विशेष संपादकीय
30 सितंबर 2013
पन्द्रह बरस से अधिक से बिहार का चारा घोटाला खबरों में रहा, और आज वह सबसे छोटी अदालत से इंसाफ की कगार पर पहुंचा है। लालू यादव समेत तीन दर्जन सरकारी-गैरसरकारी लोगों को सीबीआई की अदालत ने कुसूरवार पाया है और उनकी सजा अब सामने आनी है। यूपीए सरकार अपराधियों को बचाने के लिए जो अध्यादेश ला चुकी थी, उसका मकसद पूरा नहीं हो पाया, और यूपीए के सबसे पसंदीदा, सबसे हमदर्द, सबसे पक्के साथी लालू यादव का जेल जाना अब पक्का हो गया। कुछ महीने पहले ही हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री चौटाला बाप-बेटे भी सजा पाकर जेल गए, और देश के कुछ और मुख्यमंत्री साम-दाम-दंड-भेद से अब तक जेल जाने से बचे हुए हैं, उनकी बारी भी आने की उम्मीद अब जनता कर रही है।
बिहार पर पन्द्रह बरस तक राज करने वाले लालू यादव इस देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल बने हुए थे जो कि धर्मनिरपेक्षता का नारा लगाकर वामपंथियों तक को अपना भ्रष्टाचार बर्दाश्त करने पर सहमत करवा चुके थे, जो सोनिया गांधी के भरोसेमंद मददगार बने हुए थे, जो साम्प्रदायिकता का विरोध करने के नाम पर अपने भ्रष्टाचार की अनदेखी की उम्मीद देश से करते थे, जो सिर्फ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुनबापरस्ती का एक नंगा नाच बरसों से करते आ रहे थे, आज एक किस्म से उनका खेल खत्म हुआ। अब यह एक अलग बात होगी कि यूपीए सरकार कोई ऐसा कानून बनाए जिसमें उसके मददगार लोगों को सात खून भी माफ हों, तो हो सकता है लालू यादव का पासा भी पलट जाए। फिलहाल उनका खेल खत्म दिखता है, और कबीर की कही यह बात सच साबित होती है कि जानवर की मरी खाल की सांस से भी लोहा भस्म हो जाता है, और जिन जानवरों के हक का लालुओं ने खाया था, वे आज कम से कम निचली अदालत से तो भस्म हो ही गए हैं।
बात सिर्फ लालू यादव की नहीं है, बात है सत्ता का बेजा इस्तेमाल करके देश को लूटने की, जनता के हक के साथ बलात्कार करने की। इसमें बहुत से प्रदेशों में लालू बिखरे पड़े हैं, जनता उनको जानती-पहचानती भी है, और यह भी देखती है कि हिन्दुस्तान का लुंज-पुंज इंसाफ उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाता, और वे एक कुर्सी के बाद दूसरी कुर्सी से बलात्कार करते ऊपर पहुंचते रहते हैं, किसी तरह किसी जांच में फंस भी गए, तो अपने घरवालों को, अपने जानवरों को कुर्सी देकर वे उनके बदन के मार्फत फिर जनता के हक से बलात्कार करते रहते हैं। बिहार में लोगों ने लालू, और लालू के बाद राबड़ी, और राबड़ी के साथ राबड़ी के भाईयों, सबकी ऐेसी ज्यादती देखी थी, और उसने देश के इस विशाल राज्य की संभावनाएं दशकों के लिए खत्म ही कर दी थी।
आज जो बेशर्म सरकार अपराधी-बचाव अध्यादेश ला चुकी है, और जो बेशर्म संसद राजनीतिक दलों का हिसाब-किताब जनता के पूछने के हक से बाहर रख रही है, जो सुप्रीम कोर्ट को उसके हर सुधारवादी फैसले पर लातें मार रही हैं, ऐसी सरकारें और ऐसी संसद इस देश में नक्सलवाद को बढ़ावा दे रही हैं। जब सरकार और संसद में बैठे डकैतों और बलात्कारियों को कोई सजा नहीं दी जा सकती, तो ऐसे लोकतंत्र को खारिज करने के लिए उग्र अतिवामपंथ हथियार उठाकर खुद सजा देने लगता है। दिक्कत यही है कि सजा के हकदार लोग सरकारी बंदूकों से घिरे हुए राजधानियों में पुलिस की सलामी लेते बैठे रहते हैं, और नक्सल मोर्चों पर बेकसूर आदिवासी, और छोटे-छोटे सिपाही मारे जाते रहते हैं। अगर इस देश में ताकतवर मवालियों के जुर्म के साथ इंसाफ की यही रफ्तार रहेगी, तो जंगलों से परे शहरों में भी किसी किस्म की नक्सल हिंसा नाजायज नहीं कही जा सकेगी। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि अपराधियों को बचाने वाले अध्यादेश के पीछे के जो बहुरूपिया सफेदपोश लोग हैं, उनको भी खारिज किया जाए। और ऐसे कड़े कानून बनाने की वकालत की जाए जिससे कि सत्ता पर बैठे मुजरिमों के मामले-मुकदमों पर तेज रफ्तार से सुनवाई हो सके, और आम मुजरिमों के मुकाबले लालबत्तीधारी मुजरिमों को कई गुना अधिक सजा देने का इंतजाम हो।
पिछले दिनों हमने यूपीए सरकार के लाए अध्यादेश को लेकर, और फिर उसे राहुल गांधी के हाथों फाड़ दिए जाने को लेकर काफी कुछ लिखा था। उन सारी बातों को आज यहां दोहराना जरूरी नहीं है। लेकिन अब यह वक्त आ गया है कि जनता के बीच से लगातार अदालत जाकर ऐसी कोशिश हो कि संसद, सरकार, और राजनीतिक पार्टियां अपने जुर्म को सजा से बचाने की कोशिशें न कर सकें। ऐसा न होने पर इस देश के सामने जो सबसे बड़ा खतरा है, वह जनता के लुट जाने से भी बड़ा है। आज इस देश में स्वघोषित और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के भयानक विकराल भ्रष्टाचार का नतीजा है कि साम्प्रदायिक ताकतें लोगों को सुहानी लगने लगी हंै, क्योंकि वे जाहिर तौर पर कम भ्रष्ट दिख रही हैं। भ्रष्टाचार ने धर्मनिरपेक्षता को एक गैरजरूरी सामान बनाकर रख छोड़ा है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता ने अपने भ्रष्टाचार को धर्मनिरपेक्षता के लिए एक विशेषाधिकार मान लिया था। जिस देश में जनता भूखी हो, जिसे खाने का हक देने की जरूरत पड़ती हो, जिसे छब्बीस रूपये रोज में जिंदा रहने पर गैरगरीब मान लिया जाता हो, उसके जेहन में किसी भी तरह की धर्मनिरपेक्षता पेट भरने के बाद ही समझ आ सकती है। जब जनता के मुंह का चारा इस देश के ताकतवर लोग छीनकर, संसद में बैठकर जुगाली करते दिखते हैं, तो ऐसे लोगों की धर्मनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्षता नाम के शब्द को ही बदनाम कर देती है, और साम्प्रदायिकता नाम के शब्द का खतरा खत्म कर देती है।
लालू यादव का मामला सत्ता पर बैठकर जनता और जानवरों के हक के साथ बलात्कार करने का है, और इसके बाद अपने संसदीय बाहुबल के दम पर कांग्रेस और यूपीए से जांच और मुकदमे में ऐतिहासिक रियायत पाने का भी है। कानून की किताबों को इस मामले की मिसालों के साथ दुरूस्त करने की जरूरत पड़ेगी कि लोकतंत्र का कानून किस तरह सत्ता की गिरोहबंदी के सामने दम तोड़ देता है, और यह बताता है कि किस तरह सिर्फ बंदूक का कानून ही ऐसे लोगों के साथ वक्त पर इंसाफ कर सकता है। इस देश को अगर नक्सल हिंसा जैसी अराजकता से बचाना है, तो इस देश को लालुओं और चौटालाओं जैसे सैकड़ों बलात्कारियों से भी बचाना होगा, इसके बिना एक दिन हिन्दी फिल्मों के अंदाज में कोई पुलिस अफसर पिस्तौल से ही इंसाफ करने लग जाएगा।
लालू यादव और चौटाला जैसों के मामले अभी भी आखिरी अदालत के आखिरी फैसले से कोसों दूर हैं, और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ही ऐसे खतरनाक मुजरिमों से संसद और विधानसभाओं को बचाने की कोशिश करता है, तो गांधी-नेहरू की पार्टी उस सुप्रीम कोर्ट के मुंह पर अध्यादेश चबाकर थूक देती है। ऐसे में देश की जनता को ही ऐसे थूकने वाले चेहरों पर फैसला करना है। लालू यादव को मिल रही सजा बेजुबान जानवरों के हक के साथ किए गए बलात्कार की सजा है, और तेज रफ्तार से देश के बाकी लालुओं को भी जेल का चारा खाने के लिए भेजना चाहिए।
30 सितंबर 2013
पन्द्रह बरस से अधिक से बिहार का चारा घोटाला खबरों में रहा, और आज वह सबसे छोटी अदालत से इंसाफ की कगार पर पहुंचा है। लालू यादव समेत तीन दर्जन सरकारी-गैरसरकारी लोगों को सीबीआई की अदालत ने कुसूरवार पाया है और उनकी सजा अब सामने आनी है। यूपीए सरकार अपराधियों को बचाने के लिए जो अध्यादेश ला चुकी थी, उसका मकसद पूरा नहीं हो पाया, और यूपीए के सबसे पसंदीदा, सबसे हमदर्द, सबसे पक्के साथी लालू यादव का जेल जाना अब पक्का हो गया। कुछ महीने पहले ही हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री चौटाला बाप-बेटे भी सजा पाकर जेल गए, और देश के कुछ और मुख्यमंत्री साम-दाम-दंड-भेद से अब तक जेल जाने से बचे हुए हैं, उनकी बारी भी आने की उम्मीद अब जनता कर रही है।
बिहार पर पन्द्रह बरस तक राज करने वाले लालू यादव इस देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल बने हुए थे जो कि धर्मनिरपेक्षता का नारा लगाकर वामपंथियों तक को अपना भ्रष्टाचार बर्दाश्त करने पर सहमत करवा चुके थे, जो सोनिया गांधी के भरोसेमंद मददगार बने हुए थे, जो साम्प्रदायिकता का विरोध करने के नाम पर अपने भ्रष्टाचार की अनदेखी की उम्मीद देश से करते थे, जो सिर्फ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुनबापरस्ती का एक नंगा नाच बरसों से करते आ रहे थे, आज एक किस्म से उनका खेल खत्म हुआ। अब यह एक अलग बात होगी कि यूपीए सरकार कोई ऐसा कानून बनाए जिसमें उसके मददगार लोगों को सात खून भी माफ हों, तो हो सकता है लालू यादव का पासा भी पलट जाए। फिलहाल उनका खेल खत्म दिखता है, और कबीर की कही यह बात सच साबित होती है कि जानवर की मरी खाल की सांस से भी लोहा भस्म हो जाता है, और जिन जानवरों के हक का लालुओं ने खाया था, वे आज कम से कम निचली अदालत से तो भस्म हो ही गए हैं।
बात सिर्फ लालू यादव की नहीं है, बात है सत्ता का बेजा इस्तेमाल करके देश को लूटने की, जनता के हक के साथ बलात्कार करने की। इसमें बहुत से प्रदेशों में लालू बिखरे पड़े हैं, जनता उनको जानती-पहचानती भी है, और यह भी देखती है कि हिन्दुस्तान का लुंज-पुंज इंसाफ उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाता, और वे एक कुर्सी के बाद दूसरी कुर्सी से बलात्कार करते ऊपर पहुंचते रहते हैं, किसी तरह किसी जांच में फंस भी गए, तो अपने घरवालों को, अपने जानवरों को कुर्सी देकर वे उनके बदन के मार्फत फिर जनता के हक से बलात्कार करते रहते हैं। बिहार में लोगों ने लालू, और लालू के बाद राबड़ी, और राबड़ी के साथ राबड़ी के भाईयों, सबकी ऐेसी ज्यादती देखी थी, और उसने देश के इस विशाल राज्य की संभावनाएं दशकों के लिए खत्म ही कर दी थी।
आज जो बेशर्म सरकार अपराधी-बचाव अध्यादेश ला चुकी है, और जो बेशर्म संसद राजनीतिक दलों का हिसाब-किताब जनता के पूछने के हक से बाहर रख रही है, जो सुप्रीम कोर्ट को उसके हर सुधारवादी फैसले पर लातें मार रही हैं, ऐसी सरकारें और ऐसी संसद इस देश में नक्सलवाद को बढ़ावा दे रही हैं। जब सरकार और संसद में बैठे डकैतों और बलात्कारियों को कोई सजा नहीं दी जा सकती, तो ऐसे लोकतंत्र को खारिज करने के लिए उग्र अतिवामपंथ हथियार उठाकर खुद सजा देने लगता है। दिक्कत यही है कि सजा के हकदार लोग सरकारी बंदूकों से घिरे हुए राजधानियों में पुलिस की सलामी लेते बैठे रहते हैं, और नक्सल मोर्चों पर बेकसूर आदिवासी, और छोटे-छोटे सिपाही मारे जाते रहते हैं। अगर इस देश में ताकतवर मवालियों के जुर्म के साथ इंसाफ की यही रफ्तार रहेगी, तो जंगलों से परे शहरों में भी किसी किस्म की नक्सल हिंसा नाजायज नहीं कही जा सकेगी। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि अपराधियों को बचाने वाले अध्यादेश के पीछे के जो बहुरूपिया सफेदपोश लोग हैं, उनको भी खारिज किया जाए। और ऐसे कड़े कानून बनाने की वकालत की जाए जिससे कि सत्ता पर बैठे मुजरिमों के मामले-मुकदमों पर तेज रफ्तार से सुनवाई हो सके, और आम मुजरिमों के मुकाबले लालबत्तीधारी मुजरिमों को कई गुना अधिक सजा देने का इंतजाम हो।
पिछले दिनों हमने यूपीए सरकार के लाए अध्यादेश को लेकर, और फिर उसे राहुल गांधी के हाथों फाड़ दिए जाने को लेकर काफी कुछ लिखा था। उन सारी बातों को आज यहां दोहराना जरूरी नहीं है। लेकिन अब यह वक्त आ गया है कि जनता के बीच से लगातार अदालत जाकर ऐसी कोशिश हो कि संसद, सरकार, और राजनीतिक पार्टियां अपने जुर्म को सजा से बचाने की कोशिशें न कर सकें। ऐसा न होने पर इस देश के सामने जो सबसे बड़ा खतरा है, वह जनता के लुट जाने से भी बड़ा है। आज इस देश में स्वघोषित और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के भयानक विकराल भ्रष्टाचार का नतीजा है कि साम्प्रदायिक ताकतें लोगों को सुहानी लगने लगी हंै, क्योंकि वे जाहिर तौर पर कम भ्रष्ट दिख रही हैं। भ्रष्टाचार ने धर्मनिरपेक्षता को एक गैरजरूरी सामान बनाकर रख छोड़ा है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता ने अपने भ्रष्टाचार को धर्मनिरपेक्षता के लिए एक विशेषाधिकार मान लिया था। जिस देश में जनता भूखी हो, जिसे खाने का हक देने की जरूरत पड़ती हो, जिसे छब्बीस रूपये रोज में जिंदा रहने पर गैरगरीब मान लिया जाता हो, उसके जेहन में किसी भी तरह की धर्मनिरपेक्षता पेट भरने के बाद ही समझ आ सकती है। जब जनता के मुंह का चारा इस देश के ताकतवर लोग छीनकर, संसद में बैठकर जुगाली करते दिखते हैं, तो ऐसे लोगों की धर्मनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्षता नाम के शब्द को ही बदनाम कर देती है, और साम्प्रदायिकता नाम के शब्द का खतरा खत्म कर देती है।
लालू यादव का मामला सत्ता पर बैठकर जनता और जानवरों के हक के साथ बलात्कार करने का है, और इसके बाद अपने संसदीय बाहुबल के दम पर कांग्रेस और यूपीए से जांच और मुकदमे में ऐतिहासिक रियायत पाने का भी है। कानून की किताबों को इस मामले की मिसालों के साथ दुरूस्त करने की जरूरत पड़ेगी कि लोकतंत्र का कानून किस तरह सत्ता की गिरोहबंदी के सामने दम तोड़ देता है, और यह बताता है कि किस तरह सिर्फ बंदूक का कानून ही ऐसे लोगों के साथ वक्त पर इंसाफ कर सकता है। इस देश को अगर नक्सल हिंसा जैसी अराजकता से बचाना है, तो इस देश को लालुओं और चौटालाओं जैसे सैकड़ों बलात्कारियों से भी बचाना होगा, इसके बिना एक दिन हिन्दी फिल्मों के अंदाज में कोई पुलिस अफसर पिस्तौल से ही इंसाफ करने लग जाएगा।
लालू यादव और चौटाला जैसों के मामले अभी भी आखिरी अदालत के आखिरी फैसले से कोसों दूर हैं, और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ही ऐसे खतरनाक मुजरिमों से संसद और विधानसभाओं को बचाने की कोशिश करता है, तो गांधी-नेहरू की पार्टी उस सुप्रीम कोर्ट के मुंह पर अध्यादेश चबाकर थूक देती है। ऐसे में देश की जनता को ही ऐसे थूकने वाले चेहरों पर फैसला करना है। लालू यादव को मिल रही सजा बेजुबान जानवरों के हक के साथ किए गए बलात्कार की सजा है, और तेज रफ्तार से देश के बाकी लालुओं को भी जेल का चारा खाने के लिए भेजना चाहिए।

























