दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त 2026



 

कोई जूलियस सीजर और रामकथा की किताबें भेजे देश के इन बड़े जजों को

27 अगस्त 2026  

 

सुप्रीम कोर्ट के एक जज, जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के काम के तरीकों पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं, और ऐसे मामले गिनाए हैं जिनमें बड़े-बड़े नफे-नुकसान वाले केस दूसरे जजों से जस्टिस शर्मा ने खुद अपनी बेंच पर ले लिए, और फिर ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए अदालत का बेजा इस्तेमाल किया। जस्टिस मेहता ने इस महीने 2, 10, और 17 तारीख को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को ये पत्र लिखे हैं, जिनमें बहुत सारे मुद्दे गिनाए गए हैं। बड़े-बड़े जमीन-जायदाद के ऐसे केस के नाम दिए गए हैं जो कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश ने अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए अपनी अदालत में बुला लिए। अभी कुछ दिन पहले ही एक और हाईकोर्ट, पंजाब एवं हरियाणा, के बारे में इसी तरह की खबर आई थी कि वहां भी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे जजों की बेंच से राजनीतिक प्रभाव वाले चुनिंदा मामलों को अपनी कोर्ट में बुला लिया, और फिर ऐसे फैसले दिए जिससे पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर बहुत बड़ा बोझ पड़ा, और वह बोझ कोई भी सरकार उठा नहीं सकती। एक के बाद एक, दो ऐसे जजों की खबरें इस हाईकोर्ट से ऐसी आई थीं जिन्हें लगातार ऐसे विवादास्पद मामलों से जोडक़र देखा जा रहा था। 

अभी दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज, जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला खबरों में बना ही हुआ है, जिनके बंगले से बोरियां भर-भरकर अधजले नोट बरामद हुए थे। वहां आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों, और पुलिसकर्मियों को ये बोरियां मिलीं, इनके वीडियो भी सामने आए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की एक जांच कमेटी बनाई, जिसमें यह पाया कि बंगले के स्टोर रूम में सचमुच में बड़ी मात्रा में नोट रखे हुए थे। कमेटी ने यह भी पाया कि आग बुझने और दमकलकर्मियों के जाने के बाद सुबह-सुबह वहां से जली हुई नगदी हटाई गई। इस कमेटी की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई, और आगे की संवैधानिक कार्रवाई करने की सिफारिश की गई। इस मामले से कई और किस्म के संदेह भी जुड़े हुए थे, लेकिन कोई सुबूत न रहने से यह स्थापित नहीं हो सका कि यह पैसा किसने, किसको, किस वजह से दिया था, यह किस भुगतान का था। फिर भी किसी हाईकोर्ट जज का इतनी बड़ी नगदी से सीधा रिश्ता शायद पहली बार ही सामने आया। 

इस सिलसिले में थोड़ी सी हैरानी इस बात को लेकर हो रही है, कि पिछले कुछ हफ्तों से सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज मुख्य न्यायाधीश को ऐसे गंभीर आरोपों वाली चिट्ठी लिख रहा है, और अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में राजस्थान हाईकोर्ट का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अनियमित तरीके से काम करते हुए, पक्षपात और भाई-भतीजावाद दिखाते हुए काम कर रहा है, और इस पर सुप्रीम कोर्ट कुछ करते भी नहीं दिख रहा है। किसी भी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश किसी मामले के लिए बेंच तय कर सकते हैं, और बेंच का फैसला ही कई मामलों में केस का फैसला भी मान लिया जाता है। खासकर जब कीमती जमीन-जायदाद से जुड़े हुए, आर्थिक नफा-नुकसान के मामलों की बेंच बदली जाती है, तो लोगों का शक जायज ही रहता है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने यह कहा है कि उन्होंने जस्टिस शर्मा से स्पष्टीकरण मांगा है। भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का ही एक जज किसी राज्य के हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बार-बार लिखित शिकायत कर रहा है, और उस पर देश का मुख्य न्यायाधीश कई हफ्ते बाद भी स्पष्टीकरण का ही इंतजार कर रहा है! ऐसे में लोगों को कुछ और जजों के विवाद भी याद पड़ते हैं कि किस तरह उनके बीते बरसों में उन पर जमीन-जायदाद की खरीद-बिक्री में आर्थिक अनियमितता के आरोप लगे थे। 

किसी भी लोकतंत्र या दूसरी शासन व्यवस्था में एक लाईन अक्सर कही जाती है कि सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। अब इसका संदर्भ यह है कि ईसा के 62 बरस पहले रोमन शासक जूलियस सीजर की पत्नी घर पर एक धार्मिक समारोह करवा रही थी, जो कि केवल महिलाओं के लिए था। वहां पर एक नौजवान महिला बनकर भीतर घुस गया, और माना गया कि वह शासक की पत्नी से मिलने पहुंचा था। इसे लेकर पूरे रोम में बड़ा राजनीतिक, और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया। सीजर को यह विश्वास नहीं था कि उसकी पत्नी ने कोई अपराध किया है, उसने अदालत में भी यही बात कही, लेकिन फिर भी उन्होंने पत्नी को तलाक दे दिया। जब उनसे पूछा गया कि वे बीवी को बेकसूर मानते थे, तो फिर तलाक क्यों दिया, तो उन्होंने कहा कि राजा की पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह संदेह की छाया भी अपने पर पडऩे दे। वहीं से यह लाईन निकली कि राजा की पत्नी को संदेह से भी ऊपर रहना चाहिए। इसे सार्वजनिक जीवन में ईमानदार रहने से ऊपर बढक़र ईमानदार दिखने की भी सोच के रूप में दुनिया भर में माना गया। फिर भारत, और दुनिया भर की अदालतों में भी इससे मिलती-जुलती एक सोच आगे बढ़ी कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, होते हुए भी साफ-साफ दिखना चाहिए। 

भारतीय संस्कृति में इसकी एक बड़ी मिसाल रामकथा में आती है जहां अयोध्या के एक निवासी की एक बात को सुनकर वनवास से लौटे राम अपनी पत्नी सीता को घर से निकाल देते हैं। उनका पैमाना भी यही रहता है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह फैसला भयानक रूप से गलत था, लेकिन ऐसे ही कड़वे फैसलों की वजह से राम, मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाए थे। ऐसे भारत में सबसे बड़ी अदालतों के जजों को न सिर्फ ईमानदार रहना चाहिए, बल्कि साथ-साथ ईमानदार दिखना भी चाहिए, और संदेह से ऊपर तो रहना ही चाहिए। जहां किसी जज से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी पक्षकार, या किसी वकील, या केस के इतिहास से अपना दूर का रिश्ता रहने पर भी उसे सुनने से इंकार कर दे, वहां पर इतने आरोपों के साथ कोई जज अगर अनियमित तरीके से काम कर रहे हैं, तो न्यायपालिका पर किसका भरोसा रह जाएगा? ऐसा भी नहीं कि आज हर किसी का न्यायपालिका पर बहुत बड़ा भरोसा है। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का जितना पतन हुआ है, उसकी वजह से नौजवान पीढ़ी, और बच्चों तक में देश की व्यवस्था को लेकर बेचैनी और संदेह दोनों भरे हुए हैं। किसी जज को खुद भी ऐसी शर्मनाक नौबत से बचना चाहिए, और जब सुप्रीम कोर्ट के एक जज यह लिखकर दे रहे हैं कि राजस्थान हाईकोर्ट के कुछ जजों ने उनसे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी शिकायतें की हैं, तो बिना देर किए संदेह के घेरे वाले जज को अपने आपको ऐसे पसंदीदा मामलों की सुनवाई से तो अलग कर ही लेना चाहिए। भारत की न्यायपालिका में यह तो जरूरी रहता भी नहीं है कि किसी मामले की सुनवाई कोई एक खास जज करे। ऐसे जज को खुद होकर अपने को आर्थिक वजन वाले मामलों से तो अलग कर ही लेना चाहिए। हमने जिन दो पुरानी कहानियों का जिक्र ऊपर किया है, उन दोनों की किताबें जस्टिस शर्मा को उपहार में भेजनी चाहिए, क्योंकि ऐसा लगता है कि उन्होंने ये दोनों कहानियां पढ़ी नहीं हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

विदेशी फर्जीवाड़े से डॉक्टर बने लोग कैसा इलाज करेंगे?

26 अगस्त 2026  

 

भारत के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में जिन्हें दाखिला नहीं मिलता है, और जिन्हें डॉक्टरी पढऩे की हसरत रहती है, ऐसे लोगों के लिए दूसरे देशों के मेडिकल कॉलेजों के स्वागतद्वार खुले रहते हैं। रूस, यूक्रेन, चीन, बांग्लादेश के साथ-साथ किर्गिस्तान, फिलीपींस, और उजबेकिस्तान जैसे कई देशों से एमबीबीएस की डिग्री दिलाने वाली एजेंसियां भारत में उसी तरह सक्रिय हैं, जिस तरह इन दिनों साइबर फ्रॉड करने वाली एजेंसियां कॉल सेंटर चला रही हैं। एक प्रमुख अखबार, दैनिक भास्कर की एक खोजी रिपोर्ट में आज ही यह स्टिंग ऑपरेशन छपा है कि ये एजेंसियां इन देशों में मेडिकल दाखिला करवाने के साथ-साथ कॉलेज जाने से भी छूट दिलवा रही हैं कि वे घर बैठे पढ़ाई करें, और सिर्फ इम्तिहान देने के लिए उन देशों में चले जाएं। इस सबकी लागत भारत में एमबीबीएस पढ़ाई के मुकाबले खासी कम भी है। एक तो दूसरे देशों से एमबीबीएस या उसके बराबर की डिग्री लेकर आने वाले भारतीय लोगों को भारत में एफएमजीई नाम का एक इम्तिहान पास करना पड़ता है, तभी वे यहां डॉक्टरी कर सकते हैं। साल में दो बार होने वाली इस इम्तिहान में 12 फीसदी से लेकर 25 फीसदी तक ही लोग पास हो पाते हैं, और वे ही लोग भारत में मरीज देख सकते हैं, सरकारी या निजी अस्पताल में डॉक्टर की नौकरी कर सकते हैं। बाहर से पढक़र आने वाली बहुत से लोग तीन-चार बार भी ऐसी इम्तिहान देकर खींचतानकर पास होते हैं, और हो सकता है कि इनमें भी नीट की तरह की धांधली चलती हो। 

देश भर में कई प्रदेशों में चिकित्सा शिक्षकों की इतनी कमी है कि नेशनल मेडिकल कमीशन के दौरे के समय घर बैठे हुए, रिटायर हो चुके, कभी न पढ़ाने वाले किसी भी तरह के चिकित्सक को शिक्षक बताकर मान्यता ले ली जाती है, या बढ़वा ली जाती है। इस फर्जीवाड़े से असल मेडिकल पढ़ाई का कोई लेना-देना नहीं रहता, क्योंकि जिस तरह कुछ दूसरे देशों में फर्जी हाजिरी दिलाकर छात्रों को मेडिकल पढ़ाई न करने की छूट दिलवा दी जाती है, ठीक उसी तरह भारत के बहुत से मेडिकल कॉलेजों में ऐसी फर्जी नियुक्ति दिखाकर उन्हें शिक्षक बता दिया जाता है, और यह तो जाहिर है कि वह पढ़ाई होती ही नहीं है। ऐसे में उत्तर भारत, या हिन्दी भारत के प्रदेशों में आबादी के अनुपात में मेडिकल सीटें कम होने का तर्क देकर एनएमसी दक्षिण भारत में सीटें बढ़ाने से मना कर चुका है, जहां पर कि मेडिकल सीटें बढ़ाने का ढांचा मौजूद है। यह रूख हैरान करता है कि इस देश में दुनिया के कमजोर किस्म के देशों से फर्जीवाड़े से डिग्री खरीद लेना एनएमसी को मंजूर है, लेकिन अपने ही देश के भीतर दक्षिण भारत को अधिक मेडिकल सीटें मंजूर करना उसे मंजूर नहीं है। ऐसे उग्र क्षेत्रवादी नजरिए की वजह से अभावग्रस्त उत्तर भारत का और नुकसान हो रहा है, क्योंकि अगर दक्षिण में सीटें बढ़तीं, तो उनमें से उत्तर के छात्र-छात्राओं को भी जगह मिली रहती, और हो सकता है कि उनमें से कई नौजवान डॉक्टर बनकर लौटकर अपने इलाकों में आते। अब पूरी तरह फर्जीवाड़े से विदेशी डिग्री पाना ही बहुत से बच्चों के लिए अकेला जरिया रह गया है।  राष्ट्रीय स्तर पर बने हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से देश के एकता के ढांचे को नुकसान होते दिख रहा है। इससे उत्तर-दक्षिण के बीच खाई भी गहरी, और चौड़ी हो रही है, और देश की चिकित्सा शिक्षा क्षमता का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो रहा। 

अब अगर हम चिकित्सा शिक्षा से कुछ देर के लिए हटकर लोगों के इलाज पर आएं, तो उसमें भी इस रूख का नुकसान हो रहा है। दक्षिण भारत से तैयार होने वाले किसी भी इलाके के छात्र-छात्राओं का फायदा पूरे देश की स्वास्थ्य सेवाओं को किसी न किसी तरह मिल सकता था। लेकिन विदेशों में मोटा पैसा खर्च करके डॉक्टर बनकर लौटने वाले लोगों में से शायद ही कोई देश के ग्रामीण इलाकों में जाने वाले होंगे। नतीजा यह है कि सरकारी हो या निजी अस्पताल हो, भारत के अस्पताल मरीजों से उसी तरह भरे हुए दिखते हैं, जिस तरह अदालतें मुकदमों से भरी हुई रहती हैं, सडक़ें जानवरों से भरी हुई रहती हैं, और गैस एजेंसियां सिलेंडर की कतार में लगे लोगों से भरी रहती हैं। इस सिलसिले को खत्म करने के लिए उन प्रदेशों को और निजी संस्थाओं को बढ़ावा देना होगा, जो कि अच्छी या बेहतर चिकित्सा शिक्षा दे सकते हैं। सरकार एक तरफ तो अपनी हर संपत्ति का निजीकरण करती जा रही है, निजी चिकित्सा शिक्षा आज भी देश में मान्यता प्राप्त है। लेकिन ऐसे में भी सरकार के नियमों का आल-जाल अगर निजी चिकित्सा शिक्षा को आगे बढऩे से रोक रहा है, तो उसे तोडऩा जरूरी है। सरकारें हर चीज को नियंत्रित करने के मामले में इतनी बावली न रहें कि वे कंट्रोल-फ्रीक कहलाने लगें। आज देश में चिकित्सा शिक्षा पर काबू एक बहुत ही भ्रष्ट व्यवस्था है, और बीते बरसों में कितने ही लोगों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। इससे जाहिर है कि सिर्फ नियंत्रण की नीयत से काम ईमानदार नहीं हो जाता, सरकार को इसके लिए कोई अलग तरीका निकालना पड़ेगा। दूसरी बात यह कि अलग-अलग राज्यों की क्षमता अगर नहीं है, अगर वे चिकित्सा शिक्षा, और चिकित्सा का ढांचा ही विकसित नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें बराबरी पर आने देने का मौका देने के नाम पर सक्षम राज्यों को पीछे धकेलकर रखना बहुत नाजायज बात है, और यह एक राष्ट्रीय क्षति भी है। 

देश में आज भी अधिक फीस देकर निजी कॉलेजों में डॉक्टरी पढऩा एक जायज व्यवस्था है। देश को डॉक्टरों की जरूरत है, फिर चाहे वे किसी भी कॉलेज से पढक़र निकले हों। ऐसे में सरकार तो जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज बनाने के एक सपने को पूरा करने का दिखावा करते दिखती है। इससे जमीनी हकीकत में कोई सुधार नहीं होना है। निजी मेडिकल कॉलेज आज भी मौजूद हैं, और वहां से भी डॉक्टर बनकर निकलने वाले लोग आने वाले बरसों में चिकित्सा शिक्षक, या चिकित्सा कॉलेज के अस्पताल के डॉक्टर बन सकते हैं। इसके लिए एक दूरदर्शी सोच और योजना दोनों की जरूरत है, यह शुरूआत तो केन्द्र सरकार के स्तर पर ही हो सकती है, और उस पर अमल राज्य सरकारें कर सकती हैं। फिर यह भी है कि केन्द्र से परे कई राज्य अपने स्तर पर राष्ट्रीय पैमानों से अधिक भी काम कर सकते हैं, केन्द्र को उनके काम में अड़ंगा लगाना बंद करना होगा। डॉक्टरी की पढ़ाई सिर्फ एक पढ़ाई नहीं है, बल्कि देश की जनता के इलाज के हक को पूरा करने का जरिया भी है। राज्य सरकारें छोटी-छोटी जगहों तक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र खोल तो रही हैं, लेकिन हर जगह डॉक्टर नहीं मिल पा रहे हैं, इसके लिए काफी सोच-विचार किया जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

ले मशालें चल पड़े हैं, बच्चे गांव-गांव के!

 25 अगस्त 2026  

 

मध्यप्रदेश की खबर है कि वहां स्कूली छात्राएं परेशानियों को लेकर कलेक्टर से मिलने 62 किलोमीटर पैदल सफर पर निकल गई थीं। अफसरों ने 18 किलोमीटर पर उन्हें रोका, और समझाने की कोशिश की, लेकिन वे स्कूल की बुनियादी समस्याओं को लेकर अड़ी हुई थीं। आखिरकार कलेक्टर जयंती सिंह जिला मुख्यालय बड़वानी से रवाना हुईं, और इन लड़कियों तक पहुंचकर उनकी बातें सुनीं, और समस्याएं सुलझाने के लिए एक कमेटी बनाई। स्कूल की पोशाक में निकली ये लड़कियां सरकारी एकलव्य आदर्श विद्यालय की थीं। अब यह सोचने की बात है कि जिसे सरकार अपने नामी-गिरामी बैनर वाला स्कूल बताती है, उस एकलव्य आदर्श स्कूल में यह नौबत आ रही है। बारिश, पानी के बीच लड़कियां अगर 18 किलोमीटर पैदल जा चुकी थीं, और 62 किलोमीटर जाने का पक्का इरादा रखती थीं, तो यह बिना किसी वजह के तो हो रही पदयात्रा नहीं थी। हम इन दिनों स्कूलों के बारे में कुछ अधिक ही लिख रहे हैं क्योंकि देश में बालिग आबादी के बीच न सही, बच्चों के बीच तो एक नई जनचेतना दिखाई पड़ रही है, और किसी भी लोकतंत्र के जागरूक होने का यह एक बड़ा संकेत है। होना तो यह चाहिए था कि बालिग वोटर तबका अपनी और बच्चों की दिक्कतों को लेकर उठ खड़ा होता, लेकिन जागरूकता जिस पीढ़ी से भी शुरू हो रही है, अच्छी बात इसलिए है कि उसके दूसरी पीढिय़ों तक पहुंचने की एक संभावना तो रहती है। 

अब एक बिल्कुल ही दूसरी खबर पर आ जाएं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने अभी महाराष्ट्र के धुले जिले में एक हाईस्कूल के कार्यक्रम में इस प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की बिगड़ती स्थिति, और मराठी माध्यम के बंद हो रहे स्कूलों पर गहरी चिंता जताई है। समाचारों में मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने कहा कि सरकार धार्मिक आयोजनों, और इंट्रा स्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर होने वाले खर्च का मामूली हिस्सा भी शिक्षा पर लगाती तो राज्य भर में सौ-सवा सौ मराठी स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था। उन्होंने कहा कि वे खुद 10वीं तक म्युनिसिपल और जिला परिषद की मराठी स्कूलों में पढ़े हैं, राज्य में स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा का बजट घटते जा रहा है। उन्होंने कहा कि नासिक त्र्यंम्बकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए सरकार 32-34 हजार करोड़ रूपए देती है, और कॉरीडोर प्रोजेक्टस के लिए 11 हजार करोड़ रूपए। यदि इस भारी-भरकम रकम का 0.1 फीसदी हिस्सा, कुल 32 करोड़ रूपए भी स्कूलों के लिए दे दिए जाते, तो ये सौ-सवा सौ मराठी स्कूलें बंद नहीं होतीं। उल्लेखनीय है कि हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने ही यह कहा था कि कुंभ और कॉरीडोर परियोजना पर इतना खर्च हो रहा है। जस्टिस वराले ने हाल की एक घटना पर दुख जाहिर किया कि एक आश्रम शाला में पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं, तीन छात्राओं को फर्श पर सोना पड़ा, और सांप के काट लेने से उनकी मौत हो गई। उन्होंने कहा कि सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा, और बुनियादी सुविधाओं पर भी गंभीर ध्यान देने की जरूरत है। 

आज हम कॉकरोच आंदोलन की वजह से शुरू हुई स्कूल-चेतना की चर्चा कर रहे हैं, कॉकरोचों की नहीं। हम इस मुद्दे पर कुछ दिनों के भीतर दूसरी और तीसरी बार लिखने को भी इस कॉलम की जगह और अपने शब्दों की बर्बादी नहीं मानते क्योंकि इस देश के बच्चों की एक पूरी पीढ़ी के भविष्य से जुड़े हुए मुद्दे पर चर्चा कितनी भी बार की जा सकती है, खासकर इसलिए कि उसमें सुधार के कोई आसार नहीं दिखते हैं। हमने तो बीते कई दशकों में स्कूलों की हालत को कभी इस तरह जनचर्चा में नहीं पाया था, और इसलिए आज बच्चों की जागरूकता एक राहत देती है कि उनके वोटर माँ-बाप अगर उन्हें सरकारी स्कूल में दाखिल कराकर भूल गए हैं, तो वे कम से कम खुद अपने बुनियादी हक के लिए लडऩा जानते हैं। आज नौबत यह है कि कॉलेज और स्कूल के बच्चों की पीढिय़ों से बात करने के लिए, उनकी दिक्कतों को समझने के लिए सरकारों, और राजनीतिक दलों में गलाकाट मुकाबला चल रहा है। अच्छा है, चाहे जिसकी कोशिश से हो, स्कूलों की हालत तो सुधरनी चाहिए। आज जो पार्टियां विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनों से डरी-सहमी रहती हैं, और औपचारिक रूप से भारत सरकार के बड़े-बड़े मंत्री कहते हैं कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, उनकी हड़बड़ाहट स्वाभाविक है कि अब तो बच्चे जुलूस लेकर उनकी दहलीज तक पहुंच रहे हैं। 

देश भर के कई राज्यों से आने वाली खबरों को देखकर मन में एक सवाल उठता है। पढ़ाई, इलाज, नाली-पानी, सडक़, और आम हिफाजत तो किसी भी सरकार के लिए सबसे पहली जिम्मेदारी रहनी चाहिए। लेकिन आज जाने कितने प्रदेशों से इनमें से हर मोर्चे पर दिक्कतें और नाकामयाबी की खबरें हैं। सडक़ों में पूरी ट्रक या बस समा जा रही है, कहीं अस्पताल सिर्फ कागज पर है, कहीं स्कूलें जमीन पर हैं ही नहीं, अस्पतालों में बदहाली ही बदहाली है, और शहर घंटे भर की बारिश में तालाब हो जाते हैं। दूसरी तरफ देश भर में हर प्रदेश की सरकारें इन बुनियादी जिम्मेदारियों से परे की अपनी पसंदीदा योजनाओं पर ध्यान केन्द्रित करके चलती हैं क्योंकि उन योजनाओं से सरकारों का नाम जुड़ा रहता है, पहचान जुड़ी रहती है। ये योजनाएं चुनाव में गिनाने लायक रहती हैं। अब स्कूल भवन ठीकठाक हैं, साफ-सुथरे हैं, अस्पतालों में दवा है, सडक़ों पर कचरा नहीं है, ये बातें तो कोई वजनदार चुनावी नारा बन नहीं पातीं। इसलिए नारे से कम इस्तेमाल वाली चीजों पर अधिक ध्यान देना किसी को जायज नहीं लगता है। किसी शहर में करोड़ों की लागत से स्वागत द्वार बनाए जाते हैं, फिर चाहे उन्हीं शहरों में बारिश के पानी से बस्तियां डूब जाएं, सडक़ें डूब जाएं, बच्चे डूबकर मर जाएं। राज्यों को बड़े-बड़े ऐतिहासिक फौलादी ढांचों को सैकड़ों करोड़ की लागत से खड़ा करना सुहाता है क्योंकि उसके साथ शिलालेख पर नाम जुड़ जाते हैं, लेकिन ऐसे ढांचों वाले प्रदेशों में स्कूल आते-जाते नदी पार करते बच्चे बहकर मर जाते हैं, और किसी के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ती। जिस तरह स्कूलों की पढ़ाई अब महत्वहीन हो गई है, और आगे के मुकाबला-इम्तिहानों की तैयारी के लिए कोचिंग ही महत्वपूर्ण रह गई है, कुछ उसी तरह सरकारों में भी हो गया है, उनके लिए अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को पूरा करना जरूरी नहीं रह गया, चुनावी नारों में फिट बैठने वाली नई मौलिक या अनोखी, आकर्षक, और लुभावनी योजनाओं पर पूरा ध्यान चले जा रहा है। जहां आज देश भर में बच्चों को स्कूलों की एकदम बुनियादी जरूरतों के लिए आंदोलन करने पड़ रहे हैं, वहां सैकड़ों फीट ऊंची धार्मिक या ऐतिहासिक प्रतिमाओं को बनाना सरकारों को अपनी उपलब्धि लग रही है। यह सिलसिला भटकी हुई प्राथमिकताओं का है, और सुप्रीम कोर्ट भी दुनिया-जहान की बहस करने के बाद भी इस सिलसिले को रोकने या काबू करने के बारे में कुछ तय नहीं कर पा रहा। ऐसा लगता है कि वोटरों की जमात राजनीतिक दलों, और सरकारोंं की बांह नहीं मरोड़ पाई, अब स्कूली बच्चे अपने हक के लिए संघर्ष करके, आंदोलन करके एक मिसाल पेश करने जा रहे हैं, जिससे बड़े भी अपने हक के लिए लडऩा सीख सकें। यह भारतीय लोकतंत्र में एक बिल्कुल ही नए किस्म की राजनीतिक चेतना है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। आज नेता, और अफसर बच्चों को देखकर हड़बड़ाए हुए हैं। बीते कुछ महीने इनके सपनों में तिलचट्टे आकर इन्हें डरा रहे थे, अब छोटे-छोटे बच्चे आकर इनकी नींद हराम कर रहे होंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

स्कूल भवन, पुल-पुलिया एकदम से आसान नहीं, सरकारें कोई विकल्प सोचें

24 अगस्त 2026  

 

आज एक ही अखबार में ऊपर-नीचे छपी दो खबरें दिल दहलाने के लिए काफी हैं। मध्यप्रदेश की खबर है कि उफनती हुई नदी को पार करके स्कूल पहुंचने के लिए शिक्षक ट्रकों के बड़े से ट्यूब पर सवार होकर आना-जाना कर रहे हैं। अगर समय पर न पहुंच पाएं, तो ई-हाजिरी नहीं लग पाएगी। बहुत सी दूसरी जगहों पर शिक्षक बिना किसी लाईफ बेल्ट के खतरनाक नावों में नदी पार करते हैं, और छत्तीसगढ़ के बस्तर से भी ऐसी खबरें आती हैं। इससे कुछ अधिक खतरनाक खबर बिलासपुर जिले से आई है जहां स्कूल से घर लौटते तीन छोटे-छोटे भाई-बहन एक नदी का एनीकट पार करते हुए पानी में बह गए, और तलाश में उनकी लाशें मिल जाने के बाद उनकी अंतिम संस्कार हुआ। सात-आठ बरस के ये भाई-बहन नदी पर बने ढांचे को कूद-कूदकर पार कर रहे थे कि अचानक आई एक लहर में वे बह गए। 

देश भर में स्कूलों की हालत को लेकर कॉकरोचों ने एक नई जागरूकता खड़ी की है। राजस्थान, और यूपी ने औपचारिक आदेश निकालकर किसी भी बाहरी व्यक्ति का स्कूल दाखिला बंद कर दिया है, कहीं-कहीं तो ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखाई जा रही है जो कि स्कूलों की बदहाली को उजागर करने के लिए वहां जाकर देख रहे हैं, या वीडियो बना रहे हैं। पांच-दस लोगों के जेल चले जाने से इस मुद्दे के झाग नहीं बैठ जाएंगे, बल्कि वे उफनते ही रहेंगे, मानसूनी बारिश में उफनती हुई नदी की तरह। जिस आंदोलन से सरकारों को सबक लेना था, उस आंदोलन को कुचलने से बच्चों के माँ-बाप, और खुद बच्चे तो चुप नहीं बैठ जाएंगे। मध्यप्रदेश का ही बताया जा रहा एक वीडियो आया है जिसमें किसी सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन कर रही छोटी-छोटी बच्चियों को महिला पुलिस उठाकर ले जा रही है, और बच्चियां इतनी छोटी हैं कि एक छोटी सी महिला सिपाही भी अकेले ही बच्ची को गोद में उठाकर गाड़ी में पहुंचा रही है। अब अगर किशोरावस्था में पहुंचने के पहले बच्चे आंदोलन में पहुंचने लगे, तो देश में संभावित आंदोलनकारियों की गिनती एकदम से दुगुनी हो सकती है। 

खैर, आंदोलन तो जिस तरह, जिस तरफ, जिस हद तक बढऩे हैं, वे बढ़ेंगे। लेकिन आज एक दूसरी बात लग रही है कि अगर देश के बहुत से प्रदेशों में स्कूलों की ऐसी बदहाली है, कुछ जगहों की तो यह खबर है कि वे स्कूल मौजूद ही नहीं हैं, और सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं, कुछ जगहों पर आसपास के गांव के आदिवासी गिरती हुई स्कूली इमारत से अपने बच्चों को बचाने के लिए बाहर खुली जगह में बांस का शेड बना रहे हैं, ताकि उनके बच्चे किसी छततले न दबें, और पढ़ सकें। कहीं-कहीं पर बांस से कोई पुल बनाया जा रहा है। यह बात जाहिर है कि जलवायु परिवर्तन के चलते हुए अब बहुत तेज बारिश कभी भी आ सकती है, और कुछ घंटों के भीतर ही नदियां ऐसी उफन सकती हैं कि स्कूल गए हुए बच्चे लौट न सकें। इसलिए सरकारों को बिना शर्मिंदगी महसूस किए सबसे पहले हकीकत को जानकर, और मानकर बारिश में पढ़ाई का वैकल्पिक इंतजाम करना चाहिए। हम इस नौबत को बहुत ही खतरनाक मानते हैं कि नदी-नाले पार करके बह जाने का खतरा उठाकर शिक्षक-शिक्षिकाएं, और बच्चे स्कूल तक पहुंचें। पूरी तरह से भीगे हुए लोग किस तरह पढ़ और पढ़ा सकते हैं? और क्या यह उनकी सेहत के लिए ठीक भी है? 

अब भारत की एक दिक्कत यह है कि इसके बहुत बड़े हिस्से में कुछ महीने भयानक गर्मी के रहते हैं, और इन महीनों में बच्चों की स्कूलों को बंद ही कर देना पड़ता है। कुछ महीने बेतहाशा बारिश के हो गए हैं। और ठंडे प्रदेशों में सबसे अधिक सर्द कुछ महीने बर्फीले होते हैं, उनकी अपनी अलग दिक्कत होती है। ऐसे में क्या पूरे देश के लिए एक स्कूली कैलेंडर मुमकिन हो सकता है? आज राष्ट्रीय स्तर पर जितने स्कूली इम्तिहान होते हैं, और स्कूली परीक्षाओं के बाद जितने आगे के दाखिला इम्तिहान होते हैं, क्या वे पूरे देश के लिए एक साथ सचमुच किए जा सकते हैं, या फिर पढ़ाई के महीनों में, और इम्तिहान के महीनों में फेरबदल भी होना चाहिए? नीट इम्तिहान के तनाव को देखते हुए हाल ही में यह चर्चा भी हुई थी कि इसे साल में एक बार करने के बजाय दो बार करना चाहिए, ताकि बच्चों पर दबाव कम पड़े, और एक बार में बहुत अधिक संख्या इम्तिहान में न बैठने पर उसमें भ्रष्टाचार भी शायद घट सके। ऐसी सिफारिश एक कमेटी ने सरकार को की है, लेकिन हम इसमें भ्रष्टाचार की कमी की संभावना नहीं देखते क्योंकि लोग कितने भी कम हों, पर्चा खरीदने वाले लोग लाखों में तो लगते भी नहीं हैं, कुछ हजार लोगों को बेचने से भी पेपर आउट करने वालों का धंधा चल जाता है। 

भारत में सरकारों को यह सोचना चाहिए कि जब न स्कूली इमारतों का ढांचा ठीक है, न ही आने-जाने के लिए पुल-पुलिया का कोई ठीक इंतजाम हैं, तो बारिश के दिनों में भीगे हुए दिन भर बिठाकर, जान पर खेलकर ऐसी पढ़ाई करवाना ठीक नहीं है। खबरों में तो मौत, या हादसों के ही आंकड़े आते हैं, खबरों में भीगने से बीमार होने वाले बच्चों या शिक्षकों के आंकड़े तो आते नहीं हैं। फिर अभी एमपी के समाचार में सिर्फ चड्डी पहनकर ट्यूब पर बैठकर नदी पार करना पुरूष शिक्षकों के लिए तो मुमकिन है, शिक्षिकाएं तो इस तरह से नहीं आ-जा सकतीं, और लड़कियों के लिए भी भीगे कपड़ों में दिन भर बैठना एक अलग किस्म की शर्मिंदगी हो सकती है, होती ही होगी। इसलिए सरकारों को खुले दिमाग से, बिना झिझक यह तय करना चाहिए कि बारिश के ऐसे दिनों में, हफ्तों, और महीनों में क्या किया जाए? और लाख रूपए का यही सवाल गर्मियों में अंधाधुंध अधिक गर्म होने वाले हफ्तों पर भी लागू होता है कि उन दिनों स्कूलें नहीं लग सकतीं, उतनी धूप में आना-जाना नहीं हो सकता, तो वैकल्पिक पढ़ाई क्या हो सकती है? देश की राजधानी दिल्ली, और उसके आसपास के सैकड़ों किलोमीटर के इलाकों में ठंड में प्रदूषण जिस तरह हवा को जहरीला कर देता है, उसमें भी वहां दिक्कत होती है, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको। हर राज्य को अपने स्तर पर मौसम की सबसे बुरी मार के हफ्तों में स्कूली पढ़ाई का विकल्प ढूंढना ही होगा। क्या इसके लिए ऐसे वक्त घर रहकर पढऩे का कोई जरिया निकल सकता है? 

भारत स्कूलों की बदहाली देख रहा है, खासकर उत्तर भारत के प्रदेशों, हिन्दी प्रदेशों में बहुत बुरा हाल है। तिलचट्टों को रोक देने से सच्चाई छुपने नहीं जा रही। अब तो स्कूली बच्चे खुद भी सडक़ों पर आने लगे हैं, और गोद में उठाकर पुलिस लॉरी तक ले जाने लायक छोटी बच्चियां भी जब सडक़ पर आंदोलन कर रही हैं, तो किसी स्कूल को अपनी बदहाली दर्ज कराने मोबाइल कैमरे लिए हुए तिलचट्टों की अधिक जरूरत भी नहीं है। सरकारें इस सच को मानें कि उनकी स्कूलें किस खराब हाल में हैं। समस्या को माने बिना समाधान शुरू नहीं हो सकता। इसके बाद सरकारें यह समझ लें कि स्कूली पीढ़ी अब आंदोलन करना जान चुकी है, वह अब मानो यह कह रही है- छोटा बच्चा जान के हमको न बहलाना रे...

(Daily Chhattisgarh)   

परमाणु छतरीतले एकजुट होते मुस्लिम देशों से खतरा कम नहीं

23 अगस्त 2026

दुनिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई ऐसी घटनाएं या बातें होती हैं जिन पर बारीकी से नजर रखना जरूरी रहता है। आज भी एक बीज रहती हैं, और आगे चलकर जाने किस दिन खाद-पानी पाकर, किसी खास मौसम में वे जमीन फोडक़र पौधे में तब्दील हो जाएं, और वक्त के साथ पेड़ बन जाएं। पाकिस्तान, सऊदी अरब, और तुर्की के बीच पिछले दिनों मक्का में जो फौजी समझौता हुआ, उसके मुताबिक इनमें से किसी एक देश पर हुए हमले को ये तीनों देश अपने पर हुआ हमला मानेंगे। लोगों को याद होगा कि योरप और अमरीका वाले नाटो की भी कुछ इसी तरह की संधि है कि उनमें से किसी एक पर हमले को सारे नाटो देश अपने पर हमला मानेंगे, और इसीलिए रूस इस बात पर अड़ा हुआ है कि यूक्रेन नाटो का सदस्य न बने। यूक्रेन पर रूस के हमले की बुनियादी वजह यही है कि वह अपनी सरहद से लगकर एक और नाटो देश नहीं चाहता, और यही वजह है कि बाकी नाटो देश एक गैरसदस्य यूक्रेन की इतनी फौजी मदद कर रहे हैं कि पांच बरस बाद भी वह रूस के मुकाबले टिका हुआ है। 

अब अगर तीन देशों के बीच यह मक्का समझौता हुआ है, तो इसके पीछे की कुछ बुनियादी बातों को समझना जरूरी है। और समझौते के कुछ हफ्ते बाद अब इस पर लिखना कुछ अधिक जरूरी इसलिए हो चला है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सहयोगी हुमायू कबीर ने एक समाचार एजेंसी से कहा है कि मक्का समझौते के इन तीन देशों के साथ आर्थिक, या फौजी ढांचे में शामिल होने की संभावनाओं पर बांग्लादेश सकारात्मक रूख रखता है। इन तीन देशों के बीच समझौते की जगह पर भी गौर करना जरूरी है कि वह मक्का में हुआ है जो कि मुस्लिमों के लिए पूरी दुनिया में सबसे पवित्र धार्मिक जगह मानी जाती है। दूसरी बात यह कि ये मुस्लिम देश इजराइल के खिलाफ अलग-अलग समय पर अलग-अलग बातें कह चुके हैं। बांग्लादेश ने अभी-अभी भारत का प्रस्तावित और घोषित दौरा रद्द किया है, और सऊदी अरब के दौरे के बारे में कहा गया है। 

भारत ने फिलहाल इतना ही कहा है कि वह पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। दुनिया के बहुत से विश्लेषकों का यह मानना है कि यह फौजी समझौता सीधे-सीधे भारत के खिलाफ न होने पर भी पाकिस्तान को बहुत मजबूत बनाने वाला है क्योंकि इन तीनों देशों में से वही अकेला परमाणु हथियार संपन्न देश है, बल्कि वह दुनिया का अकेला परमाणु हथियार वाला मुस्लिम देश है। यह समझौता इजराइल की फिक्र को बढ़ाने वाला है, क्योंकि दुनिया के इस हिस्से में अब इजराइल के मुकाबले किसी और देश के पास परमाणु बम चाहे न हो, परमाणु ताकत वाले देश के साथ तुर्की, और सऊदी अरब का यह फौजी समझौता तो हुआ ही है। बांग्लादेश अगर आगे-पीछे इसमें और जुड़ जाता है, तो यह इस्लामिक नाटो बनने की दिशा में एक और कदम हो सकता है। 

यह पूरा सिलसिला दुनिया में एक ऐसे वक्त हो रहा है जब अमरीका मध्य-पूर्व के देशों में अपनी सुरक्षा गारंटी पर खरा नहीं उतर रहा है। ईरान के साथ जंग में अमरीका ऐसा बुरा फंसा है कि उसके हमलों के जवाब में ईरान अड़ोस-पड़ोस के उन तमाम देशों पर फौजी हमले कर रहा है जहां पर अमरीकी फौजी ठिकाने हैं, या जहां से अमरीकी फौजी विमान उड़ान भर रहे हैं, जहां से मिसाइलें छोड़ी जा रही हैं। लोगों को यह समझ आ गया है कि अमरीका ने इस पूरे इलाके के देशों से किसी सलाह-मशविरे के बिना सिर्फ इजराइल के झांसे में आकर, उसके उकसावे को मानकर ईरान पर एक ऐसा हमला कर दिया है जिसे खत्म कर पाना या छोड़ पाना उसके बस के बाहर है। नतीजा यह है कि ईरान के हमलों से जख्मी बाकी पेट्रोलियम-गैस से मोटी कमाई करने वाले देश ईरानी मिसाइलें झेल रहे हैं, और अमरीका झूठे-बावले दावे करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है। जिस तरह योरप के देश, और पूरे का पूरा नाटो आज अमरीका के बिना अपनी पूरी ताकत खड़ी करने में लगा हुआ है, कुछ उसी तरह मध्य-पूर्व के देश अब अमरीका से परे अपने फौजी पांवों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मक्का को मानने वाले तमाम मुस्लिम देशों के एक साथ आने की एक कागजी संभावना तो बनती ही है। 

आज यह सवाल भी उठ रहा है कि अमरीका और ईरान के बीच बातचीत के कई दौर पाकिस्तान ने मध्यस्थता करते हुए पूरे करवाए। इन दोनों ही देशों ने पाकिस्तान के योगदान को माना, यह एक अलग बात है कि पाकिस्तान में तय हुआ युद्धविराम कायम नहीं रह पाया, लेकिन इनमें से किसी देश ने पाकिस्तान पर कोई तोहमत नहीं लगाई है। इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता भी न देने वाले पाकिस्तान को अमरीका ने अपने हाल के बरसों की सबसे नाजुक जंग में जिस तरह, और जिस हद तक इस्तेमाल किया, उसे भी पाकिस्तान का एक बढ़ा हुआ महत्व माना जा रहा है। भारत के साथ हमदर्दी रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का भी यह कहना है कि फिलीस्तीन पर इजराइली हमलों के पूरे दौर में पाकिस्तान खुलकर बोलता रहा, और भारत इजराइल के साथ खड़े रहा। इस वजह से भी मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान की एक नई जगह बनी। इसी तरह तुर्की भी खुलकर इजराइल के खिलाफ आज भी खड़ा हुआ है, और उसने भी मुस्लिम दुनिया में एक फौजी ताकत की जगह बना ली है। सऊदी अरब की आर्थिक ताकत को तो सब लोग जानते ही हैं। ऐसे में यह गठबंधन परमाणु हथियार, दूसरे आधुनिक हथियारों वाले तुर्की, और सऊदी संपन्नता का एक ताकतवर गठजोड़ है। दुनिया के दूसरे भी कुछ मुस्लिम देशों में इजराइल की बढ़ती हुई विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ चाहे-अनचाहे नाराजगी बढ़ रही है। आज हालत यह है कि ब्रिटेन, कनाडा, और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोग इजराइल की बढ़ती बस्तियों के खिलाफ सार्वजनिक बयान जारी कर रहे हैं। ऐसे में मुस्लिम देशों को शर्म खाकर भी इजराइल के खिलाफ जुबानी जमा-खर्च तो करना ही होगा। फिर मक्का समझौते के तीन देशों के साथ जुडऩे से बाकी मुस्लिम देशों को भी परमाणु हथियारों की एक छतरी हासिल हो सकेगी। 

इससे इजराइल तो तुरंत अपने पर एक खतरा महसूस करेगा, लेकिन भारत को लेकर भी कुछ विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब भारत पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर जैसा हमला उसी आसानी के साथ कर सकेगा? क्या ऐसी कोई फौजी कार्रवाई करने से पहले उसे मक्का समझौते के बाकी दो देशों के साथ बात नहीं करनी होगी? और क्या उस बात का कोई असर उन दो देशों पर होगा जिन्होंने परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान के साथ एक लिखित औपचारिक फौजी समझौता किया है? यह भी समझना होगा कि आज जिस तरह बांग्लादेश की एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण ली हुई है, और बांग्लादेश उन्हें मौत की सजा सुनाकर वापिस भेजने की मांग कर रहा है, इससे भी भारत और बांग्लादेश के बीच अभी एक बड़ा तनाव बना हुआ है। 

मुस्लिम देशों के मक्का समझौते, मुस्लिम-विरोधी इजराइल से पूरी दुनिया की बढ़ती शिकायतें, अमरीका और इजराइल की बीते दशकों से किसी न किसी मुस्लिम देश पर हमले का रिकॉर्ड, इन सबको देखते हुए अगर चाहकर, या मजबूरी में मुस्लिम देश पाकिस्तान की परमाणु छतरीतले एकजुट हो रहे हैं, तो इस बात को गौर से देखा जाना जरूरी है।

(Daily Chhattisgarh)  

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त 2026