23 सितंबर 2026
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव करवाने के लिए बनी केंद्रीय चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का हाल यह हो गया है कि वह संविधानेतर अंदाज में काम कर रही है, और उसे छूने से बचने की कोशिश करते चले आने वाले सुप्रीम कोर्ट को भी अब दिल्ली में आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठाने पड़े हैं। अब इस देश में एक भारत रत्न वैज्ञानिक, बहुत सारे पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित व्यक्ति, फौज के अनगिनत रिटायर्ड बहादुर अफसर और अब देश के विदेश मंत्री से लेकर जाने कितने ही जज और राजनयिक चुनाव आयोग में जाकर अपने आपको हिंदुस्तानी मतदाता साबित करने को मजबूर किए गए हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भी चुनाव आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का आरोप रहा है कि ऐन चुनाव के पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं को छांट-छांटकर मतदाता सूची से बाहर करने का अभियान चलाया गया।
सुप्रीम कोर्ट की नींद तब कुछ जल्दी खुलती है जब उसके आसपास कुछ होने लगता है, चाहे वह दिल्ली का प्रदूषण हो, चाहे दिल्ली की इमारतों के तलघरों में चलने वाले कारोबार हों, चाहे दिल्ली में डीजल गाड़ियां हों या और कोई जनसुविधा हो। इसमें कुछ अटपटा भी नहीं है, क्योंकि जब आग बहुत पास में लगती है तो ताप कुछ अधिक लगता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट बना तो पूरे देश के लिए है, लेकिन आज दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, को लेकर सुप्रीम कोर्ट चौकन्ना हो गया है और चुनाव आयोग से सवाल कर रहा है। इसी सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल चुनाव के वक्त हैरान करने वाला एक सवाल पूछा था कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं डाल पाएंगे तो कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा, वे अगले चुनाव में वोट डाल देंगे। और चुनाव हो गया, नतीजे देश के सामने हैं। जिस मतदाता सूची पुनरीक्षण की कोई हड़बड़ी नहीं थी, उसे तुरंत करवाने और दसियों लाख वोटरों का हक छीन लेने का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो जाने दिया गया। देश में न्यायपालिका का इतिहास जब लिखा जाएगा, तब उसमें बंगाल की मतदाता सूची को लेकर अदालत का रुख और उसकी टिप्पणियां जरूर जगह पाएंगी।
अब आज इस मामले पर लिखे बिना इसलिए नहीं रहा जा सकता कि देश के एक खोजी अखबार, इंडियन एक्सप्रेस ने जांच-पड़ताल के बाद एक रिपोर्ट छापी है कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से बाकी दो सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से समय-समय पर लिखित असहमति जाहिर की है और उसे अनदेखा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कई फैसले अपने स्तर पर लिए। रिपोर्ट के मुताबिक इन फैसलों की जानकारी भी कई मामलों में बाकी दो आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को फैसले लिए जाने से पहले नहीं दी गई। एसआईआर को पूरे देश में लागू करने के काम सहित चुनाव आयोग के भीतर पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार संधू और जोशी ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई और लिखित रूप में अपनी असहमति दी, लेकिन उनकी आपत्तियों पर अमल नहीं हुआ। एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि ये आपत्तियां एसआईआर प्रक्रिया और वोटर लिस्ट से जुड़ी हुई थीं। इन दोनों ने यह भी लिखित शिकायत की कि उनकी लिखित सलाह के खिलाफ जाकर ज्ञानेश कुमार ने काम किया। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया है। इसके साथ-साथ इन दोनों सदस्यों ने भारत सरकार के सबसे बड़े नौकरशाह, कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर चुनाव आयोग के भीतर काम के बंटवारे में किए गए बदलाव की शिकायत की थी, जिससे वोटर लिस्ट के लिए आईटी सिस्टम की निगरानी का एक स्तर खत्म हो गया था।
इन तीनों ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुई है और कानून के तहत प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और विपक्ष के नेता के एक पैनल ने इन सदस्यों का चयन किया था। उल्लेखनीय है कि 2024 में जब संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त बनाया गया था, तब भी विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया से असहमति दर्ज कराई थी। इसके बाद 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त बनाने पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने असहमति दर्ज कराई थी। इस देश में चुनाव आयोग का ऐसा गौरवशाली इतिहास रहा है, कि टी एन शेषन का नाम आज भी सख्ती और हौसले के लिए देश में मिसाल की तरह लिया जाता है। वहाँ से लेकर आज शर्मिंदगी तक, ये कहाँ आ गए हम !
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है कि अब वोटर बनने के लिए किसी नागरिक को जो फॉर्म भरना होता है, उसमें एक ऐसा सवाल पूछा जा रहा है जो पहले कभी नहीं पूछा गया था। इसमें पूछा जा रहा है कि क्या नया वोटर, उसके मां-बाप या दादा-दादी इसके पहले हुए एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद थे। इस सवाल के खिलाफ जोशी और संधू दोनों ने फाइल पर यह चेतावनी लिखी थी कि नियमों को बदले बिना यह सवाल ऐसे नहीं जोड़ा जा सकता। जोशी ने अपनी आपत्ति दर्ज की और संधू ने भी उससे सहमति जताते हुए इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तुरंत हटाने की बात कही। दोनों चुनाव आयुक्तों ने एसआईआर से जुड़े हुए बहुत सारे पहलुओं को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन उनकी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक बंगाल चुनाव में 49 सीटों पर एसआईआर के तहत हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन 49 सीटों पर एसआईआर से हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक होने के बावजूद चुनाव परिणाम में इसका कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है; इनमें 26 सीटें भाजपा और 21 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थीं।
अभी सुप्रीम कोर्ट ने ही बंगाल में महीनों से चल रहे मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग से हासिल जानकारी के आधार पर यह कहा था कि जिस रफ्तार से मतदाताओं की आपत्तियां सुनी जा रही हैं और उनके कागजात देखे जा रहे हैं, उस रफ्तार से बंगाल में आपत्तियों के निपटारे में 21 बरस लगेंगे। अब दिल्ली की बारी पुनरीक्षण में जल्दी आ गई है और सुप्रीम कोर्ट को यह सवाल दिखाई दे रहा है कि चुनाव आयोग वोटरों के नाम पर सवालिया निशान लगाने का काम कहीं मशीनी अंदाज में तो नहीं कर रहा। दिल्ली में गर यह काम कुछ बरस बाद होता, तो दूसरे राज्यों को देखकर सुप्रीम कोर्ट को यह समझ ही नहीं पड़ता कि चुनाव आयोग एक खास मकसद की मशीन बन चुका है। बंगाल में एसआईआर के बाद 27.16 लाख नाम हटाए गए, उनमें से 22.21 लाख लोगों ने अपने मताधिकार की बहाली के लिए अपील की। लेकिन चुनाव आयोग के सामने कुल अपीलें 38.31 लाख हैं, क्योंकि 16.10 लाख अपीलें उलटे उन नामों को हटाने के लिए हैं जिन्हें सूची में शामिल किया गया था।
देश में ऐसे कई मौके आए हैं जब चुनिंदा अखबारों की खबरों ने इतिहास में हो रहे फेरबदल को रोकने या तेज करने का काम किया है। कभी कोई अखबार, तो कभी कोई और वेबसाइट, कभी स्टिंग ऑपरेशन करने वाला कोई कोबरा, अलग-अलग लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दों और किए गए भंडाफोड़ से लोकतंत्र को बचने का मौका मिला है। अब सुप्रीम कोर्ट के जागने का समय आ गया है। इंडियन एक्सप्रेस नाम के एक मुर्गे ने अदालत की दहलीज पर जाकर बांग दी है। देखना है, इस रिपोर्ट के बाद अब क्या होता है?




