नौकर-नौकरानियों पर जुल्म ढहाने वालों को कैद भी हो, और उनकी दौलत भी छिने
31 अगस्त 2022
झारखंड की राजधानी रांची में पुलिस ने एक
शिकायत के बाद भाजपा की एक महिला नेता सीमा पात्रा को गिरफ्तार किया है जिस
पर अपनी घरेलू नौकरानी को बंधुआ मजदूर बनाकर रखने और उसकी भयानक प्रताडऩा
करने का आरोप है। यह महिला भाजपा महिला विंग की राष्ट्रीय कार्यसमिति की
सदस्य हैं, और उन्हें इस शिकायत के सामने आने के बाद बीजेपी ने निलंबित
किया है। इस महिला के पति एक रिटायर्ड आईएएस अफसर हैं, और इसका बेटा अपनी
मां के जुर्म से असहमत था, और उसी से यह जानकारी बाहर निकली, और पुलिस ने
जाकर किसी तरह उस आदिवासी नौकरानी को कैद से निकाला जिसे यह महिला गर्म तवे
और डंडों से पीटती थी जिससे उसके दांत भी टूट गए थे, और वह बहुत खराब
शारीरिक-मानसिक हालत में आठ बरस से कैद थी। झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने
भी इस पूरे मामले के उजागर होने पर राज्य के पुलिस प्रमुख से पूछा है कि
इस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई है। इस महिला नौकरानी ने मजिस्ट्रेट के
सामने पूरा बयान दिया है।
घरेलू नौकरों को बंधुआ मजदूर की तरह रखकर उन पर तरह-तरह के जुल्म ढहाते हुए उनसे अमानवीय काम करवाना बहुत अनोखी बात नहीं है। गांव से जो नौकरों को लाकर शहरों में रखते हैं, वे बहुत से मामलों में उन्हें बंधुआ मजदूर से बेहतर नहीं रखते। न उन्हें इंसानों की तरह जीने की सहूलियत रहती, न नौकरी और तनख्वाह की कोई गारंटी रहती, और न ही इलाज या किसी और तरह के कानूनी अधिकार उन्हें मिलते हैं। गांव में भी घरवाले इतनी कमजोर आर्थिक स्थिति के रहते हैं कि किसी को शहर में जिंदा रहने लायक काम ही मिल जाए, तो उसे वे बहुत समझ लेते हैं। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों, कुछ पहाड़ी इलाकों, और अधिकतर आदिवासी इलाकों से लडक़े-लड़कियों को गुलाम की तरह ले जाया जाता है, और वे गांव के मुकाबले बेहतर जिंदगी की उम्मीद में चले जाते हैं। इनमें से कई लोग तो ईसाई स्कूलों की मेहरबानी से कुछ पढ़े-लिखे भी होते हैं, और उन्हें लगता है कि वे एक बार शहर पहुंच जाएंगे, तो ऊपर का सफर वे खुद तय कर लेंगे। लेकिन शहर बेरहम होता है, और अड़ोस-पड़ोस के लोग बेबस नौकर-नौकरानी पर, बाल मजदूरों पर जुल्म देखते हुए भी चुप रहते हैं, क्योंकि उनके मालिक पड़ोसियों के वर्ग-मित्र रहते हैं, और उनसे बुराई भला क्यों मोल ली जाए।
अभी झारखंड की राजधानी रांची में जुल्म की शिकार इस गरीब आदिवासी का मामला सामने आया है जो कि उसी राज्य की रहने वाली थी। जब ऐसे लोग महानगरों में जाकर वहां संपन्न घरों में बंधुआ मजदूरी करते हैं, तो वे और अधिक कमजोर और बेबस हो जाते हैं। वे अपने इलाके से, अपनी जुबान से बहुत दूर चले जाते हैं, और महानगरों की हमदर्दी किसी कमजोर के साथ रहती नहीं है। नतीजा यह होता है कि बहुत से मामलों में ऐसे मजदूर लडक़े-लड़कियों का देह शोषण भी होता है, और उन्हीं में से हर बरस दसियों हजार लोगों को देह के धंधे में धकेलकर कई लोग कमाई कर लेते हैं। ये दोनों-तीनों किस्म के मामले मिले-जुले रहते हंै, और कब घरेलू जुल्म से निकलकर इनमें से कुछ लड़कियां रेड लाईट एरिया पहुंच जाती हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता।
कुछ प्रदेशों में अगर ऐसा कानून होगा भी तो भी उस पर अमल जरा भी नहीं है कि घरेलू नौकर-नौकरानी की पूरी जानकारी करीब के थाने में दी जाए, और कोई सरकारी अमला या सामाजिक कार्यकर्ता बीच में कभी जाकर ऐसे नौकरों का हालचाल पूछकर आएं, यह समझकर आएं कि उन्हें किन स्थितियों में रहना पड़ रहा है, उनकी पूरी तनख्वाह मिलती है या नहीं। आज सरकारों के श्रम विभाग भी सिर्फ संगठित मजदूरों वाले संस्थानों तक अपनी दिलचस्पी सीमित रखते हैं, घरेलू नौकर-नौकरानी, या घरों में पूरे वक्त के लिए रखे जाने वाले दूसरे कामगार किसी तरह के कानूनी अधिकार नहीं पाते हैं। राज्यों को अधिक सुधारवादी रूख अपनाना चाहिए, और इस बात को दंडनीय अपराध बनाना चाहिए, अगर सरकार को लिखित जानकारी दिए बिना लोग घरेलू या व्यापारी संस्थानों में नौकर रखते हैं।
झारखंड और छत्तीसगढ़ उन आदिवासी इलाकों में से सबसे आगे हैं जहां से लड़कियां और महिलाएं महानगरों की प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा बाहर ले जाई जाती हैं, और वहां उन्हें काम से लगाया जाता है, या रेड लाईट एरिया में बेच दिया जाता है। मानव तस्करी के आंकड़े भयानक हैं, और सरकारें इस सामाजिक खतरे को मानने के लिए तैयार नहीं होती हैं क्योंकि दूसरे शहरों में बसे हुए मजदूर किसी पार्टी या नेता के संगठित वोटर नहीं होते हैं। सरकार के साथ-साथ इस बात को रिहायशी इमारतों की भी जिम्मेदारी बनाना चाहिए कि वहां के घरों में काम करने वाले लोगों का पूरा रिकॉर्ड इकट्ठा करके पुलिस को देना वहां के निवासी संघ या बिल्डर की कानूनी जिम्मेदारी रहे। सरकारों को नमूने के तौर पर ऐसे कुछ लोगों पर कार्रवाई करनी भी चाहिए, और ऐसे गैरजिम्मेदार लोगों पर मोटा जुर्माना भी लगाना चाहिए, इसकी खबरें और लोगों पर असर करेंगी।
झारखंड के इस मामले में फंसी हुई महिला भाजपा की ऐसी नेता है जिसका फेसबुक पेज और ट्विटर पेज पिछले कई हफ्तों से सिर्फ तिरंगे झंडे लिए हुए अपनी तस्वीरों वाला है। उसने अलग-अलग नेताओं के साथ, अलग-अलग कार्यक्रमों में अपनी खुद की सैकड़ों तस्वीरें झंडा थामे हुए पोस्ट की हैं। अब घरेलू नौकरानी को गर्म लोहे से पीटना, सलाखों से उसके दांत तोड़ देना, और बाहर तिरंगा यात्रा निकालना, घर-घर तिरंगा फहराना, यह सार्वजनिक जीवन में कथनी और करनी का बहुत बड़ा विरोधाभास है। कानून को कड़ाई से काम करना चाहिए, इस महिला को कई बरस की कैद होनी चाहिए, और इसकी दौलत का एक बड़ा हिस्सा इसकी शिकार महिला को मुआवजे में मिलना चाहिए। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जब कभी अपने विधायकों के साथ राज्य को सुरक्षित पाकर लौट सकें, तब उन्हें वहां की गरीब आदिवासी जनता की सुरक्षा भी करनी चाहिए।
जब हर तरफ निराशा फैली हो तो अपने आपको खबरों से कुछ अलग रखना बेहतर
30 अगस्त 2022
यूक्रेन पर रूस के हमले को छह महीने से अधिक
हो गए हैं। दैत्याकार रूस की सेना के सामने यूक्रेन बहुत छोटा और कमजोर
है, और पश्चिमी हथियार मिलने के बावजूद वह लगातार नुकसान झेल रहा है।
यूक्रेन के काफी हिस्से पर रूसी फौज का कब्जा हो गया है, और यूक्रेन के इन
इलाकों में बचे हुए, मोटेतौर पर बूढ़ों, महिलाओं, और बच्चों की आबादी को
रूस अपने में शामिल करने की कोशिश भी कर रहा है। ऐसी आबादी लगातार जिस तनाव
में जी रही है उसका एक अंदाज इससे लगता है कि जब ऐसे एक यूक्रेनियन से
पूछा गया कि वे ऐसे हालात में किस तरह जी रहे हैं, तो उसने कहा- अपने-आपको
खबरों से दूर रखकर।
जब चारों तरफ बहुत ही बुरी बातें हो रही हों, हौसले को तोडऩे की बात हो रही हो, हैवानियत नाच रही हो, तथाकथित इंसानियत दुबककर बैठ गई हो, तब अपने को खबरों से दूर रखना शायद अपने बचे-खुचे हौसले को बचाए रखने की एक तरकीब हो सकती है। हिन्दुस्तान में भी हम देखत हैं कि बहुत से लोग सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहते हैं, और लगातार वहां आ रही नकारात्मक खबरों को देख-सुनकर वे दिमागी रूप से टूटने लगते हैं। जो लोग थोड़े से संवेदनशील होते हैं, वे कुछ दिनों के लिए सोशल मीडिया से अलग हो जाते हैं। टीवी की खबरों से भी बहुत से लोग परहेज करने लगे हैं क्योंकि किसी नापसंद खबर को छोडक़र आगे बढ़ जाना टीवी पर मुमकिन नहीं होता है। अखबार में तो पन्ना पलटाया जा सकता है, दूसरी खबर पर जाया जा सकता है, ऐसी ही सहूलियत इंटरनेट पर खबरों के साथ रहती है, लेकिन टीवी की खबरें रेल के डिब्बों की तरह एक के बाद एक चलती हैं, और उन्हें छोडक़र आगे नहीं बढ़ा जा सकता। वैसे तो सोशल मीडिया पर भी बाकी इंटरनेट की तरह खबरों को छोडक़र आगे बढ़ा जा सकता है, लेकिन वहां फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म के कम्प्यूटर आपको आपकी पसंदीदा और चुनिंदा चीजें दिखाते चलते हैं, और जब आप उनसे थक चुके रहते हैं, तब भी आपकी थकान का अंदाज लगाने में इन कम्प्यूटरों को कुछ वक्त लग जाता है। फिर यह भी रहता है कि फेसबुक जैसी जगह आप जिन्हें फॉलो करते हैं, या जो आपके दोस्त रहते हैं, उन्हीं की पोस्ट आपको अधिक दिखाई जाती है, और अगर वे किसी एक विचारधारा के हैं तो उनकी हिंसा, या उनकी नफरत, या उनकी निराशा आप तक भी पहुंचती है।
जिस तरह हम बीच-बीच में लिखते हैं कि जिंदगी में धर्म की एक सीमित भूमिका रहनी चाहिए, उसी तरह खबरों की भी एक सीमित जगह रोज की जिंदगी में होनी चाहिए। और जब हम इस जगह को सीमित करने की बात करते हैं, तो पाठक की पसंद और प्राथमिकता की गुंजाइश सबसे ऊपर रहना चाहिए। टीवी के साथ यह बिल्कुल भी नहीं है। रेडियो की खबरों के साथ भी यही दिक्कत है कि गैरजरूरी या नापसंद खबर को छोडक़र आगे बढऩा मुमकिन नहीं है। इसलिए लोगों को खबर पाने, समाचार या विचार पाने के अपने जरिये सोच-समझकर तय करना चाहिए। टीवी के आधे घंटे के एक बुलेटिन में जितनी जानकारी किसी दर्शक को मिलती है, उतनी जानकारी वे दर्शक पाठक बनकर दस मिनट में किसी अखबार या जिम्मेदार वेबसाइट से पा सकते हैं, या तो बीस मिनट बचा सकते हैं, या टीवी के मुकाबले तीन गुना खबरों को जान सकते हैं।
और यह बात हम महज समाचार-विचार के लिए नहीं कह रहे हैं, बल्कि जिंदगी में रोज लोग जितना समय जानकारी, विचार, और मनोरंजन पाने के लिए रखते हैं, उसका बड़ी सावधानी से इस्तेमाल होना चाहिए। अब अगर कोई किताब पढऩा शुरू किया गया है, और वह बेकार निकल गई है, तो उसे पूरा पढऩे की जहमत नहीं उठाई जाती, उसे छोड़ दिया जाता है, और किसी बेहतर किताब को उठाया जाता है। ठीक इसी तरह लोगों को अखबार, या कोई पत्रिका, या टीवी चैनल का समाचार या बहस का कार्यक्रम छांटना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है कि आप धीरे-धीरे वैसे ही इंसान बनने लगते हैं जैसी सोच आप समाचार-विचार, या मनोरंजन से रोज पाते हैं। अगर आप रोज हॅंसने के ऐसे कार्यक्रम देखते हैं जिनमें लोगों के रूप-रंग, उनकी शारीरिक कमजोरियों को लेकर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती है, तो धीरे-धीरे आप असल जिंदगी में भी वैसी खिल्ली उड़ाने वाले बन जाते हैं। आप जिन टीवी चैनलों पर वक्त बर्बाद करते हैं, उन्हीं चैनलों की सोच आपकी भी सोच बन जाती है। इसलिए लोग किन लोगों के बीच रोज बैठते हैं, किन बातों पर बातें करते हैं, उतनी ही अहमियत इस बात को भी देनी चाहिए कि वे रोज क्या देखते और सोचते हैं।
जब ऐसे-ऐसे यार, तब दुश्मन की क्या दरकार...
29 अगस्त 2022
भाजपा सरकार वाले कर्नाटक की आठवीं की एक
सरकारी पाठ्य पुस्तक को लेकर एक दिलचस्प विवाद उठ खड़ा हुआ है। कर्नाटक इन
दिनों विनायक दामोदर सावरकर को महान देशभक्त साबित करने की कोशिशों से गुजर
रहा है, और चूंकि सिर्फ इतने से हवा में साम्प्रदायिक जहर नहीं घुल सकता
था, वहां साथ-साथ टीपू सुल्तान का विरोध भी किया जा रहा है ताकि इस मुद्दे
को हिन्दू-मुस्लिम में तब्दील किया जा सके, मुस्लिमों के ध्रुवीकरण का
सामान पेश किया जा सके, और उसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू ध्रुवीकरण की
उम्मीद की जा सके। इसी सिलसिले में अभी इस किताब का एक हिस्सा सामने आया है
जिसमें यह दावा किया गया है कि सावरकर जब अंडमान की जेल में थे, जहां उनकी
कोठरी में एक चाबी के लिए छेद भी नहीं था, वहां बुलबुल उडक़र कोठरी में
पहुंचती थीं, और सावरकर उनके पंखों पर बैठकर रोज मातृभूमि घूमकर आते थे। अब
जब इस बात को लेकर विवाद हो रहा है तो किताब के बचाव में यह तर्क दिया जा
रहा है कि यह साहित्य की अलंकारिक भाषा है, और उसका शाब्दिक अर्थ निकालना
गलत है। आलोचकों का कहना है कि इस कन्नड़ पाठ्य पुस्तक को सीधी-सपाट भाषा
में लिखा गया है, और इसमें किसी अलंकार या प्रतीक जैसी कोई बात नहीं है। यह
बच्चों के दिमाग में सावरकर की करिश्माई महानता को बैठाने की एक बड़ी
भोथरी कोशिश है, और यह कोशिश अपने आपमें अकेली नहीं है, सावरकर को महान
बताने की कोशिशें गांधी से जुड़े एक सबसे प्रमुख संस्थान की पत्रिका में भी
हाल ही में हुई है।
दरअसल झूठ को फैलाने और स्थापित करने की एक सीमा होनी चाहिए। सावरकर ने देश की आजादी के लिए जब तक, जो कुछ किया था, उसका सम्मान इंदिरा गांधी के समय भी हो चुका है जब प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने सावरकर पर डाक टिकट निकाली थी। और सावरकर की तारीफ भी की थी। लेकिन हकीकत यह है कि सावरकर का जीवन दो अलग-अलग हिस्सों में महानता और पलायन में बंटा हुआ था। एक वक्त उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ काम किया, और उस वजह से उन्हें कालापानी की सजा देकर अंडमान जेल में बंद किया गया था। लेकिन जेल में रहते हुए सावरकर ने अंग्रेज सरकार पर माफीनामों और रहम की अपीलों की बौछार कर दी थी। कुछ इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने कम से कम आधा दर्ज दया याचिकाएं भेजी थी जिनमें से पहली तो जेल में छह महीने गुजारने के बाद ही चली गई थी। इन दया याचिकाओं में सावरकर ने अंग्रेज सरकार की किसी भी रूप में सेवा करने का मौका देने की अपील की थी, और कहा था कि वे राह से भटके हुए और लोगों को भी सरकार की तरफ लेकर आएंगे। आज जिस गांधी-स्मृति की पत्रिका में केन्द्र सरकार के मनोनीत आरएसएस के ट्रस्टी सावरकर की स्तुति छाप रहे हैं, उसके बारे में इतिहासकारों ने लिखा है कि सावरकर खुलेआम गांधी को गालियां देते थे, और गांधी के लिए उनका दिल नफरत से भरा हुआ था। यह एक और बात थी कि सावरकर की रहम की अपीलें अंग्रेज सरकार के पास जाने का दौर शुरू हो जाने के बाद उनके भाई की चिट्ठियों में की गई अपील के जवाब में गांधी ने महज यह सुझाया था कि सावरकर को केस की जानकारी देते हुए किस तरह अपील करनी चाहिए। गांधी के इस जवाब को आज इस तरह प्रचारित किया जा रहा है कि मानो गांधी ने सावरकर को रहम की अपील करना सुझाया था। जबकि गांधी से सावरकर के भाई के पहले संपर्क के चार बरस पहले सावरकर का पहला माफीनामा अंग्रेज सरकार को पहुंच चुका था। सावरकर की जिंदगी के शुरू के एक हिस्से में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में उनकी हिस्सेदारी को लेकर जब-जब उनके गौरवगान की कोशिश होगी, तब-तब लोगों को उनकी आगे की जिंदगी याद आएगी, याद दिलाई जाएगी कि अंग्रेजों से रहम की अपील में उन्होंने क्या-क्या लिखा था, और किस तरह अंग्रेज सरकार से वे बरसों तक माहवारी पेंशन पाते थे। जिस वक्त देश के हजारों स्वतंत्रता सेनानी जेलों में कैद थे, उस वक्त सावरकर अंग्रेज सरकार की वफादारी और उसकी सेवा करने का लिखित वायदा करके जेल के बाहर आए थे, और अंग्रेजी पेंशन पर रहते थे।
दरअसल यह दिक्कत सावरकर के साथ ही नहीं है, सार्वजनिक जीवन के बहुत से लोगों के साथ ऐसा होता है कि जब वे आसमान जैसी ऊंचाई पर पहुंचते हैं, और वहां से नीचे गिरते हैं, तो बहुत नीचे गिर जाते हैं। उनकी जिंदगी को मिलाजुला ही देखना चाहिए। जब कभी कोई उन्हें महज आसमान तक ले जाकर वहीं एक सिंहासन पर बिठा देना चाहेंगे, तो लोग तुरंत याद करेंगे कि वे कितने नीचे भी गिरे हुए थे। और फिर जो लोग इतिहास का हिस्सा हो चुके हैं, उन लोगों का समग्र मूल्यांकन अगर अभी नहीं होगा, और अभी भी अगर सिर्फ उनकी अच्छी बातें ही गिनी जाएंगी, तो फिर वे एक विचारधारा के महज प्रचार के लिए बनाए गए मुखौटे रह जाएंगे। जेल के नियमों में माफी मांगकर बाहर निकलने की कोशिश तो रहती है, लेकिन यह तो लोगों की अपनी पसंद रहती है कि वे अंग्रेजों से माफी मांगें, या रहम की भीख मांगें, या जलियांवाला बाग जैसे भयानक हत्याकांड करने वाले अंग्रेजों से पेंशन लें, या फिर वे जेल की सलाखों के पीछे मरने के लिए तैयार रहें। सावरकर ने अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह किया था, और आज उनकी स्मृतियों को इन्हीं का भुगतान करना पड़ रहा है। जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, जब भगतसिंह जैसे नौजवान सीना ताने हुए देशभक्ति के गाने गाते हुए किसी भी रहम की अपील से दूर खुशी-खुशी फांसी पर झूल गए, तो वैसे दौर के सावरकर की रहम की अपीलों और अंग्रेजों की सेवा करने की गिड़गिड़ाहट को कैसे भुलाया जा सकता है। सावरकर को देश के इतिहास की किताबों में छोड़ देना चाहिए। आज स्कूली किताबों के रास्ते सावरकर को महान साबित करने की कोशिशें जब-जब होंगी, तब-तब सावरकर की अंग्रेजों की चापलूसी और रहम की भीख भी लोगों को याद आएगी। आज सावरकर को महान साबित करने वाले उनका भला नहीं कर रहे हैं, वे इतिहास के पन्नों को बार-बार सामने लाने को मजबूर कर रहे हैं कि आज वीर कहा जाने वाला यह आदमी किस कदर कमजोर था, और उसने किस तरह रिहाई की भीख मांगी थी।
एक चर्च ऐसा विवादित कि उससे जुड़े बड़े-बड़े मंत्री बर्खास्त करने पड़े!
28 अगस्त 2022
कुछ दिन पहले जापान में एक चुनाव प्रचार में
लगे हुए वहां के एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री शिंजो एब पर एक नौजवान ने
सार्वजनिक जगह पर ही घरेलू बनाई बंदूक से हमला कर दिया था, और इन्हीं
जख्मों से शिंजो की मौत हो गई थी। अब खबर आई है कि इस हत्यारे ने इसलिए
कत्ल किया था कि शिंजो जापान के एक विवादित धार्मिक सम्प्रदाय, यूनिफिकेशन
चर्च से जुड़े हुए थे, और हत्यारे की मां ने अपनी पूरी दौलत चर्च को दान कर
दी थी, और इससे वह भयानक गरीबी का शिकार हो गया था। अब जब हत्यारे के
कम्प्यूटर से यह चिट्ठी मिली है तो इस चर्च की तरफ लोगों का ध्यान गया है,
और यह खबर भी सामने आई कि जापान के मौजूदा प्रधानमंत्री फुकियो किशिदा ने
हाल ही में अपने कई मंत्रियों को इस वजह से बर्खास्त कर दिया है कि वे इसी
विवादास्पद यूनिफिकेशन चर्चा से जुड़े हुए थे।
ईसाई धर्म के तहत बहुत से अलग-अलग किस्म के सम्प्रदायों वाले अलग-अलग चर्च रहते हैं, इनकी रीति-नीति अलग रहती है, और इनके धार्मिक संस्कारों में भी फर्क रहता है। कुछ देशों में तो इस किस्म के चर्च भी हैं जो कि पूरी तरह से अंधविश्वासों पर भरोसा करते हैं, और वहां की प्रार्थना सभाओं में लोग अजगर और सांप लेकर नाचते हैं। यूनिफिकेशन चर्च नाम का यह नया धार्मिक आंदोलन दक्षिण कोरिया के सियोल में 1954 में शुरू हुआ और इसके तीस लाख सदस्य बताए जाते हैं। कोरिया और जापान बौद्ध धर्म से भी जुड़े हुए देश हैं, लेकिन इस ईसाई चर्च की कुछ नीतियों की वजह से इसे खतरनाक सम्प्रदाय भी माना जाता है। विकीपीडिया की जानकारी के मुताबिक यह चर्च राजनीति में खुलकर हिस्सा लेता है, यह घोर साम्यवादविरोधी चर्च है, और यह शैक्षणिक, राजनीतिक, और कारोबारी संगठनों से भी जुड़ा रहता है। यह चर्च उत्तर और दक्षिण कोरिया को एक करने के राजनीतिक अभियान में भी लगे रहता है, और यह अपने कोरियाई और जापानी अनुयाईयों के बीच बड़े-बड़े सामूहिक विवाह करवाता है ताकि दोनों देशों के बीच एकता बढ़ सके।
लेकिन इस चर्च पर अधिक लिखने का हमारा इरादा नहीं है। हम सिर्फ एक ऐसी खतरनाक नौबत के बारे में लिखना चाहते हैं जिसकी राजनीतिक सरगर्मी से उसके धार्मिक पहलू का नुकसान हो रहा है, और उसके साथ संबंधों को लेकर एक देश की सत्तारूढ़ पार्टी तोहमतें झेल रही है, और उसके मंत्रियों को बर्खास्त करना पड़ रहा है। और तो और अभी कातिल का शिकार बने पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो एब के भाई को भी मंत्री पद खोना पड़ा क्योंकि जनता इस चर्च को लेकर बौराई हुई है। जापान की इन बातों से दुनिया के बाकी देशों को भी सबक लेना चाहिए कि धर्म और राजनीति का घालमेल लोगों को कहां ले जा सकता है। अभी तक हमने इस्लामिक आतंकी संगठनों की दुनिया भर में हिंसक वारदातें देखी हैं, और म्यांमार और श्रीलंका जैसे देशों में बौद्ध लोगों की की गई हिंसा के शिकार मुस्लिमों और तमिलों को भी देखा है। हिंदुस्तान में हिंदू हिंसक संगठनों की जगह-जगह की जा रही हिंसा बीच-बीच में सामने आते ही रहती है। इजराइल में यहूदियों की कट्टरता पूरी तरह से फिलिस्तीन पर हो रहे जुल्मों के साथ रहती है।
दुनिया में धर्म का इतिहास हमेशा से हिंसक रहा है। एक ही धर्म के भीतर अलग-अलग सम्प्रदायों के लोग एक-दूसरे को मारने में भी लगे रहते हैं। ईरान से लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक हर कहीं मुस्लिमों के बीच एक-दूसरे को सम्प्रदायों के नाम पर मारने की होड़ लगी रहती है। हिंदुस्तान का पुराना इतिहास बताता है कि किस तरह अपने आप के शांतिप्रिय होने का दावा करने वाले हिंदू और बौद्ध सम्प्रदायों के बीच एक-दूसरे के सिर काटने का मुकाबला चलता था। इसलिए आज जब जापान के इन ताजा विवादों से यह बात सामने आ रही है कि किस तरह धर्म और राजनीति, धर्म और कारोबार का घालमेल न सिर्फ जानलेवा हो सकता है, बल्कि वह देश के लोगों के भीतर ऐसे धर्म के लिए नफरत भी खड़ी कर सकता है।
गुलाम नबी आजाद को छोड़ें, लेकिन उनके उठाए मुद्दे नहीं
27 अगस्त 2022
कांग्रेस छोडऩे वाले पार्टी के एक सबसे
पुराने और बड़े नेता गुलाम नबी आजाद पर पार्टी नेताओं के हमले का पहला दौर
हो चुका है, और कांग्रेस की कल की प्रेस कांफ्रेंस इस मायने में कुछ गलत
होते दिख रही है कि आज गुलाम नबी आजाद ने कश्मीर में नई पार्टी बनाने का
ऐलान किया है, और कहा है कि वे भाजपा में नहीं जा रहे। कल ही कांग्रेस
प्रवक्ता जयराम रमेश ने तीखे शब्दों में कहा था कि गुलाम नबी आजाद का डीएनए
मोदीफाईड हो गया है। कांग्रेस पार्टी का हक बनता था कि पूरी जिंदगी उसके
भीतर महत्व पाने वाले आजाद के इस तरह आरोप लगाकर जाने के बाद उनके खिलाफ
मनचाही बातें की जाएं, उन्हें धोखेबाज करार दिया जाए, यह भी कहा जाए कि
दिल्ली में बंगला बने रहने के लालच में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ी है।
आने वाले दिनों में गुलाम नबी आजाद के खिलाफ और भी सौ किस्म की बातें हो
सकती हैं। उसमें भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि राजनीति में साथ छोडक़र जाने
वाले अगर आरोप लगाते हुए जाते हैं, तो उनके खिलाफ भी आरोप लग सकते हैं।
लेकिन फिलहाल हम गुलाम नबी आजाद नाम के इंसान से परे, उनकी कही हुई बातों पर चर्चा करना चाहते हैं जो कि महज उनके दिमाग में ही नहीं है, बहुतों के दिमाग में है। दो बरस पहले जिस तरह कांग्रेस के 23 प्रमुख नेताओं के, जी-23 समूह ने सोनिया गांधी को एक चिट्टी लिखकर पार्टी की दशा और दिशा पर सवाल खड़े किए थे, कुछ मांगें रखी थीं, और कुछ सलाह दी थी, उसमें आजाद अकेले नहीं थे। उस चिट्ठी में दस्तखत करने वाले लोगों मेें से दो-चार अब पार्टी में नहीं हैं, और एक-दो शायद पार्टी के पदाधिकारी बना दिए गए हैं, लेकिन उस चिट्ठी पर अफसोस जाहिर करने वाले भी कोई नहीं है। जिन्होंने उसे लिखा था वे उसके साथ कायम हैं। उस चिट्ठी पर उस वक्त इसी जगह पर लिखना हो चुका था, इसलिए आज उसे दुहराने के बजाय आज गुलाम नबी आजाद के उठाए गए मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए। इन मुद्दों पर चर्चा आजाद के किसी हक को लेकर नहीं होनी चाहिए, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भले के लिए बात होनी चाहिए। और ईमानदारी की बात तो यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव को हारने के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह पार्टी और अपने खुद के भले के लिए अध्यक्ष पद छोड़ा था, और उनके परिवार से बाहर के किसी को अध्यक्ष बनाने की मांग की थी, उस पर पार्टी के ही बहुत से चापलूस नेताओं ने अमल नहीं होने दिया। उसका नतीजा आगे देखने मिला जब कांग्रेस ने एक-एक करके तकरीबन तमाम राज्य खो दिए, और अपनी बुनियाद, उत्तरप्रदेश में तो अब उसका नामलेवा भी नहीं दिखता है। ऐसी नौबत में भी अगर आज आधी सदी पार्टी में गुजारने वाले, छोड़क़र जा रहे एक नेता के उठाए मुद्दों को अगर उसके नाम की तख्ती सहित कचरे की टोकरी में डाल दिया जाएगा, तो पार्टी को न अपने भविष्य की फिक्र है, न ही अपने वर्तमान की।
गुलाम नबी आजाद ने जो लिखा है, वह बात कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता बंद कमरों में करते हैं, और जब उन्हें घुटन अधिक होती है, किसी दूसरी पार्टी में संभावना अधिक दिखती है, तो वे वहां भी चले जाते हैं। भारत की आज की राजनीति में इस आवाजाही में कुछ भी अटपटा नहीं है, और हो सकता है कि कांग्रेस से अभी लोगों का जाना जारी भी रहे। इसलिए भी इस पार्टी को अपने बचे हुए जनाधार, बचे हुए नेताओं, बची हुई इज्जत, और बची हुई संभावना की फिक्र करते हुए आजाद की लिखी बातों पर सोचना चाहिए। यह कहते हुए हम पल भर के लिए भी यह नहीं मानते कि कांग्रेस के भीतर के जिस चापलूस और चाटुकार गिरोह का आजाद ने विरोध किया है, वे खुद भी संजय गांधी के वक्त से ऐसे ही गिरोह के सदस्य नहीं थे। लेकिन पार्टी छोड़ते वक्त श्मशान वैराग्य की तरह, या कि निकलते हुए चेहरा छुपाने के लिए तोहमतों का जो नकाब उन्होंने ओढ़ा है, उस पर चर्चा कांग्रेस को अपने भले के लिए करनी चाहिए, गुलाम नबी आजाद तो अपने भले की फिक्र खुद कर लेंगे।
उन्होंने चिट्टी में लिखा है कि कांग्रेस आज अपरिपक्व लोगों के हाथों में है, और इसकी सबसे बड़ी मिसाल है कि राहुल गांधी ने मीडिया के सामने (मनमोहन सिंह सरकार के) एक सरकारी अध्यादेश को फाडक़र फेंका था, जिसे कि कांग्रेस के अनुभवी नेताओं ने गहन विचार-विमर्श करके तैयार किया था। उन्होंने इस हरकत को बचकाना करार देते हुए कहा- इस हरकत की वजह से प्रधानमंत्री और भारत सरकार की गरिमा को भारी ठेस पहुंची। आजाद की लिखी हुई यह बात थोड़ी सी अधूरी भी है। वह अध्यादेश अकेले कांग्रेस पार्टी का नहीं था, वह यूपीए मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर था जिसमें दूसरी पार्टियां भी शामिल थीं, और किसी भी एक पार्टी के किसी भी नेता को उसे फाडक़र फेंकने का हक नहीं था, जिसके बाद कि उसकी इस मनमानी को सरकार को मानना भी पड़ा था। यह पूरे गठबंधन का अपमान था।
लोगों को यह याद रहना चाहिए कि 2019 का आम चुनाव हारने के बाद जब कांग्रेस पार्टी के भीतर एक चिंतन शिविर करने की बात उठी, तो राजस्थान में मई के महीने में हुए इस आयोजन में उसका नाम ही बदलकर नवसंकल्प चिंतन शिविर कर दिया गया था। जरूरत चिंतन की थी, लेकिन आयोजन को नवसंकल्प का मौका बना दिया गया था, उसमें हारे हुए चुनाव के बारे में कोई भी चर्चा नहीं हुई थी, बस आगे क्या-क्या करना है वही बात हुई थी। लोगों को यह भी याद होगा कि उसमें राहुल गांधी ने बिना किसी प्रसंग के क्षेत्रीय पार्टियों के खिलाफ बहुत कुछ कहा था, और उससे कांग्रेस के साथीदल हक्का-बक्का भी रह गए थे।
गुलाम नबी आजाद ने साफ-साफ लिखा है कि सोनिया गांधी महज नाम की अध्यक्ष हैं, और सारे महत्वपूर्ण फैसले राहुल गांधी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब पार्टी के 22 बड़े नेताओं ने पार्टी की बदहाली की तरफ सोनिया गांधी का ध्यान खींचने के लिए चिट्ठी लिखी, तो चाटुकारों की मंडली ने उन पर हमला बोला, उन्हें विलेन बनाने की कोशिश की, बहुत बुरी तरह अपमानित किया गया, इन्हीं के इशारे पर जम्मू में उनका जनाजा निकाला गया, और जिन लोगों ने यह काम किया उनकी तारीफ पार्टी के महासचिवों और राहुल गांधी ने की। उन्होंने गांधी परिवार के लिए कानूनी मामले लडऩे वाले पार्टी के एक बहुत पुराने और वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल पर भी चापलूसों द्वारा हमला करने का जिक्र चिट्ठी में किया है। उन्होंने यह भी लिखा है कि यह दुर्दशा इसलिए हुई क्योंकि पार्टी के ऊपर एक ऐसे आदमी (राहुल गांधी) को थोप दिया गया है जो गंभीर नहीं है।
इन बातों को गुलाम नबी आजाद के दस्तखत से हटाकर देखें, तो इनमें कुछ भी नाजायज और अटपटा नहीं है। कांग्रेस पार्टी अगर यह कहती है कि वह ऐतिहासि चुनौती से गुजर रही है, गरीबों के लिए लड़ रही है, साम्प्रदायिकता और तानाशाही के खिलाफ लड़ रही है, और ऐसे में पार्टी छोडक़र जाना इन तमाम सिद्धांतों से गद्दारी है, तो पार्टी को यह भी सोचना चाहिए कि ऐसी ‘गद्दारी’ की नौबत न आने देने के लिए उसने क्या किया है? जी-23 नेताओं ने पार्टी को जो चिट्ठी लिखी उसकी तकरीबन तमाम ही जायज बातों में से किस पर कुछ किया गया? अभी-अभी एक अलग इंटरव्यू में कांग्रेस के एक और बड़े नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि उन्हें कई सालों से राहुल गांधी से मिलने का समय नहीं मिल पाया है। कुछ ऐसी ही बात पंजाब के मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कही थी। अब अगर बिना किसी ओहदे पर रहते हुए अगर पार्टी के तमाम फैसले राहुल गांधी ही कर रहे हैं, और वे बरसों तक पार्टी के बड़े नेताओं को मिलने का समय भी नहीं दे रहे हैं, वे नियमित रूप से अनियमित रहने वाले पार्टी नेता हैं, तो ऐसे में कोई किस उम्मीद से इस कांग्रेस में रह सकते हैं? आज भारत की चुनावी राजनीति ओवरटाईम करने वाले मोदी-शाह के मुकाबले की है, और यह राजनीति पार्टटाईम काम से नहीं चल सकती है।
हेमंत सोरेन का जो भी हो, सोचें कि यह नौबत क्यों?
26 अगस्त 2022
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लेकर
ऐसी खबरें हैं कि चुनाव आयोग ने उन्हें भ्रष्ट आचरण का दोषी पाकर विधानसभा
की उनकी सदस्यता खारिज कर देने की सिफारिश की है, या उन्हें अपात्र घोषित
कर दिया है। चुनाव आयोग को यह मामला झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने भेजा
था, और खबरें हैं कि आयोग ने सीलबंद लिफाफे में अपना फैसला राज्यपाल को
भेजा है जो कि अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। इस बीच अलग से खबरें आ रही
हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने विधायकों की बैठक लेना शुरू कर
दिया है। ऐसी चर्चा है कि अगर उनके हटने की नौबत आती है, तो वे अपनी पत्नी
को गठबंधन सरकार की मुख्यमंत्री बना सकते हैं। फिलहाल हम यहां इस बढ़ते और
बदलते हुए घटनाक्रम पर नहीं लिख रहे हैं, बल्कि उन वजहों पर लिख रहे हैं
जिनकी वजह से यह नौबत आई है।
देश
के कुछ विपक्षी राज्यों को लेकर हाल के बरसों में यह चर्चा बहुत बुरी तरह
बढ़ी है कि केन्द्र की मोदी-सरकार की अगुवाई में इंकम टैक्स, ईडी, और
सीबीआई जैसी एजेंसियां लगातार विपक्षी नेताओं को घेरती हैं, और वे अगर
भाजपा में शामिल हो जाते हैं, तो उनके खिलाफ जांच थम भी जाती है। कल ही
दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता ने ऐसे कई भूतपूर्व गैरभाजपाई
नेताओं के नाम गिनाए जिनके खिलाफ बड़े-बड़े मामले दर्ज हुए, लेकिन वे भाजपा
में आ गए, तो उन मामलों को इन्हीं एजेंसियों ने किनारे धर दिया। लेकिन ये
आरोप पिछले कई बरसों से लग रहे हैं, इसलिए आज यहां पर एक दूसरे पहलू पर
चर्चा करने की जरूरत है।
हमने अभी कुछ महीने पहले पश्चिम बंगाल के
मामले में देखा कि ममता बैनर्जी के एक विवादित मंत्री की एक महिला मित्र के
दो मकानों से 50 करोड़ रूपये की नगदी बरामद हुई। यह रकम अविश्वसनीय किस्म
की है, और किसी नेता से जुड़े मामलों में इतनी बड़ी बरामदगी देश में पहली
बार हुई। ममता के कई दूसरे मंत्री और नेता पिछले बरसों में चिटफंड कंपनियों
के मामलों में फंसे, और फिर उनमें से कुछ भाजपा में जाकर राहत हासिल पाने
में कामयाब हुए। लेकिन यह बात तो अपनी जगह थी ही कि वे लोग ऐसे मामलों में
शामिल थे। खुद ममता बैनर्जी देश में सबसे अधिक सादगी से जीने वाली नेता
हैं, लेकिन उनके करीबी सत्तारूढ़ नेता मोटी कमाई के काम में लगे मिले हैं,
और मंत्री रहते हुए अभी कुछ हफ्ते पहले जो गिरफ्तारी हुई है, और जितनी रकम
मिली है, वह ममता बैनर्जी की राष्ट्रीय छवि और संभावना दोनों को बर्बाद
करने का सामान भी है।
अब महाराष्ट्र के बहुत से नेताओं को देखें, तो संजय राऊत जैसे शिवसेना के एक सबसे दिग्गज नेता के बारे में वहां की जमीन को लेकर जिस तरह के घोटाले की खबरें आ रही हैं, वे संजय राऊत और शिवसेना दोनों की साख को खराब करती हैं। यह पूरी तरह से मुमकिन है कि केन्द्र सरकार की एजेंसियां छांट-छांटकर भाजपा के विरोधियों के दरवाजे जा रही हैं, लेकिन इस बात को भी समझने की जरूरत है कि क्या ये एजेंसियां किसी ईमानदार नेता के घर भी जा रही हैं? हेमंत सोरेन से जुड़े हुए कुछ लोगों पर कुछ महीने पहले भी छापे पड़े थे, अब जिस मामले को लेकर चुनाव आयोग से उनकी अपात्रता की चर्चा है वह मामला भ्रष्ट आचरण का है जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए एक खदान अपने ही नाम आबंटित कर ली, जो कि बहुत बचकाने किस्म का लालच था, और बहुत ही सतही दर्जे की बेवकूफी भी थी। कोई व्यक्ति कुर्सी पर रहते हुए अपने को ही कुछ आबंटित कर दे, तो वह तो भ्रष्ट आचरण है ही। अब चुनाव आयोग केन्द्र सरकार की एक एजेंसी नहीं है, और उसने उसे मिली हुई शिकायत पर यह कार्रवाई अगर की है, तो हेमंत सोरेन की एक गलती, या उसके एक गलत काम की वजह से ही ऐसा हो पाया है।
हम राजनीतिक बदले की भावना से अपने से असहमति रखने वाले लोगों पर केन्द्र सरकार की कार्रवाई से इंकार नहीं कर रहे, लेकिन ऐसे असहमत नेताओं में से जो भ्रष्टाचार में शामिल हैं, या दूसरे किस्म के जुर्म में शामिल हैं, वे अपने आपको कुछ या बहुत हद तक खतरे में तो खुद ही डालते हैं। अब इसी झारखंड की चर्चा करें तो इसी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पिता शीबू सोरेन को 2006 में अपने ही एक भूतपूर्व निजी सहायक के अपहरण और कत्ल के मामले में कुसूरवार पाया गया था। वे उस समय मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में कोयला मंत्री थे, और देश के इतिहास में पहली बार एक केन्द्रीय मंत्री को हत्यारा करार दिया गया था। उन्हें उम्रकैद सुनाई गई थी, और अदालत ने उन्हें जमानत भी नहीं दी थी। लेकिन जल्द ही हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था। उनके साथ और भी कई तरह के विवाद जुड़े हुए थे, और उस वक्त तो वे केन्द्रीय मंत्री थे, और जांच सीबीआई ने ही करके उन्हें हत्या में शामिल साबित किया था।
बगल के बिहार में लालू यादव कई मामलों में सजा पाकर, इलाज की छुट्टी पर अभी घर बैठे हैं, कुछ और मामलों में उन्हें सजा होने के आसार भी हैं, और यह सब उनके अपने ही कुकर्मों की वजह से हुआ है। इसलिए उन पर अगर छापे पड़ रहे हैं, तो वे बदनीयत तो हो सकते हैं, लेकिन उनका खतरा तो लालू यादव और उनके परिवार का खुद ही का खड़ा किया हुआ है। ऐसा हाल महाराष्ट्र में एनसीपी के कई नेताओं का है, या दूसरे कई प्रदेशों में भी है। जब सत्ता की ताकत लोगों को पकड़ में आने लायक परले दर्जे के भ्रष्टाचार करने का हौसला भी देती है, तो फिर वे अपने आपको आसान निशाना बनाकर पेश कर देते हैं, और उसके बाद यह महज वक्त की बात रहती है कि उनसे असहमत और सत्तारूढ़ राजनीतिक ताकत कब उनके घर अपनी एजेंसियों को पहुंचाती है। इसी देश की राजनीति में कई ऐसे मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री भी रहे हैं जिनके बारे में किसी भ्रष्टाचार की कल्पना भी किसी ने नहीं की, और जो कार्यकाल खत्म होने के बाद एक रिक्शे में सामान लादकर सरकारी घर छोडक़र चले गए थे।
हम किसी केन्द्र या किसी राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा बदनीयत से की जा रही कार्रवाई का बचाव करना नहीं चाहते, लेकिन सार्वजनिक जीवन के लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि वे क्या भ्रष्टाचार से जरा भी दूर नहीं रह सकते? और आज जब देश में असहमति के खिलाफ जांच एजेंसियों का माहौल बना हुआ है, तो यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या ऐसी जांच और कार्रवाई के दबाव में देश में भ्रष्टाचार कुछ कम भी हो सकता है? यह एक अलग बात है कि टैक्स और कालेधन से जुड़े हुए मामलों की जांच और उन पर कार्रवाई करने की एजेंसियां सिर्फ केन्द्र सरकार के हाथ हैं, और वहां सत्तारूढ़ पार्टी के राजनीतिक विरोधी ही निशाने पर हैं, लेकिन राज्य सरकारों के हाथ भी कुछ दूसरे किस्म के भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस और कुछ मामूली एजेंसियां हैं। राजनीतिक दलों के बीच पसंद और नापसंद, सहमति और असहमति पर टिकी ऐसी जांच और कार्रवाई देश में राजनीतिक कटुता तो बढ़ा रही हैं, लेकिन हो सकता है कि इससे राजनीति में संगठित और व्यापक भ्रष्टाचार घट भी सके। दिक्कत यही रहेगी कि केन्द्र और अधिकतर राज्यों में जिस एक पार्टी की सरकार है, उसके भ्रष्ट लोगों पर कोई कार्रवाई मुमकिन नहीं हो सकेगी। लेकिन लोकतंत्र में हर समस्या का तो कोई इलाज भी नहीं है। अपने को नापसंद भ्रष्ट लोगों पर कार्रवाई होती रहे, और अपने को पसंद भ्रष्ट बचे रहें, यह आज भारतीय राजनीति का एक आम नजारा हो गया है, और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता के बिना यह नजारा बदलने वाला भी नहीं है।
कभी बाढ़, तो कभी सूखा, कहीं बाढ़, तो कहीं सूखा, इसके लिए क्या तैयारी?
25 अगस्त 2022
योरप के बारे में डरावनी रिपोर्ट है कि वह
पिछले पांच सौ साल का सबसे भयानक सूखा झेल रहा है। यूरोपियन यूनियन की
रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि फसलों का इलाका घटते चल रहा है, बिजली उत्पादन
घटते चल रहा है, जंगलों की आग बढ़ते जा रही है, और अंधाधुंध बढ़ी हुई गर्मी
से हवाई आवाजाही पर असर पड़ा है, हजारों लोग बेघर हुए हैं, और गर्मी और लू
की वजह से सैकड़ों मौतें हुई हैं। यह रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि करीब आधा
योरप चेतावनी जारी करने के स्तर पर चल रहा है। बिजली से लेकर अनाज तक का
उत्पादन इस गर्मी और सूखे की वजह से गिर गया है। नदियां सूख गई हैं, और कई
बड़ी नदियों में पानी की कमी से सैकड़ों बरस से चले आ रहा जल परिवहन भी रोक
दिया गया है। बांधों में पानी इतना कम है कि पनबिजली का उत्पादन एक चौथाई
तक कम हो गया है। साठ हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगल जल चुके हैं। पिछले दस
बरस में जंगल हर बरस जितने जलते थे, उससे यह साढ़े चार गुना अधिक है।
अब योरप से बिल्कुल परे के एक दूसरे इलाके को देखें तो चीन से पिछले कुछ दिनों से खबर आ रही है कि वहां के बहुत से बड़े शहरों में शॉपिंग मॉल बंद करवा दिए गए हैं, पर्यटन केन्द्र बंद कर दिए गए हैं, कारखानों में उत्पादन बंद कर दिया गया है, और शहरी इलाकों में भी बिजली काट दी गई है, क्योंकि नदियां सूख गई हैं, बांधों में पानी नहीं है, और पनबिजली बन नहीं पा रही है। चीन में यह 61 साल की सबसे भयानक गर्मी बताई जा रही है, और इसकी वजह से बिजली की खपत भी बढ़ी है, और नदियां सूखने से बिजली का उत्पादन गिरा है। डेढ़ सौ से अधिक शहरों में बुरी लू की चेतावनी जारी की गई है, और लोगों को घर पर ही रहने कहा गया है। कोरोना लॉकडाउन की वजह से महीनों से चीन के कई शहरों की जिंदगी थमी हुई थी, कारोबार रूका हुआ था, और अब वहां खेती से लेकर कारखाने तक, सभी कुछ बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। चीन की सबसे लंबी, और दुनिया की तीसरे नंबर की लंबी नदी, यांग्त्जी से 40 करोड़ लोगों को पानी मिलता है, और खेतों को भी, लेकिन पिछले पांच बरस में इसमें पानी पचास फीसदी से भी कम रह गया है, जो कि पिछले डेढ़ सौ बरस का रिकॉर्ड है।
लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले जब ब्रिटेन के ग्लास्गो में क्लाइमेट समिट हुई थी तो दुनिया के बहुत से देशों के शासन प्रमुख वहां पहुंचे थे, और वहां इस बात पर बड़ी फिक्र हुई थी कि दुनिया का तापमान जो लगातार बढ़ते चल रहा है, उसकी बढ़ोत्तरी को रोकना जरूरी है, वरना दुनिया में बड़ी तबाही आएगी जिसे झेल पाना मुश्किल होगा। लेकिन जिस तरह श्मशान वैराग्य के माहौल में बहुत सी बातें की जाती हैं, उसी तरह देशों ने ग्लास्गो में तरह-तरह के वायदे किए, घोषणापत्र पर दस्तखत किया, और अपने-अपने देश लौटकर सब भूल गए। अमरीका में पर्यावरण को बचाने के लिए वाइडन सरकार जो कोशिश कर रही थी, उस पर वहां के सुप्रीम कोर्ट ने ही रोक लगा दी है। इस अदालती फैसले को बहुत ही निराशाजनक कहा जा रहा है, लेकिन उसके खिलाफ कुछ इसलिए नहीं किया जा सकता कि वहां का सुप्रीम कोर्ट पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की सोच वाले जजों के बहुमत का हो चुका है, और वहां से किसी सुधारवादी, प्रगतिशील, उदारवादी फैसले की कोई उम्मीद नहीं की जा रही है।
लेकिन सिर्फ योरप, चीन, और अमरीका की फिक्र करना आज का मकसद नहीं है। आज हिन्दुस्तान के कितने ही प्रदेशों में जैसी बुरी बाढ़ आई हुई है, बादल फटने से उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में जितनी तबाही हो रही है, वह सब बेकाबू लग रहा है। एक तरफ तो पिछले कई महीनों से हिन्दुस्तान में चल रही बेमौसम की अंधाधुंध गर्मी ने गेहूं जैसी परंपरागत फसल को तबाह किया है, तो दूसरी तरफ आने वाले बरसों में यह गर्मी कम होते नहीं दिख रही है, और इस पूरी सदी में यूपी, राजस्थान, और गुजरात में बहुत बुरी गर्मी पडऩे का मौसम का अंदाज सामने आया है। एक तरफ कई प्रदेश बाढ़ से बेहाल हैं, दूसरी तरफ कई प्रदेश भयानक गर्मी और सूखा झेल रहे हैं, ऐसे में मौसम की सबसे बुरी मार भी बढ़ते चल रही है, और वह बार-बार भी हो रही है। फिर मौसम सडक़ के ट्रैफिक जैसा नहीं होता है जिसे कि लालबत्ती दिखाकर रोक दिया जा सके।
लोगों को याद होगा कि पिछले एक बरस में ही इसी योरप में भयानक बाढ़ आई थी जिसमें विकसित देशों के जमे-जमाए शहर तबाह हुए थे। और मौसम की उस एक किस्म की मार से ठीक उल्टे जाकर अब सूखे की मार आ रही है। अब सवाल यह है कि क्या बाढ़ के वक्त का पानी किसी तरह धरती के भीतर बचाने की कोई योजना बनाई जा सकती थी जो कि उस वक्त बाढ़ की मार को कम करती, और आज पानी की जरूरत को? हिन्दुस्तान में नदियों को जोडऩे की एक योजना सुप्रीम कोर्ट तक जाकर वहां के हुक्म से चल रही है, लेकिन उसकी किसी रफ्तार की कोई खबर सुनाई नहीं पड़ती है। पर्यावरण शास्त्रियों और आंदोलनकारियों की एक बड़ी फिक्र उससे जुड़ी हुई यह है कि धरती के ढांचे में फेरबदल करके नदियों को दूसरी तरफ भी कुछ हद तक मोड़ा जाएगा, तो उससे नदियों के प्राणियों की जिंदगी पर कैसा असर पड़ेगा? अभी वह बहस चल ही रही है, नदी-जोड़ योजना से अधिक रफ्तार से चल रही है, लेकिन इसी बीच देश के किसी हिस्से में बाढ़ से तबाही, और किसी दूसरे हिस्से में सूखे से तबाही दोनों साथ-साथ चल रही हैं, और नदियां जोडक़र, पानी मोडक़र संतुलन बनाने के अलावा और कोई रास्ता सूझ भी नहीं रहा है। महाराष्ट्र जैसे कई प्रदेश हैं जहां पर ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी कुओं में उतरकर खतरनाक तरीकों से रोज पानी निकालने में गुजर जा रही है, और असम, बिहार जैसे प्रदेश हैं जहां पर हर बारिश में लोगों की जिंदगी बचाव दल की बोट की वजह से बच पाती है।
हम यहां पर ग्लास्गो के बड़े-बड़े और 2070 तक के वायदों के बारे में अधिक कहना नहीं चाहते, लेकिन इस पर सोचने की जरूरत है कि इंसानों की जिंदगी के लिए पर्यावरण, पेड़ और पशु के साथ-साथ पानी और फसल भी उतने ही जरूरी माने जाएं या नहीं? न सिर्फ हिन्दुस्तान बल्कि दुनिया के हर देश को अंधाधुंध बारिश के दौरान गिरने वाले पानी को जमीन के भीतर डालने की वैज्ञानिक तरकीब पर अमल करना होगा, उसी से बाढ़ घटेगी, समुद्र का जलस्तर बढऩा कम होगा, और अधिक गर्मी के वक्त वह पानी जमीन से निकाला जा सकेगा। दुनिया के अधिक बारिश वाले इलाकों में बंजर जमीनों पर ऐसे विशाल जलाशय बनाने की जरूरत है जो कि पानी को सहेजकर रख सकें, और वह पानी भूजल भंडारों की भरपाई कर सके। सिर्फ यही नुस्खा कोई रामबाण दवा नहीं है, और मौसम में बदलाव के जिम्मेदार बाकी भी बहुत से पहलुओं पर सोचना होगा। कुल मिलाकर यह है कि इन बातों पर चर्चा बढऩी चाहिए, उसे बढ़-बढक़र जागरूकता में तब्दील होना चाहिए, और वह जागरूकता अमल में आनी चाहिए।
लोकतंत्र नाम का बस शब्द ही एक है, वरना अलग-अलग जगह...
24 अगस्त 2022
मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथंगा की बेटी का एक वीडियो खबरों में आया
जिसमें वह एक क्लिनिक में डॉक्टर को पीट रही है। समाचार बताता है कि वह
बिना समय लिए डॉक्टर से मिलने गई थी, और डॉक्टर ने जब अपाइंटमेंट लेकर आने
कहा तो भडक़कर उसने डॉक्टर पर बुरी तरह हमला किया। इसके खिलाफ पूरे मिजोरम
के डॉक्टरों ने विरोध करते हुए काली पट्टी लगाकर काम किया, और आईएमए ने
बयान जारी किया। यह सब देखते हुए मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से इस
डॉक्टर से माफी मांगी, और कहा कि मेरी बेटी के व्यवहार के बचाव में मैं कुछ
कहना नहीं चाहता, हम जनता और डॉक्टर से माफी मांगते हैं। उन्होंने लिखा कि
उनकी बेटी पर कठोर कार्रवाई न करने को लेकर वे आईएमए के आभारी हैं। इसके
पहले मुख्यमंत्री के बेटे ने भी सोशल मीडिया पर माफी मांगी थी कि मानसिक
तनाव की वजह से उनकी बहन बेकाबू हो गई थीं।
मिजोरम देश के उन बेहतर प्रदेशों में से है जहां कानून का राज कुछ अधिक कड़ाई से चलता है, और इसीलिए मुख्यमंत्री-परिवार की तरफ से ऐसे माफीनामों की नौबत आई है। शायद वहां पर शराफत के पैमाने भी थोड़े अलग होंगे, और जनता शायद अधिक संवेदनशील होगी। वरना ऐसी ही हरकत देश के कई दूसरे प्रदेशों में होकर गुजर गई होती, और पिटा हुआ डॉक्टर खुद छुपते रहता कि मीडिया उससे कोई बयान न निकलवा ले। लोगों को याद होगा कि किस तरह मध्यप्रदेश के इंदौर में भाजपा के एक सबसे बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे ने क्रिकेट के बल्ले से खुलेआम एक म्युनिसिपल अफसर को पीटा था जो कि एक अवैध निर्माण गिराने वाले दस्ते के साथ गया था। क्रिकेट बैट से बार-बार मारते हुए इसका साफ वीडियो चारों तरफ आया था, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उसे गिरफ्तार किया था, जमानत पर छूटने पर भाजपा ने उसका ऐसा जमकर स्वागत किया था कि उसमें हवाई फायर तक किए गए थे। दूसरी तरफ जब इस मामले की सुनवाई हुई तो इसी अफसर ने अदालत में यह बयान दिया कि वह नहीं देख पाया कि उस पर किसने हमला किया। देश के अधिकतर हिस्सों में मिजोरम जैसी माफी कम दिखेगी, इंदौर की तरह पिटने के बाद की मुकरी हुई गवाही अधिक दिखेगी, क्योंकि सत्ता का आतंक कम नहीं रहता है।
आज इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए सूझी कि अभी-अभी योरप के एक देश फिनलैंड की खबर आई थी जिसमें वहां की काफी कम उम्र की महिला प्रधानमंत्री सना मारिन कुछ नशे की हालत में एक पार्टी में खुलकर डांस करते दिख रही हैं, वहां के विपक्ष ने उनके व्यवहार को लेकर आपत्ति की, और यह शक जाहिर किया कि हो सकता है कि उन्होंने ड्रग्स (प्रतिबंधित नशा) भी ली हो। इसके जवाब में 36 बरस की इस प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक घोषणा की कि वे आरोपों का जवाब देने के लिए मेडिकल जांच करवा रही हैं जिससे यह साफ हो जाएगा कि उन्होंने ड्रग्स ली थीं, या नहीं। लेकिन यह अकेली बात नहीं है जो कि सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही दिखा रही है। एक और खबर अमरीका से आई है जहां अमरीकी निर्वाचित संसद की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी के पति पॉल पेलोसी को शराब के नशे में गाड़ी चलाने के आरोप में पांच दिन जेल की सजा सुनाई गई है। उन्होंने नशे में गाड़ी चलाते हुए उनके घर के पास ही खड़ी एक दूसरी गाड़ी को टक्कर मार दी थी जिससे दोनों गाडिय़ां टूट-फूट गई थीं। 82 बरस के पॉल पेलोसी को अब कार चलाते हुए हर बार कार के उपकरण पर अपनी सांस का नमूना देना होगा जिससे यह पता लगेगा कि उन्होंने शराब तो नहीं पी रखी है, और अगर वे नशे में मिले तो गाड़ी शुरू नहीं होगी।
क्या हिन्दुस्तान में कोई लोकसभा अध्यक्ष के जीवनसाथी के बारे में ऐसी कल्पना कर सकते हैं? इस देश में तो सत्तारूढ़ छोटे से नेताओं के जुर्म भी ढांकने के लिए पुलिस आमतौर पर अपनी पूरी ताकत से टूट पड़ेगी, और जरूरत पडऩे पर किसी दूसरे बेगुनाह को तलाशकर, छांटकर उसे मुजरिम बताकर पेश भी कर दिया जाएगा।
इन तीन-चार घटनाओं से दो बातें सामने आती हैं, एक तो यह कि कानून लागू करने वाली पुलिस अगर अमरीकी कड़ाई वाली हो, तो छोटे-बड़े किसी भी तरह के लोग जुर्म करने से पहले हिचकेंगे। संसद की अध्यक्ष के पति को आखिर पकड़ा तो किसी सिपाही ने ही होगा, जिसे यह भी मालूम हो चुका होगा कि वह किसका चालान कर रहा है, किसे जेल ले जा रहा है। यहां पिछले बरस कोरोना लॉकडाउन के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री निवास पर हुई दारू पार्टी की जांच करने वाली लंदन पुलिस को भी याद करना ठीक होगा जिसने कि जांच के बाद पार्टी में मौजूद लोगों पर जुर्माना भी लगाया। क्या हिन्दुस्तान में कोई किसी थानेदार के घर पर भी हुई पार्टी पर जुर्माने की कल्पना कर सकते हैं? दूसरी बात यह कि जहां नेताओं के मन में जनता के प्रति जवाबदेही और सम्मान रहता है, वहां पर वे फिनलैंड की प्रधानमंत्री की तरह अपनी खुद की जांच को भी तैयार हो जाते हैं, या मिजोरम के मुख्यमंत्री की तरह खुलकर माफी भी मांग लेते हैं।
हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोकतंत्र इतना बदहाल हो चुका है कि हत्यारे और बलात्कारी लोगों को सरकार नाजायज तरीके से रिहा कर रही है, और समाज उन्हें माला पहनाकर, मिठाई खिलाकर उनका स्वागत कर रहा है। हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में कानून और तथाकथित इंसानियत की बस इतनी ही इज्जत रह गई है। एक वक्त था जब इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी और उसके गिरोह की गुंडागर्दी के बारे में जनता पार्टी की सरकार आने पर फिल्म भी बनाई गई, कई किताबें भी लिखी गईं। लेकिन क्या आज सत्ता पर काबिज लोगों की गुंडागर्दी पर खबरें भी दो-चार दिन में दम नहीं तोड़ देती हैं? हिन्दुस्तानी लोकतंत्र सभ्यता में जहां तक भी पहुंचा था, वह बहुत तेज रफ्तार से वापिस जा रहा है। हवा में न सिर्फ साम्प्रदायिकता का हिंसक जहर बढ़ते चल रहा है, बल्कि लोगों के बीच कानून का किसी भी तरह का सम्मान तेज रफ्तार से खत्म हो रहा है। यह देश खुद दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने का दंभ भर रहा है, लेकिन यहां लोकतंत्र, सभ्य जीवन, और तथाकथित इंसानियत के बुनियादी पैमानों पर भी लगातार गिरावट जारी है, और सबसे बड़ी बात यह कि यह गिरावट न सिर्फ राजनीतिक सत्ता की ताकत से हो रही है, बल्कि इसमें न्यायपालिका और मीडिया की ताकत से भी गिरावट हो रही है।
जेएनयू वीसी के जाति और मनुस्मृति विरोधी भाषण के पीछे का राज
23 अगस्त 2022
दुनिया में अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता के
साथ-साथ लंबे समय से वामपंथी रूझान के लिए पहचाने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय की साख बड़ी ऊंची है। हाल के बरसों में किसी भी वामपंथी
रूझान के खिलाफ देश भर में चलाए जा रहे अभियान के तहत जेएनयू में भी
केन्द्र सरकार की तरफ से दक्षिणपंथी कोशिशें हुईं, और वहां कुलपति से लेकर
कोर्स तक कई फैसलों पर सरकारी रूझान की झलक दिखाई दी। लेकिन अभी मोदी सरकार
की मनोनीत कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित का एक लंबा व्याख्यान
अचानक खबरों में आया है जो कि दक्षिणपंथी लोगों में खासी असुविधा पैदा कर
सकता है। वे दिल्ली में केन्द्र सरकार की एक अम्बेडकर व्याख्यान माला के
दौरान ‘जेंडर जस्टिस पर अम्बेडकर के विचार : समान नागरिक संहिता की
व्याख्या’ विषय पर बोल रही थीं। उनकी बातों को काफी खुलासे से यहां लिखना
पड़ेगा जो कि खबर सरीखा लगेगा, लेकिन उसके बिना उस पर कोई टिप्पणी करना ठीक
नहीं होगा।
वाइस चांसलर शांतिश्री ने कहा कि हिन्दुओं के कोई भी देवता अगड़ी जातियों के नहीं हैं, भगवान शिव भी दलित या आदिवासी रहे होंगे, भगवान जगन्नाथ भी आदिवासी थे, और ऐसी स्थिति में अगर हम (हिन्दू) अभी भी जातियों को लेकर भेदभाव बनाए हुए हैं, तो यह बहुत ही अमानवीय है। उन्होंने भारत की हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था पर तगड़ी मार करते हुए यह कहा है कि हमारे देवताओं की उत्पत्ति को मानव शास्त्र या वैज्ञानिक लिहाज से समझना चाहिए, कोई भी देवता ब्राम्हण नहीं है, सबसे ऊंचा देवता भी क्षत्रिय है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव भी एससी या एसटी समुदाय के होंगे क्योंकि वे श्मशान में गले में सांप डालकर बैठते हैं, उनके पास पहनने के लिए कपड़े भी बहुत कम है, मुझे नहीं लगता कि ब्राम्हण श्मशान में बैठ सकते हैं। वाइस चांसलर ने आगे कहा कि लक्ष्मी, शक्ति, या भगवान जगन्नाथ भी मानवविज्ञान के लिहाज से अगड़ी जाति के नहीं हैं, ऐसे में आज समाज इस जाति व्यवस्था को क्यों ढो रहा है?
उन्होंने महिलाओं के बारे में कहा कि मनुस्मृति के अनुसार सभी महिलाएं शूद्र हैं, इसलिए कोई भी महिला ये दावा नहीं कर सकतीं कि वे ब्राम्हण या कुछ और हैं। महिलाओं को जाति केवल पिता या विवाह के जरिये पति से मिलती है, और मुझे लगता है कि ये पीछे ले जाने वाला विचार है। शांतिश्री ने आगे कहा कि महिलाओं के लिए आरक्षण की जरूरत है क्योंकि आज भी देश के 54 विश्वविद्यालयों में से कुल 6 में महिला कुलपति हैं। वाइस चांसलर का मनुस्मृति के बारे में दिया गया यह बयान इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए कि अभी-अभी एक हाईकोर्ट महिला जज ने मनुस्मृति को महिलाओं का सम्मान बढ़ाने वाला कहा था। जेएनयू वीसी ने कहा कि कुलपति के लिए कुलगुरू शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए, और वे विश्वविद्यालय कार्य परिषद में यह प्रस्ताव रखेंगी।
लेकिन जेएनयू वीसी का केन्द्र सरकार के कार्यक्रम में समान नागरिक संहिता को लेकर अम्बेडकर के विचारों पर दिया गया यह व्याख्यान इतना मासूम भी नहीं दिख रहा है कि वह हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था पर चोट करने, और मनुस्मृति की आलोचना करने के लिए आयोजित किया गया हो। वाइस चांसलर की आगे की बात इस कार्यक्रम के रूझान को साफ करती है जिसमें वे कहती हैं कि जेंडर जस्टिस के प्रति सबसे बड़ा सम्मान यह होगा कि हम बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की महत्वाकांक्षा के अनुरूप समान नागरिक संहिता लागू करें। उन्होंने मिसाल दी कि गोवा में पुर्तगालियों ने अपने शासन के दौरान इसे सभी धर्मों के लिए लागू किया था, और सभी ने इसे मंजूर कर लिया है, तो बाकी देश में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? उन्होंने कहा कि यह नहीं हो सकता कि देश में अल्पसंख्यकों को सारे अधिकार दे दिए जाएं, लेकिन बहुसंख्यकों को वे सभी अधिकार न मिले। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा होता रहा तो एक दिन यह चीज इतनी उल्टी पड़ जाएगी कि इसे सम्हालना मुश्किल हो जाएगा। वाइस चांसलर ने कहा कि अम्बेडकर पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते थे, आधुनिक भारत का कोई भी नेता उनके जितने महान विचारक नहीं था।
जैसी कि उम्मीद की जा सकती थी जेएनयू वीसी के व्याख्यान का देवी-देवताओं के ब्राम्हण न होने, और महिलाओं को लेकर मनुस्मृति के खिलाफ कहा हुआ बयान ही सुर्खियों में आया है। खबरें बहुत आसान चीजों को ही, बहुत आकर्षक बातों को ही सुर्खियां बनाती हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि कुलपति की कही हुई इन बातों के भीतर इस आयोजन का मकसद समान नागरिक संहिता को अम्बेडकर की कही बातों से जोडक़र लोगों के सामने दुहराना था, और वह मकसद कामयाब भी रहा है। जेएनयू वीसी को मौजूदा केन्द्र सरकार ने ही मनोनीत किया है इसलिए उनकी विचारधारा को लेकर कोई संदेह करने की जरूरत नहीं है। आज उनसे दूसरी बातों के साथ-साथ समान नागरिक संहिता की जरूरत को बखान करवाना एक राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम भी है, और वह खबरों में जगह पाते हुए केन्द्र सरकार ने ठीक तरीके से करवा दिया है। जब सरकार आयोजक हो, और सरकार की मनोनीत वीसी वक्ता हो, तो इसमें कोई दिक्कत होनी भी नहीं थी। दूसरी बात यह कि जब समान नागरिक संहिता जैसे व्यापक असर वाले एक राजनीतिक इरादे को लागू करना हो, तो कुछ देर के लिए हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था की आलोचना में भी कोई बुराई नहीं है, और मनुस्मृति की महिलाओं पर ज्यादती गिनाने में भी कोई नुकसान नहीं है। जब भारत के आम चुनावों में सभी जातियों के लिए वोटर रहते हैं, और वोटरों में महिलाओं की आधी संख्या रहती है, तो उनकी हिमायती दिखती ऐसी बातें भी किसी नुकसान की न होकर फायदे की ही हैं। इस व्याख्यान से ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार का अगला एक बड़ा फैसला समान नागरिक संहिता का हो सकता है, जो कि भाजपा के राजनीतिक घोषणापत्र की एक पुरानी बात भी है। ऐसे में इसे एक अग्रिम सूचना मानना चाहिए कि सरकार अगले आम चुनाव के पहले एक समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करेगी, और जिन लोगों को इसकी बारीकियां मालूम हैं, उन लोगों को अभी से इस मुद्दे पर अपने तर्क तैयार कर लेने चाहिए। आज अलग-अलग कई धर्मों के लिए अलग-अलग नागरिक संहिताएं हैं, उन सबको मिलाकर एक करना कई किस्म की जटिलताएं पैदा कर सकता है। खासकर अल्पसंख्यकों की अलग खास धार्मिक पहचान, उनके सांस्कृतिक रीति-रिवाज को समान नागरिक संहिता कुचल सकती है, इसलिए उन्हें और उनके हिमायती लोगों को कागज-कलम लेकर बहस की तैयारी रखनी चाहिए।
आम हो या खास, वीडियो और सोशल मीडिया दबाव से कार्रवाई आसान हुई है..
22 अगस्त 2022
पिछले दस दिनों में हिन्दुस्तान की राजधानी
दिल्ली के आसपास के इलाकों से निकले कुछ ऐसे वीडियो आए हैं जिनमें संपन्न
तबके की महिलाएं अपनी दौलत और अपनी ताकत का दंभ दिखाते हुए रिहायशी इलाकों
के सुरक्षा कर्मचारियों को पीट रही हैं। इसके साथ-साथ वे उन्हें ऐसी गंदी
गालियां भी दे रही हैं जिन्हें आमतौर पर मर्दों की जुबान से ही सुना जाता
है। ये महिलाएं सिर्फ संपन्नता के नशे में थीं या उन्होंने कोई और भी नशा
कर रखा था, इसे वे ही जानें। लेकिन भारत की आम संस्कृति में महिला का
सार्वजनिक रूप से ऐसा अश्लील बर्ताव करना भी अटपटा लगता है, और जब संपन्नता
की गुंडागर्दी छोटे और मजबूर कर्मचारियों पर हिंसा करती है, तो वह
गैरकानूनी तो होता ही है। ताजा मामले में नोएडा में सुरक्षा कर्मचारी को
पीटने वाली और अश्लील बर्ताव करने वाली, वीडियो पर कैद महिला को गिरफ्तार
करके 14 दिन की हिरासत में भेज दिया गया है। यहां पर हम मर्दों के किए हुए
ऐसे ही जुर्म की बात नहीं कर रहे हैं, जिनके बारे में अक्सर ही लिखना हो
जाता है, और वे बहुत आम भी हैं। एक महिला का मर्दों के साथ ऐसा करना कोई
अतिरिक्त बड़ा जुर्म नहीं है, लेकिन इसमें जिस बात को समझना चाहिए वह
संपन्नता से जुड़ी हिंसा की है। एक अकेली महिला तीन-चार वर्दीधारी सुरक्षा
कर्मचारियों को मां-बहन की गालियां देते हुए धक्के दे रही है, और अधिक
हिंसा करने की धमकी दे रही है, तो उस हिंसक अहंकार को जरूर समझना चाहिए।
आज हिन्दुस्तान में मोबाइल फोन के कैमरों की मेहरबानी से ऐसे सुबूत जुट जा रहे हैं जो कि तरह-तरह के जुर्म, और ज्यादतियों को साबित करते हैं। अगर ये न रहें तो संपन्न तबके के लोगों के खिलाफ छोटे कर्मचारी भला कौन सी शिकायत कहां कर सकते हैं, और उसे किस तरह से साबित कर सकते हैं? इस हिसाब से अगर देखें तो एक छोटे से सामान ने आज समाज के सबसे कमजोर लोगों को भी एक अभूतपूर्व ताकत दे दी है, और वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की कुछ उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन इन दो-चार महिलाओं के जो वीडियो सामने आए हैं, उनमें से एक वीडियो में वह इलाके के कुत्ते भगाने के खिलाफ सुरक्षा कर्मचारियों को लाठी से पीट भी रही है, और उसे धमकी भी दे रही है कि वह मेनका गांधी को फोन करने वाली है। लोगों को याद होगा कि एक-दो बरस पहले मेनका गांधी के एक सरकारी पशु चिकित्सक को फोन पर धमकाने की रिकॉर्डिंग सामने आई थी जिसमें वे उस सरकारी डॉक्टर को सेक्स से जुड़ी बड़ी असंभव किस्म की हरकतों वाली धमकियां दे रही थीं। मेनका गांधी केन्द्रीय मंत्री और सांसद रहते हुए भी इस तरह की जुबान और धमकियों के लिए जानी जाती हैं, और इसीलिए खुद हिंसा कर रही एक संपन्न महिला गंदी गालियां बकते हुए मेनका गांधी को भी बीच में लाने की बात कहती है।
कुल मिलाकर यह संपन्न तबके का एक ऐसा हिंसक अहंकार है जो कि संपन्न बस्तियों में अलग-अलग कई शक्लों में देखने मिलता है। बीच-बीच में सोशल मीडिया पर महानगरों के कई ऐसे नोटिस दिखते हैं जिनमें बहुमंजिली इमारतों में काम करने वाले लोगों के लिफ्ट इस्तेमाल करने पर मनाही लिखी रहती है। अब पांच-दस मंजिल ऊपर बसे घरों तक काम वाले लोग किस तरह जाएंगे, किस तरह सामान ले जाएंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। ऐसी इमारतों में जब कामगारों या बाहर से पार्सल लेकर आने वाले लोगों के लिफ्ट इस्तेमाल करने पर रोक रहती है, तो वह मानवाधिकारों के खिलाफ रहती है। हमारा ख्याल है कि इन प्रदेशों के मानवाधिकार आयोगों को ऐसे किसी भी नोटिस पर तुरंत कार्रवाई करना चाहिए, और इमारत का मैनेजमेंट देखने वालों पर जुर्माना लगाना चाहिए।
आम जिंदगी में यही देखने में आता है कि जैसे-जैसे संपन्नता बढ़ती है, वैसे-वैसे इंसानियत घटने लगती है। ये महिलाएं अपने महिला होने की वजह से हिंसा नहीं कर रहीं, ये अपनी संपन्नता की बददिमागी में हिंसा कर रही हैं, और इसे उनकी संपन्नता से ही जोडक़र देखना चाहिए। फिलहाल तो ऐसी एक महिला की गिरफ्तारी से सभी किस्म के संपन्न औरत-मर्दों को थोड़ी सी समझ मिल सकती है कि उनकी बदसलूकी की वीडियो रिकॉर्डिंग उन्हें जेल भेज सकती है, और सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम तो कर ही सकती है। कमजोर तबकों को अपने बराबरी के लोगों का साथ देने के लिए ऐसे वीडियो सुबूत जुटाने की कोशिश करनी चाहिए, जहां कहीं सरकारी अमला ज्यादती करे, या कोई भी ताकतवर अमला कमजोर पर जुल्म करे, उसकी रिकॉर्डिंग करके उसे फैलाना चाहिए, और पुलिस तक भी पहुंचाना चाहिए। अगर ऐसे सुबूत न रहें तो भला कमजोर की बात का कौन भरोसा करे? करोड़ों रूपये के फ्लैट में रहने वाले अरबपति के खिलाफ एक मामूली सुरक्षा कर्मचारी की शिकायत पर शायद जिंदगी भर कोई पुलिस कार्रवाई न करती, लेकिन वीडियो सुबूत सोशल मीडिया पर फैल जाने के बाद इन दोनों के मिलेजुले दबाव ने पुलिस से कार्रवाई करवाई। इसलिए आम लोगों को इन दोनों चीजों की ताकत को अच्छी तरह समझना चाहिए, ऑडियो-वीडियो सुबूत भी जुटाने चाहिए, और उन्हें सोशल मीडिया पर फैलाना भी चाहिए।
अब आम और संपन्न लोगों की इस चर्चा के बीच एक खास आदमी की चर्चा और हो जानी चाहिए। राजस्थान के एक भूतपूर्व भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे लोगों के बीच में गर्व से कहते दिख रहे हैं कि उन्होंने अब तक पांच (लोगों को) मारे हैं, लालवंडी में मारा, चाहे बहरोड़ में मारा, अब तक पांच मारे हैं। आहूजा लोगों को कह रहे हैं कि मैंने खुल्लम-खुल्ला छूट दे रखी है कार्यकर्ताओं को कि जो गाय को मारते दिखे, उसे मारो, हम जमानत भी करवाएंगे, बरी भी करवा देंगे। आहूजा जिन दो गांवों का जिक्र कर रहे हैं, उनमें लालवंडी में 2018 में रकबर खान, और बहरोड़ में पहलू खान की भीड़त्या की गई थी। कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से इस वीडियो सुबूत पर कार्रवाई करने की मांग की थी, और राजस्थान पुलिस ने अभी जुर्म दर्ज कर लिया है। इस सुबूत को देखते हुए राजस्थान भाजपा ने पार्टी को अपने पूर्व विधायक के बयान से अलग कर लिया है, और कहा है कि पार्टी कानून अपने हाथ में लेने के पक्ष में नहीं है। कुल मिलाकर बात यह है कि वीडियो सुबूतों के आधार पर कई तरह की कार्रवाई मुमकिन है, और पुलिस को इसका इस्तेमाल करते हुए तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए।
सूरज की रौशनी पर टिकी एक नई तकनीक मिटा सकती है दुनिया की भूख
21 अगस्त 2022
एक ताजा वैज्ञानिक कामयाबी मिली है जिसमें
सोयाबीन के पौधों को सूरज की रौशनी को बेहतर तरीके से सोखने के लायक तैयार
किया गया है, और इससे उन पौधों से फसल 20 से 24 फीसदी तक अधिक मिली है।
वैज्ञानिकों का यह मानना है कि बाकी पौधों में भी सूरज की रौशनी से खुराक
पाने की फोटो सिंथेसिस की प्रक्रिया इसी तरह की रहती है, और ऐसी कामयाबी उन
फसलों में भी पाई जा सकती है। अमरीका के एक विश्वविद्यालय ने अपने नए शोध
के ये नतीजे अभी प्रकाशित किए हैं, और इन्हें दुनिया की भूख मिटाने के लिए
एक सबसे बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। सूरज की रौशनी से पौधों में अनाज या
दूसरी उपज प्रभावित होती है, और सोयाबीन में जेनेटिक फेरबदल करके यह
कामयाबी पाई गई है। लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगशाला से निकलकर ये नतीजे जब तक
खेतों तक पहुंचेंगे, और लोगों के खाने में शामिल होंगे तब तक हो सकता है कि
इसमें कुछ और सकारात्मक या नकारात्मक बातें सामने आएं, लेकिन आज जब दुनिया
में चारों तरफ हर किस्म की निराशा की खबरें आ रही हैं, यह एक खबर भुखमरी
की शिकार इस धरती पर एक उम्मीद जगाने वाली है।
आज बहुत से लोगों को जीएम फसलों से परहेज है, और तरह-तरह की आशंका भी है। जेनेटिकली मॉडीफाईड फसलों का कारोबार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में है, और बहुत से मामलों में किसानों को हर फसल के लिए नए बीज खरीदने पड़ते हैं, जिसकी लागत अधिक रहती है। बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि जीएम बीजों से दुनिया की खेती पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एक नाजायज काबू हो जाएगा। हम ऐसी किसी भी तरह की फिक्र को खारिज किए बिना केवल वैज्ञानिक नजरिये से यह देख रहे हैं कि किसी तकनीक से अगर फसल 20 फीसदी या उससे अधिक बढ़ सकती है, तो यह दुनिया की भूख मिटाने में एक बहुत कारगर कदम होगा। हम अपने आसपास यह देखते हैं कि एक वक्त जो देसी अमरूद मिलते थे, वे अब नए किस्म के पौधों से निकलने वाले बड़े-बड़े अमरूद रहते हैं, जिनका स्वाद पुराने देसी अमरूदों जितना अच्छा नहीं रहता है, लेकिन वे धीरे-धीरे बिकने लगे हैं, और लोगों के बीच उसकी जगह बन गई है। यह तो फलों की बात हुई, जिसमें छोटे आकार के देसी पपीते के मुकाबले दो-तीन गुना वजन के नए हाईब्रीड पपीते आने लगे हैं, और भी कई फल-सब्जियों का ऐसा ही नया अवतार सामने आया है।
इससे परे जब अनाज की बात आती है, तो आज दुनिया में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा करीब 70 करोड़ लोगों के भूखे रहने का अंदाज है। यह दुनिया की आबादी का करीब 9 फीसदी है, और यह संख्या बढ़ती चल रही है। कई देश तो इस बुरी तरह भुखमरी के शिकार हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों ने अब आबादी के कुछ हिस्से को ही पेट भर अनाज देना शुरू किया है कि पूरी आबादी को तो बचाना मुमकिन नहीं है, इसलिए आबादी के कुछ हिस्से को ही पेट भर अनाज देकर बचा लेना बेहतर है। कुछ दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों का अंदाज संयुक्त राष्ट्र से भी अधिक खराब है, और 2022 का एक अनुमान करीब 83 करोड़ लोगों के भूखे रहने का है, और यह दुनिया की आबादी का 10 फीसदी है। जब भूख के ऐसे आंकड़ों को देखा जाए तब यह समझ आता है कि अगर किसी तरह से अनाज की उपज 20 फीसदी बढ़ाई जा सकती है, तो उससे दुनिया के भूखे पेटों को भर पेट खाना दिया जा सकता है। अभी यहां पर हम इस पर जाना नहीं चाहते कि ऐसे गरीब देशों के पास अनाज को खरीदने की ताकत कहां से रहेगी। आज भी संयुक्त राष्ट्र सहित कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठन लगातार बहुत से देशों में भूखे लोगों को अनाज पहुंचा रहे हैं, और आज तो एक दिक्कत यह भी है कि रूस और यूक्रेन के बीच जंग के चलते हुए अनाज की उपलब्धता ही घट गई है। इसलिए अगर सोयाबीन पर किया गया यह प्रयोग, वैज्ञानिकों की उम्मीद के मुताबिक अगर बाकी फसलों पर भी कामयाब होता है, तो इससे दुनिया को एक बहुत बड़ी मदद मिल सकती है, दुनिया भुखमरी से उबर सकती है।
हिन्दुस्तान के कुछ पीढ़ी पहले के लोगों को याद होगा कि किस तरह हरित क्रांति के पहले तक यहां पर अनाज की कमी थी, और हिन्दुस्तान 1960 के पहले अमरीका के साथ हुए एक खाद्यान्न समझौते पीएल480 (पब्लिक लॉ 480) के तहत अनाज पाता था, और लोग अमरीकी गेहूं के लाल होने, और उससे रोटियां बहुत कड़ी बनने की शिकायत करते थे, लेकिन वैसी मदद से ही उस वक्त हिन्दुस्तानी राशन दुकानों के रास्ते लोगों का पेट भरता था, और लोग भूखे मरने से बचते थे। जब धीरे-धीरे हिन्दुस्तान में अनाज का उत्पादन बढ़ा, और यह देश अनाज के मामले में दुनिया के दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह गया, तब यहां पर भुखमरी धीरे-धीरे खत्म हुई। लेकिन आज दुनिया के दर्जनों देश भुखमरी के शिकार हैं, और जहां पर भूख से मौत हो रही है, वहां पर जिंदा बचे हुए लोगों में भी कुपोषण का कैसा बुरा हाल होगा, यह अंदाज लगाया जा सकता है। इसलिए आज अगर कोई वैज्ञानिक तरीका ऐसा निकल रहा है जो कि महज सूरज की रौशनी के बेहतर इस्तेमाल से उपज बढ़ा सकता है, तो यह बहुत बड़ी कामयाबी है।
जाहिर है कि एक अमरीकी विश्वविद्यालय की ऐसी खोज अमरीका की सरकार या कंपनियों के रास्ते दुनिया भर में तेजी से फैल सकती है, और हिन्दुस्तान कृषि अनुसंधान में एक विकसित देश है। आने वाले बरसों में हम हिन्दुस्तानी खेतों में उपज बढऩे का सपना देख सकते हैं, और आज हिन्दुस्तानी किसान जिस तकलीफ से इस काम को करता है, उसे भी ऐसी नई तकनीक एक नई राहत दे सकती है। हम खबर आने के दो दिन के भीतर ही इतनी सारी उम्मीदें लिख रहे हैं, लेकिन उम्मीदों पर ही तो दुनिया जिंदा है।
एक दवा को बढ़ावा देने के लिए क्या डॉक्टरों को दी हजार करोड़ रिश्वत?
20 अगस्त 2022
यह बात सुनने में कुछ हैरान कर सकती है कि
अदना सी दवा की टेबलेट पर सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट
के सामने यह बताया गया है कि पिछले दो दौर की कोरोना महामारी के दौरान
बुखार और बदन दर्द में काम आने वाली पैरासिटामॉल टेबलेट के एक खास ब्रांड
डोलो-650 की बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनी ने डॉक्टरों को रिश्वत दी, ताकि वे
इसे अंधाधुंध लिखें। अदालत में यह जनहित याचिका फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड
सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने दायर की है, जिसका कहना है
कि इस कंपनी ने डॉक्टरों को रिश्वत देने पर हजार करोड़ रूपये खर्च किए हैं।
कंपनी ने इस खर्च को गलत बताया है और कहा है कि यह कोरोना के दौरान का
खर्च नहीं है, यह पिछले कई बरसों का मार्केटिंग का खर्च है। अभी यह मामला
अदालत में चलना है, और जज भी इसे गंभीरता से ले रहे हैं। अदालत ने उपहारों
के नाम पर डॉक्टरों को दी गई रिश्वत पर कंपनी से जानकारी मांगी है। कुछ समय
पहले आयकर विभाग ने भी यह दवा बनाने वाली कंपनी के 9 राज्यों के 36
ठिकानों पर छापा मारा था।
लेकिन हम आज की बात को इसी एक दवा पर शुरू और खत्म करना नहीं चाहते, क्योंकि देश की सबसे बड़ी अदालत इस पर सुनवाई कर ही रही है, और वहां से कोई न कोई नतीजा सामने आएगा। हम चिकित्सा और दवा कारोबार में फैले हुए भारी भ्रष्टाचार की बात जरूर करना चाहते हैं जो कि बहुत ही संगठित है, इस कारोबार से जुड़े लोगों की नजरों में हैं, लेकिन उसे रोकने की कोशिश नहीं होती है। बड़े-बड़े कामयाब कारोबारी-अस्पताल और डॉक्टर मरीज लेकर आने वाले दलालों को कमीशन देते हैं, मरीज भेजने वाले छोटे डॉक्टरों को इलाज के बाद की निगरानी के नाम पर चेक से भुगतान करते हैं। इसके अलावा तरह-तरह की जांच करने वाले जो मेडिकल सेंटर हैं, वे भी अपने को मरीज भेजने वाले लोगों को संगठित तरीके से कमीशन देते हैं। यह पूरा कारोबार चिकित्सकों के संगठनों की नीतियों के खिलाफ है, वहां से कई बार नोटिस जारी होते भी हैं, लेकिन जिंदगी से जुड़े इस पेशे और कारोबार से इस गंदगी को दूर करने की कोई ठोस कोशिश दिखाई नहीं देती है।
दरअसल चिकित्सा से जुड़ा हुआ यह पूरा कारोबार निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले में होने वाले पूरी तरह से संगठित भ्रष्टाचार से शुरू होता है, और सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए दी जाने वाली रिश्वत पर खत्म होता है। फिर एक बात यह भी है कि इलाज के तौर-तरीके, जांच का फैसला, और दवाओं की पसंद, इन सबमें अलग-अलग डॉक्टरों की अलग-अलग सोच हो सकती है, और किसी को भी तेजी से तब तक खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक उनके इन फैसलों को किसी रिश्वत से प्रभावित साबित न किया जा सके। अभी सुप्रीम कोर्ट में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स का जो संगठन कंपनी और डॉक्टरों के बीच बेईमान रिश्ते का आरोप लेकर पहुंचा है, वह एक जागरूक संगठन है, और वह समय-समय पर कंपनियों की बेईमानी के खिलाफ लड़ते भी रहता है। हिन्दुस्तान में मरीजों का तो कोई संगठन न है, और न बन सकता, लेकिन मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स का संगठन ही दवाओं की बढ़ती हुई कीमतों के खिलाफ हर समय आवाज उठाते रहता है, और दवा उद्योग के दूसरे नाजायज तौर-तरीकों का भांडाफोड़ भी करता है। इसलिए ऐसे संगठन की कोशिशों का साथ देने की जरूरत है ताकि वह मरीजों के हित के लिए लड़ सके, और दवा कंपनियों और डॉक्टरों के अनैतिक गठबंधन के खिलाफ भी।
आज हिन्दुस्तान में निजी चिकित्सा कारोबार लगातार बढ़ते चल रहा है, और केन्द्र और राज्य सरकारें भी मरीजों को दिए जाने वाले स्वास्थ्य बीमा कार्ड को इन अस्पतालों से जोड़ते जा रही हैं। नतीजा यह है कि आज सरकारी अस्पताल लगातार उपेक्षित हो रहे हैं, और निजी चिकित्सा कारोबार बढ़ते ही जा रहा है। जब गरीब बीमार होते हैं, तो अगर सरकारी स्वास्थ्य बीमा कार्ड उस खर्च को नहीं उठा पाता, तो लोग गहने और मकान बेचकर भी इलाज करवाते हैं। ऐसे में उनके साथ अगर दवाओं के रेट को लेकर बेईमानी होती है, गैरजरूरी जांच करवाई जाती है, जांच में कमीशन लिया जाता है, तो इन सबका भांडाफोड़ होना चाहिए। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब कई अस्पतालों ने अपने दलालों के मार्फत यह पाया कि लोगों के स्वास्थ्य बीमा कार्ड पर अभी और इलाज करवाने लायक रकम बाकी है, तो कुछ अस्पतालों ने गांव के गांव की महिलाओं को उठवा लिया, और उनकी उम्र देखे बिना भी उनके गर्भाशय निकाल दिए गए थे। अस्पतालों ने तो छप्पर फाडक़र कमाई कर ली थी, लेकिन बाद में जब यह पूरी धोखाधड़ी उजागर हुई तो कई डॉक्टरों और अस्पतालों को ब्लैकलिस्टेड किया गया था, और उनका कारोबार रोका गया था। इसलिए सरकारी स्वास्थ्य बीमा जहां सबसे गरीब लोगों के लिए मुफ्त इलाज का एक जरिया है, वहीं गैरजरूरी इलाज करके गरीबों के बदन का नुकसान भी किया जाता है, और सरकार को चूना भी लगाया जाता है। लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले मेडिकल कॉलेजों के दाखिलों को लेकर बड़ा भ्रष्टाचार पकड़ाया था, और मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने वाली कमेटी एमसीआई में भी फेरबदल किया गया था। आज जरूरत यही है कि जिस तरह दवा प्रतिनिधियों के संगठन ने सुप्रीम कोर्ट तक पहल की है, बाकी सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी चिकित्सा कारोबार की बाकी गड़बडिय़ों के खिलाफ पहल करनी चाहिए, और जरूरत हो तो स्टिंग ऑपरेशन भी करना चाहिए। देश की राजधानी में यह बात आम प्रचलित है कि निजी मेडिकल कॉलेजों से लेकर निजी अस्पतालों, और दवा कंपनियों तक के खेमे सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में करने की अपार ताकत रखते हैं। ऐसी लॉबियों की मर्जी के खिलाफ कुछ कर पाना सरकारों के लिए भी आसान नहीं रहता है। ऐसे में सुबूतों और स्टिंग ऑपरेशनों के साथ अदालतों तक जनहित याचिका लेकर जाना एक असरदार तरीका हो सकता है।
दलित-विरोधी, महिला-विरोधी जजों को कुर्सियों पर आने से रोकने, या हटाने की जरूरत..
19 अगस्त 2022
हिन्दुस्तान के हजारों बरस पुराने कहे जाने
वाले कई किस्म के धर्म और दूसरे ग्रंथों में महिलाओं के खिलाफ जितनी हिंसक
बातें लिखी गई हैं, जिनका हिन्दुस्तान में खुलकर इस्तेमाल भी होता है, उन
बातों ने हिन्दुस्तान की अदालतों के जजों के दिल-दिमाग पर बहुत गहरा असर
किया हुआ है। और यह असर कभी-कभार किसी एक मामले में दिखता है तो लोग हैरान
हो जाते हैं कि ऐसी सोच वाले लोग अगर फैसले कर रहे हैं, तो वे फैसले किस
कदर महिला-विरोधी होंगे। केरल के एक जिले कोझीकोड के एक जज ने यौन उत्पीडऩ
के एक मामले में अभियुक्त को जमानत दे दी क्योंकि उसका यह तर्क था कि
शिकायतकर्ता महिला ने उस वक्त उत्तेजक कपड़े पहन रखे थे। मतलब यह कि अगर
किसी महिला के कपड़े उत्तेजक हैं, तो वह महिला बलात्कार के लायक है। यह जज
एस. कृष्णकुमार इसके दस दिन पहले यौन उत्पीडऩ के एक दूसरे मामले में भी
आरोपी को जमानत दे चुका है, और उसने लिखा था- यह मानना विश्वास से बिल्कुल
परे है कि अभियुक्त ने यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि पीडि़ता दलित है,
उसे छुआ होगा।
इन दो आदेशों ने इस जज की सोच भयानक स्तर पर महिला-विरोधी भी है, और दलित-विरोधी भी है। वह महिला के कपड़ों की पसंद के आधार पर उसे एक किस्म से बलात्कार के लायक पा रहा है, और दूसरी तरफ एक दलित महिला के बारे में कह रहा है कि उसे दलित जानते हुए भी कैसे कोई छू सकता है? जज का नजरिया तालिबानों सरीखा दिखता है जो कि महिला की पोशाक तय कर रहे हैं। लेकिन यह अकेला जज ऐसा नहीं है, अभी हफ्ते भर पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट की एक महिला जज प्रतिभा एम.सिंह के एक बयान के खिलाफ बहुत सी महिला कार्यकर्ताओं ने जमकर बयान दिया था जिसमें इस जज ने मनुस्मृति की वजह से भारतीय महिला को सम्मानजनक स्थान मिलने की बात कही थी। मनुस्मृति की चर्चा हिन्दुस्तान में महिलाओं को नियंत्रित करने वाली सोच की तरह होती है, और उसमें महिलाओं के लिए बहुत ही अपमानजनक बातें लिखी हुई हैं। ऐसे में अगर हाईकोर्ट की एक जज मनुस्मृति से प्रभावित है तो जाहिर है कि उसके फैसले इस सोच से प्रभावित होंगे। मनुस्मृति के मुताबिक एक महिला को पुरूष द्वारा सुरक्षित किया जाता है। जब वह बालिका है तो उसकी रक्षा की जिम्मेदारी उसके पिता की है, शादी के बाद वह अपने पति की जिम्मेदारी है, और अगर वह विधवा हो जाए तो वह उसके पुत्र की जिम्मेदारी है। मनुस्मृति महिलाओं के न करने के छह काम गिनाती है जिनमें से एक शराब पीना है। महिलाओं को बिना काम के इधर-उधर घूमने की मनाही की गई है। महिलाओं को बेवक्त और देर तक सोने की मनाही की गई है। मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में लिखा गया है कि वे हमेशा दूसरे मर्दों को आकर्षित करने और संभोग के लिए आतुर रहती हैं। वे अपने पति के प्रति भी वफादार नहीं रहतीं। लेकिन इस तरह की अनगिनत भेदभाव की बातें उसमें महिलाओं के खिलाफ हैं, और इसके साथ-साथ मनुस्मृति बहुत बुरी तरह ब्राम्हणवादी और पुरूषवादी सोच भी है। इसमें शूद्रों को नीच माना गया है, और कहा गया है कि अगर कोई शूद्र ब्राम्हण को धर्मउपदेश दे, तो राजा को उसके मुंह और कानों में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए। शूद्रों के पास सम्पत्ति होने का भी विरोध किया गया है, शूद्र अगर ब्राम्हण या उसकी जाति का नाम बदतमीजी से ले, तो उसके मुंह में दस अंगुल लंबी लोहे की दहकती हुई कील डाल देना चाहिए।
हिन्दुस्तान में निचली अदालतों के जजों को लिखित इम्तिहान के मुकाबले से छांटा जाता है, और उनकी राजनीतिक-सामाजिक सोच के बारे में कभी सोचा भी नहीं जाता है। नतीजा यह होता है कि उनका दलित-विरोधी, महिला-विरोधी पूर्वाग्रह सिर चढक़र बोलता है, और उन अदालतों से इन तबकों को किसी इंसाफ की गुंजाइश भी नहीं रहती है। हमारा तो ख्याल यह है कि लिखित परीक्षा में कामयाब होने के बाद ऐसे उम्मीदवारों को सामाजिक कार्यकर्ताओं के सवालों का सामना करना चाहिए या लिखित परीक्षा में ही सामाजिक सोच के बारे में पूछना चाहिए, और उस आधार पर उनका मूल्यांकन करना चाहिए। अब सवाल यह भी उठेगा कि ऐसा मूल्यांकन कौन करेंगे, क्योंकि जिन लोगों को यह काम दिया जाएगा उनकी अपनी सोच पुरूषवादी और दलित-विरोधी होने का पूरा खतरा रहेगा। पिछले एक दशक में हिन्दुस्तान में मनु के प्रशंसकों, और भारत की हजारों साल पुरानी सोच के प्रशंसकों के दिन निकल आए हैं। यही वजह है कि दलितों को देश भर में तरह-तरह से मारा जा रहा है, और बलात्कारियों का तरह-तरह से अभिनंदन हो रहा है।
केरल के इस जज की सोच के खिलाफ तो वहां लोगों की आवाज उठने लगी है। कुछ रिटायर्ड जजों ने यह भी कहा है कि इस जज की टिप्पणियों के खिलाफ ऊपर की अदालत में जाने की जरूरत है। आज हिन्दुस्तान में सामाजिक न्याय के आंदोलनकारियों के बीच इस सक्रियता की जरूरत है कि अदालतों की बेइंसाफ बयानबाजी, और उनके फैसलों के खिलाफ एक सामाजिक जागरूकता फैलाई जाए। जब तक ऐसे जजों के खिलाफ सार्वजनिक और सामाजिक सवाल नहीं उठेंगे, तब तक उनका ऐसा ही रूख जारी रहेगा। इसलिए जब कभी ऐसा कोई अपमानजनक बयान या फैसला किसी अदालत का आता है, तो तुरंत उसका विरोध करने की जरूरत है। केरल के एक जिले के इस जज की टिप्पणियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर खूब लिखा जा रहा है, और इस बात को आगे बढ़ाना चाहिए।
दूसरे केस छोडक़र, मुफ्त और रेवड़ी की परिभाषा तय करने में लगा सुप्रीम कोर्ट!
18 अगस्त 2022
सुप्रीम कोर्ट में अभी इस बात पर बहस चल रही
है कि हिंदुस्तान के चुनावों में राजनीतिक दल मुफ्त के तोहफों के जो वायदे
करते हैं, क्या उन पर रोक लगाई जानी चाहिए? यह मामला चुनाव आयोग के सामने
भी आया था, और देश के कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इस आधार पर ऐसी घोषणाओं
पर रोक लगाने की मांग की थी कि उनसे राज्यों के बजट पर गैरजरूरी बोझ बढ़ता
है, और विकास कार्य के लिए रकम नहीं बचती है। पिछले कुछ दशकों में
हिंदुस्तानी चुनावों में ऐसा हुआ भी है कि राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे से
आगे बढक़र ऐसी लुभावनी घोषणाएं की हैं कि जिनसे सत्ता पर पहुंचने से पहले ही
वे बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर चुके होते हैं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम
कोर्ट से ही कहा है कि वह एक संवैधानिक संस्था है, और सुप्रीम कोर्ट चुनावी
तोहफों को लेकर जो विशेषज्ञ पैनल बना रहा है, उससे आयोग को बाहर रखा जाए।
आयोग का यह मानना है कि यह तय करना अदालत का काम होना चाहिए कि चुनावी
घोषणाओं में क्या-क्या कहा जा सके और क्या-क्या नहीं कहा जा सके। सुप्रीम
कोर्ट में यह बहस चल ही रही है कि इस दौरान संसद में मोदी सरकार के
मंत्रियों ने जनता को दिए जाने वाले अनाज को मुफ्त का तोहफा करार देकर यह
बहस शुरू कर दी है कि जिंदा रहने के लिए जनता का जो बुनियाद हक है, उसे
मुफ्त का कैसे कहा जा सकता है? विपक्ष के बहुत से नेताओं ने इस पर संसद के
भीतर और बाहर, दोनों जगह आपत्ति की है कि इसे मुफ्त कहना देश की जनता के हक
का अपमान है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के तय किए गए विशेषज्ञ पैनल के लोग यह तय करेंगे कि चुनावी घोषणापत्र में राजनीतिक दल जनता से किन चीजों का वायदा कर सकते हैं, और किन चीजों का नहीं? इस बात में जागरूक और जानकार सामाजिक कार्यकर्ता एक बड़ी खामी देखते हैं कि देश के तथाकथित विशेषज्ञ एक अलग ही दुनिया में जीते हैं, और वे देश के सबसे गरीब लोगों की जरूरतों का अहसास ही नहीं रखते। ऐसे सामाजिक आंदोलनकारियों का यह मानना है कि अपने-आपको अर्थशास्त्र का जानकार समझने वाले ये लोग आमतौर पर सरकारों की पूंजीवादी सोच का साथ देते हैं, और जिंदा रहने के लिए जो न्यूनतम जरूरतें आम जनता को चाहिए, ये उन्हें भी रियायत या राहत की तरह देने के खिलाफ रहते हैं। लोगों को याद होगा कि किस तरह बड़े-बड़े सरकारी अर्थशास्त्री मनरेगा जैसी योजना के खिलाफ थे, जो कि आज हिंदुस्तान में एक बड़ी आबादी को जिंदा रखने का सबसे बड़ा जरिया साबित हो रही है। किस तरह सरकारी अर्थशास्त्री रियायती राशन या स्कूलों में दोपहर के भोजन के खिलाफ थे जिनकी वजह से आबादी के एक बड़े हिस्से का पोषण आहार संभव हो सका, और करोड़ों बच्चों का विकास बेहतर हो सका। सामाजिक विकास के पैमानों को अगर तात्कालिक आर्थिक विकास और उत्पादकता से जोडक़र देखा जाएगा, तो वह एक गड़बड़ अनुमान ही सामने रखेगा। सरकार की ऐसी जनकल्याणकारी योजनाओं का दीर्घकालीन फायदा होता है, और कुछ दशक इनके चलते रहने के बाद इनका फायदा पाने वाली आबादी की औसत उम्र में भी बेहतरी दिखेगी, और इनकी उत्पादकता में भी। अब पूरे देश में यह बात निर्विवाद रूप से मान ली गई है कि देश की करीब आधी आबादी को रियायती या नि:शुल्क अनाज देना जरूरी है, और उसे पाना उनका बुनियादी हक है।
लोगों ने सुप्रीम कोर्ट की इस अतिरिक्त दिलचस्पी को लेकर भी उसकी कड़ी आलोचना की है कि उसके सामने देश की राजनीति को साफ करने के लिए दर्जनों जलते-सुलगते मामले खड़े हैं, लेकिन वह उनकी सुनवाई नहीं कर रही है, बल्कि चुनावी लुभावनी घोषणाओं का विश्लेषण करने में लगी है जो कि संसद और विधानसभाओं का काम होना चाहिए। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार का यह हक रहता है कि वह संविधान के दायरे के भीतर अपनी मर्जी से बजट के मुद्दे तय करे। अगर वह गलत फैसले लेती है तो पांच बरस बाद उसे फिर जनता के बीच जाना पड़ता है, और उसका हिसाब-किताब जनता ही चुकता करती है। जहां तक लुभावनी घोषणाओं पर सरकारों का दीवाला निकल जाने के खतरे की बात है, तो उसके लिए भी देश-प्रदेश में विपक्ष भी है, केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के सलाह-मशविरे भी हैं, मीडिया भी है, और जनता के बीच से भी आवाज उठती है। इसलिए अगर कोई विशेषज्ञ कमेटी बुनियादी लोकतांत्रिक मुद्दों को तय करेगी, तो उसका सोचने का नजरिया गरीबों के खिलाफ होने का एक बहुत बड़ा खतरा है।
यहां पर तमिलनाडु के वित्त मंत्री पीटीआर का कल का एक टीवी इंटरव्यू देखने लायक है जिसमें उन्होंने सवाल पूछ रहे उत्साही चैनल-मुखिया को बेजवाब कर दिया। प्रधानमंत्री ने जनता को दिए जाने वाले रियायती सामानों को लेकर या दूसरी छूट को लेकर रेवड़ी जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था, और इस बारे में तमिल वित्त मंत्री ने कहा कि राज्यों से किस आधार पर प्रधानमंत्री अपनी नीतियां बदलने को कह सकते हैं? उन्होंने कहा कि या तो कोई संवैधानिक आधार होना चाहिए तो आप जो कहेंगे उसे हम सब सुनेंगे, या फिर आपकी कोई ऐसी विशेषज्ञता होनी चाहिए, आपके पास अर्थशास्त्र में दोहरी पीएचडी होनी चाहिए, या फिर आपको नोबेल पुरस्कार मिला होना चाहिए, या फिर कोई ऐसी बात होनी चाहिए जो बताए कि आप हमसे बेहतर हैं। या आपका काम का रिकॉर्ड ऐसा हो जो बताए आपने अर्थव्यवस्था को आसमान पर पहुंचा दिया है, या कर्ज को जमीन पर ला दिया है, या प्रति व्यक्ति आय बढ़ा दी है, या रोजगार खड़े कर दिए हैं। तमिलनाडु के वित्त मंत्री ने कहा कि जब इनमें से कोई बात सच नहीं है तो हम उनके नजरिए से क्यों देखें? उन्होंने कहा कि तमिलनाडु ने बहुत से पैमानों पर केंद्र सरकार से बेहतर काम किया है, ऐसे में यह राज्य प्रधानमंत्री के कहे अपनी नीतियां क्यों बदले? उन्होंने कहा कि क्या यह स्वर्ग से आ रहा कोई संविधानेतर हुक्म है? तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके सुप्रीम कोर्ट गई है और उसने इस मामले में फ्रीबीज (बोलचाल की जुबान में रेवड़ी) की परिभाषा तय करने की मांग की है, और कहा है कि जनजीवन को सुरक्षित रखने के लिए और आर्थिक न्याय के लिए लिए जाने वाले फैसले फ्रीबीज नहीं कहे जा सकते।
अभी यह बहस अगले कुछ हफ्ते या कुछ महीने चलती रहेगी, और सुप्रीम कोर्ट शायद ही सरकार से यह पूछ सकेगी कि देश के बड़े कारोबारियों को बैंकों से दिए गए कर्ज का दस-दस लाख रुपया डूब जाना किस आकार की रेवड़ी कहलाएगा? और यह भी कि राष्ट्रीय सूचना आयोग के बार-बार के आदेश के बाद भी देश के राजनीतिक दल उन्हें मिले चंदे का हिसाब देने को तैयार क्यों नहीं हैं? क्या बड़े कारोबारियों से उन्हें मिलने वाला मोटा देशी और विदेशी चंदा भी रेवड़ी कहलाएगा, या कुछ और?
गुजरात में हत्यारे-बलात्कारी लोगों की रिहाई को दिसंबर के चुनाव से जोडक़र देखें!
17 अगस्त 2022
गुजरात में गोधरा कांड के बाद 2002 में हुए
मुस्लिम विरोधी दंगों में एक मुस्लिम युवती बिलकिस बानो के परिवार पर हमला
हुआ था, भीड़ ने इस पांच महीने की गर्भवती युवती की तीन साल की बेटी को मार
डाला था, परिवार के सात लोगों का कत्ल कर दिया था, और बिलकिस के साथ
गैंगरैप किया था। 2002 के इस मामले पर प्रदेश के बाहर हुई सुनवाई में 2008
में सीबीआई कोर्ट ने मुंबई में ग्यारह लोगों को उम्रकैद सुनाई थी जिसे कि
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कायम रखा था। इसके बाद पन्द्रह बरस कैद काटने के बाद
इन्होंने सजा माफी के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की, और अदालत ने राज्य
सरकार को इस पर विचार करने कहा। राज्य सरकार की एक कमेटी ने इन सारे लोगों
को पन्द्रह अगस्त को उस वक्त रिहा किया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ
घंटे पहले ही लालकिले पर से महिलाओं के सम्मान की अपील करके हटे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने इन लोगों की सजा माफी करने को नहीं कहा था, उस पर विचार
करने कहा था, और यह गुजरात सरकार का अपना फैसला है, जिसे वह आज सुप्रीम
कोर्ट का नाम लेकर बचने की कोशिश कर रही है। इस एक खबर ने प्रधानमंत्री की
एक बड़ी घोषणा को पल भर में खोखला साबित कर दिया क्योंकि गुजरात की राज्य
सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी ही है, और ऐसा तो हो नहीं सकता
कि वह राज्य सरकार अपनी पार्टी और अपने गृहमंत्री, प्रधानमंत्री को बताए
बिना इतना नाजुक फैसला ले। यह भी समझने की जरूरत है कि केन्द्र सरकार के
ऐसे बहुत से निर्देश पहले से हैं, 2014 की एक सजामाफी नीति भी है जिसमें
साफ लिखा है कि बलात्कार जैसे भयानक अपराधों के मुजरिमों को माफी नहीं दी
जाएगी। गुजरात सरकार के इस फैसले के बाद जानकार वकीलों का कहना है कि राज्य
का यह फैसला केन्द्र की इसी नीति के तहत होना था।
लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के मुख्य न्यायाधीश की मौजूदगी में अदालतों से विचाराधीन कैदियों को जल्द छोडऩे के बारे में कुछ कहा था। यह मामला विचाराधीन कैदियों का तो नहीं है, लेकिन यह राज्य सरकार के विवेक का मामला जरूर है जो कि सजा का एक वक्त पूरा हो जाने के बाद सजामाफी की अपील पर विचार कर सकती है। अब जब गुजरात सरकार के इस फैसले के बाद प्रधानमंत्री की हाल ही में कैदियों की रिहाई के बारे में कही गई बातों को देखें तो ऐसा लगता है कि क्या वे गुजरात की इस कार्रवाई के पहले एक जमीन तैयार कर रहे थे?
स्वतंत्रता दिवस के दिन जब इन कैदियों को रिहा किया जा रहा था तो जिस तरह से उन्हें मालाएं पहनाई गईं, उनकी आरती उतारी गई, उससे भी देश बहुत विचलित है। प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर देश भर में यह विवाद चल ही रहा था कि देश में उनके समर्थक और प्रशंसक महिलाओं पर सबसे अधिक ओछे हमले करने के लिए जाने जाते हैं, और खुद प्रधानमंत्री ने पिछले बरसों में महिलाओं के बारे में बहुत से आपत्तिजनक बयान दिए थे। इसके ठीक बाद जब गुजरात में हत्यारों और बलात्कारियों की रिहाई ऐसे दिन को छांटकर की गई, तो उसकी तस्वीरें और उसके वीडियो देखकर लोग हक्का-बक्का रह गए। यहां पर इस बात को समझने की जरूरत है कि चार महीने बाद दिसंबर में गुजरात में विधानसभा के चुनाव होने हैं, और वहां के पिछले कई चुनाव हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक आक्रामक ध्रुवीकरण करके भाजपा ने जीते थे, और 2014 के पहले तक तो नरेन्द्र मोदी ही वहां के कई बार के मुख्यमंत्री थे। ऐसे में अभी हिन्दुस्तान के इतिहास के सबसे चर्चित साम्प्रदायिक हमले के इन ग्यारह गुनहगारों को जिस तरह जेल से छोड़ा गया है, जिस तरह उनका स्वागत हुआ है, उससे लगता है कि यह चुनाव के ठीक पहले का एक ऐसा सरकारी फैसला है जिसका निशाना तात्कालिक ध्रुवीकरण पर है। देश के सबसे मुखर मुस्लिम नेता, असदुद्दीन ओवैसी ने कल से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा, और गुजरात की भाजपा सरकार पर बड़ा तीखा हमला शुरू कर दिया है, और कल ही विश्व हिन्दू परिषद ने उसका बड़ा लंबा आक्रामक जवाब दिया है। मतलब यह कि यह नूरा कुश्ती अगले कुछ महीनों में चुनाव का एक अखाड़ा बनाने में लग गई है। ओवैसी को हम पहले भी भाजपा के चुनाव अभियान में शामियाना खड़ा करने वाला लिख चुके हैं, और आज वे जितने अधिक हमलावर तेवर दिखाएंगे, वह दिसंबर के चुनाव में भाजपा के उतने ही अधिक काम आएगा। जाहिर है कि इस रिहाई से गुजरात की मुस्लिम बिरादरी बहुत बुरी तरह विचलित रहेगी, और गुजरात का इतिहास बताता है कि विचलित मुस्लिम बिरादरी हिन्दुओं के ध्रुवीकरण का काम करती है। इस बात को कुछ हफ्ते पहले उन दो लोगों की गिरफ्तारी से न जोडऩा ठीक नहीं होगा जिन्हें गुजरात दंगों के बाद मोदी सरकार के खिलाफ बागी तेवरों वाला माना गया था क्योंकि वे मुस्लिमों के हक की लड़ाई लड़ रहे थे, या दंगों में मोदी सरकार के रूख को लेकर जिन्होंने बयान दिए थे। सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़, और एक रिटायर्ड आईपीएस पुलिस अफसर आर.बी. श्रीकुमार को गिरफ्तार किया गया, और जिला अदालत से उन्हें जमानत देने से मना कर दिया गया है। दिसंबर के चुनावों के पहले कुछ महीने पहले की इन घटनाओं को चुनाव से न जोड़ऩा मुमकिन नहीं है, खासकर तब, जब मोदी की भाजपा चुनाव के वक्त के एक-एक दिन को अपने पक्ष में तय करने की चतुराई रखती है। वह हिन्दुस्तान के किसी मतदान के दिन नरेन्द्र मोदी को नेपाल के मंदिरों में घूमता दिखाती है, तो किसी और मतदान के दिन बांग्लादेश के मंदिरों में। टीवी पर दिन-दिन भर मंदिरों में छाए हुए मोदी भारत की किसी चुनावी आचार संहिता से भी बचे रहते हैं। इसलिए अभी गुजरात में हक्का-बक्का कर देने वाली यह रिहाई पूरी तरह से कानून की भावना के खिलाफ है, केन्द्र सरकार की 2014 की नीतियों के खिलाफ है, और चुनावी ध्रुवीकरण की गारंटी करने वाली है।













