कब्र से निकाल लाशों से रेप भी रोक नहीं पाता मजहब..

 30 अप्रैल 2023

 

जब कभी ऐसा लगे कि इससे अधिक दिल दहलाने वाली खबर कम होगी, तभी कुछ ऐसा आ जाता है कि उसके पहले कि हैवानियत कम लगने लगती है। पाकिस्तान की एक खबर आई कि वहां इस्लाम छोड़ चुके एक नास्तिक सामाजिक कार्यकर्ता हैरिस सुल्तान ने अपनी एक किताब में यह लिखा है कि किस तरह वहां लोग अपनी लड़कियों की कब्र पर ताले लगाकर रख रहे हैं कि उनके दफन बदन बलात्कार से बचाए जा सकें। द कर्स ऑफ गॉड, वाई आई लेफ्ट इस्लाम नाम की इस किताब के बारे में हैरिस ने अभी ट्विटर पर लिखा है- पाकिस्तान ने यौन कुंठाओं से ग्रस्त एक ऐसा समाज बनाया है जिसमें लोग अपनी बेटियों की कब्र पर ताले डाल रहे हैं ताकि उन्हें बलात्कार से बचाया जा सके। हैरिस ने लिखा है कि जब आप बलात्कार से बचाने के लिए बुर्के की बात करते हो, तो ऐसी सोच कब्र तक ले जाती है। 

पहली नजर में यह खबर फर्जी लगी, और हिन्दुस्तान के कई बड़े अखबारों ने इसे छापा था, लेकिन कम से कम एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने इसे अपनी वेबसाइट से बिना कुछ लिखे हटा दिया। लेकिन जिस पाकिस्तानी अखबार के हवाले से यह बात हिन्दुस्तानी अखबारों में आई है, डेली टाईम्स नाम के उस अखबार में ढूंढते हुए उसके एडिटोरियल कॉलम में 28 अप्रैल को इस बारे में लिखा हुआ मिला। पाकिस्तान के बारे में इस संपादकीय में लिखा गया है- अपने देश के पारिवारिक मूल्यों पर बड़ा गर्व करने वाले पाकिस्तान में हर दो घंटे में एक औरत से बलात्कार होता है। लेकिन दिल दहलाने वाली एक बात यह है कि महिलाओं की कब्र पर ताले डालने पड़ रहे हैं कि लाशों से बलात्कार न हों। पाकिस्तान में नेक्रोफिलिया (लाश से सेक्स) के मामले अंधाधुंध बढ़ रहे हैं, और ऐसे में यह आसानी से समझ आता है कि लोग अपने गुजरे हुए लोगों को इनसे बचाना चाहते हैं। इस यौन कुंठाग्रस्त समाज में महिला का अस्तित्व एक ऐसे खिलौने से अधिक नहीं है जिससे खेलते हुए लोग उसके हाथ-पैर मोड़ सकते हैं। कुछ ही दिन पहले एक हाईवे के किनारे 18 बरस की लडक़ी की जली हुई लाश मिली है जिसे कुल्हाड़े से काटा गया था। लेकिन ऐसे कितने ही मामले पाकिस्तान की सरकार का ध्यान खींचने के लिए काफी नहीं है। इस देश में कुछ बिना दांत-नाखून के कानून हैं, और कुछ नारों वाले पोस्टर हैं, और प्रेस कांफ्रेंस में किए जाने वाले दावे हैं, जो सब बेअसर हैं। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग का कहना है कि 40 फीसदी से अधिक पाकिस्तानी महिलाएं जिंदगी में किसी न किसी तरह की हिंसा झेलती हैं। 

अखबार ने, और एक प्रमुख पाकिस्तानी अखबार ने जब इस बारे में लिखा है तो इस खबर को खारिज करना ठीक नहीं है। हैरिस सुल्तान नाम के लेखक ने तो इस बारे में लिखा ही है, पाकिस्तानी अखबार ने इस पर संपादकीय ही लिखा है, इसलिए इसे पाकिस्तान या मुस्लिम विरोधी प्रचार मानना ठीक नहीं है। भारत की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी बन गई एएनआई ने भी यह समाचार जारी किया है। कुछ और खबरें बताती हैं कि किस तरह कब्रों से निकाल-निकालकर लाशों से बलात्कार के कई मामले सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान में 2011 में कब्रिस्तान के एक चौकीदार को गिरफ्तार किया गया था जब उसने मंजूर किया था कि उसने 48 महिलाओं की लाशों से बलात्कार किया है। 

अब पाकिस्तान की बात छोडक़र बाकी दुनिया की बात भी करनी चाहिए क्योंकि देशों की संस्कृति तो अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इंसानों की बुनियादी सोच कुछ कमी-बेसी के साथ मिलती-जुलती हो सकती है। जिन देशों में यौन कुंठाएं जितनी अधिक रहती हैं, वहां पर यौन अपराध उतने ही अधिक होते हैं। जहां पर लोगों के मिलने-जुलने और सेक्स-संबंध बनाने पर रोक नहीं होती है, वहां अपराध की जरूरत भी कम पड़ती है। दुनिया के बहुत से धर्म कई किस्म की नैतिकता सिखाते हैं, और हर धर्म में पाप, स्वर्ग, नर्क की धारणाएं तो हैं ही। लेकिन वेटिकन के तहत आने वाले चर्चों में बच्चों से बलात्कार का इतिहास पूरी दुनिया में बिखरा हुआ है। और धर्म भी कहीं पीछे नहीं हैं। यह इसलिए भी है कि जो-जो धर्म अपने लोगों पर ब्रम्हचारी रहने की शर्त थोपते हैं, उनके बदन अपनी जरूरत कहीं न कहीं से पूरी कर लेते हैं। ब्रम्हचर्य कागज पर तो लिखे जाने लायक शब्द है, लेकिन असल जिंदगी में इस पर अमल तकरीबन नामुमकिन रहता है। 

पाकिस्तान या उस किस्म की दकियानूसी संस्कृति वाले देश महिलाओं को बुर्के में रखकर, या दूसरे धर्मों और संस्कृतियों के लोग उन्हें किसी दूसरे किस्म के पर्दे, घूंघट में रखकर यह मान लेते हैं कि मर्दों को उत्तेजना से बचाया जा सकेगा। लेकिन ऐसा होता कुछ नहीं है। अगर औरत के कपड़े ही मर्दों को उत्तेजना से बचाते, तो फिर कब्र के भीतर का महिला का बदन तो बाहर से दिखता नहीं है, कब्र खोदकर उससे बलात्कार की नौबत क्यों आती? 

समाज में जब-जब लोगों की प्राकृतिक जरूरतों पर कानूनी या सामाजिक रोक लगाई जाती है, तब-तब कई किस्म के अपराध बढ़ते हैं। पाकिस्तान में अगर हर दो घंटे में एक महिला से बलात्कार के आंकड़े हैं, तो यह मानकर चलना चाहिए कि कई बलात्कार होने पर ही कोई एक बलात्कार रिपोर्ट होता होगा। जिस धर्म में अच्छे चाल-चलन और नेक काम पर जन्नत में हूरों का वायदा हो, और बुरे काम पर दोजख की आग में जलना बताया गया हो, वहां भी अगर लाशों से बलात्कार हो रहा है, तो उसका मतलब यही है कि मजहब किसी को बुरे काम से नहीं रोकता, दिखावे के लिए मजहब को जितना मान लिया जाए, वह इंसान के भीतर की हैवानियत को नहीं रोक पाता। यह भी हो सकता है कि धर्मों की नीयत ही ऐसी हैवानियत (सच तो इसे इंसानियत कहना ही होगा) पर रोक लगाने की नहीं होगी। 

फिलहाल उन धर्मों के लोग राहत महसूस कर सकते हैं जो लाशों को जला देते हैं, क्योंकि उनके भीतर के यौन कुंठाग्रस्त लोग भी पंचतत्वों से तो बलात्कार कर नहीं सकते। 

अगर इस्लाम छोड़े हुए, और नास्तिक बन चुके एक लेखक की किताब की ही बात होती, तो उसे इस धर्म को बदनाम करने की कोशिश माना जा सकता था, लेकिन जब वहां का एक प्रमुख अखबार इस पर संपादकीय लिख रहा है, तो इसे झूठी खबर मानना ठीक नहीं है। सभी धर्मों के लोग अपने-अपने भीतर के मुजरिमों पर अपने धर्म के असर को एक बार फिर आंक लें कि धर्म किस बुरे काम को रोक पाता है।

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अप्रैल, 2023



 

बंदूकों के सामने भला कौन सी जागरूकता खड़ी होगी?

30 अप्रैल, 2023  

   

अमरीका में हर किसी को तरह-तरह की बंदूकें रखने का हक है। लोग फौजी दर्जे के ऐसे ऑटोमेटिक हथियार भी रखते हैं जिनसे मिनट भर में सौ लोगों को मारा जा सके। यह बड़ा ही अजीब और सिरफिरा देश है जो कि अपने हर नागरिक को इतने हथियार रखने का हक देता है जिससे एक-एक अमरीकी सैकड़ों लोगों को मार सके। और वहां पर हथियारों की वकालत करने वाले लोग यह मानकर चलते हैं कि इससे देश में लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा क्योंकि अमरीकी सेना कभी तख्ता पलट नहीं कर सकेगी क्योंकि जनता के पास इतने हथियार हैं। अभी वहां एक नौजवान अपने घर के अहाते में रोज गोलियां चला रहा था, और पड़ोसियों ने जब इस पर विरोध दर्ज किया, तो उसने पांच लोगों को मार डाला। नाजायज काम से रोकने का यह बहुत बड़ा दाम चुकाना पड़ा। लेकिन इस बात को हम दुनिया के बाकी देशों की उन अलग-अलग घटनाओं से जोडक़र भी देखना चाहते हैं जिनमें जायज विरोध के जवाब में इस तरह के कत्ल हो रहे हैं। हिन्दुस्तान में ही सडक़ों पर किसी की गुंडागर्दी को रोकने की कोशिश हो तो लोग मार डाल रहे हैं, छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट के कड़े हुक्म के बाद भी लगातार बजने वाले डीजे के शोरगुल का विरोध करने पर कत्ल हुए हैं, और आज के वक्त समझदार लोग कोई भी जागरूकता दिखाने के पहले यह मान लेते हैं कि उसका नतीजा जिंदगी देना भी हो सकता है। 

अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में छोटी-छोटी बातों के लिए लोग अगर अपने हक का इस्तेमाल न कर सकें, और हर बात की शिकायत के लिए पुलिस, सरकार, या अदालत तक जाना पड़े, तो कितनी नाजायज बातों को रोकना मुमकिन हो पाएगा? जब लोगों के बीच कानून की फिक्र खत्म हो जाती है, जब राजनीति मुजरिमों को बचाने का काम करने लगती है, जब पुलिस और अदालती कार्रवाई सबसे अधिक दाम देने वाले के हाथ बिकने को तैयार खड़ी रहती हैं, तब लोगों की जागरूकता जवाब देने लगती है। लोकतंत्र में इससे बुरी कोई नौबत नहीं रहती कि लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता को घर छोडक़र बाहर निकलें, क्योंकि अधिक जागरूक बनने के बाद इस बात की गारंटी नहीं रहेगी कि वे घर लौट सकेंगे या नहीं। आज आस-पड़ोस की गुंडागर्दी पर भी कुछ बोलने का धरम नहीं रह गया है क्योंकि हर गुंडे-मवाली को बचाने के लिए उसके धर्म के लोग, उसकी जाति के लोग, उसके राजनीतिक दल के लोग खड़े रहते हैं। और शरीफों का कोई संगठन नहीं रहता, शरीफ की मदद करने से किसी नेता का कोई फायदा नहीं होता, और शरीफ के पास ऐसा पैसा भी नहीं रहता कि पुलिस और अदालत उसके साथ इंसाफ करे। नतीजा यह होता है कि थाने से लेकर अदालत तक शरीफ सबसे अधिक प्रताडि़त रहते हैं, और मुजरिम घर जैसी सहूलियत पाते रहते हैं। 

हिन्दुस्तान में अधिकतर प्रदेशों में अमरीका की तरह की बंदूकबाजी नहीं होती, लेकिन फिर भी यूपी-बिहार जैसे राज्य देखें तो वहां पर आम लोगों के बीच बंदूक की जिस तरह की संस्कृति प्रचलित है, और कानूनी और गैरकानूनी हथियार जितने आम हैं, उनके बीच शरीफों का गुजारा कम है। यही वजह है कि वहां पर बड़े-बड़े मुजरिमों के गिरोह राज करते हैं, वे किसी धर्म और किसी जाति की गिरोहबंदी करते हैं, और नेता उन्हें अपने भाड़े के हत्यारों की तरह बचाने का काम करते हैं। बंदूकों का राज चाहे वह मुजरिमों का हो, चाहे वह कश्मीर या बस्तर जैसे इलाकों में सुरक्षाबलों की बंदूकों का हो, उनमें अराजकता आ ही जाती है। अमरीका में एक अलग किस्म की अराजकता है जिसे वहां कानून की बुनियाद हासिल है, हिन्दुस्तान में सुरक्षाबलों को ज्यादती करने पर किसी तरह की कानूनी हिफाजत तो नहीं है, लेकिन अघोषित हिफाजत उन्हें इतनी मिली हुई है कि सुरक्षाबल ज्यादतियां करते हैं, तो भी उनका कुछ बुरा नहीं होता, उनकी सरकारें उन्हें बचाने का काम करती हैं, फिर चाहे वे एक गाड़ी के सामने एक बेकसूर कश्मीरी को बांधकर क्यों न चलें। कश्मीर हो या बस्तर ऐसे इलाकों में यह लगातार देखने में आ रहा है कि जो लोग जागरूकता की बात करते हैं, उन्हें सुरक्षाबल और उनकी सरकारें अलग-अलग किस्म के मामलों में फंसाने की कोशिश करते हैं। ऐसा उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी होता है, और जहां कहीं किसी उग्रवाद का बहाना बनाया जा सकता है, वहां पर सरकारें लोकतंत्र को जिंदा रखने के नाम पर जागरूकता को कुचलने का काम करती हैं। अब लोग न निजी हकों की बात कर सकते हैं, न सार्वजनिक हक की, और न ही समाज के लोकतांत्रिक अधिकारों की। इन सबके खिलाफ मवालियों से लेकर सरकारों तक की बंदूकें तैनात हैं। लोकतंत्र के लिए यह एक बड़ी तकलीफदेह और निराशाजनक नौबत है, कि ऐसे में लोग क्या जागरूकता दिखाएं?

(Daily Chhattisgarh)

...मवालियों की जांघतले दबे लोकतंत्र में खुश वोटर, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाने जैसा

 29 अप्रैल, 2023  

   

बिहार के तथाकथित सुशासन बाबू नीतीश कुमार ने अपने चहेते, एक दलित आईएएस के हत्यारे, भूतपूर्व सांसद आनंद मोहन को रिहा करने के लिए जिस तरह राज्य का जेल मैन्युअल बदला उससे पूरे देश के आईएएस स्तब्ध हैं, उनके एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से यह फैसला बदलने की मांग की है, और शायद वे इसके खिलाफ अदालत भी जाएं। इस अखबार ने इस बारे में बड़े कड़े शब्दों में यूट्यूब चैनल पर कहा भी है, और बिहार के एक प्रमुख पत्रकार पुष्य रंजन से राजनीति और अपराध के गठजोड़ का इतिहास जाना भी है। लेकिन उत्तरप्रदेश और बिहार से यह सिलसिला खत्म होते दिखता ही नहीं है। आनंद मोहन की रिहाई हुई तो अब बिहार में बैनर लग रहे हैं कि क्षत्रिय समाज के जेलों में बंद और मुजरिमों को भी बाहर निकाला जाए। यह मांग की गई है कि आनंद मोहन की तरह उन्हें भी रिहा करवाया जाए। एक तरफ तो पटना के इस फैसले से नीतीश कुमार को धिक्कारा जा रहा है, दूसरी तरफ दिल्ली में भाजपा के सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ नाबालिग और दूसरी महिला पहलवानों के यौन शोषण का जुर्म आखिर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी दखल के बाद कल दर्ज हुआ है। इसके पहले ओलंपिक मैडल लेकर आने वाली पहलवान लड़कियां सडक़-फुटपाथ पर आंदोलन करते बैठी थीं, और केन्द्र सरकार की नजरों में वे फुटपाथ पर पड़े कूड़े से अधिक नहीं दिख रही थीं, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कड़ी चेतावनी, और निगरानी की कड़ी टिप्पणी के बाद दिल्ली पुलिस के मुर्दा हाथों ने रपट लिखी है। वजह यही है कि भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष मौजूदा भाजपा सांसद हैं, और वे अपने इलाके के बेताज रंगदार भी हैं। ऐसे में जाहिर है कि भाजपा के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस की कोई दिलचस्पी ओलंपिक विजेता महिला खिलाडिय़ों के आंसुओं में नहीं थी। 

उत्तरप्रदेश और बिहार के इन दो बाहुबलियों के मामलों को देखें तो देश के ये दो बड़े राज्य, एक अलग ही किस्म की जातिवादी, मवालीवादी, अराजक, और अलोकतांत्रिक राजनीति के अड्डे दिखते हैं। कोई हैरानी नहीं है कि देश में अधिकतर और जगहों पर यूपी-बिहार का नाम राजनीति और अपराध की जोड़ी के लिए लिया जाता है, और जहां पर अधिक अराजकता दिखती है, तो लोग अपने लोगों को याद दिलाते हैं कि ये यूपी-बिहार नहीं है। इन दोनों ही प्रदेशों में आम लोग तो अमन-पसंद ही होंगे क्योंकि आम लोगों की भला क्या सुनवाई हो सकती है, लेकिन जो खास लोग हैं वे अपने जुर्म के कारोबार में, अपनी राजनीति में आम लोगों का इस्तेमाल गुठलियों की तरह करते हैं, और उन्हीं की वजह से पूरे देश में इन दो राज्यों को एक बुरे विशेषण की तरह इस्तेमाल किया जाता है। 

आज जो बृजभूषण सिंह चर्चा में है, उसके बारे में खबरें बताती हैं कि वह राम मंदिर आंदोलन के उफान के वक्त उसमें जुड़ा और बाद में बीजेपी से सांसद बना। उसने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि वह बाबरी मस्जिद गिराने में शामिल था, सीबीआई ने उस पर इसका केस भी चलाया, लेकिन 2020 में वह बरी हो गया। उस पर दाऊद इब्राहिम के गुर्गों की मदद के लिए टाडा भी लगाया गया, लेकिन वह उससे भी निकल गया। वह भाजपा छोडक़र सपा गया, वहां भी लोकसभा जीता, फिर लौटकर भाजपा आया, फिर वहां से जीत रहा है। पिछले ही बरस एक समाचार वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में उसने कहा था कि उसने एक कत्ल किया था। उसके चुनावी हलफनामे में अभी चार मामले बचे दिख रहे हैं जिनमें कत्ल की कोशिश का मामला भी है। और अब इतनी बड़ी संख्या में महिला खिलाडिय़ों ने उस पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं, लेकिन उसकी पार्टी का उस पर मुंह नहीं खुल रहा है। जो व्यक्ति जिस पार्टी से चाहे उस पार्टी से टिकट पा ले, जिस पार्टी से लड़े, चुनाव जीत जाए, बार-बार जीते, इलाके में धाक हो, पास में दौलत हो, तो भला कौन सी पार्टी को अपना ऐसा आरोपी चुभता है? इसी यूपी-बिहार में अभी जो एक बड़ा गैंगस्टर अतीक अहमद पुलिस घेरे में मार डाला गया, उसके और उसके कुनबे पर दर्ज जुर्मों की एक बड़ी लंबी फेहरिस्त है, और वह सपा से लेकर विधानसभा और लोकसभा का सफर करते रहा है। आनंद मोहन और उनकी बीवी बिहार में विधानसभा और लोकसभा उसी अंदाज में आते-जाते रहे जिस अंदाज में अदालत और जेल आते-जाते रहे। 

अपराधियों को चुनावों से दूर रखने के लिए यूपीए सरकार के वक्त राहुल गांधी ने जिस विधेयक को फाडक़र फेंक दिया था, उसके न रहने पर भी राजनीतिक मुजरिम तरह-तरह से सत्ता पर काबिज हैं। बिहार में आनंद मोहन की रिहाई के लिए नियम बदलने के पहले ही नीतीश कुमार आनंद मोहन की रिहाई की मुनादी करते हैं। और चुनावी लोकतंत्र की मजबूरी यह है कि कांग्रेस इन्हीं नीतीश कुमार के साथ विपक्षी गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा कर रही है। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र में एक बड़ी निराशा खड़ी करता है कि भाजपा से लेकर समाजवादियों तक, और दूसरी पार्टियों तक भी, किसी को अपने मुजरिम नहीं खटकते हैं, बल्कि सुहाते ही हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि गुजरात के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले भाजपा सरकार ने उम्रकैद काट रहे उन 11 हत्यारे-बलात्कारी हिन्दू मुजरिमों को वक्त से पहले, नियम तोडक़र जेल से रिहा किया जिन्होंने बिल्किस बानो से गैंगरेप किया था, उसकी बेटी और मां सहित पूरे कुनबे का कत्ल किया था, और कुल 14 हत्याएं की थीं। जब लोकतंत्र में किसी पार्टी को अपने हत्यारे और बलात्कारी अभिनंदन और माला के लायक लगते हों, नियम तोडक़र जेल से रिहा करने के लायक लगते हों, तो आम वोटर बेवकूफों की तरह वोट डालकर इस खुशफहमी में जी सकते हैं कि उनके वोट से यह लोकतंत्र चल रहा है। यह लोकतंत्र पार्टियों की गुंडागर्दी, और उनके मवालियों की जांघतले दम तोड़ रहा है, और नासमझ वोटर अपने को सरकार बनाने वाला मान रहा है। हिन्दुस्तान के चुनाव इस हद तक ढकोसला बन गए हैं कि कोई सरकारें लोकतांत्रिक पैमानों पर चुनकर बनने की संभावना न सरीखी रह गई है। फिर भी दिल के बहलाने को जम्हूरियत का खयाल अच्छा है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बदनामी महिला पहलवानों से हो रही है, या कुश्ती संघ अध्यक्ष भाजपा सांसद से?

 28 अप्रैल, 2023  

 

भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष भाजपा के एक बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय पहलवानों द्वारा महीनों से लगातार केन्द्र सरकार से, सार्वजनिक रूप से की जा रही यौन शोषण की शिकायतों पर सरकार ने अब तक किया तो कुछ नहीं, अब जब इंसाफ की मांग करते हुए महिला खिलाड़ी सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं, तो भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पी.टी.ऊषा ने इन पहलवानों की ही आलोचना कर डाली, और कहा कि वे सडक़ों पर जाकर देश का नाम बदनाम कर रही हैं। उनके पास बृजभूषण सिंह के बारे में कहने को कुछ नहीं था, यह भी नहीं था कि महीनों से इतनी लड़कियों की शिकायत पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई, और यौन शोषण की जांच के बजाय उन्हें यह आंदोलन देश की बदनामी लग रहा है। एक ओलंपिक महिला खिलाड़ी रहते हुए पी.टी.ऊषा का आज दूसरी खिलाडिय़ों के लिए इस तरह का बयान बहुत से लोगों को हक्का-बक्का कर सकता है, लेकिन हमें इससे कोई सदमा नहीं पहुंचता। जो लोग किसी भी किस्म की सत्ता या ताकत की जगह पर पहुंच जाते हैं, वे अपने जेंडर से ऊपर उठ जाते हैं, वे अपनी जाति या धर्म से भी ऊपर उठ जाते हैं। उनके सामने सिर्फ ताकत, पैसा, महत्व और मुनाफा, यही बातें रह जाती हैं। यह बात महिलाओं के साथ बदसलूकी करने वाली महिला विधायकों या मंत्रियों को देखकर भी समझी जा सकती है, महिला अधिकारियों को देखकर भी समझी जा सकती है। महिलाओं को पीटने, और मां-बहन की गाली देने में महिला पुलिस अधिकारी भी पीछे नहीं रहती हैं। इसलिए कुल मिलाकर मामला ताकत का है, और ताकत लोगों को उनके जेंडर से ऊपर उठा देता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर से लेकर इंदिरा गांधी तक के बारे में कहा जाता था कि अपने मंत्रिमंडल में वे अकेली मर्द रहती थीं। 

कल से सोशल मीडिया पी.टी. ऊषा के खिलाफ उबला पड़ा है, और अगर उनका छोटा सा एक वीडियो देखा जाए जिसमें वे महिला पहलवानों को देश की बदनामी करने वाली बतला रही हैं, तो मन खट्टा हो जाता है, देश के लिए मैडल जीतकर आने वाली पी.टी. ऊषा के लिए मन में सम्मान पूरी तरह खत्म हो जाता है। उन्हें न सिर्फ खिलाडिय़ों की कोई परवाह नहीं है, बल्कि यौन शोषण की शिकार लड़कियों के लिए भी उनके मन में कोई हमदर्दी नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की एक मुखर सांसद महुआ मोइत्रा ने पी.टी. ऊषा के बयान पर कहा है कि अगर इससे देश की बदनामी हो रही है तो सत्तारूढ़ भाजपा सांसद के यौन शोषण की हरकतों से, और उसके खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा मामला दर्ज न करने से क्या गुलाब की खुशबू आ रही है? बहुत से राजनीतिक दलों ने भी पी.टी. ऊषा को धिक्कारा है। पी.टी. ऊषा का यह कहना है कि पहलवानों को शिकायत लेकर उनके पास आना था। वे शायद यह भूल रही हैं कि पिछले कई महीनों से यह सिलसिला चल रहा है, यौन शोषण की शिकार महिला पहलवान और उनके साथी केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर से भी मिले, खेल संघों में भी गए, और उन्हें जुबानी मरहम से अधिक कुछ नहीं मिला। पी.टी. ऊषा भी इस ताकतवर कुर्सी पर बैठने के बाद से ऐसे मामलों को देखने की सीधी-सीधी जिम्मेदार हैं, लेकिन वे बैठकर इंतजार कर रही हैं कि कोई आकर उनसे शिकायत करे, तब वे उस पर गौर करें, यह नजरिया भी धिक्कार के लायक है। आज खिलाडिय़ों ने भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष, भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दर्ज अपराधों की एक लंबी फेहरिस्त भी दिल्ली में सामने रखी है, लेकिन कई बार का सांसद रहा हुआ यह आदमी भाजपा को किसी जवाब-तलब के लायक भी नहीं लग रहा है। यह रवैया एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा के लिए शर्मनाक है, पी.टी.ऊषा के लिए शर्मनाक है, और महिलाओं के हक की वकालत करने वाले नेताओं के लिए भी शर्मनाक है। 

पहलवानों का यह आंदोलन दिल्ली के करीब के, लगे हुए हरियाणा से भी जुड़ा हुआ है क्योंकि अधिकतर महिला पहलवान वहीं की हैं। अब धीरे-धीरे करके दूसरे राजनीतिक दलों के लोग भी इससे जुड़ रहे हैं, और पुरूष पहलवान तो पहले दिन से ही महिला पहलवानों के साथ हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी आज सुनवाई के लिए लगा है, और ऐसा लगता है कि दिल्ली पुलिस जिस तरह से भाजपा सांसद के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने से कतरा रही है, उसे अदालत की फटकार भी लगेगी। लेकिन महज फटकार से क्या होता है, अगर पुलिस इस सांसद को बचाने पर ही आमादा होगी तो चाहे कितने ही सुबूत हों, पुलिस बार-बार अदालती दखल बिना दो कदम भी आगे नहीं बढ़ेगी। भारत में सत्ता और पैसों की ताकत का यही हाल है। हर पार्टी अपने-अपने पसंदीदा मुजरिमों को बचाने में लगी रहती है। 

फिलहाल आज का दिन पी.टी. ऊषा को धिक्कारने का दिन है जिसके मन में न दूसरी महिलाओं के लिए कोई सम्मान रह गया है, न दूसरी खिलाडिय़ों के लिए। सरकारी सहूलियतें और ओहदे की ताकत लोगों से इंसानियत छीन लेती हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बिलावल के भारत आने से सरकारों को उम्मीद नहीं, लोगों को कुछ सोचना चाहिए

 27 अप्रैल, 2023  

 

अगले महीने हिन्दुस्तान में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक होने जा रही है जिसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के आने की बात तय हो गई है। पिछले कुछ बरसों से लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बहुत बढ़ा हुआ चल रहा है जिसकी वजह से दोनों देशों में कारोबार भी घटा है, और सरकारों के बीच जाहिर तौर पर किसी तरह की बात नहीं हो रही है। वैसे तो दुनिया में तमाम सरकारों के बीच पर्दे के पीछे बातचीत की अलग-अलग तरकीबें काम करती रहती हैं, और ऐसे में भारत और पाकिस्तान भी कुछ लोगों के मार्फत कहीं बात कर रहे हों, तो उसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए। लोगों को एक दिलचस्प बात ठीक से याद नहीं होगी कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक विदेश प्रवास से दिल्ली लौटते हुए अचानक पाकिस्तान उतर गए, उस वक्त के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के परिवार में एक शादी में पहुंचे, जन्मदिन मनाया, दोनों की मां के लिए तोहफे लेना-देना हुआ, तो इसके पीछे भारतीय विदेश मंत्रालय का नहीं, हिन्दुस्तान के एक कारोबारी सजन जिंदल का अधिक हाथ था जिनके परिवार से नवाज शरीफ के परिवार का दशकों पुराना आने-जाने का रिश्ता था। इसलिए जाहिर तौर पर जो दिखता है, वही पूरा नहीं होता, पर्दे के पीछे बहुत सी और बातों का असर भी होता है। अब अभी बिलावल भुट्टो के आने को लेकर भारत में विरोधी भावनाएं सडक़ों पर हैं, हिन्दुस्तानी फौज पर अभी हुए एक आतंकी हमले की बात को गिनाया जा रहा है, और भारतीय विदेश मंत्री ने अपने एक विदेश दौरे के बीच ही बयान दिया है कि ऐसे एक पड़ोसी के साथ जोडऩा बहुत मुश्किल है जो हमारे खिलाफ सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देता है। 

पांच मई को होने वाली शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में चीन और रूस के अलावा भी कई और देशों के विदेश मंत्री रहेंगे, और ऐसे में हमेशा ही यह होता है कि एजेंडा से परे भी नेताओं में आपस में अनौपचारिक चर्चाएं होती हैं जो कि कई बार औपचारिक चर्चाओं के मुकाबले भी अधिक काम की रहती हैं। भारत में बिलावल भुट्टो अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं जो कि पाकिस्तान सरकार की एक हैसियत से यहां आ रहे हैं। उनके नाना और उनकी मां दोनों ही अलग-अलग वक्त पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे हुए हैं, और नाना को फौजी तानाशाह ने फांसी दी थी, और मां बेनजीर भुट्टो को एक रैली में गोली मार दी गई थी। यहां पर इस बात का कोई औचित्य नहीं है, फिर भी सरहद के दोनों तरफ एक अजीब सा संयोग है कि हिन्दुस्तान में भी एक नेता राहुल गांधी के पिता और दादी की मौत भी असाधारण हुईं, और उन दोनों का जुल्फिकार अली भुट्टो और बेनजीर भुट्टो के साथ लंबा संपर्क था। 

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के लिए एक बहुराष्ट्रीय संगठन की बैठक में सदस्यों के रूप में आमने-सामने होना बहुत अहमियत तो नहीं रखता है, लेकिन इन दोनों देशों के बीच तनातनी से दोनों का ही बड़ा नुकसान होता है। सरहद के दोनों तरफ गरीबी है, वह कम और अधिक हो सकती है, लेकिन है दोनों तरफ, और इन दोनों का फौजी खर्च मोटेतौर पर एक-दूसरे के खिलाफ ही अधिक रहता है। सडक़ से जुड़े इन दोनों देशों के बीच कारोबार बहुत अच्छा हो सकता है, और अलग-अलग वक्त पर होते भी रहा है। तनातनी में दोनों देश और जगहों से महंगा खरीदने, और सस्ता बेचने को मजबूर रहते हैं। हिन्दुस्तान में सरकारी और निजी क्षेत्र में गंभीर और महंगे इलाज की बहुत बड़ी क्षमता है, और तनाव कम रहने पर पाकिस्तान से हजारों लोग इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते भी थे, लोगों को सहूलियत मिलती थी, और चिकित्सा-कारोबार को ग्राहकी। लेकिन वह भी बंद हो चुका है। सरहद के दोनों तरफ लाखों लोगों की रिश्तेदारियां हैं, लेकिन उनका भी सीधा आना-जाना बंद है, और किसी तीसरे देश के मार्फत कुछ लोग आ-जा पाते हैं। सडक़, रेल, और हवाई रास्ते का दोनों देशों के बीच का सारा ढांचा बेकार पड़ा हुआ है। लोगों को याद होगा कि इन दोनों देशों के बीच फिल्म, संगीत, फैशन, क्रिकेट, और पर्यटन की बहुत संभावनाएं हैं, और जब तनाव कम रहता था, तो हिन्दुस्तान के फिल्म और टीवी पर पाकिस्तानी कलाकार दिखते थे, उनके कार्यक्रम हिन्दुस्तान में होते थे। सरहद के तनाव, और आतंकी तोहमतों ने लोगों के बीच के सारे रिश्तों को बर्फ में जमाकर सर्द कर दिया है। 

किसी देश की सरकार की जुबान अलग हो सकती है, सरकार चुने हुए लोगों से बनती है, और लोगों को अगले चुनाव में फिर सरकार में आने की जरूरत भी लगती है। ऐसे में सरकार चला रहे लोगों की प्राथमिकताएं संबंध सुधारने से परे की भी हो सकती हैं। लेकिन अगर जनता की पसंद और प्राथमिकता देखी जाए, तो वह सरहदों पर बहुत महंगा तनाव घटाने, और मोहब्बत के रिश्ते बढ़ाने की हिमायती होंगी। लेकिन दिक्कत यह रहती है कि आम जनता सरकार को चुनती तो है, सरकार चलाती नहीं है। एक बार चुन लिए जाने के बाद पांच बरस तक सरकार जनता को चलाती है, और इस सिलसिले में जम्मू-कश्मीर के पिछले गवर्नर सतपाल मलिक की हाल ही में कही गई बातों को भी याद रखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने पुलवामा के आतंकी हमले से जुड़ी बड़ी नाजुक बातें कही थीं, और उनमें से किसी बात का अभी तक भारत सरकार ने खंडन नहीं किया है। इन तमाम बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि अगर किसी तरह दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू हो सकती है, तो उससे दोनों तरफ के गरीबों का सबसे अधिक भला होगा, उनकी रोटी छीनकर गोला-बारूद खरीदना कम होगा, बर्फीली सरहदों पर सैनिकों की मौतें घटेंगीं, और दोनों तरफ कारोबार बढ़ेगा। हम सरकार की कूटनीतिक जुबान नहीं जानते, लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों का मामला ऐसा है कि इसमें सरकारों की जुबानें फासलों को घटाते नहीं दिखती हैं। ऐसा लगता है कि सरकारें चुनाव अभियान में बोलती हैं, और वे अपने देश की जनता से नहीं, देश के वोटरों से बात करती हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए। यह बात सुझाना भी आसान नहीं है क्योंकि इसे बहुत आसानी से देश के साथ गद्दारी करार दिया जा सकता है, और सरहद पार भेजने की बात कही जा सकती है। लेकिन सच बोलने वालों को जहर का प्याला देने का दुनिया का पुराना इतिहास रहा है। इसलिए आज नफरती हो-हल्ले के बीच मोहब्बत की जुबान बोलने वालों को कुछ खतरे तो उठाने ही होंगे। इसलिए हम यह साफ-साफ सुझा रहे हंै कि आतंकी हमलों और सरहदी तनावों पर जो भी फौजी कार्रवाई करनी है उसे जारी रखते हुए भी देशों को आपस में बातचीत जारी रखनी चाहिए। यह बात एक वक्त चंबल के डकैतों पर भी लागू होती थी, यह पंजाब के खालिस्तानी आतंकियों, उत्तर-पूर्व के उग्रवादियों, और देश के कई राज्यों के नक्सलियों पर भी लागू होती है, कि बातचीत का सिलसिला कभी बंद नहीं होना चाहिए। हम हमेशा बातचीत की वकालत करते हैं, और उसके साथ बहुत सारी शर्तें जोडऩे के खिलाफ रहते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल 2023


 

आम आदमी के सीएम बंगले पर खास आदमी के बंगले से भी बड़ा खर्च

26 अप्रैल, 2023  

 

इस अखबार के यूट्यूब चैनल पर कल ही इसके संपादक ने सरकारी और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की फिजूलखर्ची के खिलाफ तल्ख जुबान में कई बातें कही थीं, और गांधी के इस गरीब देश में किफायत बरतने की नसीहत दी थी। अब आज सुबह के इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक आम आदमी पार्टी के चर्चित मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री निवास पर 45 करोड़ रूपये खर्च किए हैं। उनकी पार्टी की सफाई यह है कि मकान 80 साल पुराना है, इसलिए इसे दुबारा बनवाने की जरूरत थी। लेकिन बीजेपी ने याद दिलाया है कि केजरीवाल ने 2013 में दावा किया था कि वे सरकारी घर, हिफाजत, और सरकारी कार नहीं लेंगे, लेकिन उन्होंने बने-बनाए घर पर 45 करोड़ खर्च किए। आम आदमी पार्टी की सफाई यह है कि यह तो सरकारी निवास है जिस पर सरकारी खर्च किया गया है। पार्टी ने बयान जारी किया है कि 1942 का बना हुआ मकान है, और सरकारी इंजीनियरों ने इसकी जगह नया घर बनाने की सलाह दी थी। इस 45 करोड़ में से 30 करोड़ ही मकान पर लगाए गए हैं, और 15 करोड़ से अहाते में बंगला-ऑफिस बनाया गया है। आम आदमी पार्टी का यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री के लिए बन रहे नए घर पर 467 करोड़ रूपये खर्च किए जा रहे हैं, प्रधानमंत्री के मौजूदा घर की मरम्मत-सजावट पर 89 करोड़ लगाए गए थे। पार्टी ने यह भी बताया है कि दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने पिछले कुछ महीनों में अपने घर की मरम्मत और साज-सज्जा पर 15 करोड़ खर्च किए हैं। 

झारखंड के राज्यपाल की किफायत की खबरों को देखते हुए कल इस संपादक ने अपने न्यूजरूम वीडियो में नेताओं और दूसरे ओहदों पर बैठे हुए लोगों की जनता के पैसों की फिजूलखर्ची के खिलाफ कहा था, और अब यह खबर आ गई जो कि हक्का-बक्का करती है। एक मुख्यमंत्री का परिवार आखिर कितना बड़ा होता है, उस पर जनता के कितने पैसे खर्च होने चाहिए? जो व्यक्ति अपनी पार्टी को आम आदमी का नाम देता है, जो नाप से अधिक बड़े कपड़े पहनकर अपने आपको गरीब की तरह दिखाता है, जो हजार किस्म की किफायत और त्याग की बात करते आया है, वह अपने सरकारी मकान पर अगर इस तरह 45 करोड़ खर्च कर रहा है, तो वह हक्का-बक्का करने वाली बात है। केजरीवाल और उनकी पत्नी दोनों ही केन्द्र सरकार के बड़े अफसर रहे हुए हैं, वे चाहते तो अपनी पिछली तनख्वाह से भी अपनी जरूरत का कोई मकान ले सकते थे, लेकिन पुराने मकान की ऐसी मरम्मत और सजावट तो एक जुर्म की तरह लग रही है। दिल्ली बहुत महंगा शहर होगा, लेकिन जनता का पैसा नेता पर इतना क्यों बर्बाद किया जाना चाहिए? 

छत्तीसगढ़ में जब पिछले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के समय नई राजधानी की योजना बनी, बड़ा सा मंत्रालय बना, और दफ्तर बने, और मंत्री-मुख्यमंत्री के लिए बंगले की योजना बनी, तब भी हमने इस बात को एक से अधिक बार लिखा था कि छत्तीसगढ़ में चूंकि यह सब कुछ पहली बार बन रहा है, इसलिए सरकार के पास किफायत बरतने का एक अनोखा मौका है, और मंत्री-अफसर के बड़े-बड़े दफ्तर बनाने के बजाय, छोटे-छोटे दफ्तर बनाने चाहिए, और हर मंजिल पर मीटिंग के कुछ कमरे बना देने चाहिए जिनका अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोग इस्तेमाल कर सकें। लेकिन आज मंत्री और सबसे बड़े अफसरों के कमरे ही ऐसे बनाए गए हैं जिनमें दर्जनों लोगों की बैठक हो सकती है, और उतने बड़े कमरों का रख-रखाव, उनकी एयरकंडीशनिंग बर्बाद होते रहती है। छत्तीसगढ़ के मंत्री-मुख्यमंत्री बंगलों के आंकड़े तो अभी सामने नहीं है, लेकिन वहां भी इसी तरह की बर्बादी हो रही होगी, क्योंकि नेता-अफसर-ठेकेदार को बड़े-बड़े निर्माण सुहाते हैं। अकेली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ऐसी दिखती है जो कि एक घनी बस्ती के बीच अपने निजी पारिवारिक मकान में रहती हैं, खपरैल के छत का मकान है, और घर के सामने की गली बारिश में पानी से भर जाती है, जिसमें ईटें रखकर ममता अपने घर आती-जाती हैं। अभी पिछले बरस इस घर में दीवाल फांदकर एक विचलित आदमी घुस आया था, वह रात भर वहां एक कोने में दुबके बैठे रहा, और सुबह पुलिस ने उसे पकड़ा था। ममता बैनर्जी शहर के बदबूदार नाले के पास की इस बस्ती में 50 बरस से रह रही हैं, और उनके रेलमंत्री रहते हुए उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब उनके इस घर पर आए थे, तो इसे देखकर हक्का-बक्का रह गए थे। 

केजरीवाल की तरह पुराने सरकारी मकान की मरम्मत और सजावट पर बर्बादी करने वाले लोग हों, या छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य में बनी अंधाधुंध गैरजरूरी बड़ी राजधानी में बनते अंधाधुंध बड़े बंगलों की बात हो, इन सब पर जनता का पैसा खर्च होता है, और इसका हक किसी को नहीं होना चाहिए। दुनिया के कई बहुत संपन्न देशों में वहां के सत्तारूढ़ नेता बड़ी किफायत से रहते हैं, साइकिल पर चलते हैं। कुछ यूरोपीय देशों में तो राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री एक फ्लैट में रहते हैं जिसकी इमारत में और भी बहुत से लोग रहते हैं। अभी कुछ बरस पहले ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनिजाद तेहरान की एक बड़ी इमारत के एक फ्लैट में रहते थे। 

जनता के पैसों पर जीने वाले लोगों को अंधाधुंध सुख-सुविधाओं का मोह छोडऩा चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। लोग अपनी सहूलियतों पर अंधाधुंध खर्च करते हैं, और फिर उनके आदी होकर किसी भी कीमत पर उस सत्ता पर बने रहना चाहते हैं। हिन्दुस्तान में अगर ऐसे सत्तामोह को खत्म करना है, और गरीबों के साथ इंसाफ करना है तो सरकारी बंगलों की परंपरा को खत्म कर देना चाहिए। इनको नीलाम करके वहां पर बहुमंजिली इमारत बनानी चाहिए, जिसमें लोग सरकारी कर्मचारियों की फौज के बिना गिने-चुने घरेलू कामगारों के साथ रह सकें। लेकिन देश की कोई बड़ी पार्टी, कोई बड़े नेता ऐसा करना नहीं चाहते। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहने के लिए बिना परिवार के हैं, न पत्नी साथ रहती, न मां, न परिवार का कोई और। लेकिन अंधाधुंध बड़े प्रधानमंत्री निवास में रहते हुए भी उन्हें करीब पांच सौ करोड़ का नया प्रधानमंत्री निवास बनवाने से कोई परहेज नहीं रहा। जबकि उन्हीं की तस्वीरों वाली थैलियों में गरीबों को मुफ्त या रियायती अनाज बांटकर प्रचार भी किया जाता है। ऐसे गरीब देश में प्रधानमंत्री को पांच सौ करोड़ का नया घर क्यों चाहिए? देश के तमाम सरकारी बंगलों को नीलाम करके सबको एक किराया-भत्ता दे दिया जाए, और वे अपनी पसंद और क्षमता के मकान किराए से लेकर रहें, इससे छोटे-छोटे प्रदेशों में भी सैकड़ों करोड़ रूपये साल की बचत होगी, और दिल्ली जैसे शहर में तो हजारों करोड़ रूपये साल की बचत होगी। लेकिन आज अगर कोई ऐसी जनहित याचिका लेकर अदालत जाए, तो उसे बाहर फेंक दिया जाएगा क्योंकि जज खुद ही अंग्रेजों के वक्त के बड़े-बड़े बंगले छोडऩा नहीं चाहते, और रिटायर होने के बाद भी उनमें बने रहने की जुगत करते रहते हैं। इसलिए यह लोकतंत्र सही मायनों में एक सामंती तंत्र है, और इसमें कोई सुधार तभी हो सकता है जब ममता बैनर्जी जैसी फक्कड़ जिंदगी जीने वाले कोई प्रधानमंत्री बनें, और जिनमें देश के गरीबों के लिए दर्द भी हो। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल 2023



 

भाजपा सांसद कुश्ती अध्यक्ष के खिलाफ महीनों बाद आखिर सुप्रीम कोर्ट ने ही सुनी

 25 अप्रैल, 2023  

 

दिल्ली में भारत के कुश्ती-चैंपियन महीनों से अपने फेडरेशन के तानाशाह और बदनाम अध्यक्ष, भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं, और जब सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो अब पहलवानों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले को बहुत गंभीर माना है। पहलवानों के आरोप हैं कि फेडरेशन को मनमाने तरीके से हांकने वाले अध्यक्ष सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने महिला पहलवानों का यौन उत्पीडऩ किया जिनमें नाबालिग भी शामिल है। ये पहलवान अभी दिल्ली में धरने पर बैठे हुए हैं, उनकी दर्ज कराई गई यौन उत्पीडऩ की शिकायत के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की है, जबकि यौन शोषण की शिकार लड़कियों में एक उस वक्त 16 बरस की थी जिसने गोल्ड मैडल भी जीता था। इनकी तरफ से अदालत में खड़े हुए वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि ऐसे जुर्म के मामले में जांच न करने के लिए जिम्मेदार पुलिसवालों पर भी मुकदमा चलना चाहिए। 

महीनों हो गए हैं यह देश पहलवान लडक़े-लड़कियों को आंसू बहाते देख रहा है। वे सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, बड़ी संख्या में खिलाडिय़ों के ऐसे आरोप हैं, और यौन शोषण की शिकार कुछ लड़कियों की तरफ से उनके साथी पहलवान सामने आए हैं ताकि उन्हें शर्मिंदगी न झेलनी पड़े। लेकिन केन्द्र सरकार के बड़े-बड़े मंत्रियों से लेकर पुलिस तक कुछ भी नहीं कर रहे। लीपापोती करने के अंदाज में भारतीय कुश्ती संघ की एक जांच का नाटक सा किया जा रहा है। इस संघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर आरोप है कि उन्होंने कम से कम 10 महिला कुश्ती खिलाडिय़ों का यौन उत्पीडऩ किया है। जैसा कि कोई भी आरोपी करते हैं, इस आदमी ने भी अपने पर लगे आरोपों को गलत बताया है। इस मामले को भारत में खेलों के जानकार मान रहे हैं कि यह इंसाफ के लिए लड़ाई की एक बड़ी शुरुआत है। जो लोग खेलों की दुनिया की हकीकत जानते हैं, वे यह भी मानते हैं कि महिला खिलाडिय़ों को अक्सर ही ऐसे शोषण का सामना करना पड़ता है, उनमें से कुछ बच पाती हैं, कुछ नहीं बच पातीं। लेकिन उनका प्रशिक्षण, उनका चयन, उन्हें आगे बढऩे के मौके, इन सबके लिए मर्द पदाधिकारियों के शोषण का सामना करना पड़ता है। आज हालत यह है कि कुश्ती संघ के इस अध्यक्ष पर ही महीनों से इतने गंभीर आरोप लग रहे हैं, लेकिन न तो सरकार की तरफ से जांच कमेटी बनाने की एक खानापूरी के अलावा और कुछ किया गया, और न ही भाजपा की तरफ से अपने इस सांसद से कोई जवाब-तलब किया गया। ऐसा माना जाता है कि यह सांसद उत्तर भारत के अपने इलाके में वोटरों पर खासा दबदबा रखता है, और पार्टी उसके खिलाफ कुछ करने की हिम्मत नहीं कर सकती। 

इस एक मामले से परे भी हमें हमेशा यह लगता है कि भारत में खेल संघों पर नेताओं और अफसरों का जिस बुरी तरह कब्जा है, उसके चलते उनके शिकार खिलाडिय़ों को कभी इंसाफ नहीं मिल सकता। वे ही सांसद-विधायक हैं, वे ही मंत्री-अफसर हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई करे तो कौन करे? शायद यही देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने आज नाराजगी के साथ पुलिस को हुक्म दिया है। हम राष्ट्रीय स्तर पर, और प्रदेशों में भी यह देखते हैं कि राजनीतिक सत्ता, सरकारी ताकत, और कारोबारी दौलत, इससे परे कोई खेल संघ नहीं चल सकते। इन तीनों दायरों में जो सबसे ताकतवर हैं, उन्होंने पूरी जिंदगी में उस खेल का मैदान भी न देखा हो, वे ही लोग राज करते हैं, और होनहार खिलाडिय़ों को किस तरह खत्म किया जाए, इसका इंतजाम भी करते हैं। चारों तरफ ऐसे खेल संघ खिलाडिय़ों से परे हैं, उनके चुनावों में दौलत और सत्ता का बोलबाला रहता है, और उन्हें माफिया अंदाज में चलाया जाता है। यह सिलसिला जब तक खत्म नहीं होगा, तब तक हिन्दुस्तान में खेलों का भला नहीं हो सकता, शोषण के शिकार खिलाडिय़ों को कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। देश ने देखा है कि किस तरह बीसीसीआई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महीनों तक दखल दी, एक रिटायर्ड जज की अगुवाई में कमेटी बनाई, लेकिन किसी भी तरह से खेल की यह संस्था खिलाडिय़ों के हाथ नहीं आ पाई। देश और प्रदेशों में क्रिकेट बड़े-बड़े सबसे ताकतवर नेताओं, और कारोबारियों के कब्जे में चले आ रहा है। और क्रिकेट से परे के भी दर्जनों खेल पदाधिकारियों की ताकत के शिकार हैं। ऐसे में अगर किसी पदाधिकारी, प्रशिक्षक, मैनेजर, या वरिष्ठ खिलाड़ी के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत है, तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। ऐसा सिर्फ हिन्दुस्तान में हो ऐसा भी नहीं है, अमरीका में अभी कुछ बरस पहले जिम्नास्टिक्स के सबसे बड़े प्रशिक्षकों पर दर्जनों खिलाडिय़ों के यौन शोषण का मामला सामने आया जिसमें सैकड़ों, कम से कम 368 जिम्नास्ट लड़कियों के यौन शोषण की बात जांच में साबित हुई, और वहां के खेल पदाधिकारी या अधिकारी इसकी अनदेखी करते चले आ रहे थे। बाद में जब एक सबसे बड़ी जिम्नास्ट एक मुकाबले के बीच ही अपनी मानसिक स्थिति के चलते पीछे हट गई, तो यह पूरा मामला उजागर हुआ, वरना यह दशकों से चले आ रहा था। 

अब चूंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है, तो यह मानना चाहिए कि अदालत खेल संघों की हालत को भी देखेगी। भूतपूर्व खिलाडिय़ों को लेकर, और खेल के दायरे से परे के कुछ लोगों को लेकर एक बड़ी जांच कमेटी बनानी चाहिए, जो कि पहलवानों की इस ताजा शिकायत से परे भी बाकी हालात की भी जांच करे। 

(Daily Chhattisgarh) 

सेम सेक्स मैरिज केस, वकील क्यों दहशत में?

 24 अप्रैल, 2023  

 

सुप्रीम कोर्ट में सेम सेक्स मैरिज नाम से चर्चित मुकदमे की सुनवाई के बीच में कल वकीलों के देश के सबसे बड़े संगठन, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक प्रस्ताव मंजूर करके सुप्रीम कोर्ट को भेजा है कि इस मामले की सुनवाई बंद की जाए, और इसे कानून बनाने वाली संसद के लिए छोड़ा जाए। इस संगठन का कहना है कि यह बहुत संवेदनशील मामला है, और इसके सामाजिक, धार्मिक, और सांस्कृतिक पहलू हैं, इसलिए इस पर विस्तृत विचार-विमर्श जरूरी है। काउंसिल का कहना है कि देश के 99.9 फीसदी से अधिक लोग समलैंगिक विवाह के खिलाफ हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि मानव सभ्यता और संस्कृति बनने के बाद से विवाह को आमतौर पर मंजूर किया गया है, और आगे जन्म बढ़ाने और मनोरंजन के लिए लोगों को पुरूष और महिला के रूप में बांटा गया है। काउंसिल का कहना है कि इस पर कोई अदालती फैसला विनाशकारी होगा। वकीलों के इस संगठन के मुताबिक अधिकांश आबादी का मानना है कि याचिकाकर्ताओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला देश के सामाजिक, सांस्कृतिक, और धार्मिक ढांचे के खिलाफ जाएगा। 

हमारी याददाश्त में वकीलों के संगठन का यह एक बहुत ही अभूतपूर्व कदम है कि वे किसी मामले की सुनवाई न करने की अपील सुप्रीम कोर्ट से कर रहे हैं। मामले की सुनवाई चल रही है, और मुख्य न्यायाधीश सहित पांच जजों की एक संविधानपीठ इसे सुन रही है। मुख्य न्यायाधीश ने केन्द्र सरकार के वकील से जो सवाल किए हैं, और सुनवाई के दौरान उन्होंने जो बातें कही हैं, उन्हें देखते हुए वकीलों के इस संगठन को शायद ऐसा अंदाज लग रहा है कि यह फैसला सेम सेक्स मैरिज के पक्ष में भी जा सकता है, इसलिए सरकार भी कुछ विचलित दिख रही है, और बार भी। बार तो वकीलों का एक पेशेवर संगठन है, और उसे इस मामले के संवैधानिक और कानूनी पहलुओं तक अपनी दिलचस्पी को सीमित रखना था। अगर कोई मामला अदालत के वकीलों से जुड़े हुए किसी पहलू का होता, तो भी उनकी यह अतिरिक्त सक्रियता और दिलचस्पी समझ आती। आज ऐसा लग रहा है कि अदालत के शुरुआती रूख से ही सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी की सोच कुछ बेचैन है। लोगों को याद होगा कि पिछले एक-दो बरस से केन्द्र सरकार के कानून मंत्री लगातार सार्वजनिक बयानों के रास्ते सुप्रीम कोर्ट पर हमला करते आए हैं, और अदालत को उसकी सीमाएं दिखाने की खुली कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की यह पहल न तो उनके पेशे से जुड़ी हुई है, और न ही देश में इस मुकदमे से कोई ऐसी नौबत आते दिख रही है जिससे कि वकालत के पेशे का नुकसान हो, उस पर कोई खतरा आए। जहां तक देश के लोगों से जुड़े हुए सार्वजनिक हित और महत्व की बात है, तो हर कुछ महीनों में ऐसे जलते-सुलगते मुद्दे सामने आते हैं, लेकिन हमने इस काउंसिल को इस तरह के प्रस्ताव पारित करते नहीं देखा है, इसलिए यह अटपटा भी है, और काउंसिल के मकसदों से बहुत अलग भी है। 

अब अगर वकीलों के लिखे हुए को देखें तो उनका संगठन अगर औपचारिक रूप से इतने गंभीर एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को कुछ लिख रहा है, तो उससे कम गंभीरता की उम्मीद तो हो नहीं सकती। यह बात हैरान करती है कि देश के वकीलों का यह सबसे बड़ा संगठन यह मान रहा है कि देश के 99.99 फीसदी से अधिक लोग सेम सेक्स के खिलाफ हैं। वकीलों से तो तर्कसंगत बात की उम्मीद की जाती है, फिर चाहे अपने मुवक्किल को बचाने के लिए वे न्यायसंगत बात न भी करें। यह बात तो किसी तरह तर्कसंगत नहीं है क्योंकि देश में ऐसा कोई सर्वे नहीं हुआ है जिससे पता लगे कि इतने फीसदी लोग सेम सेक्स मैरिज के खिलाफ हैं। दूसरी तरफ एक ऐसा अनुमान जरूर लगाया जाता है  कि एलजीबीटीक्यूआई-प्लस कहे जाने वाले तबके में आबादी के 10 फीसदी से अधिक लोग आते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान में ऐसी सेक्स-प्राथमिकताओं वाले लोगों की गिनती 10-15 करोड़ होनी चाहिए। लेकिन वकीलों का संगठन इनकी संख्या 0.1 फीसदी से भी कम बता रहा है क्योंकि वह सेम सेक्स मैरिज के विरोधियों को 99.99 फीसदी से अधिक बता रहा है। देश की संविधानपीठ से की जा रही अपील का अभूतपूर्व होने के साथ-साथ इस तरह बेबुनियाद होना भी कुछ हैरान करता है कि इसके पीछे मकसद क्या है।

यह जरूर है कि देश की सरकार वकीलों के ऐसे दबाव को पसंद कर सकती है क्योंकि इसका कोई असर अगर संविधानपीठ पर होता है, तो उससे सरकार अदालत में असुविधा से बच सकती है। हालांकि आज मोदी सरकार के हाथ संसद में जो अभूतपूर्व बाहुबल है, उसके चलते तो सरकार शायद सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को पलट भी सकती है, और अगर 99.99 फीसदी जनता सेम सेक्स मैरिज के खिलाफ है, तब तो सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए ऐसा फैसला फायदे का होगा क्योंकि फिर उसे पलटकर नया कानून बनाकर सरकार 99.99 फीसदी जनता को लुभा सकेगी। लेकिन सरकार की जो प्राथमिकता हो सकती है, उसके लिए उसके पास संसद है। अदालत ने आज उसे अपनी बात रखने का हक तो है ही। वकीलों का संगठन इस मामले में क्यों उतरा है, यह हैरान करता है। और सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने तस्वीरों सहित यह याद भी दिलाया है कि सैकड़ों बरस पहले के बने खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर सेम सेक्स की मूर्तियां अच्छी तरह कायम हैं, और भारत के लिए यह कोई नई बात नहीं है। हमको भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट किसी भी तरह वकीलों के संगठन के ऐसे अटपटे प्रस्ताव से प्रभावित नहीं होगा क्योंकि संविधानपीठ अगर इस तरह की बातों के प्रभाव में आने लगी, तब तो देश में न्याय व्यवस्था चल ही नहीं पाएगी। समलैंगिकता के खिलाफ समाज के एक तबके में हिकारत है, नफरत है, और उससे दहशत है। ऐसे होमोफोबिक समाज से भी अभी तक जिस तरह की आवाज नहीं उठी है, वैसी आवाज बार काउंसिल ऑफ इंडिया क्यों उठा रहा है, यह एक पहेली है। खैर, सुप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ अदालती सुनवाई से परे की ऐसी अपील पर शायद कोई गौर भी न करे, और वही बेहतर होगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक दक्षिणमुखी मजार थी, अब दक्षिणमुखी हनुमान...

 23 अप्रैल 2023

 

विश्व हिन्दू परिषद की एक चर्चित नेता, साध्वी प्रज्ञा का नाम अक्सर ही नफरती खबरों के साथ आता है। उनका ट्विटर अकाऊंट उन्हें भगवा क्रांति सेना की राष्ट्रीय अध्यक्ष बताता है, और आरएसएस की महिला शाखा राष्ट्रीय सेविका समिति का सदस्य भी। उन्हें ट्विटर पर सवा तीन लाख से अधिक लोग फॉलो करते हैं, जिनमें बहुत से प्रमुख नेता, और टीवी पत्रकार भी हैं। इसलिए वे जो लिखती हैं, और पोस्ट करती हैं, उनसे गंभीरता से लेना ही चाहिए। 

अभी उनकी ताजा पोस्ट कल शाम की ही है जिसमें उन्होंने लिखा है- पिछले कुछ दिनों में भिवानी (हरियाणा) में विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा अवैध मजारों को हटाकर मंदिर की जमीन खाली कराई गई है, इन जगहों पर मंदिर निर्माण के लिए अपने सामथ्र्य अनुसार आर्थिक सहयोग करने की कृपा करें। उन्होंने मजार की फोटो, मजार खोदकर हटाने की फोटो, और वहां पर उसी शेड में नया चबूतरा बनाकर बजरंग बली बिठा देने की तस्वीरें पोस्ट की हैं। अगर किसी प्रदेश में कानून का राज है, तो यह नौबत भयानक लग सकती है कि किसी एक धर्म से जुड़ी हुई मजार को इस तरह साम्प्रदायिक कार्रवाई से हटाकर, वहां पर बजरंग बली स्थापित किए जा रहे हैं, और उसका एक दावा भी किया जा रहा है। लेकिन जहां कानून का राज न हो, वहां इसे ही इंसाफ भी कहा जा सकता है। इस ट्वीट में साध्वी प्राची ने विश्व हिन्दू परिषद के बैंक अकाऊंट डिटेल्स भी दिए हैं जहां पर पैसा जमा किया जा सकता है।

यह जरूर है कि साध्वी प्राची की इस ट्वीट पर जहां कुछ लोगों ने तारीफ की है, वहीं बहुत लोगों ने इसकी आलोचना भी की है। कुछ हिन्दुओं ने लिखा है, विश्व हिन्दू परिषद क्या कोई इंफोर्समेंट एजेंसी है? ये कहो कि भाजपाई गुंडों ने जमीन कब्जा करके वहां भीख मांगने के स्पॉट बनाए हैं। एक और ने लिखा है- इन फर्जी ठेकेदारों के अनुसार कोई दलित मंदिर चला जाए तो मंदिर अपवित्र हो जाता है, लेकिन मजार तोडक़र कब्र के ऊपर बना मंदिर पवित्र होगा। एक ने लिखा है मजार थीं अवैध थीं, उनको कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा तोडक़र मंदिर बनाया जाएगा तो वे अवैध नहीं रहेंगे। एक और हिन्दू महिला ने लिखा है- तुम्हें बॉयकाट करने की अच्छी रकम मिलती होगी, खुद दे दो, हम सबसे क्यों मांग रही हो, एक धर्म को नीचा दिखाकर दूसरे को ऊंचा बताने वाले दोगले लोग नहीं हैं हम। एक ने लिखा है रोजगार और विद्या मंदिर को मत दो, मुफ्तखोरों को ही धर्म की आड़ में मंदिर बनाने को दो। एक सनातनी हिन्दू ने लिखा है- चार दीवारी और छत का खर्चा बच गया। एक और हिन्दू ने लिखा है- अब मंदिर अवैध नहीं होगा न प्राची ताई? एक ने लिखा है- क्या दिन आ गए हैं कि आज बीजेपी राज में मंदिर बनाने के लिए मजार तोडऩी पड़ रही है। 

एक और हिन्दू ने लिखा है अंधभक्तों मजारों में मूर्तियां स्थापित करके हिन्दू राष्ट्र बनाने में लगे हैं। एक ने लिखा है- इसे कहते हैं एक बीमारी हटाकर दूसरी बीमारी पाल लेना। एक हिन्दू ने लिखा है-बहुत ही सराहनीय काम किया है, अन्य प्रदेशों में बजरंग दल के भाई इससे प्रेरणा लें, और अवैध मजारें और मंदिरें ध्वस्त करें। एक और हिन्दू का लिखना है-ये ससुरे पढ़े-लिखे होते तो आज मजारों और मूर्तियों के पीछे पढऩे की जरूरत नहीं होती। एक ने लिखा है-रामनाम जपना पराया माल अपना, शायद यही तुम्हारा धर्म है। एक ने लिखा है-इतनी नीच सोच कैसी आती है तेरे दिमाग में। एक हिन्दू ने लिखा है-मैं किसी भी धार्मिक स्थल बनाने के लिए गाली के सिवाय कोई सहयोग नहीं दे सकता। एक और हिन्दू ने लिखा है-धर्म की दलाली मस्जिद हटाओ मंदिर बनाओ चंदाजीवी। 

हमने यहां पर मुस्लिमों की लिखी हुई टिप्पणियां नहीं लिखी हैं क्योंकि उनसे एक तनाव खड़ा हो सकता है। अब तनाव तो इन हरकतों से भी खड़ा हो सकता है जो कि साध्वी प्राची वहां कर रही हैं। लेकिन राज भाजपा का है इसलिए फिलहाल वहां कोई कुछ बोलते नहीं दिख रहा। लेकिन यह सोचकर तरस आती है कि बजरंग बली के नसीब में अब किसी मजार के ऊपर बैठना लिखा है। इस तथाकथित हिन्दू राष्ट्र में हिन्दी देवी-देवताओं के लिए जगह की मानो कमी पड़ गई है, और मस्जिद या मजार को तोडक़र उन्हें बिठाया जा रहा है। एक बार फिर यह याद दिलाने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश में हेट-स्पीच के खिलाफ जो कड़े हुक्म दिए हैं, वे ऐसी स्पीच पर भी लागू होते हैं जो कि साध्वी प्राची ने पोस्ट की है, और जो उनके साथ के बजरंगी वहां पर कर रहे हैं। अब यह सुझाना हमें खुद ही कुछ नाजायज लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में दखल देनी चाहिए, और हरियाणा सरकार को कटघरे में बुलाना चाहिए। यह भी लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को न्यायमित्रों की तरह देश में एक निगरानी कमेटी बनानी चाहिए जिसके लोग सोशल मीडिया और अखबार-टीवी पर नफरती बातों की निगरानी करें, और उन्हें अदालत के सामने रखते जाएं ताकि उन पर अफसरों और नेताओं से, और नफरती लोगों से जवाब-तलब हो सके। 

हिन्दुस्तान एक अभूतपूर्व साम्प्रदायिकता से गुजर रहा है, और न सिर्फ हिन्दूवादी ताकतें, बल्कि कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्षता के दावे वाली पार्टी भी जगह-जगह अपने नर्म-हिन्दुत्व का प्रदर्शन करने के लिए एक पैर पर खड़ी दिखती है। कांग्रेस के बड़े दिग्गज नेता आपस में यह कहते दिखते हैं कि पार्टी पर से हिन्दूविरोधी होने का लेबल हटाना है। लेकिन ऐसा लेबल हटाते हुए ये बड़े-बड़े नेता जो कि गांधी और नेहरू के नाम का खाते हैं, वे मुस्लिमों को नामौजूद मानने पर उतारू हैं, और अपने कांग्रेसी होने का तो दावा करते ही हैं। यह नौबत इस देश को हिन्दू राष्ट्र की कोशिशों की तरफ बढ़ा रही है। ऐसा लगता है कि आज भाजपा और दूसरी हिन्दुत्ववादी ताकतें अगर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की घोषणा कर दें, तो आधे कांग्रेसी नेता उसके साथ रहेंगे कि कहीं ऐसा न करने पर उन्हें कम हिन्दू न समझ लिया जाए। लोगों ने धर्मनिरपेक्षता की रीढ़ की हड्डी निकलवाकर उसे दफना दिया है, और वे हिन्दुत्व की नदी के बहाव में सहूलियत के साथ बहते जा रहे हैं, जितनी सहूलियत से कोई मुर्दा बह सकता है, उससे अधिक सहूलियत से आज कांग्रेस के लोग बह रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे में ईमानदारी से धर्मनिरपेक्ष रहने वाले लोगों को खुद कांग्रेस के भीतर हाशिए पर किया जा रहा है क्योंकि वे लुभावनी साम्प्रदायिक राजनीति की राह पर रोड़े से अधिक कुछ नहीं लग रहे हैं। 

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के आज के हालात में ऐसे कांग्रेसी नेता पार्टी को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से हटा रहे हैं। ऐसा लगता है कि खुद राहुल गांधी आज कांग्रेस में ताकतवर नेताओं के बीच बिल्कुल अल्पसंख्यकों में रह गए हैं, और बहुसंख्यक लोग देश की बहुसंख्यक-साम्प्रदायिक राजनीति में शामिल हैं, और कांग्रेस में रहते हुए राहुल को बर्दाश्त भर कर रहे हैं। अगर राहुल गांधी अलग-अलग प्रदेशों में अपनी ही पार्टी के लोगों का नर्म-हिन्दुत्व बारीकी से देखेंगे, तो इस पार्टी से ही उनका मन भर जाएगा। लेकिन जिन लोगों को आज हिन्दुत्व की राजनीति एक बेबसी लग रही है, उसे करना सुहावना लग रहा है, वे लोग जान लें कि जिस दिन हिन्दुत्व के नाम पर लोगों को वोट देना रहेगा, वे हिन्दुत्व की खालिस पार्टी भाजपा को ही वोट देंगे, हिन्दुत्व की बी, सी, या डी टीम को नहीं। फिलहाल देश भर में ऐसी जो साम्प्रदायिकता हो रही है, उसमें चुप रहने वालों का नाम भी इतिहास में दर्ज हो रहा है, और वक्त की नदी में मुर्दों की तरह बहने वाले मौन लोगों का भी। आज सत्ता और राजनीति की हुआ-हुआ में समझदारी की बात बहुतों को सुनाई भी नहीं देगी, लेकिन इतिहास सबका हिसाब रखेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

सोशल मीडिया पर रोक और पहुंच घटने की बातों के पीछे कारोबारी साजिश भी मुमकिन

 23 अप्रैल, 2023

  

पढ़े-लिखे लोग चाहे मामूली ही हों, टेक्नालॉजी, सोशल मीडिया, और मुफ्त के मैसेंजरों की मेहरबानी से लोगों की सक्रियता देखते ही बनती है। कोई भी घटना कहीं भी होती है, किसी का एक बयान आता है, तो उस पर  हजारों लाखों प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। अब अभी ट्विटर पर जाने-पहचाने, नामी-गिरामी लोगों को मिले हुए ब्ल्यूटिक नीले निशान को खत्म किया गया, और उसे सिर्फ माहवारी भाड़ा देने वाले लोगों के लिए रखा गया, तो बड़ा बवाल हुआ। अमिताभ बच्चन तक ट्विटर के सामने गिड़गिड़ाते रहे, और हाथ-पैर जोडक़र ब्ल्यूटिक चालू रखने की मांग करते रहे। इस मांग का समर्थन करते हुए अमिताभ को टैग करते एक ने लिखा-और अगर ई एलन मस्कवा फिर भी ना सुनी, तो एकरे दफ्तर के पिछवाड़े बमबाजी भी होय सकत है, अभी ओका समझ में नै आवा कि हम इलाहाबादी कुछ भी कर सकित है। यह धमकी अमिताभ बच्चन की मजाकिया गिड़गिड़ाहट में की गई एक गंभीर मांग के समर्थन में दी गई थी, और एलन मस्क मानो देवनागरी न समझ पाए, तो इसी बात को रोमन हिज्जों में भी लिखा गया था, और उसमें एलन मस्क को दो शब्द जरूर समझ में आए होंगे, एक तो खुद का नाम, और दूसरा उसके ऑफिस के पीछे बम्बार्डमेंट। नतीजा यह हुआ कि ऐसे इलाहाबादी अभिषेक उपाध्याय का ट्विटर अकाऊंट सस्पेंड कर दिया गया। अब उनके लाख से अधिक फॉलोअर हैं, लेकिन इस बात का भी कोई रूतबा एलन मस्क पर नहीं पड़ा क्योंकि उसे यह कारोबार भी चलाना है, इलाहाबादी अमरूद नहीं बेचने हैं। 

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के तौर-तरीकों से असहमत लोग भी बढ़ते चल रहे हैं। बहुत से लोगों को बार-बार फेसबुक या ट्विटर पर ब्लॉक भी कर दिया जाता है, किसी को टिप्पणी करने से रोका जाता है, किसी की पोस्ट हटा दी जाती है, क्योंकि ये प्लेटफॉर्म उनकी बातों को, उनकी पोस्ट की गई फोटो को अपने नियमों और पैमानों के खिलाफ पाते हैं। फिर जब हर घंटे करोड़ों पोस्ट होनी है, और हिंसा बढ़ाने, नफरत फैलाने की तोहमत लगनी है, तो जाहिर है कि इन्हें कुछ तो सावधानी बरतनी ही है। यह एक अलग बात है कि इनकी सावधानी के तौर-तरीके बहुत काम के नहीं हैं क्योंकि नफरत की अधिकतर बातें तो इन तमाम प्लेटफॉर्म पर राज कर रही हैं, हिंसा की धमकियां तैर रही हैं, लेकिन कुछ लोगों के अकाऊंट ब्लॉक हो रहे हैं, और उनकी पहुंच भी कहा जाता है कि सीमित कर दी जा रही है। इस बात को समझने की जरूरत है क्योंकि जब तक भी, जिस हद तक भी सोशल मीडिया लोकतांत्रिक आवाज को जगह देंगे, तब तक उसका इस्तेमाल करने में ही समझदारी है। 

बहुत से लोगों का यह मानना है कि फेसबुक या ट्विटर पर उनकी पोस्ट की पहुंच को घटा दिया जा रहा है। ऐसा कहने वाले अधिकतर लोग साम्प्रदायिकता विरोधी, धर्मान्धता, और कट्टरता के विरोधी दिखते हैं। और जब ऐसे लोगों को अपनी पहुंच कम होने का अहसास होता है, तो यह जाहिर है कि इसके पीछे कैसी सोच की दिलचस्पी हो सकती है। अब वह सोच फेसबुक या ट्विटर, या इंस्टाग्राम पर किस तरह का असर खरीद सकती है, यह एक अलग कल्पना और जांच का मुद्दा है। दुनिया की बहुत सी लोकतांत्रिक ताकतों का यह मानना है कि सोशल मीडिया आज पूरी तरह बिकाऊ है, तरह-तरह की साजिशों में भागीदार है, वह किसी देश में जनमत को प्रभावित करने के लिए ठेके पर काम करने के अंदाज में अपने कम्प्यूटरों का इस्तेमाल करता है। इन बातों को बाहर बैठे हमारे सरीखे लोग साबित नहीं कर सकते, लेकिन इन कंपनियों से निकले हुए जो कर्मचारी हैं वे कई बार लोकतंत्र के हित में भीतर की साजिशों के खिलाफ बयान देते हैं जिन पर अमरीका जैसे देश में जांच भी चल रही है। अब जब तक ऐसी किसी जांच का कोई नतीजा निकले, तब तक तो ऐसी साजिशें अगर हैं, तो वे जारी रहेंगी, और हो सकता है कि इसकी नई तरकीबें भी बनती चल रही हों। 

दुनिया में सोशल मीडिया को लोकतंत्र के एक सबसे बड़े औजार की तरह देखा जा रहा था। अधिकतर लोगों के लिए यह आज भी है। यह एक अलग बात है कि ताकतवर तबकों की सोच के खिलाफ चलने वाले लोगों को किनारे करने के लिए सरकार और कारोबार की ताकत पर्दे के पीछे से काम जरूर करती होगी। हो सकता है कि यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के मैनेजमेंट को खरीदने के स्तर पर हो, या यह भी हो सकता है कि वहां पर शिकायत दर्ज कराने के जो तरीके हैं, उनका इस्तेमाल करते हुए भाड़े के साइबर-सैनिक अगर कुछ लोगों के खिलाफ लगातार शिकायत दर्ज करते होंगे, तो भी सोशल मीडिया मैनेजमेंट ऐसे लोगों की पहुंच को कम करता होगा। यही वजह है कि हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ लिखने वाले लोगों की पहुंच कम होते रहती है, उन्हें ब्लॉक किया जाता है। हो सकता है कि साम्प्रदायिक ताकतों की फौज लगातार इनके खिलाफ झूठी शिकायतें करती हों, और उसके असर में इन्हें ब्लॉक किया जाता हो, इनकी पहुंच घटाई जाती हो। यह तो हम बहुत जाहिर तौर पर दिखने वाले तरीकों की बात कर रहे हैं, इससे परे भी बहुत से ऐसे तरीके इंटरनेट और ऑनलाईन दुनिया पर हो सकते हैं जो कि किसी की साख को घटा सकें, किसी की विश्वसनीयता को कम कर सकें, और फिर सोशल मीडिया के कम्प्यूटर इंटरनेट पर लिखी ऐसी बातों, ऐसी तोहमतों का नोटिस लेकर खुद ही कुछ लोगों का दायरा बांधते हों। 

फेसबुक और ट्विटर पर पहुंच घटा देने की शिकायत आम हैं, लेकिन इस कंपनी का मालिक मार्क जुकरबर्ग खुद टेलीफोन कॉल पर सुनकर एक-एक की पहुंच नहीं घटाता, यह कम्प्यूटरों के जिम्मे का काम है जिसमें इंसानी दखल रहता जरूर है, लेकिन इन दोनों को प्रभावित करने के लिए पर्दे के पीछे से बहुत बड़ी-बड़ी साजिशें होती होंगी, उसके बारे में भी सोचना चाहिए। जो बहुत जाहिर तौर पर दिखता है, आज के वक्त में उससे बहुत अलग भी बहुत कुछ पर्दे के पीछे होता है। सोशल मीडिया नाम के कारोबार में सोशल सिर्फ दिखावे का है, और जो शब्द कारोबार दिखता भी नहीं है, वही असली खिलाड़ी है, और उसी के हाथों में कठपुतलियों के धागे हैं। हो सकता है कि ऐसी कंपनियों से निकले हुए कुछ लोग आगे सुबूतों के साथ इनकी नीयत का भांडाफोड़ करें, लेकिन जब तक सोशल मीडिया नाम का यह कारोबार रहेगा, तब तक उसमें कारोबारी साजिश का खतरा बने ही रहेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

इतने बड़े पैमाने पर हो रहे हैं साइबर-जुर्म कि बस...


  22 अप्रैल, 2023

   

दिल्ली पुलिस ने अभी बंगाल से जालसाजों के एक गिरोह को पकड़ा है जो कि फर्जी नामों से सिमकार्ड जारी करवाकर झारखंड के कुख्यात जामताड़ा के जालसाजों को देते थे, और वहां से वे देश भर में उससे ठगी करते थे। हैरानी की बात यह है कि बंगाल के जिस आदमी को पुलिस ने अपने घेरे में लिया उसके पास से 22 हजार सिमकार्ड मिले हैं जिनमें से अधिकतर हिन्दुस्तान के थे, लेकिन उनमें बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, और श्रीलंका के सिमकार्ड भी थे। जामताड़ा के जालसाज बड़ी-बड़ी कंपनियों और बैंकों के नकली वेबसाइट बनाकर ऐसे सिमकार्ड के नंबर उस पर पोस्ट करते थे, और फिर कस्टमर केयर बनकर फोन करने वाले ग्राहकों को ठगते थे। मिलते-जुलते नामों वाली  असली सरीखी दिखने वाली वेबसाइटें बनाना एक अलग किस्म का जुर्म था, और इसका कोई भी हिस्सा इंटरनेट पर कई तरह की जानकारी डाले बिना पूरा नहीं हो सकता था। अब सवाल यह उठता है कि देश की बड़ी-बड़ी मोबाइल कंपनियां केन्द्र सरकार के नियमों के मुताबिक कई तरह की शिनाख्त पाने के बाद ही सिमकार्ड दे सकती हैं, इसी तरह इंटरनेट कनेक्शन और वेबसाइट के डोमेन नेम भी कई तरह की शिनाख्त के बाद ही हो पाते हैं। निपट अनपढ़ लोग भी जामताड़ा की जालसाजी की परंपरा से सरकार और कारोबार की ऐसी सभी जांच को पार करते दिख रहे हैं, और एक-दो मामलों में नहीं, रोजाना हजारों मामलों में। 

हिन्दुस्तान में साइबर अपराधी जब लूट का माल ठिकाने लगा चुके रहते हैं, तब पुलिस लाठी लेकर उनके पांवों के निशान पीटते दिखती है। अभी दिल्ली पुलिस ने बंगाल जाकर जो गिरफ्तारी और जब्ती की है, वह सिलसिला भी यही मुजरिम साल भर से अधिक से चला रहे थे। हर दिन वहां का एक-एक जालसाज नौजवान दर्जनों लोगों को ठगता है, और उस किस्म के हजारों लोग वहां से काम करते हैं। उस इलाके की शिनाख्त इतनी अच्छी तरह हो चुकी है कि सरकारी एजेंसियां चाहें तो उस गांव से निकलने वाले हर मोबाइल और हर इंटरनेट सिग्नल को जालसाजी का मानकर उस पर निगरानी रख सकती हैं, लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा होता नहीं है। सरकार का पूरा का पूरा तंत्र जुर्म के बाद की जांच तक सीमित है, जुर्म के पहले निगरानी रखकर लोगों को बचाने के मामले में सरकार बिल्कुल बेअसर है। और यह बात सिर्फ केन्द्र सरकार की नहीं है, उस प्रदेश सरकार के बारे में भी सोचना चाहिए जिसके तहत जामताड़ा आता है, और जहां से देश भर में हर दिन दसियों हजार लोग ठगे जाते हैं। जहां एक गांव इंटरनेट और साइबर जालसाजी को कुटीर उद्योग की तरह चला रहा है, जिस पर फिल्में बन रही हैं, उसकी इतनी पुख्ता पहचान के बाद भी सरकार वहां कुछ नहीं कर पा रही है, यह बेबसी समझ से परे है।
भारत में और इसके प्रदेशों में जुर्म की जांच के लिए बहुत सी एजेंसियां हैं। लेकिन संभावित जुर्म को रोकने के लिए निगरानी रखने की एजेंसियां बिल्कुल नहीं हैं। जबकि निगरानी रखने की एजेंसी होती, तो वह जुर्म हो जाने के बाद की जांच एजेंसी के लिए भी मददगार रहती। जुर्म की जांच करने के बाद मुजरिम पकड़े जाने पर भी उनकी ठगी या लूटी गई रकम तो बरामद नहीं हो पाती है। इसलिए इस देश को एक मजबूत निगरानी एजेंसी की जरूरत है, जो राष्ट्रीय स्तर पर अपना काम करे, और राज्य भी अपने स्तर पर ऐसी एजेंसी बना सकते हैं जो कि चर्चा और खबरों से, मुजरिमों और खबरियों से मिली जानकारी के आधार पर मुजरिमों को जुर्म करने के पहले ही, या जुर्म करते ही दबोच सके। हिन्दुस्तान में खुफिया एजेंसियां जो निगरानी करती हैं, वे राजनीतिक, आंतरिक सुरक्षा से जुड़े आतंक सरीखे मामलों की रहती हैं, ठगी-जालसाजी, चिटफंड और मार्केटिंग जैसे मामले लोगों के लुट जाने के महीनों बाद सामने आते हैं, तब तक हाथ आने लायक कुछ बचता नहीं है। 

अभी जिस तरह एक मुजरिम से 22 हजार सिमकार्ड मिले हैं, उन्हें देखते हुए मोबाइल कंपनियों पर भी कार्रवाई की जरूरत है जो कि गलाकाट बाजारू मुकाबले में बिना जांच-पड़ताल सिमकार्ड बेचने में लगी रहती हैं। अगर संगठित अपराध जगत इस हद तक, इतनी आसानी से सिमकार्ड हासिल कर सकता है, तो फिर ग्राहकों की जांच-पड़ताल का पूरा सिलसिला ही बोगस साबित होता है। यह मामला, और इससे जुड़ा जामताड़ा का मामला ऐसा है कि जांच एजेंसियों को इन मुजरिमों को ले जाकर देश के बड़े पुलिस-प्रशिक्षण संस्थानों में अफसरों की इनसे ट्रेनिंग करवानी चाहिए ताकि वे अपराध करने के तरीकों को समझ सकें, और बाद में दूसरे मुजरिमों को पकड़ सकें। 

हिन्दुस्तान बड़ी तेजी से एक डिजिटल इकॉनॉमी के रास्ते पर धकेल दिया गया है। अब हर मोबाइल फोन लोगों का बैंक बन चुका है, और उस पर पैसे आ भी रहे हैं, और उससे जा भी रहे हैं। लोग इंटरनेट का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने लगे हैं, और अधिकतर कारोबार किसी भी तरह की ग्राहक सेवा इंटरनेट के रास्ते ही देता है। ऐसे में आम ग्राहक किसी तरह से भी इन औजारों के इस्तेमाल से नहीं बच सकते। सरकार को ही साइबर-निगरानी बढ़ानी होगी वरना घर बैठे एक मोबाइल फोन से, एक कम्प्यूटर से जुर्म करने का आसान सिलसिला और नए मुजरिम बनाते ही चलेगा।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

ऐसी मौतों के इर्द-गिर्द भी इंसान ईश्वर में मगन

 21 अप्रैल, 2023

   मध्यप्रदेश के सतना की खबर है कि बुरी तरह कर्ज में डूब गए एक पिता ने पैर खो चुकी अपनी जवान बेटी के इलाज से थककर खुदकुशी कर ली।  छह साल पहले यह लडक़ी एक सडक़ हादसे में दोनों पैर से लाचार हो गई थी, और बिस्तर पर ही थी। तीन बच्चों में से इस एक बेटी का इलाज कराते हुए पिता के घर-दुकान बिक गए, और कर्ज चढ़ गया, मकान किराया साल भर से देना नहीं हुआ, पिता ने हाल ही में खून बेचकर खाने और गैस सिलेंडर का इंतजाम किया था, और अब आखिर में उसने इस बेटी को फोन करके कहा कि वह थक गया है, और आत्महत्या कर रहा है। इसके पहले कि लोग उसे ढूंढ पाते, उसने ट्रेन के सामने खुदकुशी कर ली। अब यह कल्पना भी मुश्किल है कि ऐसे पिता के रहते हुए जो घर नहीं चल पा रहा था, तीन बच्चों वाला वह परिवार अब क्या तो इलाज करा पाएगा, और क्या जी पाएगा।
इस मामले को देखकर लगता है कि ईश्वर भी कुछ परिवारों पर अधिक मेहरबान रहता है, और यह वैसा ही एक परिवार है, या शायद यह कहना बेहतर होगा कि था, अब उसे बचा हुआ परिवार क्या माना जाए। और यह उस मध्यप्रदेश की बात है जिसमें तीन बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हर लडक़ी को अपनी भांजी बताते हैं, हर महिला को बहन कहते हैं, और ऐसी निजी रिश्तेदारी बताते हुए ही वे राजनीति करते हैं। उनकी अनगिनत योजनाएं कन्याओं के नाम पर हैं, लेकिन जाहिर है कि किसी हादसे की शिकार ऐसी गंभीर जख्मी लडक़ी के इलाज का कोई सरकारी इंतजाम नहीं रहा होगा, तभी पिता का घर बिक गया, दुकान बिक गई, और कर्ज लद गया। बात थोड़ी अटपटी इसलिए भी है कि आज केन्द्र सरकार और अलग-अलग राज्य सरकारों की बहुत किस्म की इलाज-बीमा योजनाएं हैं जिनके तहत ऐसी लडक़ी का भी इलाज होना चाहिए था, लेकिन अमल में कोई कमी-कमजोरी दिखती है जो कि यह परिवार इलाज और मदद नहीं पा सका।
दुनिया के विकसित देशों में हर किस्म का बीमा रहता है। इलाज के लिए, हादसे से निपटने के लिए, किसी और किस्म के नुकसान की भरपाई के लिए। ऐसा इसलिए भी रहता है कि सरकारें अपने ऊपर मदद करने की बहुत जिम्मेदारी नहीं लेती हैं। मुसीबत में आने पर उससे उबरने को जिंदगी का एक हिस्सा मानकर ही लोगों पर ही यह छोड़ा जाता है कि वे हर तरह का बीमा कराकर रखें। इसीलिए अमरीका जैसे देश में जब तूफान से पूरे के पूरे शहर उजड़ जा रहे हैं, तो सरकार को हर किसी की पूरी मदद नहीं करनी होती, जो कि मुमकिन भी नहीं रहेगी। अब हिन्दुस्तान जैसे देश में यह कल्पना कुछ मुश्किल है कि जिन लोगों का आज खाने-कमाने का ठिकाना नहीं है, वे कई किस्म के बीमे करवाकर रखें। इसके बाद बीमा कंपनियां तो विकसित दुनिया में भी बेईमानी के लिए बदनाम हैं, और उनसे लंबी कानूनी लड़ाई लडऩे की नौबत आते रहती है। इसलिए ब्रिटेन जैसे देश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा एक बड़ा मुद्दा है, और तमाम गरीब और मध्यमवर्गीय लोग उस पर टिके रहते हैं।
हिन्दुस्तान में मुफ्त इलाज के लिए सरकारों ने कई तरह के इंतजाम किए हैं, और अधिकतर लोगों को कुछ या अधिक हद तक उसका फायदा भी मिल जाता है। जहां से ऐसी खबरें आती हैं, उनकी तुरंत जांच संबंधित सरकारों को करवानी चाहिए कि इलाज-बीमे के इंतजाम में क्या कमी रह गई थी, या सरकारी योजना में कहां कमजोरी रह गई है। कल की ही बात है ट्विटर पर ओडिशा की एक तस्वीर आई है जो कि दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने पोस्ट की है। यह एक वीडियो है जिसमें 70 साल की एक बुजुर्ग महिला प्लास्टिक की एक कुर्सी को सामने बढ़ा-बढ़ाकर उसके सहारे से धूप में नंगे पैर चलते हुए बैंक जा रही है। उसे हर बार पेंशन (शायद सामाजिक पेंशन) लेने इसी तरह जाना पड़ता है, और उसके जर्जर बदन को देखें, तो हैरानी होती है कि वह और कितने बार ऐसा सफर कर सकेगी? पेंशन को लेकर चारों तरफ से ऐसी खबरें आती हैं, कुछ सौ रूपये महीने की सामाजिक पेंशन के लिए भी लोगों को ऐसी अमानवीय नौबत से हर महीने गुजरना पड़ता है।
सरकारों में ऐसी संवेदनशीलता होनी चाहिए कि मरीजों, बुजुर्गों, बच्चों, महिलाओं, और विकलांगों की जरूरतों का खास ख्याल रखा जाए। ये गिनती में कम रहते हैं, बहुत संगठित नहीं रहते हैं, अपनी हालत की वजह से ये किसी आंदोलन या प्रदर्शन के लायक भी नहीं रहते हैं, लेकिन सरकार और समाज को इन्हें प्राथमिकता देनी चाहिए। ये दोनों ही खबरें विचलित करती हैं, और ये तकलीफदेह चाहे जितनी हों, ये बहुत अनोखी नहीं हैं, देश में जगह-जगह ऐसी नौबत है, और जहां कहीं अधिकारी-कर्मचारी संवेदनशील होते हैं वहां जरूर हालत बेहतर होती है। हर कुछ महीनों में ऐसी खबरें भी देखने मिलती हैं कि मौत के बाद शव घर ले जाने कोई गाड़ी नहीं मिल पाई तो लोग कंधे पर, या साइकिल पर शव लेकर लंबा-लंबा सफर सडक़ से करते रहे। ऐसी नौबत यह भी साबित करती है कि हिन्दुस्तानी समाज अपने आपको चाहे कितना ही धर्मालु कहे, वह बेरहमी में कम नहीं है। धर्म और बाबाओं के लिए तो लोगों की जेब से रकम निकल जाती है, लेकिन सबसे अधिक जरूरतमंदों के लिए मदद नहीं निकलती। सरकार से परे समाज को भी उस इंसानियत को पाने की कोशिश करनी होगी जिसकी बातें बड़ी-बड़ी होती हैं, लेकिन दर्शन नहीं होते हैं। जो परिवार एक बच्ची के इलाज में सब कुछ बेच चुका था, वह शहर में ही था, और उस शहर में कई संपन्न लोग भी होंगे, लेकिन मौत के पहले तक किसी ने इनके बारे में सोचा नहीं होगा। लोग ईश्वर की पूजा, धार्मिक बाबाओं की सेवा, बड़े-बड़े प्रवचन के बजाय असल जिंदगी के जरूरतमंदों का साथ देने की सोचें, तो शायद बहुत सी जिंदगियां बच सकती हैं।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

फैलते झूठ को रोकने फैक्ट-चेक से अधिक कार्रवाई की जरूरत..

 20 अप्रैल, 2023

  

हिन्दुस्तान और बाकी बहुत से देशों में भी जिस तरह समाचार-विचार की वेबसाइटें होती हैं, ठीक उसी तरह कई वेबसाइटें मीडिया में तैरते झूठ पकडऩे का काम करती हैं। होता यह है कि झूठ हमेशा सच से अधिक दिलचस्प होता है, और एक झूठ किसी ने पोस्ट किया, तो वह अधिक रफ्तार से आगे बढ़ाया जाता है। आज के मीडिया की अलग-अलग कई किस्में एक-दूसरे से मुकाबला करती रहती हैं, और इनके बीच झूठ के लिए चाह बड़ी अधिक रहती है। कुछ किस्म के झूठ तो गढ़े हुए होते हैं, यानी जो बयान किसी ने दिया नहीं, उसकी कतरन गढक़र फैला देना, और कुछ झूठ गलत लेबल लगाकर आगे बढ़ाए जाते हैं कि किसी नेता के साथ किसी की तस्वीर को किसी और खबर के साथ जोडक़र फैला देना। ऐसा किसी एक पार्टी के लोग ही करते हों ऐसा नहीं है, और ऐसा सोच-समझकर ही करते हों, ऐसा भी नहीं है। सोशल मीडिया पर आज बहुत से लोग अनजाने में भी किसी बात को आगे बढ़ा देते हैं, यह मानते हुए कि वह सच है। हर किसी को यह हड़बड़ी दिखती है कि वे अपने जान-पहचान के लोगों के सामने कुछ ऐसा पेश करें कि लोग उसे पसंद करें। लोगों की वाहवाही पाने की यह चाह भी बहुत से नावाकिफ लोगों को झूठ फैलाने में उलझा देती है। 

अब धीरे-धीरे बड़े समाचार संस्थानों ने भी फैक्ट-चेक नाम से समाचारों की जांच करना शुरू किया है, जो कि बहुत मुश्किल काम भी नहीं था। लेकिन सनसनी फैलाने पर आमादा तथाकथित मीडिया संस्थान सोच-समझकर अनजान बनकर झूठ फैलाते आए हैं, लेकिन अब वह धीरे-धीरे उजागर होने लगा है। आज भी हिन्दुस्तान में बहुत कड़ा आईटी कानून होने के बावजूद गढ़े हुए, और गलती से फैलाए गए झूठ पर कार्रवाई नहीं के बराबर हो रही है। फिर यह भी है कि किसी धार्मिक या राजनीतिक सोच से जुड़े हुए लोग अपने लोगों को अधिक जिम्मेदार बनाना भी नहीं चाहते। अगर तमाम लोग जागरूक और जिम्मेदार हो गए, तो फिर सडक़ों पर साम्प्रदायिक नारे लगाते हुए जुलूस निकालने के लिए भीड़ कहां से आएगी। इसलिए लोगों को मंदबुद्धि और बंदबुद्धि बनाए रखने में ही नेतागीरी चलाने की सहूलियत रहती है। यह भी एक वजह है कि कोई संगठन या कोई नेता अपने मातहत काम करने वाले लोगों को झूठ फैलाने से रोकते नहीं हैं। होता यह भी है कि जो सबसे कट्टर धर्मान्ध होते हैं, साम्प्रदायिक या हिंसक होते हैं, या जिनके मन में महिलाओं के प्रति भारी हिकारत रहती है, वैसे तमाम लोग सोशल मीडिया पर अधिक सक्रिय होते हैं, और बाकी किस्म के मीडिया में आए हुए झूठ को बड़ी रफ्तार से आगे बढ़ाते हैं। 

अब वक्त आ गया है कि प्रेस कौंसिल जैसे मीडिया संस्थान, या भारत में टीवी के लिए बनाए गए निगरानी-संगठन, या एडिटर्स गिल्ड जैसी पेशेवर संस्था को मीडिया और सोशल मीडिया पर तैरते झूठ के खिलाफ एक अधिक संगठित कार्रवाई करनी चाहिए। आज हालत यह है कि किसी बेकसूर को पूरी तरह से बदनाम कर दिया जाता है, लेकिन उनकी यह ताकत नहीं रहती कि वे अदालत तक जा सकें जो कि खर्चीला और तकलीफदेह दोनों ही होता है। दूसरी तरफ मीडिया संस्थानों के झूठ के खिलाफ देश में बने हुए संगठनों और संस्थाओं को काम करना चाहिए, और निजी स्तर पर जो झूठ फैलाया जा रहा है, उस पर सरकार या पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसा न होने पर सबसे सनसनीखेज झूठ इतना अधिक फेरा लगाते रहता है कि वह सच सरीखा दिखने लगता है। इस सिलसिले को रोकने की जरूरत है, और जब तक हर दिन ऐसे किसी बदनीयत झूठे को सजा नहीं मिलेगी, तब तक बाकी लोगों को सबक नहीं मिलेगा। 

हिन्दुस्तान में यह भी देखने में आता है कि धर्म और राजनीति से जुड़े हुए संगठनों के बड़े-बड़े पदाधिकारी नफरत और हिंसा को फैलाने के लिए भी कई किस्म का झूठ इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग चाहे किसी भी पार्टी के हों, उनके खिलाफ केस दर्ज होने चाहिए, और ऐसे मामलों को फैसलों तक तेजी से पहुंचाना चाहिए। आज हालत यह है कि इंटरनेट और कम्प्यूटरों की मेहरबानी से, मोबाइल फोन की वजह से झूठ तो पल भर में दुनिया भर में फैल जाता है, लेकिन उस पर कार्रवाई बरसों तक नहीं होती है। इसलिए आज साइबर अदालतों की जरूरत है ताकि आईटी एक्ट, और इस तरह के दूसरे मामलों की सुनवाई बेहतर तरीके से हो सके, और अधिक रफ्तार से हो सके। आज हालत यह है कि न तो पुलिस इन मामलों को ठीक से तैयार कर पाती है, न ठीक से सुबूत जब्त कर पाती क्योंकि उनकी ट्रेनिंग ही अब तक नहीं हो पाई है, और फिर सुबूत जब्ती में, किसी कम्प्यूटर-प्रयोगशाला की रिपोर्ट में जरा सी भी कमी रह जाने से मुजरिमों के वकील उन्हें बचा ले जाते हैं। आज सरकारों में अधिक जागरूकता की जरूरत है, दिक्कत यह है कि जो पीढ़ी सरकार चला रही है, उसका खुद का अपना कम्प्यूटर और इससे जुड़े हुए मामलों का ज्ञान और तजुर्बा कम है। कुल मिलाकर एक नई पीढ़ी की नई सोच की जरूरत इन नए किस्म के जुर्मों से निपटने के लिए है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बिलकिस बानो के गैंगरेप और 14 कत्लों के मुजरिम क्यों छोड़े, केन्द्र बताने तैयार नहीं!

 19 अप्रैल, 2023

  

गुजरात के कुख्यात बिलकिस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कल केन्द्र सरकार के साथ जो रूख दिखाया है, वह लोकतंत्र की मजबूती का एक सुबूत है। जब सरकार अपने किए पर इस हद तक अड़ जाए कि उसके अमानवीय, अनैतिक, और अलोकतांत्रिक फैसले भी अदालती नजरों से परे के हैं, और सरकार अदालत को यह नहीं बताएगी कि बलात्कार और 14 लोगों के कत्ल के मुजरिमों को सरकार ने किस आधार पर जेल से छोडऩा तय किया, तो वैसी हालत में अदालत में रीढ़ की हड्डी की जरूरत लगती है, और कल दो जजों की बेंच ने केन्द्र सरकार के साथ ठीक वही किया है। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान एक गर्भवती मुस्लिम महिला से बलात्कार और परिवार के 14 लोगों के कत्ल के मुजरिमों को गुजरात सरकार ने कुछ महीने पहले रिहाई के लायक मानकर छोड़ दिया, और उसके बाद उनका जमकर स्वागत चल रहा है। जब यह मामला नीचे की अदालतों से निराश होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा तो जजों ने सरकार से कहा कि वे फाईलें पेश की जाएं जो कि समय के पहले इन कैदियों को रिहा करने की बुनियाद थीं। अदालत ने इस बात पर भी टिप्पणी की कि इतना भयानक जुर्म होते हुए भी कुछ मुजरिमों को सजा के दौरान ही लंबे-लंबे पैरोल दिए गए। जजों ने सरकार को याद दिलाया कि यह कत्ल का आम मामला नहीं था जिसमें कि किसी कैदी को आचरण अच्छा होने से सजा पूरी होने के कुछ पहले रिहा कर दिया जाए। अदालत ने याद दिलाया कि यह एक गर्भवती महिला के साथ सामूहिक बलात्कार और उसके परिवार के 14 लोगों के कत्ल का मामला था जिसे आम जुर्म नहीं माना जा सकता। ऐसे में सरकार ने क्या सोचकर, फाईलों पर क्या लिखकर इन्हें रिहा किया है, वह तो अदालत देखना चाहेगी। जजों ने केन्द्र सरकार के वकील को चेतावनी भी दी कि उसे यह भी समझना चाहिए कि ऐसी रिहाई से वह देश को क्या संदेश देना चाहती है। अदालत ने सरकार को कहा कि इस रिहाई के वक्त सरकार ने कौन से तथ्य और तर्क इस्तेमाल किए हैं, और दिमाग का इस्तेमाल किया है या नहीं, इसे अदालत देखना चाहती है। इस मामले में 11 लोगों को उम्रकैद मिली थी, और सारे के सारे लोगों को अच्छा आचरण बताकर समय के पहले रिहा किया गया, जबकि उनके खिलाफ पैरोल पर बाहर आने पर शिकायतकर्ताओं को धमकाने की शिकायतें होती रही हैं। उसके बाद भी गुजरात सरकार और केन्द्र सरकार ने यह रिहाई की। जजों ने सरकार से यह सवाल भी पूछा कि ऐसे जुर्म को देखते हुए इन लोगों को 11 सौ दिनों से अधिक की पैरोल दी गई, जो कि तीन साल से अधिक की होती है, क्या आम कैदी को ऐसी पैरोल मिलती है? 

हम यहां पर अदालत की कही एक बात को आगे बढ़ाना चाहते हैं। जस्टिस के.एम.जोसेफ और जस्टिस बी.वी.नागरत्ना ने कहा कि ऐसी रिहाई करके सरकार बाकी देश को क्या संदेश देना चाहती है? जजों ने यह एकदम मुद्दों की बात पकड़ी है, और यह रिहाई इन 11 बलात्कारी-हत्यारों की ही नहीं थी, यह रिहाई इससे कहीं अधिक पूरे देश को यह बताने को थी कि गुजरात सरकार के साथ-साथ केन्द्र सरकार का भी लोगों के लिए क्या रूख है, जातियों के लिए, धर्मों के लिए, किसी एक धर्म के लोगों के खिलाफ धार्मिक आधार पर किए गए जुर्म को लेकर इन सरकारों का क्या रूख है? गुजरात के 2002 के दंगे सिर्फ गुजरात के लिए नहीं थे, उनका संदेश पूरे देश के लिए था, और वह संदेश गया भी, उसमें वक्त लगा, लेकिन देश की तमाम जनता ने उसके मतलब अपनी-अपनी तरह से, अपने-अपने लिए निकाल लिए थे। अब पहले गुजरात सरकार ने रिहाई का यह फैसला लिया, और फिर केन्द्र सरकार ने उसे मंजूर किया, और अब केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट से यह कह रही है कि वह रिहाई की फाईलें दिखाना नहीं चाहती, तो यह सब भी एक संदेश है। इस चिट्ठी को चारों तरफ पहुंचने में ये जज आड़े आ रहे हैं क्योंकि वे इस देश में न्यायपालिका की जिम्मेदारी को समझ रहे हैं, और उसे पूरी करने पर उतारू हैं। 

सरकारें चाहे वे किसी प्रदेश की हों, या देश की हों, उनमें अपने पहले की सरकार से और अधिक दुष्ट और भ्रष्ट होने का एक मिजाज बन ही जाता है, और वे उसी लाईन पर आगे बढ़ती रहती हैं। ऐसे में अगर अदालतों के जज अपने वृद्धावस्था पुनर्वास की संभावना पर लार टपकाते बैठे रहते हैं, तो वह मिजाज भी उनके फैसलों में साफ-साफ दिखने लगता है। किसी देश-प्रदेश में जब राज्य ही अराजक हो जाए, सरकारें मनमानी करने लगें, और वे जजों को तरह-तरह से प्रभावित करने पर आमादा भी रहें, तो वह नौबत भी आम लोगों को अब दिखने लगी है। इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से पहले भी उसके रूख को बारीकी से देखते हैं क्योंकि अगर आम जनता के बीच दूसरे लोकतांत्रिक तबके कोई जनमत नहीं बना पा रहे हैं, तो भी सुप्रीम कोर्ट के ऐसे रूख से जनमत को एक दिशा मिलती है। आने वाले दिनों में इस मामले में केन्द्र सरकार और क्या आना-कानी करती है, वह देखने लायक होगा, और अगर उसे लगता है कि अदालत की अवमानना करना भारी पड़ेगा, और वह फाईलें पेश करती है, तो वे फाईलें और अधिक देखने लायक होंगी।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल 2023


 (Daily Chhattisgarh)

मौसम की बढ़ती मार के खतरे समझने की जरूरत

 18 अप्रैल, 2023

  

अभी गर्मी शुरू हुई ही है, और आज की खबर कहती है कि देश के 9 राज्यों में लू चलने का खतरा है। मौसम विभाग ने बंगाल, बिहार, और आन्ध्र में भीषण गर्मी का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है, और ओडिशा, झारखंड, यूपी, और सिक्किम में हीट वेव का खतरा बताया है। पिछले बरस हिन्दुस्तान में गेहूं की फसल के दौरान इतनी बुरी लू चली थी कि गेहूं के दाने ठीक से नहीं बन पाए थे। इस पर लिखने की जरूरत इसलिए भी लग रही है कि अभी दो दिन पहले ही महाराष्ट्र में हुई एक बड़ी आमसभा में गर्मी से एक दर्जन लोग मारे गए, और सैकड़ों अस्पताल में भर्ती किए गए हैं। इसके पहले कभी भी ऐसी कोई आमसभा सुनाई नहीं पड़ती थी, किसी-किसी सभा में स्कूली बच्चों को देर तक खड़ा कर देने से उनके चक्कर खाकर गिरने की खबर जरूर रहती थी, लेकिन बड़े लोगों में इस तरह एक आमसभा में दर्जन भर मौतें अनसुनी, अनदेखी थीं। और आज की मौसम की भविष्यवाणी पर ही चर्चा की अधिक जरूरत नहीं है, क्योंकि अभी गर्मी के कम से कम 60 दिन बाकी हैं। और झारखंड में तो अगले दो दिनों में ही पारा 44 डिग्री से ऊपर जाने की भविष्यवाणी है, बिहार में बीते कल अधिकतर जगहों पर पारा 40 डिग्री पार कर चुका था।  उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में अतीक अहमद को मारने के लिए चलाई गई गोलियों से भी तापमान कुछ बढ़ा होगा, वहां पर कल 44.6 डिग्री सेल्सियस गर्मी रही।

अब इंसान तो फिर भी मौसम की भविष्यवाणी देख लेते हैं, और उस हिसाब से कूलर, वॉटरकूलर, और बाकी इंतजाम कर लेते हैं। लेकिन शहरी सडक़ों के जानवर, और जंगलों के जंगली जानवर बदहाल रहते हैं। उन्हें पीने के पानी का भी ठिकाना नहीं रहता है। जंगल में कुछ खाना नसीब हो इसकी गारंटी नहीं रहती है, और पानी की तलाश में हाथी से लेकर भालू तक, और शेर से लेकर तेंदुए तक गांवों मेें पहुंचते हैं, अधिकतर तो लोग उन्हें मारते हैं, और कभी-कभी अपनी जान बचाने के लिए वे भी लोगों को मारते हैं। शहरों में पेड़ कटते चले जा रहे हैं, धूप से खौल जाने वाले कांक्रीट के ढांचे बढ़ते जा रहे हैं, और पंछियों के रहने की जगह सिमटती चल रही है। बंगाल में ममता बैनर्जी ने, और त्रिपुरा की सरकार ने भी इस हफ्ते तमाम स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए हैं, और शायद ओडिशा में भी ऐसा ही फैसला हो रहा है। 

लेकिन दुनिया के पर्यावरण में और मौसम में जो बदलाव आ रहे हैं, उन्हें सिर्फ गर्मी से नहीं आंका जा सकता। दुनिया की बहुत सी जगहों में ऐसी बर्फबारी होती है जैसी किसी ने कभी देखी नहीं थी। अभी पिछले दो बरसों में योरप में ऐसी बाढ़ आई कि उसे किसी ने देखा नहीं था। हिन्दुस्तान के बगल का पाकिस्तान जिस तरह बाढ़ में डूबा, और महीनों तक डूबे रहा, उसके नुकसान से वह देश बरसों तक नहीं उबर सकेगा। इस तरह मौसम की सबसे बुरी मार न सिर्फ अधिक बुरी होती चल रही है, बल्कि वह अधिक जल्दी-जल्दी भी हो रही है, अधिक जगहों पर भी हो रही है। हालत यह है कि मौसम में बदलाव को धीमा करने के लिए जितने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होते हैं, उनमें जुबानी जमाखर्च के अलावा काम कम हो रहा है, और बड़े देश अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए गरीब देशों की मदद को पैसा नहीं निकाल रहे हैं। अभी सूडान की खराब हालत पर संयुक्त राष्ट्र की तरफ से एक बयान आया, और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने याद दिलाया कि यह देश जो अपनी गरीबी के कारण मौसम के बदलाव में कोई भी बढ़ोत्तरी नहीं कर रहा है, वह मौसम के बदलाव का सबसे बुरा शिकार हुआ है, और भुखमरी की कगार पर है। खुद पाकिस्तान का यह तर्क है कि वह अपनी गरीबी की वजह से अंतरराष्ट्रीय प्रदूषण में कुछ भी नहीं जोड़ रहा है, लेकिन उस पर मार संपन्न देशों के प्रदूषण की वजह से पड़ी है, जो कि मदद करने की अपनी जिम्मेदारी निभाने को तैयार नहीं हैं। 

हिन्दुस्तान जैसा देश जो कि न तो दूसरे बहुत देशों की मदद करने के लायक है, और न ही दूसरे देशों से मदद पाने के लायक है, उसे अपने बारे में बारीकी से सोचना चाहिए। कटे हुए पेड़ों की जगह नए पेड़ लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनी कमेटी से राज्यों को मिले हजारों करोड़ रूपये सरकारी अमला और सत्तारूढ़ राजनीतिक ताकतें लूटकर खा जा रही हैं, और कोई पेड़ नहीं लग रहे। अब किसी देश में इससे अधिक ऊंची निगरानी और क्या हो सकती है कि एक-एक पैसे को खर्च करने के लिए नियम सुप्रीम कोर्ट ने बनाए और लागू किए हैं। यह देश अंधाधुंध आर्थिक उदारीकरण का शिकार है, और मानो देश की सार्वजनिक परिवहन नीति कार-कंपनियां बनाती हैं। शहरों में बसों या दूसरे किस्म के ट्रांसपोर्ट का ढांचा बढऩे ही नहीं दिया जा रहा है ताकि निजी गाडिय़ां बिकती रहें। आज हालत यह है कि इन गाडिय़ों को बनाते हुए धरती पर कार्बन बढ़ रहा है, फिर इन गाडिय़ों को चलाते हुए वह कार्बन और बढ़ रहा है, और उसके बाद बढ़ी हुई गाडिय़ों के लिए अधिक से अधिक पार्किंग बनाना, सडक़ों और पुलों को चौड़ा करना चल रहा है जिससे कि कार्बन और अधिक बढ़ रहा है। किस तरह एक बस में 50 लोगों के जाने के बजाय 25-50 कारों में उतने लोग जाते हैं, और पूरा शहरी ढांचा इसी बढ़ी हुई जरूरत के हिसाब से बनाया जा रहा है। पेड़ घटते जा रहे हैं, कांक्रीट की खपत बढ़ती जा रही है, और खुली जगह खत्म होती जा रही है। 

यह अकेली दिक्कत नहीं है, कई और किस्म के खतरे भी हैं, जिनमें कोयले से चलने वाले बिजलीघरों को सबसे बड़ा खतरा माना जाता है, और सामानों की अमरीकी पैमाने की खपत भी धरती बहुत बड़ा बोझ है, शायद हर औसत अमरीकी दुनिया के किसी भी और इंसान के मुकाबले मौसम को अधिक बर्बाद कर रहे हैं। यह सिलसिला पता नहीं कैसे थमेगा, किसकी मदद से थमेगा, लेकिन यह बात तय है कि आज की जिस पीढ़ी को मौसम की आग से बचने के लिए छाता हासिल है, उसे पेड़ लगाना नहीं सूझ रहा है, पेड़ बचाना भी नहीं सूझ रहा है, प्रदूषण घटाना तो सूझ ही नहीं रहा है क्योंकि अपनी खुद की कार एसी है। 

ऐसी टुकड़ा-टुकड़ा बहुत सी बातें हैं और लोग इस बारे में सोचें, बात करें, और सत्ता हांकने वाले लोगों से सवाल भी करें। अगर आज इतनी जिम्मेदारी जिंदा लोग नहीं निभाएंगे, तो मरकर इन्हें ऊपर से अपनी औलादों को सूरज की आग में झुलसते देखना होगा, यह तो तय है।  

(Daily Chhattisgarh)