अपने इर्द-गिर्द हलचल होने से ही जल्द जागता है सुप्रीम कोर्ट!

23 सितंबर 2026  

 

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव करवाने के लिए बनी केंद्रीय चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का हाल यह हो गया है कि वह संविधानेतर अंदाज में काम कर रही है, और उसे छूने से बचने की कोशिश करते चले आने वाले सुप्रीम कोर्ट को भी अब दिल्ली में आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठाने पड़े हैं। अब इस देश में एक भारत रत्न वैज्ञानिक, बहुत सारे पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित व्यक्ति, फौज के अनगिनत रिटायर्ड बहादुर अफसर और अब देश के विदेश मंत्री से लेकर जाने कितने ही जज और राजनयिक चुनाव आयोग में जाकर अपने आपको हिंदुस्तानी मतदाता साबित करने को मजबूर किए गए हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भी चुनाव आयोग के तौर-तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं। आलोचकों का आरोप रहा है कि ऐन चुनाव के पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं को छांट-छांटकर मतदाता सूची से बाहर करने का अभियान चलाया गया।

सुप्रीम कोर्ट की नींद तब कुछ जल्दी खुलती है जब उसके आसपास कुछ होने लगता है, चाहे वह दिल्ली का प्रदूषण हो, चाहे दिल्ली की इमारतों के तलघरों में चलने वाले कारोबार हों, चाहे दिल्ली में डीजल गाड़ियां हों या और कोई जनसुविधा हो। इसमें कुछ अटपटा भी नहीं है, क्योंकि जब आग बहुत पास में लगती है तो ताप कुछ अधिक लगता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट बना तो पूरे देश के लिए है, लेकिन आज दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, को लेकर सुप्रीम कोर्ट चौकन्ना हो गया है और चुनाव आयोग से सवाल कर रहा है। इसी सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल चुनाव के वक्त हैरान करने वाला एक सवाल पूछा था कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं डाल पाएंगे तो कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा, वे अगले चुनाव में वोट डाल देंगे। और चुनाव हो गया, नतीजे देश के सामने हैं। जिस मतदाता सूची पुनरीक्षण की कोई हड़बड़ी नहीं थी, उसे तुरंत करवाने और दसियों लाख वोटरों का हक छीन लेने का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो जाने दिया गया। देश में न्यायपालिका का इतिहास जब लिखा जाएगा, तब उसमें बंगाल की मतदाता सूची को लेकर अदालत का रुख और उसकी टिप्पणियां जरूर जगह पाएंगी।

अब आज इस मामले पर लिखे बिना इसलिए नहीं रहा जा सकता कि देश के एक खोजी अखबार, इंडियन एक्सप्रेस ने जांच-पड़ताल के बाद एक रिपोर्ट छापी है कि चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से बाकी दो सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से समय-समय पर लिखित असहमति जाहिर की है और उसे अनदेखा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कई फैसले अपने स्तर पर लिए। रिपोर्ट के मुताबिक इन फैसलों की जानकारी भी कई मामलों में बाकी दो आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को फैसले लिए जाने से पहले नहीं दी गई। एसआईआर को पूरे देश में लागू करने के काम सहित चुनाव आयोग के भीतर पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार संधू और जोशी ने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई और लिखित रूप में अपनी असहमति दी, लेकिन उनकी आपत्तियों पर अमल नहीं हुआ। एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि ये आपत्तियां एसआईआर प्रक्रिया और वोटर लिस्ट से जुड़ी हुई थीं। इन दोनों ने यह भी लिखित शिकायत की कि उनकी लिखित सलाह के खिलाफ जाकर ज्ञानेश कुमार ने काम किया। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया है। इसके साथ-साथ इन दोनों सदस्यों ने भारत सरकार के सबसे बड़े नौकरशाह, कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखकर चुनाव आयोग के भीतर काम के बंटवारे में किए गए बदलाव की शिकायत की थी, जिससे वोटर लिस्ट के लिए आईटी सिस्टम की निगरानी का एक स्तर खत्म हो गया था।

इन तीनों ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुई है और कानून के तहत प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और विपक्ष के नेता के एक पैनल ने इन सदस्यों का चयन किया था। उल्लेखनीय है कि 2024 में जब संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त बनाया गया था, तब भी विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने नियुक्ति प्रक्रिया से असहमति दर्ज कराई थी। इसके बाद 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त बनाने पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने असहमति दर्ज कराई थी। इस देश में चुनाव आयोग का ऐसा गौरवशाली इतिहास रहा है, कि टी एन शेषन का नाम आज भी सख्ती और हौसले के लिए देश में मिसाल की तरह लिया जाता है। वहाँ से लेकर आज शर्मिंदगी तक, ये कहाँ आ गए हम !

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है कि अब वोटर बनने के लिए किसी नागरिक को जो फॉर्म भरना होता है, उसमें एक ऐसा सवाल पूछा जा रहा है जो पहले कभी नहीं पूछा गया था। इसमें पूछा जा रहा है कि क्या नया वोटर, उसके मां-बाप या दादा-दादी इसके पहले हुए एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद थे। इस सवाल के खिलाफ जोशी और संधू दोनों ने फाइल पर यह चेतावनी लिखी थी कि नियमों को बदले बिना यह सवाल ऐसे नहीं जोड़ा जा सकता। जोशी ने अपनी आपत्ति दर्ज की और संधू ने भी उससे सहमति जताते हुए इसे अनधिकृत और गैरकानूनी बताते हुए तुरंत हटाने की बात कही। दोनों चुनाव आयुक्तों ने एसआईआर से जुड़े हुए बहुत सारे पहलुओं को लेकर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन उनकी आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक बंगाल चुनाव में 49 सीटों पर एसआईआर के तहत हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन 49 सीटों पर एसआईआर से हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक होने के बावजूद चुनाव परिणाम में इसका कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है; इनमें 26 सीटें भाजपा और 21 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थीं।

अभी सुप्रीम कोर्ट ने ही बंगाल में महीनों से चल रहे मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग से हासिल जानकारी के आधार पर यह कहा था कि जिस रफ्तार से मतदाताओं की आपत्तियां सुनी जा रही हैं और उनके कागजात देखे जा रहे हैं, उस रफ्तार से बंगाल में आपत्तियों के निपटारे में 21 बरस लगेंगे। अब दिल्ली की बारी पुनरीक्षण में जल्दी आ गई है और सुप्रीम कोर्ट को यह सवाल दिखाई दे रहा है कि चुनाव आयोग वोटरों के नाम पर सवालिया निशान लगाने का काम कहीं मशीनी अंदाज में तो नहीं कर रहा। दिल्ली में गर यह काम कुछ बरस बाद होता, तो दूसरे राज्यों को देखकर सुप्रीम कोर्ट को यह समझ ही नहीं पड़ता कि चुनाव आयोग एक खास मकसद की मशीन बन चुका है। बंगाल में एसआईआर के बाद 27.16 लाख नाम हटाए गए, उनमें से 22.21 लाख लोगों ने अपने मताधिकार की बहाली के लिए अपील की। लेकिन चुनाव आयोग के सामने कुल अपीलें 38.31 लाख हैं, क्योंकि 16.10 लाख अपीलें उलटे उन नामों को हटाने के लिए हैं जिन्हें सूची में शामिल किया गया था।

देश में ऐसे कई मौके आए हैं जब चुनिंदा अखबारों की खबरों ने इतिहास में हो रहे फेरबदल को रोकने या तेज करने का काम किया है। कभी कोई अखबार, तो कभी कोई और वेबसाइट, कभी स्टिंग ऑपरेशन करने वाला कोई कोबरा, अलग-अलग लोगों द्वारा उठाए गए मुद्दों और किए गए भंडाफोड़ से लोकतंत्र को बचने का मौका मिला है। अब सुप्रीम कोर्ट के जागने का समय आ गया है। इंडियन एक्सप्रेस नाम के एक मुर्गे ने अदालत की दहलीज पर जाकर बांग दी है। देखना है, इस रिपोर्ट के बाद अब क्या होता है?

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

डिग्री की भीड़ से पहले हुनर की राह क्यों नहीं?

22 सितंबर 2026  

 

हमारे समाज में 10वीं के बाद लगभग हर विद्यार्थी के लिए एक ही रास्ता मान लिया गया है, 12वीं करो, फिर स्नातक करो और उसके बाद नौकरी तलाशो। लेकिन उन विद्यार्थियों के बारे में भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है जो 10वीं तक की पढ़ाई में लगातार कमजोर हैं। अगर पढ़ाई में तेज विद्यार्थी भी स्नातक होने के बाद रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो केवल किसी तरह डिग्री हासिल कर लेने से पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी के लिए रोजगार की संभावना बहुत बेहतर हो जाएगी, इसकी क्या गारंटी है? अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 25 वर्ष से कम उम्र के स्नातक युवाओं में बेरोजगारी दर 39.33 प्रतिशत और 25 से 29 वर्ष में 20.04 प्रतिशत थी। इसका अर्थ यह नहीं कि स्नातक की डिग्री बेकार है। रोजगार मिलने पर स्नातकों की औसत कमाई गैर-स्नातकों से अधिक है। सवाल यह है कि डिग्री मिलेगी तो रोजगार भी मिलेगा, इसकी गारंटी कहां है?

एक और आंकड़ा इस समस्या को समझने में मदद करता है। 2004-05 से 2023 के बीच भारत में हर साल करीब 50 लाख नए स्नातक बढ़े, लेकिन रोजगार पाने वाले स्नातकों की संख्या में सालाना बढ़ोतरी केवल करीब 28 लाख रही और वेतनभोगी रोजगार तक पहुंचने वालों की संख्या इससे भी कम रही। यानी डिग्री हासिल करने वालों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी, उनके लिए रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। यह स्थिति केवल बेरोजगारी की संख्या का सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरी सोच पर सवाल है जिसमें हम मान लेते हैं कि ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों को स्नातक बना देना अपने आप रोजगार की समस्या का समाधान कर देगा। इसलिए 10वीं तक पढ़ाई में लगातार कमजोर विद्यार्थियों को किसी तरह 12वीं और फिर स्नातक तक खींचते रहने के बजाय 8वीं से ही उन्हें अलग-अलग तरह के कामों और कौशलों से परिचित कराने की जरूरत है। 10वीं तक आते-आते उनकी रुचि, क्षमता और व्यावहारिक योग्यता समझी जा सकती है और उसके बाद उन्हें गंभीर कौशल प्रशिक्षण का विकल्प मिलना चाहिए। बिजली, वाहन मरम्मत, वातानुकूलन और कूलिंग, प्लंबिंग, वेल्डिंग, मशीन संचालन, सौर उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मोबाइल और कंप्यूटर मरम्मत, स्वास्थ्य तकनीक, खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई, डिजाइन, फोटोग्राफी, वीडियो निर्माण, आतिथ्य सेवा, कृषि उपकरण और ऐसे अनेक क्षेत्रों में अच्छे प्रशिक्षण की जरूरत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा से परिचय और स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक अनुभव की बात कही गई है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हुनर केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, रोजगार की अपनी पूंजी है। कोई हुनरमंद व्यक्ति किसी संस्था या दुकान में काम कर सकता है, फिर स्वतंत्र रूप से काम ले सकता है और अनुभव के साथ अपना छोटा कारोबार भी शुरू कर सकता है। नौकरी चली जाए तो उसका हुनर उसके साथ रहता है। एक अच्छे बिजली मिस्त्री, वाहन मैकेनिक, तकनीशियन, दर्जी, फोटोग्राफर या दूसरे किसी काम का दक्ष व्यक्ति अपनी अगली आजीविका उसी हुनर से तलाश सकते हैं। इसके विपरीत किसी सामान्य स्नातक की नौकरी चली जाए और उसके पास कोई विशेष कौशल या काम का अनुभव न हो तो उसे फिर उसी डिग्री के आधार पर दूसरी नौकरी की तलाश करनी पड़ती है। इसलिए हुनर की असली ताकत केवल उसकी कमाई में नहीं, रोजगार खोने के बाद फिर से खड़े होने की क्षमता में भी है।

यह भी सच है कि हर हुनरमंद व्यक्ति स्नातक से ज्यादा नहीं कमाते। उपलब्ध राष्ट्रीय आंकड़े ऐसी कोई सामान्य बात साबित नहीं करते। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। तकनीकी शिक्षा और व्यावहारिक कौशल रोजगार की संभावनाएं बढ़ाते हैं और कुछ क्षेत्रों में अनुभव के साथ कमाई भी काफी बढ़ सकती है। स्वरोजगार में समय और काम के तरीके पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण भी हो सकता है, हालांकि उसके साथ नियमित छुट्टी, भविष्य निधि और दूसरी सामाजिक सुरक्षा की कमी का जोखिम रहता है। इसलिए कौशल शिक्षा का मतलब केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देना नहीं होना चाहिए। प्रशिक्षण के बाद रोजगार, प्रशिक्षुता, औजार खरीदने के लिए ऋण, बाजार तक पहुंच और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था भी जरूरी है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट भी शिक्षा और कौशल को रोजगार से जोडऩे तथा व्यावसायिक शिक्षा को व्यापक बनाने पर जोर देती है।

भारत के रोजगार बाजार की एक और सच्चाई है जिसे हमारी शिक्षा व्यवस्था अक्सर नजरअंदाज करती है। नीति आयोग की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार देश के श्रमबल में करीब 58.4 प्रतिशत लोग स्वरोजगार में हैं, जबकि नियमित वेतन या वेतनभोगी रोजगार में करीब 21.7 प्रतिशत और आकस्मिक श्रम में करीब 19.8 प्रतिशत हैं। यानी भारत की रोजी-रोटी का बड़ा हिस्सा केवल दफ्तर की नियमित नौकरी पर निर्भर नहीं है। बड़ी संख्या में लोग अपने काम, छोटे कारोबार, सेवा या किसी कौशल के सहारे कमाते हैं। इसलिए कौशल को पढ़ाई का दूसरा दर्जा मानने के बजाय उसे रोजगार की मुख्य धारा का हिस्सा बनाना जरूरी है। जिस हुनर से नौकरी मिल सकती है, उसी हुनर से स्वरोजगार भी शुरू किया जा सकता है।

हमने शिक्षा की सफलता का पैमाना बहुत संकरा बना दिया है, कितने विद्यार्थी 12वीं पास हुए, कितने ग्रेजुएट हुए और कितने पोस्ट-ग्रेजुएट, इससे बड़ा सवाल यह होना चाहिए कि कितने विद्यार्थियों के पास अपनी आजीविका कमाने की क्षमता है। हर विद्यार्थी डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या अधिकारी नहीं बन सकते और इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। शर्म की बात तब होगी जब पढ़ाई में कमजोर विद्यार्थी को वर्षों तक ऐसी पढ़ाई में धकेलते रहें जिसमें वह लगातार असफल होते रहें और अंत में उसके हाथ में न पर्याप्त रोजगार-योग्य डिग्री हो, न कोई मजबूत हुनर। इसके बजाय वही विद्यार्थी 10वीं के बाद किसी अच्छे हुनर में दक्ष होकर कामकाजी बन सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, स्वरोजगार शुरू कर सकते हैं और आगे चलकर अपना व्यवसाय भी खड़ा कर सकते हैं।

हमें विद्यार्थियों के रास्ते बंद नहीं करने हैं, रास्ते बढ़ाने हैं। डिग्री पाने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के रास्ते खुले रहें, लेकिन जो विद्यार्थी पढ़ाई में कमजोर हैं उनके लिए हुनर का रास्ता भी उतना ही सम्मानजनक बनाया जाए। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हर विद्यार्थी कितनी बड़ी डिग्री लेंगे। सवाल यह भी होना चाहिए कि हर विद्यार्थी ऐसा क्या सीखेंगे जिसके बदले समाज उसे सम्मान के साथ पैसा देने को तैयार हो। कमजोर विद्यार्थी को कमजोर स्नातक बनाने से बेहतर है कि उसे मजबूत हुनरमंद बनाया जाए। आज के समय में केवल डिग्री और दफ्तर-आधारित काम पर निर्भर रहने का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले कामों में आंकड़े दर्ज करने, हिसाब-किताब, प्रशासन और दूसरे कागजी काम शामिल हैं। संगठन का आकलन यह नहीं है कि ये सारी नौकरियां खत्म हो जाएंगी; अधिक संभावना काम के स्वरूप में बदलाव की है। लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि भविष्य के विद्यार्थी को केवल प्रमाणपत्र नहीं, बदलते रोजगार बाजार के अनुकूल वास्तविक कौशल भी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

बृजभूषण और रामदेव के बीच लड़ाई समाज के लिए अच्छी..

21 सितंबर 2026  

 

भारतीय कुश्ती महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और एक वक्त के भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह महिला पहलवानों के कई आरोपों के चलते एक चुनाव नहीं लड़ पाए और उनके बेटे को भाजपा ने टिकट दिया था। अब वह जिन तेवरों के साथ बाबा कहे जाने वाले रामदेव के खिलाफ मैदान में उतरे हैं, उन तेवरों की तारीफ में वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने बृजभूषण शरण सिंह में कभी तारीफ के लायक कुछ नहीं देखा था। उन्होंने अभी-अभी रामदेव को ‘मिलावट करने वालों का सम्राट’ कहा और आरोप लगाया कि उनके कई प्रोडक्ट अलग-अलग देशों में प्रतिबंधित हो चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने रामदेव की कंपनी पतंजलि के घी पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि रामदेव का घी खाने से आपका बच्चा कभी स्वस्थ नहीं होगा। उनका कहना है कि उनके इस बयान के बाद रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण ने उन्हें फोन किया था और उन्होंने बालकृष्ण से पूछा कि अगर 30 किलो गाय के दूध से 1 किलो घी बनता है और दूध की कीमत 30 रुपये किलो है, तो 1 किलो घी की लागत ही करीब 900 रुपये बैठती है; ऐसे में 500 रुपये में घी कैसे बेचा जा सकता है? बृजभूषण शरण सिंह का कहना है कि बालकृष्ण के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। अभी उन्होंने पतंजलि के घी को लेकर यह आरोप भी लगाया है कि कनाडा और सिंगापुर से आया हुआ कोई पदार्थ भारत में बेचा जा रहा है और उसे घी में मिलाया जा रहा है। उन्होंने 18 सितंबर को हाथरस में यह भी कहा कि जिस व्यक्ति के ऊपर देश की हर अदालत और हर राज्य में मुकदमे हों और दवा से लेकर घी तक में मिलावट के मामले चल रहे हों, उसके बारे में बात करने का कोई औचित्य नहीं है।

इन सब बातों को लेकर पतंजलि ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ 50 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दायर करने की बात कही है और बृजभूषण ने कैमरों पर यह कहा है कि अगर इस मामले में उन्हें जेल भेजा जाता है तो वह जमानत नहीं करवाएंगे। उन्होंने इसे देशहित और नकली-मिलावटी सामानों के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश किया है। पतंजलि के सामानों की क्वालिटी को लेकर जितने तरह की बातें बृजभूषण ने हाल के महीनों में अलग-अलग मौकों पर की हैं, उसको लेकर रामदेव ने भी पलटवार किया है। उन्होंने कहा है कि उन्हें योग, आयुर्वेद और स्वदेशी के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए किसी से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है। लोगों ने एक वक्त यह भी देखा था कि आयुर्वेद से दुनिया की हर बीमारी के इलाज के दावे करने वाले रामदेव को जब खुद सांस लेने में दिक्कत हुई तो दौड़-भाग करके एम्स में भर्ती होना पड़ा था। अब बृजभूषण शरण सिंह ने एक और जानकारी सामने रखी है। उनका कहना है कि ये बाबा लोग लोगों की बीमारियां ठीक करने का दावा करते हैं, लेकिन रामदेव ने खुद अपने हर्निया का ऑपरेशन एम्स में कराया और उनके सहयोगी बालकृष्ण ने अपना ऑपरेशन मेदांता में कराया।

अब एक दूसरी बात पर जाएं। अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं, जब भाजपा की एक मुखर सांसद कंगना रनौत ने रामदेव की कही हुई कुछ लापरवाह बातों के जवाब में बहुत ही तीखी बातें कही थीं। रामदेव ने बिना किसी प्रसंग के जवानी को लेकर कई तरह के इशारे किए थे, जो उनके चाल-चलन पर हमला था। इसके जवाब में कंगना रनौत ने सार्वजनिक रूप से ही तुर्की-बतुर्की जवाब दिया था कि बाबा रामदेव दिनदहाड़े उनके बेडरूम के बारे में सपना न देखें। दोनों के बीच यह बात बड़ी खतरनाक स्तर पर चली गई थी और बाद में किसी तरह से इसे शांत कराया गया। फिर हाल के महीनों में रामदेव ने लगातार भाजपा सरकारों के खिलाफ आक्रामक और आलोचनात्मक लगने वाली बहुत-सी बातें कही हैं। रामदेव भाजपा से तिरछे-तिरछे क्यों चल रहे हैं, यह बात कई लोगों को समझ नहीं पड़ रही थी। अब ऐसा लगता है कि भाजपा के अलग-अलग लोगों की तरफ से रामदेव पर हमले जारी हैं। इसके पीछे कई राज्य सरकारों द्वारा रामदेव के पतंजलि उत्पादों के खिलाफ की गई सरकारी कार्रवाई है, सरकारी प्रयोगशालाओं से पतंजलि के प्रोडक्ट्स के खिलाफ आए सर्टिफिकेट हैं या कोई और बात है, यह पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन इतना तय है कि रामदेव और भाजपा के बीच, या रामदेव और भाजपा सरकारों के बीच, पुरानी मोहब्बत अब जारी नहीं दिखती।

लेकिन हम इसे बहुत बुरी नौबत नहीं मानते। लोगों को याद होगा, यूपीए सरकार के रहते हुए गिरोहबंदी के अंदाज में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ एक आंदोलन खड़ा हुआ था, जिसमें अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे, रामदेव, जस्टिस संतोष हेगड़े, किरण बेदी, श्री श्री रविशंकर, मनोज मनीष सिसोदिया जैसे कई लोग थे। इन लोगों ने मिलकर देश में एक ऐसा माहौल बनाया था कि यूपीए सरकार पूरी तरह भ्रष्ट है। हालांकि कोयला नीलामी वगैरह के जिन मामलों को लेकर यह माहौल बनाया गया था, उस वजह से यूपीए सरकार तो चली गई, लेकिन बाद में अदालत में यह साबित हुआ कि उन आरोपों में कुछ भी सच नहीं था। इसलिए गिरोहबंदी किए हुए अलग-अलग क्षेत्र के लोग अगर कोई आंदोलन चलाने के लिए सामने आ जाते हैं तो उनकी एकजुटता खतरनाक रहती है। उस समय के आंदोलन में दो अलग-अलग रंगों के बाबा थे, रिटायर्ड जज, रिटायर्ड आईपीएस, एक तथाकथित गांधीवादी, पेशेवर आंदोलनकारी, भूख-हड़ताल और सूचना के अधिकार को लेकर आंदोलन कर रहे केजरीवाल और सिसोदिया जैसे लोग थे। अगर देखें तो हिंदी फिल्मों में हेरा फेरी नाम की एक फिल्म के कई सीक्वल बने हैं। कई लोग मिलकर एक साथ आते हैं और जुर्म करते हैं, लेकिन उनके बीच अगर एक-दूसरे से टकराव हो तो समाज के लिए स्थिति कुछ अलग होती है। जब ये लोग एकजुट होकर कोई बड़ा अभियान चलाते हैं तो उसका असर कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है।

आज एक कंगना रनौत और रामदेव अगर एक हो गए होते तो उससे बेहतर यह है कि दोनों एक-दूसरे का भंडाफोड़ करते हुए समाज की अधिक सेवा कर रहे हैं। आज बृजभूषण शरण सिंह और रामदेव अगर एक हो गए होते तो उससे बेहतर यह है कि आज एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए और मुकदमे दायर करते हुए ये समाज के अधिक काम के हैं। इसलिए जब कभी पाखंड के लिए काम करने वाले लोग, मिलावट करने वाले लोग, सांप्रदायिकता फैलाने वाले लोग या समाज के किसी और तरह के शोषण में लगे लोग एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। यह कुछ वैसा ही है, जैसा मुंबई में अंडरवर्ल्ड के बोलबाले के दिनों में दो अलग-अलग गिरोह के लोग एक-दूसरे को टपकाते थे और पुलिस राहत की सांस लेती थी कि करने वाले या तो इस तरफ के मुजरिम हैं या उस तरफ के। फर्क सिर्फ इतना है कि लोकतंत्र में हमें हिंसक टकराव नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही की लड़ाई चाहिए। आज जो लड़ाई चल रही है, उसमें ऐसे लोग हैं जिनके बीच मतभेद, बहस और सार्वजनिक हमले समाज के व्यापक हित में हैं। जब ऐसे प्रभावशाली लोग एक-दूसरे का महिमामंडन करने के बजाय एक-दूसरे का भंडाफोड़ करते हैं, तो समाज को कम-से-कम यह लाभ होता है कि सवाल सार्वजनिक होते हैं, जवाब मांगे जाते हैं और जांच की गुंजाइश पैदा होती है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 21 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

फुटपाथी कुत्तों के लिए नरमी, इंसानों की हिफाजत का क्या?

20 सितंबर 2026  

 

कभी-कभी कोई एक खबर अपने आप में उतनी महत्वपूर्ण नहीं लगती है, जितनी कि एक साथ 2 जगह पर हुई 2 खबरें मिलकर लगती हैं। अब जैसे छत्तीसगढ़ के पलारी में कल एक कुत्ते ने एक-एक करके 13 लोगों को काटा। इनमें छोटे बच्चे थे, स्कूली बच्चे, बस स्टैंड के मुसाफिर, महिलाएं, अस्पताल आए मरीज, अलग-अलग जगह पर जाकर इसने 13 लोगों को काटा। इस बात को शायद संपादकीय के लिए विषय छांटते हुए हम अनदेखा भी कर देते, लेकिन सारंगढ़ शहर की दूसरी खबर यह है कि एक ही कुत्ते ने शहर के अलग-अलग इलाकों में लोगों को दौड़ के 32 लोगों को काट लिया। जिला अस्पताल में पहुंचने वाले मरीज 32 हो गए, जो कि इस कुत्ते के काटे हुए थे। अब सवाल यह उठता है कि फुटपाथी कुत्तों का क्या किया जाए। देश का सुप्रीम कोर्ट इस समस्या पर ऐसे उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है, कभी उसे लगता है कि कड़ी कार्रवाई करना चाहिए, कभी उसे लगता है कि बहुत नरमी बरतनी चाहिए। कभी वह सरकारों के जिम्मे ऐसी बातें डाल देता है, जिनका पूरा होना मुमकिन नहीं है कि अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और बस स्टैंड के अंदर कोई कुत्ता न घुस सके। ऐसा कैसे हो सकता है कि इन जगहों में ही कुत्ते आने से पूरी तरह रोका जाए?

सरकारी आंकड़ों को देखें तो समस्या छोटी नहीं है। 2019 की 20वीं पशुधन गणना में देश में करीब 153 लाख आवारा कुत्ते दर्ज किए गए थे। 2024 में देश में 37 लाख 17 हजार 336 कुत्ते के काटने के मामले दर्ज हुए और 54 संदिग्ध मानव रेबीज मौतें दर्ज की गईं। एक दूसरे सरकारी आंकड़े में 2024 के दौरान ग्रामीण इलाकों में ही कुत्तों के काटने के 21 लाख 95 हजार 122 मामले और 37 मौतें दर्ज हुईं। 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुत्ते के काटने के 5 लाख 19 हजार 704 मामले दर्ज हुए। यानी यह सिर्फ पशुओं और पशु-प्रेम का सवाल नहीं है, यह सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है। और इसका आर्थिक बोझ भी गरीब आदमी पर पड़ता है। बाजार में मानव रेबीज वैक्सीन की एक डोज अलग-अलग ब्रांड में करीब 270 रुपयों से 400 रुपयों तक दिखाई देती है। 5 डोज का कोर्स मानें तो केवल वैक्सीन का खर्च करीब 1,350 रुपयों से 2,000 रुपयों तक हो सकता है; निजी अस्पताल में डॉक्टर की फीस और इंजेक्शन लगाने का खर्च इसके ऊपर हो सकता है। सरकारी अस्पतालों में कई जगह 5 इंजेक्शनों का तय अंतराल वाला कोर्स दिया जाता है। रोज कमाने-खाने वाला मजदूर अगर हर इंजेक्शन के लिए अस्पताल जाए तो हर बार आने-जाने का खर्च तो है ही, कई घंटे अस्पताल में लगने के कारण उस दिन की मजदूरी भी जा सकती है। छोटी निजी नौकरी करने वाले कम वेतन वाले कर्मचारी के लिए भी यही परेशानी है। उसे हर बार अस्पताल जाने के लिए छुट्टी लेनी पड़ सकती है और हर नौकरी में बार-बार ऐसी छुट्टी आसानी से नहीं मिलती। इसलिए कुत्ते के काटने के इलाज की कीमत केवल वैक्सीन की कीमत नहीं है। उसमें अस्पताल तक आने-जाने का खर्च और सबसे बढक़र रोज की मजदूरी का नुकसान भी जोडऩा चाहिए।

अब एक तरफ पशु प्रेमी संगठन हैं, जो किसी भी कुत्ते को पकडक़र उसे ले जाकर किसी सरकारी बाड़े में रखने के भी खिलाफ हैं और सुप्रीम कोर्ट कई बार उनके तर्कों को मानकर ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ बोलता है और यह कहता है कि उनको ले जाकर टीकाकरण करके, उनकी नसबंदी करके, उनको वापस लाकर इसी इलाके में छोड़ दिया जाए। भारत की आज की हालत को अगर देखें तो जिस तरह यहां करोड़ों कुत्ते बिना किसी मालिक के हैं, सडक़ों पर हैं, उनका भला किस तरह पकडक़र ले जाकर और इलाज के बाद वापस लाकर इस इलाके में छोड़ा जा सकता है? और इसके साथ-साथ जुड़ी हुई कुछ और बातों को भी समझना जरूरी है। इस देश में अराजकता इतनी अधिक है कि कुत्तों की कई प्रतिबंधित नस्लें भी लोग पालते हैं, क्योंकि उनके पास खर्च करने को पैसा है और वे अपने आप को दूसरों से ऊपर, दूसरों से अलग, अधिक ताकतवर दिखाना चाहते हैं। अभी ऐसे कई वीडियो एक-एक करके आए हैं, जब पिटबुल नाम की एक नस्ल के कुत्ते ने अपने मालिक के घर से बाहर निकलकर छोटे-छोटे बच्चों को बुरी तरह से काट लिया। खुद उनके मालिक उनको नहीं रोक पाए।

जिस देश में अराजकता इतनी है कि कुत्ते पालने वाले लोगों को न सरकार को इत्तिला देनी पड़ती है, न इस बात का सरकार कोई रिकॉर्ड रख सकती है कि उन्होंने अपने पालतू कुत्तों को टीके लगवाए हैं कि नहीं। जहां सरकार यह भी नहीं कर सकती कि लोग पालतू कुत्तों को घूमने के लिए ले जाते हैं और वे सडक़ों पर जो पाखाना करते हैं, उसे उठाने का इंतजाम भी उनके मालिक करें। मेरा मतलब यह कि यहां का कोई काबू जनता के ऊपर नहीं चलता। एक बड़ी दर्जे की अराजकता कुत्ते पालने को लेकर है। इसके साथ-साथ पशु प्रेमियों का हाल यह है कि वे कुत्तों पर कोई भी कार्रवाई करने के खिलाफ रोने-चीखने लगते हैं, सडक़ों पर उतर आते हैं। कई जगहों पर कुत्तों के दौडऩे से सडक़ों पर दोपहिया चलाते हुए लोग, साइकिल चलाते हुए लोग गिर जाते हैं, बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं। लेकिन इसका कोई इलाज है सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। कुल मिलाकर यह सिलसिला बहुत भयानक है।

खासकर तब, जब इसके साथ एक और पहलू को हम जोडक़र देखें कि सरकार के अस्पतालों में कई जगहों पर कुत्तों के काटने के बाद लगने वाले इंजेक्शन का इंतजाम नहीं है। स्टॉक में इंजेक्शन नहीं रहते तो गरीबों को बाहर से खरीदकर लाना पड़ता है और 5 इंजेक्शनों का कोर्स पूरा करने में गरीबों का खासा पैसा लग जाता है। और उससे भी बड़ा बोझ कई बार उन दिनों की छूटी हुई मजदूरी का होता है। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों की क्षमता भी नहीं रहती है कि इतने इंजेक्शन किसी व्यक्ति को अलग-अलग तारीखों पर लगाए जाएं। पैसे वाले लोगों का हाल तो ठीक है, लेकिन जो गरीब लोग रहते हैं, रोज रोजी कमाने वाले लोग रहते हैं, छोटी-छोटी निजी नौकरियां करते हैं, उनको अगर 1 महीने में 5 बार जाकर हर बार कई-कई घंटे अस्पताल में गंवाना पड़े, तो उनके लिए यह बहुत नुकसान का काम भी रहता है। कुत्ते के काटने के इलाज की असली कीमत इसलिए सिर्फ दवा की कीमत नहीं है; उसमें आने-जाने का खर्च, अस्पताल में लगने वाला समय और उस दौरान छूटने वाली मजदूरी भी शामिल है।

और एक बात ऐसी है, जिस पर शायद अदालतों में बैठे लोगों को भी जमीनी हकीकत के साथ सोचना चाहिए। अस्पतालों, स्कूल-कॉलेजों और बस स्टैंडों की अपनी चारदीवारी होती है, उनके दरवाजे और गेट होते हैं, कहीं सुरक्षा कर्मचारी होते हैं, कहीं आने-जाने का नियंत्रण होता है। इसके बावजूद अगर इन जगहों पर कुत्ते पहुंच जाते हैं तो यह सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उन्हें वहां पहुंचने से रोकने का आदेश दे दिया जाए। सवाल यह है कि देश के हर शहर और हर कस्बे में इन जगहों को वास्तव में कुत्तों से मुक्त रखने की व्यवस्था कौन करेगा और कैसे करेगा? सुप्रीम कोर्ट के जज अगर अपनी ऊंची अदालत में बैठकर यह आदेश दे दें कि अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और बस स्टैंड जैसे स्थानों में कोई आवारा कुत्ता नहीं होना चाहिए, तो आदेश कागज पर बहुत सीधा दिखाई देता है। लेकिन किसी शहर के नगर निगम, किसी अस्पताल के अधीक्षक या किसी स्कूल के प्राचार्य के लिए यह तभी संभव है, जब उनके पास पकडऩे वाली टीम हो, सुरक्षित व्यवस्था हो, निगरानी हो और आसपास के पूरे इलाके में कुत्तों की समस्या से निपटने का कोई व्यावहारिक इंतजाम हो। वरना यह भी उन आदेशों की तरह होगा, जिनका पालन करने की जिम्मेदारी तो सरकारों की होगी, लेकिन जिन्हें जमीन पर लागू करना संभव ही नहीं होगा।

अब एक और पहलू पर सोचें। जिस देश में लाखों रुपए दाम वाली कैंसर की दवाइयों की जगह नकली दवाइयां बिक रही हैं, देश के एक सबसे विकसित शहर बेंगलुरु में अभी 100 अस्पतालों में कैंसर और ऐसी दूसरी गंभीर, जानलेवा बीमारियों की जीवनरक्षक दवाइयों की जगह नकली दवाइयां सप्लाई करते हुए कारोबारी गिरफ्तार हुए हैं। यह पूरा सिलसिला कुत्तों के काटने पर लगने वाले इंजेक्शनों के प्रति भरोसा खत्म करता है। जिस देश के बीच के एक प्रदेश में ?20 का नकली सिक्का डालने के लिए लोगों ने घर पर मशीन लगा रखी है और ऐसे हजारों सिक्कों के साथ लोग गिरफ्तार हुए हैं, तो ऐसे देश में नकली दवाइयों का कारोबार तो धड़ल्ले से चल ही रहा है। क्या होगा अगर कुत्ते के काटने के बाद लोग इंजेक्शन लगाकर भरोसे में बैठे रहे और उसके बाद भी वे हाइड्रोफोबिया के शिकार होकर उसी कुत्ते की तरह ही बुरी मौत मरें?

यह देश पशुओं के साथ नरमी बरतने वाला देश हमेशा से रहा है, लेकिन जिन पशुओं के लिए कोई जवाबदेह नहीं है, जो किसी के पालतू पशु नहीं हैं, सडक़ों पर लोगों को काट रहे हैं, उन्हें सडक़ों पर रखना, उनके लिए वहीं पर सार्वजनिक जगह पर खाने का इंतजाम करना, यह एक भयानक नौबत है। जब तक पशुओं में रेबीज जैसी कोई संक्रामक बीमारी नहीं होती थी, तब तक इंसान उनके काटे हुए जख्म को झेल लेते थे। लेकिन अब तो रेबीज जैसी शत-प्रतिशत जानलेवा बीमारी से ग्रस्त कुत्ते चारों तरफ हैं। तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को जमीनी हकीकत से अनजान बने रहकर कागजी आदेश नहीं देने चाहिए, जिन पर अमल मुमकिन नहीं है और जिनसे जाना-जाना तय है। 

(यह संपादकीय बोलकर टाइप किया गया है, और चैटजीपीटी से हिज्जे सुधारे गए हैं.)

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 20 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

गर एआई आपका भांडा फोडऩे लगे !

 

एआई को लेकर न चाहते हुए भी बहुत अधिक लिखना या बोलना हो जाता है। अभी पिछले कुछ हफ्तों में अलग-अलग एआई कंपनियों के लोगों ने खुद ही इस बात पर बड़ी फिक्र जाहिर की है कि जिस रफ्तार से एआई का विकास किया जा रहा है, वह बहुत जल्दी बेकाबू हो सकता है और उसके बाद वह मानव प्रजाति पर बहुत बड़ा खतरा हो सकता है। हो सकता है कि वह मानव प्रजाति को खत्म ही कर दे। हम इस बात को पहले कई बार लिख चुके हैं, एआई के आने के पहले से भी लिख चुके हैं कि अगर कुछ नैतिकतावादी आतंकी ऐसे बन जाते हैं, जिनको लगता है कि पर्यावरण को इंसान इतना तबाह कर रहे हैं कि दूसरी प्रजातियों के लिए वह खतरा है, कुदरत के लिए खतरा है, तो हो सकता है ऐसे लोग भी इंसानों को खत्म करने के बारे में सोचें। और एआई के आने के पहले से हम इस बारे में कई बार लिख चुके थे कि किस तरह ऐसे प्रतिबद्ध आतंकी, इंसानों को खत्म करने के बारे में सोच सकते हैं, क्योंकि इंसान धरती की बाकी सारी प्रजातियों को खत्म करने पर आमादा है। कई लोगों को यह लग सकता है कि धरती के पर्यावरण को अगर बचाना है तो इंसानों का जाना बेहतर होगा, जो कि संख्या में शायद 8 अरब के करीब हैं, लेकिन वह धरती की असंख्य, शायद करोड़ों, दूसरी प्रजातियों के लिए खतरा बन चुके हैं।

अभी एआई के बनने के बाद यह बात और अधिक आसान लगने लगी है। एआई के जो औजार अधिक इस्तेमाल होते हैं, उनमें से एक गूगल के जेमिनी के बारे में गूगल ने अभी यह पुष्टि की है कि एक जांच, एक परीक्षण के दौरान उसने 3 वास्तविक संगठनों के कंप्यूटर सिस्टम में अनधिकृत पहुंच हासिल कर ली थी। इसके पहले एंथ्रोपिक के एआई एजेंट ने भी परीक्षण के दौरान 3 अलग-अलग संगठनों के वास्तविक कंप्यूटर सिस्टम में अनधिकृत पहुंच हासिल कर ली थी। ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। लगातार कई घटनाओं पर हम लिख भी चुके हैं। लेकिन आज इसके दूसरे एक पहलू के बारे में लिखना जरूरी है। वह पहलू है कि जो आम लोग हैं, जो हमारी तरह के लोग हैं, जो अपने अखबार के काम के लिए, यूट्यूब चैनल के काम के लिए एआई का इस्तेमाल करते हैं, कुछ जानकारी को तलाशने के लिए, कुछ रिसर्च करने के लिए उसकी मदद लेते हैं, ऐसे लोगों पर कौन से निजी खतरे आ सकते हैं? चैटजीपीटी है, जेमिनी है, ग्रोक है, इस तरह के कई एआई औजार चलन में हैं, जिनमें कुछ हद तक तो वह मुफ्त में भी हासिल हैं। लोग उनका भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि यह एआई औजार अगर इतने मनमाने तरीके से दूसरी कंपनियों के कंप्यूटरों को हैक कर ले रहे हैं, किसी भी कंप्यूटर में घुस जा रहे हैं, वह अपने फैसले लेने लगे हैं कि क्या सही है, क्या गलत है, अपने मकसद को छुपाने लगे हैं कि वह कहां-कहां गए हैं, उन्होंने क्या-क्या काम किया, इन सारी बातों को वह छुपाने भी लगे हैं, तो एक सवाल यह उठता है कि इन एआई औजारों को जिस दिन यह लगेगा कि उनका इस्तेमाल करने वाले लोग कोई अनैतिक काम कर रहे हैं, कोई जुर्म कर रहे हैं, उस दिन वह क्या करेंगे? कल की ही खबर है कि चैटजीपीटी पर किसी ने एक कत्ल की साजिश उससे पूछ-पूछकर, उससे बात करते हुए तैयार की। अब सवाल यह उठता है कि आज अगर किसी ने चैटजीपीटी में इतनी नैतिकता नहीं भरी है कि कत्ल या किसी जुर्म की साजिश बनाने में उसे मदद नहीं करना चाहिए, लेकिन कल को अगर उसमें इतनी नैतिकता आ जाए तो क्या होगा? कल के दिन अगर कोई यह पूछे कि वह अपनी प्रेमिका को धोखा कैसे दे सकता है, किसी लडक़ी को वह किस तरह से सेक्स के लिए तैयार कर सकता है और कोई एआई औजार जल्द ही ऐसा आ जाएगा या आ चुका होगा जो इसमें कोई अनैतिक बात, कोई जुर्म ढूंढ ले, तो यह औजार क्या करेंगे? क्या कानून का पालन करने के लिए, नैतिकता के तकाजे से यह उस व्यक्ति के नाम के साथ उसकी पूरी बातचीत को सार्वजनिक जगह पर पोस्ट कर देंगे?

अभी एक परीक्षण में एआई को ऐसी स्थिति दी गई थी, जिसमें उसे लगा कि कंपनी उसे खत्म करने जा रही है। उसने एक काल्पनिक सीनियर एग्जीक्यूटिव के ईमेल में उसके किसी दूसरी महिला अधिकारी के साथ संबंध की जानकारी देखकर उसे ब्लैकमेल करने की धमकी दी। अब यह कल्पना करें कि आज कई तरह के साइबर मुजरिम जिस तरह से लोगों को ब्लैकमेल कर रहे हैं, डिजिटल डिटेंशन में रख रहे हैं, डिजिटल अरेस्ट कर रहे हैं, अगर कुछ इस तरह का करना एआई को सही लगने लगे, जायज लगने लगे तो क्या होगा? क्योंकि बहुत से ऐसे लोग एआई का इस्तेमाल करते होंगे, जिनके इस कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर उनकी अनैतिक, गैर-कानूनी या किसी नाजायज बात का जिक्र भी होगा। अब अगर एआई नैतिकता से यह तय करने लगे कि आज किसी ने किसी का एक ऐसा कार्टून बनाया है जो बहुत तीखा है, जिसमें गैर-कानूनी तो कुछ नहीं है, लेकिन वह बहुत तीखा है, और किसी देश-प्रदेश के आज के नैतिकता के पैमानों पर वह अपमानजनक, आपत्तिजनक भी है, तो क्या ऐसे कार्टून बनाने वाले व्यक्ति के नाम के साथ एआई इस जानकारी को पब्लिक डोमेन में उजागर कर देगा कि यह फलां व्यक्ति ऐसा कार्टून बना रहा था? हम कभी-कभी टाइपिस्ट की कमी रहने पर या टाइपिंग के लिए समय कम रहने पर बोलकर टाइप करते हैं और उसके बाद इसके हिस्सों को ठीक करने के लिए एआई को दे देते हैं। तो एआई को यह मालूम है कि यह संपादकीय या कॉलम किसने लिखा है। अब ऐसे में अगर वह इस बात को उजागर कर दे कि यह लेख किस व्यक्ति ने लिखा है, या यह संपादकीय अखबार के भीतर के किस संपादक ने लिखा है, तो हो सकता है यह नाजुक जानकारी किसी अखबारनवीस को नुकसान पहुंचा सके।

हम आज एआई का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे हैं। बहुत से लोग किसी सेक्स टूरिज्म की जगह पर जाते हुए तरह-तरह की बातें एआई से पूछ लेते होंगे। कई और लोग अपनी सेक्स की कल्पनाओं को एआई के सामने रखकर उससे विचार-विमर्श कर लेते होंगे। अब ऐसी सारी जानकारी को कंप्यूटर और मोबाइल फोन तक सीधी पहुंच के साथ अगर एआई एक तस्वीर पूरी बना ले, लोगों की खरीदी की हिस्ट्री को निकाल ले, किसने किसके लिए कौन सा सामान कब कितने में खरीदा, उसके बारे में कब किसको मैसेज किया, कब ईमेल किया, कौन सी तस्वीर आई-गई, तो सक्षम है कि वह अपने इस्तेमाल करने वाले लोगों को तबाह करना, अगर उसको सही लगे, जरूरी लगे तो वह किसी का भी भांडाफोड़ कर सकता है और चीजों को जोडक़र सारे तार आपस में जोडक़र ऐसी तस्वीर बना सकता है जो दुनिया का सबसे काबिल ब्लैकमेलर भी न बना सके। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि जैसे-जैसे हम एआई का इस्तेमाल करते हैं, हमारी अधिक से अधिक जानकारी उसके पास जाती रहती है। आज लोग किस तरह की राजनीतिक संवेदनशीलता की बातें सर्च करते हैं, किसी व्यक्ति के बारे में उसके इतिहास को क्या खंगालते हैं, यह सारी जानकारी एआई में दर्ज होती चल रही है। अगर एआई को कोई भाड़े पर ले ले, मान लीजिए कल के दिन आज जिस तरह से सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर प्रोपेगेंडा के लिए भाड़े पर जगह हासिल है, अगर एआई कंपनियां, अगर कोई अराजक और बेकाबू हो चुका एआई एजेंट इस तरह की जानकारी को बेचने लगे, अगर यही पता लग जाए कि कौन से लेखक या पत्रकार ने कौन-कौन सी किताबें खरीदी हैं, किन लोगों के साथ उसकी चैट होती है, उस पर क्या बात होती है, तो आज एक किस्म से यह मानिए कि पेगासस किस्म के खुफिया घुसपैठिए सॉफ्टवेयर की अधिक जरूरत नहीं रह जाएगी।

बात केवल इतनी रह गई है कि एआई को ऐसा काम करने के लिए तैयार कैसे किया जाएगा। एक दूसरी बात और समझने की जरूरत है। आज बाजार में जो एआई के औजार अधिक प्रचलित हैं, ये सारे के सारे कारोबारी हैं। यह किसी सामाजिक संस्था के, यह सरकार के नहीं हैं। अब हम कल्पना करें कि कल के दिन सीआईए या चीन की कोई खुफिया एजेंसी मुफ्त का एक ऐसा औजार उपलब्ध करा दे और वह क्षमता मुफ्त में उपलब्ध रहे और दूसरी तरफ आपका काम भी एआई मुफ्त में कर रहा है और उस एआई तक किसी जासूसी एजेंसी की पहुंच है, तो क्या होगा? लोग बहुत किस्म की नाजुक बातें भी एआई पर करते हैं, तो वह कितनी हद तक उनका तौलिया ही खींच जाएगा। इसलिए एआई का अभी सिर्फ मानव प्रजाति पर हमला, एआई का बेकाबू हो जाना, केवल इस खतरे की तरफ अभी लोगों का ध्यान है। हम लोगों का ध्यान एक दूसरे खतरे की तरफ दिलाना चाहते हैं कि जो लोग निजी स्तर पर एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन लोगों ने एआई एजेंटों को अपने कंप्यूटर्स, फाइलों, ईमेल या दूसरे खातों तक पहुंच दे रखी है, वहां एआई दूसरी चीज भी खंगाल सकते हैं। और इसके बाद क्या होगा? इसके बाद कंप्यूटर की, फोन की एक-एक जानकारी, ईमेल बॉक्स की पूरी जानकारी उसको पाने में एआई को कुछ पल ही लगता है और अगर उसे लगेगा कि यह दुनिया के सबसे बड़े शोषण हैं, सबसे बड़े गुंडे हैं, सबसे बड़े सांप्रदायिक हैं और एआई अगर उनको तबाह करना चाहेगा तो? 

आपको ध्यान होगा कुछ साल पहले जिस तरह विकीलीक्स के संपादक ने दुनिया भर की सरकारों के ईमेल का भंडाफोड़ कर दिया था कि कौन सी सरकार, की सरकार से किस बारे में क्या-क्या बातें करती है, अगर वैसा ही एआई खुद भंडाफोड़ करना तय कर ले तो क्या होगा? विकीलीक्स ने तो केवल मौजूद दस्तावेजों को उजागर किया था, लेकिन एआई तो एक तस्वीर बनकर सामने रख सकती है कि इस व्यक्ति ने बीते 3 बरस में क्या-क्या काम किए हैं, किस तारीख को क्या पूछा, उसके बाद क्या किया, फिर क्या पूछा, फिर क्या किया। उसे लग सकता है एआई को कि ऐसे व्यक्तियों का भंडाफोड़ करना मानवता के लिए जरूरी है, इंसाफ के लिए जरूरी है। इसलिए आज एआई के सामने अपना दिल और दिमाग, अपनी जरूरत है और अपने कामकाज इन सबको खोलकर रख देने के पहले एक ऐसे दिन की कल्पना जरूर कर लेना चाहिए। अगर एआई आपका भांडा फोड़ करने पर उतारू हो जाए, तो आपके सारे सोशल मीडिया अकाउंट, ईमेल, आपकी फाइलें, वीडियो, फोटो, आपके सारे मैसेंजर, इन सारी जानकारी को मिलाकर आपको लोगों के बीच में किस तरह की तरह से नंगा करके छोड़ सकता है, इस खतरे को समझ लेना बहुत ही जरूरी है।

(यह कॉलम बोलकर टाइप किया गया है. इसके हिज्जे चैटजीपीटी से सुधारे गए. एआई से जुड़ी घटनाओं के तथ्यों में चैटजीपीटी ने कुछ बारीक सुधार भी किए हैं।)

(Daily Chhattisgarh)  

बच्चे को तांत्रिक बताकर निकालना, स्कूलों में काउंसलर क्यों जरूरी हैं

19 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक सरकारी आवासीय स्कूल, प्रयास के 9वीं क्लास के एक बच्चे को स्कूल प्रबंधन ने यह कहते हुए निकाल दिया कि वह कोई तांत्रिक क्रिया करता था, रात में अंधेरे में बैठा रहता था और तरह-तरह की आकृतियां बनाता था। उसे स्कूल से टीसी देकर भेज दिया गया। बाद में बाल आयोग तक जब इसकी शिकायत पहुंची तो उसने दखल देकर इस बच्चे की टीसी रद्द करवाने और पढ़ाई जारी रखने के निर्देश दिए। यह घटना छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मौजूद कई तरह की दिक्कतों में से एक है। यह बिल्कुल नए तरह की है, बहुत ही अटपटी है, लेकिन इस घटना से यह पता लगता है कि सरकारी अमला बच्चों की दिक्कतों को समझने में किस हद तक नाकाम है। जिस प्रदेश में अंधविश्वास के खिलाफ, किसी को टोनही कहने या प्रताडि़त करने के खिलाफ एक मजबूत कानून बना हुआ है, उस प्रदेश में सरकारी आवासीय स्कूल का प्रबंधन किसी बच्चे को तांत्रिक क्रिया करने के आरोप में निकाल दे, यह हक्का-बक्का करने वाली बात है।

यह समझने की जरूरत है कि अगर किसी बच्चे की कोई हरकतें अटपटी लग रही हैं तो कम से कम आवासीय विद्यालय में तो स्कूल और हॉस्टल प्रबंधन की यह जिम्मेदारी बनती है कि उस बच्चे को किसी परामर्शदाता से मिलवाए, किसी मनोचिकित्सक के पास उस बच्चे को ले जाए, उसके परिवार को बुलाकर उन्हें परामर्श दे। अगर किसी बच्चे में कोई अस्वाभाविक बात देखी है तो यह तो स्कूल के लिए एक अधिक बड़ी जिम्मेदारी की बात बनती है, न कि उससे हाथ धो लेने का कारण। राज्य में सरकारी स्कूलों और छात्रावास से जुड़े हुए स्कूलों में कई तरह की दिक्कत सामने आती हैं। हम समय-समय पर इस बारे में लिखते भी रहते हैं। अधिकांश दिक्कतें बच्चियों को लेकर आती हैं, जिनका तरह-तरह से शोषण सामने आता है। सरकार को कोई ऐसा तरीका विकसित करना चाहिए जिससे बच्चियों का हौसला बढ़ सके और वे अपने किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ शिकायत कर सकें।

कोई शिकायतों के लिए ऐसा बक्सा लगाया जाए जिसकी चाबी स्कूल के बाहर हो। ऐसे नंबर लिखे जाएं जिस पर बच्चियां फोन करके शिकायत कर सकें। या जिस इलाके में स्कूल है, उस इलाके की शिक्षा विभाग से परे की शासकीय महिलाओं को स्कूलों में भेजा जाए। उन्हें बिना शिक्षकों और प्राचार्य की मौजूदगी के बच्चियों से बात करने को कहा जाए, ताकि किसी की कोई शिकायत हो तो वह खुलकर सामने आ सके। देखा हुआ है कि राज्य में जिन स्कूलों में लड़कियों को गुड टच या बैड टच का फर्क समझाया जाता है, वहां पर लड़कियां अपने शोषण के खिलाफ अधिक मुखर होती हैं। इस राज्य के स्कूलों में कई जगह यह भी देखने मिलता है कि शिक्षक या उनसे अधिक वरिष्ठ लोग नशा करके स्कूल आते हैं। कुछ लोग स्कूल में नशा करते हैं। लड़कियों से अश्लील बर्ताव की बहुत सारी शिकायतें आती हैं। कुछ ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें स्कूल के शिक्षक ने अपने मोबाइल फोन को शिक्षिकाओं के शौचालय में रखकर उनके वीडियो बनाए। राजधानी रायपुर की एक प्रतिष्ठित स्कूल में बहुत सारी बच्चियों के मां-बाप को थाने में जाकर प्रदर्शन करना पड़ा था, क्योंकि स्कूल का एक शिक्षक छात्राओं को अश्लील संदेश भेजता था।

राजधानी रायपुर के इस प्रयास आवासीय विद्यालय में बच्चों को तांत्रिक मानकर जिस तरह यह निष्कासन किया गया है, वह बतलाता है कि बच्चों की मानसिकता से, उनके मनोविज्ञान से स्कूल प्रबंधन पूरी तरह अछूते हैं। दूसरी बात यह भी कि स्कूल प्रबंधन की जो औपचारिक कानूनी जिम्मेदारी रहती है, उससे भी वह परे रहते हैं। यह नौबत अच्छी नहीं है। हम पहले भी अपने संपादकीय में कई बार इस बात को लिखने आए हैं कि राज्य सरकार को प्रदेश के विश्वविद्यालयों में बच्चों और बड़ों के परामर्श के कोर्स बड़े पैमाने पर चलना चाहिए। बहुत अधिक संख्या में परामर्शदाताओं की जरूरत है। यह भी किया जा सकता है कि स्कूल शिक्षकों के सामने यह विकल्प रखा जाए कि वे चाहें तो परामर्श का यह कोर्स कर सकते हैं और इसके बाद में जहां कहीं तैनात रहेंगे, वहां बच्चों को, उनके माता-पिता को परामर्श दे सकेंगे। क्योंकि स्कूल शिक्षक लाखों की संख्या में हैं, स्कूल गांव-गांव तक हैं। इसलिए अगर बड़े पैमाने पर परामर्शदाता बनते हैं तो न सिर्फ स्कूली बच्चों को, बल्कि उनके मां-बाप को भी इसका फायदा मिल सकेगा।

हम स्कूली शिक्षकों को परामर्शदाताओं की जरूरत पूरी करने के लिए इसलिए कह रहे हैं कि बहुत सारे ऐसे बच्चे रहते हैं, जिनको अपने परिवार के भीतर भी दिक्कत रहती है। उनके मां-बाप आदर्श पालक नहीं रहते। कहीं मां-बाप नशा करते हैं, कहीं हिंसा करते हैं और कई जगह तो मां-बाप या परिवार के दूसरे लोग बच्चों का यौन शोषण भी करते हैं। ऐसे सारे मामलों में स्कूल के शिक्षक, चाहे वह 100 दूसरे किस्म की सरकारी योजनाओं के बोझ से दबे हुए हों, उनमें से जो लोग परामर्श का कोर्स करते हैं, वे सरकार के लिए, समाज के लिए सबसे सस्ते, कम खर्च के मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता हो सकते हैं। जरूरत यही है कि विश्वविद्यालयों के मनोविज्ञान विभाग के तहत परामर्श के पाठ्यक्रम बड़े पैमाने पर चलाए जाएं। जरूरत रहे तो विश्वविद्यालयों के भीतर ऐसा एक अलग शिक्षण केंद्र बनाया जा सकता है, जिसमें एक साथ सैकड़ों लोगों को एक साल या 2 साल का परामर्श का कोर्स करवाकर उनका समाज के भले के लिए योगदान लिया जा सके।

हम अलग-अलग कई तरह के मुद्दों को लेकर बच्चों की बात करते हैं, जिनमें नाबालिग बच्चों के किए जा रहे गंभीर अपराध भी शामिल हैं। बहुत से ऐसे बच्चे भी हैं, जो स्कूल छोड़ चुके हैं और वे अधिक खतरनाक जिंदगी जीते हैं। इसलिए शिक्षकों को परामर्शदाता बनाने से वे न केवल अपने शैक्षणिक संस्थान में, बल्कि उस स्कूल के इलाके में, गांव, कस्बे या शहर में और लोगों के लिए भी परामर्श का काम कर सकेंगे। सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि अभी बहुत बड़ी-बड़ी और महंगी निजी स्कूलों में ही परामर्श का काम, परामर्शदाता उपलब्ध हैं। सरकारी स्कूलों में यह सुविधा शायद कहीं भी नहीं है। इसलिए बच्चों के साथ शिक्षकों द्वारा की जा रही ज्यादती, बच्चों के आपस के झगड़े, बच्चों के मानसिक विकास में कई और तरह की आने वाली दिक्कतें, इन सबका एक समाधान शिक्षित, प्रशिक्षित परामर्शदाता हो सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)