30 जुलाई 2011
भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने अपने पिता, एक भूतपूर्व सैनिक अफसर का अंतिम संस्कार खुद करके हिंदू धर्म में महिलाओं के कमजोर हाल को चुनौती दी है। आमतौर पर हिंदुओं में यह काम आदमियों का माना जाता है और महिलाएं श्मशान तक भी नहीं जाती हैं। ऐसा पहले भी कहीं-कहीं पर सुनने में आता है और आज इस पर बात हम इसलिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं कि किसी भी समाज में रीति-रिवाजों की जकडऩ को चुनौती देने की जरूरत है और रेणुका चौधरी ने ऐसा एक छोटा सा कदम उठाया है। आज जब देश में एक तरफ खाप पंचायतों के नाम पर हत्यारे फैसले लिए जा रहे हैं और हिंदू समाज के बहुत से तबके कहीं अपने बच्चों की हत्या कर रहे हैं तो कहीं उनकी हसरतों की। और चूंकि हम यहां पर बात हिंदू समाज से शुरू कर रहे हैं इसलिए यहां पर जवाब में या मिसाल के तौर पर हम दूसरी समाजों की कुरीतियों और खामियों के जिक्र को जरूरी नहीं समझते।
एक तरफ हिंदू समाज जातियों और उपजातियों में बंटकर कहीं गोत्र के नाम पर हत्याएं कर रहा है तो कहीं पर ऊंची और नीची जाति के नाम पर। दूसरी तरफ हजारों बरस से चली आ रही मनुवादी व्यवस्था के चलते अब भी हिंदू समाज उस गैरकानूनी छुआछूत और भेदभाव को जारी रखे हुए है जिसके चलते हिंदुओं के बीच से दलित कटते चले गए हैं और वे कहीं पर अंबेडकरवादी बौद्ध हो गए हैं तो कहीं पर मुस्लिम बन गए हैं। हिंदू समाज में आदिवासियों को जिस तरह से जंगली गिना जाता है और जिस तरह से यह माना जाता है कि वे भगवान राम की सेवा करने के लायक बंदरों की तरह ही हैं, उससे भी आदिवासी हिंदुओं से दूर होते चले गए हैं। ऐसे में जब ईसाई धर्म प्रचारकों ने पढ़ाई-लिखाई, इलाज और दूसरी मदद ऐसे आदिवासियों को दी, तो वे अपनी आदिवासी संस्कृति से ईसाई धर्म में शामिल हो गए। इसे भी हिंदू धर्म के एक आक्रामक तबके ने धर्मातरण कहा, लेकिन ऐसे हमलावरों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि मनुवादी व्यवस्था के तहत हिंदू धर्म दलितों और आदिवासियों के सबसे नीचे कैसे मानता है? और अलग-अलग जातियों के बीच का यह हिंसक फर्क आज भी खत्म क्यों नहीं हो पा रहा है?
जो लोग खबरों को ध्यान से देखते हैं उन्हें आज की बाजार व्यवस्था के हाथों हांके जा रहे मीडिया में कहीं-कहीं किसी कोने पर छोटी सी खबर आदिवासी और दलित लोगों पर हमले के बारे में कभी-कभी देखने मिल सकती है। जब मीडिया के सारे बड़े ग्राहक, उसके इश्तहारों से प्रभावित होकर खरीददारी करने वाले लोग, संपन्न और सवर्ण समाज के अधिक हैं, तो नीचे गिने जाने वाले तबकों पर हमलों की खबरें वैसे भी दब जाती है। इसलिए हिंदू समाज के भीतर सामाजिक सुधार को लेकर जैसे आंदोलन पिछली एक सदी में जगह-जगह चले थे वैसे कोई आंदोलन अब नहीं सुनाई पड़ते। इसकी एक वजह यह है कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर चुनावी राजनीति में लगी पार्टियां किसी भी जाति या धर्म को एक तबके के रूप में नाराज करना नहीं चाहती। यही वजह है कि हिंसक और कट्टर, अपराधी खाप पंचायतों को काबू में करने के लिए जब सरकार में कोई बात उठती है तो हरियाणा जैसे राज्य के बड़े-बड़े राजनीतिक दल मुंह बंद कर लेते हैं और उसके पढ़े-लिखे नेता भी गुफा में रहने वाले लोगों की तरह बातें करने लगते हैं।
हिंदू धर्म की रीति-रिवाजों के लोकतंत्र के पैमाने पर नापने की जरूरत है। जितने भी रिवाज औरत और मर्द के बीच भेदभाव करने वाले हैं, उन सबको खारिज करने की जरूरत है। जितने भी रीति-रिवाज जातियों के बीच फर्क करने वाले हैं उन सबको भी खत्म करने की जरूरत है। जितनी परंपराएं समाज में अपने-आपको दूसरे धर्मों से बेहतर साबित करने के लिए एक हमलावर तेवर इस्तेमाल करने लगती हैं, उन तमाम परंपराओं को बदलने की जरूरत है। जिस तरह इस धर्म के गुरु और इसके तहत आने वाले आध्यात्मिक या दूसरे किस्म के सम्प्रदायों में अपराध फैले हुए हैं उनको भी हटाने की जरूरत है। जिस तरह हिंदुओं के बीच बड़े पैमाने पर कन्या भू्रण हत्या होती है, उसे भी खत्म करने की जरूरत है। कानून में अंतरजातीय विवाह को बढ़ाने के लिए तरह-तरह के इंतजाम किए गए हैं लेकिन हिंदू धर्म के तहत बहुत सी ऐसी कट्टरता है जो ऐसा होने नहीं देती और हत्या करने पर उतारू हो जाती है। इसे भी खत्म करने की जरूरत है। हमारा यह भी मानना है कि जिन मंदिरों में दलितों को घुसने नहीं मिलता है वहां पर उन तमाम गैरदलितों को भी पांव धरना बंद कर देना चाहिए जो कि दलित-गैरदलित समानता के हिमायती हैं।
यह लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है लेकिन हम आज इस कम चर्चित रह गए मुद्दे पर बात इसलिए कर रहे हैं कि अब हिंदू समाज के भीतर सुधार की कोई चर्चा भी सुनाई नहीं देती है। ऐसा लगता है कि उदारवादी लोग समाज को पर्याप्त उदार मानकर बैठ गए हैं और उन्हें यह भी दिखाई नहीं पड़ रहा कि कट्टर लोग अपने दकियानूसीपन को फिर से लादने में पत्थर के औजार लेकर लगे हुए हैं। ऐसे में एक बहुत छोटा सा कदम रेणुका चौधरी ने उठाया है और हम इसकी तारीफ करते हैं। अगर यह समाज अपने पिछड़ेपन से नहीं उबरेगा तो यह सिर्फ रीति-रिवाजों में पिछड़ा नहीं रह जाएगा यह विकास के दूसरे पैमानों पर भी पिछड़ा रहेगा। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा लगातार कुंठाओं के बीच जीते रहेगा तो फिर वह समाज अपनी पूरी संभावनाओं जितना आगे कभी नहीं बढ़ पाएगा।
भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने अपने पिता, एक भूतपूर्व सैनिक अफसर का अंतिम संस्कार खुद करके हिंदू धर्म में महिलाओं के कमजोर हाल को चुनौती दी है। आमतौर पर हिंदुओं में यह काम आदमियों का माना जाता है और महिलाएं श्मशान तक भी नहीं जाती हैं। ऐसा पहले भी कहीं-कहीं पर सुनने में आता है और आज इस पर बात हम इसलिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं कि किसी भी समाज में रीति-रिवाजों की जकडऩ को चुनौती देने की जरूरत है और रेणुका चौधरी ने ऐसा एक छोटा सा कदम उठाया है। आज जब देश में एक तरफ खाप पंचायतों के नाम पर हत्यारे फैसले लिए जा रहे हैं और हिंदू समाज के बहुत से तबके कहीं अपने बच्चों की हत्या कर रहे हैं तो कहीं उनकी हसरतों की। और चूंकि हम यहां पर बात हिंदू समाज से शुरू कर रहे हैं इसलिए यहां पर जवाब में या मिसाल के तौर पर हम दूसरी समाजों की कुरीतियों और खामियों के जिक्र को जरूरी नहीं समझते।
एक तरफ हिंदू समाज जातियों और उपजातियों में बंटकर कहीं गोत्र के नाम पर हत्याएं कर रहा है तो कहीं पर ऊंची और नीची जाति के नाम पर। दूसरी तरफ हजारों बरस से चली आ रही मनुवादी व्यवस्था के चलते अब भी हिंदू समाज उस गैरकानूनी छुआछूत और भेदभाव को जारी रखे हुए है जिसके चलते हिंदुओं के बीच से दलित कटते चले गए हैं और वे कहीं पर अंबेडकरवादी बौद्ध हो गए हैं तो कहीं पर मुस्लिम बन गए हैं। हिंदू समाज में आदिवासियों को जिस तरह से जंगली गिना जाता है और जिस तरह से यह माना जाता है कि वे भगवान राम की सेवा करने के लायक बंदरों की तरह ही हैं, उससे भी आदिवासी हिंदुओं से दूर होते चले गए हैं। ऐसे में जब ईसाई धर्म प्रचारकों ने पढ़ाई-लिखाई, इलाज और दूसरी मदद ऐसे आदिवासियों को दी, तो वे अपनी आदिवासी संस्कृति से ईसाई धर्म में शामिल हो गए। इसे भी हिंदू धर्म के एक आक्रामक तबके ने धर्मातरण कहा, लेकिन ऐसे हमलावरों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि मनुवादी व्यवस्था के तहत हिंदू धर्म दलितों और आदिवासियों के सबसे नीचे कैसे मानता है? और अलग-अलग जातियों के बीच का यह हिंसक फर्क आज भी खत्म क्यों नहीं हो पा रहा है?
जो लोग खबरों को ध्यान से देखते हैं उन्हें आज की बाजार व्यवस्था के हाथों हांके जा रहे मीडिया में कहीं-कहीं किसी कोने पर छोटी सी खबर आदिवासी और दलित लोगों पर हमले के बारे में कभी-कभी देखने मिल सकती है। जब मीडिया के सारे बड़े ग्राहक, उसके इश्तहारों से प्रभावित होकर खरीददारी करने वाले लोग, संपन्न और सवर्ण समाज के अधिक हैं, तो नीचे गिने जाने वाले तबकों पर हमलों की खबरें वैसे भी दब जाती है। इसलिए हिंदू समाज के भीतर सामाजिक सुधार को लेकर जैसे आंदोलन पिछली एक सदी में जगह-जगह चले थे वैसे कोई आंदोलन अब नहीं सुनाई पड़ते। इसकी एक वजह यह है कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर चुनावी राजनीति में लगी पार्टियां किसी भी जाति या धर्म को एक तबके के रूप में नाराज करना नहीं चाहती। यही वजह है कि हिंसक और कट्टर, अपराधी खाप पंचायतों को काबू में करने के लिए जब सरकार में कोई बात उठती है तो हरियाणा जैसे राज्य के बड़े-बड़े राजनीतिक दल मुंह बंद कर लेते हैं और उसके पढ़े-लिखे नेता भी गुफा में रहने वाले लोगों की तरह बातें करने लगते हैं।
हिंदू धर्म की रीति-रिवाजों के लोकतंत्र के पैमाने पर नापने की जरूरत है। जितने भी रिवाज औरत और मर्द के बीच भेदभाव करने वाले हैं, उन सबको खारिज करने की जरूरत है। जितने भी रीति-रिवाज जातियों के बीच फर्क करने वाले हैं उन सबको भी खत्म करने की जरूरत है। जितनी परंपराएं समाज में अपने-आपको दूसरे धर्मों से बेहतर साबित करने के लिए एक हमलावर तेवर इस्तेमाल करने लगती हैं, उन तमाम परंपराओं को बदलने की जरूरत है। जिस तरह इस धर्म के गुरु और इसके तहत आने वाले आध्यात्मिक या दूसरे किस्म के सम्प्रदायों में अपराध फैले हुए हैं उनको भी हटाने की जरूरत है। जिस तरह हिंदुओं के बीच बड़े पैमाने पर कन्या भू्रण हत्या होती है, उसे भी खत्म करने की जरूरत है। कानून में अंतरजातीय विवाह को बढ़ाने के लिए तरह-तरह के इंतजाम किए गए हैं लेकिन हिंदू धर्म के तहत बहुत सी ऐसी कट्टरता है जो ऐसा होने नहीं देती और हत्या करने पर उतारू हो जाती है। इसे भी खत्म करने की जरूरत है। हमारा यह भी मानना है कि जिन मंदिरों में दलितों को घुसने नहीं मिलता है वहां पर उन तमाम गैरदलितों को भी पांव धरना बंद कर देना चाहिए जो कि दलित-गैरदलित समानता के हिमायती हैं।
यह लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है लेकिन हम आज इस कम चर्चित रह गए मुद्दे पर बात इसलिए कर रहे हैं कि अब हिंदू समाज के भीतर सुधार की कोई चर्चा भी सुनाई नहीं देती है। ऐसा लगता है कि उदारवादी लोग समाज को पर्याप्त उदार मानकर बैठ गए हैं और उन्हें यह भी दिखाई नहीं पड़ रहा कि कट्टर लोग अपने दकियानूसीपन को फिर से लादने में पत्थर के औजार लेकर लगे हुए हैं। ऐसे में एक बहुत छोटा सा कदम रेणुका चौधरी ने उठाया है और हम इसकी तारीफ करते हैं। अगर यह समाज अपने पिछड़ेपन से नहीं उबरेगा तो यह सिर्फ रीति-रिवाजों में पिछड़ा नहीं रह जाएगा यह विकास के दूसरे पैमानों पर भी पिछड़ा रहेगा। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा लगातार कुंठाओं के बीच जीते रहेगा तो फिर वह समाज अपनी पूरी संभावनाओं जितना आगे कभी नहीं बढ़ पाएगा।





