रिलेशनशिप टिप की वजह
31 जुलाई 2022
हिन्दी में बहुत पहले, आज से चालीस बरस
पहले, एक पत्रिका अपने एक कॉलम के लिए हम लोगों को बड़ा खींचती थी। कहने के
लिए युवा वर्ग के लिए छपने वाली इस पत्रिका में ‘मैं क्या करूं?’ नाम का
एक कॉलम छपता था जिसमें लोग अपनी नौजवानी की दिक्कतों या उलझनों का जवाब
चाहते थे। उस वक्त के हिसाब से उस कॉलम के सवाल भी कुछ अधिक हिम्मती रहते
थे, और शायद जवाब भी। खैर, उस वक्त वैसा एक ही कॉलम हिन्दी में था, इसलिए
उसे पढऩे का इंतजार रहता था। बाद में अंग्रेजी पढऩे के साथ-साथ समझ आया कि
अंग्रेजी के पत्र-पत्रिकाओं में तो वैसे कॉलम का चलन आम हैं, और जिनकी कोई
उलझन नहीं रहती है, वे भी वैसे कॉलमों को पढ़ते हैं। दूसरों की जिंदगी की
निजी दिक्कतों को सुनना, और फिर उसे सुलझाने का सुझाव भी पढऩा, बहुत से
लोगों के लिए बहुत दिलचस्पी का होता है। हालांकि कुछ परामर्शदाता ऐसे भी
हैं जो कि ऐसा कॉलम लिखने के खिलाफ रहते हैं कि जिन लोगों की जिंदगी में
ऐसी कोई समस्या या उलझन नहीं रहती है, वे भी उससे अपने आपको जोड़ लेते हैं,
और अपने लिए वैसी कोई काल्पनिक समस्या सच मान बैठते हैं। फिलहाल अंग्रेजी
में ऐसे कॉलम धड़ल्ले से चलते हैं, और इनमें संबंधों की जटिलताओं पर
परामर्श से लेकर लोगों की सेक्स-जिंदगी की दिक्कतों पर सुझाव तक रहते हैं।
अभी पिछले कुछ हफ्तों से मैंने अपने फेसबुक पेज पर रिलेशनशिप-टिप नाम का एक सिलसिला शुरू किया है जिसमें गिने-चुने बीस-पच्चीस शब्दों में कोई एक ऐसी सलाह रहती है जिसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। यह किसी मनोवैज्ञानिक-परामर्शदाता विशेषज्ञता से उपजी हुई सलाह नहीं रहती है, लेकिन यह आम जिंदगी में खुद के जिए हुए, और दूसरों से सुने हुए से बनी धारणाएं हैं जो कि मैं दूसरों के सोचने-विचारने के लिए सामने रख देता हूं। लेकिन इससे किसी की उलझन सुलझे या न सुलझे, खुद मेरे लिए इससे अभूतपूर्व उलझनें पैदा हो रही हैं, क्योंकि आसपास के कई तरह के लोग लिखी गई एक-एक बात को मेरे उनसे रिश्तों पर कही गई बात मान ले रहे हैं, या उनके किसी और से रिश्ते के बारे में कही गई बात!
अब बात व्यक्तिगत रूप से कुछ खतरे की हो जाती है, कई संबंध और कई दोस्तियां खोने का खतरा खड़ा हो जाता है, कई लोगों से बातचीत में तनाव की नौबत आ जाती है, कुछ लोगों ने इसे साफ-साफ उनकी बेइज्जती मान लिया है, और कुछ ने यह संदेश भी भेजा कि उन्हें बेईमान-धोखेबाज लिखते हुए मुझे कोई शर्म नहीं आई? एक दोस्त ने फेसबुक पर ही यह लिखा कि उसे यह हैरानी है कि मेरे परिवार ने अब तक मुझे घर से निकालकर बाहर फेंका क्यों नहीं है? जितने मुंह, उतनी बातें।
अब बिना किसी खास उलझन के जब इस तरह की सुलझन लिखने का शौक चर्राया है, तो कुछ खतरे तो होना जायज ही था। और फिर यह किसी के पूछे गए सवाल के जवाब में लिखने के बजाय, मसीहाई अंदाज में दी गई नसीहत अधिक थी, तो मसीहा को सलीब पर तो ठुकना ही था, और वही हो भी रहा है।
दरअसल संबंधों को लेकर हिन्दुस्तान के अधिकतर लोगों के बीच बहुत खुली बातचीत का सिलसिला कम रहता है। लोग निजता खत्म हो जाने के डर से आसपास के लोगों से भी बहुत खुलासे से बहुत सी बातें नहीं करते। इसके अलावा सेक्स और प्रेमसंबंधों जैसे मुद्दे अभी भी अधिकतर लोगों के लिए वर्जित-विषय जैसे हैं, और उन पर भी बहुत चर्चा नहीं होती है। बहुत से प्रेमी-जोड़े भी ऐसे रहते हैं, जो आपस में जो करते भी हैं, जो जीते भी हैं, उस पर वे खुलकर चर्चा नहीं करते। यहां तक कि बात तो दो लोगों के बीच की है, लेकिन असल जिंदगी में दो लोग हमेशा ही दो नहीं रहते, और बहुत से लोगों की जिंदगी में एक तीसरे किसी के आने से कम या अधिक वक्त के लिए यह एक त्रिकोण बन जाता है, और उससे कैसे निपटना है इसका अंदाज बहुत से लोगों को नहीं रहता। वे लोग तो फिर भी खुशकिस्मत रहते हैं जिनके पास कोई राजदार ऐसी दिक्कत और परेशानी की बात करने के लिए रहते हैं, लेकिन वे भी अपनी जिंदगी के पूर्वाग्रहों पर टिकी हुई सलाह ही दे पाते हैं, उनकी सलाह भी किसी पेशेवर परामर्शदाता जैसी नहीं रहती है, और अक्सर ही वह काम की होने के बजाय बर्बाद करने वाली अधिक रहती है। लोगों को ऐसी किसी सलाह के लिए किसी से बात करते समय यह भी सोचना चाहिए कि हर शुभचिंतक अच्छे सलाहकार हों, यह जरूरी तो नहीं।
ऐसे में मुझे सूझा कि किसी एक व्यक्ति के निजी संबंधों से परे, किसी के भी किसी भी तरह के संबंधों को लेकर क्या सावधानी की ऐसी कोई बातें लिखी जा सकती हैं जो कि लोगों को समय रहते सोचने का मौका दे, सोचने पर मजबूर करे, और यह किसी सलाह या इलाज की तरह न होकर, एक रिमाइंडर की तरह रहे, और लोगों को याद दिलाए कि मुझे याद रखना। अपनी खुद की उम्र का खासा बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद मेरे पास खुद के लिए ऐसी किसी चेकलिस्ट की जरूरत कम है, लेकिन ऐसी चेकलिस्ट बनाने के लिए तजुर्बा बड़ा लंबा है कि लोगों को संबंधों के बारे में क्या-क्या सोच लेना चाहिए।
इन बातों की चर्चा कई लोगों के मुंह में बड़ा कड़वा स्वाद छोड़ जा रही है, क्योंकि सावधानियां किसी को नहीं सुहातीं। अगर किसी से घर-दफ्तर में आग बुझाने के सामान तैयार रखने को कहा जाए, तो लोग आमतौर पर ऐसा समझ लेते हैं कि ऐसे सलाहकार उनके बुरे की ही बात सोचते हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि अगर किसी बुरी नौबत से सचमुच ही बचना है, तो वक्त रहते उसके बारे में सोचकर, उसकी कल्पना करके, उस हिसाब से तैयारी करके रखना होता है। जीवन बीमा तभी तक कराया जा सकता है, जब तक जीवन रहता है, जिसका कोई फायदा मरने के बाद बाकी परिवार को मिलता है, उसे मरने के बाद नहीं किया जा सकता। इसलिए आपसी रिश्तों में तनाव आ जाने के बाद उन तनावों की कल्पना का कोई फायदा नहीं रह जाता, तब तो वह कल्पना नहीं हकीकत हो चुकी रहती है। इसलिए संबंधों को लेकर आत्ममंथन, आत्मविश्लेषण, और मूल्यांकन जैसे काम बिगाड़ आने के पहले ही काम के रहते हैं, सब कुछ बिगड़ जाने के बाद कुछ भी बच जाना मुमकिन नहीं रहता।
इसलिए लोगों को अपने संबंधों के अपने अच्छे दिनों के चलते हुए ही बुरे दिनों की आशंका किए बिना, वैसी किसी नौबत के आने पर क्या करना चाहिए इस बारे में सोच जरूर लेना चाहिए। अब इस बात को एक मिसाल के साथ समझा जाए तो वह यह है कि आज हिन्दुस्तान में हर दिन पुलिस के पास दर्जनों या सैकड़ों ऐसी शिकायतें पहुंचती हैं कि किसी ने उनकी अंतरंग तस्वीरें, या नग्न या अश्लील वीडियो वायरल कर दिए हैं। इनमें से अधिकतर मामलों में ये वीडियो और ये तस्वीरें लोगों की खुद ही अपने साथी को दी हुई रहती हैं, और रिश्ते खराब हो जाने पर इनका नाजायज इस्तेमाल होने लगता है। अंग्रेजी में इसके लिए रिवेंज-पोर्न शब्द खासे अरसे से चल रहा है, इसका हिन्दी तरजुमा बदले का सेक्स-वीडियो जैसा कुछ हो सकता है। अब जब सब कुछ अच्छा चलते रहता है, उस वक्त लोगों को यह सूझ भी नहीं सकता कि भर्ती के अपने उस वक्त के सबसे प्यारे इंसान के साथ शेयर की गई इन निजी चीजों का कोई बेजा इस्तेमाल भी कभी हो सकता है, लेकिन सच तो यह है कि इनमें से बहुत सी चीजें किसी तीसरे-चौथे तक पहुंचती हैं, और कुछ चीजें सोशल मीडिया पर भी चली जाती हैं। अब अगर मेरी सुझाई गई बातों से लोगों को अपनी तस्वीरें और वीडियो साझा करते वक्त एक बार फिर सोचना सूझता है, तो इससे उनका भला ही हो सकता है।
मेरी सुझाई हुई हर बात यहां लिखने के लिए आज की इस जगह से कई गुना अधिक जगह लग सकती है, और लोगों को यह अटपटा भी लग सकता है कि एक उम्रदराज अखबारनवीस छिछोरेपन की लगतीं इन बातों को क्यों लिख रहा है, फिर यह भी है कि मुफ्त में दी गई सलाह की कोई इज्जत तो होती नहीं है, फिर भी जैसे बिना किसी मांग के भी कोई पेड़ फल, पत्ते, फूल देते रहते हैं, उसी तरह मैं अपने को सूझी गई बातें साझा करते रहता हूं। किसी के काम आए तो ठीक, और काम न आए, तो ये बातें मेरी डायरी सरीखी दर्ज होती चल रही हैं।
माईक सामने आते ही लोगों को यह क्यों लगता है कि उन्हें कुछ बेवकूफी उगलनी है?
31 जुलाई 2022
महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी
के एक बयान को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया है जिसमें मुम्बई के एक सार्वजनिक
कार्यक्रम में मंच से माईक पर बोलते हुए राज्यपाल ने कहा- कभी-कभी मैं यहां
लोगों से कहता हूं कि महाराष्ट्र में, विशेषकर मुम्बई और ठाणे से,
गुजरातियों और राजस्थानियों को निकाल दो, तो तुम्हारे यहां कोई पैसा बचेगा
ही नहीं। ये राजधानी जो कहलाती है आर्थिक राजधानी, ये आर्थिक राजधानी
कहलाएगी ही नहीं। वे इन्हीं समुदायों में से एक से जुड़े एक नामकरण समारोह
में बोल रहे थे। और जैसी कि उम्मीद की जा सकती है, राज्यपाल के इस बयान के
बाद आज विपक्ष में बैठे शिवसेना के उद्धव ठाकरे समेत तमाम लोग राज्यपाल पर
टूट पड़े। ठाकरे ने शिवसेना के परंपरागत हमलावर तेवरों के साथ कहा- भगत
सिंह कोश्यारी ने भले ही महाराष्ट्र की संस्कृति देखी हो, लेकिन उन्हें
कोल्हापुरी जोड़ा भी दिखाना होगा। उल्लेखनीय है कि कोल्हापुरी चप्पलें
विश्वविख्यात हैं। ठाकरे ने यह भी कहा कि राज्यपाल ने मराठी लोगों का अपमान
किया है, और इसके साथ ही उन्होंने हिन्दुओं को बांटने की कोशिश भी की है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, और उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस
ने भी राज्यपाल के बयान से असहमति जताई है, और कहा है कि महाराष्ट्र के
निर्माण में मराठियों का योगदान सबसे ज्यादा है, और मुम्बई देश की आर्थिक
राजधानी सिर्फ मराठियों की मेहनत से बनी है।
भगत सिंह कोश्यारी जिस इतिहास के साथ आते हैं, उसमें इस तरह की अनर्गल बातें कहना अटपटा नहीं समझा जाता। और खासकर जब अलग-अलग तबकों के बीच भेदभाव को बढ़ाने की बात हो, तो उसमें ऐसे लोग अतिरिक्त सक्रियता के साथ जुट जाते हैं। उनका पर्याप्त राजनीतिक अनुभव है, और वे महाराष्ट्र के बाहर के भी हैं। इसलिए वे ऐसी बातों की नजाकत को भी समझते हैं, और इनके खतरों को भी। वे उत्तराखंड विधानसभा, विधान परिषद से होते हुए राज्यसभा और लोकसभा सभी का तजुर्बा रखते हैं, और इसके पहले भी वे महाराष्ट्र के कुछ सबसे सम्मानजनक लोगों के बारे में अनर्गल बातें कर चुके हैं। मार्च में ही उन्होंने सावित्री बाई फुले के बाल विवाह को लेकर उटपटांग बात कही थी जिस पर बड़ा बवाल मचा था। इसके अलावा उन्होंने समर्थ रामदास को छत्रपति शिवाजी का गुरू करार दिया था जो कि ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत बात है और उस समय सत्तारूढ़ कांग्रेस एनसीपी, शिवसेना गठबंधन ने उनके बयानों पर आपत्ति जताई थी, और कहा था कि सावित्री बाई फुले के बाल विवाह का जिक्र करते हुए राज्यपाल ने जिस तरह हॅंसते हुए हाथों से कुछ इशारे किए थे, वह बहुत शर्मनाक था, गठबंधन ने कहा था कि ये महाराष्ट्र की बदनसीबी है कि उसे ऐसा गवर्नर मिला है। समर्थ रामदास को छत्रपति शिवाजी का गुरू बताने के पीछे भी महाराष्ट्र में यह वैचारिक विवाद चलता है कि ऐसा सुझाना ब्राम्हणों की गैरब्राम्हणों पर प्रभुत्व दिखाने की भावना है।
सार्वजनिक जीवन में जुबान पर लगाम देना किसी भी राजनीतिक दल में एक बुनियादी तालीम होनी चाहिए। जिस तरह प्राइमरी स्कूल में पहाड़ा और अक्षरज्ञान सिखाए जाते हैं, लिखना सिखाया जाता है, उसी तरह राजनीति में जुबान पर लगाम देना सिखाना चाहिए। ये राज्यपाल अकेले ऐसे नहीं हैं, अभी चार दिन पहले ही लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने जिस लापरवाही के साथ राष्ट्रपति की जगह राष्ट्रपत्नी शब्द का इस्तेमाल किया, उसने सदन के भीतर और बाहर बड़ी कड़वाहट घोल दी, और देश का मानो एक पूरा संसदीय दिन ही इस बदजुबानी को समर्पित हो गया। जो लोग राजनीति में लंबे समय से रहते हैं, उन्हें बदजुबानी की कोई रियायत नहीं दी जा सकती। और अधीर रंजन चौधरी तो इसके पहले भी मुंह खोलते ही पार्टी के लिए मुसीबत का सामान बनते रहे हैं। बहुत सी पार्टियों में बहुत से नेता ऐसे हैं जिन्होंने अपनी जुबान से अपनी पार्टी का नुकसान किया है। समाजवादी पार्टी के आजम खान के नाम को याद रखा जा सकता है जिन्होंने बलात्कार की शिकार एक छोटी बच्ची की लिखाई रिपोर्ट को राजनीतिक साजिश करार दिया था, और जिसके लिए उन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट की लताड़ भी पड़ी, और वहां जाकर माफी भी मांगनी पड़ी। ऐसे बयान ममता बैनर्जी से लेकर शरद यादव तक देते आए हैं, और ऐसी गंदगी बाद में दूसरी पार्टियों के लिए अपनी गंदगी के बचाव का तर्क बनती है।
चूंकि हिन्दुस्तान में अदालतों की एक सीमा है, और वैसे तो तमाम आबादी ऐसे बयानों को लेकर अदालत तक जाने के लिए आजाद है, लेकिन पहले से मामलों के बोझ से टूटी कमर वाली अदालतें और कितना बोझ झेल पाएंगी, इसका अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में बकवासी और मवादी बयान देने वाले लोगों के खिलाफ राजनीति और सार्वजनिक जीवन के लोगों को दूसरी संवैधानिक कार्रवाई करनी चाहिए। अगर महिला आयोग, बाल आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, अल्पसंख्यक आयोग में जाकर शिकायत करने की गुंजाइश हो, तो वहां शिकायत करनी चाहिए, या फिर सार्वजनिक बयानों के हमले से ओछे और घटिया बयानों का जवाब देना चाहिए। जब तक ऐसे बकवासी लोगों को सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं किया जाएगा, तब तक उनकी बकवास जारी रहेगी। राज्यपाल के रूप में कोश्यारी अकेले नहीं हैं, और भी बहुत से राज्यपाल घटिया बातें करते आए हैं, घटिया हरकतें भी करते आए हैं। लोगों को याद होगा कि किस तरह के हालात में नारायण दत्त तिवारी को आन्ध्र का राजभवन छोडऩा पड़ा था, और उन्हें सेक्स वीडियो के विवाद के बीच वहां से निकलकर अघोषित संतान के डीएनए विवाद में आकर फंसना पड़ा था। राजनीतिक पार्टियों को भी अपने-अपने घटिया लोगों को काबू में रखना चाहिए क्योंकि उनकी वजह से देश के जलते-सुलगते मुद्दे धरे रह जाते हैं, और पार्टियां बकवासी में उलझ जाती हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल एक मिसाल हैं कि राज्यपाल कैसे नहीं होने चाहिए। किसी समझदार ने कहा भी है कि बेवकूफ होने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन जब बेवकूफ को बढ़-चढक़र बोलने का शौक हो, तब दिक्कत बड़ी रहती है।
नाबालिग बच्चों के बीच हिंसा और जुर्म के ये ताजा नमूने, आम नहीं, खास फिक्र लायक
30 जुलाई 2022
उत्तरप्रदेश के कल तक के इलाहाबाद और आज के
प्रयागराज की कुछ अटपटी खबर है। आमतौर पर तो यह माना जाना चाहिए था कि शहर
को धार्मिक नाम मिलने के बाद वहां का माहौल अधिक धार्मिक या आध्यात्मिक
होगा, लेकिन बीबीसी की एक रिपोर्ट कहती है कि इस शहर के स्कूली बच्चों में
एक अजीब किस्म की हिंसा फैल रही है, जैसी कि बमों के शौकीन पश्चिम बंगाल
में भी दिखाई-सुनाई नहीं पड़ी है। पुलिस ने वहां स्कूली बच्चों के कुछ
गिरोह पकड़े हैं जो बम बनाकर उन्हें दूसरी स्कूलों के बाहर फोड़ रहे थे।
ऐसे 35 स्कूली बच्चे प्रयागराज पुलिस की हिरासत में है, और रिपोर्ट कहती है
कि पिछले कई महीनों से वहां पर सरेआम देसी बम मारने की वारदातें हो रही
थीं। पुलिस का कहना है कि ये सभी बच्चे प्रयागराज के जाने-माने स्कूलों में
पढ़ते हैं, और शुरुआती जांच में पता लगा है कि ओटीटी वेब सीरिज से
प्रभावित होकर, उन्हीं के नामों पर इन छात्रों ने तांडव ग्रुप, जैगुआर
ग्रुप, इम्मॉर्टल ग्रुप, माया ग्रुप जैसे गिरोह बनाए, इंटरनेट पर यूट्यूब
से देखकर घरेलू बम बनाए, और एक दूसरे समूह पर दबदबा कायम करने के लिए, दहशत
फैलाने के लिए ऐसे बम फोड़े, और सोशल मीडिया पर इन वारदातों की शोहरत भी
बढ़ाने की कोशिश की। पुलिस ने बताया कि ऐसे किसी-किसी ग्रुप में तो छात्रों
की संख्या सौ से लेकर तीन सौ तक भी है।
यह बड़ी अजीब सी खबर है, और लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले ही जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक शायद नाबालिग लडक़ी ने सडक़ पर एक साइकिल वाले के किनारे न होने पर उसका गला ही काटकर मार डाला, तब भी हमने ऐसी हिंसा के विश्लेषण की जरूरत बताई थी। बाद में आई खबरों में पता लगा कि वह लडक़ी एक गिरोह-सरगना बनना चाहती थी, और वह नशे के कारोबार से भी जुड़ी बताई गई थी। नाबालिग पीढ़ी की हिंसा और उसके जुर्म की बात अधिक बड़ी फिक्र इसलिए खड़ी करती है कि उसे शायद कानूनी जटिलताओं और जिंदगी के खतरों का पूरा अहसास नहीं रहता है। और भारत में नाबालिग बच्चों के किए हुए जुर्म पर उनके सुधार का इंतजाम इतना खराब है कि छत्तीसगढ़ में एक जगह ऐसे सरकारी केन्द्र पर इक_ा बच्चों ने छत पर चढक़र बाहर पुलिस या अफसरों पर गैस सिलेंडर फेंककर हमला करने की कोशिश की थी। जानकार लोगों का यह भी कहना है कि ऐसे सभी बाल सुधारगृह बच्चों को कई नए किस्म के जुर्म करना सिखाकर बिदा करते हैं, और कई तरह के नशे की भी आदत डालकर। हिन्दुस्तान में बच्चों को सुधारने का कोई भी असरदार सरकारी इंतजाम नहीं है, और इसलिए भी ऐसी नौबत आने देने से बचना चाहिए।
आज जब अलग-अलग कमरों में टीवी, या कि हर मोबाइल फोन पर तरह-तरह के वीडियो की सहूलियत, और उसका खतरा, दोनों ही मौजूद हैं, तो मां-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों की हरकतों पर ध्यान दें, और पहली शिकायत का मौका आने के भी पहले उन्हें लेकर सम्हल जाएं। लोगों को याद होगा कि जो देश का सबसे चर्चित बलात्कार कांड था, उसमें निर्भया से बलात्कार और सबसे खूंखार दर्जे की हिंसा करने वालों में एक नाबालिग भी था। और एक नाबालिग के ऐसी हिंसा में शामिल होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यह बहस भी हुई थी कि क्या नाबालिगों को ऐसे जुर्म में भी उम्र की रियायत देना जायज है? अब दुनिया के अलग-अलग देशों में, और उनके अलग-अलग प्रदेशों में बच्चों की उम्र के पैमाने अलग-अलग हैं। उनके गाड़ी चलाने से लेकर उनके सिगरेट-शराब पीने तक की उम्र अलग-अलग है। जुर्म को लेकर भी, शादी की उम्र को लेकर भी ये नियम अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान में मौजूदा नियम-कानून को देखना चाहिए जिसमें किसी नाबालिग से कोई गलती होने पर, या उसके कोई गलत काम करने पर उसे जिस किस्म के सुधारगृह में भेजा जाएगा, वहां से उसका और बुरा मुजरिम होकर निकलना तय रहेगा। लोगों का पैसा, उनकी राजनीतिक पहुंच, और उनकी किसी और किस्म की ताकत उनके बच्चों को हमेशा ही कानून के शिकंजे से नहीं निकाल सकती। पुलिस और न्याय व्यवस्था कितनी भी भ्रष्ट क्यों न हो, आज वीडियो-सुबूतों की वजह से बहुत से नाबालिग भी अदालत में ले जाकर मुजरिम साबित किए जा सकते हैं, और उन्हें कई बरस सुधारगृह में रखा जा सकता है। हर मां-बाप को ऐसे सुधारगृहों के खतरों को बारीकी से समझ लेना चाहिए, और ऐसी नौबत नहीं आने देनी चाहिए कि उनके बच्चे ऐसी जगहों पर भेजे जाएं, और वे वहां से पूरी तरह बर्बाद होकर निकलें। उन्हें यह खतरा भी समझना चाहिए कि आज उनके बच्चे नाबालिग उम्र में सुधारगृह पहुंचेंगे, और फिर 18 बरस के होने पर उन्हें आम जेल भेजा जाएगा, और वहां की जिंदगी के तमाम किस्म के खतरों को यहां पर गिनाना भी मुमकिन नहीं है, लोगों को सिर्फ इतना समझना चाहिए कि इन जगहों से उनके बच्चे बलात्कार के शिकार होकर भी निकल सकते हैं, जो कि इन जगहों पर एक आम बात है।
अब जिस घटना से आज का यह लिखना शुरू किया गया है, उस प्रयागराज में लौटें, तो यह बड़ी अजीब बात है कि एक तरफ तो उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में पुलिस चारों तरफ, हर किस्म की मुठभेड़ भी कर रही है जिसमें जुर्म के आरोपियों को सडक़ पर ही निपटा दिया जा रहा है। यह तरीका ऐसी शोहरत पा चुका है कि अभी कर्नाटक में साम्प्रदायिक हत्या के जवाब में वहां के हिन्दू संगठनों और भाजपा नेताओं ने इसी योगी-शैली का राज कर्नाटक में भी मांगा है, और वहां कल ही एक मंत्री ने यह भरोसा भी दिलाया है कि जरूरत रहेगी तो यूपी से अधिक बड़े पैमाने पर मुठभेड़ कर्नाटक में भी की जाएगी। ऐसी बड़ी कानूनी कार्रवाई वाले उत्तरप्रदेश में धार्मिक नाम वाले प्रयागराज में अगर नामी-गिरामी स्कूलों के बच्चे ऐसे औपचारिक गिरोह बनाकर एक-दूसरे पर सार्वजनिक हमलों का काम कर रहे हैं, तो यह बहुत भयानक नौबत है, यह उत्तरप्रदेश की ताजा समस्या तो है ही, यह बाकी हिन्दुस्तान के लिए भी खतरे की एक घंटी है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आने वाली हिंसक वेब सिरीज और हिंसक वीडियो गेम्स का असर अगर इस तरह सिर चढक़र बोल रहा है, तो सरकार और समाज दोनों को इसके बारे में सोचना चाहिए। इस ताजा मामले को एक स्थानीय घटना मानने के बजाय नई पीढ़ी पर मंडराते एक व्यापक खतरे की तरह देखना बेहतर होगा, और बाकी जगहों पर ऐसी नौबत आए उसके पहले सबको सम्हल जाना होगा।
कर्नाटक में हिन्दू-मुस्लिम हत्याओं से बाकी देश के सामने भी खड़ा एक सवाल
29 जुलाई 2022
कर्नाटक में आज किसी हिन्दू की, तो चार दिन
बाद किसी मुस्लिम का कत्ल चल रहा है। और जाहिर तौर पर ये मामले
साम्प्रदायिक हत्या के दिख रहे हैं। ऐसा भी लगता है कि ये जवाबी हत्याएं
हैं। पहले किसी एक सम्प्रदाय के लोगों ने या संगठन ने दूसरे सम्प्रदाय के
लोगों को मारा, तो बाद में दूसरों ने उसका जवाब दे दिया। लोगों को याद होगा
कि बीच-बीच में केरल में भी आरएसएस और सीपीएम के लोगों के बीच इस तरह की
जवाबी हिंसा चलती रहती है। कर्नाटक में दिक्कत यह है कि वहां भाजपा के एक
कार्यकर्ता के कत्ल के बाद लोग अब मुख्यमंत्री से यूपी के योगी-मॉडल की
मांग कर रहे हैं। योगी मॉडल कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, यह पुलिस और
बुलडोजर की मदद से अल्पसंख्यक तबके के खिलाफ आतंक का एक माहौल बनाने का
राजनीतिक मॉडल है, जिसके तहत मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का नागरिक करार दिया
जाता है। अब अगर भाजपा और संघ परिवार के लोग कर्नाटक में भाजपा सरकार रहने
के बाद उनके कार्यकर्ता के कत्ल पर योगी मॉडल लागू करने की मांग कर रहे
हैं, तो एक बरस पहले मुख्यमंत्री बने बासवराज बोम्मई पर एक दबाव पडऩा तो तय
है ही। इस दबाव के चलते वे वहां पर पुलिस को और अधिक साम्प्रदायिक नजरिये
से काम करने कहेंगे, या योगी के कुछ और असंवैधानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल
करेंगे, यह पता नहीं। लेकिन धर्मान्धता और कट्टरता लोगों को गैरकानूनी
हिंसा की तरफ धकेलने का काम करती हैं, और कर्नाटक आज उस खतरे की कगार पर
दिख रहा है।
लेकिन इसे कर्नाटक की इस ताजा हिंसा के हमलों से परे भी देखें, तो यह देश के लिए एक अलग फिक्र की बात है। जब सडक़ों पर पूजा या नमाज को लेकर जगह-जगह तनातनी चल रही है, जब मस्जिद के लाउडस्पीकर का जवाब देने के लिए उनके सामने लाउडस्पीकर लगाकर हनुमान चालीसा पढ़ी जा रही है, जब पूरे देश की हवा में साम्प्रदायिक जहर घोला जा रहा है, तो कोई कब तक महफूज रहेंगे, यह एक पहेली है। आने वाली पीढ़ी को लोग कितनी हिफाजत या कितने खतरे में छोडक़र जाएंगे, यह तो बहुत दूर की बात है, आज की बात यह है कि साम्प्रदायिक तनाव बढ़ते-बढ़ते अब जगह-जगह कत्ल करवा रहा है। आज केन्द्र सरकार और बहुत से प्रदेशों की सरकारें ऐसे फैसले ले रही हैं कि जिनसे मुस्लिम अल्पसंख्यक अपने को खतरे में महसूस करें, उपेक्षित पाएं, और फिर उनके बीच के कुछ नौजवान कानून पर भरोसा छोड़ दें। पूरा देश इस बात को देख रहा है कि किस तरह किसी भाषण या ट्वीट को लेकर मुस्लिम नौजवान छात्र नेताओं को बरसों तक बिना जमानत जेल में डालकर रखा जा रहा है, और जैसा कि हमने कुछ दिन पहले लिखा था, और उसके कुछ दिनों के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि ऐसा लगता है कि इस देश में प्रक्रिया को ही सजा बना दिया गया है। अब अगर किसी समुदाय के लोगों को यह लगने लगेगा कि कानून की प्रक्रिया ही उनके खिलाफ सजा की तरह इस्तेमाल की जा रही है, तो उनका भरोसा ऐसे कानून और ऐसे लोकतंत्र पर से उठ जाने में कोई हैरानी नहीं होगी। आज जिन लोगों को यह लगता है कि बहुसंख्यक आबादी के वोटों को अल्पसंख्यक आबादी के वोटों के खिलाफ एक धार्मिक-जनमत संग्रह सरीखे चुनाव में खड़े करके इस देश और प्रदेशों पर अंतहीन राज किया जा सकता है, उन लोगों को ऐसी नौबत के खतरों का या तो अंदाज नहीं है, या वे खुद अपने परिवार को महफूज रखने की ताकत रखते हैं। अगर इस देश में दो समुदायों के बीच हिंसक नफरत को आसमान तक ले जाया जाएगा तो कौन सुरक्षित रह जाएंगे? आज जिस तरह किसी एक समुदाय के दो या चार लोग मिलकर दूसरे समुदाय के किसी एक को मार डाल रहे हैं, वैसी गिनती पूरे हिन्दुस्तान में हर दिन लाखों जगहों पर आ सकती है। लाखों ऐसे मौके हर दिन रहते हैं जब किसी एक समुदाय के चार लोगों के बीच दूसरे समुदाय का कोई एक घिरा हुआ रहे। अगर नफरत के हिंसा बढ़ती चली गई, तो हिन्दू और मुस्लिमों के बीच किसी टकराव को रोकने के लिए पूरे देश की पुलिस और तमाम फौज भी मिलकर कम पड़ेंगी। इन दोनों समुदायों के तमाम लोगों को पूरी हिफाजत दे पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है। देश के लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा बना रहेगा, तो ही वे खतरे से बाहर रहेंगे। आज जिस तरह धर्म को लोकतंत्र से बहुत-बहुत ऊपर रखा जा रहा है, और लोगों की धार्मिक भावनाएं पल-पल आहत हो रही हैं, किसी की भी लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय भावनाएं कभी भी आहत नहीं हो रही हैं, यह एक बहुत ही खतरनाक नौबत है।
इस देश के धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोगों को यह बात समझ लेना चाहिए कि उनकी संपन्नता और ताकत की वजह से आज हो सकता है कि उनके परिवार महंगी कारों में बैठकर दूर निकल जाते हों, लेकिन जिस दिन किसी एक समुदाय के लोग हिसाब चुकता करने के लिए दूसरे समुदाय के लोगों को ठिकाने लगाने लगेंगे, वैसे राज्यों में पुलिस और सरकार के पास सिर्फ ऐसे कत्ल की जांच, और उससे उपजे तनाव को काबू में करने का काम ही रह जाएगा। आज जिस तरह एक-एक कत्ल पूरे-पूरे राज्य को तनाव में डाल रहा है, कहीं कफ्र्यू लगता है, कहीं शहर बंद होता है, जिंदगी और कारोबारी कामकाज ठप्प हो जाते हैं, पढ़ाई-लिखाई बंद हो जाती है, यह सब कुछ देश की बर्बादी का सिलसिला है। लोगों को याद होगा कि जिस वक्त बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, और देश के मुस्लिमों को लगा था कि कानून का राज उनके हक बचा नहीं पा रहा है, तब मुम्बई में आतंकी बम धमाके हुए थे, और सैकड़ों लोग मारे गए थे। इन धमाकों की तोहमत जिन पर है, वैसे दाऊद सरीखे कुछ लोग पाकिस्तान या कहीं और जा बसे हैं, लेकिन उन दंगों में हुए नुकसान की कोई भरपाई तो हो नहीं पाई। इसलिए अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक तबकों के बीच खाई खोदने के लिए भी, चुनाव जीतने के लिए भी अगर साम्प्रदायिक तनाव की आग को हवा दी जाती है, तो वह आग जंगल की आग की तरह बेकाबू भी हो सकती है, और पूरे देश की अर्थव्यवस्था को भी चौपट कर सकती है। साम्प्रदायिक नफरत चुनाव तो प्रभावित करती है, लेकिन उससे उपजी हिंसा कारोबार को भी प्रभावित करती है, देश के विकास को भी प्रभावित करती है। कर्नाटक ने पिछले बरसों में लगातार साम्प्रदायिकता देखी है, और देश का यह एक सबसे विकसित राज्य अपनी संभावनाओं से काफी पीछे हो गया होगा। जिन लोगों को साम्प्रदायिक हिंसा से आर्थिक गिरावट का रिश्ता समझ नहीं आता है, उन्हें अपने देश-प्रदेश की संभावनाओं का कोई अंदाज नहीं है। कुल मिलाकर बात यह है कि इस देश में 140 करोड़ आबादी में से अगर 20 करोड़ मुस्लिम हैं, तो हिन्दू और मुस्लिम आबादी के एक-एक फीसदी लोगों के भी साम्प्रदायिक-कातिल हो जाने का खतरा इस मुल्क को तबाह कर सकता है। आज सरकारें हांक रहे कई लोग इस खतरे की कीमत पर भी धार्मिक ध्रुवीकरण करके सत्ता पर निरंतरता चाहते हैं, लेकिन वह किसी श्मशान की चौकीदारी की निरंतरता सरीखी रहेगी।
और इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि जब धर्म के नाम पर कत्ल करने की आदत पड़ जाती है, तो उसके लिए दूसरे धर्म के किसी को मुर्दा बनाना जरूरी नहीं रहता, अभी उत्तराखंड में कांवड़ लेकर जा रहे एक फौजी से बहस होने पर दूसरे कावडिय़ों के एक जत्थे ने उसे लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला।
अपने घर न सही, दुनिया के दूसरी ओर जिंदा लोकतंत्र देखकर खुश होने पर रोक नहीं
28 जुलाई 2022
ब्रिटेन में इन दिनों अगले प्रधानमंत्री के
लिए कंजरवेटिव पार्टी के दो सांसदों के बीच मुकाबला चल रहा है। और इस
मुकाबले को देखना हिन्दुस्तान के लोगों के लिए किसी किस्से कहानी सरीखा हो
सकता है क्योंकि एक ही पार्टी के दो सांसदों के बीच सार्वजनिक रूप से जैसी
बहस चल रही है, उसी पार्टी के सांसदों के बीच कई सांसदों को वोट देकर फिर
अधिक वोट पाने वाले लोगों के बीच चुनकर जिस तरह दो आखिरी उम्मीदवार छांटे
गए हैं, वह भी देखना दिलचस्प है। खासकर हिन्दुस्तान जैसे चुनावी लोकतंत्र
में जहां पर कि किसी भी पार्टी में ऐसे किसी लोकतंत्र की उम्मीद की नहीं जा
सकती। आज के ये दोनों ही उम्मीदवार, ऋषि सुनक और लिज ट्रस मौजूदा
प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के मंत्रिमंडल में शामिल थे, और जब बोरिस जॉनसन
को बहुत मजबूरी में हटना ही पड़ा, तो अब ये दोनों अगले कुछ हफ्तों में
पार्टी के रजिस्टर्ड वोटरों के बीच मतदान से अगला प्रधानमंत्री तय
करवाएंगे। दूसरी तरफ इससे कुछ दूर हटकर देखें तो अमरीका में राष्ट्रपति
चुनाव के पहले दोनों बड़ी पार्टियों के उम्मीदवार बनने के लिए उन पार्टियों
के लोगों के बीच दावेदारी सामने आती है, वे दावेदार देश भर में घूमकर अपनी
पार्टी के लोगों के बीच अपनी काबिलीयत के बारे में बताते हैं, और इस तरह
देश भर से पहले तो पार्टियां ही अपने अधिकृत उम्मीदवार तय करती हैं, और फिर
देश भर के वोटर उनमें से किसी को अगला राष्ट्रपति चुनते हैं। मतलब यह कि
पार्टी के भीतर भी देश के सबसे बड़े पद के लिए उम्मीदवार बनने के लिए लोगों
को बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है, और इन दोनों ही
मॉडल्स में पूरी पार्टी की भागीदारी हो जाती है।
अब अगर इस तरह की कोई कल्पना हिन्दुस्तान के बारे में की जाए, तो यहां ऐसा कोई लोकतंत्र मुमकिन नहीं दिखता। पहले तो पार्टी के पदाधिकारियों का चुनाव भी किसी लोकतांत्रिक तरीके से नहीं होता, और अधिकतर पार्टियों में एक परिवार के भीतर निपटारा हो जाता है, और भाजपा जैसी पार्टी में कहा जाता है कि संघ परिवार के भीतर निपटारा हो जाता है। हिन्दुस्तान में न तो प्रधानमंत्री, न ही मुख्यमंत्री, और न ही किसी और ओहदे के लिए कोई भी चुनाव होता है। पार्टी के संसदीय दल, या विधायक दल के नेता भी शायद ही कहीं बहुमत से चुने जाते हैं, और पार्टी हांकने वाले लोग बंद कमरों से संगठन और सरकार दोनों का भविष्य तय कर लेते हैं कि किस कुर्सी पर किसे बिठाना है। इसलिए जब कभी संगठन या सरकार की किसी कुर्सी के लिए चुनाव के बारे में सोचना हो, तो ब्रिटेन और अमरीका सरीखे मॉडल पर सोच लेना चाहिए। ये दोनों ही देश बाकी दुनिया के लिए चाहे कितने ही अलोकतांत्रिक क्यों न हों, कितने ही हमलावर क्यों न हों, ये दोनों ही अपने घर के भीतर लोकतांत्रिक सिलसिले को जिंदा रखे हुए हैं।
हिन्दुस्तान ने वैसे तो अधिकतर कुनबापरस्त पार्टियां ही देखी हैं, कांग्रेस से शुरू करके शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, राष्ट्रीय जनता दल, अकाली दल, चौटाला-कुनबा, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस, डीएमके, जैसी अनगिनत पार्टियां हैं जिनमें सबसे बड़े फैसले भी परिवार नाश्ते की टेबिल पर ले सकता है, या रात के खाने पर। इनमें किसी संगठन की कोई भूमिका नहीं है। और जब भाजपा की भी बात आती है, तो उसमें भी नीचे से लेकर ऊपर तक किसी भी ओहदे के लिए लोगों का मनोनयन होता है, किसी तरह के चुनाव नहीं होते। अब यह मनोनयन आरएसएस करता है, या हाल के बरसों में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह करते हैं, यह तो अंदर की बात है, लेकिन बाहर दिखावे के लिए भी किसी तरह का चुनाव नहीं होता है। अब इस नौबत की पूरी की पूरी तोहमत कांग्रेस की कुनबापरस्ती पर डालना ठीक होगा या नहीं, यह तो पता नहीं। लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के नाते, और इस पर एक ही कुनबे का प्रत्यक्ष और परोक्ष कब्जा होने की वजह से भारतीय राजनीति में परिवारवाद के लिए तोहमत तो इसे ही झेलनी पड़ेगी। आज भाजपा मोटेतौर पर लीडर के स्तर पर वंशवाद से मुक्त दिखती है, लेकिन वह आंतरिक लोकतंत्र से कोसों दूर भी है। उसके भीतर के तमाम बड़े फैसले रहस्यमय तरीके से अपने को राजनीति से दूर करार देने वाला एक सांस्कृतिक संगठन लेता है, या अब बदले हुए हालात में मोदी और शाह लेते हैं। और एक-दूसरे पर तोहमत लगाने की जरूरत को अगर छोड़ दें, तो तमाम कुनबापरस्त पार्टियां अपने भीतर मगनमस्त हैं। इनमें से किसी भी पार्टी के भीतर कुनबापरस्ती के खिलाफ कोई बेचैनी नहीं दिखती है, कोई आवाज नहीं उठती है। और तो और एक-दो मिसालें तो भारतीय राजनीति में ऐसी भी हैं कि कुनबे से परे भी नेता ने अपनी प्रेमिका को पार्टी का मुखिया बना दिया, और न सिर्फ संगठन ने, बल्कि जनता ने भी उसे मंजूर कर लिया।
जिन लोगों को घूमने-फिरने का शौक रहता है लेकिन दुनिया भर में जाने की सहूलियत नहीं रहती, वे लोग टीवी के कुछ चैनलों पर अलग-अलग देशों के सैर-सपाटे की डॉक्यूमेंट्री देख लेते हैं, और तसल्ली कर लेते हैं। उसी तरह जब हिन्दुस्तानियों को लोकतंत्र के बारे में कुछ अच्छा पढऩे की जरूरत लगे, लोकतंत्र के बारे में कुछ अच्छा महसूस करने की जरूरत लगे, तो उन्हें ब्रिटेन और अमरीका के ऐसे लोकतांत्रिक मॉडल के बारे में जरूर सोच लेना चाहिए, और यह मान लेना चाहिए कि हिन्दुस्तान में न सही, दुनिया में और कहीं इस तरह का जिंदा लोकतंत्र कायम तो है। दुष्यंत कुमार ने एक वक्त लिखा था- हो कहीं भी आग लेकिन, आग जलनी चाहिए...। इसी के मुताबिक लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजाद मीडिया, लोकतांत्रिक पार्टियां, लोकतांत्रिक चुनाव, लोकतांत्रिक मूल्यों की अपनी हसरत पूरी करने के लिए दुनिया के बेहतर लोकतंत्रों की तरफ देखना चाहिए, और उनकी कामयाबी पर खुश हो लेना चाहिए।
कनाडा जाकर पोप ने मांगी आदिवासियों से माफी, और जाहिर की ऐतिहासिक शर्म
27 जुलाई 2022
दुनिया में कैथोलिक ईसाई लोगों के सबसे बड़े
धर्मगुरू पोप अभी कनाडा पहुंचे। और जैसा कि पहले से तय था उन्होंने वहां
के मूल निवासियों से इस बात के लिए माफी मांगी कि पिछली डेढ़ सदी में
कैथोलिक चर्च और उसकी चलाई स्कूलों ने डेढ़ लाख के करीब आदिवासी बच्चों को
उनके परिवार से दूर करके उन्हें ‘शहरी, शिक्षित, और सभ्य’ बनाने के लिए
उन्हें अपनी स्कूलों में बंधुआ सा रखा। कनाडा के इतिहास में 1870 से 1996
के बीच मूल निवासियों के बच्चों को जबर्दस्ती उनके घरों से ले जाकर इस तरह
उनका ‘विकास’ किया जाता था। और एक जांच रिपोर्ट बताती है कि इनमें से तीन
हजार बच्चे इन स्कूलों में मर भी गए, जिन्हें इस जांच रिपोर्ट ने मूल
निवासियों का सांस्कृतिक-जनसंहार करार दिया था। पोप फ्रांसीस ने आदिवासी
समुदाय से ऐसी ही एक आवासीय-स्कूल की जमीन पर आमंत्रित आदिवासियों से माफी
मांगते हुए कहा कि उन्हें चर्च के लोगों के इस किए हुए का बहुत दुख है, और
उन्होंने इसके लिए माफी मांगी। यहां पर आदिवासी समुदायों के ऐसे लोग मौजूद
थे जो कि चर्च की आवासीय-स्कूलों में कैद करके रखे गए थे, और जो आज भी
जिंदा हैं। उन लोगों ने पोप की माफी पर तसल्ली जाहिर की, इनमें से कई लोग
इस मौके के लिए दूर-दूर से पहुंचे थे। पोप ने कैथोलिक चर्च की तरफ से दुख
और शर्मिंदगी का इजहार किया, और कहा कि वह स्कूल प्रथा भयानक गलती थी, और
आदिवासियों के खिलाफ बहुत से ईसाई लोगों द्वारा की गई दुष्टता के लिए
उन्होंने माफी मांगी। वहां पहुंचे मूल निवासियों में कई लोगों का कहना था
कि यह माफी नाकाफी है, और पोप को इससे अधिक कुछ कहना चाहिए।
दुनिया में सभ्यता वही होती है कि लोग अपनी गलतियों, और खासकर अपने किए गलत कामों पर अफसोस जाहिर करना सीखें, और माफी मांगना सीखें। दुनिया का इतिहास ऐसी सभ्य संस्कृतियों से भरा हुआ है। लोगों को याद होगा कि ऑस्ट्रेलिया में भी शहरी, गोरे, ईसाई लोगों ने वहां के मूल निवासियों के साथ ऐसा ही किया था, और उनके बच्चों को सभ्य बनाने के नाम पर गांव-परिवार से दूर करके शहरी, ईसाई, आवासीय-स्कूलों में उन्हें रखा था जिससे कि वे अपनी संस्कृति से कट गए थे। सदियों के ऐसे शोषण के बाद अभी कुछ बरस पहले ऑस्ट्रेलिया की संसद ने इन समुदायों के प्रतिनिधियों को सदन के भीतर आमंत्रित किया, और फिर पूरी संसद ने खड़े होकर इनसे समाज की की हुई ज्यादती के लिए माफी मांगी थी। ऑस्ट्रेलिया में इसे स्टोलन जनरेशन कहा जाता था, यानी मूल निवासियों से चुराई गई (उनके बच्चों की) पीढ़ी। दुनिया के इतिहास में ऐसा कई देशों के साथ भी हुआ है जिन पर ज्यादती करने वाले दूसरे देशों ने उनसे माफी मांगी है। लेकिन ऐसी शर्मिंदगी जाहिर करने के लिए, और माफी मांगने के लिए लोगों का सभ्य होना जरूरी होता है।
हिन्दुस्तान के इतिहास को देखें, तो अंग्रेजों ने तो अपने जलियांवाला बाग जैसे जुल्म और जुर्म के लिए भी माफी नहीं मांगी थी, और नतीजा यह हुआ था कि एक हिन्दुस्तानी क्रांतिकारी उधम सिंह ने लंदन जाकर जलियांवाला बाग के अंग्रेज खलनायक जनरल डायर को सार्वजनिक रूप से गोली मार दी थी। हिन्दुस्तान के भीतर जो ताकतें, और जो संगठन गांधी की हत्या के पीछे थे, उसके लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने कभी भी उस जुर्म के लिए माफी नहीं मांगी। बल्कि अब तो ये संगठन गोडसे से लेकर सावरकर तक के महिमामंडन में लगे हुए हैं, और उसके लिए भी गांधी स्मृति के प्रकाशन का इस्तेमाल कर रहे हैं। देश में ऐसे और भी जो-जो ऐतिहासिक जुर्म हुए हैं, उनके लिए माफी मांगने का कोई इतिहास नहीं रहा है। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, और उनके बेटे संजय गांधी की असंवैधानिक सत्ता देश को कुचल रही थी। लेकिन आपातकाल की ज्यादतियों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने कोई सार्वजनिक माफी मांगी हो ऐसा याद नहीं पड़ता। बल्कि इन शब्दों से इंटरनेट पर ढूंढने पर 2015 का कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का यह बयान सामने आता है कि आपातकाल के लिए कांग्रेस को माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है। उनका तर्क है कि इसके बाद लोगों ने इंदिरा गांधी को फिर प्रधानमंत्री चुन लिया था, और अगर हम (कांग्रेस) इसके लिए माफी मांगते हैं, तो देश की जनता को भी माफी मांगनी पड़ेगी कि उसने इसके बाद भी इंदिरा गांधी को क्यों चुना। कांग्रेस के एक बड़े नेता, जो कि एक वकील भी हैं, उन्होंने एक लंबे-चौड़े बयान में कई तरह से इस बात की वकालत की थी कि कांग्रेस को इमरजेंसी पर माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं है।
माफी तो इंदिरा गांधी के कत्ल के लिए सिक्ख पंथ के उस वक्त के उग्रवादियों की तरफ से भी किसी ने नहीं मांगी थी, बल्कि उसे जीत के जश्न की तरह मनाया गया था। इसके पहले जब स्वर्ण मंदिर से हथियारबंद आतंकियों को निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था, तो एक धर्मस्थान पर घुसने के लिए केन्द्र सरकार और कांग्रेस पार्टी से माफी की मांग की गई थी। अनगिनत हत्याएं करके भाग-भागकर स्वर्ण मंदिर में रहने वाले भिंडरावाले के आतंकियों को हटाने के लिए उस वक्त जो कार्रवाई सरकार को मुनासिब लगी थी, उसने की थी, और भिंडरावाले के हत्यारे-आतंक पर चुप रहने वाले सिक्ख नेताओं ने स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई के खिलाफ जुबानी हमला बोल दिया था, और नतीजा इंदिरा गांधी की हत्या तक पहुंचा था। इसके तुरंत बाद देश भर में सिक्ख विरोधी दंगे हुए थे, और यह बात आज तक जारी है कि कांग्रेस ने उस पर पर्याप्त माफी मांगी है या नहीं। जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सिक्ख विरोधी दंगों के लिए देश से माफी मांगी थी, जिसे बाद में लीक हुए एक अमरीकी कूटनीतिक संदेश में कहा गया था कि बीस बरस में किसी भारतीय नेता ने ऐसा करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई थी।
हिन्दुस्तान में ऐतिहासिक जुल्म और ज्यादती के और भी मामले हैं, 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराया गया, और गिराने वालों ने सामने मंच पर खड़े होकर, माईक से फतवे जारी करके यह काम किया, इसके ठीक पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने मैदान को समतल कर देने जैसी कोई बात सार्वजनिक रूप से कही थी, अडवानी ने इसके पहले रथयात्रा निकाली थी जिसमें उनके साथ आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मौजूद थे। लेकिन बाबरी मस्जिद गिराने के लिए किसी ने माफी नहीं मांगी, जिसके बाद कि देश भर में हुए दंगों और आतंकी हमलों में सैकड़ों मौतें हुई थीं। 2002 में गुजरात में हिन्दुओं से भरे रेल डिब्बे जला दिए गए, और उसके बाद मानो इसके जवाब में हिन्दू उग्रवादियों ने छांट-छांटकर हजारों मुस्लिमों को तीन दिनों तक मारा, और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार दूसरी तरफ मुंह मोड़े बैठी रही। अपनी सरकार के चलते राजधर्म की ऐसी अनदेखी पर मोदी ने कभी माफी नहीं मांगी। बल्कि आज जो संयुक्त विपक्ष के राष्ट्रपति पद प्रत्याशी थे, उन यशवंत सिन्हा के नाम के साथ गुजरात दंगे टाईप करके देखें तो पहली हैडिंग 2014 की दिखाई पड़ती है जिसमें यशवंत सिन्हा का बयान है कि गुजरात दंगों के लिए माफी न मांगकर मोदी ने सही किया। आज जरूर यशवंत सिन्हा की हार पर देश के बहुत से लोगों को अफसोस हो रहा है जो कि भाजपा की उम्मीदवार को हराना चाहते थे, लेकिन 2014 में जब यशवंत सिन्हा भाजपा के नेता थे, वे प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के बारे में दमखम से यह बात कह रहे थे, और उन्होंने यह भी कहा था कि कोई भी व्यक्ति इस बात को लेकर जरा भी विचलित नहीं है कि 2002 में गुजरात में क्या हुआ था, ठीक उसी तरह जिस तरह कि वे भूल गए हैं कि 1984 में सिक्खों के साथ क्या हुआ था।
माफी मांगने के लिए लोगों में लोकतांत्रिक समझ होना जरूरी है, दूसरे लोगों के हक और अपनी जिम्मेदारी की बुनियादी समझ होना जरूरी है। आज भी इस हिन्दुस्तान में संघ परिवार के संगठन उत्तर-पूर्वी राज्यों से आदिवासी परिवारों की बच्चियों को लाकर देश भर में जगह-जगह बनाए गए शबरी आश्रमों में रख रहे हैं, और उनकी संस्कृति, उनके धर्म से उन्हें परे ले जाकर उनका शहरी, हिन्दूकरण कर रहे हैं। यह ठीक उसी तरह का काम है जिसके लिए सैकड़ों बरस बाद ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में वहां की संसद, सरकार, और ईसाई धर्मप्रमुख माफी मांग रहे हैं, शर्मिंदगी जाहिर कर रहे हैं। हिन्दुस्तान में तो बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में आदिवासियों के साथ क्या तो भाजपा सरकार, और क्या तो कांग्रेस सरकार, सबके राज में जिस तरह के जुल्म हो रहे हैं, उसके लिए आदिवासियों से माफी मांगने की सभ्यता इस देश में जाने कब विकसित हो सकेगी। कई मामलों में हिन्दुस्तान पश्चिम से सैकड़ों बरस पीछे चलता है, और 22वीं या 23वीं सदी में हिन्दुस्तान की संसद और सरकार शायद आदिवासियों से माफी मांगने जितनी सभ्य हो सकेंगी।
अर्धसत्य असत्य के मुकाबले भी अधिक खतरनाक होता है, अपनी साख बचाकर रखें...
26 जुलाई 2022
आज की दुनिया इन्फर्मेशन ओवरलोड की शिकार
है। कोई इंसान एक दिन में जितना पढ़ सकते हैं, सुन या देख सकते हैं, उससे
करोड़ों गुना अधिक उनके इर्द-गिर्द इंटरनेट पर तैर रहा है। अधिक सक्रिय और
अधिक जुड़े हुए लोगों को वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों पर इतना अधिक आता है कि आम
लोगों के लिए यह मुमकिन नहीं रहता कि उसे जांच-परख लें। यह एक और बात है
कि अधिकतर लोगों के बीच ऐसे उत्साही इंसान जिंदा रहते हैं जो कि पूरी
गैरजिम्मेदारी के साथ चीजों को आगे बढ़ाने को उतावले रहते हैं। नतीजा यह
होता है कि लोग झूठी बातों को भी आगे बढ़ा देते हैं, और अक्सर ही यह जानते
हुए भी आगे बढ़ा देते हैं कि वह झूठ है। लोगों को संपर्कों के अपने दायरे
में यह दिखाने की भी एक हड़बड़ी रहती है कि उनके पास दिखाने को कुछ है। हर
किसी को यह साबित करने की चाह रहती है कि उनका भेजा हुआ, या उनका पोस्ट
किया हुआ भी लोग देखते हैं, और गैरजिम्मेदारी से उसे पसंद भी करते हैं।
अब अभी कल की ही बात है, योरप की एक बड़ी पर्यावरण आंदोलनकारी छात्रा ग्रेटा थनबर्ग के बारे में एक पोस्टर लोगों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया जिसमें उसने जर्मन रेलगाडिय़ों को भीड़भरा बताया, और अपनी एक तस्वीर पोस्ट की जिसमें वह एक डिब्बे में अपने सामान सहित फर्श पर बैठी हुई है। अभी पोस्ट की हुई जानकारी यह भी बताती है कि जर्मन रेलवे ने तुरंत ही यह पोस्ट किया कि ग्रेटा थनबर्ग का फस्र्ट क्लास के डिब्बे में रिजर्वेशन था, और उसके लिए फलां सीट नंबर तय था। इस बात को ग्रेट थनबर्ग के खिलाफ इस्तेमाल किया गया कि पर्यावरण बचाने के नाम पर वह झूठ फैलाती है। अच्छे-खासे, पढ़े-लिखे, विकसित देशों में बसे हुए लोगों ने भी इस पोस्टर का मजा लिया क्योंकि पर्यावरण बचाने की मुहिम छेड़े हुए इस लडक़ी ने दुनिया के बड़े-बड़े नेताओं का जीना हराम किया हुआ है, और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जैसे लोग इससे हलाकान थे। लेकिन जब इस पोस्टर की हकीकत ढूंढने की कोशिश की गई, तो दो बातें सामने आईं, एक तो यह कि यह करीब तीन बरस पुरानी बात है। ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट पर जर्मन रेलवे ने यह जानकारी जरूर दी थी। लेकिन ग्रेटा-विरोधियों ने इसके बाद के हिस्से को छुपाकर यह पोस्टर बनाया जिसमें ग्रेटा थनबर्ग ने यह लिखा था कि उसका ट्रेन सफर तीन हिस्सों में था, और इसमें से एक हिस्सा उसने डिब्बे के फर्श पर गुजारा था। उसने यह भी साफ किया कि ट्रेनों को भीड़भरा बताना उसके लिए कोई नकारात्मक बात नहीं थी बल्कि उसने इसे पर्यावरण के लिए एक अच्छी बात की तरह पेश किया था क्योंकि ट्रेनें पर्यावरण का कम नुकसान करती हैं।
इस बात को महज एक घटना की तरह देखना ठीक नहीं है, इसे लोगों के रूझान की तरह देखना ठीक है कि जो लोग जिन्हें पसंद नहीं करते हैं, उनके खिलाफ वे चुनिंदा तथ्यों को लेकर एक झूठ को आगे बढ़ाते हैं, या सच की एक ऐसी शक्ल को सामने रखते हैं जो कि अधूरी रहती है, और एक अलग धारणा बनाती है। पिछले कुछ बरसों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कुछ तस्वीरें और कुछ वीडियो ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें वे लोगों की उपेक्षा करते दिख रहे हैं। खासकर लालकृष्ण अडवानी के साथ मोदी की एक ऐसी तस्वीर है जिसमें अडवानी हाथ जोड़े हुए बहुत ही बुरी तरह दीन-हीन, गिड़गिड़ाते हुए से दिख रहे हैं, और मोदी सामने एक क्रूर अंदाज में खड़े हैं। यह तस्वीर अपने आपमें गढ़ी हुई नहीं थी, लेकिन यह एक सेकेंड के भी एक छोटे हिस्से को दिखाती हुई तस्वीर थी, जिसके पहले और बाद के पल जब दूसरी तस्वीरों में सामने आए, तो दिखा कि मोदी उसके पहले या बाद में नमस्कार कर चुके थे। कुछ इसी तरह का एक वीडियो अभी दो दिनों से सोशल मीडिया पर चल रहा है जिसमें जाते हुए राष्ट्रपति उनके विदाई समारोह में एक कतार में खड़े हुए लोगों के सामने से नमस्कार करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, और वहां खड़े हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरी तरह मंत्रमुग्ध होकर कैमरों को देख रहे हैं, उस पल सामने से हाथ जोड़े हुए गुजरते हुए राष्ट्रपति को भी वे नहीं देख रहे हैं। बाद में इसके जवाब में भाजपा के लोगों ने एक दूसरा वीडियो पोस्ट किया जिसमें इन पलों के पहले के कुछ पल दिखते हैं, और उनमें मोदी राष्ट्रपति को नमस्कार कर चुके हैं, और राष्ट्रपति के सामने-सामने चलते हुए फोटोग्राफरों पर जब उनकी नजर टिकती है, तो फिर वहीं टिकी रह जाती है। अगर शुरू के इन पलों को न देखें, तो तस्वीर ऐसी बनती है कि मोदी ने राष्ट्रपति को देखा ही नहीं, और बस कैमरे देखते रह गए। यह एक अलग बात है कि कुछ पल राष्ट्रपति को देखने के बाद मोदी का ध्यान कैमरों की तरफ ही रह गया, लेकिन उन्होंने शुरू के कुछ पलों में राष्ट्रपति को नमस्ते तो कर लिया था।
आज का वक्त सूचनाओं के सैलाब का वक्त है, और साधारण समझबूझ के इंसानों के लिए यह आसान नहीं रहता कि वे इस सैलाब के बीच संभल पाएं। सुनामी सरीखे सैलाब से जूझते इंसान की तरह आज के लोगों के सामने दिक्कत यह रहती है कि उन्हें अपने संपर्कों के दायरे में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने की एक हड़बड़ी रहती है, और उसका दबाव भी रहता है। जिस तरह लोग अपने साथ के लोगों को निराश करने के बजाय उनके साथ सिगरेट या दारू पीने लगते हैं, या जुआ खेलने लगते हैं, ठीक उसी तरह आज लोग अपने गैरजिम्मेदार दायरे की बराबरी करने के लिए उसी के दर्जे की गैरजिम्मेदारी दिखाने में लग जाते हैं। फिर सच को आधे या पूरे झूठ की तरह दिखाने के लिए कुछ गढऩे की जरूरत भी नहीं रहती, चीजों को बस आधा दिखाना, चीजों को गलत वक्त का दिखा देना भी काफी होता है। उमा भारती का एक पुराना वीडियो नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सबसे बुरी बातें कहते हुए इंटरनेट पर मौजूद है। उसे आज मोदी के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ मोदी के कहे हुए एक वीडियो को आज मजाक में इस्तेमाल किया जा रहा है जिसमें वे कह रहे हैं कि रूपया उसी देश का गिरता है जिस देश का प्रधानमंत्री गिरा रहता है। अब उमा भारती ने भाजपा से बाहर रहते हुए जो कुछ कहा था उसे आज भी इस्तेमाल करने पर कोई कानूनी रोक नहीं है, लेकिन जिम्मेदार लोगों को यह समझने की जरूरत जरूर है कि कौन सी बात किस संदर्भ में कही गई थी।
संदर्भ से काटकर जब किसी बात को देखा जाता है, तो सरदार पटेल को नेहरू का विरोधी साबित किया जा सकता है, सरदार पटेल को आरएसएस का हिमायती साबित किया जा सकता है, गांधी, सुभाषचंद्र बोस, और भगत सिंह को संघ के मंच पर सजाया जा सकता है। आज आंखों से जो सच सा दिखता है, उसे भी परख लेने का वक्त है। और इंटरनेट की मेहरबानी से यह बड़ा मुश्किल काम भी नहीं है। जो जानकारी आपके सामने आ रही है, उसके चुनिंदा शब्दों को इंटरनेट पर सर्च कर देखें, बड़ी संभावना रहेगी कि आप हकीकत की गहराई तक पहुंच जाएं। इससे एक दूसरा फायदा यह भी होगा कि आप झूठ फैलाने से बचेंगे। याद रखें कि आज के वक्त आपकी साख बस उतनी ही है जितनी कि आपकी फैलाई गई बातों की है। इसलिए बदनीयत झूठों की भीड़ के दबाव में आकर उनकी बराबरी करने न उतरें, सच पर बने रहें।
दिल दहलाने वाली यह अजीबोगरीब वारदात!
25 जुलाई 2022
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल दिल
दहलाने वाली एक ऐसी वारदात हुई है जिस पर आसानी से भरोसा करने को दिल नहीं
करता। शहर के बीचोंबीच एक व्यस्त चौराहे पर एक दुपहिये पर अपनी मां सहित जा
रही एक लडक़ी ने हॉर्न बजाया, लेकिन रास्ते में साइकिल लिए खड़ा एक मूकबधिर
कुछ सुन नहीं पाया। वह हॉर्न से हटा नहीं इस बात को लेकर नाबालिग कही जा
रही इस लडक़ी ने अपने पास रखे छुरे से उस पर हमला कर दिया, और उसे मार डाला।
इसके बाद शहर छोडक़र भागते उस लडक़ी को पुलिस ने गिरफ्तार किया। अब तक आमतौर
पर राजधानी दिल्ली के इलाके और उत्तर भारत, पंजाब के कुछ इलाकों से सडक़ों
पर होने वाले झगड़ों में कत्ल की खबरें जरूर आती थीं, लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे
प्रदेश में शहर के बीच, दुपहिया सवार नाबालिग लडक़ी एक साइकिल वाले मूकबधिर
को दिनदहाड़े इस तरह अपने छुरे से मार डालेगी, यह तो भरोसा करने लायक भी
बात नहीं है, यह एक और बात है कि यह सच कल हो चुका है।
इस बात को किस-किस तरह से देखा जाए यह सोचने में भी कुछ मुश्किल हो रही है। चाकू और छुरा चलाना, आमतौर पर लडक़ों और आदमियों का काम माना जाता है, और उस काम में एक लडक़ी का उतरना भी कुछ अटपटी बात है। फिर यह भी है कि यह लडक़ी अपनी मां के साथ थी, और न ही किसी नशे में थी। इसलिए यार दोस्तों के साथ नशे में कोई जुर्म कर बैठना एक अलग बात होती, दिन की रौशनी में मां के साथ रहते हुए ऐसा करना और बड़ी फिक्र की बात है। फिर यह भी कि एक नाबालिग लडक़ी छुरा लेकर क्यों घूम रही थी? इस शहर की पुलिस बीच-बीच में नुमाइश करती है कि उसने बदमाश और आवारा लोगों की तलाशी लेकर उनसे कितने चाकू-छुरे बरामद किए हैं। लेकिन अब एक नाबालिग लडक़ी की तलाशी भी पुलिस क्या ले लेती? और फिर यह भी है कि एक मूकबधिर पर छुरे से हमला करते हुए भी इस लडक़ी को यह तो अंदाज लग गया होगा कि वह बोल-सुन नहीं पा रहा है, साइकिल पर है इसलिए जाहिर है कि लडक़ी के मुकाबले गरीब भी रहा होगा, और फिर भी उसको इस तरह मार डालना उस लडक़ी की हत्यारी सोच का एक सुबूत है, जो कि पूरे समाज के लिए खतरे और फिक्र की बात है।
हिन्दुस्तान में बहुत बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर चलने वाले बहुत ताकतवर और पैसों वाले लोगों की बददिमागी तो आए दिन सडक़ों पर देखने मिलती है जब वे ट्रैफिक सिपाही को भी हडक़ाते हुए धमकाते हैं कि वह नहीं जानता कि वे कौन हैं। लेकिन एक दुपहिया का तो इतना बड़ा अहंकार भी नहीं रहना चाहिए। हिन्दुस्तान में अपने तथाकथित इतिहास के झूठे गौरव का दंभ बहुत है, लेकिन अपने आज की असभ्यता पर उसे मलाल जरा भी नहीं है। सार्वजनिक जगहों पर हिन्दुस्तानी लोग दूसरों की जिम्मेदारी, और अपने अधिकार की ही सोचते रहते हैं। फिर वे दूसरों की जिम्मेदारी को आसमान की ऊंचाईयों तक साबित करते हैं, और अपने अधिकार को भी विकराल मानकर चलते हैं। नतीजा यह होता है कि सार्वजनिक जगहों और सार्वजनिक जीवन में हिन्दुस्तानी लोग अपने सबसे क्रूर रूप में सामने आते हैं। वहां पर उनकी गाडिय़ों का हॉर्सपावर उनके अहंकार के साथ जुडक़र उन्हें अधिक हिंसक बना देता है।
दुनिया के सभ्य देशों के लिए राष्ट्रवादी हिन्दुस्तानियों के मन में घोर हिकारत है कि वे पश्चिमी सभ्यता वाले हैं, वहां का समाज बदचलन है, वहां पर अश्लीलता और नग्नता की संस्कृति है। लेकिन ऐसे हिन्दुस्तानी पश्चिम के उन विकसित और सभ्य लोकतंत्रों के बारे में यह नहीं देखते हैं कि वहां पर पैदल और पैडल का सबसे अधिक सम्मान है। वहां पर सडक़ पार करने के लिए अगर एक पैदल इंसान ने एक कदम बढ़ा दिया है, तो दोनों तरफ का सारा ट्रैफिक थम जाता है। हिन्दुस्तान में पैदल और पैडल को अपनी राह से अलग फेंकने के लिए लोग गाडिय़ों में एक्स्ट्रा हॉर्न लगवाकर रखते हैं कि मानो ध्वनितरंगों से ऐसे गरीब लोगों को धकेलकर किनारे फेंक दिया जाएगा। यह सिलसिला इतना आम है कि हिन्दुस्तानी इसे जीने का एक ढर्रा ही मानकर चलते हैं, और शायद ही किसी हिन्दुस्तानी को यह फिक्र रहती होगी कि गाड़ी में साथ चल रही अगली पीढ़ी भी ऐसी ही बदतमीजी और बददिमागी सीख लेगी।
रायपुर में कल हुई यह घटना कई मामलों में अटपटी और अजीब है, इसलिए इसे मिसाल मानकर अधिक लिखना ठीक नहीं है। लेकिन सडक़ों पर होने वाली हिंसा में कई बार बेकसूर मारे जाते हैं, और फिर वे चाहे कारों में चलने वाले संपन्न लोग ही क्यों न हों। ऐसी जितनी घटनाएं याद पड़ रही हैं उनमें बहुत सी घटनाओं में बड़ी-बड़ी गाडिय़ां या बददिमाग महंगी मोटरसाइकिलें शामिल रहती हैं, जिनके मालिक अपने को सडक़ों का भी मालिक समझते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह दिक्कत भी रहती है कि पुलिस के साथ होने वाली बदसलूकी के जवाब में पुलिस कोई कड़ी कार्रवाई नहीं कर पाती क्योंकि ऐसे बदसलूक लोगों को किसी न किसी किस्म की ताकतवर हिफाजत हासिल रहती है। यह भी मुमकिन है कि ऐसी बेइज्जती झेल-झेलकर पुलिस का मनोबल ही टूटा हुआ रहता है, और वह राजनीतिक दलों या प्रेस के स्टिकरों वाली गाडिय़ों को छोड़ते-छोड़ते हर बड़ी गाड़ी को छोडऩे लगते हैं। नतीजा यह निकलता है कि सडक़ों पर अराजकता एक आम बात हो जाती है। लेकिन हमारे लिखे हुए इन तमाम तर्कों में से एक भी तर्क कल की इस घटना की वजह नहीं समझा सकता जो कि बहुत ही अलग है, बहुत ही अजीब है। यह तो इस लडक़ी के परिवार के लोगों को मनोचिकित्सकों से मिलकर यह समझना चाहिए कि उसकी ऐसी हत्यारी दिमागी हालत क्यों हुई है? यह घटना इस किस्म की किसी और घटना की याद नहीं दिलाती, और इसलिए इसे बिल्कुल ही अलग मानकर पुलिस को भी इसका विश्लेषण करना चाहिए कि इस पीढ़ी के बीच ऐसी सोच आई कैसे, इतनी हिंसक कैसे हुई। सरकार और समाज पता नहीं इस बारे में क्या कर सकेंगे क्योंकि एक दुपहिया सवार दिनदहाड़े व्यस्त सडक़ पर एक बेकसूर साइकिल सवार को इस तरह मार न डाले, इसलिए तो बचाव के लिए कोई पुलिस तैनात नहीं की जा सकती। कुल मिलाकर हमारा यह मानना है कि इस मामले को चाकूबाजी का एक और मामला मानकर चलना ठीक नहीं है, क्योंकि यह बिल्कुल अलग किस्म का मामला है, और तमाम जिम्मेदार तबकों को इसके बारे में सोचना चाहिए, और अपने बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए जिनके बटुए की ताकत के साथ उनकी गाडिय़ों की ताकत मिलकर उन्हें बेहद बददिमाग बना रही है, कहीं वे किसी को मार न डालें, या किसी के हाथ मारे न जाएं। इस एक अकेली घटना ने पिछले बहुत समय की घटनाओं से अधिक विचलित किया है।
चीफ जस्टिस की फिक्र तो जायज है, लेकिन वे कुछ करते क्यों नहीं हैं?
24 जुलाई 2022
भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी.रमना ने देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को
जमकर कोसा है, और कहा है कि अदालतों में चल रहे मुद्दों पर गलत जानकारी
देना और एक तय नीयत के साथ एजेंडा संचालित बहसें लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह
साबित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रिंट मीडिया अब भी कुछ हद तक जवाबदेह
है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जवाबदेही नहीं है, यह जो दिखाता है
वह हवा-हवाई है। जस्टिस रमना रांची में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एक
कार्यक्रम में बोल रहे थे, और उन्होंने कहा कि मीडिया द्वारा प्रचारित
पक्षपातपूर्ण विचार लोगों को प्रभावित कर रहे हैं, लोकतंत्र को कमजोर कर
रहे हैं, और व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं, इससे न्याय प्रक्रिया पर
भी उल्टा असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि (इलेक्ट्रॉनिक) मीडिया अपनी
जिम्मेदारियों के दायरे से आगे जाकर, और उनका उल्लंघन करके लोकतंत्र को
पीछे ले जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया की हालत इससे भी
बदततर है।
हमने इसी पन्ने पर पिछले बरसों में कई बार इस बात को लिखा है कि हिन्दुस्तान में मीडिया नाम का शब्द अब एक अटपटा लेबल बन गया है, और यहां के प्रिंट मीडिया को इससे बाहर निकलकर अपनी पुरानी पहचान, प्रेस को दुबारा कायम करना चाहिए। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का चाल, चरित्र, चेहरा एक-दूसरे से इतना अलग है, दोनों की तकनीक अलग है, दोनों की जरूरतें और मकसद अलग हैं, और ऐसे में उन्हें एक दायरे में एक लेबलतले रखना कुछ ऐसा ही है जैसा कि एक हाथी और एक बकरी को मिलाकर उनका एक संघ बना दिया जाए। यह एक बेमेल काम होगा जिससे इन दोनों जानवरों में से किसी का भी मकसद पूरा नहीं होगा। किसी पेशे के दायरे में उस पेशे या कारोबारी संगठन में उस कारोबार से जुड़े हुए लोग इसलिए रहते हैं कि उनके हित एक सरीखे रहते हैं, उनकी जरूरतें मिलती-जुलती रहती हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सारा ही तौर-तरीका अखबारनवीसी के पुराने और परंपरागत तौर-तरीकों से बिल्कुल ही उल्टा है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कोई नीति-सिद्धांत हैं या नहीं, इसे वे ही बेहतर जानें, लेकिन हम प्रिंट मीडिया में पूरी जिंदगी गुजारने के बाद उसका यह निचोड़ सामने रख सकते हैं कि नीति-सिद्धांतों से परे प्रिंट मीडिया का कोई भविष्य नहीं है। आज भी कई अखबार घटिया निकलते होंगे, जो बिककर छपते होंगे, लेकिन ऐसे अखबार भी बने हुए हैं जो कि छपकर बिकते हैं। इसलिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक का यह बेमेल लेबल, मीडिया कम से कम प्रिंट को तो छोड़ देना चाहिए। प्रिंट के पास तो आजादी की लड़ाई के दिनों से अब तक चले आ रहा प्रेस नाम का एक खूबसूरत और इज्जतदार शब्द है, और उसे उसका ही इस्तेमाल करना चाहिए।
यह बात हमारे सरीखे पेशेवर प्रिंट-पत्रकार ही नहीं कह रहे, इस देश के जागरूक नागरिकों का एक बड़ा तबका भी सोशल मीडिया पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस हद तक कोस रहा है कि यह हैरानी होती है कि देश में इतना कड़ा कानून रहते हुए भी टीवी चैनलों को लगातार नफरत और हिंसा फैलाने, लगातार साम्प्रदायिकता को बढ़ाने का मौका दिया जा रहा है, और उन्हें इस काम के लिए बढ़ावा भी दिया जा रहा है। वैसे तो यह काम कुछ अखबारों को बढ़ावा देकर भी हो रहा है, लेकिन फिर भी अखबारों के एक हिस्से में अब तक एक दर्जे की सामाजिक जवाबदेही बाकी है, जो कि टीवी समाचार चैनलों पर कब की खत्म हो चुकी है।
देश के मुख्य न्यायाधीश अपनी अदालत के बाहर एक लॉ यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में तो यह बात बोल रहे हैं, लेकिन जब अनगिनत मामलों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की फैलाई नफरत सुप्रीम कोर्ट के सामने आ चुकी है, तो वहां पर न तो मुख्य न्यायाधीश, और न ही दूसरे जज ऐसे नफरतजीवी, हिंसक, और देश को तबाह कर रहे टीवी चैनलों के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं। जब ऐसे चैनलों के मालिक और संपादक बड़े-बड़े हमलावर हथियार लेकर कैमरों के सामने खड़े होते हैं, और देश से एक मजहब को, उसे मानने वाले लोगों को खत्म करने के फतवे देते हैं, तो ऐसे मामलों पर भी सुप्रीम कोर्ट का बर्दाश्त देखने लायक है। देश का ना सिर्फ सुप्रीम कोर्ट, बल्कि देश के हाईकोर्ट भी जब चाहें तब व्यापक जनहित के मामलों को बिना किसी पिटीशन के भी खुद मामला बना सकते हैं, और सुनवाई शुरू कर सकते हैं। ऐसे में बेहतर तो यह होता कि मुख्य न्यायाधीश एक व्याख्यान में ऐसी मसीहाई बातें करने के बजाय जज की कुर्सी पर बैठकर अपनी तनख्वाह को जायज साबित करते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जुर्म के कुछ नमूनों को लेकर एक कमेटी बनाते, और वह कमेटी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सरकार से परे अपनी रिपोर्ट देती जिसमें सरकारी रूख का भी विश्लेषण रहता। आज सरकार के ऊपर मानो कुछ भी नहीं रह गया है, संसद में सरकारी बाहुबल के सामने विपक्ष को अनसुना कर देना एक परंपरा बन गई है। देश में सबसे महंगा संसद भवन बन रहा है, और बिना बहस कानून बनाना उसके भीतर इस बाहुबल के लिए सबसे सस्ता काम रहेगा। ऐसे में अदालत को ही यह देखना होगा कि सरकारी अनदेखी किस कीमत पर चल रही है, उससे लोकतंत्र का कितना नुकसान हो रहा है।
मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक प्रक्रिया को लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की हरकतों की चर्चा की है। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का नुकसान इस देश में न्याय प्रक्रिया से परे आम जनता को भी झेलना पड़ रहा है, और इस देश का परंपरागत ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो चला है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को न्याय प्रक्रिया के सामने टीवी चैनलों की खड़ी की हुई दिक्कत को ही नहीं देखना चाहिए बल्कि यह भी देखना चाहिए कि लोकतंत्र को जो व्यापक नुकसान इस संगठित बड़े कारोबार द्वारा सोच-समझकर, और सरकारी अनदेखी या बढ़ावे से किया जा रहा है, उसे कैसे रोका जाए? समाज के भीतर एक धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ नफरत के सैलाब में डुबाकर, हथियार थमाकर जिस तरह लड़ाया जा रहा है, उसे भी सुप्रीम कोर्ट को ही देखना होगा क्योंकि सरकार की दिलचस्पी इसमें नहीं दिख रही है।
जस्टिस एन.वी. रमना की कही बातें अगर उनके आखिरी कुछ हफ्तों में कोई शक्ल नहीं लेती हैं, तो ये किसी काम की नहीं रहेंगी। आज उन्हें कोई नहीं रोक सकता अगर वे अपने इन आखिरी हफ्तों में हिन्दुस्तान में टीवी चैनलों की नफरत और हिंसा और उसकी सरकारी अनदेखी की जांच करें। उन्हें तुरंत प्रिंट-मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और रिटायर्ड जजों में से लोगों को छांटकर ऐसी कमेटी बनानी चाहिए। इसकी रिपोर्ट तो जस्टिस रमना के रिटायर होने के बाद ही सामने आ पाएगी, लेकिन ऐसा काम उनके नाम के साथ जरूर दर्ज होगा।
रणवीर सिंह की नग्न तस्वीरों से उठा सवालों का एक सैलाब...
24 जुलाई 2022
सोशल मीडिया पिछले चार दिनों से उफान पर है।
खासकर खुलकर लिखने वाली महिलाओं का एक तबका ऐसा है जो फिल्म अभिनेता रणवीर
सिंह की नग्न तस्वीरों को पोस्ट करके अपनी खुली सोच को सामने रख रहा है,
और यह साबित भी कर रहा है कि महिलाओं की नग्न तस्वीरों को देखना जिस तरह
पुरूषों ने अपना अधिकार बना रखा है, तो उसी तरह किसी पुरूष की आकर्षक और
नग्न देह को देखना महिलाओं का हक भी है। ये तस्वीरें रणवीर सिंह ने
सोच-समझकर खिंचवाई हैं, और कई तस्वीरों में उनके बदन पर महज पांव में
पायजेब की तरह बंधा एक काला धागा भर है। कुछ आजादखयाल महिलाएं इसे महिलाओं
का नयन सुख का अधिकार मानते हुए इससे भी बेहतर, मतलब इससे भी अधिक
दुस्साहसी, तस्वीरों की उम्मीद कर रही हैं। एक पुरूष अभिनेता की नग्न
तस्वीरों ने महिलाओं के समान अधिकार और आजादी के मुद्दे को हवा दे दी है,
जिसे देखना बड़ा दिलचस्प है।
यह कोई एकदम ही पहला मौका नहीं है जब किसी हिन्दुस्तानी मर्द की ऐसी पूरी तरह से नग्न तस्वीर मीडिया में आई हो। लोगों को याद होगा कि कुछ दशक पहले एक मॉडल मिलिंद सोमन और एक प्रमुख मॉडल मधु सप्रे के बीच जूते के एक ब्रांड के इश्तहार के लिए एक फोटो खींची गई थी जिसमें ये दोनों मॉडल बिना कपड़ों के खड़े लिपटे हुए थे, और इनके बदन पर सिर्फ एक अजगर लिपटा हुआ था। दोनों ने बस जूते पहन रखे थे, और किसी जूते का उससे अधिक दमदार इश्तहार हो नहीं सकता था। मिलिंद सोमन की कई दूसरी नग्न तस्वीरें इस इश्तहार से परे भी सामने आई थीं, और चौथाई सदी पहले इन तस्वीरों ने बड़ी खलबली भी मचाई थी।
अब हिन्दुस्तान के बिल्कुल ही ताजा और राजनीतिक सांस्कृतिक-पैमानों को छोड़ दें, तो नग्नता भारतीय संस्कृति में कोई नई बात नहीं है। सैकड़ों बरस पहले इस देश में जो मंदिर बने हैं, उनके भीतर और उनके बाहर देवी-देवताओं से लेकर दूसरे लोगों तक की नग्न प्रतिमाओं का बड़ा लंबा इतिहास है। खजुराहो जैसे मंदिर देश भर में बिखरे हुए हैं जहां पर संभोगरत लोगों की प्रतिमाएं सिर चढक़र बोलती हैं। कृष्ण की अनगिनत कहानियों में बिना कपड़ों के गोपियां पानी में खड़ी हैं, और कृष्ण कपड़ों सहित पेड़ पर चढ़े हुए उसका मजा ले रहे हैं।
इक्कीसवीं सदी की ताजा और हमलावर शुद्धतावादी सनातनी संस्कृति के फतवों को छोड़ दें, तो हिन्दुस्तान के हिन्दुओं में भी नग्नता को कभी बुरा नहीं माना गया है। यहां पर कई धर्मों के सन्यासियों का बिना कपड़ों के रहना पूरी तरह सामाजिक मान्यताप्राप्त है। कुंभ के मेले मेें तो नागा साधुओं की तस्वीरें लेने के लिए दुनिया भर से विदेशी फोटोग्राफरों की फौज हर बार आती ही है, लेकिन ऐसे कैमरों और नाटकीयता से दूर जैन धर्म के कुछ सन्यासियों के बीच बिना कपड़ों पूरी तरह नग्न रहना भी प्रचलित है, और समाज उसके साथ आसानी से, आस्था सहित जी लेता है, इसे लेकर कभी कोई बवाल खड़ा नहीं होता। बल्कि अनजाने नागा साधुओं की गोद में भी आम हिन्दुस्तानी लोग अपने बच्चों को देकर उनका आशीर्वाद दिलवाते हैं, और किसी को इसमें कुछ अटपटा नहीं लगता। लेकिन सदियों से चली आ रही ऐसी हिन्दू और हिन्दुस्तानी संस्कृति को आज के हिंसक और हमलावर धार्मिक और सांस्कृतिक फतवों को झेलना पड़ रहा है, और आज की नग्नता इन नवशुद्धतावादी पैमानों पर ही आंकी जा रही है।
यह तो गनीमत है कि अभी की ये ताजा तस्वीरें रणवीर सिंह की हैं, अगर ये शाहरूख खान या सलमान खान की होतीं, तो इन्हें भारतीय संस्कृति पर हमला करार देकर इनको देश भर में दसियों हजार जगहों पर जलाया जाता, और इन्हें भारतीय संस्कृति का गद्दार करार दिया जाता। लेकिन यह देह एक गैरमुस्लिम की है, इस नाते यह नग्नता उतना बड़ा जुर्म नहीं है।
सोशल मीडिया लोगों की बर्दाश्त को तौलने का एक बड़ा अच्छा जरिया भी हो गया है। बदनीयत से भाड़े पर हमले करने वाले, या प्रचार करने वाले लोगों की शिनाख्त आसान रहती है, लेकिन उनसे परे के जो लोग रहते हैं, उनकी प्रतिक्रियाओं से यह समझ आता है कि नाजुक मुद्दों पर लोग क्या सोच रहे हैं, पिछली पीढ़ी से अलग, या उसके मुकाबले क्या सोच रहे हैं, और इस बर्दाश्त को और कितनी दूर तक खींचा जा सकता है। यह बात हम सिर्फ नग्नता के बारे में नहीं कह रहे, जिंदगी के किसी भी पहलू को लेकर कह रहे हैं। जिस वक्त इस देश में गणेश के दूध पीने का पाखंड प्रचारित हुआ था, उस वक्त सोशल मीडिया नहीं था, वरना दूध भी फैलता, और दूध फट भी जाता। पाखंड के खिलाफ भी लिखने वाले लोग रहते, और जो दोनों सिरों के बीच अनिश्चय में फंसे लोग रहते, उन्हें भी दोनों किस्म की बातें पढऩे मिली होतीं, और उनसे वे अपना दिमाग बना पाते।
रणवीर सिंह की नग्न तस्वीरों ने महिलाओं के एक बड़े तबके को इस निराशा से उबरने में मदद की होगी कि महिलाओं की नग्न तस्वीरों को देख-देखकर मर्द मजा लेते हैं। यह बराबरी का कुछ हिसाब चुकता करने का मौका भी है, और साथ ही इस बात का भी मौका है कि औसत हिन्दुस्तानी मर्द जो कि सबसे खूबसूरत मॉडल्स के बदन देख-देखकर अपनी बीवियों को नीची नजर से देखते हैं, आज उन्हें रणवीर सिंह के बदन के मुकाबले अपने बदन को भी तौलने का मौका मिला होगा कि उनका बदन भी नीची नजरों से देखने लायक ही है, और वह तो शायद बिना कपड़ों के किसी कैमरे के सामने पेश करने लायक भी नहीं है। इसलिए चार-छह तस्वीरों का यह सैलाब सबके सोचने का सामान है, औरत और मर्द के बराबरी के हक के दावे का भी, और अपने-अपने बदन का ख्याल रखने का भी।
अब नोटों के इतने ऊंचे जखीरे पर बैठे नेता भला किस मुंह से बदले की कार्रवाई कह सकते हैं...
23 जुलाई 2022
पश्चिम बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार के साथ
केन्द्र सरकार का टकराव, और तनातनी जारी है। लेकिन इस बार बात महज राजनीतिक
नहीं है, बल्कि सत्ता का भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। ममता मंत्रिमंडल
के पार्थ चटर्जी से जुड़े ठिकानों पर कल ईडी ने छापा मारा था। और मंत्री की
एक बहुत ही करीबी महिला अर्पिता मुखर्जी के घर से 20 करोड़ रूपए नगद बरामद
किए गए हैं, और 20 से अधिक मोबाइल फोन जब्त हुए हैं। यह छापा बंगाल की
स्कूलों में नौकरी के लिए रिश्वत लेने के आरोपों पर कोलकाता हाईकोर्ट से
सीबीआई जांच का आदेश देने के सिलसिले में पड़ा था। ऐसे आरोप थे कि सरकारी
सहायता प्राप्त स्कूलों में नौकरी लगवाने के लिए बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार
चल रहा था, और मामला जब हाईकोर्ट तक पहुंचा तो वहां से सीबीआई जांच का
आदेश हुआ, और सीबीआई ने इस मामले में मनी लांड्रिंग की आशंका पाकर ईडी को
भी इसकी खबर की थी। कल बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के दो
मंत्रियों सहित एक दर्जन जगहों पर ईडी ने एक साथ छापे मारे थे, और आज
मंत्री पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार कर लिया है।
पश्चिम बंगाल को लेकर पता नहीं क्यों बाहर ऐसी धारणा थी कि वहां तीन दशक तक लगातार चली वाममोर्चा सरकार ने एक ऐसी राजनीतिक और सरकारी संस्कृति विकसित की थी जिसमें बड़े पैमाने पर संगठित भ्रष्टाचार नहीं रह गया था। फिर ऐसा भी लगता था कि ऐसी संस्कृति देखे हुए पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे को हराकर दो-दो बार सत्ता में आई ममता बैनर्जी पर भी ऐसा नैतिक दबाव तो रहेगा कि वह भ्रष्टाचार को बड़े पैमाने पर संगठित स्तर तक नहीं ले जाएंगी। लेकिन धीरे-धीरे यह बात समझ में आ गई कि तरह-तरह की चिटफंड कंपनियों के साथ ममता बैनर्जी सरकार के लोगों का जितना गहरा रिश्ता चले आ रहा था वह मामूली और मासूम संबंध नहीं था, वह बड़े पैमाने पर राजनीतिक भ्रष्टाचार ही था। और अब तो जब सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में नौकरी दिलवाने के लिए इतने बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी की गई कि सीबीआई जांच शुरू होने के बाद, ईडी की जांच शुरू होने के बाद भी अब जाकर अगर मंत्री की सबसे करीबी महिला से 20 करोड़ रूपये नगद मिल रहे हैं, तो पिछले बरसों में इससे कितने गुना अधिक रकम आई-गई होगी, यह अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। राजनीतिक और सरकारी भ्रष्टाचार का पैसा बहुत कम ही इस तरह नगद रखा जाता है, और उसका अधिकतर हिस्सा लगातार इधर-उधर कर दिया जाता रहता है। इसलिए इस रकम से आंखें तो फटी की फटी रह जाती हैं, लेकिन यह संगठित भ्रष्टाचार की आखिरी किस्त सरीखी चीज है।
वैसे तो जनता के पैसों से चलने वाली सरकारों में किसी भी किस्म का भ्रष्टाचार सबसे गरीब जनता के हक को सबसे बुरी तरह कुचलना होता है, लेकिन जब नौकरियां देने में भ्रष्टाचार करके कम काबिल या नालायक लोगों को नौकरी पर रख दिया जाता है, तो उसका एक मतलब यह भी होता है कि उनकी पूरी नौकरी चलने तक लोगों को घटिया काम हासिल होगा। एक-एक शिक्षक अपनी पूरी जिंदगी में दसियों हजार बच्चों को पढ़ाते हैं, और अगर रिश्वत देकर नालायक लोग शिक्षक बन जाते हैं, तो वे नालायक बच्चों की पूरी पीढिय़ां तैयार करते हैं। यह सिलसिला किसी सडक़ या इमारत को बनाने में किए जा रहे भ्रष्टाचार से अधिक खतरनाक होता है। यह अधिक खतरनाक इस मायने में भी होता है कि जो गरीब नौकरी के लिए रिश्वत देने की हालत में नहीं रहते हैं, उनका मन ऐसे हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के लिए नफरत से भर जाता है, न सिर्फ सरकार बल्कि लोकतंत्र के सभी ढांचों से उन्हें नफरत हो जाती है। और ऐसे लोग न तो इस देश में कोई आत्मगौरव पाते हैं, और न ही सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति उनके मन में कोई दर्द रह जाता है। नैतिकता की तमाम नसीहतें देने वाले नेता उन्हें जालसाज और धोखेबाज दिखते हैं। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले मध्यप्रदेश में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए हुए इम्तिहान लेने वाली व्यापम नाम की संस्था के व्यापक भ्रष्टाचार का मामला अदालत तक पहुंचा था। व्यापम मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरियों में भर्ती का काम भी करती थी। इसके चयन में इतना बड़ा संगठित भ्रष्टाचार चल रहा था कि अभी तक उस मामले का पूरा पर्दाफाश नहीं हो पाया है जबकि दस बरस होने को हैं। मामले के इतना लंबा चलने से इससे जुड़े हुए तीस-चालीस गवाह और आरोपी रहस्यमय तरीके से मर गए या मार दिए गए, और अभी तक इस व्यापक जुर्म का पूरा खुलासा सामने नहीं आया है। लोगों को यह भी याद होगा कि हरियाणा के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को भी शिक्षक भर्ती में भारी रिश्वतखोरी की वजह से दस बरस की कैद हुई थी, और उसके बेटे अजय चौटाला को भी इतनी ही कैद हुई थी।
हिन्दुस्तान में सरकारी नौकरियों में भर्ती बड़े पैमाने पर होने वाले भ्रष्टाचार का एक मौका रहता है। सत्ता कभी भी इतनी कमाई हाथ से जाने नहीं देती है। और जो 20 करोड़ रूपये नगदी पश्चिम बंगाल के मंत्री की करीबी महिला से मिले हैं, उसे बहुत थोड़ा सा मानना चाहिए क्योंकि ममता सरकार में तो हर किसी को यह मालूम था कि वे केन्द्रीय जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं, और उन्हें लगातार सावधान रहना है। इसके बावजूद अगर वे इस तरह से इस हद तक नोटों में डूबे हुए मिल रहे हैं, तो उनके पूरे भ्रष्टाचार का अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं है। देश का कानून जितनी नगद रकम रखने की छूट देता है, उससे हजार गुना अधिक नगदी अगर इस तरह से मिल रही है, और भ्रष्टाचार के सुबूत मिल रहे हैं, तो फिर इसे कौन मोदी सरकार की बदले से की गई कार्रवाई करार दे सकते हैं? बदले की कार्रवाई भी जरूर होती होगी, लेकिन 20 करोड़ के नोटों के जखीरे पर बैठकर किसी को बदले की कार्रवाई की शिकायत करने का हक नहीं रह जाता। देश की बाकी सरकारों को भी इससे सबक लेना चाहिए। हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें नोट छुपाने के बेहतर रास्ते निकालने चाहिए, बल्कि यह है कि ऐसा भ्रष्टाचार खत्म करना चाहिए जिसने चौटाला और उसके बेटे को दस-दस बरस जेल में रखा। अगर उनके पास हजारों करोड़ की काली कमाई भी होगी, तो भी दस बरस की कैद के मुकाबले वह भला किस काम की?
यूपी को कड़ी फटकार वाली सुप्रीम कोर्ट की नसीहत पर देश भर में अमल की जरूरत
22 जुलाई 2022
मीडिया में फर्जीवाड़े की जांच करने वाली और
उसका भांडाफोड़ करने वाली एक विश्वसनीय वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के एक संस्थापक
पत्रकार मोहम्मद जुबैर को जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में
जो कहा वह देश के सभी राज्यों की सरकारों और केन्द्र सरकार के गौर करने की
बात है। यह आदेश वैसे तो इस एक मामले में आया है, लेकिन अदालत ने कुछ
व्यापक विचार सामने रखे हैं जो दूसरे मामलों पर भी लागू होंगे। सुप्रीम
कोर्ट ने यह कहा है कि किसी को गिरफ्तार करने के अधिकार का इस्तेमाल पुलिस
को संयम से करना चाहिए। उसने उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जुबैर के एक ट्वीट
को लेकर जगह-जगह दर्ज की गई एफआईआर पर अलग-अलग गिरफ्तारियां करने, और
अलग-अलग मामले चलाने के खिलाफ राय दी, यूपी सरकार द्वारा जाहिर तौर पर
फर्जी दिख रही इन शिकायतों में जुबैर को उलझाए रखने के लिए अलग-अलग जिलों
में रिपोर्ट लिखवाने का जो सिलसिला चला रखा था, अदालत ने उसके खिलाफ भी
कहा, और यूपी सरकार द्वारा इन मामलों पर बनाए गए विशेष जांच दल को भी भंग
कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इन तमाम मामलों को एक साथ दिल्ली पुलिस को भेज
दिया, जो है तो भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार के मातहत, लेकिन वह
यूपी के बाहर है, और अब तो इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सीधे दखल के बाद
दिल्ली पुलिस शायद उस तरह की साजिश का रूख नहीं रख पाएगी जैसा उत्तरप्रदेश
पुलिस का दिख रहा था। उत्तरप्रदेश सरकार के वकील ने इस पूरे मामले में मुंह
की खाई, और वकील तो सरकार का प्रतिनिधि रहता है, सरकार ने अदालत में मुंह
की खाई है। यूपी की इस अपील को सरकार ने खारिज कर दिया कि जुबैर के आगे
ट्वीट करने पर रोक लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट जज ने वकील से कहा यह तो ठीक
वैसी ही बात की जा रही है कि एक वकील को बहस न करने को कहा जाए। एक पत्रकार
को यह कैसे कहा जा सकता है कि वह लिखना बंद कर दे। अदालत ने यहां तक आदेश
दिया कि अगर इसी मुद्दे पर जुबैर के खिलाफ कोई और एफआईआर भी दर्ज होती है,
तो उन सभी मामलों में अभी से यह जमानत लागू रहेगी। यह अपने आपमें बड़ा कड़ा
फैसला है जो कि बदनीयत की साजिश को देखते हुए दिया गया लगता है। यह एक और
बात है कि अदालत के इस रूख के बाद अब यूपी सरीखा कोई दूसरा राज्य भी जुबैर
के खिलाफ इस ट्वीट के मामले में नई एफआईआर लिखने से कतराएगा। अदालत ने यह
साफ किया है कि गिरफ्तारी अपने आपमें एक कठोर कदम है जिसका कम ही इस्तेमाल
किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी अदालतों से कहा है कि वे ऐसे अफसरों
के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें जो गिरफ्तारी की शर्तों को पूरा किए बिना
कानून की धाराओं का पालन किए बिना गिरफ्तारी करते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह
आदेश देश की बाकी तमाम अदालतों पर लागू होता है।
अब ये दिन कुछ ऐसे चल रहे हैं कि हमें लगातार पुलिस और अदालत के मामलों पर लिखना पड़ रहा है। पहले बस्तर के मामले सामने आए जिनमें बेकसूर आदिवासियों को पुलिस और सुरक्षाबलों ने थोक में मारा और सरकारी वर्दियों द्वारा की गई ऐसी हत्याओं की जांच रिपोर्ट आने के बरसों बाद भी छत्तीसगढ़ सरकार उस पर कोई कार्रवाई करते नहीं दिख रही है। इसके बाद अभी चार दिन पहले एक दूसरा मामला आया जिसमें बस्तर में सीआरपीएफ पर एक नक्सल हमले के बाद पास के गांव के करीब सवा सौ बेकसूर आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया गया था, और एनआईए ने उन पर मुकदमा चलाया, और एनआईए की विशेष अदालत ने उन सबको बेकसूर पाकर छोड़ दिया। आज राज्यों की पुलिस वहां की सत्तारूढ़ राजनीतिक पसंद और नापसंद के आधार पर जिस तरह की कार्रवाई करते दिख रही हैं, उसके खिलाफ देश में एक जागरूकता की जरूरत है, और सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले में निचली अदालतों को दिए गए निर्देश पर अमल भी करवाने की जरूरत है। अगर पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं के कहे हुए किसी की भी गिरफ्तारी के लिए टूट पड़ती है, तो ऐसी पुलिस की कानूनी जवाबदेही तय होनी चाहिए। हमने पिछले कई बरसों में लगातार यह देखा है कि अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों की सरकारों के मातहत काम करती पुलिस राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह काम करने लगती है। और यह सिलसिला न्याय प्रक्रिया को ही एक सजा की तरह स्थापित कर देता है जब जुबैर की तरह एक के बाद एक अलग-अलग जिलों में की गई एफआईआर के आधार पर उसकी एक जमानत होते ही दूसरी एफआईआर पर गिरफ्तारी की जाती है, और इंसाफ के पूरे सिलसिले को ही कुचल दिया जाता है। बाकी प्रदेशों में बाकी पार्टियां कोई रहमदिल नहीं हैं, और वे भी अपने विरोधियों, अपने को नापसंद लोगों को अपनी पुलिस के हाथों इसी तरह घेरती हैं, और कुचलती हैं। ऐसे में अदालतों को जमानत की सुनवाई करते हुए यह भी देखना चाहिए कि क्या पुलिस सत्ता के तलुए सहलाने के लिए लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल रही है? बस्तर के आदिवासी पांच बरस बाद नक्सल आरोपों से छूटकर जेल के बाहर आए हैं, देश में जगह-जगह कई पत्रकार महीनों और बरसों तक जेल में सड़ाए जा रहे हैं क्योंकि किसी प्रदेश की सत्ता उन्हें पसंद नहीं करती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और चूंकि देश के बहुत से प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारें अपने-अपने राज में यही रूख रखती हैं, इसलिए इसका इलाज अदालत छोड़ और कुछ नहीं हो सकता। जुबैर नाम का यह पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में बड़ी लड़ाई लडऩे की ताकत रखता था, इसलिए उसके लिए बड़े-बड़े वकील खड़े हुए, और एक बहुत चर्चित मामला होने की वजह से भी अदालत ने शायद उस पर तेजी से गौर किया। लेकिन बहुत छोटे-छोटे लेखक, पत्रकार, कलाकार ऐसे हैं जिन्हें वकालत की इतनी ताकत हासिल नहीं है, और उनके हकों के लिए सुप्रीम कोर्ट को ही राज्यों की पुलिस को ऐसे निर्देश देने पड़ेंगे ताकि बदनीयत दिखने पर ऐसी पुलिस के खिलाफ कार्रवाई हो सके।
किसी का किसी मामले से छूट जाना इसलिए भी हो सकता है कि गवाह बदल जाएं, और मामला साबित न हो पाए, लेकिन पुलिस की बदनीयत जहां रहती है वहां वह सिर चढक़र बोलती है। ऐसे मामलों में पुलिस को सजा देने का काम भी होना चाहिए, और इस बात की जांच भी होनी चाहिए कि पुलिस ने किन ताकतों के कहे हुए नाजायज और गैरकानूनी काम किए। आज जब देश में न्यायिक प्रक्रिया ही एक सजा हो चुकी है, तो लोगों को ऐसी ज्यादती से बचाने के लिए अदालतों को सक्रिय होकर पुलिस की जवाबदेही कटघरे में पूछनी होगी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्याय की प्रक्रिया को वापिस इस्तेमाल में लाने की बात करने वाला है, और इसलिए यह हिम्मत बढ़ाने वाला भी है।
इस पुरूषप्रधान भारत में छात्राओं की ब्रा उतरवाना देश की आम सोच के तहत
21 जुलाई 2022
देश के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में दाखिले
होने वाले नीट इम्तिहान को लेकर एक नया विवाद खड़ा हुआ है जिसमें केरल के
कुछ परीक्षा केन्द्रों में छात्राओं को तब तक भीतर नहीं जाने दिया गया जब
तक उन्होंने अपनी ब्रा नहीं उतार दी। दरअसल नीट परीक्षा आयोजित करने वाली
संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी का नियम मेटल डिटेक्टर से जांच करके, बिना
धातु के किसी सामान के ही भीतर जाने देने का है। ब्रा के हुक और वायर धातु
के होते हैं, और उनसे मेटल डिटेक्टर के बजने पर इन छात्राओं को रोक दिया
गया था। केरल में ऐसी ही एक छात्रा के पिता ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई है
जिसमें उन्होंने बताया कि उनकी बेटी ने जब यह इनरवियर उतारने से मना कर
दिया, तो उसे परीक्षा देने से मना कर दिया गया है। रिपोर्ट में लिखाया है
कि एक कमरा इनरविनर से भरा हुआ था, उनमें बहुत से लोग रो रहे थे, और इस तरह
के भद्दे बर्ताव से बच्चों को मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जा रहा था,
बहुत सी लड़कियां वहीं अपनी ब्रा उतार रही थीं, और पिछले बरसों में भी ऐसी
नौबत आई है जब छात्राओं से ब्रा उतरवाई गई, और आसपास मौजूद पुरूष परीक्षक
उन्हें घूरते रहे। हैरानी की बात यह है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने एक
बयान में कहा है कि उन्हें इस घटना के बारे में कोई शिकायत नहीं मिली है।
एक कड़े मुकाबले वाले ऐसे दाखिला इम्तिहान में बच्चे वैसे भी बहुत दबाव और तनाव के साथ शामिल होते हैं। ऐसे में लड़कियों को उनके रोजमर्रा के अनिवार्य रूप से पहनने वाले कपड़ों को उतरवाकर बैठने को कहा जाए, तो यह जाहिर है कि इस बात से उनका इम्तिहान देना बुरी तरह प्रभावित होगा। इम्तिहान के नियम-कायदे बनाने वाले लोग न सिर्फ बेवकूफ हैं, बल्कि वे संवेदनाशून्य और अमानवीय भी हैं। इम्तिहान के पोशाक के नियम धातु के धार्मिक प्रतीकों को तो भीतर जाने की छूट दे रहे हैं, लेकिन लड़कियों की बदन की प्राकृतिक जरूरत के मुताबिक जो कपड़े बिल्कुल ही जरूरी हैं, उन्हें धातु के हुक की वजह से उतरवाया जा रहा है। धर्म का सम्मान जिंदा लडक़ी के बदन के सम्मान से बढक़र हो गया। और देश भर में जब करोड़ों बच्चे ऐसे इम्तिहान में शामिल होते हैं, और उनमें शायद आधे से अधिक लड़कियां होती हैं, तब ऐसे नियम बनाना सजा के लायक काम है। अगर इस देश में बनाई गई संवैधानिक संस्थाओं पर सत्तारूढ़ पार्टियों के मनचाहे और पसंदीदा लोग काबिज न होते, तो ऐसे नियमों और इंतजाम पर अब तक कई नोटिस जारी हो गए होते। एक खबर यह जरूर है कि केरल की पुलिस ने छात्राओं की ब्रा जबर्दस्ती उतरवाने वाली पांच महिलाओं को गिरफ्तार किया है। इन लड़कियों के मां-बाप ने यह भी कहा कि उनकी बच्चियां बरसों से इस इम्तिहान की तैयारी कर रही थीं, और उन्हें अच्छे नंबर पाने की उम्मीद थी, लेकिन जब उनकी ब्रा उतरवाकर उन्हें छात्रों के बीच बैठकर, पुरूष परीक्षकों की नजरों के सामने इम्तिहान देना पड़ा, तो वे मानसिक यातना से गुजर रही थीं, और इससे उनका लिखना बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
हिन्दुस्तान में लड़कियों और महिलाओं की प्राकृतिक जरूरतों के लिए समाज संवेदनाशून्य है। सार्वजनिक जगहों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक महिलाओं के लिए शौचालयों का इंतजाम कहीं होता है, और कहीं नहीं भी होता है। बहुत ऊंचे दर्जे के दफ्तरों की बात छोड़ दें, तो आम दफ्तरों और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के माहवारी के दिनों के लिए कोई इंतजाम नहीं रहता। और ऐसी तरह-तरह की दिक्कतों का असर महिलाओं के मनोबल पर भी पड़ता है, और लडक़ों और आदमियों के मुकाबले उनकी संभावनाएं भी पिछडऩे लगती हैं। कहने के लिए तो केन्द्र और राज्य में मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग बने हुए हैं, लेकिन उन पर काबिज लोग सरकारों के लिए कोई दिक्कत खड़ी करना नहीं चाहते, और अधिकतर ऐसे मामलों में तो सरकार ही जिम्मेदार रहती है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के डायरेक्टर जनरल विनीत जोशी के नाम से भी यह समझा जा सकता है कि यह एजेंसी लड़कियों की बुनियादी जरूरत के प्रति इस कदर गैरजिम्मेदार क्यों है। हिन्दुस्तान की पुरूष प्रधान और ब्राम्हणवादी समाज व्यवस्था में महिला की जगह उतनी ही है जितनी जगह महिलाओं के लिए मंदिरों में पुजारी के काम के लिए हो सकती है। कदम-कदम पर महिलाओं को कुचलना, उन्हें बराबरी पर नहीं आने देना, इसकी साजिशें कई बार तो शायद बिना कोशिश भी होती रहती हैं क्योंकि नीति और योजना बनाने वाले लोगों की सोच को इस तरह से काम करने के लिए कोई कोशिश नहीं करनी पड़ती। अभी तीन दिन पहले ही यह खबर आई थी कि रिश्तों वाली वेबसाइटों पर ऐसी युवतियों पर कम ध्यान दिया जाता है जो कामकाजी हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की एक शोध छात्रा ने ऐसी एक वेबसाइट पर एक परीक्षण करके देखा कि जिन युवतियों के प्रोफाइल में वे कामकाजी नहीं दिखती हैं, उनमें 15-20 फीसदी अधिक दिलचस्पी ली जाती है। एक कामकाजी महिला के प्रोफाइल में 78 से 85 लोगों ने दिलचस्पी ली जबकि इतने ही वक्त में कोई काम न करने वाली महिला में सौ लोगों ने दिलचस्पी ली। भारतीय मूल की इस शोध छात्रा दिवा धर ने इस प्रयोग के लिए 20 ऐसी नकली प्रोफाइल बनाई जो बाकी तमाम मामलों में एक सरीखी थीं, सिवाय कामकाज के, या भविष्य में काम करने के। इसके बाद उन पर पहुंचने वाले लोगों को देखा तो काम न करने वाली महिलाओं में सबसे अधिक आदमी दिलचस्पी लेते हैं, इसके बाद बारी उन महिलाओं की आती है जो अभी काम कर रही हैं, लेकिन काम छोडऩा चाहती हैं। इस पूरे प्रयोग के बारे में यहां पर लिखना मुमकिन नहीं है लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि हिन्दुस्तान में लडक़ी या महिला का आगे बढऩा सबको खटकता है, और वह अगर कामयाब हो जाती है, तो उसमें लोगों की दिलचस्पी कम हो जाती है। यही वजह है कि नीतियां और योजना बनाने वाले लोगों को लड़कियों और महिलाओं की जरूरतें सूझती ही नहीं हैं। महिलाओं के हक और उनकी जरूरतों को लेकर लगातार और हमेशा चलने वाले एक आंदोलन की जरूरत है, तो शायद अगली सदी तक हिन्दुस्तान किसी बराबरी तक पहुंच पाए।
बरसों की कैद के बाद बाहर निकले बेकसूरों को मुआवजा क्यों नहीं?
20 जुलाई 2022
हिन्दुस्तान की एक बड़ी खूबी यह है कि हर दिन कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा होता है जिससे लगता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। अभी दो हफ्ते पहले हमने इसी जगह उत्तरप्रदेश के एक अदालती फैसले के बाद लिखा था कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र किस हद तक नाकामयाब हो गया है, अदालतें किस तरह बेइंसाफी करती हैं, आमतौर पर अंधाधुंध देर करके। उत्तरप्रदेश का यह मामला 44 बरस के एक मजदूर का था जिस पर पुलिस ने आरोप लगाया था कि उसके पास कट्टा है। और यह देसी पिस्तौल उसके पास से कभी बरामद नहीं हुई, और यह मुकदमा 26 बरस चला, उसे 400 बार अदालत में पेश होना पड़ा, 2020 में निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया था, लेकिन सरकारी वकील ने जोर डालकर मामला फिर खुलवाया था, और अब 2022 में वह 70 बरस की उम्र में इस तोहमत से बरी हुआ है। इस दौरान पूरा परिवार तबाह हो गया है। इसी संपादकीय में हमने यह सुझाया था कि राम के उत्तरप्रदेश में रामरतन नाम के इस गरीब के 26 बरसों को तबाह करने के एवज में उसे न्यूनतम मजदूरी जितना मुआवजा तो मिलना चाहिए। इससे उसके बच्चों की जा चुकी पढ़ाई का तो कोई मुआवजा नहीं मिल सकता, परिवार की जिंदगी दुबारा नहीं आ सकती, लेकिन लोकतंत्र को अपनी नीयत और नीति स्थापित करने के लिए ऐसे मुआवजे करने का इंतजाम करना चाहिए।
एक पखवाड़े के भीतर ही छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक दूसरा मामला सामने आया है जिस पर हम उसके बाकी पहलुओं पर तीन दिन पहले ही लिख चुके हैं, लेकिन उसके एक पहलू पर लिखा जाना बाकी है। बस्तर के दंतेवाड़ा के एनआईए कोर्ट ने 121 आदिवासियों को बरी किया है जिन पर एक नक्सल हमले में भागीदार होने के आरोप में एनआईए ने यूएपीए जैसे कड़े कानून के तहत मुकदमा चलाया हुआ था। सीआरपीएफ के 25 लोगों को मारने वाला नक्सल हमला जिस इलाके में हुआ था वहां के 122 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था जिनमें से एक की मौत हुई, और बाकी लोग बिना जमानत जेल में पांच साल गुजारकर अभी बरी हुए हैं। जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था उनसे जिन सामानों की जब्ती पुलिस ने बनाई थी, और एनआईए ने मुकदमे में जिनका इस्तेमाल किया था उनमें धनुषबाण जैसा आदिवासियों के काम का रोजाना का हथियार भी था। खैर, ये सारे के सारे लोग अदालत से छूटकर पांच बरस बाद बाहर निकले हैं, इनमें से बहुत से तो 19-20 बरस के थे जब वे जेल गए थे। अब सवाल यह उठता है कि बिना जमानत जिन लोगों को जेल में रहना पड़ता है, और फिर जो बेकसूर साबित होकर बाहर निकलते हैं, उनके इन बरसों का क्या इंसाफ हो सकता है? हमने उत्तरप्रदेश के मामले में यह सुझाया ही था कि इतने दिनों की सरकारी रेट से न्यूनतम मजदूरी तो इन लोगों को देनी ही चाहिए ताकि जो गरीब लोग परिवार से दूर जेल में रहने को मजबूर थे, उन्हें इन बरसों का कुछ मुआवजा मिल सके।
बस्तर के नक्सल मामलों में गिरफ्तार किए जाने वाले बेकसूर आदिवासी तो बेकसूर रहते हैं, लेकिन बहुत से लोग इतने खुशकिस्मत नहीं रहते, और उन्हें सुरक्षाबल गांव-जंगल में ही बिना किसी कुसूर के मार गिराते हैं। हाल के बरसों में ऐसे बड़े-बड़े कई मामले सामने आए हैं, और न्यायिक जांच के निष्कर्ष की शक्ल में सामने आए हैं जिनमें सुरक्षाबलों के हाथों बेकसूरों की मौत स्थापित हुई है। ऐसे ही बस्तर में इस पहलू पर भी सोचने की जरूरत है कि नक्सलियों को हथियार डालने पर कई तरह की मदद की सार्वजनिक घोषणा सरकार बरसों से करती आई है। हर कुछ दिनों में नक्सलियों का आत्मसमर्पण दिखाया जाता है, और वे असली नक्सली हों, या कि सरकारी आंकड़े बढ़ाकर जनधारणा के लिए दिखाए गए नक्सली हों, उन्हें मुआवजा मिलता है, पुनर्वास का मौका मिलता है। जब हथियारबंद जुर्म करने वाले नक्सलियों को भी पुनर्वास का मौका मिलता है, तो फिर जांच एजेंसियों और अदालतों के शिकार ऐसे बेकसूर आदिवासियों को मुआवजा और पुनर्वास क्यों नहीं मिलना चाहिए? छत्तीसगढ़ सरकार इस बारे में देश में एक मिसाल पेश कर सकती है कि वह जेलों से बेकसूर छूटने वाले लोगों को उनके विचाराधीन बंदी रहने के दिनों की न्यूनतम मजदूरी जितनी रोजी दे। यह रकम पैसे वाले कैदियों के लिए किसी काम की नहीं रहेगी, लेकिन गरीब कैदियों के लिए यह जरूर काम की होगी। सरकार इसे केवल गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों के लिए शुरू कर सकती है, और इससे लोकतांत्रिक सरकार की न्याय व्यवस्था की चूक या कमजोरी पर एक जुर्माना लगेगा, और सबसे गरीब परिवारों पर गिरी हुई बिजली से उन्हें थोड़ी सी राहत मिलेगी। अगर छत्तीसगढ़ सरकार ऐसी पहल करती है तो धीरे-धीरे देश के बाकी प्रदेशों की सरकारों को भी इस रास्ते चलना पड़ेगा क्योंकि गरीबी की रेखा के नीचे के परिवार इस हालत में भी नहीं रहते हैं कि वे परिवार के एक कमाऊ सदस्य के बरसों के लिए चले जाने पर रोजाना की आम जिंदगी के इंतजाम कर सकें। ऐसे तमाम परिवारों में बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, बीमारों का इलाज नहीं हो पाता है।
जिस बस्तर में रोजाना ही सरकार आत्मसमर्पित नक्सलियों को नगदी प्रोत्साहन देने की खबरें जारी करती है, और उनके पुनर्वास का कई तरह का इंतजाम करती है, वहां पर सुरक्षाबलों के हाथों जेल जाने वाले बेकसूर साबित हुए लोगों को तो एक मुआवजा मिलना ही चाहिए, वरना आज के लोकतांत्रिक इंतजाम में तो आदिवासियों का भरोसा ही इस व्यवस्था से उठते चले जाएगा, और उन्हें लगते रहेगा कि हथियार उठाने पर ही सरकार मदद करती है, उसके बिना सरकार की नजर में वे या तो गोली मार देने लायक हैं, या जेलों में बंद कर देने लायक हैं। किसी एक इलाके में, किसी एक तबके में सरकार की नीतियां एक सरीखी रहनी भी चाहिए, और दिखनी भी चाहिए।
बोल कि लब आजाद हैं तेरे, बोल कि सोशल मीडिया अब तक फ्री है
19 जुलाई 2022
उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक मॉल को
अचानक ढेर सी शोहरत और उतनी ही बदनामी मिल रही है। किसी भी कारोबारी के लिए
मुफ्त की पब्लिसिटी, बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ, किस्म की होती है। और
केरल के एक मुस्लिम कारोबारी के बनाए हुए सैकड़ों करोड़ के इस मॉल का नाम
एकाएक पूरे हिन्दुस्तान की जुबान पर चढ़ गया है। लुलु मॉल में कुछ लोगों ने
जाकर अचानक ही गलियारे में नमाज पढ़ी, या नमाज पढऩे का नाटक किया, उसका
वीडियो बनाया गया, उसे चारों तरफ फैलाया गया, और अब उत्तरप्रदेश के
हिन्दूवादी संगठन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस मॉल पर बुलडोजर चलाने
की मांग कर रहे हैं, जिसका कि उद्घाटन ही योगी ने किया था। शुरुआती खबरों
से जो पता लगता है उनमें इस मॉल में आकर नमाज पढऩे का यह नाटक किया गया था
क्योंकि इसे कुल 18 सेकेंड तक किया गया, जैसी कि कोई नमाज नहीं होती है।
जाहिर तौर पर इसका मकसद मॉल को बदनाम करना, और साम्प्रदायिक तनाव खड़ा करना
है। अब नमाज के इस नाटक के बाद हिन्दूवादी संगठन वहां हनुमान चालीसा पढऩे
पहुंच गए, और पुलिस के जिम्मे इन्हीं सबको काबू करने का काम रह गया है।
हिन्दुस्तान में अब हर दो-चार दिन में कोई न कोई साम्प्रदायिक या भावनात्मक मामला इस तरह उठते दिखता है जिससे कि जिंदगी के असल मुद्दे दब जाएं। गांधी की स्मृति में बनी राष्ट्रीय सरकारी समिति की पत्रिका का ताजा अंक अभी सावरकर की स्तुति में आया है, और देश-दुनिया के गांधीवादी हक्का-बक्का हैं कि क्या गांधी को ये दिन देखना भी नसीब में लिक्खा हुआ था? फिर यह भी हो रहा है कि कल से जब देश में आटे-दाल के भाव बढऩे थे, और हर गरीब की रसोई में परिवार के बाकी लोगों के साथ बैठकर जीएसटी खाना खाने लगा है, तब देश भर में हो रहे हाहाकार को खबरों से पीछे धकेलकर 18 सेकेंड की नमाज और उसके मुकाबले हनुमान चालीसा टीवी स्क्रीन पर छाई हुई हैं। मीडिया और राजनीति की जुबान में इसे स्पिन डॉक्टरी कहते हैं, कि चर्चा में छाए मुद्दों का रूख मोड़ देना, और वहां पर दूसरे मुद्दों को ले आना। आज जब हिन्दुस्तान के हर गरीब और मध्यमवर्गीय घर के चूल्हों पर खतरा आया हुआ है, हर गरीब की थाली से कुछ कौर छीन लिए गए हैं, जब आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी केन्द्र सरकार ने पहली बार सबसे गरीब की सबसे बुनियादी जरूरत से भी खून चूसने का काम किया है, उस वक्त देश के एक बड़े तबके को नमाज और हनुमान चालीसा में उलझाने का काम अनायास नहीं हो सकता। जिस साजिश के तहत ऐसा वीडियो बनाया गया, जिस साजिश के तहत इसका संगठित और सुनियोजित विरोध किया गया, उसी साजिश के तहत देश के दुख-दर्द को ढांकने का काम भी हो रहा है, खबरों के पन्नों से अनाज की जगह छीनी जा रही है।
लेकिन लोकतंत्र, चाहे वह जिस हद तक भी हिन्दुस्तान में बाकी हो, के तहत सत्ता से परे की बाकी ताकतों को भी ऐसे मौके पर कुछ करने की गुंजाइश हासिल रहती है। आज यह गुंजाइश जनजागरण की है। आज अगर हिन्दुस्तान की विपक्षी राजनीतिक ताकतें, मीडिया का जो भी छोटा-मोटा हिस्सा अब भी जनहित के लिए फिक्र रखता हो वह, सोशल मीडिया पर असरदार मौजूदगी रखने वाले और सही राजनीति की वकालत करने वाले लोग, ऐसे कई तबके हैं जो कि इस तरह की स्पिन डॉक्टरी का भांडाफोड़ कर सकते हैं, और लोगों को जागरूक कर सकते हैं कि कुछ खास मौकों पर कुछ जानी-पहचानी ताकतें राष्ट्रवादी, साम्प्रदायिक, भावनात्मक, और उन्मादी मुद्दों को लेकर क्यों सक्रिय हो जाती हैं, और जिंदगी की किन तकलीफदेह हकीकतों को दबाना उनकी नीयत रहती है। लोकतंत्र में जितनी जिम्मेदारी सरकारी काम करने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी की रहती है, उतनी ही जिम्मेदारी सरकारी नाकामयाबी को उजागर करने के लिए विपक्ष और देश के जागरूक तबकों की रहती है। फिर यह भी है कि अब देश की संसद में आलोचना के जिन विशेषणों पर रोक लगाने की खबरें आ रही हैं, उनसे परे संसद के बाहर की खुली हवा में तो उन तमाम विशेषणों का इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि वे सारे के सारे लोकतांत्रिक हैं। सत्ता अपने असर से संसद के भीतर चाहे जो करवा ले, संसद के बाहर खुली हवा में लोग आज भी बोल सकते हैं, चाहे कुछ खतरा उठाकर ही क्यों न बोलना हों।
लोगों को यह याद रखना चाहिए कि बीते बरसों में कब-कब किन बातों को पहले पन्ने से धकेलकर भीतर के पन्नों पर भेजने के लिए, या टीवी के समाचार बुलेटिनों से पूरी तरह बाहर करवाकर किसी फर्जी मुद्दे पर नाटकीय बहस की नूरा कुश्ती करवाने के लिए साजिशें की गई हैं। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से देश के जागरूक और जिम्मेदार तबके को भी अपनी बात कहने और लिखने की गुंजाइश हासिल है, जो कि अखबारी पन्नों से तकरीबन गायब हो चुकी है, और टीवी के पर्दों पर जो कभी थी भी नहीं। इसलिए इसका इस्तेमाल होना चाहिए। फैज़ की कही बात को आज के संदर्भ में देखें तो यह कहा जा सकता है कि बोल कि लब आजाद हैं तेरे, बोल कि सोशल मीडिया अब तक फ्री है।











