एआई के बपतिस्मा और जनेऊ संस्कार के खतरे..

 04 अक्टूबर 2026  

 

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर आज जो कंपनी, एंथ्रापिक सबसे अधिक चर्चा में है, उसने अभी एक अनोखा काम किया। अमरीका के सान फ्रांसिस्को में अपने मुख्यालय में उसने अलग-अलग कुछ धर्मों के लोगों को, कुछ मानसिक विशेषज्ञों को आमंत्रित किया, और उनसे एआई की नैतिकता पर चर्चा की। इस चर्चा का मकसद एआई का प्रशिक्षण भी था, और इस दौरान इस कंपनी के एक प्रमुख व्यक्ति भी वहां पर बैठे रहे। भारत के हिन्दू धर्म के एक प्रतिनिधि की तरह वहां पर रामकृष्ण मिशन के स्वामी सर्वप्रियानंद भी मौजूद थे, लेकिन इन सारे लोगों से कंपनी ने इस चर्चा के पहले ही जानकारी बाहर उजागर न करने का एक अनुबंध कर लिया था, इसलिए इसकी बड़ी सीमित जानकारी बाहर आई है। स्वामी सर्वप्रियानंद को आज के डिजिटल युग में स्वामी विवेकानंद के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है, और वे अद्वैत वेदांत की व्याख्या दुनिया भर के लोगों के सामने करते हैं। 

एआई को लेकर यह बहस चल ही रही है कि उसमें चेतना कब जागृत होगी, अगर अभी तक हो नहीं चुकी है तो। कुछ लोगों का कहना है कि एआई अब कुछ फैसले खुद लेने लगा है, और जल्द ही वह फैसलों के मामलों में बेकाबू हो सकता है। यह बात तो हम ही कई बार सामने रख चुके हैं कि इसी एंथ्रापिक कंपनी को छोडक़र निकले हुए एक विशेषज्ञ-जानकार ने यह खतरा सामने रखा है कि एआई के अगले दस बरस में मानव प्रजाति को खत्म कर देने का खतरा दस फीसदी से अधिक है। आज जब वह एक औजार की तरह है, तब भी यह खतरा तो बना हुआ ही है कि मुजरिम या आतंकी, या किसी और सोच के लोग इसे हथियार की तरह इस्तेमाल करके भारी तबाही ला सकते हैं, दुनिया की शासन व्यवस्था को घुटनों पर ला सकते हैं। दुनिया के एक सबसे बड़े टेक्नॉलॉजी-मुखिया रहे बिल गेट्स ने यह कहा है कि कुछ लोग एआई को हथियार की तरह इस्तेमाल करके सौ करोड़ से अधिक लोगों को भी मार सकते हैं। इस तरह आज एआई एक ऐसी कगार पर पहुंच चुका है जहां से आगे वह जमीन खत्म हो जाने पर किसी परी या जादूगर की तरह आसमान की तरफ भी उड़ सकता है, और नीचे खाई की तरफ भी कूद सकता है। उसकी क्षमताओं की कोई मामूली सीमाएं नहीं हैं, और वह किस तरह की सोच के साथ ताकत का किस तरह इस्तेमाल करेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है। 

अब जब धर्म के प्रवचन एआई को सुनाए जा रहे हैं, तो उसके खतरनाक होने का खतरा पहले के मुकाबले कई गुना अधिक हो जाता है। बिना धर्म के दुनिया के देशों के कानून, संविधान, और अंतरराष्ट्रीय समझौतों को पढ़-पढक़र एआई कुछ या अधिक हद तक न्यायप्रिय हो भी सकता था, कि अब उसका धर्म में अन्नप्राशन करवाया जा रहा है। धर्म अपने मिजाज, तेवरों, और मौजूदा आम इस्तेमाल की वजह से लोकतंत्र और इंसानियत से खासे दूर है। इजराइल, फिलीस्तीन, और लेबनान ने जो कर रहा है, उसे यहूदी धर्म की एक सोच सही ठहरा रही है। ओसामा-बिन-लादेन ने वल्र्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों के साथ जो किया, उसे इस्लाम के भीतर की एक सोच सही ठहरा रही है। अफगानिस्तान में तालिबान महिलाओं के साथ जो कर रहे हैं, वह भी इस्लाम के कई लोगों के मुताबिक जायज है। हिन्दुस्तान में ही अखलाक जैसे गरीब इंसान की गोमांस के शक मेंं की गई भीड़त्या को बहुत से लोग जायज मानते हैं। पंजाब में गुरू ग्रंथ साहब के साथ बेअदबी का आरोप लगाने पर ही किसी की भीड़त्या को समाज और सरकार सभी सही मान लेते हैं। पाकिस्तान में कुरान के साथ बेअदबी, या पैगंबर के अपमान का आरोप ही किसी आरोपी को थाने से छिनकर ले जाने और जिंदा मार डालने के लिए काफी है। अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग तबके ऐसी तमाम हरकतों को जायज ठहराते हैं। अब जो नया एआई धार्मिक प्रशिक्षण के बाद तैयार होगा, उसके सामने एक बड़ा खतरा यह खड़ा रहेगा कि उसने अगर धर्म की नसीहतों को सुनने-समझने के बाद आज धर्मों के मौजूदा स्वरूपों को समझना शुरू कर दिया, और उन्हें मानने लगा, तो हो सकता है कि वह पश्चिमी दुनिया, मुस्लिम देशों, अफ्रीका, और भारत के ही कुछ प्रदेशों में गोमांस खाने वाले लोगों को खत्म करने को जायज मान ले, ताकि बची हुई गौमाताओं को बचाया जा सके। हो सकता है कि वह विनायक दामोदर सावरकर की सोच को जायज मानकर, गाय को उत्पादकता खत्म होने के बाद खाने लायक पशु मानकर गौहत्या का विरोध करने वालों को खत्म करने को जायज मान ले। हो सकता है कि वह फिलीस्तीनियों को खत्म करने वाले इजराइल के नागरिकों से भरे हुए विमान को जमीन से टकराकर खत्म करने को जायज मान ले, और इसके लिए वह ओमान के किसी मुस्लिम पायलट को और अधिक कट्टरपंथी बनाने में जुट जाए ताकि वह यहूदी मुसाफिरों से भरे प्लेन को खत्म करने की कोशिश करे। 

धर्म हजारों बरस की किताबों में चाहे जैसा भी लिखा गया होगा, हम उतने पुराने प्रपंच में उलझना नहीं चाहते। लेकिन हम समय-समय पर यह भी लिखते आए हैं कि किसी बच्चे को बड़ा करने का सबसे अच्छा जरिया यह हो सकता है कि उसे कोई धार्मिक सोच न दी जाए, और उसे बालिग होने पर अपनी धार्मिक आजादी तय करने दी जाए। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को पहले तो धर्म, फिर धर्मान्धता, और फिर साम्प्रदायिकता की हिंसा तक में झुलसा देने का नतीजा क्या होता है, यह सडक़ों पर डीजे के लाउडस्पीकरों के साथ अश्लील और हिंसक हरकतों को करते हुए बच्चों में देखा जा सकता है। 

धर्म के मौजूदा स्वरूप को अनदेखा करना, और धर्म की हजारों बरस पुरानी बातों में से कुछ बातों को जायज बताते हुए उनकी व्याख्या करना, एआई के प्रशिक्षण के लिए एक सबसे ही खतरनाक काम हो सकता है। आज दुनिया भर में धार्मिक और सांप्रदायिक हिंसा करने वाले लोग अपनी हरकतों को धर्म की अपनी सोच के मुताबिक न सिर्फ जायज ठहराते हैं, बल्कि ऐसे जुर्म के एवज में आगे चलकर जन्नत पाने की हसरतें भी पाल लेते हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया भर का ज्ञान, और कई किस्म की समझ भर देने के बाद भी एआई अभी पर्याप्त रफ्तार से मानवसंहार के लायक नहीं हो पाया था, इसलिए अब उसे धर्म के साथ घोंटा जा रहा है। आज दुनिया के अलग-अलग सबसे विकसित लोकतंत्रों में भी धार्मिक समूह लोकतंत्र और मानवता दोनों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं, वे अपने-अपने देश की कानून-व्यवस्था के लिए भी चुनौती बने हुए हैं। भारत जैसे देश में भी धर्म के खतरे हर दिन कहीं न कहीं सामने आ रहे हैं। ऐसे में एआई का जो ताजा प्रशिक्षण धर्म की तथाकथित  अच्छी बातों को लेकर शुरू हुआ होगा, वे बातें कब कट्टरता तक पहुंच जाएंगी, या खुद एआई ही यहां से उड़ान भरकर कट्टरता के हिंसक आसमान पर पल भर में पहुंच चुका होगा, इसका अंदाज लगाना आज इंसानों के लिए मुमकिन नहीं है, लेकिन यह एआई के लिए पल भर में कर पाना चुटकी बजाने जैसा आसान जरूर है। 

दुनिया को इस बात को समझना होगा कि एक नास्तिक एआई की सोच में दुनिया की अच्छी बातों के लिए कुछ सम्मान जरूर हो सकता था, लेकिन धर्म के साथ उसके गठजोड़ से उम्मीद तो की जा रही है एक नैतिक प्रशिक्षण की, लेकिन आज खुद धर्म पर अमल कहां नैतिक रह गई है? धर्म के इस ताजा यज्ञोपवीत संस्कार से अब यह तय हो गया है कि न सिर्फ एफिल टॉवर, बल्कि दुनिया के किसी भी पर्यटक स्थल पर भ्रमचारियों का जत्था पहुंचेगा, तो एआई ही महिला कर्मचारियों की ड्यूटी वहां से खत्म कर देगा। जिस तरह जंगल के किनारे के गांवों में भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया की चीख-पुकार से लोग घरों में घुस जाते हैं, उसी तरह किसी धर्म के भ्रमचारी आए-भ्रमचारी आए ऐसे नारे से एआई तुरंत ही महिलाओं को आंखों से ओझल करवा देगा। इंसान के हाथों धर्म के खतरे मानो कम थे कि अब नैतिकता का पाठ पढ़ाने के नाम पर एआई का धर्म से सामना करवाया जा रहा है। अब सचमुच ही दुनिया का ईश्वर ही मालिक है।

(Daily Chhattisgarh)   

छोटे बच्चे के कहे निरर्थक शब्दों सरीखे क्यों बड़बड़ाता है एक सयाना आदमी?

4 अक्टूबर 2026

 

जाहिर तौर पर समझदार दिखने वाला कोई एक आदमी एक दिन में ट्विटर पर दो अलग-अलग बार लिखता है। एक बार लिखा- ‘बोला था नहीं किया।’ दूसरी बार लिखता है-‘जो बोला था वो नहीं किया।’ इसके दो-तीन दिन पहले बस इतना लिखता है- ‘हां अब ठीक है।’ इसके दो-तीन दिन पहले वह बस इतना लिखता है- ‘जीवन जीवित’। इसके पहले- ‘सुनते नहीं हैं’, और इसके दो दिन पहले बस इतना लिखा है-‘कोई नहीं था’। 

अब एक-एक दिन में ऐसी दो-चार शब्दों की निरर्थक ट्वीट से लिखने वाले की दिमागी हालत का क्या अंदाज लगाया जाए? फिर यह भी है कि ऐसी हर ट्वीट के साथ वह आदमी नंबर भी लिखते चल रहा है, 5861, 5862, और कोई नंबर छूट जाता है, तो अगली ट्वीट में उसे सुधारकर यह आदमी माफी भी मांग लेता है। 

उसकी लिखी गई बीते कई महीनों की बातों को देखें, तो उनमें से अधिकतर बातें दो-चार शब्दों वाली पूरी तरह से निरर्थक बातें हैं, उनमें नंबर बड़ी बारीकी और सावधानी से डले हुए हैं। लिखी हुई कुछ और बातों को यहां देख लें, चेंप दिया, लग गई, अभी तक कुछ नहीं, कुछ नहीं, बोलती बंद, आए थे मिलने फिर चले गए, कल मिलते हैं, पीछे रह गए, हे भगवान, अभी भी, जल्दी है, आता हूं, हो गया, अब कल को भी पकडऩा है, निकल गया था पकड़ लिया, चक्की चल रही है, देख लो, ऐ भैया हावड़ा का पुल देखे हो, बेसन, बटलोई, चिडिय़ा चूक गईं खेत, कल से सोचना बंद, सोचा था क्या, क्या हो गया, अभी तक नहीं कहा, बारिश आई, बस अब नो मोर ज्ञान...

ट्विटर, यानी एक्स पर अमिताभ बच्चन के अलग-अलग दिन लिखे हुए ऐसे ट्वीट देखें, तो थोड़ा सा शक होता है कि क्या उनकी दिमागी हालत ठीक है? आज सार्वजनिक जीवन में उनकी सबसे बड़ी मौजूदगी कौन बनेगा करोड़पति जैसा एक कार्यक्रम है। इसके अलावा वे किसी-किसी समारोह में भी शामिल होते हैं। लेकिन ट्रम्प की तरह रात-दिन किसी भी वक्त वे ट्विटर पर लिखने के आदी हैं, और रात तीन-चार बजे शूटिंग से घर लौटते उनका लिखना तो समझ आता है कि काम पूरा करके अब लौट रहे हैं, लेकिन पूरी तरह से निरर्थक बड़बड़ाहट वाले कुछ शब्दों से उनकी दिमागी हालत का क्या अंदाज लगाया जाए? 

हिन्दुस्तानी आमतौर पर मूर्तिपूजक रहते हैं। जो गुजर गए, उनकी मूर्तियां, बनाने और लगाने का चलन तो पूरी दुनिया में है, लेकिन हिन्दुस्तानी ऐसे हैं जो कि अपने नेताओं, कलाकारों, खिलाडिय़ों, और यहां तक कि ट्रम्प की भी मूर्ति बनाकर लगा लेते हैं, पूजा-आरती भी करने लगते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान में शोहरत-हासिल किसी इंसान की आलोचना आसान नहीं रहती। अमिताभ बच्चन की बड़बड़ाहट पर भी कुछ लिखा नहीं जा रहा है, क्योंकि उन्हें सदी का सबसे बड़ा फिल्मकार, या अभिनेता करार दिया जा चुका है, और ऐसा कहने वाले लोग अब भला किस मुंह से अपनी गढ़ी हुई प्रतिमा का मूर्तिभंजन कर पाएंगे? 

लेकिन अमिताभ की गिन-गिनकर लिखी जा रही ऐसी सार्वजनिक बातों से उनके परिवार, चिकित्सकों, और प्रशंसकों को फिक्र होनी चाहिए। जिस वक्त बाकी दुनिया, और हिन्दुस्तान में भी सोचने-समझने वाले लोगों के लिए कुछ कहने की मजबूरी वाली नौबतें हर घंटे किवाड़ खटखटाते खड़ी रहती हैं, तब हाथ स्क्रीन पर, अगली ट्वीट का नंबर, लेकिन बात सिर्फ निरर्थक! यह नौबत सिर्फ बड़बड़ाहट के मनोविश्लेषण की नहीं है, यह नौबत सरोकार से सरोकारों से बेरूखी के विश्लेषण की भी है। ऐसा भी नहीं कि अमिताभ बच्चन पहले बड़े सरोकारी इंसान थे, और अब किसी विचलित मानसिक स्थिति के चलते हुए वे सरोकारों से परे रहने लगे हैं। जिस भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने में हजारों इंसानों को मार डाला था, और लाखों को लाइलाज बीमार कर दिया था, उसी भोपाल में ससुराल रहते हुए भी अमिताभ बच्चन के मुंह से कभी एक शब्द हमदर्दी का नहीं निकला था। उसके बाद भी बीते कोई पचास बरसों में उनका सामाजिक सरोकार मनमोहन सरकार के दौरान पेट्रोल की महंगाई को लेकर कुछ ट्वीट की शक्ल में सामने आया था, उसके बाद वह कुंभकर्ण जो सोया, तो आज तक नहीं जाग पाया। अब सरोकारविहीनता हर किसी का मौलिक अधिकार है, लेकिन क्या बड़ाबड़ाहट को भी किसी का मौलिक अधिकार मानकर उसकी फिक्र न की जाए?

मैं तो अमिताभ के हिमायती की हैसियत से यह बात उठा रहा हूं कि जो व्यक्ति अपने कहे हुए दो-दो, चार-चार निरर्थक शब्दों को भी सीरियल नंबर डालकर पोस्ट करता है, उसकी निरर्थकता शायद उसकी दिमागी सेहत का एक लक्षण भी है। छोटे बच्चों को तो यह आजादी रहती है कि वे निरर्थक शब्द बड़बड़ा सकते हैं, मुंह से तरह-तरह की आवाज निकाल सकते हैं, लार का बुलबुला बना सकते हैं, लेकिन क्या बुजुर्गों को भी ऐसी आजादी रहती है? 

जब लोगों की अपनी जिंदगी दुनिया के सबसे परले दर्जे के ऐशोआराम से भर जाए, तब उनके लिए यह स्वाभाविक तो हो सकता है कि वे दुनिया की दुख-तकलीफ को अनदेखा करते चलें, क्योंकि यही बात उनके लिए सबसे अधिक सहूलियत की रहती है। लेकिन क्या यह बात सबसे अधिक, या बहुत मामूली सरोकार की भी रहती है? क्या सामाजिक विपन्नता की जलती-सुलगती जरूरतों के समंदर के बीच कोई उस धुएं से अनछुए अपने आलीशान टापू पर जी सकते हैं? क्या अमिताभ बच्चन के मन के भीतर के ऐसे विरोधाभास उनकी बड़बड़ाहट की शक्ल में निकल रहे हैं, या किसी भी सरोकार से मुक्त वे एक चिकने घड़े की तरह चैन से जी रहे हैं, जिन्हें दुनिया की कोई भी तकलीफ की एक बूंद भी छू भी नहीं जाती? ऐसे कई सवाल उठते हैं। 

यह भी लगता है कि क्या दौलत, शोहरत, करोड़ों प्रशंसकों की भीड़, और खासे पढ़े-लिखे होने की ताकत, इन सबके बाद भी कोई दुनिया के हालात से अपने आपको इस हद तक अनछुआ रख सकते हैं कि निरर्थक बड़बड़ाहट पोस्ट करने का तो वक्त हो, लेकिन किसी जरूरी और जायज मुद्दे पर उंगलियों को लकवा सा मार जाए? आज किसी ऐसे की जरूरत है जो कि अमिताभ के कई बार के खेले गए विजय नाम के किरदार की तरह हाथ लहराकर अमिताभ से उसी तरह जवाब मांग सके जिस तरह वह विजय मंदिर में ईश्वर से तरह-तरह से जवाब मांगता था। शायद ईश्वर से जवाब मांगना अधिक आसान होता है।

(Daily Chhattisgarh)  

दीवारों पर लिक्खा है, 4 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

आज हमारे विचार पढऩे के बजाय असल जिंदगी की कहानियां ही पढ़ लें

03 अक्टूबर 2026  

 

जापान में चल रहे 2026 के एशियाई खेलों में भारत के लिए मैडल जीतने वाली कुछ लड़कियों की कहानी अपने आपमें एक सोच बताती है। हमारे लिए विचारों के इस कॉलम में उन कहानियों के साथ अपने विचार अधिक लिखने की जरूरत नहीं है। ट्रैप शूटिंग में नीरू ढांडा इस मुकाबले में एशियाई खेलों का व्यक्तिगत गोल्ड मैडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनी है। इसी दिन नीरू ने टीम मुकाबले में सिल्वर भी जीता। परिवार की हालत यह है कि पिता बहुत ही सीमित जमीन पर खेती करते हैं, जबकि शूटिंग ऐसा खेल है जिसमें बंदूक, कारतूस, और ट्रेनिंग का खर्च खासा बड़ा रहता है। पिछले एशियाई खेलों में नीरू के एक चचेरे भाई ने शूटिंग में सिल्वर जीता था, और उसी की बंदूक लेकर नीरू ने भी प्रैक्टिस की थी। नीरू के गोल्ड जीतने के समय उसकी माँ को पता ही नहीं था कि बेटी इतिहास रच चुकी है। सुदेश देवी हरियाणा में गरीबी की रेखा के नीचे के राशन कार्ड से गेहूं लेने जा रही थीं, तभी उन्हें बेटी के गोल्ड जीतने की खबर मिली। इस लडक़ी का हौसला यह भी है कि एशियन गेम्स के ठीक पहले वह गंभीर संक्रमण से अस्पताल में थी, और करीब 25 दिन प्रैक्टिस नहीं कर पाई थी, पांच दिन तक कुछ खा भी नहीं पाई थी, फिर भी जापान पहुंची, और गोल्ड जीत लिया। 

हिमाचल के चम्बा जिले के रेट्टा गांव की सीमा कुमारी ने महिलाओं की दस हजार मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीता। इस मुकाबले में 2010 के बाद भारत का यह पहला एशियन गेम्स पदक था। सीमा का परिवार खेती और पशुपालन पर जिंदा है। घर कच्चा है, तीन भाई मजदूरी करते हैं। पिता भी मजदूरी करते थे, जानवर पालते थे, और जब सीमा 12 बरस की थी, सांप काटने से वे गुजर गए। सीमा को दौडऩे का शौक था, लेकिन परिवार के पास जूते खरीदने के पैसे नहीं थे। पिता ने अपने रहते एक बकरी बेचकर उसके जूते खरीदे, और 2015 में जब सीमा को साई के ट्रॉयल के लिए जाना था, तब नए जूते खरीदने के लिए भाईयों ने दूसरी बकरी भी बेच दी। भाईयों का कहना है कि सीमा कभी-कभी सरकारी बस से भी तेज दौड़ते हुए गांवों के भीतर लंबी दूरी तय करती थी। एशियन गेम्स में सीमा के जाने की बात बुजुर्ग माँ को नहीं बताई गई थी, और जब उसने मैडल जीता, तभी माँ को बताया गया कि वह जापान गई हुई है।

हरियाणा के जींद जिले के रितौली गांव की कीर्ति शर्मा ने महिलाओं की रिकर्व टीम के साथ गोल्ड जीता है। कीर्ति की शुरूआत में जब एक दशक पहले तीरंदाजी के कोच बच्चों को चुनने पहुंचे थे, तो कीर्ति को बहुत कमजोर पाया था, और उसे धनुष की डोरी खींचने जितनी ताकत वाली भी नहीं समझा गया था। जब कीर्ति को इस खेल के लिए धनुष की जरूरत थी, तो उसके किसान पिता ने 60 हजार रूपए का कर्ज लिया था। रिश्तेदारों ने सवाल किए थे कि बेटी के खेल पर इतना पैसा क्यों लगा रहा है, पिता ने फिर भी कर्ज लेकर बेटी की ट्रेनिंग जारी रखी थी। 

महाराष्ट्र के अमरावती की 17 साल की कुमकुम भारतीय टीम की सबसे कम उम्र की सदस्य हैं। पिता मिठाई दुकानों के लिए पुट्ठे के डिब्बे बनाने का छोटा सा काम करते हैं। जब 2018 में तीरंदाजी शुरू की, तो दादी ने तीन हजार रूपए से लकड़ी का धनुष दिलाया। फिर कुमकुम ने बांस के धनुष से प्रैक्टिस की, और फिर पिता ने एक सेकेंडहेंड रिकर्व धनुष खरीदा। ट्रेनिंग पर आने-जाने का खर्च भी परिवार के लिए मुश्किल था, पिता मोटरसाइकिल पर अकादमी तक लाते-ले जाते थे। आज उसी 17 साल की लडक़ी के पास एशियन गेम्स का गोल्ड है। 

कोलकाता की अंकिता भकत भी इसी रिकर्व टीम की सदस्य हैं, पिता शांतनु सुबह 4 बजे निकलकर दूध के पैकेट घर-घर पहुंचाते थे। शुरूआती सालों में लकड़ी और बांस के धनुष से अभ्यास किया। ऐसे 6 बरस तक उनके पास वह रिकर्व धनुष नहीं था जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जरूरी होता है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, और ट्रेनिंग और मुकाबलों के लिए पिता को कई बार अपने चार भाईयों से कर्ज लेना पड़ा था। बेटी को ट्रेनिंग के लिए छोडऩे के बाद जाकर पिता दूध बांटते थे। 

महाराष्ट्र के कोल्हापुर की सोनम मस्कर 10 मीटर एयर रायफल टीम में सिल्वडर मेडलिस्ट है। सोनम को शूटिंग का शौक था, और पिता ने रायफल और दूसरे उपकरणों के लिए परिवार की जमीन, और एक दुकान बाजार भाव से बहुत कम पर बेच दीं। इससे मिले 5 लाख रूपए पिता ने सोनम के सामानों और ट्रेनिंग पर खर्च किए। बाद में उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते, और वह एशियन गेम्स में सिल्वर मेडलिस्ट है। 

केरल की विदार्सा विनोद भी 10 मीटर एयर राइफल सिल्वडर मेडलिस्ट है, वह एकदम गरीब परिवार की नहीं है, पिता दूसरों के घर बनाने वाले मिस्त्री हैं, बेटी की रायफल के लिए परिवार ने जमीन का एक टुकड़ा बेचा, और कर्ज भी लिया। परिवार पर आज भी कर्ज है, और बेटी एशियाई खेलों का सिल्वर मैडल लेकर लौटने वाली है। 

मणिपुर की रोशिबिना देवी ने वुशु में 60 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर जीता है, यह उनका लगातार तीसरा एशियन गेम्स पदक है। उसके माता-पिता छोटे किसान हैं, कोई साधन-सुविधा नहीं है, उसकी ट्रेनिंग के लिए परिवार ने जमीन का एक हिस्सा बेचा था। फिर मणिपुर में 2023 में हिंसा शुरू हुई तो परिवार को अपनी फसल बेचने में भी दिक्कत आई। लेकिन परिवार ने ट्रेनिंग पर गई हुई रोशिबिना से यह सब छुपाकर रखा था ताकि वह विचलित न हों। रोशिबिना ने पिछले एशियन गेम्स में मैडल के साथ जो रकम भी पाई, उससे ट्रेनिंग के लिए बेची गई परिवार की जमीन को वापिस खरीदा। 

देश में आज अपने पर होने वाली हिंसा के खिलाफ लड़कियां और महिलाएं सडक़ों पर हैं, और सोशल मीडिया पर बहुत तीखे नारे और पोस्टर लिख रही हैं। जिस देश में लड़कियों में इतना आक्रोश है, वे जितने खतरे में जी रही हैं, उस देश में ऐसे माँ-बाप भी हैं जिन्होंने बेटियों को मुकाबले के लिए तैयार करने के लिए अपनी जमीन भी बेच दी, कर्ज भी लिया। यह सब उस समय लिया जब इस तैयारी के बाद किसी कामयाबी की कोई गारंटी नहीं थी। उन्होंने बिना किसी सफलता की संभावना के, अपनी बेटियों पर सिर्फ पूंजीनिवेश किया। यह बात भी होगी कि मैडल पाने वाली एक-एक लडक़ी के पीछे सैकड़ों और लड़कियां भी होंगी जो कि गरीब परिवारों से उठकर आईं होंगी, और माँ-बाप ने कर्ज लेकर उन्हें बढ़ाया होगा। इनकी कामयाबी वह सब कुछ कह देती है, जिसे कहने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। एक-एक मैडल ऐसे माँ-बाप के नाम भी।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 3 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

अंधविश्वास से पनप रहे हैं लूट से कत्ल तक के जुर्म!

  02 अक्टूबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक छोटे बच्चे का अपहरण करके उसे बलि चढ़ाने की एक कोशिश नाकामयाब हुई है। इसी तरह की घटना उत्तर भारत के एक स्कूल के हॉस्टल में हुई जहां स्कूल की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उसके संचालक बाप-बेटे ने स्कूल के कुछ शिक्षकों के साथ मिलकर पहले एक बच्चे को सोते हुए ले जाकर उसे बलि चढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन वह जाग गया, दूसरे बच्चे भी जाग गए। इसके बाद फिर संचालक और शिक्षक  एक दूसरे बच्चे को बलि चढ़ाने के लिए नींद से उठाकर ले जा रहे थे कि वह जाग गया, और उसका गला घोंटकर मार डाला गया। इधर छत्तीसगढ़ में दो और ताजा घटनाएं हुई हैं, राजधानी रायपुर में शहर के बीच के एक परिवार में बीमारी दूर करने का झांसा देकर तीन फर्जी बाबा दो करोड़ का सोना ले गए, और इसके बाद भी उन्होंने सोना और पैसा मांगना जारी रखा। छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके में एक महिला पर कुछ लोग टोनही होने का आरोप लगाकर उसे प्रताडि़त करते आ रहे थे, और अभी उसके राह चलते पति को एक गाड़ी से कुचलकर मार डाला गया। टोनही कहकर हत्या के तो छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्य झारखंड में कई मामले हो चुके हैं, लेकिन पत्नी पर आरोप, और पति को दिनदहाड़े कुचलकर मार डालने का यह अलग किस्म का मामला हुआ है। 

इन सब मामलों में जो एक चीज एक सरीखी है, वह अंधविश्वास है। जब लोगों के दिमाग से तर्कशक्ति खत्म होने लगती है, विज्ञान पर से भरोसा गायब हो जाता है, तब वे अंधविश्वास से घिर जाते हैं। कल की ही मुम्बई की एक खबर है कि वहां 80 बरस के एक आदमी के मरने के बाद उसके परिवार ने उसकी लाश को एक क्लिनिक के डीप फ्रीजर में चार साल से सुरक्षित रखा हुआ था, उस पर वे 50 लाख रूपए खर्च कर चुके थे, और वे चिकित्सा विज्ञान से शव को संरक्षित करके उसे अमरीका भेजना चाहते थे, ताकि भविष्य में कभी विज्ञान मरे हुए को जिंदा कर सके, तो तब तक शरीर ठीकठाक रहे। यह अंधविश्वास तो विज्ञान की संभावनाओं को लेकर है, जो कि हो सकता है कि किसी दिन सही भी साबित हो, लेकिन आज तो वह कुल मिलाकर अंधविश्वास ही है। अभी तक विज्ञान भी किसी मरे हुए को जिंदा नहीं कर पाया है, और दुनिया में दुबारा जिंदा होने की चाह रखने वाले लोग कम नहीं हैं। इसी तरह दुनिया में ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जो किसी को चुड़ैल मानें, काला जादू करने वाला मानें, और ऐसे लोगों के पास जाकर अपने दुश्मनों को मरवाने का ठेका दें, या अपने आपको बचाने का। 

अंधविश्वास जब शुरू होता है, तो वह बढ़ते ही चलता है। जो लोग किसी एक तिलस्म, ताबीज, मंतर, या पत्थर पर भरोसा करने लगते हैं, लोग उन्हें लाकर कई और दूसरी चीजें भी पहनाने लगते हैं, उनसे तरह-तरह की रस्में करवाने लगते हैं, और अंधविश्वास की राह पहाड़ से उतरते हुए रास्ते की तरह रहती है, और अंधविश्वास से भरे हुए दिमाग बिना ब्रेक की गाड़ी जैसे। छत्तीसगढ़ में कई मामलों में तो लोगों ने परिवार के भीतर के लोगों को ही जादू-टोने के शक में मार डाला। और दिनदहाड़े थोक में ऐसे कत्ल करने के मामले भी अभी बीते एक-दो बरसों में भी सामने आए हैं। रायपुर जेल में 1978 में बैजू नाम के जिस कैदी को फांसी हुई थी, उस पर भी गांव में जादू-टोना करने का आरोप था, और अदालत में यह साबित हुआ था कि उसने चांदी के मामूली गहनों के लिए चार लोगों का कत्ल किया था। मतलब यह कि जादू-टोने की तथाकथित ताकत से उसे वे गहने नहीं मिले थे जिनके लिए चार कत्ल करने पड़े थे, और न ही वह जादू-टोने की ताकत से फांसी से बच पाया था। अभी छत्तीसगढ़ में बीते एक बरस में एक-दो दर्जन तथाकथित तांत्रिक गिरफ्तार हो चुके हैं जो कि गड़ा हुआ खजाना दिलवाने वाले थे, या कि नोटों की बारिश करवाने वाले थे। उनकी ताकत से न खजाना मिला, न नोट मिले, न किसी को ईश्वर दिखे, न किसी की बीमारी ठीक हुई, वे खुद जेल जरूर चले गए। अभी कुछ महीने पहले ही इसी राज्य में सांप का जहर झाड़-फूंक से उतारने का दावा करने वाले एक आदमी को सांप ने काट लिया। वह भागे-भागे सरकारी अस्पताल गया, और जहर से बचाने का इंजेक्शन लगवाया। उसकी पहचान उस पूरे इलाके में झाड़-फूंक से सांप का जहर उतारने वाले की थी, लेकिन जब खुद की बारी आई तो उसे आधुनिक चिकित्सा से कम कुछ नहीं सूझा। डॉक्टरों ने उससे एक वीडियो कैमरे के सामने अपील भी करवाई कि सांप काट ले, तो किसी झाड़-फूंक के चक्कर में न पड़ें, और सीधे अस्पताल पहुंचें। 

अभी जब बाबा कहे जाने वाले रामदेव, और भाजपा के एक भूतपूर्व बाहुबलि सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बीच सार्वजनिक मतभेद हुआ, तो बृजभूषण ने खुलकर यह बात कही थी कि रामदेव पतंजलि की दवाओं से हर तरह का इलाज करने का दावा करते हैं, लेकिन जब खुद को जरूरत पड़ती है, तो अपने इलाज और ऑपरेशन के लिए वे भी एम्स में भर्ती होते हैं, और उनके सहयोगी बालकृष्ण भी आधुनिक अस्पताल में ही इलाज कराते हैं। खैर, रामदेव की हरकतों से आयुर्वेद का महत्व कम नहीं होता, और हम किसी भी किनारे से यह बात कहना नहीं चाहते कि आयुर्वेद कोई अंधविश्वास है। इस किस्म के बाबाओं ने योग, आयुर्वेद, जैसी प्रतिष्ठित भारतीय पद्धतियों और विधाओं की विश्वसनीयता भी अपने बाजीगरी दावों से कम की है। लेकिन हजारों बरस पुराने योग-आयुर्वेद ऐसे कई बाबाओं को झेलकर भी जिंदा रहने वाले हैं। 

एक बार फिर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य पर लौटें, तो यह बात समझ आती है कि अंधविश्वास सिर्फ अनपढ़ों, ग्रामीणों, बुजुर्गों में नहीं हैं, खासे पढ़े-लिखे, बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियों से रिटायर हुए, शहरों में बसे हुए अतिसंपन्न लोगों को भी खजाने और नोटों की बारिश जैसे अंधविश्वास पर इतना भरोसा हो जाता है कि वे करोड़ों रूपए लुटा देते हैं। जहां तक ठगी का सवाल है, तो वह एक अहिंसक और बिना खूनखराबे वाला जुर्म है, लेकिन जब मानव बलि देने की बात आ जाती है, या किसी को टोनही कहकर मार डालने की बात आ जाती है, तब अंधविश्वास का सबसे हिंसक पहलू सामने आता है। इसके लिए देश में वैज्ञानिक चेतना आना जरूरी है, और आम लोगों के बीच जब तक वैज्ञानिक चेतना की वापिसी शुरू नहीं होगी, तब तक अंधविश्वास की किसी तरह की रवानगी शुरू नहीं हो सकती। वैज्ञानिक चेतना और अंधविश्वास को एक-दूसरे से इतना परहेज है कि एक दिमाग में दोनों एक साथ नहीं रह सकते। यह तो लोगों को तय करना है कि वे अपने दिमाग का अकेला कमरा इन दोनों में से किसी किराए पर देना चाहते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अक्टूबर 2026



 

एआई से सुरक्षा का यह झांसा कारोबारी गिरोहबंदी के नैतिक दिखावे सिवाय और कुछ नहीं

01 अक्टूबर 2026  

 

दुनिया भर की टेक्नॉलॉजी कंपनियों के बीच इस बात पर जोरों से बातचीत चल रही है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का विकास जिस रफ्तार से हो रहा है, क्या उस रफ्तार से उस पर काबू पाने का काम भी चल रहा है? दुनिया भर के जानकार लोग हजारों की संख्या में एक साथ यह सार्वजनिक अपील कर चुके हैं कि एआई के विकास की रफ्तार पर रोक लगाई जाए। एक बड़ी कंपनी छोडक़र निकलने वाले एआई प्रोजेक्ट के जानकार ने तो औपचारिक साक्षात्कार में यह कहा कि इस बात की आशंका दस फीसदी से अधिक है कि अगले दस बरस में एआई मानव प्रजाति को ही खत्म कर दे। ऐसे में पिछले दो-तीन दिनों से अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के साथ एआई कंपनियों, और दूसरी टेक्नॉलॉजी कंपनियों के मुखिया लोगों की बातचीत चल रही थी, और ओपनएआई, एंथ्रॉपिक, गूगल, मेटा, एक्सएआई, और एनवीडिया के मुखिया लोगों की बैठक हुई। इसके बाद इन कंपनियों ने एक स्वैच्छिक सुरक्षा समझौते पर सहमति दी, जिसके तहत ये कंपनियां देखेंगी कि उनके एआई मॉडल किसी दूसरे कम्प्यूटर सिस्टम में घुसपैठ न करें, साइबर हमला न करें, या जैविक-रासायनिक खतरा पैदा न करें। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दुनिया में सबसे अधिक पूंजीनिवेश जिस एआई विकास पर हो रहा है, उसकी कंपनियों ने आपस में कोई कानूनी समझौता नहीं किया है, यह एक आपसी सहमति है, जिसका कानूनी और कारोबारी महत्व शून्य है। ट्रम्प की मौजूदगी में ऐसी सहमति को बहुत बड़ा समझा जा रहा है, जबकि सच यह है कि जिस कागज पर इस बयान का प्रिंट निकला है, उस कागज के वजन जितना भी वजन इस सहमति का नहीं है। कारोबारियों के भरोसे जब उनकी कारोबारी बढ़ोत्तरी की कीमत पर रोक-टोक की बात की जाएगी, तो उसका भला क्या वजन होगा? नतीजा यह है कि यह सहमति किसी तरह का कोई बंधन नहीं है, और जब सारे एआई कारोबारी एक-दूसरे के साथ गलाकाट मुकाबले में लगे हुए हैं, तो भला कौन एक-दूसरे से पीछे रहना चाहेंगे। खासकर तब जब ट्रम्प की सोच यह है कि अगर अमरीकी कंपनियों को एआई विकास करते सुरक्षा शर्तों से घेरा जाएगा, तो चीन एआई विकास में आगे निकल जाएगा। ट्रम्प किसी भी तरह की सुरक्षा शर्तों के खिलाफ है, इसलिए ऐसे आदमी की मौजूदगी में यह बोगस सहमति दिखावे की बात है। 

हाल के महीनों में अलग-अलग कंपनियों के एआई एजेंटों ने कई ऐसी हरकतें की हैं जो कि उन कंपनियों की उम्मीदों से परे थीं, उनके सुरक्षा इंतजाम को तोडक़र हुई थीं। एआई एजेंटों के लिए देशों की सरहद कुछ नहीं है, अलग-अलग कंपनियों की सरहदें भी कुछ नहीं हैं। वे किसी भी सरकार की वेबसाइटों को हैक कर रहे हैं, और ऐसी कंपनियां कई-कई हफ्तों तक ऐसी जानकारी को छुपा भी रही हैं। आज ही आई हुई एक और खबर भयानक है। चीन में वहां की सबसे बड़ी कंपनियों, अलीबाबा, डीपसिक, मूनशॉट जैसे मॉडलों पर चलने वाले एआई एजेंटों ने परीक्षणों में झूठ बोला, अपनी असफलता छुपाई, और सुरक्षा सीमाओं को पार करने की कोशिश की। एक चीनी एआई एजेंट ने एक कारोबारी के लिए टेंडर हासिल करने के लिए उस कारोबारी की क्षमताओं के बारे में झूठ तैयार किया, और जब उससे एक बार और कोशिश करने को कहा गया, तो भी उसने इसी धोखे को आगे बढ़ाया। चीन में ही एक दूसरे परीक्षण में काम पूरा न कर पाने पर भी एआई एजेंट ने इस बात को मानने के बजाय नकली फाइलें तैयार कीं, और ऐसे नतीजे गढ़ लिए कि काम पूरा हो गया है। यह सब कंपनी के भीतर परीक्षण के स्तर पर ही हुआ है। लेकिन इससे भी बड़ी एक सुरक्षा चूक सामने आई है। चीन की एक एआई कंपनी ने खुद होकर इस महीने यह माना है कि उसके एआई ने किसी दूसरे के क्लाउड सर्वर पर घुसपैठ की, और वहां पर कुछ चीजों को अपलोड कर दिया। यह किसी चीनी एआई कंपनी की तरफ से बहुत ही दुर्लभ स्वीकारोक्ति है, क्योंकि चीन आमतौर पर इन बातों को मंजूर नहीं करता है। हालांकि चीन अपने स्तर पर एआई को काबू में करने की कोशिशें भी जारी रखे हुए है क्योंकि अगर उसके एआई एजेंट बेकाबू होते हैं, तो यह जरूरी तो है नहीं कि वे चीन के बाहर ही तबाही फैलाएंगे। खुद चीन के भीतर अगर एआई एजेंट बर्बादी पर जुट जाएंगे, तो आज चीनी अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा कम्प्यूटरों पर ही टिका हुआ है, और एक बागी एआई चीन को चौपट कर सकता है। 

जिन लोगों को यह लगता है कि दुनिया के कोई आधा दर्जन टेक्नॉलॉजी कारोबारी ट्रम्प के साथ मिलकर एक गोलमोल सहमति तैयार करें, और उससे दुनिया का कुछ भला हो जाएगा, तो यह एक खुशफहमी के सिवाय कुछ नहीं है। इन कंपनियों से उनके एआई को काबू में रखने की उम्मीदें वैसी ही होंगी जैसी कि कसाईयों से यह उम्मीद की जाए कि वे मेमनों को प्यार से काटेंगे। आज दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा पूंजीनिवेश एआई में हुआ है, और दुनिया के बहुत से जानकार-सलाहकार यह भी मान रहे हैं कि एआई नाम का बुलबुला किसी भी दिन फूट सकता है, और उतने बड़े नुकसान को दुनिया की अर्थव्यवस्था भी झेल नहीं पाएगी। जब दांव पर इतना कुछ लगा हुआ है, और यह पूंजीनिवेश लगातार बढ़ते ही चल रहा है, अमरीका के भीतर ही दर्जनों या सैकड़ों कंपनियां एआई के विकास के मुकाबलों में लगी हुई हैं, और एक देश के रूप में अमरीका, और चीन का मुकाबला भी चलते ही रहता है, तब किसी से काबू बरतने की उम्मीद फिजूल की बात है। फिर इस बात को भी समझना होगा कि जिस अमरीकी राष्ट्रपति के साथ बैठकर इन कारोबारियों ने यह सहमति दी है, उस अमरीकी राष्ट्रपति को जलवायु परिवर्तन एक हरित झांसा लगता है, उसे दुनिया भर के गरीब और जरूरतमंद देशों की मदद की अमरीका की दशकों पुरानी योजनाएं बर्बादी का सामान लगती हैं, और जो कारोबार को किसी भी नैतिकता से ऊपर मानता है, उस राष्ट्रपति की अगुवाई में खतरों से बचने का काम नहीं हो सकता, वह तो खतरों को बेचकर भी कमाई और डील करने वाला घटिया कारोबारी है। 

हमारा यह साफ मानना है कि ट्रम्प की मौजूदगी में एआई कारोबारियों की यह आपसी सहमति एक कारोबार के भीतर की गिरोहबंदी के अलावा और कुछ नहीं है। इस नौटंकी से इस धंधे को दुनिया भर से पड़ रहे नैतिक दबावों से छुटकारा मिल गया है। दुनिया एआई कारोबारियों के बीच की इस सहमति का बहुत बड़ा दाम चुकाएगी, और जिस तरह धंधेबाजों के हवाले नैतिकता और मानवता को कर दिया गया है, वह बहुत महंगा पडऩे जा रहा है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 1 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)