ले मशालें चल पड़े हैं, बच्चे गांव-गांव के!

 25 अगस्त 2026  

 

मध्यप्रदेश की खबर है कि वहां स्कूली छात्राएं परेशानियों को लेकर कलेक्टर से मिलने 62 किलोमीटर पैदल सफर पर निकल गई थीं। अफसरों ने 18 किलोमीटर पर उन्हें रोका, और समझाने की कोशिश की, लेकिन वे स्कूल की बुनियादी समस्याओं को लेकर अड़ी हुई थीं। आखिरकार कलेक्टर जयंती सिंह जिला मुख्यालय बड़वानी से रवाना हुईं, और इन लड़कियों तक पहुंचकर उनकी बातें सुनीं, और समस्याएं सुलझाने के लिए एक कमेटी बनाई। स्कूल की पोशाक में निकली ये लड़कियां सरकारी एकलव्य आदर्श विद्यालय की थीं। अब यह सोचने की बात है कि जिसे सरकार अपने नामी-गिरामी बैनर वाला स्कूल बताती है, उस एकलव्य आदर्श स्कूल में यह नौबत आ रही है। बारिश, पानी के बीच लड़कियां अगर 18 किलोमीटर पैदल जा चुकी थीं, और 62 किलोमीटर जाने का पक्का इरादा रखती थीं, तो यह बिना किसी वजह के तो हो रही पदयात्रा नहीं थी। हम इन दिनों स्कूलों के बारे में कुछ अधिक ही लिख रहे हैं क्योंकि देश में बालिग आबादी के बीच न सही, बच्चों के बीच तो एक नई जनचेतना दिखाई पड़ रही है, और किसी भी लोकतंत्र के जागरूक होने का यह एक बड़ा संकेत है। होना तो यह चाहिए था कि बालिग वोटर तबका अपनी और बच्चों की दिक्कतों को लेकर उठ खड़ा होता, लेकिन जागरूकता जिस पीढ़ी से भी शुरू हो रही है, अच्छी बात इसलिए है कि उसके दूसरी पीढिय़ों तक पहुंचने की एक संभावना तो रहती है। 

अब एक बिल्कुल ही दूसरी खबर पर आ जाएं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने अभी महाराष्ट्र के धुले जिले में एक हाईस्कूल के कार्यक्रम में इस प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की बिगड़ती स्थिति, और मराठी माध्यम के बंद हो रहे स्कूलों पर गहरी चिंता जताई है। समाचारों में मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने कहा कि सरकार धार्मिक आयोजनों, और इंट्रा स्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर होने वाले खर्च का मामूली हिस्सा भी शिक्षा पर लगाती तो राज्य भर में सौ-सवा सौ मराठी स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था। उन्होंने कहा कि वे खुद 10वीं तक म्युनिसिपल और जिला परिषद की मराठी स्कूलों में पढ़े हैं, राज्य में स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन शिक्षा का बजट घटते जा रहा है। उन्होंने कहा कि नासिक त्र्यंम्बकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए सरकार 32-34 हजार करोड़ रूपए देती है, और कॉरीडोर प्रोजेक्टस के लिए 11 हजार करोड़ रूपए। यदि इस भारी-भरकम रकम का 0.1 फीसदी हिस्सा, कुल 32 करोड़ रूपए भी स्कूलों के लिए दे दिए जाते, तो ये सौ-सवा सौ मराठी स्कूलें बंद नहीं होतीं। उल्लेखनीय है कि हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने ही यह कहा था कि कुंभ और कॉरीडोर परियोजना पर इतना खर्च हो रहा है। जस्टिस वराले ने हाल की एक घटना पर दुख जाहिर किया कि एक आश्रम शाला में पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं, तीन छात्राओं को फर्श पर सोना पड़ा, और सांप के काट लेने से उनकी मौत हो गई। उन्होंने कहा कि सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट ही नहीं, प्राथमिक शिक्षा, और बुनियादी सुविधाओं पर भी गंभीर ध्यान देने की जरूरत है। 

आज हम कॉकरोच आंदोलन की वजह से शुरू हुई स्कूल-चेतना की चर्चा कर रहे हैं, कॉकरोचों की नहीं। हम इस मुद्दे पर कुछ दिनों के भीतर दूसरी और तीसरी बार लिखने को भी इस कॉलम की जगह और अपने शब्दों की बर्बादी नहीं मानते क्योंकि इस देश के बच्चों की एक पूरी पीढ़ी के भविष्य से जुड़े हुए मुद्दे पर चर्चा कितनी भी बार की जा सकती है, खासकर इसलिए कि उसमें सुधार के कोई आसार नहीं दिखते हैं। हमने तो बीते कई दशकों में स्कूलों की हालत को कभी इस तरह जनचर्चा में नहीं पाया था, और इसलिए आज बच्चों की जागरूकता एक राहत देती है कि उनके वोटर माँ-बाप अगर उन्हें सरकारी स्कूल में दाखिल कराकर भूल गए हैं, तो वे कम से कम खुद अपने बुनियादी हक के लिए लडऩा जानते हैं। आज नौबत यह है कि कॉलेज और स्कूल के बच्चों की पीढिय़ों से बात करने के लिए, उनकी दिक्कतों को समझने के लिए सरकारों, और राजनीतिक दलों में गलाकाट मुकाबला चल रहा है। अच्छा है, चाहे जिसकी कोशिश से हो, स्कूलों की हालत तो सुधरनी चाहिए। आज जो पार्टियां विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनों से डरी-सहमी रहती हैं, और औपचारिक रूप से भारत सरकार के बड़े-बड़े मंत्री कहते हैं कि छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, उनकी हड़बड़ाहट स्वाभाविक है कि अब तो बच्चे जुलूस लेकर उनकी दहलीज तक पहुंच रहे हैं। 

देश भर के कई राज्यों से आने वाली खबरों को देखकर मन में एक सवाल उठता है। पढ़ाई, इलाज, नाली-पानी, सडक़, और आम हिफाजत तो किसी भी सरकार के लिए सबसे पहली जिम्मेदारी रहनी चाहिए। लेकिन आज जाने कितने प्रदेशों से इनमें से हर मोर्चे पर दिक्कतें और नाकामयाबी की खबरें हैं। सडक़ों में पूरी ट्रक या बस समा जा रही है, कहीं अस्पताल सिर्फ कागज पर है, कहीं स्कूलें जमीन पर हैं ही नहीं, अस्पतालों में बदहाली ही बदहाली है, और शहर घंटे भर की बारिश में तालाब हो जाते हैं। दूसरी तरफ देश भर में हर प्रदेश की सरकारें इन बुनियादी जिम्मेदारियों से परे की अपनी पसंदीदा योजनाओं पर ध्यान केन्द्रित करके चलती हैं क्योंकि उन योजनाओं से सरकारों का नाम जुड़ा रहता है, पहचान जुड़ी रहती है। ये योजनाएं चुनाव में गिनाने लायक रहती हैं। अब स्कूल भवन ठीकठाक हैं, साफ-सुथरे हैं, अस्पतालों में दवा है, सडक़ों पर कचरा नहीं है, ये बातें तो कोई वजनदार चुनावी नारा बन नहीं पातीं। इसलिए नारे से कम इस्तेमाल वाली चीजों पर अधिक ध्यान देना किसी को जायज नहीं लगता है। किसी शहर में करोड़ों की लागत से स्वागत द्वार बनाए जाते हैं, फिर चाहे उन्हीं शहरों में बारिश के पानी से बस्तियां डूब जाएं, सडक़ें डूब जाएं, बच्चे डूबकर मर जाएं। राज्यों को बड़े-बड़े ऐतिहासिक फौलादी ढांचों को सैकड़ों करोड़ की लागत से खड़ा करना सुहाता है क्योंकि उसके साथ शिलालेख पर नाम जुड़ जाते हैं, लेकिन ऐसे ढांचों वाले प्रदेशों में स्कूल आते-जाते नदी पार करते बच्चे बहकर मर जाते हैं, और किसी के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ती। जिस तरह स्कूलों की पढ़ाई अब महत्वहीन हो गई है, और आगे के मुकाबला-इम्तिहानों की तैयारी के लिए कोचिंग ही महत्वपूर्ण रह गई है, कुछ उसी तरह सरकारों में भी हो गया है, उनके लिए अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को पूरा करना जरूरी नहीं रह गया, चुनावी नारों में फिट बैठने वाली नई मौलिक या अनोखी, आकर्षक, और लुभावनी योजनाओं पर पूरा ध्यान चले जा रहा है। जहां आज देश भर में बच्चों को स्कूलों की एकदम बुनियादी जरूरतों के लिए आंदोलन करने पड़ रहे हैं, वहां सैकड़ों फीट ऊंची धार्मिक या ऐतिहासिक प्रतिमाओं को बनाना सरकारों को अपनी उपलब्धि लग रही है। यह सिलसिला भटकी हुई प्राथमिकताओं का है, और सुप्रीम कोर्ट भी दुनिया-जहान की बहस करने के बाद भी इस सिलसिले को रोकने या काबू करने के बारे में कुछ तय नहीं कर पा रहा। ऐसा लगता है कि वोटरों की जमात राजनीतिक दलों, और सरकारोंं की बांह नहीं मरोड़ पाई, अब स्कूली बच्चे अपने हक के लिए संघर्ष करके, आंदोलन करके एक मिसाल पेश करने जा रहे हैं, जिससे बड़े भी अपने हक के लिए लडऩा सीख सकें। यह भारतीय लोकतंत्र में एक बिल्कुल ही नए किस्म की राजनीतिक चेतना है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। आज नेता, और अफसर बच्चों को देखकर हड़बड़ाए हुए हैं। बीते कुछ महीने इनके सपनों में तिलचट्टे आकर इन्हें डरा रहे थे, अब छोटे-छोटे बच्चे आकर इनकी नींद हराम कर रहे होंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

स्कूल भवन, पुल-पुलिया एकदम से आसान नहीं, सरकारें कोई विकल्प सोचें

24 अगस्त 2026  

 

आज एक ही अखबार में ऊपर-नीचे छपी दो खबरें दिल दहलाने के लिए काफी हैं। मध्यप्रदेश की खबर है कि उफनती हुई नदी को पार करके स्कूल पहुंचने के लिए शिक्षक ट्रकों के बड़े से ट्यूब पर सवार होकर आना-जाना कर रहे हैं। अगर समय पर न पहुंच पाएं, तो ई-हाजिरी नहीं लग पाएगी। बहुत सी दूसरी जगहों पर शिक्षक बिना किसी लाईफ बेल्ट के खतरनाक नावों में नदी पार करते हैं, और छत्तीसगढ़ के बस्तर से भी ऐसी खबरें आती हैं। इससे कुछ अधिक खतरनाक खबर बिलासपुर जिले से आई है जहां स्कूल से घर लौटते तीन छोटे-छोटे भाई-बहन एक नदी का एनीकट पार करते हुए पानी में बह गए, और तलाश में उनकी लाशें मिल जाने के बाद उनकी अंतिम संस्कार हुआ। सात-आठ बरस के ये भाई-बहन नदी पर बने ढांचे को कूद-कूदकर पार कर रहे थे कि अचानक आई एक लहर में वे बह गए। 

देश भर में स्कूलों की हालत को लेकर कॉकरोचों ने एक नई जागरूकता खड़ी की है। राजस्थान, और यूपी ने औपचारिक आदेश निकालकर किसी भी बाहरी व्यक्ति का स्कूल दाखिला बंद कर दिया है, कहीं-कहीं तो ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखाई जा रही है जो कि स्कूलों की बदहाली को उजागर करने के लिए वहां जाकर देख रहे हैं, या वीडियो बना रहे हैं। पांच-दस लोगों के जेल चले जाने से इस मुद्दे के झाग नहीं बैठ जाएंगे, बल्कि वे उफनते ही रहेंगे, मानसूनी बारिश में उफनती हुई नदी की तरह। जिस आंदोलन से सरकारों को सबक लेना था, उस आंदोलन को कुचलने से बच्चों के माँ-बाप, और खुद बच्चे तो चुप नहीं बैठ जाएंगे। मध्यप्रदेश का ही बताया जा रहा एक वीडियो आया है जिसमें किसी सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन कर रही छोटी-छोटी बच्चियों को महिला पुलिस उठाकर ले जा रही है, और बच्चियां इतनी छोटी हैं कि एक छोटी सी महिला सिपाही भी अकेले ही बच्ची को गोद में उठाकर गाड़ी में पहुंचा रही है। अब अगर किशोरावस्था में पहुंचने के पहले बच्चे आंदोलन में पहुंचने लगे, तो देश में संभावित आंदोलनकारियों की गिनती एकदम से दुगुनी हो सकती है। 

खैर, आंदोलन तो जिस तरह, जिस तरफ, जिस हद तक बढऩे हैं, वे बढ़ेंगे। लेकिन आज एक दूसरी बात लग रही है कि अगर देश के बहुत से प्रदेशों में स्कूलों की ऐसी बदहाली है, कुछ जगहों की तो यह खबर है कि वे स्कूल मौजूद ही नहीं हैं, और सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं, कुछ जगहों पर आसपास के गांव के आदिवासी गिरती हुई स्कूली इमारत से अपने बच्चों को बचाने के लिए बाहर खुली जगह में बांस का शेड बना रहे हैं, ताकि उनके बच्चे किसी छततले न दबें, और पढ़ सकें। कहीं-कहीं पर बांस से कोई पुल बनाया जा रहा है। यह बात जाहिर है कि जलवायु परिवर्तन के चलते हुए अब बहुत तेज बारिश कभी भी आ सकती है, और कुछ घंटों के भीतर ही नदियां ऐसी उफन सकती हैं कि स्कूल गए हुए बच्चे लौट न सकें। इसलिए सरकारों को बिना शर्मिंदगी महसूस किए सबसे पहले हकीकत को जानकर, और मानकर बारिश में पढ़ाई का वैकल्पिक इंतजाम करना चाहिए। हम इस नौबत को बहुत ही खतरनाक मानते हैं कि नदी-नाले पार करके बह जाने का खतरा उठाकर शिक्षक-शिक्षिकाएं, और बच्चे स्कूल तक पहुंचें। पूरी तरह से भीगे हुए लोग किस तरह पढ़ और पढ़ा सकते हैं? और क्या यह उनकी सेहत के लिए ठीक भी है? 

अब भारत की एक दिक्कत यह है कि इसके बहुत बड़े हिस्से में कुछ महीने भयानक गर्मी के रहते हैं, और इन महीनों में बच्चों की स्कूलों को बंद ही कर देना पड़ता है। कुछ महीने बेतहाशा बारिश के हो गए हैं। और ठंडे प्रदेशों में सबसे अधिक सर्द कुछ महीने बर्फीले होते हैं, उनकी अपनी अलग दिक्कत होती है। ऐसे में क्या पूरे देश के लिए एक स्कूली कैलेंडर मुमकिन हो सकता है? आज राष्ट्रीय स्तर पर जितने स्कूली इम्तिहान होते हैं, और स्कूली परीक्षाओं के बाद जितने आगे के दाखिला इम्तिहान होते हैं, क्या वे पूरे देश के लिए एक साथ सचमुच किए जा सकते हैं, या फिर पढ़ाई के महीनों में, और इम्तिहान के महीनों में फेरबदल भी होना चाहिए? नीट इम्तिहान के तनाव को देखते हुए हाल ही में यह चर्चा भी हुई थी कि इसे साल में एक बार करने के बजाय दो बार करना चाहिए, ताकि बच्चों पर दबाव कम पड़े, और एक बार में बहुत अधिक संख्या इम्तिहान में न बैठने पर उसमें भ्रष्टाचार भी शायद घट सके। ऐसी सिफारिश एक कमेटी ने सरकार को की है, लेकिन हम इसमें भ्रष्टाचार की कमी की संभावना नहीं देखते क्योंकि लोग कितने भी कम हों, पर्चा खरीदने वाले लोग लाखों में तो लगते भी नहीं हैं, कुछ हजार लोगों को बेचने से भी पेपर आउट करने वालों का धंधा चल जाता है। 

भारत में सरकारों को यह सोचना चाहिए कि जब न स्कूली इमारतों का ढांचा ठीक है, न ही आने-जाने के लिए पुल-पुलिया का कोई ठीक इंतजाम हैं, तो बारिश के दिनों में भीगे हुए दिन भर बिठाकर, जान पर खेलकर ऐसी पढ़ाई करवाना ठीक नहीं है। खबरों में तो मौत, या हादसों के ही आंकड़े आते हैं, खबरों में भीगने से बीमार होने वाले बच्चों या शिक्षकों के आंकड़े तो आते नहीं हैं। फिर अभी एमपी के समाचार में सिर्फ चड्डी पहनकर ट्यूब पर बैठकर नदी पार करना पुरूष शिक्षकों के लिए तो मुमकिन है, शिक्षिकाएं तो इस तरह से नहीं आ-जा सकतीं, और लड़कियों के लिए भी भीगे कपड़ों में दिन भर बैठना एक अलग किस्म की शर्मिंदगी हो सकती है, होती ही होगी। इसलिए सरकारों को खुले दिमाग से, बिना झिझक यह तय करना चाहिए कि बारिश के ऐसे दिनों में, हफ्तों, और महीनों में क्या किया जाए? और लाख रूपए का यही सवाल गर्मियों में अंधाधुंध अधिक गर्म होने वाले हफ्तों पर भी लागू होता है कि उन दिनों स्कूलें नहीं लग सकतीं, उतनी धूप में आना-जाना नहीं हो सकता, तो वैकल्पिक पढ़ाई क्या हो सकती है? देश की राजधानी दिल्ली, और उसके आसपास के सैकड़ों किलोमीटर के इलाकों में ठंड में प्रदूषण जिस तरह हवा को जहरीला कर देता है, उसमें भी वहां दिक्कत होती है, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको। हर राज्य को अपने स्तर पर मौसम की सबसे बुरी मार के हफ्तों में स्कूली पढ़ाई का विकल्प ढूंढना ही होगा। क्या इसके लिए ऐसे वक्त घर रहकर पढऩे का कोई जरिया निकल सकता है? 

भारत स्कूलों की बदहाली देख रहा है, खासकर उत्तर भारत के प्रदेशों, हिन्दी प्रदेशों में बहुत बुरा हाल है। तिलचट्टों को रोक देने से सच्चाई छुपने नहीं जा रही। अब तो स्कूली बच्चे खुद भी सडक़ों पर आने लगे हैं, और गोद में उठाकर पुलिस लॉरी तक ले जाने लायक छोटी बच्चियां भी जब सडक़ पर आंदोलन कर रही हैं, तो किसी स्कूल को अपनी बदहाली दर्ज कराने मोबाइल कैमरे लिए हुए तिलचट्टों की अधिक जरूरत भी नहीं है। सरकारें इस सच को मानें कि उनकी स्कूलें किस खराब हाल में हैं। समस्या को माने बिना समाधान शुरू नहीं हो सकता। इसके बाद सरकारें यह समझ लें कि स्कूली पीढ़ी अब आंदोलन करना जान चुकी है, वह अब मानो यह कह रही है- छोटा बच्चा जान के हमको न बहलाना रे...

(Daily Chhattisgarh)   

परमाणु छतरीतले एकजुट होते मुस्लिम देशों से खतरा कम नहीं

23 अगस्त 2026

दुनिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई ऐसी घटनाएं या बातें होती हैं जिन पर बारीकी से नजर रखना जरूरी रहता है। आज भी एक बीज रहती हैं, और आगे चलकर जाने किस दिन खाद-पानी पाकर, किसी खास मौसम में वे जमीन फोडक़र पौधे में तब्दील हो जाएं, और वक्त के साथ पेड़ बन जाएं। पाकिस्तान, सऊदी अरब, और तुर्की के बीच पिछले दिनों मक्का में जो फौजी समझौता हुआ, उसके मुताबिक इनमें से किसी एक देश पर हुए हमले को ये तीनों देश अपने पर हुआ हमला मानेंगे। लोगों को याद होगा कि योरप और अमरीका वाले नाटो की भी कुछ इसी तरह की संधि है कि उनमें से किसी एक पर हमले को सारे नाटो देश अपने पर हमला मानेंगे, और इसीलिए रूस इस बात पर अड़ा हुआ है कि यूक्रेन नाटो का सदस्य न बने। यूक्रेन पर रूस के हमले की बुनियादी वजह यही है कि वह अपनी सरहद से लगकर एक और नाटो देश नहीं चाहता, और यही वजह है कि बाकी नाटो देश एक गैरसदस्य यूक्रेन की इतनी फौजी मदद कर रहे हैं कि पांच बरस बाद भी वह रूस के मुकाबले टिका हुआ है। 

अब अगर तीन देशों के बीच यह मक्का समझौता हुआ है, तो इसके पीछे की कुछ बुनियादी बातों को समझना जरूरी है। और समझौते के कुछ हफ्ते बाद अब इस पर लिखना कुछ अधिक जरूरी इसलिए हो चला है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के करीबी सहयोगी हुमायू कबीर ने एक समाचार एजेंसी से कहा है कि मक्का समझौते के इन तीन देशों के साथ आर्थिक, या फौजी ढांचे में शामिल होने की संभावनाओं पर बांग्लादेश सकारात्मक रूख रखता है। इन तीन देशों के बीच समझौते की जगह पर भी गौर करना जरूरी है कि वह मक्का में हुआ है जो कि मुस्लिमों के लिए पूरी दुनिया में सबसे पवित्र धार्मिक जगह मानी जाती है। दूसरी बात यह कि ये मुस्लिम देश इजराइल के खिलाफ अलग-अलग समय पर अलग-अलग बातें कह चुके हैं। बांग्लादेश ने अभी-अभी भारत का प्रस्तावित और घोषित दौरा रद्द किया है, और सऊदी अरब के दौरे के बारे में कहा गया है। 

भारत ने फिलहाल इतना ही कहा है कि वह पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। दुनिया के बहुत से विश्लेषकों का यह मानना है कि यह फौजी समझौता सीधे-सीधे भारत के खिलाफ न होने पर भी पाकिस्तान को बहुत मजबूत बनाने वाला है क्योंकि इन तीनों देशों में से वही अकेला परमाणु हथियार संपन्न देश है, बल्कि वह दुनिया का अकेला परमाणु हथियार वाला मुस्लिम देश है। यह समझौता इजराइल की फिक्र को बढ़ाने वाला है, क्योंकि दुनिया के इस हिस्से में अब इजराइल के मुकाबले किसी और देश के पास परमाणु बम चाहे न हो, परमाणु ताकत वाले देश के साथ तुर्की, और सऊदी अरब का यह फौजी समझौता तो हुआ ही है। बांग्लादेश अगर आगे-पीछे इसमें और जुड़ जाता है, तो यह इस्लामिक नाटो बनने की दिशा में एक और कदम हो सकता है। 

यह पूरा सिलसिला दुनिया में एक ऐसे वक्त हो रहा है जब अमरीका मध्य-पूर्व के देशों में अपनी सुरक्षा गारंटी पर खरा नहीं उतर रहा है। ईरान के साथ जंग में अमरीका ऐसा बुरा फंसा है कि उसके हमलों के जवाब में ईरान अड़ोस-पड़ोस के उन तमाम देशों पर फौजी हमले कर रहा है जहां पर अमरीकी फौजी ठिकाने हैं, या जहां से अमरीकी फौजी विमान उड़ान भर रहे हैं, जहां से मिसाइलें छोड़ी जा रही हैं। लोगों को यह समझ आ गया है कि अमरीका ने इस पूरे इलाके के देशों से किसी सलाह-मशविरे के बिना सिर्फ इजराइल के झांसे में आकर, उसके उकसावे को मानकर ईरान पर एक ऐसा हमला कर दिया है जिसे खत्म कर पाना या छोड़ पाना उसके बस के बाहर है। नतीजा यह है कि ईरान के हमलों से जख्मी बाकी पेट्रोलियम-गैस से मोटी कमाई करने वाले देश ईरानी मिसाइलें झेल रहे हैं, और अमरीका झूठे-बावले दावे करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है। जिस तरह योरप के देश, और पूरे का पूरा नाटो आज अमरीका के बिना अपनी पूरी ताकत खड़ी करने में लगा हुआ है, कुछ उसी तरह मध्य-पूर्व के देश अब अमरीका से परे अपने फौजी पांवों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मक्का को मानने वाले तमाम मुस्लिम देशों के एक साथ आने की एक कागजी संभावना तो बनती ही है। 

आज यह सवाल भी उठ रहा है कि अमरीका और ईरान के बीच बातचीत के कई दौर पाकिस्तान ने मध्यस्थता करते हुए पूरे करवाए। इन दोनों ही देशों ने पाकिस्तान के योगदान को माना, यह एक अलग बात है कि पाकिस्तान में तय हुआ युद्धविराम कायम नहीं रह पाया, लेकिन इनमें से किसी देश ने पाकिस्तान पर कोई तोहमत नहीं लगाई है। इजराइल को एक देश के रूप में मान्यता भी न देने वाले पाकिस्तान को अमरीका ने अपने हाल के बरसों की सबसे नाजुक जंग में जिस तरह, और जिस हद तक इस्तेमाल किया, उसे भी पाकिस्तान का एक बढ़ा हुआ महत्व माना जा रहा है। भारत के साथ हमदर्दी रखने वाले अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का भी यह कहना है कि फिलीस्तीन पर इजराइली हमलों के पूरे दौर में पाकिस्तान खुलकर बोलता रहा, और भारत इजराइल के साथ खड़े रहा। इस वजह से भी मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान की एक नई जगह बनी। इसी तरह तुर्की भी खुलकर इजराइल के खिलाफ आज भी खड़ा हुआ है, और उसने भी मुस्लिम दुनिया में एक फौजी ताकत की जगह बना ली है। सऊदी अरब की आर्थिक ताकत को तो सब लोग जानते ही हैं। ऐसे में यह गठबंधन परमाणु हथियार, दूसरे आधुनिक हथियारों वाले तुर्की, और सऊदी संपन्नता का एक ताकतवर गठजोड़ है। दुनिया के दूसरे भी कुछ मुस्लिम देशों में इजराइल की बढ़ती हुई विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ चाहे-अनचाहे नाराजगी बढ़ रही है। आज हालत यह है कि ब्रिटेन, कनाडा, और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोग इजराइल की बढ़ती बस्तियों के खिलाफ सार्वजनिक बयान जारी कर रहे हैं। ऐसे में मुस्लिम देशों को शर्म खाकर भी इजराइल के खिलाफ जुबानी जमा-खर्च तो करना ही होगा। फिर मक्का समझौते के तीन देशों के साथ जुडऩे से बाकी मुस्लिम देशों को भी परमाणु हथियारों की एक छतरी हासिल हो सकेगी। 

इससे इजराइल तो तुरंत अपने पर एक खतरा महसूस करेगा, लेकिन भारत को लेकर भी कुछ विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब भारत पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर जैसा हमला उसी आसानी के साथ कर सकेगा? क्या ऐसी कोई फौजी कार्रवाई करने से पहले उसे मक्का समझौते के बाकी दो देशों के साथ बात नहीं करनी होगी? और क्या उस बात का कोई असर उन दो देशों पर होगा जिन्होंने परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान के साथ एक लिखित औपचारिक फौजी समझौता किया है? यह भी समझना होगा कि आज जिस तरह बांग्लादेश की एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में शरण ली हुई है, और बांग्लादेश उन्हें मौत की सजा सुनाकर वापिस भेजने की मांग कर रहा है, इससे भी भारत और बांग्लादेश के बीच अभी एक बड़ा तनाव बना हुआ है। 

मुस्लिम देशों के मक्का समझौते, मुस्लिम-विरोधी इजराइल से पूरी दुनिया की बढ़ती शिकायतें, अमरीका और इजराइल की बीते दशकों से किसी न किसी मुस्लिम देश पर हमले का रिकॉर्ड, इन सबको देखते हुए अगर चाहकर, या मजबूरी में मुस्लिम देश पाकिस्तान की परमाणु छतरीतले एकजुट हो रहे हैं, तो इस बात को गौर से देखा जाना जरूरी है।

(Daily Chhattisgarh)  

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त 2026



 

भारत की जिंदगी में बिखरी कतरा-कतरा अंधेरी बातें...

23 अगस्त 2026  

 

अभी एक शहर के बाहरी हिस्से में एक खाली खदान में भरे हुए पानी में डूबकर एक नौजवान की मौत हो गई। आपस में कुछ नौजवान वहां भरे हुए पानी को तैरकर पार करने का मुकाबला कर रहे थे, बीच में दम टूट गया, और एक नौजवान डूब गया। अब यह साधारण खदान जितनी गहराई नहीं थी, चार सौ फीट गहरे पानी में नीचे तक जाकर ढूंढना स्थानीय बचावकर्मियों के लिए मुमकिन नहीं था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने नौसेना के अफसरों से बात करके गोताखोरों का इंतजाम किया था, लेकिन इसके पहले कि वे यहां के लिए रवाना हो सकें, कोई 80 घंटे बाद लाश तैरकर सतह पर आ गई। इस तरह छत्तीसगढ़ में नौसेना के गोताखोरों की पहली तलाश शुरू होने के पहले ही रूक गई। लेकिन इन चार दिनों शहर में जो बेचैनी रही, बचावकर्मियों पर जो दबाव रहा, वह बहुत था। ऐसी खतरनाक जगह पर लंबी तैराकी का मुकाबला बिना किसी बचाव के करने वाले लोगों ने अपनी जिंदगी तो गंवाई ही, सरकार पर भी एक असाधारण बोझ लाद दिया। एक दूसरी घटना में एक आदमी अपने दो बच्चों को लेकर कहीं नदी-तालाब के किनारे गया, बच्चे पानी में डूबते रहे, और किनारे बैठा बाप मोबाइल पर जुटे रहा, बच्चों की जिंदगी चली गई। रील बनाते हुए जिंदगियां देने वाले तो बहुत सारे लोग हैं, और हाईकोर्ट के हुक्म के बावजूद सडक़ों पर स्टंट करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। यह तो बात हुई जनता की, लेकिन जब हम सरकार या अदालत पर पडऩे वाले बोझ की बात करते हैं, तो सरकारों के बहुत सारे फैसले भी ऐसे रहते हैं जिनके बारे में सरकार को यह कानूनी समझ रहती है कि यह अदालती अग्निपरीक्षा को नहीं झेल पाएंगे, लेकिन वे ऐसे फैसले लेती हैं। ये फैसले सरकारी अमले के बारे में भी रहते हैं, जनता के बारे में भी रहते हैं। खुद अदालतों के भीतर अगर देखें, तो छोटी अदालतें ऐसे नाजायज फैसले भी देती हैं जो कि पहली नजर में ही गलत लगते हैं, और जिन पर ऊपर की अदालतों का और अधिक वक्त बर्बाद होता है। साम्प्रदायिक और राजनीतिक नेता कई तरह के भडक़ाऊ बयान देते हैं, जिनके बारे में उन्हें अंदाज रहता है कि इस पर या तो पुलिस रिपोर्ट होगी, या मुकदमे चलेंगे, या फिर कानून व्यवस्था की दिक्कत खड़ी होगी, और सरकारी अमला उसमें झोंकना पड़ेगा। 

हम भारत जैसे देश में सरकार और अदालत की उत्पादकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही गैरजरूरी मुद्दों में बर्बाद होते देखते हैं, जिन्हें वक्त रहते सुलझाया जा सकता था, या गलत फैसलों से बचा जा सकता था, बिना विवाद बढ़ाए काम हो सकता था। ऐसे फैसले निजी जिंदगी के भी रहते हैं, और सरकारी या अदालती भी। अब चाकू या पिस्तौल दिखाते हुए एक वीडियो बनाकर पोस्ट कर देने का मतलब यह रहता है कि उसकी तलाश करते हुए पुलिस सोशल मीडिया कंपनियों तक जाए, फिर पहचान निकालकर उनके घर जाकर पकड़े, उन्हें अदालत में पेश करे, जेल भेजे, और यही करते रह जाए। क्या आज टेक्नॉलॉजी और दूसरी वजहों से जिस रफ्तार से जुर्म बढ़ रहे हैं, उस अनुपात में अगर पुलिस और अदालत की क्षमता बढ़ाई जाएगी, तो उसका खर्च आएगा कहां से? जेलें कैदियों से उफन रही हैं, सडक़ें उन जानवरों से उफन रही हैं जिन्हें उनके मालिकों ने दूध की आखिरी बूंद तक निचोडक़र सडक़ों पर छोड़ दिया है। लोग इन जानवरों से टकराते हैं, अपनी जिंदगी देते हैं, और अगर खुद बच जाते हैं, तो जानवरों को जख्मी करने की तोहमत झेलते हुए जेल भी जाते हैं, भीड़ की मार भी खाते हैं, और कभी-कभी भीड़ के हाथों मारे भी जाते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार और अदालत का ढांचा, आम लोगों के लिए बनी हुई सडक़ें इसीलिए है कि लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोग, मुजरिम किस्म के लोग उनका बेजा इस्तेमाल करें? यह सब होता तो जनता के ही टैक्स के पैसों से है। 

सरकारों की बात करें तो वे भी देश के संविधान के शब्दों और उसकी भावना के खिलाफ जाकर कई तरह के फैसले लेती हैं। फिर देश मेें चुनाव आयोग जैसी जो दूसरी संवैधानिक संस्थाएं बनाई गई हैं, वे भी बड़े पैमाने पर बदअमनी फैलाने का काम कर रही हैं। बंगाल में जिस तरह चुनाव के चलते हुए दसियों लाख मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी न्यायिक सुनवाई करने के लिए चुनाव आयोग से कहा। अभी भी इस लिस्ट में दसियों लाख लोग, शायद 30 लाख से अधिक, अर्जियां लेकर खड़े हुए हैं, और जिस रफ्तार से उनकी जांच की जा रही है, उससे खुद सुप्रीम कोर्ट का अंदाज है कि सारी अर्जियां निपटाने में 21 साल लग जाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह चुनाव तो निकल ही गया, इसके बाद के और चार चुनाव निकल जाएंगे, तब तक आज की अर्जियां ही नहीं निपट पाएंगी, लोगों का वोट देने का अधिकार जाता रहेगा। यह तो गनीमत कि देश में सुप्रीम कोर्ट से ऊपर कोई और कोर्ट नहीं है, वरना यह फैसला किसी सुपर सुप्रीम कोर्ट में पल भर में खारिज हो गया रहता, कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं दे पा रहे हैं तो क्या हुआ, अगले चुनाव में दे देंगे। कोई सुप्रीम कोर्ट के जजों से यह बात कहकर देखते कि उनका इस जन्म में सुप्रीम कोर्ट के लिए सलेक्शन नहीं हो पाया तो क्या हुआ, अगले जन्म में हो जाएगा, तो पता लगता। हमारे कहने का मतलब यह है कि गनीमत कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को संसद के अलावा कहीं और चुनौती नहीं दी जा सकती है, वरना ढेर सारे फैसलों को खारिज करने के तर्क तो हमारे जैसे को ही सूझते रहते हैं। आज की इस चर्चा में हम कॉकरोच-प्रसंग पर कुछ लिखना नहीं चाहते क्योंकि उस अवांछित प्रसंग पर बहुत बार बहुत कुछ लिख चुके हैं। 

भारतीय लोकतंत्र में लोगों के नफरती और जहरीले बयानों से लेकर तरह-तरह के लोगों के किए जा रहे तरह-तरह के जुर्म तक इतना कुछ ऐसा हो रहा है कि उससे पुलिस, अदालत, सरकार, और समाज सबका जीना हराम है। यह सिलसिला कैसे कम होगा? कैसे लोगों में सामाजिक सरोकार आ सकता है, सामूहिक चेतना आ सकती है, कानून के प्रति सम्मान आ सकता है, कैसे सरकारों से बददिमागी कम हो सकती है, कैसे पूरे भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर फैला हुआ भ्रष्टाचार घट सकता है, कैसे महिलाओं का सम्मान पत्थर-मिट्टी की देवी प्रतिमाओं के बराबर हो सकता है, कैसे बच्चों के साथ बर्ताव तथाकथित इंसानी हो सकता है, कैसे लोग अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी मंजूर कर सकते हैं? कैसे ये तमाम चीजें भारतीय जीवन में लौट सकती हैं, या पहली बार आ सकती हैं? यह न सिर्फ हथियारबंद अराजकता है, बल्कि तथाकथित मानवीय मूल्यों की अराजकता भी है, जो कि वैचारिक से लेकर शारीरिक हिंसा तक भारतीय जनजीवन पर हावी हो चुकी है। कानून के प्रति हिकारत, समाज के प्रति गैरजिम्मेदारी, दूसरों के अधिकारों की हेठी, क्या नहीं है हिन्दुस्तान में? किस तरह सार्वजनिक जगहों पर और जनजीवन मेंं कभी दुरुस्त न होने वाला नुकसान होते चल रहा है, क्या कोई इस बारे में सुधार करने की बात सोच भी रहे हैं? यह एक बहुत लंबी-गहरी अंधेरी सुरंग की तरह है, जिसमें अगर किसी को आखिर में उम्मीद की किरण अगर दिखती भी है, तो वह असली होने के बजाय घुप्प अंधेरे में दिखती मृगतृष्णा ही है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

पेपर बेचने वाले प्रोफेसर के लिए मौजूदा सजा कम, कानून में संशोधन जरूरी..

22 अगस्त 2026  

 

देश भर में जगह-जगह इम्तिहानों के पर्चे लीक होने को लेकर साल-दो साल से बवाल चल रहा है। मेडिकल दाखिले के लिए होने वाली नीट इम्तिहान के पेपर लीक की वजह से तो विश्व इतिहास में पहली बार पर्चों को दुबारा इम्तिहान में एयरफोर्स के विमानों से भेजा गया। देश भर में एक असाधारण ऐतिहासिक आंदोलन पर्चे आउट होने के खिलाफ चला, और एक  बहुत कड़ा कानून इसके लिए 2024 में बनाया गया था जिसमें तीन से पांच साल तक की जेल, और 10 लाख रूपए तक के जुर्माने का इंतजाम किया गया, और अगर मैनेजमेंट की भागीदारी साबित होती है तो 3 से 10 साल की कैद, और एक करोड़ रूपए तक जुर्माना लगाया गया था। इस कानून को गैरजमानती, और गैरसमझौता योग्य बनाया गया था। अब 2026 में पिछले ही महीने इसमें एक संशोधन पेश किया गया है जो कि लोकसभा में विचाराधीन है जिसमें पर्चों से जुड़े मैनेजमेंट पर पांच करोड़ रूपए तक जुर्माने, और आठ साल तक प्रतिबंध के कड़े प्रावधान किए गए हैं। व्यक्तियों को व्यक्तिगत अपराध के लिए 5 से 10 साल की कैद, और 50 लाख तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। इसके बाद भी अभी जब छत्तीसगढ़ में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय का एक पर्चा लीक होकर धड़ल्ले से चारों तरफ फैला, तो यह समझ आया कि कागजों पर कड़ी सजा किसी को जुर्म से नहीं रोक पाती है। लोगों का भारतीय न्याय प्रक्रिया की कमजोरी पर इतना पुख्ता भरोसा है कि वे बड़े से बड़ा जुर्म करके बच जाने की उम्मीद रखते हैं। 

अभी पुलिस ने छत्तीसगढ़ के इस मामले में दुर्ग जिले के भारती एग्रीकल्चर कॉलेज नाम के निजी कॉलेज के एक प्रोफेसर सहित आधा दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय ने इस इम्तिहान के लिए प्रदेश के 28 सरकारी, और 4 निजी कॉलेजों को छांटा था, और वहां पर पर्चे समय से पहले पहुंचाए जाते थे। अभी जिस प्रोफेसर योगेश सोनकेसरिया को गिरफ्तार किया गया है वह अपने कॉलेज से रायपुर के कृषि विश्वविद्यालय तक कॉपियां लाने ले जाने, प्रश्नपत्र लाने का काम करता था। उसने इसमें से एक लिफाफे के कोने में बारीक छेद करके भीतर एक छोटा कैमरा डालकर प्रश्नपत्र की फोटे खींची थीं, और फिर 11 हजार रूपए में बेच दी थी। खरीदने वाले छात्र ने इसे कुछ और लोगों को दिया। अब सवाल यह उठता है कि 2019 से जो एक कॉलेज में प्राध्यापक है, वह 11 हजार रूपए के लिए एक इम्तिहान को चौपट करने का काम कर रहा है, और अपने ही कॉलेज के छात्रों को पर्चा बेच रहा है। 

आज हिन्दुस्तान में नौजवान आबादी का एक बड़ा हिस्सा बेरोजगार है। लेकिन जिन लोगों को रोजगार मिला हुआ है, उनमें से कई शिक्षक शराब पिए हुए स्कूलों में पड़े रहते हैं, बहुत से लोग नौकरी की परवाह किए बिना रिश्वत लेने में लगे रहते हैं, और एक कॉलेज प्राध्यापक इस तरह की आपराधिक साजिश करके एक मामूली सी रकम के लिए इतना बड़ा खतरा मोल ले रहा है। यह 11 हजार रूपए की रकम एक कॉलेज प्राध्यापक की तनख्वाह के मुकाबले कुछ भी नहीं होगी। देश में कड़ा कानून बनने की चर्चा और लोगों में न सही, स्कूल-कॉलेज के लोगों में तो हुई ही होगी। आज जंतर-मंतर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, संसद से लेकर सडक़ तक पर्चे आउट होने को लेकर जनता की अभूतपूर्व नाराजगी सामने आ ही रही है, बड़े-बड़े आंदोलन चल रहे हैं। ऐसे में भी लोगों को पर्चे आउट करके बेचने का उत्साह बना हुआ है। यह तो यह हरकत पकड़ में आ गई। मान लें कि नहीं आई होती, तो पर्चे खरीदने वाले छात्र दूसरे ईमानदार छात्रों के मुकाबले कई तरह के फायदे पा सकते थे, पाते ही। इसलिए इम्तिहानों में, नौकरी के साक्षात्कार में बेईमानी सिर्फ खुद के फायदे की बात नहीं होती, वह दूसरों के हक छीनने की बात भी होती है। कड़े कानून की जरूरत भी इसीलिए थी कि समान अवसरों से वंचित रह जाने वाले तबके इस तरह के जुर्म से इतने विचलित होते हैं कि खुदकुशी भी कर लेते हैं। जिस नीट इम्तिहान को लेकर देश हिल गया, उसके दुबारा होने से पहली बार के कामयाब बच्चों में से 20 से अधिक बच्चों ने खुदकुशी कर ली थी। एक प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के ऐसे एक इम्तिहान के एक पर्चे से शायद कुछ सौ, या कुछ हजार लोग ही जुड़े होंगे, लेकिन जब किसी संस्थान के इंतजाम की विश्वसनीयता खत्म होती है, तो मुकाबला करने वाले सभी बच्चों, और नौजवानों का विश्वास भी खत्म होता है। लोगों में एक निराशा छा जाती है कि उनकी मेहनत से क्या फायदा, क्योंकि उनके मुकाबले कमजोर लोग तो पर्चे खरीदकर, या किसी और तरीके से लिस्ट में ऊपर आ जाएंगे। 

कानून में पांच-दस बरस की कैद के बाद ऐसे लोगों का पढऩा, और पढ़ाना खत्म ही हो जाएगा, लेकिन इन लोगों को सजा मिलने से परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता जल्दी नहीं लौट पाएगी। यही छत्तीसगढ़ है जहां बीते बरसों में राज्य लोकसेवा आयोग बेरोजगारों के हक की सरकारी कुर्सियों को पैसेवालों, और नेता-अफसरों के रिश्तेदारों को देते आया है, आज पीएससी के चेयरमैन सहित बहुत से लोग जेलों में पड़े हैं, जिनमें करोड़पति-अरबपति उद्योगपतियों के परिवारों के लोग भी हैं जिन्होंने 50-50 लाख में एक-एक कुर्सी खरीदी थी। आज देश में इम्तिहानों की बेईमानी, दाखिले, और नौकरी के मुकाबलों में बेईमानी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। देश के सारे बेरोजगार, चाहे वे प्रतिभा के आधार पर चयन सूची में आने के लायक न हों, वे भी निराश हो जाते हैं कि सलेक्शन में बेईमानी चल रही है। यह सिलसिला टूटना चाहिए। जहां बाकी लोगों के हक छीनकर कुछ लोगों के बीच पढ़ाई या नौकरी की कुर्सी बेची जाती है, वहां पर इन लोगों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए, और लोकसभा में जो संशोधन अभी है, उसे भी कानून बनाया जाना चाहिए। इस बीच यह उम्मीद तो जायज ही होगी कि इम्तिहान और इंटरव्यू लेने वाले सभी संस्थान अपने इंतजाम और पुख्ता करते चलें, क्योंकि पेपर आउट करने का बड़ी कमाई का धंधा तो मुजरिम चलाते ही रहेंगे, और उसे रोकने की तरकीबें भी जारी रखनी होगी।

(Daily Chhattisgarh)   

एथेनॉल का बावलापन क्या डॉलर और पेट्रोल के टक्कर में शक्कर की भी सेंचुरी बनाएगा?

 21 अगस्त 2026  

 

भारत के बाजारों में शक्कर का दाम एकाएक आसमान छूने लगा है। कमी इतनी हो गई है कि केन्द्र सरकार ने शक्कर आयात पर शुल्क शून्य कर दिया है। मतलब यह कि टैक्स का नुकसान झेलते हुए, विदेशी मुद्रा खर्च करते हुए अब भारत के लोगों के मुंह में कड़वी शक्कर घुलेगी, दूसरी तरफ भारत में शक्कर कारखानों को गन्ना कम नसीब है क्योंकि गन्ना एथेनॉल फैक्ट्रियों में जा रहा है, और वहां से पेट्रोलियम में मिलावट के लिए। सरकार का तर्क है कि भारी-भरकम पेट्रोलियम आयात खर्च घटाने के लिए, विदेशी मुद्रा बचाने के लिए यह मिलावट की जा रही है, लेकिन अब पेट्रोलियम में यह बच रही है तो शक्कर में जा रही है। इसके साथ-साथ कुछ जानकार लोगों ने यह भी लिखा है कि एथेनॉल मिले हुए पेट्रोल से गाडिय़ों का माइलेज 10-15 फीसदी तक गिर रहा है, इसका मतलब है कि उनके पेट्रोल की खपत 10-15 फीसदी बढ़ जाएगी। अब उतने ही लोगों के उतने ही किलोमीटर पर 10-15 फीसदी अतिरिक्त पेट्रोल आयात करना पड़ेगा, तो फिर हासिल हुआ क्या? निल बटे सन्नाटा? 

पेट्रोल में एथेनॉल मिलावट का अधिक विरोध इसलिए कारगर नहीं हो रहा क्योंकि इस बाजार पर सरकार का एकाधिकार है। अधिकतर पेट्रोलियम कंपनियां सरकार की अपनी हैं, और ग्राहक के पास न कोई पसंद है, न कोई विकल्प। अभी दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि ग्राहकों को ई-20 पेट्रोल के साथ-साथ ई-10 पेट्रोल भी मुहैया कराया जाना चाहिए ताकि पुरानी गाडिय़ों वाले लोग अपनी पसंद का ईंधन चुन सकें। दरअसल यह तकनीकी तथ्य सामने आया है कि पुरानी गाडिय़ां एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के लायक बनी हुई नहीं हैं। केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बहुत ही गोलमाल शब्दों में मजबूरी में ही संसद में यह माना है कि पुरानी गाडिय़ों के कुछ पुर्जे इससे खराब हो सकते हैं। लोगों का कहना है कि यह ‘कुछ’ शब्द सही ब्यौरा नहीं है, और कई पुर्जे खराब हो सकते हैं, उनके बदलने की लागत सरकार के रखे गए अंदाज से काफी अधिक हो सकती है, ऐसी गाडिय़ां खराब होने के वक्त कहीं भी दगा दे सकती हैं। भारत की ऑटोमोबाइल कंपनियां एक गजब की रहस्यमय चुप्पी साधे बैठी हैं, और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने इन कंपनियों को चिट्ठी लिखने पर भी कोई जवाब न मिलने की बात सार्वजनिक रूप से कही है। देश के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल संगठन एसआईएएम ने पेट्रोलियम मंत्रालय को एक चिट्ठी लिखी, और ई-20 पेट्रोल से होने वाले नुकसान की शिकायतें बढऩे की बात कही, लेकिन कुछ रहस्यमय कारणों से कुछ घंटों के भीतर ही यह चिट्ठी वापिस ले ली, और कहा कि अभी आंकड़ों की कुछ और पुष्टि करनी है। 

अब हिन्दुस्तान में त्यौहार के महीने शुरू हो चुके हैं, और अगले कई महीने लोगों के घर-बाजार में शक्कर की अधिक खपत रहेगी। अभी ही शक्कर दुगुने दाम पर पहुंच रही है, और आज बाजार का एक अंदाज यह है कि यह सौ रूपए किलो भी हो सकती है, यानी वह पेट्रोल और डॉलर दोनों को कड़ा मुकाबला दे सकती है। यह बड़ी गजब की नौबत है। सरकार ने अभी कुछ हफ्ते पहले यह मंजूर किया था कि इस मिलावट से गाडिय़ों को कुछ नुकसान पहुंच सकता है, लेकिन सरकार ने यह भी कहा था कि एथेनॉल से जुड़े हुए ढांचे को खड़ा करने में देश का सवा लाख करोड़ रूपए खर्च हो चुका है, इसलिए वापिस लौटना महंगा पड़ेगा। हमने उस वक्त भी लिखा था कि देश की सारी पेट्रोल-गाडिय़ों की मौजूदा कीमत इस सवा लाख करोड़ से बहुत अधिक है, और उनको नुकसान पहुंचाने की कीमत पर ऐसा फैसला नहीं लेना चाहिए। 

आज त्यौहार के वक्त लोगों की गाडिय़ां गन्ना रस से बने एथेनॉल वाले पेट्रोल से डायबिटिक हो रही हैं, बाजारों से शक्कर गायब हो रही है, महंगी हो रही है, गन्ना उगाने वाले खेत भयानक पानी पीते हैं, इसलिए धरती के पेट से पानी गायब हो रहा है, अब शक्कर आयात करने की नौबत आ गई है, इसलिए जीरो ड्यूटी करने से सरकार को सीधा नुकसान भी हो रहा है, और विदेशी मुद्रा भी जा रही है। गाडिय़ों को नुकसान हो रहा है, सेकेंडहैंड गाडिय़ों का बाजार ठप्प सरीखा हो रहा है, वहां दाम गिर गए हैं, ग्राहक बिदक गए हैं। अर्थशास्त्रियों को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि पेट्रोल का 20 फीसदी आयात घटाने के लिए सरकार किस-किस तरह के नुकसान झेल रही है। यह भी खबर है कि राज्य सरकारें चावल के अपने विशाल अतिरिक्त भंडार से औने-पौने दाम पर एथेनॉल निर्माण के लिए चावल दे रही है जिससे अंधाधुंध अनुदान पर खरीदा गया चावल भारी नुकसान पर एथेनॉल बनाने में जा रहा है। किसको घाटा हो रहा है, किसको मुनाफा हो रहा है, यह कुछ भी साफ नहीं है। इतना जरूर है कि जनता का विश्वास सरकार पर से कमजोर हो गया है, और एथेनॉल के सेल्समैन की तरह जनता के सामने खलनायक बने हुए नितिन गडकरी अपनी दशकों की कमाई हुई लोकप्रियता को महीनों में खो बैठे हैं। 

इस पूरे मामले से जुड़े हुए सारे आंकड़ों का विश्लेषण हमारी साधारण समझ से ऊपर की बात है। लेकिन क्या आयात में 20 फीसदी की कमी करना सचमुच इतने किस्म के नुकसान के लायक है? क्या जनता का भरोसा खो देने के लायक है? क्या एथेनॉल निर्माण के लिए एक बार बन चुके ढांचे की लागत की विकरालता इतनी विशाल है कि सरकार अपना फैसला बदल न पाए, ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनके जवाब हमारे पास नहीं हैं, लेकिन जनता के मन में ये सवालों की शक्ल में खड़े हुए हैं, जब-जब लोगों को पेट्रोल पंप की शक्ल देखनी पड़ती है, उन्हें नितिन गडकरी की शक्ल भी दिमाग में घूम जाती है, चाहे वे पेट्रोलियम मंत्री न हों। अब तक पेट्रोल पंपों पर जो नाराजगी रहती थी, वह तो दो-चार दिनों में, या हफ्ते में एक बार रहती थी, लेकिन अब दिन में चार-छह बार चाय की हर प्याली के साथ लोगों के मन में यह टीस उठती रहेगी कि उनकी चाय एथेनॉल की वजह से कड़वी है। 

सरकार के अपने हित में यह है कि एकदम पारदर्शी तरीके से, लोगों को समझ आए ऐसी भाषा में इस पूरी अर्थव्यवस्था को समझाए, और जनता के सामने अपने फैसलों को न्यायोचित साबित करे। हम तो देश की जनता, और सरकार दोनों के शुभचिंतक की हैसियत से यह पारदर्शिता सुझा रहे हैं। जनता के इतने बड़े तबके, तकरीबन सौ फीसदी जनता के मन में स्थाई संदेह, और स्थाई आक्रोश लोकतंत्र में किसी भी सत्ता के लिए अच्छी बात तो रहती नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)