नेता से असहमति को राजद्रोह करार देना कलंक की बात है...

  31 अक्टूबर 2021

 

भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच हमेशा कुछ बवाल खड़ा करता है। अभी ऐसे मैच के स्टेडियम से एक पाकिस्तानी खिलाड़ी की फोटो आई है जिसने पाकिस्तानी टीम की जर्सी पहनी हुई है, और उस पर धोनी का नाम लिखा हुआ है। जाहिर है कि वह धोनी का फैन है, और अपनी पसंद जाहिर कर रहा है। अब तक उसके खिलाफ किसी जुर्म दर्ज होने, या उसकी गिरफ्तारी की बात सामने नहीं आई है, लेकिन पाकिस्तान में भी ऐसा हो सकता है। हिंदुस्तान में तो ऐसे हर मैच के बाद में दो चार जगहों पर कहीं पटाखे फूटते हैं तो कहीं कोई खुशी मनाते हैं तो उसके बाद उनके खिलाफ जुर्म दर्ज होता है। अभी उत्तर प्रदेश में आगरा में कुछ कश्मीरी छात्रों ने भारत-पाकिस्तान मैच के बाद खुशी मनाई तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उनके खिलाफ राजद्रोह के आरोप में जुर्म दर्ज किया जाएगा। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के एक भूतपूर्व जज दीपक गुप्ता ने एक इंटरव्यू में दिलचस्प बातें कही हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारतीय टीम को हराने के बाद पाकिस्तानी टीम की जीत का जश्न निश्चित रूप से राजद्रोह का अपराध नहीं है। उन्होंने कहा यह सोचना भी हास्यास्पद है कि यह राजद्रोह के बराबर है। ऐसी खुशी मनाने वालों पर आरोप लगाने के लिए कुछ दूसरी धाराएं हैं, और राजद्रोह के आरोप अदालत में टिक नहीं पाएंगे, इससे समय और जनता का पैसा दोनों बर्बाद होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह जरूरी नहीं है कि हर कानूनी काम अच्छा और नैतिक हो या सभी अनैतिक और बुरे काम गैरकानूनी हों। उन्होंने इस बात पर राहत जाहिर की कि हिंदुस्तान कानून के शासन से चल रहा है, न कि नैतिकता के नियम से. वे बोले-समाज के अलग-अलग धर्मों, और अलग-अलग समय में नैतिकता के अलग-अलग मतलब होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के एक भूतपूर्व जज का यह कहना मायने इसलिए रखता है कि उन्होंने पहले भी कई बार सार्वजनिक रूप से भारत के राजद्रोह कानून की व्याख्या की है और उन्होंने यह भी कहा है कि अब समय आ गया है कि राजद्रोह की धारा की संवैधानिकता को दी गई चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट को कदम उठाना चाहिए, और साफ साफ शब्दों में कहना चाहिए कि यह कानून वैध है, या अवैध है, और इसकी सीमाएं क्या हैं जो इसे इतना कड़ा बनाती हैं। उन्होंने कहा कि यह अंग्रेजों के समय का बनाया गया कानून है जिसे खत्म किया जाना चाहिए। इस मौके पर यह याद रखने की जरूरत है कि भारत के आज के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा ने भी राजद्रोह के कानून के इस प्रावधान को जारी रखने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा था कि स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी राज के दौरान पेश किया गया कानून आज के संदर्भ में आवश्यक नहीं हो सकता। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में एक चुनौती सुनी भी जा रही है।

हिंदुस्तान में ना केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकारें भी असहमति को दबाने के लिए बार-बार राजद्रोह के कानून का इस्तेमाल करती हैं। किसी सरकार से असहमति लोकतंत्र में एक आम बात रहनी चाहिए, और इससे लोकतंत्र के साथ-साथ सरकार को भी संभलने का और विकसित होने का मौका मिलता है। लेकिन हकीकत यह है कि अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों की बहुत सी सरकारों ने राजद्रोह के कानून का बेजा इस्तेमाल किया है. जिस तरह आपातकाल के दौरान इंदिरा इज इंडिया का नारा लगाया गया था, उसी तरह आज कहीं कोई मोदी को हिंदुस्तान मान लेते हैं, तो कहीं किसी राज्य में किसी मुख्यमंत्री को ही राज्य मान लेते हैं, और उनकी आलोचना पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज हो जाते हैं। जैसा कि जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा है ऐसे मामले अदालत में टिकते नहीं है लेकिन राजद्रोह के मामले में क्योंकि जमानत मिलने में दिक्कत होती है इसलिए जमानत होने तक की जेल को सत्ता एक सजा की तरह लोगों को दिखा देती है, ताकि बाकी लोगों की असहमति उनकी जुबान पर न आ सके, या उनकी कलम से न निकल सके। सरकारों का राजद्रोह के कानून का इस्तेमाल ऐसा अंधाधुंध है कि जिस पर चाहे उस पर यह कानून लगाकर उसे जेल में डाल दिया जाता है। लेकिन जब अदालतें इस कानून के इस्तेमाल को गलत पाती हैं, और लोगों को महीनों बाद या बरसों बाद जेल से छूटने का मौका मिलता है, तो उस वक्त अदालतें सरकारों पर जुर्माना और हर्जाना नहीं लगाती हैं कि जिसकी जिंदगी का इतना वक्त जेल में गया है, उसे सरकार हर्जाना दे, और इस बात को अदालतें अफसरों के रिकॉर्ड में दर्ज भी नहीं करवाती हैं कि उन्होंने बदनीयत से ऐसे मामले दर्ज किए थे, फिर चाहे वे उन्हें हांकने वाले नेताओं के दबाव में ही क्यों ना दर्ज किए गए हो।

हिंदुस्तान में लोकतंत्र की समझ लगातार कमजोर होते चल रही है, और ऐसी कमजोर समझ के देश में लोगों को आसानी से इस बात पर से सहमत कराया जा सकता है कि सत्ता से असहमति देश से असहमति है, या किसी सत्तारूढ़ नेता से असहमति देश के खिलाफ बगावत है। यह सिलसिला खत्म करने की जरूरत है और सुप्रीम कोर्ट को बिना देर किए हुए इस मामले की सुनवाई करके राजद्रोह के इस कानून को, या इसकी अधिक बेजा इस्तेमाल हो रही धाराओं को खत्म करना चाहिए। कहने के लिए तो केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार कहा है कि उसने गैरजरूरी हो चुके कानूनों को खत्म करने का अभियान छेड़ा हुआ है, और ऐसे सैकड़ों कानून खत्म किए गए हैं, लेकिन आज इस राजद्रोह कानून का सबसे अधिक बेजा इस्तेमाल अदालतों में जाकर साबित भी हो रहा है, इस कानून को, राजद्रोह कानून की धाराओं को खत्म किया जाना चाहिए। यह अदालती फैसला आने के पहले भी लोगों को सजा देने की नीयत से, कैद में रखने की नीयत से इस्तेमाल किया जा रहा है, यह लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है, इनसे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, और सुप्रीम कोर्ट को इसे प्राथमिकता के साथ सुनना चाहिए, और जो सरकारें, जो अफसर इसका बेजा इस्तेमाल करते हुए मिलते हैं, उनके रिकॉर्ड में ऐसे काम दर्ज भी होने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

एमपी के विधायक के लिए वेटिकन से आयी निराशा

 31 अक्टूबर  2021


मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा आज बड़े निराश होंगे। कल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेटिकन जाकर पोप से मुलाकात की तस्वीरें चारों तरफ छाई हुई हैं, और खुद प्रधानमंत्री के ट्विटर और फेसबुक जैसे पेज लगातार इन तस्वीरों को पोस्ट कर रहे हैं। वे पोप से गले मिल रहे हैं, उनके गाल से गाल सटा रहे हैं, और बाइबल को उठाकर सिर पर रख रहे हैं। यह एक अलग बात है कि हिंदुस्तान में गोवा में चुनाव होने जा रहे हैं जहां ईसाई बहुतायत है, लेकिन रामेश्वर शर्मा को इस वजह से भी राहत मिलने वाली नहीं है। अभी कुछ ही समय तो हुआ है जब उन्होंने एक कार्यक्रम में वीडियो कैमरे के सामने कहा था कि हिंदुओं को फादर और चादर से दूर रहना चाहिए। फादर तो जाहिर है ईसाई के लिए कहा जाता है, और चादर जाहिर है कि मुस्लिम महिलाओं के ओढ़ने के कपड़े को कहा जाता है। उन्होंने दशहरा के कार्यक्रम में मंच से भाषण देते हुए कहा था कि फादर और चादर तुम्हें बर्बाद कर देंगे, यह पीर बाबा तुम्हारे मंदिर जाने में बाधा हैं, पीरों को पूजने वालों को कह दो कि तुम जमीन में दफन करने में भरोसा रखते हो, और हम दुनिया को जलाने वालों पर भरोसा रखते हैं, जो बजरंगबली हैं. इस तरह की बहुत सी बातें वह हिंदुत्व को लेकर अपनी हमलावर सोच के तहत करते रहते हैं, इसलिए उनका यह हक भी बनता है कि पोप से इस तरह गले मिलते, लिपटते नरेंद्र मोदी को देखकर वह निराश हो जाएं।

लेकिन ऐसे विधायक की ऐसी बातों को छोड़ भी दें तो भी लोगों का धर्म से जुड़े लोगों के बारे में तजुर्बा बड़ा गड़बड़ रहता है। अभी जाने-माने फिल्म निर्देशक प्रकाश झा की एक वेब सीरीज 'आश्रम' की शूटिंग के दौरान मध्यप्रदेश में बजरंग दल ने प्रकाश झा पर हमला किया, क्योंकि यह वेब सीरीज 'आश्रम' नाम वाली है, और इसमें किसी बाबा के कुकर्मों का जिक्र है। जब इस हमले की खबर चारों तरफ फैली तो लोगों ने सोशल मीडिया पर बजरंग दल से पूछा कि अगर हमला ही करना था तो आसाराम और राम रहीम जैसे बाबाओं के आश्रम पर क्यों नहीं किया जो कि बलात्कार ही कर रहे थे, और आश्रम में ही कर रहे थे। अब अगर ऐसे आश्रमों वाले देश में आश्रम पर एक वेब सीरीज बन रही है तो उस पर हमले से क्या सुधरेगा? खैर धर्म के कुकर्मों की बात कोई नई नहीं है, और आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का एक मकसद यही है कि टेक्नोलॉजी दुनिया में एक ऐसा काम करने जा रही है जिससे कि हो सकता है धर्म के कुछ कुकर्म कम हो जाएं।

जर्मनी में अभी कुछ ईसाई चर्चों में एक रोबो पादरी का इस्तेमाल शुरु हुआ है जो कि अलग-अलग 5 भाषाओं में बाइबल के प्रवचन पढ़ सकता है, नसीहत में दे सकता है, आशीर्वाद दे सकता है, और धार्मिक संस्कार करवा सकता है। आज से 500 बरस पहले ईसाई धर्म में यूरोप भर में मार्टिन लूथर ने एक सुधारवादी आंदोलन शुरू किया था, और उसके 500 बरस पूरे होने के मौके पर यह रोबो प्रयोग के तौर पर कई चर्चों में इस्तेमाल किया जा रहा है। जाहिर है कि चर्च जाने वाले लोगों की प्रतिक्रिया इस पर मिली-जुली हो सकती है, लेकिन चर्च के ढांचे के भीतर काम करने वाले पादरियों में इसे लेकर बेचैनी है। उन्हें लग रहा है कि उनके पेट पर लात पड़ने वाली है और उनका रोजगार छिनने वाला है। हालांकि हकीकत यह है कि पूरे यूरोप में पादरियों की कमी चल रही है, और चर्चों में धार्मिक संस्कार कराने को वे कम पड़ रहे हैं। ऐसे में यह पादरी रोबो 5 भाषाओं में संस्कार भी करवा सकता है, और जब हाथ उठाकर आशीर्वाद देता है तो उससे प्रकाश की किरण भी निकलकर श्रद्धालुओं पर पड़ती है। हालांकि यह पूरी तरह मौलिक प्रयोग नहीं है क्योंकि कुछ बरस पहले चीन के एक बौद्ध मंदिर में एक रोबो भिक्षु का उपयोग शुरू किया गया था, जो कि मंत्र पढ़ता था, और धर्म की बुनियादी बातों को बोलता था।

अब यह रोबो जब तक किसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ना हो जाए, और जब तक जिंदा पादरियों से यह कुछ बुरी बातें सीख न ले, तब तक तो यह भक्त जनों के लिए अच्छा साबित हो सकता है, क्योंकि आज दुनिया भर के चर्चों में पादरियों को बच्चों के यौन शोषण के आरोप झेलने पड़ रहे हैं. यूरोप के विकसित लोकतंत्रों में ऐसी घटनाएं लाखों में हुई हैं, यह बात खुद चर्च द्वारा करवाई गई जांच में सामने आई है न कि किसी चर्च विरोधी के लगाए गए आरोपों में। इसलिए फिलहाल तो ऐसे रोबो पादरियों से यह खतरा नहीं है कि वे बच्चों का यौन शोषण भी करेंगे लेकिन हो सकता है कि कभी इन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दिया जाए, और उसके बाद ये असल पादरियों से सभी तरह की बातों को सीखें, और तब जाकर ये बच्चों के लिए खतरनाक भी साबित हो सकते हैं। लेकिन फिलहाल इससे चर्च के भक्तों के बच्चों को एक सुरक्षित धार्मिक माहौल मिल सकता है।

अभी चर्च से जुड़े हुए पहलुओं में यह बहस चल रही है कि क्या धार्मिक संस्कारों का इस तरह मशीनीकरण करना ठीक है? अब हिंदुस्तान में अगर देखें तो यहां बहुत से हिंदू मंदिरों में बिजली की मशीनों से चलने वाले नगाड़े और ढोल मंजीरे इस्तेमाल होने लगे हैं, जो कि बिना भक्तों के भी अकेले पुजारी शुरू कर लेते हैं, और माहौल बन जाता है। हालांकि अभी पुजारी का विकल्प किसी रोबो में सामने नहीं आया है, लेकिन ढोल-मंजीरा बजाने वाले भक्तों का विकल्प तो मशीन में आ गया है। अब धीरे-धीरे यह भी हो सकता है कि जिस तरह किसी कॉमेडी शो में टीवी प्रसारण के पहले हंसने की आवाज, खिलखिलाने की, और तालियों की आवाज जोड़ दी जाती है, उसी तरह धर्म स्थलों में भी भक्तों की आवाजें जोड़ दी जाएं ताकि कम रहने पर भी वह बाहर से भक्तों की अधिक संख्या का झांसा दे सके। इसमें बुराई कुछ नहीं है क्योंकि धर्म कुल मिलाकर बहुत से लोगों को वैसे ही झांसा देता है, और अगर यह एक और झांसा देकर अधिक भीड़ का नजारा पेश करने लगे तो भी वह कोई पहला झांसा नहीं रहेगा।

अब वेटिकन गए हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पोप को भारत आने का न्योता दिया है, और ऐसी कोई वजह नहीं है कि पोप भारत ना आएं क्योंकि यहां बड़ी संख्या में ईसाई आबादी है, और बड़ी संख्या में और लोगों को भी ईसाई बनाया जा सकता है, या कि वह बन सकते हैं, क्योंकि आज के उनके धर्म में उन्हें पावों का दर्जा देकर रखा गया है, और हो सकता है कि चर्च में उन्हें चर्च में थोड़ी बराबरी का मौका मिल जाए। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री की पार्टी पूरे देश में जगह जगह हिंदुओं के धर्मांतरण का जो आरोप लगाती है और जो जाहिर तौर पर चर्च पर लगाया जाता है, उसके मुखिया पोप का हिंदुस्तान आना कैसा माना जाएगा? खैर अगले कुछ बरस तो पोप को बुढ़ापे में भी दुनिया भर का दौरा करना पड़ेगा, और उसके बाद एक विकसित हो रही नई तकनीक मेटावर्स की मेहरबानी से लोग होलोग्राम की शक्ल में दुनिया में कहीं भी पहुंच सकेंगे, और वहां पर लोगों के बीच बैठकर किसी कार्यक्रम में शामिल भी हो सकेंगे। उस दिन हो सकता है कि पोप को हिंदुस्तान न आना पड़े, और उनके होलोग्राम से गले मिलकर मोदी उसका स्वागत कर सकें, या फिर यह भी हो सकता है कि मोदी का होलोग्राम जाकर पोप के होलोग्राम का गले लगकर स्वागत कर सके। और होलोग्राम आकर, जाकर स्वागत करेगा, तो उससे फादर से दूर रहने का मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक का फतवा भी निभा जाएगा क्योंकि मोदी को पोप से सीधे गले नहीं मिलना पड़ेगा। फिलहाल तो धर्म में टेक्नोलॉजी के उपयोग को लेकर लोगों के बीच उत्सुकता से भरी जो बहस है जर्मनी से शुरू हुई है, उसे देखना चाहिए।

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर 2021


 

सरकारी दफ्तरों को कागजों में फंसाकर जनता की जिंदगी बर्बाद करना बंद करना चाहिए

 30 अक्टूबर 2021

 

केंद्र सरकार के बारे में एक खबर यह आई है कि वह लालफीताशाही और नौकरशाही को घटाने के लिए केंद्र के सचिवालय और मंत्रालय में कोई ऐसी प्रक्रिया लागू कर रही है, जिससे एक फाइल चार अफसरों से अधिक के हाथों तक ना जाए। आज देशभर में अलग-अलग सरकारों में, अलग-अलग सरकारी दफ्तरों में हालत यह रहती है कि एक-एक फाइल बहुत से कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच घूमते रहती है, और जिनका सरकार से वास्ता पड़ता है वे हिंदी के एक बड़े तकलीफदेह सीरियल, ऑफिस-ऑफिस की तरह तकलीफ पाते रहते हैं। अभी इस खबर से हमें केंद्र सरकार के कामकाज में क्या फर्क पड़ेगा यह तो समझ नहीं आ रहा, लेकिन सरकारी दफ्तरों से जिनका वास्ता पड़ता है वे जानते हैं कि वहां बैठे हुए लोगों की दिलचस्पी कागजों को अधिक से अधिक लटकाने और घुमाने में रहती है ताकि थके-हारे लोग खुद होकर रिश्वत की बात करें ताकि काम जल्दी निपट जाए। पर जब लोग इस इशारे को भी नहीं समझते हैं, तो सरकारी अमला खुलकर उन्हें बतलाता है कि इस कागज पर जब तक कुछ नहीं रखोगे, वह उड़ जाएगा, इसलिए कागज पर कुछ रखो। और इस वसूली के चक्कर में सरकारी अमला इतने गैरजरूरी कागजों को मांगता है कि जिन्हें जुटाने में लोग थक जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने रिटायर हुए मुख्य सचिव अरुण कुमार के पीछे लग जाने पर मजबूरी में उन्हें एक काम दिया था, और अपनी पूरी नौकरी काम न करने के लिए जाने जाने वाले अरुण कुमार को उन्होंने प्रशासनिक सुधार कमेटी का चेयरमैन बना दिया था, ताकि 1 बरस उनकी सहूलियतें जारी रहें। आसपास में काम करने वाले लोगों का अरुण कुमार का तजुर्बा यह था कि उनके चेंबर में फाइलें जाती थीं। लेकिन वहां से वापस नहीं आती थीं। ऐसे व्यक्ति को प्रशासनिक सुधार का जिम्मा देकर सरकार ने उससे साल भर के लिए पीछा तो छुड़ा लिया था, लेकिन उससे न कुछ और होना था, और न हुआ। पूरे देश की सरकारों को और दूसरे सरकारी संगठनों, संस्थाओं के दफ्तरों को अपने कामकाज को घटाने की जरूरत है, लेकिन सवाल यह है कि रिश्वत की संभावनाओं को घटाने की यह सलाह दे कौन, और उसे माने कौन?

दुनिया के विकसित और परिपक्व लोकतंत्रों में सरकारों के कागजात देखें, तो उन में लिखा रहता है कि किसी फार्म को भरने में अमूमन कितना वक्त लगेगा। हिंदुस्तान से अमेरिका जाने वाले लोग जब वीजा फार्म भरते हैं, तो उसमें वहां की सरकार ने कोशिश करके कम से कम जानकारी मांगने का काम किया है। ऐसा सभ्य लोकतंत्रों में सभी सरकारी कागजात में होता है। हिंदुस्तान में इसके ठीक उल्टे लोगों को हर सरकारी अर्जी के साथ इतने किस्म के कागज लगाने पड़ते हैं, जो कि उसी सरकारी दफ्तर में पहले से जमा रहते हैं, या उसी सरकारी दफ्तर के जारी किए हुए रहते हैं। किसी विश्वविद्यालय में परीक्षा की अर्जी भरने पर उसी विश्वविद्यालय की पुरानी अंक सूचियों को लगाना पड़ता है जो कि उसी विश्वविद्यालय में जमा हैं, वहीं से बनाई हुई हैं। अब तो तमाम काम का कंप्यूटरीकरण हुए बरसों गुजर चुके हैं, लेकिन अपने चंगुल में फंसे हुए किसी इंसान से अधिक से अधिक कागजात नहीं छोडऩे की सरकारी दफ्तरों की हवस खत्म नहीं होती है।

हिंदुस्तान के दफ्तरों को चाहिए कि अपने हर फार्म में यह देखें कि कौन-कौन सी जानकारी मांगना गैरजरूरी है, कौन-कौन से कागजात मांगना गैरजरूरी है। इसके अलावा अभी केंद्र सरकार जो पहल करते दिख रही है, वैसी पहल भी राज्य सरकारों में और स्थानीय संस्थाओं के दफ्तरों में जरूरी है कि फाइल कम से कम टेबिलों पर जाए, और जल्द से जल्द उसका निपटारा हो। इसके लिए जरूरी हो तो हर फाइल की स्थिति विभागों की वेबसाइट पर चलनी चाहिए ताकि लोगों को घर बैठे पता लग सके और खुद सरकार भी जांच सके कि कौन सी फाइल किस टेबल पर कितने दिन रही। ऐसा नहीं कि सरकार में सारे के सारे लोग खराब रहते हैं, बहुत से ईमानदार, और बहुत से भ्रष्ट लोग, ऐसे रहते हैं जो कि हर शाम ऑफिस छोडऩे के पहले टेबल खाली करके जाते हैं। ऐसे लोग काम को तेजी से निपटाते हैं फिर भले उसके पीछे उनकी कमाई की नीयत हो या ईमानदारी से काम करने की नीयत हो। देर से होने वाले काम से वसूली-उगाही का खतरा तो रहता ही है, देश की उत्पादकता का भी बड़ा नुकसान होता है। लोगों को सरकारी दफ्तरों के बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं और कुल मिलाकर उन दफ्तरों में काम करवाने वाले दलालों के मार्फत काम करवाना पड़ता है। ऐसा करते हुए बहुत से लोगों के सामने यह दिक्कत भी सामने आती है कि वे जब दफ्तर पहुंचते हैं संबंधित अधिकारी या कर्मचारी छुट्टी पर, या गैरमौजूद मिलते हैं। होना यह चाहिए कि विभागीय वेबसाइट पर हर अधिकारी और कर्मचारी की छुट्टी दिख जानी चाहिए, या वे दौरे पर हैं, या पूरे दिन किसी बैठक में हैं, तो वह भी दिख जाना चाहिए ताकि लोगों का वक्त खराब ना हो। और क्योंकि यह बात मामला सरकारी कामकाज से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें लोगों की निजी जिंदगी का कोई राज भी उजागर नहीं हो रहा है। अफसर और कर्मचारी किस-किस दिन दफ्तर में नहीं रहेंगे, यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उजागर होनी चाहिए।

हिंदुस्तान में जब से सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ है तबसे फाइलों का रहस्य थोड़ा सा घटा है, फिर भी यह आम लोगों के बस का नहीं रह गया कि वे अपने से संबंधित हर फाइल की कॉपी आरटीआई के तहत हासिल कर सकें, और फिर अपना काम तेजी से करवा सकें। लोग फाइल ले भी लेते हैं, तो भी उनका काम रफ्तार से नहीं हो सकता क्योंकि सरकार का ढांचा काम को रोकने के हिसाब से बनाया गया है, काम को करने के हिसाब से नहीं। सरकारी अमला अपनी जिम्मेदारियों की बात ही नहीं करता, अपने अधिकारों की बात करता है, उन्हें यह मालूम है कि वे कितने दिन तक कागज को रोक सकते हैं, क्या अड़ंगा लगाकर वापस भेज सकते हैं, और कौन-कौन सी दूसरी गैरजरूरी चीजों को मांग सकते हैं।

छत्तीसगढ़ का हमारा तजुर्बा यह कहता है कि यहां जब कभी प्रशासनिक सुधार के बारे में कोई बात तो हुई है, तो वह नारे की तरह अधिक हुई है, लेकिन हकीकत में जमीनी स्तर पर लोगों की परेशानी घटाने की कोई कोशिश नहीं हुई। सरकार को अपने अफसरों से प्रशासनिक सुधार का प्रयोग बंद करना चाहिए। इसके लिए तो आम जनता के बीच के लोगों को लेकर उनसे सलाह लेनी चाहिए कि कौन-कौन सी जानकारी गैरजरूरी है, और कौन-कौन सी प्रक्रिया वक्त बर्बाद करती है। सरकारें अगर यह सोचती हैं कि आम जनता का वक्त बर्बाद करने में कोई हर्ज नहीं है, तो यह भी समझ लेना चाहिए कि इससे राष्ट्रीय उत्पादकता भी प्रभावित होती है और जनता का सरकार में भरोसा तो खत्म होता ही है। यह भी एक बड़ी वजह रहती है कि एक कार्यकाल पूरा करने के बाद कोई-कोई सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव हार जाती है क्योंकि लोगों के मन में उसके कामकाज के खिलाफ एक नाराजगी बैठी रहती है। इसलिए न केवल जनता की तरफ से ऐसी मांग उठनी चाहिए, बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी को भी अपने खुद के भले के लिए ऐसी कोशिश करनी चाहिए जिससे अगले चुनाव के वक्त एंटी इनकंबेंसी कही जाने वाली नौबत ना आए, और लोग सरकार से नाराज होकर सत्तारूढ़ पार्टी को पूरी तरह ख़ारिज न कर दें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अक्टूबर 2021


 

कुदरत की बनाई दुनिया के मुकाबले इंसान की बनाई जा रही एक आभासी दुनिया

 29 अक्टूबर 2021

 

दुनिया में जो लोग पिछले डेढ़ बरस में जगह-जगह हुए लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम से अब तक पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं, उनके लिए आने वाला वक्त कुछ और चीजें लेकर आने वाला है। एक नई जुबान खबरों में सामने आ रही है, जिसमें वर्चुअल-रियलिटी विजन (मेटावर्स) का इस्तेमाल हो रहा है। और इसी को ध्यान में रखकर दुनिया में ईश्वर की तरह ताकतवर हो चुकी कंपनी फेसबुक ने अपना नाम बदलकर मेटा कर लिया है। अब यह समझना थोड़ा सा मुश्किल भी हो सकता है कि मेटावर्स से क्या होगा। तो इस बारे में फेसबुक सहित दूसरी कुछ कंपनियां मिलकर जो एक नया आभासी वातावरण, वर्चुअल एनवायरमेंट बना रही हैं, उसे समझने की जरूरत है। अभी लोगों ने इंटरनेट पर कंप्यूटर और मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए दो लोगों के बीच तरह-तरह की ऑडियोवीजुअल बैठकें की हैं, और इसके साथ-साथ तरह-तरह की कॉन्फ्रेंस भी की हैं। लेकिन अब मेटावर्स के बारे में कहा जा रहा है कि इसे कुछ खास किस्म के हेडसेट लगाकर ऐसा महसूस किया जा सकेगा कि लोग इस आभासी दुनिया के भीतर चल-फिर रहे हैं, उठ-बैठ रहे हैं, वहां दूसरे लोगों से मिल रहे हैं, वहां काम कर रहे हैं, वहां खरीदारी कर रहे हैं, और घर के भीतर भी ऐसे हेड सेट लगाकर लोग दफ्तर की तरह काम कर सकेंगे, या घर में बैठे-बैठे ही दुनिया की दूसरी जगहों की सैर कर सकेंगे। यह कंप्यूटर स्क्रीन पर चलने वाली बैठकों से बहुत ही अलग किस्म का अनुभव होगा और लोग ऐसा महसूस करेंगे कि वे सचमुच इस दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाकर वहां लोगों से मिल रहे हैं, सब कुछ देख रहे हैं, और कई किस्मों के काम कर रहे हैं। यह शायद किसी 3-डी फिल्म देखने की तरह होगा, जिसमें देखने वाले उसके भीतर जाकर उसे जी भी सकेंगे।

अब यह समझने की जरूरत है कि हाल के वर्षों में लोग अपनी असल जिंदगी के मुकाबले ऑनलाइन जिंदगी में जिस तरह उलझे हैं, और जिस तरह की संभावनाओं और आशंकाओं के बीच में अपनी ऑनलाइन मौजूदगी बढ़ाते चल रहे हैं, उस तरह अब अगर वे ऑनलाइन के आभासी वातावरण में जाकर वहां रह सकेंगे, बस सकेंगे, काम कर सकेंगे, वहीं लोगों से मिलजुल सकेंगे, सैर सपाटा कर सकेंगे, तो क्या होगा? उससे असल जिंदगी पर कैसा असर पड़ेगा? आज के मौजूदा रिश्ते पर कैसा असर पड़ेगा? ऐसी बहुत सी बातें टेक्नोलॉजी से परे लोगों के निजी मनोविज्ञान और समाज विज्ञान के नजरिए से देखने और समझने की रहेंगी। जब असल जिंदगी और आभासी जिंदगी के बीच के फासले को इस तरह घटाया जा रहा है, और जब लोगों को आभासी जिंदगी में और अधिक जीने की सहूलियत मुहैया कराई जा रही है जहां पर लोग असल जिंदगी की दिक्कतों से दूर वक्त गुजार सकेंगे, और कामकाज कर सकेंगे, तो फिर यह देखना होगा कि ऐसी आभासी जिंदगी के बढ़ते चलने से उनकी असल जिंदगी पर कैसा असर पड़ेगा? आभासी दुनिया के रिश्तों का असल दुनिया के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? और यह अंदाज लगाना अभी आसान इसलिए नहीं होगा कि अभी तो इस आने वाली, आभासी दुनिया, मेटावर्स की संभावनाओं और उसकी दखल के बारे में भी लोगों की कल्पनाएं काम नहीं कर रही हैं। लोगों को अभी यह पता नहीं लग रहा है कि ऐसी आभासी दुनिया या ऐसे आभासी वातावरण में क्या-क्या किया जा सकेगा। लेकिन चूंकि दुनिया की बहुत सी कंपनियां, बहुत से विश्वविद्यालय, बहुत से वैज्ञानिक संस्थान इस मेटावर्स पर काम कर रहे हैं, और जैसा कि फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने कहा, यह इतनी बड़ी सोच है कि फेसबुक जैसी कंपनी भी इसे अकेले पूरा नहीं कर सकती थी, इसलिए वह बाकी संस्थानों और कंपनियों के साथ इस प्रोजेक्ट में भागीदार बनी है। इसलिए आज किसी को इस सोच की विकरालता का कोई अंदाज नहीं है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि 10-15 बरस पहले किसी को फेसबुक की इन संभावनाओं का अंदाज नहीं था, या कि व्हाट्सएप के बारे में किसी ने सोचा नहीं था कि वह जिंदगी को इस तरह बदल देगा।

इंसानी मनोविज्ञान के जानकार लोगों, और समाज विज्ञान के जानकार लोगों के लिए यह एक बड़ी चुनौती का समय है कि वे ऐसे मेटावर्स के बारे में कल्पना करें और उससे इंसानों की जिंदगी में पढऩे वाले फर्क के बारे में सोचें। यह सोचना जरूरी इसलिए भी है कि जिस दिन बाजार इस नए औजार को हथियार की तरह इस्तेमाल करके इंसानों की मौजूदा जिंदगी को तहस-नहस करने, और उसे दुहने पर आमादा हो जाएगा, उस दिन लोगों के पास संभलने का वक्त भी नहीं होगा। यह भी सोचने की जरूरत है कि टेक्नोलॉजी और बाजार मिलकर आज के मौजूदा बाजार और रोजगार को किस तरह खत्म या प्रभावित कर सकते हैं। यह सोचना भी आसान नहीं है, और दूसरी बात यह कि मेटावर्स से जुड़ी हुई कुछ कंपनियों को छोडक़र बाकी बाजार पर इस आभासी वातावरण का क्या असर होगा, इसे भी बाकी कारोबार को सोचना चाहिए। इससे हो सकता है कि बहुत से कारोबार खत्म होने की नौबत आ जाए, बहुत से रोजगार पूरी तरह खत्म ही हो जाएं। यह भी हो सकता है कि इससे कारोबार और रोजगार का एक नया आसमान खुल जाए। कुल मिलाकर इस दुनिया के भीतर एक नई आभासी दुनिया बन जाने से हालात में जो भूचाल आएगा, उसे समझने का काम शुरू किया जाना चाहिए, और उसके हिसाब से लोगों को तैयारी भी करनी चाहिए। फिलहाल तो हम इतना ही सुझा सकते हैं कि तमाम लोगों को, जो पढऩा-लिखना जानते हैं, उन्हें इस विषय पर आने वाली हर नई जानकारी को जरूर पढऩा चाहिए क्योंकि इससे उनकी जिंदगी बहुत जल्द ही बदलने जा रही है। ऐसे बदलाव के लिए उन्हें दिमागी रूप से तैयार रहना चाहिए। आगे-आगे देखिए होता है क्या।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अक्टूबर 2021


 

आज का यह संपादकीय अदम गोंडवी की कलम से

28 अक्टूबर 2021

 

एक जाने-माने शायर अदम गोंडवी के गुजरने से भी उनकी मौत नहीं हुई। अपनी लिखी बातों को लेकर वे हिंदुस्तान के बहुत तकलीफजदा लोगों की आवाज बनकर हमेशा बने रहेंगे। उनकी गज़लें और उनके शेर किसी दूसरे शायर से अलग, पूरी तरह लोगों के दुख-दर्द से उपजे हैं और दो-दो लाइनों में तकलीफ को इस कदर साफ-साफ बयां करना हमारे लिए भी आसान नहीं है। कमोबेश इसी किस्म की बातें हम आए दिन इस कॉलम में लिखते हैं और आज हमें यह लग रहा है कि हम एक दिन में इतनी जगह में इतनी बातें और किस तरह कह सकते हैं, बजाय अदम गोंडवी को यह जगह दे देने के। हम उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हैं और जुड़े हुए हैं, इसलिए आज का संपादकीय उन्हीं का लिखा हुआ है।

सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है।
कोठियों से मुल्क के मेयार को मत आंकिये
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है।
सत्ताधारी लड़ पड़े है आज कुत्तों की तरह
सूखी रोटी देखकर हम मुफ्लिसों के हाथ में!
जो मिटा पाया न अब तक भूख के अवसाद को
दफन कर दो आज उस मफ्लूज पूंजीवाद को।
बूढ़ा बरगद साक्षी है गांव की चौपाल पर
रमसुदी की झोपड़ी भी ढह गई चौपाल में।
जिस शहर के मुन्तजिम अंधे हों जलवामाह के
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है।
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
रोशनी वो गांव तक पहुंचेगी कितने साल में।
——
आजादी का वो जश्न मनाएं तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
——
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।
——
ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब
जि़न्दगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया
——
ज़ुल्फ़-अंगड़ाई-तबस्सुम-चाँद-आईना-गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब
पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है पढ़े दिल की किताब
——
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
ये वन्दे-मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
——
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
——
सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
——
बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरखान को
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
——
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
——
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ्ऩ है जो बात, अब उस बात को मत छेडि़ए
गऱ ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेडि़ए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेडिय़े
छेडिय़े इक जंग, मिल-जुल कर गऱीबी के खिलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेडि़ए

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर 2021


 

हिंदुस्तान में पेगासस के इस्तेमाल की जांच का सुप्रीम कोर्ट का शानदार फैसला, अब दूध का दूध...

27 अक्टूबर 2021

 

इजराइली जासूसी घुसपैठिया स्पाइवेयर पेगासस के भारत में इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका पर आज अदालत का बहुत महत्वपूर्ण फैसला आया है। इस फैसले के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की देखरेख में अदालत ने विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई है जो भारत में पेगासस के इस्तेमाल की जांच करेगी कि इसका इस्तेमाल हुआ है या नहीं, और अगर हुआ है तो किस कानून के तहत, किन लोगों के खिलाफ इससे घुसपैठ की गई है। इस तरह के बहुत से पहलुओं को लेकर अदालत ने बड़ा साफ-साफ आदेश दिया है, और यह आदेश इस सुनवाई के दौरान अदालत में भारत सरकार द्वारा दिए गए तर्कों को खारिज करते हुए सामने आया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की एक बेंच ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र कर देने से ही केंद्र सरकार इस जांच से नहीं बच सकती। सुनवाई के दौरान भारत सरकार कोई भी जवाब देने से बार-बार कतराती रही कि उसने इसका इस्तेमाल किया है या नहीं। सरकार का तर्क था कि ऐसी कोई भी जानकारी देना कि वह किस निगरानी या घुसपैठ सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करती है, उससे आतंकियों को सरकार के तरीकों की जानकारी मिलेगी और उससे वे चौकन्ने भी हो सकते हैं। लेकिन केंद्र सरकार के वकील के यह सारे तर्क मुख्य न्यायाधीश ने खारिज कर दिए और कहा कि अदालत को राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलुओं को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है, और वह केवल यह पता लगाना चाहती है कि क्या पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल करके नागरिकों को निशाना बनाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला देश में नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में एक बड़ा फैसला है। अदालत ने जिन बातों की जांच करने के लिए कहा है उनमें यह भी है कि क्या भारत के नागरिकों के फोन या दूसरे उपकरणों पर मौजूद जानकारी पाने के लिए, उनकी बातचीत सुनने के लिए, या किसी और मकसद से पेगासस का इस्तेमाल किया गया? अदालत ने यह भी जांच करने कहा है कि अगर ऐसा स्पाइवेयर हमला हुआ है तो किन लोगों पर हुआ है? अदालत ने यह भी कहा कि जब भारत के नागरिकों ने 2019 में पेगासस का इस्तेमाल करके उनके व्हाट्सएप अकाउंट हैक करने की जानकारी मीडिया की रिपोर्ट में दी थी, तो उसके बाद से सरकार ने क्या कदम उठाए या क्या कार्यवाही की थी? अदालत ने यह भी जानने के लिए कहा है कि किसी भी राज्य सरकार, केंद्र सरकार, या किसी केंद्रीय और राज्य एजेंसी ने पेगासस का इस्तेमाल किया है, और अगर किया है तो किस कानून, नियम, और वैध प्रक्रिया के तहत ऐसा किया है? अदालत ने इस एक्सपर्ट कमेटी से यह सिफारिश भी मांगी है कि कैसे इस देश में नागरिकों की निजता के अधिकार पर हमले को रोका जा सकता है कैसे नागरिकों के उपकरणों की अवैध निगरानी के संदेह पर शिकायत के लिए एक तंत्र विकसित किया जा सकता है, कैसे साइबर सुरक्षा को बढ़ाया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का आज का यह फैसला जनहित याचिका लेकर अदालत पहुंचने वाले कई लोगों के साथ-साथ देश के तमाम नागरिकों को राहत देगा जिसमें पेगासस के हमले से अब तक प्रभावित न होने वाले लोग भी हैं। अदालत में  याचिका लगाने वाले कई ऐसे पत्रकार भी थे जिनको अभी उन पर पेगासस के हमले की जानकारी नहीं थी, लेकिन जिन्होंने व्यापक मीडिया हित में, और जनहित में याचिका लगाई थी। आज का यह फैसला केंद्र सरकार के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दे रहा है और यह फैसला साफ-साफ कह रहा है कि केंद्र सरकार केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क देकर न्यायिक जांच से दूर नहीं हो सकती। उसने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसी डरावनी नहीं हो सकती कि अदालतें इसका नाम लेने भर से दूर हट जाएं। चूँकि मुख्य न्यायाधीश सहित दो अन्य न्यायाधीशों की बेंच ने यह फैसला दिया है, तो ऐसी गुंजाइश कम दिखती है कि इसके खिलाफ केंद्र सरकार किसी पुनर्विचार याचिका में जाए और केंद्र सरकार को अपनी किसी निगरानी को अदालती जांच-पड़ताल से बाहर रखने की कोई राहत मिल सके। अदालत का रुख बिल्कुल साफ है कि शासन द्वारा केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का आव्हान करने से अदालत मूकदर्शक नहीं बन जाती है। फैसले में यह भी लिखा गया है कि भारत सरकार का अदालत में पेगासस के इस्तेमाल पर किसी बात की पुष्टि करने से बहुत स्पष्ट इनकार, पर्याप्त नहीं है, और अदालत ने याचिकाकर्ताओं की रखी गई सामग्री पर विचार और जांच की जरूरत कही है। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ताओं के द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच के लिए उनके तर्क मंजूर करने के अलावा अदालत के पास और कोई विकल्प नहीं है।

पेगासस को लेकर हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के बहुत से देशों की सरकारों और वहां की लोकतांत्रिक संस्थाओं में खलबली मची हुई है। कुछ देशों ने औपचारिक रूप से जांच-आदेश भी दिए हैं कि क्या उसके नेताओं पर किसी और देश में पेगासस के माफऱ्त हमला किया है, और घुसपैठ की है? और कम से कम 2 देश ऐसे हैं जहां पर अलग-अलग लोगों की हत्याओं के पीछे पेगासस के इस्तेमाल की बात खुलकर सामने आई है। इन 2 लोगों को मारने के पीछे किसी देश की सरकार का हाथ बताया जा रहा है। हिंदुस्तान में लोकतंत्र की यह मांग है कि जनता की जिंदगी में राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में अगर ऐसी घुसपैठ हुई है, तो सच सामने आना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

इस गैर जिम्मेदार लोकतंत्र में गरीब आदिवासी की जगह आर्यन खान के मुकाबले कहाँ?

  26 अक्टूबर 2021



हिंदुस्तान का मीडिया पिछले 20-25 दिनों से शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की गिरफ्तारी को लेकर उफना हुआ है। रात दिन टीवी पर उसी की तस्वीर दिखती है, और अधिकतर अखबारों के पहले पन्ने पर उसका कब्जा है। एक आलीशान जहाज पर चल रही पार्टी में नशा परोसा जा रहा था, और भारत के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने उस पर छापा मारा तो बिना किसी नशे के आर्यन को भी उसी पार्टी में गिरफ्तार किया गया, और अब तक उसकी जमानत नहीं हो पाई है। बहुत से लोगों का यह मानना है कि क्योंकि शाहरुख खान ने एक-दो बरस पहले बिना नाम लिए देश के माहौल की कुछ आलोचना की थी, या देश में सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ कुछ कहा था, इसलिए उनके बेटे को निशाना बनाकर यह कार्यवाही की जा रही है। जो भी हो अगर किसी ने नशा किया है, या उसके पास से नशा पकड़ाया है, या वह नशे के कारोबार से जुड़ा हुआ मिला है तो उस पर कार्यवाही तो होनी चाहिए। फिर शाहरुख खान का बेटा होने के नाते आर्यन को हिंदुस्तान के सबसे महंगे वकीलों की सहूलियत हासिल है और आज जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं उस वक्त उसकी जमानत के लिए देश के एक सबसे महंगे वकील मुकुल रोहतगी के पहुंचने की खबर है। इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि शाहरुख खान की तमाम दौलत की मदद से उनका बेटा हिंदुस्तानी अदालतों में इंसाफ पाने की अधिक संभावना रखता है बजाए किसी गरीब फटेहाल बेबस के।

लेकिन जितने टीवी चैनल या जितने अखबार सरसरी नजर में हमारे देखने में आते हैं, उनमें आर्यन की गिरफ्तारी की खबर के पीछे दबी-छुपी हुई भी एक खबर नहीं दिखती कि कर्नाटक में 12 बरस पहले एक आदिवासी छात्र को नक्सल साहित्य रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, और उसके बूढ़े पिता को भी। अदालत ने अभी उन्हें उनके खिलाफ कोई भी सबूत न होने की वजह से रिहा किया है, और जिंदगी के इतने बरस गंवाने के बाद वे अब खुली हवा में आए हैं। लेकिन खबरों में उनका इतना भी महत्व नहीं है कि एक आदिवासी के साथ हो गई ऐसी ज्यादती को ठीक से जगह मिल सके, या मामूली जगह भी मिल सके। इससे यह पता चलता है कि देश में लोकतंत्र का क्या हाल है। जब लोकतंत्र में एक गरीब आदिवासी छात्र और उसके बूढ़े पिता के साथ हो रही ऐसी सरकारी और पुलिसिया ज्यादती के खिलाफ किसी के चेहरे पर कोई शिकन ना पड़े, तो उसका मतलब देश में ऐसी सरकारों और ऐसी अदालतों का बढ़ जाना है जहां से किसी फिल्मी सितारे के बेटे को भी हो सकता है कि बेकसूर होने पर भी इंसाफ ना मिल सके। लोकतंत्र में सबसे कमजोर और सबसे गरीब को इंसाफ न मिलने का एक खतरा यह रहता है कि धीरे-धीरे बेइंसाफी उस लोकतंत्र का मिजाज बनने लगता है। देश में लोकतंत्र के पैमाने नीचे आने लगते हैं, और अदालतों को इंसाफ का ख्याल रखना जरूरी नहीं रह जाता है।

देशभर में केंद्र सरकार और अलग-अलग प्रदेशों की एजेंसियों ने जिस तरह के मामलों को अदालतों में बढ़ावा दिया है और जिस बड़े पैमाने पर ये मामले अदालतों से खारिज हो रहे हैं, उससे भी पता लगता है कि लोकतंत्र में इंसाफ की जरूरत को ही नकार दिया जा रहा है। ऐसे में हो यह रहा है कि हर जगह सत्ता पर बैठे लोग अपनी मर्जी से चुनिंदा लोगों को परेशान करने के लिए कानूनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं और जितने समय तक किसी बेकसूर को सता सकते हैं, सताते चलते हैं, जमानत में जितनी देर कर सकते हैं उतनी देर करते हैं, और फिर आखिर में सरकारें अदालतों में मुंह की खाती हैं। लेकिन इंसाफ कहा जाने वाला यह सिलसिला इसी तरह चल रहा है और देश की सबसे बड़ी अदालत भी सब कुछ देखते हुए भी कुछ नहीं कर पा रही हैं। अदालतों का हाल तो यह है कि सरकार खाली कुर्सियों के लिए जज नहीं बना रही, और देश का मुख्य न्यायाधीश सरकार की मौजूदगी में बतलाता है कि 26 फ़ीसदी अदालतों में महिला जजों के लिए शौचालय तक नहीं है, और 16 फीसदी अदालतों में तो किसी जज के लिए शौचालय नहीं है। सरकार का न्यायपालिका के लिए यह रुख बताता है कि न्यायपालिका को गैरजरूरी मान लिया गया है, और ऐसा इसलिए किया गया है कि जांच एजेंसियों के रास्ते मनमानी को और अधिक वक्त तक जारी रखा जा सके।

लेकिन सरकार का यह सिलसिला ऐसे लोकतंत्र में कमजोर नहीं पड़ सकता जहां पर कमजोर तबके के लिए बाकी लोगों के मन में कोई रहम न हो, कोई फिकर न हो। आज देश की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में सबसे अधिक संख्या में अल्पसंख्यक, दलित, और आदिवासी तबकों के लोग हैं, क्योंकि ये लोग वकीलों का खर्च नहीं उठा सकते, जांच एजेंसियों में जो भ्रष्ट लोग हैं उन्हें रिश्वत नहीं दे सकते, और अदालतों में जो भ्रष्ट लोग हैं उन्हें खरीद नहीं सकते, सबूतों को तोड़ मरोड़ नहीं सकते, और गवाहों को प्रभावित नहीं कर सकते। जिनके पास पैसा है वे इनमें से सब-कुछ कर सकते हैं। इसलिए आज हिंदुस्तान में इंसाफ पाने के लिए लोगों का संपन्न और सक्षम, ताकतवर और दबदबे वाला होना जरूरी है। जहां पहले कुछ घंटों से ही देश का मीडिया शाहरुख खान के बेटे के लिए बेचैन हो चला है, वहां पर अल्पसंख्यक तबके के आम और गरीब लोग 20-20 बरस जेल में कैद रहकर अदालत से बेकसूर साबित होकर बाहर निकल रहे हैं, तब तक उनके परिवार की जिंदगी खत्म हो चुकी रहती है, उनकी खुद की जिंदगी खत्म हो चुकी रहती है।

देश के नक्सल इलाकों में इसी तरह बरसों से बेकसूर आदिवासी कैद हैं, और सरकारें बार-बार यह कहती हैं कि उनके मामलों को तेजी से निपटाया जाएगा, या उन्हें छोड़ा जाएगा, लेकिन होता इनमें से कुछ नहीं है। कर्नाटक के जिस छात्र की हम बात कर रहे हैं उस कर्नाटक के बारे में अभी-अभी हमने लिखा है कि किस तरह वहां कांग्रेस, भाजपा, और जनता दल तीनों के मुख्यमंत्री रहे लेकिन यह बेकसूर आदिवासी छात्र अपने बाप सहित जेल में बंद रहा। इसलिए जेल में बंद रहा कि वह पत्रकारिता का छात्र था और उसके पास भगत सिंह की किताब सहित कुछ दूसरे लेख मिले जिनमें गांव की समस्या दूर न होने पर संसदीय चुनावों के बहिष्कार की बात लिखी हुई थी। देश का सबसे संपन्न तबका वोट डालने न जाकर वैसे भी चुनावों का बहिष्कार करता ही है, लेकिन अगर किसी ने जागरूकता के साथ इस मुद्दे को लिख रखा है, तो उसे नक्सल करार दे दिया गया। इस देश के लोगों को सोचना है कि क्या तमाम ताकत और असर हासिल रहने पर भी शाहरुख खान का बेटा अधिक हमदर्दी का हकदार है, और बरसों तक बूढ़े बाप के साथ जेल में बंद आदिवासी छात्र हमदर्दी का हकदार नहीं है? जिसकी कि कोई चर्चा भी नहीं हो रही है। यह इस देश की जनता का हाल है जिसके बीच बेबस लोगों की कोई बात नहीं होती है, और जिन्हें देश के सबसे महंगे वकील हासिल हैं, उनकी फिक्र में देश का मीडिया दुबला हुए जा रहा है।

हम कहीं भी शाहरुख खान के बेटे के जमानत के हक को कम नहीं आंक रहे हैं, लेकिन हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि इस देश में बेइंसाफी झेल रहे लोगों के बीच प्राथमिकता की लिस्ट में आर्यन खान दसियों लाख लोगों के बाद ही आ सकता है, फिर चाहे वह अखबार के पहले पन्ने पर एकाधिकार क्यों न पा रहा हो।


दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अक्टूबर 2021


 

हार की जीत, विराट ने मैदान पर पढ़ दी सुदर्शन की कहानी

  25 अक्टूबर 2021

  किसी हार में भी कोई जीत हो सकती है यह सोचना थोड़ा मुश्किल है। बहुत पहले सुदर्शन की बाबा भारती और खडग़सिंह वाली विख्यात कहानी, ‘हार की जीत’ में जरूर ऐसा था, लेकिन असल जिंदगी में बीती रात भारत और पाकिस्तान के मैच में यह देखने मिला। मैच में हिंदुस्तान खासी बुरी तरह हारने के बाद भी बहुत अच्छी तरह जीत गया। खुद पाकिस्तान में पाकिस्तान की जीत की जिस किस्म से खुशी मनाई जा रही है, उसी किस्म से सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमी इस बात की खुशी भी मना रहे हैं कि भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने मैच हारने के बाद किस तरह पाकिस्तानी कप्तान को बधाई दी, हंसते-मुस्कुराते हुए हर खिलाड़ी से गले मिले, और पूरे मैच के दौरान भी तनाव मुक्त रहे। इस पर पाकिस्तान के लोगों ने इतना सुंदर लिखा कि बस। एक महिला ने लिखा कि इतिहास इन तस्वीरों को याद रखेगा। एक दूसरे ने लिखा कि विराट कोहली बहुत अच्छे शख्स हैं जो जानते हैं कि यह खेल है युद्ध नहीं। एक खिलाड़ी ने लिखा-‘खुद एक खिलाड़ी होने के नाते मुझे यह लम्हा बहुत अच्छा लगा क्योंकि खेलना ही खेल भावना है शाबाश विराट कोहली’। एक और पाकिस्तानी ने मजाकिया लहजे में लिखा-‘विराट कोहली को अपनी टीम में शामिल होने का न्योता देने में कोई नुकसान नहीं है वह पहले से ही घुले मिले हुए हैं’। एक और ने लिखा-‘वहां भारतीय और पाकिस्तानी साथ साथ खेल रहे हैं और यहां हम बेवकूफों की तरह लड़ रहे हैं’। भारतीय कप्तान विराट कोहली ने मैच के दौरान भी एक बड़प्पन का खुशमिजाज बनाए रखा और मैच के बाद भी उन्होंने कहा कि हम हारे हैं जिसे हम मंजूर करते हैं और पाकिस्तान को जीत का श्रेय देते हैं उन्होंने वाकई हमें हर क्षेत्र में मात्र दी। कोहली ने कहा उनके बल्लेबाजों ने जिस अंदाज में बल्लेबाजी की उसने हमें कोई मौका नहीं दिया। कोहली के अलावा धोनी भी पाकिस्तानी खिलाडिय़ों से खेल भावना में अच्छे मिजाज में बात करते दिखे, और धोनी की भी तारीफ हो रही है।

भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद पर जो नफरत चलती है, और जो जंग राजधानियों में बैठकर लड़ी जाती है, और सरहद के दोनों तरफ के जो धर्मांध कट्टरपंथी लगातार एक जंग की उम्मीद करते हैं, और दुनिया के हथियारों के सौदागर इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाते चलने में भरोसा रखते हैं, और जिस तरह इन दोनों देशों के नेता कई बार अपनी घरेलू दिक्कतों को अपने वोटरों की नजरों से पीछे धकेलने के लिए दूसरे देश पर तोहमत लगाते हैं, उन सबको अगर देखें तो लगता है कि जिस तनाव का जिक्र करके क्रिकेट को रोकने की कोशिश की जा रही है, उस तनाव को तो क्रिकेट कम ही करता है। और महज क्रिकेट नहीं इन दोनों देशों के बीच लेखक, शायर, संगीतकार और कलाकार भी तनाव को कम करने में मदद करते हैं, यह एक अलग बात है कि दोनों तरफ के कट्टरपंथी अपनी हस्ती और मौजूदगी को साबित करने के लिए वक्त-वक्त पर तोहमतें लगाते हैं, हिंसा करते हैं, और सरहद पार के लोगों को भगाने की बात करते हैं। ऐसा सिर्फ पाकिस्तान में होता है ऐसा भी नहीं, हिंदुस्तान में भी मुंबई में कई बार ऐसा होता है। मुंबई में भी टीवी के रियलिटी शो में हिस्सा लेने वाले कुछ पाकिस्तानी कलाकारों को वापिस भेज दिया जाता है क्योंकि सांप्रदायिक संगठन उनके खिलाफ तनाव खड़ा करने लगते हैं।

अभी जब भारत और पाकिस्तान के बीच टी-20 का यह मैच खेला जाना तय हुआ था उस वक्त हिंदुस्तान में भाजपा के मददगार माने जाने वाले और एक कट्टर मुस्लिम राजनीति करने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने खुलकर इस मैच का विरोध किया था, और कहा था कि जब कश्मीर में आतंकी हमलों में हिंदुस्तानी सैनिक मारे जा रहे हैं, तब हिंदुस्तानी टीम को पाकिस्तानी टीम के साथ क्रिकेट क्यों खेलना चाहिए। यह बात अपने आपको एक कट्टर राष्ट्रवादी साबित करने की कोशिश अधिक थी जिसमें अंतरराष्ट्रीय समझ-बूझ छू भी  नहीं गई थी। ओवैसी कट्टरता की बातें करने के लिए जाने जाते हैं, और मुस्लिमों के बीच अपने एक सीमित समर्थक तबके को बाकी हिंदुस्तानियों के मुकाबले अधिक राष्ट्रवादी साबित करने के लिए, अधिक बड़ा देशभक्त साबित करने के लिए, उन्होंने इस किस्म की भडक़ाने वाली बात की थी। ऐसी बात तो हिंदुस्तान के सबसे अधिक सांप्रदायिक दूसरे हिंदू संगठनों ने भी नहीं की थी, उन्होंने भी पाकिस्तान के साथ मैच के बहिष्कार का कोई फतवा नहीं दिया था जो कि ओवैसी ने दिया।

लेकिन विराट कोहली की दरियादिली और खेल भावना के इस मौके पर जब चारों तरफ सब कुछ अच्छा अच्छा लिखा जा रहा था उसके बीच भी एक गंदी बात करने से भारत के एक बड़े उद्योगपति हर्ष गोयनका नहीं चूके। हर्ष गोयनका ट्विटर पर सक्रिय रहते हैं और कई किस्म की सकारात्मक बातें भी पोस्ट करते हैं, लेकिन कल उन्होंने पाकिस्तान के टॉस जीतने के बाद यह लिखा- ‘पाकिस्तान ने टॉस जीता और यह तय किया कि वह इस सिक्के को वापस पाकिस्तान ले जाएंगे ताकि वहां की अर्थव्यवस्था सुधर सके’। यह बात एक मजाक के रूप में तो तीखा तंज हो सकती थी, लेकिन कल का मौका बड़प्पन दिखाने का था, और दोनों देशों के बीच जिसने बड़प्पन दिखाया, उसने महफिल लूटी। हर्ष गोयनका की इस बात पर एक प्रमुख पत्रकार हृदयेश जोशी ने तुरंत लिखा कि इस ट्वीट को देखकर मास्टर कार्ड का विज्ञापन याद आ रहा है जो कहता है कि कुछ चीजें पैसों से नहीं खरीदी जा सकतीं। वैसे ही गोयनका साहब के लिए तमीज किसी मास्टर कार्ड से नहीं खरीदी जा सकती।

भारत और पाकिस्तान के बीच मैच दोनों देशों में खेल की सबसे बड़ी उत्सुकता का मौका रहता है, और इससे बड़ा मैच इन दोनों देशों के लिए दुनिया में और कुछ भी नहीं होता है। ऐसे ही मौके पर खेल यह साबित कर सकता है कि वह सरहद के सारे तनाव को कम करने की ताकत रखता है। ऐसे ही मौके पर खिलाड़ी यह साबित कर सकते हैं कि वे नेताओं और फौजी जनरलों के मुकाबले बेहतर इंसान हैं। ऐसे ही मौके पर क्रिकेट का बैट न केवल गेंद को मैदान के बाहर फेंक पाता है बल्कि हथियारों के सौदागरों की तमाम किस्म की साजिशों को भी दोनों देशों से बाहर फेंकने की कोशिश करता है। ऐसे मौके एक दरियादिली और बड़प्पन दिखाने के रहते हैं, मोहब्बत दिखाने के रहते हैं, और भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने सचमुच यही एक विराट दिल कल दिखाया, जब उन्होंने हार के बावजूद पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को लिपटाकर बड़प्पन और मोहब्बत से बातें की, और हारते हुए भी उन्होंने तनाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया। यह सिलसिला जारी रखना चाहिए, सरहद के दोनों तरफ बुरे लोग भी हैं, और अच्छे लोग भी हैं, बुरे लोग दिखते अधिक हैं, लेकिन अच्छे लोग गिनती में ज्यादा हैं। ऐसे ही मौके हैं जब लोगों को दोनों देशों के बीच दोस्ती की संभावनाओं को टटोलना चाहिए जिन्हें कि वोटों के चक्कर में पड़े हुए नेता नहीं तलाश सकते। खेल भावना ने बहुत ही तंग नजरिए वाले राष्ट्रवाद को उसकी जगह दिखा दी है, और इसके लिए किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ी, झंडे-डंडे  की जरूरत नहीं पड़ी, और थोड़ी सी मोहब्बत, और थोड़ी सी दरियादिली से यह काम हो गया।  पाकिस्तान की टीम मैच जीतने की लिए, और विराट कोहली और उनकी टीम हार के बाद भी मोहब्बत का बर्ताव करने के लिए बधाई की हकदार है।

 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर 2021


 

अपने आदर्शों को लेकर पाखंडी देश

 24 अक्टूबर  2021


हिंदुस्तान में पिछले कुछ दिनों से सावरकर को लेकर एक बहस चल रही है। विनायक दामोदर सावरकर जिन्हें कुछ लोग वीर सावरकर भी कहते हैं और उन्हें वीर मानते हैं। दूसरी तरफ बहुत से दूसरे लोग हैं जिनका यह मानना है कि सावरकर अपनी जिंदगी के शुरू के हिस्से में तो स्वतंत्रता सेनानी रहे, लेकिन जैसे ही वे अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार करके अंडमान में काला पानी की सजा में भेजे गए उन्होंने तुरंत ही अंग्रेज सरकार से रहम की अपील करना शुरू कर दिया, और कुछ महीनों के भीतर उन्होंने ऐसी अर्जियां भेजना शुरू किया जो कि शायद कुल मिलकर पौन दर्जन तक पहुंचीं। इस बारे में अलग-अलग लेखों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, इसलिए उन पूरी बातों को यहां दोहराने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि आज की बात केवल सावरकर पर नहीं लिखी जा रही बल्कि इस बात पर लिखी जा रही है कि लोगों की जिंदगी को एक साथ, एक मुश्त देखकर उन पर एक अकेला लेबल लगाना कई बार मुमकिन नहीं होता है। गांधी के लिए जरूर ऐसा हो सकता था कि उनके पूरे जीवन को एक साथ देखकर भी उन्हें महात्मा लिखा जाए, लेकिन सावरकर को यह सहूलियत हासिल नहीं थी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम में शामिल रहे, लेकिन गिरफ्तारी के बाद जिस तरह उन्होंने लगातार माफी मांगी, लगातार रहम की अर्जी दायर की, और आखिर रहम मांगते हुए ही वे जेल से छूटे, और इतिहासकारों ने लिखा है कि उन्हें अंग्रेजों से हर महीने आर्थिक मदद भी मिली। अब ऐसे में जो लोग उनको वीर कहते हैं वह इतिहास के कुछ नाजुक पन्नों को कुरेद भी देते हैं जो उन्हें वीर साबित नहीं करते।

सावरकर का यह ताजा सिलसिला देश के सूचना आयुक्त उदय माहुरकर की सावरकर पर लिखी गई एक किताब के विमोचन के मौके पर शुरू हुआ जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहां कि सावरकर ने रहम की अपील गांधीजी के कहे हुए लिखी थी। बहुत से इतिहासकारों ने उसके बाद लगातार यह लिखा कि जिस वक्त सावरकर ने रहम की अर्जियां भेजना शुरू कर दिया था, उस वक्त तो गांधी से सावरकर की मुलाकात भी नहीं हुई थी, गांधी हिंदुस्तान लौटे भी नहीं थे, वह दक्षिण अफ्रीका में ही थे, उस वक्त उनका भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से भी कोई लेना देना नहीं था, और सावरकर को तो वे जानते भी नहीं थे। लेकिन इतिहास लेखन जब वक्त की सहूलियत के हिसाब से होता है तो उसमें कई तरह की सुविधाजनक बातों को लिख दिया जाता है और कानों को मधुर लगने वाले तथ्य गढ़ दिए जाते हैं। राजनाथ सिंह ने यह बात उदय माहुरकर की किताब को पढक़र नहीं कही थी क्योंकि उस किताब में इस बारे में कुछ जिक्र नहीं है, उन्होंने सावरकर पर अलग से यह बात कही।

यह सोचने समझने की जरूरत है कि जब लोगों की जिंदगी के अलग-अलग पहलू सकारात्मक और नकारात्मक, अलग-अलग किस्मों के होते हैं, उनमें कहीं खूबियां होती हैं और कहीं खामियां होती हैं, तो उनकी महानता को तय करना थोड़ा मुश्किल होता है। नायक और खलनायक के बीच में घूमती हुई ऐसी जिंदगी कोई एक लेबल लगाने की सहूलियत नहीं देती, और ऐसा करना भी नहीं चाहिए। अब जैसे हिंदुस्तान के ताजा इतिहास को ही लें, तो कम से कम दो ऐसे बड़े पत्रकार हुए जो अखबारनवीसी में नामी-गिरामी थे, जिनके लिखे हुए की लोग तारीफ करते थे, और जिनके संपादन वाले अखबार या पत्रिका की भी तारीफ होती थी, लेकिन जब अपनी मातहत महिलाओं से बर्ताव की बात थी तो इसमें से एक संपादक ने अपनी एक मातहत कम उम्र लडक़ी के साथ जैसा सुलूक किया, उससे मामला अदालत तक पहुंचा, लंबा वक्त जेल में काटना पड़ा, और बाद में अदालत से उसे बरी किया गया। हिंदुस्तान में अदालत से बरी होने का मतलब बेकसूर हो जाना नहीं होता, बस यही साबित होता कि वहां पर पुलिस या जांच एजेंसी गुनाह साबित नहीं कर पाईं।

दूसरे संपादक के खिलाफ तो दर्जनभर या दर्जनों मातहत महिला पत्रकारों ने सेक्स शोषण की शिकायतें की हैं, और वह मामला अदालत में चल ही रहा है। अब किसी व्यक्ति की अच्छी अखबारनवीसी को उसके चरित्र के इस पहलू के साथ जोडक़र देखा जाए या जोडक़र न देखा जाए? यह सवाल बड़ा आसान नहीं है क्योंकि लोगों ने इतिहास में यह भी लिखा हुआ है कि हिटलर एक पेंटर था, और जिस तरह से उसने दसियों लाख लोगों का कत्ल किया, तो क्या उसकी बनाई किसी पेंटिंग को लेकर चित्रकला के पैमानों पर उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए, या उसकी कोई बात नहीं करनी चाहिए? क्या गांधी महात्मा थे इसलिए उनके सत्य के प्रयोगों की चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या नेहरू देश के एक महान नेता थे इसलिए एडविना माउंटबेटन के साथ उनके संबंधों की चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या अटल बिहारी वाजपेई भाजपा के एक बहुत बड़े नेता थे, और जनसंघ से भाजपा तक अपने वक्त के वह सबसे बड़े नेता रहे, तो क्या उनकी जिंदगी में आई महिला के बारे में कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए? या क्या इस बात को छुपाया जाना चाहिए कि वह शराब पीते थे? या नेहरू के बारे में यह छुपाना चाहिए कि वह सिगरेट पीते थे?

हिंदुस्तान एक पाखंडी देश है यहां पर लोग अपने आदर्श के बारे में किसी ईमानदार मूल्यांकन को बर्दाश्त नहीं करते। वे जिसे महान व्यक्ति या युगपुरुष मानते हैं, उसके बारे में किसी खामी की चर्चा सुनना नहीं चाहते। लेकिन हाल के वर्षों में हिंदुस्तान में एक नया मिजाज सामने आया है कि जिन लोगों को लोग नापसंद करें, उनके इतिहास और चरित्र के बारे में झूठी बातें गढक़र उन्हें तरह-तरह से, खूब खर्च करके, और खरीदे गए लोगों से चारों तरफ फैलाया जाए। किसी एक देश में किसी फैंसी ड्रेस में गांधी बना हुआ कोई आदमी किसी विदेशी महिला के साथ डांस कर रहा है तो उसे एक चरित्रहीन महात्मा गांधी की तरह पेश करने में हजारों लोग जुटे रहते हैं। अपनी बहन को गले लगाए हुए नेहरु की तस्वीर को चारों तरफ फैलाकर उन्हें बदचलन साबित करने की कोशिश में लोग लगे रहते हैं। ऐसे लोग अपने किसी पसंदीदा के बारे में एक लाइन की भी नकारात्मक सच्चाई सुनना नहीं चाहते, उस पर भी खून-खराबे को तैयार हो जाते हैं। लेकिन जो नापसंद हैं उनके बारे में गढ़ी गई झूठी बातें भी फैलाने के लिए वे अपनी रातों की नींद हराम करते हैं।

झूठ के ऐसे सैलाब के बीच यह जरूरी रहता है कि इतिहास का सही इस्तेमाल हो, लोगों का सही मूल्यांकन हो, लोगों की खूबियों के साथ-साथ उनकी खामियों की चर्चा से भी परहेज न किया जाए, और किसी व्यक्ति को एक बिल्कुल ही बेदाग प्रतिमा की तरह पेश न किया जाए, क्योंकि गढ़ी गई प्रतिमा ही बेदाग हो सकती है, असल जिंदगी में तो इंसान पर कई किस्म के दाग लगे हो सकते हैं, जो कि कुदरत का एक हिस्सा हैं, कुदरत के दिए हुए बदन का एक हिस्सा, या कुदरत के दिए हुए मिजाज का एक हिस्सा।

सावरकर को लेकर जो लोग इतिहास के कड़वे हिस्से से परहेज कर रहे हैं, उनको लोकतंत्र की लचीली सीमाओं को समझना चाहिए जहां पर गांधी और नेहरू जैसे लोगों की कमियों और खामियों का भी जमकर विश्लेषण हुआ, और नेहरू के खिलाफ तो जितने कार्टून उस वक्त बनते थे, उनमें से कई मौकों पर वे कार्टूनिस्ट को फोन करके उसकी तारीफ भी करते थे। आज का वक्त ऐसा हो गया है कि नेहरू के मुकाबले बहुत ही कमजोर और खामियों से भरे हुए छोटे-छोटे से नेता उन पर बने हुए कार्टून पर लोगों को जेल डालने की तैयारी करते हैं। लोकतंत्र की परिपच्ता आने में हिंदुस्तान में हो सकता है कि आधी-एक सदी और लगे क्योंकि अब तो लोग यहां पर बर्दाश्त खोने लगे हैं, सच से परहेज करने लगे हैं, झूठ को गढऩे लगे हैं, और बदनीयत नफरत को फैलाने लगे हैं।

यह पूरा सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और मानव सभ्यता के विकास की घड़ी के कांटों को वापिस ले जाने वाला भी है। सभ्य समाज और लोकतांत्रिक समाज को अपना बर्दाश्त बढ़ाना चाहिए, उसे लोगों के व्यक्तित्व और उनकी जिंदगी के पहलुओं को अलग-अलग करके देखना भी आना चाहिए और किसी का मूल्यांकन करते हुए इन सारे पहलुओं को साथ देखने की बर्दाश्त भी रहनी चाहिए। जो सभ्य समाज हैं वहां पर इतिहास लोगों को आसानी से शर्मिंदा नहीं करता। और जहां हिटलर जैसे इतिहास से शर्मिंदगी होना चाहिए तो वहां पूरा का पूरा देश, पूरी की पूरी जर्मन जाति शर्मिंदा होती है, और उससे मिले हुए सबक से वह सीखती है कि उसे क्या-क्या नहीं करना चाहिए। हिंदुस्तान में लोगों के कामकाज से लेकर माफीनामे तक को लेकर जो लोग मुंह चुराते हैं, वो इतिहास की गलतियों को भविष्य में दोहराने की गारंटी भी कर लेते हैं।

भगत सिंह की किताब अगर नक्सल होने का सुबूत है, तो अंग्रेज राज ही क्या बुरा था?

 24 अक्टूबर 2021

 

कर्नाटक की एक जिला अदालत से अभी एक आदिवासी नौजवान को उसके बूढ़े पिता के साथ बरी किया गया है जिन्हें पुलिस ने नक्सलियों से संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया था। इस आदिवासी छात्र के हॉस्टल के कमरे से जिन किताबों को जप्त करके उस पर नक्सली होने का आरोप लगाया गया था, उनमें भगत सिंह की लिखी एक किताब भी थी। उसके पास अखबारों की कुछ कतरनें भी थीं, और एक चिट्ठी लिखी हुई थी कि जब तक गांव को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती हैं, तब तक संसद के चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए। अब 32 बरस का हो गया यह नौजवान अपने पिता के साथ 9 बरस तक चले इस मुकदमे के बाद बरी किया गया क्योंकि पुलिस कुछ भी साबित नहीं कर सकी और उसके पास कोई सबूत नहीं था। जबकि मामले को दायर करते हुए पुलिस ने इस आदिवासी छात्र के मोबाइल फोन से नक्सलियों की मदद करने और राजद्रोह का अपराध करने की बातें कही थीं, लेकिन इसके मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स तक पुलिस ने अदालत में पेश नहीं किए। देश में बेकसूरों को कुचलने के लिए जो यूएपीए नाम का एक बहुत ही कड़ा कानून इस्तेमाल किया जा रहा है, उस कानून के तहत यह मामला चलाया गया था, और यह गरीब आदिवासी परिवार अपने 9 बरस खोने के बाद अब खुली हवा में सांस ले रहा है। लेकिन अदालत ने इन्हें सिर्फ बरी किया है, इन्हें बाइज्जत बरी नहीं किया है, इसलिए अब ये फिर ऊंची अदालत जा रहे हैं, ताकि उन्हें बाइज्जत बरी किया जाए। फैसले में अदालत ने यह तक लिखा कि चुनाव के बहिष्कार का आह्वान करने की जो चिट्ठी है, तो उसे पत्रकारिता के छात्र ने इसलिए लिखा क्योंकि नेताओं ने उस आदिवासी गांव के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा नहीं किया था, और इसे पढऩे पर यह आसानी से कहा जा सकता है कि इस पत्र में स्थानीय लोगों की मांगें हैं।

हिंदुस्तान की सरकारों को इस तरह के कानून बहुत अच्छे लगते हैं जिनमें लोगों के मौलिक अधिकारों को कुचला जा सकता है, उन्हें जमानत पाने से भी रोका जा सकता है, और बरसों तक बिना किसी सुनवाई के, बिना किसी ठोस सुबूत के उन्हें जेलों में बंद करके रखा जा सकता है। यह सारा कानूनी इंतजाम अंग्रेजों के वक्त किया गया था ताकि हिंदुस्तानियों को अदालतों के ढकोसले से भी कोई राहत ना मिल सके, और आजाद हिंदुस्तान की काली सरकारों ने भी इन गोरे कानूनों को और अधिक कड़ा बनाकर जारी रखा और अपने ही लोगों की असहमति को कुचलने का काम किया। हिंदुस्तान में किसी को कुचलना हो तो उसके घर से नक्सलियों के बारे में एक किताब का बरामद होना काफी रहता है. पता नहीं संसद की लाइब्रेरी में नक्सलियों के बारे में किताबें हैं या नहीं, सुप्रीम कोर्ट की लाइब्रेरी में नक्सलियों की किताबें हैं या नहीं। लोकतंत्र से असहमति रखने की किताबें भी अगर किसी को 9 बरस तक जेल में डालने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल की जा रही है, तो इस पर धिक्कार है। और कर्नाटक के बारे में यह बात समझने की जरूरत है कि यह 2012 में दर्ज मामला है, और तबसे लेकर अब तक वहां पर भाजपा, कांग्रेस, जनता दल, इन सभी की सरकारें रहीं, इन तीनों पार्टियों के मुख्यमंत्री रहे लेकिन एक गरीब आदिवासी छात्र को उसके बूढ़े बाप के साथ जेल में फंसाकर रखा गया और वे अदालत के धक्के खाते रहे।


हिंदुस्तान में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो या किसी भी गठबंधन की, उन्होंने कभी ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों को हटाने के बारे में कोई कोशिश नहीं की। जब जो सत्ता में रहते हैं उन्हें ऐसा चाबुक पसंद आता है, उन्हें ऐसी हथकड़ी पसंद आती है, जिसे असहमत लोगों के हाथों पर डाला जाए, उन्हें असहमति की जुबान छीन लेने के औजार पसंद आते हैं, और इसलिए हिंदुस्तान में ऐसे भयानक कानून और कड़े बनाए जा रहे हैं। 1967 में बनाया गया यूएपीए कानून 2019 में मोदी सरकार ने संसद में एक संशोधन करके और कड़ा कर दिया, और उसमें कई किस्म की धाराएं जोड़ दीं जिसमें जांच एजेंसियों और मुकदमा चलाने वाली एजेंसी पर से जिम्मेदारी हटा दी गई, और बेकसूर नागरिकों के अधिकार और घटा दिए गए। लोकतंत्र में कानून की जो बुनियादी जरूरतें रहती हैं उन सबको घटाते हुए कानून को इतना कड़ा कर दिया गया है कि जिसके खिलाफ यह इस्तेमाल हो उसके बचने की कोई गुंजाइश न रहे, और 10-20 बरस बाद जाकर हिंदुस्तान के कुछ मुसलमान अगर आतंक के आरोपों से निकलकर बाहर आ रहे हैं तो उनकी जिंदगी भी क्या जिंदगी बच जाती है?

20-20, 25-25 बरस तक लोग जेलों में कैद रहे आतंक के मुकदमे झेलते रहे और आखिर में बिना किसी सबूत के उनको छोड़ देना पड़ा क्योंकि सुबूत कभी था ही नहीं। लोगों को केवल खुली जमीन से हटाने और इसे दूसरे लोगों के लिए एक धमकी की तरह इस्तेमाल करने की नीयत केंद्र सरकार की भी रही, राज्य सरकारों की भी रही, और इनसे शायद ही कोई पार्टी बची रही। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक, और ममता बनर्जी से लेकर दूसरे क्षेत्रीय दलों के मुख्यमंत्रियों तक इन सबने ऐसे कानूनों को एक ताकतवर हथियार की शक्ल में पाया, और उसका जमकर इस्तेमाल किया। दिक्कत यह है कि देश के सुप्रीम कोर्ट तक ने इन कानूनों के अलोकतांत्रिक होने के बारे में कोई फैसले नहीं दिए, और सरकारें मनमर्जी से इनका इस्तेमाल कर रही हैं।

(Daily chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अक्टूबर 2021


 

तालिबान ने हिंदुस्तान में गोडसे की पूजा देखकर तो अपने आत्मघाती हमलावरों का अभिनन्दन नहीं सीखा?

 23 अक्टूबर 2021


अफगानिस्तान 2011 में जब अमेरिकी फौजों के काबू में था, और कहने के लिए वहां पर एक स्थानीय सरकार थी, उस वक्त काबुल के एक पांच सितारा होटल में तालिबान ने एक आत्मघाती हमला किया था, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे, मरने वालों में बहुत से अफगानी भी थे. अभी 9 साल बाद तालिबान ने उन आत्मघाती हमलावरों के परिवारों को उसी होटल में न्योता देकर बुलाया और उन्हें पैसे और तोहफे दिए, उनका सम्मान किया। इस मौके पर अफगानिस्तान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी भी मौजूद थे और उन्होंने कहा कि ये आत्मघाती हमलावर देश के, और हमारे हीरो हैं। इन हमलावरों के परिवारों को नगद रकम के साथ एक-एक जमीन देने का वादा भी तालिबान ने किया था और अब सरकार बनने पर उसे पूरा किया जा रहा है। इस बात को लेकर अफगानिस्तान के बहुत से दूसरे लोग नाराज भी हैं क्योंकि इस तरह के जितने आत्मघाती हमले तालिबान आतंकियों ने किए थे, उनमें मरने वाले अधिकतर अफगान ही थे। जिस होटल में यह सम्मान समारोह हुआ उस होटल पर तालिबान ने दो बार हमला किया था जिसमें दर्जनों अफगान मारे गए थे। आज तालिबान ने इन हमलावरों की तारीफ में एक वीडियो भी जारी किया है जिसमें उन हमलों में इस्तेमाल की हुई आत्मघाती जैकेट को भी दिखाया गया है. एक आतंकी कहे जाने वाले और अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित संगठन, हक्कानी नेटवर्क, के मुखिया आज अफगानिस्तान के गृह मंत्री हैं और उन्होंने खुलकर यह बात कही है कि दुनिया चाहे कुछ भी कहे आत्मघाती हमलावर हमारे हीरो हैं और बने रहेंगे।

आज इस मामले पर लिखने की जरूरत क्यों लग रही है? यह तो अफगानिस्तान का एक ऐसा अलोकतांत्रिक मामला है जिसकी कि आदत अफगानिस्तान में लोगों को पड़ चुकी है, और ऐसे ही तालिबानी आतंक के बढ़ते-बढ़ते आज हालत यहां तक आ गई है कि वहां औरतों को इंसान नहीं माना जाता। अब सुना जा रहा है कि दूसरे धर्म के लोगों को बाहर निकलने कहा जा रहा है, और खुद मुस्लिम धर्म को मानने वाले शिया समुदाय के लोगों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है। तो ऐसे देश के बारे में वहां अगर आतंकियों का सम्मान हो रहा है तो उस बारे में लिखने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? यह सवाल कुछ पाठकों के मन में उठ सकता है इसलिए यह लिख देना ठीक है कि इतिहास से सबक लेना तो बहुत से लोग सुझाते हैं लेकिन वर्तमान से भी सबक लेना चाहिए और अड़ोस-पड़ोस से भी सबक लेना चाहिए यह तमाम लोग नहीं सुझाते। आज हालत यह है कि हिंदुस्तान में दिल्ली हरियाणा सरहद पर किसान आंदोलन के करीब एक सिख धर्म ग्रंथ की बेअदबी का आरोप लगाकर सिख निहंगों ने जिस तरह एक दलित को काट-काटकर टांग दिया, उसे तालिबानी हिंसा से जोडक़र देखने की जरूरत है। तालिबान का किया हुआ सब कुछ अपने धर्म के नाम पर किया हुआ बताया जाता है, महिलाओं के हक कुचल देना भी शरीयत के नाम पर बतलाया जाता है, और हाथ-पैर काटने की सजा भी वहां चौराहों पर दी जाती है और नई तालिबान सरकार ने भी चौराहे पर सिर कलम करने की वह पुरानी सजा कायम रखने की घोषणा की है।

कुछ ऐसा ही मिजाज हिंदुस्तान में धर्म के नाम पर एक इंसान के टुकड़े कर देने का है, और इस हत्यारे निहंग के पुलिस में समर्पण करने जाने के पहले दूसरे निहंगों की तरफ से सार्वजनिक अभिनंदन किया गया और लोगों ने इसे गर्व की बात माना। कुछ ऐसी किस्म की बात देश में दूसरी कई जगहों पर दूसरे धर्मों के लोगों के बीच होती है। राजस्थान में एक किसी मुस्लिम को मारने वाले और उसका वीडियो बनाने वाले हिंदू का सार्वजनिक रूप से अभिनंदन किया गया था। उत्तर प्रदेश की एक छोटी पार्टी जो अपनी सांप्रदायिकता के लिए जानी जाती है, उसने घोषणा की थी कि वह मोहम्मद अफऱाज़ुल नाम के मजदूर को सार्वजनिक रूप से मारने और उसे जिंदा जलाने वाले शंभू लाल रैगर को आगरा से लोकसभा का चुनाव लड़वाएगी। राजस्थान में 3 बरस पहले, बाबरी मस्जिद गिराने के दिन 6 दिसंबर को इस शंभूलाल ने इस मुस्लिम मजदूर को बिना किसी भडक़ावे के, बिना किसी तनाव के, सार्वजनिक जगह पर मारा, जिंदा जलाया, और उसका वीडियो बनाकर चारों तरफ बांटा। उस हत्यारे का भी सम्मान किया गया। ऐसा कई जगह हुआ है। कई जगहों पर गाय ले जाने के आरोप में किसी मुस्लिम को पीट-पीटकर मारने वाले लोगों का सम्मान होता है, तो नाथूराम गोडसे का सम्मान तो होते ही रहता है, जगह-जगह उसकी प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, जगह-जगह उसके मंदिर बनाए जाते हैं, और उसे महिमामंडित करना बंद ही नहीं होता है।

हिंदुस्तान के बड़े तबके में तालिबान को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है और अगर हिंदुस्तान के किसी संगठन का किसी व्यक्ति का तालिबान से कोई जुबानी नाता भी जोड़ दिया जाए तो उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हो जा रही है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान में जगह-जगह धर्म के आधार पर, नफरत के आधार पर, जब सार्वजनिक रूप से किसी को मारा जा रहा है और हत्यारे का इस तरह सार्वजनिक अभिनंदन हो रहा है, तो ऐसे लोगों में और तालिबान में फर्क क्या है? जिस निहंग ने अभी एक दलित को काटकर टुकड़े टांग दिए वह तालिबान से किस मायने में अलग है? ऐसे ही पंजाब के आतंक के दिनों में भिंडरावाले के आतंकियों ने लगातार छंाट-छाँटकर हिंदुओं को मारा था, और उन हत्यारों का स्वर्ण मंदिर में कितनी ही बार सम्मान हुआ था। अब आतंकियों का ऐसा सम्मान और आत्मघाती तालिबानों का ऐसा सम्मान, इसमें फर्क अगर कोई ढूंढना चाहे तो ढूंढ ले, हमको तो इसमें कोई फर्क दिखता नहीं है। दोनों ही धर्म के नाम पर किए गए हथियारबंद आतंक हैं, जो कातिल थे, कातिल हैं, और कातिल ही रहेंगे। इसलिए दुनिया को महज इतिहास से सबक लेने की जरूरत नहीं रहती, दुनिया को अधिक बड़ा सबक वर्तमान से मिल सकता है. यह देखने की जरूरत है कि जब धर्म के नाम पर हिंसा आगे बढ़ती है और जब धर्म के नाम पर किसी इलाके या देश का राज्य चलाया जाता है तो वह धर्म किस तरह कातिल हो जाता है, वह किस तरह हत्याएं करने लगता है, उसमें इंसाफ की कोई भी गुंजाइश नहीं बच जाती है। इस बात को समझने की जरूरत है जिन लोगों को आज हिंदुस्तान को एक हिंदू राज्य बनाने की सनक सवार है, उन्हें यह भी देखना चाहिए कि अफगानिस्तान में आज मुस्लिम दूसरे धर्मों के लोगों को कम मार रहे हैं, खुद मुस्लिमों को अधिक मार रहे हैं। ऐसा ही एक संगठन के मुस्लिम आतंकियों ने पाकिस्तान में दूसरे समुदाय के मुस्लिम नागरिकों के साथ किया। धर्म पहले तो दूसरे धर्म के लोगों को मारता है, लेकिन बाद में वह अपने ही धर्म के अलग-अलग समुदाय के लोगों को मारना शुरू करता है। इसलिए तालिबान को हत्यारा मानना और निहंग को या शंभूनाथ रैगर को अलग मानना एक परले दर्जे की बेवकूफी की बात होगी। किसी भी लोकतंत्र में समझदारी की बात यही होगी कि ऐसे तमाम धर्मांध आतंकी संगठनों को काबू में करना, जेल भेजना, सजा दिलवाना, और खत्म करना।  लेकिन फिर गोडसे की प्रतिमाएं कैसे लग सकेंगी? कहीं तालिबान ने हिंदुस्तान में गोडसे की पूजा देखकर तो अपने आत्मघाती हमलावरों का अभिनन्दन नहीं सीखा?

धर्म को कितनी अराजकता की इजाजत मिलनी चाहिए देश में?

  22 अक्टूबर 2021


हिंदुस्तान के एक बहुत चर्चित फिल्म कलाकार आमिर खान ने दिवाली के ठीक पहले यह सलाह दी कि लोग सडक़ों पर पटाखे ना फोड़ें। उनकी यह सलाह कोई निजी सलाह नहीं थी, बल्कि टायर बनाने वाली एक कंपनी के एक इश्तहार में उन्होंने यह बात कही। इस तरह इस इश्तहार के लिए मोटे तौर पर यह कंपनी जिम्मेदार थी और क्योंकि टायर का सडक़ों से लेना-देना रहता है इसलिए शायद टायर कंपनी को सडक़ों को महफूज रखना भी सूझा होगा। खैर जो भी हो आमिर खान और उनकी पिछली पत्नी कुछ बरस पहले भी एक विवाद में थे जब उनकी पूर्व पत्नी किरण राव ने भारत में रहने में अपने को सुरक्षित न महसूस करने की बात कही थी। उस बात को लेकर भी सोशल मीडिया पर बात का मतलब समझे और निकाले बिना दुर्भावना से उनके खिलाफ एक बड़ा अभियान चला था, और उसके बाद से आमिर तकरीबन चुप चल रहे थे। अब आमिर खान को दिखाने वाले इस इश्तहार के बारे में कर्नाटक के एक सांप्रदायिक मिजाज वाले भाजपा सांसद अनंत कुमार हेगड़े ने इस टायर कंपनी को चि_ी लिखकर कहा है कि इस विज्ञापन से हिंदुओं में नाराजगी है। उन्होंने लिखा है- आमिर खान इस इश्तहार में लोगों को सडक़ों पर पटाखे नहीं जलाने की सलाह दे रहे हैं, जो कि बहुत अच्छा संदेश है, सार्वजनिक के मुद्दों पर आपकी चिंता के लिए मैं आपकी सराहना करता हूं, और आपसे एक और समस्या के समाधान का अनुरोध करता हूं जिसमें शुक्रवार और अन्य महत्वपूर्ण त्योहारों के दिन नमाज पढऩे के नाम पर मुस्लिमों द्वारा सडक़ें जाम कर दी जाती हैं। उन्होंने लिखा कि कई भारतीय शहरों में यह बहुत आम नजारा है और ऐसे वक्त एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी गाडिय़ां भी ट्रैफिक जाम में फंस जाती हैं जिसे बड़ा नुकसान होता है. सांसद हेगड़े ने यह भी लिखा है कि वह अपनी कंपनी के विज्ञापनों में ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा भी उठाएं क्योंकि हमारे देश में मस्जिदों के ऊपर लगे लाउडस्पीकर से अजान के समय बहुत अधिक शोर होता है।

आमिर खान ने शायद अपने मन की बात नहीं कही है और एक विज्ञापन में उनसे जो कहने के लिए कहा गया वह कहा हो, और इस कंपनी के मालिक गोयनका तो एक हिंदू हैं इसलिए ऐसा खतरा नहीं लगा होगा कि एक मुस्लिम अपने पैसे से पटाखों के खिलाफ अभियान चला रहा है। भाजपा के इस सांसद से ऐसी ही प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही थी क्योंकि उनका पुराना रिकॉर्ड कुछ इसी किस्म का रहा है। लेकिन इन दोनों पक्षों की नीयत से परे हम इस मुद्दे पर आना चाहते हैं जिसमें चाहे एक हिंदू त्योहार दिवाली पर चारों तरफ अंधाधुंध पटाखे जलाकर इतना प्रदूषण फैला दिया जाता है कि दमे के मरीजों को सांस के मरीजों को भारी तकलीफ होने लगती है और उनके लिए बड़ा खतरा इक_ा हो जाता है। भारत के शहरों के वैज्ञानिक परीक्षण बतलाते हैं कि दिवाली के पटाखों से प्रदूषण का स्तर कितना बढ़ जाता है और हवा कितनी जहरीली हो जाती है इसलिए किसी बारात में फूटने वाले पटाखे या किसी के जुलूस में फूटने वाले पटाखों से परे दिवाली के पटाखों में फर्क यह है कि एक साथ कुछ घंटों में अंधाधुंध संख्या में फूटने वाले रहते हैं और उसे हवा में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाता है।

लेकिन भाजपा सांसद अनंत हेगड़े ने जो दूसरा मुद्दा उठाया है वह मुद्दा भी सही है कि नमाज पढऩे के लिए सडक़ों को कैसे रोका जा सकता है? हिंदुस्तान में जहां पर कि सांप्रदायिक नजरिए से धर्मों के बीच एक अंधा मुकाबला चलता है और एक धर्म सार्वजनिक जीवन को बर्बाद करने के लिए दूसरे धर्म से अधिक गैर जिम्मेदारी दिखाने में लगे रहता है. ऐसे में अगर नमाज से जाम होने वाली सडक़ों के मुकाबले अगर हिंदू मंदिरों के सामने कोई विशाल आरती होने लगे सडक़ों के बीच विशाल भंडारा लगने लगे तो क्या होगा? नमाज तो हफ्ते में एक दिन पढ़ी जाती है, लेकिन आरती तो सडक़ों पर रोज की जा सकती है, दिन में दो बार की जा सकती है। इसका मुकाबला कैसे तय होगा कि किसे कितनी इजाजत मिले? हेगड़े ने मस्जिदों से लाउडस्पीकर से दी जाने वाली अजान की बात उठाई है। दिन में कई बार कुछ -कुछ मिनटों की यह अजान बहुत से लोगों के लिए दिक्कत खड़ी करती है लेकिन इसके टक्कर में साल में कई-कई दिन, शायद दर्जनों दिन हिंदू मंदिरों से और हिंदू धार्मिक आयोजनों से रात-रात भर जगराते के लाउडस्पीकर बजते हैं, अखंड रामधुन एक-एक हफ्ते चलती है, और तरह-तरह के घरेलू हवन और यज्ञ में भी लाउडस्पीकर लगा दिया जाता है। अब इसका हिसाब कैसे लगाया जाए कि दिन में 5 बार अजान में कितने वक्त लाउडस्पीकर चलता है, और अखंड रामधुन में उससे कम घंटे चलता है या उससे अधिक घंटे चलता है?

 धर्म से परे भी अगर हम ध्वनि प्रदूषण की बात करें, तो जितने धार्मिक जुलूस निकलते हैं, उन्हीं के टक्कर के लाउडस्पीकर शादी की बारात में भी चलते हैं, किसी तरह के विजय जुलूस में भी चलते हैं, और मोटे तौर पर लाउडस्पीकर का कारोबार करने वाले लोग कानून को हाथ में लेकर चलते हैं, और अपने को मिलने वाले पैसों को जायज ठहराने के लिए अधिक से अधिक ऊंची आवाज में इसे बजाते हैं। यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है, सार्वजनिक जीवन में अराजकता पूरी तरह खत्म होनी चाहिए चाहे, वह सडक़ों पर नमाज हो, चाहे वह सडक़ की चौड़ाई को घेरते हुए गणेश और दुर्गा बैठाने का मामला हो, चाहे वह प्रतिमा स्थापना और विसर्जन के जुलूस हों, चाहे वे किसी रिहायशी इलाके में किसी मंदिर या गुरुद्वारे में बजने वाले लाउडस्पीकर हों। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। राजनीतिक दल धार्मिक तत्वों को खुश करने के लिए कभी इन पर कोई कार्यवाही नहीं करेंगे और कट्टरता बढ़ते-बढ़ते ऐसी बढ़ती है कि अभी धर्मांध निहंगों ने एक गरीब दलित को काट-काट कर उसके बदन के हिस्से टांग दिए और हत्यारे का सार्वजनिक अभिनंदन करते हुए उसे पुलिस के सामने पेश किया गया। यह सिलसिला देश में हाल के वर्षों में एक सबसे ही खतरनाक, वीभत्स, और हिंसक मामला था जिससे कुछ लोग हिले हैं, और कुछ लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि धर्म के नाम पर तमाम हिंसा उन्हें जायज लगती है।

हिंदुस्तान में केवल अदालतों को यह काम करना पड़ेगा कि वह धर्म के सार्वजनिक पहलू को काबू में करें, और किसी का जीना हराम न होने दें। आज हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के ढेर सारे फैसलों और आदेशों के बावजूद धर्म बेकाबू है, और धर्मांध लोग अंधाधुंध हिंसा करते हैं जो उन्हें खुद को हिंसा नहीं दिखती। एक धर्म के लोगों को मिसाल के तौर पर दूसरे धर्म की अराजकता और हिंसा हासिल रहती है और देखा-देखी सिलसिला बढ़ते चले जा रहा है। इस सिलसिले को खत्म करना चाहिए। धर्म एक निजी आस्था का सामान रहना चाहिए जिसके लिए लोग अपनी निजी जगह पर आराधना करें, न कि सार्वजनिक जगह पर अवैध कब्जा करके, अवैध निर्माण करके, नियम-कानून को तोड़ते हुए आराधना करें, लाउडस्पीकर बजाएं। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। धर्म आज हिंदुस्तान की एक सबसे बड़ी दिक्कत हो गई है, एक सबसे बड़ा खतरा बन गया है, जिससे उबरने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अक्टूबर 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अक्टूबर 2021


 

गालियां ही नाशुक्रे इंसानों की जान बचाने के काम आ रही हैं..

  21 अक्टूबर 2021


हिंदुस्तान और दूसरे बहुत से देशों की अलग-अलग जुबान में सूअर को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। ठीक उसी तरह जिस तरह की कुत्ते को, या सांप को। जबकि सूअर दुनिया के बहुत से देशों में लोगों के खाने के काम भी आता है, और गंदगी को साफ भी करता है। इस पर भी लोग उसे बहुत बुरी गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं और कुछ धर्मों में तो सूअर को बहुत ही बुरा माना जाता है, और अगर उस धर्म के लोगों को भडक़ाना हो तो किसी एक सूअर को मारकर उस धर्म के धर्मस्थल पर फेंक देना दंगा शुरू करवाने की पर्याप्त वजह हो सकती है। सूअर को लोग गाली की तरह अपने घर-परिवार के सामने या क्लास के बच्चों के सामने इस्तेमाल करते हैं। किसी ने कोई बहुत बुरा काम किया तो उसे कहा जाता है कि सूअर जैसा काम मत करो, मानो कि सूअर बहुत बुरा काम करता है। आमतौर पर जानवरों के खिलाफ जितने किस्म की कहावतें और मुहावरे प्रचलन में रहते हैं, उन्हें देखते हुए हम कई बार इस जगह पर लिखते हैं कि इंसानों को अपनी भाषा से बेइंसाफी खत्म करनी चाहिए। लेकिन कहावतें और मुहावरे उसी युग के बने हुए हैं जिस वक्त जानवरों के अधिकारों का सम्मान करना तो दूर रहा, खुद इंसानों में शूद्रों का सिर्फ अपमान होता था, महिलाओं का सिर्फ अपमान होता था, और किसी किस्म की गंभीर बीमारी, विकलांगता वाले लोग गाली बनाने के ही काम के माने जाते थे। इसलिए अब जब सूअर को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो आज की 2 खबरें याद पड़ती हैं।

यूरोप में हालैंड के एमस्टरडम एयरपोर्ट के आसपास किसान एक मीठी कंद उगाते हैं, और जब मिट्टी खोदकर फसल निकाली जाती है तो कंद के कुछ टुकड़े जमीन में रह जाते हैं और कंद के साथ-साथ कुछ तरह के केंचुए वगैरह बाहर आ जाते हैं। इनको खाने के लिए वहां पर बड़े-बड़े पंछी टूट पड़ते हैं, और लगे हुए एयरपोर्ट पर आते-जाते विमानों के लिए खतरा बन जाते हैं। विमानों के जेट इंजन में अगर कोई बड़ा पंछी चले जाए तो क्रैश लैंडिंग करने की नौबत भी आ जाती है। ऐसे में इस एयरपोर्ट ने एक तरकीब निकाली है, उसने ऐसे खेतों के एक हिस्से में 20 सूअर छोड़ दिए जो कि निकली हुई कंद को तेजी से खाकर खत्म कर रहे थे और एक दिन के भीतर ही उन्होंने कंद के निकले हुए सारे टुकड़े खत्म कर दिए। नतीजा यह हुआ कि यहां पंछियों का आना रुक गया। दूसरी तरफ एयरपोर्ट के एक अलग तरह तरफ, इतनी ही जमीन को बिना सूअर रखा गया और वहां फसल से निकले गए मीठे कंद के टुकड़े पड़े रहे, और उन्हें खाने के लिए बड़े-बड़े पंछी पहुंचते रहे। अब एयरपोर्ट के आसपास के इलाके को पंछियों से मुक्त रखने के लिए यह तरकीब दूसरी जगहों पर भी आजमाने की बात चल रही है।

लेकिन एक दूसरी खबर यूरोप से अलग अमेरिका के न्यूयॉर्क से आई है जहां पर चिकित्सा वैज्ञानिकों ने एक सूअर की किडनी को एक इंसान के शरीर से जोड़ दिया है और वह किडनी ठीक से काम कर रही है। इस ट्रांसप्लांट के पहले सूअर के जींस में इंसानी जींस भी डाले गए थे ताकि मानव शरीर सूअर की किडनी को तुरंत खारिज ना कर दे। यह प्रयोग ब्रेन डेड घोषित हो चुके एक मरीज के शरीर पर उसके परिवार की इजाजत से किया गया, और सूअर की किडनी को इस मरीज के शरीर के बाहर ही रखा गया था जहां वह मरीज की खून की नलियों के साथ ठीक से काम करते रही। डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट के इस प्रयोग को पूरी तरह सामान्य बतलाया है और इसे पहली बार दूसरे प्राणी की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट भी कहा है। आज दुनिया भर में एक लाख से अधिक लोग अंग प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं जिसमें से 90 हजार सिर्फ किडनी की कतार में हैं।

यह बात कई बरस पहले भी सामने आई थी जब यह कहा गया था कि सूअर का शरीर इंसान के शरीर से सबसे अधिक मिलता-जुलता है और किसी दिन सूअर के अंग इंसान को लग सकेंगे, इससे दो किस्म की नैतिक अड़चन आ रही थी एक तो यह कि कई धर्मों में सूअर को बहुत ही निकृष्ट प्राणी माना जाता है, ऐसे धर्म के लोग सूअर के अंग लगे हुए इंसानों को क्या मानेंगे? इंसान मानेंगे या सूअर मानेंगे? दूसरा नैतिक सवाल यह खड़ा होता है कि सूअर को इंसान के करीब लाने के लिए जब इंसान के जींस सूअर के शरीर में डाले जाते हैं, तो फिर वह सूअर क्या खाने के काम में भी लाया जा सकता है? या उसे खाना इंसानों के एक हिस्से को खाने जैसा तो नहीं मान लिया जाएगा? लेकिन ये दोनों नैतिक सवाल ऐसे नहीं हैं जिनका रास्ता न निकल सके। सूअर के अंग लगवाना तो दूर की बात है, आज भी अलग-अलग धर्मों के लोग अलग-अलग किस्म से काटे गए जानवरों को ही खाते हैं। मुस्लिमों के तरीके से काटे गए जानवरों को सिक्ख नहीं खाते और सिक्खों के तरीके से काटे गए जानवरों को मुस्लिम नहीं खाते। ऐसा ही कुछ और धर्मों में भी है। लेकिन परहेज की अपनी सीमाएं हैं, जिनको मानने में किसी को बहुत दिक्कत भी नहीं होती। इसी तरह जिन इंसानों को सूअर की किडनी या उसके दूसरे अंगों से परहेज नहीं होगा वही ऐसे अंग लगवाएंगे, और जिन्हें सूअर से परहेज है, वे या तो इंसानी अंग का इंतजार करेंगे या चल बसेंगे।

अभी हम इस बहस में पडऩा नहीं चाहते कि एक जानवर को उसके अंगों के लिए इस तरह से मारना कितनी बड़ी हिंसा है। क्योंकि उसके अंगों के लिए नहीं तो उसके मांस के लिए उसे मारा तो जाता ही है। इसलिए किसी जानवर का मारा जाना इतना बड़ा नहीं नैतिक मुद्दा भी नहीं है और वैज्ञानिक मुद्दा तो है ही नहीं। देखना यही है कि जिस सूअर को सबसे गंदा और सबसे निकृष्ट प्राणी मानकर लोग जिससे नफरत करते हैं, और बिना किसी वजह के नफरत करते हैं, उस प्राणी के बचाए हुए लोग बचना चाहेंगे या नहीं बचना चाहेंगे?

फिलहाल तो लोगों को अपनी जुबान सुधारनी चाहिए और पशु-पक्षियों को गालियां देना बंद करना चाहिए। ऐसा इसलिए भी करना चाहिए कि कुछ विज्ञान कथाओं में पहले भी ऐसा जिक्र हुआ है जिसमें इंसानों की नस्ल के करीब के माने जाने वाले बन्दर जैसे किसी प्राणी के शरीर में इंसान के जींस डालकर उसे एक टापू पर रेडियो कॉलर लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जिस दिन उस इंसान को अंग प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है तो वह पहुंचकर उस टापू के अस्पताल में भर्ती होते हैं, और रेडियो कॉलर के रास्ते उस प्राणी को ढूंढकर लाया जाता है, और उसके शरीर के अंग निकालकर इंसान को लगाए जाते हैं। रॉबिन कुक नाम के एक विज्ञान उपन्यासकार ने दशकों पहले यह कहानी लिखी थी जो कि अभी न्यूयॉर्क में सही साबित होते दिख रही है, और ठीक उस कहानी की तरह पहले सूअर के शरीर में इंसान के जींस डाले गए ताकि उसके अंग इस तरह तैयार रहें कि इंसान का शरीर उन्हें तुरंत ही रिजेक्ट ना कर दे। जानवर आज भी इंसानों के काम आ रहे हैं और आगे भी काम आते रहेंगे। इसलिए लोगों को अपनी कहावतें और मुहावरे सुधारने चाहिए, अपनी बोलचाल की और लिखने की भाषा भी सुधारनी चाहिए और कुत्ते, सूअर इन सबको गालियों की तरह इस्तेमाल करना बंद करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अक्टूबर 2021


 

उत्तराखंड पर कुदरत की लगातार मार से सबक लेने की जरूरत पूरे देश को है..

 

  20 अक्टूबर 2021


करीब 2 बरस की कोरोना के रुकावट के बाद अब उत्तराखंड में चार धाम की यात्रा शुरू होने को थी, कानूनी दिक्कतें भी सब हट गई थीं, और वहां पर ऐसी बाढ़ आई है कि अब तक 50 के करीब मौतें हो चुकी हैं, बहुत से लोग गायब हैं। भारी बारिश हुई है, नदियां उफन रही हैं, बड़े-बड़े रास्ते बंद हैं, सैलानी जगह-जगह फंसे हुए हैं, और फौज बचाव के काम में लगी हुई है। मौतों की तकलीफ से परे एक बात यह भी है कि उत्तराखंड का पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है, देश भर से आए पर्यटक जगह-जगह फंसे हुए हैं और उन्हें बचाना एक बड़ी चुनौती हो गई है। इससे तुरंत मुसीबत से परे यह बात भी है कि प्रदेश में बहुत सी जगहों पर किसानों की फसल को भारी नुकसान हुआ है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले केदारनाथ में जो भयानक बाढ़ आई थी और जिसमें हजारों मौतों का अंदाज था, हजारों लोगों का अभी तक कोई पता भी नहीं चला है, उसके बाद यह एक बड़ा हादसा है हालांकि मौतें कम हैं लेकिन सैलानी जिस तरह प्रभावित हुए हैं उससे यह बात साफ है कि आने वाले वक्त में भी सैलानी यहां आने से कतराएंगे। दूसरी तरफ यही एक ऐसा वक्त है जब कश्मीर पहुंचने वाले सैलानी वहां छाँट-छाँट कर की जा रही हत्याओं को लेकर सदमे में हैं और कश्मीर का पर्यटन कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित होने जा रहा है।

उत्तराखंड के इस ताजा प्राकृतिक हादसे के कई पहलू हैं। पहली बात तो यह कि पूरी दुनिया में मौसम की जो सबसे बड़ी और सबसे कड़ी मार के मौके हैं, वे लगातार बढ़ते चल रहे हैं, और वेदर एक्सट्रीम कही जाने वाली घटनाएं बार-बार हो रही हैं। मौसम में जो तब्दीली इंसानों की करतूतों से आई है, उसी का नतीजा आज उत्तराखंड में इस तरह देखने मिल रहा है। इसके पहले भी लोग लगातार यह बात कर रहे थे कि क्या भारत के पहाड़ी इलाके सचमुच ही इतने पर्यटकों को झेलने की हालत में हैं? क्या वहां पर इतनी सैलानी गाडिय़ों का धुआं, सैलानियों का इतना कचरा, सैलानियों का लाया हुआ खपत का इतना प्रदूषण, क्या ये पहाड़ सचमुच इतना सब कुछ झेलने की हालत में हैं? लगातार होटलों को बनाने के लिए, सडक़ों को चौड़ा करने के लिए, पुल बनाने के लिए, पेड़ कट रहे हैं, जंगल घट रहे हैं, और पत्थरों का सीना चीरकर लोगों की आवाजाही का, रहने का रास्ता तैयार किया जा रहा है। इन सबसे इस पहाड़ी इलाके की प्रकृति पर बड़ा बुरा असर पड़ रहा है जो कि पहले भी भूकंप के खतरे के बीच रहती है। इसलिए आज बिना देर किए यह भी सोचने की जरूरत है कि हिंदुस्तान के पर्यटन केंद्र कितने लोगों को झेल सकते हैं, किन मौसमों में झेल सकते हैं, और अगर पर्यटन उद्योग घटता है, तो फिर इन इलाकों की अर्थव्यवस्था का क्या होगा, क्योंकि यहां का कारोबार कश्मीर के कारोबार की तरह ही सैलानियों पर जिंदा रहता है। आतंक की वारदातों से या प्राकृतिक विपदाओं से जब कभी सैलानी घट जायेंगे तो इस इलाके में रोजगार की बहुत बड़ी दिक्कत खड़ी होगी। इसलिए पर्यटन कारोबार, प्राकृतिक विपदाओं, और जलवायु परिवर्तन के बीच एक संतुलन बनाकर चलना पड़ेगा जो कि आसान बात नहीं है। हिंदुस्तान जैसे देश में जहां पर पर्यटन कारोबार को नियंत्रित करने का अधिकतर अधिकार राज्य सरकारों का रहता है, वहां पर बहुत सोच-विचारकर कोई काम इसलिए नहीं होता कि राज्य सरकारें 5 बरस के लिए ही आती हैं और उन्हें उससे अधिक वक्त की बहुत फिक्र भी नहीं रहती। इसी उत्तराखंड के बारे में यह बात समझने की जरूरत है कि किस तरह वहां हर एक-दो बरस में मुख्यमंत्री बदलते आए हैं, तो ऐसे बदलते हुए मुख्यमंत्रियों से बहुत दीर्घकालीन योजनाओं की उम्मीद भी नहीं की जा सकती।

दूसरी बात यह भी है कि हिंदुस्तान जैसे बड़े देश को जो कि बहुत विविधताओं वाला है और जहां पर पर्यटन के चुनिंदा इलाकों के बहुत से विकल्प हो सकते हैं, जहां पर बहुत सी  ऐसी अच्छी जगहें बाकी हैं जहां पर अभी तक सैलानियों के जाने का कोई ढांचा नहीं बना है, तो हिमाचल, उत्तराखंड, कश्मीर जैसे परंपरागत पहाड़ी पर्यटन केंद्रों के साथ-साथ ऐसे दूसरे पर्यटन केंद्र भी विकसित करने की जरूरत है जिससे देश में कारोबार के कुल जमा मौके कम न हों। वैसे हो सकता है कि किसी एक प्रदेश में मौके कम हों, लेकिन हिंदुस्तान जैसे देश में तो लोग सारे प्रदेशों में आ-जाकर वहां कोई न कोई रोजगार और कारोबार ढूंढ ही लेते हैं। इसलिए देश को राष्ट्रीय स्तर पर यह सोचना चाहिए कि साल के  अलग-अलग महीनों के लिए लोगों के पास समंदर से लेकर पहाड़ तक कौन से विकल्प हो सकते हैं? ऐसा करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छा होगा और देश का राष्ट्रीय एकता का ढांचा भी इससे विकसित होगा। आज देश के लोकप्रिय पर्यटन केंद्र भीड़ से भरे रहते हैं, और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में ऐसे प्रदेश हैं जिनको लोगों ने देखा भी नहीं रहता। कुदरत की ऐसी मार को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर पूरे कैलेंडर को सामने रखकर, और अलग-अलग किस्म की जगहों को उनके मौसम के मुताबिक जांचकर पर्यटन का एक ढांचा विकसित करना चाहिए जिससे लोगों को भी जाने-आने का, देश को देखने का मौका मिले।

जिम्मेदार-जागरूक इंसानों की पूरी देह सिमट गई है महज आंखों और एक अंगूठे तक !

 

  19 अक्टूबर 2021


अमरीका के लोग अपने अधिकारों को लेकर दुनिया में सबसे अधिक चौकन्ने लोगों में माने जाते हैं, और आज हालत यह है कि कोरोनावायरस की महामारी के बीच भी अमेरिकी लोग अपनी सरकारों से लड़ रहे हैं कि वे मास्क नहीं लगाएंगे, या टीके नहीं लगवाएंगे, और इसके बावजूद वे विमान में सफर करना चाहेंगे, या दफ्तर में काम करने जाना चाहेंगे। अधिकारों की यह पराकाष्ठा अमेरिका की तरह किसी और देश में देखने नहीं मिलती जहां लोग महामारी के बीच भी सडक़ों पर आकर मास्क जलाकर अपना रुख जाहिर करते थे और सरकारी प्रतिबंधों का विरोध करते थे। ऐसे अमेरिका में एक ताजा मामला सामने आया है जिसे अधिकारों की इस जागरूकता से जोडक़र देखने की जरूरत है।

अमरीका के फिलाडेल्फिया राज्य में एक ट्रेन में सफर कर रही महिला के बगल में बैठे हुए एक निहत्थे मुसाफिर ने उसके कपड़े फाडऩा शुरू कर दिया और फिर वहीं उसके साथ बलात्कार किया। वह अकेली महिला अपनी पूरी ताकत से इसका विरोध करती रही, लेकिन उस आदमी का मुकाबला नहीं कर पाई। करीब 10 मिनट तक चले इस हमले को आसपास के लोग दूसरे मुसाफिर न सिर्फ देखते रहे, बल्कि अपने मोबाइल फोन से फोटो भी खींचते रहे, और वीडियो भी बनाते रहे। उस महिला का बयान और ट्रेन के डिब्बे में लगे सुरक्षा कैमरों की जांच से यह पता लगता है कि इतनी संख्या में मुसाफिर आसपास थे कि वे मिलकर इस बलात्कारी को पकड़ सकते थे, रोक सकते थे, उनमें से हर किसी के पास मोबाइल फोन थे जिससे वे 911 नंबर डायल करके पुलिस को खबर कर सकते थे या ट्रेन के डिब्बे के भीतर लगे हुए इमरजेंसी अलार्म की बटन दबा सकते थे, या जोरों से चीखकर भी बलात्कारी को डरा सकते थे। लेकिन उन्होंने इनमें से कोई भी काम नहीं किया। उस डिब्बे में पहुंची एक सरकारी कर्मचारी ने जब इस महिला की हालत देखी तो उसने रेलवे और पुलिस दोनों को खबर की, अगले स्टेशन पर इस महिला को उतारकर अस्पताल भेजा गया और उस बलात्कारी को गिरफ्तार किया गया। अब फिलाडेल्फिया के सरकारी वकील यह तय करेंगे कि डिब्बे में मौजूद दूसरे लोग जिन्होंने ऐसी मुसीबत के वक्त भी उस महिला की मदद नहीं की, क्या उनके खिलाफ किसी तरह की कानूनी कार्यवाही की जा सकती है? हालांकि जो लोग ऐसी नौबत में आसपास के लोगों को मदद के लिए आगे बढऩे की ट्रेनिंग देते हैं उनका यह भी कहना है कि लोगों के आगे ना आने की कई वजहें हो सकती हैं जिनमें से एक यह कि वे सदमे में चले जाते हैं, दूसरी वजह ये कि वे यह मानकर चल रहे हैं कि कोई और पहल करें, और तीसरी वजह यह भी हो सकती है कि उन्हें यह भरोसा ना हो कि वे अगर पहल करें तो दूसरे लोग साथ देंगे या नहीं। लेकिन इस मामले में बलात्कारी जाहिर तौर पर निहत्था था, वह एक अकेली महिला से डिब्बे के भीतर बलात्कार कर रहा था, और आसपास के लोग उसका फोटो ले रहे थे उसके वीडियो बना रहे थे, जबकि वे इतनी संख्या में थे कि वे बलात्कार रोक सकते थे।

इस बात को समझने की जरूरत है कि जो समाज अपने अधिकारों को लेकर इस कदर चौकन्ना रहता है कि बात-बात में सरकार के खिलाफ, स्थानीय संस्थाओं के खिलाफ अदालतों तक पहुंच जाता है, मुकदमे दायर करने लगता है, ऐसा समाज अपने बीच किसी महिला पर हुए ऐसे हमले की नौबत में कैसे दर्शनार्थी बने रहता है, बल्कि कैसे वह इसका वीडियो बनाते बैठे रह सकता है, जबकि किसी एक की पहल करने पर और लोग भी सामने आ सकते थे, या किसी एक के चीखने-चिल्लाने पर बलात्कारी डरकर हट सकता था। अपने अधिकारों और अपनी जिम्मेदारियों के बीच का यह बहुत बड़ा फासला अमेरिकी समाज की आज की एक बहुत ही कड़वी और दर्दनाक हकीकत बतलाता है कि लोगों की कानूनी जागरूकता महज अपनी मतलबपरस्ती तक सीमित है, और अपनी जिम्मेदारियों को लेकर उनके बीच जागरूकता नहीं है, उन्हें उसकी परवाह भी नहीं है। अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग किस्म के कानून हैं, और शायद इस राज्य फिलाडेल्फिया में ऐसा कानून नहीं है कि किसी जुर्म के गवाह लोगों को जुर्म के शिकार की किसी तरह की मदद करना ही चाहिए। इसलिए हो सकता है कि इस डिब्बे के बाकी मुसाफिरों के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही ना हो सके।

एक दूसरी हकीकत यह है जो अमरीका के बाहर भी बाकी दुनिया पर भी लागू होती है कि आज लोगों ने मानो अपनी आंखों से कोई भी उल्लेखनीय, महत्वपूर्ण, चौंकाने वाली या सदमा पहुंचाने वाली बात देखना बंद कर दिया है। आज लोग इनमें से जो भी देखते हैं, वह किसी मोबाइल कैमरे के मार्फत देखते हैं। उनके भीतर के इंसान ऐसे मोबाइल फोन के पीछे रहते हैं और कैमरे का लेंस मानो एक सरहद बन जाता है जिसके पास जाकर इन इंसानों को किसी दूसरे की कोई मदद करना जरूरी नहीं रहता। लोगों को याद होगा कि पिछले बहुत सालों से एक कार्टून चारों तरफ फैला हुआ है जिसमें पानी में डूबते हुए किसी एक इंसान का एक हाथ ही बचाने की अपील करता हुआ सतह के ऊपर, बाहर दिख रहा है, और किनारे खड़े हुए दर्जनों लोग अपने-अपने मोबाइल फोन से उसकी फोटो ले रहे हैं, या उसका वीडियो बना रहे हैं। यह नौबत बहुत ही खतरनाक है। हम बहुत दूर जाना नहीं चाहते, अभी 4 दिन पहले ही दिल्ली-हरियाणा सीमा पर किसान आंदोलन के धरना स्थल के पास ही निहंगों के एक जत्थे ने एक दलित नौजवान को सिख धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी के आरोप में काटकर टांग दिया, और इस क़त्ल को रोकने वाले कोई नहीं थे। सिख निहंगों ने इस पूरे जुर्म की तोहमत अपने पर ली है और शान से सम्मान करवाते हुए पुलिस के सामने समर्पण किया है। अब जांच में ही पता लग सकेगा कि क्या इतनी हिंसा और इतना खून-खराबा यह किसान आंदोलन के पास, उनके देखते हुए हुआ, या उनके देखे बिना हुआ। और यही एक मामला नहीं है, हिंदुस्तान में जगह-जगह जहां-जहां भीड़त्या कर दी जाती है, या कि गुंडे और दबंग किसी एक गरीब या कमजोर पर हिंसा करते हैं, उसे मार डालते हैं, या जख्मी करते हैं, या उसके कपड़े उतारकर उसका जुलूस निकालते हैं, किसी महिला के साथ भी ऐसा सुलूक करते हैं, और लोग उसके वीडियो बनाते खड़े रहते हैं। पिछले कई वर्षों में ऐसा कोई वीडियो देखना हमें याद नहीं पड़ रहा जिसमें लोग हिंसा का कोई विरोध कर रहे हैं, उसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए वह आज महज अमरीकियों को गाली देना ठीक नहीं है। यह भी याद करने की जरूरत है कि हिंदुस्तान में जब कोई गिरोह कोई टोली या कोई भीड़त्या करने की हद तक हमलावर हो जाती है, तो हिंदुस्तानी भी महज उसका वीडियो बनाने तक सीमित रहते हैं।

यह पूरा सिलसिला इंसान के भीतर की सोच को एक चुनौती देता है जिसे कि बोलचाल में इंसान इंसानियत कहते हैं। हालांकि इंसानियत और हैवानियत नाम की दो अलग-अलग चीजें होती नहीं हैं, और ये दोनों ही एक ही इंसान के भीतर अलग-अलग अनुपात में हो सकती हैं या होती हैं। यह सिलसिला बहुत ही भयानक है क्योंकि यह एक और झूठ को उजागर करता है जिसे समाज की सामूहिक चेतना कहा जाता है। जब लोग समाज की इज्जत करना चाहते हैं, या समाज के लोगों की इज्जत करना चाहते हैं, तो वे समाज की सामूहिक चेतना जैसे फर्जी शब्द का इस्तेमाल करते हैं। जैसा कि अमेरिकी ट्रेन के एक डिब्बे के लोगों ने साबित किया, या जैसा कि सिंघु बॉर्डर पर एक निहत्थे दलित की हत्या से साबित हुआ, या कि जैसा देश भर में कमजोर तबकों पर सार्वजनिक जुल्म से साबित होता है, समाज की सामूहिक चेतना एक फर्जी मुखौटा है जिसके पीछे कोई सच नहीं होता। सच तो यही होता है कि लोग अपने मोबाइल फोन के कैमरे के लेंस के पीछे महफूज बैठे रहना चाहते हैं, और वे दूसरों पर हो रही हिंसा को भी अपने मजे का सामान मानकर चलते हैं। अपने आसपास के बारे में सोचकर देखें कि क्या आपके इर्द-गिर्द ऐसा कोई बलात्कार होने लगेगा तो आप उठकर, खड़े होकर उसे रोकने की कोशिश करेंगे, या फिर उसका वीडियो ही बनाते रहेंगे। अपने खुद के हौसले और अपनी नैतिक जिम्मेदारी इन दोनों को तौल लेना ठीक है। और इसके साथ-साथ यह भी समझ लेना बेहतर होगा कि आपके घर वालों के साथ अगर ऐसा बलात्कार होगा, और दूसरों के पास महज वीडियो कैमरे की बटन दबाने के लिए एक अंगूठा होगा, तो आपको कैसा लगेगा?

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अक्टूबर 2021