सुप्रीम कोर्ट जजों ने वह याद दिलाया जो सरकार को खुद याद रहना था...

28 फ़रवरी, 2023

 

सुप्रीम कोर्ट में एक के बाद एक धार्मिक और साम्प्रदायिक मुद्दों को लेकर याचिका लगाने वाले वहां के एक वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की एक ताजा याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया, और उन्हें बड़ा सा एक आईना दिखाया। अश्विनी उपाध्याय पहले भी इस किस्म की बहुत सी याचिकाएं लगा चुके हैं जिनसे देश का साम्प्रदायिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है। लेकिन यह पहला मौका था जब दो जजों ने उन्हें सैद्धांतिक आधार पर जमकर फटकार लगाई। अश्विनी उपाध्याय ने अदालत में याचिका लगाई थी कि देश में मुस्लिम आक्रमणकारियों के नाम वाली जितनी जगहें हैं उनके नाम बदलने के लिए एक आयोग गठित किया जाए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन का नाम बदलकर अमृत उद्यान करने की मिसाल दी, और कहा कि आक्रमणकारियों के नामों को बनाए रखना संविधान के तहत नागरिक अधिकारों के खिलाफ है।

यह याचिका खारिज करते हुए दो जज, जस्टिस के.एम. जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा-भारत धर्मनिरपेक्ष है, और संविधान की रक्षा करने वाला है, आप अतीत के बारे में चिंतित हैं, और वर्तमान पीढ़ी पर इसका बोझ डालने के लिए इसे खोदते हैं। आप अतीत को चुनिंदा रूप से देख रहे हैं, और आपकी उंगलियां एक विशेष समुदाय पर उठ रही हैं जिसे आप बर्बर कह रहे हैं, क्या आप देश को उबालते रखना चाहते हैं? आप इस याचिका से क्या हासिल करना चाहते हैं, क्या देश में और कोई मुद्दे नहीं हैं? जजों ने कहा- देश अतीत का कैदी नहीं रह सकता, देश को आगे बढऩा चाहिए, और यह अपरिहार्य है, अतीत की घटनाएं वर्तमान और भविष्य को परेशान नहीं कर सकतीं। जजों ने कहा- हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है जिसके कारण भारत ने सभी को आत्मसात कर लिया है, उसी के कारण हम साथ रह पाते हैं, अंग्रेजों की बांटो, और राज करो की नीति ने हमारे समाज में फूट डाल दी है।

इस याचिका में अश्विनी उपाध्याय ने दर्जनों शहरों के नाम, दर्जनों जगहों के नाम गिनाते हुए एक नामकरण आयोग बनाने की मांग की थी ताकि मुस्लिम आक्रमणकारियों से जुड़े नामों को हटाया जाए। इस पर जस्टिस के.एम.जोसेफ ने कहा कि हिन्दुत्व जीने की एक महान शैली है, इसके महत्व को मत घटाइये। उन्होंने कहा कि वे ईसाई हैं, लेकिन वे हिन्दुत्व के प्रशंसक हैं, और इसे पढऩे की कोशिश भी की है, इसकी महानता को समझने की कोशिश की है, इसे किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल मत कीजिए। उन्होंने मिसाल दी कि वे जिस केरल से आए हैं वहां हिन्दुओं ने चर्च बनाने के लिए जमीनें दान दी हैं। दोनों जजों ने यह कहा कि हिन्दुस्तान को अतीत का कैदी बनाकर नहीं चला जा सकता। जजों के रूख को देखते हुए याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिका वापिस लेने की कोशिश की लेकिन जजों ने उसकी इजाजत नहीं दी और वे उसे खारिज करके ही माने। जजों ने कहा कि इस तरह की याचिकाओं से समाज को नहीं तोडऩा चाहिए, कृपया देश को ध्यान में रखें, किसी धर्म को नहीं।

कुछ ही ऐसे मौके रहते हैं जब संसद या बाहर दिए गए किसी भाषण या अदालत के किसी फैसले के शब्दों को ज्यों का त्यों लिख देने की इच्छा होती है कि इस अखबार की अपनी विचारधारा और सोच यही है। यह फैसला ऐसा ही एक फैसला है। अश्विनी उपाध्याय लगातार किसी न किसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लगे रहते हैं जिनसे कि धर्म, सम्प्रदाय, या साम्प्रदायिकता जुड़ी रहती है। हमारा ख्याल है कि उनकी इस याचिका में जिस तरह पूरे मुस्लिम समाज को बर्बर लिखा गया है, उससे भी जज विचलित हुए, और उपाध्याय की पुरानी साख भी जजों को याद रही होगी कि वे ऐसे ही मुद्दों को लेकर बार-बार अदालत पहुंचते रहते हैं। जजों का यह रूख तारीफ के काबिल है कि उन्होंने याचिका वापिस लेने की इजाजत नहीं दी, और उसे खारिज ही किया। जजों ने संविधान के बुनियादी मूल्यों को भी गिनाया कि किस तरह भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और तमाम तबके यहां बराबरी से जीने का हक रखते हैं। ऐसा भी नहीं है कि संविधान के ये मूल तत्व सुप्रीम कोर्ट के इस चर्चित वकील को मालूम नहीं रहे होंगे, लेकिन मुस्लिमों का नामोनिशान मिटा देने की यह याचिका कुछ भारी पड़ी, और इस तरह के नामकरण का मामला अब जब तक किसी बड़ी बेंच के लिए मंजूर न हो, तब तक के लिए तो यह खारिज हो ही चुका है।

इन जजों ने न तो कोई नई बात कही है, और न ही कोई अनोखी बात। उन्होंने संविधान की बुनियादी बातें, और लोकतंत्र की बुनियादी समझ को ही गिनाया है। होना तो यह चाहिए था कि इस देश को हांकने वाले प्रधानमंत्री, और उनकी पसंद से बनाई गईं राष्ट्रपति को ही यह सोचना था कि राष्ट्रपति भवन की मुगल गार्डन का नाम बदलकर अमृत उद्यान रखने से यह खौलता हुआ लाल लावा दूर तक बहते जाएगा। यह मुगल गार्डन मुगलों का बनाया हुआ नहीं था, इसे अंग्रेजों ने बनाया था, लेकिन उद्यान की शैली मुगल उद्यान शैली रहने की वजह से उसका नाम मुगल गार्डन रखा गया था। उस नाम को बदलकर प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली सरकार, और उनकी मनोनीत राष्ट्रपति ने मानो कोई बड़ी कामयाबी हासिल कर ली थी। उसी से उत्साह और हौसला पाकर ऐसी पिटीशन लगी थी, और जजों की की हुई समझदारी की बातों पर सरकार और राष्ट्रपति को भी गौर करना चाहिए। भाजपा के राज वाले उत्तरप्रदेश में यह सिलसिला बेकाबू चल रहा है कि हर उस शहर का नाम बदल दिया जाए जिसमें कुछ भी मुस्लिम, कुछ भी ऊर्दू दिखाई देता है। यह सोच हिन्दुस्तान के भीतर मुस्लिम तबके में एक असुरक्षा पैदा कर रही है, और वे अपने आपको दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस कर रहे हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। जो लोग हिन्दुस्तान को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने पर आमादा हैं, उन्हें धर्म के आधार पर चलने वाले अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल जैसे बहुत से देशों की हालत देखनी चाहिए। हिन्दुस्तान अगर पिछली पौन सदी में इतना आगे बढ़ पाया है, तो वह सभी समुदायों के योगदान से आगे बढ़ा है, सिर्फ किसी एक धर्म के लोगों के बढ़ाए नहीं बढ़ा है। अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट में ऐसी बदनीयत उजागर हुई, जजों ने भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी मजबूती याद दिलाई, और लोगों को देश की संवैधानिक व्यवस्था एक बार फिर सुनाई पड़ी।

 (Daily Chhattisgarh)

अटल और अमर जहर से बचने चौकन्नापन जरूरी

 27 फरवरी, 2023

 

दुनिया में कितनी चीजें अटल हो सकती हैं? जितने तलाक हो रहे हैं उन्हें देखते हुए शादियां भी सात जन्म तो दूर, एक जन्म भी अटल रह जाए तो बहुत है, राजनीति में जो लोग हैं वे जिस रफ्तार से पार्टियां बदलते हैं, उनकी प्रतिबद्धता उतनी ही अटल है जितनी कि पारे की बूंद की स्थिरता रहती है। लोगों में ईमानदारी अगर कूट-कूटकर भरी है, तो भी कोई वक्त ऐसा आ सकता है जब उनकी जरूरत बहुत बड़ी हो, और दाम ईमानदारी के मुकाबले बहुत अधिक बड़ा हो, तो फिर वह ईमानदारी भी अटल नहीं रह जाती। प्रेमसंबंधों में कब देहसंबंध शुरू हो जाते हैं, और कब दोनों ही टूट जाते हैं, इसका भी कोई ठिकाना नहीं रहता, और बहुत से मामलों में इसके बाद महिला अदालत भी चली जाती है कि उसके साथ शादी का वायदा करके बलात्कार किया गया था, इसलिए प्रेम और देहसंबंध भी अटल नहीं हैं। लेकिन आज दुनिया में बहुत बड़ी फिक्र बने हुए कई किस्म के जहरीले पदार्थ जरूर अटल हैं जो कि कभी खत्म नहीं होने वाले हैं, जिन्हें फॉरएवर केमिकल्स कहा जाता है, यानी चिरकालिक रसायन। चिर काल का मतलब ही है हमेशा के लिए, और दुनिया में आज हजारों किस्म के ऐसे जहर हैं जो कि कुदरत से लेकर सार्वजनिक जगहों तक, और इंसानों के बदन में इक_ा हो गए हैं, और जो कभी कहीं नहीं जाने वाले हैं, और ये एक बड़ी फिक्र का सामान हैं। 

फॉरएवर केमिकल्स यानी पीएफएएस अकेले योरप में ही 17 हजार से ज्यादा जगहों पर पाए गए हैं, और इनमें से दो हजार जगहों को तो हॉटस्पॉट कहा जाता है यानी वहां लोगों के ऐसे जहर को पाने का खतरा बहुत अधिक है। एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि इंसानों के बनाए हुए करीब 45 सौ ऐसे पदार्थ हैं जो फॉरएवर केमिकल्स के दायरे में आते हैं, और ये जानवरों, मछलियों, डेयरी के दूध से लेकर इंसान के बदन और मां के दूध तक फैले हुए हैं। योरप के अलावा अमरीका जैसे कड़े पैमानों वाले देश में 98 फीसदी आबादी के बदन में चिरकालिक रसायन मिले हैं। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि भारत जैसे लापरवाह और भ्रष्ट देश में प्रदूषण के पैमानों पर कोई भी अमल न होने से यहां के उद्योग और कारोबार किस बड़े पैमाने पर ये रसायन फैला रहे होंगे। भारत जैसे देश में तो जानवरों से अधिक दूध पाने के लिए उन्हें तरह-तरह के इंजेक्शन लगाए जाते हैं, पोल्ट्री उद्योग जरूरत से अधिक एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करता है, जानवर घूरों पर खाते हैं, और वहां से कई किस्म का जहर पाते हैं। हिन्दुस्तान जैसे देश में जहरीले सामानों की पैकिंग को नष्ट करने के कोई वैज्ञानिक तरीके नहीं हैं, खेतों में ऐसा अंधाधुंध कीटनाशक इस्तेमाल होता है कि पंजाब के कई इलाकों से कैंसर मरीजों की पूरी रेलगाडिय़ां ही राजस्थान के कैंसर अस्पताल जाती हैं। हिन्दुस्तान के खनिज इलाकों में तरह-तरह का प्रदूषण फैला हुआ है, और सारे खनिज इलाके तरह-तरह के खनिज-आधारित कारखाने भी चलाते हैं, और इन कारखानों में कई तरह के फॉरएवर केमिकल्स का इस्तेमाल होता है। दुनिया में कपड़ा उद्योग में धुलाई या चमड़े को पकाने जैसे काम में जिन रसायनों का इस्तेमाल होता है, उनसे निकले हुए फॉरएवर केमिकल्स नालों से होते हुए सीधे नदी पहुंच जाते हैं, और सरकार का, समाज का उस पर कोई बस नहीं रहता। 

अब जो लोग अपने शरीर में पीएफएएस दर्जे के ऐसे जहर लेकर चल रहे हैं, उनमें से बहुत से हो सकता है कि आज खतरनाक स्तर के नीचे हों, लेकिन कब बदन में यह जहर बढक़र खतरनाक स्तर के ऊपर चले जाएगा, इसकी कोई जांच भी हिन्दुस्तान जैसे देश में सुनी भी नहीं जाती हैं। यह जरूर पता लगते रहता है कि खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक मां के दूध में भी पाए जाते हैं, और उससे होते हुए वे दुधमुंहे बच्चों में भी पहुंच जाते हैं। इसमें कई किस्म के फॉरएवर केमिकल्स भी हैं। लेकिन हम खास हिन्दुस्तान जैसे देश को लेकर जब सोचते हैं तो यह लगता है कि तकरीबन तमाम आबादी किसी भी किस्म के प्रदूषण को लेकर बेफिक्र है क्योंकि उसने दिल्ली जैसी जहरीली हवा में भी जीना सीख लिया है। नतीजा यह है कि बदन में धीरे-धीरे इकट्ठे होने वाले ऐसे खतरे की तरफ से हम सब बेफिक्र रहते हैं क्योंकि इससे लीवर और किडनी को नुकसान हो सकता है, लेकिन वह धीमी रफ्तार से होता है, इनसे कैंसर हो सकता है, लेकिन उसकी शिनाख्त देर से होती है, और यह भी पता नहीं लगता है कि कैंसर किस वजह से हुआ है, इनसे यौन शक्ति कम हो सकती है, लेकिन यौन शक्ति कम होने की और भी कई वजहें हो सकती हैं, और लोग ऐसे जहर से उसे जोडक़र देखना इसलिए नहीं सीख सकते क्योंकि ऐसे जहर की जानकारी भी बहुत कम है। दिक्कत यह है कि शरीर में एक बार पहुंचा हुआ ऐसा जहर शरीर से बहुत धीरे-धीरे बाहर निकलता है, और बहुत से लोगों में यह भी हो सकता है कि जिस रफ्तार से यह बाहर निकलता हो, उससे अधिक रफ्तार से यह भीतर पहुंचता हो, और भीतर इसका स्तर बढ़ते चलता हो। रोज खाने के सामानों, मछली, मांस, दूध, अंडे, और सब्जियों में ये जहर या इस दर्जे के रसायन खतरनाक स्तर पर हो सकते हैं, और हो सकता है कि इससे आने वाली तमाम पीढिय़ों तक पहुंचने वाले डीएनए भी प्रभावित होते हों। 

आज दुनिया भर में कारोबारियों के आपराधिक स्तर के गैरजिम्मेदार होने के सुबूत आते ही रहते हैं। बहुत से बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांड जहरीले सामान बनाकर उन्हें ग्राहकों के बीच खपाते रहते हैं, और बच्चों पर इस्तेमाल होने वाले पाउडर जैसे आम इस्तेमाल के सामान बनाने वाली एक सबसे बड़ी कंपनी जॉन्सन एंड जॉन्सन अंतरराष्ट्रीय मुकदमे झेल रही है क्योंकि उसके इस सामान से बच्चों को कैंसर होने का खतरा पाया गया है। आज जब योरप और अमरीका जैसे कड़े सुरक्षा पैमानों वाले देश भी हजारों किस्म के चिरकालिक जहर झेल रहे हैं, तो हिन्दुस्तान में तो यह खतरा दर्जनों या सैकड़ों गुना अधिक होगा। आज विज्ञान की समझ रखने वाले लोगों को इसकी और जानकारी तलाश कर उसे हिन्दुस्तानी संदर्भ में सरल भाषा में तैयार करके लोगों के बीच बांटना चाहिए ताकि ऐसे फॉरएवर केमिकल्स को बढ़ाना रोका जा सके। जो लोग विज्ञान पढ़े हुए हैं, उनकी पढ़ाई से समाज को कोई फायदा तब तक नहीं है जब तक वे खतरे के ऐसे संकेतों को आम लोगों की भाषा में लिखकर, कहकर उसे अधिक से अधिक लोगों तक न पहुंचाएं। जो लोग इंटरनेट का मामूली इस्तेमाल भी करना जानते हैं वे फॉरएवर केमिकल्स पर और जानकारी निकाल सकते हैं, और अपनी समझ बढ़ा सकते हैं, आसपास के और लोगों को भी चौकन्ना कर सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक इमारत, 170 किमी. लंबी, रहेगी जिसमें 90 लाख आबादी

26 फरवरी 2023

 

शहरीकरण दुनिया में एक बड़ा दिलचस्प काम है जिसमें आर्किटेक्चर, अर्बन प्लानिंग, कारोबार, पर्यावरण, और जीवनशैली जैसे दर्जनों पहलुओं की जगह रहती है, और इन सबको ध्यान में रखकर शहरी योजनाएं बनाई जाती हैं। अब आज शहरों के इर्द-गिर्द नए शहर का विस्तार देखना हो तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगकर बने नए रायपुर को देखा जा सकता है जो कि खेतों को खाली करवाकर बनाया गया नया शहर है। हिन्दुस्तान में किसी पूरे के पूरे शहर को किसी ने एक योजना के तहत बनाया हो, इसकी एक बड़ी मिसाल चंडीगढ़ है जिसे नेहरू के वक्त एक फ्रेंच आर्किटेक्ट ने बनाया था। गुजरात में अहमदाबाद के पास सरकारी राजधानी गांधीनगर भी एक बसाया हुआ शहर या इलाका है, और भी देश में कुछ जगहों पर बड़ी कॉलोनी या छोटे शहर बनाए गए हैं। 

लेकिन आज इस मुद्दे पर चर्चा की एक बड़ी वजह है। अपनी संपन्नता के लिए जाने जा रहे सऊदी अरब में एक इमारत वाला एक शहर बनाने की योजना शुरू हुई है। यह पूरे का पूरा शहर नए लोगों की बसाहट का होगा, और इससे इस देश की आबादी की शक्ल भी बदल जाएगी जो कि आज साढ़े तीन करोड़ है, और इस एक इमारत वाले शहर की आबादी 90 लाख होने जा रही है। इससे सऊदी अरब की आबादी सवा गुना हो जाएगी। अब एक छोटा देश किसी एक इमारत के भरोसे न्यूयॉर्क शहर जितना एक शहर बसाने का यह सपना छोटा नहीं है, और जब देश ने तय कर लिया है कि यह इमारत बनानी है, तो फिर यह सपना न होकर एक योजना है। अब इस एक इमारत की आबादी का एक हिन्दुस्तानी अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसमें अहमदाबाद शहर से अधिक लोग रहेंगे। 

अब इस इमारत को देखें तो यह दो सौ मीटर (656 फीट) चौड़ी, पांच सौ मीटर (1640 फीट) ऊंची, और 170 किलोमीटर (105 मील) लंबी रहेगी। हिन्दुस्तान के दो शहरों के बीच जैसी दूरी रहती है, उस किस्म की 170 किलोमीटर लंबी यह अकेली एक इमारत रहेगी, यह लंबाई विमान से जाने पर ठीक भोपाल से इंदौर जितनी है। इसकी ऊंचाई को देखें तो यह एक सौ पच्चीस मंजिल की इमारत से ऊंची रहेगी। इसकी चौड़ाई का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि इसमें अगल-बगल तीन फुटबॉल मैदान बन सकते हैं, और लंबाई तो 170 किलोमीटर है ही। 

यह इमारत रेगिस्तान का सीना चीरते हुए, पहाड़ों से गुजरती हुई, समंदर को छूती हुई रहेगी, और इसे इस तरह से सौर ऊर्जा पर चलने वाला बनाया जा रहा है कि 90 लाख आबादी भी धरती पर कोई बोझ नहीं बढ़ाएगी। पूरी इमारत कांच से घिरी रहेगी, और अपनी बिजली खुद पैदा करेगी। इसका नाम द लाईन रखा गया है क्योंकि यह धरती पर एक लकीर की तरह दिखेगी। अभी ऐसा माना जा रहा है कि यह धरती के किसी भी हिस्से, किसी भी शहर के मुकाबले कम जमीन का इस्तेमाल करेगी, और बहुत बड़ी संख्या में लोगों के लिए एक पूरी दुनिया ही बना देगी। इसमें एयरपोर्ट भी होगा, बंदरगाह भी रहेंगे, और औद्योगिक इलाके भी रहेंगे। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कारों से मुक्त यह शहर एक अलग तेज रफ्तार बिजली-गाडिय़ों का रहेगा जिसमें 170 किलोमीटर का सफर भी 20 मिनट में पूरा किया जा सकेगा। लोगों को बिना प्रदूषण एक सेहतमंद जिंदगी उपलब्ध कराने के लिए बन रहा यह शहर नई से नई तकनीक को लेकर चलेगा, और धरती पर प्रति व्यक्ति पडऩे वाले बोझ में यह बहुत कमी भी करेगा। 

इस प्रोजेक्ट पर आई एक रिपोर्ट याद करती है कि एक लकीर की तरह बनाए गए शहर की योजना बहुत नई भी नहीं है, 1982 में स्पेन के एक शहरी योजनाकार ने ऐसी एक योजना बनाई थी जिसमें बिजली, पानी, गैस और ट्रांसपोर्ट सीधे एक लंबाई में होने से उन सबमें किफायत रहनी थी। लेकिन इस बार लोगों की एक फिक्र यह भी है कि 170 किलोमीटर लंबी और 500 मीटर ऊंची कांच से घिरी यह इमारत इस देश के इस पूरे हिस्से में किस तरह पर्यावरण को प्रभावित करेगी? 

लेकिन बात सिर्फ पर्यावरण और प्रदूषण की नहीं है, इस तरह एक बक्से में रहने के सामाजिक और मानसिक प्रभाव क्या होंगे, यह भी एक दिलचस्प अध्ययन होगा। क्या यह संपन्न लोगों की एक ऐसी आत्मकेन्द्रित इमारत हो जाएगी जो कि किसी संपन्न टापू की तरह बाकी दुनिया से कटी हुई रहेगी? ऐसे दर्जनों सवाल अभी सामने आएंगे, और जो लोग इस शहर में बसेंगे, बसने के लिए दुनिया के दूसरे देशों से यहां आएंगे, उनके आर्थिक स्तर, उनकी राजनीतिक सोच, उनकी पसंद-नापसंद से यह शहर एक अलग किस्म का समाज भी बनेगा, वह कैसा रहेगा इसका अंदाज आज आसान नहीं है। लेकिन हम हिन्दुस्तान के अलग-अलग शहरों में बनने वाली ऐसी संपन्न कॉलोनियों को देख रहे हैं जिनमें सिर्फ करोड़पति ही रह सकते हैं, लेकिन उसमें फर्क यही रहता है कि यहां रहने से परे उन्हें रोजाना बाहर जाना ही होता है, और वे बाकी दुनिया से जुड़े रहते हैं। अब अगर कोई द लाईन नाम की इस दुनिया के भीतर ही रहते चले जाएं, और बाहर ही न निकलें, तो क्या होगा? फिलहाल यह प्रोजेक्ट बनाने वाले लोगों का यह कहना है कि यहां रहने वाले लोग इमारत के भीतर साइकिलों पर भी चलेंगे, और कुदरत का कोई न कोई हिस्सा उनके लिए दो मिनट की दूरी से भी कम पर रहेगा। 

शहरी ढांचों में प्रति व्यक्ति रहने-खाने और काम करने के लिए जितनी जमीन लगती है, जितनी भवन निर्माण सामग्री लगती है, उससे इस इलाके में बहुत ही कम जगह और सामग्री लगेगी। नब्बे लाख लोग कुल 34 वर्ग किलोमीटर जमीन पर रहेंगे जो कि कुल 13 वर्ग मील होती है। साथ ही यह किसी भी तरह के पेट्रोलियम या कोयले के इस्तेमाल से परे रहेगी, और सिर्फ सौर ऊर्जा जैसी तकनीक पर चलेगी। दुनिया में आज तक न तो इस किस्म के आकार का, और न ही इतना बड़ा कोई शहर बसा है, और इतनी बड़ी इमारत की तो कल्पना भी इसके पहले सामने नहीं आई थी। यह योजना और तकनीक का, कारोबार और बसाहट का एक बिल्कुल ही नया प्रयोग होने जा रहा है, और प्रति व्यक्ति सबसे कम जमीन का इस्तेमाल करके, प्रति व्यक्ति सबसे अधिक आकार का शहरी ढांचा देना अपने आपमें एक अनोखा प्रयोग है। आज की यहां की चर्चा सिर्फ लोगों के सोचने के लिए है कि दुनिया किस तरह की बनने जा रही है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

कांग्रेस के सामने चुनौती मोदी नहीं, बाकी विपक्ष से तालमेल बैठाना है...

 26 फरवरी, 2023

 

कांग्रेस का रायपुर का यह महाधिवेशन कई मायनों में ऐतिहासिक है। यह गांधी परिवार की सोनिया गांधी का लीडरशिप से संन्यास का मौका भी है, और यह मोटेतौर पर राजनीति से उनकी बाहर रवानगी की शुरुआत भी है। फिर यह इसी परिवार के राहुल गांधी के एक नए व्यक्तित्व के उभरने का मौका भी है। उन्होंने राजनीति में पिछले करीब दो दशक में जो कुछ हासिल किया था, उससे कहीं अधिक उन्होंने डेढ़ सौ दिनों की एक पदयात्रा में हासिल कर लिया है, और अब उन्हें लेकर वंशवाद या नासमझी की कोई बातें प्रासंगिक नहीं रह गई हैं। एक पदयात्रा किस तरह किसी को परिवार के वंशज से उठाकर एक बड़ा नेता, और एक शानदार इंसान बना सकती है, इसकी मिसाल भारत जोड़ो यात्रा से सामने आई है। इसलिए कांग्रेस का यह महाधिवेशन राहुल गांधी के इस नए अवतार के साथ भी हो रहा है। फिर यह इस रौशनी में भी हो रहा है कि एक खुले चुनाव से कांग्रेस अध्यक्ष बनकर आए मल्लिकार्जुन खडग़े आज एक अभूतपूर्व स्वायत्तता से पार्टी चलाते दिख रहे हैं, और पार्टी की सबसे बड़ी कमेटी के चुनाव से गांधी परिवार ने अपने को अलग रखा है। सोनिया गांधी की रवानगी, एक नए अवतार में राहुल गांधी का आगमन, और परिवार के बाहर के एक अध्यक्ष के बीच कांग्रेस पार्टी तीन दिनों तक अपने वर्तमान और भविष्य पर चर्चा कर रही है। तीन राज्यों में ही सत्ता में सिमट गई कांग्रेस के लिए आज का यह इतना बड़ा आयोजन छोटा नहीं है, लेकिन इसमें जिन मुद्दों पर चर्चा हो रही है, क्या सचमुच वही कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती रहेगी? 

एक वक्त था जब दस बरस से अधिक वक्त था सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए यूपीए की मुखिया भी थीं, और यूपीए की तमाम पार्टियां उनके साथ आराम से चलती थीं। लेकिन पिछले आठ बरस के मोदी राज ने यूपीए को खत्म कर दिया है, और अब 2024 के लोकसभा चुनाव तक कौन सा गठबंधन मोदी का मुकाबला करने के लिए खड़ा किया जा सकता है, यह सवाल देश के तमाम गैर-एनडीए दलों के सामने खड़ा हुआ है, और खासकर कांग्रेस के सामने, जिसका यह मानना है कि उसके बिना देश में कोई कामयाब विकल्प नहीं बन सकता, और ऐसे विकल्प का मुखिया कांग्रेस से परे किसी और पार्टी का नहीं हो सकता। आज कांग्रेस के सामने अपना घर सम्हालने की चुनौती बहुत बड़ी नहीं है, क्योंकि पार्टी छोडक़र कौन लोग भाजपा में जाएंगे, इसे कांग्रेस तय नहीं कर रही, भाजपा तय कर रही है। लेकिन एक बात जो कांग्रेस के तय करने की है, वह बाकी पार्टियों के साथ तालमेल करने, और अगले प्रधानमंत्री के लिए चेहरा तय करने की है। यह एक ऐसा जटिल मुद्दा है जिस पर आज कांग्रेस पर देश की ऐतिहासिक जिम्मेदारी एक अलग मांग करती है, और कांग्रेस का अपना स्वार्थ, या उसका अपना भविष्य एक अलग रास्ता सुझाता है। 

सोनिया गांधी और राहुल गांधी में यह एक बड़ा फर्क है कि सोनिया के मातहत चले यूपीए में तमाम गठबंधन और समर्थक दलों को सहूलियत लगती थी, लेकिन आज राहुल गांधी के साथ कई वजहों से वैसी बात नहीं दिखती है। यह कल्पना करें कि भारत जोड़ो यात्रा अगर सोनिया गांधी ने की होती, तो क्या उन्हें राहुल की भारत जोड़ो यात्रा से बाकी पार्टियों का बहुत अधिक समर्थन नहीं मिला होता? गैरभाजपाई पार्टियों के बीच एक अधिक मान्यता पाना आज कांग्रेस और राहुल गांधी, दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। आज सैद्धांतिक रूप से मोदी सरकार से लडऩे की बात कांग्रेस सरीखी किसी भी पार्टी का एक बड़ा मुद्दा होना स्वाभाविक है, लेकिन इस लड़ाई के लिए एक गठबंधन तैयार करना, कांग्रेस के लिए आज आसान नहीं दिख रहा है। इस एक मुद्दे पर हो सकता है कि कांग्रेस अधिवेशन जैसे मंच से कुछ अधिक तय न कर पाए, लेकिन आज इस अधिवेशन के मौके पर कांग्रेस के बारे में लिखते हुए हमें यही बात सबसे अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण लग रही है कि बाकी पार्टियों के साथ कांग्रेस का एक चुनावी तालमेल, गठबंधन, सहमति किस तरह हासिल किए जा सकते हैं। यह चुनौती बड़ी इसलिए भी है कि केन्द्र और राज्यों में, संसद और विधानसभाओं में कांग्रेस की ताकत के मुकाबले क्षेत्रीय पार्टियां इस तरह जगह बना चुकी हैं, कि उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को नाजायज कहना ठीक नहीं है। आज केन्द्र पर सत्तारूढ़ एनडीए के घटक दलों को छोड़ दें, तो बाकी पार्टियों में एनडीए का मुकाबला करने के लिए लीडरशिप का मुद्दा सबसे बड़ा दिख रहा है, राहुल गांधी, नीतीश कुमार, केसीआर, इनमें से कौन ऐसे गठबंधन के मुखिया हो सकते हैं, इस पर तमाम विपक्षी एकता टिकी रहेगी। आज देश में मोदी का मुकाबला करने के लिए महज अपनी पार्टी के लोगों को एक रखना जरूरी नहीं है, बल्कि मोदीविरोधी तमाम पार्टियों के लोगों को एक रखना जरूरी है, और रखने के पहले भी उन्हें एक करना जरूरी है। अब यही देखना होगा कि बाकी पार्टियों में राहुल के प्रति सहमति की जो कमी है, उसे दूर कैसे किया जा सकता है? क्या इसमें कांग्रेसाध्यक्ष खड़ग़े, और सोनिया गांधी भी सहयोग कर सकते हैं? क्या राहुल गांधी बहुत से मुद्दों पर एक कड़ा रूख लेने के बजाय विपक्ष के अधिक मान्यता प्राप्त नेता की तरह एक न्यूनतम आम सहमति वाला रूख भी रख सकते हैं, ऐसे बहुत से सवाल आज देश की राजनीति में खड़े हुए हैं। कांग्रेस अपना यह अधिवेशन को कई तरह की सैद्धांतिक बातों पर, और संगठन के कुछ मुद्दों पर निपटा ही लेगी, लेकिन इसके बाद एक असली संघर्ष सामने खड़े रहेगा कि 2024 के लिए बाकी पार्टियों के साथ एक बेहतर सहमति कैसे तैयार की जाए? और इस बात की कामयाबी से कांग्रेस और राहुल दोनों का भविष्य तय होगा। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

पंजाब में फिर खालिस्तानी नारों की चुनौती खड़ी हुई

 25 फरवरी, 2023

 

पिछले विधानसभा चुनाव के पहले पंजाब में यह मुद्दा उठा था कि क्या आम आदमी पार्टी खालिस्तान समर्थकों के समर्थन से चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है? और वहां आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से लगातार न सिर्फ पंजाब में, बल्कि हिन्दुस्तान के बाहर भी ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में वहां बसे हुए सिखों के बीच के कुछ तबके खालिस्तान को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। अभी पंजाब के एक पुलिस थाने में ऐसे ही खालिस्तान समर्थकों के हुए एक हथियारबंद आक्रामक हमले, और उसके साथ में पुलिस के आत्मसमर्पण से एक बार फिर पंजाब में खालिस्तान समर्थक हिंसा पनपने का खतरा दिख रहा है। इस ताजा घटना में पुलिस ने खालिस्तान का मुद्दा उठाने वाले अमृतपाल सिंह नाम के एक चर्चित व्यक्ति के करीबी समर्थक को अपहरण और हिंसा के आरोप में गिरफ्तार किया था। और अपने समर्थक को छुड़वाने के लिए ‘वारिस पंजाब दे’ (पंजाब के वारिस) नाम के संगठन के मुखिया अमृतपाल सिंह ने सैकड़ों हथियारबंद समर्थकों के साथ थाने पर हमला किया, और इसके सामने बेबस पुलिस ने यह वायदा किया कि अगले अदालती कामकाज के दिन इस समर्थक को अदालत से छुड़वा दिया जाएगा, तब यह हिंसक भीड़ वहां से टली। और पुलिस ने अपने ही गिरफ्तार किए इस आदमी को अदालत से छुड़वा भी दिया। खबरों में यह भी है कि अमृतपाल सिंह नाम के इस आदमी ने हाल ही में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह को धमकी दी थी कि उनका हाल पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जैसा होगा। पंजाब के सभी राजनीतिक दलों ने पुलिस थाने पर हुए इस हमले पर फिक्र जाहिर की है, और इसे एक खतरनाक नौबत करार दिया है। आम आदमी पार्टी की राज्य सरकार अभी भीड़ की ताकत के सामने दंडवत बिछी दिख रही है, और आने वाला वक्त पंजाब को राजनीतिक और अलगाववादी हिंसा के दौर में एक बार फिर धकेल सकता है। 

पंजाब की मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी के साथ एक दिक्कत यह भी है कि इसके पहले सिर्फ दिल्ली में उसकी सरकार थी, और दिल्ली की सरकार पर पुलिस और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं रहती है। इसलिए इस पार्टी को अब तक किन्हीं राजनीतिक मुद्दों से नहीं जूझना पड़ा था, और यह मोटेतौर पर म्युनिसिपल जैसा काम करने के तजुर्बे वाली पार्टी थी। पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी, और उसके पहले लंबे समय तक सत्ता में रहे अकाली-भाजपा गठबंधन की बुरी सरकारों के जवाब की शक्ल में आम आदमी पार्टी वोटरों द्वारा चुनी गई थी। लेकिन इस पार्टी और इसके नेताओं को पंजाब के पिछले अलगाववादी और आतंकी इतिहास का कोई तजुर्बा नहीं है। नतीजा यह है कि एक नई क्षेत्रीय पार्टी की तरह वह राज्य को सिर्फ प्रशासन चलाने जैसा मानकर चल रही है, और इससे प्रदेश में अलगाववाद का खतरा बढ़ते चल रहा है। आज ऐसा लग रहा है कि दुनिया के कुछ दूसरे देशों में बसे हुए सिखों में से भी कुछ लोग इस खुशफहमी में हैं कि भारत के एक हिस्से को काटकर खालिस्तान बनाया जा सकता है, और वह सिखों का एक धर्मराज्य होगा। इनकी कल्पना में भारत के नक्शे का जो हिस्सा खालिस्तान दिखता है, वह भारत और पाकिस्तान के बीच की जगह है। हिन्दुस्तान एक तो बहुत बड़ा और बहुत ताकतवर देश है, और इससे यह उम्मीद करना एक नासमझी है कि वह किसी दबाव के तहत अपने देश को काटकर एक नया देश बनाने के लिए झुक जाएगा। लेकिन जिन लोगों का अस्तित्व खालिस्तान के मुद्दे को जिंदा रखकर ही चलता है, वे लोग तो कमसमझ लोगों को ऐसे काल्पनिक धर्मराज का सपना दिखाते हुए उन्हें डॉलर और पौंड में दुहते ही रहेंगे। फिर लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि पिछली बार जब खालिस्तान बनाने की खुशफहमी के साथ पंजाब में आतंक फैला था, तो उसके पीछे सरहद पार पाकिस्तान की तरफ से आने वाला बहुत बड़ा समर्थन भी था। आज पाकिस्तान खुद ही दाने-दाने को मोहताज है, हिन्दुस्तानी सरहदें उस दौर के मुकाबले आज अधिक मजबूत हैं, और ऐसे में खालिस्तान का सपना कुछ अलगाववादियों की हसरतों से अधिक कुछ नहीं है। लेकिन पंजाब के घरेलू हालात हिंसक होने में कभी भी देर नहीं लगती है। देश का यह प्रदेश धर्म के नाम पर सबसे पहले उबलने वाला प्रदेश है, और धर्म के अपमान होने की भावना यहां तेजी से फैलाई जा सकती है, तेजी से फैल जाती है। इसलिए पकिस्तान की सरहद से लगा हुआ यह प्रदेश एक लापरवाह सरकार का खतरा नहीं उठा सकता जो कि थाने पर पहुंची भीड़ के सामने अभी बिछ गई थीं। आज पंजाब से परे अगर दिल्ली में भी यह जनभावना और जनधारणा फैली कि आम आदमी पार्टी की सरकार खालिस्तान समर्थकों के सामने समर्पण कर चुकी है, तो शायद दिल्ली में भी केजरीवाल अगला चुनाव नहीं जीत पाएंगे। आज सारे देश में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का सपना लिए चलने वाले केजरीवाल और दूसरे आप नेताओं को यह समझना चाहिए कि उनकी असली परख दिल्ली में नहीं हुई थी, वह परख अभी पंजाब में होने जा रही है। 

पंजाब में एक तरफ तो खालिस्तान समर्थकों को खुलकर सामने आते हुए देखा जा सकता है, दूसरी तरफ इसी पंजाब में बड़े-बड़े संगठित जुर्म जेलों में बैठे हुए माफिया-सरगना करवा रहे हैं। ऐसे संगठित अपराधों के तमाम सुबूत सामने आ चुके हैं, और पंजाब सरकार इस पर भी काबू नहीं पा सक रही है। यह मौका इस राज्य में अलग-अलग चुनावी हसरत और निशाना रखने वाली पार्टियों की राजनीति का भी है। यह मौका केन्द्र सरकार और पंजाब की राज्य सरकार के बीच तनातनी के खतरे का भी है। ऐसे में पंजाब को धर्मराज बनने से बचाना, उसे अलगाववादियों के शिकंजे से दूर रखना, और सरहद पार से होने वाली तस्करी से आए नशे में डूबी पूरी नौजवान पीढ़ी को बचाने का भी है। इनमें से हर चीज बड़ी चुनौती है, और देखना होगा कि टीवी के इश्तहारों से परे पंजाब की आप सरकार कैसे कामयाब होती है।

(Daily Chhattisgarh)

 

एक बार फिर सडक़ पर हुई थोक में मौतें, फिक्र का मौका

 24 फरवरी, 2023

 

छत्तीसगढ़ में बीती आधी रात एक सडक़ हादसे में एक परिवार के 11 लोगों की मौत हो गई, और 10 लोग खासे जख्मी होकर अस्पताल में हैं। ये तमाम लोग एक मालवाहक गाड़ी में एक पारिवारिक कार्यक्रम में गए थे, और वापिसी में एक ट्रक ने इन्हें जोरों से टक्कर मारीं, और मौके पर ही 11 लोग मारे गए। सडक़ हादसों में कुछ गिनी-चुनी वजहों से रोजाना अलग-अलग जगहों पर बहुत सी मौतें होती हैं, लेकिन उन पर लिखने की जरूरत तब सूझती है जब मौतें थोक में आती हैं, और खबरें बड़ी बनती हैं। ऐसे हादसे कम मौतों वाले हों, या अधिक वाले, इनमें से अधिकतर के पीछे सरकारी विभागों और गाड़ी चलाने वाले लोगों की बराबरी की जिम्मेदारी रहती है। 

ऐसे मौकों पर सरकार को यह सोचना चाहिए कि क्या इन हादसों को किसी तरह कम किया जा सकता है? छत्तीसगढ़ एक खनिज प्रदेश होने के नाते यहां पर कोयला, लोहा, सीमेंट-पत्थर की आवाजाही खासी रहती है, और इसके अलावा धान का बहुत बड़ा कारोबार रहने से भी सडक़ों पर ट्रकें अधिक रहती हैं। इन दोनों बातों के अलावा यह राज्य आधा दर्जन दूसरे राज्यों से घिरा हुआ है, इसलिए भी दूसरे प्रदेशों की गाडिय़ां यहां से होकर गुजरती हैं। लेकिन यह बात तो कोई नई नहीं है, और सडक़ों से लेकर ट्रैफिक और आरटीओ के इंतजाम तक हर विभाग को इसकी जानकारी है। फिर यह जानकारी भी सबको है कि कारोबारी गाडिय़ां बहुत खराब हालत में चलती हैं, उनकी फिटनेस जांचने की दिलचस्पी किसी विभाग को नहीं होती, वे ओवरलोड भी चलती हैं, ड्राइवर बिना नींद पूरी किए या नशे में अंधाधुंध रफ्तार से चलाते रहते हैं, और ट्रैफिक नियमों के लिए लोगों के मन में परले दर्जे की हिकारत है। ये तमाम बातें मिलकर खराब सडक़ों के साथ जुडक़र बहुत बड़ा खतरा बन जाती हैं। इनमें से हर खतरे को एक जिम्मेदार सरकार कम कर सकती है, लेकिन वैध और अवैध कमाई से परे सरकार की दिलचस्पी सुरक्षा और सावधानी में बहुत ही कम दिखती है। 

दूसरी तरफ लोग लापरवाह हैं, और पूरे कुनबे को लेकर किसी भी मालवाहक गाड़ी पर सवार होकर रात-बिरात शादी-ब्याह या पूजा-तीर्थ से  आते-जाते हैं, कई जगहों पर तो ड्राइवर भी शराब पिए हुए रहते हैं। इस तरह दो अलग-अलग गाडिय़ां दो अलग-अलग नशे में डूबे ड्राइवरों के हाथों आमने-सामने जब आती हैं, तो ऐसा हादसा न होना हैरानी की बात रहती है। अगर पुलिस की जांच और कार्रवाई कड़ी हो, तो भी नशे में गाड़ी चलाना रूक सकता है। ऐसे ड्राइवरों के लाइसेंस अगर निलंबित और रद्द होना शुरू हो जाए, गाडिय़ां जब्त होने लगें, तो फिर ऐसे हादसे भी कम होने लगेंगे। लेकिन कारोबारी मालवाहक गाडिय़ां या मुसाफिर बसें अधिक से अधिक कारोबार करने के चक्कर में अंधाधुंध रफ्तार से सडक़ों को रौंदती हैं, और आए दिन ऐसे हादसे होते हैं, लेकिन किसी ड्राइवर का ड्राइविंग लाइसेंस रद्द होने की बात नहीं आती है। 

छत्तीसगढ़ अतिसंपन्नता का शिकार प्रदेश है, और यहां पर बड़ी-बड़ी तेज रफ्तार गाडिय़ां सडक़ों पर अराजकता के साथ दौड़ती हैं। बहुत अधिक पैसा जिनके पास है वे लाखों रूपये की मोटरसाइकिलों के साइलेंसर फाडक़र चलते हैं, बड़ी गाडिय़ों पर अंधाधुंध लाईट और सायरन लगाकर चलते हैं, और ऐसी बातें उनके मिजाज को भी बताती हैं कि वे बाकी नियमों को भी इसी तरह तोड़ते होंगे। किसी भी प्रदेश या शहर में नियम-कानून की इज्जत की शुरुआत सडक़ों से ही होती है, और जिस शहर में सडक़ों पर अराजकता रहती है वहां बाकी की जिंदगी में भी अराजकता रहती है। यही हाल छत्तीसगढ़ का हो रहा है कि यहां सडक़ों पर ट्रैफिक पूरी तरह बेकाबू रहता है, और सरकार के किसी अमले की इसमें दिलचस्पी भी नहीं रहती है। अगर सरकार न करे तो भी जनता के बीच से ऐसा एक सोशल ऑडिट होना चाहिए कि किसी सडक़ हादसे में मौतों की जिम्मेदारी किन बातों पर थी। आज छत्तीसगढ़ में न सरकार इस नजरिए से सडक़ हादसों का विश्लेषण करती, न ही जनता को इसकी कोई खास परवाह लगती कि जो सरकार गाडिय़ों से इतना टैक्स लेती है, वह सडक़ सुरक्षा के मामले में लापरवाह है। 

आज टाली जा सकने वाली तमाम मौतों को रोकने की जरूरत है। लोगों से सौ फीसदी जिम्मेदारी की उम्मीद करना गलत है, और आम हिन्दुस्तानी का मिजाज सजा, जुर्माना, या लाठी देखकर ही ठीक से चलने का है। इसलिए सरकार के जुड़े हुए विभागों को जनसंगठनों के साथ मिल-बैठकर सडक़ सुरक्षा बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए। जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था तब जिला और संभाग स्तर पर यातायात सुधार समितियां बनती थीं, और उनमें व्यापारी संगठनों से लेकर अखबारों तक के लोग रखे जाते थे, और उनकी सलाह भी सुनी जाती थी। अब वह सिलसिला खत्म हो गया है, और अब इसे सिर्फ अफसरों का काम मान लिया गया है। ऐसे में सडक़ों पर मौतें कभी कम नहीं हो पाएंगीं। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

यूक्रेन पर रूसी हमले की पहली सालगिरह पर सोचें

 23 फरवरी, 2023

 

यूक्रेन पर रूस के हमले का एक साल पूरा होने के ठीक पहले अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन अचानक ही यूक्रेन पहुंचे, और वहां खुले में यूक्रेनी राष्ट्रपति के साथ घूमकर तस्वीरें खिंचवाकर उन्होंने एक अलग किस्म का भरोसा जताया है। लेकिन तस्वीरों से परे उनके भाषण ने भी यूक्रेन का साथ देने का पश्चिमी देशों और नाटो देशों का एक वायदा सामने रखा है जो कि इस जंग में आज बहुत मायने रखता है। यह जंग यूक्रेन पर रूस के हमले के साथ शुरू हुई थी, और मास्को का यह अंदाज था कि यह कुछ महीनों में यूक्रेनी सत्ता के साथ-साथ खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, और यह जंग आज दुनिया की एक महाशक्ति रूस पर भारी पड़ते दिख रही है। यह एक अलग बात है कि पूरी जंग यूक्रेनी जमीन पर लड़ी जा रही है, यूक्रेन बड़ा नुकसान झेल रहा है, उसके कई इलाकों पर रूस का कब्जा हो चुका है, लेकिन यूक्रेन एक असाधारण मनोबल के साथ रूस के खिलाफ डटा हुआ है, और पश्चिमी देश एक अभूतपूर्व और असाधारण एकता दिखाते हुए यूक्रेन का फौजी साथ दे रहे हैं। आज मोर्चे पर लड़ तो यूक्रेनी सैनिक रहे हैं, लेकिन उनका साज-सामान अमरीका और ब्रिटेन से लेकर जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों से आ रहा है, आते ही जा रहा है। दूसरी तरफ ऐसा माना जा रहा है कि रूस की युद्ध की क्षमता अब कमजोर पड़ रही है, एक तरफ तो पश्चिम के लागू किए गए बहुत कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से रूस की जनता की जिंदगी पर थोड़ा सा फर्क पड़ा है, और थोड़ा सा फर्क रूसी सरकार के खजाने पर भी पड़ा है जिसे कि अपनी फौज पर, भाड़े के सैनिकों पर अंधाधुंध खर्च करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ यूक्रेन का साथ देने के लिए तमाम नाटो देश अपना खजाना खोल रहे हैं, और फौजी साज-सामान भेज रहे हैं। इसलिए गैरबराबरी की यह लड़ाई भी रूस पर कई मायनों में भारी पड़ रही है, फिर चाहे उसे आज अपनी जमीन नहीं खोनी पड़ी है। 

अब रूस ने यूक्रेन के परमाणु हथियार पाने की आशंका गिनाते हुए अपनी सरहद तक नाटो के पहुंच जाने का तर्क या बहाना गिनाते हुए यह हमला किया था। लेकिन अमरीका से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक, और दुनिया के दर्जनों और देशों ने भी इसे यूक्रेन की स्वायत्तता पर हमला माना है, और संयुक्त राष्ट्र बार-बार रूस के इसे रोकने के लिए कहते भी आ रहा है। आज नौबत यह आ गई है कि इन दोनों देशों के बीच किसी भी तरह की बातचीत मुमकिन नहीं दिख रही है, और रूस एक अंतहीन जंग के लिए डटा हुआ है, और अमरीका और उसके साथी देश यूक्रेन का अंतहीन साथ देने के लिए डटे हुए हैं। दिक्कत यह है कि इस जंग में सीधा-सीधा नुकसान अकेले यूक्रेन का हो रहा है जो कि जमीन खो चुका है, जिसके दसियों हजार लोग मारे गए हैं, और जिसके देश का ढांचा तबाह हो गया है, एक करोड़ से अधिक लोग बेदखल हो चुके हैं। यूक्रेन की बर्बादी के आंकड़े गिन पाना भी आसान नहीं है। ऐसे में उसे रूस के साथ जंग जारी रखने के लिए तो पश्चिम की मदद मिल रही है, लेकिन खुद यूक्रेन के पुनर्निर्माण की जरूरतें पश्चिम से कितनी पूरी होंगी, वह पुनर्निर्माण कब शुरू हो सकेगा, इसमें कुछ भी अभी साफ नहीं है। फिर यह भी है कि योरप और अमरीका की कोई भी मदद किफायत और पारदर्शिता की कई शर्तों के साथ आएगी, जिन्हें यूक्रेन पता नहीं कितना पूरा कर पाएगा। 

इन्हीं तमाम बातों के बीच एक बात यह साफ है कि अमरीका और नाटो देश यूक्रेन की फौजी मदद इसलिए भी कर रहे हैं कि वे नाटो देशों के फौजी गठबंधन के चलते हुए रूस के आसपास के अपने सदस्य देशों की हिफाजत को लेकर फिक्रमंद हैं। और इस हिफाजत की गारंटी उसी हालत में हो सकती है जब रूस से लगे हुए कई देश नाटो में शामिल हो जाएं, और नाटो की फौजी क्षमता रूस की सरहदों तक पहुंच जाए। ठीक यही फिक्र रूस इस हमले के पीछे बताता है जिसे वह हमला या जंग कहने से कतराता है, और जिसे वह महज एक फौजी कार्रवाई कहता है। लेकिन शब्दों से परे सच तो यह है कि एक महाशक्ति ने एक छोटे से पड़ोसी पर इतना बड़ा फौजी हमला किया कि जिसका कोई मुकाबला नहीं हो सकता था, लेकिन रूसी फौजी तेवर देखकर उसके खिलाफ दर्जनों देश जिस तरह एकजुट हुए हैं, और उन्होंने जिस हद तक यूक्रेन का साथ दिया है, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। नतीजा यह है कि आज यूक्रेन के फौजियों की मौत, उसकी तबाही की कीमत पर रूस कमजोर होते चल रहा है, और यह बात अमरीका और नाटो के बाकी देशों के फौजी फायदे की बात है। अब सवाल यह उठता है कि अपने फौजियों को शामिल किए बिना, इस युद्ध को विश्व युद्ध में तब्दील होने के खतरे से बचाते हुए यूक्रेन का जो साथ दिया जा रहा है, उससे रूस का नुकसान तो जाहिर तौर पर हो रहा है, लेकिन इसकी जो कीमत यूक्रेन चुका रहा है, उसकी भरपाई कैसे होगी? आज यूक्रेन के लोग शरणार्थी होकर दर्जन भर दूसरे देशों में पड़े हुए हैं। यूक्रेन का ढांचा बुरी तरह तबाह हो चुका है, और अगली शायद चौथाई सदी भी यह देश इस नुकसान से उबर नहीं पाएगा। ऐसे में रूस को खोखला करने की हसरत लिए हुए जो लोग यूक्रेन का साथ दे रहे हैं, वे अपने फौजियों की शहादत के बिना सिर्फ खर्च करके यह मकसद हासिल कर रहे हैं। यह एक अलग नैतिक सवाल है कि यूक्रेनी जनता की जिंदगी और देश के कितने नुकसान की कीमत पर रूस का कितना नुकसान जायज कहा जाएगा? आज इस जंग को एक बरस पूरा हो रहा है, और इस मौके पर पूरी दुनिया को यह सोचना चाहिए कि इस तबाही से कैसे उबरा जा सकता है क्योंकि इससे न सिर्फ इन दो देशों का सीधा नुकसान हो रहा है, यूक्रेन का साथ देने वाले देशों का बड़ा खर्च हो रहा है, और इन दोनों देशों से बाहर निकलने वाले अनाज, खाद, पेट्रोलियम की कमी से दुनिया की अर्थव्यवस्था कितनी तबाह हो रही है। ऐसी बहुत सी बातों पर जंग की इस पहली सालगिरह पर लोगों को सोचना चाहिए, और अपने-अपने देशों की सरकारों से सवाल भी करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

एक लोक गायिका से आई योगी सरकार दहशत में !

 22 फरवरी, 2023

 

वैसे तो भाजपा के राज वाले मध्यप्रदेश का नारा है कि एमपी गजब है, लेकिन यह नारा भाजपा के एक दूसरे राज्य उत्तरप्रदेश पर भी माकूल बैठता है जहां पर एक लोक गायिका नेहा सिंह राठौर को पुलिस ने एक नोटिस दिया है कि उनके पोस्ट किए गए एक गाने को लेकर समाज में दुश्मनी और तनाव की हालत उत्पन्न हुई है इसलिए उस बारे में वे तीन दिन के भीतर स्पष्टीकरण पेश करे। ‘यूपी में का बा’ शब्दों से बने हुए इस गाने में इस लोक गायिका ने उत्तरप्रदेश में आज फैली हुई बदअमनी पर लोकगीतों के तल्ख अंदाज में सीधे सपाट सवाल किए हैं जिनमें सीएम से लेकर डीएम तक से पूछा गया है कि अभी-अभी कानपुर में एक झोपड़ी में जलकर मरी मां-बेटी, और उस पर चलाए गए बुलडोजर पर उनका क्या कहना है। लोगों को यह घटना याद ही होगी कि अभी पिछले ही हफ्ते अतिक्रमण हटाने वाले दस्ते ने जब एक झोपड़ी को हटाने की कोशिश की, तो दहशत में भरी हुई मां-बेटी ने आग लगाकर जान दे दी, या किसी ने उन्हें जलाकर मार डाला, अफसरों ने आग लगने या लगाने के बाद झोपड़ी पर बुलडोजर भी चला दिया। उल्लेखनीय है कि उत्तरप्रदेश में बुलडोजर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर लगाकर चलते हैं, और योगी की साख वहां पर बुलडोजर बाबा के रूप में खुद सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी ही फैला रही है। ऐसे में एक लोक गायिका को उसके सवाल भरे गाने पर इस तरह का पुलिस नोटिस देना और लोगों को हैरान कर सकता है, लेकिन जिन लोगों ने उत्तरप्रदेश पुलिस के काम करने के तरीके देखे हैं, उन्हें यह आम बात लग सकती है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मरने, मारने, या गाने में सवाल करने वाले कोई भी गैरहिन्दू नहीं हैं। सत्ता से तीखे लेकिन सौ फीसदी जायज सवाल करने वाली लोक गायिका अपनी सादगी से और अपने सरल तरीकों से पहले भी लोगों को मोह चुकी है, और जाहिर है कि उसकी लोकप्रियता से परेशान योगी सरकार ने पुलिस के हाथों यह कार्रवाई चालू करवाई है। जिस अंदाज में पुलिस की टीम यह नोटिस देने पहुंची थी, और जिस तरह से कई फोन वीडियो बना रहे थे, उससे समझ पड़ रहा था कि सरकार दहशत में है। इस गायिका ने यह सवाल किया है कि राज्य के हालात पर वह सरकार से सवाल नहीं करेगी, तो क्या विपक्षी समाजवादी पार्टी से सवाल करेगी? 

पुलिस के किसी थाने की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर जैसी समझ हो सकती है, और योगीराज में पुलिस का जिस तरह से आम इस्तेमाल हो रहा है, उसके मुताबिक ही नेहा सिंह राठौर से पूछा गया है कि उनके गाने से समाज पर पडऩे वाले प्रभाव से वे वाकिफ हैं या नहीं? पुलिस ने इससे समाज में दुश्मनी और तनाव पैदा होने का अपना निष्कर्ष जांच के पहले ही सामने रख दिया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह एक बहुत ही घटिया और ओछा हमला है। अभी कुछ दिन पहले ही हमने देश के कुछ दूसरे राज्यों और दूसरे नेताओं के आलोचना के खिलाफ अभियान के बारे में लिखा था, और उन राज्यों की पुलिस की हरकतों को भी धिक्कारा था। लोगों को याद होगा कि भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा द्वारा फिल्म पठान के खिलाफ छेड़े गए अभियान के संदर्भ में बड़ी कड़ी बात कही थी, और उसके बाद से ही नरोत्तम मिश्रा भी शांत हैं, मीडिया से दूर हैं, फिल्मी विवादों से दूर हैं। लेकिन एक लोक गायिका के सवालों से डरकर योगी सरकार जिस तरह की हरकत कर रही है, वह उसकी मजबूती को खोखला साबित कर रही है। यह लोक गायिका सोशल मीडिया के कई किस्म के प्लेटफॉर्मों पर भारी लोकप्रिय है, और उसकी शोहरत में जो कमी रह गई होगी, वह अब योगी पुलिस ने पूरी कर दी है। हमें इस बात में जरा भी शक नहीं है कि इस लोक गायिका का यह गाना देश की किसी भी अदालत में जुर्म साबित नहीं किया जा सकेगा, लेकिन आज सरकारों की दिलचस्पी किसी जुर्म को साबित करने में नहीं रहती है, बल्कि मुकदमेबाजी में फंसाकर जिंदगी मुश्किल करने में जरूर रहती है। आज देश में बहुत से पत्रकार, बहुत से दूसरे लोग, कलाकार, फिल्मकार इसी तरह मामलों में फंसाए जा रहे हैं, और फिर सरकार अदालतों में उन मामलों को किसी किनारे ही नहीं पहुंचने देती। पूरी तरह बदनीयत से किए जा रहे ऐसे हमले देश के बाकी हास्य कलाकारों को, या बाकी कार्टूनिस्टों को डराने में कामयाब जरूर होते हैं, और सत्ता की नीयत यही रहती है कि असहमति को दहशत से, और पुलिसिया ताकत से कुचल दिया जाए। सत्ता की ऐसी गुंडागर्दी का मुकाबला देश की जनता बेहतर तरीके से कर सकती है, और उसे ऐसे गाने, ऐसे कार्टून, ऐसी खबरें, ऐसे वीडियो या डॉक्यूमेंट्री अधिक से अधिक फैलाने का काम करना चाहिए, ताकि उनका मकसद पूरा किया जा सके। उत्तरप्रदेश सरकार अपनी जितने किस्म की फजीहत करवा सकती थी, उससे कुछ अधिक हद तक फजीहत अब इस एक मामले से होगी। आने वाले दिनों में हो सकता है कि ये आंकड़े सामने आए कि इस एक पुलिस नोटिस से इस लोक गायिका के चाहने वाले सोशल मीडिया पर और कितने बढ़े हैं, और यह बढऩा ही लोकतंत्र की कामयाबी होगी। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

हवा से नफरत के जहर को हटाने का जिम्मा आज सुप्रीम कोर्ट पर है

 21 फरवरी, 2023


हिन्दी फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर अपनी फिल्मों से कहीं अधिक अपनी सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता के लिए खबरों में रहती हैं। वे आला दर्जे की अभिनेत्री हैं लेकिन देश में धर्मनिरपेक्षता के लिए वे एक खुली लड़ाई लड़ती हैं, और जेएनयू से निकले अमूमन अच्छे लोगों के मुताबिक वे अपने सिद्धांतों के लिए सडक़ों पर लडऩे से पीछे नहीं रहतीं। ऐसे में एक मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता से उनकी शादी को लेकर देश के साम्प्रदायिक लोग बुरी तरह घायल हैं। वे तमाम लोग भी जो स्वरा को रात-दिन सोशल मीडिया पर बलात्कार की धमकियां देते थे, उनके बारे में अश्लील और गंदी बातें लिखते थे, उन्हें भी अचानक एक हिन्दू लडक़ी के मुस्लिम से शादी करने पर चोट लगी है। तरह-तरह के लोग तरह-तरह की अपमानजनक बातें लिख रहे हैं और मानो इसी के एक जख्मी ने कर्नाटक में अभी एक ताजा साम्प्रदायिक बयान दिया है। 

कर्नाटक के घोर साम्प्रदायिक संगठन श्रीराम सेना को उसकी दूसरी कट्टर बातों के लिए भी जाना जाता है, और कई बरस पहले के वो वीडियो लोगों को याद होंगे जिनमें बेंगलुरू शहर के पब में पहुंची लड़कियों को निकाल-निकालकर मारते हुए इस श्रीराम सेना के नेता-कार्यकर्ता कैमरों पर कैद हुए थे। उस समय से इसके मुखिया प्रमोद मुथालिक खबरों में आए थे, और अब तक वे अपने हिंसक बयानों को लेकर हर कुछ महीनों में अखबारी सुर्खियों में लीज नवीनीकरण करवाते रहते हैं। अभी उन्होंने कर्नाटक के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में खुलकर कहा- अगर हमारी एक हिन्दू लडक़ी जाती है, तो हमे दस मुस्लिम लड़कियों को फंसाना चाहिए, और आप ऐसा करते हैं तो श्रीराम सेना आपकी जिम्मेदारी लेगी। उन्होंने ऐसा करने वालों को हिफाजत और रोजगार देने का वायदा किया है। उनके इस बयान का वीडियो चारों तरफ फैला हुआ है। पिछले बरस उन्होंने टीपू सुल्तान का विरोध करते हुए सावरकर के पोस्टर पूरे कर्नाटक में लगाने का अभियान छेड़ा था, और बयान दिया था कि अगर मुस्लिम या कांग्रेस के किसी ने इन पोस्टरों को छुआ तो उनके हाथ काट दिए जाएंगे। पिछले साल का उनका बयान तो सुप्रीम कोर्ट की हेट-स्पीच की चेतावनी के पहले का था, लेकिन अब दस मुस्लिम लड़कियों को फंसाने का यह ताजा साम्प्रदायिक बयान तो सुप्रीम कोर्ट की कई बार दुहराई जा चुकी हेट-स्पीच चेतावनी के बाद का है, और देखना है कि कोई अदालत, कोई अफसर इस पर कार्रवाई करते हैं या नहीं। 

सुप्रीम कोर्ट ने अभी कल ही दिल्ली पुलिस से कहा है कि उसने 2021 के दिल्ली हेट-स्पीच केस की चार्जशीट की एफआईआर फाईल करने में पांच महीने क्यों लगाए, और क्या अभी तक उसमें किसी को गिरफ्तार किया गया है? देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ इस बेंच के मुखिया हैं, और यह बेंच एक सामाजिक कार्यकर्ता तुषार गांधी की दाखिल की गई अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें कहा गया है कि उत्तराखंड पुलिस, और दिल्ली पुलिस नफरत के तेजाबी भाषणों के मामलों में कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पुलिस ने इस मामले में नफरती भाषण देने वालों को संदेह का लाभ देने की पूरी कोशिश की, लेकिन अदालत ने उनकी इस हरकत को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट इस मामले एक कड़ा रूख दिखा रही है, और हो सकता है कि यह रूख बाकी देश के लिए भी एक मिसाल बने। फिलहाल तो अदालत ने इस तरह के नफरती भाषणों के लिए किसी को जेल भेजा नहीं है, इसलिए कर्नाटक में श्रीराम सेना के नफरती नेता फिर से अपने पुराने हिंसक मिजाज वाले साम्प्रदायिक रूख को दोहरा रहे हैं। ऐसे में अदालत को देश के बाकी हिस्सों में डिजिटल सुबूतों पर दर्ज हो रही नफरती और हिंसक बातों को भी कटघरे में लेना चाहिए क्योंकि उत्तराखंड में किसी को सजा हो भी जाए तो उससे कर्नाटक में किसी के सहमने की गुंजाइश कम ही रहती है। लोगों को अपने आसपास सजा दिखने पर ही उन पर इसका असर होता है। 

हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिक नफरत की बातों पर अगर देश का कोई कानून लागू होता है, तो उस पर सुप्रीम कोर्ट को एक कड़ी और व्यापक मिसाल पेश करने की जरूरत है। जब तक ऐसी मिसालें देश की बाकी अदालतों के लिए मौजूद नहीं रहेंगी, तब तक नफरती लोग कानून के ढीले-ढाले इस्तेमाल का फायदा उठाते रहेंगे। यह सिलसिला पूरी तरह से तोडऩे की जरूरत है, खासकर इसलिए कि आज देश में साम्प्रदायिकता के आधार पर चुनाव जीतने की जुगत में लगी हुई कुछ राजनीतिक ताकतें, और देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में लगी हुई कुछ गैरचुनावी ताकतें रात-दिन नफरत फैलाने में लगी हुई है। इनकी नफरत के झांसे में सबसे पहले तो इनके अपने बच्चे खुद आ रहे हैं जो कि समझ आने के पहले से घर से ही ऐसी नफरत का नमूना पाते चलते हैं। इसलिए देश को बचाने के लिए यह जरूरी है कि संविधान की मूल भावना, लोकतंत्र, और इंसानियत की तथाकथित बातों को नफरत से बचाया जाए। आज एक बहुत बड़ी जरूरत यह भी आ खड़ी हुई है कि देश में अल्पसंख्यकों को दूसरे धर्मों के लोगों में से साम्प्रदायिक-हमलावर लोगों से बचाया जाए। और यह काम आज चुनाव हार चुकी राजनीतिक ताकतें नहीं कर पा रही हैं, इस काम को फिलहाल तो अदालत को ही करना पड़ेगा जहां पर आज जजों का रूख पहले के मुकाबले थोड़ा सा बेहतर दिख रहा है, साम्प्रदायिकता से परे का दिख रहा है, सरकार के सामने दंडवत हो जाने से अलग दिख रहा है। आज अदालत को तेज रफ्तार से देश की हवा में घुल चुकी साम्प्रदायिक नफरत को साफ करने का काम करना है, और इस काम को करने में जिन राज्यों की पुलिस की बेरूखी दिख रही है, वहां के आला अफसरों को कटघरे में खड़ा भी करना है, उससे कम किसी कार्रवाई से काम नहीं बनेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 फरवरी 2023


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चुनाव प्रभावित करने की सुपारी लेने वाले इजराइली कारोबार लोकतंत्र पर खतरा

 20 फरवरी, 2023

दुनिया के कई सबसे प्रतिष्ठित अखबारों के रिपोर्टरों ने मिलकर अभी एक सबसे बड़ी सनसनीखेज रिपोर्ट पेश की है जिसमें एक इजराइली कारोबारी को दुनिया के दर्जनों देशों ने चुनाव प्रभावित करने का ठेका लेते पाया गया है। रहस्य के पर्दों में रहने वाला यह इजराइली आखिरकार जाकर शातिर रिपोर्टरों के स्टिंग ऑपरेशन में फंसा, और वह कम्प्यूटर स्क्रीन पर इन रिपोर्टरों को यह बताते हुए कैद हुआ कि वे किस तरह लोगों के ईमेल खातों में घुसपैठ करते हैं, और सोशल मीडिया अकाऊंट्स को प्रभावित करके चुनाव के वक्त माहौल बदलने का काम करते हैं। बरसों से इस इजराइली चुनावी-सुपारी लेने वाले कारोबारी के बारे में चर्चा होती थी, लेकिन वह कभी सामने नहीं आया था, कभी फंसा नहीं था, लेकिन अब वह उजागर हो गया है, और उसने जिन दर्जनों देशों के नाम गिनाए हैं कि उसने वहां के चुनावों को प्रभावित किया है, उनमें भारत का नाम भी है। और उसका यह दावा भी है कि जिन अब तक 31 देशों में उन्होंने चुनाव प्रभावित किए हैं, उनमें से 26 देशों में नतीजे उनके मनमाफिक आए हैं। उन्होंने राजनीतिक दलों, सरकारों, और कारोबारियों से ठेके लेकर जनमत प्रभावित करने के ऐसे बड़े-बड़े साइबर-अभियान चलाए थे।
इस एजेंसी का भांडाफोड़ करने के लिए पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन, आईसीजे (इंटरनेशनल कन्सोर्र्टिएम ऑफ इंवेस्टीगेटिव जर्नलिस्ट्स, की जिस टीम में काम किया उसमें 30 से ज्यादा मीडिया संस्थानों के पत्रकार जुड़े हुए थे। इन पत्रकारों ने संभावित ग्राहक बनकर इस इजराइली कारोबारी से संपर्क किया था, और नए ग्राहक फंसते देख इस इजराइली ने बारीकी से यह बताया कि वे किस तरह किसी के भी ईमेल अकाऊंट को हैक कर सकते हैं, सोशल मीडिया पर कम्प्यूटर एप्लीकेशनों की मदद से चलाए जाने वाले अनगिनत अकाऊंट से वे किसी पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में या उसके खिलाफ माहौल खड़ा कर सकते हैं। यह इजराइली कारोबारी वहां का रिटायर्ड फौजी या खुफिया अफसर रहा हुआ है, और वह बिना किसी पहचान के, अपना नाम और चेहरा छुपाए हुए इसी तरह के खुफिया अभियान चलाने का कारोबार करता है। लोगों को याद होगा कि दो बरस पहले जब इजराइली फौजी घुसपैठिया सॉफ्टवेयर पेगासस का भांडा फूटा था, तो वह भी पत्रकारों की इसी किस्म की एक टोली की बनाई हुई रिपोर्ट थी, और उसमें इजराइली कंपनी का यह दावा था कि वह सिर्फ सरकारों को ही यह स्पाइवेयर बेचती है। इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी दावा था कि भारत में उसका इस्तेमाल हुआ है। फिर भारत के सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला पहुंचने पर अदालत के सामने भारत सरकार ने साफ-साफ यह कहा था कि वह ऐसा कोई हलफनामा नहीं देगी कि उसने पेगासस खरीदा या उसका इस्तेमाल किया है या नहीं। अभी तक सुप्रीम कोर्ट में इसकी जांच चल ही रही है, कि यह दूसरा इजराइली कारोबार सामने आया है जो लोगों के ईमेल अकाऊंट में घुसपैठ तो करता ही है, वह साथ-साथ जनधारणा बनाने, और जनमत को मोडऩे का ठेका भी लेता है ताकि चुनावों को प्रभावित किया जा सके।
पिछले कई बरस से भारत में भी यह फिक्र चल रही है कि सोशल मीडिया पर तमाम वक्त कुछ ताकतें एक खास किस्म के एजेंडा को बढ़ाने का काम कर रही हैं। लेकिन इसके कोई सुबूत सामने नहीं आए थे। यह पहला ऐसा सुबूत दिख रहा है जिसमें यह इजराइली कंपनी साइबर-जुर्म करके चुनावों को प्रभावित करने का ठेका ले रही है, और उसके ग्राहकों की लिस्ट में हिन्दुस्तानी चुनाव की कोई एक ताकत भी है। यह जांच किसी किनारे तक पहुंचे या न पहुंचे, लोगों को इस खतरे को समझने की जरूरत है कि जिस सोशल मीडिया को दुनिया एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक औजार मानकर चलती है, वह लोकतंत्र के खिलाफ एक उतने ही बड़े भाड़े के हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर यह रिपोर्ट सही है, और इजराइली घुसपैठिया कंपनी इजराइल की बहुत सी दूसरी बदनाम निगरानी-कंपनियों की तरह काम करती है, तो हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत बड़ा खतरा है। हिन्दुस्तान के लिए खतरे को इस हिसाब से समझना चाहिए कि आज इजराइल के पूरे निर्यात का आधा हिस्सा अकेला हिन्दुस्तान खरीदता है। इसके अलावा भारत की आज की सरकार अपनी विदेश नीति में इजराइल के साथ खड़ी हुई है, और फिलीस्तीनियों को भारत का ऐतिहासिक और परंपरागत समर्थन अब तक खत्म हो गया दिखता है। ऐसे में भारत की कुछ ताकतें अगर एक ग्राहक की शक्ल में ऐसे इजराइली कारोबारी को ठेका देती हैं, तो यह बात इजराइल की सरकार और वहां के सारे कारोबार को भी माकूल बैठेगी क्योंकि वह कारोबार को जारी रखने वाली बात होगी। इसलिए भारत में इस पर अधिक बारीकी और चौकन्नेपन से गौर किया जाना चाहिए कि इस देश के किस चुनाव में किस पार्टी या संगठन, सरकार या नेता ने इन्हें जनमत प्रभावित करने की सुपारी दी थी।
सोशल मीडिया अच्छा हो या बुरा, वह अब एक अपरिहार्य ताकत बन चुका है, और किसी भी चुनाव में इसकी ताकत को अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। फिर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म दुनिया के कई देशों में तरह-तरह की जांच और संसदीय सुनवाई का सामना कर रहे हैं कि वह किस तरह अपने इस्तेमाल करने वाले लोगों की सोच को प्रभावित करने का काम करते आया है। फेसबुक और ट्विटर जैसे अमरीकी कारोबार को अमरीका में ही संसदीय जांच का सामना करना पड़ रहा है कि वे राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने, या पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उकसावे पर हिंसा को बढ़ाने का काम करते रहे हैं। ऐसे माहौल में हिन्दुस्तान जैसे देश को यह समझना चाहिए कि अब यहां ईवीएम से चुनावी धोखाधड़ी के आरोपों से चिपके रहने से कुछ साबित नहीं होगा। अब सोशल मीडिया के खतरों को समझना होगा, और अनगिनत इजराइली कंपनियों की बदनीयत पर भी नजर रखनी होगी कि वे लोकतंत्रों को किस तरह अपना वफादार ग्राहक बनाने में लगी रहती हैं। 


(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फरवरी 2023


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मिसाल तो मलबेतले से भी निकलती है, और समंदर के सीने पर से भी

 19 फरवरी, 2023


भूकम्प से बर्बाद तुर्की से अभी दो-तीन दिन पहले खबर आई थी कि वहां गिरी हुई इमारत के मलबे तले दस दिनों से दबी हुई एक लडक़ी को इतना वक्त सर्द मौसम में गुजार लेने के बाद अभी बचाया जा सका है। दसवें दिन भी दो महिलाओं और दो बच्चों को मलबे से जिंदा निकाला गया था। इसे करिश्मा ही माना जा रहा था, और यह एक विश्व रिकॉर्ड बन गया था कि अभी तीन दिन और गुजरने के बाद तीन लोगों को मलबे के नीचे से और बचा लिया गया है, यानी पिछला रिकॉर्ड तीन दिन भी नहीं टिक पाया। ये लोग भूख-प्यास के बावजूद बिना किसी मदद के, बिना गर्म कपड़ों के जिंदा थे। तुर्की और सीरिया के इस भूकम्प में 46 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इसे सदी का इस इलाके का सबसे जानलेवा भूकम्प माना जा रहा है, और लोगों के इस तरह बचने को आस्तिक लोग ऊपरवाले की मेहरबानी मान रहे हैं, और नास्तिक लोग इसे इंसान के जिंदा रहने के जज्बे की एक बड़ी मिसाल। 

जो भी हो, तुर्की और सीरिया के इस हाल को देखकर बाकी दुनिया को हौसले की एक बड़ी नसीहत लेने की जरूरत है। दुनिया का हर हिस्सा इतनी बड़ी मुसीबत से नहीं घिरता है। खासकर सीरिया तो बरसों से गृहयुद्ध से घिरा हुआ है, विदेशी हमलों का शिकार है, और कल ही इजराइल ने वहां एक मिसाइल हमला किया जिसमें 15 मौतों की खबर है। इतने किस्म की कुदरती और इंसानी मार कुछ देशों पर पड़ी हुई है, लेकिन वहां लोगों का हौसला है जो कि दस-दस मंजिली इमारतों के दस-बीस फीट ऊंचे रह गए मलबे के नीचे भी जिंदा है। और यह हौसला देखकर उन लोगों को बहुत कुछ सीखना चाहिए जो कि अपनी जिंदगी की अनिश्चितता से, उसकी नाकामयाबी से, उसकी तकलीफों से निराश होकर जिंदगी छोडऩे की सोचते हैं। ऐसा आए दिन हो रहा है, अभी दो दिन पहले ही ये आंकड़े सामने आए कि हिन्दुस्तान में पिछले दो-तीन बरसों में कितने लाख मजदूरों ने खुदकुशी की, कितनी लाख महिलाओं ने जान दे दी, और ऐसे ही कुछ और तबकों के भी आंकड़े सामने आए हैं। कई लोग इसे कोरोना और लॉकडाउन के दौर में सरकार की नाकामी का नतीजा मान रहे हैं, कुछ लोग इसकी जड़ें नोटबंदी और जीएसटी की दिक्कतों से बर्बाद हुए कारोबार में देख रहे हैं, जो भी हो, आम हिन्दुस्तानी की हालत आज किसी इमारत के मलबे में दबे हुए इंसान से बेहतर तो है ही। दुनिया की मिसालों से सरकारों को भी सबक लेना चाहिए, और लोगों को भी। किसी भी मिसाल से इन दोनों के लिए अलग-अलग नसीहतों का मौका रहता है, और सरकारों के लिए भी हम लिखते ही रहते हैं कि देश में धर्मान्धता और कट्टरता को बढ़ाने का नतीजा क्या होता है, इसे समझने के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे नाकामयाब लोकतंत्रों की तरफ देखना चाहिए, और अब तक वैसी नौबत में न पहुंचे हुए देशों को वैसी धर्मान्धता, और कट्टरता से बचना चाहिए। लेकिन सरकारों से परे इंसानों के सीखने की बातें भी तमाम नौबतों में रहती हैं। लोगों को बुरे से बुरे वक्त में भी किसी अच्छे की न तो उम्मीद छोडऩी चाहिए, और न ही उसकी कोशिश बंद करनी चाहिए। 

जिंदगी की छोटी-छोटी मिसाल भी बड़े-बड़े हौसले दे जाती है। फिलीस्तीन में इजराइली हमले का शिकार एक ऐसा फोटोग्राफर है जिसका बदन बस कमर के ऊपर बचा है, नीचे कुछ भी नहीं है। और वह न सिर्फ जिंदा है, बल्कि पहियों की कुर्सी पर चलते हुए वह फोटोग्राफी का अपना काम भी करता है, और फिलीस्तीन की आजादी की लड़ाई भी लड़ता है। ऐसे और भी लोग हैं जो बिना हाथ-पैर के पैदा हुए हैं, और जो आज दूसरे लोगों को प्रेरणा देने के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रमों में मंच पर व्याख्यान देते हैं। एक वक्त कुछ लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि वे तो अंग्रेजी जानते नहीं हैं, और दुनिया घूमने कैसे जा सकते हैं, तो एक समझदार ने उन्हें याद दिलाया कि जो लोग मूक-बधिर होते हैं, न सुन सकते न बोल सकते, क्या वे कहीं जाते ही नहीं हैं? और यह बात भी कई बरस पहले की थी, अब तो आम मोबाइल फोन पर लोग दुनिया की किसी भी देश की जुबान में अनुवाद कर सकते हैं, किसी भी भाषा में पूछे गए सवाल का अपनी भाषा में जवाब देकर उसे मोबाइल फोन की स्क्रीन पर किसी तीसरी या चौथी भाषा में भी दिखा सकते हैं। जरूरत हौसले की थी, और टेक्नालॉजी ने तो वक्त के साथ सारी दिक्कतें दूर कर ही दीं। लेकिन टेक्नालॉजी हौसला नहीं दिला सकती, वह खुद का ही लगता है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले जब अमरीका के न्यूयॉर्क में मौसम के बदलाव के खतरों पर एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम हो रहा था, तो स्वीडन की एक किशोरी, ग्रेटा थनबर्ग, लोगों का ध्यान खींचने के लिए एक बोट पर सवार होकर 35 सौ मील का समुद्री सफर तय करके न्यूयॉर्क पहुंची थी, और तब से लेकर अब तक वह मौसम के बदलाव के मोर्चे पर दुनिया की सबसे लड़ाकू नौजवान सामाजिक कार्यकर्ता बनी हुई है। इस लडक़ी ने अपने मां-बाप से लेकर अपने स्कूल तक, और अपने देश की संसद तक को अपने आंदोलन से मजबूर किया कि वे जीवनशैली में बदलाव लाएं ताकि पर्यावरण बच सके। उसने शुरूआत घर से की, फिर अपना शहर, फिर अपना देश, और फिर समंदर चीरते हुए वह ब्रिटेन से अमरीका पहुंची थी। हिन्दुस्तान में इस टीनएज के तकरीबन तमाम बच्चे पर्यावरण के बजाय अपने मोबाइल फोन के अगले मॉडल में मगन दिखते हैं, और पर्यावरण को बचाना उन्हें सफाई कर्मचारियों और रद्दी बीनने वालों का जिम्मा लगता है। इसलिए न सिर्फ हौसले की, बल्कि जागरूकता की नसीहत लेना भी मुमकिन है, कोई दस मंजिला इमारत के मलबेतले बिना खाए-पिए सर्द मौसम में जिंदा रहने का हौसला दिखा रहे हैं, तो कोई अपने खेलने-खाने के दिनों में दुनिया को बचाने, गैरजिम्मेदार और लापरवाह अमरीकी राष्ट्रपति को आईना दिखाने के लिए समंदर चीरने का हौसला दिखाते हैं, और इन सबसे बाकी दुनिया के सीखने का बहुत कुछ रहता है। ऐसी हर मिसाल पर लोगों को अपने आसपास के लोगों से भी चर्चा करनी चाहिए, और चाहे इनसे कितनी ही शर्मिंदगी क्यों न खड़ी होती हो, लोगों को अपने बच्चों से भी इन मिसालों की चर्चा करनी चाहिए। हो सकता है कि वे फोन पर ऑर्डर किए हुए पीत्जा का इंतजार करते हुए वीडियो गेम खेल रहे हों, लेकिन उन्हें असल जिंदगी की ऐसी करिश्माई लगती घटनाएं जरूर बतानी चाहिए, हो सकता है कि किसी एक बात से उन्हें अपनी बाकी जिंदगी के लिए एक बेहतर रास्ता सूझे।

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स्कूली चिकन लेग पीस पर, अपने बच्चों के हक की लड़ाई

19 फरवरी 2023

 

बंगाल की एक खबर है कि वहां के माल्दा जिले में एक स्कूल के बच्चों के मां-बाप का यह कहना था कि स्कूल में दोपहर के भोजन में जब चिकन परोसा जाता है, तो वहां के शिक्षक उसके सभी अच्छे हिस्सों को (जिन्हें शायद लेग पीस कहते हैं) अपने लिए रख लेते हैं, और मुर्गे के बदन के बाकी  कम जायकेदार माने जाने वाले हिस्सों को बच्चों के खाने में डालते हैं। मां-बाप का यह भी कहना था कि जिस दिन स्कूल में चिकन पकता है, उस दिन शिक्षक पिकनिक के मूड में होते हैं, और वे बेहतर क्वालिटी का चावल लाकर अपने लिए उसे अलग पकाते हैं। इस बात की शिकायत लेकर मां-बाप स्कूल पहुंचे, और वहां शिक्षकों के साथ उनकी कहासुनी हो गई। बात बढऩे पर आधा दर्जन शिक्षकों को पालकों ने एक कमरे में बंद कर दिया, और चार घंटे बंद रखा, बाद में पुलिस ने आकर इन शिक्षकों को छुड़वाया। 

अब बंगाल राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक, बहुत मुखर, और आक्रामक-सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति वाला प्रदेश है। यहां पर छोटी बातें भी बड़ा मुद्दा बन जाती हैं। एक वक्त की बात है कि कोलकाता में ट्राम की टिकट एक या दो पैसे बढ़ा दी गई थी, तो वहां राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सडक़ों पर गाडिय़ों में आग लगा दी थी। जागरूकता का हाल यह है कि इस राजधानी में फुटपाथों पर किताबों की दुकानें शायद हिन्दुस्तान में किसी भी दूसरे शहर के मुकाबले अधिक हैं। लोग दीवारों पर नारे लिखते हुए, समर्थन या विरोध के कार्टून बनाते हुए मानो खूबसूरत कलाकृतियां ही बना देते हैं। इसलिए अगर वहां के स्कूली बच्चों के मां-बाप ऐसे भेदभाव के खिलाफ ऐसा आक्रामक विरोध करते हैं, तो भी हैरानी की बात नहीं है, और अगर राजनीतिक असहमति की वजह से गांव के लोगों ने शिक्षकों के खिलाफ गुटबाजी करके ऐसा किया होगा, तो भी हैरानी नहीं होगी। पहले वामपंथी पार्टियों के राज में उनके कार्यकर्ता प्रदेश में ऐसे किसी भी मुद्दे को लेकर राज करते थे, और अब ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सत्ता के बाहुबल का उसी तरह इस्तेमाल करती है। कुल मिलाकर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति एक मुखर प्रतिक्रिया की है, और यह ताजा मामला उसी की एक मिसाल है। 

लेकिन इस बात से मेरे अपने बचपन की कुछ यादें ताजा हो गई हैं। मैं छत्तीसगढ़ के उस वक्त के एक जिला मुख्यालय वाले शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ता था। यह बात आधी सदी के और पहले की है। उन दिनों यूनीसेफ या विश्व स्वास्थ्य संगठन किसी के बैनरतले हिन्दुस्तानी गरीब बच्चों को कुपोषण से बाहर लाने के लिए विदेशी दूध पाउडर आता था, और विटामिन, कैल्शियम, या किसी और किस्म की गोलियां भी आती थीं। हर शनिवार स्कूल की छुट्टी जल्दी होती थी, और आखिरी घंटे में सबकी नजरें मैदान के उस कोने पर लगी रहती थीं जहां एक भट्टी पर बड़े से गंज में दूध पाउडर को खौलाकर दूध बनाया जाता था, और उसके बाद हम सब छात्र एक-एक गिलास लेकर कतार में लग जाते थे, और सबको आधा-पौन गिलास दूध मिलता था, और एक-एक गोली मिलती थी। इस खुराक की साख इतनी थी, और इससे इतने करिश्मे की उम्मीद रहती थी कि दवा खाने और दूध पीने के तुरंत बाद तमाम बच्चे किसी बॉडीबिल्डिंग मुकाबले की तरह  अपने हाथों को मोडक़र देखने लगते थे कि मांसपेशियां (मसल्स) बन गई हैं या नहीं? 

उस वक्त वही एक किस्म का हफ्तावार मिड डे मील था, और आज सोचते हुए याद पड़ता है कि सभी जातियों के बच्चे थे, सभी धर्मों के भी थे, लेकिन दूध बनाने और देने वाले चपरासी या चौकीदार की जात या धरम की कोई चर्चा भी नहीं थी। यह 60 के दशक की बात थी, लेकिन स्कूल के शिक्षकों में ब्राम्हणों का बहुमत था, लेकिन किसी को भी उस दूध को पीने से इंकार नहीं रहता था। शायद जाति और धरम की समझ आने के पहले ही बच्चों को उससे उबर जाने की पहली नसीहत वहीं मिली होगी। बाद में जब देश में सरकारी स्कूलों में मिड डे मील कार्यक्रम शुरू किया गया, तो उसके पीछे की एक सोच यह भी थी कि स्कूलों में एक साथ खाते-पीते बच्चों के बीच से जाति की दीवारें टूटेंगीं, और मोटेतौर पर वैसा हुआ भी, कई जगहों पर जाति व्यवस्था ने अपने खूनी पंजे दिखाए, लेकिन कहीं सरकारों की सख्ती से, तो कहीं अदालती दखल से, कुल मिलाकर सरकारी स्कूलों के गरीब बच्चों के बीच एक साथ खाना तकरीबन सभी जगह होने लगा। कुपोषण से मुक्ति के अलावा यह एक बड़ा फायदा हुआ, लेकिन यह बात तो आज के मुद्दे से परे की है, और कुछ लंबी खिंच गई। 

मुद्दे की बात यह है कि उस वक्त हमारी म्युनिसिपल स्कूल के शिक्षक दूध वाले ऐसे दिन कागजों में बांधकर दूध पाउडर के एक-दो किलो के पैकेट साइकिल के पीछे फंसाकर ही घर जाते थे। यह सिलसिला बहुत लंबा नहीं चला, लेकिन जब तक चला, तब तक अधिकतर, या सभी शिक्षकों के लिए यह आम बात थी कि दूध पीना भी था, और बांधकर घर भी ले जाना था। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जो कि उस समय मध्यप्रदेश का हिस्सा था, वहां जनता के बीच जागरूकता न तब थी, न आज है। जब अविभाजित मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कैबिनेट में सैकड़ों लोगों को सीधे सरकारी नौकरी दे दी, तो केरल से आए हुए एक आईएएस अफसर ने हैरानी जाहिर की थी, और व्यक्तिगत बातचीत में मुझसे कहा था कि यह आपके प्रदेश मेें ही हो सकता है, हमारे केरल में सरकार मुकाबले से परे किसी एक को भी नौकरी देने की हिम्मत नहीं कर सकती, क्योंकि लोग उसके खिलाफ अदालत चले जाएंगे, और सरकार कटघरे में होगी। 

जनता की जागरूकता के बिना न उसके बच्चों को कोई हक मिल सकते, न उसे खुद कोई हक मिल सकता, और उन्हें कोई भविष्य तो मिल ही नहीं सकता। इस राज्य में पिछली सरकारों के वक्त से ही स्कूल शिक्षा विभाग एक सबसे भ्रष्ट विभाग बना हुआ है। यहां किताबें सप्लाई करने से लेकर फर्नीचर की खरीदी तक में खुला भ्रष्टाचार हावी रहा है, और हर सरकारी स्कूल में एक-दो कमरे टूटे हुए फर्नीचर से भरे हुए रहते हैं। लेकिन राज्य बनने के बाद के इन 22 बरसों में भी कहीं मां-बाप ने जाकर स्कूल की बदइंतजामी के खिलाफ आवाज उठाई हो, ऐसा सुनाई नहीं पड़ा। किसी-किसी स्कूल में जब शिक्षक दारू पिए हुए फर्श पर पड़े रहते हैं, या किसी महिला के साथ स्कूल की इमारत में बंद कमरे में रंगे हाथों पकड़ाते हैं, तो जरूर कुछ गांव वाले इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं। लेकिन बाकी बदइंतजामी, बाकी भ्रष्टाचार से लोग अछूते रहते हैं, बेअसर रहते हैं। 

कुछ लोगों को लग सकता है कि बंगाल की तरह की हमलावर जागरूकता अच्छी नहीं है, और वह हिंसक होने लगती है, लेकिन हिंसा से नीचे दर्जे की, अमन-पसंद जागरूकता भी तो हिन्दीभाषी प्रदेशों में देखने नहीं मिलती। मां-बाप यह आवाज भी नहीं उठाते कि उनके बच्चों की स्कूल में शिक्षक कितने दिन आते हैं, कितने दिन नहीं आते, और शिक्षकों की कितनी कुर्सियां खाली पड़ी हुई हैं। मां-बाप चबूतरों पर बैठे हुए खाली वक्त गुजार लेते हैं, लेकिन बच्चों की स्कूल की तरफ झांकना जरूरी नहीं समझते, और गैरजिम्मेदार मां-बाप तो अब और बेफिक्र हो गए हैं कि बच्चों को एक वक्त का खाना स्कूल से मिल जाता है, अब वह अच्छा रहता है या नहीं, उनके हक के लायक रहता है या नहीं, इसकी फिक्र अपने आपको सबले बढिय़ा मानने वाले छत्तिसगढिय़ा में नहीं दिखती है। 

बंगाल का यह ताजा मामला सच्चा है यह मानकर हम उसे एक मुद्दा मान रहे हैं कि चिकन का अच्छा हिस्सा उनके बच्चों को न मिलने पर वे स्कूल पहुंचकर शिक्षकों को बंधक बना लेते हैं। स्कूलों की कई बुनियादी दिक्कतों को लेकर, खामियों और मक्कारियों को लेकर हिन्दीभाषी इलाकों में लोगों में जागरूकता पता नहीं कभी आएगी भी या नहीं। लोगों को याद रखना चाहिए कि राजनीतिक जागरूकता वाला जिम्मेदार प्रदेश केरल अपने बच्चों को सबसे अच्छी शिक्षा देता है, सबसे अच्छा इलाज देता है, और जिंदगी में कामयाब होने के लायक सबसे अच्छी संभावनाएं भी अपने बच्चों को केरल ही देता है। अगली पीढ़ी को सिर्फ निजी विरासत, और अपना डीएनए नहीं दिया जाता, अपनी जागरूकता से अगली पीढ़ी को एक बेहतर भविष्य भी दिया जा सकता है। 

(Daily Chhattisgarh)

 

भूकम्प से मलबा बने सीरिया और भूखे-बिलखते पाकिस्तान से सबक लेने की जरूरत...

  18 फरवरी, 2023


भयानक भूकम्प से अभी हाल में गुजरे सीरिया में इमारतों का मलबा भी नहीं उठ पाया है, नीचे लाशें बिना कफन दफन हैं जिनकी गिनती भी नहीं हुई है, और शिनाख्त भी नहीं हुई है, और ऐसे सीरिया में आईएसआईएस नाम के इस्लामी आतंकी संगठन ने एक हमला किया है जिसमें 53 लोगों की मौत हो गई है। अगर किसी को उसके धर्म ने कुछ भला सिखाया होता तो वे लोग आज भूकम्प से तबाह लोगों की मदद में लगे रहते, अभी इसी भूकम्प में पड़ोस के टर्की में मलबे के नीचे से दस दिन बाद एक लडक़ी जिंदा निकली है, उससे सबक लेकर सीरिया में भी लोगों को जिंदा निकालने की कोशिश करते, लेकिन उन्हें अभी धर्म के आधार पर आतंकी हमले सूझ रहे हैं। और यह हमला कोई अनोखा नहीं है, अभी हफ्ते भर के भीतर ही ऐसे ही एक दूसरे हमले में इसी आतंकी संगठन ने 16 लोगों को मार डाला था, और दर्जनों का अपहरण कर लिया था। एक दूसरी खबर पाकिस्तान की है जहां प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अभी ट्वीट किया है कि पाकिस्तान न सिर्फ आतंक को उखाड़ फेंकेगा बल्कि आतंकियों को कानून के कटघरे तक लाकर मौत की सजा दिलवाएगा। उन्होंने लिखा है कि पिछले दो दशक में इस देश ने अपना लहू बहाकर भी आतंक से मुकाबला किया है, और उसने इस दुष्टता को हमेशा के लिए खत्म करने की कसम खाई है। पाक प्रधानमंत्री वहां की कारोबारी राजधानी करांची के पुलिस मुख्यालय पर कल हुए आतंकी हमले के संदर्भ में बोल रहे थे जिसमें चार लोग मारे गए थे, और 14 जख्मी हुए थे। पाकिस्तान के आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। 

जिस सीरिया से हमने आज बात शुरू की है वह सीरिया बरसों से गृहयुद्ध से गुजर रहा है, वहां के कई इलाके सरकारविरोधी विद्रोहियों के कब्जे में है। और वह इलाका भूकम्प में सबसे अधिक तबाह हुआ है। वहां तक अंतरराष्ट्रीय राहत पहुंचने में भी बहुत मुश्किल आई है। और वहां से यह मांग भी उठ रही है कि पड़ोसी टर्की से इस इलाके में राहत आने के लिए और रास्ते खोले जाएं, और सीरिया की सरकार भी इन इलाकों तक आवाजाही खोले। जब देश बरसों से चले आ रहे गृहयुद्ध, और फौजी हवाई हमलों का शिकार रहा है, और आज वहां दसियों हजार लोगों की भूकम्प से मौत का अंदेशा है, तब भी धार्मिक आतंकियों को जानलेवा हमलों के अलावा और कुछ नहीं सूझ रहा है। ऐसा भी नहीं कि धर्म से जुडऩे का मतलब नेक कामों से रिश्ता खत्म हो जाना ही होता है। दुनिया के बहुत से देशों में सिक्ख संगठन राहत पहुंचाने में सबसे आगे रहते हैं, और वे मुसीबत के वक्त अपने गुरुद्वारों को भी दूसरे धर्म के लोगों की प्रार्थना के लिए खोल देते हैं। एक वक्त ऐसा भी था जब सिक्ख धर्म की सत्ता को अपने कब्जे में किए हुए भिंडरावाले ने पंजाब में छांट-छांटकर गैरसिक्खों को अपने आतंकी हत्यारों से निशाना बनवाया था, लेकिन सिक्ख उससे उबर गए हैं, और वे आज दुनिया में राहत पहुंचाने में सबसे आगे शामिल रहते हैं। दूसरी तरफ आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन इस्लाम के नाम पर गृहयुद्ध और भूकम्प से मलबा हुए देश में आतंकी हमले किए जा रहे हैं। 

सीरिया, और कुछ ही दूरी पर बसे हुए एक दूसरे मुस्लिम देश पाकिस्तान, इन दोनों में मजहबी आतंकियों को देखें, तो ये अपने-अपने देश की सरकारों के काबू से बाहर हैं, और धर्म के नाम पर ये अपने ही धर्म के लोगों को मार रहे हैं। अभी 20 दिन पहले पाकिस्तान के पेशावर में पुलिस के इलाके की एक मस्जिद में आतंकी आत्मघाती हमला किया गया था जिसमें हमलावर ने पुलिसवर्दी के भीतर विस्फोटकों से लैस होकर नमाज के दौरान धमाका किया, और करीब पांच दर्जन लोग मारे गए थे, और डेढ़ सौ से अधिक जख्मी हुए थे। आज पाकिस्तान में लोगों के खाने को आटा नहीं है, गाडिय़ां चलाने को पेट्रोल नहीं है, बिजली बंद है, और पिछले बरस की बाढ़ से देश की करोड़ों की आबादी अब तक उबर नहीं पाई है, लेकिन धार्मिक आतंकियों को कत्ले-आम सुहा रहा है। मतलब यह कि जिंदगी को बचाने के काम में धर्म की दिलचस्पी बड़ी सीमित रहती है, लेकिन थोक में कत्ल करने में धर्म दौड़ में सबसे आगे रहता है। हकीकत तो यह है कि पिछली सदियों में थोक में हुए अधिकतर कत्ल धर्म के नाम पर, धर्म की वजह से, धर्म के झंडे-डंडे के साथ ही हुए हैं। 

दम तोड़ते देशों में मजहबी दहशतगर्दी के कत्ले-आम से बाकी दुनिया के लिए भी कुछ सबक है। एक वक्त जो देश अच्छे-भले चल रहे थे, वहां पर धार्मिक आतंकी संगठन इसलिए पनप और हावी हो पाए कि वहां लोगों के बीच धार्मिक कट्टरता पहले तो धार्मिक रीति-रिवाजों तक थी, बाद में वह कट्टरता में बदली, और फिर उसके बाद उसे हिंसा में तब्दील होने में अधिक वक्त नहीं लगा। दुनिया के जो देश आज वैज्ञानिक सोच खोकर धर्मान्धता के शिकार हो रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान और सीरिया जैसे दुनिया के बहुत से देशों का इतिहास देखना चाहिए कि एक वक्त वहां धर्म तो था, लेकिन धार्मिक-आतंकी नहीं थे। धर्म का मिजाज उसे कट्टरता की तरफ ले जाता है, यह कट्टरता उसे हिंसा की तरफ ले जाती है, और यह हिंसा उसे आतंकी बनाकर कामयाब होती है। इसलिए जिन देशों को, जिन लोगों को आज अपना धर्म सुहा रहा है, और जिन्हें अपने धर्म की कट्टरता पर भी उसे तालिबानी बुलाने पर बड़ी आपत्ति होती है, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह पहाड़ से लुढक़ती हुई चट्टान सरीखी नौबत है जिसकी रफ्तार बढ़ती चलती है, और जो आखिर में जाकर जानलेवा ही साबित होती है। धर्म को जब भी नफरत से जोड़ा जाता है, किसी दूसरे धर्म के खिलाफ उसे खड़ा किया जाता है, देशों के कानून और संविधान के मुकाबले धर्म को अधिक ऊंचा दर्जा दिया जाता है, तो वहां पर अपने-अपने धर्मों के तालिबान बनाने का रास्ता खोल दिया जाता है, यह मंजिल पाने में वक्त कम या अधिक लग सकता है। समझदार देशों के लिए यह भी समझने की बात है कि जो देश मजहबी आतंक के शिकार हैं, उन देशों की तमाम संभावनाएं इन आतंकियों से जूझने में खत्म हो जाती हैं, उनकी अंतरराष्ट्रीय साख खत्म हो जाती है, उनकी आने वाली कई पीढिय़ां अपनी संभावनाओं को छू नहीं पातीं। इसलिए धर्म नाम के इस खूंखार जानवर को इंसानी लहू चटा-चटाकर इतना इंसानखोर नहीं बना देना चाहिए कि वह स्वर्ग नाम की पाखंडी धारणा को पाने के फेर में अपने ही देश, अपने ही धर्म, अपने ही लोगों को थोक में मारने में लग जाए। धर्म और धार्मिक आतंक के बीच नंगी आंखों से दिखने वाली कोई सीमारेखा नहीं होती है, इनके बीच सलेटी रंग का एक समंदर होता है, जिसमें मामला कहां तक पहुंचा है यह पता नहीं लगता। धर्म की कातिल ताकत को समझने की जरूरत है, और सीरिया से लेकर पाकिस्तान तक, अफगानिस्तान से लेकर कई अफ्रीकी देशों तक लोग धर्म के झंडे लेकर इस ताकत को साबित कर रहे हैं, एक-एक हमले में दर्जनों और सैकड़ों लोगों को मार-मारकर। 

(Daily Chhattisgarh)

स्मार्ट सिटी, किस कीमत पर और कितनी बर्बादी से?

 17 फरवरी, 2023


नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया था जिसके तहत सौ शहरों को छांटकर उन्हें शहरी सुविधाओं के मामले में बेहतर बनाने का बीड़ा उठाया गया था। अगले महीने मार्च 2023 में इनमें से 22 शहर स्मार्ट होने जा रहे बताए गए हैं, और दावा किया गया है कि इससे वहां के लोगों की जिंदगी बेहतर होगी, और वे एक साफ-सुथरे माहौल में रह सकेंगे। इन शहरों में भोपाल, इंदौर, आगरा, वाराणसी, भुवनेश्वर, चेन्नई, कोयम्बटूर, इरोड़, रांची, सालेम, सूरत, उदयपुर, विशाखापत्तनम, अहमदाबाद, काकीनाड़ा, पुणे, वेल्लूर, पिम्परी-चिंचवाड़ा, मदुरै, अमरावती, तिरुचिरापल्ली, और तंजौर के नाम हैं। अब तक इन शहरों में एक लाख करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं, और तकरीबन उतने ही और शुरू किए गए हैं। इसमें आधी रकम केन्द्र सरकार देता है, और आधी रकम राज्य सरकार या स्थानीय म्युनिसिपल की लगती है। 

जब यह योजना शुरु हुई थी तब भी हमने इसके खिलाफ लिखा था कि यह निर्वाचित म्युनिसिपलों के अधिकारों में दखल है, और स्मार्ट सिटी का काम करने वाली एक अलग बनाई गई कंपनी उन शहरों के म्युनिसिपलों के प्रति जवाबदेह नहीं रहती हैं जो कि एक असंवैधानिक नौबत है। भारत में केन्द्र, राज्य, और स्थानीय संस्थाओं से परे कुछ नहीं हो सकता, लेकिन स्मार्ट सिटी की पूरी धारणा ही केन्द्र सरकार की सोच पर शहरों को ढालने के लिए राज्यों पर थोपी गई थी, और ‘स्मार्ट’ बनने की हड़बड़ी में राज्य इस बात की अनदेखी कर गए थे कि केन्द्र की सोच पर राज्यों को बराबरी से खर्च करना पड़ रहा है, और उनकी अपनी कल्पनाशीलता की कोई जगह इसमें नहीं है। इसके अलोकतांत्रिक मिजाज को भी अनदेखा किया गया था, और अभी छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट में इसके खिलाफ एक पिटीशन पर सुनवाई हो ही रही है। हम ‘स्मार्ट’ बनने जा रहे ऐसे शहरों का हाल देखें तो इनमें से मध्यप्रदेश का इंदौर बार-बार देश का सबसे साफ शहर घोषित हो रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि मध्यप्रदेश की कारोबारी राजधानी होने की वजह से इंदौर म्युनिसिपल की कमाई अंधाधुंध है, और उतना खर्च करके कोई भी शहर साफ रखा जा सकता है। देश के किसी भी शहर में अगर म्युनिसिपल या वार्ड मेम्बर यह तय कर लें कि उन्हें चारों तरफ से रकम जुटाकर शहर को साफ रखना है, तो शहर की संपन्नता में यह मुमकिन तो है, लेकिन सफाई के ऐसे टापू बाकी प्रदेश के हक को छीनते हैं, और एक स्थानीय वाद को बढ़ावा देते हैं। भारत में ही दक्षिण भारत के कुछ शहरों ने सफाई की योजना इस तरह बनाई है कि उन पर धेला भी खर्च नहीं किया जा रहा है, और कचरे से कमाई की जा रही है। ऐसे में सैकड़ों करोड़ सालाना खर्च करके किसी टैक्स देने वाले शहर को साफ रखना कोई बड़ी चुनौती नहीं है। होना तो यह चाहिए कि कचरे को छांटना और सफाई रखना स्थानीय जनता के मिजाज में लाया जाना चाहिए ताकि उस पर टैक्स का पैसा खर्च न हो। शहरों पर अनुपातहीन खर्च करके उन्हें ‘स्मार्ट’ बनाने की सोच असंतुलित विकास है, और जब निर्वाचित संस्था के काबू से परे ऐसा काम होता है, तो वह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक भी रहता है। 

जिस तरह राज्यों में डीएमएफ के नाम पर जो जिला खनिज निधि अंधाधुंध बर्बाद करने के लिए कलेक्टरों के हाथ रहती है, उसी तरह ‘स्मार्ट’ सिटी के नाम पर ऐसा अंधाधुंध खर्च म्युनिसिपल कमिश्नरों के हाथ आ जाता है। और उसकी बर्बादी की मिसाल डीएमएफ से कम नहीं है। यह राज्य के नेताओं और अफसरों की मनमर्जी से होने वाली बर्बादी का जश्न रहता है। हमने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी-अभी देखा कि ऐतिहासिक सरकारी खेल मैदान को काटकर किस तरह खाने-पीने का एक बहुत महंगा बाजार स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बनाया जा रहा है, और फिर मानो उसे आबाद करने के लिए आसपास कई किलोमीटर तक सडक़ किनारे के गरीब ठेलेवालों को हटा दिया गया है कि अगर वे भी खानपान बेचते रहेंगे, तो स्मार्ट सिटी का बनाया महंगा बाजार कैसे चलेगा। कुछ दर्जन नई चमचमाती और बड़ी दुकानों को चलाने के लिए सैकड़ों गरीबों को बेदखल और बेरोजगार कर दिया गया, और इसे स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर किया गया है। यह पूरा सिलसिला अमानवीय भी है, और तानाशाह भी है, क्योंकि बिना किसी तर्कसंगत और न्यायसंगत आधार के बरसों से सडक़ किनारे कारोबार कर रहे छोटे और गरीब लोगों को इस तरह रातों-रात हटा देना एक सरकारी गुंडागर्दी के अलावा कुछ नहीं है। और ऐसा इसलिए किया गया है कि स्मार्ट सिटी योजना के तहत एक अफसर के मातहत सैकड़ों करोड़ खर्चने का जिम्मा और हक दोनों दे दिया गया है। जिस तरह डीएमएफ को कलेक्टरों का पॉकेटमनी कहा जाता है, और उसके तहत होने वाले खर्च के ठेकों और सप्लाई में जमकर भ्रष्टाचार होता है, ठीक वैसा ही शहरों में स्मार्टसिटी के नाम पर चलते रहता है जहां दसियों करोड़ के शौचालय बनते रहते हैं, और करोड़ों के कचरे के डिब्बे लगते रहते हैं, और कोई जवाबदेही नहीं रहती। 

जब देश में पंचायत या म्युनिसिपलों की शक्ल में स्थानीय शासन का संवैधानिक इंतजाम है, तो स्मार्ट सिटी के नाम पर यह अफसरशाही शुरू से ही गलत थी, लेकिन मोदी की विरोधी पार्टियों में इसे समझने की फुर्सत नहीं थी। ऐसे खर्च का एक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए, और अदालत में इस पूरी सोच को शिकस्त मिलनी चाहिए कि किसी निर्वाचित म्युनिसिपल से अधिक अधिकार किसी एक अफसर को रहे। स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर अंधाधुंध खर्च करके एक अलोकतांत्रिक व्यवस्था चलाना अपने आपमें बेवकूफी है, और यह उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट लोकतंत्र विरोधी इस सोच को रोक पाएगा।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 फरवरी, 2023



 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

नफरतजीवी मीडिया से बात की जाए या नहीं?

 16 फरवरी 2023


हिन्दुस्तानी मीडिया में नफरत फैलाने की अधिकतर जिम्मेदारी टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने उठा रखी है क्योंकि अपनी पुरानी पहचान के मुताबिक टीवी के दर्शकों का अक्ल से अधिक रिश्ता नहीं रह जाता, और उन्हें नफरत बेचना उसी तरह आसान हो जाता है जिस तरह सडक़ किनारे कोई तमाशा दिखाकर मंजन बेचना। हिन्दुस्तान में नफरत के ये सौदागर अच्छी तरह पहचाने हुए हैं, और इन्हें अपने इस काम पर बड़ा फख्र भी दिखता है। इन्हें हिन्दुस्तान की दिक्कतों पर चर्चा के बजाय यहां के मुकाबले पाकिस्तान में महंगा बिकता आटा और पेट्रोल चर्चा के लायक लगता है ताकि हिन्दुस्तानी लोग अपनी दिक्कतों को लेकर किसी बेचैनी से न घिरें। और फिर देश के भीतर, पड़ोसी देशों से, एक धर्म के खिलाफ दूसरे धर्म को खड़ा करके, मोहब्बत की बात करने वाले राहुल गांधी को खिलौनों से खेलने वाला पप्पू साबित करते हुए ये लोग नफरत को दूर-दूर तक और नई ऊंचाईयों तक ले जाने में लगे रहते हैं। ऐसे में अभी सोशल मीडिया पर कांग्रेस के एक नेता के साथ ऐसे दो नफरतजीवी एंकरों की तस्वीरों को पोस्ट करते हुए एक महिला पत्रकार ने लिखा- नफरत के इन सौदागरों को कभी इंटरव्यू न दें, इंटरव्यू देना ही है तो मुझे दे दें, मैं ले लूंगी। उसने आगे लिखा- नफरत, हिंसा, और राष्ट्र की एकता को तोडऩे वालों के सामने आना पाप है। 

इससे एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या जाहिर तौर पर नफरत फैलाने में लगे हुए ऐसे टीवी एंकरों, या मीडिया के दूसरे लोगों से धर्मनिरपेक्ष और अमन-पसंद लोगों को बात नहीं करना चाहिए? यह सवाल दिलचस्प इसलिए भी है कि बड़े कारोबारी मीडिया का मालिकाना हक इन दिनों तरह-तरह के आर्थिक अपराधियों या विवादास्पद कारोबारियों के पास आ गया है। और अगर जाहिर तौर पर इनकी नीयत पल-पल उजागर न भी होती हो, तो भी उनका वह एजेंडा तो रहेगा ही। कभी-कभी उनके सवाल मासूम लग सकते हैं, लेकिन अपना नाखूनों और दांतों के बिना वे आखिर खाएंगे क्या? इसलिए यह तो तय है कि वे या तो हर बातचीत में नफरत को आगे बढ़ाने का अपना एजेंडा लागू करते होंगे, या फिर वे कुछ भले लोगों से भली या बुरी कैसी भी बातें करके उनकी साख का इस्तेमाल अपनी साख को बनाने और बढ़ाने में करते होंगे। टीवी से परे अखबारों में भी कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी सारी साम्प्रदायिकता के बीच किसी एक धर्मनिरपेक्ष लेखक का एक कॉलम छापकर उसकी साख को अपनी साख में तब्दील करने का काम करते हैं। तो ऐसे में लिखने वाले लोगों, बहस में शामिल होने वाले लोगों, और इंटरव्यू देने वाले नेताओं या प्रमुख लोगों को क्या करना चाहिए? 

वैसे तो जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, उनके लिए यह कुछ मुश्किल काम ही होता है कि वे किसी भी माइक्रोफोन और कैमरे को मना कर सकें। और ऐसी मनाही का एक मतलब आगे के लिए दुश्मनी भी होता है। लेकिन भारतीय राजनीति में भी कुछ ऐसे लोग रहे हैं जिन्होंने कुछ चैनलों या कुछ अखबारों के लोगों के सवालों का जवाब देने से साफ मना कर दिया। इस वक्त अर्नब गोस्वामी टाईम्स नाऊ चैनल का मुखिया था, और वहां से नफरत फैलाता था, तो कुछ नेताओं ने भरी प्रेस कांफ्रेंस में भी टाईम्स नाऊ के रिपोर्टर के सवालों का जवाब देने से मना कर दिया था। ऐसा करना आसान नहीं रहता है क्योंकि कई बार नफरत से परे काम करने वाले मीडिया के लोग भी अपने नफरतजीवी साथी का साथ देने के लिए गिरोहबंदी पर उतर आते हैं, और नेता को एक पूरा बहिष्कार झेलना पड़ सकता है। फिर यह भी है कि इंटरव्यू देने वाले या प्रेस कांफ्रेंस लेने वाले लोगों का अपना नैतिक मनोबल भी इतना ऊंचा रहना चाहिए कि वे किसी बुरे मीडिया को मुंह पर साफ-साफ मना करने का हौसला रख सकें, और दिखा सकें। 

लेकिन बुनियादी बात पर अभी भी चर्चा बाकी है कि ऐसे बदनाम मीडिया के बदनाम लोगों से बात करनी चाहिए या नहीं? इसका जवाब आसान नहीं हो सकता, लेकिन है जरूर। लोग इंटरव्यू दे सकते हैं, सवालों के जवाब दे सकते हैं, लेकिन उनमें से किस जवाब के किस हिस्से को किस तरह से पेश किया जाएगा, यह तो उसी बदनाम मीडिया के बदनाम रिपोर्टर या एंकर के हाथ में रहेगा। इसलिए ऐसे लोगों से बात करना कम खतरनाक नहीं होता है क्योंकि वे लोग वैचारिक रूप से असहमत लोगों से बात करने, उन्हें जगह देने का दिखावा भी करते हैं, और उनकी बातों को कुल मिलाकर तोड़-मरोडक़र अपने एजेंडा के मुताबिक इस्तेमाल भी कर लेते हैं। अगर पांच उंगलियां एक माईक और एक मुंह होने से ही कोई इंटरव्यू लेने के हकदार हो सकते हैं, तो बदनाम मीडिया के बदनाम लोगों के मुकाबले बेहतर साख वाले छोटे मीडिया के अनजान लोगों से भी बात करना बेहतर है। 

नेताओं के मुकाबले सडक़ों पर आम जनता अधिक जागरूक रहती हैं क्योंकि उसका दांव पर कम लगा रहता है। वह कई बार कई बदनाम चैनलों के लोगों से बात करने से मना कर देती है, और उन्हें आईना भी दिखाती है कि उनकी किन हरकतों की वजह से वे उनसे बात करना नहीं चाहते। लेकिन वोटों की राजनीति में लगे हुए लोग हर बार इतना खरा-खरा नहीं बोल पाते। बीच-बीच में ऐसा जरूर होता है कि कोई राजनीतिक पार्टी किसी चैनल का कम या अधिक समय तक पूरा बहिष्कार करती है, वहां पर अपने प्रवक्ता नहीं भेजती है, लेकिन धीरे-धीरे फिर बीच का कोई रास्ता निकाला जाता है, और सार्वजनिक जीवन की इस बात को मान लिया जाता है कि राजनीति में कोई स्थाई शत्रु नहीं होते। लेकिन अभी सोशल मीडिया पर यह सवाल उठना एक बड़ा प्रासंगिक मामला है, और इस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। ऐसी चर्चा से नफरतजीवी लोगों में थोड़ी सी बेचैनी होगी क्योंकि सवाल पूछने के उनके पेशेवर एकाधिकार के खिलाफ जाकर दूसरे लोग भी उनसे सवाल कर सकेंगे। और सवाल करने वालों से सवाल न करना कोई शर्त तो हो नहीं सकती। ऐसी जागरूकता से ही नफरत फैलाने वाले लोगों के हौसले पस्त हो सकते हैं। जो उनका बहिष्कार करना चाहें, वह भी ठीक है, और जो उनसे बात करते हुए कुछ असुविधाजनक सवाल करना चाहें, वह भी ठीक है। लेकिन उन्हें स्वाभाविक मीडिया मानकर उनकी नफरत को अनदेखा करना ठीक नहीं है। वरना नफरत पर टिकी हुई मीडिया आज के लिए नवसामान्य  हो जाएगी। आज हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में कई किस्म की नफरत नवसामान्य हो गई है, लेकिन बदनाम मीडिया को नवसामान्य का दर्जा देना देश में नफरत को और फैलाने से कम कुछ नहीं होगा।

(Daily Chhattisgarh)

 

एक प्रोफेसर के भाषण पर हमले के पीछे की नीयत और साजिश समझें

 15 फरवरी 2023


देश के एक सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, जेएनयू, के एक प्राध्यापक सुरजीत मजूमदार अभी ओडिशा में राजधानी के उत्कल विश्वविद्यालय सभागार में एक नागरिक मंच के कार्यक्रम में अंबेडकर पर बोल रहे थे कि कुछ लोगों ने चिल्लाते हुए उन्हें गालियां बकीं, और आयोजकों के साथ धक्का-मुक्की की। प्रोफेसर मजूमदार अंबेडकर के सिद्धांतों और उद्देश्यों पर बात करते हुए प्राकृतिक संसाधनों को कुछ लोगों को सौंपे जाने की बात कह रहे थे, तो यह बात कुछ बाहरी लोगों को नागवार गुजरी। वहां मौजूद लोगों का कहना है कि उन्होंने अडानी जैसे किसी उद्योगपति का नाम नहीं लिया था, लेकिन इस मुद्दे पर बोलना ही कुछ लोगों को गवारा नहीं हुआ, और वे विरोध और धक्का-मुक्की पर उतर आए। इस धक्का-मुक्की में एक स्थानीय प्राध्यापक गिरफ्तार भी हुए हैं, और हमलावरों को दक्षिणपंथी गुटों से जुड़ा बताया गया है। 

अब अंबेडकर वैसे भी लोगों को नहीं सुहाते हैं। उनकी बातें संविधान के तहत तो हैं ही, वे बातें सबसे कुचले और वंछित तबकों को हक दिलाने की बातें भी हैं। जिस तरह वे संविधान के लिए अपनी सोच सामने रखते हुए हमेशा ही एक सामाजिक न्याय की वकालत करते रहे, उसकी वजह से वे दलितों के लिए एक प्रेरणा भी बने कि वे जात-पात और छुआछूत मानने वाले हिन्दू समाज को छोडक़र बाहर निकलें, और जात-पात न मानने वाले बौद्ध समाज में जाएं। इस तरह देश के कट्टर हिन्दुओं की नजरों में अंबेडकर इसलिए भी खटकते हैं कि उन्होंने हिन्दू समाज के सबसे निचले कहे जाने वाले तबके, पैरोंतले लगातार कुचले जाने वाले दलितों को हिन्दू समाज से हटा दिया। अब इसके बाद अगर उनकी नसीहत को याद दिलाते हुए कोई जानकार और विद्वान प्रोफेसर प्राकृतिक स्रोतों को लेकर यह फिक्र जाहिर करता है कि ये स्रोत कुछ लोगों को दिए जा रहे हैं, तो इसका एक मतलब यह भी होता है कि वे हिन्दू समाज के भीतर के दलितों के शोषण की चर्चा करते हुए उससे आगे बढक़र आदिवासियों के हक की बात भी कर रहा है, और यह बात हिन्दुत्व के ठेकेदारों, और कारखानेदारों के दलालों, दोनों को खटकने वाली बात है, और आज के हिन्दुस्तान में एक तबका ऐसा खड़ा हो गया है जो कि ये दोनों ही झंडे अपने डंडों पर लगाकर चल रहा है। 

जेएनयू जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को सुनने का ओडिशा में यह गिना-चुना मौका ही रहा होगा। ओडिशा के बारे में लोगों को यह याद रखना चाहिए कि वहां दलितों से बड़ा मुद्दा आदिवासियों का है, और आदिवासियों के जंगल, उनके पहाड़, इन सबको कारखानेदारों को देने के खिलाफ दुनिया का एक सबसे चर्चित आंदोलन ओडिशा में चल रहा है। ऐसे में अभी की इस ताजा घटना को समझने की जरूरत है कि सिर्फ पढ़े-लिखे और समझदार, सोचने वाले लोगों के बीच अगर एक सभागृह में कोई कार्यक्रम हो रहा है, तो वहां पहुंचकर विरोध करना अनायास नहीं हो सकता, और यह विरोध जेएनयू के नाम का भी रहा होगा, और जंगलों पर आदिवासियों के हक की वकालत का भी विरोध रहा होगा। ऐसा लगता है कि विरोध की यह साजिश हमलावर हिन्दुत्ववादियों और कारखानेदारों की तरफ से पहले से गढ़ी गई होगी। क्योंकि हमलावर हिन्दुत्ववादियों को खुद होकर तो जंगलों पर आदिवासियों के हकों की अलग से समझ नहीं है। ऐसा लगता है कि कारखानेदारों के दलालों ने अपने प्राकृतिक समर्थक हिन्दुत्ववादी हमलावरों को साथ लेकर इस कार्यक्रम में यह विरोध किया। यह विरोध अपने आपमें बतलाता है कि आज के हिन्दुस्तान में अंबेडकर की सोच की कितनी जरूरत है, और इस सोच का विरोध करने वाली ताकतें कितने हमलावर तेवरों के साथ मौजूद हैं। 

न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया के तमाम बड़े जंगलों वाले देशों में कारखानेदार और कारोबारी जिस तेज रफ्तार से और जितनी बड़ी मशीनों के साथ कुदरत पर हमला कर रहे हैं, उसकी भरपाई अगले लाखों बरस तक होने के कोई आसार नहीं रहेंगे। अमेजान के जिन जंगलों से दुनिया भर में बिखरा हुआ कारोबार करने वाली कंपनी अमेजान ने अपना नाम लिया है, अमेजान के उन जंगलों को खत्म करने की पूरी कोशिशें चल रही हैं। यह कुदरत का बड़ा अजीब सा इंतजाम है कि जहां खनिज हैं वहीं पर जंगल हैं, और जहां पर जंगल हैं वहीं पर आदिवासी हैं, और इसलिए आदिवासियों की बेदखली के बिना खनिज निकालना मुमकिन नहीं है। यह हाल हम छत्तीसगढ़ में हसदेव के सबसे घने जंगलों के नीचे से कोयला निकालने की अडानी की हड़बड़ी में भी देख रहे हैं, और दुनिया भर के जंगलों में अलग-अलग कंपनियों के हमलों की शक्ल में भी। ऐसे में अगर अंबेडकर को याद करते हुए कोई विचारक इन हमलों के खतरे गिनाता है, तो आज ऐसे विचारक को ही एक खतरा मानकर उस पर हमले किए जा रहे हैं। इनसे पहली बात तो यही साबित होती है कि आज लोगों के कुदरत पर हक बनाए रखने के लिए अंबेडकर की सोच कितनी जरूरी है। दूसरी बात यह साबित होती है कि हिन्दुस्तान में कारोबारी हमलावर गिरोह सिर्फ राष्ट्रवादी खाल ओढक़र नहीं आते, वे हिन्दुत्ववादी खाल ओढक़र भी आ सकते हैं, आ रहे हैं। अभी जब एक अंतरराष्ट्रीय भांडाफोड़ एजेंसी ने अडानी पर खाता-बही में हेरफेर करके, विदेशी रास्तों से संदिग्ध पैसा लाकर कारोबार को बड़ा दिखाने की तोहमत लगाई, तो रातों-रात अडानी ने इसे हिन्दुस्तान पर हमला करार दिया। और अडानी के बचाव में स्वघोषित हिन्दू सांस्कृतिक संगठन आरएसएस ने झंडा-डंडा उठा लिया। जहां पर साफ-साफ जांच एजेंसियों के हरकत में आने की जरूरत थी, वहां पर तिरंगे झंडे से लेकर भगवा झंडे तक की ढाल खड़ी कर दी गई। इस पूरे सिलसिले को समझने की जरूरत है। और ऐसे सिलसिले को समझाने वाले न रहें, इसलिए भी जेएनयू जैसी जगह को खत्म करने की खुली कोशिश चल रही है। जिस दिन जेएनयू जैसे संस्थानों से उपजी हुई जागरूकता खत्म हो जाएगी, उस दिन हिन्दुस्तान में जल, जंगल, जमीन को बचाने के आंदोलन भी खत्म हो जाएंगे। और देश का एक हमलावर तबका वैसे ही ‘अच्छे दिन’ लाने में लगा हुआ है। 

(Daily Chhattisgarh)