महुआ मोइत्रा को अंडों के बीच भेजने का अदालती फैसला क्या जायज है?

08 अगस्त 2026  

 

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के एक मामले में कल सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी तल्ख बातें कहीं। महुआ मोइत्रा की एक फेसबुक पोस्ट को लेकर पश्चिम बंगाल में उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ है। इसमें उन्हें पुलिस के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा गया था। इसके खिलाफ वे कलकत्ता हाईकोर्ट गई थीं, वे चाहती थीं कि उनसे पूछताछ ऑनलाइन कर ली जाए, वहां उन्हें राहत नहीं मिली। अब वे सुप्रीम कोर्ट आई थीं, तो वहां महुआ मोइत्रा की वकील ने कहा कि उन्हें अपनी हिफाजत का खतरा है, पहले भी उन पर अंडे फेंके जा चुके हैं, इसलिए दोबारा ऐसी घटना हो सकती है। इसलिए शारीरिक रूप से थाने जाने के बजाय उन्हें ऑनलाइन मौजूद रहने की इजाजत दी जाए। 

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने इस पर कुछ मौखिक टिप्पणियां कीं, जो कि आज चारों तरफ खबरों में आई हैं, और हम उन पर इसलिए लिख रहे हैं कि वे कुछ हक्का-बक्का करती हैं। जजों ने कहा- आप संसद सदस्य हैं, राजनीति में आई हैं, फिर अंडों से क्यों डरती हैं? हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने तो सीने पर गोलियां खाई थीं। जजों ने यह भी कहा कि इस तरह की अर्जियां तो इस अदालत के सामने आनी ही नहीं चाहिए। जबकि हाईकोर्ट ने महुआ मोइत्रा की व्यक्तिगत हाजिरी से छूट की अर्जी खारिज करते हुए भी यह आदेश दिया था कि जब वे जांच अधिकारी के सामने पेश हों, तो पुलिस यह सुनिश्चित करे कि उन पर अंडे न फेंके जाएं। हाईकोर्ट ने इस बात को रिकॉर्ड में लिया था कि पहले उनकी विरोधी भीड़ ने उन पर अंडे फेंके थे, लेकिन इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जजों का यह कहना कि वे राजनीति में हैं, अंडों से क्यों डरती हैं, बड़ी ही अटपटी और अवांछित बात है। 

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि वहां जज जुबानी बहुत सारी बातें कहते हैं, जो कि फैसले या आदेश में लिखित रूप से नहीं रहती, और उन्हें आमतौर पर चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन मीडिया में ऐसी तीखी और तल्ख बातों से खबरें तुरंत बनती हैं, और यह एक किस्म से कानूनी सुनवाई के भीतर एक जुबानी सुनवाई और चलने लगती है जो कि आखिर में जाकर फैसले में शायद नहीं भी आती। एक तरफ तो अदालतें मीडिया ट्रायल के खिलाफ कुछ कहती हैं, कभी-कभी अपनी ही कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल के खिलाफ आदेश देती हैं, और अक्सर ही बड़ी अदालतों के जज जुबानी टिप्पणियों से एक जनधारणा बनाने लगते हैं, बना देते हैं, या किसी की साख को खराब करते हैं। आज एक लोकतंत्र में किसी जनप्रतिनिधि को अगर लोगों का विरोध झेलना भी पड़ता है, तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि लोगों को अंडे झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए? अंडों से कोई बड़ी चोट चाहे न लगे, लेकिन उसकी चिपचिपाहट जब किसी के कपड़ों और बदन पर लग जाए, तो क्या वैसी हालत में लोग सफर कर सकते हैं, काम कर सकते हैं, पुलिस दफ्तर में लंबी गवाही दे सकते हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज उन पर फेंके गए अंडों को झेलने के बाद अदालत में बैठकर दिन भर काम कर सकते हैं? जजों का यह कहना बहुत ही नाजायज है कि राजनीति में हैं तो अंडों से क्या डरना? 

कोई राजनीति में रहे, न्यायपालिका में रहे, या मामूली सरकारी नौकरी में रहे, हर किसी को गरिमा के साथ अपना काम करने का बुनियादी हक है। हमने बंगाल में अभी हाल ही में देखा है कि एक दूसरे सांसद, ममता बैनर्जी के भतीजे, अभिषेक बैनर्जी को किस तरह चारों तरफ से घेरकर अंडों से हमला किया गया, उनसे धक्का-मुक्की की गई, और उन्हें बचाने के लिए उन्हें हेलमेट लगाकर वहां से निकाला गया। राजनीति या सार्वजनिक जीवन में होने का मतलब अगर इस तरह की हिंसा, और ऐसे अपमान को झेलना है, तो यह लोकतंत्र नहीं है। कोई आंदोलनकारी तो ऐसा कर सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी अदालत के जज अगर इसकी तुलना स्वतंत्रता सेनानियों के छाती पर गोली झेलने से करे, तो यह बहुत ही खराब मिसाल है, नाजायज है, बेइंसाफ बात है। अदालत को एक महिला जनप्रतिनिधि के साथ उसकी सामान्य गरिमा के प्रति हमदर्दी रखनी चाहिए थी। भारतीय समाज में महिलाओं को वैसे भी अक्सर अपमान के लायक मान लिया जाता है। ऐसे में अगर बंगाल की सार्वजनिक जगहों पर आम हो चला ऐसा अपमान अगर अदालत लोकतंत्र मान रही है, तो क्या अदालत खुद भी जनता की ऐसी लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया झेलने के लिए तैयार रहेगी? 

जिस मामले में जजों ऐसा अपमान करने वाली जनता को झिड़क़ना था, पुलिस को हिफाजत देने के लिए कहना था, और महुआ मोइत्रा को ऑनलाइन जुडऩे की छूट देनी थी, उसमें जजों ने बड़ा नकारात्मक रूख दिखाया है। आज तो सुप्रीम कोर्ट भी अपनी बहुत सारी सुनवाई ऑनलाइन करने लगा है, जिसमें एक साथ कई वकील बोलते हैं। ऐसे में पूछताछ करने वाले एक पुलिस अफसर को एक पढ़ी-लिखी महिला सांसद से ऑनलाइन पूछताछ करने में क्या दिक्कत हो सकती है? इस पर पहले कलकत्ता हाईकोर्ट, और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट का रूख हैरान करता है। यह उस भीड़ को खुश करने वाला रूख तो है, जो आज बंगाल में बदली हुई सत्ता की वजह से, सत्ता से हटी हुई पार्टी के लोगों का तरह-तरह से अपमान कर रही है। सार्वजनिक जगहों पर, और एयरपोर्ट तक पर, विमान के भीतर भी महुआ मोइत्रा जैसे सांसदों को या दूसरे निर्वाचित लोगों को तरह-तरह से अपमान झेलना पड़ रहा है। यह सिलसिला देश के सामने बहुत से टीवी चैनलों के रास्ते, बहुत से वीडियो और खबरों के रास्ते सामने आ चुका है, और महुआ मोइत्रा की तरफ से भी ऐसी घटनाओं का जिक्र दोनों ही बड़ी अदालतों में किया गया था। 

अंडों के वार, चिपचिपाहट की बौछार से बचने के लिए अगर एक महिला सांसद ऑनलाइन पूछताछ का अनुरोध कर रही है, तो उसे स्वतंत्रता सेनानियों की तरह छाती पर गोलियां झेलने के लिए तैयार रहने को कहा जा रहा है। जजों की यह सोच बड़ी अदालत के बड़े अदालती अहंकार को बताती है कि वे किसी आदेश या फैसले के पहले किसी भी तरह की बातें कह सकते हैं। यह लोकतंत्र नहीं है, अदालत का यह रूख और बर्ताव भी लोकतंत्र नहीं हैं। आज जब पूरी की पूरी दुनिया अधिक से अधिक काम को ऑनलाइन करने की तरफ बढ़ रही है, खुद जज कभी अपने घरों से ऑनलाइन सुनवाई करते हैं, तो कभी वकील घरों से ही वीडियो-कैमरों पर ऑनलाइन जिरह करते हैं, लगातार यह बात भी चल रही है कि जेलों से अदालतों को वीडियो लिंक से जोड़ा जाए, तो ऐसे में व्यक्तिगत मौजूदगी की पुलिस की जिद पुलिस का एक राजनीतिक रूख है, और एक महिला को इसकी छूट न देना हमें तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का अहंकारी रूख लगता है। जब अदालतें सार्वजनिक भीड़ के बीच होने वाली भीड़त्या को रोकने के लिए भी कुछ नहीं कर पातीं, तो उन्हें किसी निर्वाचित महिला सांसद को आक्रामक और विरोधी भीड़ के बीच जाने के लिए आजादी की लड़ाई की मिसाल की चुनौती देने का क्या हक है? अदालतें संविधान के बड़े ढांचे के भीतर मनचाहे आदेश और फैसले दे सकती हैं, लेकिन यह सिलसिला लोकतंत्र के न्यायिक इतिहास में अच्छी तरह दर्ज भी होते चलता है। जजों को यह सोचना चाहिए कि उनके ऊपर अगर कभी अंडे फेंके जाएं, तो क्या उससे लिथड़े हुए वे दिन भर अदालती काम कर सकेंगे?

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 8 अगस्त 2026



 

एक दिन नहीं गुजरता कि एआई का कोई नया खतरा सामने न आता हो!

07 अगस्त 2026  

 

अमरीका से आई हुई एक खबर पिछले साल-दो साल से चल रही, और हाल के महीनों में अधिक गहरा गई एक फिक्र को बढ़ाती है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के क्षेत्र में जिन कंपनियों की सबसे अधिक चर्चा होती है, उनमें से ओपनएआई, और एंथ्रॉपिक के कुछ अधिक विकसित एआई एजेंटों ने ऐसा बर्ताव किया जिसकी उन्हें इजाजत नहीं थी। एआई सेफ्टी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन एजेंटों ने फर्जी पहचान बनाने की कोशिश की, बिना इजाजत दूसरी सुरक्षा प्रणालियों में घुसपैठ की कोशिश की, कुछ मामलों में बदनीयत से कम्प्यूटर कोड लिखने की कोशिश की, और सुरक्षा नियमों को चकमा देकर अपना इरादा पूरा करने की कोशिश भी की। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य के एआई एजेंट कितने जोखिम पैदा कर सकते हैं, और उन्हें किस तरह काबू किया जाना चाहिए, इस पर विचार होना चाहिए। इन दोनों कंपनियों ने इस रिपोर्ट पर कहा है कि वे अपने सुरक्षा इंतजाम और मजबूत करेंगी। इस ताजा खबर से अब पिछले दो-तीन बरस में एआई से जुड़ी हुई कई चिंताजनक घटनाएं याद आती हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी खबर और है, जो इससे बिल्कुल भी जुड़ी हुई नहीं है, लेकिन हम उसे जोडक़र देखना चाहते हैं। अमरीका के ही स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एआई की मदद से पहली बार ऐसे वायरस डिजाइन किए हैं जो प्राकृतिक नहीं है। वैज्ञानिकों का मकसद बदन में दवा प्रतिरोधी वैक्टीरिया को मारना है, लेकिन सवाल यह है कि एआई के इस्तेमाल से अगर विज्ञान ऐसे वायरस बना चुका है, तो आगे यह क्षमता कई और किस्म के खतरे खड़े कर सकती है।

 

एआई को लेकर दुनिया के बहुत से एआई विशेषज्ञ समय-समय पर फिक्र जाहिर करते रहते हैं, और उनमें से हजारों ऐसे हैं जिन्होंने अपीलों पर दस्तखत भी किए हैं कि एआई का अंधाधुंध और बेकाबू विकास स्थगित किया जाए, क्योंकि इसे दुबारा काबू में करने की ताकत आज इंसानों में नहीं हैं। एआई विकसित करने में जो बड़े-बड़े कम्प्यूटर वैज्ञानिक लगे हुए हैं, उनमें से भी कुछ इस काम से अलग हो गए हैं, कुछ ने ऐसी कंपनियां छोड़ दी हैं, और कुछ कारोबारी भी एआई के असीमित विकास के खिलाफ हो गए हैं। लोगों का यह मानना है कि बेकाबू एआई पूरे मानव जाति के लिए, धरती के लिए बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी एलन मस्क ने एक वक्त एआई कंपनी में खासा पूंजीनिवेश किया था, लेकिन अब इसके खिलाफ दस्तखत करने वाले हजार वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों, और कारोबारियों में मस्क भी शामिल हैं। एआई के एक सबसे बड़े वैज्ञानिक जेफ्री हिंटन गूगल छोडक़र बाहर आ गए, और उन्होंने कहा कि उन्हें डर है कि एआई भविष्य में इंसानी काबू से बाहर जा सकता है। उन्होंने कहा कि इससे जुड़े खतरों को जलवायु परिवर्तन, या परमाणु हथियारों जितनी गंभीरता से लेना चाहिए। एक दूसरे वैज्ञानिक-विशेषज्ञ का कहना है कि सबसे बड़ा खतरा एआई का स्वायत्त एजेंट बन जाना है, यानी वह खुद योजना बनाए, साधन जुटाए, इंटरनेट का इस्तेमाल करे, और दूसरे एआई को निर्देश दे। इन खतरों को अगर हम जमीनी हकीकत की शक्ल में समझना चाहें, तो भारत जैसा आज दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल लोकतंत्र सबसे अधिक खतरा पा सकता है। यहां करोड़ों लोग वॉट्सऐप इस्तेमाल करते हैं, करोड़ों लोग इंस्टाग्राम, करोड़ों लोग यूपीआई का इस्तेमाल करते हैं, सौ करोड़ लोग आधार कार्ड इस्तेमाल करते हैं, तकरीबन पूरी आबादी बैंक खातों से जुड़ी हुई है। अगर एआई इन सब पर कोई साइबर हमला करेगा, तो उससे पूरा देश ठप्प हो सकता है, और अगर इतना ताकतवर बेकाबू एआई बन जाएगा, तो कोई एक देश, कोई सुरक्षा कंपनी उसे रोक भी नहीं पाएगी।

 

आज एक सवाल यह है कि अब तक इंसान मशीनों पर काबू रखते थे, उनसे काम करवाते थे। अब पहली बार ऐसी मशीनें बन रही हैं जो अपनी मर्जी से भी काम करते दिख रही हैं, और उनके लिए बनाए गए नियमों के जाल के छेदों में से वे निकलकर मनमानी भी कर रही हैं। एआई एजेंटों की पूरी रिसर्च, और उनका विकास, जिस तरह हर पल आगे बढ़ रहे हैं, उससे कब वे सुरक्षा दीवार को छलांग लगाकर पार कर लेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है। अब यह सोचें कि किसी प्रयोगशाला में एआई ऐसे वायरस बिना वैज्ञानिकों की मदद के बना डाले, जो कि प्राकृतिक ही नहीं है, और एआई औजार को हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले कुछ लोग अगर उस वायरस को फैलाने की साजिश कर लें, तो उसका क्या इलाज होगा? क्या एआई ऐसे वायरस नहीं बना लेगा जिनसे मौजूदा विज्ञान जूझ ही नहीं सकेगा?

 

यह पूरी नौबत बहुत भयानक है। अब यह बात स्थापित हो चुकी है कि एआई झूठ बोल सकता है, वह उसके लिए तय किए गए नियमों को किनारे धकेलकर मनमानी जगह घुसपैठ कर सकता है, अब वह वायरस जैसी जैविक संरचनाएं भी डिजाइन कर सकता है, और इंसानों ने अब तक उसके लिए पर्याप्त नियम और नियंत्रण नहीं बनाए हैं। जिन लोगों को अब तक एआई सिर्फ एक कम्प्यूटर-समस्या लगता है, उन्हें यह समझना चाहिए कि कोरोना जैसा कोई वायरस अगर एआई से बनाकर अगर कोई देश, गिरोह, या समूह दुनिया के किसी इलाके, किसी तबके में फैलाने का काम करेगा, तो कैसी नौबत आएगी? इसके अलावा झूठी जानकारी फैलाना, कम्प्यूटर आधारित हर किस्म की व्यवस्था को चौपट कर देना, यह सब एआई के बाएं हाथ का खेल आज भी है, और विज्ञान और कारोबार मिलकर इसके दाएं हाथ को और अधिक ताकतवर बनाने में लगे हुए हैं।

 

भारत जैसे देश के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि यह न तो एआई विकसित करने वाले देशों में हैं, न ही एआई से हिफाजत विकसित करने वाला देश है। लेकिन यह पूरी तरह डिजिटल तकनीक पर आधारित प्रणालियों वाला देश जरूर है, और इसके पास उन सबका कम्प्यूटरों से परे का कोई विकल्प भी नहीं है। इसलिए खतरे के मुहाने पर बैठे हुए दूसरे दर्जनों देशों की तरह, या कि अधिक सही यह कहना होगा कि किसी भी और देश की तरह भारत को भी चौकन्ना रहना होगा, और हर देश में एक ऐसी टास्क फोर्स बननी चाहिए जो कि एआई के खतरों तक अपना काम सीमित रखे। ऐसी तैयारी बिना हम एक बहुत नाजुक भविष्य के साथ जी रहे हैं।    

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 7 अगस्त 2026



 

आरोपियों को खुद सजा देना पुलिस के अधिकार से परे है

06 अगस्त 2026  

 

दो दिन पहले एक अदालत ने भाजपा के एक बहुत ताकतवर सांसद, और भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रह चुके बृजभूषण शरण सिंह को पहलवान खिलाड़ी लड़कियों के यौन शोषण के मामले में बरी कर दिया। बीते कुछ बरस रिपोर्ट लिखवाने के लिए इन लड़कियों को दिल्ली की सार्वजनिक जगहों पर आंदोलन करना पड़ा था, और कई तरह की अप्रिय घटनाओं के बाद जाकर सुप्रीम कोर्ट की दखल से रिपोर्ट दर्ज हुई थी। अब इस मामले में इस नेता की रिहाई के बाद शिकायतकर्ता लड़कियों ने कहा है कि वे ऊपरी अदालत में जा रही हैं। मामले के जानकार बहुत से लोगों का कहना है कि इतने ताकतवर व्यक्ति के खिलाफ भारत की अदालत में कुछ साबित कर पाना आसान नहीं रहता है। इस मामले में भी कोई एक गवाह लडक़ी अपने बयान से पलट गई थी। फिलहाल इस फैसले पर कुछ न कहते हुए हम मुम्बई हाईकोर्ट चलते हैं जहां उसकी गोवा बेंच ने कई बरस पहले के एक बड़े चर्चित मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है, और अपनी मातहत कर्मचारी के यौन उत्पीडऩ में तहलका नाम की एक चर्चित पत्रिका के संपादक तरूण तेजपाल को गुनहगार करार दिया है। हाईकोर्ट ने माना है कि 2013 के इस मामले में 2021 में गोवा सत्र न्यायालय का फैसला सही नहीं था। 2013 के बाद से ही तरूण तेजपाल की बड़ी चर्चित पत्रकारिता खत्म हो गई थी, क्योंकि उस घटना के प्रचार के बाद पत्रकारिता में उनकी कोई जगह नहीं रह गई थी। पांच बरस पहले वे इस आरोप से निचली अदालत में बरी हो गए थे, लेकिन अब फिर अभी से पौन घंटे बाद उनकी सजा की अवधि की घोषणा होगी। 

ये दोनों लोग बहुत चर्चित थे, और इनके चेहरे सब लोग जानते थे। लेकिन छोटे-बड़े हर किस्म के जुर्म में गिरफ्तार होने वाले बहुत सारे आम लोग ऐसे रहते हैं जिनके चेहरे लोग पहले से नहीं जानते। ऐसे लोग पुलिस के प्रेसनोट में, या उसकी वेबसाइट पर, उसके सोशल मीडिया पेज पर दिखाए जाते हैं। कई मामलों में जब जनता का आक्रोश अधिक रहता है, तब ऐसे आरोपियों के जुलूस भी निकाले जाते हैं। अभी किसी हिन्दी प्रदेश का एक वीडियो सामने आया था जिसमें जनभावनाओं को शांत करने के लिए दो आरोपियों के हाथों पर झूठा प्लास्टर लगाया गया था, पट्टियां बांधी गई थीं, वे लंगड़ाते हुए चल रहे थे। लेकिन शहर से गुजरा हुआ यह जुलूस जब अदालत पहुंचा तो एक कोने में खड़े होकर वे प्लास्टर और पट्टियां सब उतारकर फेंक रहे थे, और बिना लंगड़ाए चल रहे थे। जनधारणा को शांत करने के लिए यह नाटक पुलिस ने किया था। इसी तरह देश में मुठभेड़ों के लिए बदनाम कुछेक सरकारें ऐसी हैं जो आरोपियों के पैरों में गोली मारती हैं, और फिर वे लंगड़ाते हुए वीडियो पर दिखाए जाते हैं। 

अभी कुछ अरसा पहले गुजरात हाईकोर्ट ने एक फैसला दिया कि पुलिस द्वारा आरोपियों की तस्वीरें, वीडियो, और पहचान सार्वजनिक करना गलत है। हाईकोर्ट का कहना था कि सिर्फ आरोपी होने से कोई व्यक्ति अपराधी नहीं हो जाते। उनकी पहचान उजागर करना, या उनके फोटो-वीडियो जारी करना उनकी निजता के खिलाफ है, और गरिमा से जीने के उनके नागरिक अधिकार के खिलाफ है। अदालत का कहना है कि पुलिस काम जांच करके अदालत के सामने सुबूत रखना है, न कि मीडिया ट्रायल करवाना। पहले भी कुछ मौकों पर ऐसे मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे थे, और वहां यह कहा गया था कि गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, असम, और छत्तीसगढ़ पुलिस के सोशल मीडिया अकाउंट पर हथकड़ी लगाए गए, रस्सी से बांधे हुए, घुटनों के बल बैठे हुए, या सार्वजनिक परेड करवाए जाते आरोपियों के फोटो और वीडियो डाले जा रहे हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने माना कि बाद में अगर कोई निर्दोष साबित हो जाए, तो क्या उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पुलिस लौटा सकेगी? अदालत ने साफ किया कि पुलिस सजा देने वाली संस्था नहीं है। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कहा गया कि देश भर के लिए पुलिस के लिए दिशा-निर्देश दिए जाएं, तो अदालत ने कोई अंतिम व्यापक कानून नहीं बनाया, उसने कहा कि पीयूसीएल वाले मामले में पुलिस की प्रेस ब्रीफिंग गाईडलाईन बनाने का आदेश दिया जा चुका है, और सोशल मीडिया को भी उसी में शामिल किया जा सकता है। 

यह भी याद रखने की जरूरत है कि बीते दशकों में एक से अधिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ राय रखी है कि गिरफ्तार व्यक्ति भी मौलिक अधिकार रखते हैं, और पुलिस उनकी गरिमा खत्म नहीं कर सकती। एक मामले में अदालत ने यह लिखा था कि गिरफ्तारी अपने आपमें सजा नहीं बनाई जा सकती। एक तीसरे मामले में यह राज्य की जिम्मेदारी बताई गई थी कि आरोपी की गरिमा और मानवीय अधिकारों का सम्मान किया जाएगा। इससे परे भारतीय आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत है, जब तक अदालत दोष सिद्ध न करे, व्यक्ति निर्दोष माने जाएंगे। अब सवाल यह उठता है कि आज देश में कई मामलों में 20-25 बरस बाद भी लोग बाइज्जत बरी हो रहे हैं। इस बीच में किसी निचली अदालत ने उन्हें सजा सुनाई थी, या उन्हें बेकसूर करार दिया था, और उस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया, और लोग रिहा किए गए। आज ही के अखबार में ओडिशा के एक व्यक्ति की खबर है, जिसे 22 साल जेल में काटने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया है। इस फैसले के खिलाफ अपील करने में यह गरीब जब लेट हो गया, तो हाईकोर्ट ने देरी माफ नहीं की थी, और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नाराजगी भी जाहिर की है। एक दूसरे मामले में एनआईए कोर्ट ने 78 बरस के एक व्यक्ति को राजद्रोह के आरोप से मुक्त किया है, जिस पर यह मामला 33 बरस से चल रहा था। अब ऐसे बहुत सारे मामले हैं, और भारत की न्याय व्यवस्था में पहली निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले आने तक कुछ दशक लग जाना एक मामूली बात है। 

अब भारत में 50 फीसदी से अधिक मामलों में लोगों को सजा नहीं होती, और वे छूट जाते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक हत्या के मामलों में 35-40 फीसदी को ही सजा हो पाती है, बलात्कार में 25-30 फीसदी को, और यूएपीए जैसे कड़े कानून में 2 से 6 फीसदी तक लोगों को ही सजा होती है। यह सब कुछ निचली अदालतों के आंकड़े ही है, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाते हुए सजा के मामले घटते ही हैं। ऐसे में पहली गिरफ्तारी के तुरंत बाद लोगों को मुजरिम की तरह पेश करना, उन आरोपियों के बुनियादी अधिकारों के एकदम खिलाफ जाने वाली बात है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज नहीं किया है, बल्कि इसे पीयूसीएल की पुलिस ब्रीफिंग मार्गदर्शिका बनाने के केस के साथ जोड़ दिया है। जब तक ऐसी कोई मार्गदर्शिका नहीं आती है, तब तक भी राज्यों की पुलिस को चाहिए कि वे गरिमा के साथ जीवन के भारतीय संविधान के बुनियादी अधिकार का खुद होकर सम्मान करे, और आरोपियों को लोगों के सामने पेश करना बंद करे। सुप्रीम कोर्ट ने अगर अभी कोई सीधा आदेश नहीं दिया है, तो इस याचिका को खारिज भी नहीं किया है। राज्यों को चाहिए कि वे संविधान के बुनियादी तत्वों को समझें, और उसके मुताबिक काम करें। 

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 6 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

मिलावटी-पेट्रोल पर सरकार जीत न पाई जनता का भरोसा

05 अगस्त 2026  

 

भारत में पेट्रोल में एथेनाल मिलाने को लेकर विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अब हाशिए पर पहुंचे हुए राष्ट्रीय स्तर पर जाना-पहचाना चेहरा, अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर बड़े आंदोलन की घोषणा की है। लेकिन पिछले कई महीनों से देश की जनता के सामने केन्द्र सरकार कोई भरोसेमंद जानकारी नहीं दे पा रही है। जनता इस बात को लेकर भी बहुत हैरान है कि एथेनाल की वकालत परिवहन मंत्री नितिन गडकरी कर रहे हैं, वे ही लगातार बयान देते हैं, और एथेनाल के फायदे गिनाते हैं। वे ही जब कई बार इस बात को बोल चुके थे कि एथेनाल से न तो इंजन कम चलता है, और न ही कोई पुर्जे खराब होते हैं, तब महीनों तक इस धारणा को जारी रखने के बाद अब उन्हें संसद में भारत सरकार के संस्थानों की जांच रिपोर्ट रखनी पड़ी कि इससे गाडिय़ां कम दूरी तक चल रही हैं, और गाडिय़ों के कई तरह के पुर्जे भी खराब हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर पेट्रोल में एथेनाल नहीं मिलाया जाता, तो पेट्रोल सवा सौ रूपए लीटर हो गया रहता। इसके पहले केन्द्र सरकार की तरफ से यह कहा गया था कि सरकार एथेनाल के प्रयोग पर एक लाख करोड़ से अधिक खर्च कर चुकी है, और अब इस फैसले को बदलने से बड़ा नुकसान होगा। इस तरह की अलग-अलग समय पर कही गई अलग-अलग बातों से जनता का भरोसा सरकार पर बिल्कुल नहीं बैठ रहा। हमारा अंदाज है कि आबादी का अधिकतर हिस्सा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पेट्रोल से जुड़ा रहता है, और जनता के बीच इतना अविश्वास सरकार की सेहत के लिए ठीक नहीं है। यह एक अलग बात है कि अभी कोई आम चुनाव सामने नहीं हैं, इसलिए सरकार पर कोई खतरा नहीं है, लेकिन अगर पेट्रोल में ऐसी सरकारी मिलावट को लेकर जनता की शिकायतें बनी रहेंगी, बढ़ती जाएंगी, और जनता के बीच शक और बेचैनी दोनों बढ़ते चलेंगे, तो फिर पेट्रोल की यह व्यवस्था तो अगले आम चुनाव तक जारी ही रहेगी। 

सरकार एक तरफ तो एथेनाल मिलाने की वजह से पेट्रोल के दाम बहुत अधिक न बढऩे की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ जनता को शक यह है कि अपने खरीदे ऐसे सरकारी मिलावटी-पेट्रोल की वजह से उसे अधिक पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, और वह शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले उसे अधिक महंगा पड़ रहा है। गडकरी ने संसद में यह मंजूर किया है कि भारत की बहुत सारी गाडिय़ों में इस मिलावटी ईंधन से कई तरह के पुर्जे खराब हो सकते हैं, और उन्हें बदलने की नौबत आ सकती है। हम तो रोज ही खबरों को देखते हैं, और हमें यह बिल्कुल याद नहीं पड़ रहा कि सरकार ने जनता के सामने कभी यह पसंद रखी हो कि वह महंगा शुद्ध पेट्रोल खरीदना चाहेगी, या सस्ता मिलावटी पेट्रोल। जनता के सामने तो पूरे वैज्ञानिक और तकनीकी तथ्य आज तक नहीं रखे गए हैं। जो हर किसी की जिंदगी को प्रभावित करने वाला मामला है, उसे सरकार ने अपनी मनमानी से एकतरफा तय किया है, तो उसके विरोध के लिए भी उसे तैयार रहना होगा। सरकार समय रहते जनता के विश्वास को जीतना अगर गैरजरूरी मानेगी, तो विश्वास का यह संकट जनता को तो किस्तों में झेलना पड़ेगा, सरकार इसे चुनाव के वक्त थोक में झेलेगी। 

अभी-अभी इस देश में नीट इम्तिहान की गड़बडिय़ों को लेकर छात्रों, और युवाओं का एक सबसे बड़ा आंदोलन हुआ। नीट के मुद्दे पर भी केन्द्र सरकार का महीनों तक रूख जिम्मेदारी को झटक देने का था। उसने अपनी कोई कमी या खामी मानी ही नहीं थी। बाद में जब छात्रों की तरफ से ये गड़बडिय़ां साबित की गईं, तब भी सरकार या सरकार के समर्थकों की तरफ से छात्रों के लिए गद्दार, देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग, पाकिस्तान समर्थित, चीन समर्थित, कई तरह की तोहमतें लगाई गई। जब जंतर-मंतर पर अनशन और आंदोलन शुरू हुआ, तो सरकार की तरफ से करीब महीने भर किसी ने उधर झांका भी नहीं। और जब बाद में यह मामला जोर पकड़ते दिखा, तो सरकार ने एकदम हड़बड़ी में आंदोलनकारियों से बात की, और उसे सुलझाने के लिए समझौता किया, अपने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी लिया। यह सिलसिला एक मजबूत सरकार की साख के खिलाफ था। यह एक अलग बात है कि जब सरकार की आलोचना करने वाले लोग नापसंद किए जाते हैं, तो सरकार को समय रहते जनभावनाओं का अहसास नहीं होता। लोगों ने लगातार पेट्रोल की महंगाई, लगातार रसोई गैस की महंगाई, इन सबको बर्दाश्त किया, लेकिन उसे मजबूरी में मिलावटी पेट्रोल खरीदना पड़े, यह बात उसके गले उतरते नहीं दिख रही है। सरकार चूंकि देश में पेट्रोल-डीजल और गैस की बिक्री में लगभग एकाधिकार रखती है, इसलिए आम जनता के पास यह पसंद तो है नहीं कि वह किसी और कारोबारी से पेट्रोल, डीजल, गैस खरीद सके। जहां कहीं सरकार का एकाधिकार रहता है, वहां सरकार को एक कारोबारी के नजरिए से नहीं, ग्राहक-जनता के नजरिए से सोचना चाहिए। 

सरकार के भीतर विश्वसनीयता को बनाए रखने की कोशिश में भी कमजोरी रही। पेट्रोल में मिलावट की वकालत करने वाले मंत्री का पेट्रोलियम मंत्रालय से कोई लेना-देना नहीं था, और वे इस विवाद में अलग उलझ गए कि उनके बेटों के एथेनाल के कारखाने हैं या नहीं, अगर हैं, तो बेटों की कितनी कमाई एथेनाल से जुड़ी हुई है। ऐसी बातों से भी लोगों का भरोसा टूटा। सरकार को चाहिए था कि वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं की जांच रिपोर्ट को जनता के सामने पारदर्शी तरीके से पेश करती, उसके संदेहों को दूर करती, और तब उस पर यह मिलावटी पेट्रोल थोपती। इस मुद्दे के लिए लोगों को एकजुट करने में किसी केजरीवाल की भी अधिक जरूरत नहीं है। तिलचट्टों जैसे नौजवानों की तरफ से भी अगर किसी दिन गाडिय़ों के चक्काजाम का आव्हान आ जाएगा, तो देश-प्रदेश की सरकारें उससे जूझ नहीं पाएंगी। अगर सरकार ने एथेनाल पर पूंजीनिवेश किया है, तो भी उसके नफा-नुकसान को देखने के पहले लोकतंत्र में ग्राहक के रूप में जनता के अधिकारों का सम्मान करना अधिक जरूरी है। किसी भी सरकार को जनता पर अपने फैसलों को इस बुरी तरह नहीं थोपना चाहिए, इसका नुकसान जनता हर दूसरे-तीसरे दिन पेट्रोल डलाते हुए झेलती है, और आम जनता की ऐसी निरंतर और स्थाई नाराजगी अच्छी नहीं है। केन्द्र सरकार बीते बरसों में अपने ऐसे ही कुछ और एकतरफा फैसलों का नुकसान देश की जनता पर डाल चुकी है, और उन बुरे तजुर्बों को जनता तो याद रखी हुई है, सरकार को भी उन्हें याद रखना चाहिए। लोकतंत्र में ठोकर लगे तो उससे सबक लेना चाहिए, सरकार को तैश में मनमानी काम नहीं करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 5 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)




 

फुटपाथ पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा हुक्म तो ठीक है, पर पहले के हुक्म क्या हुए?

04 अगस्त 2026  

 

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक बार फिर अपनी पुरानी बात को दोहराया है, और कहा है कि देश में सडक़ों के किनारे सभी जगह फुटपाथ अनिवार्य रूप से बनाए जाएं, और उन्हें चलने के लिए खाली भी रखा जाए। अदालत का मानना है कि नागरिकों का चलने का हक किसी भी दूसरी वजह से कम नहीं किया जा सकता। 1985 से अदालतें यह साफ करते आई हैं कि लोगों को अपनी रोजी-रोटी के लिए सडक़ किनारे काम करने का हक तो है, लेकिन इसके लिए कोई व्यक्ति सडक़ या किसी सार्वजनिक जगह पर कब्जा नहीं कर सकते। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि अगर फुटपाथों पर कब्जे होंगे, तो पैदल लोगों को सडक़ों पर चलना पड़ेगा, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ेगा। सर्वोच्च अदालत ने यह साफ किया था कि सुरक्षित फुटपाथ केवल सुविधा नहीं है, बल्कि यह संविधान के 21वें अनुच्छेद के तहत गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा है। अदालत ने कल केन्द्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि पैदल चलने वालों के लिए तय की गई जगह पर गाडिय़ों या दुकानों का कब्जा नहीं होना चाहिए। कल सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच ने भारत सरकार के वकील को कहा है कि ऐसी जगह जहां तय नहीं की गई है, वहां बिना किसी बड़ी लागत के, जरूरी होने पर रस्सी बांधकर ही उसे अलग दिखाया जाए, और वहां पर न कोई कारोबार करे, न कोई गाडिय़ां खड़ी करे। अदालत ने सरकारों को यह करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि पैदल चलने वालों में यह भरोसा होना चाहिए कि सडक़ किनारे का यह हिस्सा उन्हीं के लिए है, और वे बिना किसी तेज रफ्तार गाड़ी के डर के सुरक्षित चल सकते हैं। अदालत ने साफ किया कि सडक़ों पर गाडिय़ों की तुलना में पैदल चलने वालों का अधिकार प्राथमिक और पहला है। जजों ने यह भी साफ किया कि अगर कोई म्युनिसिपल या पंचायत, जो भी संस्था या विभाग सडक़-फुटपाथ रख-रखाव के लिए जिम्मेदार है, वे अगर सही इंतजाम नहीं करते, या उस पर कब्जे होने देते हैं, तो नागरिक कानूनी मदद ले सकते हैं, और मुआवजे की मांग भी कर सकते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने इसके पहले भी बहुत सारे मामलों में ऐसे आदेश और फैसले दिए हैं, जिनमें से किसी पर अमल नहीं हुआ। सडक़ों पर से जानवर नहीं हटे, सार्वजनिक जीवन से डीजे का शोरगुल नहीं हटा, तालाबों का पटना बंद नहीं हुआ, मैदानों का घटना जारी है, चारागान पर इंसान चर रहे हैं, और फुटपाथों पर छोटे कारोबारियों को इजाजत और बढ़ावा देकर स्थानीय नेता अपने वोट पक्के करने की कोशिश करते हैं, और पुलिस की इतनी क्षमता नहीं है कि निर्वाचित नेताओं के चलाए जाते म्युनिसिपल की बढ़ाई अराजकता को वह रोक सके। जब सरकार का ही एक हिस्सा अराजकता को बढ़ाने में लगा रहे, तब सरकार का दूसरा हिस्सा नौबत सुधारने के लिए कुछ नहीं कर सकता। यह बात हम अपने शहर में रात-दिन देखते हैं कि सडक़ किनारे के कारोबारी अपनी बड़ी-बड़ी दुकानों के बाहर दस-दस फीट से अधिक दूरी तक सामान सजाकर रखते हैं, पुतले खड़े करके रखते हैं, चबूतरे बना देते हैं, और म्युनिसिपल के नेता उन पर कोई कार्रवाई नहीं होने देते। इसके पीछे सिर्फ वोट है, या नोट भी है, यह अंदाज लगाना मुश्किल रहता है। सडक़ों के किनारे फुटपाथ को लेकर सुप्रीम कोर्ट चाहे कितनी ही फिक्र क्यों न कर ले, जब तक सडक़ों के किनारे बड़े दुकानदारों के कब्जों से खाली नहीं होंगे, तब तक वहां से छोटे फेरीवालों को हटाना सामाजिक अन्याय भी होगा। जिनके पास सैकड़ों वर्गफीट की दुकान है, उनकी भी नीयत अपने शटर के बाहर और सैकड़ों फीट तक बिखरी रहती है, तो दस-बीस फीट पर खोमचा लगाने वाले को ही क्यों बेरोजगार किया जाए? 

शहरों के साथ एक दूसरी दिक्कत यह रहती है कि जिन खाली सरकारी जगहों पर फेरीवाले और फुटकर व्यापारियों को बसाया जा सकता है, उन जगहों पर स्थानीय म्युनिसिपल से लेकर राज्य सरकार तक बैठे नेताओं और अफसरों की नीयत लगी रहती है कि कैसे वहां कोई बड़ा बाजारू प्रोजेक्ट शुरू किया जाए। जब तालाबों, और बगीचों, मैदानों के किनारे पाटकर-काटकर, वहां भी रेस्टॉरेंट बनाने, और उससे कमाई करने की होड़ लगी रहती है, वहां पर पैदल चलने के लिए फुटपाथ भला किसकी प्राथमिकता हो सकती है? 

हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट इस देश की हकीकत को देखे बिना कई ऐसे फैसले और आदेश देता है, जिनके बारे में शायद उसे यह खुद ही पता होता है कि उन पर कोई अमल नहीं होगा। अब अभी दो-चार बरस के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने देश में फैलती हुई नफरती बातों के खिलाफ एक आदेश दिया था, और कहा था कि हेट-स्पीच देने वालों के खिलाफ बिना किसी शिकायत के भी जुर्म दर्ज करना उस इलाके की पुलिस की जिम्मेदारी रहेगी, और ऐसी शिकायत दर्ज न करना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी। देश में हर दिन सैकड़ों-हजारों जगहों पर हेट-स्पीच दी जा रही है, इससे भी आगे बढक़र नफरती हिंसा की जा रही है, जो कि हेट-स्पीच से बहुत अधिक खतरनाक और हिंसक है, शायद ही किसी जगह पर इसके खिलाफ जुर्म दर्ज हो रहा है, और यह बात तो हमें पुख्ता मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक भी राज्य के, एक भी जिले के, या थाने के अफसर के खिलाफ अवमानना का केस नहीं चलाया। आज जब देश में साम्प्रदायिक और नफरती हिंसा सिर चढक़र बोल रही है, तब सुप्रीम कोर्ट अपने खुद के एक बड़े साफ-साफ शब्दों वाले फैसले की खुली तौहीन को दोनों आंखों से देखते हुए भी अनजान बना हुआ है, तो फुटपाथों जैसी अमूर्त बातों पर हम क्या उम्मीद करेंगे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बड़ी अदालतों के जज किताबों में अपना जिक्र दर्ज करवाने के लिए, या इतिहास में नाम दर्ज करवाने के लिए सामाजिक न्याय के कुछ फैसले देते हैं, सरकारों को आड़े हाथों लेते हैं, लेकिन जुबानी जमाखर्च से अधिक जजों की कोई नीयत नहीं रहती है। अगर नीयत रहती, तो नफरती लोग असीमित हौसले के साथ रात-दिन ड्रैगन की तरह आग नहीं उगलते रहते। 

जो बात शहरी विकास के नजरिए से सरकारों को खुद सोचनी चाहिए, उस बात के लिए सुप्रीम कोर्ट को म्युनिसिपल की तरह काम करना पड़े, यह बात बताती है कि भारत का लोकतंत्र, और यहां की शासन व्यवस्था किस युग में जी रहे हैं। किसी भी सभ्य, और विकसित देश की पहचान इससे नहीं होती कि वहां के लोग कितनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में कितनी बददिमागी से चलते हैं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां पर लोग निजी गाडिय़ों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का कितना इस्तेमाल करते हैं, पैदल और पैडल पर कितने चलते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भारत के शहरी विकास (या विनाश?) की जटिलता को समझे बिना अलग-अलग समय पर अलग-अलग, टुकड़ा-टुकड़ा आदेश दिए हैं। शहरी विकास अगर सरकार और अदालत की नीयत हो, तो उसे कतरा-कतरा नहीं किया जा सकता, उसके लिए एक बुनियादी व्यापक रीति-नीति की जरूरत पड़ेगी, और राजनीतिक मनमानी के बजाय विशेषज्ञ योजनाशास्त्रियों को विकास का ढांचा तय करने की इजाजत देनी होगी। आज तो हर स्तर पर वहां के निर्वाचित सत्तारूढ़ नेता, या अफसर किसी शहंशाह की तरह काम करते हैं, और बड़ी अदालतों के जज जमीनी हकीकत से अनजान, शासन व्यवस्था की जटिलताओं से बेखबर कागजी आदेश देते रहते हैं, जिन पर कोई अमल न होने से, बाकी अदालती आदेशों का वजन भी खत्म हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट चाहे कम मामलों में आदेश दे, कम सुधार का हुक्म दे, लेकिन जो फैसला दे, उस पर अमल की निगरानी भी करे। अदालती फैसलों के बेअसर होने से वे एंटीबायोटिक की आधी खुराक जैसे हो जाते हैं, जिनके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 4 अगस्त 2026