30 जून 14
संपादकीय
भारत ने अपने शानदार और गौरवशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत आज फिर एक रॉकेट से कई देशों के उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे हैं। ये देश दुनिया के सबसे विकसित देश हैं, और उनमें से कोई भी तकनीकी क्षमता में, वैज्ञानिक विकास में भारत से पीछे नहीं है। इस पर भी अगर वे भारत के रॉकेट से अंतरिक्ष में अपने उपग्रह भेज रहे हैं, और ऐसा करते हुए भारत की अंतरिक्ष संस्था इसरो को कुछ समय हो भी चुका है, तो यह भारत के लिए गर्व की बात तो है ही, इससे यह सोचने की एक मजबूरी भी सामने आती है कि अंतरिक्ष तक पहुंचा हुआ हिन्दुस्तान आज पखानों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है, नालियों और गटरों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है? यह हिन्दुस्तान क्या अंतरिक्ष में पहुंचकर वहां से इस देश में हर प्रदेश में बिखरी हुई तरह-तरह की सरकारी खामियों और कमियों को क्यों नहीं देख पा रहा है?
बोलचाल की भाषा में किसी आसान काम के बारे में कहा जाता है कि उसे करने के लिए परमाणु बम बनाने के फार्मूले की जरूरत नहीं है। भारत में भी सरकारी काम में सुधार के लिए, शहरों और गांवों की रोज की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए किसी कठिन और जटिल फार्मूले की जरूरत नहीं है, इस देश के भीतर विज्ञान से लेकर तकनीक तक, और मैनेजमेंट से लेकर मार्केटिंग तक इतने किस्म की कामयाब मिसालें हैं, कि उनकी नकल करके भी यह देश आगे बढ़ सकता है। गुजरात में अमूल नाम का देश का एक सबसे कामयाब प्रोजेक्ट चल रहा है, जो दशकों से इसी भ्रष्ट देश के भीतर भी पूरी कामयाबी से अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर रहा है। इस सफलता से सीख कर देश के भीतर सौ दूसरी जगहों पर अमूल की डेयरी, और दूध उत्पादक लोग क्यों तैयार नहीं किए जा सकते? गुजरात में जिस जगह पर यह है, वहां जैसी हवा-पानी और बाकी सहूलियतें देश में जगह-जगह हो सकती हैं, लेकिन एक के बाद दूसरा अमूल इस देश में नहीं हो सका। इस देश में दिल्ली की एक मेट्रो के बाद कई दूसरे शहरों में मेट्रो बन रही है, और चल रही है। इस सामूहिक यातायात सुविधा ने महानगरों को एक नई जिंदगी दी है। और एक के बाद दूसरा शहर मेट्रो की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन अमूल डेयरी जैसे सफल प्रयोग बाकी देश में कहीं नहीं दुहराए जा सके।
अंतरिक्ष के मोर्चे पर भारत की कामयाबी को देखकर यह भी लगता है कि लोगों की जिंदगी में कई तरह की सुविधाओं को लेकर, सरकार के कामकाज को लेकर उत्कृष्टता के इसरो जैसे पैमाने क्यों नहीं गढ़े जा सकते? आज अगर दुनिया के दर्जनों देश अपने महंगे उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए भारत के कामयाब रॉकेटों पर भरोसा करते हैं, तो यह तकनीकी उत्कृष्टता इसी देश की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को क्यों नहीं लाई जा सकती? जब इसी देश के नौजवान दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों तक पहुंचकर, वहां रिकॉर्ड कायम करते हैं, और दुनिया की सबसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुखिया भी बनाए जाते हैं, तो फिर वह उत्कृष्टता भारत में क्यों नहीं लाई जा सकती? अभी चार दिन पहले ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भोपाल में एक भाषण में इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि भारत के विश्वविद्यालयों का स्तर अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर कहीं नहीं टिकता। और भारत के ही छात्र-छात्रा दूसरे देशों में जाकर किसी भी दूसरे देश के नौजवानों के मुकाबले आसानी से खड़े रहते हैं। इस हकीकत के पीछे हमको भारतीय शिक्षा व्यवस्था में उत्कृष्टता की कमी साफ-साफ जिम्मेदार दिखती है।
आज जब यह देश इसरो की कामयाबी पर खुशी मना रहा है, तो करीब-करीब हर नागरिक की जिंदगी में कोई न कोई खामी या कमी उसकी जिंदगी से खुशियां छीन भी रही हैं। लोगों को सरकारी दफ्तरों से लेकर सार्वजनिक जगहों तक, कारोबार से लेकर सामाजिक व्यवहार तक उत्कृष्टता की कमी झेलनी पड़ती है, और अंतरिक्ष में सफलता के बाद जब इस धरती पर असफलता कदम-कदम पर दर्ज होती है, तो वह और अधिक चुभती है। भारत को अपने हर पहलू में बेहतर पैमाने लागू करने, और उन पर ऊपर जाने की कोशिश करनी चाहिए।





