दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त 2026



 

भावनाओं से बेसहारा गाय का न पेट भरेगा, न साँस चलेगी...

29 अगस्त 2026  

 

किसी भी देश-प्रदेश में सरकारी योजना का सबसे बेहतर अमल अमूमन राजधानी या उसके इर्द-गिर्द होने की संभावना रहती है क्योंकि शासन-प्रशासन की चुस्ती वहां अधिक रहती है। लेकिन अभी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के म्युनिसिपल की शहर से लगी हुई एक गौशाला की बदहाली का वीडियो जिन्होंने देखा होगा, उन्हें लगा होगा कि गायों की ऐसी मौत देने से बेहतर उन्हें कसाईघर भेज देना चाहिए। गायों का जब दूध देना बंद होता है, तो उसके बाद वे गौपालक के लिए उसी तरह अवांछित हो जाती हैं जिस तरह बिना शादी किसी नाबालिग बच्ची से जन्मने वाले बच्चे को अवांछित मानकर घूरे पर डाल दिया जाता है। सरकारी अहातों में गायों की हालत घूरे पर फेंके गए बच्चे से बेहतर नहीं है। बेघर गायों के लिए म्युनिसिपल की राजधानी की गौशाला में शायद ढाई सौ गायों को रखने की क्षमता थी, और उसमें छह सौ गायें इस तरह मिलीं कि वे हिलडुल भी नहीं सकती थीं। जिस तरह किसी ट्रक में उन्हें ठूंस-ठूंसकर खड़ा करके कसाईघर ले जाया जाता है, ठीक उसी तरह वे इस सरकारी गौशाला में थीं, और वहीं पर कई गायें इस बुरी तरह गंदगी में मरणासन्न पड़ी थीं कि उसे वीडियो में देखते भी नहीं बन रहा था। फिर यह भी पता लगा कि जिसे यह गौशाला चलाने का जिम्मा या ठेका दिया गया है, उसे 8 महीने से भुगतान नहीं हुआ है। गाय को जो लोग माँ मानते, कहते थकते नहीं हैं, उन्होंने इस हालत में गायों को रखा है। फिर राजधानी से दूर छत्तीसगढ़ में कुछ और जगहों पर गौशालाओं का ऐसा ही हाल मिला है, उस पर तो राजधानी जितनी फिक्र नहीं की जा सकती। 

इससे परे एक दूसरी दिक्कत शहरों के भीतर, और हाईवे पर, सडक़ों पर जी रहे मवेशियों की है। जो पशु दुधारू नहीं रह जाते, उनसे उसी दिन गौपालक अपना रिश्ता तोड़ देते हैं। जिससे कुछ मिलना नहीं है, उसे चारा या सहारा क्यों देना? ऐसे सारे पशु सडक़ों पर रहते हैं, उनसे टकराकर कई गाडिय़ों वाले मरते हैं, कई बड़ी गाडिय़ां ऐसे पशुओं को कुचलते हुए निकल जाती हैं। इनमें से जो लोग गौभक्तों के हाथ लग जाते हैं, उनके लिए मौके पर ही इंसाफ और सजा दोनों का इंसान इस देश के अघोषित कानून में अच्छी तरह कर दिया गया है। बारिश की रात सडक़ों पर बैठे मवेशियों से टकराकर जख्मी होने वाले, या मर जाने वाले लोगों को भी मुजरिम मान लिया जाता है, लेकिन जानवरों को सडक़ों पर ऐसा छोड़ देने वाले बेफिक्र रहते हैं, कभी साल में ऐसे एक-दो लोगों पर हाईकोर्ट में दिखावे के लिए कोई जुर्माना लगा दिया जाता है। लेकिन इन जानवरों को रखने के लिए हर जगह इंतजाम करने का हुक्म सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक देते आए हैं, और वह इंतजाम जमीन पर इसी तरह का दिख रहा है कि वहां जानवरों को मरने के लिए ठूंस दिया गया है। जानवरों के बीच पशुमत संग्रह करवाया जाए, तो शायद वे ऐसी गौशालाओं में जाने के बजाय शहरी घूरों पर जीने, और हाईवे पर कुचल मरने के विकल्प तो अधिक पसंद करेंगे। 

गाय को लेकर देश के एक तबके की भावनाएँ चाहे जो हों, उन सारी भावनाओं को मिलाकर भी देश की गायों को महीने में एक वक्त का खाना भी नहीं मिल सकता। सरकारी गौशालाओं का जो हाल रहता है, वह कोई नई बात नहीं है, छत्तीसगढ़ में दशकों से सरकारी अनुदान पर चलने वाली गौशालाओं के ट्रस्टी गायों को भयंकर यातना की हालत में रखते हुए मर जाने देने के दोषी पाए जा चुके हैं, लेकिन आज तक सरकार ने राज्य के पशुओं को लेकर कोई नीति नहीं बनाई है जिसमें दूध देना बंद कर चुकी गाय, या अनुपयोगी बाकी गौवंशीय पशुओं को रखने का इंतजाम हो। शहरों के किनारे के गांवों की एक और समस्या अभी सामने आई, म्युनिसिपलों के कर्मचारी शहरों से गायों को पकडक़र पास के गांवों में छोड़ देते हैं, और वहां पर ये गायें खेतों को चर जाती हैं। इसे लेकर किसान अभी छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में कलेक्ट्रेट पहुंच गए थे, ऐसे पशुओं के पूरे रेवड़ को लेकर। अभी भी जगह-जगह से गायों को रखने की बदहाली सामने आ रही है, और सरकार साफ-साफ न कुछ कहने की हालत में है, न करने की। कभी हाईकोर्ट को कुछ दिखाना होता है, कभी सुप्रीम कोर्ट को, और कभी स्वघोषित गौरक्षकों के तबके को। 

गाय दूध देना बंद करने के बाद एक दशक तक गौभक्त समाज पर बोझ बनी रह सकती है। इस पूरे दशक की उसकी जिंदगी का क्या कोई इंतजाम है? या उससे दूध पा लेने वाले कारोबारी उसे सडक़ों पर छोड़ दें, वह घूरों पर जी ले, या हाईवे पर कुचलकर मारी जाए, या अदालत को दिखाने के लिए बनाए गए किसी सरकारी अहाते में भूखों मर जाए! भावनाओं के पैर नहीं होते, उन्हें हकीकत की कड़ी, पथरीली, और कंटीली जमीन नहीं चुभती। भावनाएँ लोगों से नारा लगवाती हैं, लाठियां चलवाती हैं, और भीड़त्या भी करवा देती है। लेकिन इन सारे कामों से किसी एक गाय का भी पेट नहीं भरता। आज अधिकतर प्रदेशों में गायों को कसाईघर जाने से रोकने के लिए जगह-जगह पुलिस और प्रशासन ने मुहिम छेड़ रखी है, और गौ-गुंडों को खुली छूट दे रखी है, कानून उनके हाथ में ही दे दिया है। लेकिन इससे भी गाय का एक वक्त का भी चारा नहीं बनता। इसलिए गाय को राज्यमाता, या राजमाता बनाने जैसी भावनात्मक बातें करने वाले लोगों को यह भी साफ करना चाहिए कि आज जिस तरह शहरों के करीब बनाए गए सरकारी अहातों में ठूंस-ठूंसकर रखी गईं राजमाताएं भूख से मर रही हैं, क्या वैसे में यह राजकीय दर्जा सरकारों के लिए, और गौभक्तों से लेकर गौ-गुंडों तक के लिए कुछ अधिक शर्मिंदगी का नहीं हो जाएगा? 

आज गाय को लेकर जिस तरह के तनाव चारों तरफ फैले हुए हैं, क्या धीरे-धीरे गाय पालना खतरनाक काम नहीं लगने लगेगा? आज भी गाय के मुद्दे पर कदम-कदम पर जितना तनाव होता है, और दूध के कारोबार में भैंस अधिक उत्पादक भी रहती है, और भक्तों से मुक्त भी रहती है, ऐसे में गाय पालना हो सकता है कि घट भी चुका हो। एक पहेली का कोई जवाब इस पूरे सिलसिले में हमें नहीं मिलता है कि जब देश में गायों को लेकर अधिकतर राज्यों में बड़े कड़े कानून बन चुके हैं, तब गाय-भैंस वंश के बीफ का एक्सपोर्ट भारत से बढ़ते ही कैसे जा रहा है? यह भी समझ नहीं आता कि यह कारोबार करने वाली कंपनियों के हिन्दू मालिकों ने अपने कंपनियों के नाम मुस्लिम जैसे क्यों रखे हुए हैं? क्या गाय को दूध और कृषि अर्थव्यवस्था से परे सिर्फ पूजा के मकसद से पाला और रखा जा सकता है? क्या किसी भी प्रदेश की सरकार उत्पादक न रह जाने के बाद बाकी पूरी जिंदगी गायों को पालने का खर्च सरकारी खजाने से उठा सकती है? आज सरकारी गौशालाओं में एक गाय पर सरकार जितना खानपान का बजट देती है, उसी के आसपास का पैसा छत्तीसगढ़ की महिलाओं को महतारी वंदन योजना में हर महीने मिलता है। तो क्या गायों को पूरी जिंदगी सरकार इतने खर्च के साथ पाल सकती है, या फिर धीरे-धीरे गौपालन ही मालिकों से लेकर सरकार तक सबके ऊपर, सडक़ों से लेकर ट्रैफिक तक, और म्युनिसिपल तक सबके ऊपर इतना बड़ा बोझ बन जाएगा कि इस देश के तमाम गौरक्षक प्रदेशों में गाय पालना बंद ही हो जाएगा, और उन्हें केरल, गोवा, पश्चिम बंगाल, अरूणाचल जैसे कानूनी रूप से बीफ खाने वाले प्रदेशों में ही रखा जाएगा? जनता के खजाने से जिस योजना पर भी खर्च होता है, उसकी संभावना तौलना जरूरी रहता है। आज शायद गायों को लेकर भावना और उत्तेजना हवा में इसीलिए हैं कि सरकार पर हर गाय का बोझ अभी तक पडऩा शुरू नहीं हुआ है। लेकिन सैद्धांतिक और कानूनी रूप से तो हर बेसहारा गाय का इंतजाम सरकार को ही करना है। क्या इसके लिए सरकार के पास बजट है? और राज्य के इंसानों के कौन-कौन से हक की कटौती करके यह बजट निकल पाएगा?

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

रोजगार न मिला तो भगवान की प्रतिमाएं कीं चूर-चूर, यह सोच समझने की जरूरत

28 अगस्त 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के बीच घनी बस्ती में दो दिन पहले एक बड़ा तनाव खड़ा हो गया जब शिव और हनुमान के मंदिर में प्रतिमाओं को तोडफ़ोड़ दिया गया। पथरीली प्रतिमाओं को तोडऩा आसान भी नहीं था, लेकिन सीसीटीवी फुटेज की जांच से पुलिस को मुजरिम का पता लग गया, वह उसी इलाके का एक अधेड़, हेमंत अग्रवाल था, जो भगवान से इस बात से खफा था कि वह उसे रोजगार में साथ नहीं दे रहा है, और वह बेरोजगार बना हुआ है। यह व्यक्ति मंदिर के पास ही अपनी माँ के साथ रहता है, और अपनी बेरोजगारी से हताश होकर उसने ईश्वर से हिसाब चुकता करना तय किया। यह तो गनीमत कि यह मामला धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता तक नहीं पहुंच पाया, और सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से पुलिस ने आनन-फानन आरोपी को पकड़ा, और उसके घर से छेनी और हथौड़ी बरामद भी कर लिए। 

अब एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि 42 साल का एक आदमी शहर के बीच रहते हुए बेरोजगार बना हुआ है, और इसके लिए वह ईश्वर को जिम्मेदार ठहरा रहा है। उसके हाथ-पैर कम से कम इतने तो चल ही रहे हैं कि वह बजरंग बली की प्रतिमा और शिवलिंग को छेनी-हथौड़ी से तोड़ रहा है। छेनी-हथौड़ी से पत्थर तोडक़र बहुत से मजदूर जिंदगी भर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। सडक़ों के किनारे हर शहर में साल में कुछ हफ्ते ऐसे सिलबट्टे बेचने वाले परिवार बैठकर पत्थर तोड़ते, दागते, उस पर निशान लगाते बैठे रहते हैं, और हर कुछ हफ्तों में वे शहर बदल लेते हैं। यह काम करते हुए आदमी भी दिखते हैं, और औरतें भी। राजस्थान या गुजरात तरफ के दिखने वाले ऐसे जोड़े सडक़ किनारे धौंकनी लगाकर लोहे को तपता लाल करके, घन के वार से आकार देते दिखते हैं, और अमूमन घन चलाने का काम घाघरा पहनी महिला ही करती है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की एक विख्यात कविता है जिसकी शुरूआत ही इन शब्दों से होती है- वह तोड़ती पत्थर, देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर.., चढ़ रही थी धूप, गर्मियों के दिन, दिवा का तमतमाता रूप, उठी झुलसाती हुई लू, रुई ज्यों जलती हुई भू, गर्द जिनगीं छा गईं, प्राय: हुई दुपहर, वह तोड़ती पत्थर। 

नौकरी न मिलने, रोजगार न चलने, इम्तिहान में कामयाब न होने जैसी बातों को लेकर धर्म लोगों को भाग्यवादी बना देता है। लोग पिछले जन्म और अगले जन्म की धार्मिक सोच की कैद में आ जाते हैं कि पिछले जन्म के कुकर्मों का नतीजा है कि इस जन्म में तकलीफ मिल रही है। धर्म के प्रवचनकर्ता यह भी सिखा देते हैं कि अधिक कामना, लालसा, वासना नहीं रखनी चाहिए, और इससे स्वर्ग के रास्ते खुलते हैं। मतलब यह कि मरने के बाद स्वर्ग का लालच दिखाकर जीते जी किसी भी सुख से दूर रखने की कोशिश होती है। वजह यह है कि अगर लोगों के मन में वैराग्य और संन्यास भाव पैदा नहीं किया जा सकेगा, तो लोग अपने हक की लड़ाई लडऩे लगेंगे, सत्ता से उसे अपना जायज हक न मिलने की बात उठाने लगेंगे, मतलब यह कि वे इंसानों से तिलचट्टे भी बनने लगेंगे। धर्म नाम का औजार लोगों को भाग्यवादी इंसान बनाने में ओवरटाइम करते रहता है, और इसीलिए जिसके हाथ में हथौड़ी-छेनी की ताकत है, वह भी कोई काम तलाशने के बजाय ईश्वर को जिम्मेदार मानकर उसकी प्रतिमाओं को चूर-चूर कर रहा है। 

दक्षिण के एक महान समाजसुधारक पेरियार का तर्क था कि यदि समाज अन्याय को ईश्वर की इच्छा कहकर स्वीकार कर ले, तो शोषण कभी समाप्त नहीं होगा। भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध लेख, मैं नास्तिक क्यों हूँ, में लिखा था कि मनुष्य को अपनी समस्याओं का समाधान अपने साहस, बुद्धि, और संघर्ष से खोजना चाहिए, किसी दैवीय हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिए। राहुल सांकृत्यायन ने बार-बार यह लिखा है कि मनुष्य को अपनी दुर्दशा का कारण भाग्य या पिछले जन्म में नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक, और आर्थिक परिस्थितियों में खोजने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी लिखा था कि अंधविश्वास मनुष्य को कर्मशीलता से दूर ले जाता है। कार्ल माक्र्स ने धर्म को जनता के लिए अफीम की तरह करार दिया था, और कहा था कि धर्म मनुष्य को वास्तविक कारणों से लडऩे के बजाय सांत्वना देकर शांत भी कर सकता है। कहने के लिए किसी-किसी धर्म में कर्म के लिए भी कुछ कहा गया है, गीता में कर्म पर जोर दिया गया है, बुद्ध ने कहा है कि दुख के कारणों को समझो, और उनका समाधान खुद ढूंढो, सिक्ख परंपरा ने मेहनत, और सेवा पर जोर दिया है, लेकिन धर्म के जो प्रचलित रूप आज चलन में हैं, उनमें धर्म का प्रचार और गुणगान करने वाले लोग यही सिखाते हैं कि बेलपत्र पर शहद लगाकर किसी खास धर्म की प्रतिमा पर चढ़ाने से ऐसा करने वाले के बच्चों को बिना पढ़े भी इम्तिहान में पास करने से कोई नहीं रोक सकते। धर्म के भीतर समझदारी की थोड़ी-बहुत गूढ़ बातें अगर हैं भी, तो उन्हें कपड़े में लपेटकर उपासना स्थलों की ताक पर धर दिया जाता है, और चलन में सबसे मूढ़ बातों को फैलाया जाता है जो कि लोगों को अंधविश्वासी और भाग्यवादी बना सकें। जिन्हें धर्म का गुणगान करना रहता है वे धर्मग्रंथों से कुछ चुनिंदा गूढ़ बातों को निकालकर पेश कर देते हैं, जो कि चलन में जमीन पर नहीं रहतीं। दूसरी तरफ ऐसी मूढ़ बातें जिनसे ईश्वर के एजेंटों की अपनी दुकानदारी चलती है, उन बातों को ही फैलाया जाता है, और उनसे लोगों को ऐसी दिमागी हालत में लाया जाता है कि वे सामाजिक, और आर्थिक शोषण के खिलाफ, सामाजिक अन्याय के खिलाफ लडऩे की सोच भी न सकें। अब भला आज उनके साथ जो इंसाफ पिछले जन्म के उनके कर्मों की वजह से हो रहा है, उसके खिलाफ वे इस जन्म में किससे लड़़ सकते हैं? इस तरह धर्म अपने उस बुनियादी मकसद को पूरा करने में बड़ा कामयाब रहता है जिसके लिए कबीलों के वक्त से वहां के सरदारों ने बैगा-गुनिया बनाए थे, बाद में समाज व्यवस्था विकसित होने के साथ-साथ वे अलग-अलग धर्मों के पुजारियों, और धर्मगुरुओं के चोगों में तरक्की पाते गए, और अपने वक्त के राजा, और कारोबारियों को उनके मकसद में मदद करते रहे। यह भूलना नहीं चाहिए कि मानव सभ्यता के इतिहास में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसे हुए, एक-दूसरे से कोई भी संपर्क न रखने वाले समुदायों में भी राजा को ईश्वर का प्रतीक मानने का काम होते रहा। प्राचीन मिस्र में राजा को ईश्वर का दूत ही नहीं, बल्कि देवता माना जाता था, और उसकी आज्ञा का उल्लंघन धार्मिक अपराध। राज्य और धर्म घुले-मिले थे। कुछ पुरानी संस्कृतियों, जैसे मेसोपोटामिया में राजाओं को देवताओं द्वारा नियुक्त शासक माना जाता था। चीन में राजा को स्वर्ग का प्रतिनिधि माना जाता था। मध्यकालीन योरप में माना जाता था कि राजा सीधे ईश्वर द्वारा नियुक्त है, और उसके विरुद्ध विद्रोह ईश्वर के विरुद्ध माना जा सकता था। कई इस्लामी साम्राज्यों में खलीफा या सुल्तान को अल्लाह का प्रतिनिधि, या धरती पर अल्लाह की छाया कहा जाता था। हिन्दू धर्म के अलग-अलग हिस्सों में राजा को अलग-अलग देवताओं के अंशों से बना हुआ बताया जाता था। जापानी सम्राट को सूर्यदेवी का वंशज माना जाता है। इस तरह धर्म ने सिर्फ मनुष्य और ईश्वर का रिश्ता तय नहीं किया, उसने राजा और प्रजा के संबंध भी तय कर दिए जिसके तहत बेरोजगार होने, या असफल होने पर ईश्वर को जिम्मेदार मानकर उसे निशाना बनाने की दिमागी हालत आती है। दुनिया के इतिहास में आधुनिक लोकतंत्र राजा की दैवीय सत्ता की सोच से ऊपर उठकर जनता द्वारा निर्वाचित शासन व्यवस्था में तब्दील हुआ। लेकिन धर्मों के मूढ़ हिस्सों ने जनता को राजा को चुनते हुए भी अपनी बदहाली के लिए राजा को जिम्मेदार ठहराने की सोच से वंचित रखा, धर्म की गूढ़ बातों वाले ग्रंथों से परे, धर्म की मूढ़ बातों के व्यापक असर के बारे में बात की जानी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त 2026



 

कोई जूलियस सीजर और रामकथा की किताबें भेजे देश के इन बड़े जजों को

27 अगस्त 2026  

 

सुप्रीम कोर्ट के एक जज, जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के काम के तरीकों पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं, और ऐसे मामले गिनाए हैं जिनमें बड़े-बड़े नफे-नुकसान वाले केस दूसरे जजों से जस्टिस शर्मा ने खुद अपनी बेंच पर ले लिए, और फिर ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए अदालत का बेजा इस्तेमाल किया। जस्टिस मेहता ने इस महीने 2, 10, और 17 तारीख को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को ये पत्र लिखे हैं, जिनमें बहुत सारे मुद्दे गिनाए गए हैं। बड़े-बड़े जमीन-जायदाद के ऐसे केस के नाम दिए गए हैं जो कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश ने अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए अपनी अदालत में बुला लिए। अभी कुछ दिन पहले ही एक और हाईकोर्ट, पंजाब एवं हरियाणा, के बारे में इसी तरह की खबर आई थी कि वहां भी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे जजों की बेंच से राजनीतिक प्रभाव वाले चुनिंदा मामलों को अपनी कोर्ट में बुला लिया, और फिर ऐसे फैसले दिए जिससे पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर बहुत बड़ा बोझ पड़ा, और वह बोझ कोई भी सरकार उठा नहीं सकती। एक के बाद एक, दो ऐसे जजों की खबरें इस हाईकोर्ट से ऐसी आई थीं जिन्हें लगातार ऐसे विवादास्पद मामलों से जोडक़र देखा जा रहा था। 

अभी दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज, जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला खबरों में बना ही हुआ है, जिनके बंगले से बोरियां भर-भरकर अधजले नोट बरामद हुए थे। वहां आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों, और पुलिसकर्मियों को ये बोरियां मिलीं, इनके वीडियो भी सामने आए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की एक जांच कमेटी बनाई, जिसमें यह पाया कि बंगले के स्टोर रूम में सचमुच में बड़ी मात्रा में नोट रखे हुए थे। कमेटी ने यह भी पाया कि आग बुझने और दमकलकर्मियों के जाने के बाद सुबह-सुबह वहां से जली हुई नगदी हटाई गई। इस कमेटी की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई, और आगे की संवैधानिक कार्रवाई करने की सिफारिश की गई। इस मामले से कई और किस्म के संदेह भी जुड़े हुए थे, लेकिन कोई सुबूत न रहने से यह स्थापित नहीं हो सका कि यह पैसा किसने, किसको, किस वजह से दिया था, यह किस भुगतान का था। फिर भी किसी हाईकोर्ट जज का इतनी बड़ी नगदी से सीधा रिश्ता शायद पहली बार ही सामने आया। 

इस सिलसिले में थोड़ी सी हैरानी इस बात को लेकर हो रही है, कि पिछले कुछ हफ्तों से सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज मुख्य न्यायाधीश को ऐसे गंभीर आरोपों वाली चिट्ठी लिख रहा है, और अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में राजस्थान हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अनियमित तरीके से काम करते हुए, पक्षपात और भाई-भतीजावाद दिखाते हुए काम कर रहा है, और इस पर सुप्रीम कोर्ट कुछ करते भी नहीं दिख रहा है। किसी भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश किसी मामले के लिए बेंच तय कर सकते हैं, और बेंच का फैसला ही कई मामलों में केस का फैसला भी मान लिया जाता है। खासकर जब कीमती जमीन-जायदाद से जुड़े हुए, आर्थिक नफा-नुकसान के मामलों की बेंच बदली जाती है, तो लोगों का शक जायज ही रहता है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने यह कहा है कि उन्होंने जस्टिस शर्मा से स्पष्टीकरण मांगा है। भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज किसी राज्य के हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बार-बार लिखित शिकायत कर रहा है, और उस पर देश का मुख्य न्यायाधीश कई हफ्ते बाद भी स्पष्टीकरण का ही इंतजार कर रहा है! ऐसे में लोगों को कुछ और जजों के विवाद भी याद पड़ते हैं कि किस तरह उनके बीते बरसों में उन पर जमीन-जायदाद की खरीद-बिक्री में आर्थिक अनियमितता के आरोप लगे थे। 

किसी भी लोकतंत्र या दूसरी शासन व्यवस्था में एक लाईन अक्सर कही जाती है कि सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। अब इसका संदर्भ यह है कि ईसा के 62 बरस पहले रोमन शासक जूलियस सीजर की पत्नी घर पर एक धार्मिक समारोह करवा रही थी, जो कि केवल महिलाओं के लिए था। वहां पर एक नौजवान महिला बनकर भीतर घुस गया, और माना गया कि वह शासक की पत्नी से मिलने पहुंचा था। इसे लेकर पूरे रोम में बड़ा राजनीतिक, और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया। सीजर को यह विश्वास नहीं था कि उसकी पत्नी ने कोई अपराध किया है, उसने अदालत में भी यही बात कही, लेकिन फिर भी उन्होंने पत्नी को तलाक दे दिया। जब उनसे पूछा गया कि वे बीवी को बेकसूर मानते थे, तो फिर तलाक क्यों दिया, तो उन्होंने कहा कि राजा की पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह संदेह की छाया भी अपने पर पडऩे दे। वहीं से यह लाईन निकली कि राजा की पत्नी को संदेह से भी ऊपर रहना चाहिए। इसे सार्वजनिक जीवन में ईमानदार रहने से ऊपर बढक़र ईमानदार दिखने की भी सोच के रूप में दुनिया भर में माना गया। फिर भारत, और दुनिया भर की अदालतों में भी इससे मिलती-जुलती एक सोच आगे बढ़ी कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, होते हुए भी साफ-साफ दिखना चाहिए। 

भारतीय संस्कृति में इसकी एक बड़ी मिसाल रामकथा में आती है जहां अयोध्या के एक निवासी की एक बात को सुनकर वनवास से लौटे राम अपनी पत्नी सीता को घर से निकाल देते हैं। उनका पैमाना भी यही रहता है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह फैसला भयानक रूप से गलत था, लेकिन ऐसे ही कड़वे फैसलों की वजह से राम, मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाए थे। ऐसे भारत में सबसे बड़ी अदालतों के जजों को न सिर्फ ईमानदार रहना चाहिए, बल्कि साथ-साथ ईमानदार दिखना भी चाहिए, और संदेह से ऊपर तो रहना ही चाहिए। जहां किसी जज से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी पक्षकार, या किसी वकील, या केस के इतिहास से अपना दूर का रिश्ता रहने पर भी उसे सुनने से इंकार कर दे, वहां पर इतने आरोपों के साथ कोई जज अगर अनियमित तरीके से काम कर रहे हैं, तो न्यायपालिका पर किसका भरोसा रह जाएगा? ऐसा भी नहीं कि आज हर किसी का न्यायपालिका पर बहुत बड़ा भरोसा है। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का जितना पतन हुआ है, उसकी वजह से नौजवान पीढ़ी, और बच्चों तक में देश की व्यवस्था को लेकर बेचैनी और संदेह दोनों भरे हुए हैं। किसी जज को खुद भी ऐसी शर्मनाक नौबत से बचना चाहिए, और जब सुप्रीम कोर्ट के एक जज यह लिखकर दे रहे हैं कि राजस्थान हाईकोर्ट के कुछ जजों ने उनसे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी शिकायतें की हैं, तो बिना देर किए संदेह के घेरे वाले जज को अपने आपको ऐसे पसंदीदा मामलों की सुनवाई से तो अलग कर ही लेना चाहिए। भारत की न्यायपालिका में यह तो जरूरी रहता भी नहीं है कि किसी मामले की सुनवाई कोई एक खास जज करे। ऐसे जज को खुद होकर अपने को आर्थिक वजन वाले मामलों से तो अलग कर ही लेना चाहिए। हमने जिन दो पुरानी कहानियों का जिक्र ऊपर किया है, उन दोनों की किताबें जस्टिस शर्मा को उपहार में भेजनी चाहिए, क्योंकि ऐसा लगता है कि उन्होंने ये दोनों कहानियां पढ़ी नहीं हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

विदेशी फर्जीवाड़े से डॉक्टर बने लोग कैसा इलाज करेंगे?

26 अगस्त 2026  

 

भारत के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में जिन्हें दाखिला नहीं मिलता है, और जिन्हें डॉक्टरी पढऩे की हसरत रहती है, ऐसे लोगों के लिए दूसरे देशों के मेडिकल कॉलेजों के स्वागतद्वार खुले रहते हैं। रूस, यूक्रेन, चीन, बांग्लादेश के साथ-साथ किर्गिस्तान, फिलीपींस, और उजबेकिस्तान जैसे कई देशों से एमबीबीएस की डिग्री दिलाने वाली एजेंसियां भारत में उसी तरह सक्रिय हैं, जिस तरह इन दिनों साइबर फ्रॉड करने वाली एजेंसियां कॉल सेंटर चला रही हैं। एक प्रमुख अखबार, दैनिक भास्कर की एक खोजी रिपोर्ट में आज ही यह स्टिंग ऑपरेशन छपा है कि ये एजेंसियां इन देशों में मेडिकल दाखिला करवाने के साथ-साथ कॉलेज जाने से भी छूट दिलवा रही हैं कि वे घर बैठे पढ़ाई करें, और सिर्फ इम्तिहान देने के लिए उन देशों में चले जाएं। इस सबकी लागत भारत में एमबीबीएस पढ़ाई के मुकाबले खासी कम भी है। एक तो दूसरे देशों से एमबीबीएस या उसके बराबर की डिग्री लेकर आने वाले भारतीय लोगों को भारत में एफएमजीई नाम का एक इम्तिहान पास करना पड़ता है, तभी वे यहां डॉक्टरी कर सकते हैं। साल में दो बार होने वाली इस इम्तिहान में 12 फीसदी से लेकर 25 फीसदी तक ही लोग पास हो पाते हैं, और वे ही लोग भारत में मरीज देख सकते हैं, सरकारी या निजी अस्पताल में डॉक्टर की नौकरी कर सकते हैं। बाहर से पढक़र आने वाली बहुत से लोग तीन-चार बार भी ऐसी इम्तिहान देकर खींचतानकर पास होते हैं, और हो सकता है कि इनमें भी नीट की तरह की धांधली चलती हो। 

देश भर में कई प्रदेशों में चिकित्सा शिक्षकों की इतनी कमी है कि नेशनल मेडिकल कमीशन के दौरे के समय घर बैठे हुए, रिटायर हो चुके, कभी न पढ़ाने वाले किसी भी तरह के चिकित्सक को शिक्षक बताकर मान्यता ले ली जाती है, या बढ़वा ली जाती है। इस फर्जीवाड़े से असल मेडिकल पढ़ाई का कोई लेना-देना नहीं रहता, क्योंकि जिस तरह कुछ दूसरे देशों में फर्जी हाजिरी दिलाकर छात्रों को मेडिकल पढ़ाई न करने की छूट दिलवा दी जाती है, ठीक उसी तरह भारत के बहुत से मेडिकल कॉलेजों में ऐसी फर्जी नियुक्ति दिखाकर उन्हें शिक्षक बता दिया जाता है, और यह तो जाहिर है कि वह पढ़ाई होती ही नहीं है। ऐसे में उत्तर भारत, या हिन्दी भारत के प्रदेशों में आबादी के अनुपात में मेडिकल सीटें कम होने का तर्क देकर एनएमसी दक्षिण भारत में सीटें बढ़ाने से मना कर चुका है, जहां पर कि मेडिकल सीटें बढ़ाने का ढांचा मौजूद है। यह रूख हैरान करता है कि इस देश में दुनिया के कमजोर किस्म के देशों से फर्जीवाड़े से डिग्री खरीद लेना एनएमसी को मंजूर है, लेकिन अपने ही देश के भीतर दक्षिण भारत को अधिक मेडिकल सीटें मंजूर करना उसे मंजूर नहीं है। ऐसे उग्र क्षेत्रवादी नजरिए की वजह से अभावग्रस्त उत्तर भारत का और नुकसान हो रहा है, क्योंकि अगर दक्षिण में सीटें बढ़तीं, तो उनमें से उत्तर के छात्र-छात्राओं को भी जगह मिली रहती, और हो सकता है कि उनमें से कई नौजवान डॉक्टर बनकर लौटकर अपने इलाकों में आते। अब पूरी तरह फर्जीवाड़े से विदेशी डिग्री पाना ही बहुत से बच्चों के लिए अकेला जरिया रह गया है।  राष्ट्रीय स्तर पर बने हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से देश के एकता के ढांचे को नुकसान होते दिख रहा है। इससे उत्तर-दक्षिण के बीच खाई भी गहरी, और चौड़ी हो रही है, और देश की चिकित्सा शिक्षा क्षमता का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो रहा। 

अब अगर हम चिकित्सा शिक्षा से कुछ देर के लिए हटकर लोगों के इलाज पर आएं, तो उसमें भी इस रूख का नुकसान हो रहा है। दक्षिण भारत से तैयार होने वाले किसी भी इलाके के छात्र-छात्राओं का फायदा पूरे देश की स्वास्थ्य सेवाओं को किसी न किसी तरह मिल सकता था। लेकिन विदेशों में मोटा पैसा खर्च करके डॉक्टर बनकर लौटने वाले लोगों में से शायद ही कोई देश के ग्रामीण इलाकों में जाने वाले होंगे। नतीजा यह है कि सरकारी हो या निजी अस्पताल हो, भारत के अस्पताल मरीजों से उसी तरह भरे हुए दिखते हैं, जिस तरह अदालतें मुकदमों से भरी हुई रहती हैं, सडक़ें जानवरों से भरी हुई रहती हैं, और गैस एजेंसियां सिलेंडर की कतार में लगे लोगों से भरी रहती हैं। इस सिलसिले को खत्म करने के लिए उन प्रदेशों को और निजी संस्थाओं को बढ़ावा देना होगा, जो कि अच्छी या बेहतर चिकित्सा शिक्षा दे सकते हैं। सरकार एक तरफ तो अपनी हर संपत्ति का निजीकरण करती जा रही है, निजी चिकित्सा शिक्षा आज भी देश में मान्यता प्राप्त है। लेकिन ऐसे में भी सरकार के नियमों का आल-जाल अगर निजी चिकित्सा शिक्षा को आगे बढऩे से रोक रहा है, तो उसे तोडऩा जरूरी है। सरकारें हर चीज को नियंत्रित करने के मामले में इतनी बावली न रहें कि वे कंट्रोल-फ्रीक कहलाने लगें। आज देश में चिकित्सा शिक्षा पर काबू एक बहुत ही भ्रष्ट व्यवस्था है, और बीते बरसों में कितने ही लोगों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। इससे जाहिर है कि सिर्फ नियंत्रण की नीयत से काम ईमानदार नहीं हो जाता, सरकार को इसके लिए कोई अलग तरीका निकालना पड़ेगा। दूसरी बात यह कि अलग-अलग राज्यों की क्षमता अगर नहीं है, अगर वे चिकित्सा शिक्षा, और चिकित्सा का ढांचा ही विकसित नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें बराबरी पर आने देने का मौका देने के नाम पर सक्षम राज्यों को पीछे धकेलकर रखना बहुत नाजायज बात है, और यह एक राष्ट्रीय क्षति भी है। 

देश में आज भी अधिक फीस देकर निजी कॉलेजों में डॉक्टरी पढऩा एक जायज व्यवस्था है। देश को डॉक्टरों की जरूरत है, फिर चाहे वे किसी भी कॉलेज से पढक़र निकले हों। ऐसे में सरकार तो जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज बनाने के एक सपने को पूरा करने का दिखावा करते दिखती है। इससे जमीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं होना है। निजी मेडिकल कॉलेज आज भी मौजूद हैं, और वहां से भी डॉक्टर बनकर निकलने वाले लोग आने वाले बरसों में चिकित्सा शिक्षक, या चिकित्सा कॉलेज के अस्पताल के डॉक्टर बन सकते हैं। इसके लिए एक दूरदर्शी सोच और योजना दोनों की जरूरत है, यह शुरूआत तो केन्द्र सरकार के स्तर पर ही हो सकती है, और उस पर अमल राज्य सरकारें कर सकती हैं। फिर यह भी है कि केन्द्र से परे कई राज्य अपने स्तर पर राष्ट्रीय पैमानों से अधिक भी काम कर सकते हैं, केन्द्र को उनके काम में अड़ंगा लगाना बंद करना होगा। डॉक्टरी की पढ़ाई सिर्फ एक पढ़ाई नहीं है, बल्कि देश की जनता के इलाज के हक को पूरा करने का जरिया भी है। राज्य सरकारें छोटी-छोटी जगहों तक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोल तो रही हैं, लेकिन हर जगह डॉक्टर नहीं मिल पा रहे हैं, इसके लिए काफी सोच-विचार किया जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

ले मशालें चल पड़े हैं, बच्चे गांव-गांव के!

 25 अगस्त 2026  

 

मध्यप्रदेश की खबर है कि वहां स्कूली छात्राएं परेशानियों को लेकर कलेक्टर से मिलने 62 किलोमीटर पैदल सफर पर निकल गई थीं। अफसरों ने 18 किलोमीटर पर उन्हें रोका, और समझाने की कोशिश की, लेकिन वे स्कूल की बुनियादी समस्याओं को लेकर अड़ी हुई थीं। आखिरकार कलेक्टर जयंती सिंह जिला मुख्यालय बड़वानी से रवाना हुईं, और इन लड़कियों तक पहुंचकर उनकी बातें सुनीं, और समस्याएं सुलझाने के लिए एक कमेटी बनाई। स्कूल की पोशाक में निकली ये लड़कियां सरकारी एकलव्य आदर्श विद्यालय की थीं। अब यह सोचने की बात है कि जिसे सरकार अपने नामी-गिरामी बैनर वाला स्कूल बताती है, उस एकलव्य आदर्श स्कूल में यह नौबत आ रही है। बारिश, पानी के बीच लड़कियां अगर 18 किलोमीटर पैदल जा चुकी थीं, और 62 किलोमीटर जाने का पक्का इरादा रखती थीं, तो यह बिना किसी वजह के तो हो रही पदयात्रा नहीं थी। हम इन दिनों स्कूलों के बारे में कुछ अधिक ही लिख रहे हैं क्योंकि देश में बालिग आबादी के बीच न सही, बच्चों के बीच तो एक नई जनचेतना दिखाई पड़ रही है, और किसी भी लोकतंत्र के जागरूक होने का यह एक बड़ा संकेत है। होना तो यह चाहिए था कि बालिग वोटर तबका अपनी और बच्चों की दिक्कतों को लेकर उठ खड़ा होता, लेकिन जागरूकता जिस पीढ़ी से भी शुरू हो रही है, अच्छी बात इसलिए है कि उसके दूसरी पीढिय़ों तक पहुंचने की एक संभावना तो रहती है। 

अब एक बिल्कुल ही दूसरी खबर पर आ जाएं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने अभी महाराष्ट्र के धुले जिले में एक हाईस्कूल के कार्यक्रम में इस प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की बिगड़ती स्थिति, और मराठी माध्यम के बंद हो रहे स्कूलों पर गहरी चिंता जताई है। समाचारों में मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने कहा कि सरकार धार्मिक आयोजनों, और इंट्रा स्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर होने वाले खर्च का मामूली हिस्सा भी शिक्षा पर लगाती तो राज्य भर में सौ-सवा सौ मराठी स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था। उन्होंने कहा कि वे खुद 10वीं तक म्युनिसिपल और जिला परिषद की मराठी स्कूलों में पढ़े हैं, राज्य में स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा का बजट घटते जा रहा है। उन्होंने कहा कि नासिक त्र्यंम्बकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए सरकार 32-34 हजार करोड़ रूपए देती है, और कॉरीडोर प्रोजेक्टस के लिए 11 हजार करोड़ रूपए। यदि इस भारी-भरकम रकम का 0.1 फीसदी हिस्सा, कुल 32 करोड़ रूपए भी स्कूलों के लिए दे दिए जाते, तो ये सौ-सवा सौ मराठी स्कूलें बंद नहीं होतीं। उल्लेखनीय है कि हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने ही यह कहा था कि कुंभ और कॉरीडोर परियोजना पर इतना खर्च हो रहा है। जस्टिस वराले ने हाल की एक घटना पर दुख जाहिर किया कि एक आश्रम शाला में पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं, तीन छात्राओं को फर्श पर सोना पड़ा, और सांप के काट लेने से उनकी मौत हो गई। उन्होंने कहा कि सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा, और बुनियादी सुविधाओं पर भी गंभीर ध्यान देने की जरूरत है। 

आज हम कॉकरोच आंदोलन की वजह से शुरू हुई स्कूल-चेतना की चर्चा कर रहे हैं, कॉकरोचों की नहीं। हम इस मुद्दे पर कुछ दिनों के भीतर दूसरी और तीसरी बार लिखने को भी इस कॉलम की जगह और अपने शब्दों की बर्बादी नहीं मानते क्योंकि इस देश के बच्चों की एक पूरी पीढ़ी के भविष्य से जुड़े हुए मुद्दे पर चर्चा कितनी भी बार की जा सकती है, खासकर इसलिए कि उसमें सुधार के कोई आसार नहीं दिखते हैं। हमने तो बीते कई दशकों में स्कूलों की हालत को कभी इस तरह जनचर्चा में नहीं पाया था, और इसलिए आज बच्चों की जागरूकता एक राहत देती है कि उनके वोटर माँ-बाप अगर उन्हें सरकारी स्कूल में दाखिल कराकर भूल गए हैं, तो वे कम से कम खुद अपने बुनियादी हक के लिए लडऩा जानते हैं। आज नौबत यह है कि कॉलेज और स्कूल के बच्चों की पीढिय़ों से बात करने के लिए, उनकी दिक्कतों को समझने के लिए सरकारों, और राजनीतिक दलों में गलाकाट मुकाबला चल रहा है। अच्छा है, चाहे जिसकी कोशिश से हो, स्कूलों की हालत तो सुधरनी चाहिए। आज जो पार्टियां विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनों से डरी-सहमी रहती हैं, और औपचारिक रूप से भारत सरकार के बड़े-बड़े मंत्री कहते हैं कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, उनकी हड़बड़ाहट स्वाभाविक है कि अब तो बच्चे जुलूस लेकर उनकी दहलीज तक पहुंच रहे हैं। 

देश भर के कई राज्यों से आने वाली खबरों को देखकर मन में एक सवाल उठता है। पढ़ाई, इलाज, नाली-पानी, सडक़, और आम हिफाजत तो किसी भी सरकार के लिए सबसे पहली जिम्मेदारी रहनी चाहिए। लेकिन आज जाने कितने प्रदेशों से इनमें से हर मोर्चे पर दिक्कतें और नाकामयाबी की खबरें हैं। सडक़ों में पूरी ट्रक या बस समा जा रही है, कहीं अस्पताल सिर्फ कागज पर है, कहीं स्कूलें जमीन पर हैं ही नहीं, अस्पतालों में बदहाली ही बदहाली है, और शहर घंटे भर की बारिश में तालाब हो जाते हैं। दूसरी तरफ देश भर में हर प्रदेश की सरकारें इन बुनियादी जिम्मेदारियों से परे की अपनी पसंदीदा योजनाओं पर ध्यान केन्द्रित करके चलती हैं क्योंकि उन योजनाओं से सरकारों का नाम जुड़ा रहता है, पहचान जुड़ी रहती है। ये योजनाएं चुनाव में गिनाने लायक रहती हैं। अब स्कूल भवन ठीकठाक हैं, साफ-सुथरे हैं, अस्पतालों में दवा है, सडक़ों पर कचरा नहीं है, ये बातें तो कोई वजनदार चुनावी नारा बन नहीं पातीं। इसलिए नारे से कम इस्तेमाल वाली चीजों पर अधिक ध्यान देना किसी को जायज नहीं लगता है। किसी शहर में करोड़ों की लागत से स्वागत द्वार बनाए जाते हैं, फिर चाहे उन्हीं शहरों में बारिश के पानी से बस्तियां डूब जाएं, सडक़ें डूब जाएं, बच्चे डूबकर मर जाएं। राज्यों को बड़े-बड़े ऐतिहासिक फौलादी ढांचों को सैकड़ों करोड़ की लागत से खड़ा करना सुहाता है क्योंकि उसके साथ शिलालेख पर नाम जुड़ जाते हैं, लेकिन ऐसे ढांचों वाले प्रदेशों में स्कूल आते-जाते नदी पार करते बच्चे बहकर मर जाते हैं, और किसी के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ती। जिस तरह स्कूलों की पढ़ाई अब महत्वहीन हो गई है, और आगे के मुकाबला-इम्तिहानों की तैयारी के लिए कोचिंग ही महत्वपूर्ण रह गई है, कुछ उसी तरह सरकारों में भी हो गया है, उनके लिए अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को पूरा करना जरूरी नहीं रह गया, चुनावी नारों में फिट बैठने वाली नई मौलिक या अनोखी, आकर्षक, और लुभावनी योजनाओं पर पूरा ध्यान चले जा रहा है। जहां आज देश भर में बच्चों को स्कूलों की एकदम बुनियादी जरूरतों के लिए आंदोलन करने पड़ रहे हैं, वहां सैकड़ों फीट ऊंची धार्मिक या ऐतिहासिक प्रतिमाओं को बनाना सरकारों को अपनी उपलब्धि लग रही है। यह सिलसिला भटकी हुई प्राथमिकताओं का है, और सुप्रीम कोर्ट भी दुनिया-जहान की बहस करने के बाद भी इस सिलसिले को रोकने या काबू करने के बारे में कुछ तय नहीं कर पा रहा। ऐसा लगता है कि वोटरों की जमात राजनीतिक दलों, और सरकारोंं की बांह नहीं मरोड़ पाई, अब स्कूली बच्चे अपने हक के लिए संघर्ष करके, आंदोलन करके एक मिसाल पेश करने जा रहे हैं, जिससे बड़े भी अपने हक के लिए लडऩा सीख सकें। यह भारतीय लोकतंत्र में एक बिल्कुल ही नए किस्म की राजनीतिक चेतना है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। आज नेता, और अफसर बच्चों को देखकर हड़बड़ाए हुए हैं। बीते कुछ महीने इनके सपनों में तिलचट्टे आकर इन्हें डरा रहे थे, अब छोटे-छोटे बच्चे आकर इनकी नींद हराम कर रहे होंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)