दीवारों पर लिक्खा है, 3 नवंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

किसी देश-प्रदेश में फैलती, फलती-फूलती आस्था चिकित्सा किसकी असफलता बताती है?

03 नवंबर 2026  

 

सरकारी और निजी दोनों तरह के अस्पतालों में मरीजों के साथ होने वाली धोखाधड़ी की खबरों से अखबार पटे हुए हैं। यह भी तब है जब सरकार से भी इश्तहार मिलते हैं, और बड़े अस्पतालों से तो मिलते ही हैं। बड़े अस्पताल शायद सबसे बड़े विज्ञापनदाताओं के आधा दर्जन कारोबार में से एक होंगे, लेकिन उसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट से लेकर केन्द्र सरकार तक, दवा कंपनियों से लेकर अस्पतालों में गैरजरूरी जांच, ऑपरेशन, और अंधाधुंध बिलिंग को लेकर इतना कुछ सामने आ रहा है कि इश्तहारी अखबारों को भी इन खबरों को छापना पड़ रहा है। इन दिनों दवा कंपनियों के फर्जी रेट को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी हैरान है कि किस तरह छह सौ और सात सौ गुना (फीसदी नहीं, गुना), दाम पर अस्पताल दवाइयों की बिलिंग कर रहे हैं, और मनचाहे दाम छापकर कंपनियां बाजार में दवाएं उतार रही हैं। जब सारे तथ्य सुप्रीम कोर्ट के सामने आए तो जजों को समझ ही नहीं आया कि देश में यह चल क्या रहा है। लेकिन इलाज के अधिकतर इंतजाम देश में ऐसे हैं जो कि जजों को हैरान कर सकते हैं। हम तो राज्यों में भी इलाज के सरकारी इंतजाम में इतने बड़े-बड़े गड्ढे देखते हैं कि जिनमें जनता के टैक्स की पूरी ही रकम डूब जाती है, और वे आकाशगंगा के ब्लैकहोल की तरह सब कुछ समा लेते हैं। 

केन्द्र और राज्य सरकारों ने गरीब और बाकी मरीजों के इलाज के लिए तरह-तरह की योजनाएं बनाई हुई हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और बाकी कर्मचारी इन योजनाओं में छेद ढूंढकर फर्जी इलाज दर्ज करते रहते हैं, और इन योजनाओं के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि को हर महीने लाखों तक ले जाते हैं। ऐसी मोटी नाजायज कमाई करने वाले सरकारी डॉक्टर और दूसरे कर्मचारियों के पकड़ाए जाने पर भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हमने कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ में देखा है कि किस तरह सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना के कार्ड की रकम लूटने के लिए राजधानी रायपुर के दर्जनभर अस्पतालों में दलालों के माध्यम से गांव-गांव तक जाल बिछाया था, और वहां से नौजवान उम्र की महिलाओं को लाकर बिना जरूरत उनके गर्भाशय निकाले जा रहे थे, ताकि बीमा की रकम अस्पताल वसूल कर सके। इंसान की देह के साथ ऐसी खिलवाड़ धड़ल्ले से चली, और कई सर्जनों की डॉक्टरी पर रोक भी लगाई गई थी। लेकिन साल-छह महीने की रोक के बाद वे सब फिर कामकाज में लग गए, और गांवों से लाई गई भोली-भाली महिलाएं बिना जरूरत, बिना उम्र आए गर्भाशय खो बैठीं क्योंकि कुछ लोगों को उससे कमाई हो सकती थी। 

देश में डॉक्टरी के धंधे का हाल यह है कि सरकार इलाज बीमा मुहैया न कराए, तो अधिकतर आबादी इलाज नहीं करा पाएगी। सरकारें अपने अस्पतालों को लगातार कमजोर करती चल रही हैं ताकि निजी अस्पतालों का कारोबार बढ़े, और धीरे-धीरे सरकारें अपने इलाज बीमा कार्ड से निजी अस्पतालों में भी इलाज की छूट देती जा रही हैं। यह पूरा सिलसिला इतना भयानक है कि एक बार कोई बीमार पड़े, तो सरकारी इलाज से गुजरते हुए उसका भरोसा पूरी सरकार पर से उठ जाने का ही अधिक आसार रहता है। अगर निजी अस्पताल में जाएं, तो सरकारी कार्ड रहने पर भी उसे लूटने का बड़ा खतरा अधिकतर अस्पतालों में रहता है। अगर निजी खर्च से इलाज करवाएं तो अस्पताल मामूली सी दवाइयों के सैकड़ों गुना अधिक दाम वसूलते हैं, और बाहर से दवाई खरीदकर लाने की छूट नहीं देते। एक पुरानी कहावत इस सिलसिले में याद आती है, जबरा मारे भी, और रोने भी न दे। निजी अस्पतालों में से बहुत सारे ऐसे रहते हैं जो गैरजरूरी जांच करवाते हैं, अगर मरीज का निजी स्वास्थ्य बीमा है, और उस पर मोटी रकम बाकी है, तो गैरजरूरी बड़े ऑपरेशन का खतरा भी बने रहता है। सरकार, बीमा कंपनी, या अपनी जेब, किसी से भी बड़े भुगतान की उम्मीद अगर रहती है, तो फिर छोटे इलाज होने की संभावना खत्म हो जाती है। 

ऐसे में लगता है कि लोग बीमार न पड़ें, सेहतमंद बने रहें, वही सबसे अच्छा है। हम खुद अपने इस संपादकीय में, और कॉलम या अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर लगातार सेहत को ठीक रखने की वकालत करते हैं। लेकिन हाल यह है कि लोग अगर पैदल चलने जाएं, तो सांडों और कुत्तों का खतरा रहता है, बाग-बगीचों या तालाब किनारे सैर पर जाएं, तो गंदगी भरी रहती है, सडक़ों पर साइकिल चलाएं तो लापरवाह गाड़ी आकर कुचल सकती है। सार्वजनिक जीवन में जब हर तरह की अराजकता बढ़ी हुई रहती है, तो प्राकृतिक जीवन में स्वस्थ बने रहने की संभावना घटने लगती है। अब ऐसे में कुछ लोगों को ईश्वर का सहारा लगता है, कई लोग मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च जाने लगते हैं कि वहां की आशीर्वाद से उनकी बीमारी ठीक हो जाएगी। कई लोग किसी चमत्कारी गुरू के पास जाने लगते हैं कि उससे वे ठीक हो जाएंगे। अब इन जगहों की हकीकत भी यह हो गई है कि धर्मस्थलों पर आने वाले दान में इतनी व्यापक और संगठित चोरी होने लगी है कि लोगों को लगने लगा है कि ईश्वर तो खुद को मिले हुए दान की भी हिफाजत नहीं कर पा रहा है, वह बीमारों की सेहत की हिफाजत कैसे करेगा? फिर चमत्कारी बाबाओं का हाल सुनाई पड़ता है कि हर कुछ हफ्तों में कोई न कोई तांत्रिक या बाबा, या धर्मगुरू, या किसी धर्म के ईश्वर का किसी और नाम वाला एजेंट बलात्कार करते हुए पकड़ाता है। मतलब यह कि जितना खतरा सरकारी या निजी अस्पतालों में हैं, उतना ही खतरा धर्मस्थलों और बाबाओं के पास भी है। लोग जाएं तो जाएं कहां? अब बदन तो कुदरत का दिया हुआ है, उसमें 19-20 चलते रहता है। ऐसे में बीमारों के लिए सहारा क्या है? दुनिया का यह भी तजुर्बा है कि इलाज के नाम पर जो अंधविश्वासी और चमत्कारी कारोबार चलते हैं, उनकी अधिक जरूरत लोगों को तभी पड़ती है जब उन्हें आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था या तो हासिल नहीं रहती है, या वह विश्वसनीय नहीं रहती है। चिकित्सा विज्ञान अपने आपमें विश्वसनीय है, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता हर जगह घटती चल रही है। ऐसे में लोग आस्था चिकित्सा की तरफ जाते हैं, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन भी दुनिया के ऐसे कोनों में उपयोगी मानता है जहां पर और कोई चिकित्सा सुविधा नहीं है। भारत में आज चारों तरफ चमत्कारी और करिश्माई चंगाई दरबारों का जो बोलबाला है, वह क्या बताता है? क्या आधुनिक चिकित्सा लोगों को हासिल नहीं है, उनकी पहुंच के बाहर है, या पूरी सरकारी चिकित्सा सुविधा, और निजी चिकित्सा कारोबार की विश्वसनीयता जमीन पर औंधे मुंह आ गिरी है? देखना है कि सुप्रीम कोर्ट देश की चिकित्सा सुविधा और सेवा को कहां-कहां ठीक कर सकता है, वरना बेबस-बीमार लोगों के लिए, हारे को हरिनाम तो है ही कि पिछले जन्म के कर्मों का फल मिल रहा है।

(Daily Chhattisgarh)    

पत्रकारिता-सम्मान से बड़े हुए सीने, और छोटे हुए दिल, दोनों के लिए छोटी-छोटी दो-दो बातें

  02 नवंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव में दिए जाने वाले राज्य अलंकरणों की घोषणा हुई है जिसमें अलग-अलग किस्म के मीडिया के कुछ लोगों के नाम भी हैं। कई दूसरे लोगों ने, जिन्होंने इन अलंकरणों के लिए अर्जियां लगाई होंगी, उनमें निराशा भी होगी कि उन्हें इस सम्मान के लायक नहीं समझा गया। फिर जिन्हें बीते बरसों में ये सम्मान मिल चुके हैं, उनमें से कुछ लोग इस पर चल रही चर्चा में चुप रहते हैं जो कि सोशल मीडिया पर हर बरस चलती ही है। जिन लोगों को सरकार से सम्मान लेना ठीक लगता है, और मिला है, उन सभी लोगों को हमारी तरफ से बधाई। जिन लोगों को नहीं मिला है, और अगले बरस भी जिनकी हसरत जिंदा रहेगी, वे फिर अर्जी लगा सकते हैं। हमारी जितनी सीमित जानकारी है उसके मुताबिक इस राज्य के अलंकरणों के लिए, या कि देश में पद्म सम्मानों के लिए लोगों को खुद अर्जी भेजनी पड़ती है, या किसी और के नाम की सिफारिश करने पर उन लोगों की सहमति भी साथ में भेजनी पड़ती है। कुल मिलाकर उन्हीं के नाम घोषित होते हैं जिन्हें ये सम्मान नामंजूर होने का खतरा न हो। छत्तीसगढ़ में तो दर्जनों अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान या सफलता के लिए अलंकरण दिए जाते हैं, और अखबारों या टीवी चैनलों के लोगों को मिलने वाले सम्मानों को लेकर चर्चा या विवाद कुछ अधिक होते हैं, जबकि इन सम्मानों को तय करने के लिए बनने वाले निर्णायक मंडल में कुछ पत्रकार ही रहते हैं। 

सरकार के अलावा भी देश में बहुत से दूसरे संगठन पत्रकारिता के पुरस्कार देते हैं। इनमें कुछ तो बहुत प्रतिष्ठित हैं जो कि पत्रकारों के ही पेशेवर संगठनों, या किसी दूसरे विवादहीन संगठन द्वारा दिए जाते हैं। लेकिन सरकारों के दिए जाने वाले पत्रकारिता पुरस्कार, या अलंकरण, या पत्रकारों को दिए जाने वाले पद्म सम्मान की बात कुछ अलग होती है। लोककला या समाजसेवा, साहित्य या खेलकूद, ग्रामीण विकास या दानशीलता का यह दावा कभी नहीं रहता कि वे लोकतंत्र के पांचवें, छठवें, सातवें, या आठवें स्तंभ हैं। अकेली पत्रकारिता ऐसी रहती है जिसका यह दावा रहता है कि वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। लोकतंत्र के स्तंभों को लेकर धारणा एकदम साफ है। संविधान में भारत में तीन ही स्तंभों को लोकतंत्र के पाये माना गया है, कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका। फिर लिखित शब्दों से परे धक्का-मुक्की करके पत्रकारिता ने अपने आपको एक और स्तंभ बना लिया। अब जब उसने अपने को स्तंभ बना ही लिया है, तो उसे चौथे स्तंभ की तरह रहना चाहिए। किसी टेबिल या कुर्सी को देखें, जिसके चार पैर हों, तो उनमें से कोई भी पैर दूसरे पैर से लिपटने की कोशिश नहीं करता, उसे खींचने या धकेलने की, या सहलाने की कोशिश भी नहीं करता। सारे पैर अपनी-अपनी जगह बोझ का अपना-अपना हिस्सा उठाते रहते हैं, और एक-दूसरे से पर्याप्त और सुरक्षित दूरी बनाए रखते हैं। कल्पना करें कि चार पांवों की कुर्सी के दो पैर एक-दूसरे के करीब आ जाएं, तो उन पर बैठे हुए लोकतंत्र का नीचे लुढक़कर जख्मी हो जाना तय सरीखा रहेगा। इसलिए सरकार के साथ पत्रकारिता को सम्मान का रिश्ता कायम करने के बजाय एक सम्माननीय दूरी बनाकर रखना चाहिए। इन दोनों में आपस में न तो कोई टकराव है, न ही इन दोनों में गलबहियों के किसी रिश्ते की जरूरत है। 

अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने भोपाल में पत्रकारिता के एक कार्यक्रम में संचालक-पत्रकारों की कही एक बात पर आपत्ति की थी। एक वरिष्ठ पत्रकार ने पटवाजी का स्वागत करते हुए कहा था कि भोपाल के पत्रकारों से उनके बहुत मधुर संबंध हैं। इस पर पटवाजी ने अपनी बारी आने पर माइक से ही कहा था कि उनके पत्रकारों से पेशेवर संबंध हैं। सरकार और पत्रकार, इन दोनों की अपनी-अपनी अलग भूमिका रहती है, और अगर इन दोनों के बीच मधुर संबंध होने लगे, तो नुकसान तो लोकतंत्र का होगा। पटवाजी अपनी साफबयानी के लिए जाने जाते थे, उन्हीं के बस था कि पत्रकारों के कार्यक्रम में पत्रकारों के मुंह पर मंच और माइक से ऐसी बात कह सकें। लेकिन उनकी बात में दम था। शिष्टाचार के संबंध एक पेशेवर जरूरत है, राजनीति की भी, और पत्रकारिता की भी। लेकिन एक-दूसरे के किसी अतिरिक्त सम्मान की जरूरत नहीं है। कहने के लिए अलंकरण के नाम तय करने वाला एक निर्णायक मंडल होता है, लेकिन कई बार ऐसी धारणा बनती है कि सरकार अपने को पसंद, या नापसंद लोगों के नामों को लेकर अपने असर का इस्तेमाल करती है। हम छत्तीसगढ़ में इस बरस छांटे गए नामों के संदर्भ में यह बात नहीं कह रहे हैं, किसी एक साल के छांटे गए नाम महत्वहीन रहते हैं, बहुत लंबी, 25 बरस लंबी लिस्ट भी देखें, तो भी उससे हम कोई धारणा नहीं बना रहे। लेकिन हम नामों से परे एक सैद्धांतिक चर्चा कर रहे हैं कि क्या पत्रकारों को किसी भी सरकार, राज्य सरकार या केन्द्र सरकार से कोई सम्मान, अलंकरण, या पुरस्कार लेना चाहिए? देश में कई पत्रकारों और संपादकों को पद्मश्री जैसा देश का एक सबसे बड़ा सम्मान भी मिला है, और अभी हम नामों पर जाना नहीं चाहते कि किस सरकार ने किन लोगों को इसके लायक माना, किन लोगों ने इसके लिए कोशिश की, किन लोगों को यह नहीं मिल पाया, या किन लोगों ने इसके लिए मना कर दिया। मुद्दा है कि जहां चयन प्रक्रिया में सरकार का एक दखल रहता है, क्या वैसी प्रक्रिया से गुजरकर छांटे गए नामों से पत्रकारों का सम्मान सचमुच बढ़ता है? या उनके प्रति सरकार के एक रूझान का यह रूख रहता है? 

हम इसमें पत्रकारों के व्यक्तिगत स्तर पर फैसले, या उनके संस्थानों के फैसले पर नहीं जा रहे। हमारी जानकारी में हैं कि कुछ संस्थानों ने अपने पत्रकारों को सरकारी सम्मान के लिए अर्जी देने से मना कर दिया था। कुछ संस्थान अपने पत्रकारों पर छोड़ते हैं कि वे चाहें तो अर्जी दें, और न चाहें तो अपने पाठकों से मिलने वाले सम्मान से खुश रहें। कुछ संस्थान इसमें सक्रिय रूप से कोशिश करते हैं कि उनके पत्रकारों को सम्मान मिले। हमको इनमें से किसी भी किस्म से न कोई शिकायत है, न कोई परहेज है, यह सब कुछ लोकतांत्रिक और जायज सीमा के भीतर स्वीकार्य बातें हैं। लेकिन हमारी अपनी सोच यह है कि पत्रकारों को सरकार से शिष्टाचार के बहुत अच्छे संबंध रखने चाहिए, लेकिन एक-दूसरे से सम्मान पाने का मोहताज नहीं होना चाहिए। यह हमारी सोच है, जो लोग इससे परे सोचते हैं, वे भी सम्मान के हकदार हैं, अपने पाठकों या दर्शकों से मिलने वाले एक बहुत ही ईमानदार और जायज सम्मान के, और अगर उन्हें ठीक लगता है तो सरकार से भी मिलने वाले सम्मान के। 

जहां कहीं सरकार बीच में रहेगी, वहां बहुत सम्मानजनक लोगों को मिलने वाले जायज सम्मान को लेकर भी जायज और नाजायज दोनों किस्म के सवाल उठेंगे। और ऐसा उठना जायज इसलिए है कि सरकार और पत्रकार के रिश्ते समधी-मिलन जैसे नहीं रहने चाहिए। कल जब छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के नाम घोषित हुए हैं, तो सोशल मीडिया पर कुछ सुगबुगाहट चल रही है। इसी को देखते हुए हम इस मुद्दे पर अपनी सोच सामने रख रहे हैं, लेकिन इसका यह मतलब कहीं नहीं है कि यही एक सोच जायज है, और बाकी किस्म की सोच ठीक नहीं है। इसी राज्य में कई ऐसे पत्रकार हैं (जिस अखबार में यह लिखा जा रहा है, उससे बाहर के) जिन्होंने खूब अच्छा काम किया है, और वे अपनी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं, उन्हें न मिले किसी सम्मान का मलाल उनके पाठकों या दर्शकों को तो बिल्कुल भी नहीं है। जिन्हें सम्मान या अलंकरण नहीं मिले हैं, हम उनके हमदर्द हैं, और याद दिलाना चाहते हैं कि गांधी को कभी नोबल शांति पुरस्कार नहीं मिला था, इसलिए किसी पुरस्कार के लिए, सम्मान या अलंकरण के लिए काम करने के बजाय अपने पाठकों या दर्शकों के लिए अपना खूब अच्छा काम और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाएं। जिंदगी में किसी पेशे में उस पेशे को इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच मिलने वाला सम्मान ही सबसे बड़ा सम्मान होता है। दुनिया में सारे नोबल पुरस्कार विजेताओं की प्रतिमाओं को मिलाकर भी उतनी प्रतिमाएं नहीं लगी हैं, जितनी एक नोबल पुरस्कारविहीन गांधी की लगी हैं। इसलिए गांधीवादी उदारता के साथ पत्रकारिता जारी रखें।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 2 नवंबर 2026


 

दीवारों पर लिक्खा है, 1 नवंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

उत्तर और दक्षिण की दो स्कूलों में अलग-अलग किस्म की हिंसा से उठते हैं कई गंभीर सवाल...

 01 नवंबर 2026  

 

देश के दो अलग-अलग प्रदेशों में कल हुई दो घटनाएं कई बातों पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं। हरियाणा में तीसरी कक्षा के एक बच्चे ने अपनी ही स्कूल की केजी की एक छात्रा को क्लास के भीतर इस बुरी तरह पटक-पटककर मारा, और उसके बाद ईंट लेकर उसे ईंट से बुरी तरह कुचला, बाल पकडक़र घसीटे। यह सब कुछ स्कूल के सीसीटीवी कैमरे में कैद हुआ है। इस बच्ची को अस्पताल में 40 घंटे बाद होश आया है। डॉक्टरों का कहना है कि उसके चेहरे की कई हड्डियां टूट गई हैं, और उसे प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत पड़ेगी। सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने यह लिखा है कि 8 बरस के इस बच्चे की हिंसा देखते भी नहीं बनती है। अब हरियाणा सरकार ने स्कूल के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज की है, जिसे लापरवाह माना गया है। अभी मिली जानकारी के अनुसार तीसरी कक्षा का यह 8 बरस का बच्चा छोटी सी बच्ची को किसी बहाने से पहली मंजिल के क्लासरूम में ले जाकर उसका सिर बार-बार बेंच पर पटकता है, जूतों से मारता है, बालों से घसीटता है, और उसके बाद ईंट पटक-पटककर उसे मारता है। बच्ची के पिता का कहना है कि जब दूसरे बच्चों ने मारने वाले इस बच्चे से पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया, तो उसका जवाब था कि उसे इसमें मजा आता है। बच्ची का पिता मेहनत-मजदूरी करके कमाने वाला गरीब है। इतनी छोटी सी उम्र में बच्ची के साथ हुई ऐसी भयानक हिंसा से बाकी जिंदगी भी उसके दिमाग पर असर बना रहेगा। 

अब एक दूसरी घटना आंध्रप्रदेश की है, वहां एक सरकारी स्कूल में 10वीं की एक क्लास में एक नौजवान घुस गया, और वह बैटरी से चलने वाली आरी लेकर गया था जिससे लोग पेड़ काटते हैं। उसने एक छात्रा पर हमला कर दिया, उसके दाएं हाथ को काट दिया, और चेहरे सहित कई जगह जख्मी कर दिया। कुछ दूसरे बच्चे भी इस हमले में जख्मी हुए, और कम से कम एक लडक़ी ने हमलावर को रोकने की कोशिश की, उसे भी उसने घायल कर दिया। एक सरकारी स्कूल में दिनदहाड़े भरी हुई क्लास में ऐसा हमला सभी माँ-बाप के हौसले पस्त करता है। अभी तक स्कूल में बाहर से आकर ऐसी हिंसा सिर्फ अमरीका जैसे देश में सुनाई पड़ती थी जहां बंदूकों से लोगों को थोक में मारने की एक सिरफिरी संस्कृति है, वहां हर महीने किसी न किसी जगह स्कूल के कई लोगों को मार डाला जाता है। लेकिन बैटरी से चलने वाली पेड़ तक काट डालने वाली ऐसी भयानक आरा मशीन से किसी पर हमले का ऐसा मामला तो स्कूल तो छोड़ दें, किसी और जगह भी सुनाई नहीं देता है। 

इन दोनों घटनाओं में किसी एक तरह की दिमागी हालत नहीं है, दोनों अलग-अलग हैं, लेकिन अलग-अलग उम्र के दो लोगों के दिमागों में हिंसा की बात एक सरीखी है। आठ बरस का बच्चा जिस किस्म की हिंसा कर रहा है, और एक नौजवान स्कूल में जाकर जिस तरह आरी से काट डाल रहा है, ये दोनों ही लंबे मानसिक इलाज के लायक मामले हैं। यह नौजवान बालिग सुनाई पड़ता है, और उसके लिए तो सजा भी अलग किस्म की रहेगी। अब सवाल यह है कि हम अपने आसपास ही हर दिन कहीं न कहीं नाबालिगों को चाकूबाजी करते देखते हैं। अभी एक मामला तो ऐसा था जिसमें बिरयानी खाने के लिए किसी आम जगह पर सोए हुए आदमी की जेब से पैसे चुरा रहे नाबालिगों ने उसके जाग जाने पर चाकू मार-मारकर उसका कत्ल कर दिया। एक भी ऐसे किस्म के जुर्म नहीं हैं जिनमें नाबालिग सुनाई न पड़ते हों। और तो और छत्तीसगढ़ के एक सुधारगृह में रखे गए लडक़ों में से दर्जनभर लडक़े वहीं के गार्ड का कत्ल करके फरार हो गए थे। एक दूसरे सुधारगृृह में खिडक़ी तोडक़र भाग गए थे, एक और जगह वे गैस सिलेंडर लेकर सुधारगृह की छत पर पहुंच गए थे, और वहां से नीचे लोगों पर फेंकने की धमकी दे रहे थे। अब स्कूल और घर छोड़े हुए नाबालिग नशा करने के साथ-साथ नशा बेचने और नशे की तस्करी में भी लग गए हैं। ये सारी बातें अच्छी तरह दर्ज होती जा रही हैं। अब यह समझ से परे है कि इस उम्र में बेघर हो चुके, नशेड़ी बन चुके ये नाबालिग बच्चे और क्या-क्या नहीं करेंगे? 

यह समझने की जरूरत है कि ऐसी नाबालिग पीढ़ी के सामने जिंदगी का कोई मकसद नहीं दिखता है कि जिसके लिए वे अपने आपको बचाकर रखें। बालिग बनने के पहले वे कई किस्म के नशे के आदी हो चुके रहते हैं, कई किस्म के जुर्म की कमाई पर जिंदा रहना सीख चुके रहते हैं, और जवान होते बदन की जरूरत को पूरा करने के लिए वे तरह-तरह के सेक्स-अपराध भी करते रहते हैं। कई ऐसे अपराध सामने आए हैं जिनमें बालिग मुजरिमों के साथ, उनके गिरोह में नाबालिग भी शामिल थे। इस तरह उनकी ट्रेनिंग भी जुर्म की होते चल रही है। आज जिन लोगों को यह लगता है कि जुर्म की राह पर चल पड़े ऐसे बच्चे अपने ही परिवारों की दिक्कत हैं, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि नशे के लिए ऐसे नाबालिग या बालिग किसी भी दिन सडक़ पर या किसी सार्वजनिक जगह पर किसी भी संपन्न या साधारण व्यक्ति की पसलियों में चाकू उतारकर नशे के लायक पैसा जुटा सकते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले मुम्बई में एक फिल्म अभिनेता पर हुए हमले में जिस तरह के साधारण नौजवान शामिल थे, उससे यह बात समझ पड़ती है कि देश में किसी बड़े व्यक्ति का कत्ल करने के लिए भी कुछ लाख रूपए लेकर सुपारी उठाने को तैयार लोगों की कमी नहीं है। जब समाज में ऐसे लोगों का अनुपात बढ़ते चलेगा, तो अपने आपको बंद घरों और बंद कारों में सुरक्षित महसूस करने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं रह जाएंगे। 

अब हरियाणा के उस छोटे बच्चे पर लौटें, जो कि अपनी ही स्कूल की छोटी सी बच्ची पर इतनी भयानक हिंसा का मजा ले रहा था, तो उसके बारे में आई शुरूआती जानकारी बताती है कि वह कोई हिंसक वीडियो गेम खेलने का शौकीन था। आज ही एक किसी वीडियो गेम के बारे में पश्चिम से खबर आई है कि उसमें हिंसा का एक सीन दिखाने के लिए दक्षिण कोरिया की एक विमान दुर्घटना के बाद बिखरी हुई लाशों के असली वीडियो डाले गए हैं। जब इस हादसे के मृतकों के परिवारों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर आपत्ति दर्ज कराई, तब उस वीडियो गेम कंपनी ने वे सीन हटाने का वादा किया है। आज जिन लोगों को अपने बच्चों को पिस्तौल, मशीनगन, तलवार, गदा, त्रिशूल, या दूसरे किस्म के हथियारों के खिलौने देने में कुछ अटपटा नहीं लगता है, उन्हें भी यह समझने की जरूरत है कि न तो बड़ों के देखे जाने वाले हर किस्म के हिंसक टीवी सीरियल या सिनेमा बच्चों के लायक रहते हैं, और न ही हथियारों वाले खिलौनों का असर मासूम रहता है। बड़ों को कई बार यह बात समझ नहीं पड़ती कि जिस कमरे में वे जुर्म और हिंसा की कहानियां टीवी पर देखते रहते हैं, वहां आते-जाते बच्चों पर भी उसका असर पड़ता है। कई माँ-बाप तो इस खतरनाक दर्जे के लापरवाह रहते हैं कि हिंसा और जुर्म के कार्यक्रमों के बीच उसी कमरे में बैठे बच्चे सब देखते-सुनते रहते हैं। उनके कौन से वीडियो गेम, या मोबाइल गेम हिंसा वाले रहते हैं, यह भी देखने की फुर्सत बहुत से माँ-बाप को नहीं रहती। कई माँ-बाप अपने बच्चों की मौजूदगी में अखबार पढ़ते हुए एक-दूसरे से हिंसा की खबरों की बातें करते हैं, और वे बातें बच्चों के कानों में भी पड़ती हैं। कई लोग फोन पर बात करते हुए एक दूसरी ही दुनिया में चले जाते हैं, और वे अपने आसपास कौन है इसे भूल ही जाते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है। 

दिक्कत यह है कि बाल मनोविज्ञान को समझने वाले लोगों का हिन्दुस्तान में अकाल पड़ा हुआ है। गजब बात यह है कि इस देश में बेरोजगारों की फौज भी है, और परामर्शदाताओं का अकाल है। किसी को परामर्श देने की नौकरी देने के लिए ही उसे मनोविज्ञान की जानकारी देना जरूरी नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए भी मनोवैज्ञानिक समझ विकसित करना बेहतर बात होगी। आज सरकार अगर लोगों को कुछ पढ़ाने का प्रस्ताव रखे, तो लोग तुरंत ही उसके बाद नौकरी की उम्मीद करने लगेंगे। इसलिए औपचारिक पढ़ाई से परे, आधे-एक दिन के मनोवैज्ञानिक समझ के कार्यक्रम समाज के अलग-अलग तबकों के लिए होने चाहिए, ताकि वे अपने घर को संभाल सकें, और उठते-बैठते आसपास के दूसरे लोगों को भी नसीहत दे सकें। सरकार से परे सामाजिक संगठनों को भी अपने सदस्यों की पारिवारिक जिंदगी बेहतर बनाने के लिए ऐसी कोशिशें करनी चाहिए। हिन्दुस्तान में आज की जिंदगी में सभ्यता की महीन बातों की कोई इज्जत नहीं रह गई है, पता नहीं कैसे यह नौबत सुधर पाएगी, और फिलहाल तो अधिक असभ्यता की तरफ बढ़ता हुआ यह समाज अपने खुद के लिए और अधिक खतरा खड़ा करते ही दिख रहा है।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर 2026



 

जिन राज्यों में पंजाब-हरियाणा दोनों आ सकते हैं, उनमें पड़ा हुआ है चैंपियनों का टोटा…1`

31 अक्टूबर 2026  

 

भारत की महिला पहलवान मनीषा भानवाला ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल जीतकर नया इतिहास रचा। वे ऐसी पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। इसके आखिरी एक-दो मिनटों का वीडियो देखने लायक है जिसमें मनीषा पूरी ताक़त के साथ कुश्ती की चटाई पर मजे से घूम रही थी, और उसके सामने की अमरीकी खिलाड़ी दोनों हाथों को घुटने पर टेककर झुकी हुई थी, वह खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। हरियाणा की मनीषा ने हरियाणा की और बहुत सी महिला खिलाडिय़ों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा लिया है, लेकिन इस बार उसने अपने खेल में देश में सबसे ऊपर की जगह दर्ज करा ली है, और इस मुकाबले में तो पूरी दुनिया में।

इस कामयाबी को देखकर हमने कुछ ढूंढने की कोशिश की कि हरियाणा के मिट्टी-पानी में ऐसा क्या है कि वहां से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए इतने खिलाड़ी निकलते हैं। कुछ आंकड़ों को देखें, पेरिस के इस पिछले ओलंपिक में भारत के 117 खिलाडिय़ों में से 24 अकेले हरियाणा के थे, करीब 20.5 फीसदी। और हरियाणा की आबादी देश की आबादी की 2 फीसदी ही है। आबादी के अनुपात में हरियाणा ने 10 गुना अधिक खिलाड़ी उगले हैं। इसी ओलंपिक में हरियाणा के बगल के पंजाब को देखें, तो वहां के 19 खिलाड़ी थे। ये दोनों राज्य मिलकर भारतीय दल का 36 फीसदी थे। पंजाब की आबादी देश की आबादी की कुल सवा दो फीसदी के करीब है। इस तरह पंजाब-हरियाणा के खिलाड़ी सबसे आगे रहे। अब राज्य की सरहद के भीतर की बात अगर देखें, तो इन दोनों राज्यों में लोगों की क़द-काठी बहुत से दूसरे राज्यों के लोगों के मुकाबले अधिक रहती है। यह एक बहुत बड़ा शारीरिक कारण हो सकता है। देश की सरहद के इस हिस्से के लोगों की क़द-काठी ऐसी क्यों हैं इसके इतिहास में अगर जाएंगे तो हो सकता है कि कुछ लोगों को अप्रिय लगने वाले कुछ डीएनए तथ्य सामने रखना पड़े। लेकिन उससे परे हम इन दोनों राज्यों में खिलाडिय़ों के महत्व पर एक नजर डालें, तो लगता है कि एक तरफ तो हरियाणा लड़कियों और महिलाओं की जींस और उनके मोबाइल फोन पर पाबंदी लगाने वाली खाप पंचायतों के लिए भी जाना जाता है, लेकिन दूसरी तरफ कुश्ती की पोशाक में लड़कियों को खेलने की इजाजत देने में हरियाणा देश में सबसे आगे है। फिर लगे हुए इन दोनों राज्यों को देखें तो इनमें खेलों की एक बड़ी पुरानी मजबूत स्थानीय परंपरा है, गांव-गांव में अखाड़े रहे हैं, कस्बों में ईनामी मुकाबले होते हैं, और बहुत से परिवार यह मानते हैं कि किसी एक बड़े खिलाड़ी के निकल जाने से परिवार का भला भी हो सकता है। इसलिए वहां नई पीढ़ी को खेलने का अधिक हौसला और मौका भी दिया जाता है।

लेकिन थोड़ा सा और आगे चलें तो एक समाचार वेबसाइट, द क्विंट ने एक विश्लेषण किया था जिसमें 2023 के एशियाई खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धाओं के पदक विजेताओं के राज्यों का आबादी के आधार पर विश्लेषण किया गया था। इनमें हरियाणा सबसे आगे था, और उसके बाद मणिपुर, तेलंगाना, पंजाब और केरल भी अच्छे अनुपात वाले राज्यों में थे। लेकिन यह हिसाब-किताब सिर्फ 2023 के एशियाई खेलों के आधार पर था। अगर हम सभी अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत के अलग-अलग राज्यों की ताक़त, या वहां के खिलाडिय़ों की ताक़त को देखें, तो हरियाणा कुश्ती, मुक्केबाजी, हॉकी, एथलेटिक्स, और शूटिंग में बहुत मजबूत है। मणिपुर अपनी छोटी सी आबादी के अनुपात में फ़ुटबॉल, वेटलिफ्टिंग, मुक्केबाजी, और हॉकी में खासी उल्लेखनीय कामयाबी वाला राज्य है। पंजाब हॉकी, एथलेटिक्स, कुश्ती, और शूटिंग में मजबूत है। केरल भी एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, और वॉलीवॉल जैसे कुछ खेलों में मजबूत है। मिज़ोरम और गोवा छोटे-छोटे राज्य होने के बावजूद फुटबॉल में मौजूदगी रखते हैं। तमिलनाडु शतरंज में सबसे अधिक चैंपियन पेश करने वाला राज्य है, लेकिन इसके साथ-साथ वह एथलेटिक्स, हॉकी और शूटिंग में भी मौजूदगी रखता है। महाराष्ट्र शूटिंग, कुश्ती, बैडमिंटन, क्रिकेट, जैसे कई खेलों में आगे है।

अब हम उन राज्यों को देखें जिनमें आबादी तो अच्छी-खासी है, लेकिन खेलों के मामले में जो तकऱीबन ठन-ठन गोपाल हैं। बिहार और उत्तरप्रदेश में इक्का-दुक्का खिलाडिय़ों को छोड़ दें तो आबादी के अनुपात में उसकी खेल और खिलाड़ी सफलता तकऱीबन जीरो है। इन दोनों राज्यों में कई हरियाणा और कई पंजाब समा सकते हैं, अकेले यूपी में 4 हरियाणा और 4 पंजाब आ सकते हैं, बिहार में भी दो हरियाणा और दो पंजाब आ सकते हैं, लेकिन इनका खेलों से कोई लेना-देना नहीं दिखता है। मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है, और छत्तीसगढ़ के अलग होने के पहले वह और भी बड़ा था। लेकिन इन दोनों ही राज्यों में अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों का तकऱीबन अकाल है। किसी एक ओलंपिक, या एशियाई, राष्ट्रमंडल खेलों में कभी-कभार इन राज्यों से एक खिलाड़ी का नाम आ जाता है, लेकिन कुल मिलाकर इनकी हालत कमजोर है। एक दिलचस्प बात यह है कि देश में जिन दो राज्यों में फुटबॉल का सबसे पुराना इतिहास रहा है, उनमें, बंगाल और गोवा में अब राष्ट्रीय टीम के लायक़ खिलाड़ी घटते चले गए हैं। ओडिशा, बंगाल, कर्नाटक, आंध्र-तेलंगाना, जैसे और कई राज्य हैं जो कि अलग-अलग क्षमताओं के हैं, लेकिन वहां से खिलाड़ी अधिक नहीं निकल पाए। ओडिशा ने एक राज्य के रूप में देश की हॉकी टीम के प्रायोजक की भूमिका बीते कई बरस से निभाई है, और उसके चलते यह टीम आसमान पर भी पहुंच गई है, लेकिन इसका ओडिशा को कोई घरेलू फायदा नहीं हो सका।

हम घूम-फिरकर फिर उसी हरियाणा की मिसाल पर आते हैं तो कद-काठी वाले डीएनए से परे समाज और सरकार के काबू की चीजों को देखें तो यह साफ है कि गांव-गांव तक से खेलों को मिलने वाला प्रोत्साहन खिलाड़ी पैदा करता है, और उनमें से कुछ को चैंपियन बनने तक की ताक़त देता है। समाज भी आगे बढ़ाता है, और सरकार भी। हमें लगता है कि देश के बाकी सारे राज्यों को बैठकर आईना देखना चाहिए कि हरियाणा, पंजाब, और मणिपुर से वे क्या सबक ले सकते हैं? सरकारों की दिलचस्पी बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में रहती है, जिन पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन खेल के मैदानों को बाजार बना देना, उनका बाजारू इस्तेमाल करना, उनको धार्मिक और राजनीतिक कार्यक्रमों से पाटकर रखना, बच्चों  के खिलाड़ी बनने की राह में एक बड़ी बाधा है। बड़े स्टेडियम में जाकर खेलने लायक़ तो वे तब ही बन सकते हैं जब वे गाँव और मोहल्ले के, स्कूलों के मैदानों पर खेलने का मौका पाएं, खेल मुकाबलों में जाने पर रोज़ खाने का भत्ता इतना रहे कि पेट भर सके, सोने के लिए दरी के बजाय गद्दा मिल जाए, स्कूलों में खेल का सामान मिल जाए, और मैदान शामियानों के गड्ढों के बिना खेलने लायक मिल जाए। बाकी प्रदेश अपने खेल प्रदर्शन को कैसे सुधार सकते हैं, इसे तो हमारी तरह की बहुत मामूली समझ रखने वाले लोग भी समझ पाते हैं, लेकिन सरकारों में बैठे हुए बड़े-बड़े दिग्गज, और खेल संघों की राजनीति पर क़ाबिज़ दानवीय ताकत रखने वाले लोग सब कुछ समझते हुए भी अपने छोटे-छोटे मतलब में व्यस्त रहते हैं। आज हरियाणा के बहाने हमें लिखने का मौका मिला है, तो लिख रहे हैं, आगे तो ताकतवर लोग बड़े समझदार हैं हीं।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर 2026



 

नक्सल हिंसा खात्मे की बड़ी कामयाबी वाली इस राज्य की सालगिरह और सोचने के मुद्दे

30 अक्टूबर 2026  

 

देखते ही देखते छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना की एक और सालगिरह आ गई। यह रजत जयंती वर्ष पूरा गुजर गया, और अब वर्तमान साय सरकार का कार्यकाल आधा होने के साथ ही राज्य अगले चुनाव की तरफ धीरे-धीरे बढ़ चला है। 25 बरस किसी राज्य की जिंदगी में न बहुत अधिक होते हैं, और न ही बहुत कम। इसलिए छत्तीसगढ़ को इस मौके पर पलटकर एक नजर यह जरूर देखना चाहिए कि वह कहां से कहां तक पहुंचा है, और फिर आगे देखकर सफर बढ़ाना चाहिए क्योंकि अगला मूल्यांकन चुनाव में तो होगा ही, लेकिन सरकारों और पार्टियों से परे यह करीब 25 बरस बाद होगा जब देश आजादी की सौवीं सालगिरह मना रहा होगा। पिछले बरस भी इन पहलुओं को लेकर बहुत से विश्लेषण हुए थे, लेकिन कब तक राज्य की भाजपा सरकार के कार्यकाल को बहुत समय नहीं हुआ था, और चुनावी घोषणापत्र की कुछ सबसे बड़ी बातों पर अमल ही मूल्यांकन का एक बड़ा पैमाना था। अब महतारी वंदन योजना के तहत प्रदेश की अधिकतर शादीशुदा महिलाओं को मिलने वाले हजार रूपए महीने इन सबका हक बन चुके हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह राशन और बिजली की रियायत एक चुनाव के बाद अगले चुनाव में वोटरों के लिए कोई मुद्दा नहीं रहतीं। इसलिए राज्य को अगले दो बरस में सरकार और सत्तारूढ़ दल से बेहतर और असरदार प्रदर्शन की उम्मीद रहेगी। 

हम आज जब पिछली सालगिरह के बाद के इस एक बरस का मूल्यांकन करना चाहते हैं, तो बस्तर में नक्सल हिंसा का खात्मा इस राज्य के इतिहास की सबसे बड़ी घटना लगती है। न सिर्फ इस सरकार की उपलब्धि, बल्कि राज्य बनने के बाद से इस हिंसक उग्रवाद का खात्मा, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ दूसरे राज्यों से भी इसका खत्म होना एक असाधारण घटना रही। जब यह राज्य बना था, तो अविभाजित मध्यप्रदेश से विरासत में नक्सल हिंसा मिली थी, और छत्तीसगढ़ की सरकारों की कम या अधिक कोशिशों के बावजूद कुछ भी कारगर साबित नहीं हुआ था। हर बरस सैकड़ों जवान मारे जाते थे, और सैकड़ों ग्रामीण आदिवासी भी। ऐसा लहूलुहान बस्तर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की घोषित की गई 31 मार्च 2026 की तारीख के पहले इस हैरतअंगेज तरीके से नक्सल हिंसामुक्त हो जाएगा, इस पर अधिक लोगों को भरोसा नहीं था। लेकिन जिस अंदाज में नक्सल नेताओं से बातचीत हुई, साथ-साथ सुरक्षाबलों ने घेरेबंदी करके मुठभेड़ भी जारी रखी, उसका मिलाजुला असर बस्तर की शांति की शक्ल में सामने आया। आज दशकों के बाद बस्तर गोलियों और धमाकों से इतना आजाद हो चुका है कि पिछले दो-चार दिनों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां के सैकड़ों नेताओं की सुरक्षा घटाई जा रही है। अब बस्तर में किसी की जिंदगी पर भी पहले सरीखा खतरा नहीं मंडरा रहा है, बल्कि बेहतर यह कहना होगा कि कोई भी खतरा नहीं मंडरा रहा है। 

यह नौबत बस्तर के विकास के लिए एक ऐतिहासिक संभावना लेकर आई है। जाने किस भरोसे से अमित शाह ने यह घोषणा की है कि बस्तर देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनेगा, जिस तरह नक्सल हिंसा खत्म हुई, उसी तरह अगर यह दूसरी घोषणा भी पूरी होती है, तो यह छत्तीसगढ़ के लिए दूसरी ऐतिहासिक घटना होगी। साथ ही आज सालगिरह के मौके पर यह राज्य सरकार, यहां की सरकारी मशीनरी, और बस्तर के सारे ही नेताओं के लिए चुनौती का एक मौका भी है कि हिंसा खत्म होने के बाद का वहां का शून्य विकास की जो चुनौती पेश कर रहा है, उसमें कौन-कौन क्या कर सकते हैं? हम इन आशंकाओं को बढ़ाना नहीं चाहते कि बस्तर की खदानों को निजी कारोबारियों के हवाले कर दिया जाएगा। जहां पर नक्सली नहीं थे, वहां पर भी खदानों का निजीकरण एक नियमित प्रक्रिया रही, और यह देश-प्रदेश में किसी भी सरकार के रहते हुए जारी रही। इसलिए सत्ता के खिलाफ इस आरोप को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना हमेशा से चलते रहा है। अगर किसी इलाके में खनिज हैं, तो वे पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाए बिना अगर निकाले जा सकते हैं, तो कोई भी सरकार उस तरफ आगे बढ़ेगी। बस्तर के विकास के लिए जितने बजट की जरूरत पड़ेगी, हो सकता है कि बस्तर की खदानों से उससे काफी अधिक मुनाफा सरकारों को मिले, और वह देश-प्रदेश के दूसरे काम भी आए। लेकिन खदानों के मुद्दे से परे भी सोचने की जरूरत है कि दशकों से जिस बस्तर के बहुत बड़े नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकार की काम की संस्कृति खत्म हो चुकी थी, वहां पर नियम-कानून के तहत काम करने की आदत कैसे शुरू हो पाएगी? अभी कुछ अखबारों की रिपोर्ट बताती हैं कि बस्तर के जंगलों में सरकारी विभाग ने किस तरह से भर्राशाही से सैकड़ों-हजारों करोड़ खर्च किए, जिस पर कोई निगरानी भी नहीं थी। ऐसी खबरें बताती हैं कि सरकारों को इन इलाकों में काम करने के लिए अधिक सावधानी सीखनी पड़ेगी। कई लोगों का यह भी मानना है कि आदिवासी इलाकों में वहां के जनप्रतिनिधि ही जनता के बड़े शोषक बन जाते हैं, इस पहचान से भी छुटकारा पाना नेताओं के लिए बेहतर होगा क्योंकि हिंसा खत्म होने के बाद लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढऩा तय है, और वे शोषकों की शिनाख्त बेहतर तरीके से कर पाएंगे। 

अब बस्तर से परे बाकी छत्तीसगढ़ को देखें, तो सालगिरह के मौके पर सरकार को कमर कसकर यह देखने की जरूरत है कि जिन मौजूदा योजनाओं पर बरसों से खर्च हो रहा है, उस खर्च की कोई जवाबदेही तय हो पा रही है? आज तो हर दिन ऐसी दर्जनों खबरें आती हैं कि छोटी-छोटी सी योजना पर खर्च हुए करोड़ों रूपए फिजूल हो गए दिखते हैं, क्योंकि सारा काम ठप्प पड़ा है, इमारतें अधूरी हैं, मशीनें खराब हैं, जनता के किसी काम नहीं आ रही है। इसके बावजूद उसी ढर्रे से उसी तरह के नए कामों पर खर्च जारी है क्योंकि सरकारी अमले को नया खर्च हमेशा आकर्षक लगता है। पीछे के अधूरे कामों की जवाबदेही अगर तय नहीं होगी, तो मौजूदा सरकार को अपने आखिरी के बरस में अपने पहले के बरसों के किए गए काम मुंह चिढ़ाते खड़े रहेंगे। किसी सत्तारूढ़ पार्टी को किसी काम के होने से जितना नफा होता है, उससे अधिक नुकसान किसी अधूरे, बिगड़े हुए, या भ्रष्टाचार में डूब गए कामों से होता है। इसलिए सरकार को नई मुनादियों के साथ-साथ कड़ाई से यह भी जांचना-परखना चाहिए कि बीते बरसों में हुए काम, इस सरकार के आने के पहले की योजनाओं की भी आज क्या हालत है? चारों तरफ सरकारी कामकाज अधूरा, बंद, या बिगड़ा हुआ अगर दिखता रहेगा, तो नए शुरू होने वाले काम की साख भी कम रहेगी। भारत में चुनाव तो पांच-पांच साल के लिए होते हैं, सरकारें भी आती-जाती रहती हैं, लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल के काम पूरे करने, जारी रखने, सुधारने का जिम्मा भी नई सरकार पर रहता ही है। चाहे जिस सरकार ने खर्च किया हो, पैसा तो जनता की जेब का गया था, और आज वह काम आ रहा है, इसे जांचने का एक पुख्ता इंतजाम सरकार को करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि सरकारी लागत से हुए किसी भी काम की उत्पदकता की निरंतरता पर निगरानी रखना किसी भी नए काम को छेडऩे के मुकाबले अधिक जरूरी बात है। 

सालगिरह के मौके पर खुशियों के जलसे तो अच्छी बात है, छत्तीसगढ़ के पास नक्सल हिंसा से मुक्त होने की एक बड़ी कामयाबी भी खुशियां मनाने के लिए है। लेकिन इसके साथ-साथ सरकार को अपने काम और राज्य को बेहतर बनाने के बारे में बड़ी गंभीरता से सोचना चाहिए। नक्सल हिंसा मोटेतौर पर बस्तर, और बाहर के कुछ आदिवासी जिलों तक सीमित थी। इसके खत्म होने की बात को पूरे प्रदेश में लोग लंबे समय तक याद नहीं रखेंगे, कम से कम वोट इससे बहुत अधिक प्रभावित नहीं होंगे। दूसरी तरफ महतारी वंदन जैसी योजनाओं का फायदा एक चुनाव में भाजपा को हो चुका है, अब तो दूसरे प्रदेशों ने इस एक हजार रूपए महीने के मुकाबले बहुत अधिक रकम भी महिलाओं को दी जा रही है, इसलिए अगले चुनाव में यह छत्तीसगढ़ की सत्तारूढ़ भाजपा के सामने भी चुनौती रहेगी। जलसों के इस मौके पर सरकार को कमर कसकर अगले दो बरस बेहतर बनाने की जरूरत है, चुनावी जीत-हार से परे भी हम तो राज्य के भले के लिए सरकारों के चौकस रहने, और जनता के पैसों के खर्च की जवाबदेही तय करने के हिमायती हैं।

(Daily Chhattisgarh)