दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर 2026


 

जलवायु परिवर्तन और बाकी नुकसान देखकर कृषि-नुकसान घटाने की तरकीबें जरूरी...

27 अक्टूबर 2026  

 

एक चक्रवाती तूफान के चलते आज से तीन दिन चार राज्यों में भारी बारिश की मौसमी-भविष्यवाणी की गई है। हर बारिश गरीबों की बहुत बड़ी आबादी के लिए दिक्कत-परेशानी लेकर आती है। एक वक्त था जब मुम्बई की मानसूनी बारिश देखने के लिए खाड़ी के देशों से शेख कुनबे सहित आकर मुम्बई में समंदर किनारे की होटलों में रूकते थे, और बारिश देखते थे, क्योंकि रेगिस्तान वाले देशों में कभी ऐसी मानसूनी बारिश उन्हें देखने नहीं मिलती थी। लेकिन गरीब हिन्दुस्तानी के लिए बारिश में जीना दूभर होता है। किसान और खेतिहर मजदूर तो खेतों की फसल के मुताबिक बारिश से खुश रहते हैं, लेकिन कृषि अर्थव्यवस्था से परे के लोगों की निजी जिंदगी तकलीफ में डूब जाती है। शहरी बस्तियां अराजक और अनियोजित तरीकों से बसी हुई हैं, और वे तेज बारिशों में डूब जाती हैं। लोगों के घरों का सामान बर्बाद हो जाता है। कई दिनों तक रोजी छिन जाती है क्योंकि वे घर छोडक़र काम पर निकलने की हालत में नहीं रहते, और बर्बादी भी बहुत होती है। पानी में डूबा हुआ सामान बाद में काम का नहीं रह जाता। 

लेकिन फसल और जल आपूर्ति के दो बड़े मकसद ऐसे हैं जो कि पानी से जुड़े हुए हैं। अभी पिछले तीन-चार दिनों से लगातार ये खबरें आ रही हैं कि दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी कितना कम रह गया है। कल की ही हैदराबाद की खबर थी कि वहां पर बीते बरसों के मुकाबले पानी के टैंकरों से सप्लाई कितने गुना बढ़ गई है, और यह मानसून के तुरंत बाद का हाल है। अभी ठंड के पूरे महीने बाकी हैं, और उसके बाद उस गर्मी के महीने बाकी हैं जो कि आज के लबालब प्रदेशों को भी सुखा डालती है। फिर खेती के लिए जो बारिश जरूरी और अच्छी होती है, उसके बारे में भी यह समझने जरूरी है कि फसल में पानी की जरूरत पूरे वक्त एक सरीखी नहीं रहती, कभी पानी कम लगता है, और कभी अधिक। ऐसे में जब जलवायु परिवर्तन के चलते हुए बारिश के महीने और हफ्ते बदल जा रहे हैं, कभी बहुत सीमित समय में बहुत अधिक बारिश हो जा रही है, जो कि बहकर नदियों के रास्ते समंदर चली जाती है, और कभी जब बारिश की जरूरत है, तो सूरज तपते रहता है, बादलों का ठिकाना नहीं रहता है। ऐसे में खेतों, इंसानों, और जानवरों की पानी की जरूरत पूरी होने का ठिकाना नहीं रह गया है। इसके अलावा आज देश में बहुत से कारखाने खूब सारा पानी मांगते हैं, और उन कारखानों को अधिकतर प्रदेशों में प्राथमिकता से पानी दिया जाता है, क्योंकि कोई भी राज्य कारखाने खोना नहीं चाहते। ऐसे में बांधों के जलाशयों में लगातार घटते चले जा रहे जलभंडार के बंटवारे में एक ऐसी खींचतान चल रही है, जिसमें लुभावनी राजनीति, कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था की प्राथमिकता तय करने का गलाकाट मुकाबला चलते रहता है। 

अभी समुद्री तूफान से जुड़ी इस बेमौसम की बारिश, और उसमें भी अंधाधुंध बारिश को लेकर दो बातें लगती हैं। एक तो यह कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में धान की जो फसल खेतों में तैयार खड़ी है, वह तेज बारिश में गिर सकती है जिससे कटाई के बाद उपज कम मिलेगी। दूसरी बात यह कि पिछले बरस का भी जो धान अभी तक मंडियों के अहातों में खुले में पड़ा हुआ है, उसका और नुकसान होगा। धान का यह पूरा चक्र अपने आपमें एक आर्थिक दुष्चक्र सरीखा रहता है क्योंकि इसमें भारी सरकारी अनुदान के साथ किसान की फसल खरीदी जाती है, जिसमें सरकारी बजट का एक खासा हिस्सा खर्च होता है। इसके बाद इस धान के परिवहन से लेकर उसकी मिलिंग तक, और फिर उस चावल के राज्य और केन्द्र सरकार के गोदामों में पहुंचाने तक भ्रष्टाचार का एक बड़ा सिलसिला चलता है। इसके साथ-साथ एक दूसरा भ्रष्टाचार चलता है कि छत्तीसगढ़ जैसे बेहतर इंतजाम वाले राज्य में अड़ोस-पड़ोस के राज्यों से चोरी-छुपे लाकर धान बेचा जाता है, और उस पर भी छत्तीसगढ़ का धान-अनुदान बर्बाद होता है। इन सबके साथ-साथ जब मौसम की मार से भी धान खराब होता है, तो मानो बाजार भाव से खासे महंगे में खरीदे गए धान, और बनवाए गए चावल की तरह-तरह की बर्बादी होती है। इसी से जुड़ा हुआ चावल का दुष्चक्र शुरू होता है जिसमें केन्द्र और राज्य सरकारों की रियायती अनाज योजनाओं के तहत मुफ्त या सस्ते में चावल दिया जाता है, और उसमें भी एक बड़ी चोरी चलती है। 

एक तरफ जलवायु परिवर्तन के चलते खेती की अर्थव्यवस्था पर न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में खतरा मंडरा रहा है। दूसरी तरफ लुभावनी राजनीति के चलते केन्द्र और राज्यों सरकारों की फसल-अनुदान और राशन योजनाओं पर जो भारी-भरकम रकम खर्च होती है, उसका एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और बर्बादी में भी चले जाता है। ऐसे में जब कभी मौसम की मार पड़ती है, तो उससे ये दोनों ही बातें बड़ी रफ्तार से बढ़ती हैं। देश में धान जैसी फसलों का मौसमी उत्पादन इतना अधिक है, और उसे गोदामों में कुछ महीनों ही रखने की जरूरत पड़ती है, इसलिए पक्के गोदाम बनाने का काम पूरी फसल के अनुपात में तो होने का कोई आसार नहीं दिखता है। आज की इस तूफानी बारिश के खतरे के वक्त गोदामों की कमी और भी अधिक खलती है। चाहे फसल राज्य सरकार की खरीदी हुई हो, या वह मिलिंग के लिए निजी राईसमिलरों को दी गई हो, या फिर वह केन्द्र और राज्य सरकार के अनाज गोदामों में पहुंची हुई हो, किसी भी वजह से उसका बर्बादी एक राष्ट्रीय बर्बादी है। आज जब केन्द्र सरकार देश में निजीकरण को बढ़ाते चल रही है, तो ऐसे में एक कल्पनाशील योजना बनाकर पक्के गोदामों को बढ़ाने का काम करना चाहिए ताकि फसल, या उससे तैयार किया गया अनाज रखने के लिए गोदाम रहें, और बर्बादी न हो। राज्यों को भी यह सोचना चाहिए कि आज उन्हें झेलनी पड़ रही बर्बादी के मुताबिक अगर वे अलग-अलग जिलों में, या अनाज उत्पादक केन्द्रों के बीच बड़े-बड़े निजी गोदामों को बढ़ावा दें, तो उससे उनकी कितनी बचत होगी? आज बाजार के कारोबारी नए कारोबार की संभावनाओं को देखकर तुरंत ही हिसाब लगा लेते हैं कि उनके पूंजीनिवेश पर मुनाफा कितना होगा। बड़े-बड़े फसल और अनाज गोदामों के लिए सरकारें अगर अपनी खाली जमीनें दें, और गोदामों को किराए पर लेने की किसी तरह की गारंटी दे सकें, तो इससे राष्ट्रीय बर्बादी घट सकती है। केन्द्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों, और गठबंधनों की सरकारों की पौन सदी हो चुकी है। अब तक अर्थशास्त्रियों, विशेषज्ञ-अफसरों, और कृषि-प्रबंधकों के पास पर्याप्त अनुभव हो चुका है। हम अपनी सीमित समझ से कोई असीमित सुझाव देना नहीं चाहते, लेकिन लगातार चल रही बर्बादी, और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नुकसान देखते भी नहीं बन रहा है। देखें कि कौन सी सरकार कारोबार के साथ मिलकर एक संभावना ढूंढ पाती है।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

बेवजह फख्र करने वाले दुनिया को उड़ते पंछी की नजरों से देखें

26 अक्टूबर 2026  

 

अभी एक स्कूल के मिडिल और हाईस्कूल के बच्चों के बीच कुछ पत्रकारों को आमंत्रित करके मीडिया के पेशे के बारे में बच्चों को कुछ जानकारी दिलवाई गई, और उनको अपने सवालों के जवाब भी मिले। एक पत्रकार से बच्चों ने पूछा कि जब किसी दूसरे पड़ोसी देश के बारे में लिखना रहता है, तो किस तरह की दुविधा होती है? वहां जवाब दे रहे संपादक हैरान थे कि छोटे बच्चों के मन में पत्रकारिता का इतना गहरा और जटिल सवाल कैसे आया जिससे कि अधिकतर पत्रकार भी मुक्त रहते हैं। किसी और देश के साथ अपने देश के रिश्तों, मामलों, और टकराव पर लिखने वाले पत्रकार भी आमतौर पर हमारा देश, उनका देश, इस तरफ, उस तरफ जैसी भाषा लिखते हैं। जाहिर तौर पर वे एक देश के नागरिक होकर लिखते हैं, और ऐसे में दूसरे देश के बारे में उनकी लिखी गई बातें किसी निष्पक्ष या तटस्थ की लिखी हुई नहीं रह जाती, बल्कि जुड़े हुए दो देशों में से एक के नागरिक की लिखी हुई बातें रहती हैं। द्विपक्षीय मामलों में इस तरह का लिखा हुआ कोई वजन नहीं रखता, क्योंकि शांतिकाल में, सरहद से दूर, बिना किसी जंग के जब लिखा जाता है, तो किसी फौज के साथ जड़े हुए जर्नलिस्ट की तरह लिखना जरूरी नहीं रहता। 

जिन लोगों को जानकारी न हो कि जंग की रिपोर्टिंग किस तरह होती है, उनके लिए यह बताना जरूरी है कि जंग में शामिल देशों में से किसी एक देश की फौज के साथ इम्बेड होकर, जडक़र ही कोई जर्नलिस्ट रिपोर्टिंग कर सकते हैं, क्योंकि दोनों तरफ के टकराव के बीच खुद होकर, अकेले जाकर रिपोर्टिंग नहीं की जा सकती। ऐसी रिपोर्टिंग के साथ इस बात का जिक्र अनिवार्य रूप से कर दिया जाता है कि संवाददाता ने किस फौज के साथ जडक़र यह रिपोर्ट की है। लेकिन शांतिकाल में सरहद से दूर बैठे विश्लेषकों के लिए यह कहीं जरूरी नहीं रहता कि वे एक देश के साथ जडक़र विश्लेषण करें या अपने विचार लिखें। वे अपने आपको किसी देश का नागरिक मानकर उस हिसाब से भी लिख सकते हैं, या अपने आपको सरहदों से ऊपर का एक निष्पक्ष, तटस्थ विश्लेषक या विचारक मानकर भी लिख सकते हैं। यह बारीकी अखबारनवीसी में भी अधिक दूर तक नहीं निभाई जाती, चीखते चैनलों को तो यह माकूल बैठ भी नहीं सकता। हमारे नियमित पाठकों ने महसूस किया होगा कि हम लंबे बरसों से बिना सरहद के किसी ओर हुए, एक वैश्विक जिम्मेदारी के साथ लिखते हैं, और जब दो देशों के मुद्दों पर लिखना होता है, तो हम उनमें से किसी भी देश के नागरिक नहीं रह जाते। 

इस पर लिखने की आज इसलिए सूझ रही है कि सोशल मीडिया पर आज किसी ने यह लिखा है कि लोग बात-बात पर गर्व करने लगते हैं। किसी को किसी शहर में पैदा होने या रहने का गर्व रहता है, किसी को अपनी भाषा या बोली का, किसी को किसी देश का नागरिक होने, या किसी जात-धरम का होने का गर्व रहता है। ऐसे छोटे-छोटे गर्व करते हुए लोग यह भूल जाते हैं कि वे इस विशाल धरती के एक बड़े छोटे हिस्से के ही नागरिक हैं। जो भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है, उस भारत का भूभाग भी दुनिया में बड़ा विशाल दिखता है। लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि धरती की कुल जमीन का कुल 2.4 फीसदी ही भारत में हैं। और अगर हम जमीन और पानी दोनों की पूरी सतह को ले लें, तो भारत का पूरा इलाका 0.64 फीसदी है। दूसरी तरफ लोगों ने कई बार ऐसी तस्वीरें देखी होंगी जिनमें इस आकाशगंगा के अलग-अलग ग्रहों को आकार के हिसाब से दिखाया गया है, और उनमें पृथ्वी नाम का यह ग्रह कितनी छोटी गोली सरीखा दिखता है! फिर उस गोली के 0.64 फीसदी इलाके पर भारत है, और 140 करोड़ से अधिक आबादी में से एक ही कोई एक व्यक्ति है। अपने आपको जब दुनिया की हकीकत की विशालता के मुकाबले देखा जाए, तभी यह समझ पड़ता है कि छोटी-छोटी बातों पर गर्व करना कितना बेबुनियाद है। दुनिया भर के ग्रहों का संसार इतना विशाल है, और इंसानों की जानकारी से परे भी जाने कितनी ही आकाशगंगाएं और हो सकती है, इन सबके बीच एक इंसान समंदर के सैकड़ों किलोमीटर के तट पर रेत के एक कण से अधिक कुछ नहीं है, और कण होने का गर्व है कि वह एक चट्टान जितना बड़ा है! 

जब किसी को दुनिया के दूसरे मुद्दों के मुकाबले अपने-आपको आंकना हो, अपने किसी पड़ोसी से, प्रतिद्वंद्वी या विरोधी से कोई मुकाबला करना हो, तो धरती से ऊपर आसमान पर उड़ते किसी पंछी की नजर से देखना चाहिए जिसे सरहद नहीं दिखती, जमीन बराबर दिखती है। अगर लोगों को कोई भी सार्थक विश्लेषण करना हो, या विचार लिखने हों, तो वे किसी एक पक्ष का होकर दूसरे पक्ष के खिलाफ नहीं लिखे जा सकते। दोनों ही पक्षों से बराबरी की दूरी बनाकर, अपने-आपको ऐसे दोनों देशों से, या दोनों प्रदेशों से, दोनों जातियों, या दोनों धर्मों से परे के होकर ही लिखा जा सकता है। एक काबिल और ईमानदार जज का अपना कोई धर्म हो सकता है, लेकिन जब दो धर्मों के बीच के किसी विवाद पर फैसला देना हो, तो उसे किसी भी धर्म से ऊपर उठकर ही काम करना होता है। प्रेमचंद की पंच-परमेश्वर कहानी में उनकी लिखी एक बात याद पड़ती है- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? कहानी में एक पंचायत चलती रहती है, और वहां इंसाफ मांगती एक महिला, एक दोस्त के खिलाफ फैसले से हिचकते हुए, धर्मसंकट और दुविधा में फंसे हुए एक पंच से सवाल करती है कि क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? हमारा ख्याल है कि जब कभी किसी देश-प्रदेश के नागरिक को, किसी जात-धरम के व्यक्ति को ऐसे द्विपक्षीय मामलों पर लिखना रहे, तो उसे प्रेमचंद की कहानी के एक किरदार के पूछे गए इस सवाल को याद रखना चाहिए। 

जंग की बात निकली तो यह लिख देना जरूरी है कि आमतौर पर किसी जंग में पहली लाश सच की गिरती है। दोनों तरफ की राजनीतिक ताकतें अपनी फौजी दिलचस्पी से युद्धोन्माद को राष्ट्रवादी उन्माद में बदलती हैं, और किसी भी तरह के सवालों को भालों से भी अधिक नुकीला मान लिया जाता है। ऐसे वक्त सच लिखने के हौसले के लिए खासे अभ्यास हो चुके रहने की जरूरत पड़ती है। इसलिए जंग की चुनौतियों से घिरने के पहले ही लोगों को उड़ते हुए पंछी की नजर से बेसरहद दुनिया को देखने की आदत डालनी चाहिए। दुनिया की चुनौतीपूर्ण नौबतों में अपने-आपको बहुत छोटे-छोटे तबकों में बांटकर, उन पर फख्र करने से कुछ हासिल नहीं होता। कुछ छोटे बच्चों ने एक सवाल उठाया था, उसका जवाब देते हुए बात इतनी लंबी हो गई है। लोगों को गर्व करना हो, तो सचमुच की किसी बड़ी बात पर गर्व करें, बात-बात पर किया गया गर्व हवा भरे गुब्बारे से अधिक वजनदार नहीं रहता।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अक्टूबर 2026


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जाति बहिष्कार की हिंसा, बूढ़े बाप का अधेड़ बेटे ने तनाव में कर दिया कत्ल!

25 अक्टूबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके की खबर है कि एक गांव में 50 साल के बेटे ने अपने 70 साल के बाप का कत्ल कर दिया। यह बेटा कुछ अरसा पहले दूसरी जाति की एक लडक़ी या महिला से शादी करके अपने घर ले आया था, और पिता को डर था कि गैरजात में शादी से परिवार का सामाजिक बहिष्कार हो जाएगा। इसे लेकर बाप-बेटे में आए दिन झगड़ा होते रहता था, और इसी झगड़े के चलते बेटे ने बूढ़े बाप को मार डाला। छत्तीसगढ़ आदिवासी, दलित, और ओबीसी समुदायों की बहुतायत वाला प्रदेश है। बहिष्कार की जो बीमारी एक समय सवर्णों और नीची कही जाने वाली जातियों के लोगों के बीच चलती थी, वह अब चारों तरफ फैल गई है। एक जाति के भीतर ही उपजातियों के रिश्तों को लेकर बहिष्कार होने लगे हैं, कहीं सगोत्र विवाहों पर बहिष्कार होता है, तो कहीं दूसरी जाति पर। ऐसा लगता है कि जात और समाज के संगठन बहिष्कार की लाठी चला-चलाकर ही अपना दबदबा कायम रखते हैं। छत्तीसगढ़ में एक ओबीसी जाति में तो अंतरजातीय विवाहों पर इतने कड़े जाति बहिष्कार का चलन हो गया है कि 16 हजार से अधिक परिवार ऐसे बहिष्कार के शिकार हैं। फिर यह भी है कि ऐसे सारे बहिष्कार कुछ लाख रूपए का जुर्माना देकर खत्म भी करवाए जा सकते हैं। मतलब यह कि संपन्न परिवारों के लिए बहिष्कार कोई मुद्दा नहीं रहता, उनके लिए वह एक बार का एक खर्च ही रहता है। लेकिन बहुत से ऐसे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार रहते हैं, जो कि बहिष्कार के नाम से कांपते हैं, और कोशिश करते हैं कि कुछ जुर्माना भरकर किसी तरह जाति में वापिसी हो जाए। एक तरफ तो न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, बल्कि पूरे देश में शहरीकरण बढ़ रहा है जो कि जाति व्यवस्था के बाहुबल को कमजोर करने वाला विकास है, और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में जाति बहिष्कार करने का एक बाहुबल है जिसके दम पर किसी जाति के नेता अपनी हुकूमत बनाए रखते हैं। 

आज जब दुनिया कहीं से कहीं निकल चुकी है, जब दुनिया का एक सबसे विकसित, संपन्न, और ताकतवर देश अमरीका दुनिया का मेल्टिंग पॉट कहलाता है, यानी एक ऐसा बर्तन जिसमें अलग-अलग कई धातुओं को पिघलाकर एक किया जाता है। दुनिया भर की अलग-अलग राष्ट्रीयता, धर्म, रंग, जाति के लोग मिल-जुलकर नए परिवार बनाते हैं, एक बिना सरहद वाला समाज बनाते हैं, और आगे बढ़ते हैं। ऐसे अमरीका के मुकाबले आज जब पिछड़े हुए हिन्दुस्तान के पिछड़े हुए प्रदेश छत्तीसगढ़ में पिछड़ी जातियों के लोग बहिष्कार नाम की तलवार चलाते हुए अपने ही लोगों का सिर काटते हैं, तो समझ पड़ता है कि ऐसे समाज अगले सौ-दो सौ साल भी मेल्टिंग पॉट वाले समाज का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। छत्तीसगढ़ तो फिर भी बहिष्कार करके संतुष्ट हो जाता है, भारत के कई हिस्सों में जाति या धर्म, या फिर महज संपन्नता का भेदभाव इतना हिंसक है कि पारिवारिक शान के नाम पर खून बहा दिया जाता है। और यह फिजूल की फर्जी शान सिर्फ परिवार की लडक़ी से जुड़ी रहती है। लडक़ी ने अगर किसी ऐसी जाति या धर्म के लडक़े से मर्जी से शादी कर ली जिसे कि उसका परिवार अपने से नीचा मानता है, तो ऑनरकिलिंग के नाम पर ऐसी लडक़ी को भी मार डाला जाता है, और कई मामलों में प्रेमी से उसके पति बने हुए व्यक्ति को भी। कत्ल करने को यह समाज अपनी शान समझता है, और फिर ऐसे कत्ल के बाद चाहे बाप-बेटे, चाचा-ताऊ कई लोग जेल ही क्यों न चले जाएं। हो सकता है कि जेल में भी वे अपनी मूंछें ऐंठते हुए घूमते रहते हों कि उन्होंने खानदान की इज्जत मिट्टी में मिलाने वाली बेटी को ही खत्म कर दिया, और साथ-साथ उसके प्रेमी या पति को भी। छत्तीसगढ़ अभी इतना खूनी नहीं हो पाया है, और यहां के जाति संगठन जाति बहिष्कार करके अपने बोकरा-भात का इंतजाम करते रहते हैं, कमाई भी करते रहते हैं। 

जिन नेताओं से कुछ लोग समाज सुधार की उम्मीद करते हैं, उनमें से कुछ तो खुद ही ऐसे बहिष्कार का शिकार रहते हैं, और वे खुद भी अपनी जाति व्यवस्था के आतंकतले दबे रहते हैं। चूंकि वोटों के लिए ऐसे नेता इसी समाज व्यवस्था के मवाली ठेकेदारों के मोहताज रहते हैं, इसलिए इस कट्टर व्यवस्था के खिलाफ कोई मोर्चा भी नहीं खोलते। हम तो यह देखकर हैरान रहते हैं कि देश के अलग-अलग प्रदेशों में आज से एक-डेढ़ सदी पहले समाज सुधारकों ने जिस हौसले और बहादुरी से बाल विवाह और सतीप्रथा के खिलाफ मोर्चे खोले थे, जिस बहादुरी से छुआछूत को खत्म करवाया था, जिस बहादुरी से आर्य समाज ने हिन्दू धर्म के भीतर की जातियों के बीच शादियां करवाना शुरू किया था, वह पूरी बहादुरी छत्तीसगढ़ से दूर-दूर ही दिखती है। इस राज्य के इतिहास को याद करें तो जाति व्यवस्था की कट्टरता के खिलाफ कोई सामाजिक मोर्चा पहली नजर में तो याद नहीं पड़ता है। लोग अधिक से अधिक अपने आपको इस जाति व्यवस्था का शिकार बनने से किसी तरह बचा लेते हैं, और वही उनकी मानो सबसे बड़ी बहादुरी है। 

हर कुछ महीनों में कहीं न कहीं से ऐसी खबर आती है कि जाति से बहिष्कृत किए गए परिवार में कोई मौत होने पर अंतरजातीय विवाह वाली किसी संतान के पहुंचने पर पूरा गांव या समाज मृतक की शवयात्रा को भी छोडक़र चले जाता है। अगर अंतरजातीय विवाह वाले अपने बच्चों को भी कोई परिवार आने-जाने देता है, तो बाकी समाज उससे रोटी-बेटी का रिश्ता तोड़ लेता है। कहने के लिए तो किसी भी किस्म के बहिष्कार के खिलाफ छत्तीसगढ़ में एक बड़ा कड़ा कानून बनाया गया है जो कि अंधविश्वास से लेकर जाति व्यवस्था की कट्टरता तक की हिंसा कम करने के लिए है। लेकिन बहुत से लोग अदालतों तक जाकर सिर पटकते रहते हैं कि उनकी जाति के भीतर उनका बहिष्कार चल रहा है, गांव में न उन्हें कोई काम देते, और न ही कोई उनसे लेन-देन करते, लेकिन अदालतें असरदार नहीं दिखती हैं। यह सिलसिला आज 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में भी ज्यों का त्यों बरकरार है। अब ऐसे में दो धर्मों के बीच किसी तरह के संबंध की तो बात भी करना बेकार है। 

बीते जाने कितने ही दशक हो चुके हैं, भारत के और राज्यों में भी कहीं से जाति व्यवस्था के खिलाफ कोई सुधारवादी आंदोलन सुनाई नहीं पड़ता है। हाल के दशकों में तो लगातार कट्टरता ही बढ़ती चल रही है, क्योंकि बढ़ती कट्टरता ही वोटों के ध्रुवीकरण में काम आती है। लेकिन ऐसी नौबत में एक बात को लेकर हैरानी होती है कि क्या बहिष्कृत किए गए लोगों को उसी समाज में लौटने की कोशिश भी करनी चाहिए, और क्यों करनी चाहिए? छत्तीसगढ़ में एक रामनामी सम्प्रदाय है, जब राम के पूजक हिंदू समाज ने अपने इन दलित लोगों को मंदिरों में आने नहीं दिया था, तो इन लोगों ने पूरे बदन पर राम-राम गुदवाकर अपनी देह को ही मंदिर सा बना लिया था। यह पूरा का पूरा सम्प्रदाय, और इसकी प्रथाएं उसी छुआछूत के प्रति एक बहुत ताकतवर विद्रोह थी। राम का तो कोई अस्तित्व है नहीं कि उससे इस अन्याय को खत्म करने की उम्मीद की जाती, राम के नाम पर पूजा के हक के एकाधिकारवादियों के खिलाफ यह विद्रोह किया गया था, और उसने एक ताकतवर सम्प्रदाय को जन्म दिया। यह एक अलग बात है कि यह विद्रोह समाज व्यवस्था के दूसरे आर्थिक पहलुओं तक नहीं पहुंच पाया, और सिर्फ धार्मिक उपासना तक सीमित रहा। लेकिन क्या आज छत्तीसगढ़ में जाति व्यवस्था के तहत हिंसक और कट्टर बहिष्कार के शिकार परिवारों को इससे विद्रोह करके इस फौलादी ढांचे से बाहर निकलने की नहीं सोचना चाहिए? और यह सुझाते हुए खुद हमें लगता है कि छत्तीसगढ़ में जिस जाति में बहिष्कार नाम की हिंसा सबसे अधिक व्यापक है, उसी जाति के लोगों का हिन्दू धर्म छोडक़र ईसाई बनना क्या उसी किस्म का विद्रोह नहीं है? हम तो केवल आज एक मुद्दे पर चर्चा शुरू करके छोड़ दे रहे हैं, कोई लंबा समाजशास्त्रीय अध्ययन यहां पर मुमकिन नहीं है, लेकिन हमारे पाठक बहस को आगे बढ़ा सकते हैं, इस पर सोचने की जरूरत है कि एक बूढ़े बाप के लिए अपने अधेड़ बेटे को विजातीय विवाह के लिए ताने कसना जरूरी लगता था, और इस बेटे को इस तनाव में बूढ़े बाप का कत्ल करके बकाया उम्र जेल में काटना भी बेहतर लगने लगा था। छत्तीसगढ़ की यह ताजा घटना भी अगर लोगों को सोचने पर मजबूर न करे, तो फिर यह समाज विचारविहीन हो चुका है।

(Daily Chhattisgarh)    

माँ और दुधमुंहे बच्चे के बुनियादी हकों से अनजान है हिन्दुस्तान !

25 अक्टूबर 2026

 

तमिलनाडु में अभी कुछ महीनों से एक महिला विधायक की जमकर आलोचना हो रही है कि वह सार्वजनिक कार्यक्रमों में गोद में अपनी छोटी सी बच्ची को लेकर जाती है। विरोधियों ने इसे जनता के बीच शोहरत पाने का एक नाटक कहा है, दूसरी ओर कुछ शिशु विशेषज्ञों ने भी इसे बच्ची की सेहत के खिलाफ बताया है कि भीड़ वाली जगहों पर कई तरह के संक्रमण का खतरा रहता है। यह महिला विधायक आर. पल्लवी चेन्नई की एक सीट से जीतकर विधानसभा आई हैं, और वे विधानसभा सत्र के दौरान भी एक सहायिका के पास अपनी बच्ची को सदन के बाहर छोडक़र सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं। जब राजनीतिक विरोधियों ने इसे राजनीतिक ड्रामा करार दिया तो उन्होंने कहा कि इतनी छोटी बच्ची को घर पर अकेला छोडक़र जिम्मेदारी निभाना मुमकिन नहीं है, इसमें कोई ड्रामा, या सीन क्रिएट करने वाली बात नहीं है। उन्होंने कहा भले ही आप किसी मां के दर्द को न समझ सकें, लेकिन कम से कम इसे बिना सोचे-समझे सोशल मीडिया पर ट्रोल न करें। 

कुछ हफ्ते पहले हमने अपने अखबार में इस पर एक रिपोर्ट छापी थी, लेकिन अभी एक दूसरी खबर आई जिसकी वजह से छोटे बच्चों वाली माताओं पर लिखने की जरूरत लगी।

अभी मुंबई आईआईटी की एक मुस्लिम महिला मरियम हेन्ना की कहानी सामने आई है। जब आईआईटी में पीएचडी करने के लिए मरियम ने अर्जी दी, वे गर्भवती थीं। चार महीने बाद जब दाखिला इम्तिहान हुआ, तो उनका बेटा हो चुका था। पीएचडी के लिए चुन लिए जाने पर वे इस छोटे से बेटे के साथ केरल से मुंबई आ गईं, और जहां कहीं इतने छोटे बच्चे के देखरेख की सहूलियत नहीं थी, मरियम अपने बेटे को क्लासरूम, प्रयोगशाला, और बैठकों में भी लेकर जाती थी। यह सिलसिला थका देने वाला था, लेकिन इस जीवट महिला ने इन दोनों जिम्मेदारियों को साथ-साथ, और बखूबी निभाना तय कर लिया था। उन्हें आईआईटी के संवेदनशील प्राध्यापकों की भी मदद मिली, वे प्रयोगशाला के कोने में छोटा सा बिस्तर लगाकर खिलौनों के साथ बेटे को बिठाकर रखती थीं। उनके बेटे ने आईआईटी में ही खिसककर और घुटनों पर चलना सीखा। क्लासरूम में कभी प्राध्यापक उनके बेटे को गोद में उठा लेते थे, तो कई बार सहपाठी उसे संभालकर हेन्ना को काम करने का मौका देते थे।

योरप की कुछ संसदों में ऐसी महिला सांसद रही हैं जो कि अपने दुधमुँहे बच्चों को गोद में लेकर सदन की कार्रवाई के बीच ही दूध पिलाती रहती थीं, और कभी किसी ने इस बात पर आपत्ति की हो, यह सुनाई नहीं पड़ता। यह बहुत हैरानी की बात है कि तमिलनाडु की महिला विधायक की उठाई जा रही दोहरी जिम्मेदारी को लोग शोहरत पाने का शिगूफा समझ रहे हैं। दरअसल यह देश ही ऐसा है। यहां पर अपने बच्चे-बच्ची को दूध पिलाने की मां की, दुनिया की एक सबसे बुनियादी प्राकृतिक जरूरत में लोग अश्लीलता भी ढूंढ लेते हैं। यह देश बहुत ही क्रूर संवेदनाओं का देश है। जिंदगी की महीन चीजें, बारीक मानवीय जरूरतें, इस देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को छू भी नहीं गई हैं। यहां के लोग बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल करने के लिए आईना देखने के बजाय सालाना पुतला बनाकर उसे जलाते हैं। ऐसे लोगों से मां और उसके छोटे बच्चों की जरूरतों को समझने की उम्मीद भी नाजायज है।

कहने के लिए तो इस देश की बहुसंख्यक आबादी कृष्ण के बाल रूप पर मोहित रहती है, दीवारों पर तस्वीरें, और कैलेंडर, घरेलू पूजा, घरों में प्रतिमाएं, और कहानियों से लेकर गीतों तक बालकृष्ण से लेकर रामलला तक लोगों को सुहाते हैं, लेकिन घरेलू कामगारों से लेकर निर्माण स्थलों तक मजदूरिन के बच्चे मालिकों को खटकते हैं। महाराष्ट्र के गन्ना किसान महिलाओं को कटाई के मौसम में काम देने के लिए गर्भाशय निकलवा देने की शर्त रखते हैं, और ऑपरेशन करवाते हैं कि माहवारी के दिनों में उनकी मेहनत कम न हो जाए। और फिर यह देश चारों तरफ देवी प्रतिमाओं की पूजा में जुट जाता है, और भगवानों के बालरूपों की पूजा में भी।

लोगों को मां और बच्चों के गुणगान की कहानियां सुहाती हैं, और बच्चों की चाह में मन्नतें मानी जाती हैं, लेकिन अपनी औलाद की चाह में जमीन-आसमान एक कर देने पर उतारू लोग भी किसी को घरेलू कामकाज पर रखने के पहले यह ठोक-बजा लेते हैं कि उसके छोटे बच्चे तो नहीं है। दरअसल आठ हाथों वाली देवी प्रतिमाओं के किसी भी हाथ में औलाद थामी हुई नहीं रहती, वे हाथ हथियार, या औजार ही थामते हैं, और इसलिए वे देवी-प्रतिमाएं लोगों को सुहाती हैं। वही देवी अगर संतान थामे कामकाज की जगह पर पहुंच जाती है, तो वह खटकने लगती है।

चूंकि दुधमुँहे बच्चे वोटर बनने से बहुत दूर रहते हैं, और तमाम नेताओं को यह पता रहता है कि उनके पूरे राजनीतिक जीवन, या पूरे जीवनकाल में ये दुधमुँहे बच्चे शायद ही कभी वोटर बनें। इसलिए इन बच्चों के हक की कोई परवाह करने की जरूरत नेताओं को नहीं लगती। काम की जगहों पर बच्चों को दूध पिलाने का कोना आज भी अनहोनी किस्म का रहता है। कानून चाहे जो कहता रहे ऐसे कमरे बहुत कम जगहों पर शक्ल ले पाते हैं। अधिकतर दफ्तर और कारोबार इस फेर में रहते हैं कि बच्चे के आने के आसार ही जैसे ही दिखने लगे किस तरह ऐसे लोगों को जिम्मेदारी, या काम से दूर कर दिया जाए। ऐसे देश में आईआईटी मुंबई की इस मलियाली मुस्लिम महिला, और उसके प्रति संस्थान, शिक्षकों, और सहपाठियों का सकारात्मक सहयोग एक राहत देता है। अपने आसपास देखकर यह सोचने की जरूरत है कि ऐसी मां और उसके बच्चों के लिए हमारा क्या बर्ताव रहेगा अगर हमारा कामकाज उस महिला से जुड़ा रहेगा?

(Daily Chhattisgarh)  

लगातार बढ़ता सरकारी ऑनलाईन काम, और साइबर हमलों के खतरे..

24 अक्टूबर 2026  

 

अभी भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक, स्टेट बैंक के हजारों ग्राहकों की जानकारी लीक हो गई, और इंटरनेट पर मुजरिमों के बाजार, डार्क वेब पर बिकने के लिए मौजूद थी। खबर लगने पर स्टेट बैंक ने अपने ग्राहकों के लिए कुछ चेतावनी या सावधानी जारी की है। साथ ही एक अधूरा सा स्पष्टीकरण भी जारी किया है कि इस लीक से बैंक के सामान्य कामकाज पर फर्क नहीं पड़ा है। इस बारे में कोई खुलासा स्पष्टीकरण में नहीं है कि जिन हजारों लोगों की जानकारी बाजार में आ गई है, उनके लिए क्या-क्या खतरा हो सकता है। बिना एआई के भी हैकर आए दिन भारत की बहुत सारी सरकारी वेबसाइटों पर हमला करते ही रहते हैं। कई ऐसे मौके भी आए हैं जब पाकिस्तानी हैकरों ने भारत के कुछ सरकारी वेबसाइटों पर कब्जा कर लिया, और पाकिस्तान का झंडा वहां लहरा दिया। अभी भी सरकार और कारोबार दोनों के बहुत सारे वेबसाइट ऐसे रहते हैं जिन पर हमले होते ही रहते हैं। और यह सब एआई के इस्तेमाल के पहले का है। आज तो बहुत सारी बड़ी एआई कंपनियों के एजेंट (इंसान नहीं एआई) दुनिया के कई विकसित देशों की सरकारों की वेबसाइटों पर हमले कर रहे हैं। भारत में धीरे-धीरे न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकारों का बहुत सारा काम डिजिटल होते-होते, ऑनलाईन होते-होते अब अनिवार्य रूप से ऑनलाईन हो चला है। आपको बिजली-पानी जैसी मामूली म्युनिसिपल शिकायतों को भी दर्ज कराना हो, कलेक्टर दफ्तर से जुड़ी हुई कोई शिकायत दर्ज कराना हो, तो उसके लिए कॉल सेंटर हैं, या ऑनलाईन इंतजाम हैं। सरकार ने कागजी तौर पर तो ये सारे इंतजाम कर दिए हैं, लेकिन हकीकत में बहुत सारे प्रदेशों और शहरों में ये इंतजाम चौपट पड़े हैं। लोग घंटों फोन लगाते रहते हैं, शिकायत के नंबर ही नहीं लगते। ऑनलाईन शिकायत दर्ज कराते हैं, तो उसका कोई जवाब नहीं मिलता। अब एक खतरा यह है कि ऐसे ऑनलाईन रिकॉर्ड तक अगर किसी हैकर की पहुंच हो जाए, तो उन्हें एक साथ यह लिस्ट मिल जाएगी कि किस नंबर और पते वाले किस व्यक्ति की क्या शिकायत है, और उसके बाद तरह-तरह साइबर अपराधी उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। 

हमारा तजुर्बा यह है कि किसी काम को डिजिटल और ऑनलाईन करना तो आसान है, लेकिन उसे हैकरों की घुसपैठ से बचाकर रखना खासा मुश्किल है। और हैकर की हरकतें हर बार आपको पता लग जाएं, ऐसा भी नहीं होता। कई बार तो वे सिर्फ जानकारी की नकल करके जा सकते हैं, और पहली नजर में ऐसे संस्थान का कोई नुकसान नहीं दिखेगा। यह सब कुछ तो इंसानी घुसपैठिए करते ही आ रहे थे, अब तो एआई कंपनियों के घुसपैठिए एजेंट ऐसे हैं जो कि दूसरी एआई कंपनियों तक घुसपैठ करके, उन कंपनियों के एआई-कम्प्यूटरों को मार-मारकर उनसे अपना काम करवा रहे हैं, और कई-कई दिनों तक इन दोनों कंपनियों को यह पता नहीं लग रहा कि किस कंपनी का छुट्टा सांड किस कंपनी के खेत में घुसकर उसे चर रहा है। अब एआई पर आधारित औजार इतने बढ़ते चले जा रहे हैं कि उनका हथियारों की तरह इस्तेमाल बहुत आसान और व्यापक होते जा रहा है। ऐसे में सरकारें अपने हर काम को ऑनलाईन करती चलें, तो किसी दिन उनका सिस्टम ध्वस्त हो जाने का खतरा अलग रहेगा, शिकायतकर्ता की ढेरों जानकारियां मुजरिमों के हाथ पहुंच जाने का खतरा भी बना रहेगा। डार्क वेब इंटरनेट का ऐसा हिस्सा है जहां दुनिया भर के मुजरिम लोगों की निजी, गोपनीय, और संवेदनशील जानकारी टका सेर बेचने के लिए टोकरी लिए बैठे रहते हैं। कोई व्यक्ति पांच-दस लाख लोगों के आधार कार्ड नंबर, और फोन नंबर लेकर ग्राहक ढूंढते रहते हैं, तो कोई दूसरे लोगों की चिकित्सा की जानकारी लेकर उसे बेचते रहते हैं। 

हैकिंग किस दर्जे की हो रही है, इसकी सबसे ताजा मिसाल बहुत ही भयानक है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का दामाद जारेड कुशनर बहुत से अंतरराष्ट्रीय विवादों में ट्रम्प का प्रतिनिधि होकर मध्यस्थता करने दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलते रहता है, साथ ही कारोबारियों से भी वह अपने धंधे की बात करते रहता है। अब यह जानकारी अमरीकी मीडिया में आई है कि हॉलैंड की सरकार ने जारेड कुशनर के फोन पर एक ऐसी घुसपैठ की थी कि जब वह दुबई स्थित अपने बैंक खाते से लेन-देन कर रहा था, तो हॉलैंड की खुफिया एजेंसी इसके स्क्रीनशॉट देख रही थी। वह वॉट्सऐप के संदेशों में घुसपैठ नहीं कर पाई थी, लेकिन उसने रूस के एक ऐसे खुफिया एजेंट को फोड़ लिया था जो कि रूसी सरकार के लिए जारेड कुशनर के मोबाइल फोन में घुसपैठ करके उसकी स्क्रीन को देख रहा था। रूसी एजेंसी के कब्जे के ऐसे स्क्रीनशॉट को हॉलैंड की एजेंसी भी देख रही थी क्योंकि उसने इस रूसी एजेंट के मार्फत रूसी कम्प्यूटर तक घुसपैठ बना ली थी। अब जब ट्रम्प का दामाद दुनिया भर के तमाम विवादास्पद लोगों के साथ बड़े-बड़े लेन-देन कर रहा था, तो ये बातें दुनिया के कम से कम दो एजेंसियां देख रही थीं। उनसे पता लग रहा था कि कैसे खाड़ी के एक देश के राजकुमार से लेकर दुनिया के कुछ बड़े मुजरिमों तक के साथ ट्रम्प के दामाद का बड़ा-बड़ा लेन-देन चल रहा था। इस लेन-देन से अमरीकी सरकार की नीतियों को किसी देश के पक्ष में बदलने का सौदा भी किया जा रहा था। अब पल भर को सोचें कि ट्रम्प के दामाद का फोन तो बहुत ही खास सुरक्षित रहना चाहिए था, लेकिन जब उसके स्क्रीनशॉट दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियां देख रही थीं, और बैंकों का लेन-देन दर्ज कर रही थीं, तो फिर दुनिया में और क्या सुरक्षित माना जा सकता है? 

यहीं पर यह भी समझने की जरूरत है कि वॉट्सऐप जैसे दुनिया के सबसे लोकप्रिय, और सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले मैसेंजर-एप्लीकेशन के संदेशों में घुसपैठ की भारत सरकार की मांग को खारिज करते हुए मेटा ने कुछ अरसा पहले भारत के एक हाईकोर्ट को कहा है कि सरकार अगर इस मांग पर अड़ी रहेगी, तो वह भारत में अपनी यह सेवा बंद ही कर देगा। जब दुनिया के अलग-अलग देशों में वहां के कानून की ताकत से लैस सरकारें अपनी खुफिया एजेंसियों के लिए दुनिया भर के संचार सिस्टमों में घुसपैठ में लगी रहेंगी, और एजेंसियां खुद होकर कानूनी या गैरकानूनी तरीके से यह घुसपैठ करती रहेंगी, तो फिर क्या सुरक्षित रह जाएगा? अभी कुछ ही बरस तो हुए हैं कि दुनिया भर के बहुत से देशों में यह बवाल खड़ा हुआ था कि वहां की सरकारें इजराइल के एक फौजी दर्जे के घुसपैठिया सॉफ्टवेयर, पेगासस की मदद से लोगों के फोन में घुसपैठ कर रही हैं। अमरीका ने तो इजराइल की बांहें मरोडक़र अपने देश के नंबरों को इस घुसपैठ से परे कर लिया था, लेकिन बाकी दुनिया को शायद ऐसी हिफाजत हासिल नहीं हो पाई थी। 

इन तमाम बातों को देखें, तो यह समझ में आता है कि बिजली-पानी जैसी छोटी-छोटी शिकायतें दर्ज करने वाली वेबसाइटों या कॉल सेंटरों से लेकर गोपनीय जानकारी रखने वाले कम्प्यूटरों तक कुछ भी घुसपैठियों के हमलों से सुरक्षित नहीं हैं। हालत यह है कि अखबारों की वेबसाइटों पर भी हमले होते हैं, और वहां किसी दूसरे देश के कोई संगठन अपने नारे लिख देते हैं। इसलिए बढ़ते हुए डिजिटलीकरण, और ऑनलाईन के शौक के साथ-साथ यह तौलना भी जरूरी है कि हर दिन हैकिंग की नई तकनीक इस्तेमाल हो रही है, और अगर आप कोई भी काम ऑनलाईन करना चाहते हैं, तो उसे लगातार बचाए रखने की कोशिशों को भी इंतजाम में शामिल करना पड़ेगा। ऑनलाईन कोई भी काम ईंट-गारे की इमारत जैसे नहीं है कि एक बार बनाकर उसे छोड़ दिया गया। ऑनलाईन काम, कम्प्यूटर या कॉल सेंटर के काम पूरे ही वक्त एक साइबर-ढाल भी मांगते हैं, अपनी हिफाजत के लिए।

(Daily Chhattisgarh)    

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

मुजरिमों के इश्तहार दिखा, बेशर्मी से कमाता फेसबुक

23 अक्टूबर 2026  

 

फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इश्तहार देखकर खरीदी करना, और धोखा खाना इतना आम हो चुका है कि यह समझदार बच्चों को भी समझ आ जाता है कि विज्ञापन फर्जी है, बस फेसबुक को समझ नहीं आता। मार्क जुकरबर्ग की समझ बड़ी कमजोर है, क्योंकि आंखों के सामने नोट छाए रहते हैं, उनके कंप्यूटर इतने कमजोर हैं कि प्लेटफॉर्म को भुगतान करके छपने वाले फर्जी विज्ञापनों को वे पहचान नहीं पाते। जब धोखा खाए हुए लोग ऐसे विज्ञापनों के नीचे सैकड़ों की संख्या में यह लिखते हैं कि वे धोखा खा चुके हैं, सामान नकली है, विज्ञापन फर्जी है, तो भी ऐसे शब्दों को फेसबुक का महान कंप्यूटर नहीं पढ़ पाता। जो कम्प्यूटर आपकी पसंद-नापसंद के एक-एक शब्द को पहचानता है, आप किस तस्वीर पर कितने पल थमे हैं, इसका भी नोटिस लेता है, वह कम्प्यूटर मार्क जुकरबर्ग के खजांची को यह नहीं बता पाता कि विज्ञापन का जो भुगतान आ रहा है, वह फर्जीवाड़े के लिए है। वैसे तो फेसबुक बड़ा होशियार बनता है, लेकिन जब धोखेबाजी से पैसा मिले, तो वह तुरंत ही जालसाजों के साथ भागीदारी कर लेता है।

अभी कल ही एक महिला इसी तरह ठगी गई है, तो फेसबुक की आम हरकतें याद आईं। फेसबुक का ही एक दूसरा प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम है, और उस इंस्टाग्राम पर महीनों से ऐसे इश्तहार चले आ रहे हैं जो बच्चों के सेक्स-वीडियो बेचने वाले लोगों के हैं। भारत के बच्चों के ऐसे वीडियो बेचने वाले लोग इंस्टाग्राम पर इश्तहार देते हैं, और एक दूसरी मैसेंजर सर्विस टेलीग्राम पर वीडियो की बिक्री करते हैं। बीबीसी ने एक खोजी रिपोर्ट में महीनों पहले इस बात का भंडाफोड़ किया था कि मेटा नाम की कंपनी अपने फेसबुक और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल चाइल्ड-पोर्नोग्राफी बेचने वाले लोगों को भुगतान लेकर करने दे रही है। कुछ महीनों के बाद बीबीसी की दूसरी रिपोर्ट आई कि ये विज्ञापन अब तक जारी हैं। दिलचस्प बात यह है कि मार्क जुकरबर्ग की कंपनी को जब यह पता भी लग जाता था कि चाइल्ड-पोर्नोग्राफी इस तरह से बेची जा रही है, तो भी उसकी कंपनी अमरीकी जाँच एजेंसियों को खबर करती थी, वह भारत सरकार को सीधे यह जानकारी नहीं देती थी। बीबीसी के मचाए हुए हल्ले के बाद और भारत सरकार के कई नोटिसों के बाद अब जाकर मेटा इस बात के लिए तैयार हुई है कि इस देश के बच्चों के साथ यह सबसे घिनौना जुर्म जब उसकी जानकारी में आएगा, तब वह अमरीकी एजेंसियों को बताने के बजाय सीधे भारत को इसकी जानकारी देगा। लेकिन ऐसे घिनौने जुर्म की कमाई के बारे में यह कंपनी कुछ नहीं कहती है। बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थान ने जब सुबूतों के साथ यह साबित कर दिया कि मेटा यह धंधा कर रही है, उसके बाद भी मार्क जुकरबर्ग जैसे कारोबारी को यह शर्म नहीं आई कि वह कहता कि ऐसे इश्तहारों से मिली कमाई को कंपनी दुनिया के बच्चों के लिए दे देगी।

दुनिया के ऐसे बड़े-बड़े टेक-कारोबारी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी इस घटिया दर्जे से निभाते हैं, और अमरीकी सरकार है कि इन्हीं कंपनियों को जिम्मेदारी दे रही है कि वे अपने विकसित किए हुए एआई को सुरक्षित रखने के लिए खुद ही इंतजाम करेंगे। यह तो वैसा ही हो गया कि मार्क जुकरबर्ग को किसी भारतीय अनाथालय का जि़म्मेदार बना दिया जाए। कारोबारी की क्या नैतिकता हो सकती है? हमने अभी-अभी तो भारत के उत्तराखंड में एक ऐसे होटल-कारोबारी का मामला देखा है जिसने वहां नौकरी करने वाली बेबस गरीब लडक़ी को होटल के एक खास मेहमान को खास सेवा देने के लिए दबाव डाला था, और अब वह ख़ास मेहमान देश की एक खास संवैधानिक कुर्सी तक पहुँच गया है। बस उस लडक़ी की मौत हो गई है, सुबूतों वाला कमरा बुलडोजर से गिरा दिया गया है। कारोबारों का हाल यही रहता है। अगर कारोबार की कोई नैतिकता रहती, तो भूखों की इस दुनिया में हथियार बनाने के कारखाने, रासायनिक हथियार बनाने के कारखाने कैसे चलते रहते? धर्म और कारोबार, इन दोनों की कोई नैतिकता नहीं होती। हमने फि़लिस्तीन पर बम बरसाने वाले इजराइलियों को देखा है, वहां के प्रधानमंत्री और फौजी अफ़सर यहूदियों के पूजा स्थल पर जाते रहते हैं, किसी यहूदी धर्मगुरु ने उन्हें नहीं रोका। अमरीका का कोई चर्च ट्रंप को बम बरसाने से नहीं रोकता। धर्म और कर्म, खासकर कारोबारी कर्म, इनसे किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए मार्क जुकरबर्ग हो, या एआई विकसित करने वाली कंपनियां हों, उनसे समाज के भले की उम्मीद करना मासूमियत की बात होगी।

आज एआई कंपनियां रोजाना मजबूर हो रही हैं यह खुलासा करने के लिए कि उनके एआई एजेंट दुनिया में कहां-कहां घुसपैठ कर रहे हैं, कहां-कहां तबाही कर रहे हैं। लेकिन दुनिया के पूंजी निवेशकों का इतना पैसा एआई कंपनियां खर्च कर चुकी हैं कि वे अब वापस लौट नहीं सकतीं, वे एक-दूसरे से गला-काट मुकाबला बंद नहीं कर सकतीं, वे चीन के मुकाबले पीछे रहना मंज़ूर नहीं कर सकतीं, इसलिए वे एक ऐसे दैत्य को और अधिक, और अधिक ताक़त देने की मुहिम में जुटी हुई हैं, जिस दैत्य के लिए आज भी उनके पास कोई पिंजरा नहीं है। दुनिया में जंगखोर कंपनियां इस बात के लिए जानी जाती हैं कि वे बहुत से देशों के बीच गैरजरूरी जंग छिड़वाती हैं ताकि उनके हथियार खप सकें। यह सिलसिला कारखानों के इतिहास के साथ ही शुरू हुआ होगा। अमरीका जैसे देश में कार बनाने वाली कंपनियों ने शायद रेल कंपनियों की पटरियां उखड़वा दी थीं ताकि लोग कारों पर चलने पर मजबूर रहें। आज भी अमरीका को देखना हक्का-बक्का करता है कि सार्वजनिक परिवहन वहां किस हद तक सीमित है, और कार और पेट्रोलियम पर लोग किस हद तक मोहताज हैं। कारोबार ऐसा ही बेरहम रहता है। इसलिए किसी को इस धोखे में नहीं रहना चाहिए कि मार्क जुकरबर्ग किसी इश्तहार के नीचे सैकड़ों लोगों के लिखे गए फर्जी, धोखा, जालसाजी जैसे शब्दों को पढऩे की भी कोशिश करेगा। कुछ दशक पहले तक हिंदुस्तान में ऐसे इश्तहार छपते थे जिसमें कोई तांत्रिक अंगूठी बेचने वाला रहता था, जिसे पहनने के बाद सारी हसरतें पूरी हो जाती थीं। कहीं कोई वशीकरण मंत्र सिखाने वाला रहता था जिससे दुनिया की किसी भी हसीना को फंसाया जा सकता था। विज्ञापनों की कोई नैतिकता हो सकती है? उसका सिर्फ एक ही इस्तेमाल होता है कि लोगों के बीच किसी सामान, या सेवा को बिकवाना। आज भी कोई बंगाली बाबा, तो कहीं कोई और चमत्कारी विज्ञापन करते ही रहते हैं कि वे वशीकरण कर देंगे, दुश्मन को मार देंगे, किसी लडक़ी को फंसा देंगे, और ऐसे विज्ञापन छापने, या टीवी पर दिखाने वाले लोग भी आज भी मौजूद हैं।

भारत के बच्चों के सेक्स-वीडियो बेचने के धंधे में मार्क जुकरबर्ग जिस तरह लगा हुआ है, यही काम उसने अमरीका में किया होता, यूरोप में किया होता, तो जेल में होता। ठीक उसी तरह जिस तरह कोल्ड ड्रिंक, चॉकलेट, या बच्चों के आहार में भारत जितनी शक्कर अगर अमरीका और यूरोप में वही कंपनी मिलाती, तो जेल में होती। जिस देश का क़ानून कमज़ोर रहता है, और कानून पर अमल और भी अधिक कमजोर रहता है वहां पर इसी तरह अंतरराष्ट्रीय लुटेरे डेरा डाल देते हैं, और धंधा चलाते हैं।

(Daily Chhattisgarh)