मिलावटी-पेट्रोल पर सरकार जीत न पाई जनता का भरोसा

05 अगस्त 2026  

 

भारत में पेट्रोल में एथेनाल मिलाने को लेकर विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अब हाशिए पर पहुंचे हुए राष्ट्रीय स्तर पर जाना-पहचाना चेहरा, अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर बड़े आंदोलन की घोषणा की है। लेकिन पिछले कई महीनों से देश की जनता के सामने केन्द्र सरकार कोई भरोसेमंद जानकारी नहीं दे पा रही है। जनता इस बात को लेकर भी बहुत हैरान है कि एथेनाल की वकालत परिवहन मंत्री नितिन गडकरी कर रहे हैं, वे ही लगातार बयान देते हैं, और एथेनाल के फायदे गिनाते हैं। वे ही जब कई बार इस बात को बोल चुके थे कि एथेनाल से न तो इंजन कम चलता है, और न ही कोई पुर्जे खराब होते हैं, तब महीनों तक इस धारणा को जारी रखने के बाद अब उन्हें संसद में भारत सरकार के संस्थानों की जांच रिपोर्ट रखनी पड़ी कि इससे गाडिय़ां कम दूरी तक चल रही हैं, और गाडिय़ों के कई तरह के पुर्जे भी खराब हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर पेट्रोल में एथेनाल नहीं मिलाया जाता, तो पेट्रोल सवा सौ रूपए लीटर हो गया रहता। इसके पहले केन्द्र सरकार की तरफ से यह कहा गया था कि सरकार एथेनाल के प्रयोग पर एक लाख करोड़ से अधिक खर्च कर चुकी है, और अब इस फैसले को बदलने से बड़ा नुकसान होगा। इस तरह की अलग-अलग समय पर कही गई अलग-अलग बातों से जनता का भरोसा सरकार पर बिल्कुल नहीं बैठ रहा। हमारा अंदाज है कि आबादी का अधिकतर हिस्सा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पेट्रोल से जुड़ा रहता है, और जनता के बीच इतना अविश्वास सरकार की सेहत के लिए ठीक नहीं है। यह एक अलग बात है कि अभी कोई आम चुनाव सामने नहीं हैं, इसलिए सरकार पर कोई खतरा नहीं है, लेकिन अगर पेट्रोल में ऐसी सरकारी मिलावट को लेकर जनता की शिकायतें बनी रहेंगी, बढ़ती जाएंगी, और जनता के बीच शक और बेचैनी दोनों बढ़ते चलेंगे, तो फिर पेट्रोल की यह व्यवस्था तो अगले आम चुनाव तक जारी ही रहेगी। 

सरकार एक तरफ तो एथेनाल मिलाने की वजह से पेट्रोल के दाम बहुत अधिक न बढऩे की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ जनता को शक यह है कि अपने खरीदे ऐसे सरकारी मिलावटी-पेट्रोल की वजह से उसे अधिक पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है, और वह शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले उसे अधिक महंगा पड़ रहा है। गडकरी ने संसद में यह मंजूर किया है कि भारत की बहुत सारी गाडिय़ों में इस मिलावटी ईंधन से कई तरह के पुर्जे खराब हो सकते हैं, और उन्हें बदलने की नौबत आ सकती है। हम तो रोज ही खबरों को देखते हैं, और हमें यह बिल्कुल याद नहीं पड़ रहा कि सरकार ने जनता के सामने कभी यह पसंद रखी हो कि वह महंगा शुद्ध पेट्रोल खरीदना चाहेगी, या सस्ता मिलावटी पेट्रोल। जनता के सामने तो पूरे वैज्ञानिक और तकनीकी तथ्य आज तक नहीं रखे गए हैं। जो हर किसी की जिंदगी को प्रभावित करने वाला मामला है, उसे सरकार ने अपनी मनमानी से एकतरफा तय किया है, तो उसके विरोध के लिए भी उसे तैयार रहना होगा। सरकार समय रहते जनता के विश्वास को जीतना अगर गैरजरूरी मानेगी, तो विश्वास का यह संकट जनता को तो किस्तों में झेलना पड़ेगा, सरकार इसे चुनाव के वक्त थोक में झेलेगी। 

अभी-अभी इस देश में नीट इम्तिहान की गड़बडिय़ों को लेकर छात्रों, और युवाओं का एक सबसे बड़ा आंदोलन हुआ। नीट के मुद्दे पर भी केन्द्र सरकार का महीनों तक रूख जिम्मेदारी को झटक देने का था। उसने अपनी कोई कमी या खामी मानी ही नहीं थी। बाद में जब छात्रों की तरफ से ये गड़बडिय़ां साबित की गईं, तब भी सरकार या सरकार के समर्थकों की तरफ से छात्रों के लिए गद्दार, देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग, पाकिस्तान समर्थित, चीन समर्थित, कई तरह की तोहमतें लगाई गई। जब जंतर-मंतर पर अनशन और आंदोलन शुरू हुआ, तो सरकार की तरफ से करीब महीने भर किसी ने उधर झांका भी नहीं। और जब बाद में यह मामला जोर पकड़ते दिखा, तो सरकार ने एकदम हड़बड़ी में आंदोलनकारियों से बात की, और उसे सुलझाने के लिए समझौता किया, अपने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी लिया। यह सिलसिला एक मजबूत सरकार की साख के खिलाफ था। यह एक अलग बात है कि जब सरकार की आलोचना करने वाले लोग नापसंद किए जाते हैं, तो सरकार को समय रहते जनभावनाओं का अहसास नहीं होता। लोगों ने लगातार पेट्रोल की महंगाई, लगातार रसोई गैस की महंगाई, इन सबको बर्दाश्त किया, लेकिन उसे मजबूरी में मिलावटी पेट्रोल खरीदना पड़े, यह बात उसके गले उतरते नहीं दिख रही है। सरकार चूंकि देश में पेट्रोल-डीजल और गैस की बिक्री में लगभग एकाधिकार रखती है, इसलिए आम जनता के पास यह पसंद तो है नहीं कि वह किसी और कारोबारी से पेट्रोल, डीजल, गैस खरीद सके। जहां कहीं सरकार का एकाधिकार रहता है, वहां सरकार को एक कारोबारी के नजरिए से नहीं, ग्राहक-जनता के नजरिए से सोचना चाहिए। 

सरकार के भीतर विश्वसनीयता को बनाए रखने की कोशिश में भी कमजोरी रही। पेट्रोल में मिलावट की वकालत करने वाले मंत्री का पेट्रोलियम मंत्रालय से कोई लेना-देना नहीं था, और वे इस विवाद में अलग उलझ गए कि उनके बेटों के एथेनाल के कारखाने हैं या नहीं, अगर हैं, तो बेटों की कितनी कमाई एथेनाल से जुड़ी हुई है। ऐसी बातों से भी लोगों का भरोसा टूटा। सरकार को चाहिए था कि वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं की जांच रिपोर्ट को जनता के सामने पारदर्शी तरीके से पेश करती, उसके संदेहों को दूर करती, और तब उस पर यह मिलावटी पेट्रोल थोपती। इस मुद्दे के लिए लोगों को एकजुट करने में किसी केजरीवाल की भी अधिक जरूरत नहीं है। तिलचट्टों जैसे नौजवानों की तरफ से भी अगर किसी दिन गाडिय़ों के चक्काजाम का आव्हान आ जाएगा, तो देश-प्रदेश की सरकारें उससे जूझ नहीं पाएंगी। अगर सरकार ने एथेनाल पर पूंजीनिवेश किया है, तो भी उसके नफा-नुकसान को देखने के पहले लोकतंत्र में ग्राहक के रूप में जनता के अधिकारों का सम्मान करना अधिक जरूरी है। किसी भी सरकार को जनता पर अपने फैसलों को इस बुरी तरह नहीं थोपना चाहिए, इसका नुकसान जनता हर दूसरे-तीसरे दिन पेट्रोल डलाते हुए झेलती है, और आम जनता की ऐसी निरंतर और स्थाई नाराजगी अच्छी नहीं है। केन्द्र सरकार बीते बरसों में अपने ऐसे ही कुछ और एकतरफा फैसलों का नुकसान देश की जनता पर डाल चुकी है, और उन बुरे तजुर्बों को जनता तो याद रखी हुई है, सरकार को भी उन्हें याद रखना चाहिए। लोकतंत्र में ठोकर लगे तो उससे सबक लेना चाहिए, सरकार को तैश में मनमानी काम नहीं करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 5 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)




 

फुटपाथ पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा हुक्म तो ठीक है, पर पहले के हुक्म क्या हुए?

04 अगस्त 2026  

 

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक बार फिर अपनी पुरानी बात को दोहराया है, और कहा है कि देश में सडक़ों के किनारे सभी जगह फुटपाथ अनिवार्य रूप से बनाए जाएं, और उन्हें चलने के लिए खाली भी रखा जाए। अदालत का मानना है कि नागरिकों का चलने का हक किसी भी दूसरी वजह से कम नहीं किया जा सकता। 1985 से अदालतें यह साफ करते आई हैं कि लोगों को अपनी रोजी-रोटी के लिए सडक़ किनारे काम करने का हक तो है, लेकिन इसके लिए कोई व्यक्ति सडक़ या किसी सार्वजनिक जगह पर कब्जा नहीं कर सकते। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि अगर फुटपाथों पर कब्जे होंगे, तो पैदल लोगों को सडक़ों पर चलना पड़ेगा, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ेगा। सर्वोच्च अदालत ने यह साफ किया था कि सुरक्षित फुटपाथ केवल सुविधा नहीं है, बल्कि यह संविधान के 21वें अनुच्छेद के तहत गरिमापूर्ण जीवन का हिस्सा है। अदालत ने कल केन्द्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि पैदल चलने वालों के लिए तय की गई जगह पर गाडिय़ों या दुकानों का कब्जा नहीं होना चाहिए। कल सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच ने भारत सरकार के वकील को कहा है कि ऐसी जगह जहां तय नहीं की गई है, वहां बिना किसी बड़ी लागत के, जरूरी होने पर रस्सी बांधकर ही उसे अलग दिखाया जाए, और वहां पर न कोई कारोबार करे, न कोई गाडिय़ां खड़ी करे। अदालत ने सरकारों को यह करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि पैदल चलने वालों में यह भरोसा होना चाहिए कि सडक़ किनारे का यह हिस्सा उन्हीं के लिए है, और वे बिना किसी तेज रफ्तार गाड़ी के डर के सुरक्षित चल सकते हैं। अदालत ने साफ किया कि सडक़ों पर गाडिय़ों की तुलना में पैदल चलने वालों का अधिकार प्राथमिक और पहला है। जजों ने यह भी साफ किया कि अगर कोई म्युनिसिपल या पंचायत, जो भी संस्था या विभाग सडक़-फुटपाथ रख-रखाव के लिए जिम्मेदार है, वे अगर सही इंतजाम नहीं करते, या उस पर कब्जे होने देते हैं, तो नागरिक कानूनी मदद ले सकते हैं, और मुआवजे की मांग भी कर सकते हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने इसके पहले भी बहुत सारे मामलों में ऐसे आदेश और फैसले दिए हैं, जिनमें से किसी पर अमल नहीं हुआ। सडक़ों पर से जानवर नहीं हटे, सार्वजनिक जीवन से डीजे का शोरगुल नहीं हटा, तालाबों का पटना बंद नहीं हुआ, मैदानों का घटना जारी है, चारागान पर इंसान चर रहे हैं, और फुटपाथों पर छोटे कारोबारियों को इजाजत और बढ़ावा देकर स्थानीय नेता अपने वोट पक्के करने की कोशिश करते हैं, और पुलिस की इतनी क्षमता नहीं है कि निर्वाचित नेताओं के चलाए जाते म्युनिसिपल की बढ़ाई अराजकता को वह रोक सके। जब सरकार का ही एक हिस्सा अराजकता को बढ़ाने में लगा रहे, तब सरकार का दूसरा हिस्सा नौबत सुधारने के लिए कुछ नहीं कर सकता। यह बात हम अपने शहर में रात-दिन देखते हैं कि सडक़ किनारे के कारोबारी अपनी बड़ी-बड़ी दुकानों के बाहर दस-दस फीट से अधिक दूरी तक सामान सजाकर रखते हैं, पुतले खड़े करके रखते हैं, चबूतरे बना देते हैं, और म्युनिसिपल के नेता उन पर कोई कार्रवाई नहीं होने देते। इसके पीछे सिर्फ वोट है, या नोट भी है, यह अंदाज लगाना मुश्किल रहता है। सडक़ों के किनारे फुटपाथ को लेकर सुप्रीम कोर्ट चाहे कितनी ही फिक्र क्यों न कर ले, जब तक सडक़ों के किनारे बड़े दुकानदारों के कब्जों से खाली नहीं होंगे, तब तक वहां से छोटे फेरीवालों को हटाना सामाजिक अन्याय भी होगा। जिनके पास सैकड़ों वर्गफीट की दुकान है, उनकी भी नीयत अपने शटर के बाहर और सैकड़ों फीट तक बिखरी रहती है, तो दस-बीस फीट पर खोमचा लगाने वाले को ही क्यों बेरोजगार किया जाए? 

शहरों के साथ एक दूसरी दिक्कत यह रहती है कि जिन खाली सरकारी जगहों पर फेरीवाले और फुटकर व्यापारियों को बसाया जा सकता है, उन जगहों पर स्थानीय म्युनिसिपल से लेकर राज्य सरकार तक बैठे नेताओं और अफसरों की नीयत लगी रहती है कि कैसे वहां कोई बड़ा बाजारू प्रोजेक्ट शुरू किया जाए। जब तालाबों, और बगीचों, मैदानों के किनारे पाटकर-काटकर, वहां भी रेस्टॉरेंट बनाने, और उससे कमाई करने की होड़ लगी रहती है, वहां पर पैदल चलने के लिए फुटपाथ भला किसकी प्राथमिकता हो सकती है? 

हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट इस देश की हकीकत को देखे बिना कई ऐसे फैसले और आदेश देता है, जिनके बारे में शायद उसे यह खुद ही पता होता है कि उन पर कोई अमल नहीं होगा। अब अभी दो-चार बरस के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने देश में फैलती हुई नफरती बातों के खिलाफ एक आदेश दिया था, और कहा था कि हेट-स्पीच देने वालों के खिलाफ बिना किसी शिकायत के भी जुर्म दर्ज करना उस इलाके की पुलिस की जिम्मेदारी रहेगी, और ऐसी शिकायत दर्ज न करना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी। देश में हर दिन सैकड़ों-हजारों जगहों पर हेट-स्पीच दी जा रही है, इससे भी आगे बढक़र नफरती हिंसा की जा रही है, जो कि हेट-स्पीच से बहुत अधिक खतरनाक और हिंसक है, शायद ही किसी जगह पर इसके खिलाफ जुर्म दर्ज हो रहा है, और यह बात तो हमें पुख्ता मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक भी राज्य के, एक भी जिले के, या थाने के अफसर के खिलाफ अवमानना का केस नहीं चलाया। आज जब देश में साम्प्रदायिक और नफरती हिंसा सिर चढक़र बोल रही है, तब सुप्रीम कोर्ट अपने खुद के एक बड़े साफ-साफ शब्दों वाले फैसले की खुली तौहीन को दोनों आंखों से देखते हुए भी अनजान बना हुआ है, तो फुटपाथों जैसी अमूर्त बातों पर हम क्या उम्मीद करेंगे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बड़ी अदालतों के जज किताबों में अपना जिक्र दर्ज करवाने के लिए, या इतिहास में नाम दर्ज करवाने के लिए सामाजिक न्याय के कुछ फैसले देते हैं, सरकारों को आड़े हाथों लेते हैं, लेकिन जुबानी जमाखर्च से अधिक जजों की कोई नीयत नहीं रहती है। अगर नीयत रहती, तो नफरती लोग असीमित हौसले के साथ रात-दिन ड्रैगन की तरह आग नहीं उगलते रहते। 

जो बात शहरी विकास के नजरिए से सरकारों को खुद सोचनी चाहिए, उस बात के लिए सुप्रीम कोर्ट को म्युनिसिपल की तरह काम करना पड़े, यह बात बताती है कि भारत का लोकतंत्र, और यहां की शासन व्यवस्था किस युग में जी रहे हैं। किसी भी सभ्य, और विकसित देश की पहचान इससे नहीं होती कि वहां के लोग कितनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में कितनी बददिमागी से चलते हैं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां पर लोग निजी गाडिय़ों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का कितना इस्तेमाल करते हैं, पैदल और पैडल पर कितने चलते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भारत के शहरी विकास (या विनाश?) की जटिलता को समझे बिना अलग-अलग समय पर अलग-अलग, टुकड़ा-टुकड़ा आदेश दिए हैं। शहरी विकास अगर सरकार और अदालत की नीयत हो, तो उसे कतरा-कतरा नहीं किया जा सकता, उसके लिए एक बुनियादी व्यापक रीति-नीति की जरूरत पड़ेगी, और राजनीतिक मनमानी के बजाय विशेषज्ञ योजनाशास्त्रियों को विकास का ढांचा तय करने की इजाजत देनी होगी। आज तो हर स्तर पर वहां के निर्वाचित सत्तारूढ़ नेता, या अफसर किसी शहंशाह की तरह काम करते हैं, और बड़ी अदालतों के जज जमीनी हकीकत से अनजान, शासन व्यवस्था की जटिलताओं से बेखबर कागजी आदेश देते रहते हैं, जिन पर कोई अमल न होने से, बाकी अदालती आदेशों का वजन भी खत्म हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट चाहे कम मामलों में आदेश दे, कम सुधार का हुक्म दे, लेकिन जो फैसला दे, उस पर अमल की निगरानी भी करे। अदालती फैसलों के बेअसर होने से वे एंटीबायोटिक की आधी खुराक जैसे हो जाते हैं, जिनके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 4 अगस्त 2026





 

सौ रूपए महीने में कन्या शिक्षा, और बालविवाह घटाने में बंगाल कामयाब

03 अगस्त 2026  

 

पश्चिम बंगाल में एक दशक से पहले बच्चियों को पढ़ाई में आगे बढ़ाने के लिए, और बाल विवाह को रोकने के लिए कन्याश्री योजना शुरू की गई थी, जिसके असर के आंकड़े अब सामने आए हैं। इस योजना में 8वीं से 12वीं तक पढऩे वाली लड़कियों को हजार रूपए की सालाना मदद मिलती थी। और स्कूल के बाद कॉलेज या किसी दूसरे कोर्स में जाने पर एक बार 25 हजार रूपए की एकमुश्त राशि दी जाती थी। अभी भी जारी इस योजना में दो अनिवार्य शर्तें रहती थीं, एक तो लडक़ी का अविवाहित रहना, और दूसरा किसी मान्यता प्राप्त संस्थान में पढ़ाई/प्रशिक्षण जारी रखना। 2013 से शुरू इस योजना के असर के जो आंकड़े अभी सामने आए हैं, वे बताते हैं कि 2011-12 तक 5वीं के पहले पढ़ाई छोड़ देने वाली लड़कियां 4.75 फीसदी थीं, वे अब 0 फीसदी हो गई हैं। मिडिल स्कूल में ड्रॉपआउट 16.32 फीसदी रहता था, वह भी अब घटकर 2 फीसदी के करीब रह गया है। बाल विवाह में भी 60 फीसदी की कमी आई है। 8वीं के बाद लड़कियां कई बार पढ़ाई छोड़ देती थीं, लेकिन अब 25 हजार की एकमुश्त प्रोत्साहन राशि की उम्मीद में माँ-बाप बच्चियों को कॉलेज या दूसरे कोर्स में दाखिला दिला रहे हैं। फिर यह भी है कि इन 13 बरसों में करीब एक करोड़ बच्चियों को इस योजना का फायदा मिला। राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी बदलने से अब इस योजना का नाम कन्याश्री से बदलकर कन्यारत्न करने की चर्चा है, लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है? 

भारत के जिन राज्यों में सरकारों ने लड़कियों के स्कूल-कॉलेज का इंतजाम अच्छा रखा है, वहां पर लड़कियां पढ़ाई में खूब आगे बढ़ती हैं। केरलम् बहुत से मानवीय-सामाजिक पैमानों पर देश में न सिर्फ सबसे आगे है, बल्कि इन पैमानों के लिए वह बाकी राज्यों के लिए एक मिसाल भी है। देश में औसत महिला साक्षारता 65 से 70 फीसदी के बीच है। हमने छत्तीसगढ़ के आंकड़े अलग से देखे, जो 60 से बढक़र अब 65 फीसदी तक पहुंचे हैं, लेकिन केरलम् में महिला साक्षरता 95 फीसदी से अधिक है। पढ़ाई से जुड़ा हुआ ही बाल विवाह का मामला है। बीते एक-डेढ़ दशक में छत्तीसगढ़ में लड़कियों के 18 से कम उम्र में शादी के मामले 21 फीसदी से घटकर 12 फीसदी आ गए हैं, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 23.3 फीसदी है। इस मामले में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय औसत से आधे पर आ चुका है, जो कि एक शानदार प्रदर्शन है। लेकिन लड़कियों की पढ़ाई और शादी से जुड़ा हुआ एक दूसरा मामला उनकी सेहत का भी है। छत्तीसगढ़ में 15 से 49 साल की करीब 61 फीसदी लड़कियां और महिलाएं खून की कमी, एनीमिया की शिकार हैं, और यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 57 फीसदी से कुछ अधिक है। एनीमिक लड़कियां भी पढ़ाई या खेलकूद में पीछे रह जाती हैं। 

लेकिन हम आंकड़ों से परे कुछ दूसरी बात करें तो देश भर में जगह-जगह लड़कियों की पढ़ाई छोडऩे की एक बड़ी वजह उनके लिए शौचालय, पानी, और सैनेटरी पैड ठिकाने लगाने का इंतजाम न होना है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था वॉटर-एड की रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 23 फीसदी लड़कियां माहवारी की सुविधाओं की कमी से स्कूल छोड़ देती हैं, या गैरहाजिर रहती हैं। एक दूसरी वजह लड़कियों पर घरेलू कामकाज का बोझ रहता है। माँ के विकल्प के रूप में बेटी को घर के काम संभालने पड़ते हैं, और बेटों को बाहर पढऩे या खेलने के लिए छोड़ दिया जाता है। बहुत से परिवारों में जहां किसी एक बच्चे को पढ़ाने की स्थिति रहती है, वहां बेटे को पहले मौका मिलता है। ऐसी वजहों से भी लड़कियों का स्कूल छूटता है। बंगाल में कन्याश्री योजना में एक साल में हजार रूपए की मदद बहुत बड़ी नहीं होती है, वह सौ रूपए महीने से भी कम रहती है, लेकिन गरीबी इतनी अधिक है कि बहुत से परिवारों के लिए सालाना हजार रूपए मिलने से बच्चियों का स्कूल का कुछ खर्च तो निकल जाता है। यही वजह है कि अब वहां प्राथमिक शालाओं से बच्चियों का छोड़ जाना खत्म हो चुका है। पूरे देश को इस स्थिति को समझना चाहिए कि अगर हजार रूपए साल की मदद बच्चियों को स्कूल में बनाए रखने के लिए काफी है, तो यह इस देश के लिए सबसे सस्ता पूंजीनिवेश है, क्योंकि पढ़ी-लिखी लड़कियां अपने घर-परिवार के अलावा भी देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दे सकती हैं, और कुछ हजार रूपए का यह पूंजीनिवेश देश को बड़ा मुनाफा दे सकता है। इसके अलावा भी पढऩे वाली लडक़ी बाल विवाह से बच सकती है, और कम उम्र में शादी से जच्चा-बच्चा दोनों की सेहत पर पडऩे वाले बुरे असर से भी। इस तरह कन्या शिक्षा को बढ़ावा देने, और बाल विवाह को रोकने का मिलाजुला यह काम बंगाल को तो एक अच्छा तजुर्बा दे गया है, देश के बाकी राज्यों को भी अपनी घरेलू स्थितियां देखकर इस पर विचार करना चाहिए, क्योंकि बाल विवाह के आंकड़े बताते हैं कि देश में तकरीबन हर चौथी शादी नाबालिग लडक़ी की होती है। 

जहां लडक़ी का मामला आता है, तो सामाजिक रूढिय़ां, माँ-बाप की सोच, बेटों का बोलबाला, माहवारी और शौचालय, बाल विवाह, और घर के बाहर लड़कियों की सामाजिक सुरक्षा जैसे बहुत सारे मिलकर भारत में एक जटिल स्थिति बनाते हैं। ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तानी कन्या अपनी भ्रूण की जिंदगी से ही समाज, और अपने ही परिवार के खिलाफ संघर्ष करके जिंदा रहती है, और यह संघर्ष बुढ़ापे तक जारी ही रहता है, कभी खत्म नहीं होता। इस देश की कुल उत्पादकता में एक लडक़ी या महिला सबसे कम खपत के बाद भी सबसे अधिक आर्थिक योगदान देने वाली रहती है, और अगर व्यापार की जुबान में पूंजीनिवेश पर मुनाफे की वापिसी की परिभाषा लागू करें, तो एक लडक़ी देश में सामाजिक-आर्थिक योगदान किसी भी लडक़े के मुकाबले अधिक देती है। यह भी तब है जब उसे उसकी संभावनाओं के आसमान पर पहुंचने नहीं दिया जाता। 

भारत में सुप्रीम कोर्ट कन्या शालाओं में माहवारी के हिसाब से इंतजाम करने के लिए कई आदेश जारी कर चुका है। यह राज्य सरकारों पर निर्भर करता है कि वे लड़कियों वाले स्कूल में पानी वाले शौचालय बनाती हैं, या नहीं, और कचरे के निपटारे का इंतजाम करती हैं, या नहीं। अब बंगाल में कन्या शिक्षा को बाल विवाह उन्मूलन से जोडक़र जो सफलता पाई है, उसे भी राज्यों को अपनी योजना में जोडऩा चाहिए। इन सबके अलावा सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी बहुत से राज्य लड़कियों को हिफाजत नहीं दे पा रहे हैं। किसी राज्य में शिक्षक या छात्रावास अधीक्षक लड़कियों के देहशोषण में लग जाते हैं, तो बहुत से राज्यों में सडक़ों और सार्वजनिक जगहों पर लड़कियों की हिफाजत बड़ी कमजोर है। ऐसी सारी बातों को जोडक़र ही कन्या शिक्षा को बढ़ाया जा सकता है, एक पढ़ी-लिखी, या ट्रेनिंग पाई हुई, आर्थिक आत्मनिर्भर, और आत्मविश्वास से भरी हुई महिला बाकी देश को भी सुरक्षित बना सकती है। देश की आर्थिक स्थिति आधी आबादी को उपेक्षित रखते हुए कभी भी अपनी पूरी संभावनाओं को नहीं छू सकती। लडक़ी के बारे में तो जाने कब से यह नारा चले आ रहा है कि लडक़ी पढ़ेगी, तो घर गढ़ेगी, या देश गढ़ेगी। देश के औसत से नीचे प्रदर्शन वाले राज्यों को केरलम् और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से सीखने की जरूरत है, लोकतंत्र में दूसरों से सीखकर अपनों का भला करना शर्मिंदगी की बात नहीं रहनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 3 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

देश आजाद होने का मतलब यह नहीं कि वे राजा नहीं, और आप प्रजा नहीं!

02 अगस्त 2026  

 

ठोस घटनाओं पर लिखना कुछ आसान होता है, लोगों की जानकारी में भी उसके तथ्य रहते हैं, खुद भी तुरंत पढ़ा हुआ रहता है, और संदर्भ अधिक बखान करने की जरूरत नहीं रहती। लेकिन कई बार हमारी कोशिश रहती है कि कुछ ऐसे अमूर्त मुद्दों को उठाया जाए जो कि आमतौर पर आंखों से ओझल रहते हैं, लेकिन जिंदगी के लिए मायने बहुत रखते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा भारत में राजा और प्रजा का है। कहने के लिए तो लोकतंत्र के आने के साथ ही ये दोनों शब्द खत्म हो जाने चाहिए थे, लेकिन आज सरकारों में बैठे हुए लोग, न सिर्फ बड़े लोग, बल्कि छोटे से छोटे लोग भी अपने को राजा समझते हैं, और वहां पहुंचने वाली, टैक्स देने वाली जनता को प्रजा समझते हैं। नतीजा यह होता है कि असल हिन्दुस्तान के सरकारी दफ्तर एक टीवी सीरियल ‘ऑफिस-ऑफिस’ की तरह हो जाते हैं, और जनता मुसद्दीलाल बनी फिरती रहती है। लेकिन हम बात सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित रखना नहीं चाहते, सरकार इससे परे भी कई और किस्म से जनता का शोषण करती है, आज उन्हीं पहलुओं पर थोड़ी सी चर्चा हो जाए। 

भारत में लोग अस्पताल जाएं, किसी सरकारी दफ्तर, या जेल में किसी कैदी से मिलने के लिए, जमीन की रजिस्ट्री कराने जाएं, राशन लेने जाएं, या प्रॉपर्टी टैक्स पटाने, सरकार का रूख जनता के लिए ऐसा रहता है कि जनता की जिंदगी का सरकार मनचाहा इस्तेमाल कर सकती है। वह कभी राशन की कतार में लगा सकती है, कभी रेलवे टिकट की कतार में, कभी गैस सिलेंडर की बहुत लंबी कतार में, कभी टैक्स पटाने के लिए बैंक के चालान काउंटर की कतार में। ऐसा लगता है कि कतार में रहने वाले लोगों का देश के पास  और किसी तरह का इस्तेमाल ही नहीं है, उनकी कोई उत्पादकता ही नहीं है, और बाकी की पूरी जिंदगी भी वे अगर कतार में रहेंगे, तो भी इस देश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अपनी ही जनता के वक्त की ऐसी बर्बादी से बेफिक्र सरकार दरअसल गैरजिम्मेदार सरकार भी होती है, जो कि अपने नागरिकों की क्षमताओं, और संभावनाओं को बर्बाद करने से परहेज नहीं करती।


सरकार में दरअसल लंबी कतार लगवाने के पीछे एक बड़ी जाहिर किस्म की बदनीयत भी रहती है। कई लोग अपनी निजी मजबूरियों के चलते कतारों में वक्त बर्बाद नहीं कर पाते, और वे फिर ऐसे रास्ते ढूंढते हैं कि काम जल्दी निपट जाए। यहीं पर सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग बेचेहरा दलालों का इस्तेमाल करके काम को जल्दी करने के लिए वसूली-उगाही करते हैं, और जनता अपने समय को बचाने के लिए यह रिश्वत देने को मजबूर हो जाती है। कई जगहों पर तो यह कारोबार इतना व्यवस्थित हो जाता है जितना व्यवस्थित तो सरकारी काम भी नहीं होता। सरकार की कोई जवाबदेही नहीं होती, वह संसद, विधानसभा, या अदालत में बहुत बुरी नौबत आने पर भी अधिक से अधिक छुपाते हुए कम से कम जानकारी देकर बचने के हुनर में माहिर हो चुकी रहती है, और नियमित कामकाज के लिए वसूली-उगाही को साबित करना तब तक मुमकिन नहीं हो पाता, जब तक किसी को रंगे हाथों न पकड़ लिया जाए, या कोई स्टिंग ऑपरेशन न किया जाए। 

हमेशा से ही कुछ अखबार, टीवी चैनल, या कुछ समाचार वेबसाइटें वसूली-उगाही के स्टिंग ऑपरेशन करते आए हैं, और जिनके खिलाफ सुबूत दर्जे की बातें दर्ज हो पाती हैं, उनमें से कुछ पर ढीली-ढाली कार्रवाई अगर हुई, तो होती है, अमूमन कुछ नहीं होता। ऐसे में सरकारी दफ्तरों में हर काम के लिए कतार लगवाना मुनाफे का कारोबार होता है, और सीमित दिन, सीमित घंटे, सीमित काउंटर, और उन पर भी असीमित लंच-अवर से लोगों की मजबूरी बढ़ती चलती है। फिर जब देश की संस्कृति में लोगों से कतार लगवाकर उगाही करने की बात घर कर जाती है, तो फिर जहां उगाही नहीं होना है, वहां भी कतार लगवाने की संस्कृति विकसित हो जाती है। सरकारें यह परवाह नहीं करतीं कि उसे बिजली का बिल जमा करवाना है, या लाखों रूपए फीस मिलने वाली रजिस्ट्री करनी है, हर जगह काम को धीमा किया जाता है, सर्वर ठप्प हो जाने का बहाना बनाया जाता है, और अधिक से अधिक देर की जाती है। किसी अस्पताल में पर्ची बनवाने के लिए पांच-पांच रूपए फीस लेकर कतार में लगे हुए लोगों को जब वक्त बहुत अधिक लगने लगता है, तो ऊपर से दस-बीस रूपए लेकर पर्ची बनवा देने वालों का कारोबार पनपता है। अदालत में मामले की अगली पेशी जल्दी देने, या देर से देने, किसी दिन सुनवाई न करने, या किसी एक वकील के मौजूद न होने की बात कहकर तारीख बढ़ा देने का सिलसिला चलते ही रहता है। वहां पर मुकदमा करने वाले लोग, या शिकायतकर्ता सुनवाई की कतार में लगे ही रहते हैं, और यहीं से फिल्मों को, तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, का डायलॉग मिलता है। 

सरकारी दफ्तरों में साहबों से लेकर छोटे कर्मचारियों तक किनके कब दौरे रहेंगे, कब उनकी बैठकें रहेंगी, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। जिनको इनसे काम रहता है, वे एक-एक मुलाकात के लिए दर्जन-दर्जन बार चक्कर लगाते हैं, और थक-हारकर फिर दलालों की शरण में जाते हैं। दलालों की ताकत रहती है कि वे साहब या बाबू से पहले से तय किए हुए वक्त पर, दफ्तर के समय के घंटों पहले, या घंटों बाद जाकर काम करवा लेते हैं, और कुल मिलाकर वह सस्ता पड़ता है। अभी एक किस्सा प्रचलित था जिसमें एक अदालत मुकदमे की सुनवाई के बाद एक पक्ष के हक में फैसला देती है। फैसला जीतने वाला बुजुर्ग जज को दुआ देता है कि आगे चलकर दारोगा जरूर बनना। जज कहता है कि दारोगा तो उससे छोटा होता है, ऐसी दुआ क्यों देते हो? तो इस पर बुजुर्ग कहता है कि नहीं, दारोगा बहुत बड़ा होता है, वह इस मामले में शुरू में ही कह रहा था कि पांच हजार रूपए दो, तो हफ्ते भर में इस मामले को निपटा दूंगा, लेकिन अदालत आने से पांच बरस में 25 हजार रूपए वकील के लग गए, तब फैसला हुआ, बड़ा तो दारोगा ही हुआ। 

इस देश में लोग रोड टैक्स देकर गाड़ी खरीदते हैं, टोल टैक्स देकर सडक़-पुल पर चलते हैं, और बदहाल इंतजाम पर तकलीफ पाते रहते हैं। ट्रेनों में टिकट लेकर चढ़ते हैं, और किसी तरह, किस्मत रही तो, खिडक़ी के रास्ते कोई कुली भीतर धकेल देते हैं, या छत पर खतरा उठाकर चढ़ते हैं, अभी तो कुछ ऐसे लोगों के वीडियो देखने आए जिन्होंने डिब्बों के बंद दरवाजों के बाहर लटककर अपने आपको गमछे के सहारे बांध लिया था, और लंबे सफर पर रवाना हो गए थे। एयरपोर्ट पर लोगों को घंटों पहले बुला लिया जाता है, सरकारी अस्पतालों में हफ्तों बाद जांच की तारीख मिलती है, और महीनों बाद ऑपरेशन की। पटवारी से एक-एक मामूली कागज हासिल करने के लिए कई भार धक्के खाने पड़ते हैं, और थक-हारकर उसे हजारों रूपए रिश्वत देनी होती है। किसी सरकार दफ्तर से रकम वापिसी मिलनी हो, तो वहां के अफसर-कर्मचारी उस रकम में भागीदारी चाहते हैं। सरकारी दफ्तर अपने ही कर्मचारी के मेडिकल बिल, या उसकी पेंशन के कागज निपटाने के लिए उससे रकम में हिस्सेदारी चाहते हैं। 

एक वक्त जिसे सेवा शुल्क कहते थे, एक दूसरी जुबान में जिसे नजराना, शुकराना, या जबराना कहते थे, वह अब रेस्त्रां के बिल में गैरकानूनी सर्विस टैक्स की तरह जुड़ गया है। जीएसटी अलग, और सर्विस टैक्स अलग। ऐसा ही सरकारी दफ्तरों में पैसा जमा भी करना हो, तो उसके लिए रिश्वत, निकालना हो, तो उसके लिए रिश्वत। एक वक्त सीमित घंटों वाले काम के दिनों में असीमित घंटों के लंच के लिए बदनाम एसबीआई की संस्कृति कोरोना की तरह फैलकर पूरे देश को गिरफ्त में ले चुकी है, और जिन टेबिलों पर काम लेट होने से जनता का नुकसान होता है, जनता तकलीफ पाती है, वहां पर टेबिलों से गायब रहने से कुर्सीधारियों का नफा जुड़ जाता है। अब भला ऐसे में कौन वक्त पर कुर्सी पर बैठेगा?

हिन्दुस्तानी जनता को अपनी भड़ास निकालने के लिए जापान जैसे देशों की कहानियां पढ़ लेना चाहिए कि किस तरह वहां हर कोई जिम्मेदारी से अपना काम करने को देश की गौरवशाली संस्कृति मानते हैं। जापान की ऐसी कहानियां पढऩे के लिए लोगों के पास अपार समय भी रहता है क्योंकि वे अगर बेरोजगार हैं, तो खाली ही खाली हैं, और अगर कामकाजी हैं, तो भी घंटों किसी न किसी कतार में लगे रहते हैं, इसलिए दुनिया से निराश होने की जरूरत नहीं है, जापान जैसे देश को देखिए, और यह सोचकर खुश हो लीजिए कि मेरे सीने में नहीं तो, तेरे सीने में सही, हो कहीं भी ठंडक लेकिन, ठंडक रहनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

ऑनलाईन फाइलों तक जनता को पहुंच देना सरकार की जिम्मेदारी

02 अगस्त 2026

भारत में इन दिनों डिजिटल तकनीक की मेहरबानी से कई तरह के काम ऑनलाईन होते चले गए हैं। सरकार के भी, संसद या विधानसभाओं के भी, और अदालतों के भी। लोग अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कई किस्म की कार्रवाई ऑनलाईन देख सकते हैं, वादी-प्रतिवादी यह भी देख सकते हैं कि उससे फीस लेने वाले वकील ने अदालत में कितनी मेहनत से बहस की, या नहीं की। जनता संसद और विधानसभा की कार्रवाई का कुछ हिस्सा देखकर यह जान सकती है कि उसके निर्वाचित नेता वहां पर कितनी मेहनत कर रहे हैं, या सदन में बैठते ही नहीं हैं। लेकिन सरकार में छोटी-छोटी सी जानकारी को हासिल करने के लिए लोगों को सूचना के अधिकार के तहत महीनों तक धक्के खाने पड़ते हैं क्योंकि सरकारी अमला अपने कब्जे की कोई भी जानकारी बाहर निकलने नहीं देना चाहता, क्योंकि जानकारी बाहर निकली, तो कई तरह के राज बाहर निकल जाएंगे, और राज-काज के धंधे में किसी को राजदार बनाना घाटे का सौदा होता है। 

हिन्दुस्तान में यूपीए सरकार के समय से सूचना का अधिकार लागू हुआ है, इसके लिए कई सामाजिक आंदोलनकारियों ने बड़ी मेहनत की थी, जिनमें यूपीए मुखिया सोनिया गांधी के आसपास के लोग भी शामिल थे, और उसी वक्त सूचना के अधिकार को लेकर एक कड़ा कानून बना था, जो कि संसद से इसलिए आसानी से और तेजी से पास हो गया था कि लोगों को उसका खतरा समझ नहीं आया था। अब जब सूचना का अधिकार सरकारी ढांचे में सूचना का हथियार माना जाने लगा है, तो सरकारी लोगों का रूख जनता के इस बड़े औजार के लिए एकदम बदल गया है। आरटीआई कानून बेजा इस्तेमाल होता है, यह कह-कहकर सरकार के लोगों ने इसे बदनाम करने की बड़ी कोशिशें कीं, लेकिन इसी आरटीआई से निकली जानकारी से देश-प्रदेश के कई सबसे बड़े भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ भी हुआ। 

हमने पिछले बरसों में लगातार इस बात को लिखा कि आरटीआई को राईट टू इंफर्मेशन के बजाय रिस्पॉसिबिलिटी टू इंफॉर्म किया जाना जरूरी है, ताकि जनता इसके लिए अर्जी लगाकर, एक रकम जमा कर अपने हक की जानकारी मांगने धक्के न खाती रहे। अब जब भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों में शासन-प्रशासन का बहुत सारा काम ऑनलाईन हो रहा है, एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के बीच, या एक ही दफ्तर के भीतर भी, फाइलें ऑनलाईन आती-जाती हैं, तो क्या जनता को इन फाइलों तक पहुंच देना ठीक होगा? कम्प्यूटरों की व्यवस्था में यह इंतजाम बड़ा आसान रहता है कि किसी को लिखने की छूट देना, किसी को सिर्फ पढऩे की छूट देना, और किसी को डाउनलोड करके प्रिंट करने की भी। क्या सरकार का जो-जो कामकाज सूचना के अधिकार के तहत जनता की पहुंच के भीतर का रखा गया है, क्या  सरकार खुद होकर भी उस तक ऑनलाईन पहुंच की छूट जनता को दे सकती है? उस फाइल तक, उस कागज तक जाना, उसकी प्रतिलिपि पाना जब जनता का हक है, और जब वह कागज सरकार के अपने भीतरी, घरेलू कामकाज के लिए ऑनलाईन है, तब उसे जनता की पहुंच में ला देने में कौन सी गोपनीयता खत्म हो जाएगी? 

इस बारे में दुनिया के कुछ दूसरे देशों की मिसाल ढूंढी गई, तो पता लगा कि लोकतांत्रिक देशों में पिछली आधी सदी में जगह-जगह यह सोच बढ़ी है कि सरकार नागरिकों से जानकारी छिपाने के बजाय अधिकतर जानकारी खुद सार्वजनिक करे। आज विश्व बैंक और कई लोकतांत्रिक देशों के प्रशासन-विशेषज्ञ इसे आधुनिक शासन की एक जरूरी बुनियाद मानते हैं। इस बारे में मामूली रिसर्च से पता लगा कि दुनिया में सरकारी पारदर्शिता की सबसे पुरानी परंपरा स्वीडन की है जहां 1766 में ही सरकारी दस्तावेजों तक नागरिकों की पहुंच का सिद्धांत मंजूर किया गया था, और बाद में इसे संविधान में जोड़ा गया। इसका मूल सिद्धांत यह है कि जब तक सरकार कोई कानून बनाकर किसी विशेष कारण से किसी किस्म के दस्तावेज को गोपनीय रखना जरूरी साबित न करे, तब तक हर सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक रहना चाहिए। इसके बगल के फिनलैंड में पारदर्शिता का एक नया मॉडल बनाया गया, जहां लोगों को आवेदन देने की नौबत ही न आए, इसलिए सरकार के अधिकतर दफ्तर अपने अधिकतर दस्तावेज खुद ही ऑनलाईन डाल देते हैं, जिसे देखना हो देख लें। इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह सूचना के अधिकार से भी आगे की व्यवस्था है, क्योंकि इससे सरकार पर व्यक्तिगत आवेदनों का बोझ घट जाता है। पूर्वी योरप के एक और देश एस्टोनिया में जनता अधिकतर सरकारी कामकाज ऑनलाईन देख पाती है, और इससे सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही भी बढ़ती है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की सिफारिशों में बार-बार यह कहा गया है कि सरकार जानकारी मांगने का इंतजार न करे, जो जानकारी सार्वजनिक हो सकती है, उसे खुद प्रकाशित करे। 

हमारा यह भी मानना है कि अब प्रकाशन का मतलब कागज पर कुछ छापने जैसा खर्चीला नहीं रहता, अब तकरीबन बिना किसी लागत और खर्च के सरकार अपनी सारी जानकारी ऑनलाईन कर सकती है। अब केन्द्र सरकार के एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक राज्य ई-फाइलिंग प्रणाली पर काम कर रहे हैं। किसी जिले का कलेक्टर किसी फाइल को ऑनलाईन राजधानी में सचिव को भेज सकते हैं, सचिव उस पर अपने विभाग से ऑनलाईन जानकारी और राय ले सकते हैं, वे फाइल को वापिस नीचे या ऊपर भेज सकते हैं, और उसे मंत्री या मुख्यमंत्री तक की मंजूरी कुछ मिनटों में मिल सकती है। ऐसी तकनीकी सहूलियत के लिए पूरी की पूरी फाइल, उसके हर पन्ने को ऑनलाईन भेजा जाता है। अब जब यह पूरी जानकारी ऑनलाईन है, और जनता के सूचना के अधिकार के तहत उसे यह जानकारी कागज पर हासिल करने का हक है, तो इस हक को सीधे-सीधे फाइल पढऩे, और उसके पन्नों को डाउनलोड करके प्रिंट करने का हक क्यों नहीं दे दिया जाता? 

सरकारी गोपनीयता के हिमायती लोगों का कहना है कि जिस तरह अभी भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के चुनिंदा टुकड़े पोस्ट करने या फैलाने पर रोक लगाई है, वैसी नौबत सरकारी फाइलों के साथ भी आ सकती है कि लोग उसके चुनिंदा पन्ने को फैलाकर सरकार, किसी अफसर, या किसी कंपनी को बदनाम करें। यह तर्क फिजूल का इसलिए लगता है कि यही काम कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत इन्हीं सारे कागजों को हासिल करके प्रतिलिपियों के गट्ठे में से चुनिंदा पन्ने निकालकर भी कर सकते हैं। हजार पेज के जवाब में से वे पसंद के दो पैरा निकालकर एक नजरिया गढ़ सकते हैं। फिर ऑनलाईन तेजी से ऐसी पहुंच हो जाने से क्या फर्क हो जाएगा? 

फाइलों को ऑनलाईन करने के विरोधियों का यह तर्क है कि हर पल, हर फाइल तक लोगों की पहुंच रहने से उन फाइलों पर टिप्पणियां करने वाले, फैसले लेने वाले अफसरों पर एक मानसिक दबाव रहेगा, और वे खुलकर अपनी राय फाइलों पर नहीं लिख सकेंगे। इस पर, बहस के लिए, हमारा तर्क यह है कि जब ऐसी टिप्पणियों वाले पन्ने, और ऐसे फैसले सूचना के अधिकार में जनता हासिल कर ही सकती है, तो इसे ऑनलाईन मुहैया कराने का हक कौन सा अतिरिक्त खतरा खड़ा करेगा? बस यही तो है कि लोग महीनों तक धक्के खाने से बचेंगे, आरटीआई की अपीलों के सालों तक चलने वाले दौर से बचेंगे, और संविधान की भावना के अनुरूप जानकारी जल्दी पा जाएंगे, इससे अगर कोई भांडाफोड़ होना है, तो वह जल्दी हो जाएगा, कोई नया भांडा तो नहीं फूटेगा।

लोकतंत्र जानकारी मांगने का अधिकार नहीं होना चाहिए, लोकतंत्र जानकारी देने की जिम्मेदारी होना चाहिए। अभी तक यह तो हो सकता था कि सरकारी ढांचे के हर पन्ने को ऑनलाईन डालने जितनी क्षमता सरकारी अमले की नहीं है। लेकिन अब ई-फाइलिंग अनिवार्य होते चलने से चूंकि सारी फाइल ऑनलाईन है ही, इसलिए उसमें से जो फाइलें आरटीआई के तहत जनता की पहुंच के भीतर की हैं, उन्हें खोल दिया जाए। क्यों आज लोगों को सरकारी दफ्तर पहुंचकर पोस्टल ऑर्डर के साथ अर्जी लगाने पर मजबूर किया जाए, फिर महीनों तक घुमाने के बाद उन्हें अपील करने कहा जाए, और फिर अपील खारिज होने पर और ऊपर तक अपील करने कहा जाए, और फिर राज्य सूचना आयोग से अपील खारिज होने पर राष्ट्रीय सूचना आयोग भेजा जाए। देश में आरटीआई की परिभाषा में तकरीबन तमाम चीजें एकदम साफ हैं कि उन्हें जनता की पहुंच में रखा गया है, या किसी गोपनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से जनता से परे रखा गया है। हम तो महज जनता की पहुंच की बातों को बिना आरटीआई प्रक्रिया के जनता की ऑनलाईन पहुंच में कर देने की बात कह रहे हैं। हिन्दुस्तान को डिजिटल करने की सोच भी सैद्धांतिक रूप से तो यही सुझाती है कि सूचना का अधिकार इस तकनीक के साथ जोड़ दिया जाए, और राजा और प्रजा, दोनों ही गैरजरूरी मशक्कत से बचाया जाए। क्या पारदर्शिता सचमुच ही इतनी डरावनी होती है कि जनता किसी फाइल को देखती रहे, तो अफसर या मंत्री उस पर सही टिप्पणी करने से डरें? इस संदर्भ में प्रेमचंद की लिखी एक विख्यात लाईन याद आती है- बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करोगे? 

ईमान की बात को पारदर्शिता करके फिर इस वाक्य को पढक़र देखें।

(Daily Chhattisgarh)