दीवारों पर लिक्खा है, 8 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

अगली कई पीढिय़ों के सीने पर लाद चुके हैं अवैध निर्माण

08 अक्टूबर 2026  

 

राजधानी दिल्ली के सीमापुरी इलाके में एक बहुमंजिला इमारत गिरने से चार लोगों के मरने, और आठ लोगों के जख्मी होने की खबर है। पांच-छह मंजिला यह इमारत अभी नई ही थी, जो कि एक छोटे से प्लॉट पर बनी थी। जैसा कि देश के किसी भी बड़े शहर के व्यस्त इलाके में होता है, छोटी सी जमीन पर लोग बड़े सपने, और बड़ी कमाई का जरिया खड़ा कर लेते हैं। न कानूनी जरूरतें पूरी की जाती हैं, और न ही निर्माण की तकनीक का सही इस्तेमाल होता। देश में सौ-पचास साल पुराने मकान तो गिरते ही रहते हैं क्योंकि उस वक्त तो नियम-कायदे अधिक लागू नहीं थे। लेकिन बाद के दशकों में शहरी जरूरतें बढ़ती चली गईं, और अभी कुछ हफ्ते पहले जब दिल्ली में छात्रों के रहने वाली एक इमारत गिरी, तो पता लगा कि उसकी अधिकतर मंजिलें गैरकानूनी बनी हुई थीं, और पूरी दिल्ली ही छात्रों, और नौजवानों के लिए ऐसी ही खतरनाक इमारतों से भरी हुई हैं, जहां एक बिस्तर के आकार के कमरों में लोगों को किराए पर रख लिया जाता है। कुछ लोग पढऩे के लिए, तो कुछ लोग कमाने-खाने के लिए इस तरह से रहने को मजबूर रहते हैं। न यहां पर आग लगने पर बचने का कोई इंतजाम रहता, न ही इमारतों के ढांचे ऐसे मजबूत रहते कि वे इतनी मंजिलों, और इतने लोगों को ढो सकें। 

देश के अधिकतर राज्यों में अवैध निर्माण का यही हाल है। इस पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी मोटेतौर पर स्थानीय संस्थाओं, म्युनिसिपलों पर आती है, और केन्द्र या राज्य सरकारों के बनाए हुए नियम धरे रह जाते हैं। छोटी-छोटी आबादी पर एक-एक शहरी वार्ड बनते हैं, और ऐसे वार्ड के चुनाव जीतना हर पार्टी के लिए, हर दौलतमंद निर्दलीय उम्मीदवार के लिए इतना बड़ा मुद्दा रहता है कि वे हर किस्म की अराजकता को बढ़ाते हुए भी नियमों को तोड़ते रहते हैं। कई नेता तो वार्ड स्तर पर इसीलिए आगे बढ़ते हैं कि वे सरकारी जमीनों पर लोगों के अवैध कब्जे करवाते हैं, अपने नाम की बस्तियां बसा लेते हैं, और फिर उन बस्तियों के लोगों को लगातार इस झांसे या असर में रखते हैं कि उनके लिए बिजली, नाली, पानी, सडक़, और कानूनी दर्जे का इंतजाम वे करवाएंगे। इसी चक्कर में वार्ड स्तर के बहुत से नेता पनपते हैं। फिर दूसरे कई नेता इसलिए पनपते हैं कि वे अपने वार्ड की निजी जमीनों पर लोगों के बड़े-बड़े अवैध निर्माण होने देते हैं, और निर्वाचित पार्षद की अपनी जिम्मेदारी को किनारे रखकर इनसे वसूली भी कर लेते हैं, या अपने चुनाव में ऐसे लोगों के किए हुए पूंजीनिवेश का उपकार वापिस करते हैं। नतीजा यह होता है कि म्युनिसिपल के अधिकारी-कर्मचारी अगर कहीं कार्रवाई करने का हौसला करें भी, तो उन इलाकों के निर्वाचित नेता ही उनके दुश्मन हो जाते हैं। 

स्थानीय राजनीति अराजकता को इतना बढ़ा देती है कि बहुत से लोगों को यह लगता है कि पार्षद और महापौर के मुकाबले अगर कोई कडक़ म्युनिसिपल कमिश्नर या प्रशासक रहें, तो वे शहर का अधिक भला कर सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र की शुरूआत तो निर्वाचित स्थानीय संस्थाओं से ही होती है, और अगर निर्वाचित लोगों के मुकाबले अफसरों को बेहतर मान लिया जाए, तो राज्य या पूरे देश के स्तर पर भी नेताओं की जरूरत तो फिर खत्म हो जाएगी। इसलिए लोकतंत्र की व्यवस्था ही ऐसी है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, और पूर्णकालिक अफसरों के बीच तालमेल से काम किया जाए। लेकिन स्थानीय संस्थाओं, यानी कि म्युनिसिपल को लेकर हमारा तजुर्बा यह है कि प्रदेश स्तर पर बैठे हुए निर्वाचित नेता भी अपनी पार्टी के म्युनिसिपल नेताओं को बढ़ावा देते हैं, और इसी बढ़ावे के चलते अधिकारी अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाते। 

ऐसा लगता है कि शहरीकरण में अवैध निर्माण पर कार्रवाई करने के लिए सरकार को स्थानीय म्युनिसिपल से परे एक अलग मशीनरी की जरूरत है। कुछ राज्यों में राज्य सरकार के टाउन प्लानिंग नाम के एक दफ्तर के नियम भी म्युनिसिपल के ऊपर लागू होते हैं, लेकिन ऐसे राज्यों में भी कार्रवाई तो म्युनिसिपल के मार्फत ही होती है। जब निर्माण-माफिया ही चुनाव लडक़र सत्ता पर आ जाता है, या फिर अपने हितों को बचाने वाले नेताओं पर पूंजीनिवेश करके उन्हें वार्ड मेंबर या म्युनिसिपल प्रमुख बनवाता है, तो फिर उनके अवैध हितों से परे किसी कार्रवाई की गुंजाइश कम हो जाती है। हमने तो कुछ राज्यों में यह भी देखा है कि शहर के सबसे बड़े भूमाफिया उस इलाके में सबसे अधिक लोकप्रिय धार्मिक व्यक्तियों, और प्रवचनकर्ताओं के एजेंट बन जाते हैं। करोड़ों रूपए खर्च करके उनके कार्यक्रम करवाते हैं, और फिर उससे हासिल राजनीतिक ताकत से वे अपने दसियों करोड़ के अवैध कारोबार के लिए प्रोटेक्शन खरीद लेते हैं। राजनीति, धर्म, और अवैध कारोबार का यह घालमेल अफसरों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने से पूरी तरह रोक देता है। 

ऐसे में जिन लोगों को अदालत से एक उम्मीद दिखती है, उन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि अदालतें सरकारों के नियमित कामकाज में दखल देने से बचती हैं। और नियमित कामकाज का हाल यह है कि शहरी अवैध निर्माण दस फीसदी अधिक होने पर राजीनामे के जो नियम हैं, उनकी आड़ लेकर इमारतों के इंजीनियर नींव से ही यह इंतजाम करके चलते हैं कि दस फीसदी से अधिक अवैध निर्माण तो करवाना ही है क्योंकि उतने के वैध हो जाने का एक प्रावधान कानून में है। बात यहां तक रहती तो भी ठीक रहता, हमने छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह देखा है कि लोग दो-तीन गुना अवैध निर्माण कर लेते हैं, जिस पर किसी तरह के राजीनामे का नियम नहीं है, उसके बावजूद राजीनामा हो जाता है, और उसकी आड़ लेकर अवैध इमारतें तनी रहती हैं। जब बड़े-बड़े निर्माण-कारोबारी, बिल्डर, और कॉलोनाइजर बड़े-बड़े अवैध काम करते हैं, तो फिर अपनी छोटी सी जमीन पर अपना छोटा सा अवैध घर बनाने वाले लोगों पर ही निशाना क्यों साधा जाए? 

दिल्ली में आज जो पांच-छह मंजिल इमारत गिरी है, वह भी छोटी सी जमीन पर बनी हुई थी। जब बड़े-बड़े माफिया कानून को अपने जूतोंतले रौंदते हैं, तो फिर छोटे-छोटे अवैध कारोबारों पर कितनी कड़ी कार्रवाई करना जायज होगा? अभी हम एक दूसरा अभियान देख रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में हाऊसिंग बोर्ड की रिहायशी इमारतों के फ्लैट के कारोबारी इस्तेमाल को बंद किया जा रहा है। यह नौबत सिर्फ ऐसी सरकारी कॉलोनियों में नहीं है, बल्कि हर रिहायशी कॉलोनी में आवासीय मकानों की जगह पर कारोबारी निर्माण कर लिया जा रहा है, और किसी कारोबार के साथ जुड़ी हुई पार्किंग की जगह की शर्त भी नहीं मानी जा रही। नतीजा यह निकल रहा है कि आवासीय निर्माण का अवैध इस्तेमाल भी हो रहा है, और वहां कारोबार चलने की वजह से सामने की सडक़ भी ट्रैफिक जाम से घिर रही है। लेकिन इस पर किसी कार्रवाई की बात तभी छिड़ती है जब वसूली-उगाही नहीं हो पाती। और वसूली-उगाही होते ही ऐसी चर्चा फिर खत्म हो जाती है। अब जो मजबूत निर्माण अगली आधी-पौन सदी तक चलना हैं, उस पर भी अगर निर्माण के, और शहर के नियम लागू नहीं किए जाएंगे, तो शहर तो आज भी रहने के लायक नहीं रह गए हैं, कल के दिन ये जिंदा रहने के लायक भी नहीं रह जाएंगे। आज कांक्रीट के अवैध निर्माण अगर बनने के पहले नहीं रोके गए, तो एक बार बन जाने के बाद तो सुप्रीम कोर्ट भी किसी कंस्ट्रक्शन को नहीं तुड़वा पाता है। आज शहरीकरण के सारे नियम राजनीति के बंधुआ मजदूर होकर रह गए हैं, और आज के लोग अपनी आने वाली पीढिय़ों की छाती पर अवैध निर्माण लाद ही चुके हैं। लोग सोचें कि क्या हिन्दुस्तान में अच्छी शहरीकरण आखिरी बार अंग्रेजों के वक्त हुआ था?

(Daily Chhattisgarh)   

अमरीका में नशा तस्करी के लिए पड़ोसी देश जिम्मेदार या उनमें जुर्म के लिए अमरीका?

07 अक्टूबर 2026  

 

अमरीका अपने अड़ोस-पड़ोस के छोटे-छोटे देशों को नशे की तस्करी में शामिल बताते हुए उन पर फौजी हमले भी कर रहा है, और एक देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति को तो वह अपहरण करके उठाकर ले जा चुका है, उसने वहां पर सत्तापलट भी करवा दिया है, वहां के तेल कारोबार पर भी कब्जा कर लिया है। अब वह अगल-बगल के दूसरे देशों को ऐसी ही धमकियां दे रहा है। लेकिन आज की एक खबर इस पूरी नौबत की हकीकत बताती है। न्यूयॉर्क टाईम्स ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में यह खुलासा किया है कि अमरीका के हाईस्कूल छात्रों, औैर 18-19 साल के नौजवानों ने अमरीका में कानूनी तरीके से हथियार खरीदकर उन्हें मैक्सिको के नशा तस्करों तक पहुंचाने का एक धंधा बना रखा है। इस अखबार ने यह पाया है कि कई हाईस्कूलों के छात्र ऐसे धंधे में लगे हुए हैं। इनमें से कुछ हथियार खरीदी की कानूनी उम्र तक आ गए हैं, कुछ हथियार चोरी करके ले आते हैं, और कुछ दूसरे गैरकानूनी तरीकों से हथियार पाते हैं। अमरीका में 18 बरस की उम्र में लोग घातक हथियार खरीद सकते हैं, और ऐसे नौजवान हथियारों को खरीदकर, उन्हें गैरकानूनी तरीके से तस्करों को बेच देते हैं, और फिर हथियार गुम जाने, या चोरी हो जाने की रिपोर्ट लिखाते हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि यह एक संगठित गिरोह के तहत किया जा रहा है बड़े पैमाने का जुर्म है, और चूंकि कम उम्र किशोरों या युवाओं के जुर्म के रिकॉर्ड नहीं रहते, इसलिए वे यह सब करके भी बच जाते हैं। 

खुद अमरीकी सरकार के रिकॉर्ड बताते हैं कि मैक्सिको में सरकार ने जो हथियार जब्त किए, उनमें से जांच के लिए अमरीका भेजे गए करीब 83 हजार हथियारों में से 68 फीसदी का स्रोत अमरीका ही पाया गया। अब सवाल यह उठता है कि अगर अमरीका से हर बरस लाखों अवैध हथियार मैक्सिको जा रहे हैं, तो वहां की सरकार क्या खाकर ऐसे गिरोहों का मुकाबला कर सकेगी? अमरीका में हर किस्म के घातक हथियार खरीदने की छूट हर नागरिक को है, और अमरीकी सरकार के आंकड़े बताते हैं कि वहां मौजूद जानलेवा बंदूकों की संख्या अमरीका की आबादी से अधिक है। इन्हीं बंदूकों में से कुछ को लेकर वहां के नौजवान स्कूलों या दूसरी जगहों पर थोक में कत्ल करते हैं, और आसपास के देशों के नशा तस्करों के हाथ भी मजबूत करते हैं। ऐसे में अगर इंसाफ की बात करें, जो कि आज के ट्रम्प के अमरीका में एक अवांछित बात रह गई है, तो अमरीका पड़ोसी देशों में संगठित माफिया गिरोहों के हाथ मजबूत कर रहा है, और फिर उन पर कार्रवाई के नाम पर उन देशों पर फौजी कार्रवाई भी कर रहा है। यह सिलसिला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ भी है, लेकिन आज के अमरीका का न्याय से भला क्या लेना-देना रह गया है। 

हमने इसी बारे में थोड़ा सा शोध किया, तो पता लगा कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प मैक्सिको के नशा तस्कर गिरोहों को अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हैं कि वहां से आने वाला नशा अमरीकी नौजवान पीढ़ी को खत्म कर रहा है। नशे से होने वाले नुकसान की बात तो सही है, लेकिन अमरीका खुद अपनी गैरजिम्मेदार हथियार नीति की वजह से पड़ोसी देशों में अवैध हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है, और इन हथियारों से नशा तस्कर अपना कारोबार भी करते हैं, और अपने उन देशों में दूसरे किस्म के जुर्म भी करते हैं। अमरीका इसमें से सिर्फ अपनी जमीन तक पहुंचने वाले नशे को देख रहा है, और उसे अमरीका पर दुश्मन कार्रवाई, आतंकी कार्रवाई करार देते हुए उसके खिलाफ हवाई हमले भी कर रहा है, और दूसरे कुछ देशों को भी वह सत्तापलट की धमकी देते रहता है। अमरीका की घरेलू हथियार नीति खुद उसके लिए जानलेवा साबित हो रही है, लेकिन इस देश की सोच बड़ी विचित्र है। एक तरफ तो वह निजी हथियार बनाने वाली कंपनियों के कारोबारी दबावतले रहती है, दूसरी तरफ निजी हथियारों को लेकर अमरीका में यह सोच भी है कि जब तक जनता के पास बड़ी संख्या में हथियार रहेंगे, तब तक अमरीका में किसी फौजी बगावत का कोई खतरा खड़ा नहीं हो सकेगा। अब यह बात साबित होने, या गलत साबित होने की नौबत तो आई नहीं है, लेकिन हथियारों को अमरीकी लोकतंत्र की सुरक्षा की एक गारंटी सरीखा भी माना जाता है, और इस रिपब्लिकन सोच का वहां की दूसरी बड़ी पार्टी, डेमोक्रेटिक पार्टी विरोध भी करती है। 

अब हम एक तीसरी बात पर आते हैं जो कि वैध-अवैध हथियारों, और नशे की तस्करी से परे की है। ट्रम्प बरसों से मैक्सिको और अमरीका के बीच की सरहद पर दीवार बनाने की मुनादी करते आ रहा है, और वह यह भी कहते आ रहा है कि इसकी लागत मैक्सिको से ही वसूल की जाएगी। उसने दशकों से अमरीका में रोजाना दाखिल होकर मजदूरी करने वाले मैक्सिकन मजदूरों पर भी रोक लगाई है। नतीजा यह भी हुआ है कि जो लोग दशकों से अमरीका में काम करके रोजी कमा रहे थे, उनमें से बहुत से लोग बेरोजगार हुए हैं, और किसी भी देश में जहां जुर्म अधिक है, वहां बेरोजगारों के जुर्म में शामिल हो जाने का खतरा अधिक रहता ही है। इस तरह अमरीका अपनी मनमानी, और तानाशाह नीतियों के चलते दुनिया के बहुत से देशों में तरह-तरह से बेरोजगारी खड़ी कर रहा है, यह एक अलग बात है कि वहां के लोग अगर जुर्म में शामिल हो रहे हैं, तो वे देश अमरीकी सरहद से बहुत दूर हैं, और उनका नुकसान अमरीका तक अभी सीधे नहीं पहुंच रहा है। 

अमरीका अपनी फिल्मों से लेकर टीवी सीरियल्स तक, अैार फैशन तक गन-कल्चर को जिस तरह बढ़ावा देता है, वह भी एक बड़ी वजह है कि दुनिया भर में पहुंचने वाले अमरीकी कार्यक्रम वहां के नौजवानों में बंदूकों के प्रति आकर्षण पैदा करते हैं, और फिर यह आकर्षण तरह-तरह के जुर्म तक पहुंच जाता है। हम जब अमरीका के हथियारों के दूसरे देशों में जाकर मुजरिमों के हाथ मजबूत करने की नौबत देखते हैं, तो लगता है कि पड़ोसी देशों में अगर अमरीका जैसी फौजी ताकत होती, तो वे अपनी जमीन पर जब्त हथियारों के सुबूत के साथ अमरीका पर फौजी हमला कर देते कि अमरीकी हथियार उनके देशों को बर्बाद कर रहे हैं। लेकिन आज दुनिया में जिसकी लाठी, उसकी भैंस जैसी नौबत है, और इसीलिए दुनिया के गिने-चुने कुछ देशों को छोडक़र बाकी हर देश की भैंसों को दुहने का एकाधिकार ट्रम्प ने अपने हाथ में ले रखा है। दुनिया भर का जुर्म का इतिहास यह बताता है कि जब किसी देश से दूसरे देशों में गैरकानूनी तस्करी होती है, तो ऐसे तस्कर लौटते हुए उस देश से भी कुछ गैरकानूनी सामान वापिस लाते ही हैं, ताकि खाली हाथ न आना पड़े। इसलिए अमरीका से पड़ोसी देशों को जो अमरीकी हथियार स्मगल होते हैं, वे इस स्मगलर ही लौटते हुए अगर नशा लेकर आते होंगे, तो उसमें कोई हैरानी नहीं होगी। आज अमरीका के तौर-तरीकों पर सवाल उठाने की ताकत दुनिया में किसी की रह नहीं गई है, इसलिए वह अपने जुर्म के शिकार देशों को भी मुजरिम करार देते हुए निशाना बना सकता है, बना रहा है।  

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 7 अक्टूबर 2026



 

बालभारती से संसद तक, मर्दाना सोच को बलात्कारी बनाने की भरी-पूरी संस्कृति

06 अक्टूबर 2026  

 

एक कॉलेज छात्रा के पीछे पड़े हुए एक नौजवान को जब निराशा हुई, तो उसने अपने एक दोस्त की मदद ली, और इस युवती पर तेजाब फिंकवा दिया। अब गंभीर जख्मों के साथ, आंख खो जाने का खतरा उठाते हुए यह युवती अस्पताल में है, और तेजाब फेंकने वाले, फिंकवाने वाले दोनों लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। एक ही दिन पहले की बात है कि इसी छत्तीसगढ़ में एक दूसरे शहर में 16 बरस की एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली क्योंकि एक नौजवान लगातार उसके पीछे लगा हुआ था, फोन पर उसे परेशान करता था, उसके घर भी पहुंच जाता था, और आते-जाते रास्ते में उसका पीछा करता था। दो दिनों के भीतर की ये दो घटनाएं अनोखी नहीं हैं, देश भर में जगह-जगह हर दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, और अधिकतर घटनाएं तो इसलिए सामने नहीं आ पातीं कि लडक़ी और उसका परिवार कमजोर तबके के रहते हैं, सामाजिक बदनामी से डरे हुए रहते हैं, या फिर उनके सामने ऐसी मिसालें रहती हैं कि गुंडे-मवाली गिरफ्तारी के बाद जब जेल से लौटकर आते हैं, तो गाजे-बाजे के साथ उनका जुलूस निकलता है, और वे लडक़ी पर दुबारा बलात्कार करने का हौसला भी रखते हैं। देश में कई प्रदेशों में ऐसी मिसालें सामने आ चुकी हैं कि बलात्कार की शिकायत के बाद भी मुजरिमों का कुछ नहीं बिगड़ता, और थाने के चक्कर लगाते हुए लडक़ी या महिला ही खुदकुशी तक पहुंच जाती हैं। 

कहने के लिए तो सुप्रीम कोर्ट ने अभी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बलात्कार, और सामूहिक बलात्कार की कुछ घटनाओं पर फिक्र जाहिर करते हुए कहा है कि आधी रात को भी सार्वजनिक जगह पर लडक़ी सुरक्षित महसूस करे, ऐसी व्यवस्था रहनी चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के बालोद में जहां लडक़ी पर राह चलते दिनदहाड़े तेजाब फेंक दिया गया, वहां तो शहर और आबादी के बीच ऐसा हुआ, और यह लडक़ी एक पुलिस कर्मचारी की बेटी भी थी। मतलब यह कि मवालियों को इस बात की भी परवाह नहीं थी कि वे एक स्थानीय पुलिस कर्मचारी या अधिकारी की बेटी पर ऐसा हमला कर रहे हैं, और देश में एसिड-अटैक करने वाले लोगों के खिलाफ अदालत भी बहुत सख्त रूख रखती है। एकतरफा मोहब्बत में जाने कितनी ही लड़कियों की हत्या होती है, और तो और किसी शादीशुदा महिला से भी एकतरफा मोहब्बत का दावा करने वाले लोग उसका कत्ल कर चुके हैं। भारतीय समाज कहने के लिए अपने आपको श्रंृगार रस की परंपरा का समाज मानता है, लेकिन यहां पर प्रेम का मतलब इस रफ्तार से हिंसा में बदल जाता है कि श्रृंगार रस के कवि लिखना भूल जाएं। 

भारतीय समाज में इन दिनों लड़कियां और महिलाएं लगातार इस बात को सोशल मीडिया पर, और फुटपाथी पोस्टरों में लिख रही हैं कि किस तरह वे अब लडक़ों और मर्दों की ज्यादतियों को बर्दाश्त नहीं करने वाली हैं। वे गाली-गलौज की जुबान तक भी जाकर अपनी हिकारत को उजागर कर रही हैं, और इसमें कुछ भी अटपटा नहीं हैं। हिन्दुस्तानी लडक़े और मर्द, एक तबके के रूप में हिंसक, महिलाविरोधी, और यौन कुंठाग्रस्त भीड़ साबित हो चुके हैं। सोशल मीडिया पर उनकी जुबान हिंसक और बलात्कारी गालियों से भरी रहती है, और उनकी हरकतें बेकाबू रहती हैं, फिर वे चाहे दर्जनों कैमरों के सामने पुलिस की वर्दी में ही क्यों न हों, जो कि दिल्ली में अभी सामने आया है। यह पूरा सिलसिला भारत को एक महिलाविरोधी संस्कृति से भरा हुआ साबित करता है जिसमें भारतमाता और देवियों के प्रतीकों का तो सम्मान किया जाता है, लेकिन जैसे ही यह भारतमाता या देवी जिंदा होकर किसी भी तरह के हक मांगने लगती हैं, उनको कुचलना शुरू हो जाता है। हिन्दुस्तानी मर्दों का बर्दाश्त तस्वीरों, और प्रतिमाओं में तो लड़कियों-महिलाओं को झेल लेता है, लेकिन उसके आगे तो फिर उसके दांत-नाखून बड़े होने लगते हैं, और उसे गुफाकाल की वे काल्पनिक तस्वीरें याद आने लगती हैं जिनमें मर्द अपने बाहुबल से किसी महिला को उसके बाल पकडक़र घसीटकर ले जाते हुए दिखाए जाते थे। दुनिया 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में पहुंच गई है, लेकिन हिन्दुस्तानी मर्द की सोच अब तक गुफा से नहीं निकल पाई है। 

समाज को यह सोचना होगा कि मर्द जिस परवरिश से होकर ऐसी सोच तक पहुंचे रहते हैं, उस परवरिश में क्या-क्या गलत है। हम शायद इस कॉलम में दर्जनभर बार पहले भी लिख चुके हैं कि अभी कुछ बरस पहले तक हिन्दी की प्राथमिक शिक्षा की बालभारती में यह लिखा रहता था कि अमर घर चल, कमला नल पर जल भर। जहां पर सोच बचपन से ही लडक़े-लड़कियों के बीच इस किस्म के भेदभाव की रहती है, वहां बड़े होकर लडक़े जब मर्द बनते हैं, तो उन्हें लड़कियां, और महिलाएं मातहत से अधिक दर्जे की नहीं लगती हैं। वे ना सुनने के आदी नहीं रहते हैं। चाहे साथ में पढऩे वाली लडक़ी हो, काम की जगह पर सहकर्मी हो, परिवार में रिश्तेदार हो, या घरेलू कामगार हो, किसी लडक़ी या महिला के पास मनाही के हक की बात भी मर्दों की सोच में नहीं घुस पाती है। वे जहां चाहे वहां हाथ डालने को अपना हक मानकर चलते हैं, फिर चाहे वे पुलिस की वर्दी में ही क्यों न हों, और लड़कियां या महिलाएं आंदोलनकारी हों, या पत्रकार हों। फिर गलत परवरिश से बनी हिंसक सोच को आगे बढ़ाने का काम हिन्दुस्तान में सोशल मीडिया पर लगातार हिंसा की बातें लिखने वालों ने अपने जिम्मे ले लिया है। जिस लडक़ी से पुलिस बदसलूकी करती है, उसके बारे में सोशल मीडिया पोस्ट पर सौ-सौ लोग खुलकर यह लिखते हैं कि वह इसी बात के लिए तो वहां गई थी, और वे उसके साथ ज्यादती की कल्पना को बलात्कार तक ले जाते हैं। जब देश का कानून, उसे लागू करने की जिम्मेदार सरकारें, इनमें से किसी को भी यह परवाह नहीं रहती कि लोग सोशल मीडिया पर अपने नाम, अपने चेहरे, अपने धर्म की तस्वीरों के साथ इस तरह की हिंसक बातें लिख रहे हैं, तब फिर ऐसे जुर्म से किसी को परहेज नहीं रह जाता। आज हिन्दुस्तान में मर्दों की सोच बलात्कारी होने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि वे सोशल मीडिया पर खुलेआम, साइबर-सुबूत छोड़ते हुए भी सौ-सौ लोगों को हजार-हजार बार बलात्कार की धमकी दे सकते हैं, और देश का कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। जब कानून को बनाकर फाइलों और किताबों में कैद छोड़ दिया जाता है, तो उसका कोई अच्छा असर होने के बजाय उसका नुकसान बहुत बड़ा होता है। अमल न होने वाले कागजी कानून के मुकाबले तो कानून न होना बेहतर होता है। जिस तरह डॉक्टरी इलाज में एंटीबायोटिक की आधी-अधूरी खुराक से फायदा कुछ नहीं होता, बल्कि बदन में उसके खिलाफ प्रतिरोधक शक्ति विकसित हो जाती है, उसी तरह अमल से परे रखे गए कानूनों से कानून के खिलाफ हिकारत बढ़ती चलती है। 

आज भारत में सडक़ों पर होने वाली गुंडागर्दी, छेडख़ानी, या जुर्म का जितना असर होता है, उससे कहीं अधिक असर सोशल मीडिया पर कही और लिखी गई बातों का होता है, क्योंकि लोग सडक़ों पर तो सीमित समय के लिए रहते हैं, वे सोशल मीडिया पर असीमित समय तक रहते हैं। इसलिए अगर लोगों को इस हिंसा का हिसाब चुकता नहीं करना पड़ेगा, तो वे असल जिंदगी में भी, अपने घर पर, सडक़ पर, या कामकाज की जगह पर भी अपने मर्दाना जुर्मों के लिए अपने को जवाबदेह नहीं मानेंगे। यही वजह है कि आज किसी लडक़ी पर तेजाब फेंका जा रहा है, किसी की मनाही पर उसे कत्ल कर दिया जा रहा है, और किसी के न मानने पर उसे खुदकुशी के लिए मजबूर कर दिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट आज अपने इर्द-गिर्द, एनसीआर इलाके में महिलाओं पर होने वाले बड़े जुर्मों को लेकर जागकर कुछ देख रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ जुर्म पर उसे जो करना चाहिए, उस तरफ तो वह देख भी नहीं रहा है। अगर न्यायपालिका जिम्मेदार होती, तो वह सोशल मीडिया पर निगरानी रखने के लिए अलग-अलग भाषाओं के जानकार ऐसे लोगों की एक टीम तैनात करती जो कि हिंसक, नफरती, और धमकी वाली बातों पर रिपोर्ट तैयार करके अदालत को देती, और अदालत की निगरानी में वह कार्रवाई हो पाती, जिसे करने में आज सरकारों की दिलचस्पी नहीं दिख रही है। महज ऐसी राजनीतिक बातें की किसी शहर या प्रदेश में आधी रात को भी लडक़ी सुरक्षित है, ये धोखे की बातें हैं। सत्ता की ऐसी बातों पर भरोसा करके अगर कोई लडक़ी या महिला देर रात निकल पड़े, तो उसे ईश्वर भी नहीं बचा सकते। देश में मर्दों की हिंसक सोच को रोकने का काम राजनीतिक ताकतें न कर सकती हैं, न वे करना चाहती हैं। आज भी तमाम राजनीतिक सलाहें लड़कियों को अकेले बाहर न निकलने, शाम-रात को घर पर ही रहने, पार्टियों में न जाने, और पूरे बदन को ढांककर चलने की नसीहत ही देती हैं। ऐसे में देश-प्रदेश के महिला आयोग पूरी तरह पाखंडी और बेअसर साबित हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस लेने के लिए घटनाओं के दिल्ली के इर्द-गिर्द होना जरूरी है, जो कि अभी हो भी रही हैं। देखते हैं कि न्यायपालिका अपना जिम्मा कहां तक पूरा करती है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 6 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

वह प्लेन तो बच गया, पर दुनिया की नौकरी के बाजार में नफरती नहीं बच पाएंगे...

05 अक्टूबर 2026  

 

अभी इजराइल जा रहे जिस विमान को इमारतों से टकराने से एक हिन्दुस्तानी पायलट ने रोका, और ओमान के एक कट्टरपंथी मुस्लिम पायलट के हमले को नाकाम कर दिया, उससे कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। लोग इस बात पर हैरान हो रहे हैं कि यह पायलट अपनी धर्मान्धता और कट्टरता को लेकर अपनी पिछली नौकरी में इतना उजागर हो चुका था कि उसे विमान उड़ाने से अलग करके जमीनी ड्यूटी दी गई थी। इसके बाद भी एक दूसरे देश की एयरलाईंस ने उसे पायलट की नौकरी दे दी, और पिछले आठ महीनों से वह विमान उड़ा रहा था। अब सवाल यह उठ रहा है कि कट्टरपंथी उग्र तेवर रखने वाले पायलट की शिनाख्त हो जाने के बाद भी उसे विमान उड़ाने के काम पर कैसे रख लिया गया? इस बारे में पता चला है कि एयरलाईंस किसी को पायलट बनाने के पहले उसके आपराधिक मामलों की जांच तो करती हैं, लेकिन उनकी सोच कैसी है, कट्टर या हिंसक तो नहीं है, वे कभी किसी दूसरे धर्म के खिलाफ तो नहीं रहे हैं, ऐसी बातों की कोई जांच एयरलाईंस नहीं करती हैं। यही वजह रही कि अपने अतिवादी या उग्रवादी विचारों के बावजूद इस पायलट को दूसरे देश की कंपनी के विमान उड़ाने का काम मिल गया, और उसने अपने साथी पायलट पर जानलेवा हमला करके विमान को गिराने की पूरी कोशिश कर ली थी। 

अब सवाल यह उठता है कि दुनिया भर के विमान दो-दो पायलटों के भरोसे चलते हैं। फिर यह भी है कि किसी विमान अपहरण के खतरे से बचने के लिए विमानों में पायलटों वाले नियंत्रण कक्ष, कॉकपिट के दरवाजों को भीतर से ही बंद रखने का एक चलन बरसों से चले आ रहा है। विमान के बाकी कर्मचारी भी पायलटों की इजाजत, और दरवाजा खोलने के बाद ही भीतर जा पाते हैं। यह जरूर है कि सैकड़ों मुसाफिरों, और सैकड़ों या हजारों करोड़ के विमान की हिफाजत के लिए अधिकतर कंपनियां सावधानी बरतती हैं, लेकिन फिर भी यह इतनी भयानक घटना हो गई कि ऐसी घटनाओं को दुबारा होने से रोकना आसान बात नहीं रहेगी। कैसे किसी पायलट की सोच की जांच होगी? हालांकि आज सोशल मीडिया के इस युग में बहुत से लोगों की ऐसी जांच आसान भी हो गई है, क्योंकि लोग अपनी मोहब्बत और नफरत, दोनों का इजहार सोशल मीडिया पर करते ही रहते हैं। अभी जिस ओमानी पायलट ने यह हमला किया था, उसने भी नफरत की बातें सोशल मीडिया पर लिखी हुई थीं, और अपने सहकर्मियों के बीच भी उसने धर्मान्धता की बातें की हुई थीं। 

अब हम कुछ देर के लिए प्लेन और पायलट को छोड़ दें, तो जमीन पर चलने वाली ट्रेन या बस की बात करें, जिनमें बहुत से मुसाफिर रहते हैं। ये मुसाफिर किसी खास राजनीतिक सोच वाले, किसी धर्म के, किसी जाति या सम्प्रदाय के हो सकते हैं जो कि थोक में किसी जगह जा रहे हों। तो क्या ऐसी तमाम भीड़ को किसी वाहन में लेकर जा रहे ड्राइवर की सोच को परखना आसान होगा? या किसी ड्राइवर को काम पर रखने के पहले उसकी सोच को तौल लेना जरूरी होगा? अभी हमने अपने यूट्यूब चैनल, ‘इंडिया-आजकल’ पर भी इस सवाल को उठाया था कि आज जो नौजवान सोशल मीडिया पर अपनी नफरत और हिंसा का रायता फैलाते चल रहे हैं, कल के दिन जब वो किसी देश का वीजा मांगेंगे, किसी बड़ी कंपनी में किसी भी देश में नौकरी मांगेंगे, तो सोशल मीडिया पर उनका इतिहास उनकी संभावनाओं को किस तरह, किस हद तक खत्म करेगा? सोशल मीडिया पर बहुत सी बातें लोग मिटा देते हैं, लेकिन पेशेवर तलाश करने वाले लोग उन बातों को भी ढूंढकर निकाल लेते हैं। फिर अगर दुनिया में आतंकियों, या दूसरे किस्म के मुजरिमों को रोकने की बात होगी, तो हो सकता है कि सोशल मीडिया कंपनियां भी उनके पेज पर पोस्ट, और बाद में मिटा दी गईं बातों तक सरकारी एजेंसियों को पहुंच दे दे। ऐसे में आज जो लोग अपने खुद के फोटो और वीडियो नफरत की हिंसक बातों के साथ डाल रहे हैं, वे यह बात समझ लें कि इस ताजा विमान हादसे के बाद अब दुनिया भर में यह बात उठेगी कि कैसे लोगों को किसी भी तरह के काम पर न रखा जाए। 

लेकिन आज भारत की बड़ी सरकारी नौकरियों में भी किसी भी तरह की महत्वपूर्ण या संवेदनशील पोस्टिंग के पहले 360 डिग्री की जांच होते कुछ साल हो चुके हैं। भारत सरकार किसी भी बड़े अफसर को किसी कुर्सी पर लाने के पहले उसके बारे में छोटी से छोटी बात पता लगाने की कोशिश करती है, उसके सीनियर रहे, उसके जूनियर रहे लोगों से भी पूछताछ होती है। इसके लिए सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट करना जरूरी नहीं रहता, लोगों ने अगर आपस की बातचीत में भी कुछ हिंसक बातें कही हैं, तो वे भी ऐसे महत्वपूर्ण मौकों पर पीछा करते हुए वहां पहुंच जाती हैं। इसलिए लोग बेरोजगार हों, या किसी रोजगार में हों, उन्हें अपनी कही और अपनी की हुई बातों को लेकर सावधान रहना चाहिए कि उनके भविष्य को गड्ढे में डालने के लिए इनमें से कोई भी बात काफी हो सकती है। आज अमरीका जैसे देश में जाने के लिए वीजा अर्जी में ही एक शर्त यह रहती है कि आवेदक अपने सभी सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी वीजा एप्लीकेशन के साथ दे। फिर अमरीकी अधिकारी पेशेवर एजेंसियों के साथ मिलकर इन खातों को देखते हैं कि क्या इनकी कही हुई कुछ ऐसी बातें रही हैं जो कि इन्हें अमरीका के लिए खतरा साबित करती हैं, और ऐसा होने पर बिना कोई वजह बताए वीजा अर्जी खारिज कर दी जाती है। यह भी एक वजह है कि आज अमरीका का वीजा पाने के लिए कई महीनों का वक्त लगता है, और उसके बाद भी वीजा पाने वालों की गिनती बहुत घट गई है। 

धीरे-धीरे दुनिया के सारे विश्वविद्यालयों में भी यह होने जा रहा है कि हिंसक और धर्मान्ध, कट्टर और आतंकी सोच रखने वाले लोगों को वहां दाखिला न मिले। अब धीरे-धीरे सरकार, कारोबार, या आगे चलकर यह भी हो सकता है कि शादी जैसे रिश्ते तय करने के लिए भी पेशेवर एजेंसियों से यह दिखवाया जाए कि जिस पर विचार किया जा रहा है, उसके खुद के विचार कैसे हैं? आज भी मामूली समझ रखने वाले छोटे-छोटे से कारोबार, या मामूली से परिवार भी यह देख लेते हैं कि जिनसे किसी भी तरह का वास्ता रखना है, वे सोच कैसी रखते हैं। अब जैसे-जैसे दुनिया में संपर्क दूर-दूर तक हो रहे हैं, जिस तरह बड़े-बड़े धोखे हो रहे हैं, ऐसी एजेंसियां बढ़ती चलेंगी जो कि बैकग्राउंड-चेक करने का काम करें। इसलिए सिर्फ दुनिया की एयरलाईंस के पायलटों की बात नहीं हैं, आज भी भारत में महत्वपूर्ण लोग अपनी निजी कारों के लिए ड्राइवर रखते हुए भी उनके रूझान और उनके रिश्तों को ठोक-बजा लेते होंगे। 

पूरी दुनिया में अलग-अलग मौकों पर कहीं राजनीतिक भीड़ जुटती है, तो कहीं पर धार्मिक यात्राएं होती हैं। अब अगर इनमें से किसी को निशाना बनाते हुए किसी ट्रेन या बस के ड्राइवर कोई आतंकी दुर्घटना करें, तो उसे रोकना भी तो सरकारों, और कंपनियों की जिम्मेदारी होगी। हमारा तो यह मानना है कि किसी भी देश में जिम्मेदार सरकार, या जिम्मेदार कारोबार नफरती लोगों को काम पर नहीं रखेंगे, क्योंकि बात सिर्फ ड्राइवरी, या पायलटिंग की नहीं है, ऐसी किसी जगह कोई दूसरा काम करने वाले लोग भी किसी आतंकी हमले में शामिल हो सकते हैं, या कोई व्यक्ति अकेले ही ऐसा हमला करना तय कर सकते हैं। इस एक विमान हादसे से दुनिया की कंपनियों और सरकारों को तो सबक मिला ही होगा, आम लोगों को भी यह सबक मिलना चाहिए कि नफरतियों को किसी काम पर न रखा जाए। इसके बाद उन लोगों को भी सबक मिलना चाहिए जो कि आज नफरत की तिजारत करते हैं, और आज तो खप जा रहे हैं, कल निकाल बाहर कर दिए जाएंगे। एक हादसा तो टल गया, लेकिन उसके सबक नहीं टले हैं, समझदार तो उसके सबक का फायदा उठाएंगे, बाकी लोग तो खतरा उठाते ही हैं, उनकी लापरवाही उसी तरह जारी भी रह सकती है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 5 अक्टूबर 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

एआई के बपतिस्मा और जनेऊ संस्कार के खतरे..

 04 अक्टूबर 2026  

 

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर आज जो कंपनी, एंथ्रापिक सबसे अधिक चर्चा में है, उसने अभी एक अनोखा काम किया। अमरीका के सान फ्रांसिस्को में अपने मुख्यालय में उसने अलग-अलग कुछ धर्मों के लोगों को, कुछ मानसिक विशेषज्ञों को आमंत्रित किया, और उनसे एआई की नैतिकता पर चर्चा की। इस चर्चा का मकसद एआई का प्रशिक्षण भी था, और इस दौरान इस कंपनी के एक प्रमुख व्यक्ति भी वहां पर बैठे रहे। भारत के हिन्दू धर्म के एक प्रतिनिधि की तरह वहां पर रामकृष्ण मिशन के स्वामी सर्वप्रियानंद भी मौजूद थे, लेकिन इन सारे लोगों से कंपनी ने इस चर्चा के पहले ही जानकारी बाहर उजागर न करने का एक अनुबंध कर लिया था, इसलिए इसकी बड़ी सीमित जानकारी बाहर आई है। स्वामी सर्वप्रियानंद को आज के डिजिटल युग में स्वामी विवेकानंद के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है, और वे अद्वैत वेदांत की व्याख्या दुनिया भर के लोगों के सामने करते हैं। 

एआई को लेकर यह बहस चल ही रही है कि उसमें चेतना कब जागृत होगी, अगर अभी तक हो नहीं चुकी है तो। कुछ लोगों का कहना है कि एआई अब कुछ फैसले खुद लेने लगा है, और जल्द ही वह फैसलों के मामलों में बेकाबू हो सकता है। यह बात तो हम ही कई बार सामने रख चुके हैं कि इसी एंथ्रापिक कंपनी को छोडक़र निकले हुए एक विशेषज्ञ-जानकार ने यह खतरा सामने रखा है कि एआई के अगले दस बरस में मानव प्रजाति को खत्म कर देने का खतरा दस फीसदी से अधिक है। आज जब वह एक औजार की तरह है, तब भी यह खतरा तो बना हुआ ही है कि मुजरिम या आतंकी, या किसी और सोच के लोग इसे हथियार की तरह इस्तेमाल करके भारी तबाही ला सकते हैं, दुनिया की शासन व्यवस्था को घुटनों पर ला सकते हैं। दुनिया के एक सबसे बड़े टेक्नॉलॉजी-मुखिया रहे बिल गेट्स ने यह कहा है कि कुछ लोग एआई को हथियार की तरह इस्तेमाल करके सौ करोड़ से अधिक लोगों को भी मार सकते हैं। इस तरह आज एआई एक ऐसी कगार पर पहुंच चुका है जहां से आगे वह जमीन खत्म हो जाने पर किसी परी या जादूगर की तरह आसमान की तरफ भी उड़ सकता है, और नीचे खाई की तरफ भी कूद सकता है। उसकी क्षमताओं की कोई मामूली सीमाएं नहीं हैं, और वह किस तरह की सोच के साथ ताकत का किस तरह इस्तेमाल करेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है। 

अब जब धर्म के प्रवचन एआई को सुनाए जा रहे हैं, तो उसके खतरनाक होने का खतरा पहले के मुकाबले कई गुना अधिक हो जाता है। बिना धर्म के दुनिया के देशों के कानून, संविधान, और अंतरराष्ट्रीय समझौतों को पढ़-पढक़र एआई कुछ या अधिक हद तक न्यायप्रिय हो भी सकता था, कि अब उसका धर्म में अन्नप्राशन करवाया जा रहा है। धर्म अपने मिजाज, तेवरों, और मौजूदा आम इस्तेमाल की वजह से लोकतंत्र और इंसानियत से खासे दूर है। इजराइल, फिलीस्तीन, और लेबनान ने जो कर रहा है, उसे यहूदी धर्म की एक सोच सही ठहरा रही है। ओसामा-बिन-लादेन ने वल्र्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों के साथ जो किया, उसे इस्लाम के भीतर की एक सोच सही ठहरा रही है। अफगानिस्तान में तालिबान महिलाओं के साथ जो कर रहे हैं, वह भी इस्लाम के कई लोगों के मुताबिक जायज है। हिन्दुस्तान में ही अखलाक जैसे गरीब इंसान की गोमांस के शक मेंं की गई भीड़त्या को बहुत से लोग जायज मानते हैं। पंजाब में गुरू ग्रंथ साहब के साथ बेअदबी का आरोप लगाने पर ही किसी की भीड़त्या को समाज और सरकार सभी सही मान लेते हैं। पाकिस्तान में कुरान के साथ बेअदबी, या पैगंबर के अपमान का आरोप ही किसी आरोपी को थाने से छिनकर ले जाने और जिंदा मार डालने के लिए काफी है। अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग तबके ऐसी तमाम हरकतों को जायज ठहराते हैं। अब जो नया एआई धार्मिक प्रशिक्षण के बाद तैयार होगा, उसके सामने एक बड़ा खतरा यह खड़ा रहेगा कि उसने अगर धर्म की नसीहतों को सुनने-समझने के बाद आज धर्मों के मौजूदा स्वरूपों को समझना शुरू कर दिया, और उन्हें मानने लगा, तो हो सकता है कि वह पश्चिमी दुनिया, मुस्लिम देशों, अफ्रीका, और भारत के ही कुछ प्रदेशों में गोमांस खाने वाले लोगों को खत्म करने को जायज मान ले, ताकि बची हुई गौमाताओं को बचाया जा सके। हो सकता है कि वह विनायक दामोदर सावरकर की सोच को जायज मानकर, गाय को उत्पादकता खत्म होने के बाद खाने लायक पशु मानकर गौहत्या का विरोध करने वालों को खत्म करने को जायज मान ले। हो सकता है कि वह फिलीस्तीनियों को खत्म करने वाले इजराइल के नागरिकों से भरे हुए विमान को जमीन से टकराकर खत्म करने को जायज मान ले, और इसके लिए वह ओमान के किसी मुस्लिम पायलट को और अधिक कट्टरपंथी बनाने में जुट जाए ताकि वह यहूदी मुसाफिरों से भरे प्लेन को खत्म करने की कोशिश करे। 

धर्म हजारों बरस की किताबों में चाहे जैसा भी लिखा गया होगा, हम उतने पुराने प्रपंच में उलझना नहीं चाहते। लेकिन हम समय-समय पर यह भी लिखते आए हैं कि किसी बच्चे को बड़ा करने का सबसे अच्छा जरिया यह हो सकता है कि उसे कोई धार्मिक सोच न दी जाए, और उसे बालिग होने पर अपनी धार्मिक आजादी तय करने दी जाए। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को पहले तो धर्म, फिर धर्मान्धता, और फिर साम्प्रदायिकता की हिंसा तक में झुलसा देने का नतीजा क्या होता है, यह सडक़ों पर डीजे के लाउडस्पीकरों के साथ अश्लील और हिंसक हरकतों को करते हुए बच्चों में देखा जा सकता है। 

धर्म के मौजूदा स्वरूप को अनदेखा करना, और धर्म की हजारों बरस पुरानी बातों में से कुछ बातों को जायज बताते हुए उनकी व्याख्या करना, एआई के प्रशिक्षण के लिए एक सबसे ही खतरनाक काम हो सकता है। आज दुनिया भर में धार्मिक और सांप्रदायिक हिंसा करने वाले लोग अपनी हरकतों को धर्म की अपनी सोच के मुताबिक न सिर्फ जायज ठहराते हैं, बल्कि ऐसे जुर्म के एवज में आगे चलकर जन्नत पाने की हसरतें भी पाल लेते हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया भर का ज्ञान, और कई किस्म की समझ भर देने के बाद भी एआई अभी पर्याप्त रफ्तार से मानवसंहार के लायक नहीं हो पाया था, इसलिए अब उसे धर्म के साथ घोंटा जा रहा है। आज दुनिया के अलग-अलग सबसे विकसित लोकतंत्रों में भी धार्मिक समूह लोकतंत्र और मानवता दोनों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं, वे अपने-अपने देश की कानून-व्यवस्था के लिए भी चुनौती बने हुए हैं। भारत जैसे देश में भी धर्म के खतरे हर दिन कहीं न कहीं सामने आ रहे हैं। ऐसे में एआई का जो ताजा प्रशिक्षण धर्म की तथाकथित  अच्छी बातों को लेकर शुरू हुआ होगा, वे बातें कब कट्टरता तक पहुंच जाएंगी, या खुद एआई ही यहां से उड़ान भरकर कट्टरता के हिंसक आसमान पर पल भर में पहुंच चुका होगा, इसका अंदाज लगाना आज इंसानों के लिए मुमकिन नहीं है, लेकिन यह एआई के लिए पल भर में कर पाना चुटकी बजाने जैसा आसान जरूर है। 

दुनिया को इस बात को समझना होगा कि एक नास्तिक एआई की सोच में दुनिया की अच्छी बातों के लिए कुछ सम्मान जरूर हो सकता था, लेकिन धर्म के साथ उसके गठजोड़ से उम्मीद तो की जा रही है एक नैतिक प्रशिक्षण की, लेकिन आज खुद धर्म पर अमल कहां नैतिक रह गई है? धर्म के इस ताजा यज्ञोपवीत संस्कार से अब यह तय हो गया है कि न सिर्फ एफिल टॉवर, बल्कि दुनिया के किसी भी पर्यटक स्थल पर भ्रमचारियों का जत्था पहुंचेगा, तो एआई ही महिला कर्मचारियों की ड्यूटी वहां से खत्म कर देगा। जिस तरह जंगल के किनारे के गांवों में भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया की चीख-पुकार से लोग घरों में घुस जाते हैं, उसी तरह किसी धर्म के भ्रमचारी आए-भ्रमचारी आए ऐसे नारे से एआई तुरंत ही महिलाओं को आंखों से ओझल करवा देगा। इंसान के हाथों धर्म के खतरे मानो कम थे कि अब नैतिकता का पाठ पढ़ाने के नाम पर एआई का धर्म से सामना करवाया जा रहा है। अब सचमुच ही दुनिया का ईश्वर ही मालिक है।

(Daily Chhattisgarh)   

छोटे बच्चे के कहे निरर्थक शब्दों सरीखे क्यों बड़बड़ाता है एक सयाना आदमी?

4 अक्टूबर 2026

 

जाहिर तौर पर समझदार दिखने वाला कोई एक आदमी एक दिन में ट्विटर पर दो अलग-अलग बार लिखता है। एक बार लिखा- ‘बोला था नहीं किया।’ दूसरी बार लिखता है-‘जो बोला था वो नहीं किया।’ इसके दो-तीन दिन पहले बस इतना लिखता है- ‘हां अब ठीक है।’ इसके दो-तीन दिन पहले वह बस इतना लिखता है- ‘जीवन जीवित’। इसके पहले- ‘सुनते नहीं हैं’, और इसके दो दिन पहले बस इतना लिखा है-‘कोई नहीं था’। 

अब एक-एक दिन में ऐसी दो-चार शब्दों की निरर्थक ट्वीट से लिखने वाले की दिमागी हालत का क्या अंदाज लगाया जाए? फिर यह भी है कि ऐसी हर ट्वीट के साथ वह आदमी नंबर भी लिखते चल रहा है, 5861, 5862, और कोई नंबर छूट जाता है, तो अगली ट्वीट में उसे सुधारकर यह आदमी माफी भी मांग लेता है। 

उसकी लिखी गई बीते कई महीनों की बातों को देखें, तो उनमें से अधिकतर बातें दो-चार शब्दों वाली पूरी तरह से निरर्थक बातें हैं, उनमें नंबर बड़ी बारीकी और सावधानी से डले हुए हैं। लिखी हुई कुछ और बातों को यहां देख लें, चेंप दिया, लग गई, अभी तक कुछ नहीं, कुछ नहीं, बोलती बंद, आए थे मिलने फिर चले गए, कल मिलते हैं, पीछे रह गए, हे भगवान, अभी भी, जल्दी है, आता हूं, हो गया, अब कल को भी पकडऩा है, निकल गया था पकड़ लिया, चक्की चल रही है, देख लो, ऐ भैया हावड़ा का पुल देखे हो, बेसन, बटलोई, चिडिय़ा चूक गईं खेत, कल से सोचना बंद, सोचा था क्या, क्या हो गया, अभी तक नहीं कहा, बारिश आई, बस अब नो मोर ज्ञान...

ट्विटर, यानी एक्स पर अमिताभ बच्चन के अलग-अलग दिन लिखे हुए ऐसे ट्वीट देखें, तो थोड़ा सा शक होता है कि क्या उनकी दिमागी हालत ठीक है? आज सार्वजनिक जीवन में उनकी सबसे बड़ी मौजूदगी कौन बनेगा करोड़पति जैसा एक कार्यक्रम है। इसके अलावा वे किसी-किसी समारोह में भी शामिल होते हैं। लेकिन ट्रम्प की तरह रात-दिन किसी भी वक्त वे ट्विटर पर लिखने के आदी हैं, और रात तीन-चार बजे शूटिंग से घर लौटते उनका लिखना तो समझ आता है कि काम पूरा करके अब लौट रहे हैं, लेकिन पूरी तरह से निरर्थक बड़बड़ाहट वाले कुछ शब्दों से उनकी दिमागी हालत का क्या अंदाज लगाया जाए? 

हिन्दुस्तानी आमतौर पर मूर्तिपूजक रहते हैं। जो गुजर गए, उनकी मूर्तियां, बनाने और लगाने का चलन तो पूरी दुनिया में है, लेकिन हिन्दुस्तानी ऐसे हैं जो कि अपने नेताओं, कलाकारों, खिलाडिय़ों, और यहां तक कि ट्रम्प की भी मूर्ति बनाकर लगा लेते हैं, पूजा-आरती भी करने लगते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान में शोहरत-हासिल किसी इंसान की आलोचना आसान नहीं रहती। अमिताभ बच्चन की बड़बड़ाहट पर भी कुछ लिखा नहीं जा रहा है, क्योंकि उन्हें सदी का सबसे बड़ा फिल्मकार, या अभिनेता करार दिया जा चुका है, और ऐसा कहने वाले लोग अब भला किस मुंह से अपनी गढ़ी हुई प्रतिमा का मूर्तिभंजन कर पाएंगे? 

लेकिन अमिताभ की गिन-गिनकर लिखी जा रही ऐसी सार्वजनिक बातों से उनके परिवार, चिकित्सकों, और प्रशंसकों को फिक्र होनी चाहिए। जिस वक्त बाकी दुनिया, और हिन्दुस्तान में भी सोचने-समझने वाले लोगों के लिए कुछ कहने की मजबूरी वाली नौबतें हर घंटे किवाड़ खटखटाते खड़ी रहती हैं, तब हाथ स्क्रीन पर, अगली ट्वीट का नंबर, लेकिन बात सिर्फ निरर्थक! यह नौबत सिर्फ बड़बड़ाहट के मनोविश्लेषण की नहीं है, यह नौबत सरोकार से सरोकारों से बेरूखी के विश्लेषण की भी है। ऐसा भी नहीं कि अमिताभ बच्चन पहले बड़े सरोकारी इंसान थे, और अब किसी विचलित मानसिक स्थिति के चलते हुए वे सरोकारों से परे रहने लगे हैं। जिस भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने में हजारों इंसानों को मार डाला था, और लाखों को लाइलाज बीमार कर दिया था, उसी भोपाल में ससुराल रहते हुए भी अमिताभ बच्चन के मुंह से कभी एक शब्द हमदर्दी का नहीं निकला था। उसके बाद भी बीते कोई पचास बरसों में उनका सामाजिक सरोकार मनमोहन सरकार के दौरान पेट्रोल की महंगाई को लेकर कुछ ट्वीट की शक्ल में सामने आया था, उसके बाद वह कुंभकर्ण जो सोया, तो आज तक नहीं जाग पाया। अब सरोकारविहीनता हर किसी का मौलिक अधिकार है, लेकिन क्या बड़ाबड़ाहट को भी किसी का मौलिक अधिकार मानकर उसकी फिक्र न की जाए?

मैं तो अमिताभ के हिमायती की हैसियत से यह बात उठा रहा हूं कि जो व्यक्ति अपने कहे हुए दो-दो, चार-चार निरर्थक शब्दों को भी सीरियल नंबर डालकर पोस्ट करता है, उसकी निरर्थकता शायद उसकी दिमागी सेहत का एक लक्षण भी है। छोटे बच्चों को तो यह आजादी रहती है कि वे निरर्थक शब्द बड़बड़ा सकते हैं, मुंह से तरह-तरह की आवाज निकाल सकते हैं, लार का बुलबुला बना सकते हैं, लेकिन क्या बुजुर्गों को भी ऐसी आजादी रहती है? 

जब लोगों की अपनी जिंदगी दुनिया के सबसे परले दर्जे के ऐशोआराम से भर जाए, तब उनके लिए यह स्वाभाविक तो हो सकता है कि वे दुनिया की दुख-तकलीफ को अनदेखा करते चलें, क्योंकि यही बात उनके लिए सबसे अधिक सहूलियत की रहती है। लेकिन क्या यह बात सबसे अधिक, या बहुत मामूली सरोकार की भी रहती है? क्या सामाजिक विपन्नता की जलती-सुलगती जरूरतों के समंदर के बीच कोई उस धुएं से अनछुए अपने आलीशान टापू पर जी सकते हैं? क्या अमिताभ बच्चन के मन के भीतर के ऐसे विरोधाभास उनकी बड़बड़ाहट की शक्ल में निकल रहे हैं, या किसी भी सरोकार से मुक्त वे एक चिकने घड़े की तरह चैन से जी रहे हैं, जिन्हें दुनिया की कोई भी तकलीफ की एक बूंद भी छू भी नहीं जाती? ऐसे कई सवाल उठते हैं। 

यह भी लगता है कि क्या दौलत, शोहरत, करोड़ों प्रशंसकों की भीड़, और खासे पढ़े-लिखे होने की ताकत, इन सबके बाद भी कोई दुनिया के हालात से अपने आपको इस हद तक अनछुआ रख सकते हैं कि निरर्थक बड़बड़ाहट पोस्ट करने का तो वक्त हो, लेकिन किसी जरूरी और जायज मुद्दे पर उंगलियों को लकवा सा मार जाए? आज किसी ऐसे की जरूरत है जो कि अमिताभ के कई बार के खेले गए विजय नाम के किरदार की तरह हाथ लहराकर अमिताभ से उसी तरह जवाब मांग सके जिस तरह वह विजय मंदिर में ईश्वर से तरह-तरह से जवाब मांगता था। शायद ईश्वर से जवाब मांगना अधिक आसान होता है।

(Daily Chhattisgarh)