केन्द्र और राज्य सरकारों के काबू से इतना परे है लॉरेंस बिश्नोई?
19 अक्टूबर 2026
मुम्बई में कल एक व्यस्त इलाके में फिल्म अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर दो पिस्तौलबाजों ने तमाम लोगों के बीच हमला किया, और टाइगर और उनके ड्राइवर को जख्मी कर दिया, एकदम करीब से आखिरी गोली चलाते हुए पिस्तौल फेल हो गई, और शायद उसी से टाइगर की जान बची। बाद में एक ऑडियो संदेश भेजकर लॉरेंस बिश्नोई गिरोह की ओर से इस हमले का दावा किया गया। इसमें अपने आपको गोली चलाने वाला बताने वाले ने कहा कि सलमान खान के साथ जो भी काम करेंगे, उनका यही हाल होगा। अपने को बिश्नोई गिरोह का अनिल पंडित बताने वाले ने यह धमकी दी है कि टाइगर को पहले समझा दिया गया था कि सलमान के साथ काम न करे। उल्लेखनीय है कि लॉरेंस बिश्नोई गिरोह सलमान का इस नाम पर विरोध कर रहा है कि उस पर काले हिरण के शिकार का आरोप है। काले हिरण को बिश्नोई समुदाय पूजनीय मानता है। इसी बात को लेकर इस गिरोह ने दो बरस पहले मुम्बई में एक प्रमुख और चर्चित नेता बाबा सिद्दीकी का कत्ल किया था, और उसे भी सलमान के करीबी होने की वजह से निशाना बनाना बताया गया था। उसके कुछ अरसा पहले इसी गिरोह के लोगों ने सलमान के घर के बाहर गोलीबारी की थी। लेकिन यह गिरोह सलमान से परे भी देश-विदेश में कई तरह के जुर्म करता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, और महाराष्ट्र में कारोबारियों से रंगदारी मांगना, कत्ल की धमकी देना, और गोलीबारी करना इस गिरोह का आम काम बताया जाता है। गिरोह का सरगना वैसे तो गुजरात की एक कड़ी हिफाजत वाली जेल में है, लेकिन जेल के बाहर इस गिरोह का काम चल ही रहा है। 2022 में पंजाब में एक विख्यात गायक सिद्धू मूसेवाला को गोली चलाकर मार डाला था, और उसमें इसी गिरोह ने जिम्मेदारी ली थी। देश की एक सबसे बड़ी जांच एजेंसी एनआईए के मुकाबले बिश्नोई गिरोह के अलग-अलग सदस्य अलग-अलग जेलों में बंद रहते हुए भी मोबाइल फोन, और इंटरनेट-कॉलिंग उपकरणों के माध्यम से संपर्क में रहते हैं, और बाहर मौजूद अपने साथियों और शूटरों के माध्यम से जुर्म करते ही रहते हैं।
भारत का यह गिरोह भारत में तो जेल में बंद रहकर भी बेअसर नहीं हुआ है, लेकिन इससे परे दूसरे देशों में भी यह कत्ल और कई दूसरे तरह के जुर्म करता है। कनाडा ने लॉरेंस बिश्नोई गैंग को आतंकी संगठन घोषित किया है। अमरीका ने इस गिरोह पर कई गंभीर संघीय अपराध करने के आरोप लगाए हैं। फ्रांस में भी इस गिरोह के एक आदमी की गिरफ्तारी हुई है। कनाडा सरकार का कहना है कि वहां पर यह गिरोह कत्ल, गोलीबारी, और आगजनी में शामिल है, इसके अलावा कारोबारियों, और प्रमुख दक्षिण एशियाई लोगों से जबरन वसूली भी करता है। कनाडा सरकार का कहना है कि धमकियों और हिंसा से यह समुदायों में दहशत पैदा करता है, इसी साल जुलाई में अमरीका ने योरप के कुछ देशों और कनाडा के साथ मिलकर एक बड़े अभियान में 24 लोगों को गिरफ्तार किया था, इनमें से कुछ को बिश्नोई गैंग से जुड़ा भी बताया गया था। अमरीकी न्याय विभाग ने बिश्नोई गैंग पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने कनाडा में सिक्ख नेता हरदीप सिंह निज्जत की 2023 में हुई हत्या की साजिश की थी। अंतरराष्ट्रीय नशा तस्करी, अपहरण, रंगदारी वसूली में भी अमरीका और कनाडा में यह गिरोह सक्रिय है। अमरीकी न्याय अधिकारियों के अनुसार भारतीय जेल में बंद होने के बावजूद बिश्नोई अवैध मोबाइल फोन, और इंटरनेट-कॉलिंग से अपने नेटवर्क को लीड करते रहता है। अमरीकी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ब्रिटेन में भी इस गिरोह की वसूली चल रही है।
अब भारत के कई प्रदेशों में चर्चित और लोकप्रिय लोगों पर इस तरह के हमले करना, उनका कत्ल करना, यह एक भयानक नौबत है। देश और कई प्रदेशों की सरकारें जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई के सामने असहाय दिख रही हैं कि गिरोह के लोगों की शिनाख्त हो जाने के बाद भी सरकारें इनका धंधा बंद नहीं करवा पा रही हैं, जबकि दुनिया के कई देशों की सरकारें भी इनके पीछे लगी हुई हैं। जिस गुजरात की जेल में लॉरेंस बंद है, वह गुजरात भाजपा का राज है, और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गुजरात के लिए ही जवाबदेह हैं। ऐसे में देश में इतने खतरनाक हमले करना, इतनी डरावनी धमकियां देना, यह सब जारी रहना हैरान करता है। जिन देशों के साथ भारत के अच्छे रिश्ते हैं, उनमें से पश्चिम के आधा दर्जन देशों ने लॉरेंस गैंग के खिलाफ जुर्म दर्ज हैं, या जांच रिपोर्ट मौजूद हैं। इसके बाद भी हिन्दुस्तान की जेल से जुर्म का यह चलता हुआ साम्राज्य भारत की शान के भी खिलाफ है। जिन जेलों का पूरा नियंत्रण केन्द्र और राज्य सरकार के हाथ है, वहां पर अगर लगातार इस गिरोह के लोगों को संचार-सुविधाएं हासिल हैं, तो यह सरकारों की एक बहुत बड़ी कमजोरी है, जो कि समझ से परे है। ऐसे में पश्चिम के कुछ देशों में भारत पर लगने वाले ऐसे आरोप खबरों में आते हैं कि लॉरेंस बिश्नोई गिरोह का इस्तेमाल भारत सरकार भी दूसरे देशों में अपने, या देश के विरोधियों को खत्म करने में करती है।
कुछ दशक पहले तक भारत में मुम्बई बम धमाकों का सबसे बड़ा आरोपी, मुम्बई अंडरवल्र्ड का सबसे बड़ा डॉन, दाऊद इब्राहिम इसलिए भारत सरकार की पहुंच से परे रह पाया कि वह भारत से दुश्मनी वाले एक देश पाकिस्तान में रहकर काम करता बताया जाता था। लेकिन लॉरेंस बिश्नोई तो सरकार के काबू से बाहर रहने के मामले में दाऊद से भी बहुत आगे है कि वह भारत की जेल में रहकर भी भारत और दुनिया के कितने ही देशों में कत्ल करवा रहा है। आज जिस तरह मुम्बई में बाबा सिद्दीकी का कत्ल किया गया था, पंजाब में सिद्धू मूसेवाला का, और अब टाइगर श्रॉफ को मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी, उससे भारत में बेकाबू गैंगवार की एक झलक मिलती है, और यह वार मुजरिम गिरोह और सरकार के बीच चल रहा है। देश में रहने-जीने वाले लोगों की हिफाजत सरकार की जिम्मेदारी रहती है। अगर सलमान खान, या किसी और ने शिकार, या कोई और जुर्म किया है, तो उसकी सजा देने के लिए एक अदालती तरीका है। उससे परे अगर कोई सडक़ पर तथाकथित इंसाफ करना चाहे, और इस अंदाज में वसूली-उगाही करे, कत्ल करे, तो लोग कहां जाएंगे? महाराष्ट्र में भी भाजपा की गठबंधन सरकार है, इसलिए वहां होने वाले जुर्म को रोकने की जिम्मेदारी भी इसी सरकार पर आती है। हमें नहीं लगता कि भारत की किसी भी सरकार के विदेशों में जुर्म के ऐसे कोई काम हो सकते हैं, जिसके लिए देश के भीतर ऐसे भयानक जुर्म कर रहे गिरोह को पालने की जरूरत पड़े। फिर भी अगर दूसरे देशों की जांच एजेंसियों, और वहां के न्याय अधिकारियों को लॉरेंस गिरोह, और सरकार के बीच कोई रिश्ता बताना जायज लगता है, सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह कम से कम अपने देश को ऐसे जुर्म से बचाने असरदार कार्रवाई करे। देश-विदेश दोनों ही जगह पर भारत, और इसके प्रदेशों की सरकारों की साख पर जो बट्टा लग रहा है, उसे संभालना चाहिए। सरकारें पूरी तरह अपने कब्जे में, अपनी जेलों में बंद मुजरिमों के जुर्म न रोक पाए, यह हैरान भी करता है।
आज ही दिल्ली पुलिस का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वहां के एक आला अफसर मुम्बई के इस ताजा हमले के संदर्भ में लॉरेंस बिश्नोई का जिक्र करते हुए कह रहा है कि इस हमले के बाद के संदेश में ‘लॉरेंस बिश्नोई ‘‘साहब’’ का जिक्र था’।
..और कितने कीट-पतंगों के पुतले रावण के बगल खड़े किए जाएंगे?
18 अक्टूबर 2026

भारत में सुबह-सुबह सोशल मीडिया देखें, तो पश्चिमी देशों के समाचार अधिक दिखते हैं। वहां दोपहर, शाम, या रात चलती रहती है, और उस वक्त खबरें अधिक आती हैं। आज फ्रांस में बेहतर स्कूलों, बेहतर सुविधाओं को लेकर चल रहा आंदोलन एक बार फिर भभकते दिख रहा है। जगह-जगह आग लगी हुई है, और शहरी बाजारों के बड़े-बड़े शोरूम तोडक़र, उनमें घुसकर लोग सामान लूट रहे हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक बीते कल वहां साढ़े पांच लाख लोग सडक़ों पर थे, दूसरी तरफ मजदूर संगठन ने यह संख्या आठ लाख बताई है। ये आंदोलन रोजाना के बढ़ते खर्चों, पेट्रोलियम महंगाई, स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कक्षाओं में क्षमता से अधिक बच्चे, स्कूलों की खराब बुनियादी सुविधाएं, सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन की अधूरी मांगें, और सार्वजनिक सुविधाओं पर घटते खर्च को लेकर चल रहे हैं।
एक तरफ भारत जैसे देश में कई जगहों पर बच्चे स्कूली दिक्कतों को लेकर 50 किलोमीटर दूर कलेक्टर दफ्तर तक पैदल निकल रहे हैं, तो दूसरी तरफ योरप का एक विकसित देश फ्रांस भी स्कूलों की अपूरित मांगों को झेल रहा है, कैसी गजब की समानता है! छात्र संगठनों के आंदोलनों का साथ देने के लिए उनके माँ-बाप भी उतर आए, और ट्रेड यूनियनें भी सडक़ों पर आ गईं। बहुत से स्कूल जला दिए गए, शहरों में जगह-जगह आगजनी हो रही है, और खुलेआम दुकानों को लूटकर लोग भाग रहे हैं। दुनिया की चर्चित जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग भी अभी इसी हफ्ते फ्रांस के छात्र आंदोलन में शरीक होने पहुंची थी।
बेल्जियम में सीमित आबादी के बावजूद राजधानी ब्रसेल्स में 30 हजार से अधिक लोग सडक़ों पर प्रदर्शन कर रहे थे, वे सरकार की प्रस्तावित बजट कटौती के खिलाफ थे, पेंशन और बेरोजगारी भत्तों को घटाने के खिलाफ थे, वैट (टैक्स) बढ़ाने के खिलाफ थे, सार्वजनिक सेवाओं पर अधिक खर्च की मांग कर रहे थे, और कर्मचारियों की सेवा स्थितियां सुधारने की मांग भी कर रहे थे। ब्रसेल्स में छात्रों का आंदोलन चल रहा है, विश्वविद्यालयों की बढ़ती हुई फीस, शिक्षा तक सीमित होती पहुंच के खिलाफ वे आंदोलन कर रहे हैं, और पुलिस ने उन पर आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल भी किया। कुल मिलाकर जनता के बहुत से तबके सरकार के खिलाफ हैं।
अलग-अलग देशों की स्थितियां अलग-अलग हैं। पुर्तगाल में चल रहे बड़े प्रदर्शनों में घरों और किराए के बढ़ते रेट, घटते वेतन, महंगे ईंधन, और घटती पेंशन-सार्वजनिक सेवा के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं। एक और बड़े प्रमुख देश इटली में रोजमर्रा की महंगाई के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए, वेतन, पेंशन, ईंधन, और आवास के मुद्दों को लेकर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें भी हुईं। न योरप के देशों में आंदोलन एक किस्म के मुद्दों पर चल रहे हैं, न उनके पीछे कोई एक किस्म की विचारधारा है, हर जगह अलग-अलग बातें हैं, लेकिन बेचैनी सब जगह एक सरीखी है।
अब योरप के एक सबसे सस्ते माने जाने वाले देश स्पेन को देखें तो वहां 50 से अधिक शहरों में बढ़ते किराए के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं। 87 साल की एक महिला को जब किराए के घर से बेदखल कर दिया गया, तो उसका मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। उसकी मौत के बाद देश भर में प्रदर्शन हुए, और आवास संकट के बीच प्रधानमंत्री को अभी पिछले पखवाड़े समय पूर्व चुनाव की घोषणा करनी पड़ी। एक और देश ग्रीस में विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन कर रहे हैं कि बढ़ते किराए का बोझ वे नहीं उठा पा रहे, और छात्रावासों की कमी है, उन्होंने संसद के सामने रात बिताकर अपने मुद्दे को उठाया। एक और देश अल्बानिया में छात्रों की लीडरशिप वाला सरकार विरोधी प्रदर्शन हफ्ते भर से चल रहा है, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा की खराब हालत जैसे मुद्दे हैं, और प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग रहे हैं। इसके अलावा ट्रम्प के दामाद की कंपनी को समुद्र तट पर एक प्रोजेक्ट के लिए संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र में इजाजत देने के खिलाफ भी आंदोलन चल रहे हैं। अल्बानिया यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन वह योरप के राजनीतिक मुद्दों से जुड़ा रहता है। पिछले कुछ हफ्तों में जर्मनी में छात्रों, शिक्षकों, पालकों, और यूनियनों में शिक्षा में निवेश बढ़ाने, अधिक शिक्षक नियुक्त करने, और शिक्षा व्यवस्था में समानता की मांग को लेकर आंदोलन हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया में छात्रों ने प्रदर्शन की चेतावनी दी है क्योंकि विश्वविद्यालय की बजट कटौती की आशंका है।
इनमें से सारे देश भारत और उसके पड़ोसी देशों के मुकाबले बहुत बेहतर आर्थिक स्थिति वाले हैं। फिर भी वहां पर बेचैनी से उपजे जनआंदोलन अलग-अलग स्तर की अशांति, हिंसा, और खतरे खड़े कर रहे हैं। भारत में बैठे यह सूझ भी नहीं सकता था कि फ्रांस में स्कूलों की हालत बेहतर बनाने के लिए देश भर की सडक़ों पर आगजनी होगी, और बड़े-बड़े ब्रांड के शोरूम चारों तरफ लूट लेने जैसी सामाजिक-अराजकता आएगी। हर देश को दूसरे देशों की स्थितियों से कुछ सीखना चाहिए। कहने के लिए तो लोग यह भी कहते हैं कि इतिहास से भी सीखना चाहिए, लेकिन हम इतिहास जितनी गहराई में नहीं जाते, हम तो अड़ोस-पड़ोस के देशों, और धरती के गोले के दूसरी तरफ के देशों की आज की घटनाओं को देखकर सबक लेने की बात पर रूक जाते हैं। सरकारें आज अगर इतना भी कर लें, तो काफी होगा। वरना तिलचट्टों के बाद, मक्खियों के बाद, अब चीफ जस्टिस के गिनाए हुए बाकी और कितने कीट-पतंगों के पुतले रावण के बगल में खड़े किए जाएंगे?
दुर्गोत्सव में हुईं थोक मौतें, धार्मिक अराजकता अब सरकारों से हो चुकी बेकाबू
18 अक्टूबर 2026
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के एक बड़े दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ होने से कम से कम 19 मौतें हो चुकी हैं। मरने वालों में अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं। बीती शाम अचानक बारिश हुई, और उसके बाद फिसलने से कुछ लोग गिरे, संकरी जगह पर बहुत लोग कतार में थे, पूरी तरह अंधेरा था, वहां हुई भगदड़ में कुचलकर लोग मारे गए। चोर बागान नामक जगह की यह दुर्गा पूजा 90 बरस से पुरानी है, और ऐसा कोई हादसा आज तक नहीं हुआ था। समाचार बताते हैं कि बंगाल में आधा लाख से अधिक जगहों पर दुर्गा पूजा का सार्वजनिक आयोजन होता है, लेकिन कोलकाता के पूजा पंडाल देखने के लिए दूसरे प्रदेशों से भी लोग आते हैं, और दूसरे देशों में बसे हुए बंगाली भी इस मौके पर देश-प्रदेश लौटते हैं। जहां पर इतनी बड़ी भीड़ थी, वहां पर न रौशनी का इंतजाम था, और न ही सुरक्षाकर्मी, या आयोजक कार्यकर्ता थे। यह पूरा हादसा 5-10 मिनट में ही हो गया, और दर्जनों जख्मी लोग अभी इलाज के बीच हैं। कोलकाता के तीन और बड़े प्रसिद्ध पूजा पंडालों में इस हादसे के तुरंत बाद दर्शन बंद कर दिए गए हैं। खबर है कि पुलिस ने हादसे वाले दुर्गोत्सव के आयोजकों सहित दर्जन भर लोगों को गिरफ्तार किया है।
अब इस एक हादसे की हम बहुत अधिक चर्चा करना नहीं चाहते, लेकिन कल ही कुछ दूसरे हादसों की भी खबरें आई हैं। छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक दुर्गा पंडाल के पास सडक़ पर बांधी गई रस्सी गले में फंसने से एक मोटरसाइकिल सवार नौजवान मर गया। इसी राज्य में कोरबा जिले में धार्मिक संगीत के लिए पैदल जा रही महिलाओं को एक बेकाबू मोटरसाइकिल ने कुचल दिया, जिसमें दो महिलाओं की मौत हो गई, और मोटरसाइकिल चलाते नौजवान की हालत खराब बताई जा रही है। सोशल मीडिया पर कई दूसरे किस्म के वीडियो छाए हुए हैं जिनमें से एक में रामलीला के बीच में एक विदेशी अर्धनग्न महिला का डाँस चल रहा है, और दर्शकों में से लोग आ-आकर उसके छोटे-छोटे कपड़ों में नोट खोंस रहे हैं। रामलीला के सारे कलाकार, रामकथा के किरदार बने हुए मंच पर बैठे यह सब नजारा देख रहे हैं। अभी पिछले ही हफ्ते छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बहुत तंग मेनरोड पर हर साल बनने वाले बहुत विशाल पंडाल के बनते-बनते ही पास से निकलती दूसरी दुर्गा प्रतिमा की आतिशबाजी से आग लग गई। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और देश के कुछ दूसरे शहरों में डीजे की भयानक तेज आवाज से बच्चों, जवानों, और बूढ़ों की मौत भी दर्ज हुई है। गुजरात का एक वीडियो सामने आया जिसमें एक आइसक्रीम पार्लर में जाकर किसी पूजा के आयोजक 21 हजार रूपए चंदा मांग रहे हैं, और उतनी रकम न मिलने पर दुकान मालिक और परिवार की महिलाओं को बुरी तरह पीट रहे हैं, और तोडफ़ोड़ कर रहे हैं। इन सबके बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट घर-परिवार के बेअसर सयाने की तरह डीजे को काबू करने, सडक़ों पर स्वागत द्वार न लगाने की चेतावनी मानो बड़बड़ाते रहता है, और घर के बुजुर्गों की बातों की तरह सरकार और समाज इन चेतावनियों को अनसुना करते रहते हैं। भाजपा शासन वाले मध्यप्रदेश के इंदौर में भाजपा का एक मंडल अध्यक्ष एक गरबा से 15 बरस की लडक़ी को धक्के देकर बाहर निकालता है, उस पर पॉक्सो का जुर्म दर्ज हुआ है, और सार्वजनिक रूप से उसके इस बच्ची से गरबा स्थल पर धक्के देने के वीडियो सामने आए हैं।
मिसालों और मामलों की ऐसी फेहरिस्त का कोई अंत नहीं है, और धार्मिक आयोजनों में तरह-तरह की लापरवाही, अराजकता, धर्मान्धता, और साम्प्रदायिकता के साथ-साथ हिंसा के नमूने सामने आ रहे हैं। प्रतिमाओं को ले जाते जुलूस बहुत ऊंचे-ऊंचे बिजली, टेलीफोन, और इंटरनेट के तारों को काटते हुए दिख रहे हैं। पिछले गणेश विसर्जन के बाद की प्रतिमाएं पानी से बाहर झांकती हुई बतला रही हैं कि वे मिट्टी की नहीं थीं, वे प्लास्टर ऑफ पेरिस की थीं, और गलने-घुलने वाली नहीं हैं। उधर महाराष्ट्र के एक बड़े तीर्थस्थान के पास पानी में एक कैंसरजनक प्रदूषण खतरे से हजार गुना अधिक मिला है, और वहां जल्द ही लाखों लोग डुबकी लगाने वाले हैं। कांवड़ यात्रा के बाद का नदी किनारे और घाट का गंदगी का मलबा अभी तक हट नहीं पाया है।
दुनिया के कुछ दूसरे कट्टर देशों को देखें, तो वहां धर्म के नाम पर बढ़ती हुई हिंसा किसी वक्त अराजकता में बदली होगी, आज वह वहां की शासन व्यवस्था बन गई है। धार्मिक कट्टरता वाले अलग-अलग समूह धीरे-धीरे धार्मिक हिंसा को इतना नवसामान्य बना देते हैं कि उसके बाद वे सत्ता पर भी पहुंच जाते हैं। कुछ दूसरी जगहों पर सत्ता पर बैठे हुए लोग धर्मान्धता, और धार्मिक हिंसा को नवसामान्य बनाते हैं, और वहां पर वह एक नवसंस्कृति बन जाती है। इन दोनों ही नौबतों में धार्मिक अराजकता इस तरह हावी हो जाती है कि पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर जिस पर चाहे उस पर आरोप लगाकर उसे गिरफ्तारी में भी थाने से निकालकर भीड़ उसके चिथड़े उड़ा देती है। इधर भारत के पंजाब में भी बेअदबी के आरोप में कुछ विक्षिप्त लोगों के ऐसे ही चिथड़े उड़ा दिए गए हैं। इधर भारत के बगल के बांग्लादेश में तमाम सांस्कृतिक समानताओं के बावजूद दुर्गा पूजा पंडालों पर हमले हो रहे हैं, और भारत के उत्तरप्रदेश में सडक़ों पर कुछ मिनट की नमाज के लिए झुके हुए लोगों के पिछवाड़े पर पुलिस के बूट लात बरसा रहे हैं।
धर्म जगह-जगह अवैध कब्जे कर रहा है, अवैध निर्माण कर रहा है, बिजली चोरी कर रहा है, नियमों को तोड़ रहा है, ट्रस्ट और मठ की दौलत को बेच खा रहा है, धार्मिक स्थानों पर तरह-तरह के कुकर्म हो रहे हैं, धर्म के चोगे में घूमने वाले लोग टीवी कैमरों के सामने माँ-बहन की गालियां बक रहे हैं, और इन सबके बावजूद हिन्दुस्तान जैसे देश में धर्म लोगों का सबसे बड़ा कर्म हो गया है। धार्मिक कर्मकांड और पाखंड ने लोगों की सोचने-समझने की ताकत खत्म कर दी है, और वे एक धुन, एक ताल पर मानो सम पर सिर हिला रहे हैं, और सिर भीतर से पूरी तरह खाली भी है, भीतर कुछ भी हिलते नहीं दिख रहा है। अगर लोग अपने आपमें मगन रहते, तब भी ठीक रहता, लेकिन लोग अपने धर्म की जिद पर अड़े हुए, अपने ही धर्म के एकाधिकार के लिए हथियार लिए खड़े हुए खतरनाक हो चुके हैं। सिर बहुत से हैं भीड़ में, लेकिन दिमाग किसी में नहीं है। वे सब मानो किसी एक सामूहिक सम्मोहन का शिकार होकर अपनी धार्मिक मान्यताओं को अंतिम और अकेला सत्य मानकर असहमत सुकरातों का सिर तोडऩे पर आमादा हैं, जहर के प्याले भला उन पर क्यों बर्बाद किए जाएं?
यह अराजकता बढ़ती चल रही है। धर्म के हिंसक तेवरों के सामने अहिंसक धार्मिक लोगों को भी चैन से जीने का हक अब हासिल नहीं है। जिन घरों के पास धर्मस्थलों के लाउडस्पीकर बजते हैं, जिन राहों से धार्मिक जुलूसों का आतंक गुजरता है, उन सबकी नियति गम खाकर धीमा दम तोडऩे की रह गई है। समाज और सरकारों ने धर्मान्धता को पहले अनदेखा किया, फिर फायदे का जानकर बढ़ावा दिया, और अब धर्मान्धता का जिन्न बोतल से निकल चुका है, और सरकारें अपनी सारी पुलिस झोंककर भी एक फीसदी भी डीजे की हिंसा एक फीसदी भी कम नहीं करवा सकतीं, किसी भी सडक़ से एक अवैध पंडाल भी नहीं हटा सकतीं, जान का खतरा खड़ा हो जाए, तो भी भीड़ को नहीं रोक सकतीं। अराजकता को अनदेखा करना भी खतरनाक होता है, उसे बर्दाश्त करना तो और अधिक, फिर उसे बढ़ावा देने का मतलब तो सूखे जंगल में आग सुलगाना होता है, और फिर उसके हिंसक तेवरों के सामने सरकारों के समर्पण के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। एक वक्त इंसानों ने धर्म गढ़ा था, ईश्वर की धारणा गढ़ी थी, आज इन दोनों का जानलेवा कातिल इस्तेमाल हो रहा है, और इंसानों की चुनी गई सरकारें कुछ नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि उन्होंने ही एक वक्त हाड़-मांस जोडक़र इस शेर की काया खड़ी की थी, और फिर उसमें प्राण भी फूंका था।
सरकार खुद खपत पर काबू लागू करे, या पानी सप्लाई का निजीकरण करके धरती बचाए
17 अक्टूबर 2026
भारत में आज घटते हुए भूजल को लेकर खेती-किसानी, और शहरी निस्तार से परे एक और बात को लेकर फिक्र हो रही है, देश भर में कई प्रदेशों में बन रहे डाटा सेंटर भी बहुत सारी गर्मी उगलेंगे, और बहुत सारा पानी पिएंगे। यह पानी बैंकों में आने वाले डॉलरों के साथ नहीं आएगा, डाटा सेंटर वाले प्रदेशों में ही नदियों का पानी, या भूजल का इस्तेमाल इनको ठंडा करने के लिए होगा। अभी आंध्रप्रदेश की एक तस्वीर आई है कि किस तरह गूगल के एक डाटा सेंटर के लिए एक पूरा जंगल काट दिया गया है, और उसकी पानी की खपत का अंदाज देखते हुए उसका जमकर विरोध चल रहा है। लेकिन आज हम सिर्फ डाटा सेंटरों पर चर्चा नहीं कर रहे, पानी पर चर्चा कर रहे। वह पानी जो कि अधिकतर प्रदेशों में अधिकतर लोगों को मुफ्त में मिलता है। स्थानीय संस्थाओं ने पानी की सप्लाई की जिम्मेदारी अपने बुनियादी काम में शामिल कर रखी है, अलग-अलग जगहों पर जल कर अलग-अलग लगता है, लेकिन शहरी संस्थाएं, पंचायतें भी, पानी पहुंचाने को अपना जिम्मा मानती हैं। केन्द्र सरकार भी एक मिशन के तहत हर घर तक साफ पानी का पाईप पहुंचाना अपना जिम्मा मानकर हर प्रदेश में काम कर रही है। टंकियां, पाईप, फिल्टर प्लांट, नहरें, बांध, और बाकी इंतजाम तो ठीक है, लेकिन इन सबके लिए जरूरी पानी का क्या हाल है?
यह साफ हो चुका है कि लोग धरती का पानी जितना खींच रहे हैं, उससे कम पानी ही जमीन में वापिस जा रहा है। इसकी बाकी वजहों में से एक वजह, और हो सकता है कि यह वजह छोटी हो, पानी का अंधाधुंध इस्तेमाल है। आज जैसे-जैसे सरकारी पाईप लाईन अधिक से अधिक घरों तक पहुंच रही हैं, वैसे-वैसे पानी की खपत बढ़ती चली जानी है। जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, और ऊंची इमारतों में पानी की योजनाबद्ध सप्लाई बढ़ रही है, वैसे-वैसे शहरों में पानी की खपत बढ़ती चली जा रही है। आज देश में बहुत सीमित जगहों पर ही पानी के पाईप में मीटर लगे हुए हैं। लोगों को जब आसानी से जो सामान मुफ्त मिलने लगता है, वैसे ही वे उतनी ही बेरहमी से उसका इस्तेमाल करने लगते हैं। भारत के ही कुछ शहरों में जब घरों तक पहुंचने वाले नलों तक मीटर लग गए, तो वहां पानी की कुल खपत गिर गई। और वाटर सप्लाई करने वाली कंपनी ने सीमित घंटों की सप्लाई को चौबीसों घंटे का कर दिया। पानी पूरे समय उपलब्ध है, लेकिन एक सीमित उपयोग के बाद उस पर मामूली सा भुगतान शुरू हो जाता है, इसलिए लोग अपनी खपत को उस सीमा के भीतर रखने की कोशिश करने लगे। बहुत पहले किसी समझदार ने यह लिखा भी था कि माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम। मतलब यह कि मुफ्त में मिले माल को बेरहमी से खर्च किया जाता है। बिजली जिसे बनाने में बहुत सारा कोयला, और पानी दोनों लगते हैं, वह भी जिस सीमा तक मुफ्त दी जाती है, उस सीमा से कम कोई खर्च करना चाहते ही नहीं। लोगों की फिक्र बिल आना शुरू होने पर शुरू होती है। ऐसा ही हाल पानी की सप्लाई के निजीकरण से होता है कि जो लोग मुफ्त में मिलने वाले पानी की अंधाधुंध खपत करते थे, अब वे चौकन्ने हो गए। बात सिर्फ यह नहीं है कि एक निजी कंपनी इससे कमाई कर रही है, बात यह भी है कि कैसे पानी का बिल मिलने पर लोगों का दिल उसे मुफ्त का माल मानकर चलना बंद कर देता है।
देश में किसानों को अधिकतर प्रदेशों में खेतों में सरकार ट्यूबवेल कर देती है, और बिजली भी कई जगह मुफ्त दे देती है, कई जगह सोलर पैनल लगाकर पंपों को पूरे-पूरे दिन मुफ्त में चलाने की सहूलियत भी सरकार ने मुहैया करा रखी है। इसका नतीजा यह है कि पानी की कदर कम हो गई है। बिजली मुफ्त मिलने से उसकी कदर भी कम हो गई है। ये दोनों बातें मिलाकर खेती की असली लागत का पता ही नहीं लगने देतीं। जिन लोगों अपने घरों में ट्यूबवेल करा रखा है, वे अपनी ताकत से ताकतवर पंप लगाकर, घर की छत पर टंकी लगाकर पानी की रात-दिन फिजूलखर्ची करते हैं, उन्हें पानी की कीमत ही नहीं मालूम है। आज सरकार अगर सारे निजी ट्यूबवेल पर मीटर लगाकर मामूली सा पैसा वसूलने लगे, तो लोगों में पहली बार पानी की कीमत समझ आएगी। यह बात भुगतान की शक्ल में भारी लगेगी, लेकिन धरती को सूखा होने से बचाने के लिए यह जरूरी भी है। जिन संपन्न लोगों के घरों में रोज पानी की धार से पूरी कार को धोया जाता है, घरों के बाहर पानी छींटा जाता है, खौलती-तपती छतों पर पौधों का बगीचा लगाकर कुदरत को चुनौती देते हुए उसे सींचा जाता है, वह सारी सोच मामूली सा भुगतान शुरू होने पर खत्म हो जाएगी, या कम से कम बदल तो जाएगी ही।
स्थानीय संस्थाएं चलाने वाले निर्वाचित लोग वोटरों की जरा भी नाराजगी नहीं चाहते, और न ही प्रदेश चलाने वाली राजनीतिक ताकतें अपने स्थानीय प्रतिनिधियों के लुभावने तौर-तरीकों के खिलाफ कुछ करना चाहतीं। नतीजा यह है कि पूरे का पूरा देश-प्रदेश जागरूकता से दूर चले जा रहा है। लोग यह मानकर चल रहे हैं कि जिस तरह उनके पास घर की छत पर अपनी टंकी है, उसी तरह धरती के नीचे की टंकी भी उनकी अपनी है। लोगों को यह समझ भी नहीं पड़ता कि भूजल की धारा कई देश-प्रदेश पार करते हुए जाती है, और एक जगह की अंधाधुंध खपत दूसरी जगहों पर सूखा ला सकती है। धरती का पेट अगर खाली हो रहा है, तो अधिकतर जगहों पर खाली हो सकता है। इस जागरूकता के बिना पानी की फिजूलखर्ची नहीं थम सकती। लोगों को पता नहीं हिन्दुस्तान के भीतर का वह नजारा इतनी आसानी से कैसे भूल गया जिसमें गुजरात ने 80 के दशक में ऐसा भयानक सूखा देखा था कि वहां ट्रेन से पानी पहुंचा था, और सार्वजनिक जगहों पर लोहे के ऐसे ढांचे रख दिए गए थे जिसके ऊपर चढक़र लोग नहाते थे, और नीचे इकट्ठा किए गए पानी में कपड़े धोए जाते थे। ऐसी नौबत अभी भी हिन्दुस्तान में कई जगह आ सकती है। इस नौबत से बचने के लिए धरती के भीतर से अधिक पानी खींचकर लंबा वक्त नहीं गुजारा जा सकता। कुछ दशकों के भीतर ही धरती का पेट खाली हो सकता है, और इंसानों की प्यास बढ़ सकती है।
आज जब पानी को राष्ट्रीय सम्पत्ति नहीं बनाया गया है, निजी ट्यूबवेल पर कोई टैक्स या फीस लागू नहीं किए गए हैं, तो खपत बेहिसाब है। निजीकरण करके, या सरकारी स्तर पर पानी की खपत को सीमित करके ही धरती को कुछ और अधिक हद तक बचाया जा सकता है। आज दुनिया के बहुत से विकसित देशों में एआई डाटा सेंटरों का जमकर विरोध हो रहा है कि वे उस इलाके का पूरा पानी पी जाएंगे, और उनकी गर्मी आसपास के इलाके को और खौला देगी, उस बढ़ी हुई गर्मी से जूझने के लिए लोगों को एसी या कूलर पर अधिक बिजली लगानी पड़ेगी, और उस अधिक बिजली को बनाने के लिए और अधिक कोयला, और पानी खर्च करना पड़ेगा। पानी की खपत, और आसमानी बारिश के पानी का संग्रह, इन दोनों बातों की तरफ गंभीरता से कोशिश करनी पड़ेगी, तभी जाकर धरती बच पाएगी। आज फिजूलखर्ची की आदत रहे, और भूजल भंडार बढ़ाने की फिक्र न रहे, तो यह दोनों सिरों से जलाई गई मोमबत्ती सरीखी नौबत है कि वह बहुत तेजी से खत्म हो जाएगी। आज जिन प्रदेशों में ट्रेन या टैंकरों से पानी किसी तरह पहुंच जा रहा है, वहां भी जागरूकता नहीं दिख रही। धरती को बचाने के लिए, और धरती को क्या बचाना, इंसानों को खुद बचने के लिए पानी को बचाना होगा, चाहे यह कड़वा काम सरकार खुद करे, या फिर पानी सप्लाई का निजीकरण करके खपत को घटाए। मुद्दा किसी निजी कारोबारी की कमाई का नहीं है, मुद्दा धरती पर इंसानों के जिंदा रहने का है।
मातहत महिला अफसर को गालियां बकने वाले आईएएस की बर्खास्तगी से कम कुछ नहीं
16 अक्टूबर 2026
जम्मू-कश्मीर की एक सरकारी वीडियो कांफ्रेंस का एक वीडियो सामने आया है जिसमें राज्य का एक आईएएस अफसर राज्य प्रशासनिक सेवा की एक महिला अधिकारी के बारे में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए उसे लगातार धमका रहा है। वीडियो का जो हिस्सा ट्विटर पर घूम रहा है उसके मुताबिक 14 तारीख को राज्य सचिवालय में मिशन युवा की समीक्षा बैठक हुई, जिसमें एक डिप्टी कलेक्टर पैर फैक्चर होने की वजह से अवकाश से ही वीडियो से जुड़ी थीं। इस बैठक में इन दोनों अफसरों के बीच किसी मुद्दे पर बहस होने की चर्चा है, और सामने आया वीडियो हिस्सा बताता है कि यह आईएएस अफसर इस महिला पर चीख रहा है, और यह महिला बोलने के इस तरीके पर आपत्ति कर रही है कि उससे इस तरह से बात नहीं की जा सकती। इस पर कैमरे में देखते हुए इस महिला पर चीखते हुए कुमार राजीव रंजन नाम का यह अफसर कहता है- यू आर ब्लडी शिट (तुम एक घटिया पखाने जितनी हो) इस पर वह महिला अफसर, बीनिश वानी आपत्ति करती है कि उससे ऐसी भाषा में बात नहीं की जा सकती, उसे गू (पखाना) नहीं कहा जा सकता, तो इस पर यह अफसर जोर देकर कह सकता है कि वह जब चाहे तब, हमेशा ही उसे शिट कहकर ऐसे ही बात कर सकता है। इसके बाद यह अफसर बैठक में शामिल किसी दूसरी महिला अधिकारी को कहता है कि तुरंत ही इस अफसर को निलंबित करने का आदेश निकालें। पूरे वक्त यह आईएएस अफसर चीखते हुए दिखता है, और फिर कैमरे पर ही इस महिला अधिकारी को गेट आऊट कहकर बैठक से निकल जाने को कहता है। इस वीडियो को देखना भी भयानक है कि सचिव स्तर का कोई आईएएस अधिकारी किसी मातहत महिला अफसर से बहुत से दूसरे लोगों की मौजूदगी में इस जुबान में बात कर सकता है। इस मामले की और जानकारी निकालने पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मुख्य सचिव से कहा है कि इस महिला अधिकारी के खिलाफ बदले की किसी तरह की कार्रवाई न हो। राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों के संगठन ने इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताई है और जांच की मांग की है।
जब एक औपचारिक बैठक में और अधिकारियों की मौजूदगी में एक सीनियर आईएएस अफसर एक महिला प्रशासनिक अधिकारी से इस घटिया जुबान में बात करता है, तो सवाल यह उठता है कि जब कैमरे न रहें, जब बैठक की रिकॉर्डिंग न हो रही हो, तब यह क्या नहीं कर रहा होगा? अभी दो दिन पहले ही दक्षिण भारत से एक वीडियो आया था कि किस तरह आंध्रप्रदेश के एक आईएएस अफसर सेे बेंगलुरू में एक विवाद के बीच वहां पहुंची पुलिस ने पूछताछ शुरू की, तो उसने बहुत बुरी तरह चीख-पुकार करते हुए, धमकाते हुए मोबाइल कैमरों के सामने ही माँ की गाली बकीं, और पुलिसवाले का कॉलर पकड़ लिया। इस गाली सहित यह वीडियो देश के बहुत से बड़े मीडिया संस्थानों की वेबसाइट पर पोस्ट हुआ है। यह नौकरी भारत और उसके प्रदेशों में सबसे बड़ी नौकरी मानी जाती है। देश के अनपढ़ लोगों के बीच भी अपनी आल-औलाद के लिए यही एक सपना रहता है कि वे बड़े होकर कलेक्टर बनें, कलेक्टर का मतलब आईएएस अधिकारी। इन अफसरों को सरकार की तरफ से जिंदगी भर नौकरी की एक गारंटी रहती है, बंगला, गाड़ी, अर्दली, दूसरे नौकर-चाकर, और सरकारी खर्च पर बहुत कुछ करने का लचीलापन भी रहता है। रिटायर होने के बाद सरकारों की इतनी सारी और कुर्सियां मौजूद रहती हैं कि उनमें से किसी पर भी जाने की एक बड़ी संभावना भी रहती है। जो लोग भ्रष्टाचार के मामलों में जेल नहीं पहुंच चुके रहते, जो अडिय़ल होने की हद तक ईमानदारी के लिए बदनाम नहीं रहते, ऐसे सब लोगों के लिए रिटायर होने के बाद भी कुछ या कई बरस और सहूलियतों की कोई न कोई कुर्सी रहती है। ऐसे में इतनी सुरक्षा, और इतनी सुविधा के साथ घोषित और अघोषित अधिकारों का टोकरा इतना बड़ा और भरा रहता है कि सीधे-सादे लोग भी इन कुर्सियों पर पहुंचकर बददिमाग होने के खतरे में आ जाते हैं।
हमारा ख्याल है कि जैसा बर्ताव जम्मू-कश्मीर के इस आईएएस ने मातहत महिला अफसर से किया है, उसके बाद उसकी नौकरी खत्म कर देनी चाहिए। जिसके मन में मातहत के लिए, महिला के लिए इतनी हिकारत भरी हुई हो, उस पर चौबीसों घंटे हर जगह तो कैमरे तैनात हो नहीं सकती, और आज का वक्त तो ऐसा है कि जिस बात की वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं है, वह घटना मानो हुई ही नहीं है। इसलिए सरकारी नौकरी की शर्तों में जो एक शर्त यह कहती है कि अधिकारी के लायक आचरण नहीं किया, इसलिए नौकरी से हटा दिया गया, उसका इस्तेमाल करते हुए सरकार को ऐसे अफसर को नौकरी से हटा देना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। अफसरों की अपनी एकता ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। कहने के लिए आईएएस अफसरों, या आईपीएस अफसरों के अपने संगठन हैं जो कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर उस वक्त सक्रिय रहते हैं जब उनके किसी सदस्य के खिलाफ कोई बदसलूकी होती है, या बेइंसाफी होती है। लेकिन जैसा कि किसी भी दूसरे संगठन का मिजाज हो जाता है, ये संगठन भी अपने सबसे खराब सदस्यों को बचाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। हमारा तो यह साफ मानना है कि किसी संगठन की पहली जिम्मेदारी तो अपने सदस्यों को ठीक रखने की होनी चाहिए, क्योंकि उनसे ही संगठन की इज्जत होती है, या बेइज्जती। लेकिन कोई संगठन अपने सदस्यों के गलत काम पर मुंह भी नहीं खोलते, और ऐसे में सदस्यों के साथ बदसलूकी होने पर तो वे अतिसक्रिय हो जाते हैं, लेकिन बाकी उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
देश में 1947 से आजादी आ चुकी है, और 1950 से एक संविधान लागू है जिसमें तमाम नागरिकों को बराबरी का दर्जा दिया गया है। अंग्रेजों के वक्त उनके तैनात किए गए प्रशासनिक अफसरों का जनता के साथ बर्ताव गुलामों के साथ शासक का बर्ताव रहता था। वे दिन लद गए हैं। अब किसी को यह हक नहीं है कि एक-दूसरे से बदसलूकी करें। न नेताओं को अफसरों से बदसलूकी करना चाहिए, न अफसरों को नेताओं से। फिर अफसरों को अपने सीनियर या जूनियर से भी बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। इस बुनियादी सभ्यता को जो लोग नहीं समझते हैं, उन लोगों को सरकारी नौकरी या कामकाज में रहने का कोई हक नहीं रहना चाहिए। इसी तरह की नौबत न्यायपालिका में बहुत से जजों के साथ रहती है जो कि अपनी बददिमागी में अदालत को अपनी जागीर समझते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि जो लोग वहां आते हैं, वे संविधान प्रदत्त गरिमा से जीने के अधिकार को अदालती अहाते के बाहर रखकर आते हैं। इन दिनों अदालतों में जो वीडियो रिकॉर्डिंग होती है, और प्रसारित होती है, उसमें भी ऐसे कुछ वीडियो बीच-बीच में देखने मिलते हैं जिनमें कुछ वकील जजों को यह बताते रहते हैं कि वे ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते, वे अपना व्यवहार सुधारें।
लोकतंत्र में लोकव्यवहार में शिष्टाचार और संवेदनशीलता दोनों जरूरी होते हैं। किसी दूसरे की बदसलूकी बर्दाश्त करना किसी की भी मजबूरी नहीं होनी चाहिए। हमारा यह साफ मानना है कि लोगों को ऐसी किसी भी बैठक, मुलाकात, या बातचीत की वीडियो रिकॉर्डिंग करने का हक रहना चाहिए, ताकि बाद में कोई विवाद होने पर वे यह साबित कर सकें कि उनके साथ कैसा बुरा बर्ताव किया गया था। आज दिन ऐसा आ गया है कि अगर किसी बात की वीडियो मौजूद नहीं है, तो यह मान लिया जाएगा कि वह घटना ही नहीं हुई है।




