नए साल पर भी कुछ नया नहीं सोचा, तो क्या किया?
31 दिसंबर 2022
नए साल का मौका बहुत से नए संकल्पों का भी
रहता है। लोग अपनी कुछ बुरी आदतों को छोडऩा तय करते हैं, और नए साल के पहले
दिन से कुछ अच्छी आदतें पकडऩे का पक्का इरादा रखते हैं। पहला हफ्ता गुजरते
न गुजरते साल भर के लिए किए गए अधिकतर संकल्प गुजर जाते हैं। जो लोग
क्रिसमस और नए साल के मौके पर बच्चों की जिद में उनके लिए कुत्ते-बिल्ली
लेकर आते हैं, उनकी बेरहम बिदाई भी अगले कुछ महीनों में होने लगती है, और
जनवरी के बाद जल्द ही दुनिया ऐसे लावारिस पालतू जानवरों को देखती है, और
इनके पुनर्वास में लगी संस्थाएं एक मुश्किल दौर से गुजरती हैं कि इतने
जानवरों के लिए नए घर कहां से ढूंढे जाएं। लेकिन जिस तरह कुदरत में सालाना
पतझड़ का एक दौर आता है, वैसा ही एक दौर दीवारों पर से कैलेंडर के टपकने का
होता है, और नए पत्तों की तरह नए साल का कैलेंडर दीवारों पर उग आता है।
ऐसे माहौल के बीच जब लोगों को अपनी-अपनी जिंदगी में कई नई चीजें तय करने का मौका मिलता है, तो नए साल के ऐसे मौके का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। संकल्प आमतौर पर इसीलिए लिए जाते हैं कि जितने वक्त तक उन्हें ढोया जा सके, ढो लिया जाए, और बाद में उन्हें सहूलियत के साथ भुला दिया जाए। लेकिन जिन लोगों के संकल्प कायम रह जाते हैं, वे लोग तो कामयाब होते ही हैं, और ऐसी कामयाबी की कोशिश में ही हर किसी को नए साल के मौके पर कुछ न कुछ तो तय करना चाहिए, और तय करने से परे भी कुछ चीजों के बारे में सोचना चाहिए। अब हिन्दुस्तान में रहते हुए आम लोग अगर रूस और यूक्रेन में से किसी एक से कोई रिश्ता याद रख पाते हैं, तो वह सोवियत संघ के समय से रूस के साथ भारत की दोस्ती है, जिसके चलते भिलाई इस्पात संयंत्र जैसे कारखाने बने हैं, और अंतरराष्ट्रीय मुसीबत के समय रूस ने जिस तरह भारत का साथ दिया था, वह भी भारत के लोगों को याद है। लेकिन वह दौर निकल गया है, और आज खुद रूस अपने इतिहास से कुछ परे-परे चल रहा है, और जिस अंदाज में वह रात-दिन यूक्रेन की नागरिक आबादी पर हमले कर रहा है, उसे अनदेखा करना ठीक नहीं है। इसलिए लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आज दुनिया का एक सबसे ताकतवर देश किस तरह एक छोटे पड़ोसी देश को खत्म करने पर आमादा है, और हिन्दुस्तानी नागरिक इसमें सीधे कोई दखल चाहे न दे सकें, उन्हें इसकी जानकारी तो रखनी चाहिए, यूक्रेन के हित में न सही, अपने खुद के हित में इस अंतरराष्ट्रीय जुल्म को समझना चाहिए। इसी तरह लोगों को यह भी समझना चाहिए कि इजराइल में आज एक कैसी कट्टरपंथी और जुल्मी सरकार बन रही है जो कि फिलीस्तीन को धरती से मिटा देने पर आमादा है। इस पर न महज फिलीस्तीनी, बल्कि दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी फिक्रमंद हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ सहित। कुल मिलाकर हमारा यह सोचना है कि नया साल निजी अच्छी और बुरी आदतों को पकडऩे और छोडऩे से परे एक सरोकार की सोच का भी रहना चाहिए जिसमें हम उन लोगों के बारे में सोचें जिनसे हमारी जिंदगी सीधी-सीधी जुड़ी हुई नहीं है। अफगानिस्तान में तालिबान नाम के दहशतगर्द आतंकी सरकार चलाते हुए अपनी महिलाओं और लड़कियों के साथ किस तरह का अमानवीय बर्ताव कर रहे हैं, इससे हिन्दुस्तान की जिंदगी पर आज तो सीधे-सीधे असर नहीं पड़ रहा है, लेकिन लोगों को इसे समझना चाहिए क्योंकि आज नहीं तो कल इन्हीं तालिबानों से हौसला पाकर दूसरे देशों में दूसरे धर्मों के लोग भी ऐसी ही तालिबानी हरकतें करेंगे, और हिन्दुस्तान इनसे अछूता नहीं रह जाएगा, आज भी अछूता नहीं है।
दुनिया पर एक नजर दौड़ाने के बाद हम हिन्दुस्तान लौटें तो यहां भी इस किस्म की ज्यादतियां कम नहीं हैं, और इस नए साल का एक संकल्प यह भी हो सकता है कि देश के कुछ लोगों पर, और कुछ तबकों के साथ होने वाले ऐसे जुल्म के बारे में हम कम से कम पढ़ेंगे तो सही, बातों को समझेंगे तो सही, और कुछ कहेंगे। कहने के लिए लोगों के पास मुफ्त का सोशल मीडिया हासिल है जिस पर कोई खर्च नहीं लगता है, महज जरा सा हौसला लगता है सच कहने के लिए, और सच का होने वाला विरोध झेलने के लिए। हिन्दुस्तान के भीतर आज अलग-अलग तबकों के साथ जितने किस्म के जुल्म चल रहे हैं, उन्हें अनदेखा करना बंद करने का एक संकल्प भी लोगों को लेना चाहिए क्योंकि इसके बिना यह लोकतंत्र अधिक लंबा नहीं चल पाएगा। इसको खत्म करने की कोशिशें तेज होती चल रही हैं, और अगर माहौल ऐसा ही रहा तो इसकी जिंदगी बहुत लंबी भी नहीं रहेगी। इसलिए जिंदा कौमों की तरह हिन्दुस्तानियों को देखने, सोचने, समझने, और मुंह खोलने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए, और नए साल का मौका यह सोचने का भी हो सकता है कि किस तरह लोग दिन का थोड़ा सा वक्त ऐसी कड़वी हकीकत को जानने और उस पर कुछ करने में भी लगाएंगे।
नए साल का मौका यह तय करने का भी हो सकता है कि लोग अपने-अपने दायरे में किस तरह कुछ लोगों को एकजुट करके कुछ नेक काम कर सकते हैं। इसी जगह दस बरस से भी पहले हमने अपने खुद का एक इरादा लिखा था कि समाज में थोड़ी-बहुत भी पकड़ रखने वाले लोग दस-दस लोगों का ऐसा समूह तैयार कर सकते हैं जो कि अपने आसपास के और दस-दस लोगों के घरों से बेकार सामान को इकट्ठा करें, और उसे जरूरतमंद लोगों के बीच बांटें। अगर कुल दस लोग कमर कस लें, और इनमें से हर कोई अपने इर्द-गिर्द के दस-दस घरों का जिम्मा ले, तो महीने में दो-चार घंटे देकर ही सौ घरों का फालतू सामान लाया भी जा सकता है, और जरूरत की जगह पर पहुंचाया भी जा सकता है। दुनिया के अलग-अलग देशों और शहरों में बहुत से लोग इसी तरह की पहल करते हैं, और उनमें से कुछ कोशिशें दुनिया की सबसे बड़ी कोशिशें हो जाती हैं। पाकिस्तान में ईधी फाउंडेशन बनाकर पूरे देश में एम्बुलेंस सेवा का जाल बिछा देने वाले एक बुजुर्ग की लोगों को याद होगी जिन्होंने भारत से किसी गलती से पाकिस्तान चली गई एक मूकबधिर लडक़ी गीता को आसरा दिया था, और उस मुस्लिम परिवार में वह अपने हिन्दू धर्म के साथ बड़ी हो रही थी, और पांच-दस बरस पहले वह हिन्दुस्तान लाई गई थी। अब कट्टरपंथ और धर्मान्ध आतंक के शिकार पाकिस्तान के भीतर अब्दुल सत्तार ईधी नाम के एक सज्जन ने 1951 में जो समाजसेवी संगठन शुरू किया था, वह न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी समाजसेवी एम्बुलेंस सेवा चला रहा है। एक अकेले इंसान की शुरू की हुई एक पहल, उसका रोपा गया एक पौधा किस तरह इतिहास का सबसे बड़ा बरगद बन सकता है और जरूरतमंदों को अपनी छांह दे सकता है यह देखने की जरूरत है।
इसलिए नए साल के इस मौके पर हम लोगों को बस उन बातों को याद दिला रहे हैं जो कि उन्हीं के बीच के, उन्हीं के सरीखे आम लोगों ने कभी शुरू की थी, और जो कोशिशें बढक़र कभी बाबा आम्टे बनीं, कभी मदर टेरेसा बनीं, और कभी रेडक्रॉस जैसी संस्था बनी। लोगों को नेक काम की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए। नेक काम शुरूआत में कुछ महत्वहीन से दिखते हैं, चर्चा से परे रहते हैं, लेकिन जब वे पनपते हैं, तो दूर-दूर तक उनकी हरियाली का खूबसूरत नजारा दिखता है, और खूब सारे लोगों को उनकी छांह मिलती है, उसके फल मिलते हैं। इसलिए चाहे खून देने जैसी छोटी पहल हो, चाहे अंगदान करने जैसे दानपत्र भरने हों, ऐसे बहुत से कामों के बारे में सोचना चाहिए, आसपास के लोगों से उसकी चर्चा करनी चाहिए, और अपने बीच उनकी संभावनाएं देखनी चाहिए।
शीशे के घरों में सेलोफिन का तौलिया लपेटे विवेक अग्निहोत्री को तगड़ा जवाब
30 दिसंबर 2022
सोशल मीडिया के आने के पहले जिंदगी इतनी
दिलचस्प कभी नहीं थी। मीडिया के नाम पर एक वक्त सिर्फ अखबार थे, फिर
रेडियो-टीवी जुड़ गए, और कई दशक बाद इंटरनेट पर डिजिटल मीडिया विकसित हुआ।
लेकिन इंटरनेट पर सोशल मीडिया के आते ही जिस तरह से आम लोगों को एक
लोकतांत्रिक अधिकार मिला, आवाज मिली, उससे दुनिया की पूरी तस्वीर बदल गई।
एक वक्त किसी शहर के चार अखबारों को काबू में करके, इश्तहार या रिश्वत देकर
वहां की किसी भी खबर को दबाया जा सकता था। आज हिन्दुस्तान जैसे देश में भी
हर शहर-कस्बे में सोशल मीडिया पर दसियों हजार या लाखों लोग हैं, और किसी
भी बात को छुपाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं रह गया। आज तो अगर दर्जन भर
किस्म के अलग-अलग धर्मों के ईश्वर भी मिलकर चाहें कि किसी बात को दबवा लें,
तो सोशल मीडिया पर लाखों नास्तिक भी मौजूद हैं जो कि ईश्वरों के दबाव का
जिक्र करते हुए भी उनकी अनचाही खबरों को पल भर में चारों तरफ फैला देंगे।
लेकिन इस सोशल मीडिया से उन लोगों के लिए खासी दिक्कत खड़ी हो गई है जो कि
कुछ अरसा पहले किसी और संदर्भ में अलग किस्म की बात करते आए हैं, और आज
अपने मतलब से या बदले हुए माहौल को देखते हुए उससे ठीक उल्टी बात कर रहे
हैं। लोग उनकी पुरानी उल्टी को सोशल मीडिया पर ढूंढकर आज उनके मुंह पर मल
दे रहे हैं।
ऐसा ताजा हादसा कश्मीर फाईल्स नाम की फिल्म के निर्माता-निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री के साथ हुआ जिन्होंने फिल्म पठान के विरोध में एक वीडियो पोस्ट किया था। उनकी यह पोस्ट भारत के हिन्दुत्ववादियों के अभियान का हिस्सा थी जो कि अभिनेता शाहरूख खान की वजह से उनकी बांहों में दिख रही अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की भगवा-केसरिया बिकिनी को हिन्दू धर्म का अपमान करार दे रहे हैं। विवेक अग्निहोत्री सोशल मीडिया पर रात-दिन हिन्दुत्ववादी-राष्ट्रवादी आंदोलनकारी की तरह लगे रहते हैं, और उनकी इस पोस्ट के बाद लोगों ने आनन-फानन सोशल मीडिया से ही विवेक अग्निहोत्री की बेटी मल्लिका की अपनी पोस्ट की हुई तस्वीरें निकालकर लगा दीं जिनमें वे भगवा कलर के बिकिनी टॉप में समंदर के किनारे अपनी तस्वीरें खिंचवाकर पोस्ट कर रही हैं। विवेक अग्निहोत्री के पोस्ट किए हुए वीडियो में दीपिका का बिकिनी-डांस देखकर एक बच्ची रोते हुए कह रही है कि इतनी अश्लीलता आप लोग लाते कहां से हो। यह सवाल दिलचस्प हो सकता था लेकिन लोगों ने विवेक अग्निहोत्री का एक पुराना वीडियो निकालकर पोस्ट किया जिसमें उन्होंने हेट-स्टोरी नामक फिल्म बनाते समय फिल्मों में महिला के बदन को दिखाने के महत्व का लंबा-चौड़ा बखान किया था, और ऐसे मादक नजारों का जश्न मनाने के लिए कहा था। उनका यह लंबा वीडियो माइक पर उनकी कही हुई बातें हैं जिसमें उन्होंने महिला के बदन को खूबसूरत बताते हुए उसे पर्दे पर दिखाने की लंबी-चौड़ी हिमायत की थी। अब आज जब वे एक, दर्जनों दूसरे रंगों सहित भगवा-केसरिया बिकिनी में दिखने वाली दीपिका के बहाने शाहरूख का नाम लिए उन पर हमला कर रहे हैं, तो यह सोशल मीडिया की ही ताकत है कि वह पल भर में विवेक अग्निहोत्री की दोगली बातों का भांडाफोड़ कर रहा है। और मजे की बात यह है कि टीवी से लेकर अखबारों तक और डिजिटल से लेकर दूसरे किस्म के मीडिया तक, ये सब सोशल मीडिया की ऐसी पोस्ट को अपनी खास खबरें बना रहे हैं। मीडिया मालिकों और मीडिया के लिए काम करने वाले तथाकथित पत्रकारों को काबू में करने वाली ताकतों के लिए सोशल मीडिया एक बुरे ख्वाब की तरह है जिस पर कोई काबू नहीं पाया जा सकता। फेसबुक जैसे कुछ बिकाऊ माध्यमों से ऐसे काबू के सौदे जरूर हो सकते हैं, लेकिन उसके बावजूद कई दूसरे सोशल मीडिया हमेशा ही लोगों के लिए मौजूद रहेंगे, और लोग उनका लोकतांत्रिक इस्तेमाल करते ही रहेंगे। सोशल मीडिया की इस ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए कि वह पहाड़ से निकलने वाली एक नदी की तरह है जिसके पानी का बहाव बेकाबू रहता है। और यही बेकाबूपन उसे कुछ हद तक अराजक और बहुत हद तक लोकतांत्रिक बनाकर चलता है।
पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे मौके सामने आए हैं जब भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों ने दूसरों पर हमले किए, और कुछ घंटों के भीतर उन ताकतों की पुरानी बातों की कतरनें, उनके वीडियो निकालकर लोगों ने पोस्ट करना शुरू कर दिया। आज तो सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग सचमुच ही शीशे के घरों में रह रहे हैं, और उन्हें दूसरों पर पत्थर चलाने के पहले यह याद रखना चाहिए कि जो लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं वे मानो पारदर्शी सेलोफिन का तौलिया लपेटे रहते हैं, और लोगों की पहुंच के भीतर रहते हैं। एक मामूली डांस को अश्लील बताने वाले विवेक अग्निहोत्री का महिला-देह की नग्नता की बड़ी लंबी वकालत देखने लायक है, और सोशल मीडिया पर लोगों को ढूंढकर इसे देखना चाहिए कि तिलक लगाया हुआ यह पाखंड किस दर्जे का है। हम सोशल मीडिया की इस अराजक ताकत के लोकतांत्रिक महत्व को गिनाना चाहते हैं कि जब संगठित कारोबार की तरह चलने वाले मीडिया घराने बिक जाते हैं, बड़े-बड़े नामी-गिरामी तथाकथित पत्रकार हर महीने कुछ राजनीतिक ट्वीट करने का लाखों रूपया भुगतान पाते हैं, तब अराजक सही, लोकतांत्रिक सोशल मीडिया यह साबित करता है कि ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है...।
धरती से इंसानों की जंग कहां ले जाकर छोड़ेगी?
29 दिसंबर 2022
पिछले हफ्ते केन्द्र सरकार ने एक बड़ा फैसला
लिया कि वह देश के 81 करोड़ से अधिक गरीब लोगों को राष्ट्रीय खाद्य
सुरक्षा कानून के तहत एक बरस तक मुफ्त राशन दिया जाएगा। सरकार की तरफ से
गरीबों के कुछ और दूसरे तबकों को बहुत रियायती रेट पर अनाज दिया जाता है।
कोरोना लॉकडाउन के समय से केन्द्र सरकार किसी न किसी तरह से सबसे गरीब
लोगों को मुफ्त या रियायती राशन देते आ रही थी, और यह अगले एक बरस तक उसी
का विस्तार है। इस पर केन्द्र के करीब 2 लाख करोड़ रूपये एक बरस में खर्च
होंगे। भारत में गरीबी और अनाज के इस हाल को दुनिया के कुछ दूसरे हिस्सों
से जोड़कर देखने की भी जरूरत है क्योंकि धरती नाम के इस गोले पर दुनिया के
तमाम देश नक्शे की सरहदों से परे भी कई तरह से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
आज दुनिया में मौसम की मार के साथ अनाज को जोड़कर देखने की जरूरत है, और
इससे भारत हमेशा अछूता रह जाएगा यह सोचना भी खुशफहमी होगी।
फिलीपींस बहुत अधिक दूर भी नहीं है, और वहां पर एक के बाद एक लगातार आए समुद्री तूफानों ने अरबों-खरबों की फसल तबाह कर दी है। तूफानी बाढ़ की वजह से 10 लाख के करीब घरों को नुकसान पहुंचा है या वे तबाह हो गए हैं, साथ ही सवा 4 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल भी तबाह हुई है। नतीजा यह हुआ है कि महंगाई वहां सिर चढ़कर बोल रही है, और वहां के बहुत से शहरों में लोग पेट भरने के लिए भीख मांग रहे हैं। आज ही सुबह बीबीसी पर एक रिपोर्ट थी कि वहां एक कामकाजी परिवार की महिला अपने बच्चों को तीन वक्त की जगह अब दो वक्त खाना दे पा रही है, और कुछ दिन बाद एक वक्त भी खाना मिल पाएगा या नहीं इसका ठिकाना नहीं है। अनाज की कमी से चीजों के भाव आसमान पर पहुंच रहे हैं, और फिलीपींस अपना बहुत सारा अनाज आयात करता है जो कि अब आसान नहीं रह गया है। दुनिया की ब्रेड बॉस्केट कहा जाने वाला यूक्रेन रूसी हमले का शिकार हो गया है, और वहां से मौजूदा अनाज भी बहुत कम निकल पाया है, और आगे तो आबादी, खेत, फसल, ढांचा, सभी कुछ रूसी हमले से तबाह हो चुका है। ऐसे में आगे जाकर वहां भी फसल दुनिया का पेट कितना भर पाएगी इसका कोई ठिकाना नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्यान्न संगठन का कहना है कि दुनिया में 19 देशों पर भूख की मार सबसे अधिक है जिनमें अफगानिस्तान, इथियोपिया, नाइजीरिया, सोमालिया, दक्षिण सूडान, और यमन की हालत बहुत ही खराब है।
अब जंग से लेकर मौसम की मार तक, इन तमाम चीजों को जोड़कर अगर देखा जाए तो मौसम की मार ही सबसे अधिक बेकाबू है जिस पर आने वाले कई बरसों तक दुनिया की कोई ताकत काबू नहीं कर सकती। किसी जंग को तो कुछ मध्यस्थ देश रोक सकते हैं, लेकिन आज दुनिया भर में जो मौसम की सबसे बुरी मार (वेदर एक्स्ट्रीम) पड़ रही है, उससे जूझने का कोई शॉर्ट-कट नहीं है। आज अमरीका जिस तरह बर्फबारी को देख रहा है, उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। दसियों लाख लोग बिना बिजली के अपने घरों में कैद हैं, सड़कों पर लोग कारों में जमकर मर गए हैं, या मरकर जम गए हैं। बड़े-बड़े प्रदेशों में बिजली ठप्प है, और इतनी बुरी बर्फबारी को अमरीका में बॉम्बसाइक्लोन कहा जा रहा है। अब दुनिया के सबसे विकसित देश का ढांचा भी कुदरत की ऐसी मार से जरा भी नहीं जूझ सकता है। दूसरी तरफ अफ्रीका के कुछ देशों में पिछले कई बरस से लगातार जितना भयानक सूखा पड़ रहा है, उसने जानवर और इंसान दोनों का जीना मुहाल हो चुका है। पूरे-पूरे देश बगल के देशों की तरफ खिसक रहे हैं कि किसी तरह खाना और पानी मिल जाए। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही हिन्दुस्तान के बगल के पाकिस्तान में ऐसी भयानक बाढ़ आई जैसी किसी ने कभी देखी-सुनी नहीं थी। पूरे के पूरे प्रदेश बाढ़ में डूब गए, सड़क और पुल बह गए, और इमरजेंसी राहत पहुंचाने वाले हेलीकाप्टरों के उतरने के लिए भी सूखी जगह नहीं बची थी। दसियों लाख लोग बेघर हो गए थे, भूखे रह रहे थे। कुल मिलाकर बात यह है कि सूखे और बाढ़ से परे, बर्फबारी, और टिड्डी दल के हमले से परे बहुत सी ऐसी और नौबतें हैं जिनसे फसल तबाह होती है। हिन्दुस्तान में ही अभी गेहूं की पिछली फसल के दौरान जब पौधों पर अन्न के दाने विकसित होते हैं, ठीक उसी समय इतनी भयानक लू चली कि उत्तर भारत में गेहूं की फसल खूबी और वजन दोनों पैमानों पर बर्बाद हुई। और इस मौसम में ऐसी लू की किसी ने कल्पना नहीं की थी।
आज दुनिया को यह समझने की जरूरत है कि लोगों के पास आज अगर किसी तरह खाना जुट रहा है, तो जरूरी नहीं है कि यह अनाज हमेशा मिलते ही रहेगा। मौसम की मार फसलों को बहुत दूर तक बर्बाद कर रही है, और उस पर इंसानों का कोई रातोंरात का काबू भी नहीं हो सकता। आज हर बरस दुनिया में एक-दो जगहों पर मौसम के बदलाव के खतरों से जूझने के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहे हैं, उनमें अधिकतर देशों के बड़े नेता पहुंच रहे हैं, मौसम विज्ञानी और पर्यावरण शास्त्री इक_ा हो रहे हैं, पर्यावरण आंदोलनकारी इन मौकों पर खतरों को गिनाते हुए सभा भवनों के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन दुनिया के देश अपने प्रदूषण मेें कटौती को अपनी घरेलू आबादी के बीच अलोकप्रिय मानते हुए उस पर तेजी से कटौती की बात नहीं कर रहे हैं। न तो कोयले से बनने वाली बिजली में कटौती हो पा रही है, और न ही निजी इस्तेमाल वाली बड़ी-बड़ी कारों की बढ़ती हुई गिनती की रफ्तार किसी तरह घट पा रही है। लोगों की संपन्नता उन्हें धरती की साधन-सुविधाओं के अनुपातहीन इस्तेमाल का हक दे रही है, और उस पर कोई देश कोई काबू करना नहीं चाह रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि धरती पर गिनी हुई आबादी के बीच खपत इतनी अधिक हो चुकी है कि वह उनसे सैकड़ों या हजारों गुना अधिक गरीब आबादी की खपत को भी पीछे छोड़ चुकी है। ऐसी इंसानी बेलगाम खपत के चलते ही धरती के पर्यावरण में इतना बदलाव आ रहा है कि जगह-जगह एक्स्ट्रीम वैदर की मार इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है।
हम इसे अनाज से जोड़कर इसलिए देख रहे हैं कि इंसान की पहली जरूरत खाने और पानी की रहती है। हवा तो वे प्रदूषित लेना सीख चुके हैं, पानी भी गंदा रहे तो भी काम चला लेते हैं, लेकिन अगर अनाज ही नहीं रहेगा, तो क्या होगा? अभी तो दुनिया केवल एक जंग झेल रही है, हो सकता है कि रूस का यूक्रेन पर हमला बढ़कर रूस और नाटों देशों के बीच जंग में तब्दील हो जाए, और वैसे में दुनिया के और भी बहुत से खेत खत्म हो जाएंगे, अनाज और घट जाएगा। अमरीकी वैज्ञानिक संस्था नासा का एक अध्ययन कहता है कि दुनिया के मौसम में बदलाव से दस बरसों के भीतर ही फसलों पर बहुत बुरा असर देखने मिल सकता है। यह अध्ययन बताता है कि मक्के की फसल 24 फीसदी तक घट सकती है, और उत्पादन में ऐसी गिरावट पूरी दुनिया को भूख से बदहाल कर सकती है। मौसम में बदलाव से अगर भुखमरी और बढ़ी, तो दुनिया के सबसे गरीब और अकालग्रस्त देश बाकी दुनिया की रहम पर अगर जिंदा रह गए तो भी बहुत होगा, लेकिन वहां की आबादी दान पर मिले अनाज पर महज जिंदा रहने से अधिक कुछ भी नहीं कर पाएगी।
आज के अनाज की कमी को देखते हुए, गरीबी और मौसम की मार को देखते हुए सभी लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि मौसम के बदलाव में इजाफा करने के बजाय किस तरह किफायत बरती जा सकती है ताकि धरती और अधिक तबाह न हो।
सलमान खुर्शीद ने बकवास की लीज रिन्यू करवा ली...
28 दिसंबर 2022
कांग्रेसियों में एक बड़ी खूबी है, जब कभी
पार्टी में कुछ अच्छे दिन आते हैं, तो उसकी खुशी में बनाई जा रही खीर में
फिनाइल डालने के लिए कोई न कोई कांग्रेसी इस तरह से दौड़कर आगे आते हैं,
मानो उन्हें किसी विरोधी पार्टी ने सुपारी दे रखी है। अब चारों तरफ राहुल
गांधी की भारत जोड़ो पदयात्रा का असर दिखाई दे रहा था, और उत्तरप्रदेश से
आने वाले कांग्रेस के एक बड़े नेता सलमान खुर्शीद ने कल राहुल गांधी की
भगवान राम से किसी तरह की एक तुलना की। ऐसी नाजायज बात पर भाजपा का यह हक
बनता था कि वह इसे चाटुकारिता की पराकाष्ठा कहे। यह एक अलग बात है कि पिछले
कई बरस से देश भर में जगह-जगह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना
अलग-अलग भगवानों से करने का सिलसिला चले आ रहा है, और उसे रोकने के लिए न
तो मोदी की तरफ से कभी कुछ कहा गया, और न ही भाजपा ने ऐसी नाजायज चापलूसी
का कोई विरोध किया। लेकिन राहुल और मोदी के बीच एक बड़ा फर्क है। मोदी
लगातार चुनावी कामयाबी पाने वाले नेता हैं, और वे अपनी पार्टी को आसमान पर
ले गए हैं, और राहुल की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी ने चुनावों में सब कुछ
खोया ही है। अब आज की चर्चा में हम चुनावी कामयाबी या नाकामयाबी से जुड़े
हुए दूसरे पहलुओं पर बात करना नहीं चाहते कि कामयाबी किस कीमत पर मिली, या
नाकामयाबी के पीछे क्या साम्प्रदायिकता से परे रहना एक वजह रही। अभी हम उस
चर्चा को अलग छोडऩा चाहते हैं, और इस पर आना चाहते हैं कि कांग्रेस आज जिस
दौर से गुजर रही है, उस दौर में जब पार्टी में कुछ अच्छा होते दिख रहा है,
जब राहुल गांधी अपने पैरों पर चलकर एक अलग किस्म की कामयाबी और शोहरत तक
पहुंच रहे हैं, दो दिन पहले ही हमारी इसी जगह पर लिखी हुई तारीफ के हकदार
बन रहे हैं, तब कांग्रेस पार्टी के एक बड़े मुस्लिम नेता राम से उनकी तुलना
करके भाजपा को हमले का एक नायाब मौका दे रहे हैं।
हमने कुछ अरसा पहले यह भी लिखा था कि धर्म और पुराण की मिसालों को लेकर कोई भी राजनीतिक दल भाजपा से नहीं जीत सकते। भाजपा की तो बुनियाद ही इन्हीं कहानियों पर टिकी हुई है, और उसके अखाड़े में जाकर उसे कोई क्या परास्त कर लेगा। ऐसे में अगर सलमान खुर्शीद को खालिस चापलूसी भी करनी थी, तो भी उन्हें राम-रहीम से दूर रहना चाहिए था। उनका नाम आते ही यह याद पड़ता है कि साल भर पहले अपनी एक किताब को बढ़ावा देने के कार्यक्रम में सलमान खुर्शीद ने हिन्दुत्व की चर्चा करते हुए उसकी तुलना दुनिया के सबसे खूंखार इस्लामी-आतंकी संगठन आईएसआईएस से की थी। यह बात इतनी भयानक थी कि उस वक्त कांग्रेस पार्टी में रहे एक दूसरे बड़े मुस्लिम नेता गुलाम नबी आजाद ने इसे तथ्यात्मक रूप से गलत, और गलत बयान करार दिया था। सलमान खुर्शीद के उस बयान को लेकर भाजपा ने राहुल गांधी पर हल्ला बोला था, और कांग्रेस पर यह तोहमत लगाई थी कि यूपी चुनाव के पहले वह मुस्लिमों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। इस बयान के 13 महीने बाद सलमान खुर्शीद ने मानो बकवास की सालाना लीज रिन्यू करवाने के लिए एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम तनाव के बीच राम का नाम लेकर पदयात्रा की कामयाबी का राम-नाम-सत्य करने का काम किया है। सलमान खुर्शीद एक कामयाब वकील रहे हैं, और उन्हें अपनी महारत का इस्तेमाल कानूनी मामलों में करना चाहिए, और हिन्दू-धार्मिक मामलों को छूना बंद करना चाहिए।
अब जब चापलूसी की पराकाष्ठा पर बात हो ही रही है, तो हम एक दूसरे पहलू पर भी बात करना चाहते हैं जो कि राहुल गांधी से ही जुड़ा हुआ है। राहुल जब दिल्ली की सात डिग्री की सर्द हवा में एक टी-शर्ट में घूम रहे हैं, भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों की खुली समाधियों पर तेज हवा के बीच वैसे ही खड़े हैं, तो यह बहस भी छिड़ गई है कि वे ऐसा कैसे कर पा रहे हैं? बात हैरानी की तो है, लेकिन चापलूसों ने इसका बखान करने के लिए उन्हें संत करार देना शुरू कर दिया है, कोई प्रशंसक सोशल मीडिया पर उन्हें योगी लिख रहे हैं, तो कोई उन्हें ऊंचे दर्जे का सन्यासी लिख रहे हैं। फिर जिन चापलूसों को कुछ और मेहनत करनी है, वे किसी समाधि स्थल पर बैठे शॉल लपेटे हुए अमित शाह की फोटो के साथ राहुल गांधी की टी-शर्ट वाली फोटो जोड़कर तुलना कर रहे हैं। कुल मिलाकर बिना चापलूसों के यह टी-शर्ट राहुल को एक अलग रौशनी में पेश कर रही थी कि पदयात्रा की आग से गुजरकर वे तपकर मजबूत हुए हैं, लेकिन इस टी-शर्ट को लेकर मोदी और शाह के गर्म कपड़ों की खिल्ली उड़ाना परले दर्जे की बेवकूफी है, और इसकी भरपाई राहुल गांधी को करनी पड़ रही है या करनी पड़ेगी। जिन चापलूसों ने दस-बीस किलोमीटर का सफर भी राहुल के साथ पैदल तय नहीं किया होगा, उन्होंने राहुल की पदयात्रा की शोहरत और उन्हें मिल रही वाहवाही को तबाह करने का काम जरूर किया है।
किसी भी नेता, संगठन, या पार्टी को अपने चापलूसों को काबू में रखना चाहिए। ऐसे लोगों के बजाय वे आलोचक काम के रहते हैं जो कि नेता या संगठन की खामियों को उजागर करने का काम करते हैं। मोदी की स्तुति में हर-हर महादेव की तर्ज पर हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा देने वालों के बजाय भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग बेहतर हैं जो कि अपनी पार्टी, और पार्टी की सरकार की खामियों पर खुलकर बोलते हैं। चापलूसों ने इंदिरा गांधी को भी इमरजेंसी के पहले से गड्ढे में गिरना शुरू कर दिया था, और इमरजेंसी के दौरान वे इंदिरा को पाताल तक ले गए थे। चापलूसों ने इंदिरा इज इंडिया जैसा नारा दिया था, और संजय गांधी की चप्पलें उठाई थीं। आज राहुल गांधी अपने परिवार के एक सबसे साहसी व्यक्ति की तरह लगातार लोगों के बीच एक गैरचुनावी मकसद से देश के इतिहास की सबसे लंबी पदयात्रा कर रहे हैं। उनकी आज की कामयाबी में कांग्रेस पार्टी के किसी और नेता का कोई भी योगदान नहीं है। पार्टी के चापलूसों को राहुल की इस मुहिम को चौपट करने से परे रहना चाहिए। कांग्रेस पार्टी के लिए बेहतर यही होगा कि उसकी तरफ से अपने नेताओं के लिए यह सलाह जारी हो जाए कि वे धर्म की मिसालों से परे रहें। बिना चापलूसी के राहुल आज अधिक कामयाब हैं, और उन्हें राम बताना, या उन्हें टी-शर्ट में एक योगी बताना बंद होना चाहिए।
कौन से जुर्म पुलिस के रोकने लायक हैं, कौन से नहीं, समझें
27 दिसंबर 2022
जब किसी शहर या प्रदेश में कत्ल या लूट की वारदातें बढऩे लगती हैं, या बलात्कार अधिक होने लगते हैं तो लोगों के बीच यह चर्चा होने लगती है कि पुलिस का खौफ खत्म हो चुका है। और इस एक शब्द, खौफ, के इस्तेमाल को छोड़ दें, तो यह बात सही रहती है कि कई मामलों में लोगों को कानून का डर नहीं रह जाता, उन्हें पुलिस के भ्रष्टाचार पर भरोसा रहता है कि वे कोई केस दर्ज होने से रोक लेंगे, गवाहों और सुबूतों को खरीदने पर भरोसा रहता है, अदालत में वकीलों से लेकर जजों तक को खरीदने का भरोसा रहता है, और वे जुर्म करने के पहले से बाद में बचने का भरोसा रखते हैं। लेकिन जनधारणा को लेकर हमारा कुछ अलग तजुर्बा है। अभी छत्तीसगढ़ में एक परिवार ने बाप-बेटे ने मिलकर भाड़े के कातिलों के साथ साजिश करके परिवार के ही एक बेटे का कत्ल कर दिया। खुली सडक़ पर दिनदहाड़े हुए इस कत्ल को लेकर शहर की पुलिस की बड़ी थू-थू हुई, राजनीतिक बयानबाजी भी हुई, लेकिन पुलिस ने दो दिनों के भीतर सबको गिरफ्तार करके पूरी साजिश उजागर कर दी। अब पुलिस के नजरिए से देखें तो घर के भीतर के लोग परिवार के किसी को कत्ल करना तय कर लें, और इस साजिश में परिवार की औरतें भी शामिल हों, तो पुलिस उसे कैसे बचा सकती है? इसी तरह इन दिनों छत्तीसगढ़ का ही एक दूसरा मामला खबरों में बना हुआ है जिसमें एक उद्योगपति ने अपनी ही 9 बरस की बेटी से बलात्कार किया, और मां-बेटी ने पुलिस में रिपोर्ट की, महीनों बाद जाकर मजिस्ट्रेट के सामने बयान हुआ, और सरकारी कमेटी बच्ची को मां के हवाले करने को तैयार नहीं है, और ऐसा लगता है कि सरकारी अफसर इस उद्योगपति के प्रभाव में हैं, इसीलिए वह गिरफ्तारी से बाहर है, और शिकायतकर्ता मां अपनी बेटी पाने के लिए सडक़ पर धरना दे रही है। यहां पर समझ में आता है कि परिवार के भीतर का बलात्कार तो पुलिस नहीं रोक सकती थी, लेकिन उसके बाद तो उस बच्ची का बयान तुरंत करवाया जा सकता था, उसके बलात्कारी पिता को गिरफ्तार किया जा सकता था, बच्ची को मां के हवाले किया जा सकता था, लेकिन इन सब मामलों में पुलिस की भूमिका संदिग्ध दिखाई पड़ती है।
जब-जब पुलिस बेअसर होने लगती है, तब-तब लोग कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर होने लगते हैं। कई जगहों पर लोग आपस में हिंसा करके हिसाब चुकता करने में लग जाते हैं। आज ही गुजरात की एक खबर छपी है जिसमें बीएसएफ के एक हवलदार ने अपनी नाबालिग बेटी का वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने से जब एक नौजवान को मना किया, तो दोनों परिवारों में झगड़ा हुआ, और इस युवक के परिवार ने इस बीएसएफ हवलदार को पीट-पीटकर मार डाला। जिस गुजरात में कानून-व्यवस्था बेहतर होने का दावा 7वीं बार की भाजपा सरकार करती है, उसके तहत बीएसएफ हवलदार को भी ऐसी मौत झेलनी पड़ी। गनीमत यही है कि देश के आज के नफरती माहौल में ये दोनों ही परिवार गुजराती-हिन्दू परिवार हैं, इसलिए किसी को सबक सिखाने की नौबत नहीं आई है। लेकिन इस हत्या से परे के हिस्से को देखें, तो किसी के ऐसे वीडियो पोस्ट करने और बदनाम करने का काम देश भर में जगह-जगह हो रहा है। इस छोटे राज्य छत्तीसगढ़ में तकरीबन हर दिन ऐसी एक रिपोर्ट लिखाई जाती है कि सोशल मीडिया पर तस्वीरें या वीडियो पोस्ट करके ब्लैकमेल किया, या करने की धमकी देकर ब्लैकमेल किया।
अब हम ऐसे सौ फीसदी मामलों को इस तरह का नहीं पाते कि पुलिस उन्हें रोक सकती है। इसकी तोहमत हम पुलिस पर नहीं देते, लेकिन जब ऐसे मामले दर्ज हो जाते हैं, तो उनकी तेजी से सुनवाई, और अदालत से सजा दिलवाने तक का काम पुलिस को मेहनत से करना चाहिए, ऐसा न होने पर उस किस्म के और जुर्म करने की हसरत रखने वाले लोगों का हौसला बढ़ता है। पुलिस की अधिक जिम्मेदारी और जवाबदेही रिपोर्ट होने के बाद शुरू होती है। और यह बिल्कुल अलग बात है कि समाज में, खासकर लड़कियों और महिलाओं में ऐसे साइबर खतरे में न फंसने की जागरूकता बढ़ाई जाए, और यह पुलिस के बुनियादी काम में नहीं आता है। इसे सरकार का दूसरा अमला, या समाज के लोग करें, और ऐसे खतरों को घटाएं। इस मुद्दे पर आज यहां लिखने का मकसद यह है कि पुलिस पर इतनी गैरजरूरी तोहमतें न लग जाएं कि पुलिस का हौसला ही पस्त हो जाए, और जहां उसकी जवाबदेही बनती है, वहां भी उसे लापरवाह होने का मौका मिल जाए। जिम्मेदारी तय करते हुए समाज को यह जिम्मेदारी तो दिखानी ही चाहिए कि अपने हिस्से की तोहमत पुलिस पर न थोप दी जाए। पुलिस सरकार का सबसे सामने दिखने वाला चेहरा रहता है, वर्दी और काम के मिजाज की वजह से पुलिस सबसे सामने दिखती है, और खासकर अप्रिय स्थितियों में और अधिक दिखती है। यह भी एक बड़ी वजह है कि पुलिस पर अधिक तोहमतें लगती हैं, लेकिन यह एक वजह होनी चाहिए कि पुलिस की जिम्मेदारियों की संभावनाओं और सीमाओं को ठीक से समझ लिया जाए, न तो उसके साथ रियायत बरती जाए, और न ही उस पर बिना वजह तोहमतें लगाई जाएं।
समाज को पुलिस तक पहुंचने की नौबत आने देने से बचना चाहिए। लोगों के बीच जुर्म के खिलाफ, खतरों के बारे में जागरूकता अधिक रहनी चाहिए। लोगों को अपने आसपास के जुर्म पर आमादा लोगों को समझाने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। परिवार के भीतर अगर कोई जुर्म हो रहा है, तो लोगों को उस नौबत को भी खत्म करना चाहिए। आज अगर पूरे देश में अदालतों पर अंधाधुंध बोझ होने की बात हर कोई कह रहे हैं, तो इस बोझ को भी समाज की सावधानी से घटाया जा सकता है ताकि बाकी मामलों पर इंसाफ होने की संभावना बन सके। वैसे भी इस बात को समझना चाहिए कि हर जुर्म न सिर्फ सरकार पर बोझ है, अदालत पर बोझ है, बल्कि इस बोझ को ढोने का खर्च तो जनता से ही निकलता है। इसलिए लोगों को अपने परिवार से शुरू करके अड़ोस-पड़ोस और जान-पहचान तक जुर्म से बचने की सावधानी पर भी चर्चा करनी चाहिए, और जुर्म करने पर जिंदगी कैसे बर्बाद होती है इसकी मिसालें भी अपने लोगों को देनी चाहिए। जब आपस के लोग ऐसे खतरों को गिनाते हैं, तो वे लोगों के दिमाग में अधिक पुख्ता तरीके से बैठते हैं, और लोग चौकन्ने रहते हैं। लोगों को अपने आसपास के लोगों को यह भी बताना चाहिए कि आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, और सीसीटीवी फुटेज जैसे सुबूतों से अधिकतर मुजरिम आनन-फानन पकड़ में आ जाते हैं, इसलिए कभी किसी जुर्म के बारे में सोचें भी नहीं। बढ़ती हुई आबादी के साथ अगर जुर्म इसी तरह बढ़ते चलेंगे, तो जो अधिक पुलिस लगेगी, अधिक अदालतें लगेंगी, वे सब जनता के ही पैसों पर चलेंगी, इसलिए किफायत और बचाव का अकेला तरीका जुर्म के खिलाफ सावधानी है।
प्रेमसंबंध टूटने को ही खुदकुशी का उकसावा मान लेना नाजायज होगा
26 दिसंबर 2022
हिन्दुस्तान में आज छाए हुए हिन्दू-मुस्लिम विवाद के बीच एक और मामला सामने आया जब टीवी अभिनेत्री तुनिषा शर्मा की शूटिंग के दौरान खुदकुशी के बाद उनकी मां की रिपोर्ट पर तुनिषा के दोस्त या प्रेमी शीजान खान को गिरफ्तार किया गया है। इस नौजवान पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने बताया कि इस अभिनेत्री ने अपनी मां को कहा था कि उसका ब्रेकप हो गया है, और लडक़ा उससे बात नहीं करता, अब उसके साथ रिश्ता नहीं रखना चाहता। मां का कहना था कि इस वजह से वो टेंशन में थी और इसलिए उसने आत्महत्या कर ली।
हम इस मामले की बारीकियों पर जाना नहीं चाहते क्योंकि इसकी जांच अभी चल ही रही है। लेकिन हम इस तरह के मामलों को लेकर यह सोचने पर जरूर मजबूर हैं कि संबंधों के टूट जाने को आत्महत्या के लिए उकसाना मान लेना कितना ठीक है? दुनिया में दोस्ती और प्रेम स्थाई नहीं हो सकते। स्थाई तो शादियां भी नहीं होतीं, और उनमें भी अलग हो जाने, अलग रहने, या तलाक की गुंजाइश रहती ही है। जब परिवार और समाज के रिवाजों के मुताबिक हुई शादियां भी टूट जाती हैं, तो दोस्ती या प्रेमसंबंध, या लिव इन रिलेशनशिप का खत्म हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं मानी जा सकती। ऐसे में अगर हर रिश्ते के टूट जाने को आत्महत्या के लिए उकसाना मान लिया जाएगा, तो फिर किसी रिश्ते के टूटने के साथ हुई आत्महत्या पर जिंदा जोड़ीदार को अनिवार्य रूप से कैद होने लगेगी। इसलिए इस बात को समझना जरूरी है कि रिश्तों को लेकर तोहमत की एक सीमा होना जरूरी है।
हिन्दुस्तानी अदालतों में ढेर सारे ऐसे मामले पहुंचते हैं जिनमें लोगों के बीच बरसों तक प्रेमसंबंध रहे, और देहसंबंध भी जारी रहा। इसके बाद अगर प्रेमी ने शादी से इंकार कर दिया तो प्रेमिका ने बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करा दी, और प्रेमी को गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसी नौबत पर हमने पहले भी इसी जगह कई बार लिखा है कि किसी से प्रेम और देहसंबंध बनते हुए क्या भविष्य में इस हद तक झांककर देखा जा सकता है कि उससे शादी हो ही जाएगी या नहीं? अगर इतनी दूर तक का देख पाना इंसान के लिए मुमकिन होता तो बहुत से प्रेम तो कभी शुरू ही नहीं हुए होते। प्रेमसंबंधों के चलते देहसंबंध एक आम बात है, और बरसों तक अगर दो बालिग लोगों के बीच आम सहमति से देहसंबंध हो रहे हैं, तो शादी भर न हो पाने से उसे धोखा देकर बलात्कार मान लेना बहुत ही नाजायज है। हिन्दुस्तान का कानून ऐसी शिकायत का हक देता है, और पुरूष की गिरफ्तारी की गारंटी भी रहती है। लेकिन इस कानूनी इंतजाम के खिलाफ देश की कई अदालतें समय-समय पर राय दे चुकी हैं।
इंसान की सोच की इस संभावना को अनदेखा नहीं करना चाहिए कि आज जो उसे शादी के लायक लग रही है, या लग रहा है, वह हो सकता है कि कल उस लायक न लगे। जिंदगी पत्थर की तरह स्थिर नहीं रहती, वह बहती हुई नदी की तरह आगे बढ़ती है। जिंदगी में कई रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं, साथ रहते हुए लोगों को एक-दूसरे की खूबियां और खामियां दोनों दिखती हैं, और एक-दूसरे के बारे में खयाल बनते और बिगड़ते हैं। प्रेम और देहसंबंधों के बाद भी अगर लोगों को लगता है कि उनकी शादी नहीं निभ पाएगी, तो ऐसी अनचाही शादी और उसके बाद की घरेलू हिंसा या तलाक से बेहतर तो यही है कि लोग प्रेम या लिव इन के दौरान ही अलग हो जाएं। ऐसा संबंध टूट जाना लोगों के लिए, परिवार और समाज के लिए शादी के टूट जाने के मुकाबले कम नुकसान का होता है। शादी के बाद टूटने वाले रिश्तों से बच्चों की जिंदगी भी खराब होती है, अनचाही शादी टल जाने से इसकी नौबत भी नहीं आती। इसलिए दबाव में अनचाही शादी में पडऩे से बेहतर प्रेम और देहसंबंधों का टूट जाना रहता है।
अब सवाल यह है कि हिन्दुस्तान के मौजूदा कानून के मुताबिक दो बालिग लोगों में भी बरसों तक आपसी सहमति से चले देहसंबंधों के बाद भी महिला जब चाहे तब बलात्कार की रिपोर्ट लिखा सकती है, और कानून पुरूष के खिलाफ है। आज जरूरत तो ऐसे कानून को बदलने की है जो एक बालिग महिला को इस तरह का हक देता है जो कि इंसानी मिजाज और आपसी संबंधों के ठीक खिलाफ है। सच तो यह है कि 21वीं सदी में आकर भारतीय बालिग महिला को यह समझने की जरूरत है कि उसका प्रेम, या कि उसका देहसंबंध किसी तरह के स्थायित्व या शादी की गारंटी नहीं है, हो भी नहीं सकती। जब तक यह परिपक्वता नहीं आ जाती, तब तक हिन्दुस्तानी युवतियां एक नाजायज कानून को सहारा मानकर चलती रहेंगीं, और अपनी जिंदगी के लिए अधिक सुरक्षित और बेहतर फैसला नहीं ले पाएंगी। आज किसी बालिग लडक़ी को देहसंबंध में पडऩे के पहले यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ऐसे रिश्ते शादी तक पहुंचने से पहले खत्म हो सकते हैं।
लोगों को याद होगा कि गुजरात में अभी कुछ बरस पहले तक मैत्री करार नाम की एक ऐसी कानूनी व्यवस्था जारी थी जिसे बाद में गैरकानूनी करार दिया गया और बंद करवाया गया। ऐसे मैत्री करार में दो बालिग स्त्री-पुरूष स्टाम्प पेपर पर किसी तय समय के लिए एक-दूसरे के साथ प्रेम और देहसंबंध बनाने का अनुबंध करते थे, और उसके बाद वे एक-दूसरे के लिए जवाबदेह नहीं रह जाते थे। ऐसा शादीशुदा लोगों में भी दूसरों के साथ होता था। समाज में यह आम प्रचलित रिवाज माना जाता था। फिर इसे गैरकानूनी करार दिया गया। अब आज अगर बालिग लोगों में प्रेम और देहसंबंधों के बाद अगर किसी युवक या आदमी को सुरक्षित रहना है, तो क्या उसे स्टाम्प पेपर पर ऐसा एक अनुबंध करना पड़ेगा कि वह शादी के किसी वायदे के बिना ऐसा करने जा रहा है, और इन रिश्तों के चलते अगर कोई तनाव होगा तो उसके लिए वह जिम्मेदार नहीं होगा? हिन्दुस्तान में महिला की सुरक्षा के लिए उसे अधिक अधिकार देने की कई तरकीबें निकाली गई हैं, लेकिन ऐसा कानून बिल्कुल नाजायज है जो कि पुरूष को देहसंबंध के बाद शादी न करने पर बलात्कारी करार दे-दे, या जोड़ीदार की खुदकुशी की नौबत में प्रेमसंबंध टूटने को जिम्मेदार मानकर जोड़ीदार को सजा दे-दे। इक्कीसवीं सदी की भारतीय युवतियों को परिपक्व होने की जरूरत है, और किसी भी तरह के संबंधों में पडऩे के पहले उनके अनिश्चित भविष्य के खतरे को भी उन्हें समझ लेना चाहिए। इसके बाद भी अगर इस बात के कोई सुबूत मिलते हैं कि पुरूष साथी ने उनके साथ बलात्कार किया, या आत्महत्या के लिए उकसाया, तो वह सजा के लायक अलग मामला रहेगा।
108 दिनों में निखरा एक व्यक्तित्व, राहुल गांधी..
25 दिसंबर 2022
केन्द्र सरकार की बेबुनियाद नसीहत के बीच राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कल दिल्ली पहुंची, और लालकिले के पास एक आमसभा में उन्होंने केन्द्र सरकार और देश से जुड़े बहुत से मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार लोगों का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटका रही है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मोदी सरकार नहीं बल्कि अडानी-अंबानी की सरकार है। अब तक 2800 किलोमीटर का सफर पूरा करके दिल्ली पहुंचे राहुल गांधी तीन जनवरी से आगे रवाना होकर श्रीनगर तक जाएंगे। हिन्दुस्तान के राजनीतिक इतिहास में किसी ने ऐसी पदयात्रा नहीं की थी, और सर्द उत्तर भारत में साथ चलते हुए मोटे गर्म कपड़ों से लदे लोगों के बीच पैदल चलते राहुल जिस तरह एक टी-शर्ट में दिख रहे हैं, वह भी एक उत्साह की गर्मी का सुबूत है जो कि अभूतपूर्व और अप्रत्याशित जनसमर्थन से उपजा हुआ है।
अब तक यह पदयात्रा सौ-सवा सौ दिन चल चुकी है, और दस राज्यों के लोगों से मिल चुकी है। बिना किसी चुनावी एजेंडा के राहुल गांधी जिस तरह देश को जोडऩे की जरूरत बताते हुए, उसकी कोशिश करते हुए चल रहे हैं, और जिस तरह आम लोग उनके गले लगकर खुशी और गम बांट रहे हैं, वैसा हिन्दुस्तानी राजनीति में किसी ने देखा नहीं था। इस देश की बड़ी-बड़ी ताकतों ने सैकड़ों या हजारों करोड़ रूपये खर्च करके, दस बरस की मेहनत से राहुल गांधी को बेवकूफ साबित करने की एक कोशिश की थी, और खरीदे हुए मीडिया या सोशल मीडिया की मेहरबानी से राहुल पर पप्पू नाम चिपका दिया था, वह सब कुछ इस पदयात्रा से धुल गया है। आज देश में नफरत की जो जहरीली हवा भर गई है, जिस तरह अलग-अलग तबकों को एक-दूसरे के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा के लिए खड़ा कर दिया गया है, जिस तरह तथाकथित हिन्दू समाज के भीतर ही दलितों को कुचला जा रहा है, आदिवासियों से उनकी जिंदगी की बसाहट छीनी जा रही है, जिस तरह देश की संवैधानिक संस्थाओं का भगवाकरण किया जा चुका है, और जिस तरह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की आधी-पौन सदी की शोहरत को खत्म कर दिया गया है, उस बीच राहुल से परे भी अनगिनत अमन-पसंद लोगों को देश को जोडऩे की जरूरत लग रही थी। और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की त्रासदी यह है कि देश के समाज के टुकड़े-टुकड़े करने में कामयाब हो चुके लोग दूसरों को टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते नहीं थकते हैं। देश को इस हद तक साम्प्रदायिकता में झोंक दिया गया है कि अब सरकार, अदालत, और दीगर संवैधानिक संस्थाओं में बैठे लोग खुलकर साम्प्रदायिक बातें करते हैं, और किसी किस्म की शर्म का भी कोई सवाल नहीं उठता। ऐसे कतरा-कतरा बांटे गए भारतीय समाज में आज राहुल गांधी अगर नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो का नारा लगाकर बिना कुछ मांगते हुए इस तरह की एक पदयात्रा कर रहे हैं, तो यह ताजा लोकतांत्रिक इतिहास की एक बड़ी घटना है। खासकर इसलिए भी कि अपनी दादी और पिता को उन्होंने जैसे आतंकी हमलों में खोया है, वैसे किसी हमले का खतरा राहुल पर कम नहीं हैं, लेकिन वे बिना किसी परवाह के जिस तरह देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चल रहे हैं, वह एक बहुत बड़े हौसले की बात भी है। हर दिन सैकड़ों-हजारों लोगों से गले मिलते हुए, हाथ में हाथ डाले हुए वे जिस तरह चलते चले जा रहे हैं, भीड़ के सैलाब के बीच बिना किसी मुमकिन हिफाजत के भी उनका हौसला देखने लायक है। सच तो यह है कि इन सवा सौ से कम दिनों में राहुल गांधी ने जो एक नई इज्जत कमाई है, एक नई साख पाई है, वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन में भी इतना कुछ हासिल नहीं कर पाए थे। और यह बिल्कुल ही अटपटी, अनोखी, और अजीब बात यह साबित करती है कि लोकतंत्र में जनता से संपर्क से बड़ा कुछ भी नहीं होता है। गांधी पूरी जिंदगी जनता के बीच ही जीते और मरते रहे, लोगों के बीच खाते रहे, पखाने धोते रहे, अनशन करते रहे, और जान देने में भी वे पीछे नहीं रहे। उनके बाद की आधी सदी में किसी ने जनता से जुडऩे की ऐसी ताकत का इस्तेमाल शायद इस हद तक नहीं किया था जिस हद तक राहुल गांधी कर रहे हैं। शायद उन्हें खुद भी इस बात का अहसास नहीं रहा होगा कि उन्हें इतना जनसमर्थन मिलेगा, और हिन्दुस्तानी मीडिया में अघोषित ब्लैकआउट सरीखी नौबत के रहते भी वे सोशल मीडिया के सैलाब से लोगों के दिलों तक पहुंचेंगे, और लोग उन तक पहुंचेंगे। इस पदयात्रा की खूबी यही रही कि इस दौरान हुए चुनावों में राहुल गांधी ने न पार्टी को हार से बचाने की कोशिश की, और न ही पार्टी की जीत का सेहरा खुद बंधवाने की कोशिश की। वे मोटेतौर पर इस पदयात्रा को गैरचुनावी बनाकर चले, और यही वजह है कि अब तक दर्जन भर पार्टियों के नेता, और अनगिनत लेखक, पत्रकार, कलाकार उनके साथ अपनी एकजुटता दिखाते हुए चले हैं।
पदयात्रा की इस हकीकत के साथ अब दो मिनटों में वह भी देख लेने की जरूरत है जो कि राहुल ने दिल्ली पहुंचकर सभा में कहा है। उन्होंने मीडिया पर चौबीसों घंटे नफरत की खबर दिखाने के लिए कहा है कि लोगों का ध्यान भटकाकर पैसा मीडिया-मालिकों की जेब में जाता है। उन्होंने आज के हिन्दुत्व के हमलावर तेवरों को लेकर भी हिन्दू धर्म की बुनियादी सोच याद दिलाई है, और पूछा है कि हिन्दू धर्म में कहां लिखा है कि गरीबों को कुचलना चाहिए, कमजोरों को मारना चाहिए? उन्होंने चीन के मोर्चे पर सरकार की नाकामयाबी की बात की है, और देश के अडानीकरण और अंबानीकरण पर भी हमला किया है। राहुल की कही बातों को देश के मीडिया में चाहे कुछ भी जगह न मिले, सोशल मीडिया और मीडिया के एक छोटे तबके की मेहरबानी से उनकी बातें लोगों तक पहुंच रही हैं, और नफरत के खिलाफ एक उम्मीद जगा रही हैं।
कांग्रेस पार्टी का समर्थन करने, या मोदी सरकार का विरोध करने की किसी नीयत के बिना आज हम देश को जोडऩे की जरूरत को बहुत तल्खी से महसूस कर रहे हैं, और इसीलिए अब तक की 108 दिनों की इस पदयात्रा पर दो-चार बार इसी जगह पर लिख चुके हैं। नफरत से उबरने की अहमियत को कम नहीं आंकना चाहिए। लोकतंत्र में आने वाली पीढ़ी के लिए नफरती हिंसा की विरासत छोड़ जाने का मतलब लोकतंत्र को कभी सभ्य और विकसित न होने देना भी होगा, इसलिए राहुल की पदयात्रा को आज राजनीतिक सहमति और असहमति से परे भी समझने की जरूरत है कि आज देश को जोडऩे की कितनी जरूरत है।
सामाजिक वर्जनाएं किसी तरह हिफाजत की गारंटी नहीं, सेफ्टी वॉल्व जरूरी
24 दिसंबर 2022
रूस के एक सैनिक की बीवी को दुनिया के ऐसे
मुजरिमों की लिस्ट में जोड़ा गया है जिनकी किसी जुर्म के लिए तलाश है। इस
महिला ने यूक्रेन के मोर्चे पर लड़ रहे अपने पति को फोन पर कहा था कि वहां
जो यूक्रेनी महिलाएं हैं उनसे बलात्कार करना, लेकिन लौटकर कुछ मत बताना। इस
पर उसका पति और खुलासे से पूछता है, तो वह इसी बात को दुहराती है और कहती
है कि बस इतना ध्यान रखना कि कंडोम का इस्तेमाल करना। जब इस टेलीफोन कॉल को
यूक्रेन की सुरक्षा एजेंसी ने इंटरसेप्ट किया तब यह सैनिक यूक्रेनी जमीन
पर था, और बाद में इनके टेलीफोन नंबरों से इनकी शिनाख्त की गई, आवाज का
मिलान किया गया, इनके सोशल मीडिया अकाऊंट देखे गए, और इसकी पुख्ता खबर भी
बनी। इस जोड़े का चार बरस का एक बेटा भी है। जब इनकी शिनाख्त के साथ खबरें
चारों तरफ फैलीं तो इस महिला ने अपना सोशल मीडिया अकाऊंट डिलीट कर दिया।
दुनिया भर की जंग में यह बात बहुत अटपटी नहीं है कि फौजी दुश्मन देश में
महिलाओं और बच्चों के हाथ लग जाने पर उनसे बलात्कार करें, लेकिन अगर किसी
फौजी की महिला उसे ऐसा जुर्म करने के लिए कहती है, तो यह उसके खिलाफ भी
कार्रवाई की वजह तो बनती है। लोगों को याद होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की
एक बड़ी अधिकारी ने कुछ अरसा पहले यह कहा था कि यूक्रेन के मोर्चे पर जाने
वाले रूसी सैनिकों को उत्तेजना बढ़ाने वाली वियाग्रा नाम की दवाई दी जा
रही है जिससे कि वे यूक्रेनी महिलाओं से बलात्कार कर सकें।
दुनिया
की सरकारें तो कई किस्म के अमानवीय काम कर सकती हैं क्योंकि वे एक इंसान
की तरह नहीं सोचतीं, लेकिन जब इंसान इस तरह की हरकतें करने लगते हैं कि
उन्हें देखते हुए इंसानियत शब्द की परिभाषा को ही बदलने की जरूरत लगने लगे,
तो फिर यह सोचना पड़ता है कि इंसानों के भीतर ही वह तथाकथित हैवान छुपा
रहता है जिसे इंसान अपने जुर्म छुपाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। तमाम
किस्म के जुर्म और जुल्म करते तो इंसान ही हैं, लेकिन ये इसकी तोहमत ऐसी
हैवानियत पर मढ़ देते हैं जो कि मानो इंसानों से परे की कुछ हो। नतीजा यह
होता है कि इंसानियत शब्द जरूरत से अधिक सकारात्मक बने रहता है, और ऐसा
लगता है कि इंसान के भीतर कुछ बुरा नहीं रहता, और जो बुरा रहता है वह इंसान
से परे का एक हैवान रहता है। यह बात कुछ वैसी ही है कि इंसान का बायां हाथ
बलात्कारी हो जाए, और दायां हाथ सज्जन बना रहे।
आज जब हम यह लिख रहे
हैं उसी समय बिलासपुर का एक मामला सामने आया है जिसमें 9 साल की एक बच्ची
से दो महीने पहले पिता द्वारा बलात्कार करने की रिपोर्ट लिखाई गई। एफआईआर
उसी वक्त हो गई, लेकिन बाल कल्याण समिति ने लंबे समय तक इस बच्ची का अदालती
बयान नहीं करवाया, इस बच्ची को उसकी मां की हवाले नहीं कर रहे, और बाल
कल्याण समिति के बारे में एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा है कि वह पूरी तरह
से बलात्कारी पिता को बचाने में लगी हुई है, और इस चक्कर में वह बच्ची को
मां के पास नहीं जाने दे रही। इसी बिलासपुर में अभी हफ्ते-दस दिन पहले
दिनदहाड़े सडक़ पर एक कत्ल हुआ जिसे पुलिस ने आनन-फानन सुलझा भी लिया। इसमें
बाप और भाई ने बाकी परिवार के साथ मिलकर एक बेटे का कत्ल करवा दिया, और
पूरे परिवार ने इसकी साजिश बनाई, कत्ल के बाद लोगों को छुपाने का काम किया।
इसी कत्ल के सिलसिले में यह बात भी सामने आई कि बाप ने एक बच्ची को गोद
लिया हुआ था, और अब वह बड़ी महिला है, जिसके साथ बाप-बेटे दोनों बलात्कार
करते आए थे, और उससे अवैध संबंध बनाकर रखा था। एक परिवार के भीतर ही इतने
किस्म के जुर्म, इतने किस्म की अनैतिक और वर्जित बातें सोचने पर मजबूर करती
हैं कि क्या ऐसे परिवारों के भीतर इंसानियत कही जाने वाली कुछ बातें भी
लागू होती हैं, या नहीं?
हर दिन कोई न कोई ऐसी वारदात सामने आ रही है
जिसमें पति-पत्नी, या प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं, या
करवा रहे हैं। और यह भी किसी क्षणिक उत्तेजना में कर दिया गया जुर्म न होकर
ऐसी लंबी-चौड़ी साजिश के तहत किए गए जुर्म हैं जिनसे कि अपराध कथाओं के
आदी पाठकों के भी दिल हिल जाएं। जबकि समाज की हकीकत यह है कि वह अपने बनाए
गए रीति-रिवाजों को हकीकत में अमल होते मान लेता है, और उसने
सामाजिक-पारिवारिक बचाव के बहुत ही कम तरीके लागू किए हैं। अनगिनत परिवारों
में बाप ही बेटी से बलात्कार करते हैं, जिनमें से गिने-चुने मामले ही
पुलिस तक पहुंचते हैं क्योंकि अधिकतर मामलों में बाप घर का कमाऊ सदस्य होता
है, और उसे जेल भिजवाकर बाकी परिवार के भूखे मर जाने की नौबत आ जाएगी।
इसके अलावा बाकी परिवार बेहिसाब दबाव डालते रहता है, समाज के लोग यही
समझाते हैं कि जो हो गया है उसे भूलकर परिवार को बचाया जाए, और इससे बचता
सिर्फ बलात्कारी है जिसे यह समझ आ जाता है कि उसका जुर्म जारी रहने पर भी
शायद ही उसके खिलाफ कोई कार्रवाई हो। इसलिए लोगों को यह समझने की जरूरत है
कि वर्जित संबंधों को लेकर जो किताबी बातें हैं, हकीकत उनसे काफी परे चलती
है। असल की जिंदगी में परिवार के भीतर, या स्कूल में गुरू कहे जाने वाले
लोग, या खेल सिखाने वाले लोग कब बलात्कारी हो जाते हैं, इसका कोई ठिकाना
नहीं रहता। और आज की यह बात जिस रूसी महिला के उकसावे से शुरू की गई है,
उसे अगर देखें तो एक महिला दुश्मन देश की महिला को शिकस्त देने के लिए,
उसका मनोबल तोडऩे के लिए अपने पति को उकसाती है कि वह जाकर उनसे बलात्कार
करे, जबकि सामाजिक वर्जनाएं तो यह कहती हैं कि अगर पति-पत्नी में से कोई
बेवफा हो जाए तो उसे तलाक दे देना भी जायज है।
कुल मिलाकर इस मुद्दे पर
लिखने का मकसद यही है कि सामाजिक वर्जनाओं को पूरी तरह असरदार मान लेना
ठीक नहीं है, लोगों को इन वर्जनाओं के नाकामयाब होने पर बचाव की नौबत की
तरकीबें सोच रखना चाहिए, और उनका उसी तरह इस्तेमाल करना चाहिए जिस तरह आग
बुझाने के उपकरणों का इस्तेमाल होता है। यह मानकर चलना चाहिए कि आसपास के
लोगों के तन-मन में लगी आग में सारी नैतिकता, सारे सामाजिक प्रतिबंध जाने
कब जल जाएंगे, और जिंदगियों और रिश्तों को जलने से बचाने के लिए इंतजाम
रखना हर किसी की खुद की जिम्मेदारी है।
(Daily Chhattisgarh)
अब यह भी सुप्रीम कोर्ट को अपनी अवमानना नहीं लगती, तो फिर और क्या बात लगेगी?
23 दिसंबर 2022
पिछले दिनों इसी जगह पर दो अलग-अलग दिन हमने
दो अलग-अलग मुद्दों पर लिखा था, और आज उन दोनों को जोडक़र लिखने का एक मौका
है। शाहरूख खान और दीपिका पादुकोण के एक फिल्मी डांस में दीपिका की
भगवा-केसरिया बिकिनी को लेकर हिन्दुस्तान का एक बड़बोला तबका उबला हुआ है,
और मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा से लेकर तथाकथित साधू-संत तक
सार्वजनिक रूप से कानूनी और गैरकानूनी धमकियां दे रहे हैं। दूसरा मुद्दा
अमरावती का था जहां पर एक भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा के मोहम्मद पैगंबर के
बारे में दिए गए आपत्तिजनक बयान को लेकर देश में कत्ल के जो फतवे चल रहे
थे, उसमें नुपूर शर्मा के बयान के पक्ष में अमरावती के एक हिन्दू दुकानदार
ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, और इसे लेकर मुस्लिमों के एक तबके ने इस
दुकानदार के 16 बरस पुराने एक दोस्त की अगुवाई में उसका गला काटकर उसे मार
डाला था। धर्म ने इंसानियत का गला काट दिया था, दोस्ती की मिसालों को भी
टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। इन दोनों बातों पर हमने खुलासे से लिखा था,
लेकिन हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता और धार्मिक हिंसा का नंगा नाच खत्म
होने का नाम नहीं ले रहा है, इसलिए आज उस पर एक बार फिर लिखने की जरूरत
है।
शाहरूख खान और दीपिका पादुकोण के फिल्मी डांस को लेकर अयोध्या के एक तथाकथित महंत परमहंस आचार्य ने यह धमकी दी है कि शाहरूख खान अगर मिल गया तो उसे वे जिंदा जला डालेंगे, और अगर किसी और ने शाहरूख को जलाने का साहस किया तो उसका मुकदमा वे (महंत) खुद लड़ेंगे। खबरें बताती हैं कि यह तथाकथित महंत पहले भी एक बार घोषणा कर चुका है कि अगर भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित न किया गया तो वह जल समाधि ले लेगा, लेकिन फिर शायद धरती का जल उसके लिए कम पड़ गया। एक दूसरे तथाकथित महंत राजूदास ने लोगों से कहा है कि जहां भी पठान फिल्म दिखाई जाए, उस थियेटर को आग लगा दें, नहीं तो बात उनकी समझ में नहीं आएगी। हिन्दुत्व के हमलावर फौजियों ने सोशल मीडिया पर इस किस्म की बहुत सारी धमकियां लिखी हैं, जिनका अलग-अलग जिक्र मुमकिन नहीं है।
अब यह सब कुछ केन्द्र सरकार, अलग-अलग राज्य सरकारों, और देश की तमाम अदालतों, संवैधानिक आयोगों की नजरों के सामने हो रहा है। ऐसी हालत में एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि अपने नाम और चेहरे सहित जो लोग अपने को एक धर्म का महंत बताते हुए हिंसा का फतवा दे रहे हैं, खुद कत्ल करने की घोषणा कर रहे हैं, उनके खिलाफ सरकारों की पुलिस कोई जुर्म दर्ज क्यों नहीं कर रही है? सुप्रीम कोर्ट ने अभी कुछ महीने पहले ही नफरती बयान देने वाले लोगों पर मुकदमे दर्ज करने का जिम्मा उनके इलाके की पुलिस पर डाला था, और यह भी कहा था कि अगर अफसर यह काम नहीं करेंगे, तो उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। अब एक गाने में एक हिन्दू अभिनेत्री के पहने हुए कपड़े के रंग को लेकर अगर मुस्लिम अभिनेता को जिंदा जलाने की बात हो रही है, तो इससे बड़ी हेट-स्पीच और क्या हो सकती है? यह फिल्म एक हिन्दू सिद्धार्थ आनंद के निर्देशन में बनी है, इसकी कहानी एक और हिन्दू श्रीधर राघवन ने लिखी है, फिल्म का निर्माण आदित्य चोपड़ा नाम के प्रोड्यूसर ने यशराज फिल्म्स नाम की एक हिन्दू की कंपनी के लिए किया है। इसके बाद अगर फिल्म के अभिनेता को मुस्लिम होने की वजह से जिंदा जलाने की बात हो रही है, उसकी ऐसा करने की कसम खाई जा रही है, दूसरों को उकसाया जा रहा है कि अगर वे शाहरूख को जिंदा जला दें तो वे (महंत) उसका मुकदमा लड़ेंगे, तो फिर इस हेट-स्पीच पर अगर यूपी की पुलिस मुकदमा दर्ज नहीं कर रही है, तो क्या वह सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के दायरे में नहीं आ रही है?
सुप्रीम कोर्ट को तो मध्यप्रदेश के गृहमंत्री से भी सवाल करना चाहिए कि संविधान की शपथ लेने के बाद वे संविधान को कुचलने वाला यह बयान कैसे दे रहे हैं, और इसे संविधान के खिलाफ किया गया काम मानकर उन पर कार्रवाई क्यों न की जाए? सरकारी और अदालती कामकाज में कुछ बातें नजीर बन जाती हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस किस्म के कुछ मामलों में लोगों को कटघरे में घसीटना चाहिए, और वहां से जेल भेजना चाहिए। धर्म के नाम पर दुकानदारी करने वाले 10-20 लोग और संविधान की शपथ लेकर संविधान पर थूकने वाले 10-20 लोग अगर जेल भेजे जाएंगे तो इस देश से हिंसक, साम्प्रदायिक, और नफरती बकवास कम हो सकेगी। आज तो सुप्रीम कोर्ट अपनी खुद की दी गई चेतावनी को लेकर नाखून और दांत खो बैठे एक ऐसे प्राणी की तरह दिख रहा है जो कि लाचार है, और जिसके बस का कुछ नहीं रह गया है। जब देश में इस तरह की साम्प्रदायिक हिंसा की एक परंपरा विकसित की जा रही है, तब अदालत को दखल देनी होगी क्योंकि देश की सरकार, अधिकतर प्रदेशों की सरकारें इस हिंसा के साथ खड़ी दिख रही हैं, सरकारों में बैठे हुए बड़े-बड़े मंत्री ऐसे खुले फतवे दे रहे हैं, संसद में बाहुबल का संतुलन साम्प्रदायिकता के पक्ष में इतना अधिक झुका हुआ है कि साम्प्रदायिकता विरोधी लोग पासंग में भी नहीं बैठ रहे हैं। ऐसे माहौल में देश की न्यायपालिका की एक बड़ी जिम्मेदारी बनती है, और उसे इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को उठाना चाहिए, वरना इतिहास में यह अच्छी तरह दर्ज होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जज महज अपनी सहूलियतों को लेकर, अपनी लंबी छुट्टियों के हक को लेकर लड़ते रहे हैं, और देश की आम जनता को उन्होंने एक छोटे और हिंसक तबके के सामने ठीक उसी तरह छोड़ दिया जिस तरह रोम में शेर के सामने निहत्थे इंसान को छोडक़र स्टेडियम में बैठे बाकी लोग उसका मजा लेते थे। सुप्रीम कोर्ट अगर अपनी ही चेतावनी, अपने ही हुक्म की अवमानना की फिक्र नहीं कर रहा है, तो इससे देश की जनता के हक कुचले जा रहे हैं, और देश की हवा जहरीली होती जा रही है।
(Daily Chhattisgarh)
सोलह बरस पुरानी दोस्ती का गला काट दिया धर्म ने
22 दिसंबर 2022
भाजपा की एक प्रवक्ता नुपूर शर्मा ने
मोहम्मद पैगंबर के बारे में एक आपत्तिजनक बयान दिया था, और सोशल मीडिया पर
उसका समर्थन करते हुए अमरावती के एक दुकानदार उमेश कोल्हे ने एक पोस्ट किया
था। इस पोस्ट के बाद कई लोगों ने मिलकर उमेश कोल्हे का कत्ल कर दिया था।
ऐसा शक था कि सीसीटीवी कैमरों पर कैद मारने वाले लोग मुस्लिम थे जिन्होंने
सोशल मीडिया पर पोस्ट किए हुए समर्थन के बदले यह कत्ल किया था। अब एनआईए ने
अपनी जांच रिपोर्ट पेश की है, और इस बीच उसने अमरावती के ही एक मुस्लिम
समुदाय, तब्लीगी जमात के ग्यारह लोगों को गिरफ्तार किया था, और अभी चार दिन
पहले उसने कोर्ट में चार्जशीट पेश की है जिसके मुताबिक उमेश कोल्हे के एक
सोलह बरस पुराने दोस्त यूसुफ ने ही अपनी जमात के बाकी लोगों के साथ मिलकर
यह कत्ल किया। चार्जशीट कहती है कि डॉ. यूसुफ उमेश कोल्हे का पुराना दोस्त
था, और यूसुफ की बहन की शादी में मदद की जरूरत थी तो उमेश कोल्हे ने ही मदद
की थी।
अभी हम एनआईए की रिपोर्ट को सच मानते हुए आगे की बात लिख रहे हैं। और यह जिक्र जरूरी इसलिए है कि हिन्दुस्तान में कभी-कभी जांच एजेंसियां जांच के नाम पर साजिश करते हुए भी मिली हैं, और किसी बेकसूर को फंसाते हुए भी। फिलहाल इस घटना, और अदालत में पेश इस चार्जशीट से कुछ लिखने की जरूरत लगती है। नुपूर शर्मा नाम की भाजपा की प्रवक्ता ने एक टीवी चैनल के लाईफ टेलीकास्ट के दौरान मोहम्मद पैगंबर के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें कहीं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट तक ने देश में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के लिए जिम्मेदार कहा। नुपूर शर्मा का सिर काटने के लिए कुछ लोगों और संगठनों ने फतवे भी जारी किए, और तब से अब तक वे सामने नहीं आई हैं, या आ पाई हैं। जिस तरह के साम्प्रदायिक रूझान के साथ भाजपा की इस प्रवक्ता ने निहायत अवांछित, नाजायज, और भडक़ाऊ बातें कही थीं, वे बातें उनकी बाकी बकवास के साथ मेल खाती हुई थीं। उनका मकसद मुस्लिमों को जख्मी करना था, और वे अपने मकसद में कामयाब भी हुईं, अनहोनी बस यही हुई कि वे इस चक्कर में देश का कानून तोड़ बैठीं, और कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों को उन्होंने इतना अधिक विचलित कर दिया कि उन्होंने नुपूर शर्मा का सिर काटने का फतवा जारी कर दिया। अब जैसा कि सोशल मीडिया पर होता है, हर भडक़ाऊ बात के समर्थन में अनगिनत लोग जुट जाते हैं, और यह साबित करने लगते हैं कि उनके पास दिल-दिमाग चाहे न हों, उनके पास किसी भडक़ाऊ बात को आगे बढ़ाने के लिए उंगलियां जरूर हैं। कुछ ऐसा ही अमरावती के उमेश कोल्हे से हुआ, या उन्होंने किया। और इसके जवाब में स्थानीय मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उनकी जान ले ली। चूंकि ये सभी ग्यारह कातिल मुस्लिमों के एक ही सम्प्रदाय के थे, इसलिए जाहिर है कि उनका धार्मिक आधार पर एक-दूसरे से मिलना-जुलना भी रहा होगा, और वे धर्म के आधार पर जुड़े हुए लोग थे।
अब इससे यह तो साबित होता है कि धर्म के नाम पर जहां-जहां नफरत और आक्रामकता है, वहां-वहां लोगों में एकजुटता बड़ी तेजी से हो जाती है। नुपूर शर्मा को न जानते हुए भी उमेश कोल्हे ने उसका समर्थन किया, और उमेश कोल्हे के कत्ल के लिए दस तब्लीगी एकजुट हो गए। यह धर्म का आम मिजाज है कि वह घायल होने के लिए एक पैर पर खड़े रहता है, और अपने धर्म की तथाकथित रक्षा करने के नाम पर किसी भी तरह की हिंसा करने को तैयार रहता है। जब-जब हिन्दू बहुत अधिक एकजुट होते हैं, एक बात बड़ी तेजी से उभरती है कि हिन्दुत्व खतरे में है। जब हिन्दू अलग-अलग रहते हैं, धार्मिक आयोजन कम होते हैं, तब हिन्दुत्व कभी खतरे में नहीं रहता। जब मुस्लिम एक कामगार की शक्ल में काम करते हैं, तब तक इस्लाम खतरे में नहीं रहता क्योंकि उनके पास काम करने की अपनी जरूरत रहती है। लेकिन जब कभी धार्मिक आधार पर वे जुटते हैं, इस्लाम खतरे में पडऩे लगता है। धर्म का मिजाज किसी दूसरे धर्म की दहशत दिखाकर अपने लोगों को एक करने, और फिर उन्हें दुहने का रहता है। धर्म के जो एजेंट ईश्वर और धर्मालु के बीच काम करते हैं, उनका अस्तित्व इसी पर टिका रहता है कि धर्मालुओं की भीड़ अपने को असुरक्षित महसूस करती रहे। अगर आस्थावान सुखी और सुरक्षित हो गए, उनके सिर पर कोई खतरा उन्हें नहीं दिखा, उन्हें अगर किसी दूसरे धर्म के लोगों का खतरा नहीं गिनाया जा सका, तो फिर वे अपने ईश्वर और उसके एजेंट के झांसे में कैसे आएंगे? इसलिए जिस तरह एक पुरानी कहानी में लोगों को भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया कहकर डराया जाता था, उसी तरह आज विधर्मी आया-विधर्मी आया कहकर डराया जाता है। यह डर लोगों को एकजुट करता है, संगठित करता है, और फिर जैसा कि धर्म का आम मिजाज रहता है, वह लोगों को नफरतजीवी और हिंसक भी बनाता है। उनसे दूसरों पर हमले करवाता है क्योंकि धर्म सहअस्तित्व को नहीं मानता। हर धर्म एकाधिकार की सोच पर काम करता है, और दूसरे धर्म को खतरा और खतरनाक मानता है। पूरी दुनिया में धर्मों का विस्तार इसीलिए किया गया कि बहुत अधिक लोगों से हिंसा करना मुमकिन नहीं था, और जब लोग अपने धर्म में आ जाएं, तो फिर उनसे हिंसा की जरूरत क्या है। दुनिया के इतिहास में धर्मों का विस्तार बहुत ही खूनी जंगों से भरा हुआ है, और वह जंग अलग-अलग शक्लों में आज भी जारी है।
हम सोशल मीडिया पर हर कुछ हफ्तों में दिल को छू लेने वाली असल जिंदगी की ऐसी कहानी पढ़ते हैं कि हिन्दू और मुस्लिम दोस्तों ने, समाज के लोगों ने दूसरे के लिए क्या किया। अब इस बीच जब इंसानियत पर धर्म हावी हुआ, तो उसने सोलह बरस पुरानी दोस्ती की भी परवाह नहीं की, और दोस्ती और इंसानियत का गला काटकर धर दिया। यह बिल्कुल धर्म के मिजाज के मुताबिक है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब जम्मू में एक छोटी सी मुस्लिम खानाबदोश लडक़ी के साथ एक मंदिर में पुजारी समेत आधा दर्जन हिन्दू लोगों ने बलात्कार किया था, और फिर उस बच्ची को मार डाला था, तो वहां के हिन्दू समाज ने राष्ट्रीय झंडा लेकर बलात्कारियों को बचाने के लिए जुलूस निकाले थे, और बड़े-बड़े भाजपा नेता उसमें शामिल हुए थे। वह भी धर्म का एक मिजाज था जिसने एक छोटी सी बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी और दूसरे लोगों द्वारा बलात्कार और हत्या को अनदेखा कर दिया था, और अपने धर्म के हत्यारे-बलात्कारियों को बचाने के लिए सडक़ों पर औरत-बच्चों को लिए हुए जुलूस निकालने लगा था, यह सिलसिला लंबे समय तक चला था, और उस मुस्लिम बच्ची के परिवार को कोई वकील मिलने से भी बाकी हिन्दू वकील रोक रहे थे। आखिर में जिस महिला वकील ने उसका मुकदमा लिया, उसे कई किस्म का सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा।
दुनिया में दोस्ती को बहुत ऊंचा माना जाता है, लेकिन अमरावती की इस घटना ने साबित किया है कि धर्म की हिंसा दोस्ती का भी गला काट सकती है। इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी में धर्म की अहमियत के बारे में चौकन्ना रहने की जरूरत है क्योंकि ईश्वर के प्रति निजी आस्था जब सार्वजनिक जीवन में संगठित होकर एक हमलावर तेवरों की शक्ल ले लेती है, तो फिर वह किसी भी हद तक हिंसक हो सकती है। धर्म की यह डरावनी हिंसा इंसानों को समझनी चाहिए जिन्होंने शेर को बनाकर प्राण फूंकने की एक कहानी की तरह धर्म को गढ़ तो लिया है, लेकिन वह धर्म आज उन्हें ही खा जा रहा है।
अमरीकी संसद पर हमले की संसदीय जांच कमेटी ने कहा ट्रंप पर क्रिमिनल केस चले
21 दिसंबर 2022
अमरीकी संसद की एक जांच कमेटी ने पिछले
राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को चुनाव हारने के बाद 6 जनवरी को संसद पर हुए
हमले को उकसाने और हमलावरों की मदद करने का कुसूरवार मानते हुए अमरीका के
न्याय विभाग से सिफारिश की है कि ट्रंप पर कुछ अपराधों को लेकर आपराधिक
मुकदमा चलाना चाहिए। अठारह महीने से यह संसदीय समिति संसद पर हमले की जांच
कर रही थी, और उसने ट्रंप पर चार आरोपों को सही पाया है। कमेटी के सामने
ट्रंप के बहुत से सहयोगियों के भी शपथपूर्वक बयान हुए थे, और जांच कमेटी ने
ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी थे। कमेटी ने डेढ़ सौ पेज की
रिपोर्ट में कहा है कि संसद और सरकार के खिलाफ विद्रोह को उकसाने,
विद्रोहियों की मदद करने, उन्हें मदद का वायदा करने, सरकारी और संसदीय
कामकाज में बाधा डालने, अमरीका के साथ धोखा करने, और गलत बयान देने की
साजिश के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया गया। लोगों को याद होगा कि 6 जनवरी 2021
को जब ट्रंप चुनाव हार चुके थे, और जो बाइडन अगले राष्ट्रपति की शपथ लेने
को थे, तब ट्रंप के हजारों समर्थक आदिम हमलावरों की शक्ल में संसद में घुस
गए थे, तोडफ़ोड़ और आगजनी की थी, सांसदों को टेबिलों के नीचे छुपकर जान
बचानी पड़ी थी, और टीवी पर यह सब हिंसा देखते हुए ट्रंप अपने सहयोगियों की
भी यह सलाह तीन घंटे से अधिक तक अनसुनी करते रहे कि उन्हें अपने समर्थकों
को हिंसा रोकने के लिए कहना चाहिए। बल्कि ट्रंप सार्वजनिक रूप से जो बयान
दे रहे थे, वे चुनावों को फर्जी करार देने वाले, और इस हमलावर भीड़ को
देशभक्त बताने वाले थे। इस कमेटी ने संसद पर हमले और टीवी पर हमला देखते
ट्रंप को उनके कमरे से देखने वाले हजार से ज्यादा लोगों के बयान लिए थे, और
ऐसे तमाम हलफिया बयानों में डेढ़ बरस का समय लगा था। छह जनवरी को करीब 24
घंटे यह हमला चलते रहा, और इसमें पांच लोगों की मौत हुई थी, और सौ से अधिक
घायल हुए थे। यह दो बरस के भीतर का इतिहास है इसलिए आज के अधिकतर लोगों को
इसकी याद भी होगी।
अमरीका की व्यवस्था के तहत न्याय विभाग संसद और सरकार से परे भी फैसले लेता है, और सरकार का विभाग होने के बावजूद वह कानूनी मामलों में खुद फैसले लेता है। इसके मुखिया वहां के अकादमी जनरल होते हैं, जो सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट करते हैं। अमरीकी परंपराएं बताती हैं कि इसके हर फैसले पर जरूरी नहीं है कि अमरीकी राष्ट्रपति की सहमति लगी हो। लोगों को यह भी याद होगा कि ट्रंप के घर पर छापा मारकर अमरीका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एफबीआई ने सैकड़ों अतिगोपनीय कागजात जब्त किए थे जो कि रद्दी के गट्ठों में पड़े हुए थे, उनके घर पर बिखरे हुए थे। उसे लेकर भी उन पर मुकदमा चलाने की बात चल ही रही थी कि अब यह संसदीय कमेटी की रिपोर्ट आ गई है।
एक तरफ तो अमरीका में आजादी का हाल यह है कि चुनाव हारा हुआ राष्ट्रपति संसद पर हमला करवा सकता है, चुनावों को धोखाधड़ी करार दे सकता है, और लोगों को अराजकता और बगावत के लिए भडक़ा सकता है कि वे इन नतीजों को न मानें। दूसरी तरफ मौजूदा राष्ट्रपति पर भी संसद महाभियोग चला सकती है, इतिहास में चला चुकी है, और ट्रंप पर अगर ये आपराधिक मुकदमे चलते हैं तो हो सकता है कि उनका बाकी जिंदगी किसी भी चुनाव लडऩे का हक खतम ही हो जाए। इस तरह आज अमरीका एक अभूतपूर्व हालात का सामना कर रहा है जिसमें ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ आवाज उठ रही है, लोग उनका विरोध कर रहे हैं। और सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जो बाइडन अपनी गिरती हुई लोकप्रियता के बाद भी वहां हाल में हुए मध्यावधि चुनावों में उम्मीद से अधिक जीत पा चुके हैं, और ट्रंप के करीबी समझे जाने वाले, उनके छांटे हुए रिपब्लिकन उम्मीदवार चुनाव हार चुके हैं।
ट्रंप ने अपने चार बरस के कार्यकाल में लगातार परले दर्जे के एक दकियानूसी और संकीर्णतावादी नेता की तरह घोर नस्लवादी रूख दिखाया, देश के अल्पसंख्यकों के हक कुचलने की कोशिश की, दूसरे देशों से आने वाले प्रवासी कामगारों के खिलाफ जंग सी छेड़ दी, और गरीबों के खिलाफ अपना वैसा ही रूख दिखाया जैसा कि कोई पक्का कारोबारी दिखा सकता है। यहां तक भी बात उनकी पार्टी और उनकी विचारधारा की हो सकती थी, लेकिन ट्रंप पर लगे हुए कई दूसरे आरोप बताते हैं कि उन्होंने चुनावी चंदे का इस्तेमाल अपने वकीलों पर किया, कारोबार में टैक्स चुराने तरह-तरह की धोखाधड़ी की, एक सनकी बादशाह की तरह अमरीकी सरकार को हांकने की कोशिश की, जिन कारोबारियों से वे असहमत थे, उनके खिलाफ तरह-तरह की जांच शुरू करने के लिए अपने अफसरों को उकसाया, और तमाम ऐसी बातें कीं जो कि अमरीकी लोकतंत्र में मंजूर नहीं की जाती हैं। लेकिन यह बददिमागी बढ़ते-बढ़ते चुनावी नतीजों को खारिज करने तक पहुंच गई, और जनता के फैसले के खिलाफ खुली हिंसक बगावत करवाने तक। नतीजा यह हुआ कि उनके हिंसक समर्थकों ने संसद पर ऐसा भयानक हमला किया जैसा कि हॉलीवुड की किसी फिल्म में ही सोचा जा सकता था, असल अमरीका में नहीं।
अमरीकी न्याय विभाग को ट्रंप के खिलाफ ऐसे गंभीर अपराधों के पुख्ता सुबूतों का इस्तेमाल करना चाहिए, और उन्हें अदालत के कटघरे तक ले जाना चाहिए। शायद ऐसा होगा भी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी भी ट्रंप की हरकतों से थकी हुई है, और उसके भी कई लोग यह चाहते हैं कि अगले चुनाव में ट्रंप को राष्ट्रपति बनाने के लिए फिर काम करने की नौबत न आए, और ट्रंप से इस तरह छुटकारा मिल जाए। जब पार्टी राजनीतिक रूप से ट्रंप से छुटकारा नहीं पा सक रही है, तब वह अदालत की किसी कार्रवाई की वजह से मिल सकने वाले ऐसे छुटकारे को काम का समझ सकती है। वैसे भी अमरीकी लोकतंत्र में बाकी ट्रंप सरीखे लोगों को यह सबक मिलना चाहिए कि लोकतंत्र पर ऐसा जानलेवा हमला करके किसी की जगह दुबारा कोई निर्वाचित दफ्तर नहीं हो सकता, जेल ही हो सकती है।
अमरीकी संसद पर हमले की संसदीय जांच कमेटी ने कहा ट्रंप पर क्रिमिनल केस चले
20 दिसंबर 2022
अमरीकी संसद की एक जांच कमेटी ने पिछले
राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को चुनाव हारने के बाद 6 जनवरी को संसद पर हुए
हमले को उकसाने और हमलावरों की मदद करने का कुसूरवार मानते हुए अमरीका के
न्याय विभाग से सिफारिश की है कि ट्रंप पर कुछ अपराधों को लेकर आपराधिक
मुकदमा चलाना चाहिए। अठारह महीने से यह संसदीय समिति संसद पर हमले की जांच
कर रही थी, और उसने ट्रंप पर चार आरोपों को सही पाया है। कमेटी के सामने
ट्रंप के बहुत से सहयोगियों के भी शपथपूर्वक बयान हुए थे, और जांच कमेटी ने
ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी थे। कमेटी ने डेढ़ सौ पेज की
रिपोर्ट में कहा है कि संसद और सरकार के खिलाफ विद्रोह को उकसाने,
विद्रोहियों की मदद करने, उन्हें मदद का वायदा करने, सरकारी और संसदीय
कामकाज में बाधा डालने, अमरीका के साथ धोखा करने, और गलत बयान देने की
साजिश के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया गया। लोगों को याद होगा कि 6 जनवरी 2021
को जब ट्रंप चुनाव हार चुके थे, और जो बाइडन अगले राष्ट्रपति की शपथ लेने
को थे, तब ट्रंप के हजारों समर्थक आदिम हमलावरों की शक्ल में संसद में घुस
गए थे, तोडफ़ोड़ और आगजनी की थी, सांसदों को टेबिलों के नीचे छुपकर जान
बचानी पड़ी थी, और टीवी पर यह सब हिंसा देखते हुए ट्रंप अपने सहयोगियों की
भी यह सलाह तीन घंटे से अधिक तक अनसुनी करते रहे कि उन्हें अपने समर्थकों
को हिंसा रोकने के लिए कहना चाहिए। बल्कि ट्रंप सार्वजनिक रूप से जो बयान
दे रहे थे, वे चुनावों को फर्जी करार देने वाले, और इस हमलावर भीड़ को
देशभक्त बताने वाले थे। इस कमेटी ने संसद पर हमले और टीवी पर हमला देखते
ट्रंप को उनके कमरे से देखने वाले हजार से ज्यादा लोगों के बयान लिए थे, और
ऐसे तमाम हलफिया बयानों में डेढ़ बरस का समय लगा था। छह जनवरी को करीब 24
घंटे यह हमला चलते रहा, और इसमें पांच लोगों की मौत हुई थी, और सौ से अधिक
घायल हुए थे। यह दो बरस के भीतर का इतिहास है इसलिए आज के अधिकतर लोगों को
इसकी याद भी होगी।
अमरीका की व्यवस्था के तहत न्याय विभाग संसद और सरकार से परे भी फैसले लेता है, और सरकार का विभाग होने के बावजूद वह कानूनी मामलों में खुद फैसले लेता है। इसके मुखिया वहां के अकादमी जनरल होते हैं, जो सीधे राष्ट्रपति को रिपोर्ट करते हैं। अमरीकी परंपराएं बताती हैं कि इसके हर फैसले पर जरूरी नहीं है कि अमरीकी राष्ट्रपति की सहमति लगी हो। लोगों को यह भी याद होगा कि ट्रंप के घर पर छापा मारकर अमरीका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एफबीआई ने सैकड़ों अतिगोपनीय कागजात जब्त किए थे जो कि रद्दी के गट्ठों में पड़े हुए थे, उनके घर पर बिखरे हुए थे। उसे लेकर भी उन पर मुकदमा चलाने की बात चल ही रही थी कि अब यह संसदीय कमेटी की रिपोर्ट आ गई है।
एक तरफ तो अमरीका में आजादी का हाल यह है कि चुनाव हारा हुआ राष्ट्रपति संसद पर हमला करवा सकता है, चुनावों को धोखाधड़ी करार दे सकता है, और लोगों को अराजकता और बगावत के लिए भडक़ा सकता है कि वे इन नतीजों को न मानें। दूसरी तरफ मौजूदा राष्ट्रपति पर भी संसद महाभियोग चला सकती है, इतिहास में चला चुकी है, और ट्रंप पर अगर ये आपराधिक मुकदमे चलते हैं तो हो सकता है कि उनका बाकी जिंदगी किसी भी चुनाव लडऩे का हक खतम ही हो जाए। इस तरह आज अमरीका एक अभूतपूर्व हालात का सामना कर रहा है जिसमें ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ आवाज उठ रही है, लोग उनका विरोध कर रहे हैं। और सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति जो बाइडन अपनी गिरती हुई लोकप्रियता के बाद भी वहां हाल में हुए मध्यावधि चुनावों में उम्मीद से अधिक जीत पा चुके हैं, और ट्रंप के करीबी समझे जाने वाले, उनके छांटे हुए रिपब्लिकन उम्मीदवार चुनाव हार चुके हैं।
ट्रंप ने अपने चार बरस के कार्यकाल में लगातार परले दर्जे के एक दकियानूसी और संकीर्णतावादी नेता की तरह घोर नस्लवादी रूख दिखाया, देश के अल्पसंख्यकों के हक कुचलने की कोशिश की, दूसरे देशों से आने वाले प्रवासी कामगारों के खिलाफ जंग सी छेड़ दी, और गरीबों के खिलाफ अपना वैसा ही रूख दिखाया जैसा कि कोई पक्का कारोबारी दिखा सकता है। यहां तक भी बात उनकी पार्टी और उनकी विचारधारा की हो सकती थी, लेकिन ट्रंप पर लगे हुए कई दूसरे आरोप बताते हैं कि उन्होंने चुनावी चंदे का इस्तेमाल अपने वकीलों पर किया, कारोबार में टैक्स चुराने तरह-तरह की धोखाधड़ी की, एक सनकी बादशाह की तरह अमरीकी सरकार को हांकने की कोशिश की, जिन कारोबारियों से वे असहमत थे, उनके खिलाफ तरह-तरह की जांच शुरू करने के लिए अपने अफसरों को उकसाया, और तमाम ऐसी बातें कीं जो कि अमरीकी लोकतंत्र में मंजूर नहीं की जाती हैं। लेकिन यह बददिमागी बढ़ते-बढ़ते चुनावी नतीजों को खारिज करने तक पहुंच गई, और जनता के फैसले के खिलाफ खुली हिंसक बगावत करवाने तक। नतीजा यह हुआ कि उनके हिंसक समर्थकों ने संसद पर ऐसा भयानक हमला किया जैसा कि हॉलीवुड की किसी फिल्म में ही सोचा जा सकता था, असल अमरीका में नहीं।
अमरीकी न्याय विभाग को ट्रंप के खिलाफ ऐसे गंभीर अपराधों के पुख्ता सुबूतों का इस्तेमाल करना चाहिए, और उन्हें अदालत के कटघरे तक ले जाना चाहिए। शायद ऐसा होगा भी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी भी ट्रंप की हरकतों से थकी हुई है, और उसके भी कई लोग यह चाहते हैं कि अगले चुनाव में ट्रंप को राष्ट्रपति बनाने के लिए फिर काम करने की नौबत न आए, और ट्रंप से इस तरह छुटकारा मिल जाए। जब पार्टी राजनीतिक रूप से ट्रंप से छुटकारा नहीं पा सक रही है, तब वह अदालत की किसी कार्रवाई की वजह से मिल सकने वाले ऐसे छुटकारे को काम का समझ सकती है। वैसे भी अमरीकी लोकतंत्र में बाकी ट्रंप सरीखे लोगों को यह सबक मिलना चाहिए कि लोकतंत्र पर ऐसा जानलेवा हमला करके किसी की जगह दुबारा कोई निर्वाचित दफ्तर नहीं हो सकता, जेल ही हो सकती है।
एक फिल्मी अंदाज में सुखद अंत वाला विश्व फुटबॉल मेसी के नाम...
19 दिसंबर 2022
दुनिया के बहुत से सभ्य और विकसित
लोकतंत्रों में तो लोगों के स्वस्थ मनोरंजन और रोमांच के लिए बहुत कुछ रहता
है, लेकिन जो देश धर्म, जाति, खानपान, पोशाक की नफरत में डूबे रहते हैं,
वहां स्वस्थ मनोरंजन की गुंजाइश बड़ी कम हो जाती है। ऐसे देशों के लिए भी
बीती रात बहुत अहमियत वाली थी क्योंकि फुटबॉल के विश्वकप फाइनल में जो दो
टीमें मैदान पर थीं, उनमें न कोई बेशरम रंग दिख रहे थे, और न ही शर्मीले,
दोनों में से किसी टीम में ऐसा मजहब ही दिख रहा था कि जिसकी वजह से उसकी
हार की हसरत पाल ली जाए। नतीजा यह हुआ कि हिन्दुस्तान में भी बीती रात
तकरीबन तमाम लोगों ने फुटबॉल का मजा लिया, और खासकर उन लोगों ने भी जिनका
सुबह से रात तक का वक्त नफरत में भीगा हुआ रहता है। कल के इस मैच में नफरत
के लायक कुछ नहीं था, और यह हिन्दुस्तान के एक तबके के लिए बड़ा दुर्लभ
मौका था।
विश्वकप फुटबॉल का कल का फाइनल गजब का था। किसी हिन्दी फिल्म की कहानी की तरह मैच शुरू होने के पहले से इन दोनों देशों से परे के अधिकतर देशों या लोगों के खयालों में यह बात बसी हुई थी कि अर्जेंटीना के खिलाड़ी लियोनेल मेसी का यह आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच है, और इसके बाद रिटायर हो जाने की घोषणा वे खुद कर चुके हैं। वे बहुत किस्म के रिकॉर्ड बनाने में अपने देश के अपने पहले के एक महानतम खिलाड़ी माराडोना की बराबरी कर चुके थे, और सिर्फ विश्वकप जीतना उनके नाम पर दर्ज नहीं था। इस टूर्नामेंट के शुरू होने के पहले से यह एक बहुत बड़ा खतरा था कि 35 बरस की उम्र में आकर मेसी यह आखिरी विश्वकप खेल रहे थे, और अगर इस बार उनकी टीम नहीं जीतती, तो वे विश्वकप जीतने के सपने को लिए लिए अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से बिदा हो जाएंगे। यह नौबत बड़ी फिल्मी थी, और खासकर तब जब इस बार के टूर्नामेंट में अर्जेंटीना की टीम शुरुआत में ही सऊदी अरब से हार गई थी। इस मैच के बाद लोगों को इस टीम से उम्मीदें खत्म हो चली थीं, लेकिन इसने बीती रात गजब का खेल दिखाया, और विश्वकप भी जीता, और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का गोल्डन बॉल पुरस्कार भी मेसी को मिला। यह सब कुछ उनकी जिंदगी के इस आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच में हुआ, जिसमें यह सब हुए बिना भी वे घर लौट सकते थे। किसी हिन्दी फिल्म की कहानी की तरह आखिर में जाकर जिस तरह हीरो और हीरोईन मिलते हैं, उसी तरह मेसी और उनकी यह आखिरी और सबसे बड़ी कामयाबी एक-दूसरे से मिले!
किसी खेल या टूर्नामेंट के बारे में विचारों के इस कॉलम में लिखने की हमें शायद ही कभी सूझती है, लेकिन खेल की तकनीकी बारीकियों से परे की बातों पर तो लिखा ही जा सकता है। कल के ही मैच को देखें तो मेसी की तरह ही दस नंबर की जर्सी पहने हुए फ्रांस के स्टार खिलाड़ी किलियन एमबापे का दर्द हार के बाद देखने लायक था। दर्शकों में मौजूद फ्रांस के राष्ट्रपति ने जिस तरह अपनी हारी हुई टीम के बीच मैदान पर पहुंचकर देर तक एमबापे को लिपटाकर दिलासा दिलाया, वह भी देखने लायक था। लेकिन इस फ्रांसीसी सितारे के लिए फुटबॉल की जिंदगी अभी खत्म नहीं हो रही है। वह अभी महज 23 बरस का है, उसके नाम ढेर अंतरराष्ट्रीय गोल करना दर्ज है, और ऐसा माना जाता है कि वह अगले कई और विश्वकप खेलने की संभावना रखता है। इसलिए अगर कल उसकी टीम विश्वकप नहीं जीत पाई, तो यह मेसी की तरह संभावनाओं का अंत नहीं था, अभी उसके सामने फुटबॉल की दुनिया की इस सबसे बड़ी ट्रॉफी को उठाने का बहुत सा मौका बाकी है। इसलिए कल की इस जीत-हार की एक खूबी यह रही कि आखिरी मौके वाले मेसी को मौका मिला, और बिल्कुल जवान खिलाड़ी एमबापे को इस मुकाबले में भी गोल दागने का।
कल के इस मुकाबले से परे, इस बार के विश्वकप में पहली बार एक अफ्रीकी टीम सेमीफाइनल तक पहुंची। मोरक्को ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया, अफ्रीका के पौने चार करोड़ आबादी वाले इस देश ने जिस तरह लोगों का दिल जीता, और सेमीफाइनल तक पहुंचने का एक रिकॉर्ड बनाया, उससे भी बाकी दुनिया के बहुत से देशों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। दुनिया के 32 देशों की टीमें इसमें शामिल हुईं, और इनमें मोरक्को जैसा कम आबादी का देश भी था, लेकिन हिन्दुस्तान जैसा 140 करोड़ आबादी का विश्वगुरू इन 32 टीमों में नहीं था। आबादी के हिसाब से वह दुनिया में दूसरे नंबर पर है, यहां पर फुटबॉल अच्छा-खासा खेला भी जाता है, लेकिन शायद क्रिकेट की दीवानगी की वजह से, या कुछ और वजहों से यह 32 टीमों में भी शामिल नहीं था। एक तरफ क्रिकेट जैसा खेल जिसके लिए सब कुछ खासा महंगा लगता है, दूसरी तरफ फुटबॉल जो कि सबसे ही सस्ता खेल है, जिसे बचपन से हिन्दुस्तानी बच्चे गली-गली खेलते हैं, लेकिन जब फुटबॉल के अंतरराष्ट्रीय मुकाबले की बात आती है, तो हिन्दुस्तान दुनिया के नक्शे से गायब ही है। और फुटबॉल का इतिहास बताता है कि 1950 में आखिरी बार हिन्दुस्तान फुटबॉल वल्र्डकप मुकाबले में दाखिल हो रहा था कि आयोजक फीफा को पता लगा कि भारतीय टीम फुटबॉल के जूते नहीं पहनेगी, और नंगे पैर खेलेगी, तो उसमें भारत के खेलने पर रोक लगा दी थी। वह दिन है, और आज का दिन है कि भारत फिर कभी फुटबॉल विश्वकप में खेलने लायक दर्जा नहीं पा सका। और इस बार तो अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल एसोसिएशन फेडरेशन (फीफा) ने भारतीय फुटबॉल फेडरेशन को उसके घरेलू मामलों की वजह से कुछ वक्त के लिए सस्पेंड भी कर दिया था। इस देश में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खेलने की भी लंबी परंपरा है, लंबा इतिहास है, लेकिन जब फीफा ने विश्वकप के लिए टीमों को छांटा, और 32 टीमों की सीमा थी, तो उसमें हिन्दुस्तान का नंबर 106 था। मोरक्को से 37 गुना अधिक आबादी वाला यह देश 106 नंबर पर रहा, और मोरक्को इस टूर्नामेंट में खेलते हुए सेमीफाइनल तक पहुंचा।
हिन्दुस्तान जैसे देश को अपने देश में इस खेल की एक मजबूत बुनियाद होते हुए, इतनी बड़ी आबादी होते हुए भी दुनिया में 106 नंबर पर होने के बारे में सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि आज जब क्रिकेट के अलावा हॉकी जैसे दूसरे खेलों में भी भारत को कामयाबी और शोहरत मिल रही है, यहां की महिला खिलाड़ी भी बढ़-चढक़र कामयाब हो रही हैं, ओलंपिक और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हिन्दुस्तान थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ रहा है, तो फुटबॉल जैसे कम खर्च वाले खेल की इस देश में बुनियाद कैसे मजबूत हो सकती है। फिलहाल जिन लोगों ने कल रात का यह फाइनल मैच नहीं देखा होगा, उन लोगों को इसका कोई रिपीट टेलीकास्ट जरूर देखना चाहिए, और यह भी देखना चाहिए कि अर्जेंटीना जैसे देश को इस जीत से कितना गौरव हासिल हुआ है। क्रिकेट से परे एक सस्ते और आसान खेल में भी संभावनाएं ढूंढनी चाहिए।
सरकार को मालूम है चीन से आयात की हकीकत लेकिन..
18 दिसंबर 2022
हर बरस दीवाली पर रौशनी के लिए लगने वाली
चीनी झालरों, और होली पर प्लास्टिक की चीनी पिचकारियों का कारोबार करने
वाले छोटे-छोटे लोग दहशत में रहते हैं कि त्यौहारी बाजार शुरू होने के ठीक
पहले अगर भारत-चीन सरहद पर कोई बड़ा बखेड़ा हो गया तो उनका कारोबार धरे रह
जाएगा। झंडे-डंडे लिए हुए राष्ट्रवादी लोग बाजारों पर टूट पड़ेंगे, और चीनी
सामानों के बहिष्कार के फतवे हवा में तैरने लगेंगे। पिछले बरसों में ऐसा
हुआ भी है, और छोटे-छोटे दुकानदार ऐसे सामानों के साथ फंस गए। अब नए आंकड़े
बतलाते हैं कि चीन से आयात हाल के तीस महीनों में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच
गया है। जब सरहद पर हिन्दुस्तानी-चीनी फौजों के बीच कड़ा संघर्ष हुआ था, और
दोनों तरफ से दर्जनों लोग मारे गए थे, तब से अब तक केन्द्र सरकार की एक
असाधारण चुप्पी इस मामले पर बनी हुई है, लेकिन चीन से भारत में आयात लगातार
बढ़ते ही चल रहा है। इस मामले पर आज लिखने की जरूरत इसलिए है कि अरूणाचल
प्रदेश में चीनी सरहद पर हुए ताजा संघर्ष के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री
अरविंद केजरीवाल ने यह सवाल उठाया कि भारत-चीन के साथ व्यापार बंद क्यों
नहीं करता? उन्होंने कहा कि चीन से आयात होने वाला ज्यादातर सामान भारत में
बनता है, आयात बंद करने से चीन को सबक मिलेगा, और भारत में रोजगार के अवसर
बढ़ेंगे।
बहुत सी राष्ट्रवादी ताकतें समय-समय पर यह मांग करती रहती हैं, और उनका गुस्सा सडक़ किनारे चीनी किस्म के खानपान बेचने वाले ठेलों पर भी उतरता है। 2020 में गलवान घाटी के टकराव के बाद से चीन से आयात लगातार बढ़ते चल रहा है, और यह इस दौर में हुआ है जब भारत सरकार चीजों को भारत में बनाने का अभियान चला रही है।
लेकिन कारोबार को भावनाओं, और राष्ट्रवादी उन्माद से अलग करके देखने की जरूरत है। केजरीवाल की बात मानकर अगर चीन से आयात बंद कर दिया जाता है, तो सवाल यह उठता है कि हिन्दुस्तान में जो चीनी सामान कच्चेमाल की तरह बुलाया जाता है, और यहां उससे दूसरे सामान बनाकर घरेलू बाजार में, या विदेशों में बेचा जाता है, उसका क्या होगा? चीन से आयात तो कम हो सकता है, लेकिन फिर हिन्दुस्तान उस रेट पर कच्चामाल कहां से पाएगा? और अगर चीन के बहिष्कार के फेर में हिन्दुस्तानी सामानों का दाम बढ़ते चलेगा, तो उसका अंतरराष्ट्रीय बाजार कहां रहेगा? इस तरह के फतवे देना बड़ा आसान रहता है, लेकिन किसी भी देश की सरकार, और वहां का कारोबार इस बात को बेहतर समझते हैं कि आज की दुनिया में देशों की एक-दूसरे पर निर्भरता कितनी बनी हुई है। आज अगर जंग के मैदान में अमरीका और चीन आमने-सामने खड़े होते हैं, और एक-दूसरे से कारोबार बंद होता है, तो चीन से अधिक अमरीका तबाह होगा क्योंकि वहां चीजों का बनना ही थम जाएगा। आज चीन के मुकाबले अगर अमरीका ताइवान को बचाने में अपनी ताकत झोंकता है, तो उसकी वजह फौजी न होकर कारोबारी है क्योंकि ताइवान का दुनिया में चिप बनाने में एकाधिकार सा है, और अमरीका के पास उसका कोई विकल्प नहीं है। आज का अंतरराष्ट्रीय कारोबार ऐसी बहुत सी मजबूरियों से भरा हुआ है, और सिर्फ राष्ट्रवादी उन्माद से आर्थिक फैसले नहीं लिए जा सकते।
आम जुबान में कहें तो यह समझने की जरूरत है कि चीन से सौ रूपये का कच्चामाल मंगाकर उससे कुछ और बनाकर हिन्दुस्तान अगर दो सौ रूपये में उसे बाहर बेचता है तो यह सौ रूपये हिन्दुस्तानी कामगारों और कारोबारियों के बीच बंटता है, सरकार को टैक्स मिलता है। चीन से सौ रूपये का आयात बंद कर देना आसान है, लेकिन उसके बाद हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था इसमें वेल्यूएडिशन का सौ रूपया पाना भी खो बैठेगी। इसलिए सरहद को लेकर राजधानियों में जंग के फतवे देने वाले लोग अलग होते हैं, और अर्थव्यवस्था को चलाने वाले लोग अलग होते हैं। यही आर्थिक मजबूरी रहती है जो चीन से लंबे समय बाद हुए सरहदी संघर्ष के बाद भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज तक इस सिलसिले में चीन का नाम भी नहीं लिया, चीन को एक शब्द के रूप में भी इस्तेमाल नहीं किया। हालांकि चीन को आंखें दिखाने के बारे में बहुत कुछ कहा गया, लेकिन पर्दे के पीछे जो हुआ वह तो चीन से लगातार खरीददारी बढ़ते चलना ही हुआ है। हम पाकिस्तान से भी कारोबारी रिश्ते खत्म करने के हिमायती नहीं हैं, आज जो योरप यूक्रेन को रूस के खिलाफ लगातार फौजी मदद कर रहा है, वह आज भी रूस से खरीदी गई गैस और डीजल-पेट्रोल पर चल रहा है। हिन्दुस्तान में अगर एक ग्राहक के रूप में चीन से आयात किया है, तो वह फिक्र की बात है, लेकिन अगर उसने एक कारोबारी के रूप में कच्चामाल आयात किया है, तो वह एक अच्छी बात है। अपने देश में जब तक उस दर्जे का, उस रेट पर कच्चामाल न बनने लगे, तब तक चीन से परहेज के नाम पर देश के कारोबार को ही बंद कर देना चीन का बहिष्कार नहीं होगा, हिन्दुस्तान की आत्महत्या होगी।
लेकिन केन्द्र सरकार के अभी सामने आए आंकड़ों से युद्धोन्मादी और राष्ट्रवादी फतवेबाजों के मुंह कुछ बंद होने चाहिए। चीन सिर्फ सरहद पर खड़े हुए फौजी नहीं हैं, चीन वहां के कारोबारी शहरों में बसे हुए कारोबारी भी हैं जिनसे लेन-देन करना भारत की मजबूरी है। बहिष्कार से चीन की बोलती बंद कर देना, और उसे सबक सिखा देना बचकानी बात है। आज चीन पूरी दुनिया का सबसे बड़ा कारखाना है, सबसे बड़ा निर्यातक है, चीन के बिना आज पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक दिन में ठप्प पड़ सकती है, आज ब्रिटेन जैसे देश में सरकार इस फिक्र में डूबी है कि चीन से परे कौन से और रास्ते निकाले जा सकते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान को लोगों का ध्यान बंटाने के लिए चीन की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए उसे चीन की जरूरत और अधिक है। देश के किसी जानकार अर्थशास्त्री या किसी संस्था को यह अंदाज निकालकर लोगों के सामने रखना चाहिए कि चीनी कच्चेमाल का प्रतिस्पर्धी हिन्दुस्तानी विकल्प कितने बरसों में बन पाएगा, किस रेट का रहेगा, और उसके इस्तेमाल के बाद बने भारतीय सामानों का रेट कितना हो जाएगा, और क्या वे घरेलू बाजार या विदेशों में मुकाबला कर सकेंगे? लेकिन सरकारों की दिलचस्पी उन्मादी नारों के बीच ऐसी समझदारी की बातों में नहीं रहती है, और इस तरह की व्याख्या करने वाले किसी गैरसरकारी संगठन को भी लोग चीन का दलाल कहने लगेंगे। फिर भी हिन्दुस्तानियों की उत्तेजना शांत करने के लिए ऐसा हिसाब-किताब किसी को जरूर करना चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था का कितना हिस्सा चीन से आयात से जुड़ा हुआ है। अपना असली कद देखकर उन्मादी नारे शायद वैसे भी कम हो जाएंगे, अगर पिछले तीस महीनों के चीन से आयात के आंकड़ों से कम नहीं हुए हैं तो।
सुप्रीम कोर्ट से केन्द्र का यह टकराव मासूम नहीं
18 दिसंबर 2022
सुप्रीम कोर्ट को लेकर केन्द्र सरकार का रूख
एक पहेली की तरह बना हुआ है। पिछले कई महीनों से केन्द्रीय कानून मंत्री
किरण रिजिजू तरह-तरह के कार्यक्रमों में या मीडिया से बात करते हुए जिस तरह
सुप्रीम कोर्ट की आलोचना कर रहे हैं, वह एक सिलसिले के रूप में देखने पर
कोई मासूम हरकत नहीं लगती है। इसके पीछे कोई सोची-समझी बात है, और अदालत से
केन्द्र सरकार का सतह के नीचे चलता कोई टकराव दिख रहा है। उन्होंने जजों
की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई कॉलेजियम प्रणाली की
कड़ी आलोचना की, फिर कुछ और मामलों में अदालत के बारे में तरह-तरह की
असहमति जताई। अभी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को यह नसीहत दी कि उसे जमानत के
मामलों को, और जनहित याचिकाओं को नहीं सुनना चाहिए क्योंकि उनमें बहुत वक्त
लगता है। फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जजों की लंबी छुट्टियों के बारे
में कहा इससे वहां चल रहे मुकदमों के लोगों को बड़ी असुविधा होती है। दूसरी
तरफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ तुर्की-ब-तुर्की
जवाब भी दे रहे हैं।
इससे कम से कम एक यह बात तो समझ में आती है कि केन्द्र सरकार चन्द्रचूड़ के साथ उतनी सहूलियत महसूस नहीं कर रही है जितनी वह पिछले मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित के साथ महसूस करती थी। जजों की अपनी निजी राय रहती है, और सरकारें यह अंदाज लगा लेती हैं कि उसकी दिलचस्पी के मामलों में किस जज का क्या रूख रहेगा। इसी को देखते हुए केन्द्र सरकार कॉलेजियम के भेजे हुए नामों को मंजूरी देने के पहले उन्हें महीनों या बरसों तक टांगकर रखती है ताकि जिन जजों या वकीलों के नाम भेजे गए हैं, उनकी सोच अगर सरकार को माकूल नहीं लगती है, तो उन्हें मंजूरी न दी जाए। नतीजा यह होता है कि ऐसी लिस्ट में से कई वकील थककर अपने नाम वापिस ले लेते हैं क्योंकि उन्हें यह समझ आ जाता है कि वे एक तारीख के बाद जज बनने पर कभी चीफ जस्टिस नहीं बन पाएंगे। अभी हाल में ही ऐसे कई लोगों ने अपने नाम वापिस ले लिए हैं। जजों की खाली पड़ी हुई कुर्सियों और सरकार के पास कॉलेजियम की भेजी गई फेहरिस्त का जब साथ-साथ साल-दो-साल इंतजार चलता है तो जाहिर है कि अदालत में मामलों का ढेर बढ़ते चलेगा। लेकिन मौजूदा सरकार को नामों की ऐसी लिस्ट को एक-दो बरस तक भी रोकने से कोई परहेज नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिक कार्यक्रम में भी इस बात को उठा चुके हैं, और अब तो ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट भी जनता के बीच अपनी स्थिति को रख देना चाहता है कि सरकार की किन बातों से उसके काम पर असर पड़ रहा है। फिर यह भी लगता है कि भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से दो, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच अधिकारों को लेकर भी एक खींचतान चल रही है। यह नौबत तब और गंभीर हो जाती है जब लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ, विधायिका, अपने भीतर सत्तारूढ़ पार्टी के असीमित बाहुबल के चलते भारतीय लोकतंत्र को अब दो स्तंभों का ही बना चुका है। अब देश में सरकार और अदालत इन्हीं दो का मतलब रह गया है क्योंकि संसद में न तो कोई विपक्ष कोई ताकत रखता, और न ही सरकार को उसकी कोई परवाह ही है। ऐसी हालत में सरकार अपने संसदीय बाहुबल के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट से दो-दो हाथ करने को उतावली दिख रही है। लेकिन आज के मुख्य न्यायाधीश सरकार के इस रूख के सामने झुकते हुए भी नहीं दिख रहे हैं।
दरअसल भारतीय संविधान जब बना, उस वक्त शायद देश में ऐसी संसदीय स्थिति की कल्पना नहीं रही होगी कि संसद में लगातार एक ही पार्टी का इतना बड़ा बहुमत जारी रहेगा, जो कि देश की तकरीबन तमाम विधानसभाओं तक भी फैला हुआ रहेगा। ऐसा बाहुबल सत्तारूढ़ पार्टी की सोच को संविधान संशोधन में बदलने की ताकत रखता है, और इसीलिए आज हिन्दुस्तान कई किस्म के नए कानूनों को देख रहा है, केन्द्र-राज्य संबंधों में नई तनातनी झेल रहा है, और अब केन्द्र में सत्तारूढ़ ताकतों को शायद यह लग रहा है कि ऐसे अभूतपूर्व जन-बहुमत के रहते हुए भी सुप्रीम कोर्ट अगर एक प्रतिबद्ध-न्यायपालिका के रूप में काम नहीं कर रहा है, तो क्यों नहीं कर रहा है? लोगों को याद होगा कि प्रतिबद्ध-न्यायपालिका शब्द का पिछला या पहला इस्तेमाल इमरजेंसी के दौरान हुआ था जब तानाशाह हो चुकी इंदिरा सरकार और सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी न्यायपालिका से यह उम्मीद कर रही थी कि उसे सरकार के नजरिए से प्रतिबद्ध होकर चलना चाहिए। आज केन्द्रीय कानून मंत्री के लगातार बयानों से अगर सीधे-सीधे यह मतलब नहीं भी निकल रहा है, तो भी इससे सीधे-सीधे उसी दौर की याद आ रही है।
हम केन्द्र और सुप्रीम कोर्ट में किसी टकराव की चाहत के बिना यह उम्मीद जरूर करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ देश के संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखे, और अगर उसके शब्दों के बीच व्याख्या की गुंजाइश है, तो जजों को अपने सरोकार सरकार के साथ नहीं, जनता के साथ जोडऩे चाहिए। लोकतंत्र में जैसे-जैसे सरकार मजबूत होती है, संसद एकतरफा होती है, वैसे-वैसे सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी को अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत भी होती है। आज का यह दौर देश की सरकार के साथ-साथ देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर एक विचारधारा की ताकतों के एकाधिकार की कोशिश का दौर दिख रहा है। केन्द्र सरकार इसमें बहुत हद तक कामयाब भी हुई है, और मोदी सरकार के इन आठ बरसों में तकरीबन तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर लगभग-प्रतिबद्धता की नौबत आ चुकी है। यह वक्त एक बहुत जिम्मेदार और मजबूत रीढ़ वाले सुप्रीम कोर्ट की जरूरत का है, और चूंकि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल पर्याप्त बाकी है, इसलिए इतिहास इस दौर को गौर से दर्ज करेगा।













