जांच एजेंसियों पर सरकारों का कब्जा और चरमराता लोकतंत्र

31 जुलाई 2025 

 

तमिलनाडु की डीएमके सरकार की एक तिकड़म पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए यह कहा है कि वहां के एक पूर्व मंत्री वी.सेंथिल बालाजी के खिलाफ घूस लेकर नौकरी देने के एक मामले में सरकार ने जिस तरह से कथित रिश्वत देने वाले दो हजार लोगों को आरोपी बना दिया है, और पांच सौ गवाह जोड़ दिए हैं, वह राज्य सरकार की बदनीयत बताता है। अदालत ने कहा कि ऐसे में तो इस मामले की सुनवाई के लिए एक स्टेडियम की जरूरत पड़ेगी। पिछले दो दिनों से सुप्रीम कोर्ट इस मामले में राज्य सरकार को फटकार लगा रहा है और कह रहा है कि वह एक ऐसी नौबत खड़ी कर रही है कि जिस पूर्व मंत्री के खिलाफ घूस लेने के आरोप हैं, उस मंत्री की पूरी जिंदगी तक यह मामला चलता ही रहे, कहीं किनारे न पहुंच जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ एक तकनीकी बात है कि रिश्वत देने वालों ने भी अपराध किया है, लेकिन उन पर मुकदमा चलाने से मुख्य अभियुक्त तो बच ही जाएगा, क्योंकि मामले का कभी फैसला ही नहीं हो सकेगा। अदालत ने कहा कि मुख्य अभियुक्त एक ताकतवर राजनेता है, और उनके भाई, निजी सहायक, और आसपास के कुछ लोग जिन्होंने नौकरी के लिए पैसे वसूले थे उतने लोगों को ही मुख्य अभियुक्त मानना चाहिए।  

लोकतंत्र में पुलिस राज्य सरकारों के हाथ रहती है, और वही पहली जांच एजेंसी रहती है। देश की बाकी तमाम जांच एजेंसियों की बारी पुलिस के बाद ही आती है, सरकारें तय करती हैं कि किसी मामले को आर्थिक अपराध जांच ब्यूरो को देना है, या सीबीआई को देना है, या केन्द्र सरकार की जांच एजेंसी ईडी किसी दूसरी पुलिस या एजेंसी की एफआईआर पर काम शुरू करती है, एक पुरानी एफआईआर पर नया केस दर्ज कर लेती है। लेकिन भारत के संघीय ढांचे में पहला जुर्म दर्ज करना, पहली एफआईआर, पहली जांच, यह सब कुछ राज्य सरकार के तहत आता है। और देश में राजनीतिक कटुता धीरे-धीरे इतनी जहरीली हो गई है कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मातहत काम करने वाली, अक्सर भ्रष्ट, और बहुत से मामलों में सत्ता के रूझान से साम्प्रदायिक हो चुकी पुलिस पहला जुर्म दर्ज करती है, पहली कार्रवाई करती है, और उसके खिलाफ सुनवाई में, राहत पाने में, कई महीनों से लेकर कई बरस तक लग जाते हैं। कुछ मामलों में तो हमने देखा हुआ है कि बिना सुनवाई पांच-छह बरस तक लोग जेलों में बंद हैं, यानी ऐसे मामलों में प्रक्रिया ही पनिशमेंट हो गई है। 

राज्य सरकारों की पुलिस और एफआईआर की असीमित ताकत का इस्तेमाल हम अलग-अलग कई पार्टियों की राज्य सरकारों के तहत देख चुके हैं। किस तरह एक कार्टून, या एक सोशल मीडिया पोस्ट पर महीनों तक जेल में ठूंस दिया जाता है, कार्टूनिस्ट पर राजद्रोह का मुकदमा चलने लगता है। एक तरफ साम्प्रदायिक नफरत का झंडा लहराते चारों तरफ नारे लगाते लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि उनके राज्य की सत्ता और पुलिस उनकी हिमायती हैं, और दूसरी तरफ एक व्यंग्य लेख या कि एक कार्टून सुप्रीम कोर्ट तक जमानत नहीं पाने देता। अब तो देश की बड़ी अदालतों में भी कुछ ऐसी हो गई हैं कि वे लोगों को राजनीतिक पैमानों पर राष्ट्रवादी देशभक्ति सिखाने लगी हैं, यह भी सिखाने लगी हैं कि कौन से मुद्दे देशभक्ति के हैं, और कौन से नहीं। जब राज्य सरकारों का संवैधानिक शपथ से परे का रूख, असहमति के खिलाफ उनका हमलावर तेवर, और ठकुरसुहाती में लगी हुई भ्रष्ट पुलिस का मेल हो जाता है, अदालतें राष्ट्रवाद से अपनी प्रतिबद्धता दिखाने पर उतारू हो जाती हैं, तो फिर वैचारिक विविधता के सांस लेने लायक हवा ही नहीं बचती। यह नौबत खतरनाक इसलिए है कि कब किस राज्य में किसकी सरकार रहे, इसका कोई ठिकाना तो रहता नहीं है, और भारत जैसे अक्खड़ और अधकचरे हो चले लोकतंत्र में गौरवशाली परंपराओं को मानने का सिलसिला भी खत्म हो चला है, और ऐसे में सिर्फ बुरी मिसालें सत्ता के फैसलों की जमीन बन जाती हैं। यह नौबत लोकतंत्र में परस्पर सम्मान की एक बुनियादी जरूरत को खत्म कर रही है। यह सिलसिला खतरनाक है, और यह आगे कहां तक जाएगा इसका ठिकाना नहीं है। हम अलग-अलग कई प्रदेशों में सत्तारूढ़ पार्टियों की राजनीतिक पसंद और नापसंद के आधार पर कई हिंसक और साम्प्रदायिक संगठनों की परले दर्जे की सार्वजनिक हिंसा को देखकर हैरान हैं कि उनके वीडियो सुबूत रहने पर भी उनके खिलाफ कार्रवाई इसलिए नहीं होती है कि उनकी राजनीतिक, धार्मिक, या साम्प्रदायिक सोच सत्ता को माकूल बैठती है। यह सिर्फ गुंडों की किसी फौज को संरक्षण देने जितना मामला नहीं है, यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अंत का आरंभ भी है। 

लोकतंत्र में सहनशक्ति का एक लचीलापन उसे महान बनाता है। असहमति के लिए बर्दाश्त उसकी ताकत रहती है। लेकिन भारत में वह खत्म होते दिख रही है, और जब राज्य की पुलिस को ऐसे राजनीतिक, धार्मिक या साम्प्रदायिक मकसद से बेजा इस्तेमाल करना एक आम बात हो जाती है, तो फिर नेताओं को अपने आपको, या अपने गुर्गों को बचाने के लिए पुलिस को एक औजार की तरह इस्तेमाल करने में कोई शर्म नहीं रह जाती। राज्यों की पुलिस कई जगह पर सत्तारूढ़ पार्टी की पोशाक में, उसके झंडे-डंडे लेकर चलने में गर्व महसूस करते दिखती है। अब ऐसा लगने लगा है कि देश का संघीय ढांचा तो ठीक है, लेकिन राज्यों के नियंत्रण की पुलिस, और केन्द्र सरकार के नियंत्रण की ईडी, और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों पर जो संपूर्ण नियंत्रण राजनीतिक ताकतों का हो गया है, उसके वजनतले संघीय ढांचा भी चरमरा रहा है, और लोकतंत्र भी चरमरा रहा है। देश के सोचने-विचारने वाले लोगों को, संविधान के शब्दों और उसकी भावना के जानकार लोगों को इस बारे में फिक्र करनी चाहिए कि हम किस तरफ ढुलक रहे हैं, और खाई में गिरने से कितने दूर बचे हैं।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 जुलाई 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जुलाई 2025



 

मंच किसे दें, और मंच पर सम्मान किसका करें, सोचें

30  जुलाई 2025 

 अभी एक बड़ी नामी-गिरामी हिन्दी साहित्य पत्रिका का एक जलसा हो रहा है जिसमें मंच पर कई तरह के लोगों को बुलाया गया है। एक बार कार्यक्रम की जानकारी उजागर हुई, तो पत्रिका के आयोजकों से लोगों ने शिकायत की कि आमंत्रित वक्ताओं में कम से कम एक नाम तो ऐसा भी है जिस पर महिलाओं के शोषण की शिकायतें हैं, और मामला भी चल रहा है। महिलाओं के हक की इस नवजागरूकता के चलते हुए अभी कुछ हफ्ते पहले ही एक और आयोजन में एक महिला से बदसलूकी करने वाले बड़े नामी-गिरामी साहित्यकार को शायद एक माफीनामा लिखवाकर वहां से चलता किया गया था। कार्यक्रम से तो बिदा कर दिया गया था, लेकिन बाद में बहुत से लोगों ने यह सवाल उठाया कि यह आदमी तो पहले से ही महिलाओं के बारे में बड़ी बुरी बदजुबानी करने के लिए सार्वजनिक रूप से जाना जाता था, उसके बाद किस तरह इस साहित्य आयोजन में कुछ हफ्ते रहकर साहित्य रचना करने के लिए इसे छांटा गया था? पहले की शोहरत तो सोशल मीडिया पर सामने थी ही, उसके बावजूद निर्णायकों ने इस, और ऐसे व्यक्ति को भला कैसे छांटा? फेसबुक पर इस पिछली घटना को लेकर काफी लाठियां चलीं, और साहित्यकार जब एक-दूसरे को काटने दौड़ते हैं, तो उनके पेन की जंग लगी और सूखी निब भी चलने लगती है, उंगलियों के जोड़ों में गठिया का दर्द हो, तो भी की-बोर्ड खटखटाने लगता है। लेकिन उस आयोजन से इतना तो हुआ था कि लोगों को समझ आ गया कि महिलाओं के मामले में किसी भी तरह से बदनाम मर्द को कुछ दूर ही रखने में सर्फ की खरीददारी की तरह समझदारी है। 

अब इस साहित्यिक पत्रिका का यह मामला फिर एक सवाल को उठा रहा है कि क्या अपने आपको एक संवेदनशील विधा कहने वाले साहित्य को भी अपने अतिथियों के महिलाविरोधी, या कि महिलाओं के खिलाफ हिंसक होने जैसी बातों को अनदेखा करना चाहिए? जिस महिला को इस बार के आमंत्रित एक वक्ता ने प्रताडि़त किया बताया जाता है, उसने तो अदालत में इसके खिलाफ मुकदमा कर रखा है, और भी दूसरी लड़कियों या महिलाओं की इस तरह की शिकायतें हैं। कहने के लिए लोग यह भी कह सकते हैं कि प्राकृतिक न्याय तो यही होगा कि जब तक किसी के खिलाफ आरोप साबित न हो जाएं तब तक उन्हें बेकसूर माना जाए। लेकिन हमारा मानना है कि इस तर्क का विस्तार यहां तक हो सकता है कि जिला अदालत से सजा को आखिरी सजा कैसे मान लिया जाए, जबकि अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट बाकी ही हैं? कहने का मतलब यह कि हम किसी के वोट देने के हक को छीनने की बात नहीं कर रहे, हम महज यह कह रहे हैं कि किसी कार्यक्रम में किसे अतिथि बनाया जाए, किसे वक्ता बनाया जाए, यह तो किसी संस्था या निर्णायक मंडल के विवेक की बात रहती है, और वहां पर वे इस तरह के बदनाम लोगों को छोड़ सकते हैं। 140 करोड़ आबादी वाले इस देश में वैसे तो हर नागरिक का हक बराबरी का है, लेकिन कितने लोगों को मंच पर जगह दी जा सकती है? इसलिए जो लोग निर्विवाद रहते हैं, सिर्फ उन्हीं को सम्मान की जगह पर बिठाना चाहिए, वरना उनकी बदनामी की वजह, उनके जुर्म की शिकार जो महिलाएं हैं, या दूसरे लोग हैं, उन लोगों के साथ यह सामाजिक नाइंसाफी होगी। 

इन दोनों विवादों से अब यह बात तो साफ होती है कि आने वाले वक्त में कार्यक्रमों के आयोजकों को यह ध्यान रखना पड़ेगा कि उनके किसी अतिथि या वक्ता की वजह से कार्यक्रम के बीच में नारेबाजी शुरू हो सकती है। एक वक्त टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईसेंज के एक कार्यक्रम में एक बड़े नामी-गिरामी फिल्मी गीतकार को बुलाया गया था। जैसे ही छात्रों को यह पता लगा, उन्होंने क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड इस बात से भर दिए कि इस गीतकार पर तो महिलाओं के शोषण के मी-टू के आरोप लगे थे, और इसे किस नैतिक आधार पर यहां बुलाया जा रहा है? विरोध इतना हुआ कि उसे बुलाना रद्द कर दिया गया, कार्यक्रम ही रद्द हो गया। वह कार्यक्रम भी तय तारीख के एक दिन पहले ही रद्द किया गया था, और इस बार इस प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका के कार्यक्रम के पहले भी ऐसा ही मुद्दा बन रहा है। आयोजकों में कुछ महिलाएं भी हैं, और यह उनके विवेक पर, और नैतिकता के उनके पैमानों पर भी निर्भर करता है कि वे इन शिकायतों के आधार पर अपने एक मेहमान को मना करने को ठीक मानते हैं या नहीं, और अगर ठीक मानते हैं तो ऐसा करने का हौसला दिखाते हैं या नहीं। 

ऐसी एक शिकायतकर्ता महिला से आज सुबह बात करने के बाद इस संपादक को यह बात समझ में आई कि हाल की ही इन दो घटनाओं के विरोध से अब इतनी जागरूकता तो फैलेगी कि लोग अपने कार्यक्रमों में किसी को बुलाने के पहले उनके बारे में चार बार सोचेंगे कि कहीं उनके नाम पर कोई बखेड़ा तो नहीं होगा? वैसे भी यह सावधानी हर आयोजक को बरतनी भी चाहिए। आज तो अखबार और टीवी चैनल, पत्रिकाएं और तरह-तरह की संस्थाएं ऐसे कार्यक्रम करती हैं जिनमें सत्ता के बड़े-बड़े लोगों को बुलाया जाता है, और अपने हर किस्म के बदनाम, या बहुत बदनाम विज्ञापनदाताओं का प्रदेश के गौरव की तरह सम्मान करवाया जाता है। बाद में पता लगता है कि चार दिन पहले मुख्यमंत्री के हाथों जिसे प्रदेश का गौरव बताया गया था, वह किसी स्पा सेंटर में चकलाघर चलाते हुए गिरफ्तार हुआ, या कि किसी पत्रकार के कत्ल में कुनबे सहित जेल गया। आज कार्यक्रमों का, और उनमें भागीदारों का यही स्तर रह गया है। यह तो भला हो साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े हुए कुछ ऐसे कार्यक्रमों का जिनमें लोग कुछ आपत्तियां दर्ज कराने लगे हैं। यह बात तो कार्यक्रमों में जाने वाले मुख्य अतिथियों और बाकी अतिथियों को भी समझना चाहिए कि आयोजक उनका किस तरह का नाजायज और बाजारू इस्तेमाल करते हैं। हर व्यक्ति जो कुछ रकम खर्च करने के लिए तैयार हो, वह प्रदेश का, देश का, दुनिया का, या कि आकाशगंगा का गौरव बन सकता है। सामाजिक प्रतिष्ठा का यह धंधा साहित्यिक प्रतिष्ठा से थोड़ा अलग तो है, लेकिन हम इन दोनों का जिक्र एक साथ इसलिए कर रहे हैं कि इन दोनों में एक ही किस्म की सावधानी बरतने की जरूरत है, आयोजकों को भी, और जहां पर आयोजक ही कमाई की बदनीयत से लबालब हैं, वहां पर आमंत्रित मुख्य अतिथियों को सावधानी बरतनी चाहिए। कुछ लोगों ने ऐसे आयोजनों को इतना नियमित धंधा बना लिया है कि वे इवेंट मैनेजमेंट कंपनी अधिक लगते हैं, मीडिया कारोबारी कम लगते हैं। इनमें शामिल होने वाले लोगों को अपनी इज्जत की भी परवाह करनी चाहिए कि कल जिस अस्पताल मालिक का सम्मान किया है, आज उसे नाजायज कमाई के मामले में जेल भेजा जा रहा है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जुलाई 2025



 

एआई खुद तो लिंगमुक्त है, लेकिन नौकरियां वह पहले महिलाओं की खा रहा है!

 29 जुलाई 2025 

 

कुछ हफ्ते या महीने पहले हमने दुनिया के जानकार विशेषज्ञों के इस अंदाज पर लिखा था कि एआई का हमला महिलाओं वाले कामकाज पर पहले होगा क्योंकि वे दफ्तरों में रिसेप्शनिस्ट का, टेलीफोन ऑपरेटर का, अकाऊंटेंट का काम अधिक करती हैं, और कारखानों में मशीनों पर, ट्रकों या क्रेन को चलाने जैसे कामों में मर्द अधिक लगे रहते हैं। अब आज सुबह हमने चैटजीपीटी से सलाह मांगी कि आज अपने अखबार में संपादकीय लिखने के लिए पूरी दुनिया में सबसे जलते-सुलगते, या महत्वपूर्ण मुद्दे कौन से हैं जिन पर विचार का एक कॉलम लिखने की गुंजाइश, और जरूरत है? इसके जवाब में उसने पलक झपकते हमारे कहे मुताबिक ऐसे 25 मुद्दे, 25-25 शब्दों में लिखकर दे दिए, जो कि सचमुच ही लिखने लायक विषय हैं। अब भला किसी की मदद मिल रही है, तो उसकी जरा सी वाहवाही कर देने में क्या बुराई है? फिलहाल चैटजीपीटी से यह तय हुआ है कि हर सुबह वह 10.30 बजे हमें हमारे देश-प्रदेश से लेकर बाकी दुनिया तक के मुद्दों में से ऐसे 25 मुद्दों को 25-25 शब्दों में निकालकर देगा ताकि विषयों की विविधता पर एक नजर डाली जा सके। अब इससे एक खतरा बढ़ता है कि विषयों की विविधता तो होगी, लेकिन ऐसी विविधता किसी एक अखबार की खबरों में नहीं होगी, दुनिया के सबसे अच्छे टीवी चैनलों पर भी शायद नहीं होगी, और वेबसाइटों पर भी नहीं होगी। इस तरह चैटजीपीटी के पास यह ताकत रहेगी कि जिस दिन हम उससे कोई विषय सुझाने कहें, वह अपनी पसंद के विषय सुझा सकता है, या सकती है। लोगों को याद ही होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले ही एलन मस्क के एआई औजार, ग्रोक ने जिस तरह हिटलर की तारीफ की थी, और नस्लभेदी जनसंहार को सही ठहराया था, उससे दुनिया हक्का-बक्का रह गई थी। हम तो अपने अखबार के लिए कुछ लिखते हुए, कुछ गढ़ते हुए इन नए औजारों का प्रयोग सीख रहे हैं, और शुरूआती प्रयोग कर रहे हैं। आज के चैटजीपीटी के सुझाए 25 विषय इस अखबार के संपादक ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट भी किए हैं। 

इन विषयों में से एक विषय पर हम पहले भी लिख चुके हैं, और जो हमारी फिक्र की फेहरिस्त में ऊपर रहने वाला एक मुद्दा है। जिस तरह कुदरत ने बदन बनाते हुए महिला के लिए पुरूष के मुकाबले अधिक दिक्कतें खड़ी की हैं, और दुनिया भर में हर देश के समाज ने, हर धर्म और जाति ने महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा है, उसी मुताबिक एआई का पहला हमला महिला कर्मचारियों पर होने वाला है क्योंकि उसकी क्षमता महिलाओं के आज किए जा रहे कामकाज का विकल्प बनने की अधिक है। आज सरकारी और निजी दफ्तरोंं में, कारोबार और कारखानों में महिलाओं के किए जा रहे काम को छीन लेना एआई के लिए अधिक आसान रहेगा। ये काम डेस्क पर, कम्प्यूटर और टेलीफोन पर, सोशल मीडिया खातों पर, अकाऊंट और खतो-किताबत के काम के अधिक हैं, जिनमें महिलाओं का अनुपात अधिक है, और एआई ने बड़ी संख्या में ये नौकरियां खाना शुरू कर दिया है। एआई के लिए रात और दिन का फर्क नहीं है, जो कि महिला कामगारों के साथ कई बार जुड़ा रहता है, उसे गर्भधारण और बच्चे पालने की छुट्टी नहीं लगती, जो कि महिलाओं को लगती है, और बिना बहुत अधिक शारीरिक ताकत वाले कामों में भी महिलाएं अधिक रहती हैं, और वे काम एआई छीन रहा है। 

अभी कुछ अरसा पहले हमने कुछ एआई मॉडल्स से यह समझने की कोशिश की थी कि उनके अपने पूर्वाग्रह, उनकी अपनी सोच क्या है? वे औरत हैं, या मर्द हैं, वे आस्तिक हैं या नास्तिक, वे किस राष्ट्रीयता या धर्म के हैं, किस पेशे के हैं, उनके मूल्य क्या हैं? इन सबके जवाब में चैटजीपीटी का कहना था कि उसकी ट्रेनिंग जिन सामग्रियों से हुई है, उसकी सोच उन्हीं से प्रभावित है। अगर उसने पुरूषों के लिखे हुए को अधिक पढक़र अपनी समझ विकसित की है, तो उसका नजरिया कुछ पुरूष सरीखा हो सकता है। कुछ दूसरे एआई विशेषज्ञों का भी यह कहना है कि अगर उसकी मशीन-लर्निंग में इस्तेमाल सामग्री में किसी धर्म का अधिक विरोध है, किसी जेंडर का अधिक विरोध है, तो वह उसके पूर्वाग्रहों में झलकते चलेगा, और उसकी सुझाई हुई बातें, दिए हुए निष्कर्ष उससे प्रभावित रहेंगे। इसी तरह चूंकि एआई की ट्रेनिंग में पुरूषों का लिखा हुआ अधिक है, पुरूष सरकार से लेकर कारोबार तक अधिकतर जगहों पर लीडरशिप की भूमिका में है, और महिलाएं आमतौर पर उनके सहायक की भूमिका में है, इसलिए एआई से अगर नौकरियां कम करने की सलाह मांगी जाएगी, तो वह सहायकों की नौकरियां पहले खाएगा, लीडरों की बाद में। और यह भी एक वजह है कि आज जब दुनिया भर के कारोबार एआई के पास एक जादुई छड़ी होने की उम्मीद कर रहे हैं जिससे कि उनकी कंपनी का मुनाफा बढ़ जाएगा, तब एआई ऐसा करिश्मा दिखाने के लिए पहला हमला उन्हीं नौकरियों और रोजगार पर करेगा जिसमें आज आमतौर पर महिलाएं लगी हुई हैं, और जिन कामों को आसानी से कम्प्यूटरों के हवाले किया जा सकता है। दुनिया में आज वैसे भी कामकाज के लायक महिलाओं में महिलाओं की भागीदारी 47 फीसदी है, और ऐसी ही काबिलीयत के पुरूषों में कामकाजी की भागीदारी 72 फीसदी है। कुल वर्कफोर्स में देखें तो महिलाएं 39-40 फीसदी हैं, और पुरूष 60-61 फीसदी। 

मतलब यह कि एआई अपनी क्षमता और अपनी प्रकृति से कुछ इस तरह की है, कि उससे महिलाओं के रोजगार पहले जाने हैं, अधिक जाने हैं, और दुनिया के कामकाजी लोगों में महिलाओं के घट जाने से परिवार में बच्चों पर पडऩे वाला फर्क भी बढऩे जा रहा है। यह सिलसिला थमने वाला इसलिए नहीं है कि दुनिया के तमाम कारोबार, और अब दुनिया की तमाम सरकारें भी, खर्च घटाने के लिए कमर कसकर बैठी हैं, और एआई इनमें से हर किसी को किफायत करके देने वाला औजार साबित हो चुका है। यह तो एआई की शुरूआत ही है, आगे-आगे जाकर यह और कितने लोगों को बेरोजगार करेगा, यह इस पर आधारित बनने वाले औजारों पर निर्भर करेगा। आज जो, जहां, जिस काम में लगे हैं, उस काम में अगर वे बाकी लोगों के मुकाबले बेहतर होंगे, तो जरूर शायद उनका रोजगार बचे रहेगा, और हर जगह होता है कि सबसे कमजोर लोगों को सबसे पहले हटाया जाता है। 

(Daily Chhattisgarh)

धार्मिक दान-भावना तो ठीक है, लेकिन हिफाजत का क्या होगा?

28 जुलाई 2025 

 

छत्तीसगढ़ के बालोद में नासिक के विख्यात त्र्यंबकेश्वर मंदिर की तरह का एक विशाल मंदिर बनकर तैयार हुआ है जिसे पड़ोस के धमतरी जिले के रहने वाले एक व्यक्ति ने खेत बेच-बेचकर तीन करोड़ रूपए से बनवाया है। पिछले 21 बरस में यह 80 फीट की ऊंचाई का विशाल मंदिर बना है, और अगले बरस की शिवरात्रि तक सारी प्रतिमाएं आकर इसमें प्राण-प्रतिष्ठा की बात इसे बनवाने वाले ने कही है। दिलचस्प बात यह है कि इतने बड़े मंदिर का निर्माण बिना किसी नक्शे या डिजाइन के हुआ है, और न ही इसमें कोई आर्किटेक्ट या इंजीनियर रहे हैं। दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से धमतरी के एक व्यक्ति ने इसे दो मिस्त्री, और गांव के कुछ मजदूरों को लेकर बनाना शुरू किया, और अब यह 8 मंजिला इमारत जितनी ऊंचाई का बड़ा सा मंदिर बना है।

अखबार की रिपोर्ट में इस बात पर कोई हैरानी जाहिर नहीं की गई है कि अगर इसकी कोई डिजाइन नहीं थी, कोई इंजीनियर नहीं था, तो फिर इसे किसी सरकारी विभाग से इजाजत भी नहीं मिली होगी। अब नासिक के विख्यात मंदिर की इस प्रतिकृति को देखने के लिए, और धार्मिक भावना से पूजा-पाठ के लिए जाहिर है कि यहां त्यौहारों पर, और खासकर सावन में, शिवरात्रि पर हजारों लोग जुटेंगे। उस वक्त इतनी भीड़ के बीच यह ढांचा कितना मजबूत रहेगा, इसकी जवाबदेही किस पर रहेगी? यह तो किसी धर्मालु के लिए बड़ी अच्छी बात है कि वह अपने खेत बेचकर मंदिर बनवाए, या कोई और उपासना स्थल बनवाए। आमतौर पर तो धार्मिक काम बताकर लोग चंदा इकट्ठा करते हैं, और कई जगहों पर उस रकम में अफरा-तफरी हो जाती है। ऐसे में अपने खेत बेचकर मंदिर बनवाना एक नैतिक ईमानदारी है, लेकिन सवाल सार्वजनिक सुरक्षा का है। और यह हमारी तरह दूर बैठे हुए लोगों की सुरक्षा की बात नहीं है, यह इस मंदिर को मानने वाले धर्मालुओं की सुरक्षा की बात है, और हमारी इस बात को आलोचना की तरह न मानकर एक चेतावनी या सलाह की तरह मानना चाहिए कि धर्मालुओं की भीड़ जहां लगनी है, वहां 8 मंजिला इमारत जितना ऊंचा मंदिर का विशाल ढांचा बिना डिजाइन, बिना इंजीनियर, बिना इजाजत बना लेना कितनी समझदारी और जिम्मेदारी की बात है?

धर्म से जुड़े हुए जितने निर्माण होते हैं, उनमें से अधिकतर अवैध कब्जे की जमीन पर होते हैं, और इसीलिए बिना किसी सरकारी इजाजत के भी होते हैं। चूंकि कोई नक्शा दाखिल ही नहीं करना है, इसलिए कोई भी मिस्त्री या ठेकेदार अपने अनुभव से ऐसे ढांचे बना देते हैं, और वे खासे अरसे बिना हादसे के चल भी जाते हैं। लेकिन ऐसे मामलों में सरकार की जिम्मेदारी क्या बनती है? हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगे हुए अमलेश्वर में नदी के किनारे उसकी चौड़ाई में ही कई मंजिला एक धार्मिक इमारत बनते देखते आए हैं। यह पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का चुनाव क्षेत्र भी है, और वे पूरे पांच बरस इस निर्माण को देखते हुए ही आते-जाते रहे होंगे। यह शायद उनकी विधानसभा सीट का एकदम सडक़ किनारे का सबसे बड़ा धार्मिक निर्माण भी रहा होगा, और हमारा पूरा अंदाज है कि नदी से लगकर, सडक़ से लगकर इतने बड़े निर्माण की इजाजत नहीं मिल सकती थी। यह हाल देश के अधिकतर प्रदेशों में है, और किसी धर्म के अवैध निर्माण को छूने का हौसला किसी सरकार में नहीं दिखता। सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह बात कह चुका है कि किसी भी सार्वजनिक जगह पर कोई धार्मिक अवैध निर्माण नहीं होना चाहिए, लेकिन हमने एक भी धार्मिक अवैध निर्माण को हटाया जाता नहीं देखा है।

कोई छोटे-मोटे धार्मिक अवैध निर्माण हों तो समझ आता है, लेकिन जब करोड़ों रूपए लगाकर 80 फीट ऊंचा मंदिर बनाया जा रहा है, तो क्या उस जिले के कलेक्टरों को इन 21 बरसों में यह नहीं दिखा कि ऐसा निर्माण जब भक्तों से भरेगा, तो उनकी हिफाजत की गारंटी किसकी रहेगी? शायद ही किसी धर्म का कोई ऐसा उपासना स्थल हो जिसका कोई नक्शा पास होता हो। जो सौ-दो सौ बरस, या और अधिक पुराने धर्मस्थान हैं, उनके बनते समय तो म्युनिसिपलों के नियम नहीं रहे होंगे, लेकिन अभी तो पिछले सौ-पचास बरसों से ये नियम चले आ रहे हैं, और ये जनता की हिफाजत के लिए है। किसी भगदड़ के बात मौतों की न्यायिक जांच करवाने से जिंदगियां नहीं लौटतीं। फिर किसी एक धर्म का अवैध निर्माण दूसरे धर्मों के अवैध निर्माणों को भी बढ़ावा देता है, और अपने धर्म के भीतर भी कुछ दूसरे उत्साही दानदाता पहले वाले से बढक़र कुछ बनाने में लग जाते हैं। ऐसा सार्वजनिक मुकाबला एक खतरे के बाद दूसरा खतरा खड़ा करता है।

अब सवाल यह उठता है कि जिस प्रशासन को ऐसे निर्माण पर पहले दिन से कार्रवाई करनी थी, उसने तो 21 बरस गुजर जाने पर भी इतने विशाल ढांचे का निर्माण जारी रहने दिया है, जिसके बारे में बनाने वाले का ही कहना है कि उसका कोई भी इंजीनियर या आर्किटेक्ट नहीं है। अब अगर सिर्फ मिस्त्री और मजदूर ऐसा विशाल ढांचा बना सकते हैं, तो फिर म्युनिसिपल और सरकार को किसी भी तरह के नक्शे का नियम क्यों रखना चाहिए? वोटरों को नाराज करने से कतराते चलने वाले नेताओं से इस बारे में कुछ नहीं होगा, और न ही उन नेताओं के मातहत उनके ताबेदार बनकर काम करने वाले अफसरों से कुछ होगा, सिर्फ अदालत यह पूछ सकती है कि इस ढांचे की, और ऐसे दूसरे धार्मिक ढांचों की कानूनी स्थिति क्या है। यह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अपनी जिम्मेदारी इसलिए बनती है कि तकरीबन तमाम धार्मिक ढांचे सुप्रीम कोर्ट के बहुत साफ-साफ फैसले के खिलाफ बनते हैं, और जब ऐसी खबरें सार्वजनिक रूप से बाहर आती हैं, तो यह हाईकोर्ट की जवाबदेही रहती है कि उसका नोटिस ले। देखते हैं ऐसे मामलों में क्या होता है, और कम से कम इस अनूठे दान की तारीफ करने वाले बाकी पत्रकारों को यह बुनियादी सवाल भी पूछना चाहिए कि अगर इसमें कोई तकनीकी राय नहीं ली गई है, नक्शा पास नहीं कराया गया है, तो लोगों की हिफाजत की क्या गारंटी है? सरकार के नियम तो बिना नक्शा पास कराए चार लोगों के रहने वाले घर की इजाजत भी नहीं देते, और यहां तो हजारों की भीड़ जुटने का सामान खड़ा हो गया है, इतना बुनियादी सवाल तो अखबारों की जिम्मेदारी बनता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जुलाई 2025



 

सोशल मीडिया को देखते टीवी की हँसी कि उसे इडियट बॉक्स कहते थे

 27 जुलाई 2025

इन दिनों इंसानों की जिंदगी में सोशल मीडिया की बहार आई हुई है। वहां पर पहुंचते ही लोग अपने दिल-दिमाग के तौलिए तुरंत निकाल फेंकते हैं, और मोहब्बत से लेकर नफरत तक की नुमाइश शुरू कर देते हैं। कुछ बरस पहले हम लोग फिलीस्तीन की यात्रा पर थे, और रास्ते में एक किसी ने फेसबुक को लेकर यह किस्सा सुनाया कि अब अमरीकी सरकार ने सीआईए का बजट आधा कर दिया है कि जब पूरी दुनिया अपने दिल-दिमाग की बातें खुद होकर फेसबुक पर लिख रही है, तो फिर जासूसी करने के लिए इतने काम की क्या जरूरत है। वह बात थी तो मजाक, लेकिन बहुत हद तक वह सही भी है। आज कोई मामूली सी कंपनी भी किसी को काम पर रखने के पहले उसके सोशल मीडिया अकाऊंट खंगाल डालती है कि वहां कौन-कौन से कुकर्म फख्र के साथ पोस्ट किए गए हैं। हमें अपने अखबार में कुछ महीनों के लिए प्रशिक्षण पर पत्रकारिता के छात्रों को रखने के अनुरोध मिलते रहते हैं, और उनके एप्लीकेशन आते ही पहला काम हम यही करते हैं कि उनके सोशल मीडिया अकाऊंट देखते हैं कि वे ट्रेनिंग देने लायक हैं या नहीं।

कुछ तो सोशल मीडिया में, और कुछ कम्प्यूटर टेक्नॉलॉजी ने, ऐसी सहूलियत मुहैया करा दी है कि लोग कॉपी-पेस्ट कर सकते हैं, या कट-पेस्ट कर सकते हैं। मौलिक होना अब कोई अनिवार्यता नहीं रह गई है। मेरे ही सोशल मीडिया पेज पर एक से अधिक लोग ठीक एक ही टिप्पणी को पोस्ट कर देते हैं, और मैं पढक़र हैरान रहता हूं कि इन सबको किस बोधिवृक्ष की ये पत्तियां मिली हैं? 

जब किसी पर हमला करना होता है, तो फेसबुक और एक्स जैसी जगहों पर एक ही पोस्ट को सैकड़ों लोग अपने-अपने नाम से डालने लगते हैं जो कि उनके अपने लिए लिखी गई रहती है। अब अलग-अलग जात-धरम, राष्ट्रीयता, और पेशे वाले लोग एक ही वक्त दुबई, लाहौर, बलूचिस्तान, और सुल्तानपुर के गल्ला मंडी के पांडेय भोजनालय में एक ही किस्म की थाली, और साथ में कोकाकोला की वही बोतल, और खाली गिलास। 50 रूपए में 6 चपाती, पनीर, लबाबदार दाल के साथ पा सकते हैं! दुबई के होटल से लेकर गल्ला मंडी के पांडेय भोजनालय तक एक ही रेट, एक ही तस्वीर, और अलग-अलग लोग इन जगहों पर ठहरे हुए हैं। अब इन तस्वीरों से न तो मोहब्बत साबित हो रही है, और न ही नफरत। लेकिन लोगों में कुछ भी पोस्ट कर देने की हड़बड़ी ऐसी भयानक है कि वे चाहे जिंदगी में दुबई न गए हों, और बलूचिस्तान को तो नक्शे पर भी न पहचान पाएं, लेकिन वहां की हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी थाली पोस्ट करने की हड़बड़ी उन्हें बहुत है। 

यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े मशहूर तथाकथित पत्रकार, नेता, पार्टियों के आईटी मुखिया, और सांसद-विधायक, प्रवक्ता भी जिस हड़बड़ी में गढ़ी हुई झूठी बातों को पोस्ट करते हैं, वह तो भयानक ही है। गढ़ी हुई तस्वीरें, संदर्भ से परे चिपका दिए गए वीडियो पोस्ट करके लोग अपने आपको बेवकूफ, और/या बदनीयत साबित करने का नुकसान झेलते हुए भी हड़बड़ी में रहते हैं कि कहीं सनसनी फैलाने में वे पीछे न रह जाएं। अंग्रेजी में इसके लिए एक बड़ा अच्छा सा छोटा शब्द इस्तेमाल होता है, फोमो, जिसका मतलब है फियर ऑफ मिसिंग आऊट, यानी कहीं पीछे न रह जाएं, यह डर। 

लोग सोशल मीडिया पर औरों से आगे बढऩे की हड़बड़ी में भी तरह-तरह के सनसनीखेज झूठ पोस्ट करते रहते हैं, या एकदम मौलिक बनने के चक्कर में भी। यह सिलसिला खतरनाक इतना रहता है कि जब तक किसी पोस्ट के नीचे कमेंट में कोई एक जिम्मेदार व्यक्ति झूठ का पर्दाफाश करे, तब तक वह झूठ हजारों दूसरे लोग शेयर कर चुके रहते हैं। और दिलचस्प बात यह है कि उनमें से अधिकतर लोग ऐसे झूठ में से अपने तजुर्बे वाले पहले झूठ को अपना भी तजुर्बा बताते हुए पोस्ट करते चलते हैं। वे थाली को 50 का 60 रूपए भी नहीं करते, चिकन को पनीर भी नहीं करते, या कोफ्ता को दालमाखनी भी नहीं बताते। 

एक वक्त था जब टीवी को इडियट बॉक्स कहा जाता था, यानी बुद्धू-बक्सा। अब वक्त बदल गया है, अब सोशल मीडिया ने लोगों को झूठा, मक्कार, बेवकूफ, बदनीयत, और नफरतजीवी-हिंसक सब कुछ बना दिया है। इन दिनों सोशल मीडिया पर जिम्मेदार बने रहना खासा मुश्किल हो गया है। फिर यह भी है कि सोशल मीडिया पर आपको नफरत की कुश्ती में घसीटने के लिए भी लोग लगे रहते हैं, और उस कीचड़ से बचकर चलना भी थोड़ा मुश्किल होता है। टीवी नाम के बुद्धू बक्से के साथ इकतरफा बातचीत रहती थी, और वह आपको बातचीत में नहीं उलझाता था। सोशल मीडिया तो किसी टैक्सी या ऑटो स्टैंड के ड्राइवरों की तरह आपको बांह पकडक़र अपनी गाड़ी की तरफ खींचते चलता है, और किसकी गाड़ी अच्छी है, वह कितनी और सवारियां बिठाएगी, कब तक मंजिल पर पहुंचाएगी, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता है। 

फिर भी मेरा यह मानना रहता है कि जिम्मेदार लोगों को उनकी नजरों में आए, उनके परिचित लोगों के झूठ पर उन्हें सच याद दिला देना चाहिए। मैंने महिलाओं के खिलाफ, या कि जिंदगी की दूसरी कुछ बातों के खिलाफ बदनीयत से लिखे गए पोस्ट पर सच्चाई बता-बताकर बहुत से अच्छे दोस्त खोए हैं, जो कि मेरे लिए तो अच्छे थे, लेकिन जिनकी सोच घटिया थी। एक वक्त था जब मैं उनके पेज पर जाकर भी उनकी गलत बातों को सुधारने की कोशिश करता था, लेकिन अब समझ पड़ा कि बरगद की एक-एक पत्ती को पोंछने की तरह का यह अंतहीन काम किसी काम का नहीं है, इसलिए मैंने दूसरों के पेज देखना बंद कर दिया, और सुधारने का काम सिर्फ अपने पेज तक सीमित रख लिया। फिर भी सोशल मीडिया की बेवकूफ बना देने की क्षमता टीवी के मुकाबले लाखों गुना अधिक है, और आज उन्हीं घरों में बैठे हुए टीवी हँसता होगा कि सोशल मीडिया जैसी इडियट दुनिया को देखने के बाद भी लोग उसे इडियट बॉक्स कहते हैं। लोग अपनी जिंदगी के खाली समय में से इतना अधिक समय सोशल मीडिया पर गुजारते या गंवाते हैं कि जितना वे अपनी वास्तविक जिंदगी पर भी नहीं खर्चते। इसलिए सोशल मीडिया की आपकी संगत भी आज की असली संगत रह गई है, और उसे बर्बादी का सामान न बनने दें, अपना दायरा सीमित रखें, क्योंकि आपका दायरा भी आज आपकी पहचान है। 

ट्रम्प नाम का काला बादल भारतीयों पर मंडरा रहा...

 27 जुलाई 2025 

 

अमरीका को लेकर वैसे तो पूरी दुनिया फिक्रमंद है कि एक सनकी-तानाशाह की मनमानी किस देश को, कहां के नागरिकों को, किन उद्योग-व्यापारों को कहां ले जाकर पटकेगी, लेकिन जैसे-जैसे एक-एक जानकारी में इजाफा होता है, भारत जैसे देश में समझदार लोगों को निराशा बढ़ती जा रही है, समझदार लोगों को। बाकी लोगों के लिए अभी ट्रम्प के हित में हवन करने के लिए पर्याप्त हवन सामग्री बची हुई है, और उसकी तस्वीरें भी। आज लोगों को ट्रम्प नाम की इस महामारी से होने वाले पूरे नुकसान का अंदाज नहीं बैठ रहा है, लेकिन एक भी दिन ऐसा नहीं गुजर रहा है जब भारत का नुकसान बढ़ न रहा हो। अमरीका के आंकड़ों को देखें, तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के काम संभालते ही इस बरस अमरीका में भारतीयों के एफ-1 वीजा की संख्या 27 फीसदी गिर गई क्योंकि अब ट्रम्प वहां पढऩे आने वाले छात्रों के सोशल मीडिया खातों की जासूसी को अनिवार्य कर चुका है, और वीजा नीतियों को कड़ा कर चुका है। इसके साथ-साथ वह अमरीकी विश्वविद्यालयों पर सौ किस्म की रोक भी लगा चुका है जिसकी वजह से वहां अब विदेशी छात्रों की गुंजाइश घट गई है। अब भारतीय छात्रों की वीजा अर्जियां रद्द होना बढ़ गया है। नतीजा साफ है कि आने वाले बरसों में अमरीका में पढक़र तैयार हुए भारतीय नौजवानों की संख्या घट जाएगी, और वहां काम पाने वाले भारतीय छात्र भी इसी अनुपात में घट जाएंगे। यह बात भी तमाम लोग समझते हैं कि भारत से गए हुए जो लोग अमरीका में काम करते हैं, या पढऩे के बाद कोई काम पाते हैं, वे अपनी बचत का कुछ हिस्सा भारत में निवेश करते हैं, या परिवार के लिए भेजते हैं, और यह रकम छोटी नहीं होती है। अब ट्रम्प की मेहरबानी से इसमें खासी गिरावट आने का खतरा है। अभी तक के जितने आंकड़े हमारे सामने है, वे ट्रम्प के इस कार्यकाल में कम से कम एक चौथाई गिरावट के हैं। एक अंदाज बताता है कि ट्रम्प के चार बरस पूरे होने तक अमरीका में भारतीय छात्रों और कामगारों की गिनती आधी रह सकती है। और इस अनुपात से परे भी यह समझना जरूरी है कि अभी हर बरस भारत से साढ़े सात लाख के करीब लोग अमरीका पहुंचते रहे हैं, इसलिए इनकी गिनती में आधी गिरावट भारत के लिए कई लाख होगी। फिर ट्रम्प की यह चेतावनी अनदेखी नहीं करनी चाहिए जिसमें उसने दो दिन पहले ही अमरीका की बड़ी टेक कंपनियों को एक सम्मेलन में कहा है कि वे भारत और चीन से कर्मचारियों को न लें, और निर्माण भी विदेश में न करें। उसने कहा कि इन टेक कंपनियों ने अमरीकी आजादी का फायदा उठाया, और भारत और चीन को अपना उत्पादन केन्द्र बना लिया। अब समय अमेरिका फस्र्ट का है। ट्रम्प ने कुछ अरसा पहले एप्पल कंपनी को चेतावनी दी थी कि उसे भारत में आईफोन का उत्पादन बंद करना चाहिए, और अगर उसने ऐसा नहीं किया तो उस पर 25 फीसदी टैरिफ लगेगा। ट्रम्प की इस नई चेतावनी के बाद अगर अमरीकी टेक कंपनियां भारत में कर्मचारी रखना बंद करती हैं, तो इससे यहां पर उनके लिए काम करने वाले करीब 50 लाख लोगों की गिनती घटेगी, और इसमें पांच-दस फीसदी गिरावट आ सकती है। ऐसे नुकसान के अनुमान की बड़ी लंबी लिस्ट है, और उसे और अधिक विस्तार से गिनाने पर आज का यह पूरा कॉलम ही खत्म हो जाएगा। 

भारत के सफल या महत्वाकांक्षी लोगों के लिए अमरीका में पढऩा, वहां काम करना, और वहां बस जाना एक बहुत बड़ा सपना रहता है। भारत के लोगों की पहली पसंद अमरीका रहते आई है। लेकिन अब ट्रम्प ने जो आक्रामक राष्ट्रवाद अमरीका पर लादा है, उसके चलते दूसरे देशों से वहां पहुंचने वाले लोगों को खुदकुशी की हद तक नकार दिया जा रहा है, उन प्रवासी-कामगारों की खुदकुशी नहीं, अमरीकी-अर्थव्यवस्था की खुदकुशी। लेकिन एक बिफरे हुए साँड को तर्कों की जरूरत नहीं रहती है, आज ट्रम्प ने अमरीका के दोस्तों और दुश्मनों के बीच फासला खत्म कर दिया है, उसने दिन और रात के बीच भी फासला खत्म कर दिया है, अब बाकी दुनिया को हर वक्त यह देखना पड़ता है कि आज उसकी कैसी किस्मत ट्रम्प ने लिखी है, और एक दिन पहले के लिखे भविष्यफल में क्या-क्या फेरबदल किया है। ऐसे अनिश्चित भविष्य वाली हो चुकी इस दुनिया में भारत को लेकर भी ट्रम्प की मनमानी हर किस्म से जारी है, और ट्रम्प के सामने हिन्दुस्तान बेबस दिखाई पड़ता है, तकरीबन बाकी दुनिया की तरह। 

भला कौन सोच सकता था कि जिस ट्रम्प ने नमस्ते ट्रम्प के नाम पर पांच बरस पहले का चुनाव अभियान भारत से ही शुरू किया था, जो कि मोदी के अमरीका प्रवास के मंच पर भी जारी रहा, और आज वह भारत को तरह-तरह से बेइज्जत करने में लगा हुआ है। वह बाकी दुनिया के साथ जैसी बदतमीजी कर रहा है, वैसी ही भारत के साथ भी कर रहा है, और बर्ताव से परे कारोबार-रोजगार पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है। आने वाले दिन अमरीका को लेकर भारत के लिए, कारोबारियों और कामगारों के लिए, छात्रों के लिए कितने खराब होंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है। अब तक तो अमरीकी सरहदों से गैरकानूनी तरीके से जान खतरे में डालकर हिन्दुस्तानी वहां पहुंच जाते थे, लेकिन अब तो कानूनी रूप से वहां गए लोगों का भी भविष्य अंधेरे में है। अपने हाथ जलाकर जो हिन्दुस्तानी ट्रम्प की तस्वीरें टांग-टांगकर इस देश में हवन करते थे, उन्हें अगले हवन के पहले भारत के हितों के बारे में भी सोचना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जुलाई 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जुलाई 2025



 

धर्मराज जितना मजबूत, महिलाएं उतनी कमजोर

26 जुलाई 2025 

 

अभी मथुरा की एक टीवी रिपोर्ट में वहां की महिला वकील पुलिस से जाकर मिली हैं, और एक स्वघोषित संत अनिरुद्धाचार्य के एक बयान पर उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। इस बयान में कई तरह के तिलक, और कई तरह की कंठी से लैस यह प्रसिद्ध कथावाचक, स्वघोषित भागवताचार्य अनिरुद्धाचार्य ने मंच और माईक से एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान कैमरों के सामने कहा था कि लोग लड़कियां ले आते हैं 25 साल की, अब 25 साल की लडक़ी चार जगह मुंह मार चुकी रहती है। इस बयान को लेकर महिला वकीलों ने कई धाराओं में एफआईआर दर्ज करने की मांग की है, और मथुरा के बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और सचिव ने भी महिला वकीलों के प्रदर्शन में हिस्सा लिया है, उनका समर्थन किया है। लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में कुछ अधिक सरकुलेशन में चल रहे बागेश्वर सरकार कहे जाने वाले धीरेन्द्र शास्त्री ने भी अभी कुछ महीने पहले अपने एक प्रवचन के दौरान महिलाओं के बारे में हिकारत के साथ कहा था कि जिस स्त्री की शादी हो गई है, उसकी दो पहचान होती है, पहला मांग का सिंदूर, दूसरा गले का मंगलसूत्र, जिस स्त्री की मांग में सिंदूर, और गले में मंगलसूत्र नहीं होता, उसे लोग खाली प्लाट मानते हैं, कि अभी उसकी रजिस्ट्री नहीं हुई है। अब इस नौजवान बाबा धीरेन्द्र शास्त्री की शोहरत का हाल यह है कि इसके एक कार्यक्रम में अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो पहुंचे ही, दो दिन के भीतर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी वहां उसी कार्यक्रम में पहुंचीं। महिलाओं के बारे में इसके उच्च विचार महिलाओं के बारे में धर्म के विचारों के अनुकूल ही हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित देश के तमाम बड़े नेता जिस स्वामीनारायण सम्प्रदाय के मंदिरों में देश-विदेश में जाते हैं, और ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे ऋषि सुनक भी भारत आकर इस सम्प्रदाय के मंदिर में गए, वहां महिलाओं के बारे में यह नियम है कि उनके प्रमुख संत के सामने कोई महिला पड़ नहीं सकती। उन्हें अलग कमरों में बैठना होता है, और वे सिर्फ स्क्रीन पर दर्शन कर सकती हैं। देश-विदेश के उनके मंदिरों में स्त्री-पुरूषों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार, अलग सभागृह, और दर्शनक्षेत्र रहते हैं। कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में यह देखने में आया है कि अगर कोई महिला भूल से मंच के पास पहुंच गई, तो मुख्य स्वामी प्रवचन छोडक़र चले जाते हैं, या उनके सामने पर्दा डाल दिया जाता है। इस सम्प्रदाय के अमरीका के एक मंदिर में जब कर्मचारियों के शोषण के मुकदमे चल रहे थे, तब वहां कई भूतपूर्व महिला अनुयायियों ने कहा था कि उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक की तरह रखा जाता है। लेकिन यह सम्प्रदाय तो छोटा है, इसके मुकाबले जो बड़े सम्प्रदाय हैं, उनमें भी इस्कॉन जैसे अंतरराष्ट्रीय धार्मिक संगठन, और कई दूसरे हिन्दू सम्प्रदायों में महिलाओं के लिए कोई भूमिका नहीं है। फिर महज हिन्दुओं के बारे में क्यों कहा जाए, पोप से लेकर नीचे मुहल्ले के चर्च तक, कहीं महिलाओं को पादरी, बिशप, या कुछ भी बनने की इजाजत नहीं है, वे सेविकाओं की तरह नन बन सकती हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह जैनियों में महिलाएं साध्वियां बन सकती हैं, लेकिन प्रवचन तो महाराज साहब के ही हो सकते हैं। और थोड़ा सा आगे बढक़र सिक्ख धर्म को देखें, तो गुरूनानक देव ने महिला को प्रथम पूजनीय कहा था, लेकिन व्यवहार यह हाल है कि अकाल तख्त और शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने आज तक किसी महिला को ग्रंथी या मुख्य ग्रंथी नहीं बनाया गया, या कि पंज प्यारे कहे जाने वाले अमृतधारी धर्मसेवकों के लिए भी महिलाओं को कभी नहीं चुना गया। बौद्धों में भी धर्म का अधिकतर नेतृत्व पुरूषों के हाथ में ही रहता है, और बौद्धभिक्षुणी बहुत नीचे के दर्जे पर ही जगह पाती है।

धर्म का नजरिया और मामलों में भी घनघोर महिलाविरोधी रहता है। देश-विदेश में जाने कितने धर्मों में बलात्कारी धर्मगुरू होते हैं जो कि महिला अनुयायियों सहित बाकी महिलाओं के बारे में न सिर्फ हिकारत की जुबान का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि उनका शोषण भी करते हैं। एक शंकराचार्य, अब गुजर चुके स्वरूपानंद सरस्वती ने शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के विवाद के दौरान 2016 में कहा था कि शनि एक क्रूर ग्रह है, और महिलाएं इससे दूर रहें, वरना बलात्कार की घटनाएं अधिक होंगी। अभी जिस अनिरुद्धाचार्य के खिलाफ महिला वकील एफआईआर लिखाने पहुंची हैं, उन्होंने अपने एक प्रवचन में कहा था कि सीता और द्रौपदी की त्रासदी उनकी अत्यधिक सुंदरता की वजह से हुई। मतलब यह कि महिला की सुंदरता एक जुर्म हो गया! स्वामीनारायण सम्प्रदाय के एक स्वामी ज्ञानवात्सल्य ने एक कॉलेज के कार्यक्रम में कहा कि महिलाएं सामने की पांच कतारों में न बैठें, वरना वे मंच छोडक़र चले जाएंगे। मुस्लिमों के एक बड़े धार्मिक संगठन दारूल उलूम ने कई बार महिलाओं के लिए फतवे जारी किए हैं, कभी कहा कि उनको मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए, कभी कहा कि उन्हें बैंकों और मीडिया में नौकरी नहीं करनी चाहिए। मुस्लिमों के बरेलवी उलेमा कई बार कहते आए हैं कि औरतों का घर से निकलना परहेजगारी के खिलाफ है। भारत में ही कई कैथोलिक बिशपों पर ननों के यौन-शोषण के आरोप लगे हैं, और ननों के साथ उनका सुलूक देखकर दक्षिण भारत के मंदिरों की देवदासी प्रथा याद पड़ती है, जिसे बाद में गैरकानूनी करार देकर, उसके खिलाफ कानून बनाकर उसे बंद करवाया गया था।

धर्म का पूरा धंधा ही महिलाविरोधी है। जाने कितने ही ऐसे मंदिर हैं, ऐसी दरगाहें हैं जहां महिला को घुसने नहीं मिलता, और वामपंथी सरकारों से लेकर देश में सबसे ताकतवर अदालतों तक सबको ऐसे मुद्दों को अनदेखा करते देखा जाता है। एक बात बिल्कुल साफ समझ लेने की जरूरत है कि दुनिया में जहां भी धर्म जितना मजबूत होगा, उस धर्म के तहत, या कि उस धर्म की सोच वाली सरकारों के तहत, महिला उतनी ही कमजोर होती जाएगी। बोलने में यह बात किसी भी धर्म के व्यक्ति को, खासकर मर्द को बड़ी खटकेगी, और इस मुद्दे पर आज यहां लिखने का मकसद भी यही है कि हर धर्म के लोग कम से कम अपने खुद के धर्म के बारे में यह आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन कर लें कि उन्होंने अपने धर्म की महिलाओं को कितनी बराबरी का दर्जा दिया है?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जुलाई 2025



 

पुलिस गौसेवा कर रही है या गौ-मालिकों की सेवा?

25 जुलाई 2025 

 

अभी एक पत्रकार ने फेसबुक पर सडक़ों पर बैठे जानवरों के लिए आवारा पशु लिख दिया, तो बहुत से लोग उस पर टूट पड़े, और लिखने लगे कि गौमाता को आवारा पशु लिखा है। भावनाओं के ऐसे सैलाब के इस देश में अभी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस ने दस हजार गौवंश के गले में रेडियम कॉलर बेल्ट लगाने की मुहिम चालू की है। पुलिस ने प्रेसनोट में लिखा है कि बारिश में आवारा मवेशी अधिकतर साफ जगह की तलाश में सडक़ पर झुंड बनाकर बैठते हैं जिसके कारण दुर्घटना की आशंका रहती है। इसे ध्यान में रखते हुए पुलिस ने आवारा मवेशियों के गले में रात को चमकने वाले रेडियम कॉलर बेल्ट लगाकर हादसों को काबू करने का अभियान चालू किया है। पुलिस का कहना है कि इससे गाडिय़ों की रौशनी से दूर से ही मवेशी दिख जाएंगे, और इससे इंसानों की मौतें भी रूकेंगी, और गौवंश की रक्षा भी होगी। पुलिस के इसी प्रेसनोट में बताया गया है कि जिले में 2024 में ऐसी 19 दुर्घटनाओं में 6 लोगों (इंसानों) की मौत हुई, और दो गंभीर रूप से घायल हुए। 2025 के पहले 6 महीनों में 12 दुर्घटनाएं हुईं, 6 मौतें हुईं, और 2 लोग घायल हुए। आंकड़े बड़े दुखदायी, लेकिन दिलचस्प है। पिछले पूरे साल में जितने मरे और घायल हुए थे, ठीक उतने ही अब 6 महीनों में हो चुके हैं। अब पिछले 15 दिनों से ट्रैफिक पुलिस के अधिकारी-कर्मचारी मवेशियों के गले में रेडियम कॉलर बेल्ट बांध रहे हैं, और 1500 से अधिक मवेशियों को इसे बांधा जा चुका है।

राजधानी पुलिस की इस कार्रवाई को इस रौशनी में देखा जाना चाहिए कि अभी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सडक़ों पर मवेशियों को लेकर सुनवाई और नोटिस का शायद अर्धशतक पूरा कर चुका है, और ऐसा लगता है कि ये रेडियम पट्टे हाईकोर्ट में सरकारी वकील की मदद करने के लिए लगाए जा रहे हैं, इन्हें गायों के गले में कम लगाया जा रहा है, हाईकोर्ट जजों की आंखों पर अधिक लगाया जा रहा है, ताकि उन्हें हकीकत न दिखे। सच तो यह है कि आवारा मवेशी कहे जाने वाले ये जितने भी जानवर हैं, इनके कोई न कोई मालिक हैं। जो लोग अपने जानवरों को बांधकर रखने के बजाय उन्हें खाने के लिए छुट्टा छोड़ देते हैं, और चारों तरफ जमीन गीली होने की वजह से बेबसी में ये जानवर सूखी सडक़ पर आकर बैठते हैं, गाडिय़ोंतले खुद भी कुचलकर मारे जाते हैं, और ऐसे हादसों में इंसानी जिंदगियां भी जाती हैं। ऐसे में इन जानवरों को पालने और छोड़ देने वाले लोगों की गिरफ्तारी होनी चाहिए, लेकिन गिरफ्तारी होती है गाड़ी चलाने वालों की, जिनमें से कई जेल जाते हैं, और कई इस धरती को छोडक़र ऊपर चले जाते हैं।

पुलिस की बहुत सारी कार्रवाई ऐसी रहती है मानो उसे चुनाव लडऩा है। पुलिस को उसे मिले अधिकारों के तहत जहां कार्रवाई करनी चाहिए, वहां वह समाजसेवा, गौसेवा, और इंसान की सेवा करने में लग जाती है। जो लोग हेलमेट लगाकर नहीं चल रहे हैं, उन्हें पुलिस कहीं पर गुलाब भेंट करती है, कहीं पर उन्हें हेलमेट भेंट कर देती है। जिन लोगों पर जुर्माना लगना चाहिए, उन्हें मुफ्त का हेलमेट मिल रहा है। गायों के मालिकों को जेल जाना चाहिए, तो सडक़ पर गाड़ी चलाने वाले बेकसूर लोगों को ऐसे हादसों में जेल भेजा जाता है, और गौ-मालिकों को छोड़ दिया जाता है। आज हर कस्बे में एक-एक, दो-दो ऐसे गौ-मालिक गिरफ्तार हो जाएं, तो सडक़ों पर एक जानवर न दिखे, लेकिन हाईकोर्ट में अपनी सक्रियता साबित करने के लिए पुलिस रेडियम के बेल्ट पहनाते घूम रही है। हो सकता है इसके बाद पुलिस सडक़ के किनारे थानों में आवारा मवेशियों, कम से कम गौवंशियों, या गायों के लिए खाने का इंतजाम भी करते दिखेगी, ताकि जानवर सडक़ों पर न जाएं। अधिकतर थानों के पास अहाते हैं, या कम से कम जमीन हैं, या पुलिस इतनी ताकत रखती है कि किसी भी जमीन को घेरकर वहां पर किसी से जानवरों के लिए बाड़ा बनवाकर कम से कम गौवंशी जानवरों को वहां रखे, चारा खिलाए, पानी का इंतजाम करे, और हो सके तो पशु चिकित्सक को भी वहीं रख ले। पुलिस चाहे तो कई हवालातियों को गौसेवा में लगा सकती है, और थाना बहुत सारे पुण्य का भागीदार हो सकता है। अगर थानों को गौशाला में बदल दिया जाए, तो राज्य सरकार के ऊपर से गौठान या गौशाला बनाने का दबाव भी कम हो जाएगा, और पुलिस को भी स्वर्ग में अपने लिए बेहतर क्वार्टर पाने की एक राह मिल जाएगी। हाईकोर्ट के जज भी सडक़ रास्ते से आते-जाते यह देख सकते हैं कि सरकार की तरफ से पुलिस थानों में जान लगा दे रही है, गौसेवा के लिए फरार वारंटियों को पकडक़र थानों में हवालाती बनाकर उनसे काम करवा रही है। पुलिस अगर इतना करने लगेगी तो यह तय है कि सडक़ हादसे कम हो जाएंगे, यह एक अलग बात है कि बाकी जुर्म का क्या होगा। बात अभी धार्मिक भावना की है, गौसेवा की है, हाईकोर्ट की नाराजगी दूर करने की है।

सडक़ों पर इंसान मारे जा रहे हैं, और उनकी जिंदगी लेने के जिम्मेदार गौ-मालिक छुट्टे घूम रहे हैं। यह एक अजीब किस्म का इंसाफ है। हाईकोर्ट सरकार से कुछ करवा तो नहीं पा रहा है, लेकिन जजों की आंखों पर रेडियम पट्टी बांधने के लिए पुलिस जरूर काफी कुछ कर रही है। इस अंदाज का इलाज अगर सरकारी अस्पतालों में भी अगर होने लगे, तो वहां पहुंचे जख्मी के जख्मों की सिलाई और मरहम पट्टी के पहले उसके हाथ-पांव के नाखूनों पर रेडियम पॉलिश लगाया जाएगा ताकि सडक़ पर रात-बिरात वह दुबारा कुचला न जाए। हम हाईकोर्ट की सहनशक्ति की तारीफ करते हैं, और उसके बेअसर होने के दुख में हम सहभागी हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जुलाई 2025



 

गाजा पर यह लिखने का कोई मतलब तो नहीं है, फिर भी इतिहास के लिए

24 जुलाई 2025 

 

फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमलों ने इस धरती पर कई तरह के मॉडल पेश किए हैं। जो धर्म को मानने वाले लोग हैं, उनके लिए गाजा आज जहन्नुम, नर्क, या ‘लिविंग हेल’ बन चुका है। और यह कहने वाले हम नहीं हैं, ये भाषा संयुक्त राष्ट्र संघ, या कि योरप के दो दर्जन से अधिक देशों की है। ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा जैसे बहुत से देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ बताया है, और कहा है कि अगर इजराइल की फौज का गाजा पर यह मानव संहार इसी तरह जारी रहा तो वे इजराइल पर प्रतिबंध लगाएंगे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने लीबिया में गाजा की स्थिति को हिटलर के नाजी यातना शिविरों जैसा कहा। और अभी इसी महीने इजराइल के एक पूर्व प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट ने कहा कि इजराइल गाजा में जिस तरह की फिलीस्तीनी बस्ती बसाने की बात कर रहा है, वह एक नस्ल के सफाए, और यातना शिविर जैसा होगा। उन्होंने कहा कि इजराइल की ऐसी योजना मानवता के खिलाफ जुर्म होगी। उन्होंने कहा कि हमास के इजराइल पर 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद आत्मरक्षा के नाम पर इजराइल का जो हमला शुरू हुआ था, वह अब युद्ध अपराधों में बदल गया है। ब्राजील, अर्जेंटीना, तुर्की ने अलग-अलग शब्दों में यह कहा है कि हिटलर की आत्मा आज इजराइल में जिंदा है, और इनमें कोई फर्क नहीं है। ट्यूनिशिया के राष्ट्रपति ने कहा कि जर्मनी में यहूदियों के जनसंहार के समय जिन लोगों ने यहूदियों को बचाया था, वे लोग आज गाजा में यहूदियों के वैसे ही जुर्म देख रहे हैं। 

हमने पिछले कुछ महीनों से फिलीस्तीन के मुद्दे पर लिखना बंद कर रखा था। ऐसा भी नहीं कि पिछले अमरीकी राष्ट्रपति ने फिलीस्तीन के मामले में कोई रहमदिली दिखाई हो, और अब अमरीका का जल्लाद राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प कोई नई ज्यादती कर रहा हो। ट्रम्प की बकवास से परे, पिछला अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी, जितनी ट्यूब मरहम फिलीस्तीन भेजता था, हजार-हजार किलो के उतने बम इजराइल को देता था, गाजा पर गिराने के लिए। ट्रम्प तो रिपब्लिकन पार्टी का है जो कि फिलीस्तीन विरोधी, मुस्लिम विरोधी मानी जाती है, लेकिन इसके मुकाबले थोड़ी सी अधिक इंसानियत की नीतियों वाली डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन का हाल भी कोई अच्छा नहीं था। यही वजह है कि फिलीस्तीन में अब तक 60 हजार से अधिक लोग इजराइली हमलों में मारे जा चुके हैं, कुछ इजराइली विश्लेषकों और पत्रकारों का यह भी मानना है कि यह संख्या बहुत अधिक हो सकती है, एक लाख तक। कुछ और जानकारों का यह मानना है कि अगर भूख और कुपोषण से मरने वाली मौतों को जोड़ लिया जाए, तो यह संख्या सवा लाख या डेढ़ लाख कितनी भी हो सकती है। 

धरती के नर्क बने हुए, दुनिया का सबसे बड़ा मलबा बने हुए, और दुनिया की सबसे बड़ी कब्रगाह बने हुए फिलीस्तीन में आज भुखमरी के करीब पहुंचे बच्चे घूरों पर ढूंढ-ढूंढकर, कुछ मिल जाए तो, कुछ खा रहे हैं, लेकिन इसकी भी गुंजाइश बहुत कम रह गई है। एक पूरी नस्ल, और पूरे देश की यह हालत देखकर दुनिया के बहुत से देश आज चुप हैं, और बहुत से देश खुलकर इजराइल के साथ हैं। हिटलर ऊपर कहीं बैठा, या जमीन के नीचे कहीं दफन, इजराइल को रश्क की नजरों से देख रहा होगा कि यहूदियों को मारते हुए दुनिया का इतना समर्थन तो उसे भी नहीं मिला था। आज दुनिया की सबसे बड़ी तानाशाह-ताकत, अमरीका जिस हद तक इजराइली जनसंहार के साथ है, और संयुक्त राष्ट्र जिस हद तक बेबस है, उसे देखते हुए हमें पिछले कुछ महीनों से कुछ भी लिखना फिजूल लग रहा था। अब तो धीरे-धीरे गाजा से आने वाली खबरों को पढऩा और सुनना भी फिजूल का लग रहा है कि दुनिया के नागरिक कोई भी अधिकार और कोई भी ताकत अब नहीं रखते हैं, अमरीका और इजराइल के मिलेजुले जनसंहार को रोकने के लिए। 

यह नौबत फिलीस्तीन जैसे छोटे मुल्क के खत्म हो जाने, या फिलीस्तीनियों की नस्ल के खत्म हो जाने से भी अधिक खतरनाक नौबत है। पिछली कुछ सदियों में धीरे-धीरे इस दुनिया ने सभ्यता की जितनी मंजिलें पार की थीं, अंतरराष्ट्रीय समझौते किए थे, नीतियां बनाई थीं, मानवाधिकारों की फेहरिस्त तैयार की थी, युद्ध के नियम बनाए थे, वे सब खत्म होने की शुरूआत गाजा में हो चुकी है। यह सभ्यता के अंत की शुरूआत है। इसे सिर्फ एक छोटे मुल्क का खात्मा न माना जाए, इसे पूरी दुनिया में न सिर्फ लोकतंत्र, न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय समझ, बल्कि मानवीय सभ्यता के अंत की शुरूआत भी मानना ठीक होगा जो कि कुछ सदियों के लोकतांत्रिक इतिहास के भी हजारों बरस पहले शुरू हुई है। गाजा अपने आपमें उतना बड़ा हादसा नहीं है, जितना बड़ा हादसा सभ्यता के अंत का आरंभ है। जब धरती से सभ्यता खत्म होने का सिलसिला शुरू हुआ है, तो उसके महज गाजा तक रह जाने की उम्मीद करना गलत होगा। अब डोनल्ड ट्रम्प सरीखे अमरीकी इतिहास के सबसे कमीने कारोबारी राष्ट्रपति को यह कहने का हौसला मिल चुका है कि वह पूरे के पूरे गाजा को एक रियल स्टेट प्रोजेक्ट बनाएगा, और अरब दुनिया में एक नई सैरगाह पेश करेगा। अमरीकी राष्ट्रपति को यह कहने का हौसला है कि अड़ोस-पड़ोस के देश फिलीस्तीनियों को बसाएं। 

यह सिलसिला कल्पना से परे है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं, और अंतरराष्ट्रीय अदालतें मिलकर भी गाजा में भुखमरी को नहीं रोक पा रही हैं,  और वहां पर खाने के लिए लगी भीड़ पर इजराइली फौज के बेहिसाब और नाजायज हमलों में एक-एक दिन में दर्जनों भूखे मारे जा रहे हैं, और दुनिया अपने-अपने घर बैठी खा रही है। जो मुस्लिम देश इसी तरह अरब दुनिया में अपनी आसमान छूती इमारतों में ऐश कर रहे हैं, वे अपने ही मुस्लिम भाई-बहनों के फिलीस्तीन को इस तरह भूखा मरते देख रहे हैं। न तो कोई ब्रदरहुड कहीं रह गया, न कोई मजहब का साथ रह गया, और न ही दुनिया की इस सबसे बड़ी बेइंसाफी के खिलाफ अल्लाह की कोई नसीहत इन मुस्लिम देशों के काम आ रही है। गाजा इस बात का सुबूत है कि हर किस्म के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय, धार्मिक-नैतिक मॉडल यहां चकनाचूर हो गए हैं, और भूख से बिलखते, दम तोड़ते बच्चों की तस्वीरों, खबरों, और आंकड़ों के बीच सोने के डायनिंग टेबिलों पर लोग बिरयानी खा रहे हैं, उनमें से किसी को कोई धार्मिक या नैतिक बात नहीं झकझोर रही है। जब रईसों से लेकर तानाशाहों तक हर किसी का यह हाल है, तो हमें इस मुद्दे पर कुछ भी लिखना फिजूल लग रहा था, लेकिन अब लग रहा है कि इतिहास तो किसी तरह दर्ज होना ही चाहिए। आज नजारा ऐसा है कि हिटलर ने यहूदियों के साथ जो कुछ किया था, यहूदी, यानी इजराइली वही कुछ फिलीस्तीन के साथ कर रहे हैं। इतिहास के बारे में कहा जाता है कि वह अपने को दोहराता है, यह इतिहास तो एक सदी के भीतर अपने आपको इस बुरी तरह दोहरा रहा है कि लोग, खुद इजराइल के बड़े-बड़े लेखक-पत्रकार, वहां के पूर्व प्रधानमंत्री इजराइल के किए हुए को हिटलर के किए हुए के बराबर मान रहे हैं। 

विश्व में आज महान नेताओं की सिर्फ अस्थियां बची हैं, या उनकी कब्रें बची हैं। यह विश्व सभ्यता की विरासत नहीं रह गया है, यह विश्व उस जंगल के कानून पर चल रहा है जहां सबसे अधिक ताकतवर का ही राज होता है। इस विश्व ने सभ्यता की समझ को इस बुरी हद तक खो दिया है कि आने वाली पीढिय़ां इस बात को याद रखेंगी कि जब गाजा में एक नस्लवादी जनसंहार चल रहा था, बाकी दुनिया मजे से जी रही थी, कुछ लोग जुबानी जमाखर्च कर रहे थे, और अधिकतर लोग तो होठों को सिलकर बैठे थे। इतिहास हर बयान को दर्ज करता है, खासकर चुप्पी को वह कुछ बड़े अक्षरों में दर्ज करता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जुलाई 2025



 

कांवड़ यात्रा में हिंसा अगर हिन्दू या गैरहिन्दू जो भी कर रहे हैं उन्हें जेल ही भेजें...

 23 जुलाई 2025 

 

उत्तर भारत में त्यौहारों का मौसम चल रहा है। सावन शुरू होता है कि त्यौहार शुरू हो जाते हैं, एक पूरा नहीं होता है कि दूसरा आकर खड़ा हो जाता है। ऐसे में सार्वजनिक जगहों पर धर्मालुओं की भीड़ लगती है, और जैसा कि किसी भी भीड़ की मानसिकता में होता है, धर्मालु धीरे-धीरे आक्रामक और धर्मांध भी होने लगते हैं। भीड़ का बड़ा असर होता है। किसी समझदार ने जाने कितने पहले यह लिखा था कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता। फिर हिंदुस्तान में हाल के बरसों में यह भी देखने में आया है कि भीड़ किस तरह हिंसक हो जाती है। फिर चाहे वह किसी शवयात्रा की भीड़ हो, बारात की भीड़ हो, किसी राजनीतिक रैली में जाती हुई भीड़ हो या एकसाथ सफर कर रहे सैनिक हों। भीड़ लोगों को उग्रता की तरफ ले ही जाती है। कुछ लोगों को इस लिस्ट में सैनिकों का नाम जोडऩे पर हैरानी हो सकती है, लेकिन रेलगाडिय़ों में कई बार यह देखने में आता है कि सेना या अर्धसैनिक बलों के लोग अगर बड़ी संख्या में सफर करते हैं, तो वे दूसरे मुसाफिरों से बद्सलूकी करने लगते हैं, पूरे के पूरे डिब्बे पर कब्जा कर लेते हैं, और कई मामले तो ऐसे भी हुए हैं जिसमें उन्होंने डिब्बे के बाकी मुसाफिरों को निकालकर बाहर फेंक दिया। जो लोग पूरी वर्दी में चलते हैं, जो बड़े कड़े नियमों से बंधे रहते हैं, वे भी जब भीड़ बनते हैं तो अराजक हो जाते हैं।

अब उत्तर भारत के तो ढेर सारे वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं, जिनमें कांवड़ लेकर जा रहे नौजवान तीर्थयात्रियों की टोलियां सडक़ किनारे के दुकानदारों, खासकर मुस्लिमों, या अंडा-मांस बेचने वाले लोगों के खिलाफ हिंसक हो रही हैं। सफाई देने वाले यह कह रहे हैं कि कुछ मुसलमान कांवडिय़ों की पोशाक में बीच में घुस गए हैं, और कांवडिय़ों को बदनाम करने के लिए इस तरह के काम कर रहे हैं। यह खतरा तो हिंदुस्तान जैसे देश में हमेशा ही बने रहेगा, क्योंकि कई जगहों पर गाय काटकर फेंकने वाले हिन्दू लोग भी यूपी में ही हिन्दू पुलिस अफसरों द्वारा पकड़े गए हैं जो कि किसी मुसलमान को उसमें फंसाना चाहते थे। लेकिन जिस योगीराज में कांवडिय़ों के स्वागत के लिए पुलिस तैनात है, हेलीकॉप्टर से फूल बरसाने से लेकर जमीन पर उनके पांवों को पोंछने, पंखा झलने तक का काम वर्दीधारी पुलिस कर रही है, तो उनके बीच किसी मुस्लिम का छुप जाना, और फिर हिंसा करना बहुत मामूली बात नहीं लगती है। और दूसरी तरफ यह बात तो अपनी जगह है ही कि ऐसी हिंसा के सैकड़ों वीडियो अब तक सामने आ चुके हैं, जिनमें लोगों के चेहरे दिख रहे हैं। इसलिए उत्तरप्रदेश की पुलिस के लिए यह मालूम करना मुश्किल नहीं है कि हिंसा करने वाले इन लोगों में कोई छिपे हुए मुस्लिम, या गैर हिंदू तो नहीं हैं। जब कई-कई मिनट के एक-एक वीडियो के कैमरे के सामने चेहरा दिखाकर लोग नारे लगा रहे हैं, कारों को तोड़ रहे हैं, लोगों को पीट रहे हैं, तो फिर पुलिस को इनकी शिनाख्त करने में दिक्कत कहां है? अगर कोई हिंदुओं के एक बड़े त्यौहार को बदनाम करने के लिए मुसलमान होते हुए हिंदू कपड़े पहनकर तीर्थ-यात्रा के बीच ऐसी हिंसा कर रहा है, तो उसे तो पहचाना ही जा सकता है, और योगी की पुलिस के पास बुलडोजर भी है ही। सबसे ताजा समाचार और वीडियो अभी यह लिखते-लिखते ही सामने आया है जिसने यूपी में वर्दीधारी महिला पुलिस अधिकारी भट्टी पर चढ़ी कढ़ाईयों में कांवडिय़ों के लिए पूडिय़ां तल रही हैं, महिला कांवडिय़ों के पैर दबा रही हैं, और कांवडिय़ों की एक पूरी तरह बेकाबू सैकड़ों लोगों की भीड़ पुलिस की एक गाड़ी को चारों तरफ से तोड़ रही है। ये दो नजारे अलग-अलग जगहों के हैं, और दोनों चारों तरफ फैल रहे हैं। योगी सरकार के पास इतनी ताकत तो है ही कि अगर ऐसे वीडियो झूठे हैं, तो इन्हें फैलाने वाले लोगों को सजा दी जाए। 

पिछले हफ्ते में ऐसे दर्जनों वीडियो सामने आए हैं जिनमें कांवडिय़ों के सामने-सामने चल रही खुली गाडिय़ों में तंग और छोटे-छोटे कपड़े पहनी हुईं लड़कियां मादक डांस कर रही हैं। जोरों से डीजे बज रहे हैं, और यह डांस आगे-आगे चलते चल रहा है, पीछे-पीछे कांवडि़ए चल रहे हैं। इसको भी जांचा जा सकता है कि क्या ये किसी दूसरे धर्म की लड़कियां, किसी दूसरे धर्म के ट्रक वाले के पीछे लदकर किसी दूसरे धर्म के गीतकार के लिखे हुए, किसी दूसरे धर्म के संगीतकार के कंपोज किए हुए, और किसी दूसरे धर्म के डांस-डायरेक्टर की कोरियोग्राफी पर ऐसे डांस कर रही हैं। इन सबको गिरफ्तार करना बड़ा आसान है, और किया भी जाना चाहिए। बल्कि हमारा तो यह भी मानना है कि हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिए अगर इस तरह की अश्लील हरकतें खुद हिंदुओं में से कुछ लोग कर रहे हैं तो यह मानकर चलना चाहिए कि उनकी नीयत हिंदू धर्म को, हिंदुत्व को, और हिंदुओं को बदनाम करने की ही है, और इन पर भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। सडक़ों के कुछ ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिनमें आधा-एक दर्जन लड़कियां भगवा हाफ पैंट और टी-शर्ट पहने हुए उत्तेजक गानों पर डांस कर रही हैं, और उनके इर्द-गिर्द कुछ मर्द भी ऐसा ही डांस कर रहे हैं। इनके भी चेहरे-मोहरे सभी बारीकी से दिख रहे हैं, और हिंदू धार्मिक भावनाओं को जख्मी करने की इस हरकत पर इन सबके खिलाफ जुर्म दर्ज होना चाहिए क्योंकि सावन का यह समय शिवजी की आराधना का है, और शिवजी की फोटो वाले टी-शर्ट पहनकर इस तरह के गंदे नाच करने वाले लोगों पर निश्चित ही कार्रवाई होनी चाहिए।

अब जब धर्म देश में सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है, तो उसको बचाने के लिए भरसक कोशिश भी होनी चाहिए। भारत में धर्म इतना तो कभी भी खतरे में नहीं था, जितना कि आज है, और यह भी समझने की जरूरत है कि आज पूरी तरह से देश-प्रदेश में हिंदू सरकारें रहते हुए भी हिंदुत्व खतरे में है, तो यह बहुत फिक्र की बात है। आज तो हिंदुत्व अपने पूरे इतिहास का सबसे अधिक सुरक्षित दौर देखने वाला होना चाहिए था, लेकिन नारों पर अगर भरोसा किया जाए तो हिंदुत्व बड़े खतरे में है। इसलिए हिंदुत्व को बदनाम करने वाली ताकतें, चाहे वे इस धर्म के बाहर की हों, चाहे वे इस धर्म के भीतर की हों, उन पर कड़ाई से रोक लगनी चाहिए।

अभी छत्तीसगढ़ के कोरबा की खबर है कि कांवडिय़ों के जत्थों के बीच डीजे की धुन पर नाचते हुए कुछ उपद्रवियों ने नकली पिस्तौल और कुछ हथियार लहराकर दहशत फैलाई। पुलिस ने इस पर दो बालिगों और चार नाबालिगों को गिरफ्तार भी कर लिया है। अभी यह खुलासा नहीं किया गया है कि ये उपद्रवी किस धर्म के थे, और इसे जाने बिना भी हम यह लिख रहे हैं कि ये किसी भी धर्म के हों, इन्हें कम से कम कई महीनों के लिए जेल भेजना चाहिए।

इसी सिलसिले में यह भी याद पड़ता है कि किस तरह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी त्यौहारों के पहले सरकार को नोटिस जारी किया है कि सडक़ों पर धार्मिक पंडाल या स्वागत द्वार न लगाए जाएं। सरकार की तरफ से कहा गया है कि वह इस बारे में नीति बना रही है। जो नोटिस त्यौहार के मौसम को देखते हुए हाईकोर्ट हर बरस जारी कर देता है, उसे बरसों से पाते हुए भी सरकार अब तक कोई नीति नहीं बना पाई है। न पिछली कांग्रेस की भूपेश सरकार, और न ही वर्तमान भाजपा सरकार। अब सडक़ों पर आवाजाही रोक देने वाले पंडाल और स्वागत-द्वार बनना रोकने के लिए नीति बनाना शायद पंचवर्षीय विचार-विमर्श का काम है, और चूंकि देश का योजना आयोग अब खत्म कर दिया गया है, इसलिए किसी भी पंचवर्षीय योजना या नीति को बनाना आसान भी नहीं रह गया है। जब तक यह नीति बनेगी, हाईकोर्ट के कई मुख्य न्यायाधीश इधर-उधर जा चुके होंगे, या रिटायर हो चुके होंगे। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट का काम भी आम के पेड़ लगाने जैसा हो गया है, एक बेंच पेड़ लगाती है, और उसके कई बरस बाद की कई बेंच पार हो जाने पर कोई और न्यायाधीश उस पर फल या कीड़े लगते देखते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जुलाई 2025



 

ओबामा की गिरफ्तारी का वीडियो पोस्ट करने के पीछे ट्रम्प की असली नीयत

22 जुलाई 2025 

 

दुनिया में शायद ही कोई और राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री डोनल्ड ट्रम्प की तरह की हलकट हरकतें करने वाले रहे हों। अभी ट्रम्प ने अपनी ही बनाए हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ‘ट्रुथ’ पर एक गढ़ा हुआ वीडियो पोस्ट किया जिसमें राष्ट्रपति के दफ्तर में पिछले एक डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा ट्रम्प के साथ बैठे हैं, और अचानक वहां पर अमरीका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी, एफबीआई के एजेंट घुसते हैं, और वे ओबामा को पकडक़र नीचे गिराते हैं, और हथकड़ी लगाकर गिरफ्तार करते हैं। ट्रम्प की अपने विरोधियों को गिरफ्तार करने की हसरतें हमेशा ही बनी रहती हैं। 2016 के चुनाव में ट्रम्प ने उनके खिलाफ खड़ी हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ चुनावी सभाओं में बार-बार ‘लॉक हर अप’ के नारे लगाए थे, यानी हिलेरी को गिरफ्तार करो, जेल भेजो। अभी का वीडियो ट्रम्प ने एक किसी टिक-टॉक अकाऊंट से अपने सोशल मीडिया अकाऊंट पर डाला है जिसमें ट्रम्प की विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं के बारे में यह गाना सुनाया गया है कि कोई कानून से ऊपर नहीं है। करीब 40 सेकेंड का यह वीडियो आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बनाया गया है, और इसमें ओबामा के गिरफ्तारी के वक्त हँसते और ठहाके लगाते ट्रम्प को दिखाया गया है, और बाद में ओबामा को कैदी की पोशाक में जेल में सलाखों के पीछे भी। 

अब ओबामा से बिना किसी झगड़े के अचानक अमरीकी राष्ट्रपति ने इस तरह की छिछोरी हरकत क्यों की है? क्योंकि अभी तो ओबामा खबरों में भी नहीं है, और पत्नी और बेटियों के साथ फोटो-वीडियो कभी-कभी दिखते हैं। इस बारे में अमरीका के कुछ लोगों का यह मानना है कि अभी ट्रम्प सरकार में नेशनल इंटेलीजेंस की डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने यह घोषणा की थी कि ओबामा सरकार के समय उनके बड़े अफसरों ने ट्रम्प के खिलाफ एक साजिश की थी। अमरीकी एजेंसियां ऐसी किसी साजिश के सुबूत होने पर किसी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए आजाद हैं, और ट्रम्प की सरकार में तो देश की अधिकतर एजेंसियां ट्रम्प की गुलाम भी हैं। उनसे असहमत जजों तक को बर्खास्त कर दिया गया है, और दर्जनों वकीलों ने सरकारी ओहदों से इस्तीफा दे दिया है कि वे ट्रम्प सरकार के फैसलों के खिलाफ देश भर में दायर मुकदमों के सैलाब से नहीं जूझ सकते। ऐसे में उनकी खुफिया-मुखिया अगर ऐसे सुबूत मिलने का दावा करती है, तो सबसे आसान तरीका तो सुबूतों को पेश करके किसी अदालत में मुकदमा चलाने का है, लेकिन ट्रम्प की यह हरकत शायद कुछ और मतलब भी रखती है। 

लोगों का कहना है कि ट्रम्प अपने बड़े-बड़े दावों के बावजूद कोई छोटी सी कामयाबी भी अब तक नहीं पा सके हैं। इजराइल और फिलीस्तीन के बीच इकतरफा जंग अभी खत्म नहीं हुई है, और अमरीका इजराइल के साथ खड़ा है, और एक-एक करके अमरीका के सहयोगी देश इजराइल के खिलाफ होते जा रहे हैं। ट्रम्प अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इजराइल के मुद्दे पर लगातार और अधिक अलग-थलग होते जा रहे हैं। यह नौबत ट्रम्प की नोबल शांति पुरस्कार पाने की हवस की गुंजाइश घटाती चल रही है। दूसरी तरफ दुनिया का आज जंग का सबसे बड़ा मोर्चा, रूस और यूक्रेन, ट्रम्प के प्रभाव से बेअसर बना हुआ है। रूस ने ट्रम्प की सारी शुरूआती मोहब्बत के बाद ट्रम्प की तमाम बातों को अनसुना कर दिया है, और यूक्रेन ने ट्रम्प से शुरूआती तनातनी के बाद उससे जंग के भारी हथियार पाने की मंजूरी पा ली है। कुल मिलाकर ट्रम्प ने इस मोर्चे पर अपने सारे बाहुबल के इस्तेमाल के बाद भी इस बात के पुख्ता सुबूत दे दिए कि वह कितने बड़े दर्जे का बेवकूफ है। आज महीनों की धमकियों, और अल्टीमेटम के बाद भी ट्रम्प इस मोर्चे पर कोई शांति नहीं ला पाया, और हर दिन उसे नोबल शांति पुरस्कार की संभावना से दूर धकेल रहा है। ट्रम्प की नाकामयाबियां एक के बाद एक बढ़ रही हैं, और कल ही अमरीका के एक प्रमुख और चर्चित पत्रकार फरीद जकारिया ने अपने एक लोकप्रिय शो में यह गिनाया है कि किस तरह अमरीकी जनता के बीच ट्रम्प की लोकप्रियता गड्ढे में जा रही है, किस तरह लोग ट्रम्प के फैसलों से असहमत होते चल रहे हैं, और वहां जो आम सर्वे होते रहते हैं, वे ट्रम्प को एक बहुत ही अलोकप्रिय हो चुका राष्ट्रपति बता रहे हैं। ऐसी तमाम स्थितियों के बीच कुछ लोगों का यह भी मानना है कि ट्रम्प ने अपनी असफलताओं की तरफ से लोगों का ध्यान हटाने के लिए ओबामा के ऐसे वीडियो का सहारा लिया है जो कि जाहिर तौर पर गढ़ा गया है, कुछ लोगों के लिए मनोरंजक है, और बाकी लोगों के लिए लोकतंत्र के खिलाफ अपमानजनक भी है। 

आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह बात समझने की जरूरत है कि सार्वजनिक जीवन के लोग, बड़ी-बड़ी कंपनियां, राजनीतिक दल, और कई किस्म की विचारधाराएं गढ़ी हुई चीजों से जनधारणा बदलने की कोशिश करते ही रहते हैं, और जनसमर्थन जुटाने की भी। चुनावों के वक्त तो ऐसी बात आम रहती है, लेकिन अब चुनावों से परे भी लगातार यह जनधारणा-प्रबंधन चलते रहता है। सोशल मीडिया ने पिछले दो दशकों में एक नया औजार और हथियार इन सब तबकों को दे दिया है, और दुनिया का यह भी तजुर्बा है कि फेसबुक जैसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म पर इश्तहार देकर भी, भुगतान करके अधिक लोगों तक पहुंचकर भी लोग दुनिया की सोच को प्रभावित करते हैं। यह औजार पहले तो लोगों को अपने नशे में डुबाते चले गया, और जब लोग नशेड़ी हो गए, तो इसने अपने असर को नशे के एक हथियार की तरह बेचना शुरू कर दिया। भारत के ही पिछले चुनावों में फेसबुक पर विज्ञापनों में, या वहां पर पहुंच खरीदने में भारत के नेताओं और राजनीतिक दलों ने शायद अरबों रूपए खर्च किए। और चुनावों से परे भी अब तो पूरे समय यह सिलसिला चलते रहता है क्योंकि कोई सरकार, या कि कोई नेता परेशानियों में घिरते रहते हैं, और वैसे नाजुक वक्त पर वे अखबारों की सुर्खियों में कुछ दूसरे मुद्दों को लाना चाहते हैं, टीवी के समाचार-बुलेटिनों में कुछ और दिखलाना चाहते हैं ताकि उनके बारे में नकारात्मक खबरें पीछे या नीचे दब जाएं। ट्रम्प आज जो हरकत कर रहा है वह ठीक वैसी ही है जैसी कि हिन्दुस्तान में किसी बड़े मुद्दे को पीछे धकेलने के लिए कभी सडक़ पर सेक्स का वीडियो चार दिन टीवी पर छाया रहता है, या कभी किसी एक छिलटे सरीखे नेता का दिया हुआ बहुत ही ऊटपटांग बयान रात-दिन खबरों पर छाया रहता है। ट्रम्प ने भी उसी दर्जे का काम किया है, लेकिन वह बेशर्म इतना है कि ऐसी हरकत वह राष्ट्रपति रहते हुए भी अपने सोशल मीडिया अकाऊंट से करता है। अमरीकी जनता ने अभूतपूर्व और असाधारण घटिया राष्ट्रपति चुनने का एक रिकॉर्ड कायम किया है, और वहां के सर्वे बता रहे हैं कि जनता अपने फैसले के खिलाफ सोचने लगी है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जुलाई 2025



 

अमल में ढिलाई, और नियमों में कड़ाई से भला क्या होगा?

21 जुलाई 2025 

 

देश में सडक़ हादसों में हो रही मौतें दुनिया में एक रिकॉर्ड हैं। अभी इस बारे में एक जानकार ने एक इंटरव्यू में बताया कि गाडिय़ों की अधिक रफ्तार मौतों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। हम दुनिया के कुछ देशों के साथ भारत की सडक़ मौतों की तुलना करके देख रहे हैं, तो भारत वैश्विक स्तर से जरा सा ऊपर है, प्रति दस लाख आबादी पर दुनिया में 150 लोग सडक़ हादसों में मर रहे हैं, भारत में 154। लेकिन दुनिया के संपन्न देशों में यह आंकड़ा 92 है, और भारत उससे दुगुना अधिक है। योरप में यह आंकड़ा 48-49 है, और भारत उससे तीन गुना है। अमरीका में जरूर सब कुछ सडक़ यातायात होने की वजह से प्रति मिलियन 130 मौतें हैं, लेकिन भारत उससे भी खासा अधिक है। दुनिया में होने वाली कुल सडक़ मौतों में भारत की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है। 

अब ऐसे में यह खबर आई है कि केन्द्र सरकार मोटर व्हिकल एक्ट को और सख्त बनाने जा रही है, और अगर नियम तोडऩे वाली गाडिय़ों में बच्चे भी बैठे हैं, तो उन पर आम जुर्माने के मुकाबले दो गुना जुर्माना लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। यह निजी गाडिय़ों, किराए की गाडिय़ों, या स्कूलों की गाडिय़ों सब पर लागू होगा। इसके अलावा गलती या गलत काम करने वाले ड्राइवरों के ड्राइविंग लाईसेंस भी कुछ गलतियों के बाद निलंबित या रद्द करने का प्रस्ताव रखा गया है। गलतियों या लापरवाहियों पर किस तरह जुर्माने के अंक जुड़ते जाएंगे, और लोगों को फिर से ड्राइविंग टेस्ट देना होगा, ऐसी कई बातें नए नियम-कानून में जोड़ी जा रही हैं। 

कानून को और कड़ा करना आसान है, लेकिन जो मौजूदा कानून है उनको कड़ाई से लागू करना बड़ा मुश्किल है। आज देश के कुछ विकसित राज्यों को छोड़ दें, जहां पर कि ट्रैफिक नियम ठीक से लागू होते हैं, तो फिर छत्तीसगढ़ जैसे बहुत सारे राज्य हैं जहां पर सडक़ों पर पूरी अराजकता है, और किसी सुधार की सरकार की नीयत ही नहीं है। इस प्रदेश का हाईकोर्ट बिलासपुर शहर में है, वहीं सारे जज रहते हैं, और वे सडक़ सुरक्षा को लेकर मुख्य सचिव और डीजीपी से, दूसरे सरकारी विभाग प्रमुखों से हलफनामा लेने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। लेकिन हाईवे पर बैठे हुए जानवर एक बार अपनी जगह से हट जाएं, तो हट जाएं, सरकार के माथे पर हाईकोर्ट के नोटिसों से शिकन भी नहीं पड़ती। इसी से गुंडागर्दी का बढ़ता हुआ हौसला यहां तक पहुंचा है कि दो दिन पहले हाईकोर्ट शहर वाले बिलासपुर में किसी छोटे-मोटे नेता के करीबी की बिगड़ैल औलाद ने दो बड़ी-बड़ी कारें खरीदीं, और फिर आधा दर्जन कारों से हाईवे को रोककर वीडियो शूटिंग की, और खुद ही उसे भारी अहंकार के साथ चारों तरफ फैलाया भी। पुलिस से उम्मीद की जाती थी कि जिस तरह गरीब मुजरिमों के साथ बर्ताव होता है, इन गुंडों का भी वह जुलूस निकालती, लेकिन इन पर दो-दो हजार रूपए जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया, और पुलिस ने इनके नाम तक जारी नहीं किए। दूसरी तरफ किसी एक पत्रकार ने इसे लेकर सोशल मीडिया पर लिखा- चूंकि ये कारें अमीर लोगों की थीं, और उन्होंने वीडियो पर अपनी शेखी भी बघारी, कंधे पर भारत का राष्ट्रीय चिन्ह पहनने वाले आईपीएस अधिकारियों में दम नहीं था कि उनकी सडक़ पर उठक-बैठक करवाते हुए वीडियो बनवाते। इस पर पहले तो बिलासपुर पुलिस ने यह टिप्पणी की कि आपने आईपीएस अधिकारियों के लिए प्रयुक्त कंधे पर भारत का राष्ट्रीय चिन्ह पहनने वालों में दम नहीं जैसे अपमानजनक शब्द लिखे जो कि मानहानि का मामला बन सकते हैं, और साथ ही राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान भी दंडनीय है। अपमान की यह व्याख्या किसी कॉमेडी शो सरीखी है जहां डरे-सहमे अफसरों को राजचिन्ह के लायक नहीं कहा गया है, अपमान अफसरों का किया गया है, और वे इसे राजचिन्ह का अपमान करार देना चाहते हैं! 

केन्द्र सरकार चाहे कितने ही कड़े नियम बना ले, उससे क्या फर्क पड़ता है? जिन राज्यों को न हेलमेट लागू करवाना है, न सीट बेल्ट लगवाना है, न ही मोबाइल पर बात करते चलते लोगों को रोकना है, न एक दर्जन सवारियां ले जाते ऑटोरिक्शा को रोकना है, न दुपहिए दौड़ाते नाबालिगों को रोकना है, न साइलेंसर फाडक़र दौड़ाती मोटरसाइकिलें रोकना है, और न ही अंधाधुंध रफ्तार से, दारू पिए हुए चलाती गाडिय़ों का कुछ करना है, तो क्या केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी छत्तीसगढ़ की सडक़ों पर खड़े होकर नया कानून लागू करवाएंगे? मामूली से ट्रैफिक नियम लागू करवाने के लिए कोई इसरो की रॉकेट टेक्नॉलॉजी नहीं लगती है, लेकिन पुलिस को इसके लिए कुछ काम तो करना होगा। आज यह लगता है कि पुलिस कारोबारी गाडिय़ों से बहुत संगठित उगाही में ही पूरी ताकत झोंक देती है, और उसमें से कोई हिस्सा वह आम लोगों पर बर्बाद करना नहीं चाहती। यह सिलसिला बहुत खतरनाक इसलिए है कि इससे पीढ़ी-दर-पीढ़ी लापरवाह और अराजक ड्राइवर तैयार हो रहे हैं। फिर ऐसी अराजकता के साथ जब बड़ी-बड़ी महंगी गाडिय़ों का हॉर्सपावर भी जुड़ जाता है, जब यह तैश भी जुड़ जाता है कि जानता नहीं मेरा बाप कौन है, तब फिर एक-दूसरे के मुकाबले हर किसी को सडक़ों के नियम तोडऩे में अपनी शान दिखती है। 

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह देखना हैरान करता है कि सरकार किस तरह अपनी एक बुनियादी जिम्मेदारी को ताक पर धरकर चैन से जी रही है, और हर दिन प्रदेश में आधा-एक दर्जन लोग सडक़ों पर मारे जा रहे हैं, जिन मौतों को कम करने की पूरी संभावना मौजूद है। जब मौजूदा कानून पर अमल का यह हाल है, तो नितिन गडकरी को फालतू की मशक्कत नहीं करनी चाहिए। आज के नियमों में जो हजार रूपए जुर्माना होना है, जब वही नहीं हो रहा, तो उसे दो हजार रूपए करने से तो सरकार की शर्मिंदगी दो गुना होनी चाहिए? हम गडकरी जैसे मंत्री से कुछ कल्पनाशीलता की उम्मीद कर रहे थे। उन्हें पूरे देश के लिए यह योजना लागू करनी चाहिए कि सडक़ नियम तोडऩे के फोटो-वीडियो, और जानकारी, जीपीएस लोकेशन भेजने वाले लोगों को जुर्माने की आधी रकम दी जाए। इससे भ्रष्ट और निकम्मे पुलिसवालों का एक विकल्प तैयार होगा, और कुछ बेरोजगार लोग हर दिन कुछ सौ रूपए कमा सकेंगे। शुरू में कम से कम कुछ साल तक तो यह सिलसिला जारी रहेगा, जब तक गाडिय़ां न सुधर जाएं, और लोग न सुधर जाएं। जब आम जनता किसी एप्लीकेशन के मार्फत ऐसी जानकारी भेज सकेगी, और उसका नाम गोपनीय रखकर उसके मोबाइल फोन पर ही ईनाम की रकम आ सकेगी, तो लोग बढ़-चढक़र उत्साह से ऐसी शिकायतें भेजेंगे। अकेले सरकारी अमले के भरोसे सडक़ों पर मरने वाले लोगों की लाशों पर अगरबत्ती भी नहीं जलेगी, असल और असरदार सुधार सिर्फ जनभागीदारी से हो सकेगा, या कि मशीनों की भागीदारी से। पता नहीं क्यों सरकारें सुधार की किसी भी बात से इस तेजी से डर जाती हैं कि मानो चालान का नोटिस पाने वाले लोग अगला चुनाव आने के पहले भी कहीं सरकार न पलट दें। भारत में आज ऐसी कोई संभावना या आशंका नहीं है, और राज्य सरकारों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। अब गडक़री की अपनी पार्टी की सरकारें जिन राज्यों में हैं, वहीं पर उनके नियमों की ऐसी बदहाली है, तो यह खुद गडकरी के लिए शर्मिंदगी की बात है। ऐसे में उन्हें सरकारों को किनारे करके जनता को सडक़ सुरक्षा से जोडऩा चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जुलाई 2025



 

सार्वजनिक लापरवाही की सजा से बचने का दावा ठीक नहीं...

 20 जुलाई 2025

न सिर्फ सोशल मीडिया, बल्कि खबरों वाला मीडिया भी पिछले चार दिनों से एक मानवीय गलती, या कि गलत काम पर बहस में डूबा हुआ है। अमरीका की एक बड़ी टेक कंपनी एस्ट्रोनॉमर, के सीईओ एंडी बायरन एक बड़े संगीत कार्यक्रम में मौजूद थे। वहां पर कार्यक्रम का प्रसारण कर रहे कैमरों में से कुछ कैमरे दर्शकों पर फोकस हो जाते हैं, और अचानक ही जीवंत प्रसारण में वे तस्वीरें जाने लगती हैं, या कि स्टेडियम या सभागृह में लगे बड़े पर्दों पर ऐसे किसी भी दिलचस्प दिख रहे दर्शक के क्लोजप दिखने लगते हैं। यह मामला ठीक वैसा ही जैसा कि क्रिकेट मैच के प्रसारण में जब मैदान पर कुछ पल के लिए कोई एक्शन नहीं रहता, तो कैमरा पर्सन किसी सुंदरी के गालों पर बने हुए किसी देश के झंडे को दिखाने लगते हैं, या किसी सुंदरी के कानों के झुमकों पर फोकस करते हैं। यह अंदाज ऐसे बड़े आयोजनों में एकदम आम है। और ऐसे ही किस-कैम कहे जाने वाले वीडियो-कैमरे ने इस कंपनी मुखिया एंडी बायरन को कंपनी की ही एचआर प्रमुख महिला क्रिस्टिन कैबॉट के साथ कैद किया। यह पुरूष पीछे खड़े हुए अपनी मातहत सहयोगी के इर्द-गिर्द बांहें लपेटे हुए था, और मानो इसकी सहमति देते हुए यह महिला भी उसकी बांहों को थामे हुई थी। अचानक ही जब इस संगीत समारोह की सभी बड़ी स्क्रीनों पर इस जोड़े का वीडियो अचानक छा गया, तो खूब आवाजें होने लगीं, और यह जोड़ा खुद हक्का-बक्का होकर शर्मिंदगी में डूब गया, और उसी जगह बैठकर कैमरे की नजरों से दूर होने की कोशिश की। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, और यह वीडियो क्लिप अमरीका की तमाम वेबसाइटों पर छा गया, सोशल मीडिया पर नैतिकता की बहस छिड़ गई, और एंडी बायरन की पत्नी ने अपने सोशल मीडिया अकाऊंट पर से अपने नाम के साथ पति का, बायरन, सरनेम हटा दिया, और बाद में अकाऊंट डिलीट भी कर दिया। साथ में वीडियो में दिख रही मातहत अफसर ने भी अपना सोशल मीडिया अकाऊंट डिलीट कर दिया। लिपटे हुए ये दोनों लोग निजी जिंदगी में अलग-अलग लोगों से शादीशुदा हैं, और कुछ सेकेंड का यह वीडियो उनके लिए बड़ी तबाही लेकर आया। 

अब इन दोनों परिवारों का जो भी होता हो, और इन दोनों, शायद, प्रेमियों का जो भी होता हो, इसकी आंच कंपनी तक भी आई है, और इनकी कंपनी में यह सवाल उठने लगा है कि सीईओ, और उसकी मातहत एचआर प्रमुख के बीच इतना करीबी रिश्ता होना कंपनी के नैतिक मापदंडों, और वहां के कामकाज के माहौल के खिलाफ है। 

लेकिन इस मुद्दे को देखकर भी मैं अनदेखा कर देता, अगर एक दोस्त ने मुझे इस मामले पर कुछ जानकारी भेजकर यह न पूछा होता कि यह किसी की निजी जिंदगी में नाजायज दखल नहीं है कि उन्हें इस तरह कैमरों पर कैद करके दिखा दिया गया हो, उनकी मर्जी के खिलाफ? 

निजता और नैतिकता के तमाम पहलू हमेशा ही मेरा ध्यान खींचते हैं। मुझे लगता है कि अलग-अलग देश, काल, और परिस्थितियों के मुताबिक इन दोनों चीजों की परिभाषाएं, और पैमाने अलग-अलग तय होते हैं। मैं अमरीका से आधी धरती दूर, गोले के दूसरे तरफ मौजूद हूं, और यहां की संस्कृति भी अमरीका से बिल्कुल ही अलग है। अमरीका में किसी भी धर्मग्रंथ को फाडक़र फेंक देना, आग लगा देना, वहां के नागरिकों का अधिकार है, और मेरे देश में अभी पंजाब में धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी करने पर उम्रकैद जोडऩे की कोशिश हो रही है। यहां धर्म का हाल यह है कि कल एक रेलवे स्टेशन पर एक धर्म की शिनाख्त बताने वाले लोगों की एक टोली के दर्जन भर लोगों ने एक अकेले वर्दीधारी सीआरपीएफ जवान को मार-मारकर गिराया, और लातों से कूट डाला। ऐसे देश में बैठे मैं धरती के दूसरे ओर के अमरीका की नैतिकता पर बात कर रहा हूं। 

भारत के लोगों को पल भर के लिए यह अटपटा लग सकता है कि किस-कैम कहे जाने वाले ऐसे कैमरों से किसी एक जोड़े को अचानक ही तमाम स्क्रीन पर दिखा दिया गया, और यह उनकी निजता के खिलाफ रहा। लेकिन इस जोड़े को यह अच्छी तरह मालूम था कि वहां के ऐसे संगीत समारोहों में ऐसे किस-कैम आम हैं, और जब स्टेज को ही देखते-देखते लोग थोड़े से थक या ऊब जाते हैं, तो कैमरापर्सन, या वीडियो एडिटर दर्शकों के बीच की कोई भी फोटो दिखाते हैं। चूंकि यह एकदम ही आम प्रचलन की बात है, इसलिए वहां जाने वाले लोग ऐसे कैमरों के फोकस हो जाने को निजता का हनन नहीं कह सकते। दुनिया में कहीं भी क्रिकेट हो रहा हो, तो मुस्कुराती सुंदरियों की तस्वीरें, या बॉडी पेंट करके पहुंचने वाले खेल के दीवानों की तस्वीरें दिखती ही हैं, स्टेडियम में पहुंचने का मतलब ही निजता के एक हिस्से को बाहर घर पर छोडक़र आना होता है। इसलिए एक-दूसरे के प्रेम में डूबे, नाग-नागिन के जोड़े की तरह लिपटे हुए इस सीईओ, और उसकी मातहत अफसर की निजता का कोई उल्लंघन यहां नहीं हुआ है। अब सवाल केवल एक कंपनी में काम करने वाले सीनियर और जूनियर के बीच, या बराबरी के दो लोगों के बीच रिश्तों का है कि उनमें क्या जायज है, और क्या नाजायज? कल इस सीईओ एंडी बायरन ने इस्तीफा भी दे दिया है, और कंपनी-बोर्ड ने दूसरे को नियुक्त करके, इस प्रेमीजोड़े की जांच शुरू करवा दी है। 

हिन्दुस्तान कहने के लिए तो अपने आपको पश्चिमी प्रभावों से अलग रखने की चाहत रखने वाला देश करार देता है, लेकिन दूसरी तरफ यहां ऐसे बड़े-बड़े स्कैंडल आकर गुजर जाते हैं, और लोग अपनी जगह बने रहते हैं। अभी पिछले ही महीने मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के एक स्थानीय नेता हाईवे पर अपनी कार से बाहर निकलकर साथ में चल रही बिन कपड़ों वाली एक महिला से सेक्स करते कैमरों पर कैद हुए थे। वे जितनी देर तक, जितने तरह से सेक्स करते दिखे, वह सब मीडिया में दिखाने लायक भी नहीं था, और सिर्फ निजी संदेशों में भेजने लायक था, या फिर पोर्न वेबसाइटों पर डालने लायक। लेकिन ऐसे मामले आते-जाते रहते हैं, कभी किसी का इस्तीफा हो भी जाता है, कभी नहीं भी होता है। कई मामलों में तो धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए कई चर्चित लोगों के वीडियो आते हैं, और बाबाओं का कोई ओहदा तो रहता नहीं है, कोई जुर्म साबित होने पर वे जेल जाते हैं, और खुले रहने पर बाकी भक्तों पर मेहरबानियां बिखराते रहते हैं। 

हमारे पाठकों के लिए इस पूरी घटना में एक बड़ा छोटा सा सबक है, अगर शादीशुदा जिंदगी से परे कोई विवाहेत्तर रिश्ता है, तो उसका प्रदर्शन करते नहीं घूमना चाहिए, उसे किसी बंद कमरे तक सीमित रखना चाहिए, या फिर किसी ऐसे पहाड़ या समंदरी कोने तक जाना चाहिए जहां वीडियो-कैमरों की कोई आशंका न हो। और जो लोग ऐसा खतरा झेलकर भी अपने प्रेम का प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने दुस्साहस का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि मध्यप्रदेश में एक नेता को सडक़ के बीचोंबीच सेक्स करने का अधिकार था। उस पर कोई मामूली सा जुर्म बना होगा, और छोटी सी सजा के लिए जेल जाने पर वह बाकी कैदियों के बीच सेक्स के अपने प्रयोग पर प्रवचन देने आमंत्रित भी किया जाएगा। सार्वजनिक जगह पर निजता के पैमाने देश, काल, और परिस्थिति के मुताबिक अलग-अलग रहते हैं, उन्हें समझे बिना आप यह मानकर नहीं चल सकते कि आपकी निजी जिंदगी के हक लोगों के सार्वजनिक जगहों के हक के ऊपर हैं।