दीवारों पर लिक्खा है, 31 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

परिवार और कारोबार, दोनों मिलकर बदन से निकाल रहे हैं दुश्मनी

 31 जुलाई 2026  

 

महाराष्ट्र सरकार ने यह तय किया है कि स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में जंकफूड नहीं बिकने दिया जाएगा। इसका मकसद बच्चों को ऐसे खानपान से दूर रखना है जिसमें शक्कर अधिक हो, नमक और फैट अधिक हो, और जिनसे शरीर को कोई पोषण तत्व बहुत कम हों। समाचार बताता है कि इस लिस्ट में समोसा, वड़ापाव, चिप्स, कोल्डड्रिंक, मीठे पेय पदार्थ, चॉकलेट, कैंडी, पैकेट वाले स्नैक्स, और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ शामिल हैं। महाराष्ट्र सरकार का यह मानना है कि बच्चों में मोटापा, डायबिटीज, दिल के रोग, और जीवनशैली संबंधी दूसरी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। लेकिन महाराष्ट्र से परे दूसरे राज्यों में ऐसी कोई पहल सुनाई नहीं पड़ रही है। 

भारत का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) बताता है कि बच्चों और किशोरों में मोटापा लगातार बढ़ रहा है, वयस्कों में भी अधिक वजन पिछले दशक में तेजी से बढ़ा है। भारत में दस करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीडि़त हैं, और बड़ी संख्या में लोग प्री-डायबिटीक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बचपन में मोटापा रोका नहीं गया, तो अगली पीढ़ी में टाईप-2 डायबिटीज पहले के मुकाबले कम उम्र में ही दिखने लगेगा। अब भारत में सिर्फ संपन्न बच्चों के अधिक प्रोसेस्ड खानपान बढऩे से अगर ऐसा हुआ रहता, तो भी बात समझ में आती। इस देश में गरीबों के बीच भी डायबिटीज बढ़ रहा है, और गरीबों के बच्चे भी फैक्ट्रियों के बने पैकेटबंद अधिक नमक-शक्कर-फैट वाले खानपान के आश्रित हो गए हैं। गरीब मजदूर मां-बाप भी पकाने का वक्त न होने पर आसपास की किसी दुकान से ऐसे सामान खरीदकर बच्चों को बहला लेते हैं। 

एक दूसरी दिक्कत यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बनाया हुआ जो खानपान भारत में उपलब्ध है, उनमें सेहत के लिए नुकसानदेह नमक-शक्कर-फैट, और दूसरे किस्म के रसायनों की भरमार है, जबकि यही कंपनियां अमरीका और योरप जैसे अधिक जागरूक देशों में इन्हीं ब्रांड के इन्हीं सामानों में इन नुकसानदेह तत्वों की मात्रा बहुत कम रखते हैं। चॉकलेट से लेकर कोल्डड्रिंक तक, और दूसरे तमाम पैकेटबंद खानपान तक ये कंपनियां हिन्दुस्तानी कानून कमजोर होने, और उस पर अमल बहुत ढीला होने की वजह से ग्राहकों के लिए भारी नुकसानदेह सीमा में जाकर भी उनकी जुबान को अपने स्वाद का आदी बनाने का हमलावर बाजारू काम करती हैं। दुनिया के जिम्मेदार देश सामानों की पैकिंग पर, उनके इश्तहारों में, नुकसानदेह बातों को प्रमुखता से दिखाने पर जोर डालते हैं। भारत में कानून जनता की सेहत के हिसाब से नहीं बनाए गए हैं, और कारोबारियों की मर्जी से नियम-कानून बनते हैं, और उन पर अमल तो कैसा होता है, यह भारत के किसी भी आम सरकारी कामकाज को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है। महाराष्ट्र का स्कूलों के आसपास ऐसा जंकफूड न बिकने देने का फैसला जमीन पर जितना असर डालेगा, उससे कहीं अधिक असर लोगों की सोच पर डालेगा, और इससे पैदा होने वाली हलचल से लोगों को यह समझ आएगा कि यह खानपान कितना नुकसानदेह है, और देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा किस खतरे की तरफ बढ़ रहा है। 

भारत कई तरह की दिक्कतों से गुजर रहा है। इस देश से भुखमरी खत्म हो गई है क्योंकि सरकार की कई तरह की राशन योजनाओं से सबसे गरीब लोगों को बिना दाम, या लगभग बिना दाम अनाज मिल जाता है। फिर गरीबी रेखा के ऊपर के लोग भी रियायती अनाज पाते हैं, और उनकी मजदूरी इतनी हो गई है कि वो परिवार का पेट भरने जितना अनाज ले सकते हैं। दिक्कत एक दूसरी है कि यह खानपान पूरी तरह से अन्न-आधारित है, इसमें दूसरे पोषक तत्व जरा भी नहीं हैं। गेहूं, चावल, मक्का, जैसे अनाजों से जिंदा रहने की ताकत तो मिल जाती है, लेकिन सबसे गरीब आबादी के अधिकतर हिस्से के पास फल, सब्जी, दूध, अंडा जैसे दूसरे पोषक तत्वों के लिए कोई इंतजाम नहीं है। इससे भी लोगों का खानपान उन्हें एक स्वस्थ बदन नहीं दे पाता। देश में धार्मिक आधार पर दूसरों के खानपान तय करने की जिद ने भी करोड़ों लोगों को बदन के लिए जरूरी प्रोटीन से दूर कर दिया है। पश्चिम बंगाल का उदाहरण एकदम ताजा है, जहां पर भाजपा सरकार आते ही कोलकाता की स्कूलों में दोपहर के भोजन का काम एक हिन्दू धार्मिक संगठन इस्कॉन को दे दिया गया, और उसने मिड-डे-मील से अंडा बंद कर दिया। कई हफ्तों से इसे लेकर वहां आबादी के एक बड़े हिस्से के बीच विरोध चल रहा था, और अभी कल-परसों ही सरकार की घोषणा आई है कि वहां इस्कॉन के परोसे जाने वाले दोपहर के भोजन से अलग अंडा भी दिया जाएगा। इस तरह भारत में खानपान को लेकर एक अलग किस्म की दिक्कत चल रही है, और इस देश की अधिकतर आबादी के खानपान में प्रोटीन की कमी है। शाकाहारियों के भोजन में प्रोटीन की कमी रहती है, और दूसरे लोगों के खानपान में भी मांसाहार पर लगी तरह-तरह की रोक-टोक से प्रोटीन का संकट आ खड़ा हुआ है। 

लोगों के बीच खानपान को लेकर जागरूकता की बड़ी कमी है। आमतौर पर बदन की शक्कर की जरूरत का एक बहुत छोटा हिस्सा ही प्रोसेस की हुई मीठी चीजों से मिलना चाहिए, और बाकी की मिठास खानपान की दूसरी प्राकृतिक चीजों से मिलनी चाहिए। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि चीजों में मिलाई गई शक्कर किसी व्यक्ति के दिन भर की कैलोरी के दस प्रतिशत से कम होना चाहिए, और बाकी का ग्लूकोज गेहूं-चावल, ज्वार-बाजरा, दाल-फल, दूध-सब्जी जैसी चीजों से मिलना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन यह भी कहता है कि अधिक अच्छा यह होगा कि बदन की ग्लूकोज-जरूरत का पांच फीसदी से कम हिस्सा ही मिलाई गई चीनी से आए। लेकिन जब बच्चों के खानपान में कोल्डड्रिंक, बिस्किट, केक-मिठाई, जूस, चॉकलेट, आइस्क्रीम, ब्रेकफास्ट सीरियल इन चीजों को देखें, तो संपन्न परिवारों के बच्चों को 90 फीसदी ग्लूकोज मिलाई हुई शक्कर से मिलता है, और यही वजह भारत में आबादी के कम उम्र में ही डायबिटीज हो जाने के खतरे के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। देश में इस जागरूकता की जरूरत है कि बच्चों-बड़ों, किसी को भी कारखाने में बनी चीनी, या चीनी मिले हुए सामानों की कोई भी जरूरत नहीं रहती है। लेकिन आज हालत यह है कि 250 एमएल सॉफ्टड्रिंक की एक बोतल ही किसी को डब्ल्यूएचओ की सुझाई गई सीमा से अधिक शक्कर दे देती है। 

संपन्न बच्चे अपने आसपास होने वाली दूसरे बच्चों की दावतों में आए दिन इसी तरह का खाते हैं, घरों में फ्रिज रहते हैं, उनमें से ऐसी ही चीजें निकालकर खाते हैं, और अब तो मोबाइल पर भेजे गए एक संदेश पर ही घर बैठे आइस्क्रीम या चॉकलेट पहुंच जाते हैं, जो कि एक दिन में ही एक बच्चे को हफ्ते भर से अधिक की शक्कर दे देते हैं। यह सिलसिला इतना खतरनाक हो चुका है कि डायबिटीज की दवा बनाने वाली कंपनियां चैन की नींद सो रही होंगी कि भारत में उनका बाजार बिना किसी मेहनत के लगातार बढ़ते ही चले जाना है। यह बाजार इसलिए भी बढ़ते चले जाना है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजाना मेहनत के कोई काम नहीं करता। लोगों की जीवनशैली में साइकिल, पैदल, खेलकूद, योग जैसी चीजें जगह नहीं बना पा रही हैं। नतीजा यह हो रहा है कि बाजार के बाजारू हमले से खानपान खतरनाक होते चल रहा है, जिसके खिलाफ कोई जागरूकता नहीं है, और सेहतमंद जीवनशैली की कोई सोच नहीं है। महाराष्ट्र सरकार के स्कूलों से जुड़े इस फैसले की वजह से हमें एक बार इस मुद्दे पर लिखने का मौका फिर से मिला है, जरूरी यह है कि अधिक से अधिक परिवारों को मिसाल देकर यह समझाया जाए कि उनके खानपान की कौन-कौन सी चीजें उन्हें खतरे में डाल रही हैं। इससे अधिक सरकार अपने नियमों में फेरबदल करके कर सकती है, यह बहुत हक्का-बक्का करने वाली बात है कि जो कंपनियां विकसित देशों में जिम्मेदार हैं, वे हिन्दुस्तान में कारोबारी जुर्म करने का ऐसा दुस्साहस रखती है।

(Daily Chhattisgarh)   

टेक्नॉलॉजी लोकतांत्रिक अधिकारों को दे रही है एक अभूतपूर्व ताकत...

30 जुलाई 2026  

 

इन दिनों मोबाइल फोन के वीडियो-कैमरों, और सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से, फिर मोबाइल फोन की कॉल रिकॉर्डिंग से, नेताओं और अफसरों की तरह-तरह की बददिमागी सामने आती है। फिर दूसरी मेहरबानी सोशल मीडिया की है जिसकी वजह से बिना किसी खर्च से ऐसी सनसनीखेज बातें चारों तरफ फैल जाती हैं। इनमें से अधिकतर बातों को देखकर यह लगता है कि अगर यह वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो कोई इन बातों पर भरोसा भी नहीं करते, और सरकार या अदालत को कोई कार्रवाई भी नहीं करनी पड़ती। अब तो मजबूरी में कभी-कभी लोग ऐसी रिकॉर्डिंग में फंस जाते हैं। यह देखकर लगता है कि निजी जिंदगी के मुद्दों को छोडक़र बाकी हर तरह की सार्वजनिक, या सरकारी बातों की रिकॉर्डिंग क्यों नहीं हो जानी चाहिए? 

विकसित और लोकतांत्रिक देशों में पुलिस के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे अपनी यूनिफॉर्म के सामने एक कैमरा टांगकर रखें, जो कि उनकी कार्रवाई की रिकॉर्डिंग करता चले। कई जगहों पर ऐसी रिकॉर्डिंग पुलिस कंट्रोलरूम तक लगातार जाती भी रहती है, और अगर पुलिस कोई ज्यादती करती है, तो वह भी तुरंत ही कंट्रोलरूम में दर्ज होती जाती है। भारत के कुछ प्रदेशों में पुलिस के लिए ऐसे कैमरे लिए गए, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने से पुलिस बचती रही, और कई प्रदेशों में ये कैमरे एक बार भी इस्तेमाल हुए बिना खत्म हो गए। लेकिन हम महज जंतर-मंतर के प्रदर्शन और उस पर पुलिस कार्रवाई की बात नहीं कर रहे, जहां कहीं भी पुलिस कार्रवाई होती है, या सरकारी दफ्तर में अफसरों और बाबुओं का जो बर्ताव होता है, वह रिकॉर्ड करने में क्या हर्ज है? सरकारी दफ्तरों, अदालतों, या म्युनिसिपलों और पंचायतों में भी लोगों से बड़ी बदसलूकी होती है, ऐसे में अगर लोगों को यह हक रहे कि वे अपनी बातचीत की रिकॉर्डिंग कर सकें, तो सरकारी व्यवहार सुधर जाएगा। आज बहुत कम लोग ऐसे हैं जो होशियारी से इस तरह की रिकॉर्डिंग कर लेते हैं, अधिकतर लोग तो इतना हौसला नहीं जुटा पाते, क्योंकि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी हों, या निर्वाचित नेता हों, वे रिकॉर्डिंग देखते ही हमला करने लगते हैं, बहुत से लोगों के मोबाइल फोन तोड़ दिए जाते हैं, रिकॉर्डिंग मिटा दी जाती है। 

हमारा यह मानना है कि निजी जिंदगी की बातों को छोडक़र सरकार से औपचारिक बातचीत के सिलसिले की रिकॉर्डिंग की एक कानूनी छूट रहनी चाहिए। और यह छूट सिर्फ राजा और प्रजा के बीच नहीं रहनी चाहिए, राज्य के अपने ढांचे के भीतर भी अगर कोई सत्तारूढ़ नेता, या अफसर किसी मातहत को कोई निर्देश देते हैं, तो दोनों ही पक्षों को उसकी रिकॉर्डिंग की औपचारिक अनुमति रहनी चाहिए। यह होने से गलत काम के लिए कहना भी बंद हो जाएगा, और किसी जांच की नौबत आने पर ऐसी रिकॉर्डिंग सुबूत के तौर पर काम भी आएगी। आज हालत यह रहती है कि सरकार के ढांचे में ऊपर बैठे लोग अपने मातहत लोगों से जुबानी निर्देश देकर ही अधिकतर काम करवा लेते हैं, और फाइलों पर वैसे आदेश करने से बचते हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए। आज जब टेक्नॉलॉजी ने पारदर्शिता और लोकतंत्र के कुछ नए पैमाने तय करने की सहूलियत दी है, तो फिर उसका इस्तेमाल करना चाहिए। आज इस लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी अदालतों की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग होती है, संसद या विधानसभाओं की कार्रवाई की पूरी रिकॉर्डिंग होती है, फिर चाहे इन सबमें से कुछ चुनिंदा का प्रसारण होता हो, और बाकी रिकॉर्ड में रहती हो। ऐसा ही पुलिस की कार्रवाई में भी होना चाहिए, और अगर पुलिस कोई ज्यादती नहीं करती है, तो यह उसके अपने बचाव में एक सुबूत की तरह काम आएगी। 

सुप्रीम कोर्ट ने देश के हर थाने में सीसीटीवी कैमरे लगवाने का आदेश दिया था, और कमोबेश हर राज्य उस पर अमल भी कर रहे हैं। अब ऐसे कैमरों की क्षमता और पहुंच को बढ़ाने के लिए भी कहा गया है, और उसके लिए केन्द्र सरकार भी राज्यों की आर्थिक मदद कर रही है। कुल मिलाकर टेक्नॉलॉजी 21वीं सदी की सबसे बड़ी, और सबसे भरोसेमंद गवाह बन रही है, सुबूत बन रही है। सार्वजनिक जगहों पर लगे कैमरों के अलावा थानों के भीतर भी कैमरे लग रहे हैं, और अस्पतालों, या दूसरी सार्वजनिक आवाजाही की जगहों पर भी। इन सबका फायदा समाज को मिल रहा है। अभी मुम्बई में सत्तारूढ़ पार्टी का एक पार्षद एक सरकारी अस्पताल में घुसकर डॉक्टर और महिला कर्मचारियों को पीटता हुआ रिकॉर्ड हुआ, तो उसकी गिरफ्तारी भी हुई, और हाईकोर्ट ने उसे जमानत देने से भी इंकार कर दिया। 

टेक्नॉलॉजी अगर निजी जिंदगी की निजता में दखल नहीं दे रही है, तो फिर सार्वजनिक जीवन में एक सुबूत के तौर पर वह एक बड़ा पुख्ता औजार है, और किसी जुर्म के खिलाफ तो वह एक कानूनी हथियार भी है। आज भी लोगों के बीच हो रही हिंसा, कोई सडक़ हादसा, किसी और तरह का जुर्म, इन सबको रिकॉर्ड करने के लिए कैमरों जैसे उपकरण बड़े मददगार हो रहे हैं, और वे अगर नहीं रहते, तो पुलिस न कई तरह के जुर्म सुलझा पाती, और न ही अदालत में किसी को मुजरिम साबित कर पाती। देश के कानून में तो ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल जायज है, लेकिन सरकार के भीतर, सरकारे के ढांचे के लोगों के बीच भी इसकी एक औपचारिक इजाजत होनी चाहिए, जिसके बिना इसे अभी भी चोरी-छिपी रिकॉर्डिंग, या स्टिंग ऑपरेशन माना जाएगा, और उसे शासकीय सेवक के आचरण के खिलाफ दर्ज किया जाएगा। इसे पूरी तरह औपचारिक और कानूनी बना देने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

सुप्रीम कोर्ट के एक शब्द से बिल से निकले तिलचट्टे, और आज का अदालती रूख

 29 जुलाई 2026  

 

जंतर-मंतर को लेकर पहले तो पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट तुरंत कुछ सुनना नहीं चाहती थी, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक जुबानी टिप्पणी चारों तरफ घूमती रही कि उनके पास इस जुबानी जिक्र को सुनने को समय नहीं है, बाद में उन्होंने मीडिया की रिपोर्टिंग को गलत करार दिया, और कहा कि उनके सामने कोई याचिका नहीं आई थी, एक वकील ने सिर्फ जिक्र किया था जिस पर वे सुनवाई नहीं कर सकते थे। इस तरह वे भारत के ऐसे पहले मुख्य न्यायाधीश हो गए हैं जिन्हें दस हफ्तों के भीतर अपनी जुबानी टिप्पणियों के लिए दो बार मीडिया पर गलतबयानी की तोहमत लगानी पड़ी। अब जब जंतर-मंतर पर, और संसद की राह पर दिल्ली पुलिस ने निहत्थे और लोकतांत्रिक आंदोलनकारियों पर जो हमले किए, जिस तरह से लाठियों से उनके सिर और पैर तोड़े, जिस तरह पैलेट गन के छर्रे लोगों के बदन में घुसे मिल रहे हैं, और जिस तरह बिहार में एके-47 नाम की असॉल्ट रायफल से पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोलियां चलाई हैं, उन सब पर जब बहुत से लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब सुप्रीम कोर्ट ने उसे सुनना तय किया, दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा, लेकिन राहत महज इतनी दी कि जिन बेदाग लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उन्हें छोड़ा जाए। 

अब किसी आंदोलन में शामिल लोगों में बेदाग किसे करार दिया जाए? किसी की अपने पड़ोसी से कोई झड़प हुई हो, और पुलिस में एक मामला दर्ज हो, किसी का सडक़ पर किसी से झगड़ा हुआ हो, और उसका मामला दर्ज हो, तो वह भी पुलिस की जुबान में बेदाग नहीं कहलाएगा। देश की राजधानी में कई विश्वविद्यालय हैं, और लाखों छात्र पढ़ते हैं, ऐसे में छात्र आंदोलन चलते ही रहते हैं, किसी और आंदोलन में जिन लोगों के खिलाफ पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया होगा, उन लोगों को भी पुलिस अब बेदाग मानने से इंकार कर देगी। सुप्रीम कोर्ट का एक शब्द सैकड़ों-हजारों नौजवानों पर भारी पड़ सकता है, और जो दिल्ली पुलिस छात्रों पर पैलेट गन चला रही है, छात्राओं  के बदन में लाठी घुसा रही है, महिला को थप्पड़ मार रही है, वह पुलिस हर किसी को दागदार साबित करने पर जुट जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि पहले किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज रहा होगा, लेकिन वे अगर जंतर-मंतर पर शांत हैं, तो उन्हें बेदाग होने की शर्त से क्यों लादा जा रहा है? यह तो सुप्रीम कोर्ट इनकी बातों को सुनता भी नहीं, लेकिन जब बड़े-बड़े वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के अहाते में ही कैमरों के सामने खड़े होकर छात्रों के मुद्दों का समर्थन किया, आंदोलन के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकार को गिनाया था, और यह सब करने के बाद राष्ट्रगान भी गाया था, तो वकीलों का यह रूख देखकर चीफ जस्टिस का एक-दो दिन पहले का रूख पिघला, और इस बार छात्रों पर जुल्म करने वाली दिल्ली पुलिस पर सुनवाई हुई। यह तो अदालत के बाहर भी अभी साबित हो चुका है कि राजधानी के एक बड़े पुलिस अफसर के आदेश पर आंदोलनकारियों पर पैलेट गन चलाई गई थी, जो कि शायद सरकार के ही नियमों के खिलाफ थी। यह तो अगर आंदोलनकारियों के बदन को छलनी की तरह छेदने वाले छर्रों के फोटो और वीडियो मौजूद नहीं रहते, खोजी पत्रकारों ने अगर पुलिस का यह आदेश ढूंढ नहीं निकाला होता, तो पुलिस तो पैलेट गन की बात मानने को तैयार ही नहीं थी। 

सुप्रीम कोर्ट का रूख बहुत ही निराश करता है। जजों के अपने राजनीतिक पूर्वाग्रह हो सकते हैं, चीफ जस्टिस को इस बात का मलाल हो सकता है कि उनके कहे हुए एक शब्द, कॉकरोच को लेकर इस देश के इतिहास का एक खासा बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया, और इस आंदोलन के चलते हर दिन देश और दुनिया इस बात का जिक्र भी कर रहे हैं कि यह तिलचट्टा किस बिल से निकला है। आमतौर पर आंदोलनों को सरकारें कुचलने की कोशिश करती हैं, और अदालतें उनमें आंदोलनकारियों के अधिकार बचाने की। इस बार उल्टा हुआ है, आंदोलनकारियों को पहली राहत सरकार से मिली है, उसकी चाहे जो भी वजह रही हो, और सुप्रीम कोर्ट उसी शहर में बैठे हुए भी शांतिपूर्ण, निहत्थे, लोकतांत्रिक आंदोलनकारी नौजवानों को कोई भी राहत देने में पिछड़ गया। अब जब खींचतान कर सुप्रीम कोर्ट इस आंदोलन में गिरफ्तार लोगों के बारे में सुनवाई कर भी रहा है, एक राहत सी दिखती हुई कोई चीज दे भी रहा है, तो भी वह बेदाग लोगों को ही छोडऩे की एक ऐसी शर्त जोड़ रहा है जिसका बेजा इस्तेमाल करने का भरपूर मौका और अधिकार दिल्ली पुलिस को मिल जाएगा। इतने जुल्म ढाने वाली दिल्ली पुलिस के हाथ में इस तरह का एक हथियार देना सुप्रीम कोर्ट की एक गलत उदारता है, और आंदोलनकारी कॉकरोच जनता पार्टी ने यह आपत्ति ठीक ही की है कि ऐसी शर्त जोडक़र सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का साथ दिया है। यह बड़ी अजीब सी नौबत है कि एक तरफ सरकार आंदोलनकारियों से बातचीत का लोकतांत्रिक तरीका दिखाकर अपने मंत्री का इस्तीफा ले रही है, और दूसरी तरफ अदालत इन्हीं आंदोलनकारियों में से बहुत से लोगों के खिलाफ कड़ाई बरतने का हथियार पुलिस को दे रही है।

हिन्दुस्तान की अदालतों को कॉकरोच या तिलचट्टा शब्द से एक जाहिर परहेज हो सकता है, लेकिन ऐसा परहेज अगर अदालती रूख में झलकेगा, तो इससे अदालत का कोई लोकतांत्रिक सम्मान नहीं बढऩे जा रहा। हम अदालत को संविधान से परे सिर्फ जनभावनाओं पर काम करने जैसी कोई बात नहीं सुझा रहे, लेकिन जब सत्ता की पूरी ताकत किसी भी निहत्थे और शांत आंदोलनकारियों पर टूट पड़ती है, तो लोकतंत्र तो अदालत की तरफ ही देखता है कि वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा निराश किया है। बहुत देर से इस मामले को सुना है, और बहुत कम राहत दी है। टू लेट, एंड टू लिटिल। लोकतंत्र में संसद, अदालत, और सरकार के बीच शक्तियों का संतुलन इसीलिए बनाया गया था कि जब कभी इनमें से कोई एक बददिमाग हो जाए, तो बाकी दो के पास उसे काबू में करने की ताकत रहे। इस मामले में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था कम से कम कागजों पर तो अमरीका के आज के बददिमागी के शिकार लोकतंत्र के मुकाबले बहुत अच्छी है, दूसरी तरफ वह ब्रिटेन के शाही घराने से ग्रस्त लोकतंत्र से भी बहुत अच्छी है। लेकिन यह तभी अच्छी है, जब लोकतंत्र के ये तीनों स्तंभ अपनी-अपनी जगह पर रीढ़ की हड्डी ठीक से सीधी रखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर इस लोकतंत्र में संतुलन तीनों में से किसी एक स्तंभ की तरफ झुक जाने का खतरा रहता है, अमूमन सरकार की तरफ। भारत की न्यायपालिका को देश की जनता को इतना निराश नहीं करना चाहिए कि वह लोकतंत्र की रक्षा करने में अपनी जिम्मेदारी भी नहीं निभा पा रही है। 

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

जंतर-मंतर की लड़कियों से गैंगरेप सुझाने वाला विचारक!

28 जुलाई 2026  

 

ठीक जिस समय आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत समलैंगिकों के प्रति सहनशीलता रखने की बात कर रहे थे, और यह मान रहे थे कि एलजीबीटीक्यू लोगों में से कुछ को प्रकृति ने ही वैसे बनाए हैं, ठीक उसी समय केरल के आरएसएस के एक बड़े पुराने, बुजुर्ग, और प्रमुख विचारक टी.जी.मोहनदास कह रहे थे कि उनके काबू में होता, तो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर गोलियां चला देते, और वे जब मर जाते, तो उन्हें अस्पताल पहुंचा देते। यही नहीं उन्होंने इस आंदोलन में शामिल लड़कियों और महिलाओं के लिए कहा कि इस प्रदर्शन में आने वाली महिलाओं को गैंगरेप से भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ये लोग बलात्कार पसंद करती हैं। उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट करके ये बातें कहीं, और कहा कि वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाली ये आंदोलनकारी महिलाएं बलात्कार पसंद करती हैं। इस बयान से आरएसएस ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वह ऐसे बयानों की कड़ी निंदा करता है। संघ ने यह भी कहा कि मोहनदास अभी संघ में किसी जिम्मेदारी के पद पर नहीं है। लेकिन इसके पहले का मोहनदास का परिचय बताता है कि वे आरएसएस के कई संगठनों में अलग-अलग पदों पर रह चुके हैं, और भाजपा के भी बौद्धिक प्रकोष्ठ के केरल राज्य संयोजक थे। वे इसके पहले भी हिन्दुत्व के मुद्दों को लेकर अदालती लड़ाई भी लड़ते रहे हैं। वे लगातार लिखते हैं, और उनके लेख संघ परिवार के प्रकाशनों में छपते रहते हैं। 

ये बुजुर्ग विचारक तो इन बातों को कैमरे के सामने यूट्यूब पर बोलकर उजागर हो गए हैं, लेकिन लोग तरह-तरह से आंदोलनकारियों के खिलाफ हिंसक बातें कर रहे हैं। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले वीडियो में आंदोलनकारियों को शांत कर रहे हैं, दूसरे वीडियो में उनका आभार मान रहे हैं, सरकार के बड़े-बड़े मंत्री आंदोलनकारियों से बातें कर रहे हैं, उनका अनशन खत्म करवा रहे हैं, उनकी मांग पूरी करते हुए अपने मंत्री का इस्तीफा ले रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, या उसके हमखयाल लोगों की प्रतिक्रिया अब तक बहुत ही अश्लील और हिंसक तरीके से जारी है। एक तरफ तो इतने बड़े आंदोलन के सामने सरकार को, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो झुकना पड़ा, और परदे के पीछे की कोई नूरा कुश्ती रही होगी, तो हम अभी परदा हटाकर देख नहीं सकते, दूसरी तरफ सरकार के साथी या हिमायती माने जाने वाले लोग आंदोलनकारियों के बारे में जिस जुबान में बातें कर रहे हैं, उनसे सरकार का ही बड़ा नुकसान हो रहा है। अगर ये लोग गोलियों से मार डालने लायक थे, अगर इस आंदोलन की लड़कियां और महिलाएं सामूहिक बलात्कार के लायक थीं, अगर ये लोग देशद्रोही हैं, गद्दार हैं, पाकिस्तानी एजेंट हैं, तो फिर सरकार ने इनसे बात क्यों की थी? एक तरफ तो सरकार ने वक्त रहते इस आंदोलन को सुलझाने की, लचीलापन दिखाने की वाहवाही पाई है। दूसरी तरफ इस आंदोलन की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं है कि लुके-छिपे अंदाज में ये खबरें आ रही हैं कि दिल्ली और बिहार में आंदोलनकारियों पर कितने किस्म के जुर्म दर्ज किए जा रहे हैं। सरकारी एजेंडे पर सार्वजनिक रूप से बोलने वाले अश्लील और हिंसक बातें कर रहे हैं। इससे सरकार ही कमजोर साबित हो रही है कि अगर आंदोलनकारी इतने ही बुरे और घटिया थे, तो सरकार उनसे बात करके उनकी मांगों पर झुकी क्यों? और मंत्रियों से इस्तीफा न लेने की अपनी परंपरा को छोड़ा क्यों? अभी तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का वह वीडियो चारों तरफ तैर ही रहा है जिसमें वे कहते दिख रहे हैं कि यह यूपीए सरकार नहीं है, इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते। 

अब सरकार की फजीहत, और आंदोलनकारियों को अपमानित करके उकसाने से परे की बात अगर हम करें, तो केरल के इस हिन्दुत्व-आंदोलनकारी बुजुर्ग के बारे में भी सोचने की जरूरत है। यह लगातार संघ के संगठनों के ओहदों पर रहा, संघ के प्रकाशनों में लिखता रहा, और उम्र के इस पड़ाव पर आकर अगर वह ऐसी हिंसक और अश्लील बातें कर रहा है, तो इस विचारधारा के लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि सारी उम्र इसमें गुजार देने के बाद भी इस आदमी की सोच ऐसी है, तो दिक्कत कहां पर है? किसी भी संस्था, संगठन, या विचारधारा के लिए यह परले दर्जे की शर्मिंदगी की बात रहती है कि उसे अपने एक सबसे ही सक्रिय बुजुर्ग को धिक्कारना पड़े, उसकी कड़ी निंदा करनी पड़े। ऐसा संगठन के या विचारधारा के कोई नए लोग करें, तो भी समझ पड़ता है। जब संगठन के अपने इलाके के भीष्म पितामह ऐसा करने लगें, तो सारे कुल का अपमान होता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हर कुछ हफ्तों-महीनों में उदारता की कोई एक बात कहकर खबरों में रहते हैं, लेकिन इस दर्जे की अलोकतांत्रिक और हिंसक बात कहने वाले उनके अपने पुराने स्तंभों की सोच पर संगठन को कुछ और विचार भी करना चाहिए। जिस भारत में देश की प्रतीक ही भारतमाता कही जाती है, जहां पर देवियों की प्रतिमाओं की पूजा की परंपरा देश भर में है, वहां पर जीती-जागती छात्राओं को सामूहिक बलात्कार का मजा लेने वाली कहना सिर्फ निंदा और धिक्कार से दब जाने वाली बात नहीं है। इस बारे में केरल के किसी पदाधिकारी से ऊपर भी संघ के किसी को कुछ, कुछ अधिक कहना चाहिए। 

देश में जिस पार्टी, संगठन, या विचारधारा के समर्थक या अनुयायी लोकतंत्र के खिलाफ, देश के संविधान के खिलाफ, मानवता के खिलाफ बातें करते हैं, उनके खिलाफ धिक्कार उनके घर से निकलना चाहिए। ऐसे लोगों की निंदा बाकी समाज को करनी पड़े, और ये लोग खुद चुप बैठे रहें, तो इस चुप्पी से इनका सम्मान नहीं बढ़ता। अभी जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी नौजवानों में से कुछ के पोस्टर लोगों को बहुत बुरे लगे कि उनमें प्रधानमंत्री या दूसरे नेताओं के लिए अलग-अलग किस्म की गालियां इस्तेमाल की गई थीं। हजारों लोगों ने गालियों की इस जुबान को जमकर कोसा, और उसके जवाब में उससे भी गंदी गालियां भी दे डालीं। लेकिन इसी मौके पर कई लोगों ने यह भी याद दिलाया कि लोकसभा के भीतर भाजपा का एक सांसद जब एक दूसरे मुस्लिम सांसद को देशद्रोही और आतंकी कह रहा था, उसके धर्म का नाम लेकर गंदी, अश्लील, और हिंसक गालियां बक रहा था, तब हर्षवर्धन, और रविशंकर प्रसाद नाम के दो भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री उसके अगल-बगल बैठे मजा ले रहे थे, जोर-जोर से हँस रहे थे। अब जंतर-मंतर के नौजवानों ने इतनी गालियां कहां से सीखीं, तो इसके जवाब में लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि लोकसभा में भाजपा के सांसद रमेश विधुड़ी की दी हुई गालियां सुनकर नौजवानों ने भी अपनी गालियों को संसदीय माना। 

गंदी मिसालें किसी संगठन, संस्था, विचारधारा का सम्मान नहीं बढ़ातीं, बल्कि विरोधियों के लिए एक मिसाल छोड़ जाती हैं, और देश की जनता में जो सभ्य हिस्सा है, उसके बीच सम्मान खत्म करवा देती हैं। जो विचारधारा अपने आपको महान बताए, उसे तो अपने लोगों पर बेहतर काबू रखना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में गंदगी का सिलसिला खत्म करना चाहिए। अगर किसी को यह लगता है कि ताजा आंदोलनकारी पीढ़ी, जेन-जी किसी की दी हुई गंदी गालियों को सुनकर चुप रह जाएगी, तो उन्हें इस खुशफहमी से बाहर आ जाना चाहिए। यह पीढ़ी इस मोहनदास की बुढ़ापे की इज्जत को ठिकाने लगाने की ताकत अपनी चुटकियों पर रखती है। इस आदमी को लड़कियों के गैंगरेप की बात करने के पहले इतना तो सोचना था कि इसके माँ-बाप ने इसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी की तरह मोहनदास रखा था, किसी और बात की, अपने संगठन की इज्जत न भी रखनी होती, तो भी कम से कम गांधी के नाम की इज्जत तो रखनी थी। हालांकि सब कुछ जानते हुए हमें यह उम्मीद करनी नहीं चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)




 

अपने दिल-दिमाग के स्पंज को निचोडक़र जगह बनाएं

27 जुलाई 2026  

 

जंतर-मंतर के छात्र और नौजवान आंदोलन की वजह से एक बार फिर इस देश में गालियों, अश्लील टिप्पणियों, या उनके जवाब में हिंसक धमकियों, अश्लील बातों का सैलाब आया हुआ है। हमें तो अखबार के धंधे की वजह से खबरों को लगातार पढऩा पड़ता है, बहुत से वीडियो भी देखने पड़ते हैं, खासकर ऐसे जो कि टीवी की मिलावट से परे के, सोशल मीडिया के खालिस वीडियो रहते हैं। इन सबको देखते महीना हो रहा है, और अब दिमाग कुछ भारी होने लगा है, मन उचटने लगा है। ऐसा लगने लगा है कि चाहे कितना ही जमीनी मुद्दों का आंदोलन क्यों न हो, उसे लेकर नकारात्मकता कितनी झेली जा सकती है? यह तो आंदोलन में कई सकारात्मक बातें थीं, इसलिए उसे लगातार देखते चलने की दिलचस्पी भी थी, लेकिन आंदोलन पर हमला करने वाले लोग इसे साम्प्रदायिकता की हद तक ले जा रहे थे, वह नकारात्मकता बहुत भारी पड़ रही थी। इसलिए आज किसी भी एक आंदोलन से परे, किसी भी आंदोलन से परे, बात असल जिंदगी में सकारात्मकता, और नकारात्मकता की। 

आज लोग अगर जरा सी भी ऑनलाइन जिंदगी जीते हैं, तो वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने, या कम से कम उसे देखते चलने के लिए मजबूर रहते हैं। जो लोग सोशल मीडिया पर मौजूद नहीं रहते, वे एक किस्म से अपने दायरे और तबके के लिए असामाजिक प्राणी हो जाते हैं। ऐसे में लोगों के दायरे में जो लोग रहते हैं, उन्हीं का लिखा हुआ, पोस्ट किया हुआ, या मैसेंजरों पर फारवर्ड किया हुआ अधिक पढऩे और देखने में आता है। नतीजा यह है कि असल जिंदगी में जो स्थितियां आती हैं, उनमें सकारात्मक और नकारात्मक का जो अनुपात रहता है, उससे बिल्कुल अलग अनुपात लोगों की ऑनलाइन जिंदगी में हो सकता है, होता है। असल जिंदगी में अधिकतर लोगों की अब तक की पूरी जिंदगी में जिन लोगों से नफरत करने की कोई वजह नहीं रहती, ऑनलाइन यह लगने लगता है कि ये लोग तो नफरत के लायक हैं! और ऑनलाइन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जब मैसेंजर सर्विसों के साथ मिलकर एक मिला-जुला औजार बनकर लोगों के हाथ लग जाते हैं, तो फिर लोग उसका मनमर्जी इस्तेमाल करने लगते हैं। दुनिया में स्विस आर्मी चाकू बड़ा मशहूर है। एक ही चाकू में दर्जन-दो दर्जन किस्म के अलग-अलग जरूरी औजार रहते हैं, जो कि एक किस्म की मिनी टूल किट रहते हैं। सोशल मीडिया और मैसेंजर मिलकर लोगों के हाथ कुछ इसी तरह का स्विस आर्मी नाइफ बन जाते हैं, एक ही साथ कई किस्म के औजार, और कई किस्म के हथियार भी।

ऐसे में हमें लगता है कि लोगों को अपनी असल जिंदगी की असल घटनाओं के अनुपात के साथ-साथ ऑनलाइन जिंदगी, या संदेशों पर भी सकारात्मक और नकारात्मक का एक अनुपात बनाए रखना चाहिए। इन दिनों बड़े तो बड़े, छोटे-छोटे बच्चे भी सडक़ों पर जिस तरह की हिंसक और नफरती बातें करते दिखते हैं, वह उन पर सोशल मीडिया, और मैसेंजरों से प्रभावित बड़े लोगों का असर भी दिखता है, और अब तक भारत में नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कोई रोक तो लगी नहीं है, इसलिए बच्चे खुद भी सोशल मीडिया और मैसेंजरों की नकारात्मकता से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। हम सिर्फ हिंसक, अश्लील, या साम्प्रदायिक बातों की बात नहीं कर रहे, इनसे कम प्रभावित होने पर भी लोगों के दिल-दिमाग पर एक निरंतर-नकारात्मकता का जो असर होता है, उसके खतरे भी समझना जरूरी है। हमने दुनिया के कुछ मनोवैज्ञानिकों की इस बारे में कही और लिखी गई बातों से समझने की कोशिश की। उनका कहना है कि भावनाएं भी संक्रामक होती हैं, जैसे हँसी फैलती है, वैसी ही गुस्सा, भय, नफरत, और निराशा भी फैलती हैं। लगातार क्रोध, अपमान, और षडय़ंत्र की भाषा सुनने-पढऩे वाले लोग भी धीरे-धीरे उसी भावनात्मक वातावरण में जीने लगते हैं। दूसरी बात मानव मनोविज्ञान के साथ यह है कि लोगों के मन में एक नकारात्मकता-पूर्वाग्रह रहता है, यानी इंसानी दिमाग बुरी खबरों पर अच्छी खबरों के मुकाबले अधिक तेजी से प्रतिक्रिया देता है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर गुस्से, अपमान, डर, और नफरत वाली पोस्ट अधिक ध्यान खींचती है, दिमाग उन्हें अधिक देर तक याद रखता है। फिर एक और मनोवैज्ञानिक तथ्य यह है कि इंसानी दिमाग एक प्रतिध्वनि-कक्ष भी रहता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपनी तरह सोचने वाले लोगों को पढ़ते, और सुनते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें लगने लगता है कि पूरी दुनिया उन्हीं की तरह सोचती है, और इससे उनकी असहमति सहने की क्षमता कम होती जाती है। सामाजिक मनोविज्ञान का एक और बहुत मजबूत सिद्धांत समूह-ध्रुवीकरण है। जब समान विचार वाले लोग बार-बार एक-दूसरे से बातचीत करते हैं, तो वे अपनी धारणाओं और मान्यताओं के लिए पहले से अधिक कट्टर हो जाते हैं, मानो करेला नीमचढ़ा भी हो गया। मनोविज्ञान कहता है कि ऐसे दस लोग हल्की नाराजगी लेकर भी बैठे हों, तो लगातार एक-दूसरे की बात सुनते-सुनते वे गुस्से की पराकाष्ठा तक पहुंच सकते हैं। मनोविज्ञान का एक और सिद्धांत कहता है कि यदि कोई व्यक्ति पूरे वक्त सिर्फ जुर्म, हिंसा, धर्म, साजिश, और नफरत की पोस्ट पढ़ते हैं, तो उन्हें लगता है कि पूरी दुनिया सिर्फ इन्हीं चीजों से भरी हुई है। वास्तविकता नहीं बदलती, लेकिन लोगों की मानसिक सोच उसके बारे में बदल जाती है। फिर इसके बाद एक खतरनाक चीज और बाकी है। आज सोशल मीडिया के भीतर जो एल्गोरिद्म काम करता है, वह लोगों की दिलचस्पी देखकर उसी किस्म के कंटेंट और दिखाता है। अगर किसी ने दस नफरती वीडियो देखे, तो प्लेटफॉर्म आपको ग्यारहवां भी वैसा ही दिखाएगा, और इस तरह कोई व्यक्ति एक मानसिक सुरंग में पहुंच सकते हैं, जिसमें चारों तरफ और कुछ नहीं दिखता, सुरंग के अलावा। 

ये मनोवैज्ञानिक सिद्धांत ढूंढते-ढूंढते अंत में एआई, चैटजीपीटी ही हमें सुझा रहा है कि आपके संपादकीय के लिए, या साप्ताहिक कॉलम के लिए यह लाईन अच्छी रहेगी- ‘मनुष्य केवल अपने खानपान से नहीं बनते, वे अपने पढऩे, सुनने, और साथ रहने वालों से भी बनते हैं। यदि कोई रोज नफरत खाते हैं, तो एक दिन उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे कभी इंसानियत भी खाया करते थे। शरीर का डीएनए माता-पिता से मिलता है, लेकिन दिमाग का डीएनए बहुत हद तक उन लोगों से बनता है जिन्हें हम हर दिन पढ़ते हैं, सुनते हैं, और अपना मानते हैं।’ एआई ने एक दिन पहले के हमारे अखबार की सामग्री को देखकर भी ये बातें सुझाई हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि इस अखबार की सोच क्या है। जब कृत्रिमबुद्धि पर भी हमारी लगातार बातचीत का ऐसा असर होता है, तो मानवबुद्धि पर भी ऐसा ही असर होता होगा। हममें से हर किसी को बड़ा सावधान रहना होगा कि अपनी मानसिक सेहत को किस तरह ठीक रखें, किस तरह नकारात्मकता से दूर रहें। आज सोशल मीडिया, मैसेंजर, और एआई के जमाने में यह पहले के मुकाबले अधिक मुश्किल भी है कि नकारात्मकता से दूर रहा जाए। इसके लिए लगातार कोशिश करनी होगी, और सिर्फ सकारात्मक चीजों को देखते चलने से आपका सोशल मीडिया अकाउंट आपको धीरे-धीरे अधिक सकारात्मक चीजें दिखाने भी लगेगा। हम कभी-कभी लोगों के दिल-दिमाग की तुलना एक स्पंज से करते हैं, जो कि कहीं बिखरे हुए पानी को सोखने के लिए भी इस्तेमाल होता है। इंसानी दिल-दिमाग भी एक स्पंज जैसा है, वह अगर अपनी पूरी क्षमता का सोख चुका रहता है, तो फिर वह और कुछ नहीं समा सकता। इसलिए अगर हमारे दिल-दिमाग नकारात्मकता से लबालब हो जाएंगे, तो फिर सकारात्मकता के लिए उसमें जगह भी नहीं बचेगी। ऐसे में इस स्पंज को दबाकर पूरी तरह निचोड़ देना जरूरी है, ताकि नकारात्मकता निकल जाए, और सकारात्मकता के लिए कुछ जगह खड़ी हो। एक वक्त कहा जाता था कि लोगों को बुरी संगत से बचना चाहिए, आज टेक्नॉलॉजी के इस जमाने में असल जिंदगी की संगत तो सबकी घट गई है, लेकिन आभासी दुनिया में सोशल मीडिया, और ऑनलाइन की संगत बढ़ गई है, उसे भी देख-समझकर सावधानी से छांटने की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी पेड़ के ठीक विकास के लिए उसकी गैरजरूरी डालियों को काटा जाता है।

(Daily Chhattisgarh)