बेटी-बेटे और पिताओं में उलझा कानूनी मामला...

26 सितंबर 2026  

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने अभी यूपी की एक महिला कलेक्टर पर एक आंदोलनकारी छात्रा को गलत तरीके से बंद करने के खिलाफ 5 लाख रुपए का निजी जुर्माना लगाया था। इसके बाद यूपी सरकार ने कहा था कि वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। यह तो किसी भी सरकार, या नागरिक का हक रहता है कि वे ऊपरी अदालत का विकल्प रहने तक अपील करते रहें, इसलिए इसमें अटपटा कुछ नहीं था। फिर सुप्रीम कोर्ट में इस चुनौती में कलेक्टर की तरफ से भारत सरकार के सबसे बड़े वकील खड़े हुए। यहां से लोगों को कुछ खटकना शुरू हुआ, क्योंकि हाईकोर्ट ने फैसला तो कलेक्टर के खिलाफ व्यक्तिगत जुर्माने का दिया था। फिर कुछ ऐसा हुआ जो बड़ा अटपटा था। सुप्रीम कोर्ट के रीति-रिवाजों के मुताबिक यह मामला सुनवाई के लिए एक ऐसी महिला जज के सामने जाना था जो कि अपनी कडक़मिजाजी के लिए जानी जाती हैं। जाने किन वजहों से चीफ जस्टिस ने इस मामले को एक दूसरे जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में भेजा। लोग गौर से देखने लगे कि ऐसा क्यों किया गया। फिर जब इस अदालत में इस महिला कलेक्टर के मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो जज ने माइक्रोफोन बंद करवा दिए। आज जब सुप्रीम कोर्ट तमाम किस्म के महत्वपूर्ण मामलों में भी कैमरे शुरू रखवाता है, तब इस एक मामले में माइक्रोफोन बंद करवाना बड़ा ही अटपटा था, क्योंकि यह मामला न किसी बच्चे, या नाबालिग से जुड़ा हुआ था, न ही किसी सेक्स-अपराध का था, न ही किसी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। फिर अदालत का यह फैसला आया कि हाईकोर्ट ने महिला कलेक्टर पर जो टिप्पणी की है, और जो जुर्माना लगाया है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया। देश के जो लोग एक आंदोलनकारी लडक़ी के खिलाफ जिला प्रशासन की नाजायज दिखती कार्रवाई के खिलाफ मुखर थे, वे हक्का-बक्का रह गए। लेकिन अदालत तो अदालत है, आज की तारीख में तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट का स्थगन लागू हो चुका है, आगे की सुनवाई जब होनी होगी, तब होगी।

अब पर्दे के पीछे की जानकारियां निकलकर सामने आ रही हैं, और चीख-चीखकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। यह बात तो पहले से सामने आ चुकी थी कि यह महिला कलेक्टर देश के भयानक चर्चित और विवादास्पद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने नियमित प्रक्रिया से परे जाकर जिन जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में इस मामले को भेजा था, उनका एक वकील बेटा चुनाव आयोग का वकील है, वह सरकार के सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज, और आयकर विभाग का भी स्थायी वकील है। दूसरी दिलचस्प बात यह सामने आई कि जस्टिस शर्मा का छोटा बेटा जो कि 2020 में ही वकील बना, वह मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग का स्थायी वकील है। अब सवाल यह उठता है कि केंद्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार के विभागों का वकील बेटा, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार के राज में पीएससी का वकील दूसरा बेटा, ये अपने आपमें जज के विवेक पर कुछ सवाल उठाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह उठता है कि जिस मुख्य चुनाव आयुक्त के चुनाव आयोग में जस्टिस शर्मा का बेटा स्टैंडिंग काउंसिल है, उसी मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी की अपील ये जज साहब सुन रहे हैं। हम कानून के बहुत बड़े जानकार नहीं हैं, लेकिन अदालत में इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए भी दिखना चाहिए, इस सदियों पुरानी सोच को याद रखने के लिए हमें किसी रॉकेट साइंस के फॉर्मूले को याद नहीं रखना पड़ता। यह तो बहुत मामूली सी समझ-बूझ की बात है कि इंसाफ करने की कुर्सी पर जिन्हें बिठाया गया है वे किसी भी लाग-लपेट, किसी भी तरह के हितों के टकराव से पूरी तरह बचे रहें। कई जज तो ऐसे रहते हैं जो कि किसी मामले की सुनवाई से सिर्फ इसलिए मना कर देते हैं कि उसमें एक वकील ऐसे हैं जो कि किसी वक्त जज के जूनियर रहे हुए हैं। रिश्तेदारी तो बहुत दूर की बात रहती है, जरा सा भी जुड़ाव होने से जजों की नैतिकता यही मांग करती है कि वे अपने-आपको मामले से अलग कर लें। यहां पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा अपने दो वकील बेटों के सरकारों, और खासकर चुनाव आयोग से रिश्ते के बाद भी इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं, यह बहुत हैरानी की बात है।

इस मामले से लोगों को यह भी याद पड़ा कि अभी हाल ही में जब चुनाव आयुक्तों के चयन को लेकर एक मामला सुप्रीम कोर्ट में चला था, तो उस बेंच में भी यही जस्टिस शर्मा भी थे, और यह उनकी राय थी कि इस मामले को संविधान पीठ को दे दिया जाए। जबकि बेंच के दूसरे जज, जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय अलग थी। मतलब यह कि आज चुनाव आयोग जितने किस्म के विवादों से घिरा हुआ है, जिनमें यह भी शामिल है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया सही है, या नहीं, वह मामला निपटने के बजाय एक संविधान पीठ को चले गया, और संविधान पीठ की लंबी प्रक्रिया जानने वाले लोगों का यह कहना है कि यह अब अगले मुख्य न्यायाधीश का इंतजार करेगा, और दिलचस्प बात यह है कि अगले संभावित मुख्य न्यायाधीश को लेकर कुछ और किस्म की जानकारियां सामने आ चुकी हैं। हम किसी जज की नीयत पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत को अपने आचरण को लेकर नैतिकता के जिन सबसे ऊंचे पैमानों पर चलना चाहिए, उनकी बात तो आज भारत में इंसानों से लेकर कॉकरोच तक सभी कर रहे हैं।

कानून के समाचार-विचार देने वाली वेबसाइटों ने यह लिखा है कि ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम का मामला जस्टिस शर्मा की बेंच को भेजने से कुछ बड़े असुविधाजनक सवाल उठ खड़े हुए हैं। जस्टिस शर्मा की बेंच इस मामले को सुनने के लिए नियमित रोस्टर पर नहीं थी। दूसरी तरफ इस मामले से जुड़े हुए कुछ दूसरे मामले सुप्रीम कोर्ट की ही एक जज, जस्टिस नागरत्ना सुन रही थीं। ऐसे में आमतौर पर होता यही है कि संबंधित मामलों को पहले से सुन रहे, या सुन रही जज को ही यह नया मामला दे दिया जाता। इसलिए जब ज्ञानेश कुमार की बेटी का मामला, चुनाव आयोग के वकील के जज पिता की बेंच को दिया गया, तो लोगों के दिमाग में एक बहुत स्वाभाविक सा संदेह उठना जायज था। फिर मानो संदेह में कोई कसर रह गई हो, तो जस्टिस शर्मा ने सुनवाई के दौरान अदालत का माइक्रोफोन बंद करवा दिया, मानो यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ कोई मुद्दा हो। लेकिन कहानी इसके और आगे तक बढ़ती चली गई। चुनाव आयोग से लेकर आयकर विभाग तक, और मध्यप्रदेश पीएससी तक की वेबसाइटों पर वकीलों के नाम दर्ज हैं, उन्होंने कब वकालत शुरू की यह दर्ज है, और वे किसके बेटे हैं, यह भी सार्वजनिक जानकारी में अच्छी तरह स्थापित है। हालांकि संदेह का लाभ देते हुए हम यह जरूर कहना चाहेंगे कि जस्टिस शर्मा ने इस मामले से जुड़े हुए लोगों से, अपना रिश्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा था या नहीं, यह अभी खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन अगर ऐसा कोई खुलासा आगे जाकर होता भी है, तो भी यह बात तो है ही कि इतनी रिश्तेदारी के बाद भी उन्होंने यह मामला सुना।

हमें यह पक्का मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट के जज बनने तक हर किसी को दर्जनों, या सैकड़ों बार यह बात पढऩे और सुनने मिल चुकी रहती है कि इंसाफ न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। सैकड़ों बरस पुरानी इस बात की एक दूसरी मिसाल यह भी है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह बात तो शेयर मार्केट के नियम-कायदे लागू करने वाली संस्थाओं तक में सुनाई देते रहती है कि वहां दर्ज हर कंपनी को अपने रिश्तों के बारे में सेबी जैसी संस्था को जानकारी देना चाहिए। अभी तो छत्तीसगढ़ सरकार ने एक ऐसा आदेश निकाला है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने परिवार के किसी सदस्य को अपना प्रतिनिधि नहीं बना सकते। इस तरह नैतिकता और पारदर्शिता सार्वजनिक जीवन में कोई दुर्लभ पशु नहीं हैं, उन पर चलन की पुरानी परंपरा रही है, और जिन लोगों को वकालत, या अदालत की जानकारी नहीं भी है, वे लोग भी इन बातों को अच्छी तरह समझते हैं। ऐसे में ज्ञानेश कुमार की बेटी का यह मामला नैतिकता और पारदर्शिता के बुनियादी पैमानों में ही उलझ गया है, और हमारा तो अंदाज यह है कि इससे इस नौजवान महिला आईएएस का नफा कम, नुकसान अधिक हुआ है। 5 लाख रुपए का जुर्माना पटाने से मिली एक अस्थायी और तात्कालिक राहत उतना अधिक मायने नहीं रखती, जितना मायने यह विवाद रखता है, और सुप्रीम कोर्ट में आगे अगर इस मामले को कुरेदा जाएगा, तो वहां इस महिला अधिकारी का नुकसान ही अधिक होगा। ऐसा लगता है कि सत्ता की बेहिसाब ताकत कई लोगों से बददिमाग और बेदिमाग फैसले करवा देती है, लेकिन ये फैसले पूरी जिंदगी खड़े नहीं रह पाते। सरकार से लेकर अदालत तक की सत्ता बदलती रहती है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

भाजपा सांसद की पत्नी का सफर हराम कर दिया डिब्बे के दर्जनों अधेड़ मुसाफिरों ने!

25 सितंबर 2026  

 

कर्नाटक के मुखर नौजवान भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी ने अभी अपने एक ट्रेन सफर को लेकर रेलवे से शिकायत की, और सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात लिखी। शिवश्री ने लिखा कि जिस डिब्बे में वो सफर कर रहीं थीं उसमें करीब 40 अधेड़ पुरूष थे जो कि पूरे समय जोर-जोर से बातचीत और हंसी-मजाक करते रहे। फिर इनमें से कोई एक कार्ड-गेम खेलते रहे और उस पर हल्ला करते रहे। वे फिल्मी गाने भी गाने लगे, और 5 घंटे तक इतना हल्ला-गुल्ला झेलना उनके लिए भारी पड़ा। उन्होंने इसके बारे में रेल अधिकारी से शिकायत करके दूसरे डिब्बे में सीट मांगी, लेकिन वह नहीं मिल पाई। तब उन्होंने सोशल मीडिया पर खुलासे से अपनी तकलीफ के बारे में लिखा है। चूंकि यह भाजपा के एक बहुत चर्चित सांसद की पत्नी का लिखा हुआ है, इसलिए यह भी नहीं माना जा सकता कि यह केंद्र सरकार की ट्रेन की एक बद्इंतजामी के बारे में राजनीतिक साजिश के तहत लिखा गया हो।

यह हाल हिंदुस्तान की अधिकतर सार्वजनिक जगहों का रहता है जहां पर लोग अपने नाजायज अधिकारों को लेकर गुंडागर्दी की हद तक तैयार रहते हैं, और बाकी लोगों के जायज अधिकारों को कुचलना भी अपना हक समझते हैं। किसी भी सार्वजनिक जगह पर दो-चार लोग भी अगर जुट जाते हैं, तो वे जानवरों के किसी रेवड़ से भी अधिक बुरे हो जाते हैं। जानवरों के रेवड़ जोर-जोर से हंसते, चीखते, ट्रेन के डिब्बों में दारू पीते, या जुआं खेलते नहीं दिखते। वे खेलते भी नहीं। वे बस अधिक से अधिक इतना करते हैं कि बारिश से भीगी हुई मिट्टी में जब सडक़ किनारे बैठना मुमकिन न हो, तो वे सूखी सडक़ पर मजबूरी में बैठते हैं और आए दिन गाडिय़ों से कुचलकर खत्म भी हो जाते हैं। इंसान तो किसी मैदान, या बगीचे में बैठकर जब एक साथ जोर-जोर से हंसने का काम करते हैं, तो आसपास के लोगों का जीना हराम हो जाता है। जब रातभर पढ़ाई करने के बाद बच्चे सुबह-सुबह कुछ नींद करना चाहते हैं, तब उनके घर के आसपास इंसान इस कदर चीख-पुकार मचा देते हैं कि न नींद मुमकिन रहती, न बच्चों और बूढ़ों का आराम मुमकिन रहता। हम अपने आसपास के कई ऐसे बगीचे देखते हैं जहां सुबह घूमने, योग, या कसरत करने गए हुए लोगों को अनदेखा करके लोगों का एक जत्था लाउडस्पीकर लगाकर किसी धर्म का शोर करने लगता है, माइक पर चीखने लगता है।

फिर दुनिया के कई देशों के ऐसे वीडियो लगातार आते ही रहते हैं जहां लोकल ट्रेन, बस, ट्राम के भीतर, या फिर एयरपोर्ट जैसी जगह पर गए हुए हिंदुस्तानी सैलानियों के जत्थे भारत की किसी धुन को बजाते हुए समूह नृत्य करने लगते हैं। डिब्बों में उनके साथ बैठे हुए लोगों का जीना हराम हो जाता है, और उन विदेशियों के चेहरों पर खीझ और हिकारत साफ दिखती रहती है, लेकिन एक बड़े जत्थे के सामने वे अकेले कुछ नहीं कर सकते, फिर चाहे वे अकेले अपने देश में क्यों न हों, और ऐसे जत्थे परदेशी ही क्यों न हों। अभी एक भारतीय विमान में जिस तरह से एक साथ सफर कर रहे मुसाफिरों ने पूरे प्लेन में अपने लोगों को जिस तरह से खाना खिलाया, उससे विमान के बाकी मुसाफिर हक्का-बक्का रह गए, कर्मचारियों ने इस जत्थे को रोकने की कोशिश की, लेकिन दर्जनों लोगों के साथ गिने-चुने विमान कर्मचारी भी कितना लड़ सकते थे? बाद में यह खबर आई कि इन सारे मुसाफिरों को उस एयरलाइंस ने ब्लैकलिस्ट में डाल दिया है, यानी अगले कुछ महीनों तक वे उस कंपनी के विमानों पर सफर नहीं कर सकेंगे। जब किसी ट्रेन में किसी धार्मिक यात्रा के लोग चलते हों, कोई बारात चल रही हो, और तो और बड़ी संख्या में पुलिस, या सेना, या अर्धसैनिक जवान चल रहे हों, तो वे बाकी मुसाफिरों से जैसा चाहे वैसा बुरा बर्ताव कर सकते हैं। इसके अलावा भी जहां कहीं सैलानियों का जत्था जरा सा बड़ा होता है वे तमाम जगहों पर अपना मालिकाना हक सा दिखाने लगते हैं। अभी एक ट्रेन का वीडियो सामने आया था जिसमें ऊपर की बर्थ पर बैठा हुआ एक आदमी वहां अपने ईष्टदेव की फोटो सामने रखकर दीया जलाकर, घंटी बजाकर पूजा कर रहा है, और जब आसपास के लोग उसे डिब्बे में दीया जलाने के लिए मना कर रहे हैं, तो उसके कानों में मानो आपत्तियां पड़ ही नहीं रही हैं। इसी तरह मुंबई की लोकल ट्रेन में गणेश के मौके पर एक डिब्बे में प्रतिमा ही स्थापित कर दी जाती है, और चलती ट्रेन में सैकड़ों मुसाफिर आरती गाते रहते हैं, घंटी, मंजीरा, और ढोलक बजाते रहते हैं। अभी एक नया नजारा और देखने मिला जब एक चलती ट्रेन में एक मुसाफिर डिब्बे के भीतर ऊपर की बर्थ पर देवी प्रतिमा को स्थापित कर दिया गया था, और लोग पूरी धूमधाम से पूजा करने में लगे हुए थे। ऐसे ही कई और वीडियो भी है जिनमें किसी धर्म, या आध्यात्मिक संगठन के किसी प्रमुख व्यक्ति के सफर करने पर रेल डिब्बों के भीतर भजन-कीर्तन होने लगते हैं। यह कल्पना इनमें से किसी को परेशान नहीं करती कि इन्हीं डिब्बों में कोई बीमार भी सफर कर रहे होंगे, जिन्हें इलाज के लिए कहीं ले जाया जा रहा होगा, और उनका पता नहीं क्या हाल होगा।

हिंदुस्तानियों में, यहां के अधिकतर लोगों में सार्वजनिक जीवन में जीने का शऊर नहीं है। और यह दूसरे प्रदेशों में, दूसरे देशों में जाकर और खटकने लगता है। भारत के भीतर तो लोग धर्म, राजनीति, जाति-संगठन, आध्यात्मिक संस्थाओं की अराजकता को देखने के आदी हो ही गए हैं। कई जगहों पर सडक़ों पर एंबुलेंस फंस जाती हैं, और मरीज मर भी जाते हैं। कई जगहों पर इस कदर शोरगुल होता है कि लोग मर जाते हैं। सार्वजनिक जगहों पर दूसरों के हक का, और अपनी जिम्मेदारी का सम्मान करने के लिए लोगों के भीतर सभ्यता की जरूरत रहती है, जो कि आत्मगौरव से लबालब इस हिंदुस्तान में बहुत ही कम दिखती है। लोग आसपास महिलाओं की मौजूदगी, बच्चों के मौजूद रहने को अनदेखा करते हुए गालियों की जुबान में बात करते हैं, धक्का-मुक्की करते हैं। हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें साथ घूमते हुए बालिग, या नाबालिग लडक़े-लड़कियों पर आसपास के जत्थे यौन हमले कर रहे हैं, उन्हें पीट रहे हैं, और उनके वीडियो भी बना रहे हैं। इन दिनों अपने ही जुर्म के वीडियो बनाने का चलन खासा चला हुआ है क्योंकि बहुत से लोगों को यह लगता है कि उनका यह काम उनकी ताकत का एक सुबूत है। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो सार्वजनिक जगहों पर किसी कर्मचारी को खंभे से बांधकर पीटते हैं, तो अभी उत्तर भारत में कहीं पर बिजली चोरी पकडऩे के लिए गए हुए बिजली कर्मचारी को पूरा गांव मिलकर पीट रहा था, और इसके वीडियो भी बना रहा था। हिंदुस्तान में अब ऐसा लगने लगा है कि वीडियो सुबूत से किसी को डर नहीं रह गया है, बल्कि उनको सिर्फ यह लगता है कि इस वीडियो को देखने वालों पर उनकी गुंडागर्दी चलती रहेगी।

हिंदुस्तानी एक राष्ट्र के रूप में भी दुनिया में कई जगह अपने देश का नाम डुबाने में लगे रहते हैं। अपनी जिस किसी संस्कृति पर इन लोगों को अपार गर्व रहता है, उसी संस्कृति के इस हिस्से के बारे में भी सोचना चाहिए कि क्या यह अपार शर्मिंदगी की वजह नहीं है? भारतीय संस्कृति को लेकर लोग कई बार हिंसक हो जाते हैं, ऐसे लोगों को हिंसा का उन्माद नीचे आने पर यह सोचना चाहिए कि वे एक राष्ट्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी की कौन-कौन सी हरकतें करते हैं, और उनसे उन्हें सिवाय एक हिंसक संतुष्टि के और क्या हासिल होता है?

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 25 सितंबर 2026



 

देहात से दिल्ली तक, लडक़ी-महिला की इज्जत तभी जब वह प्रतिमा हो...

24 सितंबर 2026  

 

इन दिनों जापान में चल रहे एशियाई खेलों की एक खबर है जिसकी हेडिंग दिल खुश करने वाली है। ‘75 साल के इतिहास में जो कभी नहीं हुआ, वो इन 3 बेटियों ने कर दिखाया’। एशियन गेम्स में भारत को निशानेबाजी के एक मुकाबले में स्कीट टीम इवेंट में पहली बार मैडल मिला है। इसके पहले स्कीट निशानेबाजी में अलग-अलग कुछ महिला खिलाड़ी मेडल पा चुकी हैं, लेकिन टीम के मैडल का यह पहला मौका था। इससे परे भी इन दिनों ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुकाबले नहीं होते हैं जिनमें भारत की लड़कियां और महिलाएं मैडल न लाती हों। अभी तो क्रिकेट से लेकर हॉकी तक, बड़े लोगों की टीम से लेकर जूनियर टीम तक जगह-जगह लड़कियां सोना-चांदी लेकर आ रही हैं। लेकिन इसी बीच देश के भीतर लड़कियों की जो आम हालत है, उस पर बराबरी का गौर करने की जरूरत है। अभी बिहार के जमुई में जिस तरह एक नाबालिग लडक़ी को भयानक हिंसा और यौन हमले का शिकार होना पड़ा, वह तो एक घटना थी जिसे ग्रामीण इलाके की कहकर टाला जा सकता है, और अगर आप बिहार में सत्तारूढ़ हैं तो आप इसे छोटी-मोटी कह सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में, जहां केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही एक ही पार्टी की हैं, जहां पर पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है, वहां शहर के बीचों-बीच एक मंदिर से लौटती नाबालिग कॉलेज छात्रा को पुलिस बनकर 3 लोगों ने बगीचे में रेप किया, और इसके बाद दिल्ली की कॉलेज छात्राएं जिस दहशत में हैं, वह गौर करने लायक है। दिल्ली के बीचों-बीच कालकाजी मंदिर में पूजा के लिए गई इस लडक़ी को पास के आस्थाकुंज पार्क में हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्मों के बलात्कारियों ने खुलेआम रेप किया। समाचार बताता है कि दिल्ली में इस महीने नाबालिग से रेप का यह तीसरा मामला है। अभी दस दिन पहले ही एक नाबालिग की गैंगरेप के बाद हत्या कर दी गई थी, उसके पहले 10 बरस की बच्ची का रेप हुआ था।

आज की खबर है कि ओडिशा के एक तीर्थ स्थान जाते हुए मोटरसाइकिल सवार एक पर्यटक दंपत्ति पर यौन हमला किया गया और उसका वीडियो बनाया गया। इसके दो दिन पहले से उत्तर भारत का एक वीडियो तैर रहा है, जिसमें मोटरसाइकिल पर पीछे साड़ी पहनकर बैठी एक महिला के बदन पर कई नौजवान टूटे पड़े हैं, कुछ कपड़ों में हाथ डाल रहे हैं, कुछ वीडियो बना रहे हैं। उत्तर भारत को बहुत से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटक केंद्र होने का गर्व रहता है, और ओडिशा तो एक पर्यटक राज्य है ही। इसके बाद भी अगर किसी भी बालिग या नाबालिग जोड़े पर, या अकेली लडक़ी-महिला पर ऐसे यौन हमले धड़ल्ले से जारी हैं, तो यह बात तय है कि ऐसी हर हिंसा इन प्रदेशों की पर्यटन संभावनाओं को घटाती चलेगी।

दिल्ली के बीचों-बीच एक छात्रा के साथ हुए गैंगरेप के बाद उस घने इलाके में रहकर पढ़ाई करने वाली 20 हजार छात्राएं दहशत में हैं। दिल्ली का एक प्रमुख कॉलेज, लेडी श्रीराम कॉलेज, ऐसी डरी लड़कियों के लिए ऑनलाइन क्लासेस ले रहा है, क्योंकि लड़कियों की बाहर निकलने की हिम्मत नहीं है। एक टीवी चैनल ने इस कॉलेज की बाहर की छात्राओं को उनके चेहरों सहित कैमरे पर इंटरव्यू किया तो उनका कहना था कि वे कॉलेज की दीवारों के भीतर ही सुरक्षित हैं, और जैसे ही वे बाहर निकलती हैं, कार सवार लोग उन्हें ले जाने के लिए मोल-भाव करने लगते हैं, सडक़ किनारे से शोहदे सीटियां बजाने लगते हैं और फिकरे कसने लगते हैं, और एक लडक़ी ने कैमरे पर इस बात को एक से अधिक बार कहा कि दिनदहाड़े सडक़ किनारे ऐसे लडक़े उन्हें दिखाकर हस्तमैथुन करते हैं। और यह पढ़ते हुए यह याद रखें कि यह दिल्ली है।

दिल्ली में देश के किसी भी दूसरे महानगर या उपमहानगर के मुकाबले अधिक अनुपात में पुलिस मौजूद है। महानगरों में यह अकेला है जहां पुलिस सीधे केंद्र सरकार के मातहत है। इस शहर में अंतरराष्ट्रीय आवाजाही और बसाहट हिंदुस्तान के किसी भी दूसरे महानगर के मुकाबले कई गुना अधिक है। देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए दिल्ली सबसे बड़ा केंद्र है। इसके बावजूद हाल यह है कि यहां बलात्कार की घटनाओं से परे भी लड़कियों के साथ बदसलूकी इस दर्जे की है। और यह कोई नई बात नहीं है। दिल्ली में बस और मेट्रो में सफर करने वाली लड़कियों और महिलाओं को यह मालूम है कि सफर पूरा होने के पहले कितने मर्दाने हाथ उन्हें टटोल चुके रहते हैं। दिल्ली से लेकर देश के गांवों तक महिलाओं का जो हाल है, वह बताता है कि कानून, लोकतंत्र, तथाकथित मानवता और महिला के प्रति सम्मान बहुत दूर तक खत्म हो चुका है। जिन लोगों को यह लगता है कि यह देश भारत माता माना जाता है, जगह-जगह देवी प्रतिमाओं की कई-कई दिन पूजा होती है, वहां पर महिलाओं को और किसी अतिरिक्त सम्मान की जरूरत क्या है? लेकिन दिक्कत यह है कि निर्जीव तस्वीर और प्रतिमाओं से परे जब अजन्मी या जन्मी लड़कियों या महिलाओं के साथ बर्ताव की बात आती है तो यह देश हिंसा में तालिबान को टक्कर देने लगता है। कहीं खेल संघों के पदाधिकारी लड़कियों का शोषण कर रहे हैं तो कहीं स्कूल शिक्षक ही अश्लील हरकतों में व्यस्त हैं। हमने आज की बात अंतरराष्ट्रीय खेल मुकाबलों में लड़कियों की कामयाबी से शुरू की थी, और वहां से भटकते हुए हम लड़कियों पर यौन हिंसा तक आ गए हैं। यह भटकाव सोचा-समझा है, और हम इस देश को याद दिलाना चाहते हैं कि लड़कियों को जितने तरह की हिंसा और जितने तरह के शोषण से गुजरना पड़ता है, उसे देखते हुए हैरानी होती है कि लड़कियां इतने मैडल कैसे ला पाती हैं। एक लडक़ी के रूप में जब वे लगातार खतरे में जीती हैं, तो कैसी दिमागी हालत में वे मुकाबलों में उतरती होंगी। देश की राजधानी एक बहुत बड़ी मिसाल रहती है, राजधानी को सबसे सुरक्षित माना जाता है, और वहां के सबसे नामी-गिरामी कॉलेज की लड़कियां जब घर से निकलने और कॉलेज जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहीं, तो खिलाड़ी लड़कियां भी तो ऐसे ही शहरों में खेल की तैयारी करते हुए आगे बढ़ती हैं। यह सिलसिला देश में एक परले दर्जे की अराजकता है। कहीं भीड़ की अराजक यौन हिंसा सामने आती है, तो कहीं दो-चार लोग भी मौका मिलते ही बलात्कार पर उतारू हो जाते हैं। हमारा यह भी मानना है कि यौन हिंसा की घटनाओं में से 10-20 फीसदी से अधिक की रिपोर्ट नहीं होती होगी, क्योंकि पुलिस भी शिकायतकर्ता महिलाओं से बदसलूकी के लिए बदनाम है।

किसी देश को अपनी संस्कृति पर गर्व हो सकता है, लेकिन ऐसे गर्व पर कुछ आत्ममंथन भी करना चाहिए, कुछ आत्मविश्लेषण करना चाहिए। जहां लड़कियां जुर्म और जुल्म के अंदेशे में जीती हों, उस देश को गर्व करने के लिए आईने में अपने को देखते हुए खासा मेकअप लगता होगा। समाज में लड़कियों को हिफाजत तभी मिल सकती है जब सरकारें उन पर होने वाले जुल्म और जुर्म को बड़ी कड़ी सजा दिला सकें, और अदालतें इसमें तेजी बरत सकें। आज तो हालत यह है कि जमानत पाकर बाहर निकले बलात्कारियों से अपमानित और उनकी दहशत में शिकायतकर्ता लडक़ी या महिला ही खुदकुशी कर रही हैं। इस गर्वीले देश को आईने के सामने जाते हुए पेशेवर मेकअप करने वालों से सहायता लेनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 24 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

अपने इर्द-गिर्द हलचल होने से ही जल्द जागता है सुप्रीम कोर्ट!

23 सितंबर 2026  

 

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव करवाने के लिए बनी केंद्रीय चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का हाल यह हो गया है कि वह संविधानेतर अंदाज में काम कर रही है, और उसे छूने से बचने की कोशिश करते चले आने वाले सुप्रीम कोर्ट को भी अब दिल्ली में आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठाने पड़े हैं। अब इस देश में एक भारत रत्न वैज्ञानिक, बहुत सारे पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित व्यक्ति, फौज के अनगिनत रिटायर्ड बहादुर अफसर और अब देश के विदेश मंत्री से लेकर जाने कितने ही जज और राजनयिक चुनाव आयोग में जाकर अपने आपको हिंदुस्तानी मतदाता साबित करने को मजबूर किए गए हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भी चुनाव आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का आरोप रहा है कि ऐन चुनाव के पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं को छांट-छांटकर मतदाता सूची से बाहर करने का अभियान चलाया गया।

सुप्रीम कोर्ट की नींद तब कुछ जल्दी खुलती है जब उसके आसपास कुछ होने लगता है, चाहे वह दिल्ली का प्रदूषण हो, चाहे दिल्ली की इमारतों के तलघरों में चलने वाले कारोबार हों, चाहे दिल्ली में डीजल गाड़ियां हों या और कोई जनसुविधा हो। इसमें कुछ अटपटा भी नहीं है, क्योंकि जब आग बहुत पास में लगती है तो ताप कुछ अधिक लगता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट बना तो पूरे देश के लिए है, लेकिन आज दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, को लेकर सुप्रीम कोर्ट चौकन्ना हो गया है और चुनाव आयोग से सवाल कर रहा है। इसी सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल चुनाव के वक्त हैरान करने वाला एक सवाल पूछा था कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं डाल पाएंगे तो कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा, वे अगले चुनाव में वोट डाल देंगे। और चुनाव हो गया, नतीजे देश के सामने हैं। जिस मतदाता सूची पुनरीक्षण की कोई हड़बड़ी नहीं थी, उसे तुरंत करवाने और दसियों लाख वोटरों का हक छीन लेने का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो जाने दिया गया। देश में न्यायपालिका का इतिहास जब लिखा जाएगा, तब उसमें बंगाल की मतदाता सूची को लेकर अदालत का रुख और उसकी टिप्पणियां जरूर जगह पाएंगी।

अब आज इस मामले पर लिखे बिना इसलिए नहीं रहा जा सकता कि देश के एक खोजी अखबार, इंडियन एक्सप्रेस ने जांच-पड़ताल के बाद एक रिपोर्ट छापी है कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से बाकी दो सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से समय-समय पर लिखित असहमति जाहिर की है और उसे अनदेखा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कई फैसले अपने स्तर पर लिए। रिपोर्ट के मुताबिक इन फैसलों की जानकारी भी कई मामलों में बाकी दो आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को फैसले लिए जाने से पहले नहीं दी गई। एसआईआर को पूरे देश में लागू करने के काम सहित चुनाव आयोग के भीतर पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार संधू और जोशी ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई और लिखित रूप में अपनी असहमति दी, लेकिन उनकी आपत्तियों पर अमल नहीं हुआ। एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि ये आपत्तियां एसआईआर प्रक्रिया और वोटर लिस्ट से जुड़ी हुई थीं। इन दोनों ने यह भी लिखित शिकायत की कि उनकी लिखित सलाह के खिलाफ जाकर ज्ञानेश कुमार ने काम किया। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया है। इसके साथ-साथ इन दोनों सदस्यों ने भारत सरकार के सबसे बड़े नौकरशाह, कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर चुनाव आयोग के भीतर काम के बंटवारे में किए गए बदलाव की शिकायत की थी, जिससे वोटर लिस्ट के लिए आईटी सिस्टम की निगरानी का एक स्तर खत्म हो गया था।

इन तीनों ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुई है और कानून के तहत प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और विपक्ष के नेता के एक पैनल ने इन सदस्यों का चयन किया था। उल्लेखनीय है कि 2024 में जब संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त बनाया गया था, तब भी विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया से असहमति दर्ज कराई थी। इसके बाद 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त बनाने पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने असहमति दर्ज कराई थी। इस देश में चुनाव आयोग का ऐसा गौरवशाली इतिहास रहा है, कि टी एन शेषन का नाम आज भी सख्ती और हौसले के लिए देश में मिसाल की तरह लिया जाता है। वहाँ से लेकर आज शर्मिंदगी तक, ये कहाँ आ गए हम !

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है कि अब वोटर बनने के लिए किसी नागरिक को जो फॉर्म भरना होता है, उसमें एक ऐसा सवाल पूछा जा रहा है जो पहले कभी नहीं पूछा गया था। इसमें पूछा जा रहा है कि क्या नया वोटर, उसके मां-बाप या दादा-दादी इसके पहले हुए एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद थे। इस सवाल के खिलाफ जोशी और संधू दोनों ने फाइल पर यह चेतावनी लिखी थी कि नियमों को बदले बिना यह सवाल ऐसे नहीं जोड़ा जा सकता। जोशी ने अपनी आपत्ति दर्ज की और संधू ने भी उससे सहमति जताते हुए इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तुरंत हटाने की बात कही। दोनों चुनाव आयुक्तों ने एसआईआर से जुड़े हुए बहुत सारे पहलुओं को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन उनकी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक बंगाल चुनाव में 49 सीटों पर एसआईआर के तहत हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन 49 सीटों पर एसआईआर से हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक होने के बावजूद चुनाव परिणाम में इसका कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है; इनमें 26 सीटें भाजपा और 21 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थीं।

अभी सुप्रीम कोर्ट ने ही बंगाल में महीनों से चल रहे मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग से हासिल जानकारी के आधार पर यह कहा था कि जिस रफ्तार से मतदाताओं की आपत्तियां सुनी जा रही हैं और उनके कागजात देखे जा रहे हैं, उस रफ्तार से बंगाल में आपत्तियों के निपटारे में 21 बरस लगेंगे। अब दिल्ली की बारी पुनरीक्षण में जल्दी आ गई है और सुप्रीम कोर्ट को यह सवाल दिखाई दे रहा है कि चुनाव आयोग वोटरों के नाम पर सवालिया निशान लगाने का काम कहीं मशीनी अंदाज में तो नहीं कर रहा। दिल्ली में गर यह काम कुछ बरस बाद होता, तो दूसरे राज्यों को देखकर सुप्रीम कोर्ट को यह समझ ही नहीं पड़ता कि चुनाव आयोग एक खास मकसद की मशीन बन चुका है। बंगाल में एसआईआर के बाद 27.16 लाख नाम हटाए गए, उनमें से 22.21 लाख लोगों ने अपने मताधिकार की बहाली के लिए अपील की। लेकिन चुनाव आयोग के सामने कुल अपीलें 38.31 लाख हैं, क्योंकि 16.10 लाख अपीलें उलटे उन नामों को हटाने के लिए हैं जिन्हें सूची में शामिल किया गया था।

देश में ऐसे कई मौके आए हैं जब चुनिंदा अखबारों की खबरों ने इतिहास में हो रहे फेरबदल को रोकने या तेज करने का काम किया है। कभी कोई अखबार, तो कभी कोई और वेबसाइट, कभी स्टिंग ऑपरेशन करने वाला कोई कोबरा, अलग-अलग लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दों और किए गए भंडाफोड़ से लोकतंत्र को बचने का मौका मिला है। अब सुप्रीम कोर्ट के जागने का समय आ गया है। इंडियन एक्सप्रेस नाम के एक मुर्गे ने अदालत की दहलीज पर जाकर बांग दी है। देखना है, इस रिपोर्ट के बाद अब क्या होता है?

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

डिग्री की भीड़ से पहले हुनर की राह क्यों नहीं?

22 सितंबर 2026  

 

हमारे समाज में 10वीं के बाद लगभग हर विद्यार्थी के लिए एक ही रास्ता मान लिया गया है, 12वीं करो, फिर स्नातक करो और उसके बाद नौकरी तलाशो। लेकिन उन विद्यार्थियों के बारे में भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है जो 10वीं तक की पढ़ाई में लगातार कमजोर हैं। अगर पढ़ाई में तेज विद्यार्थी भी स्नातक होने के बाद रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो केवल किसी तरह डिग्री हासिल कर लेने से पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी के लिए रोजगार की संभावना बहुत बेहतर हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी है? अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 25 वर्ष से कम उम्र के स्नातक युवाओं में बेरोजगारी दर 39.33 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष में 20.04 प्रतिशत थी। इसका अर्थ यह नहीं कि स्नातक की डिग्री बेकार है। रोजगार मिलने पर स्नातकों की औसत कमाई गैर-स्नातकों से अधिक है। सवाल यह है कि डिग्री मिलेगी तो रोजगार भी मिलेगा, इसकी गारंटी कहां है?

एक और आंकड़ा इस समस्या को समझने में मदद करता है। 2004-05 से 2023 के बीच भारत में हर साल करीब 50 लाख नए स्नातक बढ़े, लेकिन रोजगार पाने वाले स्नातकों की संख्या में सालाना बढ़ोतरी केवल करीब 28 लाख रही और वेतनभोगी रोजगार तक पहुंचने वालों की संख्या इससे भी कम रही। यानी डिग्री हासिल करने वालों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी, उनके लिए रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। यह स्थिति केवल बेरोजगारी की संख्या का सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरी सोच पर सवाल है जिसमें हम मान लेते हैं कि ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों को स्नातक बना देना अपने आप रोजगार की समस्या का समाधान कर देगा। इसलिए 10वीं तक पढ़ाई में लगातार कमजोर विद्यार्थियों को किसी तरह 12वीं और फिर स्नातक तक खींचते रहने के बजाय 8वीं से ही उन्हें अलग-अलग तरह के कामों और कौशलों से परिचित कराने की जरूरत है। 10वीं तक आते-आते उनकी रुचि, क्षमता और व्यावहारिक योग्यता समझी जा सकती है और उसके बाद उन्हें गंभीर कौशल प्रशिक्षण का विकल्प मिलना चाहिए। बिजली, वाहन मरम्मत, वातानुकूलन और कूलिंग, प्लंबिंग, वेल्डिंग, मशीन संचालन, सौर उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मोबाइल और कंप्यूटर मरम्मत, स्वास्थ्य तकनीक, खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई, डिजाइन, फोटोग्राफी, वीडियो निर्माण, आतिथ्य सेवा, कृषि उपकरण और ऐसे अनेक क्षेत्रों में अच्छे प्रशिक्षण की जरूरत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा से परिचय और स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक अनुभव की बात कही गई है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हुनर केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, रोजगार की अपनी पूंजी है। कोई हुनरमंद व्यक्ति किसी संस्था या दुकान में काम कर सकता है, फिर स्वतंत्र रूप से काम ले सकता है और अनुभव के साथ अपना छोटा कारोबार भी शुरू कर सकता है। नौकरी चली जाए तो उसका हुनर उसके साथ रहता है। एक अच्छे बिजली मिस्त्री, वाहन मैकेनिक, तकनीशियन, दर्जी, फोटोग्राफर या दूसरे किसी काम का दक्ष व्यक्ति अपनी अगली आजीविका उसी हुनर से तलाश सकते हैं। इसके विपरीत किसी सामान्य स्नातक की नौकरी चली जाए और उसके पास कोई विशेष कौशल या काम का अनुभव न हो तो उसे फिर उसी डिग्री के आधार पर दूसरी नौकरी की तलाश करनी पड़ती है। इसलिए हुनर की असली ताकत केवल उसकी कमाई में नहीं, रोजगार खोने के बाद फिर से खड़े होने की क्षमता में भी है।

यह भी सच है कि हर हुनरमंद व्यक्ति स्नातक से ज्यादा नहीं कमाते। उपलब्ध राष्ट्रीय आंकड़े ऐसी कोई सामान्य बात साबित नहीं करते। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। तकनीकी शिक्षा और व्यावहारिक कौशल रोजगार की संभावनाएं बढ़ाते हैं और कुछ क्षेत्रों में अनुभव के साथ कमाई भी काफी बढ़ सकती है। स्वरोजगार में समय और काम के तरीके पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण भी हो सकता है, हालांकि उसके साथ नियमित छुट्टी, भविष्य निधि और दूसरी सामाजिक सुरक्षा की कमी का जोखिम रहता है। इसलिए कौशल शिक्षा का मतलब केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देना नहीं होना चाहिए। प्रशिक्षण के बाद रोजगार, प्रशिक्षुता, औजार खरीदने के लिए ऋण, बाजार तक पहुंच और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था भी जरूरी है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट भी शिक्षा और कौशल को रोजगार से जोडऩे तथा व्यावसायिक शिक्षा को व्यापक बनाने पर जोर देती है।

भारत के रोजगार बाजार की एक और सच्चाई है जिसे हमारी शिक्षा व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज करती है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार देश के श्रमबल में करीब 58.4 प्रतिशत लोग स्वरोजगार में हैं, जबकि नियमित वेतन या वेतनभोगी रोजगार में करीब 21.7 प्रतिशत और आकस्मिक श्रम में करीब 19.8 प्रतिशत हैं। यानी भारत की रोजी-रोटी का बड़ा हिस्सा केवल दफ्तर की नियमित नौकरी पर निर्भर नहीं है। बड़ी संख्या में लोग अपने काम, छोटे कारोबार, सेवा या किसी कौशल के सहारे कमाते हैं। इसलिए कौशल को पढ़ाई का दूसरा दर्जा मानने के बजाय उसे रोजगार की मुख्य धारा का हिस्सा बनाना जरूरी है। जिस हुनर से नौकरी मिल सकती है, उसी हुनर से स्वरोजगार भी शुरू किया जा सकता है।

हमने शिक्षा की सफलता का पैमाना बहुत संकरा बना दिया है, कितने विद्यार्थी 12वीं पास हुए, कितने ग्रेजुएट हुए और कितने पोस्ट-ग्रेजुएट, इससे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि कितने विद्यार्थियों के पास अपनी आजीविका कमाने की क्षमता है। हर विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या अधिकारी नहीं बन सकते और इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। शर्म की बात तब होगी जब पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी को वर्षों तक ऐसी पढ़ाई में धकेलते रहें जिसमें वह लगातार असफल होते रहें और अंत में उसके हाथ में न पर्याप्त रोजगार-योग्य डिग्री हो, न कोई मजबूत हुनर। इसके बजाय वही विद्यार्थी 10वीं के बाद किसी अच्छे हुनर में दक्ष होकर कामकाजी बन सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं और आगे चलकर अपना व्यवसाय भी खड़ा कर सकते हैं।

हमें विद्यार्थियों के रास्ते बंद नहीं करने हैं, रास्ते बढ़ाने हैं। डिग्री पाने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के रास्ते खुले रहें, लेकिन जो विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर हैं उनके लिए हुनर का रास्ता भी उतना ही सम्मानजनक बनाया जाए। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हर विद्यार्थी कितनी बड़ी डिग्री लेंगे। सवाल यह भी होना चाहिए कि हर विद्यार्थी ऐसा क्या सीखेंगे जिसके बदले समाज उसे सम्मान के साथ पैसा देने को तैयार हो। कमजोर विद्यार्थी को कमजोर स्नातक बनाने से बेहतर है कि उसे मजबूत हुनरमंद बनाया जाए। आज के समय में केवल डिग्री और दफ्तर-आधारित काम पर निर्भर रहने का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले कामों में आंकड़े दर्ज करने, हिसाब-किताब, प्रशासन और दूसरे कागजी काम शामिल हैं। संगठन का आकलन यह नहीं है कि ये सारी नौकरियां खत्म हो जाएंगी; अधिक संभावना काम के स्वरूप में बदलाव की है। लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि भविष्य के विद्यार्थी को केवल प्रमाणपत्र नहीं, बदलते रोजगार बाजार के अनुकूल वास्तविक कौशल भी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितंबर 2026


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