08 अगस्त 2026
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के एक मामले में कल सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी तल्ख बातें कहीं। महुआ मोइत्रा की एक फेसबुक पोस्ट को लेकर पश्चिम बंगाल में उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ है। इसमें उन्हें पुलिस के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने को कहा गया था। इसके खिलाफ वे कलकत्ता हाईकोर्ट गई थीं, वे चाहती थीं कि उनसे पूछताछ ऑनलाइन कर ली जाए, वहां उन्हें राहत नहीं मिली। अब वे सुप्रीम कोर्ट आई थीं, तो वहां महुआ मोइत्रा की वकील ने कहा कि उन्हें अपनी हिफाजत का खतरा है, पहले भी उन पर अंडे फेंके जा चुके हैं, इसलिए दोबारा ऐसी घटना हो सकती है। इसलिए शारीरिक रूप से थाने जाने के बजाय उन्हें ऑनलाइन मौजूद रहने की इजाजत दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने इस पर कुछ मौखिक टिप्पणियां कीं, जो कि आज चारों तरफ खबरों में आई हैं, और हम उन पर इसलिए लिख रहे हैं कि वे कुछ हक्का-बक्का करती हैं। जजों ने कहा- आप संसद सदस्य हैं, राजनीति में आई हैं, फिर अंडों से क्यों डरती हैं? हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने तो सीने पर गोलियां खाई थीं। जजों ने यह भी कहा कि इस तरह की अर्जियां तो इस अदालत के सामने आनी ही नहीं चाहिए। जबकि हाईकोर्ट ने महुआ मोइत्रा की व्यक्तिगत हाजिरी से छूट की अर्जी खारिज करते हुए भी यह आदेश दिया था कि जब वे जांच अधिकारी के सामने पेश हों, तो पुलिस यह सुनिश्चित करे कि उन पर अंडे न फेंके जाएं। हाईकोर्ट ने इस बात को रिकॉर्ड में लिया था कि पहले उनकी विरोधी भीड़ ने उन पर अंडे फेंके थे, लेकिन इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के जजों का यह कहना कि वे राजनीति में हैं, अंडों से क्यों डरती हैं, बड़ी ही अटपटी और अवांछित बात है।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि वहां जज जुबानी बहुत सारी बातें कहते हैं, जो कि फैसले या आदेश में लिखित रूप से नहीं रहती, और उन्हें आमतौर पर चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन मीडिया में ऐसी तीखी और तल्ख बातों से खबरें तुरंत बनती हैं, और यह एक किस्म से कानूनी सुनवाई के भीतर एक जुबानी सुनवाई और चलने लगती है जो कि आखिर में जाकर फैसले में शायद नहीं भी आती। एक तरफ तो अदालतें मीडिया ट्रायल के खिलाफ कुछ कहती हैं, कभी-कभी अपनी ही कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल के खिलाफ आदेश देती हैं, और अक्सर ही बड़ी अदालतों के जज जुबानी टिप्पणियों से एक जनधारणा बनाने लगते हैं, बना देते हैं, या किसी की साख को खराब करते हैं। आज एक लोकतंत्र में किसी जनप्रतिनिधि को अगर लोगों का विरोध झेलना भी पड़ता है, तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि लोगों को अंडे झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए? अंडों से कोई बड़ी चोट चाहे न लगे, लेकिन उसकी चिपचिपाहट जब किसी के कपड़ों और बदन पर लग जाए, तो क्या वैसी हालत में लोग सफर कर सकते हैं, काम कर सकते हैं, पुलिस दफ्तर में लंबी गवाही दे सकते हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज उन पर फेंके गए अंडों को झेलने के बाद अदालत में बैठकर दिन भर काम कर सकते हैं? जजों का यह कहना बहुत ही नाजायज है कि राजनीति में हैं तो अंडों से क्या डरना?
कोई राजनीति में रहे, न्यायपालिका में रहे, या मामूली सरकारी नौकरी में रहे, हर किसी को गरिमा के साथ अपना काम करने का बुनियादी हक है। हमने बंगाल में अभी हाल ही में देखा है कि एक दूसरे सांसद, ममता बैनर्जी के भतीजे, अभिषेक बैनर्जी को किस तरह चारों तरफ से घेरकर अंडों से हमला किया गया, उनसे धक्का-मुक्की की गई, और उन्हें बचाने के लिए उन्हें हेलमेट लगाकर वहां से निकाला गया। राजनीति या सार्वजनिक जीवन में होने का मतलब अगर इस तरह की हिंसा, और ऐसे अपमान को झेलना है, तो यह लोकतंत्र नहीं है। कोई आंदोलनकारी तो ऐसा कर सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी अदालत के जज अगर इसकी तुलना स्वतंत्रता सेनानियों के छाती पर गोली झेलने से करे, तो यह बहुत ही खराब मिसाल है, नाजायज है, बेइंसाफ बात है। अदालत को एक महिला जनप्रतिनिधि के साथ उसकी सामान्य गरिमा के प्रति हमदर्दी रखनी चाहिए थी। भारतीय समाज में महिलाओं को वैसे भी अक्सर अपमान के लायक मान लिया जाता है। ऐसे में अगर बंगाल की सार्वजनिक जगहों पर आम हो चला ऐसा अपमान अगर अदालत लोकतंत्र मान रही है, तो क्या अदालत खुद भी जनता की ऐसी लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया झेलने के लिए तैयार रहेगी?
जिस मामले में जजों ऐसा अपमान करने वाली जनता को झिड़क़ना था, पुलिस को हिफाजत देने के लिए कहना था, और महुआ मोइत्रा को ऑनलाइन जुडऩे की छूट देनी थी, उसमें जजों ने बड़ा नकारात्मक रूख दिखाया है। आज तो सुप्रीम कोर्ट भी अपनी बहुत सारी सुनवाई ऑनलाइन करने लगा है, जिसमें एक साथ कई वकील बोलते हैं। ऐसे में पूछताछ करने वाले एक पुलिस अफसर को एक पढ़ी-लिखी महिला सांसद से ऑनलाइन पूछताछ करने में क्या दिक्कत हो सकती है? इस पर पहले कलकत्ता हाईकोर्ट, और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट का रूख हैरान करता है। यह उस भीड़ को खुश करने वाला रूख तो है, जो आज बंगाल में बदली हुई सत्ता की वजह से, सत्ता से हटी हुई पार्टी के लोगों का तरह-तरह से अपमान कर रही है। सार्वजनिक जगहों पर, और एयरपोर्ट तक पर, विमान के भीतर भी महुआ मोइत्रा जैसे सांसदों को या दूसरे निर्वाचित लोगों को तरह-तरह से अपमान झेलना पड़ रहा है। यह सिलसिला देश के सामने बहुत से टीवी चैनलों के रास्ते, बहुत से वीडियो और खबरों के रास्ते सामने आ चुका है, और महुआ मोइत्रा की तरफ से भी ऐसी घटनाओं का जिक्र दोनों ही बड़ी अदालतों में किया गया था।
अंडों के वार, चिपचिपाहट की बौछार से बचने के लिए अगर एक महिला सांसद ऑनलाइन पूछताछ का अनुरोध कर रही है, तो उसे स्वतंत्रता सेनानियों की तरह छाती पर गोलियां झेलने के लिए तैयार रहने को कहा जा रहा है। जजों की यह सोच बड़ी अदालत के बड़े अदालती अहंकार को बताती है कि वे किसी आदेश या फैसले के पहले किसी भी तरह की बातें कह सकते हैं। यह लोकतंत्र नहीं है, अदालत का यह रूख और बर्ताव भी लोकतंत्र नहीं हैं। आज जब पूरी की पूरी दुनिया अधिक से अधिक काम को ऑनलाइन करने की तरफ बढ़ रही है, खुद जज कभी अपने घरों से ऑनलाइन सुनवाई करते हैं, तो कभी वकील घरों से ही वीडियो-कैमरों पर ऑनलाइन जिरह करते हैं, लगातार यह बात भी चल रही है कि जेलों से अदालतों को वीडियो लिंक से जोड़ा जाए, तो ऐसे में व्यक्तिगत मौजूदगी की पुलिस की जिद पुलिस का एक राजनीतिक रूख है, और एक महिला को इसकी छूट न देना हमें तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का अहंकारी रूख लगता है। जब अदालतें सार्वजनिक भीड़ के बीच होने वाली भीड़त्या को रोकने के लिए भी कुछ नहीं कर पातीं, तो उन्हें किसी निर्वाचित महिला सांसद को आक्रामक और विरोधी भीड़ के बीच जाने के लिए आजादी की लड़ाई की मिसाल की चुनौती देने का क्या हक है? अदालतें संविधान के बड़े ढांचे के भीतर मनचाहे आदेश और फैसले दे सकती हैं, लेकिन यह सिलसिला लोकतंत्र के न्यायिक इतिहास में अच्छी तरह दर्ज भी होते चलता है। जजों को यह सोचना चाहिए कि उनके ऊपर अगर कभी अंडे फेंके जाएं, तो क्या उससे लिथड़े हुए वे दिन भर अदालती काम कर सकेंगे?




