अभिव्यक्ति की अराजकता रोकने, सरकारी अराजकता बढ़ाने के खतरे!
30 नवम्बर 2025
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया को लेकर अभी कुछ सख्त सोच जाहिर की है, और इन्हें चलाने वाली कंपनियों के साथ-साथ सरकार पर भी थोड़ी अधिक जिम्मेदारी डाली है। एक मामले की सुनवाई चल ही रही है कि अदालत ने इस बारे में कहा कि अब सोशल मीडिया सिर्फ निजी अभिव्यक्ति का मंच नहीं रहा, उस पर लिखी बातें नफरत, हिंसा, या अफवाह को फैलाने की ताकत रखती है। उसने पारंपरिक मीडिया के बारे में कहा कि अखबार में छपने वाली बात की जिम्मेदारी तय होती है, लेकिन सोशल मीडिया पर पांच सेकेंड में झूठ देश भर में फैल जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान की अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन यह आजादी सीमाविहीन नहीं है। अदालत ने कहा कि झूठ, नफरत, मानहानि, और धार्मिक उकसावा, इन सब पर सीमा लागू होती है। अदालत ने सरकारी कामकाज के बारे में भी कहा कि सोशल मीडिया ने अफसरों को डराने-धमकाने के नए तरीके बना लिए हैं। जायज सरकारी काम करने पर भी सोशल मीडिया की टिप्पणियां अधिकारियों को मानसिक रूप से तोड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से पूछा है कि क्या मौजूदा आईटी कानून काफी है, क्या और नियमों की जरूरत है?
जब सुप्रीम कोर्ट ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जरूरी सीमा रेखा खींचने लगे, तो फिर सरकार को भला और क्या चाहिए? सरकार तो लोगों की अभिव्यक्ति पर तरह-तरह की सीमा रेखा खींचने की शौकीन ही रहती है। परंपरागत मीडिया पर काबू थोड़ा आसान रहता है, और ऐसे में अराजकता की हद तक आजाद सोशल मीडिया पूरी तरह बेकाबू रहता है। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट खुद होकर सरकार से पूछ रही है कि क्या उसे इस अराजकता पर काबू पाने के लिए कोई नए नियम-कानून चाहिए, तो सरकार के लिए तो मानो उसका पसंदीदा संगीत बजा दिया गया। लेकिन बात सिर्फ सरकार तक सीमित नहीं है कि सोशल मीडिया से वही अकेली परेशान है। सरकार के पास तो आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई करने के लिए बहुत सारे अधिकार हैं, लेकिन अगर सरकार किसी हमलावर दस्ते पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, तो फिर ऐसे दस्ते के हमले के शिकार लोग अपने को बचा नहीं पाते। आज भारत में सोशल मीडिया पर सरकार से बेकाबू लोग अराजक हो रहे हों, ऐसी नौबत कम है। सरकार को पसंद लोग अराजक अधिक हो रहे हों, ऐसी नौबत अधिक है। ऐसे में इन लोगों पर कोई कार्रवाई भी नहीं होती है।
सोशल मीडिया के साथ जाने किसने और कब मीडिया शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। पहले ही परंपरागत प्रेस बाद में प्रचलित हुए मीडिया शब्द के भीतर एक अल्पसंख्यक हो चुका है, अपने नीति-सिद्धांतों की पोटली थामे हुए, दबा-सहमा सा बैठा रहता है प्रेस, और मीडिया के दायरे में आने वाले बाकी लोग सडक़ों पर बेकाबू जानवरों की तरह मटरगश्ती करते हैं। अब मानो मीडिया नाम का यह बेकाबू और अराजक तबका काफी नहीं था, अब सोशल मीडिया नाम का एक और बड़ा तबका खड़ा हो गया है जिसमें दुनिया के हर ऑनलाईन नागरिक शामिल हैं। समंदर के पानी की भला कौन सी बूंद बाकी बूंदों के प्रति जवाबदेह हो सकती है? सोशल मीडिया का हाल कुछ ऐसा ही है। ऐसे में भारत के सुप्रीम कोर्ट को इस देश की सरहद के भीतर से सोशल मीडिया पर कहा और लिखा जाने वाला अगर खटक रहा है, तो वह सरकार के लिए कुछ हद तक काबू का हो सकता है, और बहुत हद तक बेकाबू बना रहेगा क्योंकि इंटरनेट की टेक्नॉलॉजी की बुनियादी खूबी या खामी यही है।
लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि जब कभी सरकार के हाथ किसी चीज को रोकने के लिए कोई अधिकार लगता है, तो जुर्म तो बाद में रूकते हैं, पहले तो उन जायज बातों को रोका जाता है जो कि सरकार को नापसंद रहती हैं। आज भी आईटी एक्ट के तहत देश भर में सरकारें उन्हीं बातों को अधिक रोकती हैं जो राजनीतिक रूप से उन्हें व्यक्तिगत तौर पर नापसंद रहती हैं। फिर सरकार चाहे किसी भी पार्टी की क्यों न हो, उसका बर्दाश्त तब एकदम कम हो जाता है जब बात उस पर आ जाती है। हमने ममता को भी कार्टूनिस्टों को गिरफ्तार करते देखा है। सरकार की व्यक्तिगत पसंद और नापसंद को तानाशाही की हद तक ले जाने के लिए आज किसी भी राज्य की पुलिस अंग्रेजीराज की पुलिस के मुकाबले कहीं अधिक अलोकतांत्रिक होकर काम करती हैं। देश में एक सुप्रीम कोर्ट भी है, और उसके सामने एक जवाबदेही की नौबत आ सकती है, यह आशंका भी किसी राज्य की पुलिस की अराजकता को कम नहीं करती।
अब यह एक दिलचस्प नौबत है कि इंटरनेट पर जनता की अभिव्यक्ति की अराजकता का मुकाबला करने के लिए जमीन पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों की चापलूस रह गई पुलिस की अराजकता को तैनात किया जा रहा है। जब कभी अदालत इस तरह की किसी बात को लागू करने की चर्चा करती है, वह जाहिर तौर पर पुलिस के मार्फत ही लागू होती है। इसलिए जनता की अराजकता के मुकाबले सत्तारूढ़ राजनीति के हाथों की औजार पुलिस की अराजकता एक दिलचस्प मुकाबला हो सकता है। आज भी अधिकतर राज्यों में पुलिस सत्ता के हाथों गीली मिट्टी की तरह रहती है, और वह क्या काम करे, इसे सत्ता ही तय करती है। अधिकतर जगहों पर पुलिस सत्तारूढ़ दलों की चापलूस-फौज के मुकाबले भी अधिक चापलूस साबित होती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की कोई भी नई व्यवस्था सरकारों के कानूनी हाथों को मजबूत नहीं करेगी, वह सरकारों की राजनीतिक मनमानी को मजबूत करेगी। ऐसा लगता है कि सरकारों के हाथ मजबूत किए बिना अगर सोशल मीडिया कंपनियों पर अधिक कड़ाई लादी जाए, उनकी जिम्मेदारी बढ़ाई जाए, तो शायद उसका बुरा असर कम होगा। किसी अच्छे असर के लिए किए जाने वाले काम के साथ अगर बाईप्रोडक्ट की तरह अच्छे से अधिक बड़ा बुरा असर भी पैदा हो रहा है, तो वह एक किस्म से प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) साबित होता है। सुप्रीम कोर्ट को इस पूरी बहस को सरकार के हाथ और औजार देने तक नहीं ले जाना चाहिए। सरकार के पास आज भी देश को अराजकता से बचाने के लिए भरपूर अधिकार है, और उनका इस्तेमाल इस मकसद में कम ही होता है। इन अधिकारों को और बढ़ा देना, अदालत के मकसद से परे उनका इस्तेमाल बढ़ाने के अलावा शायद ही कुछ और होगा। सुप्रीम कोर्ट की मर्जी और उसके हुक्म की सील-मुहर के साथ यह नई सरकारी व्यवस्था अधिक अलोकतांत्रिक होने का खतरा है। अदालत को भी लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकारों को और अधिक अराजक नहीं होने देना चाहिए, सरकारें कानून के लचीलेपन को नाजायज हद तक खींचकर भी अपने अधिकार क्षेत्र बढ़ाने की कोशिश वैसे भी करती हैं, और उनसे लोकतंत्र खतरे में पड़ता है।
वारिसों के लिए क्या छोडऩा है, जहरीली हवा या खुशबू?
30 नवंबर 2025
कुछ घटनाएं जो कि स्वाभाविक तौर पर आम लगनी चाहिए, वे आज के माहौल में बड़ी खास लगने लगती हैं। दो दिनों से एक वीडियो तैर रहा है कि पानी में एक कार डूबती चली जा रही है, और एक छोटी सी नाव पर सवार एक नौजवान कार की खिडक़ी से किसी व्यक्ति को खींचकर निकालने की कोशिश में लगा हुआ है। दो मिनट के इस वीडियो में नाव डूब जाती है, कार भी डूब जाती है, लेकिन यह नौजवान किसी तरह से कार के ड्राइवर को बचा लेता है। तब तक किनारे से पहुंचा एक और नौजवान मदद करता है, और दोनों मिलकर किसी तरह कार सवार को बचाकर किनारे लाते हैं। इन तीनों के नाम सहित यह वीडियो हजारों लोगों ने आगे बढ़ाया है, और खबर शायद सही ही रही होगी कि इसका कोई खंडन देखने नहीं मिला। कार चालक हिन्दू था, उसे बचाने वाला मुस्लिम था, और किनारे से पहुंचा तीसरा नौजवान हिन्दू था। डूबते हुए को बचाते हुए किसी को उसके जात-धरम पूछने की न जरूरत रहती है, न फुरसत रहती है। इसी तरह जब कोई डूब रहा हो तो उसे बचाने वाले के जात-धरम क्या हैं, इसे पूछने की भी जहमत कोई नहीं उठाते। यह तो सीधे-सीधे डूबते से बचने की बात, लोग तो अस्पताल के ब्लड बैंक में खून लेते हुए, या आंखें और किडनी देते हुए कभी नहीं पूछते कि देने वालों के जात-धरम क्या हैं। जब अपनी जान पर आ पड़ी हो, तो जिससे जान बच रही है, वे ईश्वर ही लगते हैं। जात-धरम तब सूझते हैं जब पेट भरा रहता है, और दिल-दिमाग पर बददिमागी छाई रहती है। राह चलते भिखारी होटल-ठेले वालों के नाम पढ़-पढक़र भीख नहीं मांगते, और इसी तरह घरों की तख्तियों पर जात-धरम देखकर लोग मांगने नहीं पहुंचते, या घर छोडक़र आगे नहीं बढ़ते।
एक हिन्दू को बचाने वाले इस मुसलमान नाव वाले की बात पर लिखने की आज इतनी बड़ी वजह नहीं रहती, अगर जम्मू से एक दूसरी खबर नहीं आई रहती। दुनिया के सबसे अधिक फौजी मौजूदगी वाले जम्मू-कश्मीर में अभी जम्मू के एक पत्रकार ने एक अफसर के नशा-तस्करी में हाथ होने की रिपोर्टिंग की, तो उसका 40 बरस पुराना घर आनन-फानन बुलडोजर से गिरा दिया गया। कहा गया कि वह सरकारी जमीन पर बना हुआ अवैध निर्माण था। वैसी सरकारी जमीन पर दूसरे दर्जनों और अवैध निर्माण बरकरार हैं, और इस पत्रकार का यह मकान भी 40 साल से वहां बना हुआ था, और दूसरे मकानों की तरह। एक रिपोर्ट उसने बनाई, और उसे बेघर कर दिया गया। उसके बच्चे मलबे के पास खुली जमीन पर बैठे हुए थे। यह देखकर जम्मू के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने सार्वजनिक रूप से अपनी जमीन के कागज इस पत्रकार अरफाज अहमद डैंग को दिए, और कहा कि चाहे उसे भीख मांगनी पड़े, वह उनका घर बनवाकर रहेंगे। कुलदीप शर्मा नाम के इस सामाजिक कार्यकर्ता ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि वे सिर्फ कागज नहीं दे रहे हैं, जमीन अरफाज के नाम करने की पूरी कानूनी कार्रवाई भी कर रहे हैं। कुलदीप शर्मा एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, और उनकी बेटी तान्या शर्मा ने कहा कि उन्हें अपने पिता पर गर्व है जिन्होंने एक बेहतरीन मिसाल कायम की है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना चाहिए। जम्मू के अफसरों ने बिना किसी कानूनी कार्रवाई के इस एक अकेले एकमंजिला मकान को मलबे में बदल दिया। कुलदीप शर्मा के बारे में लोगों ने बताया कि वे अरफाज का घर टूटने से बहुत परेशान थे, और उन्होंने खुद होकर यह फैसला लिया। उनकी बेटी पिछले कुछ सालों से आसपास के गरीब बच्चों को मुफ्त की ट्यूशन पढ़ाती हैं। कुलदीप शर्मा का कहना है कि अरफाज ने उस वक्त सच बोला जब बहुत कम लोगों में ऐसा कहने की हिम्मत रह गई है। बदकिस्मती से सच के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं इस परिवार के घर को दुबारा खड़ा करने में काम आ सकूं, मेरा ईश्वर मेरे जाने के बाद भी मेरे सिर पर छत रखेगा।
इन दो घटनाओं को देखें, तो लगता है कि रात-दिन नफरती लावा उगलने वाले टीवी चैनलों की पहुंच से कुछ लोग अब भी बेअसर रह गए हैं। टीवी चैनल खुद बहुत से लोगों के असर में, बहुत से लोगों को खुश रखने के लिए ऐसा करते हैं, और ऐसा करते हुए शायद अपना सुख भी जुटाते हैं। लेकिन बिना शोहरत की चाह के भी कई लोग, शायद अधिकतर लोग एक-दूसरे के काम आने के लिए एक पैर पर तैयार खड़े रहते हैं। भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौर में सिक्खों और मुस्लिमों के बीच सबसे अधिक खून बहा था, लेकिन आज जब सिक्ख बाढ़ में डूबे हुए लोगों की मदद करने को रात-दिन काम करते हैं, तो लोगों का धरम जानते हुए भी उनके मन में कोई भेदभाव नहीं आता। पंजाब के गांवों में सोच-समझकर, ठंडे दिल से फैसला लेकर एक के बाद दूसरे गुरुद्वारे में लोग नमाज पढऩे की जगह बनाकर देते हैं। कई जगहों के ऐसे फोटो-वीडियो भी हमने देखे हैं जहां लोग सडक़ पर नमाज पढ़ रहे हैं, और उनके आसपास गैरमुस्लिम लोग एक घेरा डालकर खड़े हैं ताकि आती-जाती ट्रैफिक से किसी को चोट न लगे। ये तमाम वे जगहें हैं जहां मीडिया नाम के यूनियन कार्बाइड कारखाने अपनी मिक गैस फैला नहीं पाए हैं।
इन्हीं दोनों घटनाओं पर लिखते हुए आज भी कुछ सच्चे और खरे इंसानों ने सोशल मीडिया पर याद दिलाया है कि अभी कश्मीर से गरम कपड़े बेचने के लिए छत्तीसगढ़ के चिरमिरी पहुंचे कश्मीरी नौजवान नजाकत अली का वहां सार्वजनिक अभिनंदन हुआ क्योंकि वह हर बरस यहां पर आता तो रहता था, लेकिन पिछली बार के बाद इस बार के बीच पहलगाम के आतंकी हमले में उसने 11 लोगों की जान बचाई थी। इस विशाल देश में भले इंसानों के विशाल हृदय के उदाहरण बिखरे पड़े हैं, लेकिन जो लोग नफरत की चुनिंदा बातों को आगे फैलाकर हवा में जहर घोलना चाहते हैं, उनके लिए हर जात-धरम के कुछ मुजरिम हैं, जिनके जुर्म का निशाना दूसरे जात-धरम के लोग हैं। यह तो लोगों पर निर्भर करता है कि वे अपने बच्चों के लिए एक जहरीली हवा छोडक़र जाना चाहते हैं, या इंसानियत की बेहतर मिसालें। इस मुद्दे पर हमारे लिखने का मकसद किसी भी तरह से नफरती लोगों को प्रभावित करने का नहीं है। वे हमारे सरीखे असर से परे के लोग हैं। हम सिर्फ ऐसे दुविधाग्रस्त लोगों तक ही इंसानियत की बात पहुंचा सकते हैं, जो अभी तक नफरती खेमे का हिस्सा नहीं बने हैं, और नफरती प्रचार से प्रभावित होकर वे दुविधा की सरहद पर खड़े हुए हैं। किसी भी खेमे को चाहे वे नफरती हों, चाहे मोहब्बती, उन्हें एक-दूसरे पर अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी चाहिए। पोप के सनातन प्रवेश, या शंकराचार्य को ईसाई बनाने की कोशिशें बेनतीजा होना तय रहती है। कोशिश उन्हीं लोगों पर की जा सकती है जिनके भीतर की इंसानियत पूरी तरह से हिंसानियत में नहीं बदल चुकी है। फैजल नाम के एक नौजवान ने शुभम नाम के एक नौजवान को डूबने से बचाकर इंसानियत को डूबने से बचा लिया, और एक अरफाज के घर को तोड़ देने वाली हिंसानियत को शिकस्त देते हुए एक कुलदीप शर्मा ने उसके घर को बनाने का बीड़ा उठा लिया, हिन्दुस्तान को इससे अधिक और चाहिए क्या?
सिलबट्टे की चटनी जिन्हें बेहतर लगती है, उनके लिए
29 नवंबर 2025
सोशल मीडिया पर कई बार बड़ी दिलचस्प बहस देखने मिलती है। अभी कुछ लोग चर्चा कर रहे हैं कि बिजली से चलने वाली मिक्सी पर चटनी पीसने के बजाय सिलबट्टे पर उसे पीसना बेहतर होता है। कई लोग यह भी मानकर चलते हैं कि रात को खाना बचना नहीं चाहिए, और अगली सुबह फ्रिज से निकालकर किसी भी चीज को गर्म करने से बचना चाहिए। इनमें से कुछ बातें तो सेहत के लिए, कुछ बातें बिजली बचाने के लिए अच्छी हो सकती हैं, लेकिन इनमें से कौन सी बातें गृहिणी के लिए भी अच्छी हैं, वह बात चर्चा की प्राथमिकता में नहीं रहती। हर दिन आटा गूंथकर ताजी रोटियां बनाना, यह क्यों जरूरी होना चाहिए? क्या महज इसलिए कि घर पर एक महिला की यह जिम्मेदारी है कि वह इस काम को करे? या फिर इसका सहूलियत से भी कोई लेना-देना है? जब फ्रिज की तकनीक इस्तेमाल में आ रही है, तो दो वक्त की दाल, दो वक्त की कढ़ी, दो वक्त की सब्जी, और दो वक्त का चावल भी एक साथ बनाकर बचे हुए फ्रिज में क्यों नहीं रखे जा सकते? मां के हाथ के गर्म खाने की महिमा से इस देश की संस्कृति भरी हुई है, लेकिन मां के हाथ कितने होने चाहिए, इस पर कुछ नहीं कहा जाता, बल्कि बिना कहे हुए देवियों की प्रतिमाएं दिखा दी जाती हैं कि कम से कम आठ तो हाथ होने ही चाहिए ताकि वह चार महिलाओं जितना काम कर सके। खाड़ी के मुस्लिम देशों को देखें तो वहां घर पर रोटी बनाने की कोई परंपरा नहीं है। बाजार में तंदूर वाले बड़ी-बड़ी रोटियां बेचते हैं, जिनमें से एक-एक रोटी से दो-तीन लोगों के पेट भर जाएं। लोग बाजार जाते हैं रोटियों का ग_ा खरीद लाते हैं, और घर पर उसके साथ खाने लायक कुछ बन जाता है। हर दिन आटा गूंथना, और रोटी बनाना यह उन महिलाओं पर भी लागू नहीं होता जिन पर बुरका लदे होता है, नकाब या हिजाब लदे होता है।
अब खाने से परे एक दूसरी बात पर आ जाएं, तो हिंदुस्तान में पिछले बरसों में हर घर में शौचालय बन गए हैं। आने वाले बरसों में हो सकता है कि हर घर तक नल भी पहुंच जाए, लेकिन शौचालय बने बरसों हो गए, और उनमें हर इस्तेमाल के बाद डलने वाला आधा बाल्टी पानी ढोकर लाना आमतौर पर महिला की ही जिम्मेदारी रहती है, कई बार तो पानी कुछ मील दूर से भी लाना पड़ता है। ग्रामीण जीवन की ऐसी एक भी तस्वीर देखने नहीं मिलती जिसमें कोई मर्द पानी ढोते दिखता हो। अब सरकार की तरफ से खुले में शौच को अपमान साबित किया गया है, कई जगहों पर तो अधिकारी-कर्मचारी मुंहअंधेरे टॉर्च लेकर निकलते थे, और खुले में शौच करते लोगों पर रौशनी फेंककर उन्हें शर्मिंदा करते थे। अब सरकारी आंकड़ों में, या जमीन पर, जैसा भी हो शौचालय बने, तो सचमुच के शौचालयों में तो पानी लगता ही है, और वह औरत ही लाती है। लोगों को अपने आसपास के लोगों से यह भी पूछना चाहिए कि सरकारी मदद से बने हुए शौचालयों को, या कि बाकी घरों के शौचालयों को साफ करने की जिम्मेदारी किसकी रहती है? इस्तेमाल तो सभी लोग करते हैं, लेकिन सफाई करना शायद महिला का एकाधिकार रहता है।
ऐसी बहुत सी सामाजिक परंपराएं हैं जिन्हें लोगों के बचपन से ही संस्कृति की तरह पेश किया गया है। घरों में पकाने और परोसने का काम महिलाएं और बच्चियां ही करती हैं, और यह सोच धीरे-धीरे लडक़े-लड़कियों सभी में कई पीढिय़ों के लिए पैठ जाती है। और सुबह से रात तक खटने वाली, काम करने वाली महिला के बारे में जब बाहर कोई पूछते हैं कि वह क्या करती है, तो आमतौर पर जवाब मिलता है कि वह कुछ नहीं करती, गृहिणी है। अब अगर एक गृहिणी के घर संभालने, खाना खिलाने, बुजुर्गों की सेहत का ख्याल रखने, गर्भधारण करने, बच्चे पैदा करने, बच्चों को बड़ा करने तक की मेहनत को अलग-अलग घरेलू कामगारों से करवाया जाए, तो पता लगेगा कि घर का पूरा बजट ही कम पड़ रहा है। जिम्मेदारियों का बोझ गिनते हुए भारत जैसे समाज में महिला पारदर्शी हो जाती है, उसे गिना ही नहीं जाता, उसे बस घर पर रहती है, कह दिया जाता है, मानो वह घर पर आरामकुर्सी पर बैठकर धूप सेंकती हो। भारत जैसे आम समाज में महिला के सम्मान के लिए जरूरी यह है कि उसके किए गए अधिकतर काम को मर्द भी करके देखें कि उनमें कितनी मेहनत लगती है, कितना वक्त लगता है।
जिस तरह पैडल रिक्शा चलाने वाले की मेहनत और तकलीफ का जरा सा अंदाज उन लोगों को लग सकता है जो कि साइकिल चलाते हैं। एक साइकिल चलाने में जितनी ताकत लगती है, उससे कई गुना अधिक ताकत रिक्शा चलाने में लगती है। लेकिन रिक्शे वाले की मेहनत का अंदाज मोपेड या स्कूटर जैसे पेट्रोल-वाहनों को चलाने वाले को नहीं हो सकता जो कि सडक़ से पैडल रिक्शा को हटाने के लिए हॉर्न का हमला कर देते हैं। किसी ने बहुत पहले यह कहा भी था कि जाके पांव न पड़े बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। मतलब यह कि जिसके पांवों की एडिय़ां फटी नहीं हैं, वे दूसरों के दर्द को क्या जानें। घर में महिला के साथ रहने वाले पुरूषों को ही जब उसके दर्द का अहसास नहीं रहता, तो बाकी दुनिया से भला क्या उम्मीद की जा सकती है? एक पति को पत्नी दिन में घरेलू बंधुआ मजदूर की तरह पसंद रहती है, और रात में वह उससे पेशेवर बदचलन जैसी मस्ती की उम्मीद करता है। ऐसा देहसुख देने वाली पेशेवर कामगार अपने बदन को घरेलू कामकाज के बोझ से बचाकर रखती है, तभी वह कोई सुख देने की हालत में रहती है।
लोगों को देहसुख, या किसी और तरह का सुख, उसकी उम्मीद करने के पहले महिला के तन-मन के दुख की भी परवाह करना सीखना चाहिए। खाना पकाने से लेकर घर चलाने तक उसका जो अपार दुख है, मेहनत और तकलीफों का जो पहाड़ वह रोज चढ़ती है, कभी उसका भी अंदाज लगाना चाहिए। कभी महिला की जिंदगी सरीखी साइकिल चलाकर देखें कि उसे घर के रिक्शा खींचने में कितनी ताकत लगती होगी। इसके बाद ही उससे रोटी गरम-गरम, और चटनी सिलबट्टे पर पीसी हुई मांगना चाहिए।
एक ने किए कत्ल, बाकी तमाम उसे भुगतेंगे...
28 नवंबर 2025
अमरीका के वॉशिन्गटन में दो दिन पहले एक अफगान नागरिक ने जिस तरह वहां के दो सैनिकों को गोली मार दी, उससे अमरीका में बाहर से आकर शरण पाए हुए, या कामकाज कर रहे लोगों पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप वैसे भी आप्रवासियों के खासे विरोधी रहते आए हैं, और अब उन्हें अपने को नापसंद देशों पर और अधिक कड़े प्रतिबंध लगाने का एक अभूतपूर्व मौका मिला है। किसी भी देश को अपनी हिफाजत की कीमत पर दूसरे देशों के लोगों को जगह देने की कोई मजबूरी तो रहती नहीं है। ट्रंप ने अपनी चुनावी घोषणाओं के वक्त से ही जिन देशों के नागरिकों पर रोक लगाने की बात कही थी, उन्हीं देशों के लोग अगर अमरीका में सैनिकों को मार डालने जैसी हरकत करेंगे, तो उसका नुकसान अमरीका की जमीन पर ठहरे हुए उनके दूसरे देशवासियों को, उनके धर्म के लोगों को झेलना पड़ेगा। आज एक अफगान की वजह से अमरीका में सारे अफगानों की दाखिला अजऱ्ी पर रोक लग गई है।
जब किसी मुस्लिम या अफ्रीकी देश से योरप पहुंचे हुए शरणार्थियों में से कोई हिंसा करते हैं, तो उसका नुकसान बाकी सारे ही मुस्लिम लोगों को झेलना पड़ता है। योरप में एक-एक करके कई देशों में ऐसे ही शरणार्थियों की वजह से राजनीतिक उथल-पुथल हुई है, और कुछ जगहों पर कट्टरपंथी पार्टियों को अभूतपूर्व जनसमर्थन भी मिला है। जब एक बार कट्टरपंथी पार्टियां सत्ता पर भागीदार बन जाती हैं, तो फिर उन देशों में दूसरे देशों से आए हुए लोगों पर रोक-टोक और भी बढ़ जाती है। इसलिए जिस देश या जिस धर्म के लोगों को दूसरी जगह जगह चाहिए, उन्हें अधिक सावधान रहना होता है क्योंकि उन जगहों के मूलनिवासी अगर बागी हो जाते हैं, तो फिर उनमें से किसी को भी उस जमीन पर जगह नहीं मिलती। भारत की ही बात करें, तो आज यहां पर बांग्लादेशी, या म्यांमारी लोगों के आने और बसने का मुद्दा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा हो चुका है। अब इनमें से अगर कोई भारत की जमीन पर किसी जुर्म में शामिल रहते हैं, तो उसका नुकसान इन देशों से यहां आए हुए दसियों लाख लोगों को उठाना पड़ता है। फिर धीरे-धीरे यह धर्म के आधार पर भी एक चुनावी नारा बनने लगता है, जैसाकि अमरीका और योरप के देशों में वहां की ईसाई-बहुल आबादी के बीच मुस्लिम शरणार्थियों का मुद्दा बना हुआ है।
यह भी समझने की जरूरत है कि सिर्फ विदेशी शरणार्थी होने से स्थानीय लोगों की नाराजगी नहीं हो जाती, नाराजगी के पीछे कामकाज के अवसर घटना भी रहता है, और संस्कृतियों का टकराव भी रहता है। पश्चिम के देशों में जाकर बसे हुए मुस्लिम शरणार्थी जब वहां की स्थानीय लोकतांत्रिक परंपराओं के साथ घुल-मिल नहीं पाते, तब भी एक टकराव खड़ा होता है, और स्थानीय लोग यह पाते हैं कि विदेशी शरणार्थी अपनी खुद की महिलाओं के साथ बुरा सुलूक करते हैं जो कि वे अपने बच्चों की नजरों में आने देना नहीं चाहते। ऑस्ट्रेलिया में अभी दो-चार दिन पहले ही एक दक्षिणपंथी महिला सांसद ने संसद में सनसनी फैला दी जब वे वहां बुरका पहनकर चली गईं। उनकी अपनी पोशाक के मुताबिक उनकी टांगें खुली हुई थीं, और उस पर बुरका अटपटा भी लग रहा था, लेकिन वे देश में बुरके पर रोक लगाने के मुद्दे को एक बार फिर उठाना चाहती थीं। संसद ने उनके इस व्यवहार को नामंजूर करते हुए उन्हें पूरे सत्र से निलंबित कर दिया, लेकिन इससे ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश में भी मुस्लिम रीति-रिवाजों के खिलाफ एक राजनीतिक माहौल का संकेत तो मिलता ही है। लोगों को याद होगा कि योरप के कुछ देशों में भी बुरके पर रोक लगाने के खिलाफ मुस्लिम समुदाय यूरोपीय संसद तक पहुंचा, अदालतों तक के दरवाजे खटखटाए, लेकिन सरकारों का फैसला सही माना गया, और यह रोक जारी रही। संस्कृतियों के ऐसे टकराव के बीच जब बाहर से आए हुए लोग किसी तरह की हिंसा में शामिल होते हैं, तो उससे नौबत बहुत खराब हो जाती है। ट्रंप ने आज अमरीका में आने की अर्जी लगाने वाले तमाम अफगान लोगों की अर्जियों पर रोक लगी दी है। दूसरी तरफ ब्रिटेन में सरकार कानून बनाकर वहां पहुंचने वाले अवैध शरणार्थियों पर आज तक की सबसे कड़ी रोक लगा रही है क्योंकि उन शरणार्थियों को होटलों में ठहराना ब्रिटिश नागरिकों पर बहुत बड़ा बोझ बन रहा था, और सरकारें लगातार अपने नागरिकों को नाखुश बनाकर नहीं चल सकती हैं।
पश्चिम के देशों की जो उदार सरकारें हैं, उनकी उदारता भी शरणार्थियों की हिंसा के सामने लंबे नहीं टिक सकतीं। और जिन मुस्लिम देशों से ऐसे शरणार्थी आए हैं, उन मुस्लिम देशों में लोकतांत्रिक मूल्यों और उदारता का कोई माहौल उन्होंने देखा हुआ नहीं है। अपने गृहयुद्ध से, भुखमरी या, किसी और वजह से उन्हें अपना देश छोडऩा पड़ा, लेकिन शायद उनकी अपनी मातृभाषा में, जैसा देश, वैसा भेष, यह नसीहत उन्हें मिली हुई नहीं थी, इसलिए वे शरण देने वाले देश की परंपराओं का सम्मान नहीं कर पा रहे। दुनिया के विकसित और सभ्य देश अपनी उदार लोकतांत्रिक परंपराओं के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश तो कर सकते हैं, लेकिन सत्तारूढ़ लोग इसी मुद्दे पर अपनी सरकार खोने का खतरा नहीं उठा सकते। आज एक-एक करके कई देशों में मतदाताओं का बहुमत बाहरी लोगों के खिलाफ होते जा रहा है, और ऐसा स्थानीय तनाव कोई राजनीतिक पार्टी नहीं झेल सकती। फिर यह भी है कि बाहर से आने वाले शरणार्थियों का कोई एक संगठन तो होता नहीं है कि उनसे किसी अनुशासन की उम्मीद की जा सके। जिनका धर्म और जिनकी संस्कृति उन्हें हिंसा की तरफ आसानी से धकेल देते हैं, उनकी आत्मघाती हरकतों को भला कौन रोक सकते हैं? अब अफगानिस्तान छोड़ते हुए अमरीकी सरकार वहां से अपने मददगार हजारों लोगों को ढोकर ले आई थी, उन्हीं में से एक ने अभी वहां के दो सैनिकों को मार डाला। ऐसे तनाव को कोई भी देश बर्दाश्त नहीं कर सकता, और ऐसे इक्का-दुक्का हिंसक लोग अपनी पूरी बिरादरी की संभावनाओं को तबाह करते हैं, चाहे वे अमरीका में रहें, चाहे हिंदुस्तान में।
पश्चिम के जिन देशों ने अपनी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही के तहत दूसरे देशों के शरणार्थियों को जगह देना जारी रखा है वे एक-एक करके घोषित या अघोषित रूप से पीछे हट रहे हैं। अपनी खुद की जमीन पर तो ये लोग उदार हैं, इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल न्यूयॉर्क में सामने आई जहां पर ओसामा बिन लादेन के विमानों ने विश्व व्यापार केंद्र की इमारतें गिरा दी थीं, और अभी उसी शहर ने एक मुस्लिम को अपना पहला मुस्लिम मेयर चुना है। लेकिन यह उदारता उस वक्त हवा हो सकती है जब उसी न्यूयॉर्क में कोई मुस्लिम शरणार्थी दो-चार लोगों को मार डाले। लोकतांत्रिक सभ्यता का विकास एक बहुत धीमी प्रक्रिया रहती है, लेकिन उसे तबाह होने के लिए कई बार कोई एक हादसा काफी होता है। आज न सिर्फ अमरीका में बल्कि इटली, फ्रांस, जर्मनी, और कुछ दूसरे देशों में कट्टरपंथ हावी होते चल रहा है जो कि आप्रवासियों और शरणार्थियों की हिंसा की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुआ है। दुनिया के बाकी देशों में भी ऐसा खतरा मौजूद है। ऐसा लगता है कि शरण देने के लिए देशों के पास खाली जमीन तो मौजूद हो सकती है, लेकिन जख्मों से भरा हुआ दिल कोई जगह नहीं निकाल पाएगा।
महतारी का वंदन और बजट का अंकगणित...
27 नवंबर 2025
आंकड़े बड़े दिलचस्प होते हैं। खासकर तब जब वे किसी चुनावी-राजनीति की योजना के हों, और उन्हें अर्थव्यवस्था के मुकाबले खड़ा कर दिया जाए। चुनावी समीकरण और अंकगणित का समीकरण बिल्कुल अलग-अलग हो सकते हैं, और हो सकता है कि जमीनी हकीकत इन दोनों के बीच कहीं हो। अभी एक संस्था की रिपोर्ट भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारों द्वारा महिलाओं के बैंक खातों में सीधे नगदी ट्रांसफर करने पर आई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्यों के बजट का एक खासा बड़ा हिस्सा इस कैश ट्रांसफर पर खर्च हो रहा है। इनमें हिमाचल की इंदिरा सम्मान निधि पर सबसे ही कम पैसा जा रहा है जो कि दशमलव में भी नहीं गिना जा सकता। इसके बाद असम, और फिर उसके ऊपर के राज्य हरियाणा, तमिलाडु, छत्तीसगढ़ हैं। छत्तीसगढ़ में बजट का 3.33 फीसदी महतारी वंदन योजना में जा रहा है। लेकिन इसके ऊपर के राज्य देखें, तो बढ़ते-बढ़ते एमपी में करीब 5 फीसदी, महाराष्ट्र और दिल्ली में 5 फीसदी से अधिक, बंगाल और कर्नाटक में साढ़े 7 फीसदी या उससे अधिक, और झारखंड में बजट का करीब 10 फीसदी महिलाओं को कैश ट्रांसफर में जा रहा है। एक-एक करके चुनावों में ऐसी योजना जीत और हार को तय करने वाली होती चली गई, और जिन पार्टियों के जीत के आसार कम थे, उन्होंने तो बढ़-चढक़र इससे भी अधिक आंकड़े घोषणापत्र में रखे थे।
बजट के तीन फीसदी से लेकर दस फीसदी तक का हिस्सा अगर महिलाओं को सीधे कैश देने की योजनाओं पर जा रहा है, तो यह समझने की जरूरत है कि राज्य का बजट सौ फीसदी तो किसी भी सरकार को उपलब्ध नहीं रहता। जिसे सरकारी अमले की तनख्वाह, बिजली-पेट्रोल, सरकारी इमारतों का रखरखाव, सफर का खर्च कहा जाता है, वह स्थापना व्यय ही अधिकतर सरकारों को बड़ा भारी पड़ता है। एक तिहाई से लेकर 40 फीसदी तक का स्थापना व्यय अलग-अलग राज्यों के बजट आंकड़े बताते हैं, जबकि हकीकत में ये आंकड़े और ऊपर भी जा सकते हैं। एक तिहाई या अधिक स्थापना व्यय के बाद सरकार के पास बजट राशि सीमित ही बचती है, और उसमें से महिलाओं के लिए, या किसी भी और दूसरी योजना के लिए एक बड़ी रकम जाने का मतलब बजट के लचीलेपन को खत्म करना भी रहता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में धान खरीदी पर सरकारी रियायत बजट का बहुत बड़ा हिस्सा रहती है, इसी तरह गरीबों को राशन देने पर भी केन्द्र और राज्य सरकारों का खासा पैसा जाता है। ऐसे में महिलाओं को उनके खातों में मिलने वाली राशि को लेकर अर्थशास्त्रियों, और पुरूषों के बीच खासी बेचैनी रहती है। ऐसी योजना भारत में तो अभी पिछले कुछ बरसों में ही शुरू हुई हैं, लेकिन दुनिया के अलग-अलग कई देशों में महिलाओं की गरीब आबादी को लेकर डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना का जो फायदा मिला है, उस पर भी एक नजर डालना चाहिए।
कुछ सबसे सफल उदाहरण ऐसे देशों के हैं जहां पर गरीबी हावी रहती है, या थी। मैक्सिको में 1997 से अब तक परिवार ने मां के खाते में पैसे जाते थे, और उसके साथ बच्चों के स्कूल जाने, और अस्पताल में जांच करवाने की शर्त जोड़ी गई थी। इससे वहां लड़कियों का स्कूल जाना 15 फीसदी बढ़ा, बच्चों का कुपोषण 20 फीसदी तक घटा, और परिवार में महिला की स्थिति मजबूत हुई। ब्राजील में 2003 से बिना किसी शर्त के गरीब माताओं को हर महीने उनके खाते में पैसे मिलते हैं, और इससे गरीबी 25 फीसदी तक घटी, घरों में मारपीट और झगड़े 10 फीसदी तक कम हुए, और महिलाएं अपना छोटा-मोटा कोई काम शुरू करके आर्थिक रूप से कुछ या अधिक हद तक आत्मनिर्भर बनीं। दक्षिण अफ्रीका में शिशु संरक्षण अनुदान के नाम से सवा करोड़ से अधिक महिलाओं को हर महीने पैसे मिलते हैं, और इससे उनके बच्चों के कद छोटे रह जाने (स्टंटिंग) में 8 फीसदी तक कमी आई, और परिवार में महिला की आवाज अधिक बुलंद हुई। केन्या में महिलाओं को बिना किसी शर्त के सीधे पैसे देना 2018 में ही शुरू हुआ। इससे वहां महिलाओं की कमाई एक तिहाई से अधिक बढ़ गई, उनके किए जाने वाले छोटे-छोटे कारोबार डेढ़ गुना हो गए, घर में पति द्वारा की जाने वाली हिंसा में 16 फीसदी कमी दर्ज की गई।
ऐसी योजनाओं पर किए गए एक सर्वे से यह पता लगता है कि पैसे अगर मां के खाते में जाते हैं, तो उसका 90 फीसदी हिस्सा बच्चों के खाने और पढऩे पर खर्च होता है, जबकि पुरूष के हाथ में पहुंचने वाले पैसों का सिर्फ 30-40 फीसदी बच्चों पर जाता है। इससे महिला-भत्ता बच्चों का कुपोषण कम करता है, बच्चों का स्कूल छोडऩा कम हो जाता है, और घरेलू हिंसा में बड़ी कमी आती है। भारत के बारे में एक अध्ययन बताता है कि घर में पैसा आने पर मर्द काम कुछ कम करने लगे कि उनकी रोजी के बिना भी घर का काम तो चल जाएगा। कुछ परिवारों में मर्दों ने बीवी से मारपीट भी शुरू कर दी कि अब उसके पास सीधे पैसा आ रहा है, तो पति का काबू कम हो रहा है। किसी देश या समाज में जो मानव विकास सूचकांक हो सकते हैं, उनमें महिला को मिलने वाले कैश ट्रांसफर से बड़ी बेहतरी दिखाई पड़ती है। बच्चों के कुपोषण में होने वाली कमी रातोंरात आंकड़ों में नहीं दिखेगी, लेकिन एक-दो पीढ़ी गुजरते न गुजरते यह फर्क समझ आने लगेगा। किसी राज्य के बजट का चार-छह फीसदी पैसा सीधे महिलाओं के हाथ में जाता है, और उससे महिलाओं और बच्चों की स्थितियों में सुधार होता है, तो यह समाज, और देश की अर्थव्यवस्था में एक बड़ी बेहतरी होगी। चूंकि परिवारों में यह फायदा महिला के माध्यम से पहुंच रहा है, इसलिए आमतौर पर समाज पर काबिज बड़बोले मर्दों को वह खटकता भी है। लेकिन अगर हजार-पन्द्रह सौ रूपए महीने की छोटी सी रकम से किसी परिवार में महिला की आवाज मजबूत होती है, तो यह एक समाज सुधार के नजरिए से भी बहुत बड़ी लागत नहीं है।
भारत मेें
जैसा कि किसी भी सरकारी अनुदान, या रियायत योजना में होता है, लोग बुनियादी तौर पर
भ्रष्ट हैं, और वे अपनी आय छुपाकर भी हर तरह का फायदा ले लेना चाहते हैं। चाहे गरीबी
रेखा के नीचे के लोगों का राशन हो, या महतारी वंदन का पैसा, बहुत से अपात्र लोग इन
योजनाओं में घुस जाते हैं जो कि गरीबों के हक के पैसों पर डाका होता है। सरकार को बड़ी
बारीकी और कड़ाई से छानबीन करके इस चोरी और बर्बादी को रोकना चाहिए, ताकि सरकारी रियायत
का आकार घट सके, और वह सुपात्र लोगों तक ही पहुंचे। हम अपने अखबार की सोच में इसे रेवड़ी
नहीं मानते हैं, यह महिलाओं के खिलाफ सदियों से चले आ रहे सामाजिक अन्याय को खत्म करने
का एक कदम है, और उसे बजट के अंकगणित के साथ-साथ समाज की बेहतरी से भी जोडक़र देखना
चाहिए।
एमबीबीएस करते हुए गरीब, और पीजी करते करोड़पति !
26 नवंबर 2025
पिछले
कुछ दिनों से मध्यप्रदेश के एक ऐसे नौजवान के बारे में खबरें आ रही थीं जिसने अनारक्षित-आर्थिक-कमजोर
की हैसियत से यूपीएससी का इम्तिहान दिया था, और आईएएस बनने के बाद जब उसका स्वागत हुआ,
तो टीवी चैनलों के इंटरव्यू में ही पता लगा कि उसकी पत्नी बेंगलुरू में आईटी सेक्टर
में काम करती है, जिसकी तनख्वाह इस नौजवान के कोचिंग सेंटर की कमाई से पांच गुना है,
मां-बाप अलग कमाते हैं। ऐसे संपन्न परिवार का लडक़ा अपने को आर्थिक रूप से कमजोर बताकर
आईएएस बन गया। वह खबर अभी चक्कर लगाना बंद कर भी नहीं पाई थी कि एक नई खबर आ गई कि
आर्थिक रूप से कमजोर अनारक्षित तबके से मेडिकल कॉलेज पहुंचने वाले और ग्रेजुएट होने
वाले लोगों ने चिकित्सा-पीजी के लिए एनआरआई, या मैनेजमेंट कोटे की सीटों पर दाखिला
लिया है जिसकी फीस आधा-एक करोड़ रूपए बताई जाती है। अपने आपको ईडब्ल्यूएस बताकर मेडिकल-दाखिला
लिया, एमबीबीएस किसी तरह किया, पीजी दाखिले में फ्लॉप शो रहा, तो उसके बाद मैनेजमेंट
सीट या एनआरआई कोटे से पीजी दाखिला ले लिया। ईडब्ल्यूएस बनने के लिए परिवार की आय
8 लाख रूपए साल से अधिक नहीं होनी चाहिए, दूसरी तरफ अब आधा-एक करोड़ देकर वे आगे दाखिला
ले रहे हैं।
जब अनारक्षित
वर्ग के लिए ईडब्ल्यूएस सीमा तय की गई थी, और उनके लिए आरक्षण रखा गया था, तब ही यह
आशंका होने लगी थी कि इसका बेजा इस्तेमाल कैसे किया जाएगा। यह ठीक वैसा ही है जैसा
कि आज ओबीसी तबकों के भीतर क्रीमीलेयर के ऊपर वाले लोग भी झूठा आय प्रमाणपत्र बनवाकर
आरक्षण का फायदा ले लेते हैं। बहुत से लोग तो बैंक खातों में मिलने वाली तनख्वाह को
भी छुपा लेते हैं, और धड़ल्ले से फर्जी सर्टिफिकेट बनवा लेते हैं। फिर इनकी आर्थिक
क्षमता की वजह से इनके बच्चे अधिक सक्षम रहते हैं, इम्तिहान में बेहतर तैयारी कर पाते
हैं, और वे ही आरक्षण का अधिकतम फायदा झपट लेते हैं। अभी भारत के मुख्य न्यायाधीश ने
दलितों के बारे में कहा था कि उनके आरक्षण से क्रीमीलेयर को बाहर करना जरूरी है, वरना
सच में कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा नहीं मिल पाएगा। हम भी दशकों से यही तर्क लिखते
आ रहे हैं कि सभी आरक्षित वर्गों से क्रीमीलेयर को बाहर किया जाए। लेकिन अभी अनारक्षित
वर्ग का ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट पाने के लिए सक्षम लोगों ने जैसी जालसाजी और धोखाधड़ी
की है, उसका क्या किया जाए? जब कॉलेजों में दाखिला गलत तरीके से हो जाए, लोग डॉक्टर
भी बन जाएं, तब अदालतें भी इस दुविधा में पड़ जाती हैं कि वे क्या करें? कैसे गलत दाखिले
वाले इन लोगों की जिंदगी की घड़ी वापिस घुमाएं?
हमने कुछ
दिन पहले ही मुख्य न्यायाधीश की बातों के संदर्भ में अपनी पुरानी बातें गिनाई थीं,
लेकिन अब अनारक्षित ईडब्ल्यूएस के संदर्भ में इस पूरे मुद्दे पर एक बार और गौर करने
की जरूरत है। जब कभी आरक्षण का लाभ पाने वालों में अपात्र लोग खड़े हो जाते हैं, तो
उसका नुकसान बाकी तमाम लोगों को उठाना पड़ता है। एसटी, एससी, और ओबीसी तबकों के ताकतवर
लोग जब आरक्षण पाकर समाज के अनारक्षित वर्गों के कमजोर लोगों से आगे निकल जाते हैं,
तो सामाजिक न्याय के लिए स्थापित आरक्षण पर से लोगों का भरोसा उठने लगता है। वे देखते
हैं कि उनके आसपास के बंगला-गाड़ी वाले, महंगी कोचिंग वाले एसटी-एससी, और ओबीसी बच्चे
किस तरह आरक्षित वर्गों में आगे बढ़ते हैं। और अब तो अनारक्षित वर्ग के गरीब होने का
झूठा सर्टिफिकेट जुटाकर संपन्न सवर्ण भी बाकी तमाम लोगों को पीछे छोडक़र आसमान पर पहुंच
रहे हैं।
आरक्षण
की व्यवस्था को लेकर समाज में जागरूकता की भी कोई कमी रहती है, और बहुत से लोग वैसे
भी इस सामाजिक इतिहास से अपरिचित रहते हैं कि सदियों के अन्याय के मुआवजे के रूप में
एसटी-एससी आरक्षण शुरू किया गया था। ऐसे लोग जब एसटी-एससी आरक्षण को क्रीमीलेयर मुक्त
देखते हैं, तो उनका दिल और जलता है। अब अगर अनारक्षित ईडब्ल्यूएस के नाम पर बेइमानी
और धांधली चलती रहेगी, तो आरक्षण की पूरी साख ही खत्म हो जाएगी। यह सिलसिला तुरंत खत्म
होना चाहिए। चाहे यूपीएससी हो, चाहे मेडिकल या कोई और दाखिले, या फिर सरकारी नौकरी
की बात हो, जहां-जहां यह धांधली हुई है, उसकी बहुत तेज रफ्तार जांच होनी चाहिए क्योंकि
कुछ बरस नौकरी हो जाए, या कुछ बरस पढ़ाई हो जाए, तो उसके बाद अदालतें भी बहुत कड़वा
फैसला लेना नहीं चाहतीं।
सरकार
को बिना देर किए हुए एसटी-एससी से क्रीमीलेयर हटाने का कानून बनाना चाहिए। फिर सारे
ही आरक्षित लोगों के प्रमाणपत्रों की खुली जांच करनी चाहिए, और जरूरत रहे तो ऐसे सारे
नाम और उनके प्रमाणपत्र उसी तरह वेबसाइटों पर डालने चाहिए, जिस तरह चुनाव आयोग उम्मीदवारों
की जानकारी पोस्ट करता है। न्याय की इस जरूरत को समझना चाहिए कि जब किसी व्यक्ति को
आरक्षण का फायदा देकर दूसरों के ऊपर रखा जाता है, पढ़ाई की सीट या नौकरी दी जाती है,
तो बाकी लोगों का भी हक रहना चाहिए कि वे ऐसे लोगों के प्रमाणपत्रों के नकली होने पर
उस पर सवाल उठा सकें। ताजा मेडिकल घोटाला बहुत भयानक है, और इससे अदालत, सरकार, और
संसद सबकी आंखें खुलनी चाहिए ताकि वे इस सिलसिले को आगे बढऩे से रोकें। आरक्षण का लाभ
पाने वाले के हर प्रमाणपत्र वेबसाइट पर रहने चाहिए जिसे लोग चुनौती दे सकें, और सरकार
एक निर्धारित समय के भीतर उसकी जांच कर सके। सोच-समझकर जालसाजी और धोखाधड़ी करने वाले
कुछ लोगों को सजा भी होनी चाहिए, ताकि बाकी लोग यह जुर्म करना छोड़ें।
भारत की
सामाजिक व्यवस्था में आरक्षण पहले से एक बदनाम शब्द चले आ रहा है, इसे और अधिक बदनाम
नहीं होने देना चाहिए।
मां के दूध में यूरेनियम प्रदूषण भी इस देश के लोगों को जगा नहीं रहा!
25 नवंबर 2025
बिहार की एक रिपोर्ट अगर सिर्फ किसी अखबार या टीवी चैनल की रहती, तो उसे सनसनीखेज कहकर खारिज किया जा सकता था। लेकिन यह रिपोर्ट कुछ वैज्ञानिक संस्थानों की शोध रिपोर्ट पर आधारित है, और देश की एक सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण संस्था, सीएसई की पत्रिका डाऊन टू अर्थ की अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट पर आधारित है, इसलिए इसे खारिज करना आसान नहीं है। बिहार के अलग-अलग कई जिलों में माताओं के दूध के नमूनों की जांच की गई, और उनमें यूरेनियम का प्रदूषण पाया गया। यह बहुत खतरनाक बात इसलिए है कि दुधमुंहे शिशु पूरी तरह मां की दूध पर निर्भर रहते हैं, और उसमें अगर यूरेनियम आकर उन बच्चों के लिए खतरा खड़ा कर रहा है, तो उन बच्चों के लिए इसका कोई विकल्प भी तो नहीं है।
इस मामले में किए गए सर्वे, अध्ययन, और शोध से यह पता लगा है कि जितनी भी माताओं के दूध की जांच की गई, उनमें सभी में यूरेनियम मिला है। यह जमीन के नीचे से आने वाले पानी में आने वाला प्रदूषण है, और ये सारी माताएं ऐसे ही पानी पर निर्भर हैं। छोटे बच्चे अपनी माताओं के मुकाबले भी ऐसे प्रदूषण के लिए अधिक संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनके शरीर का वजन कम होता है, उनके अंग, और उनका मस्तिष्क विकसित नहीं हुआ रहता, और उनकी पाचन शक्ति पेट में गई भारी धातुओं को आसानी से बाहर नहीं निकाल सकती। यूरेनियम के प्रदूषण से बच्चों की किडनी पर असर होता है, उन पर स्नायुसंबंधी (न्यूरोलॉजिकल) असर होता है, कैंसर का खतरा रहता है, और भी कई किस्म की गंभीर बीमारियां उनको हो सकती हैं। सीएसई के एक शोध के मुताबिक बिहार के 11 जिलों में भूजल में यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुझाई गई सीमा से बहुत ऊपर है, कई जिलों में तो यह दो-ढाई गुना से भी अधिक है। रिपोर्ट बताती हैं कि बिहार में गंगा तट के इलाके ऐसे प्रदूषण के लिए अधिक जाने जाते हैं। फिर भी डॉक्टरों का कहना है कि खतरे के बावजूद इन बच्चों से मां का दूध छुड़ाना नहीं चाहिए, क्योंकि उसका कोई बेहतर विकल्प इन बच्चों के लिए अभी उपलब्ध नहीं है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट कहती है कि भूजल में प्रति लीटर में 30 माइक्रोग्राम से अधिक यूरेनियम मां के दूध में पहुंच सकता है। बिहार के जिलों में यह 66, 77, और 82 माइक्रोग्राम/लीटर तक मिला है।
अब देश के अलग-अलग हिस्सों में जमीन के भीतर के पानी में कई किस्म के खतरनाक प्रदूषण बने हुए हैं। छत्तीसगढ़ के ही गरियाबंद जिले के सुपेबेड़ा में प्रदूषित पानी की वजह से किडनी खराब होने से लगातार मौतें होती हैं, और करोड़ों खर्च करने के बाद भी वहां पानी से इस प्रदूषण को खत्म करने, या साफ पानी पहुंचाने का काम नहीं हो पाया है। देश के बहुत से हिस्सों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, ऐसे बहुत से नुकसानदेह रसायन मिले हुए हैं, और अलग-अलग इलाकों से भयानक तस्वीरें आती हैं जिनमें कहीं लोगों के दांत खराब हो गए हैं, कहीं उनकी हड्डियां कमजोर हो गई हैं, और बदन में पानी से जूझने वाली किडनी तो कई मामलों में खराब हो जाती है जो कि चेहरे से दिखती नहीं है। सरकार के ही कुछ आंकड़े बताते हैं कि देश में 16 करोड़ से अधिक लोगों को सुरक्षित पानी नहीं मिल रहा है। भयानक रसायनों के जमीन के नीचे के भंडारों से परे कई जगहों पर खेती में इस्तेमाल होने वाले, कारखानों में काम में लाए जाने वाले रसायनों को बह-बहकर भूजल में जाते पाया गया है, और उससे कैंसर जैसे खतरनाक रोग भी लोगों को हो रहे हैं।
जिन लोगों को यह लगता है कि वे अपने लिए घरों में तरह-तरह के महंगे फिल्टर लगाकर अपने पीने के पानी को साफ कर लेंगे, उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके खाए जाने वाले फल और सब्जी भी प्रदूषित पानी से उगते हैं, और रासायनिक प्रदूषण उनमें से होते हुए बदन के भीतर पहुंचता रहता है। फल-सब्जी, या फसल में छिडक़ा जाने वाला, खेतों में जमीन में डाला जाने वाला रसायन और जहर भी घूम-फिरकर पानी तक भी पहुंचता है, और फसलों के रास्ते तो इंसानों के बदन में आता ही है। जहर से परे माइक्रोप्लास्टिक भी हर तरह के पानी में घुसकर लोगों के बदन में आता है, और अब वह इंसानों के खून में घूम रहा है, उनके दिमाग के भीतर भी पहुंच रहा है।
प्रदूषण जब तक लोगों की जिंदगियां खत्म नहीं करता, तब तक लोग उसकी परवाह नहीं करते। लेकिन आज हालत यह है कि दिल्ली में हवा जितनी जहरीली हो गई है, सिर्फ उसी की वजह से दस-बीस लाख लोग दिल्ली में मर रहे हैं, और लोगों की उम्र 8 बरस तक घट जा रही है। ये बातें हम किसी पार्टी के नेता के आरोपों से निकालकर नहीं कह रहे हैं, बल्कि ये वैज्ञानिक रिपोर्ट कहती हैं। यह नौबत किसी एक पार्टी के देश-प्रदेश में राज होने पर अचानक रातोंरात नहीं आ गई है, यह धीरे-धीरे बढ़ते हुए जहर का नतीजा है। यह सिलसिला हिन्दुस्तान में बहुत अधिक खतरनाक इसलिए है कि यहां औद्योगिक प्रदूषण पर किसी तरह का सरकारी, या अदालती काबू नहीं है। पर्यावरण के नियमों पर अमल इतना कमजोर है कि हर फैक्ट्रियां, जहर बनाने वाली हर कंपनी अपनी मर्जी का काम कर पाती हैं, और उन पर कोई रोक-टोक नहीं है। छत्तीसगढ़ में ही शराब बनाने वाले कुछ कारखाने अपना भयानक प्रदूषण सीधे नदी में डाल रहे हैं, उनसे मरी हुई लाखों मछलियां तैरती हुई मिली हैं, हाईकोर्ट उस पर खफा भी हुआ है, लेकिन कारखाने और कारोबार की सेहत पर कोई आंच नहीं आई है।
मां के दूध में यूरेनियम मिलने पर भी अगर यह देश नहीं जागता है, तो इसे अगले सैकड़ों-हजारों बरस के लिए प्रदूषण की शिकार पीढिय़ां मिलना तय है। आज तो ऐसी भी पूरी वैज्ञानिक जानकारी नहीं है कि ऐसे प्रदूषण के शिकार लोगों की अगली कितनी पीढिय़ां प्रभावित रहेंगी। यह सिलसिला सरकार के भरोसे इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि रोकथाम के सरकारी इंतजाम परले दर्जे के भ्रष्टाचार से लदे रहते हैं। अदालत के भरोसे इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता कि जहर के कारोबारियों के महंगे वकील अदालत में जो चाहे साबित करते रहते हैं। जनता में जागरूकता की इतनी कमी है कि जहर का असर उसे आंखों से जब दिखने भी लगता है, तब भी वह शांत बैठी रहती है। इस देश के दुधमुंहे बच्चों का कोई वोट तो है नहीं कि उनकी सीधी फिक्र की जाए। फिर भी दुनिया का इतिहास जब लिखा जाएगा, तब बेजुबान बच्चों के साथ ऐसा जुल्म करने वाली पीढ़ी का नाम बड़े-बड़े काले अक्षरों में दर्ज होगा। क्या किसी को सचमुच इसकी फिक्र रह गई है?
बुनियादी मतभेदों के साथ शादी की शुरूआत ही क्यों?
24 नवंबर 2025
भोपाल के फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए एक ऐसा मामला पहुंचा है जिसमें महिला को यह शिकायत है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाला उसका पति सिर के बालों में पीछे चुटैया रखता है, जो कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ लगती है, और इसलिए वह तलाक चाहती है। उसका कहना है कि शादी के पहले उसे उम्मीद थी कि शादी के बाद इसे कटाने को मान जाएगा, लेकिन उसके न मानने पर अब पत्नी अपने मां-बाप के पास रहती है, और तलाक चाहती है। एक दूसरे मामले में पति ने तलाक की अर्जी लगाई है कि पत्नी रात-दिन पूजा में लगी रहती है। इस तरह के मामले देश की अलग-अलग फैमिली कोर्ट में आते ही रहते हैं। एक पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने किसी अनजान नंबर पर हाय लिखकर एक स्माइली भेजी, इसलिए अब उसे तलाक चाहिए। घर में खाना पकाने को लेकर तनातनी बहुत से तलाक-प्रकरणों की आम वजह है। मुम्बई का एक मामला ऐसा है जिसमें शादी के पहले पति-पत्नी दोनों मांसाहारी थे, और शादी के बाद अब पत्नी शाकाहारी हो गई है, और पति को भी मांस खाने से रोक रही है। तलाक चाहने वाले एक पति का आरोप है कि पत्नी ने उसके मां-बाप और बहन को फोन पर ब्लॉक कर रखा है, और मिलने भी नहीं देती। कुत्ता पालने या न पालने को लेकर कई जोड़ों के बीच तनातनी तलाक तक पहुंचती है। बरसों तक देहसंबंध न बनाना तलाक के लिए पर्याप्त आधार माना जाता है। दिल्ली की लडक़ी की शादी राजस्थान में हुई, और गर्मियों में भी वहां एसी नहीं था, इस आधार पर अदालत ने तलाक मंजूर कर दिया कि जीवनशैली का यह एक बड़ा फर्क है। लखनऊ के एक मामले में पत्नी ने शादी के बाद सोशल मीडिया से पति का सरनेम हटा दिया, और अपना शादी के पहले का सरनेम इस्तेमाल करने लगी, इस पर पति ने तलाक मांग लिया।
इस तरह की सैकड़ों किस्में हैं जो कि पति-पत्नी के बीच कलह की वजह रहती हैं, और बहुत से मामलों में ये तलाक तक पहुंचती हैं। तलाक तो फिर भी ठीक है, बहुत से मामलों में ये वजहें विवाहेत्तर संबंधों तक पहुंच जाती है, और उसके बाद तरह-तरह की हिंसा की वजह भी बनती हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि अगर शादी के पहले जोड़े के दोनों लोगों को किसी पेशेवर विवाह-परामर्शदाता के साथ बिठा दिया जाता, तो शायद एक-दो घंटे में यह समझ आ जाता कि एक-दूसरे की कौन-कौन सी बातें नापसंद हैं, और कौन-कौन सी बातों पर जोड़ीदार को कोई भी समझौता मंजूर नहीं होगा। अगर टेबिल पर ये तमाम बातें साफ-साफ हो जाएं, तो न केवल बहुत सारे तलाक की नौबत टल सकती है, बल्कि गृहकलह कम हो सकता है, हिंसा तो कम हो ही सकती है। लेकिन भारत में या तो लडक़ा-लडक़ी खुद एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते एक-दूसरे को पसंद कर लेते हैं, और फिर बात परिवार की मर्जी से, या मर्जी के खिलाफ शादी तक पहुंच जाती है। लेकिन डेटिंग या दोस्ती के इस दौर में ताजा-ताजा प्यार की आंखें कुत्ते के नवजात पिल्लों की आंखों की तरह खुली नहीं रहती हैं, और एक-दूसरे की खामियां दिखती नहीं हैं, और लोग अपनी-अपनी खामियां छुपाते भी चलते हैं। फिर यह भी है कि दोस्ती या मोहब्बत के इस दौर में दोनों परिवारों की जटिलताएं, कमाई के साधन, बुरी आदतों की कोई अधिक चर्चा होती नहीं। और शादी के बाद जोड़ों के बीच जब बदन से निकलने वाली हर किस्म की गंध, और हर किस्म की आवाज के साथ जीना रोज की जरूरत बन जाता है, तब असली दिक्कतें सामने आने लगती हैं, और या तो बर्दाश्त करते हुए लोगों के मन भड़ास से भरे रहते हैं, या फिर वे अलग होने तक पहुंच जाते हैं।
इस बारे में लिखते हुए अभी हमें मालूम नहीं है कि शादी के पहले ऐसे जोड़ों के सुखी साथ की संभावनाओं को आंकने के लिए कोई मोबाइल ऐप या कोई वेबसाइट मुफ्त में हासिल है या नहीं। आज कोई परामर्शदाता भी कम्प्यूटर पर ऐसे प्रोग्राम को देखकर ही दोनों को सामने बिठाकर सवाल करेंगे, या अलग-अलग बात करके। कुल मिलाकर शादी के बाद आने वाले तमाम किस्म के संभावित टकराव को पहले ही सुलझा लेने में समझदारी हो सकती है। एक बार शादी हो जाए, बच्चे हो जाएं, कोई संयुक्त संपत्ति लेना हो जाए, उसके बाद तलाक में कई किस्म की दिक्कतें आती हैं। लोगों का मिजाज शादी के पहले जो रहता है, वह भी बाद में बदल सकता है, और अभी तक हमने बेवफाई या बदचलनी का जिक्र नहीं किया है, जो कि बहुत से जोड़ों के बीच तनाव की एक बड़ी वजह रहती है। आज के जमाने में लडक़े-लड़कियां दोनों ही बाहर रहते हैं, पढ़ते हैं, काम करते हैं, और मिलते-जुलते हैं। ऐसा शादी के पहले से शुरू होता है, और शादी के बाद भी चलते रहता है। इसलिए कब किसी की पिछली जिंदगी की कोई दफन मोहब्बत कब्र फाडक़र निकल आए, और भूतपूर्व पर वर्तमान में कब्जा करने की हसरत दिखाए, यह भी अंदाज लगाना पहले से मुमकिन नहीं रहता। फिर भी ऐसे तमाम असुविधाजनक सवाल कोई भी पेशेवर परामर्शदाता शादी के पहले तो कर ही सकते हैं, और यह अंदाज लगा सकते हैं कि जोड़ों के बीच सामंजस्य किन मुद्दों पर कितना हो सकेगा, और कहां पर कोई समझौता नहीं होगा।
लोगों को याद होगा कि हम हर कुछ महीनों में इस बात की भी चर्चा करते हैं कि कुंडली मिलाने के बजाय लोगों को लडक़े-लडक़ी की मेडिकल जांच रिपोर्ट मिलवाना चाहिए, ताकि शादी के पहले ही एक-दूसरे के बारे में मौजूदा बीमारियों का पता लग सके। इससे आगे आने वाली कई किस्म की जेनेटिक-जटिलताएं भी घट सकती हैं, और लोग एक अधिक भरोसेमंद और सेहतमंद साथ निभा सकते हैं। उसके साथ-साथ अब हम इस बात को भी जोडऩा चाहते हैं कि ऐसे पेशेवर विवाह-परामर्शदाता रहने चाहिए जो कि शादी टूटने की नौबत को घटाने के काम आ सके। एक तलाक, या जोड़ों का अलग रहना समाज की उत्पादकता को भी प्रभावित करता है, और दोनों परिवार, अगली पीढ़ी के बच्चे, इन सबका भी सुख तबाह होता है। इसलिए अगर ऐसे पेशेवर लोग समाज में नहीं हैं, तो सरकारों को भी चाहिए कि वे इंटरनेट पर ऐसी इंटरएक्टिव वेबसाइट बनाकर दें जिसमें लडक़ा-लडक़ी दोनों कुछ सवालों के जवाब देते जाएं, और उनके जवाबों के आधार पर उनसे आगे सवाल किए जाएं, और इनके आधार पर एक-दूसरे से सवाल-जवाब चलते रहें। आज एआई के जमाने में यह सब बड़ा आसान हो गया है। वैसे तो सवालों की ऐसी फेहरिस्त रहे, तो उसके सवाल-जवाब किसी भी एआई औजार में डालने पर वह भी सुझा सकता है कि यह जोड़ी कारगर रहेगी या नहीं। आज से ही जहां पर शादी कामयाब होने की संभावना कम दिखती हो, वहां पर वक्त बर्बाद करना शुरू करने के पहले लोगों को एक बार दुबारा सोच लेना चाहिए, वरना अब तो इस देश में खुदकुशी भी जुर्म नहीं रह गई है, और मतभेदों के बाद भी जोड़े चाहें, तो वे अपनी जिंदगी को प्रयोग में झोंक सकते हैं।
सार्वजनिक जगहों के बाजारू दोहन के खिलाफ भी कोई हैं?
23 नवम्बर 2025
यह बात है तो लोकल, लेकिन आज के वक्त किसी भी लोकल बात की एक ग्लोबल संभावना भी रहती है, और किसी ग्लोबल बात की लोकल संभावना। शायद इसीलिए बहुत बरस पहले मैंने अपने ब्लॉग का नाम इन दोनों को मिलाकर बने हुए एक शब्द, ग्लोकल पर रखा था। अब अमरीका में चार-चार बरस के लिए सरकार चुनी जाती है, कुछ देशों में पांच बरस के लिए। भारत भी उन्हीं में से है, और यहां केन्द्र, राज्य, म्युनिसिपल, और पंचायत सरकारें पांच-पांच बरस के लिए बनती हैं। माना तो यही जाता है कि जनता के एक बार वोट देने के बाद ये सरकारें पांच बरस तक काम करें, लेकिन राजभवन और विधानसभा अध्यक्ष के दफ्तर 21वीं सदी के ऐसे नए नीलामघर बन गए हैं कि सरकारें कई बार कार्यकाल पूरा नहीं कर पातीं। लेकिन वह एक अलग बहस का मुद्दा हो जाएगा, आज मेरे इर्द-गिर्द छत्तीसगढ़ में जो मुद्दा है, वह तो पांच बरस पूरी चलने वाली सरकारों के साथ भी आने वाली दिक्कत का मुद्दा है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल एक सरकारी कॉलेज के विशाल मैदान का बेजा इस्तेमाल करके वहां पर बनाए गए एक खानपान के बाजार को तोड़ दिया गया। इस पर म्युनिसिपल के करोड़ों खर्च हुए थे, और पिछली कांग्रेस सरकार के वक्त भाजपा के स्थानीय विधायक जो कि उस समय भूतपूर्व विधायक थे, वे इसके खिलाफ अड़े हुए थे। कल उन्होंने इसे तुड़वाकर दम लिया। उनकी आपत्ति यह नहीं थी कि एक मैदान के बड़े हिस्से को घेरकर बाजार क्यों बनाया गया, उनकी आपत्ति यह थी कि वहां पर कुछ और बनाया जाना चाहिए था। कांग्रेस और भाजपा की सत्ता के बीच फंसे हुए इस बाजार के कल हट जाने के बाद भी आज यह आवाज कहीं से नहीं आ रही कि खेल के एक मैदान का एक बड़ा हिस्सा काटकर जो पूरी तरह से अनैतिक और गैरकानूनी इस्तेमाल किया गया था, उस इस्तेमाल को ही खत्म किया जाना चाहिए था। जमीन चाहे सरकार की हो, अगर वह मैदान के इस्तेमाल में आ रही है, आधी सदी से उसका यही उपयोग बना हुआ है, तो कोई सरकार भी वहां बाजार नहीं बना सकती। लेकिन हाईकोर्ट तक जाकर किसी ने यह मुद्दा नहीं उठाया। बात अहंकारों के टकराव तक सीमित रह गई कि शहर के किस मैदान को काटकर कौन वहां चौपाटी बनाए, कौन अपने लोगों को दुकानें बांटे, कौन उसका श्रेय ले।
इसी राजधानी रायपुर में प्रदेश का एक सबसे बड़ा जंगला, फौलादी स्काईवॉक सात बरस बाद अब आगे बनना शुरू हो रहा है। उसे भाजपा सरकार के ताकतवर मंत्री रहे राजेश मूणत ने बनवाना शुरू किया था, और वह शहर के कुछ सबसे व्यस्त सडक़-चौराहों पर आवाजाही के लिए हवा में टंगा हुआ पुल सरीखा था। कांग्रेस की भूपेश सरकार पांच बरस तक यही तय नहीं कर पाई थी कि उसे पूरा करना है, या उसे गिराना है। अब भाजपा की सरकार बनी, तो इसी पार्टी की पिछली सरकार का बनवाया हुआ यह ढांचा पूरा करना उसकी जिम्मेदारी भी थी, और इस बार विधायक बन जाने पर भी मंत्री नहीं बनाए गए राजेश मूणत का दबाव भी था। भाजपा के ही पिछले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह इस बार विधानसभा अध्यक्ष हैं, और मूणत उन्हीं के करीबी सहयोगी रहे, इसलिए मूणत की प्रतिष्ठा के इस प्रोजेक्ट को पूरा करना सरकार पर एक बड़े दबाव सरीखा था। अब उसके लिए ठेका हो गया है, और काम आगे बढ़ रहा है। हालांकि जानकारों का यह कहना है कि शहर के बीचोंबीच बनने जा रहे इस गैरजरूरी माने जा रहे स्काईवॉक की वजह से शहर के बीच से कभी कोई मेट्रो नहीं जा पाएगी, या कोई फ्लाईओवर नहीं बन पाएगा। उन संभावनाओं को यह फौलादी ढांचा खत्म कर देता है। लेकिन सरकारों की अपनी राजनीतिक पसंद रहती हैं, और लोकतंत्र निर्वाचित सरकारों को कैसे भी फैसले लेने की छूट देता है।
अब जिस तरह शहर में या बाकी प्रदेश में एक सरकार की पसंद, प्रतिष्ठा, और उसके अहंकार के प्रोजेक्ट पांच बरस के बाद अगर दुबारा तय किए जाएंगे, तो प्रदेश में सारे ही निर्माण पुर्जे खोलकर दुबारा कहीं और खड़े करने वाले ही बनाने चाहिए। इमारतों की जगह शामियाने बनाने चाहिए, और लोहे की जगह बांस का इस्तेमाल करना चाहिए। कोई भी सरकार आते ही शुरू के छह महीनों में अपनी पसंद से ऐसे अस्थाई ढांचे खड़े कर ले, पिछले ढांचे खुलवा दे, और इस काम में मनरेगा की मजदूरी भी मंजूर कर दे तो कई लोगों को रोजगार भी मिल जाएगा।
ऐसा लगता है कि जब एक-एक करके कोई सरकार केन्द्र, राज्य, म्युनिसिपल, और वार्ड तक, चार इंजन की सरकार हो जाती है, तो उसमें मुसाफिर डिब्बे लगाने की कोई जरूरत भी नहीं रह जाती। जब चार-चार इंजन की सरकार चल रही है, तो फिर पांच बरस जनता की क्या जरूरत है? वह तो पैदल भी चल सकती है, उसने हजारों किलोमीटर पैदल चलकर दिखाया हुआ भी है। एक रेलगाड़ी में चार इंजनों का असर अब देखने मिल रहा है, जब म्युनिसिपल के फैसलों का जनता से कोई लेना-देना नहीं रह गया। राज्य सरकार और म्युनिसिपल एक ही पार्टी की सरकारों के हैं, इसलिए उनके बीच भी आपस में किसी जवाब-तलब की जरूरत नहीं रह गई है।
कांग्रेस के बीते पांच बरस के शासन में एक-एक तालाब, एक-एक बगीचे, एक-एक मैदान को काट-काटकर उसमें बाजार बना दिए गए, और ऐसे बाजारों को सत्ता पर बैठे लोगों ने कैसी-कैसी कमाई का जरिया बना लिया, यह चर्चा भी हवा में बनी हुई हैं। बहुत से लोग अब इन सार्वजनिक जगहों पर घूमने भी जाना नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें बर्बाद कर दिया गया है, और सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के कई फैसले, कई आदेश भी सार्वजनिक जगहों का यह बाजारूकरण नहीं रोक पाए। बहुत अधिक राजनीतिक ताकत बहुत अधिक बददिमागी भी पैदा करती है, और हमने अलग-अलग सरकारों के वक्त अलग-अलग मामलों में इसके पुख्ता सुबूत देखे हैं। इसलिए बहुत अधिक स्थिरता, नीचे से ऊपर तक एक ही पार्टी के राज जैसी बातें हमें जितना भरोसा दिलाती हैं, उससे कहीं अधिक आशंकाओं से भर देती हैं।
किसी पार्टी या नेता की क्या पसंद है, किस सरकार के वक्त क्या किया गया है, ऐसी छोटी बातों पर गौर किए बिना एक बुनियादी बात पर लोगों को सवाल खड़े करने चाहिए कि सार्वजनिक जगह का बेजा इस्तेमाल करने का अधिकार निर्वाचित लोगों, और अफसरों को किसने दिया है? नेता तो पांच बरस के लिए निर्वाचित होते हैं, अफसर तो शायद इससे आधे वक्त के लिए ही किसी कुर्सी पर आते हैं, लेकिन जो लोग प्रदेश और शहर के, गांव-कस्बे के पुराने बाशिंदे हैं, जिनकी पूरी जिंदगी यहीं गुजरी है, उन लोगों की कोई भी राय किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में लेने की जरूरत किसी को नहीं लगती, अगर सत्ता अपने पर उतर आती है तो।
आज हमारी दिक्कत यह है कि एक बेजा इस्तेमाल को हटाकर दूसरे बेजा इस्तेमाल की तैयारी चल रही है, जबकि मैदान से अधिक जायज कोई दूसरा इस्तेमाल हो नहीं सकता था। अगर कोई हाईकोर्ट में ऐसे मामलों को सही तरीके से रखे, तो तालाबों, बगीचों, मैदानों की बाजारू घेराबंदी, उनका कांक्रीटीकरण, उनका बाजारूकरण सब तुड़वा दिया जाएगा। आज जगह-जगह पुराने ऐतिहासिक मैदानों को चारों तरफ से काट-काटकर छोटा कर दिया गया है, सौ-सौ साल पुराने बगीचों के भीतर इमारतें बना दी गईं, और अलग-अलग धर्मों के धर्मस्थल भी। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। ऐसे जनसंगठनों की जरूरत है जो कि जानकार, और विशेषज्ञों की मदद लेकर सार्वजनिक जगहों के इस्तेमाल पर कानूनी और तकनीकी विश्लेषण लोगों के सामने रख सके, और शहर-कस्बों को हमेशा के लिए बर्बाद होने से बचा सके। आज एक निर्माण टूटने से खाली हुई जगह पर दूसरा निर्माण शुरू होने के पहले उस पर अदालती रोक की कोशिश होनी चाहिए।
इनको मालूम है जातियों की हकीकत लेकिन...
23 नवंबर 2025
अभी-अभी बिहार के चुनाव निपटे तो जातियों की चर्चा इस प्रदेश की राजनीति को लेकर, और समाज के बाकी दायरों को लेकर भी खूब बढ़-चढक़र हुई। इस बीच एक रिपोर्ट बिहार के जातिवाद पर इस चुनाव के पहले की भी सामने आई। देश के एक प्रतिष्ठित मैनेजमेंट संस्थान, आईआईएम बेंगलोर के एक अध्ययन में यह पाया गया है कि बिहार के सरकारी स्कूलों में अलग-अलग जातियों के छात्र परीक्षाओं में जो नंबर पाते हैं, उन बच्चों के शिक्षकों की धारणाएं उनसे अलग रहती हैं, और वह जातियों से प्रभावित रहती हैं। पिछड़ी जातियों के छात्र-छात्राओं की क्षमता को उनके परीक्षा-परिणामों के मुकाबले भी कम आंका जाता है, और आईआईएम का यह अध्ययन कहता है कि यह शिक्षकों के ‘मूल्यांकन पक्षपात’ की वजह से होता है। तथाकथित शिक्षकों से जब परीक्षा परिणामों से परे छात्रों का अपने अंदाज से मूल्यांकन करने कहा गया, अगड़ी जातियों के शिक्षकों का अंदाज पिछड़ी जातियों के बच्चों के प्रतिकूल ही रहा। पिछड़ी जातियों के जिन बच्चों के अंक सवर्ण छात्रों के बराबर थे, उन्हें भी शिक्षक के गैरइम्तिहानी मूल्यांकन में सवर्ण बच्चों से कमजोर बताया गया। आईआईएम के इस शोध को करने वाले दो वरिष्ठ प्राध्यापक सोहम साहू, और ऋत्विक बनर्जी थे, जिन्होंने बिहार के 105 सरकारी स्कूलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, और छात्रों, शिक्षक, परिवारों, और स्कूलों का विस्तृत सर्वेक्षण भी किया। शोधकर्ताओं का यह निष्कर्ष है कि ऐसा पूर्वाग्रही आंकलन लंबे समय में पिछड़ी जातियों, जिसमें ओबीसी से परे एसटी-एससी भी शामिल हैं, छात्र-छात्राओं का आत्मविश्वास तोड़ता है और धीरे-धीरे जाकर एक असली शैक्षणिक अंतर पैदा होने लगता है। उन्होंने इसे पिग्मेलियन इफेक्ट कहा है जिसमें टीचर की अपेक्षाएं ही छात्रों के नतीजे तय करने लगती हैं।
अभी हम एक जिम्मेदार संस्थान के दो वरिष्ठ शोधकर्ताओं की इस रिपोर्ट की अधिक बारीकियों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन इससे जुड़ी हुई, और इससे बिल्कुल अलग भी, एक दूसरी खबर पर जाना चाहते हैं, जो कि मध्यप्रदेश से आई है। यह खबर वहां पर सिविल जज-2022 की परीक्षा के बारे में है जिसमें आदिवासियों के लिए 121 पद आरक्षित थे, लेकिन चयन एक का भी नहीं हुआ। मध्यप्रदेश में आदिवासी आबादी 20 फीसदी है, और संख्या डेढ़ करोड़ से अधिक है। यह भी 15 बरस पहले की 2011 की जनगणना का कहना है। अब अगर डेढ़-दो करोड़ आबादी में सिविल जज बनने के लिए 121 आदिवासी भी तैयार नहीं हो पाए, या उन्हें छांटा नहीं गया, तो यह बहुत ही शर्मनाक नौबत है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस नौबत को देखकर बड़ा सख्त रूख दिखाया, और अदालत ने दिसंबर तक नई चयन सूची पेश करने के लिए कहा है। इस मामले में सामाजिक न्याय के लिए बने वकीलों के एक संगठन ने अदालत में अपील की थी, और कहा था कि आदिवासी वर्ग के प्रतियोगियों पर सामान्य वर्ग के बराबर कटऑफ लागू कर दिया गया था। न्यूनतम योग्यता में छूट नहीं दी, और साक्षात्कार में कम अंक देकर भेदभाव दिखाया गया। इस इम्तिहान में सरकार की अपनी बनाई हुई शर्तों के खिलाफ जाकर एसटी-एससी प्रतियोगियों पर गलत शर्तें लागू की गईं।
बिहार के स्कूलों और मध्यप्रदेश के इस इम्तिहान का आपस में कोई सीधा संबंध नहीं है, सिवाय इसके कि इससे यह साबित होता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। जिन लोगों को यह लगता है कि जाति व्यवस्था टूट चुकी है, आरक्षण खत्म कर देना चाहिए, उनकी इस सोच से ही उनके जाति-वर्ग का अंदाज लगाया जा सकता है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आज से करीब 35 साल पहले एक इंटरव्यू में जाति व्यवस्था खत्म हो जाने के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि जिन लोगों के पांव में बूट है, उन्हें जिनके पांव कुचले जाते हैं, उनका दर्द पता नहीं चलता। आज जाति की हालत वैसी ही है। जिन्हें अगड़ी जातियां कहा जाता है, उन्हें अपनी जातियों पर बात-बात पर अहंकार होने लगता है, वे बात-बात में एसटी-एससी, और आरक्षण पाने वाली ओबीसी को सरकारी दामाद कहने लगते हैं, उनकी जुबान, चेहरे के भाव, और आवाज से हिंसक हिकारत टपकने लगती है। उन्हें कुछ मिनट सुन लें तो यह समझ आ जाता है कि आरक्षित वर्गों के वकीलों और उनके तर्कों को सुनने की जरूरत ही नहीं है, अनारक्षित वर्ग के लोगों की हिंसक बातें ही उनके खिलाफ वकील की तरह खड़ी रहती है। देश में यह नौबत जाने कब सुधरेगी, जल्द तो सुधरने का कोई आसार नहीं है।
भारत में दलित प्रताडऩा की घटनाएं होती ही रहती हैं। अभी जून के महीने में ओडिशा के गंजाम जिले में दो दलितों के बाल काटे गए, उन्हें घास खाने और नाली का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर किया गया। हिमाचल में 12 साल एक दलित लडक़े ने जातिगत प्रताडऩा की वजह से खुदकुशी कर ली। ऐसी घटनाएं कई जगह होती रहती है। जिस तमिलनाडु में दलितों की हिमायती राज्य सरकार है वहां अभी कुछ अरसा पहले 19 साल के दलित नौजवान को जातिगत गालियों के साथ पीटा गया, और उसकी मौत हो गई। बिहार के मुजफ्फरपुर में एक दलित नाबालिग लडक़ी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, और उसे झाडिय़ों में फेंक दिया गया। इसी के समानांतर एक दूसरा सुहाना सफर चलते रहता है दलित पर्यटन का। अलग-अलग जगह, अलग-अलग पार्टियों के नेता दलितों के घर जाकर वहां शायद बाहर से लाए गए बर्तन और पकवानों के भोज पर बैठकर दलित-उद्धार का दिखावा करते हैं। देश में ऐसे दलित पर्यटन की घटनाएं साल भर में अधिक होती हैं, या दलित प्रताडऩा की घटनाएं, यह मुकाबला देख पाना आसान नहीं है। और फिर नेताओं और पार्टियों की राजनीतिक नीयत को देखें, तो लगता है कि दलित के घर खाना भी एक किस्म से दलित शोषण और प्रताडऩा ही है, फिर चाहे वह किसी भी पार्टी के नेता क्यों न करते हों।
बिहार से लेकर मध्यप्रदेश होकर हम पूरे देश में जातिवाद के मुद्दे पर एक नजर डाल रहे हैं, और उन लोगों की सोच पर हैरान हो रहे हैं जिन्हें लगता है कि देश में जातिवाद खत्म हो चुका है, अब आरक्षण खत्म कर देना चाहिए। उनका ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं।
राज्यपाल-राष्ट्रपति पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बुरा सदमा पहुंचाता है..
22 नवंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के एक फैसले को पलटते हुए अभी एक बड़ी बेंच ने राष्ट्रपति के भेजे हुए एक संदर्भ पर अपनी राय सुनाई कि राष्ट्रपति और राज्यपालों के पास गए हुए विधेयकों पर उनके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। इसके पहले दो जजों की एक बेंच ने यह फैसला दिया था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयक उनके पास पहुंचने के बाद तीन महीने के भीतर उस पर अपना फैसला देना चाहिए। केन्द्र सरकार इस फैसले के बहुत खिलाफ थी, और उसने जजों को याद दिलाया था कि संविधान में इन दो संवैधानिक पदों के लिए समय सीमा तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र के बाहर है। ऐसे मामले अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग राज्यों में उठते ही रहते हैं जहां सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन से केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के राजनीतिक विरोध रहते हैं। ऐसी नौबत रहने पर राज्यपाल या राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की मर्जी से राज्य विधानसभाओं से पास किए गए विधेयकों को मंजूरी देने के बजाय उन्हें गद्दे के नीचे दबाकर उस पर सो जाते हैं। कुछ राज्यों में तो कई साल पहले से विधेयक राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास पड़े हुए हैं, और जनता द्वारा निर्वाचित विधायकों वाली विधानसभा सिवाय इंतजार करने के और कुछ नहीं कर सकती है। ऐसे में जब कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय की थी, तब हमने उस फैसले की तारीफ करते हुए यह लिखा था कि यह इन दो संवैधानिक पदों की जनता के प्रति जवाबदेही भी तय करने वाला फैसला है, और इन पदों को सरकार के असर से परे का मानना इसलिए ठीक नहीं है कि राज्यपाल तो केन्द्र सरकार के मनोनीत किए हुए होते हैं, और राष्ट्रपति भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिशों के मुताबिक काम करने को मजबूर रहते हैं। ऐसे में केन्द्र का गठबंधन उसे नापसंद किसी भी राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पास करवाए गए विधेयक को अंतहीन रोक सकता है, और सामने ही दिख रहा है कि रोकते आया है।
सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला मुख्य न्यायाधीश बी.आर.गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच का है, और उसने साफ कर दिया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को बिलों को मंजूरी देने के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की जा सकती। 111 पेज का यह बहुत ही निराशाजनक फैसला घोर अलोकतांत्रिक है, और केन्द्र सरकार को तानाशाही के सारे अधिकार देता है। ये दोनों ही पद पूरी तरह से केन्द्र सरकार के काबू के, और उसके मातहत सरीखे पद हैं। राज्यपाल और राष्ट्रपति को बेमुद्दत हक देना केन्द्र सरकार के हाथ में केन्द्र सरकार को तानाशाह बना देने के अलावा और कुछ भी नहीं है। आज की बात आज केन्द्र पर सवार गठबंधन को लेकर नहीं है, यह बात जनता द्वारा निर्वाचित विधानसभाओं के पारित विधेयकों के कानून बनने के जनता के परोक्ष अधिकार की बात है। जनता किसी विधेयक के लिए सीधे वोट नहीं देती, लेकिन उसके निर्वाचित विधायकों का एक बहुमत ऐसे विधेयक के साथ जब होता है, तभी वह पास होकर मंजूरी के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास जाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के लिखे हुए शब्दों की व्याख्या हो सकता है, लेकिन यह लोकतंत्र की भावना के ठीक खिलाफ है। जस्टिस गवई रिटायर होते-होते ऐसा फैसला क्यों कर गए हैं, इसे वे ही जाने। इस बेंच में उनके ठीक बाद जस्टिस बनने वाले जज भी हैं। सुप्रीम कोर्ट तो देश की सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत है, और इसका हक संविधान की व्याख्या करना भी रहता है। कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट अगर संविधान के प्रावधानों को छू नहीं पाता, तो भी फैसले में उनके खिलाफ टिप्पणी जरूर करता है। ऐसा करने के लिए जजों में कुछ हौसले की भी जरूरत पड़ती है, और उन्हें रिटायर होने के बाद के लिए मोह-माया से मुक्त भी रहना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट का दो दिन पहले का यह फैसला बहुत ही निराश करता है। संविधान एक मुर्दा दस्तावेज नहीं रहता, वह शब्दों के साथ-साथ भावनाओं का पुलिंदा भी रहता है, और इसीलिए उस पर आधारित बातों के लिए कहा भी जाता है कि इन लैटर, एंड स्पिरिट। ऐसा लगता है कि पांच जजों की इस बेंच ने राष्ट्रपति और केन्द्र सरकार के वकीलों के संविधान के दिए गए संदर्भों के शब्द ही पढ़े हैं, लोकतंत्र की भावना का इस्तेमाल नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच की यह व्याख्या हक्का-बक्का करती है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। अपने फैसले की इज्जत बचाने के लिए इस फैसले में लिखा गया है कि राज्यपाल विधेयक को रोक सकते हैं, लेकिन अनावश्यक देरी का कारण स्पष्ट न हो, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है। राष्ट्रपति के उठाए गए सवालों में से अधिकांश पर कोर्ट ने कहा है कि न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती। लोकतंत्र में किस तरह एक राजनीतिक सरकार के तहत काम करने वाले दो लोगों को ऐसे असीमित अधिकार दिए जा सकते हैं? आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट की कोई और बड़ी बेंच इस फैसले पर पुनर्विचार करेगी, और उसमें जज कड़ा और खरा बोलने और लिखने वाले रहेंगे, तो यह फैसला पलट दिया जाएगा। हम कानून और संविधान की बारीकियों में उलझे बिना यह सोचते हैं कि किसी राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास विधानसभा से पारित विधेयक पहुंचने के बाद उन्हें तीन महीने से अधिक का वक्त क्यों लगना चाहिए? राज्यपाल के पास कानूनी सलाहकार रहते हैं, वे केन्द्र सरकार के वकीलों से भी सलाह ले सकते हैं। जनता की निर्वाचित विधानसभा के पारित विधेयक पर अगर राज्यपाल 90 दिन में भी फैसला नहीं ले सकते, तो वे जनता के पैसों की बर्बादी करते हुए इस कुर्सी पर क्यों बैठे हैं? कानूनी और संवैधानिक सलाह-मशविरा तो कुछ दिनों के भीतर ही हो सकता है, तीन महीने के और बाद जाकर तो महज राजनीति हो सकती है, जो कि हो रही है। एक आदिवासी समुदाय से आई हुई राष्ट्रपति ने जब यह संदर्भ सुप्रीम कोर्ट को भेजा, और उससे संवैधानिक राय मांगी, तो भी यह बड़ी हैरानी की बात इसलिए थी कि क्या वे निर्वाचित विधानसभा के अधिकारों को केन्द्र सरकार के इशारे पर नीचा दिखाने की हिमायती हो गई हैं? जनता के पैसों पर जो राज्यपाल और राष्ट्रपति राजसी ठाठ से जीते हैं, उस जनता के जीवन को प्रभावित करने वाले विधेयकों को क्या ये सामंती सहूलियतों वाले लोग बिस्तर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बारे में दो दिनों से हमने जितनी भी बार सोचा है, न्यायपालिका को लेकर हमारी शर्मिंदगी बढ़ती चली जा रही है। यह किसी मुजरिम को बचाने के लिए उसके वकील द्वारा निकाले गए कानूनी दांव-पेच सरीखा फैसला लगता है, यह जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान करने वाला तो किसी कोने से नहीं लगता। राज्यपाल तो केन्द्र सरकार के मनोनीत रहते हैं, और उसी के राजनीतिक एजेंट की तरह राजभवनों को चलाते हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रपति भी केन्द्र और राज्यों के सांसदों और विधायकों के बहुमत से बनकर आते हैं, और बनने के तुरंत बाद वे पूरे कार्यकाल केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर काम करते हैं। ऐसे व्यक्ति आम जनता की निर्वाचित विधानसभा के फैसलों को अंतहीन पड़े रहने दें, तो फिर उन्हें तनख्वाह किस बात की मिलती है? हर किसी को काम करना चाहिए, कल के दिन किसी सरकारी दफ्तर के बाबू कहें कि उन्हें भी तीन या छह महीने में जब समय मिलेगा, तब वे काम करेंगे, तो कैसा लगेगा? जनता के पैसों से तनख्वाह और सहूलियतें पाने वाले राज्यपाल और राष्ट्रपति का आचरण मन, वचन, और कर्म से लोकतांत्रिक रहना चाहिए, उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाकर संविधान के मोटे-मोटे शब्दों की आड़ में लुका-छिपी नहीं खेलनी चाहिए। लोकतंत्र की बुनियादी बात यह है कि किसी को भी अलोकतांत्रिक अधिकार नहीं होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट अपने इस खराब फैसले के लिए इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होगा।
मुस्लिम महिला के हक पर सुप्रीम चर्चा जारी, जज 21वीं सदी ध्यान रखें
21 नवंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट में अभी मुस्लिम समाज में महिला के हक के खिलाफ प्रचलित एक प्रथा पर सुनवाई हो रही है। अदालत ने एक मुस्लिम मर्द के वकील से यह पूछा है कि तलाक-ए-हसन नाम की प्रथा क्या सभ्य समाज में जारी रहनी चाहिए? यह मामला एक पत्रकार बेनजीर हिना का दायर किया हुआ है जिसमें कहा गया है कि मुस्लिम महिला को तलाक देने का यह तरीका तर्कहीन, मनमानी, और असंवैधानिक है जो कि महिलाओं के सम्मान, और समानता के अधिकार के खिलाफ है। बीते बरसों में भारत में मुस्लिम महिलाओं से जुड़े हुए कई मामले अदालतों में आए, इनमें से एक, तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को 2017 में अदालत ने असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद मोदी सरकार ने तीन तलाक को गैरकानूनी करार देने वाला एक कानून बनाया जो 1 अगस्त 2019 से लागू हो गया। इसके बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई चुनावी रैलियों में कहा था कि मुस्लिम मां-बहनों को तीन तलाक के जुल्म से आजादी दिलानी है। इस कानून में ऐसा करने वाले मुस्लिम मर्द को तीन साल तक की कैद, और जुर्माने का प्रावधान किया गया था। इसके लागू होने के बाद से देश में तीन तलाक देने वाले हजारों मर्दों के खिलाफ उनकी बीवियों की तरफ से पुलिस रिपोर्ट हुई है, और मुकदमे चल रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट में तलाक की एक दूसरी किस्म के खिलाफ मामला पहुंचा है।
भारत में 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ के प्रावधान चले आ रहे हैं। इनमें से बहुत से प्रावधान महिलाओं के हक के खिलाफ हैं। देश में कुछ अलग-अलग प्रदेशों ने मुस्लिमों को इस कानून के तहत नाबालिग लड़कियों की शादी करने की मिली हुई छूट को खत्म करना शुरू किया है, और हमने अपने अखबार में तीन तलाक को सजा के लायक बनाने का भी समर्थन किया था, और नाबालिग लड़कियों की इस्लामिक कानून के हवाले से शादी करने के खिलाफ भी बार-बार लिखा है, अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर इसके खिलाफ कई बार कहा है। आज भी सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के इस दूसरे तरीके के खिलाफ कड़ा रूख दिखाया है, और कहा है कि पति की तरफ से उसका वकील ही महिला को तलाक के तीन नोटिस एक-एक महीने के फासले से भेजकर शादी को खत्म कर सकता है, यह आज के वक्त पर सही कैसे माना जा सकता है? अदालत ने यह भी कहा है कि हर महिला के पास कानूनी लड़ाई लडऩे की ताकत नहीं होती है।
मुस्लिम महिला के तलाक के बाद उसका वही पति अगर दुबारा उससे शादी करना चाहे, तो उसके लिए हलाला नाम का एक रिवाज है जिसके तहत उस औरत को पहले किसी और मर्द से शादी करनी पड़ती है, फिर उससे तलाक लेना पड़ता है, तब जाकर वह अपने पिछले पति से दुबारा निकाह कर सकती है। इस प्रथा के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का कई जगह बहुत बुरा शोषण होता है। मुस्लिम मर्द को चार बीवियां रखने का हक है, और यह बात भी मुस्लिम महिला के हक मारने वाली रहती है। मुस्लिम लड़कियों को अपने भाईयों के मुकाबले आधा हक ही मिलता है, और मुस्लिम विधवा को भी कानून के तहत बहुत कम हक मिलता है। तलाक के बाद मुस्लिम महिला को कोई स्थाई गुजारा-भत्ता नहीं मिलता। रूपए-पैसे के कुछ मामलों में मुस्लिम कानून में दो औरतों की गवाही एक मर्द की गवाही मानी जाती है। ऐसे कई बेइंसाफ कानूनों को बदलने की मांग मुस्लिम महिला संगठन लंबे समय से करते आ रहे हैं, और मुस्लिम समाज के बाहर हमारे सरीखे लोग भी इन बातों को बार-बार उठाते हैं।
कर्नाटक की स्कूल-कॉलेज की छात्राओं पर वहां की पिछली भाजपा सरकार के वक्त हिजाब पहनने पर यह कहते हुए रोक लगाई गई थी कि यह स्कूली पोशाक का हिस्सा नहीं है। सरकार की इस रोक के खिलाफ मुस्लिम समुदाय सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। हमने इस मुद्दे पर शुरू से अंत तक यही लिखा था कि कोई समुदाय हिजाब की शर्त पर अडक़र अपनी लड़कियों को स्कूल-कॉलेज से निकाल देने का काम करता है, तो वह परले दर्जे की मर्दाना बेअक्ली है। दुनिया में बहुत से ऐसे इस्लामिक या मुस्लिम देश हैं जहां पर हिजाब की कोई बंदिश नहीं है, बुर्के की कोई बंदिश नहीं है। इस पर भी अगर मुस्लिम मर्द अपने समाज की महिलाओं को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि यह उनका हक है, तो यह एक मर्दानी कामयाबी है, और सदियों से उसकी गुलाम चली आ रही महिलाओं की नासमझी भी है। जिस बोझ को मुस्लिम महिला का हक करार देने में मर्द कामयाब हो गए हैं, उस साजिश को भी समझना चाहिए, और समाज सुधार के रास्ते, या कानून के रास्ते, सिर्फ महिलाओं पर लादे जाने वाले ऐसे रिवाज खत्म किए ही जाने चाहिए। यह कोई हक नहीं है एक बोझ है। एक वक्त राजस्थान में हिन्दू महिला के पति के गुजर जाने पर उसे भी साथ-साथ सती कर देने की घटना होती थी, और उसे हिन्दू महिला का हक करार दिया जाता था। बाद में कानून बनाकर उसके इस तथाकथित हक को खत्म किया गया है।
किसी भी लोकतंत्र में किसी भी धर्म के ऊपर औरत और मर्द की बराबरी रहनी चाहिए। लैंगिक समानता, मानवाधिकार, गरिमा से जीने का हक, इन सब पर किसी तरह का मोलभाव नहीं किया जाना चाहिए। इन बातों को नॉन-निगोशिएबल मानकर चलना चाहिए, कि इन पर कोई समझौता नहीं हो सकता। और इसके बाद ही किसी धार्मिक रीति-रिवाज के कानूनी होने या न होने पर बात होनी चाहिए। एक नाबालिग लडक़ी की शादी कर देने का हक लोकतंत्र में किसी को नहीं मिलना चाहिए, चाहे वह मुस्लिम बेटी के मां-बाप ही क्यों न हों। बुनियादी मानवाधिकार, और लोकतांत्रिक न्याय किसी भी धार्मिक कानून से ऊपर रहने चाहिए। एक वक्त तो हिन्दू लडक़े-लड़कियों का भी धड़ल्ले से बाल विवाह होता था, बाद में कानून बनाकर उसे गैरकानूनी करार दिया गया, लेकिन आज भी उस कानून पर अमल के लिए सरकार को समाज से संघर्ष करना पड़ता है।
सिर्फ अल्पसंख्यक हो जाने से किसी समुदाय को ऐसे धार्मिक अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए जो कि उस समाज के भीतर की महिलाओं को इंसान भी मानने के खिलाफ हों, जाहिर तौर पर गैरबराबरी और बेइंसाफी के हों। भारत में जिस-जिस धर्म में महिलाओं के हक के खिलाफ जो भी कानून हैं, उन सबको खत्म किया जाना चाहिए। यह एक अच्छी बात है कि एक मुस्लिम महिला का यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है, और जजों को भी यह समझना चाहिए कि मुस्लिमों के बीच सदियों से प्रचलित, और पिछले कुछ दशकों से कानून बनकर लागू बातों को लोकतंत्र की रौशनी में देखने-परखने का समय आ चुका है, और अब किसी समाज के भीतर महिलाओं को दूसरे दर्जे की नागरिक, या गुलाम बनाकर रखना देश के लोकतंत्र के खिलाफ कहलाएगा। अदालत को दकियानूसी कानूनों को जारी रखने के बजाय 21वीं सदी को भी देखना चाहिए।
...भीड़त्या के डेढ़ दर्जन आरोपियों से केस वापिस! सुप्रीम कोर्ट जाग रहा है?
20 नवंबर 2025
उत्तरप्रदेश में 2015 में एक मुस्लिम अखलाक के गांव में यह अफवाह फैली कि उसने अपने घर में गोमांस रखा है। इस बात की घोषणा गांव के मंदिर से लाउडस्पीकर पर हुई, और बात की बात में एक बड़ी भीड़ जुट गई, और अखलाक को उसके घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला गया। उसे बचाते हुए उसके बेटे को भी गंभीर चोटें आईं। 2015 में ही पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट फाइल की जिसमें 15 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, और इनमें एक नाबालिग लडक़ा भी था, और एक स्थानीय भाजपा नेता का बेटा भी। 2017 में योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने, और उसके बाद 2021 से अखलाक-मॉबलिंचिंग मामले की सुनवाई शुरू हुई। देश में अपने किस्म की यह पहली भीड़त्या थी जिसे खबरों में मॉबलिंचिंग कहा गया था। अब उत्तरप्रदेश सरकार ने अदालत में अर्जी दाखिल की है कि वह सारे ही अभियुक्तों के खिलाफ हत्या के आरोप सहित तमाम आरोप वापिस लेना चाहती है।
क्या लोकतंत्र में इससे भयानक और कुछ हो सकता है कि एक मांसाहारी परिवार के व्यक्ति को उसके घर पर रखे गए मांस के गौमांस होने का आरोप लगाकर घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला जाए? क्या देश में प्रशासन और पुलिस नहीं रह गए हैं कि जगह-जगह ऐसी गौ-गुंडई की जाए? कहीं राजस्थान में, कहीं हरियाणा में, अक्सर ही उत्तरप्रदेश में, और अब छत्तीसगढ़ में भी गौहत्या या गौमांस, या गौ-कारोबार, गौ-परिवहन का आरोप लगाकर किसी को भी पीट-पीटकर मार डाला जाता है। छत्तीसगढ़ में पिछले साल राजधानी रायपुर की सरहद पर एक पुल के ऊपर पशु व्यापारियों को पीट-पीटकर मार डाला गया, और फिर उन्हें पुल से कूदकर जान देना बता दिया गया। अपने आपको गौरक्षक कहने वाले लोगों ने 50-60 किलोमीटर तक पशु व्यापारियों की गाड़ी का पीछा किया, उस पर हमला करके उसे रोका, और उसमें कोई गाय नहीं थी, लेकिन तीन मुस्लिम पशु व्यापारी मार डाले गए। ये तीनों अपनी गाड़ी में भैंस ले जा रहे थे। उनमें से एक ने अपने परिवार को फोन लगाया था, और परिवार 47 मिनट तक इन लोगों के मार खाने की चीखें सुनते रहा। लेकिन जैसा कि अभी यूपी सरकार कर रही है, उस वक्त छत्तीसगढ़ की पुलिस ने इस घटना में किसी मारपीट का जिक्र नहीं किया, और यह दिखाया कि ये पशु व्यापारी पुल से नीचे कूदे, और पत्थरों पर गिरकर मर गए। जिन लोगों ने पीछा किया, हमला किया, उन पर हत्या का जुर्म भी दर्ज नहीं किया गया।
आज अखलाक को दिल्ली से 50 किलोमीटर के भीतर ही गादरी नाम के गांव में दफन हुए 10 बरस गुजर चुके हैं, और अब हत्या के सारे ही आरोपियों के खिलाफ सरकार मामला वापिस लेने की अर्जी लगा चुकी है। खबर बताती है कि इसमें राज्यपाल की अनुमति भी साथ में लगाई गई है। गौतम बुद्ध नगर जिले की अदालत में लगी इस अर्जी को लेकर बुद्ध क्या सोच रहे होंगे, इसका अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। अब तक तो पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियां, सरकारी या दूसरे वकील, और न्याय प्रक्रिया में शामिल दूसरे लोग धर्म के नाम पर रियायत करते हुए सुने जाते थे। लेकिन अब तो संविधान की शपथ लेकर काम करने वाली एक सरकार ने एक औपचारिक अर्जी ऐसी लगाई है, जो कि बुरी तरह हक्का-बक्का करती है।
लोगों को याद होगा कि गुजरात में दो-तीन बरस पहले 2002 के दंगों के दौरान एक गर्भवती मुस्लिम महिला से बलात्कार करने वाले, और उसके छोटे से बच्चे को मार डालने वाले 11 लोगों को राज्य और केन्द्र सरकार ने अच्छे चाल-चलन की फाइल बनाकर समय से पहले जेल से रिहा कर दिया था। जेल के बाहर इन्हें माला पहनाकर, मिठाइयां खिलाकर इनका सार्वजनिक अभिनंदन किया गया था। जब इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई, तो अदालत ने इन सारे लोगों को दुबारा जेल भेजा। हमारा ख्याल है कि यूपी की जिला अदालत में यूपी सरकार की लगाई हुई अर्जी का सुप्रीम कोर्ट को खुद ही संज्ञान लेना चाहिए, और इस सरकारी अर्जी को खारिज करते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहिए, और उससे पूछना चाहिए कि संविधान की शपथ का क्या हुआ? देश में आज जगह-जगह अल्पसंख्यकों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, और ऐसे में अल्पसंख्यकों की खुली भीड़त्या करने वाले लोगों को अगर इसी तरह माफी मिलती रही, तो वे क्या-क्या नहीं करेंगे, और देश में बाकी जगहों पर गाय के नाम पर इंसानों को काटने की घटनाएं कहां-कहां पर नहीं होंगी?
गुजरात दंगों के इस सबसे चर्चित बिल्किस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी 11 मुजरिमों को रिहाई रद्द करके दो हफ्ते में जेल भेजा था, और इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- आपने कानून का कत्ल कर दिया है, यह रियायती-रिहाई नहीं, दगाबाजी है, और आपने जुर्म और मुजरिम दोनों को बचाने की कोशिश की। जजों ने कहा ये मिठाई क्या 15 अगस्त की बांट रहे थे? इन बलात्कारियों और हत्यारों को हीरो बना दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि गुजरात सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर बाम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलटने की हिमाकत की, गुजरात सरकार के पास ऐसी रियायत देने का हक ही नहीं था, फिर भी 11 मुजरिमों को छोड़ दिया! जजों ने कहा कि गैंगरेप और सामूहिक हत्या के इन मुजरिमों को इस तरह रिहा करना जनचेतना की हत्या है। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने कहा- बिल्किस बानो के साथ दो बार अन्याय हुआ, पहले 2002 में, दूसरी बार 2022 में जब इन्हें (हत्यारे-बलात्कारियों को) छोड़ा गया।
बिल्किस बानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात (और केन्द्र सरकार भी) को जैसी फटकार लगाई थी, लताड़ लगाई थी, वैसी ही अभी यूपी की योगी सरकार को लगाने की जरूरत है। देखते हैं सुप्रीम कोर्ट अभी जाग रहा है, या...
अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम और स्थानीय बच्चों के खेलकूद के बीच कोई रिश्ता नहीं...
19 नवंबर 2025
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राज्य सरकार ने एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम बनाया था जिसकी निर्माण लागत ही सौ करोड़ रूपए तक पहुंच गई थी, और जमीन के दाम जोड़ें, तो शायद हजार-दो हजार करोड़ का स्टेडियम था। अब सफेद हाथी खाने में तो काले हाथी जितना ही खाता है, लेकिन उसे नहलाने में साबुन अलग से लगता है, जो कि खासा महंगा रहता है। यह स्टेडियम भी भूले-भटके यहां होने वाले किसी क्रिकेट मुकाबले की शकल कभी देख पाता था, और इसके अलावा तो इतने बड़े ढांचे का और तो इस्तेमाल था नहीं। अब सरकार ने पांच साल के लिए यह स्टेडियम छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन को दिया है, जिससे सालाना कुछ रकम भी मिलेगी, रखरखाव भी होगा, और हो सकता है कि मैच कुछ अधिक हो जाएं, या कुछ रकम भी सरकार को मिल जाए। हम अभी सरकार के इस फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे, लेकिन इससे जुड़े हुए एक मुद्दे पर बात करना जरूरी है।
प्रदेश में दसियों हजार स्कूल-कॉलेज के खेल मैदान हैं, कुछ छोटे हैं, कुछ बड़े हैं, लेकिन खेल गतिविधियां ठप्प सरीखी रहती हैं। चूंकि सरकार चाहती है इसलिए खेल मुकाबले तो हो जाती है, स्कूलों से लेकर दूसरी टीमें बन जाती हैं, प्रतियोगिताएं हो जाती हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में राज्य के खिलाड़ी राज्य के भीतर ही रह जाते हैं, और गिने-चुने खिलाड़ी ही राष्ट्रीय स्तर पर किसी किनारे पहुंच पाते हैं। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की एक फिजियोथैरेपिस्ट युवती छत्तीसगढ़ की है, और टीम विश्वकप जीतकर लौटी, तो यह प्रदेश इस फिजियोथैरेपिस्ट का सम्मान-अभिनंदन करने का मौका पा सका, पूरा प्रदेश इसी बात को लेकर गौरवान्वित रहा। कहने के लिए प्रदेश में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के अलावा, अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम भी है, लेकिन इनका प्रदेश के खिलाडिय़ों से कुछ लेना-देना नहीं है। नेता-अफसर-ठेकेदार बड़े-बड़े निर्माण से खुश रहते हैं, और बड़े-बड़े स्टेडियम बनने से तो सरदार खुश हुआ किस्म के फिल्मी डायलॉग भी याद आते हैं। लेकिन प्रदेश के खिलाड़ी इन स्टेडियमों में खेलने लायक बन सकें, वह बात किनारे धरी हुई है। स्कूल और गांव के स्तर के खिलाडिय़ों को आगे बढ़ाने, उन्हें मैदान मुहैया कराने, खेल के सामान और खेल शिक्षक-प्रशिक्षक देने का काम स्टेडियम बनाने जितना आकर्षक नहीं रहता, इसलिए सरकार में किसी की दिलचस्पी ऐसे बिखरे हुए काम में नहीं रहती, जहां स्कूल की स्पोटर््स किट खरीदी से छोटे-छोटे से कमीशन ही मिलें। फिर स्कूलों में खेल के अभ्यास से तो किसी को कुछ नहीं मिलना है, सिर्फ बच्चों को खेलने का मौका मिलेगा, आगे बढऩे का मौका मिलेगा। इसलिए प्रदेश भर में स्कूल-कॉलेज के, और बाकी सार्वजनिक खेल मैदानों पर गैरखेल काम ही चलते रहते हैं। सरकार, राजनीति, बाजार, धर्म, और आध्यात्म, इन सब के तम्बू लगने और उखडऩे के बीच एक-दो दिन खेल मैदानों पर बच्चे पहुंच पाते हैं, तो हाथ-हाथ भर गहरे गड्ढे पड़े रहते हैं, कोई मैदान खेल के लायक नहीं बचते।
इस प्रदेश में हर खेल के लिए कोई न कोई खेल संघ है। हरेक पर कोई न कोई बड़ा नेता, बड़ा अफसर, या बहुत बड़ा कारोबारी काबिज है। सत्ता बदलने के साथ-साथ कुछ खेल संघों के मुखिया के नाम बदल जाते हैं, लेकिन वे रहते नेता-अफसर, और कारोबारी ही हैं। खेल मैदानों की बात कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा ने भी उठाई थी। लेकिन प्रदेश के एक भी खेल संघ ने यह बात नहीं उठाई कि खेल मैदानों पर दूसरे काम नहीं होने चाहिए, उन्हें सिर्फ बच्चों और खिलाडिय़ों के खेलने के लिए रखना चाहिए, ताकि वे स्टेडियम में पहुंचने लायक टीम के लायक भी बन सकें, और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ साबित कर सकें। खेल संघ सत्ता से इतने जुड़े रहते हैं, सत्ता का हिस्सा रहते हैं कि वे सरकारी या राजनीतिक हितों से परे कुछ सोच भी नहीं पाते। खेल आयोजनों और खेल संघों के मंच देखें, तो उन पर सत्ता, सत्तारूढ़ पार्टी, और प्रदेश का खेल माफिया हावी रहता है, जिनका खेलों से कुछ लेना-देना नहीं रहता, लेकिन वे इन संघों के नाम पर एक सामाजिक प्रतिष्ठा, और एक ताकत पाते रहते हैं। तमाम खेल एक तरफ तो खेल मैदानों को लेकर सरकारी लापरवाही और उदासीनता के शिकार हैं, और दूसरी तरफ वे खेल संघों के शिकार हैं। आज जितने खिलाड़ी थोड़े-बहुत भी आगे बढ़ पाते हैं, वे खेल संघों की वजह से नहीं, खेल संघों के बावजूद आगे बढ़ जाते हैं।
किसी भी किस्म की सत्ता के बड़े लोगों को छोटे मैदानों की कोई बात नहीं सुहाती, उन्हें बड़े स्टेडियम, अंतरराष्ट्रीय मैच, बड़े सितारे, मुफ्त की बिजली, हजारों करोड़ के स्टेडियम कुछ लाख रूपए में पा लेने की हसरत उनकी रहती है। लेकिन क्या यह प्रदेश बाहर से आए हुए खिलाडिय़ों का नजारा देखने के लिए ही बना है, या फिर यहां के बच्चों के खिलाड़ी बनने के लिए भी गांव-गांव तक सरकार की जो संपत्ति बिखरी हुई है, जो सार्वजनिक खेल मैदान हैं, क्या उनके लिए भी सरकार कोई नीति बनाएगी, क्या खेल संघ यह भी देखेंगे कि उनके खेलों के लिए मैदान हैं या नहीं, वे कितने काम के हैं, और बच्चों को उन खेलों की सुविधा हासिल है, या उनके खेल संघों की राजनीति ही उन खेलों को हासिल है? यह बात हँसी की लगती है कि सरकार अपनी खुद की स्कूलों के मैदानों को न बचाए, उन पर अवैध निर्माण खुद करती रहे, और दूसरी तरफ महंगी टिकट देकर जाने वाले अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम पर हजारों करोड़ की जमीन लगाए, सैकड़ों करोड़ का निर्माण करे, और लाखों रूपए महीने का रखरखाव करे।
भारत को चीन जैसे देश से सीखना चाहिए कि छोटे-छोटे से बच्चों की प्रतिभा को पहचान कर किस तरह उन्हें चार-छह बरस की उम्र से ही प्रशिक्षण दिया जाता है, और किशोरावस्था में पहुंचने तक तो उनमें से चुनिंदा बच्चे ओलंपिक से गोल्ड मैडल लेकर भी आने लगते हैं। इधर हिन्दुस्तान मैदान और स्टेडियम के बाजारू और कारोबारी इस्तेमाल में डूबा हुआ है, और सत्ता पर काबिज लोग खेल संघों पर काबिज होकर उन खेलों का गला घोंट रहे हैं। ऐसे देश-प्रदेश में बच्चों और बड़ों सबका खेल भविष्य यही है कि सैकड़ों-हजारों रूपए की टिकटें खरीदकर नुमाइशी मैच देखें, और अपनी खुद की उपलब्धि के हसीन सपने देखना छोड़ दें, क्योंकि उनको पूरा करने की फिक्र किसी को नहीं है।





