मोदी-शाह की सीधी निगरानी के बाद भी असम-मिजोरम में इतना लहू क्यों बह रहा है ?
31 जुलाई 2021
हिंदुस्तान के उत्तर पूर्व के 2 राज्यों असम और मिजोरम के बीच जैसा हिंसक संघर्ष शुरू हुआ है, वह भारत और चीन के बीच पिछले एक-डेढ़ बरस में कई बार हुई हिंसक मुठभेड़ के टक्कर का है। भारत और चीन के सीमा संघर्ष में कुछ दर्जन हिंदुस्तानी फौजियों के मारे जाने की बात भारत सरकार ने मंजूर की है, और हो सकता है कि चीन में भी कई सैनिक मारे गए हों, लेकिन हिंदुस्तान के भीतर के अगल-बगल के ये दो राज्य, असम और मिजोरम, दोनों भाजपा की, या गैरकांग्रेस सरकार के रहते हुए जिस तरह से हिंसक संघर्ष में असम पुलिस के 6 लोग मारे गए हैं और असम ने मिजोरम के कई सरकारी लोगों के खिलाफ जुर्म कायम किया है। यह पूरा सिलसिला भारत के 2 राज्यों के बीच है पिछले बहुत समय में तो कभी सुनाई नहीं पड़ा था। असम और मिजोरम का इतिहास बताता है कि अंग्रेजों के वक्त 1873 में जो सीमा तय की गई थी, मिजोरम उस सीमा को लागू करवाना चाहता है, और अंग्रेजों के ही वक्त 1933 में एक दूसरी सीमा तय हुई थी, जिसे कि असम मानता है। इन दोनों राज्यों के बीच झगड़े की एक दूसरी वजह यह भी है कि 1972 के पहले तक मिजोरम असम का हिस्सा था, उसके बाद मिजोरम को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था, और 1987 में वहां लंबे समय से चली आ रही उग्रवादी हिंसा को खत्म करने के लिए मिजोरम समझौते के बाद उसे राज्य का दर्जा दिया गया, और 20 साल से चले आ रहा विद्रोह खत्म हो गया।
असम और मिजोरम के बीच कई किस्म के नक्शे और कई किस्म की सरहदों के चलते हुए दोनों राज्य एक-दूसरे पर अपनी जमीनों पर अवैध कब्जे की शिकायतें लंबे समय से करते आ रहे हैं लेकिन लोगों को यह उम्मीद थी कि पिछले 6 बरस से जिस तरह केंद्र में बहुत ही मजबूत माने जाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अभी के गृह मंत्री अमित शाह देश पर अपनी मजबूत पकड़ रखते हैं और उन्हीं की पार्टी की राज्य सरकार असम में है, और मिजोरम में उनके समर्थन से है, तो ऐसे में इस तरह की कोई नौबत किसी के लिए भी अकल्पनीय है। इन प्रदेशों में गैरकांग्रेस मुख्यमंत्रियों के रहते हुए और दिल्ली की लगातार निगरानी के बीच ऐसी हिंसा जिसमें एक राज्य के पुलिस के लोग मारे जाएं इसकी देश में दूसरी कोई मिसाल याद नहीं पड़ती है।
अभी 24 जुलाई को ही उत्तर पूर्व के दौरे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहुंचे थे और उन्होंने कहा था कि नरेंद्र मोदी की सरकार इस इलाके के सीमा संबंधी सभी मामलों को सुलझाना चाहती है और इसके 2 दिन के भीतर ही इन दो राज्यों के बीच बीच इतना बुरा हिंसक संघर्ष छिड़ गया। अमित शाह ने एक किस्म से असम के बीजेपी मुख्यमंत्री को सारे उत्तर-पूर्वी राज्यों का मुखिया बनाकर रखा है। फिर भी आज हालत यह है कि असम सरकार ने मिजोरम आने-जाने वाले अपने लोगों और मिजोरम में गए हुए या रहने वाले अपने लोगों के लिए चेतावनी जारी की है कि वे बहुत ही सावधानी बरतें। जानकारों का मानना है कि देश में इसके पहले कभी किसी राज्य ने पडोसी के लिए ऐसी चेतावनी जारी नहीं की थी। दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच जुबानी जंग छिड़ी हुई है, दोनों सुप्रीम कोर्ट तक जमीनों पर अपने दावे लेकर कानूनी लड़ाई लडऩे के लिए तैयार हैं, और सरहद पर तो धमाकों के साथ ऑटोमैटिक हथियारों के साथ संघर्ष चल ही रहा है।
कांग्रेस ने ऐसी नौबत के लिए गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा की इन दोनों राज्य सरकारों पर तोहमत लगाई है। लेकिन भाजपा का यह कहना है कि यह सीमा विवाद नया नहीं है और लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार के रहते हुए कांग्रेस ने इन विवादों को निपटाया नहीं, नतीजा यह निकला कि वे आज भडक़ रहे हैं। अभी हम ऐसे किसी इतिहास की तरफ जाना नहीं चाहते क्योंकि इतिहास में जितना पीछे जाएंगे, उतना तो सरहदी विवाद बढ़ा हुआ दिखेगा, लेकिन यह बात तो है की इन दो राज्यों के बीच हाल के वर्षों में ऐसा खूनी संघर्ष कभी हुआ नहीं था। और किसी एक पार्टी की सरकार देश पर भी हो और इन दोनों प्रदेशों में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष उसी की सरकार हो और उसके बाद ऐसी नौबत आए तो वह अधिक फिक्र की बात है। अदालत से लेकर सरहद तक यह तनाव बना हुआ है और केंद्र सरकार को कुछ हजार हथियारबंद सिपाही केंद्रीय बलों से इस सरहद के लिए भेजने पड़े हैं। केंद्र सरकार अपने असर का इस्तेमाल करे, और भाजपा अपने असर का इस्तेमाल करे, और देश की आज की नौबत बताती है कि इन दोनों की सारी ताकतें कुल मिलाकर दो ही हाथों में केंद्रित है। इसलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह को इन दोनों प्रदेशों के भले के लिए, देश के भले के लिए, और अपनी पार्टी की सरकारों के भले के लिए इस टकराव पर तुरंत काबू पाना चाहिए। यह काम वह कैसे करेंगे यह बताना मछली के बच्चे को तैरना सिखाने जैसा होगा क्योंकि मोदी और शाह ऐसी नौबतों से जूझने की समझ रखते हैं, और ताकत भी रखते हैं। हैरानी तो इस बात की है इन दोनों के रहते हुए असम और मिजोरम के बीच इतना खून बह रहा है।
पेगासस पर पीआईएल, अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
30 जुलाई 2021
हिंदुस्तान में पैगासस नाम के जासूसी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की खबरों पर देश के दो प्रमुख पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई थी, जिसे अगले हफ्ते सुनने के लिए मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने मंजूर किया है। कांग्रेस पार्टी से जुड़े और सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के सामने उठाया था और उन्होंने इस याचिका का जिक्र किया था जो कि हिंदू नाम के अखबार के पूर्व मुख्य संपादक एन राम और एशियानेट नामक मीडिया समूह के संस्थापक शशि कुमार की ओर से लगाई गई है। इस याचिका में अपील की गई है कि पैगासस को लेकर जितने तरह के तथ्य दुनिया के मीडिया में सामने आ रहे हैं, उनमें हिंदुस्तान के भी करीब डेढ़ सौ लोगों के फोन नंबर संभावित निशाने के रूप में पहचाने गए हैं, इसलिए देश में इसकी जांच सर्वोच्च स्तर पर होनी चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा या रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में इस मामले की जांच की जाए, और सरकार से यह भी पूछा जाए कि क्या उसने इस जासूसी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का लाइसेंस लिया है, या इसका इस्तेमाल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी तरह की निगरानी के लिए किया है?
यह मुद्दा पिछले एक पखवाड़े से लगातार खबरों में बना हुआ है और संसद में भी विपक्ष ने इसे जोर-शोर से उठाया है. विपक्ष के एक सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का नाम भी ऐसे संभावित निशाने के रूप में खबरों में आया है कि उनका और उनके सहयोगियों का फोन पेगासस नाम के जासूसी सॉफ्टवेयर से घुसपैठ करने की लिस्ट में मिला है। अब तक सरकार की तरफ से साफ-साफ कुछ नहीं कहा गया है, और संसद के बाहर, संसद के भीतर, कहीं पर भी सरकार ने न तो यह बात मानी है कि उसने इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है और ना ही उसने यह ही कहा है कि उसने यह सॉफ्टवेयर नहीं लिया है, और उसने ऐसी जासूसी नहीं करवाई है. इसी सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पेगासस जासूसी की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग की घोषणा की है जिसमें दो रिटायर्ड जजों को मनोनीत किया गया है. इसके साथ ही यह एक दिलचस्प बहस भी शुरू हो गई है कि केंद्र सरकार पर इस जासूसी सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की तोहमत लग रही है तो उसकी जांच देश का कोई एक राज्य कैसे करवा सकता है? लेकिन अगर बंगाल के लोगों के नंबर ऐसे जासूसी कांड में सामने आ रहे हैं जिनमें ममता बनर्जी के रणनीति के सलाहकार रहे प्रशांत किशोर का नाम भी आया है, और ममता बनर्जी के साथ राजनीति में काम करने वाले उनके भतीजे का नाम भी आया है, तो हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की किसी बहस में पश्चिम बंगाल सरकार का यह अधिकार साबित हो कि वह इस मामले की जांच करवा सकती है, और भारत सरकार से भी जवाब मांग सकती है। ऐसे ही जटिल मामलों पर जब अदालतों में बहस होती है, तब यह बात भी तय होती है कि केंद्र और राज्य के संबंधों में किसके क्या अधिकार रहते हैं, और दोनों एक दूसरे के प्रति किस हद तक जवाबदेह रहते हैं। ममता की शुरू करवाई जांच से यह सवाल भी उठता है कि अगर भारत सरकार से परे किसी और ने हिन्दुस्तानियों की ऐसी साईबर सेंधमारी की है, जासूसी की है, तो उसकी जांच करवाने की जिम्मेदारी तो भारत सरकार की ही होनी चाहिए! केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ऐसी जांच क्यों नहीं करवा रही है?
पेगासस के मार्फत जासूसी को लेकर यह सॉफ्टवेयर को बनाने वाली कंपनी चाहे कितने ही दावे कर ले कि वह इजराइल की डिफेंस मिनिस्ट्री की इजाजत के बाद ही किसी देश की सरकार को यह सॉफ्टवेयर बेचती है, दुनिया का तजुर्बा यह है कि कारोबारियों का बहुत से मामलों में कोई ईमान नहीं होता है और कारोबार किसी नैतिकता की बंदिशों से बंधे भी नहीं रहता। इसलिए इस इजराइली कंपनी के इस दावे पर भी हमको अधिक भरोसा नहीं है कि वह सिर्फ सरकारों को यह सॉफ्टवेयर बेचती है। लेकिन दूसरी तरफ यह कहते हुए हम भारत सरकार को साफ-साफ जवाब देने की जिम्मेदारी से बरी भी नहीं करते कि उसे खुलकर यह बताना चाहिए कि उसने यह जासूसी सॉफ्टवेयर खरीदा था या नहीं और इसका इस्तेमाल किया था या नहीं। यहां पर इस बात की चर्चा भी प्रासंगिक होगी कि देश में आईटी मंत्रालय की सलाहकार समिति के मुखिया शशि थरूर ने पिछले दिनों यह कहा था कि भारत का कानून हैकिंग की इजाजत नहीं देता है, और इस कानून के तहत हैकिंग करने वालों को कई बरस की कैद देने का प्रावधान है। दूसरी तरफ देश के लोगों के डेटा सुरक्षा के लिए एक कानून की तैयारी चल रही है, लेकिन जब तक वह बनता नहीं है और लागू नहीं होता है तब तक भी देश के लोगों का मौलिक अधिकार तो अपनी जगह है ही जिसमें उन्हें उनको अपनी जिंदगी की निजता का अधिकार भी हासिल है। इसलिए केंद्र सरकार पर यह जिम्मेदारी बनती है कि जब दुनिया के बहुत से प्रतिष्ठित अखबार मिलकर कोई रिपोर्ट बना रहे हैं और सबूतों के आधार पर बना रहे हैं, फॉरेंसिक जांच के आधार पर बना रहे हैं, तो सरकार को भी उस पर अपना जवाब देना ही चाहिए।
आज हिंदुस्तान के जिस तरह के पत्रकारों और मानव अधिकार सामाजिक कार्यकर्ताओं, सुप्रीम कोर्ट के कम से कम एक भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश, और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ देश शोषण की शिकायत करने वाली महिला के पूरे परिवार, कुछ केंद्रीय मंत्री, कई विपक्षी नेताओं की जासूसी के जैसे आरोप हवा में तैर रहे हैं वैसे में सरकार की यह जवाबदेही बनती है कि उसे सामने आकर पाक-साफ होकर दिखाना चाहिए। सरकार की चुप्पी उसे ऐसी जासूसी का जिम्मेदार ही ठहराएगी। जनाधारणा लोकतंत्र में बड़ी चीज होती है और आज जनधारणा यह मांग करती है कि सरकार सार्वजनिक रूप से और अधिकृत रूप से इस बात को कहे कि उसने ऐसी जासूसी की है या नहीं की है। लोगों को ऐसे में याद पड़ रहा है कि किस तरह कर्नाटक में एक वक्त रामकृष्ण हेगड़े की एक सरकार जासूसी के एक मामले में गिरी थी। लोगों को यह भी याद पड़ रहा है कि केंद्र में चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी सरकार एक अलग किस्म की जासूसी के मामले में गिरी थी। हिंदुस्तान का कानून और यहां के राजनीतिक मूल्य इस तरह की जासूसी को बर्दाश्त नहीं करते हैं, और अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट इस जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इस मामले को पूरी गंभीरता से लेगा ऐसी हमें उम्मीद है।
भगवान जगन्नाथ के घर से निकली एक मिसाल पर बाकी हिंदुस्तान भी चले...
29 जुलाई 2021
अभी चार दिन पहले हिंदुस्तान में बड़ी अहमियत वाली एक बात हुई लेकिन उसे खबरों में ठीक से जगह भी नहीं मिल पाई क्योंकि वह सनसनीखेज नहीं थी, वह राजनीति या क्रिकेट नहीं थी, जुर्म नहीं थी, सेक्स नहीं थी, उससे अधिक जगह राज कुंद्रा की पॉर्नोग्राफी को मिलती रही, उससे अधिक जगह राजनीति के ओछे आरोपों को मिलती रही। लेकिन यह मुद्दा ऐसा है जिस पर लिखना सोचना और अमल करना जरूरी है। देश में जो एक पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता है, उस ओडिशा के पुरी को यह फख्र हासिल हुआ है कि वह हिंदुस्तान का ऐसा पहला शहर बना है जहां नल के पानी को पिया जा सकता है। भारत के शुद्ध और साफ पानी के जो पैमाने हैं, उन पर जगन्नाथपुरी शहर के नलों का पानी खरा उतरा है। और ऐसा भी नहीं कि नल से साफ पानी कुछ गिने-चुने घंटे आता है कि लोग उन्हें घरों में भर लें। चौबीसों घंटे पुरी के नलों से ऐसा साफ पानी आ रहा है कि जिसे पूरी तरह भरोसे के साथ पिया जा सकता है। वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पहल पर पूरे प्रदेश में इस सुजल योजना का विस्तार किया जा रहा है। और ओडिशा राज्य सरकार का यह कहना है कि पुरी की ढाई लाख आबादी और साल भर में वहां पहुंचने वाले दो करोड़ पर्यटकों को यह शुद्ध पानी पूरे वक्त हासिल रहेगा जिसे पूरे भरोसे के साथ पिया जा सकेगा। सरकार का यह अंदाज है कि इससे हर बरस करीब तीन करोड़ प्लास्टिक बोतलें बचेंगी जिनमें भरा हुआ पानी साल भर में यहां खर्च होता है। सरकार का यह भी अंदाज है कि इससे करीब 400 टन प्लास्टिक कचरा बचेगा।
आज हिंदुस्तान की किसी भी किस्म की सरकारी तस्वीरों को देखें, जिनमें कोई कार्यक्रम हो रहा हो या मंच पर कुछ चल रहा हो, या कोई सरकारी बैठक हो रही हो, तो उनमें से हर मेज पर प्लास्टिक की बोतल में पानी लोगों के सामने दिखता है। सरकारी दफ्तरों में बड़े अफसरों के लिए, या नेताओं के बंगलों में अधिकतर लोगों के लिए, ऐसी बोतलों के बक्से भरे रहते हैं। और लोग अब आदी हो गए हैं कि कौन खतरा उठाएं, उसके बजाय बाजार का बोतल बंद महंगा ब्रांड पानी खरीद कर अपनी हिफाजत का ख्याल रखा जाए। नतीजा यह हो रहा है कि प्लास्टिक की बोतलों का अंबार बढ़ते ही चल रहा है. प्लास्टिक प्रदूषण का एक तरफ पहाड़ बन रहा है और दूसरी तरफ समंदर के पानी में ऐसी खाली बोतलें पहुंचकर किनारों को इतना प्रदूषित कर रही है कि वहां जल जीवन खत्म होते जा रहा है क्योंकि इन बोतलों को पार करके सांस लेना पानी के जानवरों के लिए मुमकिन नहीं रह गया है। फिर जैसा कि प्लास्टिक का विज्ञान बतलाता है ये बोतलें धरती पर हजारों बरस तक खत्म नहीं होनी हैं। और आज प्लास्टिक के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बोतलबंद पानी हो गया है जो कि पूरी तरह से गैरजरूरी था। अगर स्थानीय सरकारें साफ पानी उपलब्ध करा सकतीं तो इन बोतलों की किसी को जरूरत ही नहीं पड़ती।
यूरोप के देशों में आमतौर पर यह दिखता है कि सार्वजनिक जगहों पर नल लगे हुए हैं जिनसे लोग पानी पीते ही रहते हैं और अपनी बोतलों में भरते रहते हैं। बहुत से विकसित देश ऐसे हैं जहां होटलों के बाथरूम में यह तख्ती लगी रहती है कि बाथरूम के नल से पीने के लिए पानी लिया जा सकता है, पानी एकदम साफ और सुरक्षित है। दूसरी तरफ आज हिंदुस्तान में अतिसंपन्न तबका ऐसा भी है जो अपने घर के भीतर फिल्टर का पानी भी नहीं पीता है, और घर के भीतर भी कारखाने की बोतलों का महंगा पानी पीता है। एक तरफ सचिन तेंदुलकर और हेमा मालिनी जैसे लोग संसद में एक-एक कुर्सी पर कब्जा करके बरसों तक बैठे रहते हैं, और पीने के पानी के ब्रांड का इश्तिहार करते हैं, वाटर फिल्टर का इश्तिहार करते हैं, दूसरी तरफ इन लोगों ने संसद के इतने बरसों में देश के गरीब लोगों को साफ पानी मिलने के हक के बारे में कभी एक शब्द नहीं कहा, ना संसद के भीतर कहा, ना संसद के बाहर का है। देश के लोगों को साफ़ पानी मिलने लगेगा तो इनके इश्तिहार ख़त्म न हो जायेंगे?
इस देश की तकलीफ यह है कि जिन लोगों के कंधों पर सरकारी योजनाएं बनाने और उन पर अमल करने का जिम्मा है, ऐसे नेता और अफसर अपने खुद के लिए जनता के पैसों पर महंगा पानी खरीद लेते हैं, और फिर जनता को गंदे पानी के हवाले कर देते हैं। अगर जनता के दबाव में ऐसा होने लगे कि सरकारी और राजनीतिक बैठकों में, और सार्वजनिक कार्यक्रमों में तमाम नेताओं और अफसरों को वहीं मौजूद नल का पानी ही परोसा जाएगा, तो हो सकता है कि बड़ी रफ्तार से नलों का पानी साफ होने लगे। यह कुछ उसी किस्म का है कि अगर सरकारी दफ्तरों में नेताओं और बड़े अफसरों को भी आम शौचालयों में जाना पड़े, आम पेशाबघरों में जाना पड़े, तो वे शौचालय और पेशाब घर साफ रहने लगेंगे। इसलिए देश की किसी हौसलामंद सरकार को सबसे पहले तो यह करना चाहिए कि वह एक तारीख की मुनादी कर दे किस तारीख के बाद किसी के लिए बोतलबंद पानी का इंतजाम नहीं किया जाएगा, और मंत्री, अफसर और दूसरे लोग सरकारी इमारतों में या सार्वजनिक कार्यक्रमों में आम नलों का ही पानी पिएंगे।
ओडिशा का जगन्नाथपुरी इस देश के ही एक पिछड़े राज्य का एक हिंदू तीर्थ स्थान है जहां कि अंधाधुंध पर्यटक भीड़ रहती है, और जहां बहुत साफ-सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में ओडिशा सरकार ने पूरे देश में एक पहल करके दिखाई है, और ओडिशा तो अपने बाकी शहरों के लिए इस इंतजाम को बढ़ा रहा है, लेकिन बाकी प्रदेशों को अपने बारे में सोचना चाहिए। हिंदुस्तान के उन बड़े शहरों को भी अपने बारे में सोचना चाहिए जो कि स्मार्ट सिटी नाम के केंद्र सरकार के पाखंड के तहत हजारों करोड़ों रुपए पा चुके हैं, और इनमें से अधिकांश हिस्सा मनमानी के दिखावे में बर्बाद भी कर चुके हैं। जबकि किसी भी स्मार्ट सिटी को सबसे पहले अपनी सिटी के ढांचे में आम जनता के लिए पीने का साफ पानी, सडक़ और नाली की सफाई, और रोशनी का इंतजाम, इन दो-तीन बुनियादी चीजों का इंतजाम सबसे पहले करना था। लेकिन जिन कामों में भ्रष्टाचार सबसे अधिक अनुपात में हो सकता है, स्मार्ट सिटी वैसे ही कामों में लग गईं और जनता का पैसा बर्बाद होते चले गया। जिन शहरों में लोग जागरूक हैं वहां लोगों को अपनी स्थानीय संस्था को पुरी की यह मिसाल देते हुए सार्वजनिक रूप से उन्हें चुनौती देनी चाहिए कि वे ओडिशा के इस शहर की कामयाबी का मुकाबला करके दिखाएं तब अपने आपको स्मार्ट कहें।
चर्च की बड़े परिवार को आर्थिक मदद की योजना का मकसद ?
28 जुलाई 2021
धर्म की विज्ञान से दुश्मनी कुछ अधिक ही गहरी दिखती है। कई धर्मों के सबसे लापरवाह फतवे देने वाले नेता अपने-अपने धर्म के लोगों से अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने के लिए बोलते हैं. यह एक अलग बात है कि ऐसे गैरगंभीर लोगों की बात को उनके समाज के लोग भी ठीक से नहीं सुनते, और इसीलिए हिंदुस्तान की आबादी आसमान तक पहुंचने के बजाय धरती पर ही सिमटती जा रही है। लेकिन एक खबर केरल से आई है जहां पर एक कैथोलिक चर्च ने अपने सदस्यों के लिए एक नई योजना की घोषणा की है जिसमें 5 से अधिक बच्चे वाले परिवारों को चर्च की तरफ से आर्थिक मदद दी जाएगी। यह भी कहा गया है कि जो महिला चौथे, या उसके बाद के बच्चे को जन्म देगी तो उसके लिए चर्च के अस्पताल में कोई फीस नहीं ली जाएगी। इसे लोग इस बात से जोडक़र देख रहे हैं कि केरल में ईसाइयों की आबादी का अनुपात गिर रहा है और आबादी में अपना अनुपात बनाए रखने के लिए भी शायद किसी चर्च ने ऐसी योजना बनाई हो. जो भी हो, कुल मिलाकर धर्म लोगों के पारिवारिक जीवन में इस तरह दखल दे रहा है कि वह आज लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए बढ़ावा दे रहा है। यह कोई बहुत नई बात भी नहीं है क्योंकि ईसाई चर्च हमेशा से गर्भपात का भी विरोधी रहा है, और गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल का भी विरोधी रहा है।
तकरीबन तमाम धर्म बच्चों के जन्म को ईश्वर की मर्जी से जोडक़र देखते हैं, और धर्म का नजरिया यह रहता है कि जो पेट देता है, मुंह देता है, वह हाथ भी देता है। इसलिए धर्म को यह लगता ही नहीं कि ईश्वर किसी को भूखे मरने देगा। यह अलग बात है कि ईश्वर के ऊपर ऐसा अंधविश्वास किसी काम का नहीं रहता, और लोग कुपोषण के शिकार होकर भूखे मरते ही हैं. ईश्वर किसी को बचाने नहीं आता, ईश्वर किसी का पेट नहीं भरता। और यह एक अलग बात है कि ईश्वर के नाम पर सभी धर्म स्थानों के पुजारी, पादरी, ग्रंथी, मुल्ला, सभी अपने-अपने पेट भर लेते हैं। अब केरल में एक चर्च की की हुई ऐसी घोषणा के बारे में उसका खुद का कहना है कि महामारी के वक्त जो आर्थिक मुसीबतें लोगों के ऊपर आई हैं उसमें राहत देने के लिए बड़े परिवारों को कुछ आर्थिक मदद की जा रही है जो कि बहुत बड़ी नहीं है, 5 से अधिक बच्चों के परिवारों को 15 सौ रुपए महीने की सहायता दी जाएगी। चर्च का कहना है कि यह बच्चे अधिक पैदा करने के लिए कोई बढ़ावा नहीं है, यह हो चुके बच्चों को पालने के लिए एक बहुत मामूली सी आर्थिक सहायता है।
अब यह जो भी हो, जिस वजह से भी यह आर्थिक सहायता दी जा रही हो, कुल मिलाकर बात यह है कि अधिक बच्चे पैदा करने को चर्च के बढ़ावे के रूप में ही इसे देखा जाएगा और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच में इसकी प्रतिक्रिया होगी। लोग मानकर चलेंगे कि यह आबादी बढ़ाने की वेटिकन की साजिश है, ठीक उसी तरह जिस तरह मुस्लिमों का विरोधी एक तबका यह मानकर चलता है कि हर मुस्लिम चार शादी करते हैं और 16 बच्चे पैदा करते हैं। यह एक अलग बात है कि मुस्लिमों की आबादी के भीतर शायद 1 फीसदी भी ऐसे लोग नहीं होंगे जिन्होंने चार शादियां की होंगी, और शायद ही कोई मुस्लिम हिंदुस्तान में ऐसा होगा जिसने 16 बच्चे पैदा किए होंगे, लेकिन एक नारे के रूप में लोगों के बीच में नफरत और हिकारत पैदा करने के लिए यह मुद्दा उछाला जाता रहा है।
अब अगर यह बात चर्च की तरफ से नहीं आई होती और किसी जनकल्याणकारी सरकार की तरफ से आई होती तो भी उसके पीछे एक तर्क हो सकता था। रूस की तरह के ऐसे कई देश हैं जहां पर अधिक बच्चों पर अधिक सुविधा देने की सरकारी नीति ही है। लेकिन हिंदुस्तान में सरकार की आर्थिक मदद कम मौजूद है, और उसे पाने की कोशिश करने वाली आबादी बहुत बड़ी है, इसलिए यह बात समझने की जरूरत है कि सरकार की या समाज की कोई भी योजना ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसका प्रत्यक्ष या परोक्ष असर आबादी को बढ़ाने वाला हो। हम जबरदस्ती किसी आबादी को काबू करने के हिमायती नहीं हैं, लेकिन पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ऐसी जनसंख्या नीति की घोषणा की जिसमें दो से अधिक बच्चे होने पर लोग स्थानीय संस्थाओं के कोई चुनाव नहीं लड़ सकेंगे, सरकारी नौकरी के लिए अर्जी नहीं दे सकेंगे, और उन्हें 2 बच्चों से अधिक पर किसी तरह की सरकारी रियायती योजनाओं का फायदा नहीं मिलेगा, तो हमने कुछ शर्तों के साथ उस नीति का समर्थन किया था। हमारा यह मानना है कि जो लोग ऐसी योजना को मुस्लिम समाज पर हमला मान रहे हैं उन्हें यह भी देखना चाहिए कि अधिकतर मुस्लिम परिवार अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर क्या बना पा रहे हैं? क्या वे उन्हें मजदूर, ड्राइवर, और मामूली कारीगर से ऊपर कुछ बना पा रहे हैं? तो फिर उस समाज में अधिक बच्चों को बढ़ावा देने की क्या जरूरत है? और बात सिर्फ मुस्लिमों की नहीं है उन तमाम जातियों और धर्मों की है जिनके लोगों पर यह जनसंख्या नीति बराबरी से लागू होगी। वहां भी दो बच्चों से अधिक जिन्हें पैदा करना हो उन्हें सरकार कोई भी रियायती योजना का फायदा क्यों दे? और आबादी को घटाने के लिए सभी धर्मों पर अगर एक साथ, एक जैसी नीति लागू की जा रही है, तो इसे सिर्फ स्थानीय संस्था के चुनाव के बजाय विधानसभा और संसद के लिए भी लागू करना चाहिए कि 2 से अधिक बच्चे होने पर कोई सांसद या विधायक भी ना बन सके।
वैसे तो चर्च हो या मंदिर, मस्जिद, यह सब अपने हिसाब से अपने लोगों को बढ़ावा देने के लिए आजाद हैं, और लोगों को याद होगा कि देश में सबसे ज्यादा रफ्तार से गिरने वाली पारसी आबादी से फिक्रमंद पारसी समाज ने यह योजना घोषित की थी कि जो पारसी जोड़ा दो या अधिक बच्चे पैदा करेगा उसे समाज की तरफ से एक फ्लैट दिया जाएगा। लेकिन यह बात भी समझने की जरूरत है कि पारसी समाज इतना संपन्न है कि उसमें बेरोजगारी सुनाई नहीं पड़ती है, और लोग बड़े-बड़े कारोबार चलाते हैं, इसलिए वहां तो अगर लोगों के बच्चे कुछ अधिक हैं तो भी वे उन बच्चों का खर्च उठा सकते है लेकिन जिन समाजों में लोग गरीब अधिक हैं वहां पर इस समझदारी को दिखाने की जरूरत है कि वह कम बच्चे पैदा करें उन्हें अधिक पढ़ा-लिखाकर बेहतर रोजगार में लगाएं, और उनकी जिंदगी बेहतर बनाएं।
यूपी में जिन लोगों को मुस्लिम समाज पर आबादी की रोक का हमला दिख रहा है, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या हर समाज के बच्चे सीमित होने पर सबसे अधिक फायदा उस समाज का नहीं होगा जिस समाज में आर्थिक स्थिति आज सबसे आगे सबसे अधिक खराब है? अभी केरल की सरकार और दूसरे धर्म के लोगों की प्रतिक्रिया, वहां के चर्च के ऐसे फैसले पर आनी बाकी है, और यह भी हो सकता है कि 15 सौ रुपए महीने की रकम आबादी बढ़ाने के काम ना आए, केवल मदद के लिए काम आए, क्योंकि पढ़ाई-लिखाई वाले केरल में 15 सौ रुपए महीने में भला कितने बच्चों को पाला जा सकता है? खैर उत्तर प्रदेश हो या असम की जनसंख्या नीति हो, या केरल के चर्च की यह घोषणा हो, हमारा मानना है कि जनसंख्या पर सभी लोगों को खुलकर बात करनी चाहिए और बहस बहुत हड़बड़ी में खत्म नहीं करनी चाहिए। जो समाज जितना जिम्मेदार होगा अपने सदस्यों का जितना भला चाहेगा वह जनसंख्या पर एक सीमा का हिमायती भी होगा। जनसंख्या की सीमा किसी पर जबरदस्ती नहीं लादी जा रही है और अगर आज के बाद बनने वाले जनप्रतिनिधियों पर ऐसी कोई सीमा लागू होती है, तो वह हमारे हिसाब से ठीक ही रहेगी क्योंकि वह इस कानून के लागू होने के बाद पैदा होने वाले बच्चों पर लागू होगी, न कि आज के बच्चों पर।
भिखारियों को शहरी-संपन्न लोग पोल्ट्री की मुर्गी बना देना चाहते हैं
27 जुलाई 2021
सुप्रीम कोर्ट में अभी एक याचिका लगाई गई है जिसमें कहा गया है कि कोरोना के खतरे को देखते हुए सडक़ों पर से भिखारियों को हटाया जाए, उनका टीकाकरण किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को मानने से साफ-साफ इनकार कर दिया और कहां कि अदालत कोई आभिजात्य दृष्टिकोण नहीं लेगी, और अदालत ने यह भी कहा कि कोई भी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते, लोग शिक्षा और रोजगार के अभाव में मजबूरी में भीख मांगते हैं क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं रहता। अदालत ने साफ-साफ यह कहा कि वे लोगों को सडक़ों से हटाने के लिए बिल्कुल नहीं कहेंगे, भिखारियों को सार्वजनिक जगहों से हटाने के लिए बिल्कुल नहीं कहेंगे, लेकिन वे सरकार से यह जरूर पूछेंगे कि इन लोगों को टीके कैसे लगाए जा सकते हैं, और कैसे इन्हें बुनियादी सुविधाएं दी जा सकती हैं। अदालत ने साफ-साफ कहा यह एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है और भिखारियों को सार्वजनिक जगहों से हटाकर इसका समाधान नहीं किया जा सकता।
इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों का नजरिया सच में ही इंसानियत से भरा हुआ दिख रहा है। यह मामला जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एम आर शाह की अदालत का है, जहां पर दिल्ली के एक व्यक्ति ने एक जनहित याचिका लगाई है जिसमें देशभर से भिखारियों, आवारा, या बेघर लोगों को चौराहों से, बाजारों और सार्वजनिक जगहों से भीख मांगने से हटाकर उनके पुनर्वास की मांग की गई है।
भिखारियों का पुनर्वास दुनिया के किसी भी विकसित या विकासशील देश में एक बड़ा जनकल्याणकारी कार्य माना जा सकता है। लेकिन हिंदुस्तान में हमने देखा है कि सरकारी निराश्रित गृह में भिखारियों को ले जाकर छोड़ दिया जाता है, जहां उन्हें दो वक्त का खाना तो मिलता है, सोने की जगह मिल जाती है लेकिन उनकी जिंदगी वहीं खत्म हो जाती है। मानो सरकार ने यह मान लिया हो कि उन्हें अब मरने तक इसी तरह जीना है। और चूँकि वे इंसान हैं, इसलिए मुर्गीखाने की मुर्गियों की तरह उनसे अंडे की उम्मीद भी नहीं की जाती, और बस उन्हें दाना दिया जाता है ताकि वे जिंदा रह जाएं। जो लोग इस किस्म के पुनर्वास को भिखारियों के लिए पुनर्वास मानते हैं, उनकी इंसानियत की समझ बड़ी सीमित है। उन्हें लगता है कि सडक़ों पर भीख मांगने वाले लोगों को वहां से हटाकर किसी एक निराश्रित गृह में रख दिया जाए तो उनका बड़ा भला हो जाएगा। हकीकत तो यह है की भिखारी चौराहे या बाजार, या मोहल्ले की गलियों में अपनी मर्जी से घूमते हैं, अलग-अलग किस्म का खाना पाते हैं, कुछ नगदी भी पाते हैं, कुछ अपने पर खर्च करते हैं, और कुछ बचाते हैं।
बहुत से भिखारी ऐसे भी रहते हैं जो अपने परिवार के किसी तरह के संपर्क में रहते हैं और किसी मौके पर अपने परिवार के लोगों की मदद करने के लिए भी अपनी कमाई और बचत में से कुछ पैसे देते हैं। भीख मांगने का यह पूरा सिलसिला चाहे कितना ही अमानवीय लगे, लेकिन यह इस मायने में मानवीय रहता है कि इसमें भिखारी अपनी मर्जी के मालिक रहते हैं, इन्हें जब मंदिर के सामने बैठना रहता है तो वह गुरुवार को साईं बाबा का मंदिर देख लेते हैं, सावन सोमवार को शंकर का मंदिर, शुक्रवार को किसी मस्जिद के सामने, और इतवार को चर्च के सामने। उन्हें पता रहता है कि किस गुरुद्वारे के लंगर से उन्हें कुछ मिल सकता है, या सडक़ किनारे जब शामियाना लगते दिखता है तो भी उन्हें पता रहता है कि कहां भंडारा लगने वाला है। उन्हें यह भी मालूम रहता है कि उनके शहर में किन जगहों पर रोज गरीबों या भिखारियों को खाना बांटा जाता है। वे अपनी आजादी से रोजगार की अपनी जगह तय करते हैं, तरह-तरह की चीजें खाते हैं, और किसी को बददुआ देना, किसी को दुआ देना भी उनके हाथ में रहता है। वे सडक़ों पर आवाजाही देखते हैं, लोगों को हंसते-खेलते देखते हैं, लोगों के मनोविज्ञान का अध्ययन करते हैं, और अपने तजुर्बे का यह इस्तेमाल करते हैं कि कौन लोग उन्हें भीख दे सकते हैं, और कौन नहीं दे सकते हैं। ऐसे में अगर किसी सरकारी निराश्रित गृह में उन्हें किसी जानवर की तरह बांध दिया जाए और कहा जाए कि यही उन्हें दो वक्त का खाना मिलेगा और यही सोने की, सिर छुपाने की जगह मिलेगी, तो उसका मतलब यह है कि एक इंसान के रूप में विविधता के साथ जीने की उनकी सारी संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। इन विविधताओं के बारे में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाने वाले संपन्न तबके के लोग जो कि जाहिर तौर पर भिखारियों की फिक्र कर रहे हैं, लेकिन शायद जिनका मकसद सडक़ों पर से गंदे और बीमार दिखने वाले, फटे कपड़ों में ऐसे बूढ़े और विकलांग लोगों को हटाना है, तो ऐसे लोगों की जनहित याचिका के पीछे की जो सोच है, उसे सुप्रीम कोर्ट के कम से कम इन दो जजों ने बिल्कुल सही संदर्भ में समझा है, और सार्वजनिक जगहों से भिखारियों को हटाने से बिल्कुल मना कर दिया है, और यह कहा है कि अगर वे कोई नोटिस जारी करेंगे तो उससे ऐसा लगेगा कि वे लोगों को हटाने के हिमायती हैं, जो कि वे नहीं हैं।
दरअसल संपन्न समाज बहुत सी चीजों को अपनी नजरों के सामने से हटाना चाहता है। इसमें गरीब, बीमार, विकलांग, बेघर लोग भी हैं क्योंकि उन पर नजर पडऩे के बाद संपन्न समाज अपनी संपन्नता का बिना अपराध बोध के उस हद तक मजा नहीं ले पाता, जितना मजा लेना वह चाहता है। चौराहों पर एसी कारों के भीतर कुछ खाते-पीते लोगों को शीशा खटखटाते भिखारी खटकते हैं। इसलिए मंदिरों और धर्म स्थलों के वैराग्य से परे जिंदगी की सुख की जगहों पर ऐसे दुखी लोगों को देखना कोई नहीं चाहते। और तो और हमें पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार याद है जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री जॉन मेजर कोलकाता आए थे। कोलकाता शहर के फुटपाथ और सडक़ों से सारे के सारे भिखारियों और बेघर लोगों को शहर के बाहर ले जाया गया था। यह पूरी तरह से वामपंथी सोच के खिलाफ और गोरे शासकों के प्रति गुलामी वाली एक सोच थी कि ऐसे मेहमान के आने पर हमें अपनी जिंदगी की हकीकत भी छुपा लेना है। यह वामपंथी सरकार का एक पाखंड था कि एक अंग्रेज प्रधानमंत्री को यह दिखाए कि उसके शहर में गोरी आंखों को तकलीफ देने वाले कोई भी फटेहाल बेघर लोग नहीं है। लोगों को याद होगा कि इसी सोच के चलते हुए अभी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के ठीक पहले जब डॉनल्ड ट्रंप अहमदाबाद आए थे तो सडक़ों के किनारे की झोपड़पट्टियों को छुपाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपनी ही पार्टी की गुजरात सरकार ने उन बस्तियों के सामने पूरी दीवार खड़ी कर दी थी ताकि वहां से तेज रफ्तार बुलेटप्रूफ गाड़ी में गुजरते हुए भी ट्रंप को कोई झोपड़पट्टी न दिखे।
यह सोच नई नहीं है लेकिन यह किसी विकसित और सभ्य लोकतंत्र की सोच भी नहीं है। दुनिया में अमेरिका जैसे लोकतंत्र हैं जहां बहुत से प्रदेशों में, बहुत से शहरों में, सार्वजनिक बाग-बगीचों में बेघर लोगों ने कब्जा कर लिया है, और उनमें रहते हैं। वहां पर भी इतनी बड़ी संख्या में रहते हैं कि वहां और लोगों का घूमने जाना नामुमकिन सरीखा रहता है। लेकिन फिर भी वहां जागरूक नागरिकों का एक तबका ऐसा है जो यह मानता है कि किसी भी सार्वजनिक जगह पर पहला हक बेघर लोगों का है, उसके बाद ही कोई हक वहां घरबार वाले लोगों का हो सकता है। क्या आज हिंदुस्तान में शहरी संपन्न लोगों के बीच कोई इस सोच से बात भी कर सकते हैं कि सार्वजनिक जगहों पर पहला हक बेघर गरीब और भिखारियों का है? संपन्न तबका ऐसा तर्क देने वालों को नोंच खाएगा। लेकिन हमें बहुत खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट के इन दो जजों ने एक ऐसी राय सामने रखी है जो कि आदेश की शक्ल में सामने आने के बाद देश के दर्जनों हाईकोर्ट के सैकड़ों जजों के लिए भी एक मार्गदर्शक की तरह रहेगी कि भिखारियों को नजरों से हटा देना कोई आर्थिक सामाजिक समाधान नहीं है।
घर-परिवार के भीतर क्या नहीं हो सकता? इसलिए सब सावधान रहें
26 जुलाई 2021
राजस्थान के भीलवाड़ा की एक खबर है कि वहां दहेज प्रताडऩा के बाद एक बहू ने आत्महत्या कर ली, और इसके पहले उसने एक वीडियो बनाकर यह बयान सबके सामने रखा कि उसके पति सहित ससुराल के लोगों ने उसके साथ कई बार मारपीट की, एक बार उसे बहुत बुरी तरह पीटते हुए उसके ससुर के सामने ही सारे कपड़े फाडक़र उसे नंगा कर दिया। इस मानसिक प्रताडऩा से विचलित होकर उसने इस बारे में बयान वीडियो रिकॉर्ड किया और फिर जहर खा लिया। इस अकेली घटना पर लिखना आज शायद जरूरी नहीं लगता लेकिन एक दूसरी घटना और हुई है। वह घटना अलग किस्म की है, और एक अलग इलाके की भी है। लेकिन जिस तरह की सामाजिक प्रताडऩा का शिकार राजस्थान रहता है, उसी तरह की सामाजिक प्रताडऩा का शिकार रहने वाले एक और प्रदेश हरियाणा के हिसार में एक महिला ने पुलिस में ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट लिखाई है और उसने अपने बेटे पर ही ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया है। महिला ने कहा कि उसका पति बीमार रहता है, घर की आर्थिक हालत खराब है, और बेटा शराबी है। ऐसे में वह घर चलाने के लिए खुद पड़ोसी के खेत में मजदूरी करती है। वहां एक दिन उसके बेटे ने खेत मालिक के साथ उसका आपत्तिजनक हालत में मोबाइल पर वीडियो रिकॉर्ड कर लिया और फिर वीडियो वायरल करने की धमकी देकर नशे के लिए पैसे ऐंठने लगा। पिछले कुछ महीनों में दो लाख रुपये बेटा वसूल चुका है, और जब उसने और पैसे देने से मना कर दिया तो बेटे ने यह अश्लील वीडियो व्हाट्सएप के कई ग्रुप में भेज दिया।
अब इन दो घटनाओं को देखें तो लगता है कि और क्या सुनना और देखना बचा है? ससुर और बहू के बीच में जिस तरह के वर्जित संबंध रहते हैं, उसका ख्याल रखते हुए पुराने वक्त में जब ससुर घर के भीतर आते थे तो कोई भी दोहा-चौपाई या राम का नाम बोलते हुए भीतर घुसते थे, ताकि बहू पर्दा कर ले। ऐसा माना जाता था कि बहू और ससुर-जेठ के बीच रिश्तों का एक फासला रहना चाहिए, और सामाजिक प्रतिबंध इसे कड़ाई से लागू भी करते थे। अब अगर दहेज के लिए एक पूरा परिवार बहू को इस हद तक प्रताडि़त करे कि वह खुदकुशी कर ले, तो ऐसी खुदकुशी के पहले की उसकी बातों को सच के अलावा और क्या माना जा सकता है? इसलिए अगर पूरा परिवार बहू को पीट-पीटकर उसे सबके सामने नंगा कर दे, तो ऐसे परिवार का अदालत में नंगा होना जरूरी भी है। दूसरी तरफ एक महिला जो कि बीमार पति और शराबी बेटे को पालने के लिए मजबूरी और मजदूरी कर रही है, उसके ही किसी संबंध को लेकर बेटा उसे ब्लैकमेल करने के लिए वीडियो बना रहा है, तो फिर अब इससे घटिया और हरकत बची क्या है?अभी-अभी छत्तीसगढ़ में एक गिरफ्तारी हुई है जिसमें एक शराबी बाप ने अपनी ही बेटी से बलात्कार किया था। लेकिन वह तो फिर भी नशे में था, हरियाणा का यह बेटा तो सोच-समझकर वीडियो बनाकर अपनी मां को ब्लैकमेल कर रहा था और आखिर में वसूली बंद हो जाने पर उसने वह वीडियो जगह-जगह पोस्ट कर दिया।
इंसानी रिश्तों का यह सिलसिला हैरान करता है और सदमा भी देता है। लोग बात-बात पर इंसान की घटिया हरकतों के लिए जानवरों की मिसालें देने लगते हैं। और हम भी इंसानों की इस बेइंसाफी के बारे में कई बार लिखते रहते हैं। लेकिन इंसान हैं कि वे सदमा देना बंद ही नहीं करते। कई बार तो यह भी लगता है कि इस तरह की भयानक खबरों को छापने से क्या समाज में परिवार के भीतर भी लोगों का एक दूसरे के ऊपर से भरोसा नहीं उठ जाएगा? क्या ऐसी खबरों के बाद लोगों का एक-दूसरे के साथ जीना मुश्किल नहीं हो जाएगा? लेकिन फिर यह भी लगता है कि ऐसी खबरों की जानकारी लोगों को इसलिए भी रहना चाहिए कि वे बाकी जिंदगी अपने आसपास के दायरे से सावधान रहें और याद रखें कि आसपास के लोग भी किसी भी हद तक गिर सकते हैं, किसी भी हद तक हिंसक हो सकते हैं, इसलिए जितना भरोसा करना जरूरी हो उतना तो ठीक है लेकिन उसके बाद एक सावधानी रखना जरूरी है। परिवारों के भीतर भी लोगों को ऐसी सावधानी बरतनी चाहिए कि किसी कमजोर घड़ी में ऐसी कोई हरकत ना हो जाए जो बाद में जिंदगी भर जीना मुहाल कर दे, और किसी लडक़ी की अगर ससुराल में लगातार हिंसक प्रताडऩा चल रही है, तो उसके मां-बाप को भी उस लडक़ी को वापस वहां नहीं भेजना चाहिए, बाद में लाश पर रोने से वह लडक़ी जिंदा तो नहीं हो जाएगी।
आज की दोनों खबरें एक दूसरे से बिल्कुल ही अलग किस्म की हैं, इन दोनों को लेकर कोई एक निष्कर्ष निकालना भी बहुत आसान या मुमकिन नहीं है, लेकिन इन दोनों के साथ एक बात जरूर है कि दोनों परिवार के भीतर की हिंसा की बात हैं। इन दो मामलों से बिल्कुल अलग किस्म की एक बात यह भी है कि जितने बच्चे सेक्स शोषण के शिकार होते हैं उनमें से अधिकांश बच्चों के साथ ऐसी हिंसा परिवार के भीतर, परिवार के लोग करते हैं, या परिवार के बहुत करीबी लोग करते हैं जिनका बड़े हक और भरोसे के साथ उस घर में आना जाना होता है। इनके अलावा बच्चों का सेक्स शोषण वे लोग करते हैं जो शिक्षक होते हैं, या उनके खेल प्रशिक्षक होते हैं, या उन्हें स्कूल लाने ले जाने वाले घरेलू कामगार होते हैं। इसलिए हर परिवार को अपने भीतर जुर्म और हिंसा के ऐसे खतरों के बारे में जरूर सोचना चाहिए और इन्हें लेकर सावधान भी रहना चाहिए।
ममता और पवार, अगले आम चुनाव के पहले भी एक तालमेल जरूरी क्यों है...
25 जुलाई 2021
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दिल्ली प्रवास की खबर से राजनीति में गर्मी आ गई है कि क्या वे अगले चुनाव को लेकर अपने आपको एक सर्वमान्य विपक्षी नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं? और ऐसी अटकलबाजी के पीछे, अभी हाल में ही तृणमूल कांग्रेस के शहीदी दिवस की रैली में ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से गैर एनडीए विपक्षी दलों को एक होने का आह्वान किया था और कहा था कि अब कुल ढाई-तीन बरस बाकी हैं, और लोग अगर भाजपा को हटाना चाहते हैं तो उन्हें गठबंधन बनाकर साथ में काम करना चाहिए। ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी पर हमला करते हुए कहा था कि यह सरकार देश में एक निगरानी राज बनाना चाह रही है। यह बात पेगासस नाम के निगरानी सॉफ्टवेयर को लेकर उन्होंने कही, और निगरानी की ऐसी बातें भाजपा के कुछ बंगाल के नेता भी पिछले दिनों कह गए हैं, जिसमें एक नेता ने सार्वजनिक रूप से एक पुलिस अधीक्षक को धमकी दी कि वह किससे बात करते हैं उसके पूरे कॉल डिटेल्स उनके पास मौजूद हैं, और वह आईपीएस अफसर हैं, और क्या वह कश्मीर तबादला चाहते हैं? बंगाल के बहुत से नेताओं के साथ दिक्कत यह है कि वे जुबानी हमले करते हुए यह नहीं समझ पाते कि उनकी कही हुई बातें कैसे उनके ही लिए आत्मघाती साबित होंगी, क्योंकि ऐसी सार्वजनिक धमकी देकर इस नेता ने खुद ही को एक पुलिस जांच में उलझा लिया है। खैर हम यहां पर बंगाल की राजनीति पर अधिक बात करना नहीं चाहते क्योंकि हम राष्ट्रीय स्तर पर ममता की संभावनाओं पर बात करना चाहते हैं, और राष्ट्रीय स्तर पर ममता से परे की संभावनाओं पर भी।
दरअसल कुछ दिन पहले जब ममता बनर्जी के विधानसभा चुनाव तक के रणनीतिकार प्रशांत किशोर मुंबई जाकर दो बार शरद पवार से मिले, और उसके बाद दिल्ली आकर 10 जनपथ में उन्होंने जिस तरह से सोनिया, राहुल, और प्रियंका, इन सबसे मुलाकात की, उससे भी ये अटकलें आगे बढ़ीं कि क्या वे भाजपा के खिलाफ देश में कई पार्टियों के मोर्चे के लिए कोशिश कर रहे हैं? और सच तो यही है कि आज जब कभी इस देश में लोग मोदी सरकार से थककर, या नाराज होकर, उसे हटाने के बारे में बात करते हैं, तो पहला सवाल यही खड़ा होता है कि मोदी का विकल्प कौन है? भारत की राजनीति में इसे टीना फैक्टर कहते हैं, टीना का मतलब देयर इज नो अल्टरनेटिव। अब बात एक किस्म से सही भी है कि मोदी ने पिछले करीब 10 बरस में अपने आपको इस देश का ‘एक सबसे बड़ा’ नेता साबित करते हुए, अपने आपको ‘सबसे बड़ा नेता’ स्थापित कर दिया है। हम इसे इतिहास में मोदी की जगह नहीं बता रहे हैं, बल्कि आज की भारतीय चुनावी राजनीति में मोदी की स्थिति को बयान कर रहे हैं।
मोदी के बारे में उनके आलोचक भी जब मूल्यांकन करने बैठते हैं, और इतिहास में मूल्यांकन नहीं, आने वाले अगले आम चुनाव में उनकी चुनावी संभावनाओं के मूल्यांकन में, तो उन्हें भी लगता है कि मोदी जैसा कोई नहीं। उनमें से कुछ लोग लिखते भी हैं कि मोदी को खुद मोदी ही हरा सकते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जनसंघ से लेकर भाजपा के इतिहास तक के सबसे बड़े नेता रहे अटल बिहारी वाजपेई ने मोदी की गुजरात सरकार को राजधर्म का पालन न करने वाली सरकार माना था, उसके बाद भी मोदी पार्टी के भीतर के मोर्चे पर जीते, और उसके बाद गुजरात में उन्होंने दो-दो चुनाव जीते। इसलिए मोदी को लेकर जल्दी में कोई मूल्यांकन करना गलत होगा क्योंकि हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ है जिसने चुनाव जीतने की मशीन चलाने में ऐसी महारत हासिल की हो। बल्कि यह मशीन भी मोदी की ही बनाई हुई है, जो जानते हैं कि किस तरह भारत में मतदान के दिन भारत के चुनाव आयोग की नजरों और उसके काबू से परे जाकर नेपाल और बांग्लादेश में दिन भर मंदिरों का दौरा करके भी टीवी स्क्रीन के मार्फत हिंदुस्तान में चुनाव प्रचार किया जा सकता है। इसलिए यह बात अपने आपमें सही है कि चुनाव प्रचार के मामले में मोदी जैसा अब तक न कोई था, और न आज कोई है।
जब मोदी के विकल्प के बारे में सोचा जाए तो जो चेहरे सामने दिखते हैं वहीं से बात हो सकती है, ममता बनर्जी ने जिस अंदाज में बंगाल का चुनाव लड़ा और मोदी और शाह की टीम को बुरी शिकस्त दी, उनके सारे दावों को गलत साबित किया, उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया, तो बंगाल के चुनावी नतीजे आने के साथ-साथ ममता की राष्ट्रीय संभावनाओं के बारे में भी चर्चा शुरू होनी थी। वह चर्चा श्रद्धांजलि और अभिनंदन के मंचों से की जाने वाले विशेषण से भरी चर्चा की हद तक तो शुरू हुई, लेकिन फिर लोगों को शायद उसमें कोई दम नहीं दिखा। ममता बनर्जी जिस तरह बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और वामपंथियों दोनों को बुलडोजर से कुचल चुकी हैं, उसके बाद सवाल यह भी उठता है कि ये दोनों पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी को कितना बड़ा नेता बनाना चाहेंगी? और फिर वामपंथी तो ऐसे हैं जिनके पास केरल, बंगाल और त्रिपुरा जैसे गिने-चुने तीन राज्य ही थे, और अगर वामपंथियों की कोई संभावना केरल के बाद बचेगी तो हो सकता है कि उसमें बंगाल को वे गिनकर चल रहे हों, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विरोध करने के लिए भी वामपंथी ममता बनर्जी के साथ किसी एक गठबंधन में आएंगे ऐसा मुमकिन नहीं दिखता है।
दूसरी तरफ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जाहिर तौर पर देश के सबसे बुजुर्ग, और शायद सबसे वरिष्ठ भी, गैर भाजपाई, गैर एनडीए नेता हैं, और उनके बारे में भी ऐसी चर्चा चलती है कि वे मोदी के मुकाबले एक गठबंधन के मुखिया हो सकते हैं। लेकिन मतदाताओं के दिल को रिझाने वाली बातों को देखें तो शरद पवार के साथ भी दिक्कत यह है कि महाराष्ट्र और दिल्ली से परे आम जनता में उनका असर सीमित है। वे ममता के मुकाबले कुछ बेहतर हिंदी भाषी जरूर हैं, लेकिन हिंदी भाषण देना उनकी खूबी में कहीं नहीं है। यही दिक्कत ममता बनर्जी के साथ भी है। इसलिए मोदी के तेजाबी और जलते-सुलगते चुनावी भाषणों के मुकाबले ये दोनों नेता किसी किनारे भी नहीं टिक पाएंगे, इस बात को भूलना नहीं चाहिए।
अब बहुत से लोगों को यह लगता है कि भाजपा के अलावा कांग्रेसी एक ऐसी पार्टी है जो आज की अपनी दुर्गति में भी देश में सबसे अधिक फैली हुई पार्टी है, जिसका हर प्रदेश में अस्तित्व अभी भी बाकी है। हो सकता है कि बंगाल की तरह और राज्य भी हों जहां पर कांग्रेस का कोई भी विधायक न बचा हो, लेकिन उससे पार्टी संगठन खत्म नहीं हो पाया है और कांग्रेस एक पार्टी के रूप में अभी भी बची हुई है। कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में आज जो अनिश्चितता बनी हुई है, वह कांग्रेस की संभावनाओं पर भारी पड़ रही है। राहुल गांधी में जो लोग मोदी के मुकाबले एक चेहरा देखते हैं, उनको यह समझने में दिक्कत होती है कि अभी तो राहुल गांधी के अगला कांग्रेस अध्यक्ष बनने का भी ठिकाना नहीं है, और हो सकता है कि कांग्रेस के जो दो दर्जन बड़े नेता बागी तेवरों के साथ संगठन चुनाव की मांग कर रहे थे, उनमें से बहुत से लोग राहुल गांधी की फिर से अगुवाई के हिमायती ना हों। ऐसी हालत में राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए जैसे किसी गठबंधन का नेता बनने के पहले कांग्रेस के भीतर कांग्रेस का नेता तय होने की जरूरत रहेगी। इसलिए राहुल गांधी के बारे में मोदी के मुकाबले किसी संभावना को देखना उसी वक्त हो पाएगा जिस वक्त कांग्रेस के भीतर उनकी संभावनाएं औपचारिक रूप से तय और घोषित हो जाएं।
देश की जिन पार्टियों को मोदी के विकल्प के रूप में एक गठबंधन या एक नेता को तय करने के लिए अभी सही समय लग रहा है, उनकी सोच गलत नहीं है। लेकिन हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा पहले भी हो चुका है जब पहले एक गठबंधन बना हो उसने चुनाव जीता हो, चुनाव मुद्दों पर लड़ा और जीता गया हो, चुनाव तानाशाही के खिलाफ लड़ा गया हो और जीता गया हो, चुनाव सेंसरशिप या मनमानी या जुल्म के खिलाफ लडक़र जीता गया हो, और प्रधानमंत्री उसके बाद तय किया गया हो। हिंदुस्तान की राजनीति में चार से ज्यादा प्रधानमंत्री ऐसे हुए हैं जिनके प्रधानमंत्री बनने के ठीक पहले तक कोई उनके बारे में अंदाज नहीं लगा सकते थे कि वे प्रधानमंत्री बनेंगे। चंद्रशेखर, इंद्र कुमार गुजराल, देवेगौड़ा, नरसिंह राव, और मनमोहन सिंह। अपने वक्त में इन सभी की संभावनाएं कभी ऐसी मजबूत नहीं थीं कि इनकी अगुवाई में कोई चुनाव लडक़र, इनके चेहरे को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करके, कोई चुनाव जीता जा सकता था। लेकिन वक्त ऐसा आया कि इनमें से हर कोई प्रधानमंत्री बने, और मनमोहन सिंह तो दो-दो बार प्रधानमंत्री बने।
इसलिए हम आज राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के मुकाबले किसी चेहरे के तय होने को लेकर बहुत निराश नहीं हैं, और न ही हमें ममता बनर्जी की कोशिश या उनकी तरफ से प्रशांत किशोर की कोशिश अपरिपच् लग रही है कि अभी उसका समय नहीं आया है। ना सिर्फ अगला चुनाव लडऩे के लिए या कि प्रधानमंत्री बनने के लिए ऐसा गठबंधन होना चाहिए, बल्कि आज देश के सामने जो बहुत से खतरे खड़े हुए हैं, उनसे जूझने के लिए भी ऐसे गठबंधन की जरूरत है, और हो सकता है कि ऐसा कोई औपचारिक गठबंधन न भी बने लेकिन गैरभाजपा गैरएनडीए पार्टियों के बीच एक व्यापक तालमेल बनकर बात आगे बढ़ सके। ऐसे किसी तालमेल की जरूरत आने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी गैरभाजपाई दलों को पड़ सकती है जहाँ अभी तक के माहौल में ऐसे किसी तालमेल की कोई संभावना नहीं दिख रही है। इसलिए ममता बनर्जी या शरद पवार की पहल हो सकता है भारतीय लोकतंत्र में एक मजबूत मोर्चे के रूप में मुद्दों को लेकर अगले ढाई बरस लडऩे के काम आए, और उसके बाद के चुनाव में काम आए या ना आए यह एक अलग बात रहेगी।
वोट के बदले नोट देने के जुर्म में महिला सांसद को मिली कैद के बहाने चर्चा
19 जुलाई 2021
नोट देकर वोट खरीदने की बात हिंदुस्तानी चुनावों में इतनी आम है कि कांटे की टक्कर वाले, और मुनाफे की सीट वाले कई चुनावों में तो आखिरी के वोटों के लिए पांच-पाँच हज़ार तक देने की चर्चा सुनाई पड़ती है। अब असली रेट क्या रहता है यह तो देने और लेने वाले जानें, लेकिन संपन्न सीटों के अति संपन्न उम्मीदवार मतदान के पहले की रात को नोट बांटने के लिए उतावले रहते हैं। ऐसे में तेलंगाना में एक सांसद को वोट पाने के लिए नोट बांटने का मुजरिम ठहराते हुए एक विशेष अदालत ने 6 महीने की कैद सुनाई है। यह महिला सांसद मलोत कविता नाम की टीआरएस नेता हैं। हालांकि हिंदुस्तान में चुनावी वोट पाने के लिए वोटरों को रिश्वत देने का सिलसिला कोई नया नहीं है, और लोगों को याद होगा कि इस देश में इमरजेंसी का इतिहास इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले से चालू होता है, जिसमें इंदिरा गांधी के चुनाव को नाजायज ठहराया गया था, क्योंकि उनके एक सहयोगी सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा मंजूर हुए बिना इंदिरा का चुनावी एजेंट बन गए थे। इंदिरा पर वोटरों को कम्बल बांटने का भी आरोप था, जो कि अदालत में साबित नहीं हो पाया था। कुर्सी न छोड़नी पड़े इसलिए उस वक्त इंदिरा और संजय गांधी ने इमरजेंसी लगाना तय किया था, और आगे की कहानी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है जिस पर अधिक चर्चा आज का मकसद नहीं है।
लेकिन तेलंगाना के इस ताजा फैसले को लेकर इस बात पर चर्चा की इच्छा जरूर होती है कि क्या भारतीय चुनावों में वोटरों को रिश्वत और भ्रष्टाचार को सचमुच ही काबू में किया जा सकता है, या यह निचली अदालत का एक ऐसा फैसला है जिसे देश की आखिरी अदालत तक पहुंचने में एक पीढ़ी का वक्त लग जाएगा और सांसद का कार्यकाल पूरा भी हो चुका रहेगा? दरअसल देश भर में चुनाव के वक्त पैसों का जो नंगा नाच देखने मिलता है वह इतना डरावना हो गया है कि ऐसा लगता है कि संसद में वे लोग पहुंचते हैं जिन्हें अपनी चुनावी सीट के वोटरों को सबसे अधिक दाम पर खरीदने की ताकत हासिल रहती है। दक्षिण भारत में वोटों का रेट उत्तर भारत के मुकाबले कुछ अधिक माना जाता है और चुनाव के वक्त वहां गहनों से लेकर दूसरे किस्म के सामान बांटने का रिवाज अधिक है। इसकी एक वजह शायद यह हो सकती है कि उत्तर भारत की एक-एक सीट पर वोटर अधिक हो गए हैं, और दक्षिण भारत की सीटों पर आबादी काबू में रहने की वजह से वोटर भी कम हैं।
जो भी हो हिंदुस्तानी आम चुनाव सबसे अधिक भ्रष्ट व्यवस्था है और किसी लहर में जीतने वाली पार्टी या उम्मीदवार की बात छोड़ दें तो कांटे की टक्कर वाली जितनी सीटें रहती हैं, वहां पर तो वोटों को खरीदने से चुनावी नतीजों का सीधा रिश्ता रहता है। अब ऐसे में मन में एक सवाल यह भी उठता है कि जहां पर वोटों को खरीदने की इतनी बड़ी गुंजाइश रहती है क्या वहां के चुनावों को सचमुच ही जनता की राय मांग लेना ठीक होगा, सचमुच ही उसे एक जनतांत्रिक पसंद माना जाना चाहिए? या फिर यह वोटों की एक ऐसी मंडी है जहां पर सबसे अधिक बोली बोलने वाला नेता या उसकी पार्टी वोट पा जाते हैं, और देश भर में सबसे ऊंची बोली लगाने वाले लोग संसद और विधानसभा में पहुंचने की सबसे अधिक संभावना भी रखते हैं? हम तो मध्य भारत के इस इलाके छत्तीसगढ़ में चुनावों को रूबरू देखते हुए यह जानते हैं कि एक बड़े शहर के एक वार्ड के चुनाव में किस तरह बड़े उम्मीदवार एक-एक करोड़ रुपए तक खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं, उतारू रहते हैं। यहां तक सुनाई पड़ता है कि सबसे भ्रष्ट किसी वार्ड उम्मीदवार को किसी एक जगह से ही एक साथ 25 लाख का चुनावी चंदा मिल जाता है। इससे भी अंदाज लग सकता है कि कुछ हजार वोट वाले वार्ड किस तरह महंगी जीत वाले रहते हैं और जाहिर है कि इसके बाद अगले 5 बरस निर्वाचित लोग इस पूंजी निवेश की वापिसी के लिए, कमाई करने के लिए कैसे-कैसे काम करते होंगे।
हिंदुस्तान का चुनाव आयोग इसी फर्जी बात पर फख्र हासिल करते रहता है कि चुनाव में गुंडागर्दी खत्म हो गई है, और अब चुनाव भी बिना किसी हिंसा के हो जाते हैं। लेकिन आज भारतीय चुनाव की जो सबसे बड़ी समस्या है, रुपयों का वह बोलबाला खत्म करने में यह चुनाव आयोग कुछ भी नहीं कर पाया है। बल्कि हाल के चुनावों में देखा गया है कि यह चुनाव आयोग लोगों के हिंसक भाषणों को भी नहीं रोक पाया, भडक़ाऊ और सांप्रदायिक नेताओं और तबकों को भी नहीं रोक पाया, यह चुनाव आयोग हिंसक जातिवाद को भी नहीं रोक पाया। यह चुनाव आयोग मतदान करवाने की एक काबिल मशीन से परे और किसी काम का नहीं रह गया है, और यह चुनाव को निष्पक्ष और ईमानदार करवाने के लिए तो कुछ भी करने के लायक नहीं रह गया है। इसलिए अगर सुप्रीम कोर्ट को यहां पर दखल देने की कोई गुंजाइश दिखती है तो उसे संसद और चुनाव आयोग इन दोनों के सामने इस बात को रखना चाहिए क्योंकि संसद के भीतर बाहुबल चुनाव आयोग को ऐसा ही बनाए रखने का हिमायती हो सकता है। इसलिए तेलंगाना के इस अदालती फैसले से हमें इस मुद्दे पर चर्चा करने की सूझ रही है कि हिंदुस्तान के चुनाव की इस मंडी में खरीदने-बेचने का सिलसिला कैसे खत्म हो सकता है? इस बारे में जो देश के जिम्मेदार तबकों को सोचना चाहिए, यहां की अदालत को भी सोचना चाहिए।
इस भूखी दुनिया में खाने की बर्बादी रोकना जरूरी
24 जुलाई 2021
दुनिया के बहुत से देशों में कारोबार कर रही अमेरिका की स्टारबक्स नाम की कॉफ़ी कंपनी ने घोषणा की है कि वह अमेरिका के अपने फास्ट फूड और कॉफ़ी के आउटलेट में न बिका हुआ खाने-पीने का सामान उस इलाके के जरूरतमंद और भूखे लोगों के लिए ऐसे समाजसेवी संगठनों को देगी जो उसे बांट सकें। इस कंपनी ने अगले 10 बरस में 100 मिलियन डॉलर की ऐसी मदद करने की घोषणा की है। अभी हम इस रकम को लेकर यह अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि यह कंपनी कितनी बड़ी है और अमेरिकी हालात में यह मदद कितनी बड़ी रहेगी। लेकिन हम इसे इस मुद्दे के रूप में देख रहे हैं कि दुनिया के बहुत से ऐसे खाने-पीने के कारोबार हैं जिनमें बहुत सा सामान बचता है जो फेंकने में जाता है या बर्बाद हो जाता है. दूसरी तरफ हर शहरी इलाके में बहुत से गरीब लोग भूखे रहते हैं या कम खा कर जीते हैं. कारोबार की सामाजिक जिम्मेदारी के हिसाब से देखें तो ऐसा लगता है कि इन दोनों का एक मेल हो सकता है. और दुनिया के बहुत से ऐसे बड़े दुकानदार भी हैं जो सामान फेंकने के बजाय उन्हें निकालकर दुकान के बाहर रख देते हैं और जरूरतमंद लोग उन्हें उठाकर ले जाते हैं. दुनिया में भूख बहुत बुरी तरह फैलती और बढ़ती जा रही है, दूसरी तरफ खाने-पीने की बर्बादी इतनी अधिक होती है कि अमेरिका जैसे दुनिया के कई देश बहुत बुरी तरह के मोटापे के शिकार हैं। मोटापे का मतलब जरूरत से अधिक खाना ही होता है। तकरीबन तमाम अधिक मोटे लोग खाने की बर्बादी बदन के बाहर करने के बजाय बदन के भीतर करते हैं. नतीजा यह होता है कि वह महंगे अस्पतालों के लिए एकदम फिट मरीज हो जाते हैं। इस हिसाब से भी यह सोचने की जरूरत है कि जो लोग जरूरत से अधिक खा रहे हैं, यानी जिनके पास जरूरत से अधिक खाना है, उन लोगों से भी कुछ खाना गरीबों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है।
इस मुद्दे पर पढ़ते हुए भारत की एक प्रमुख पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थ में छपा हुआ एक लेख दिख रहा है जिसमें फीडिंग इंडिया नाम के एक संगठन के बारे में बताया गया है। इस संगठन की एक संस्थापक सृष्टि जैन ने कहा कि हर शादी में औसतन 15-20 फ़ीसदी खाना बर्बाद होता है और जो कि 25-50 किलो से लेकर 800 किलो तक रहता है इतने खाने से 100-200 लोगों से लेकर 2-4 हजार लोगों तक का पेट भरा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट भी मेहमानों की संख्या सीमित करने के बारे में सोच रहा था, लेकिन तब तक अधिक व्यावहारिक बात यह है कि अधिक बने हुए खाने को किस तरह भूखे लोगों तक पहुंचाया जाए, और उनका संगठन यह काम करने में लगा हुआ है। डाउन टू अर्थ पत्रिका ने एक बड़े कैटरर से बात की जो शादियों की पार्टियों में खाने का इंतजाम करते हैं. उनका तजुर्बा यह रहा कि छोटी पार्टियों में करीब 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद होता है और बड़ी पार्टियों में यह 60 फ़ीसदी तक हो सकता है क्योंकि लोग जितने मेहमानों को बुलाते हैं उतने आते नहीं, और वे जितने किस्म की चीजें बनाते हैं उतनी चीजों की खपत नहीं होती। उनका कहना यह है कि 500 लोगों की दावतों में 700 लोगों के खाने लायक खाना बना लिया जाता है, और ऐसी दावत तो में कई बार 300 लोग ही पहुंचते हैं.
यह कोई बहुत मौलिक और नई सोच की बात नहीं है हिंदुस्तान में आज से कई दशक पहले मुंबई में एक कोई समाजसेवी संगठन ऐसा था जो शादी-ब्याह के बाद बचा हुआ बिना जूठा खाना ले जाकर अपनी गाड़ियों में गरीब बस्तियों में जरूरतमंद गरीबों को खिलाता था। हर दावत में खाना जरूरत से ज्यादा बनता है और बर्बाद होने के बजाय ऐसा खाना दूसरों तक पहुंचाना एक बड़ा भला काम है. मुंबई के अलावा कुछ और शहरों में भी अलग-अलग स्तर पर यह काम हुआ है और कुछ जगहों पर तो लोगों ने दावतों में खाने की बर्बादी रोकने के लिए खाने की टेबलों पर यह तख्ती लगानी शुरू कर दी है कि कृपया उतना ही खाना लें जितना आप खा सकते हैं। कुछ संपन्न और सवर्ण तबकों में ऐसी दावतों के वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें कोई एक जिम्मेदार व्यक्ति खड़े होकर प्लेट रखने वाले लोगों को वापिस भेज रहे हैं कि प्लेट का पूरा खाना खाकर खाली प्लेट लेकर आएं।
ऐसी जागरूकता और इसी तरह तरह की पहल जरूरी है क्योंकि आज दुनिया में एक तरफ खाने की बर्बादी जारी है और दूसरी तरफ भूख से लोगों की जिंदगी बर्बाद हो रही है। इन दोनों बातों को जब भी एक साथ रखकर देखें, तो लगता है कि यह संपन्न तबके की और समाज की एक किस्म की हिंसा है जो कि गरीब और भूखे लोगों को अनदेखा करके खाना-पीना इतना बर्बाद करती है। लोग इस बात को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बना लेते हैं कि वे कितने अधिक किस्म के खाने परोसते हैं, और कितना जबरदस्ती लोगों को खिला सकते हैं, फिर भले ऐसा खिलाना उनके मेहमानों की सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह ही क्यों ना हो। इसलिए समाज में ऐसी जागरूकता की जरूरत है जो लोगों को सीमित किस्म के खाने परोसने के सामाजिक प्रतिबंध भी लगाए। कुछ शहरों में कुछ समाज के लोगों ने ऐसा किया हुआ भी है। दूसरी तरफ दावतों के बाद बचे हुए खाने को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने के लिए सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए। हमने अलग-अलग किस्म के बहुत से समाजसेवी संगठनों के काम देखे हैं जो कि बड़ी मेहनत करते हैं लाशों को घर पहुंचाने का काम करते हैं, कफन-दफन का काम करते हैं, अंतिम संस्कार करते हैं। इसलिए खाने की बर्बादी रोकने के लिए भी ऐसे संगठन जरूर बन सकते हैं, या मौजूदा संगठन इस काम को भी कर सकते हैं.
किसान मवाली हैं, तो फिर ऐसे मवालियों का उगाया न खाएं !
23 जुलाई 2021
केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी कल भाजपा कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसानों के प्रदर्शन पर एक सवाल का जवाब दे रही थीं, और उन्होंने काफी आक्रामक तरीके से कहा- फिर किसान आप उन लोगों को बोल रहे हैं, मवाली हैं वो। इसका वीडियो मौजूद है जो उनके शब्दों को बड़ा साफ-साफ बतला रहा है। लेकिन जैसा कि बाद में होता है, उन्होंने एक और बयान में कहा कि उनके शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया है, फिर भी अगर उनके शब्दों से कोई किसान आहत हुआ है, तो वह उन्हें वापस लेती हैं। इन दोनों बातों के वीडियो हमने देखे हैं और इन दोनों बातों में कहीं गलतफहमी की कोई गुंजाइश नहीं है।
मीनाक्षी लेखी केंद्रीय राज्य मंत्री बनने के पहले सुप्रीम कोर्ट सहित बहुत सी अदालतों में वकालत कर चुकी हैं, और पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता रह चुकी हैं। वे हिंदी भाषी इलाके से हैं इसलिए किसी गैर हिंदी भाषी प्रवक्ता या नेता के मुंह से निकले अटपटे शब्दों के लिए उन्हें संदेह का लाभ देने की कोई गुंजाइश भी मीनाक्षी लेखी के साथ नहीं है। वे लंबे समय से भाजपा के कई पदों पर दिल्ली में ही काम करती रही हैं जो कि मोटे तौर पर हिंदी भाषी प्रदेश है और वह खुद भी वकील रहते हुए वे मवाली शब्द का मतलब न समझें ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए अपने शब्दों के बचाव में बाद में उनका चाहे जो बयान नुकसान को घटाने के लिए आया हो, किसानों की जो बेइज्जती होनी थी, वह तो हो ही चुकी है। राजनीति में सत्ता पर रहते हुए बहुत से लोग इस तरह बड़े हमलावर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, वह अगर ज्यादा आक्रामक रहते हैं तो वह पूरे के पूरे वाक्यों और मिसालों को बहुत ही हमलावर बनाकर बोलते हैं, गाड़ी के नीचे आ जाने वाले पिल्ले जैसी मिसाल । यह जानते हुए भी बोलते हैं कि इन दिनों किसी शहर स्तर के नेता की कही हुई बात को भी कई कई कैमरे रिकॉर्ड करते ही रहते हैं. इसलिए यह समझना मुश्किल होता है कि कौन सी बात किसके मुंह से चूक से निकली है, और कौन सी बात सोच-समझकर किसी हथियार की तरह चलाई गई है। फिर भी किसानों के व्यापक तबके के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में उन्हें मवाली करना कुछ अधिक ही हमलावर और अपमानजनक बात है इसलिए पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बिना वक्त गवाएं तुरंत ही मीनाक्षी लेखी के इस्तीफे की मांग की है, और उन्होंने यह भी याद दिलाया है कि दिल्ली की सरहद पर आंदोलन शुरू होने के बाद से किसानों के खिलाफ कई भाजपा नेताओं ने समय-समय पर अपमानजनक बातें कही हैं, उनके आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की है।
यह बात बहुत हद तक सही है क्योंकि केंद्र सरकार सहित हरियाणा के भी कई भाजपा नेताओं, और मंत्रियों ने किसानों के बारे में समय-समय पर बहुत ओछी बातें कही हैं। और हैरानी यह होती है कि किसानों पर ऐसे हमलों के बीच ही असम, बंगाल, और केरल जैसे चुनाव भी निपट गए, अब तो उस पंजाब का चुनाव सामने खड़ा हुआ है जहां से इस आंदोलन में शुरू से किसान आए हुए हैं, इससे जुड़े हुए हैं। देश में कोई एक प्रदेश किसानों के मुद्दों से सबसे अधिक जुड़ा हुआ है तो वह पंजाब है. आज देश में जितने किस्म के अलग-अलग पेशेवर तबके हैं उनमें शायद किसान ही अकेले ऐसे हैं जो भ्रष्टाचार से सबसे कम जुड़े हुए हैं, जो कोई भी गुंडागर्दी नहीं करते हैं, और जो कुदरत और सरकार इन दोनों के रहमो करम पर जीते हुए मेहनत करते हैं, और राजनीतिक दलों और सरकारों के किए हुए वायदों के पूरे होने की उम्मीद रखे हुए जिंदगी गुजार लेते हैं। किसानों ने अपने आंदोलन में कभी किसी को मारा नहीं है, देश का इतिहास गवाह है कि हर बरस हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं, लेकिन ऐसा कोई भी साल नहीं है जब किसानों ने कुछ दर्जन भी हत्याएं की हों। और एक तबके के रूप में तो किसानों ने कभी भी कोई हिंसा नहीं की है। दिल्ली में भी स्वतंत्रता दिवस के दौरान जिन लोगों ने वहां आकर हिंसा की वे लोग भाजपा से जुड़े हुए थे, चर्चित और नामी-गिरामी थे जिनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के साथ हैं, और जिनके खिलाफ सुबूत भी मिले और मुकदमे भी चल रहे हैं. लेकिन किसानों ने एक तबके के रूप में, एक आंदोलन के रूप में कोई हिंसा नहीं की।
इसलिए हमारा ख्याल है कि किसानों को मवाली कहना न सिर्फ किसानों का अपमान है, बल्कि इस देश के हर उस इंसान का अपमान है जिसका पेट किसानों के उगाए हुए अनाज से भरता है. और किसानों से परे भी लोगों को ऐसी जुबान का विरोध करना चाहिए और भाजपा के लिए बेहतर यह होगा कि एक मंत्री की कही हुई बात और फिर वापस लिए गए शब्दों से ऊपर जाकर, वह एक पार्टी के रूप में किसानों से माफी मांगे, और अपनी पार्टी के बाकी नेताओं के लिए भी यह चेतावनी जारी करे कि किसानों के बारे में अभद्र और अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करने से बाज आएं. ऐसा नहीं है कि बंगाल और केरल के चुनावों में भाजपा के नेताओं का किसानों के खिलाफ कहा हुआ कमल छाप के खिलाफ न गया हो। देश के हर प्रदेश में किसान हैं और कम से कम आम नागरिकों में तो बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि किसानों से हमदर्दी रखते हैं, किसानों के लिए सम्मान रखते हैं. इसलिए भाजपा को पंजाब चुनाव में इस मवाली-शब्दावली का नुकसान हो उसके पहले उसे खुले दिल से, और साफ शब्दों में, बिना किंतु परंतु किए हुए किसानों से माफी मांगनी चाहिए।
बिना देर किए हिंदुस्तान में पेगासस से की गई जासूसी की सर्वोच्च जांच शुरू हो
22 जुलाई 2021
दुनिया के कई देशों में लोगों के मोबाइल फोन पर घुसपैठ करके जासूसी करने वाले इजराइली सॉफ्टवेयर पेगासस का मामला जल्दी ठंडा होते नहीं दिख रहा है क्योंकि कई विकसित और सभ्य लोकतंत्र इसके शिकार हुए हैं। फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों ने इसकी औपचारिक जांच की घोषणा की है। हिंदुस्तान में लोकतंत्र तो पुराना है और हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दंभ भी भरता है, लेकिन यहां पर सरकार अभी तक इस बात पर साफ-साफ जवाब देने से भी कतरा रही है कि उसने पेगासस सॉफ्टवेयर खरीदा था या नहीं, और इससे देश के लोगों पर हुई जासूसी की खबर उसे है या नहीं। यहां पर समझने की बात यह है कि हिंदुस्तान में डाटा प्राइवेसी कानून देश के हर नागरिक और संस्थान को उसके डेटा की सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है और जब लोगों के टेलीफोन पर घुसपैठ करके इस तरह से डाटा चोरी किया गया, तो उसकी जांच और उस पर कार्रवाई भी केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बनती है। लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले की जांच के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। सरकार का संसद के भीतर और संसद के बाहर बयान बहुत ही अमूर्त किस्म का, गोलमाल शब्दों का बयान है, जिसमें सरकार न तो इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की बात मंजूर कर रही है और ना इसे इस्तेमाल करने का खंडन कर रही है।
निजता पर आए ऐसे गंभीर खतरे के बीच सुप्रीम कोर्ट में एक पिटीशन लगाई गई है कि सुप्रीम कोर्ट इस जासूसी सॉफ्टवेयर की खरीदी पर रोक लगाए। जैसा कि यह कंपनी कहती है वह इसे केवल सरकारों को बेचती है, ऐसे में हिंदुस्तान में सिर्फ सरकार ही इसे कानूनी रूप से खरीद सकती है, तो सुप्रीम कोर्ट से इस पर रोक लगाने की मांग सीधे-सीधे सरकार पर यह रोक लगाने की मांग है कि वह इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल न करे। अभी इस याचिका पर अदालत में कोई सुनवाई नहीं हुई है लेकिन देश के लोगों को इस जासूसी घुसपैठ के मामले से खत्म होने वाली निजता का मामला बहुत ही भयानक लग रहा है, और हो सकता है कि इसकी गंभीरता को देखकर सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई आदेश भी करें। सुप्रीम कोर्ट शायद याचिका को इस नाते भी गंभीरता से देखेगा कि सुप्रीम कोर्ट के एक पिछले मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ उनकी मातहत कर्मचारी द्वारा लगाए गए सेक्स शोषण के आरोपों की जांच के चलते समय बताया जा रहा है कि उस जज का फोन भी पेगासस के रास्ते हैक किया गया था, और शिकायतकर्ता महिला के परिवार के तो 8 मोबाइल फोन नंबर हैक किए गए थे, अब इनमें से कोई बात अभी तक साबित इसलिए नहीं हो रही है कि यदि सरकार ही हर बात की मनाही कर रही है।
फिलहाल हम यह देख रहे हैं कि दुनिया के कई देशों में इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके इतने तरह के काम किए गए कि उससे लोगों के बुनियादी अधिकार बुरी तरह कुचले गए। मेक्सिको में एक ऐसे पत्रकार की हत्या कर दी गई जिस पर पेगासस के माध्यम से नजर रखी जा रही थी, और यह सॉफ्टवेयर जिस फोन में घुसपैठ कर लेता है उसका लोकेशन भी बतला देता है, और उसके कैमरे और माइक्रोफोन से आसपास की बातों को सुन भी लेता है, आसपास की तस्वीरें भी देख लेता है। इसलिए एक बड़ा शक हो रहा है कि मेक्सिको में इस पत्रकार की हत्या के पीछे इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का हाथ रहा है। ऐसा ही दुनिया के कुछ दूसरे देशों में कुछ पत्रकारों की गिरफ्तारी के लिए तो किसी के बेडरूम में घुसकर अनैतिक संबंधों की तोहमत लगाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया गया है। पूरी दुनिया में पेगासस के ग्राहकों ने अपनी दिलचस्पी के जो टेलीफोन नंबर इस कंपनी में दर्ज करवाए थे, ऐसे करीब 50 हज़ार नंबर बताए जा रहे हैं, और हिंदुस्तान में ही ऐसे 300 से अधिक नंबर बताए जा रहे हैं, जिनकी निगरानी करना बताया जा रहा है।
एक दिलचस्प बात यह है कि खुद इजराइल की सरकार ने अपने देश की इस कंपनी के इस सॉफ्टवेयर के रास्ते दुनिया भर में हुई जासूसी की जांच करवाने की घोषणा की है। लोगों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि सऊदी अरब ने दुसरे देश में अपने दूतावास में बुलाकर एक वरिष्ठ पत्रकार की हत्या की थी, उस पत्रकार और उसके आसपास के लोगों के फोन भी इसी पेगासस सॉफ्टवेयर से निगरानी में रखे गए थे, उनमें घुसपैठ की गई थी।
अब दुनिया भर के साइबर विशेषज्ञ यह मान कर रहे हैं कि दुनिया की सरकारों के बीच इस बात को लेकर एक आम सहमति बनना चाहिए की जासूसी के नाम पर किस-किस तरह के अनैतिक काम न किए जाएं। इस तरह की सहमति कुछ दूसरे मामलों में सरकारों के बीच बनी हुई है जैसे मानव क्लोनिंग को लेकर दुनिया की सरकारों के बीच यह सहमति बनी हुई है कि इस पर काम नहीं होना चाहिए। यहां तक कि चीन जैसा दुस्साहसी प्रयोग करने वाला देश अभी कुछ समय पहले अपने देश के तीन वैज्ञानिकों को कैद सुना चुका है जिन्होंने एक बच्चे के जन्म के पहले उसके डीएनए में एडिटिंग करके उसे एचआईवी जैसी बीमारी के खिलाफ एक प्रतिरोधक शक्ति देने का काम किया था। चीन में ऐसी जेनेटिक एडिटिंग के बाद 3 बच्चे पैदा हुए और ऐसा प्रयोग करने वाले तीन वैज्ञानिकों को चीनी अदालत ने अभी कैद सुनाई है।
दुनिया में लोकतंत्र के हिमायती साइबर विशेषज्ञ यह मान कर रहे हैं कि पेगासस जैसे घुसपैठ करने वाले सॉफ्टवेयर बनाने और उसके इस्तेमाल पर रोक के लिए पूरी दुनिया में एक सहमति बननी चाहिए क्योंकि यह कंपनी चाहे जैसे दावे करती रहे कि यह सॉफ्टवेयर सिर्फ आतंक रोकने के लिए और ड्रग माफिया को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, यह जाहिर है कि इसका इस्तेमाल सरकारों ने अपने विरोधियों के खिलाफ किया है, और ऐसी ताकत रखने वाला घुसपैठिया सॉफ्टवेयर दुनिया के लोकतंत्र को खत्म करके रख सकता है। इसलिए हिंदुस्तान की सरकार को तो इस बारे में बिना देर किए एक जांच की घोषणा करनी चाहिए जिससे वह अपनी खुद की साख भी बचा सकती है, और दुनिया के सभी जिम्मेदार लोकतंत्रों को एक पहल करनी चाहिए कि इस किस्म के घुसपैठिए सॉफ्टवेयर पर रोक लगाई जाए जो कि लोगों की आजादी, लोगों की निजता को इस हद तक खत्म कर सकते हैं। सरकार नहीं करेगी तो सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में जांच का हुक्म दे सकता है जिसमें सरकार को हलफनामे पर सब कुछ बताना होगा।
आंकड़ों का फरेब सुहाता है देश-प्रदेश की हर सरकार को
21 जुलाई 2021
केंद्र सरकार ने लंबे समय बाद हो रहे संसद के सत्र में एक सवाल के जवाब में कहा कि कोरोना के दौर में देश में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। इसे लेकर देश हक्का-बक्का रह गया और संसद में कई विपक्षी दलों के लोगों ने इसे लेकर खासी नाराजगी जाहिर की क्योंकि इस पूरे दौर में लोग ऑक्सीजन की कमी से कोरोना मरीजों को मरते देख रहे थे, परिवार के लोगों को बिलखते देख रहे थे, अस्पतालों ने नोटिस लगा दिए थे कि ऑक्सीजन उनके पास नहीं है, और मरीजों को कहीं और ले जाएं। ऐसे में केंद्र सरकार का यह कहना कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई है, एक बड़ी ही अटपटी बात लग रही है। लेकिन इससे भी अधिक दिलचस्प और तकलीफदेह बात यह है कि किसी राज्य सरकार ने अपने भेजे गए आंकड़ों में केंद्र सरकार को यह नहीं कहा कि उनके राज्य में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत हुई है। केंद्र सरकार की इस बात में दम है कि वह तो महज राज्यों से मिले हुए आंकड़ों को जोडक़र संसद को बतला देती है। यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार लगातार यह देख रही थी कि ऑक्सीजन की कमी से देश में मौतें हो रही हैं और देश में ऑक्सीजन की बहुत बुरी कमी चल रही है, लेकिन जब तक अस्पतालों के इंचार्ज राज्य के अधिकारी यह बात मानेंगे नहीं कि ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं, तब तक केंद्र सरकार अपनी तरफ से कैसे कह सकती है कि कुछ मौतें ऑक्सीजन की कमी से भी हुई हैं ?
भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का यह मिला-जुला पाखंड नया नहीं है। इस देश में पिछली करीब पौन सदी से यह देखने में आ रहा है कि जब कभी भूख से कोई मौत होती है, तो वहां की राज्य सरकार बड़ी तेजी से ऐसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश कर देती है जिसमें लाश के पेट से पचा हुआ खाना निकला बताया जाता है। मरने वाले के घर पर कुछ किलो अनाज दिखा दिया जाता है। उस इलाके की राशन दुकान के रिकॉर्ड बताने लगते हैं कि मरने वाले को कुछ दिन पहले ही अनाज दिया गया था। कुल मिलाकर कोई भी राज्य सरकार हिंदुस्तान में आज तक इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुई है कि उनके यहां भूख से कोई मौत हुई है। और तो और, कुपोषण के जो आंकड़े बतलाते हैं कि बहुत से बच्चे कुपोषण की वजह से बहुत गंभीर रूप से कमजोर हैं, उनकी मौत पर भी उनकी मौत को कुपोषण से मौत दर्ज करने में सरकारें कतराती हैं, और उन्हें भी किसी बीमारी से मौत बतला दिया जाता है। बात यहीं तक सीमित नहीं है, कई ऐसे राज्य हैं जिन्होंने पिछले डेढ़ बरस में कोरोना से होने वाली मौतों को कोरोना के साथ दर्ज नहीं किया है और महज किसी और बीमारी से मौत दर्ज कर लिया है। नतीजा यह निकला कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार जब कोरोना मौतों पर कोई मुआवजा देने की तैयारी कर रही हैं, तो उस लिस्ट में भी इन मरने वालों के घर वालों का नाम नहीं आ पा रहा क्योंकि उनकी मौतों को ही कोरोना मौत दर्ज नहीं किया गया है।
सरकारों का गजब का करिश्मा तो तब देखने मिलता है जब उनके राज्य में कोई किसान आत्महत्या करते हैं। किसानों की आत्महत्या क्योंकि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बनता है, और सरकार को जवाब देने में मुश्किल होती है, इसलिए देश के कई राज्यों ने किसान की आत्महत्या को कुछ दूसरी वजहों के साथ दर्ज करना शुरू कर दिया है। आत्महत्या करने वाले के पेशे या रोजगार के कॉलम में किसान दर्ज ही नहीं किया जाता। और आत्महत्या की वजह में नशे की आदत, कर्ज में डूबना, या कहीं अवैध प्रेम और सेक्स संबंध जैसी बातें दर्ज कर ली जाती हैं, लेकिन किसानी के नुकसान से, किसानों के कर्ज से आत्महत्या हुई हो, ऐसा रिकॉर्ड में नहीं आने दिया जाता। नतीजा यह होता है कि सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार किसान की आत्महत्या पर उठने वाले असुविधाजनक सवालों से बच जाती हैं।
हिंदुस्तान में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपनी सार्वजनिक छवि को बचाने के लिए सरकारी आंकड़ों को किसी भी हद तक दबाने-कुचलने, तोडऩे-मरोडऩे के लिए एक पैर पर खड़ी रहती हैं। जनधारणा का प्रबंधन पूरी तरह आंकड़ों और इमेज को लेकर चलता है। एक वक्त कुछ होशियार लोग यह कहते थे कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव 5 साल काम करके नहीं, चुनाव का मैनेजमेंट करके जीते जाते हैं। अब एक बात लग रही है कि चुनाव जनधारणा प्रबंधन से जीते जाते हैं, और लोगों के सामने सरकार की कैसी छवि पेश की जाती है, इससे भी जीते जाते हैं। भारतीय चुनावों में और भी कई मुद्दे रहते हैं जिनमें धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण, लोगों के बहुसंख्यक तबके को खुश करने वाले कई किस्म के मुद्दे रहते हैं जिनमें अल्पसंख्यकों को प्रताडि़त करने के मुद्दे भी शामिल रहते हैं। जब सरकारें झूठे और फरेबी आंकड़ों से अपने को बेहतर दिखाने की कोशिश करती हैं तो राज्यों के भेजे गए झूठे आंकड़ों पर भी केंद्र सरकार ने कोई आपत्ति नहीं की क्योंकि अलग-अलग पार्टियों की राज्य सरकारें जो भेज रही है उनसे केंद्र सरकार की एक देश के रूप में बेहतर छवि बनाने की कोशिश बिना खुद की मेहनत के पूरी हो रही है।
ऐसे में संसद में एक विपक्षी सांसद के दिए गए इस बयान को देखने की जरूरत है जिसने सोशल मीडिया पर लोगों को हिला कर रख दिया है। राज्यसभा में कोरोना पर बहस के दौरान आरजेडी सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि पूरे सदन को उन लोगों से माफी मांगनी चाहिए जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं, पर उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया गया। झा ने कोरोना संकट के दौरान ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सांसद होने के बावजूद वे लोगों की मदद नहीं कर पाए। मनोज झा ने कहा कि कोरोना के प्रकोप में देश के तमाम परिवारों ने किसी अपने को खोया है। उन्होंने कहा, ‘हम सबको एक साझा माफीनामा उन लोगों को भेजना चाहिए जिनकी लाशें गंगा में तैर रही थीं।’ उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि हमने इस कोरोना महामारी में ऑक्सीजन की कमी के कारण कई मौतें देखी है। उन्होंने कहा कि हम आंकड़ों की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि सच्चाई से रूबरू होकर यह कहना चाहते हैं कि ये जो लोग हमारे बीच से आज चले गए, वो एक जिंदा दस्तावेज छोडक़र गए हैं, हमारी नाकामी का, उन्होंने कहा कि यह कलेक्टिव फेल्योर है 1947 से लेकर अब तक की सभी सरकारों का। मुफ्त वैक्सीन पर भी तंज कसते हुए झा ने कहा कि यह मुफ्त राशन, मुक्त वैक्सीन की बात जो हो रही है, यह कुछ मुफ्त नहीं है, इस वेलफेयर स्टेट का एक कमिटमेंट है, उसको सरकार कम ना करे, उसे बौना ना बनाए। उन्होंने कहा ‘मैं चाहता हूं, जगाना चाहता हूं आपको भी और सभी को भी, क्योंकि हमने असम्मानजनक मौत को देखा है, और अगर हमने इसे दुरुस्त नहीं किया तो आने वाली पीढ़ी आप हमें माफ नहीं करेगी।’
पेगासस से जासूसी जिसने भी करवाई हो, जांच तो सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है...
19 जुलाई 2021
दुनिया भर में इजराइल की एक कंपनी के बनाए हुए पेगासस नाम के एक सॉफ्टवेयर को लेकर हंगामा मचा हुआ है कि दर्जनों देशों की सरकारों ने इसका इस्तेमाल करके अपने देश के विरोधी नेताओं और मीडिया के लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी की, उनके फोन में घुसपैठ की, वहां से जानकारी चुराई, उनकी लोकेशन देखी कि वह किस वक्त कहां पर थे, उनके फोन की लॉग बुक देखी कि उन्होंने कब किसको फोन किया। और जैसा कि इस सॉफ्टवेयर को बनाने वालों का कहना है, जिस फोन में इसकी घुसपैठ हो गई, उसके कैमरा और माइक्रोफोन का इस्तेमाल करके बिना किसी को पता लगे इस सॉफ्टवेयर ने आसपास की तस्वीरें, वीडियो भेजने का काम किया, और वहां की आवाजों को बाहर ट्रांसमिट किया। कुल मिलाकर दुनिया के सभ्य लोकतंत्रों ने अपने नागरिकों की निजता के लिए जितने किस्म के कानूनी इंतजाम किए हैं, जितने तरह से उनकी हिफाजत के दावे किए हैं उसके ठीक खिलाफ जाकर इस कंपनी के ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया और बेचा जिसने सबके बदन पर से तौलिया खींच दिया। कहने के लिए इस कंपनी का दावा यह है कि वह इजराइल की डिफेंस मिनिस्ट्री की इजाजत से ही दुनिया की चुनिंदा सरकारों को यह सॉफ्टवेयर बेचती है, और इससे आतंकी हमलों पर काबू पाने की सोच बताई गई है, और इसके अलावा नशे की तस्करी, बच्चों की तस्करी, महिलाओं की तस्करी को रोकने के लिए भी इसके इस्तेमाल का दावा किया गया है। कंपनी ने बढ़-चढक़र यह भी कहा है कि वह सरकारों और सरकारी एजेंसियों के अलावा किसी को यह सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है। लेकिन दुनिया की बाजार व्यवस्था बताती है कि बाजार में कमाई के लिए काम करने वाले लोग लोकतंत्र या सभ्यता का कितना सम्मान करते हैं, उनको मानवाधिकार की कितनी फिक्र रहती है, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। इसलिए जब ऐसा कोई सॉफ्टवेयर बना है तो यह जाहिर है कि उस तक किसी की भी पहुंच हो सकती है जिसके पास इसको खरीदने की ताकत हो। कहने के लिए तो आज दुनिया के बहुत से जंग के मोर्चों पर इस्तेमाल होने वाले खतरनाक फौजी हथियारों को भी उन्हें बनाने वाले कारखाने, किसी न किसी देश की सरकार को ही बेचते हैं, लेकिन दुनिया का इतिहास बताता है कि गृहयुद्ध में लगे हुए हथियारबंद समूहों तक ये सारे हथियार कहीं न कहीं से पहुंचते ही हैं। दिलचस्प बात यह है कि इजरायल की इस कंपनी ने यह खुलासा भी किया है कि उसका सॉफ्टवेयर अमेरिका के किसी टेलीफोन नंबर पर काम नहीं कर सकता। उसे ऐसा बनाया गया है कि उसका अमेरिका में या अमेरिका के फोन नंबरों पर कोई इस्तेमाल ना हो सके। अब सवाल यह है कि अमेरिकी सरकार का ऐसा कितना काबू इजराइल की इस कंपनी पर है कि वह अमेरिका में जासूसी के लायक सॉफ्टवेयर ही ना बनाएं और यह बात जासूसी की शौकीन अमेरिकी सरकार की मर्जी से हुई है, या उसकी मर्जी के खिलाफ यह भी अभी साफ नहीं है।
खैर, जिन देशों की बात इसमें आ रही है और दुनिया के करीब एक दर्जन सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने मिलकर इस मामले की तहकीकात की है जिसमें दुनिया का सबसे बड़ा मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल भी शामिल था और दुनिया की कुछ सबसे बड़ी और साख वाली साइबर लैब ने इस मामले की जांच करके अपने नतीजे सामने रखे हैं। कुल मिलाकर जो तस्वीर सामने आ रही है उसमें यह है कि भारत में भी बहुत से ऐसे मीडिया कर्मी जिनका रुख सरकार के खिलाफ आलोचना का रहते आया है उनके फोन में भी पेगासस से घुसपैठ हुई है, दूसरी तरफ शुरुआती खबरें यह कहती हैं कि हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे हुए एक जज के खिलाफ भी इस सॉफ्टवेयर से घुसपैठ हुई और इस जज पर सेक्स शोषण का आरोप जिस मातहत महिला कर्मचारी ने लगाया था, उसकी शिकायत के बाद उसके परिवार के 8 लोगों के टेलीफोन में इस सॉफ्टवेयर से हमले किए गए और वहां से जानकारी चुराने की कोशिश की गई। यह भी बात सामने आई है कि भारत में विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के फोन भी इस हमले के शिकार हुए हैं।
पिछले कुछ महीनों में ऐसी जानकारियां दूसरी बार सामने आई हैं और पिछली बार भी सरकार की तरफ से साफ-साफ शब्दों में ना तो पेगासस के इस्तेमाल की बात मानी गई थी न इसका खंडन किया गया था, और सिर्फ इतना कहा गया था कि निगरानी के लिए बने हुए कानून के मुताबिक ही काम किया जाता है। अभी भी जब दोबारा यह मामला उठा है और संसद का सत्र चल रहा है तब भी सरकार का रुख यही है कि मीडिया में सरकार पर पेगासस के इस्तेमाल को लेकर जो आरोप लग रहे हैं उन आरोपों में कोई दम नहीं है और वे किसी ठोस बुनियाद पर नहीं खड़े हैं। लेकिन सरकार की बात को ध्यान से पढ़ा जाए तो उसमें सरकार सीधे-सीधे इस बात पर कुछ कहने से बचते हुए दिख रही है कि इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भारत में हुआ है या नहीं। सरकार इस बारे में कुछ भी नहीं कह रही है वह इस बात का खंडन तक नहीं कर रही है।
इस दौरान मीडिया में जो रिपोर्ट आई हैं उनमें जानकार कानूनी विशेषज्ञों का यह कहना है कि सॉफ्टवेयर बनाने वाली विदेशी कंपनी अपने हिसाब से कुछ भी बना सकती है लेकिन हिंदुस्तान का कानून इस बारे में बहुत साफ है कि यहां के कानून के मुताबिक तय किए गए तरीकों से ही लोगों के टेलीफोन या ई-मेल की निगरानी की जा सकती है, लेकिन उनमें किसी तरह की हैकिंग नहीं की जा सकती। हैकिंग अगर सरकार भी इस देश में करती है तो भी वह गैरकानूनी होगी ऐसा जानकर लोगों का कहना है। वैसे तो अभी संसद का सत्र चल रहा है और सरकार जवाबदेही के सबसे बड़े मंच पर विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए एक किस्म से मजबूर है, लेकिन सच तो यह है कि चतुर और चालबाज सरकारें कुछ गोलमोल शब्दों का सहारा लेकर साफ-साफ जवाब देने से बचती हैं, और इससे अधिक कोई जवाबदेही इस देश में किसी सरकार की रह नहीं गई है। फिलहाल हम इस किस्म की सारी हैकिंग और घुसपैठ को बहुत ही अलोकतांत्रिक, बहुत ही परले दर्जे का जुर्म, और बहुत ही असभ्य बात मानते हैं। यह बात मानवाधिकार के भी खिलाफ है और लोकतांत्रिक देश के नागरिकों के निजता के अधिकार के खिलाफ तो है ही। ऐसे ही आरोपों को लेकर अमेरिका में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की सरकार चली गई थी क्योंकि उन्होंने अपने विरोधियों की बातचीत को रिकॉर्ड करवाने की कोशिश की थी, और एक अख़बार ने उसका भंडाफोड़ कर दिया था।
हिंदुस्तान में भी इस मामले को एक तर्कसंगत अंत तक पहुंचाने की जरूरत है क्योंकि यहां केंद्र और राज्य सरकारों को लोगों की जासूसी करवाने में बहुत मजा आता है, और यह बात लोकतंत्र को खत्म करने वाली हो सकती है। जब अपने विरोधियों को, अपने से सहमत लोगों को, ऐसी जासूसी का शिकार बनाया जाए, तो इसके पीछे जो कोई है उसकी जांच होनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि अगर यह मामला कोई सुप्रीम कोर्ट में ले जाए तो वहां आज की हालत में इसकी सुनवाई की उम्मीद बंधती है, और हो सकता है कि अदालत सरकार से यह हलफनामा दायर करने को कहे कि उसने इस सॉफ्टवेयर से देश के लोगों की जासूसी करवाई है या नहीं। यह भी बहुत भयानक नौबत होगी कि कोई बाहरी एजेंसी हिंदुस्तान के लोगों की, किसी के भी कहने पर, ऐसी जासूसी करें। उस हालत में भी यह सरकार की ही जिम्मेदारी होगी कि वह इसकी जांच करवाए।
लोकतंत्र में बहुमत का मतलब अल्पमत पर डंडा नहीं होता...
20 जुलाई 2021
उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने राज्य के एक प्रमुख तीर्थ स्थान हरिद्वार नाम के शहर को कसाईखाना मुक्त बना दिया है, वहां कसाईखानों को जो सरकारी इजाजत मिली हुई थी वह मार्च के महीने में राज्य सरकार ने खारिज कर दी। इस तरह वहां पर मांस की बिक्री भी रोक दी गई है। कुछ लोगों ने इसके खिलाफ उत्तराखंड हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। इसकी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर एस चौहान ने राज्य सरकार से कुछ सवाल किए और यह पूछा कि क्या राज्य सरकार लोगों की पसंद तय करेगी? उनका मतलब जाहिर तौर पर लोगों की खानपान की पसंद से था। अब हरिद्वार में बसे हुए मांसाहारी लोग न तो आसानी से शहर छोडक़र कहीं जा सकते और न ही जिंदगी भर की अपनी खानपान की आदतों को रातों-रात सरकारी आदेश की वजह से खारिज कर सकते हैं। ऐसे में यह सवाल देश में थोपी जा रही एक ऐसी संस्कृति के सामने खड़ा किया गया सवाल है जो कि सत्तारूढ़ कुछ चुनिंदा लोगों की पसंद पर देश के बाकी लोगों को चलने पर मजबूर करने की राजनीति से जुड़ा हुआ है।
हरिद्वार शहर को मांसमुक्त शहर बनाने का जो सरकारी अभियान चल रहा है उसके चलते हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की कि लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुसंख्यकों का शासन ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना भी होता है, उन्होंने कहा- किसी भी सभ्यता की महानता का पैमाना यही होता है कि वह अल्पसंख्यक आबादी के साथ कैसा बर्ताव करती है, हरिद्वार में जिस तरह के प्रतिबंध की बात की गई है उसे यही सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या नागरिकों की पसंद राज्य तय करेगा।
यह मामला अकेले उत्तराखंड का नहीं है क्योंकि भाजपा के राज वाले कई राज्यों ने एक-एक करके ऐसे कई फैसले लिए जिसमें गाय या गोवंश को मारने के खिलाफ, या गाय-भैंस के मांस के इस्तेमाल के खिलाफ तरह-तरह के आदेश निकाले गए। जहां पर ऐसे आदेश थे वहां भी, और जहां पर ऐसे आदेश नहीं थे वहां भी, हमलावर हिंदू जत्थों ने जगह-जगह लोगों को शक के बिना पर पीटा, कई जगह भीड़त्या हुई, और कई जगह सांप्रदायिक तनाव भी खड़ा हुआ। लेकिन दिलचस्प बात यह भी है कि गोवा या केरल जैसे कई राज्य ऐसे भी रहे जहां पर चुनाव लडऩे की वजह से भाजपा ने लोगों से बीफ उपलब्ध कराने का वायदा किया और उत्तर-पूर्व के राज्यों में तो भाजपा के राज में गौ मांस या बीफ उपलब्ध है है ही। इसलिए खाने की जिस संस्कृति को कुछ राज्यों पर थोपा जा रहा है, वहीं कुछ दूसरे राज्यों में अपने एजेंडा को किनारे भी रखा जा रहा है, क्योंकि वहां की बहुतायत आबादी गौ मांस या बीफ खाती ही है। हिंदुस्तान में खानपान के रिवाज को लेकर, कहीं पर शराब पीने के रिवाज को लेकर, तो कहीं पर अंतरजातीय या अंतरधर्मीय शादियों को लेकर तरह-तरह से विभाजन खड़े किए जा रहे हैं। पहनावे को लेकर विभाजन, खानपान को लेकर विभाजन, और लडक़े-लड़कियों के साथ उठने-बैठने या साथ रहने को लेकर विभाजन, यह पूरा तनाव देश पर भारी भी पड़ रहा है।
लेकिन एक बात यह भी है कि जिन लोगों पर ऐसे भावनात्मक मुद्दों का बड़ा असर होता है और जो इसे अपनी एक पुरातन संस्कृति की निरंतरता मान लेते हैं, वे फिर आज की सरकारों की नाकामयाबी को पूरी तरह अनदेखा भी कर लेते हैं, और उन्हें अपने इस काल्पनिक इतिहास में दोबारा जीने के मौके के अलावा किसी और चीज की जरूरत नहीं लगती है। यह पूरा सिलसिला लोगों को आज की जमीनी हकीकत से काट रहा है, और लोगों को गैर मुद्दों में उलझा कर रख रहा है। पूरे हिंदुस्तान के अलग-अलग अनगिनत शहरों को देखें तो वहां पर शहर के पहले थाने कोतवाली के आसपास सराफे की दुकानें रहती थीं, जो कि मोटे तौर पर सवर्ण हिंदुओं या जैन समाज के लोगों की रहती थीं। आज भी सराफा बाजार कोतवाली के आसपास अधिकतर शहरों में दिखता है। लेकिन इसके साथ-साथ इन्हीं इलाकों में बंदूक और कारतूस की दुकानें भी दिखती हैं जिन्हें अधिकतर मुस्लिम चलाते हैं, और उनकी वजह से उन इलाकों में मस्जिदें भी रहती हैं। सैकड़ों बरस से हिंदुस्तान के शहरों का ऐसा ही ढांचा चलते आ रहा है कि हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद ये मिले-जुले इलाकों में रहते आए हैं। अब इलाकों के नाम बदलना, शहरों के नाम बदलना, खानपान बदलना, इन सबका जो सिलसिला चल रहा है, उसकी असली नीयत लोगों का ध्यान असली दिक्कतों की तरफ से हटाना है। यह तो अच्छा है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बहुसंख्यक तबके के राज्य में अल्पसंख्यकों की फिक्र को लेकर सवाल उठाए हैं, और इस पर बहस भी उत्तराखंड से बाहर भी देशभर में होनी चाहिए। लोकतंत्र महज बहुमत का नाम नहीं होता है।
इंसान, और जानवर की मिसालें
18 जुलाई 2021
सोशल मीडिया पर हर दिन कई समझदार दिखते लोगों का लिखा हुआ पढऩे मिलता है जिसमें इंसान की घटिया हरकतों, इंसान के तरह-तरह के जुर्म में इनको कोसने के लिए जानवरों का इस्तेमाल किया जाता है। कहीं भेड़ की खाल ओढ़े हुए भेडि़ए का जिक्र होता है, तो कहीं आस्तीन के सांप का, तो कहीं रंगे सियार की बात होती है, तो कहीं घडिय़ाल के आंसुओं की। जानवरों के बारे में बड़ी मामूली सी जानकारी रखने वाले भी इस बात को जानते हैं कि इंसान अपनी खुद की कमीनगी को जानवरों की कुछ एक काल्पनिक खामियों के साथ जोडक़र मानो अपने पर लगी तोहमत को घटाना चाहते हैं।
अब इंसानों के किए हुए कामों को देखें तो लगता है कि जानवरों में भला कौन हैं जो ऐसे काम करते हैं? एक भी मिसाल जानवरों में ऐसी नहीं मिल सकती जो इंसानों की कमीनगी का मुकाबला कर सके। अब आज की एक खबर है कि उत्तर भारत के किसी एक गांव में एक बाप-बेटी खुले खेत में सेक्स कर रहे थे और लोगों ने घेरकर उनका वीडियो बनाया, उन्हें वहां से भगाया तो वह लोगों पर पथराव करने लगे। अब उनकी हिफाजत के लिए गांव में उनके घर के बाहर पुलिस तैनात की गई है वरना यह खतरा है कि गांव के लोग उन पर हमला कर सकते हैं। कल या परसों एक दूसरी खबर थी कि एक बेटे ने अपनी मां को मारकर उसकी किडनी और अंतडिय़ाँ बाहर निकाल लीं। अखबार में बैठे हुए यह भी समझ नहीं पड़ता कि इस तरह की हिंसा या इस तरह के जुर्म की कितनी खबरें छापी जाएं, उन खबरों में कितना खुलासा किया जाए। क्या उससे समाज को सावधान होने का मौका मिलेगा या इन खबरों का ही समाज पर बुरा असर पड़ेगा, यह तय करने में मुश्किल होने लगती है। जानवरों में कौन से ऐसे हैं जिनमें इस तरह की मिसालें मिल सकें?
इंसान कैसा-कैसा करते हैं, इसकी एक मिसाल कुछ सौ बरस पहले की अभी पढऩे मिली जब कोरोना से बचाव के लिए टीकों की खबर के साथ-साथ वैक्सीन के इतिहास पर भी छपा, और पढऩे मिला। इतिहास का ऐसा ही एक पन्ना 1803 के बरस का है जब दुनिया भर में स्मॉलपॉक्स बहुत बुरी तरह फैला हुआ था, और वह लोगों को बड़ी संख्या में मार भी रहा था, साथ-साथ उनके बदन पर गहरे दाग छोड़ रहा था, कई लोगों की आंखें खराब कर दे रहा था। वैसे में 1796 के आसपास एक ब्रिटिश डॉक्टर ने स्मालपॉक्स के संक्रमण से बचाव की एक तरकीब ढूंढी, और उसने यह पाया कि एक दूसरा संक्रमण कॉउपॉक्स ऐसा है जिससे संक्रमित लोगों को स्मालपॉक्स नहीं हो रहा था। उसने लोगों को स्मालपॉक्स संक्रमण से बचाने के लिए कॉउपॉक्स के वायरस देने शुरू किए, और ऐसे दुनिया की पहली वैक्सीन सामने आई।
इसका तरीका भी बड़ा आसान था, जिन लोगों को कॉउपॉक्स से संक्रमित किया जाता था, उनके बदन पर 9-10 दिनों में कुछ फोड़े हो जाते थे, और दूसरे लोगों के बदन में खरोंच लगाकर उन फोड़ों का पानी निकाल कर उन्हें छुआ दिया जाता था, तो वे लोग भी कॉउपॉक्स से संक्रमित हो जाते थे, लेकिन स्मालपॉक्स के संक्रमण से बच जाते थे जो कि जानलेवा और बहुत अधिक खतरनाक संक्रमण था।
अब इसमें दिक्कत यह आ रही थी कि संक्रमित लोगों के फोड़ों से निकलने वाला पानी बहुत दूर तक नहीं ले जाया जा सकता था। उसे कुछ सौ किलोमीटर ले जाते हुए भी उसका असर खत्म हो जाता था। ऐसे में यूरोप से अमेरिका अगर यह संक्रमण ले जाना हो ताकि अमेरिका में बुरी तरह फैले हुए स्मालपॉक्स का संक्रमण रोका जा सके, तो उसकी कोई तरकीब नहीं निकल रही थी। लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है विज्ञान का एक तकनीक से रिश्ता होता है इंसानियत से नहीं, इसलिए स्पेन के डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने एक तरीका निकाल लिया। यह अनोखा प्रयोग था लेकिन उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया।
1803 में स्पेन के राजा की इजाजत से वहां के दो दर्जन अनाथ बच्चों को छांटकर एक जहाज पर सवार किया गया। राजा की सोच जनकल्याणकारी थी इसलिए उसने इन बच्चों के खाने-पीने का और इनके रखरखाव का अच्छा इंतजाम किया। जहाज के रवाना होने के ठीक पहले डॉक्टरों ने इनमें से दो बच्चों के शरीर में कॉउपॉक्स का संक्रमण डाल दिया। समंदर में सफर के बीच नौ-दस दिनों में इन दो बच्चों की बाहों पर लगाए गए इस टीके के जख्म फोड़ों में तब्दील हो गए और जहाज पर तैनात डॉक्टरों ने इन्हें फोडक़र इसमें से पानी निकालकर दो दूसरे बच्चों की बाहों में खरोंच लगाकर उसमें इसका संक्रमण डाल दिया। अगले नौ-दस दिनों के बाद ये दो बच्चे अपने संक्रमित फोड़ों के साथ तैयार थे, और फिर यही सिलसिला तब तक चलते रहा जब तक जहाज अमेरिका नहीं पहुंच गया। अमेरिका पहुंचने पर सिर्फ आखिरी बच्चे की बाहों में एक फोड़े में पानी था, और डॉक्टरों ने जहाज से उतरते ही उससे संक्रमित पानी निकाल कर दूसरे बच्चों का टीकाकरण शुरू कर दिया जिन पर कि स्मालपॉक्स का खतरा दूसरी उम्र के लोगों के मुकाबले अधिक था। अब अगर देखा जाए कि ये अनाथ बच्चे बिना किसी की इजाजत के इस तरह से वैक्सीन खच्चर की तरह इस्तेमाल किए गए, और इनमें से कुछ बच्चे जहाज पर मर भी गए। तो आज वैक्सीन के कारखानों से निकलकर फ्रीजर जैसी गाडिय़ों में लदकर वैक्सीन दूर-दूर तक जाती है, और एक वक्त यह काम इन अनाथ बच्चों से करवाया गया जिन्होंने इन वैक्सीन को अपने बदन में ढोया, और अपनी जिंदगी की कुर्बानी दी।
जो लोग बात-बात पर इंसान की खामियों के लिए जानवरों की मिसालें ढूंढ लेते हैं, उन लोगों को चाहिए कि इंसान की इस कमीनगी के टक्कर की कोई मिसाल जानवरों में ढूंढकर बताएं। पंछी भी हजारों किलोमीटर उडक़र कई देश पार करके हर बरस किसी एक देश पहुंचते हैं, और मौसम बदलने पर फिर वापस अपने देश आ जाते हैं, लेकिन न वे इंसानों की तरह किसी दूसरे जानवर की पीठ पर सवार होकर आते हैं, और न ही आते जाते हुए किसी दूसरे का हक का खाते हैं। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि दुनिया के इतिहास में उसके हर दौर में इंसान जितने तरह के बुरे काम करते रहा है, उसकी कोई मिसाल इंसानों से परे कहीं देखने नहीं मिलेगी। दुनिया का इतिहास जुल्म से भरा हुआ है और हर जुल्म के लिए महज इंसान जिम्मेदार रहे हैं।
अपने आसपास के लोगों को कैदी बनाकर गुलाम बनाकर उन्हें बाजारों में नीलाम करना, उनसे जानवरों या मशीनों की तरह काम लेकर उन्हें खत्म कर देना, और उन्हें फेंक कर फिर से दूसरे गुलाम खरीद लेना ऐसे कितने ही काम बड़े आम तरीके से इंसान करते हैं।
अभी हाल के बरसों तक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तक जापान ने कई दूसरे देशों में अपनी फौज के लोगों के लिए वहां की स्थानीय लड़कियों और महिलाओं को रखकर चकलाघर बना दिए थे, और उनका मनचाहा शोषण करने के बाद सैनिक अपने देश लौट आए वहां पर अपनी एक अगली पीढ़ी छोडक़र। ऐसा ही अमेरिकी फौजियों ने वियतनाम में किया था, ऐसा ही तालिबान आज अफगानिस्तान में कर रहे हैं जहां वे विधवाओं और लड़कियों की लिस्ट बनाकर विधवाओं को अपने सैनिकों के हवाले कर रहे हैं ताकि वे उनका मनचाहा इस्तेमाल कर सकें। खूब बढ़-चढक़र जानवरों के खिलाफ लिखने वाले इंसानों को जानवरों में ऐसी कोई मिसाल ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए और नाकामयाब होने पर कम से कम आगे जानवरों के खिलाफ अपनी हैवानियत नहीं दिखानी चाहिए।



