05 अगस्त 2026
भारत में पेट्रोल में एथेनाल मिलाने को लेकर विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अब हाशिए पर पहुंचे हुए राष्ट्रीय स्तर पर जाना-पहचाना चेहरा, अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर बड़े आंदोलन की घोषणा की है। लेकिन पिछले कई महीनों से देश की जनता के सामने केन्द्र सरकार कोई भरोसेमंद जानकारी नहीं दे पा रही है। जनता इस बात को लेकर भी बहुत हैरान है कि एथेनाल की वकालत परिवहन मंत्री नितिन गडकरी कर रहे हैं, वे ही लगातार बयान देते हैं, और एथेनाल के फायदे गिनाते हैं। वे ही जब कई बार इस बात को बोल चुके थे कि एथेनाल से न तो इंजन कम चलता है, और न ही कोई पुर्जे खराब होते हैं, तब महीनों तक इस धारणा को जारी रखने के बाद अब उन्हें संसद में भारत सरकार के संस्थानों की जांच रिपोर्ट रखनी पड़ी कि इससे गाडिय़ां कम दूरी तक चल रही हैं, और गाडिय़ों के कई तरह के पुर्जे भी खराब हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर पेट्रोल में एथेनाल नहीं मिलाया जाता, तो पेट्रोल सवा सौ रूपए लीटर हो गया रहता। इसके पहले केन्द्र सरकार की तरफ से यह कहा गया था कि सरकार एथेनाल के प्रयोग पर एक लाख करोड़ से अधिक खर्च कर चुकी है, और अब इस फैसले को बदलने से बड़ा नुकसान होगा। इस तरह की अलग-अलग समय पर कही गई अलग-अलग बातों से जनता का भरोसा सरकार पर बिल्कुल नहीं बैठ रहा। हमारा अंदाज है कि आबादी का अधिकतर हिस्सा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पेट्रोल से जुड़ा रहता है, और जनता के बीच इतना अविश्वास सरकार की सेहत के लिए ठीक नहीं है। यह एक अलग बात है कि अभी कोई आम चुनाव सामने नहीं हैं, इसलिए सरकार पर कोई खतरा नहीं है, लेकिन अगर पेट्रोल में ऐसी सरकारी मिलावट को लेकर जनता की शिकायतें बनी रहेंगी, बढ़ती जाएंगी, और जनता के बीच शक और बेचैनी दोनों बढ़ते चलेंगे, तो फिर पेट्रोल की यह व्यवस्था तो अगले आम चुनाव तक जारी ही रहेगी।
सरकार एक तरफ तो एथेनाल मिलाने की वजह से पेट्रोल के दाम बहुत अधिक न बढऩे की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ जनता को शक यह है कि अपने खरीदे ऐसे सरकारी मिलावटी-पेट्रोल की वजह से उसे अधिक पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, और वह शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले उसे अधिक महंगा पड़ रहा है। गडकरी ने संसद में यह मंजूर किया है कि भारत की बहुत सारी गाडिय़ों में इस मिलावटी ईंधन से कई तरह के पुर्जे खराब हो सकते हैं, और उन्हें बदलने की नौबत आ सकती है। हम तो रोज ही खबरों को देखते हैं, और हमें यह बिल्कुल याद नहीं पड़ रहा कि सरकार ने जनता के सामने कभी यह पसंद रखी हो कि वह महंगा शुद्ध पेट्रोल खरीदना चाहेगी, या सस्ता मिलावटी पेट्रोल। जनता के सामने तो पूरे वैज्ञानिक और तकनीकी तथ्य आज तक नहीं रखे गए हैं। जो हर किसी की जिंदगी को प्रभावित करने वाला मामला है, उसे सरकार ने अपनी मनमानी से एकतरफा तय किया है, तो उसके विरोध के लिए भी उसे तैयार रहना होगा। सरकार समय रहते जनता के विश्वास को जीतना अगर गैरजरूरी मानेगी, तो विश्वास का यह संकट जनता को तो किस्तों में झेलना पड़ेगा, सरकार इसे चुनाव के वक्त थोक में झेलेगी।
अभी-अभी इस देश में नीट इम्तिहान की गड़बडिय़ों को लेकर छात्रों, और युवाओं का एक सबसे बड़ा आंदोलन हुआ। नीट के मुद्दे पर भी केन्द्र सरकार का महीनों तक रूख जिम्मेदारी को झटक देने का था। उसने अपनी कोई कमी या खामी मानी ही नहीं थी। बाद में जब छात्रों की तरफ से ये गड़बडिय़ां साबित की गईं, तब भी सरकार या सरकार के समर्थकों की तरफ से छात्रों के लिए गद्दार, देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग, पाकिस्तान समर्थित, चीन समर्थित, कई तरह की तोहमतें लगाई गई। जब जंतर-मंतर पर अनशन और आंदोलन शुरू हुआ, तो सरकार की तरफ से करीब महीने भर किसी ने उधर झांका भी नहीं। और जब बाद में यह मामला जोर पकड़ते दिखा, तो सरकार ने एकदम हड़बड़ी में आंदोलनकारियों से बात की, और उसे सुलझाने के लिए समझौता किया, अपने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी लिया। यह सिलसिला एक मजबूत सरकार की साख के खिलाफ था। यह एक अलग बात है कि जब सरकार की आलोचना करने वाले लोग नापसंद किए जाते हैं, तो सरकार को समय रहते जनभावनाओं का अहसास नहीं होता। लोगों ने लगातार पेट्रोल की महंगाई, लगातार रसोई गैस की महंगाई, इन सबको बर्दाश्त किया, लेकिन उसे मजबूरी में मिलावटी पेट्रोल खरीदना पड़े, यह बात उसके गले उतरते नहीं दिख रही है। सरकार चूंकि देश में पेट्रोल-डीजल और गैस की बिक्री में लगभग एकाधिकार रखती है, इसलिए आम जनता के पास यह पसंद तो है नहीं कि वह किसी और कारोबारी से पेट्रोल, डीजल, गैस खरीद सके। जहां कहीं सरकार का एकाधिकार रहता है, वहां सरकार को एक कारोबारी के नजरिए से नहीं, ग्राहक-जनता के नजरिए से सोचना चाहिए।
सरकार के भीतर विश्वसनीयता को बनाए रखने की कोशिश में भी कमजोरी रही। पेट्रोल में मिलावट की वकालत करने वाले मंत्री का पेट्रोलियम मंत्रालय से कोई लेना-देना नहीं था, और वे इस विवाद में अलग उलझ गए कि उनके बेटों के एथेनाल के कारखाने हैं या नहीं, अगर हैं, तो बेटों की कितनी कमाई एथेनाल से जुड़ी हुई है। ऐसी बातों से भी लोगों का भरोसा टूटा। सरकार को चाहिए था कि वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं की जांच रिपोर्ट को जनता के सामने पारदर्शी तरीके से पेश करती, उसके संदेहों को दूर करती, और तब उस पर यह मिलावटी पेट्रोल थोपती। इस मुद्दे के लिए लोगों को एकजुट करने में किसी केजरीवाल की भी अधिक जरूरत नहीं है। तिलचट्टों जैसे नौजवानों की तरफ से भी अगर किसी दिन गाडिय़ों के चक्काजाम का आव्हान आ जाएगा, तो देश-प्रदेश की सरकारें उससे जूझ नहीं पाएंगी। अगर सरकार ने एथेनाल पर पूंजीनिवेश किया है, तो भी उसके नफा-नुकसान को देखने के पहले लोकतंत्र में ग्राहक के रूप में जनता के अधिकारों का सम्मान करना अधिक जरूरी है। किसी भी सरकार को जनता पर अपने फैसलों को इस बुरी तरह नहीं थोपना चाहिए, इसका नुकसान जनता हर दूसरे-तीसरे दिन पेट्रोल डलाते हुए झेलती है, और आम जनता की ऐसी निरंतर और स्थाई नाराजगी अच्छी नहीं है। केन्द्र सरकार बीते बरसों में अपने ऐसे ही कुछ और एकतरफा फैसलों का नुकसान देश की जनता पर डाल चुकी है, और उन बुरे तजुर्बों को जनता तो याद रखी हुई है, सरकार को भी उन्हें याद रखना चाहिए। लोकतंत्र में ठोकर लगे तो उससे सबक लेना चाहिए, सरकार को तैश में मनमानी काम नहीं करना चाहिए।





