संपादकीय
31 जनवरी 2015
भारत में आज एक ऐसी मिसाइल कामयाबी से दागी है जो कि पांच हजार किलोमीटर दूर तक जाकर मार कर सकती है। अब हिन्दुस्तान की सरहद से पांच हजार किलोमीटर की दूरी नापें, तो शायद आधी दुनिया ही इसकी मार में आ जाएगी। और यह मिसाइल एक टन का परमाणु बम लेकर जा सकती है। इन तमाम जानकारियों के साथ आज की सुबह शुरू हुई, और देश के बहुत से लोगों को इस पर गर्व हुआ कि भारत ने यह कामयाबी हासिल की है। अब कुछ दिनों के बाद चीन या पाकिस्तान की तरफ से इसी किस्म की कोई दूसरी खबर आएगी।
अब सवाल यह है कि जंग का यह मुकाबला दुनिया के मुल्कों के बीच किस हद तक जाएगा? इसके बाद इससे दुगुनी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल बनेगी, और वह शायद इतना बड़ा परमाणु हथियार लेकर जा सकेगी कि वह किसी एक पूरे देश को खत्म कर सके। दो-चार दिन पहले ही हमने एक समझदार की कही हुई एक लाईन छापी थी कि परमाणु हथियारों का मुकाबला कुछ इस किस्म का है कि पेट्रोल में कमर तक डूबे हुए दो लोग खड़े हैं, और एक के हाथ में माचिस की तीन तीलियां हैं, और दूसरे के हाथ में पांच।
गांधी ने एक बार कहा था कि आंख के जवाब में आंख निकाल लेने से एक दिन पूरी दुनिया ही अंधी हो जाएगी। आज हो यही रहा है, देशों के बीच जंग का मुकाबला, फौज का मुकाबला बढ़ते चल रहा है। और अपनी सरहदों के भीतर के गरीब, भूखे, बेघर, बीमार, और कुपोषण के शिकार लोगों की फिक्र करने के बजाय देश यह फिक्र करने में लगे हैं कि उनकी मिसाइलें सरहद से बाहर के किन मुल्कों के कौन-कौन से ठिकानों तक जाकर मार कर सकेंगी। और दूसरी तरफ बचाव का एक दूसरा मुकाबला भी चल रहा है कि अपनी ओर आती हुई ऐसी मिसाइलों को हवा में ही खत्म कर देने के लिए कैसी मिसाइल बनाई जाए, और वैसी मिसाइलें भी बनती चली जा रही हैं।
यह तमाम काम उस गरीब जनता के पैसों पर हो रहा है जिसके भीतर कहीं किसी धर्म के नाम पर, कहीं देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर, और कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर एक दहशत या नफरत फैलाई जाती है, और उसे यह एहसास कराया जाता है कि उसकी भूख से अधिक जरूरी हथियारों के सौदागरों के कारखानों की भूख है। और देश के नाम पर, धर्म के नाम पर लोग ऐसे झांसे में जीने भी लगते हैं, और एक युद्धोन्माद के शिकार हो जाते हैं। दरअसल दुनिया में हथियारों का कारोबार इतना बड़ा है कि उसकी खासी दिलचस्पी देशों के बीच जंग छिड़वाने में, आतंकियों को खड़ा करवाने में, और जगह-जगह हथियारबंद लड़ाई पैदा करवाने में रहती है। जिस तरह कुछ लोगों की रोजी-रोटी दूसरों की मौत से जुड़ी रहती है, उसी तरह हथियारों के कारोबार की जिंदगी दुनिया में तनाव खड़े होने और बड़े होने से जुड़ी रहती है। ऐसे कारोबार अमरीका जैसे बड़े देश में भी राष्ट्रपति बनाने और बिगाडऩे में दखल रखते हैं, और छोटे-छोटे तो बहुत से देश इनकी जेब में रहते हैं। आज दुनिया के दर्जनों देशों में बागियों के पास, आतंकियों के पास वे तमाम हथियार पहुंचते कैसे हैं, जिनकी एक-एक की बिक्री कहीं न कहीं दर्ज होनी चाहिए।
इसलिए आज चाहे किसी देश की सरकार खुद कोई हथियार बनाए, या कोई कारखानेदार इसे बनाकर सरकार या बागियों को बेचे, इन सबको कम करने की तरफ बढऩा चाहिए। भारत की बड़ी कामयाबी ऐसी मिसाइल बनाने में नहीं हो सकती, जो कई देशों को पार करके भी आगे जाकर मार कर सके। भारत की कामयाबी ऐसी मिसाल बनाने में ही हो सकती है कि पड़ोसियों के साथ उसका फौजी मुकाबला कैसे कम हो सकता है। हिन्द महासागर के इस इलाके में भारत ही सबसे बड़ा देश है, और भारत का ही इतिहास इस मामले में एक वक्त बेहतर रहते आया है। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के फौजी इंतजाम बढ़ाते चलने के बजाय, राष्ट्र को कम फौजी इंतजामों से भी सुरक्षित रखने की तरकीब ढूंढना लोकतंत्र की एक अधिक बड़ी कामयाबी होगी, और भारत का बड़प्पन भी उसी से कायम हो सकेगा। आज कारगिल के मोर्चे पर रात-दिन बर्फ पर डटे हुए दर्जनों सैनिक सरहद के दोनों तरफ हर बरस बिना गोलियों के भी बर्फ से मारे जाते हैं। तनाव की ऐसी नौबत घटानी चाहिए। दोनों देशों को एक-दूसरे को दुश्मन की तरह देखना बंद करके दोस्तों की तरह रहकर, आपसी कारोबार बढ़ाकर, दोनों तरफ की गरीबी घटाकर, हवा से नफरत घटानी चाहिए।

