नटवर सिंह की लिखी बातों के महत्व से अधिक बड़ी खबरें
31 जुलाई 2014
संपादकीय
एक वक्त राजीव गांधी और सोनिया गांधी के सबसे करीबी लोगों में से एक रहे, कांग्रेस के नेता और भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री नटवर सिंह की किताब ने कल से चाय की प्याली में तूफान सा ला दिया है। टीवी चैनलों को एक मुद्दा मिला, और कल शाम से रात तक आधा दर्जन चैनल तो नटवर सिंह का इंटरव्यू दिखाते दिख रहे थे। कुछ समय पहले से आने वाली यह किताब खबरों में बनी हुई थी, क्योंकि इसे लेकर एक खबर छपी थी कि इस किताब के कुछ हिस्से को रोकने के लिए सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी नटवर सिंह के घर पहुंचे थे।
इस किताब की जिस बात पर फिलहाल सबसे अधिक बहस हो रही है, वह यह है कि सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का मुखिया चुन लिए जाने के बाद भी उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था, और उस वक्त उन्होंने उसे अपनी अंतरात्मा की आवाज कहा था। अभी नटवर सिंह ने इस किताब में लिखा है कि राहुल गांधी ने सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से मना किया था क्योंकि उन्हें डर था कि अपनी दादी और पिता की तरह वे मां को भी खो बैठेंगे। इस बात के सच होने या न होने से परे एक बहस यह भी चल रही है कि ऐसी अंतरंग बातों को लिखा जाना चाहिए, या नहीं लिखा जाना चाहिए। कल रात ही एक चैनल पर एक सवाल के जवाब में नटवर सिंह ने अपनी लिखी इन बातों को जायज ठहराते कहा कि कैनेडी से लेकर नेहरू तक कौन सा ऐसा नेता रहा है जिसके बारे में छोटी से छोटी बातें न लिखी गई हों? उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति जननेता बनते हैं, तो उनके सार्वजनिक कामकाज और फैसलों की बातें निजी नहीं रह जातीं।
अब इस किताब के आज आने को लेकर एक सवाल यह उठ सकता है कि बरसों पहले के एक जज के मामले पर आज जिस तरह जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की नींद खुली है, उसी तरह आज नटवर सिंह की भी आत्मा जागी है। लेकिन हम मौके को लेकर किसी नीयत पर सवाल उठाने के बजाय तथ्यों पर जाना चाहेंगे और मुद्दे की बात करना चाहेंगे। मुद्दे की बात यह है कि बड़े ओहदों पर रहने वाले सार्वजनिक जीवन के लोगों की कितनी निजी बातें निजी रहने देनी चाहिए? और दूसरा मुद्दा यह है कि आसपास के किसी व्यक्ति के बारे में लिखते हुए लोगों को कितनी निजी बातों का जिक्र करना चाहिए? ये दोनों ही पैमाने देश, काल, संस्कृति, और निजी संबंधों से, निजी नीति-सिद्धांतों से तय होते हैं। अमरीका में जिस तरह क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की के बारे में लिखा गया, वैसा हिन्दुस्तान में कभी नहीं लिखा जाता। और जहां तक आसपास के लोगों द्वारा भांडाफोड़ की बात है, तो वह तो नेहरू के बारे में जब उनके निजी सचिव रहे मथाई ने लिखा था, तो उस वक्त से यह मिसाल तो देश में चली ही आ रही है कि आसपास के लोग जिस दिन चाहें उस दिन बहुत सी निजी बातों को उजागर कर सकते हैं।
अभी हम सार्वजनिक जीवन में अहमियत रखने वाले लोगों के सिलसिले में ही इस बात को यहां कर रहे हैं, और ऐसे लोगों का आसपास के दायरे पर कामकाज के दौरान ही अपनी निजी जिंदगी को कुछ या अधिक हक तक उजागर करने की मजबूरी रहती है, और यहीं पर अपने सहयोगियों या अपने साथियों के दायरे के बारे में उनके सही या गलत फैसले का दाम उनको चुकाना होता है। हिन्दुस्तान में चुप्पी की आज तक की सबसे बड़ी मिसाल राजीव गांधी के मित्र और मंत्री रहे अरूण सिंह की है, जिन्होंने राजीव की सरकार जाने के बाद भी हिन्दुस्तान के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार बोफोर्स के बारे में, या किसी भी बारे में मुंह भी नहीं खोला। उन्होंने उत्तर भारत की किसी एक पहाड़ी पर बसे रहते हुए कहीं चेहरा भी नहीं दिखाया, और आज हमें यह भी ठीक से याद नहीं है कि अरूण सिंह जिंदा हैं या नहीं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में भी मोनिका लेविंस्की जैसे लोगों के होने पर कोई रोक नहीं है, जो चाहें तो दाग-धब्बों वाले कपड़ों को सम्हालकर रख सकते हैं।
नटवर सिंह की लिखी बातों को हम बहुत सनसनीखेज या बहुत हैरान करने वाली नहीं मानते। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में नेहरू-इंदिरा के कुनबे में राष्ट्रीय राजनीति के उथल-पुथल के दौर में, परिवार के दो-दो लोगों को खोने के बाद, बच्चों के साथ अकेली रह गई महिला-मुखिया के फैसले बहुत सी बातों से प्रभावित हुए होंगे। नटवर सिंह ने चाहे जिस नीयत से राहुल की अपील का जिक्र किया हो, हम इसे आज से दस बरस पहले जरा भी अस्वाभाविक नहीं मानते, और हम अपनी सामान्य समझबूझ की वजह से इस बात की गुंजाइश भी मानते हैं कि राहुल की ऐसी अपील के बाद भी सोनिया गांधी की अंतरात्मा से वैसा फैसला निकला हो। हम किसी बेटे की सावधानी के बाद मां की आत्मा का काम खत्म हो जाना नहीं मानते। ऐसी दो बातें एक के बाद एक भी जिंदगी में हो सकती हैं। और आज हमको लगता है कि नटवर सिंह की किताब को मुद्दा बनाना, एक ऐतिहासिक तथ्य, अगर वह सच है तो, को मुद्दा बनाना नहीं है, आज राजनीतिक चर्चा और मीडिया के लिए अपने शून्य को भरने के लिए वह एक अधिक बड़ा मुद्दा लगता है।
जहां तक निजी बातों को किताब में लिखने की बात है, तो इस घटना का जिक्र हमें इतना अधिक निजी भी नहीं लगता, इतना नुकसानदेह भी नहीं लगता कि लोग अपने संस्मरण में, और अपनी आत्मकथा में उसे न लिखें। जब कभी कोई अपनी आत्मकथा लिखते हैं, तो उनमें उनकी जिंदगी के कई दायरों का कुछ-कुछ जिक्र तो आता ही है, कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपने बारे में किसी दूसरे की चर्चा के बिना नहीं लिख सकते। और हम समकालीन इतिहास के दस्तावेजीकरण के भारी हिमायती हैं, और इसलिए हम ऐसी बातों को लिखने की उम्मीद सभी महत्वपूर्ण लोगों से करते हैं, जो बातें वक्त के इतिहास को दर्ज करती हों, फिर चाहे वे बातें उनके अपने नजरिए से रंगी हुई ही क्यों न हों। इतिहास कभी भी बेरंग नहीं होता, वह हमेशा लिखने वाले के पूर्वाग्रह और लिखने से होने वाले नफे-नुकसान से प्रभावित होने का खतरा लेकर चलता है। लेकिन इतिहास लिखना किसी का एकाधिकार भी नहीं होता, उसे बहुत से अलग-अलग नजरियों से लिखा जा सकता है, लिखा ही जाता है। और फिर उन्हें प्रसंग और संदर्भ के साथ, लोगों के पूर्वाग्रहों की रौशनी में देखा जाता है, तौला जाता है, और फिर उन लिखी हुई बातों को आगे इस्तेमाल किया जाता है, या खारिज कर दिया जाता है। न लिखने के बजाय हम लिखना बेहतर समझते हैं, और आज जितनी बातें इस किताब के बारे में खबरों में हैं, उनको लिखना हम नाजायज नहीं पाते।
सोशल मीडिया पर धार्मिक तनाव फैलाना बाएं हाथ का खेल...
30 जुलाई 2014
संपादकीय
देश के दूसरे हिस्सों की तरह कल छत्तीसगढ़ में भी इंटरनेट के सोशल मीडिया पर देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक बातों के खिलाफ हंगामा शुरू हुआ है। गैरजिम्मेदारी से जब किसी धर्म के खिलाफ ऐसा किया जाएगा, तो उससे तनाव खड़ा होना लाजिमी है। दो दिन पहले गुजरात के भुज में मुसलमान इसी तरह तनाव में थे, और पाठकों को याद होगा कि अभी कुछ ही महीने हुए हैं जब छत्तीसगढ़ के दुर्ग में युवक कांग्रेस के एक नेता को देवी-देवताओं के खिलाफ अश्लील फेसबुक पोस्ट को लेकर गिरफ्तार किया गया था और वहां धार्मिक तनाव खड़ा हो गया था।
आज भारत में पहले धार्मिक तनाव और फिर साम्प्रदायिक टकराव खड़ा करना बहुत आसान हो गया है। इंटरनेट पर सोशल मीडिया तक लोगों की पहुंच सड़क की धूल तक पांवों की पहुंच जैसी आसान हो गई है। आज जिसके पास भी एक मोबाइल फोन है, वह ऐसी ताकत रखता है कि चार गंदी बातें लिखकर कहीं भी तनाव फैला दे। और लोग अपने मोबाइल फोन, इंटरनेट कनेक्शन, कम्प्यूटर, और सोशल मीडिया के अपने अकाउंट को लेकर आज भी इतने लापरवाह हैं कि कहीं सुनंदा थरूर को यह सफाई देनी पड़ती है कि उनके फोन से किए गए ट्वीट उनके नहीं थे, तो कहीं दिग्विजय सिंह की महिला मित्र के फोन से कई तस्वीरें इंटरनेट पर डाल दी जाती हैं। इस तरह आज का वक्त बहुत नाजुक है, टेक्नालॉजी में लोगों के हाथ में एक ऐसा हथियार दे दिया है जिससे कि वे अपने खुद के बदन को जख्मी कर सकते हैं। आज इंटरनेट पर किसी भी तरह की गैरजिम्मेदारी दिखाने वाले लोगों को पकडऩा आसान हो गया है, और देश का कानून बहुत कड़ा है। अखबारों के मामले में कानून इतना कड़ा नहीं था, जितना कि आज इंटरनेट के मामले में है। दूसरी तरफ अखबारों में लोग जिम्मेदारी के साथ काम करना जानते थे, लेकिन सोशल मीडिया का मिजाज इतना अराजक है, कि लोग वहां पर किसी भी तरह की गैरजिम्मेदारी दिखाते रहते हैं।
लेकिन यह सिलसिला कहां तक जा सकता है, इसका अंदाज लगाना नामुमकिन है। जब तक देश के भीतर जिम्मेदार और चौकस लोग ऐसे मुद्दों पर खुलकर नहीं बोलेंगे, हर तबके को बर्दाश्त नहीं सिखाएंगे, जब तक राजनीतिक दल और उनके नेता ऐसे मुद्दों पर वोट दुहना बंद नहीं करेंगे, तब तक यह हिन्दुस्तान इंटरनेट की केबलों पर नहीं बैठा है, बारूदी सुरंगों पर बैठा है। किसी भी धर्म की भावनाओं पर दूसरे ने पैर धरा, तो उसी तरह धमाका होगा जिस तरह बारूदी सुरंगों पर किसी गाड़ी के पहुंचने से होता है। यह सिलसिला बहुत ही फिक्र पैदा करने वाला है, क्योंकि भारत में आज धार्मिक भीड़ ही पूरी तरह बेदिमाग रहती है। उसमें सिर हजारों होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता। और फिर जब ऐसी भीड़ साम्प्रदायिक भीड़ में तब्दील हो जाती है, तो उससे खतरा हजार गुना बढ़ जाता है। भारत में आज अलग-अलग लोग कई तरह की साम्प्रदायिक बातें कर रहे हैं, जिनके बारे में हमने पिछले दिनों इसी जगह पर लिखा भी है। उनकी वजह से आज देश का माहौल बहुत विस्फोटक बना हुआ है, और लोग इस ताक में हैं कि कैसे दूसरों की बातों पर कानून की कार्रवाई के पहले खुद कानून हाथ में लेकर जवाबी हमला किया जाए। ऐसी सोच में कई धर्मों के लोग शामिल हैं, कई पार्टियों के लोग शामिल हैं।
हिन्दुस्तान ने साम्प्रदायिक दंगों में बहुत नुकसान झेला हुआ है। जिंदगियों का नुकसान, अपने पड़ोस के लोगों पर से भरोसा उठ जाने का नुकसान, और अर्थव्यवस्था को नुकसान। बहुत सी बातें साम्प्रदायिक दंगों के पीछे धर्म से अलग की होती हैं, और भारत का दंगों का इतिहास बताता है कि इनकी सबसे बुरी मार हाथों के हुनर वाले कारीगरों पर पड़ी है, और लाखों लोग रोजगार खो बैठे हैं। ऐसे माहौल में अमन-पसंद लोगों को घर पर चुप बैठना बंद करना होगा, और देश के लोगों की सोच को मजबूत करना होगा, कि किसी एक की शरारत, किसी एक की साजिश के चलते पूरा देश आग में न झोंक दिया जाए। राजनीतिक दलों को भी आज बैठकर इस बारे में सोचना होगा, क्योंकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किसी पार्टी को किसी एक चुनाव में फायदे का दिख सकता है, लेकिन बाद में उसके नुकसान बेकाबू हो सकते हैं।
आज के वक्त में मां-बाप को भी अपने बच्चों को सोशल मीडिया पर जिम्मेदारीसे बर्ताव सिखाना चाहिए, वरना वे जमानत और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अपना बुढ़ापा खपाने पर बेबस रहेंगे।
21वीं सदी के हिंदुस्तान को गुफा में ले जाने को आमादा
संपादकीय
29 जुलाई 2014
भारत में हिंदुत्व और एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भयानक आक्रामक अंदाज में मीडिया से लेकर अदालत तक अभियान चला रहे दीनानाथ बत्रा देश में अज्ञान बिखेरने में लग गए हैं। उन्होंने एक-दो बड़े प्रकाशकों को कानूनी धमकी देकर हिंदुत्व के इतिहास पर लिखी एक-दो किताबों को नष्ट करवा दिया, और उसके बाद मोदी सरकार आने पर उनका वह उत्साह कई गुना और बढ़ गया। आज जिस तरह वे काल्पनिक बातों को ऐतिहासिक तथ्य बताते हुए प्रचारित कर रहे हैं, जिस तरह अंग्रेजी के खिलाफ एक अभियान चला रहा हैं, जिस तरह भारत की मौजूदा संस्कृति को खत्म करके केक के पहले के दिनों में वे ले जाना चाहते हैं, उससे न तो इस देश की इज्जत बढऩे वाली है, न भाजपा की, और न मोदी सरकार की। यह हिंदुस्तान की 21वीं सदी है, और आज दुनिया भर में जो प्रवासी भारतीय मोदी और भाजपा के दोस्त और शुभचिंतक हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या सिर्फ संस्कृत से काम चलाकर वे प्रवासी भारतीय बन सकते थे? क्या वे कुछ कमाकर मोदी और भाजपा को चंदा भेज सकते थे?
लेकिन एक प्रकाशक रहे दीनानाथ बत्रा को आज गुजरात की सरकार में अपनी किताबों को बढ़ावा देने के लिए एक माहौल मिल गया है, और वे पूरे देश की शिक्षानीति को बदलने में जुट गए हैं, पूरे देश के इतिहास को शोले फिल्म के जेलर के अंदाज में एक साथ सबके-सब बदल डालूंगा कहते हुए कल्पना को इतिहास बनाने पर आमादा हैं। उनकी बातें विज्ञान से परे हैं, इतिहास से परे हैं, आज के हिंदुस्तान की सामाजिक हकीकत से परे हैं, सच से परे हैं, और संभव से भी परे हैं। इसलिए वे आज समझदार हिंदुस्तानियों के बीच मखौल का सामान बन गए हैं, और उनकी हरकतों से आज की दुनिया में भारत की इज्जत बढऩे नहीं जा रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने ऐसे समर्थकों और शुभचिंतकों से उन्हें खुद को और देश को हो रहे नुकसान के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। आज वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नहीं हैं, आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं।
29 जुलाई 2014
भारत में हिंदुत्व और एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भयानक आक्रामक अंदाज में मीडिया से लेकर अदालत तक अभियान चला रहे दीनानाथ बत्रा देश में अज्ञान बिखेरने में लग गए हैं। उन्होंने एक-दो बड़े प्रकाशकों को कानूनी धमकी देकर हिंदुत्व के इतिहास पर लिखी एक-दो किताबों को नष्ट करवा दिया, और उसके बाद मोदी सरकार आने पर उनका वह उत्साह कई गुना और बढ़ गया। आज जिस तरह वे काल्पनिक बातों को ऐतिहासिक तथ्य बताते हुए प्रचारित कर रहे हैं, जिस तरह अंग्रेजी के खिलाफ एक अभियान चला रहा हैं, जिस तरह भारत की मौजूदा संस्कृति को खत्म करके केक के पहले के दिनों में वे ले जाना चाहते हैं, उससे न तो इस देश की इज्जत बढऩे वाली है, न भाजपा की, और न मोदी सरकार की। यह हिंदुस्तान की 21वीं सदी है, और आज दुनिया भर में जो प्रवासी भारतीय मोदी और भाजपा के दोस्त और शुभचिंतक हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या सिर्फ संस्कृत से काम चलाकर वे प्रवासी भारतीय बन सकते थे? क्या वे कुछ कमाकर मोदी और भाजपा को चंदा भेज सकते थे?
लेकिन एक प्रकाशक रहे दीनानाथ बत्रा को आज गुजरात की सरकार में अपनी किताबों को बढ़ावा देने के लिए एक माहौल मिल गया है, और वे पूरे देश की शिक्षानीति को बदलने में जुट गए हैं, पूरे देश के इतिहास को शोले फिल्म के जेलर के अंदाज में एक साथ सबके-सब बदल डालूंगा कहते हुए कल्पना को इतिहास बनाने पर आमादा हैं। उनकी बातें विज्ञान से परे हैं, इतिहास से परे हैं, आज के हिंदुस्तान की सामाजिक हकीकत से परे हैं, सच से परे हैं, और संभव से भी परे हैं। इसलिए वे आज समझदार हिंदुस्तानियों के बीच मखौल का सामान बन गए हैं, और उनकी हरकतों से आज की दुनिया में भारत की इज्जत बढऩे नहीं जा रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने ऐसे समर्थकों और शुभचिंतकों से उन्हें खुद को और देश को हो रहे नुकसान के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। आज वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नहीं हैं, आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं।
बलात्कार के बाद महिला से सत्ता का जुबानी बलात्कार
28 जुलाई 14
संपादकीय
देश भर में जगह-जगह कहीं नेता और कहीं अफसर बलात्कार को लेकर गैरजिम्मेदारी के बयान देते आ रहे हैं, और कोई ऐसा पखवाड़ा नहीं गुजरता जब हमें इसके बारे में लिखना न पड़ता हो। लेकिन उत्तरप्रदेश में अभी एक फिर मामला ऐसा आया जिसमें वहां की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, एक महिला अफसर, ने बिना किसी जरूरत के अचानक प्रेस कांफ्रेंस लेकर कैमरों के सामने यह बयान दिया कि जिस महिला के साथ बलात्कार के बाद हत्या की बात खबरों में है, उसके साथ बलात्कार नहीं हुआ। इस बयानबाजी के चार दिन बाद फोरेंसिक जांच रिपोर्ट आती है कि उस महिला के साथ न सिर्फ बलात्कार हुआ था, बल्कि सामूहिक बलात्कार हुआ था। इसके पहले ही उत्तरप्रदेश में बलात्कार के मामलों में समाजवादी पार्टी की सरकार ने पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अफसरों से बलात्कार की आशंका का खंडन करवाते हुए बयान जारी करवाए, और फिर वे खंडन जांच में झूठे साबित हुए। पाठकों को हमारा कई बार यह लिखा हुआ याद होगा कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने किस तरह एक बलात्कार के बाद उसे झूठा करार दिया था, और बाद में उन्हीं की पुलिस ने उस शिकायत को सही पाया था।
अलग-अलग बहुत से राज्यों में नेता और अफसर ऐसी गैरजिम्मेदार बयानबाजी में लगे रहते हैं, लेकिन जब उत्तरप्रदेश की एक सबसे बड़ी महिला पुलिस अफसर बिना किसी जरूरत ऐसा औपचारिक खंडन जारी करती है, तो हम उसके महिला होने को भी अनदेखा नहीं कर सकते और ऐसा लगता है कि राज्य सरकार ने एक महिला के मुंह से वैसा खंडन जारी करवाकर खबरों को ठंडा करने की कोशिश की थी। हमारा यह मानना है कि महिलाओं के साथ सेक्स हिंसा के मामलों में अगर जिम्मेदार ओहदों पर बैठे हुए लोग गैरजिम्मेदारी के बयान देते हैं, या सच को छुपाने और दबाने वाले झूठ बोलते हैं, तो ऐसे लोगों पर अदालत को खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए, और ऐसे कुछ लोगों को अगर सजा मिल सके, तो उससे बाकी लोगों को सबक मिल सकेगा।
आज भारत में महिलाओं की जो हालत है, उसे देखते हुए शिकायत करने का हौसला जुटाने वाली महिला की नीयत पर शक करना भी एक हिंसा है। शिकायत पर पूरी जांच के बाद सुनवाई के दौरान अदालत ने महिला की नीयत पर भी विचार हो सकता है, लेकिन जांच शुरू भी नहीं हुई, और महिला के खिलाफ ही अगर सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोग बयान देने लगते हैं, तो हम इसे बहुत ही हिंसक बात मानते हैं। आज भारत में महिला आयोग से लेकर मानवाधिकार आयोग तक, और कम उम्र के बच्चों के साथ होती हिंसा के मामलों में बाल आयोग तक अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहे हैं, वरना ऐसी बयानबाजी के खिलाफ ये संवैधानिक आयोग खुद होकर नोटिस जारी कर सकते थे। दरअसल संवैधानिक कुर्सियों पर जहां-जहां लोगों को मनोनीत करने की व्यवस्था है, सत्ता अपने अनुकूल लोगों को वहां बिठाती है, और फिर वैसे बैठाए गए लोग अहसानों का बदला चुकाने के लिए चुप्पी अपनाते हैं।
हमारा यह मानना है कि ऐसे माहौल में मीडिया भी सिर्फ सतह पर तैरते हुए तथ्यों को लिख देने से आगे बढ़कर ऐसे गैरजिम्मेदार खंडनों और बयानों पर लोगों से तीखे सवाल कर सकता है, और उसे अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने के लिए ऐसा करना भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे कुछ चुुनिंदा बयानों को लेकर उस पर खुद ही मामला शुरू करके कुछ आला अफसरों को, मंत्रियों और ओहदेदार लोगों को कटघरे में बुलाना चाहिए, तो ही इस देश में हिंसक सिलसिला कुछ थम सकता है।
जिम्मा निभाने से डरे जस्टिस काटजू फुटपाथ से ही कुछ हौसला मांग लाएं
28 जुलाई 2014
सुप्रीम कोर्ट के जज रहकर रिटायर होने वाले और आज के पे्रस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने पिछले दिनों खबरों में जगह बनाई, जब उन्होंने लिखा कि तमिलनाडु की एक पार्टी के दबाव में मनमोहन सरकार ने एक भ्रष्ट जज को पदोन्नति दी। उन्होंने लोगों के नाम नहीं लिखे, लेकिन तमाम नाम जाहिर हो गए, उस पर बहस चली, और झाग की तरह बैठ गई। इसलिए कि ऐसा पहला मामला सामने नहीं आया था, और काटजू ने पहली बार खबरें गढऩे का सामान मौजूद नहीं कराया था। वे पहले भी कुछ-कुछ लिखकर और बोलकर खबरों में आते रहे हैं, और जहां तक मेरी याद साथ देती है, इनमें से शायद ही कोई बात उनकी मीडिया की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ी हुई रही हो।
जब किसी को उसके जज रहे होने की वजह से देश के एक ऐसे बड़े संवैधानिक पद पर सरकार मनोनीत करती है जो कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को लेकर बनाया गया हो, तो ऐसे इंसान को अपने काम को गंभीरता से लेना चाहिए, और पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष को किसी और मामले पर बोलने का वक्त तभी मिलना चाहिए, जब देश में मीडिया से जुड़े हुए सभी सवालों पर बहस हो चुकी हो, और संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी हो चुकी हो। जस्टिस काटजू ने आज तक शायद ही भारतीय मीडिया के सबसे सुलगते हुए सवालों पर कोई बहस छेड़ी हो।
भारत के आम पाठकों और टीवी खबरों के आम दर्शकों को भी अच्छी तरह याद है कि महाराष्ट्र के एक भूतपूर्व कांगे्रसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खबरें खरीदकर चुनाव जीतने का मामला कानून की बहुत सी सीढिय़ों तक चढ़कर चीखकर बोल रहा है, अशोक चव्हाण इस मामले में अदालत से रोक-टोक पाने की कोशिश में लगे हुए हैं, लेकिन पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष ने इस मुद्दे को लेकर किसी बहस की कोशिश नहीं की। अभी पिछले महीने ही यह मामला सामने आया कि किस तरह देश का सबसे बड़ा उद्योगपति मुकेश अंबानी देश के एक सबसे बड़े मीडिया कारोबार का मालिक बन बैठा, वहां से अनगिनत पत्रकारों को पिछले एक बरस में इसी नई मालिकाना हैसियत की परदे के पीछे की ताकत से, हटने को बेबस किया गया, लेकिन मार्कंडेय काटजू को इस पर कुछ भी नहीं कहना था।
भारत में टीवी की खबरें अखबारों के मुकाबले बहुत नई हैं, और उनके तौर-तरीकों से लेकर उनकी विश्वसनीयता तक, बहुत से पहलुओं पर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन पे्रस काउंसिल के इस बड़बोले अध्यक्ष ने इन सवालों पर न खुद कहा, न लोगों को कहने के लिए उकसाया। इसी तरह देश में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों तरह के मीडिया में समाचारों और विचारों के बीच फासला खत्म होते चल रहा है, और इश्तहारों और खबरों के बीच भी फासले खत्म हो चुका है। इस खतरनाक सिलसिले के चलते हुए भारतीय मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, लेकिन इस पहलू पर पे्रस काउंसिल ने कोई बहस नहीं छेड़ी।
भारत की मीडिया में मानो पिछले कुछ बरसों में मुद्दे उबलते हुए तेजाब सरीखे हैं, और भारतीय पे्रस परिषद का अध्यक्ष एक अभिनेता संजय दत्त की जमानत और पैरोल की वकालत करते हुए खबरों में बना रहता है। अपनी उस बुनियादी जिम्मेदारी को छोड़कर, जिसके लिए कि जस्टिस काटजू खासी तनख्वाह पा रहे होंगे, खासे ऐशोआराम की जिंदगी के कई बरस पा चुके हैं, वे अगर अपने काम को छोड़कर, हिंदुस्तानी मीडिया पर आज मंडराते खतरों को छोड़कर, दुनियाजहान की बातें करते हैं, तो वे बेमतलब हैं।
लेकिन कुछ देर के लिए हम अपने ऊपर उठाए गए मुद्दे को छोड़ दें, और इस बात पर आएं कि जस्टिस काटजू मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने के बाद अब उससे दूर भाग रहे हैं और कह रहे हैं कि वे अदालत की कालिख के बारे में कुछ और कहना नहीं चाहते, तो हम इसे उनके अदालत के दिनों की भी गैरजिम्मेदारी मानेंगे।
सुप्रीम कोर्ट का जज रह चुका एक इंसान, आज जुबानी जंग से भी डरकर अगर अपने कार्यकाल में अपने सामने आए जुर्म पर भी चुप्पी रखना चाहता है, तो हम इसे सरकारी ओहदे की जिम्मेदारी के खिलाफ एक जुर्म से कम कुछ नहीं मानते। जब लोग जनता के पैसों की किसी कुर्सी पर बैठते हैं, तो वहां बैठकर कुछ गलत बातों को अनदेखा करना, कुछ गलत बातों पर चुप रहना, सरकारी या सार्वजनिक जिम्मेदारी के खिलाफ होता है। जज रहते हुए काटजू को अगर अदालती कामकाज की खामियां दिखीं, तो उनकी पहली जिम्मेदारी उसी वक्त उनके बारे में अपने से ऊपर के सही ओहदे को लिखकर बतलाना था। यह न सिर्फ सरकार या अदालत में होता है, बल्कि किसी निजी कारोबार में भी किसी भी कर्मचारी से यह सहज उम्मीद की जाती है कि कोई गड़बड़ी नजर में आने पर वे उसे मैनेजमेंट को बताएं। ऐसे में काटजू ने कल भी कई बातें छुपाईं, और आज भी कह रहे हैं कि वे न्यायपालिका के उन काले चेहरों का खुलासा नहीं करने वाले हैं, क्योंकि भांड़ाफोड़ के बाद जो बवाल मचेगा उसे वे खुद भी नहीं झेल पाएंगे।
काटजू हिंदुस्तान की उसी अदालत का जिंदगी भर हिस्सा रहे हैं जहां से दो दिन पहले ही यह खबर आई है कि किस तरह एक बस कंडक्टर पांच पैसे कम लेने के लिए बर्खास्त किया गया, और उस लड़ाई को लड़ते हुए उसे इसी देश की अदालत में चालीस बरस हो गए हैं। ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें बहुत ही कमजोर, बेबस और असहाय लोग अदालत में लड़ते हुए पूरी जिंदगी खो बैठते हैं, और उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाता। अनगिनत ऐसे लोग हैं जिनको पुलिस या जांच एजेंसियां ताकतवर लोगों के खिलाफ गवाह बनाकर अदालत में खड़ा कर देती है और कहीं सलमान खान के खिलाफ तो कहीं अंबानी की कार के खिलाफ फुटपाथ पर सोने वालों से गवाही की उम्मीद करती है, और अरबपति वकीलों के सामने ऐसे बेजुबान लोगों को झोंक देती है। हिंदुस्तानी न्यायपालिका सबसे कमजोर से भी यह उम्मीद करती है कि वे सबसे ताकतवर मुजरिमों का भी भांड़ाफोड़ करते हुए इंसाफ में मदद करें। ऐसे में उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचा हुआ देश का एक सबसे ताकतवर आदमी बेमतलब की फिजूल बातों को खुद होकर लिखने का शौक तो रखता है, लेकिन अपने इर्दगिर्द की कालिख का भांड़ाफोड़ करने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को भी पूरा करने से कतराता है, बचता है, और मुनादी करता है कि वह ऐसे भांड़ाफोड़ के बाद का हंगामा नहीं झेल पाएगा।
अंबानी और सलमान खान के खिलाफ गवाही देने वाले बेघर फुटपाथी लोग उनके लिए दिक्कत खड़ी करने के बाद नतीजे झेलने को तैयार हैं। जस्टिस मार्कंडेय काटजू को कम से कम फुटपाथ से ही कुछ हौसला मांगकर लाना चाहिए।
लोगों में अपने बदन के लिए नफरत पैदा कर चलती बाजार की साजिश
21 जुलाई 2014
बाकी दुनिया की तरह हिन्दुस्तान के पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर रात-दिन ऐसे ईश्तहार आते रहते हैं जो महिलाओं को अधिक खूबसूरत बनाने, मर्दों को अधिक गठीला और आकर्षक बनाने का रास्ता तो दिखाते ही हैं, वे इन दोनों को अधिक गोरा बनाने के सामान भी बेचते हैं। दुबलों को मोटा, और मोटों को दुबला, कम ऊंचाई वालों को अधिक ऊंचा, और कम भरे हुए बदन को अधिक भरने के लिए तरह-तरह के सामान और तरह-तरह की डॉक्टरी-गैरडॉक्टरी सेवाएं बेचते हैं।
कुल मिलाकर अपने बदन से नफरत करने, लगातार हीनभावना में जीने, और एक असंभव को पाने की लगातार कोशिश पर दुनिया का खरबों का कारोबार टिका हुआ है। पूरी दुनिया को देखें, या पूरी दुनिया को देखने की जरूरत भी नहीं है, सिर्फ कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिन्दुस्तान को ही देख लें, तो बदन के रंग की अलग-अलग कितनी ही किस्में दिखती हैं। नाक-नक्श अलग-अलग कई तरह के दिखते हैं, और कद-काठी का फर्क भी अलग-अलग इलाकों के हिसाब से, अलग-अलग नस्लों और डीएनए के हिसाब से दिखता है। इस खूबसूरत विविधता को खत्म करके कुछ खास तरह के पैमाने बना दिए गए हैं, जिनको पाने के लिए लोग लगे रहते हैं।
लेकिन यह सिलसिला नया नहीं है, और न ही सिर्फ गोरा बनने के लिए है। दुनिया में बेचैनी बेचने का कारोबार खासा पुराना है, और कुछ पुराने अमरीकी ईश्तहार अगर देखें, तो गालों में गड्ढे बनाने के लिए कुछ किस्म के उपकरण एक सदी पहले से अमरीकी बाजार में थे, दुबले बदन को भरने का कारोबार उस समय था, और हिन्दुस्तान में शायद अभी से तीस-चालीस बरस पहले महिलाओं का सीना अधिक भरा हुआ बनाने के लिए किसी एक तकनीक या सामान के विज्ञापन अनगिनत पत्रिकाओं में भरे पड़े रहते थे।
यह पूरा सिलसिला गरीबों के खिलाफ है, क्योंकि उनके पास इनमें से किसी झांसे को खरीदने की ताकत नहीं है। और जब उनके मन में उनके रंग-रूप को लेकर, कद-काठी या आकार को लेकर हीनभावना भर दी जाती है, तो फिर वे खुद उदास रहते हैं, निराश रहते हैं, और खूबसूरती के बाजारू पैमानों पर सोचने वाली दुनिया उन लोगों को हिकारत से देखती है। यह बात तो बुनियादी बदन की हुई, बाकी फैशन के कपड़ों और सामानों, चेहरे पर लेपने वाले सामानों की बात तो बची हुई ही है, लेकिन वह बदन की न होकर, ऊपर की ओढ़ी हुई बात है, इसलिए वह कम खतरनाक है।
दुनिया के कुछ ऐसे देशों को देखें, जो कि ठंडे हैं, और जहां लोगों का रंग अधिक गोरा है। वहां पर ऐसे लोग ही अपने रंग को सांवला कर पाते हैं, जो कि गर्म देशों तक जाकर वहां धूप सेंककर लौटते हैं। वहां भी ऐसा न कर पाने वाले लोगों के लिए खास किस्म की रौशनी में लेटकर अपने बदन की चमड़ी को कुछ सांवला करने के क्लीनिक मौजूद हैं, और रंग का कारोबार वहां रंग को गाढ़ा करने से कमाई करता है, जैसे कि हिन्दुस्तान में रंग को गोरा करने के लिए शाहरूख खान जैसे लोग मॉडलिंग करते हैं।
बाजार की हिंसा का कोई अंत नहीं है। और यह समाज की सोच को ढालते चलती है, या समाज की मौजूदा सोच को दुहते चलती है। बाजार रोज नए तरीके निकालता है कि लोगों को कैसे-कैसे अपने आपसे नफरत करना सिखाया जाए, और फिर उस नफरत की वजहों को दूर करने के सामान बेचे जाएं। यह सिलसिला कुछ उसी तरह का है कि किसी हिन्दी फिल्म में कोई पहले से तय किया गया गुंडा आकर पहले तो किसी सुंदरी का बैग छीनकर भागता है, और फिर फिल्म का हीरो आकर गुंडे को पीटकर बैग छीनकर लाकर सुंदरी को देता है, और एवज में उसका दिल जीतने की कोशिश करता है। बाजार लोगों के मन में हीनभावना भरते चलता है, ताकि खुद उसका पेट चलता रहे।
लोग बाजार की फैशन के शिकार इस हद तक हो जाते हैं कि हिन्दुस्तान का गृहमंत्री शिवराज पाटिल मुंबई आतंकी हमले के दिन दिनभर में चार बार अलग-अलग किस्म के कपड़े पहनकर, फैशन परेड की तरह मीडिया के सामने आता है। बाजार लोगों को जिंदगी में आगे बढऩे के लिए महंगे कपड़ों का रास्ता बताता है, और लोग इस झांसे में आ जाते हैं कि महंगे सामानों के बिना कामयाब नहीं हुआ जा सकता।
जिस अमरीका में बाजार घरेलू मोर्चे पर भी बहुत हिंसक और आक्रामक है, और बाकी दुनिया के देशों में भी अमरीकी कंपनियां लोगों के आत्मविश्वास पर हिंसक हमले करती हैं, खुद वहां पर बाजार इस बात पर बेचैन है कि अमरीकी राष्ट्रपति की पत्नी मिशेल ओबामा बहुत ही सस्ते कपड़े पहनती हैं। वे इतने सस्ते हैं कि अमरीका की कोई मध्यमवर्गीय महिला भी उन्हें खरीदकर पहन सकती है। अब अगर अमरीका की प्रथम महिला महंगे कपड़े पहनती, तो बाजार ऊंचे दामों में अपनी ऊंची कमाई भी कर पाता। लेकिन अगर राष्ट्रपति की पत्नी किसी मामूली औरत की तरह, आम लोगों की पहुंच के भीतर के कपड़े पहन लेती है, तो इससे बाजार का कारोबार मंदा होता है।
भारत में गोरेपन की क्रीम के खिलाफ कुछ समझदार लोग आवाज उठाते हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी सामाजिक सोच शादी के बाजार में गोरेपन के लिए जिस तरह की बावली है, उसे देखते हुए लोग फिर गोरे रंग पर गुमान करने लगते हैं, उसकी चाह में लगे रहते हैं, और यह हसरत रखते हैं कि घर में गोरी बहू आए तो अगली पीढिय़ां गोरी निकलें।
इस सिलसिले को खत्म करना हिन्दुस्तान जैसे देश में शुरू भी नहीं हो सकता, क्योंकि अभी तो बाजार की हिंसा को समझना भी शुरू नहीं हुआ है। अभी लोग यह जान और मान भी नहीं रहे हैं कि वे एक कारोबार की साजिश के तहत हीनभावना में जीते हैं। लेकिन इस बारे में बात जब तक नहीं होगी, तब तक समाज की आर्थिक असमानता भी लोगों की हीनभावना को बढ़ाते चलेगी, क्योंकि जिस तबके के पास पेट भरने को भी मुश्किल से जुटता है, वह तबका चेहरे पर पोतने के लिए गोरेपन की क्रीम कहां से खरीदेगा? लेकिन समाज का जो जागरूक तबका है, उसे यह चर्चा शुरू करनी पड़ेगी, उसे बहस तक ले जाना पड़ेगा, और बाजार की साजिश का भांडाफोड़ करना पड़ेगा।
हिन्दुस्तान के हिंसक प्रदर्शनों पर हवाई नजर की तकनीक
27 जुलाई 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में दो समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष की खबरों से बाकी देश में तनाव फैलने का खतरा हमने कल ही इस जगह लिखा, इसलिए आज उस पर दुबारा लिखने का कोई मकसद नहीं है, लेकिन उससे जुड़ी हुई एक छोटी बात है कि वहां पर पुलिस प्रदर्शनों और संघर्ष पर नजर रखने के लिए ड्रोन विमानों में कैमरा लगाकर उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। खिलौनों की तरह के ये छोटे विमान दूर से नियंत्रित किए जाते हैं, और कुछ ऊंचाई पर उड़ते हुए ये नीचे की तस्वीरें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं, और उन्हें उसी वक्त प्रसारित भी कर सकते हैं। ऐसे वीडियो सुबूत पुलिस के काम आ सकते हैं, और अदालतों से लेकर मानवाधिकार आयोग तक कई जगहों पर पुलिस को ऐसे हर मौके के बाद कटघरे में खड़ा किया ही जाता है। ऐसे में हिंसा में लगे हुए समुदायों से लेकर राजनीतिक दलों तक बहुत से पक्ष होते हैं जो अपने-अपने नजरिए से मौके का ब्यौरा बताते हैं। ऐसे में अगर हवाई फोटोग्राफी से पुलिस कोई सुबूत जुटा सकती है, तो वह इंसाफ में बहुत मददगार हो सकते हैं।
दुनिया में आज ड्रोन का तरह-तरह से इस्तेमाल हो रहा है। अमरीका और इजराईल ड्रोन से पाकिस्तान-अफगानिस्तान, और फिलीस्तीन पर बमबारी कर रहे हैं, और दर्जनों लोगों को एक बार में मार रहे हैं। दूसरी तरफ सामानों की घर पहुंच बिक्री करने वाली बड़ी कंपनियां खाने-पीने के सामान तक ड्रोन से डिलीवर करने की तैयारी कर चुकी हैं। अभी-अभी उत्तरप्रदेश में ही कुछ विदेशी डॉक्यूमेंट्री निर्माताओं को पकड़ा गया जो कि गंगा आरती की हवाई शूटिंग के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे थे। अमरीका में मानवाधिकारवादी लोग लगातार इस बात पर आशंका जाहिर कर रहे हैं कि सार्वजनिक जगहों पर ड्रोन से पुलिस की निगरानी से जनता के बुनियादी हक कुचले जाएंगे। किसी भी नई टेक्नालॉजी के साथ ऐसी आशंकाएं और ऐसे खतरे जुड़े ही रहते हैं, लेकिन उनकी वजह से टेक्नालॉजी का आना नहीं थमता। एक तरफ तो मोबाइल फोन की वजह से दुनिया में हजारों-लाखों मरीजों और घायलों की जिंदगियां बच रही हैं, तो दूसरी तरफ अमरीका पर यह ताजा आरोप लगा है कि वहां बना हुआ एप्पल का आईफोन अपने इस्तेमाल करने वालों की हर जानकारी एप्पल को भेजने की तकनीकी क्षमता वाला है, और अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए इस जानकारी का इस्तेमाल कर रही है। ऐसा ही ड्रोन के साथ भी हो सकता है, एक तरफ हिंसा पर नजर रखने के लिए हवा में पुलिस के ड्रोन उड़ सकते हैं, तो दूसरी तरफ कोई मुजरिम भी किसी घर पर आसमान से नजर रखने के लिए ऐसे ड्रोन कुछ हजार में ही खरीदकर इस्तेमाल कर सकते हैं।
लोगों को आज इस नई टेक्नालॉजी के साथ जीना सीखना होगा। और इसमें अधिक दिक्कत अभी उन हिंसक प्रदर्शनकारियों को आएगी जो कि किसी राजनीतिक दल, किसी धर्म, या संगठन के झंडे तले सड़कों पर भीड़ का कानून लागू करते हैं, और जिंदगियां खतरे में डालते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ जब पुलिस के हवाई कैमरे रिकॉर्डिंग जुटाकर अदालत के सामने पेश करेंगे, तो मुजरिमों का बचना मुश्किल हो जाएगा। हमारा मानना है कि हिंसा और उपद्रव के मौके पर इस तकनीक का इस्तेमाल किसी तरह के बुनियादी अधिकार को नहीं कुचलता, और धीरे-धीरे पूरे देश में हिंसा पर निगरानी के औजार के रूप में इसका इस्तेमाल करना चाहिए। भारत के लोकतांत्रिक कानून में बिना हिंसा प्रदर्शन करने की काफी गुंजाइश है, और यहां की सरकारें भी बहुत हद तक इसकी इजाजत देती हैं। और फिर ड्रोन से की जा रही रिकॉर्डिंग तो पुलिस की कार्रवाई पर भी नजर रखेगी, और हिंसा के बाद पुलिस ऐसी रिकॉर्डिग को आसानी से खत्म भी नहीं कर सकेगी। ऐसे नियम जरूर बनने चाहिए कि सार्वजनिक जगहों के ड्रोन की ऐसी रिकॉर्डिंग बिना छेड़छाड़ सम्हालकर रखी जाए, इससे प्रदर्शनकारियों को भी ऐसे आरोपों को साबित करने में मदद मिलेगी कि दूसरे तबके ने, या कि पुलिस ने उनके साथ ज्यादती की। आगे चलकर यह भी हो सकता है कि भारत के मीडिया के ड्रोन और आंदोलनकारियों के अपने ड्रोन भी अपने-अपने मकसद से उड़कर रिकॉर्ड कर सकें, और तब सुबूतों के साथ छेड़छाड़ नामुमकिन हो जाएगी।
उत्तरप्रदेश की साम्प्रदायिक हिंसा से पूरे देश के सामने खतरे खड़े
26 जुलाई 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश में आज फिर साम्प्रदायिक तनाव भड़क उठा है, और अभी जो खबर है उसके मुताबिक सेना को बुलाया गया है। भारत में आंतरिक तनाव को लेकर कफ्र्यू लगने के बाद यह सबसे बड़ी कार्रवाई रहती है, और सेना को बुलाना, इलाके को उसके हवाले करना, यह एक किस्म से लोकतांत्रिक सरकार का नाकामयाब होना, और हालात को बंदूकों के हवाले करना रहता है। उत्तरप्रदेश में यह नौबत नई नहीं है, और इसका केन्द्र में मोदी सरकार के आने से भी कोई लेना-देना नहीं है। उत्तरप्रदेश के भीतर भारतीय जनता पार्टी के लोग, या हिन्दू संगठनों के लोग ऐसे तनाव के कुछ मामलों के पीछे रहे हैं, लेकिन उनके बिना भी वहां की समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार ऐसे तनाव के मौके देते आई है। अभी हम इस तनाव की जिम्मेदारी तय करने के पचड़े में पडऩा नहीं चाहते, लेकिन फौजी बूटों के साथ-साथ आने वाले खतरे को हम उत्तरप्रदेश की सरहद के बाहर भी बाकी देश में खतरा मानते हैं, और इसीलिए एक प्रदेश की नाकामयाबी, या वहां पर की साजिशें, बाकी देश को भी आग में झोंक सकती हैं।
कल ही हमने देश भर में जगह-जगह साम्प्रदायिकता को बढ़ाने वाली बातों के खिलाफ लिखा था, और आज फिर उत्तरप्रदेश की इस ताजा आग को देखते हुए इस बारे में लिखना जरूरी लग रहा है। भारत का ताजा इतिहास इस बात का गवाह है कि पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, और श्रीलंका से लेकर म्यांमार तक, जहां-जहां भी दो धर्मों के लोगों के बीच टकराव हुआ है, हिंसा हुई है, उसका बहुत बुरा असर हिन्दुस्तान पर भी पड़ा है। क्योंकि हिन्द महासागर के इस हिस्से में देशों के बीच सरहदें तो हैं, लेकिन धर्मों का बंटवारा नहीं है। इसलिए म्यांमार में जब बौद्ध समुदाय मुस्लिमों को मारता है, तो उसके खिलाफ भारत में कुछ आतंकी मुस्लिम लोग बोधगया को निशाना बनाते हैं। ऐसे ही मामले श्रीलंका में तमिलों पर हुई हिंसा को लेकर भारत में होते हैं, ऐसा ही पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ हुई ज्यादती को लेकर होता है, और ऐसा ही तब भी होता है जब भारत में मुस्लिमों के साथ ज्यादती होती है, और उसका दाम पाकिस्तान या बांग्लादेश के हिन्दुओं को चुकाना पड़ता है। हिंसा से परे भी बहुत से देशों की अर्थव्यवस्था में हिन्दुस्तानियों की जगह को लेकर ऐसे खतरे साम्प्रदायिक तनाव के बाद खड़े होते हैं।
हम एक बार फिर उत्तरप्रदेश की बात करें, तो वहां की नालायक और बददिमाग सरकार ने एक ऐसी नौबत खड़ी की है जिसमें मुलायम सिंह ब्रांड के समाजवाद की सबसे बड़ी कामयाबी यही मानी जा रही है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मुलायम सिंह का कुनबा काबिज रहे। और उसके बाद प्रदेश का चाहे जो हो, उसके बाद लोकतांत्रिक परंपराओं का चाहे जो हो। यह नौबत भारत की राजनीति और समाज व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता नाम के शब्द की इज्जत मिट्टी में मिला रही है। उत्तर भारत के दो बड़े राज्यों में साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता का झंडा लेकर चलने वाले दो बड़े ओबीसी नेताओं का हाल यह है कि वे कुनबापरस्ती, अनुपातहीन संपत्ति, भ्रष्टाचार, और बददिमागी का लंबा इतिहास दर्ज कर चुके हैं। ऐसे लालू यादवों, और मुलायमों के चलते साम्प्रदायिकता का विरोध एक गंदा शब्द लगता है, और वह अपनी साख खो बैठा है। लोगों को लगता है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ये लोग जब सिर्फ अपना कुनबा पालने में सैकड़ों बरस पहले के राजवंशों की तरह लगे हुए हैं, तो इनकी लोकतंत्र में कोई जगह क्यों होनी चाहिए?
लेकिन ऐसी राजनीतिक बात से परे अगर उत्तरप्रदेश के शासन-प्रशासन की बात करें तो मुलायम-अखिलेश के राज में पूरे राज्य की पुलिस और वहां के अफसर-तबके को जातिवाद और पसंद के पैमानों पर अलग-अलग करके शासन-प्रशासन को तबाह कर दिया है। देश के सबसे बड़े राज्य को आज जिस तरह एक बच्चे का खिलौना बनाकर रख दिया गया है, उससे सिर्फ वहीं साम्प्रदायिकता नहीं बढ़ी है, बल्कि उसका असर बाकी देश में भी हो रहा है, कहीं पर आग लग रही है, और कहीं पर अभी दबे-दबे सुलग रही है। इस बारे में पूरे देश को, और लोकतंत्र की तमाम राजनीतिक ताकतों को गंभीरता से सोचना चाहिए।
देश में खाई खोदते बयानों पर कड़ी रोक की जरूरत
संपादकीय
इस सिलसिले की शुरुआत कहां से हुई यह याद करना तो मुमकिन नहीं है, लेकिन किसी सिरे तक पहुंचने के लिए गिरिराज सिंह के बयान से शुरू करते हैं, जिसमें उन्होंने नरेन्द्र मोदी के राज में उनके आलोचकों को पाकिस्तान चले जाने की चेतावनी दी थी। बाद में मानो इन्हीं रेल टिकटों के लिए उनके घर से रहस्यमय तादाद में एक करोड़ से अधिक की अघोषित नगदी चोरी होकर बरामद हुई थी, जिसे पहले दिन उन्होंने राजनीतिक साजिश कहा था, लेकिन दो दिन बाद उन्होंने एक भाई खड़ा करके उस रकम पर दावा भी कर दिया। गिरिराज सिंह के उस बयान के बाद से अब तक भाजपा और उसके साथी दलों की ओर से बहुत से ऐसे बयान आए हैं जो हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक तनाव और कड़वाहट पैदा कर रहे हैं। जाहिर तौर पर ऐसे हमलों के शिकार हिन्दुस्तान के वे मुस्लिम हैं, जो किसी भी हिन्दू जितने ही भारतीय हैं। चुनाव अभियान खत्म होने के बाद नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर उनसे यह उम्मीद की जाती थी कि साम्प्रदायिकता भड़काने वाली बातें उनके मातहत लोगों की तरफ से नहीं होंगी, क्योंकि अब सरकार चलाने के जिम्मेदार भी हैं। लेकिन ऐसी बातें रोज कहीं न कहीं से उठ रही हैं।पिछले दो दिनों में ही कम से कम चार ऐसी बातें सामने आई हैं, जो हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुस्लिम के बीच तनाव खड़ा करने की सोची-समझी कोशिश साबित करती हैं, या फिर रोजा रखे हुए मुस्लिम के मुंह में एक बिल्कुल ही लापरवाही से रोटी ठूंसती है। शिवसेना के सांसदों का खड़ा किया हुआ इस साम्प्रदायिक तनाव पर प्रधानमंत्री जाहिर तौर पर तो चुप रह सकते हैं, क्योंकि अभी तक न तो पुलिस में रिपोर्ट हुई है, और न ही हिन्दुस्तान के अंधे कानून ने रोजा-रोटी में अब तक कोई खोट देखी है। लेकिन सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ऐसी बातों को अनदेखा करते हुए क्या विविधताओं से भरे हुए इस विशाल देश पर राज कर सकेंगे? खुद उनकी पार्टी के मंत्री गोवा में घोर दकियानूसी बयान देते हैं, और उनका खंडन गोवा के ही भाजपाई मुख्यमंत्री को करना पड़ता है, अपने मंत्री के सार्वजनिक बयान के खिलाफ सरकार का रूख बताना पड़ता है। और उसी गोवा में कल भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के एक सहयोगी-दल मंत्री बयान देते हैं कि मोदी की अगुवाई में भारत एक हिन्दू राष्ट्र बनेगा। और यह बयान विधानसभा के भीतर सामने आता है।
कल की ही बात है कि हैदराबाद में भाजपा विधायक दल के नेता का एक बयान सामने आता है कि तेलंगाना राज्य सरकार का सानिया मिर्जा को प्रदेश का ब्रांड एम्बेसडर बनाना गलत है, क्योंकि अब वह पाकिस्तान की बहू है। यह बयान लोगों को याद दिलाता है कि सोनिया गांधी इटली की बेटी थीं, लेकिन उनको भारत की बहू मानने से भाजपा के नेता अभी कुछ बरस पहले तक इंकार करते थे, और सोनिया के प्रधानमंत्री बनने की नौबत आने पर सिर मुंडाने के बयान देते थे, आज उसी तरह सानिया मिर्जा एक पाकिस्तानी से शादी करने के बाद, भारतीय नागरिक बने रहने परभ भी भारत की बेटी नहीं मानी जा रही है। यह तो अच्छा हुआ कि शाम होते-होते भाजपा के केन्द्रीय मंत्री और कल तक प्रवक्ता रहे प्रकाश जावड़ेकर ने इस बयान का विरोध किया और कहा कि पार्टी ऐसा नहीं सोचती है।
और यह भी कल की ही बात है कि संसद में दिल्ली से भाजपा के एक सांसद ने रोजा-रोटी पर बहस के दौरान शिवसेना के बर्ताव का विरोध करने वाले सांसदों को पाकिस्तान जाने की नसीहत दे दी। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी की चुप्पी लोगों को कुछ तो चौंका रही है, और कुछ इस मजाक का मौका दे रही है कि पीएम की कुर्सी सबको मौनी बाबा बना देती है। लेकिन चुप रहकर भी वे अपनी पार्टी के, अपने गठबंधन के, और अपने हमखयालों के किए जा रहे हमलों के लिए संवैधानिक, राजनीतिक, और नैतिक रूप से जिम्मेदार, या जवाबदेह तो हैं ही। देश में आज अगर हिन्दू और मुस्लिम के बीच एक खाई खोदी जा रही है, तो इसका नुकसान सिर्फ सामाजिक मोर्चे पर नहीं होगा, आर्थिक मोर्चे पर भी इसका नुकसान होगा। दोनों समुदायों के बीच यह तनाव बढ़ेगा, तो घोषित साम्प्रदायिक हिंसा से जूझने में देश की बहुत सी ताकत जाएगी, और अघोषित आतंकी साजिशों से बचाव की तैयारी में भी देश की बहुत सी ताकत लगेगी, बेहिसाब खर्च लगेगा, और देश की साख दुनियाभर के कारोबारियों के बीच भी गिर जाएगी।
भाजपा को एक पार्टी के रूप में, एनडीए को एक गठबंधन के रूप में, और नरेन्द्र मोदी एक प्रधानमंत्री के रूप में ऐसी गैरजरूरी बयानबाजी पर रोक लगाने की जरूरत है, अगर इसके पीछे कोई सोची-समझी बात न हो तो।
नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे...
24 जुलाई 2014
संपादकीय
तेलंगाना में दिक्कतें दूर होने में बरसों लगेंगे, और आंध्र में भी। लेकिन इस बीच कुछ नई दिक्कतें भी खड़ी हो रही हैं। नया राज्य बने तेलंगाना में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने अंतरराष्ट्रीय टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाया, तो भाजपा विधायक दल के नेता ने कहा कि सानिया तो अब पाकिस्तान की बहू है, इसलिए उसे ब्रांड एंबेसडर बनाना ठीक नहीं है। कांगे्रस ने इस तर्क से परे सानिया के नाम का यह कहकर विरोध किया कि वह तेलंगाना की नहीं, आंध्र की है। लेकिन मुख्यमंत्री की बेटी ने यह मिसाल देकर पिता का बचाव किया कि मोदी के गुजरात में अमिताभ बच्चन ब्रांड एंबेसडर हैं, और वे वहां न पैदा हुए हैं, न उन्होंने वहां काम किया है।
आज की बाजार व्यवस्था के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों से लेकर दूसरे समाजसेवी संगठनों तक ने अपने-अपने ब्रांड एंबेसडर बनाए हैं। हॉलीवुड के अभिनेता-अभिनेत्रियों से लेकर खिलाडिय़ों तक को किसी देश-प्रदेश, संगठन, अभियान, या मुद्दे के प्रचार के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाया जाता है। लेकिन हम भारत के राज्यों की बात करें, तो क्या सचमुच ही राज्यों को पहले से चर्चित चेहरों का इस्तेमाल करने की जरूरत पडऩी चाहिए?
भारत की आजादी के दिनों को याद करें, तो महात्मा गांधी पूरी दुनिया में भारत के विकल्प के रूप में समझे जाते थे। कोई हिंदुस्तान कहे, या गांधी कहे, उसका एक ही मतलब होता था। गांधी के ठीक बाद जवाहर लाल नेहरू अपनी अंतरराष्ट्रीय सोच, इंसानियत के लिए दरियादिली, और दुनिया भर से दोस्ती की वजह से भारत के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर रहे, और कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि भारत को अपनी कामयाबी के लिए, प्रचार के लिए, सैलानी जुटाने के लिए किसी और चेहरे या नाम की जरूरत हो सकती है। इंदिरा के वक्त तक भी यही हाल रहा, और अपने अंतरराष्ट्रीय फैसलों की वजह से इंदिरा दुनिया के मोर्चो पर एक किस्म से इंडिया मानी गईं, खासकर तब तक, जब तक कि अपने बेटे संजय गांधी के फेर में उन्होंने लोकतंत्र की हत्या करके इमरजेंसी लागू की। इंदिरा के अच्छे दौर के बाद से इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसे नाम नहीं आए, जिनकी कि दुनिया में कोई साख रही हो, और जो भारत के ब्रांड एंबेसडर बन सकते हों।
किसी कलाकार, संगीतकार, खिलाड़ी, या समाजसेवी को ब्रांड एंबेसडर बनाने की नौबत तभी पड़ती है, जब देश या प्रदेश के मुखिया अपने काम को जिम्मेदारी से नहीं करते। पश्चिम बंगाल की बात करें, तो दशकों तक वहां मुख्यमंत्री रहे, माक्र्सवादी ज्योति बसु का नाम और चेहरा उस राज्य का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर था। उनके रहते राज्य को किसी और नाम की जरूरत नहीं थी, और वामपंथी नीतियों से सहमत या असहमत जो भी हों, ज्योति बाबू के बारे में यह बात साफ थी कि वे पश्चिम बंगाल का समानार्थी शब्द बने हुए थे। आज अगर ममता बैनर्जी किसी शाहरूख खान को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाती है तो यह राज्य सरकार के मुखिया की एक नाकामयाबी रहेगी।
हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में शासन का मुखिया रहते हुए किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को अपने अच्छे कामों से ही देश-प्र्रदेश की पहचान बनने का मौका मिलता है, और ऐसे लोग ही जब देश-प्रदेश का चेहरा बन सकें, तो ही उनका काम कामयाब साबित होता है। यह अफसोस की बात है कि सरकार चला रहे लोग किसी दूसरे दायरे के कामयाब लोगों की कामयाबी को अपने राज्य या देश की पहचान बनाने और बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करें। लोगों को याद रखना चाहिए कि हिंदुस्तान के इतिहास में समाजसेवा का सबसे बड़ा काम करने वाली मदर टेरेसा को दान जुटाने के लिए, अपने मुद्दों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उनको कभी किसी सितारा चेहरे की जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि हिंदुस्तान की एक पहचान यह भी बनी कि मदर टेरेसा यहां पर काम करती थीं, और उन्होंने दूर देश से आकर इसको अपना घर बना लिया था। जहां लोग खुद काम नहीं करते हैं, वहीं उन्हें मशहूर बैसाखियां लगती हैं। महान काम करने वालों को इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाने की कोशिश भी नहीं करनी पड़ती, और उनके काम ही उनके दायरे की पहचान हमेशा बने रहते हैं। ऐसे में एक गाना याद पड़ता है-नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे...
कैमरे पर रिकॉर्ड शिवसेना सांसदों की बदसलूकी पर कार्रवाई हो...
23 जुलाई 2014
संपादकीय
दिल्ली में महाराष्ट्र सरकार के भवन में शिवसेना के सांसदों ने खाने से नाराज होकर वहां के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी की, और एक मुस्लिम कर्मचारी के मुंह में यह बताने पर भी जबर्दस्ती रोटी ठूंसी कि वह रोजा रख रहा है। रमजान के महीने में मुस्लिम समाज के धर्मालु लोग दिन भर बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं, और वे इस बात को बहुत गंभीरता से मानते हैं। ऐसे में कर्मचारी के बार-बार बताने पर भी उसके मुंह में रोटी ठूंसना, एक बड़ा गंभीर अपराध है, जो कि हिंसक तो नहीं है, लेकिन हिंसा से कम भी नहीं है। इसके बाद दूसरी गंभीर बात यह हुई कि यह शिकायत होने पर शिवसेना सांसदों ने इस पूरी घटना को झूठा करार दिया, और यह कहा कि धर्म का इस्तेमाल करके, उसकी आड़ में ऐसे झूठे आरोप लगाना एक बड़ा अपराध है। इसके बाद इस घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आ गई जिसमें सांसद जबर्दस्ती एक कर्मचारी के मुंह में रोटी ठूंस रहा है।
हम इसे सिर्फ शिवसेना तक सीमित रखकर बात करना नहीं चाहते। दूसरी पार्टियों के सांसद और विधायक भी जहां-जहां उनसे बन पड़ता है, वहां-वहां अपने ओहदे की बददिमागी दिखाते हैं, और लोगों से बदसलूकी करते हैं। फिर बात को कुछ और आगे बढ़ाएं, तो सिर्फ सांसदों और विधायकों को क्यों कोसें, हिन्दुस्तान में जिस किसी के हाथ में ताकत आ जाती है, उसका दिमाग सिर के ऊपर चले जाता है, फिर ऐसे लोगों में बड़े अफसर हों, मीडिया के लोग हों, पैसों की ताकत वाले लोग हों। आज दरअसल बदन की ताकत तो बहुत छोटी रह गई है, दूसरे कमजोर लोगों को नुकसान पहुंचाने की ताकत अधिक मायने रखने लगी है।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पहले भी कई बार यह लिखते हैं कि जब समाज में ताकत रखने वाला कोई तबका किसी कमजोर के खिलाफ कोई जुर्म करे, तो उसकी तेज सुनवाई के इंतजाम के साथ-साथ उस पर अधिक कड़ी सजा का इंतजाम भी होना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि कमजोर की सुनवाई भारतीय न्यायव्यवस्था में बहुत ही कम संभावना रखती है। ताकतवर की बच निकलने की संभावना ही अधिक होती है। शिकायत से लेकर जांच तक, और सुबूत से लेकर गवाह तक, वकील से लेकर जज तक, कमजोर तबका मानो कोई हक ही नहीं रखता। आज अगर दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में रेल मंत्रालय के कर्मचारियों द्वारा चलाई जा रही यह केंटीन वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं दिखा पाती, तो हमें कोई हैरानी नहीं होती, अगर शिवसेना के सांसद संसद में विशेषाधिकार भंग का मामला लाकर छोटे कर्मचारियों को सजा दिलवाने पर उतारू हो जाते।
भारतीय लोकतंत्र एक बहुत ही गैरबराबरी की व्यवस्था बन चुका है। किसी खरबपति की कार से जब मुंबई के फुटपाथ पर लोग कुचल जाते हैं, और मारे जाते हैं, तो मीडिया से लेकर पुलिस के रिकॉर्ड तक में ड्राइवर को लेकर एक धुंध छा जाती है, और ऐसा ही तब होता है जब संजय दत्त जैसे ताकतवर लोग जेल से बार-बार लंबी पैरोल पर बाहर आते हैं। ऐसा तब भी दिखता है जब सुब्रत राय जैसे लोगों की जमानत के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट अंतहीन घंटे खर्च करते चलती है, और सहारा का वकील सुप्रीम कोर्ट के जजों को बदलवाने की तरकीबें निकालते रहता है, जज बदलते रहते हैं, और सुप्रीम कोर्ट अपने आपको असहाय बताते हुए अपना वक्त खर्च करते चलता है।
भारत में ताकत की बददिमागी को रोकने के लिए आज वीडियो रिकॉर्डिंग एक बड़ा औजार बन गया है, और जब तक किसी की रिकॉर्डिंग सामने नहीं आ जाती है, तब तक ताकतवर लोग चोरी और सीनाजोरी दिखाते रहते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और शिवसेना के ऐसे सांसदों को सजा मिलनी चाहिए, जिससे कि बाकी लोगों को एक सबक मिल सके। अपनी आक्रामक हिन्दुत्ववादी विचारधारा के चलते शिवसेना के सांसद जब किसी मुस्लिम कर्मचारी पर साजिश का ऐसा आरोप लगाते हैं, और जब आरोप को झूठा साबित करने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग आ जाती है, तो उसे कैसे छोड़ा जा सकता है?
आज जरूरत है हिंसक हमलावर अमरीका-इजराईल के बहिष्कार की
22 जुलाई 2014
संपादकीय
फिलीस्तीन के अस्पतालों तक पर हवाई बमबारी करके इजराईल जितने लोगों को अब तक मार चुका है, उनमें से पांच सौ से अधिक की लाशें मिल चुकी हैं। और दुनिया के मामलात में दिलचस्पी रखने वाले कुछ लोगों को छोड़कर बाकी लोग इससे बेखबर हैं, ऐसा इसलिए भी है कि हिन्दुस्तान जैसी संसद इस पर बात करने से भी कतरा रही है क्योंकि इजराईल के साथ भारत के कारोबारी रिश्ते खासे भारी-भरकम हैं। लेकिन जागरूक लोगों को यह समझना चाहिए कि गांधी के दिनों से लेकर आज तक, किसी जगह बेकसूर के साथ हो रही हिंसा पर जो लोग चुप रहते हैं, वे शायद अपनी अगली पीढ़ी के लिए हिंसा को न्यौता देते हैं। दुनिया की एक विख्यात कविता है कि हत्यारे एक पड़ोसी को लेने आए, तो मैं चुप रहा, क्योंकि वे मुझे लेने नहीं आए थे, फिर वे किसी और को लेने आए, तो भी मैं चुप रहा..., और आखिर में एक दिन वे मुझे लेने आए...।
आज वक्त है कि इजराईल और अमरीका की अंतरराष्ट्रीय गुंडागर्दी और हिंसा के खिलाफ दुनिया में आवाज उठे। भारत की कारोबारी पार्टियां न संसद में इस ऐतिहासिक हिंसा के खिलाफ बोलेंगी, और न ही भारत की सरकार इस पर मुंह खोलेगी। इस बारे में हमने दो-तीन दिन पहले ही लिखा था। लेकिन आज फिर इस मुद्दे पर लिखने की वजह यह है कि सरकार से परे जनता भी कुछ कर सकती है, सरकार के बिना भी कुछ कर सकती है। आज लोगों को चाहिए कि अमरीका और इजराईल के बनाए हुए सामानों के खिलाफ एक अभियान छेड़ा जाए, और ऐसी कंपनियों के सामानों का बहिष्कार किया जाए जिनके पीछे कि अमरीका और इजराईल हैं। यह मामला आसान नहीं होगा, क्योंकि दुनिया के बाजार पर, कारोबार पर, अमरीका का दबदबा इतना अधिक है कि अमरीकी सामानों के बहिष्कार का मतलब जिंदगी से कई चीजों को बाहर कर देना, या जिंदगी की रफ्तार को रोक देना होगा। लेकिन फिर भी लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि किस तरह अमरीकी और इजराईली सामानों के दूसरे विकल्प ढूंढे जा सकते हैं। ऐसा भी नहीं कि दुनिया के बाकी देश एकदम से शरीफ हैं, और हिंसा के खिलाफ हैं। लेकिन भारत के चुनाव हों, या दुनिया के मामले, लोगों के पास पसंद की गुंजाइश हमेशा ही सीमित रहती है। इसलिए आज सबसे बड़ा सबक अमरीका और इजराईल की गिरोहबंदी को सिखाने का ही हो सकता है, और जब तक इनके पेट पर लात नहीं पड़ेगी, तब तक ये अपनी कमाई से लोगों पर बम बरसाते रहेंगे। इन्होंने इराक में ऐसा किया, अफगानिस्तान में किया, पाकिस्तान में रोजाना कर रहे हैं, और अमरीका का इतिहास अगर देखें तो उन्होंने वियतनाम में एक पूरी पीढ़ी को खत्म करने का काम किया, और जिस दिन उनका बस चलेगा, उस दिन दिल्ली की संसद पर भी वे बम गिराएंगे। आज हिन्दुस्तान एक देश के रूप में तो भारी दब्बू और गैरजिम्मेदार साबित हो रहा है, लेकिन यहां की जनता अधिक जागरूक साबित हो सकती है।
भारत का आजादी का इतिहास भी विदेशी सामानों के बहिष्कार का रहा है, और उस वक्त भी गांधी का नजरिया यही था कि हिन्दुस्तान पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों के पेट पर जब तक लात नहीं पड़ेगी, तब तक उन्हें समझ नहीं आएगी। आज भी लोगों को कम से कम ऐसे अमरीकी सामानों का बहिष्कार तो शुरू करना ही चाहिए, जिनसे कि हिन्दुस्तानी बाजार पटे हुए हैं। कोकाकोला और मैकडोनल्ड जैसे सामानों के बिना क्या जिंदगी चल नहीं सकती? क्या अमरीका से बाहर के मोबाइल फोन बाजार में कम हैं? अधिक से अधिक बहिष्कार जब अमरीकी सामानों का होगा, तो ही जाकर इन हमलावर देशों को समझ आएगी। और जब हिंसा के खिलाफ बहिष्कार की समझ भारतीय जनता में आएगी, तो वह जागरूकता इस देश के भीतर भी, और जिंदगी के दूसरे दायरों में भी काम आएगी।
बच्चों के देह शोषण पर यह देश तो चर्चा तक नहीं करता
21 जुलाई 2014
संपादकीय
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में छह बरस की एक बच्ची के साथ स्कूल में बलात्कार के बाद वहीं का एक खेल प्रशिक्षक-शिक्षक पकड़ाया है, जिसके लैपटॉप पर बच्चों से बलात्कार के बहुत से वीडियो निकले हैं। बड़े शहरों में होने वाले जुर्म पर चर्चा जल्दी शुरू होती है लेकिन हम हमेशा से बच्चों के देह शोषण के खतरे के बारे में लिखते आ रहे हैं। हम इस बारे में जितनी बार लिखते हैं, और लोगों को जितना सावधान करते हैं, उसको लेकर कुछ लोगों को यह भी लगता है कि इस मुद्दे पर इतनी चर्चा की क्या जरूरत है। लेकिन हमारा यह मानना है कि इस पर चर्चा की अधिक जरूरत इसलिए भी है कि ऐसे शोषण के शिकार बच्चों की खुद की जुबान की आवाज सुनने वाले लोग नहीं रहते। स्कूल में या मैदान में कोई शिक्षक-प्रशिक्षक ऐसा करे, तो उसकी शिकायत स्कूल नहीं सुनता, घर या पड़ोस में कोई ऐसा करें, तो उस बात को परिवार अनसुना कर देता है, और जब कभी बच्चे की कोई शिकायत भरोसेमंद भी लगे, तो उसे बात को न बढ़ाने की बात कहते हुए, उसे रफा-दफा करने की कोशिश होती है। नतीजा यह होता है कि बच्चों के यौन शोषण के मुजरिम अमूमन हर मामले में बच निकलते हैं, और वे आखिर तक दूसरे बच्चों के लिए खतरा बने रहते हैं।
दूसरी बात यह भी है कि हिन्दुस्तान में बलात्कार की वजहों को लेकर सत्ता पर बैठे हुए बेवकूफ और बदमिजाज लोग जिस तरह की बातें करते हैं, उनको लेकर सेक्स-अपराध पर बहस एक गलत तरफ मुड़ जाती है। कोई महिलाओं के कपड़ों को बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहरा देता है, कोई उनके देर रात तक बाहर रहने को, और कोई उनके शराब पीने को। अब बात कुछ आगे तक बढ़ गई है, और लोग मांसाहार को और मोबाइल फोन को भी बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराने लगे हैं। इस बहस के बीच यह बात धरी रह जाती है कि जब चार-छह बरस की बच्चियों से बलात्कार होता है, तो न तो वे कम कपड़े पहनी रहतीं, न वे शराब पीती रहतीं, न वे देर रात तक घर के बाहर रहतीं, और न वे मोबाइल फोन की वजह से बलात्कार का शिकार होती हैं। दरअसल हिन्दुस्तानी सोच का पूरा ढांचा महिला के खिलाफ है, और वह अपने लड़कों के बारे में खुलकर यह कहता है कि लड़कों से तो गलतियां हो ही जाती हैं, लड़कियों को ही सावधान रहना चाहिए। मतलब यह कि लड़कों का हिंसक जुर्म माफी के लायक है, और लड़कियों का अपनी तरह से रहना माफी के लायक नहीं है। यह वही देश है जो कि अजन्मी लड़कियों को मारने के मामले में दुनिया में सबसे आगे है, और शायद दुनिया में ऐसी कोई दूसरी मिसाल भी नहीं है। जिन मुस्लिम देशों को भी अनपढ़ और जाहिल, कट्टर और धर्मान्ध, पिछड़ा और आतंकी करार दिया जाता है, वहां भी अजन्मी बच्चियों को मारने की कोई सामाजिक प्रथा नहीं है।
हम फिर बच्चों के यौन शोषण की बात पर लौटें, तो भारत में कानून से परे जमीन पर कुछ बातों को करने की बहुत जरूरत है। एक तो यह कि स्कूल और कॉलेज में कोई भी कमरे ऐसे नहीं होने चाहिए जिनमें कि बाहर से भीतर देखा न जा सके। इसके अलावा बच्चों को सेक्स हिंसा के खतरों के बारे में स्कूल के परामर्शदाता उन बच्चों के मां-बाप की मौजूदगी में उन्हें बताएं, ताकि बच्चे भी सावधान रह सकें, और स्कूल से परे भी उनके मां-बाप बच्चों के लिए ऐसे खतरों से वाकिफ रह सकें। अभी तक हम उन बच्चों की बात कर रहे हैं जिनको स्कूल नसीब है, और मां-बाप नसीब हैं, एक घर नसीब है। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों बच्चे हैं जिनके लिए महज फुटपाथ और रेलवे प्लेटफार्म हैं। ऐसे बच्चे सेक्स हिंसा और देह शोषण को बहुत बुरी तरह झेलते हैं, और उनको बचाने वाला भी कोई नहीं होता। हमने ही पहले कई बार यह लिखा है कि इस देश में दसियों लाख बच्चे ऐसे हैं जिनको ठंड में एक कम्बल में सोने की जगह देकर लोग उनका देह शोषण कर लेते हैं। यह सिलसिला इस देश को एक ऐसी जख्मी और तकलीफजदा पीढ़ी दे रहा है, जो कि किसी भी सेहतमंद देश के लिए बहुत खतरनाक है। लेकिन हमने छत्तीसगढ़ में पिछली आधी सदी में बच्चों के देह शोषण के खतरों पर चर्चा के लिए एक बैठक भी होते आज तक देखी नहीं है। ऐसे में इस देश-प्रदेश में कोई जागरूकता आ भी कैसे सकती है?
दान की नीयत तो अच्छी है, सुपात्र की शिनाख्त भी जरूरी
20 जुलाई 2014
संपादकीय
शहर की एक तस्वीर देखने मिली जिसमें आज सुबह की एक समाज के लोग गरीब बच्चों को कॉपी-किताब बांटते दिखे। कतार में दर्जनों बच्चे लगे थे, और सभी ने ठीक-ठाक कपड़े पहन रखे थे। वे संपन्न परिवारों के चाहे न हों, वे कम से कम खाते-पीते घरों के तो थे ही, क्योंकि पैरों में चप्पलें भी थीं, कुछ पैरों में पायजेब भी थे, और शायद ही किसी के कपड़े खराब थे।
शहरों में दानदाताओं का उत्साह कई मौकों पर सामने आता है। जब किसी जाति या धर्म का त्यौहार आता है, तो उसके लोग सड़क किनारे कहीं भंडारा खोल लेते हैं, कहीं शरबत बांटते हैं, और कहीं किसी और शक्ल में प्रसाद बांटते हैं। ऐसी जगहों पर रास्ता जाम हो जाने की हद तक भीड़ लग जाती है, रिक्शे-ठेले से लेकर आटो रिक्शा और मोटरसाइकिलों तक को खड़ा करके लोग खाने-पीने में जुट जाते हैं। दानदाताओं को यह तसल्ली रहती है कि उन्होंने धर्म का काम किया है, और गरीबों का पेट भी भरा है।
दरअसल शहरी गरीब शायद ही भूखे रहते हैं। उनका पेट भी भरा होता है, और उनके पास आमतौर पर काम भी होता है। भंडारों में कतार में लगे हुए लोगों से परे भिखारी, बीमार, बूढ़े, और विचलित लोग अलग होते हैं, जिनको खाने की जरूरत होती है। लेकिन प्रसाद और दान की दूसरी शक्लों में पेट भरने के सामान पाने वाले तकरीबन सारे लोग बहती गंगा में हाथ धोने के अंदाज में अपनी आस्था भी पूरी कर लेते हैं, और पेट भी भर लेते हैं।
हम इस पूरे सिलसिले में गलती किसी की नहीं मानते, लेकिन दान के बेहतर इस्तेमाल की संभावना जरूर देखते हैं। जब कभी भूखों के नाम पर दानदाताओं की जेब से रकम निकलती है, तो उसका सबसे अच्छा इस्तेमाल ही होना चाहिए। यह दान सबसे गरीब तक जाना चाहिए। लेकिन सबसे गरीब से परे बाकी लोगों तक यह न जाए, ऐसा कोई जरिया सड़क किनारे के भंडारों में निकलना नामुमकिन है। सबसे गरीब और सबसे जरूरतमंद की तलाश, शिनाख्त, और उस तक पहुंच के लिए खासी जांच-पड़ताल की जरूरत पड़ती है, जो कि सड़क किनारे के मौजूदा दान-धर्म के मुकाबले खासी अधिक मशक्कत का काम होगी। इसलिए लोग अपने मन की तसल्ली के लिए आसपास कतार में जुटने वाले लोगों को भक्त, आस्तिक, या गरीब मानकर काम चला लेते हैं।
समाज में जो पैसा लोगों की जेब से निकलता है, उसके बेहतर इस्तेमाल के लिए एक सामाजिक ढांचा रहना चाहिए। इसके बिना सबसे अधिक जरूरतमंद, नजरों से दूर, कहीं अस्पतालों के पिछवाड़े में, तो कहीं कुष्ठ रोगियों की बस्तियों में, तो कहीं दूर के गांवों में पड़े रह जाते हैं। एक बार कोई भरोसेमंद संस्था या तरीका ऐसा निकल जाए, जो कि यह दिखा भी सके कि दान का सबसे अच्छा इस्तेमाल किया गया है, तो उससे फिर दानदाताओं का उत्साह बढ़ भी सकता है। लोग अपने आसपास के थोड़े से जरूरतमंद लोगों को ही दान का सुपात्र समझ लेते हैं, और ऐसे में उनका सामाजिक योगदान अधिक उत्पादक योगदान नहीं बन पाता। आज धर्म के नाम पर, आध्यात्म या जातियों के संगठनों के नाम पर, त्यौहारों पर लोगों की जेब से पैसे निकलते हैं, और इसके विश्वसनीय उपयोग का तरीका लोगों को सोचना चाहिए। ऐसा काम करने में वे लोग भी लग सकते हैं, जिनके पास खुद तो दान के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन कुछ करने का उत्साह है, ईमानदारी है, और साख है। ऐसे दो तबकों के मेल से समाज का भला हो सकता है।
फिलीस्तीनियों के मानवसंहार पर शर्मनाक हिन्दुस्तानी चुप्पी
19 जुलाई 2014
संपादकीय
संसद में मोदी सरकार फिलीस्तीन पर इजराईली हमले की चर्चा से जिस तरह बचते दिख रही है, वह एक शर्मनाक हालत है। इन दोनों देशों के बीच कोई संघर्ष चल रहा है ऐसा मानने वालों को यह देखने की जरूरत है कि किस तरह सरहद के आरपार के हमलों में मरने वाले इजराईलियों से सैकड़ों गुना मौतें फिलीस्तीन में हो रही हैं, जहां पर कि इजराईली फौजी विमान अस्पतालों तक बमबारी कर रहे हैं। यह पूरा टकराव एक लंबा इतिहास है, और शायद बड़ा लंबा भविष्य भी है क्योंकि इजराईल की पीठ पर अमरीका का हाथ है, और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय पंचायत पूरी तरह बेअसर और बेकाम पड़ी हुई है। लेकिन भारत को दुनिया के मामलों में अपनी गौरवशाली दखल को याद रखकर आज इजराईली हैवानियत पर अपनी संसद में जो बात करनी थी, उससे बचते हुए मोदी सरकार का तर्क यह है कि इन दोनों देशों से भारत के दोस्ताना तालुकात है, और संसद में इस पर चर्चा से ऐसे रिश्ते खराब हो सकते हैं।
आजादी के पहले से भारत के गांधी और नेहरू जैसे नेताओं का पूरी दुनिया के मामलों में एक गौरवशाली हस्तक्षेप रहते आया है। इन दोनों ही नेताओं ने अपने देश के लोगों को अंतरराष्ट्रीय मामलों पर शिक्षित और जागरूक करने का काम अपनी आखिरी सांस तक किया था, और दक्षिण अफ्रीका से लेकर फिलीस्तीन तक, और गुटनिरपेक्ष देशों से लेकर चीन तक, गांधी और नेहरू ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, दूसरे देशों से दोस्ती की, दोस्ती निभाई, धोखा भी खाया, लेकिन दरियादिली कम नहीं की। आज भारत का इजराईल के साथ संबंध यही है कि इजराईल के पूरे निर्यात का आधे से अधिक, भारत आयात करता है। भारत इजराईल का सबसे बड़ा ग्राहक है, और इन दोनों के बीच अगर किसी किस्म की रियायत होनी चाहिए, तो वह इजराईल की तरफ से भारत के लिए होनी चाहिए, न कि फिलीस्तीन के साथ चल रहे ऐतिहासिक जुल्म पर भारत की तरफ से इजराईल के लिए किसी रियायत की शक्ल में। लेकिन भारत के कारोबारी इजराईल के साथ धंधा करके इतनी बड़ी एक लॉबी दिल्ली में खड़ी कर चुके हैं, कि भारत की सरकार एक शर्मनाक चुप्पी मुंह पर टांगे हुए इतिहास में अपना नाम खराब कर रही है।
हम मुस्लिम और यहूदी समुदायों की बात नहीं कर रहे, हम इंसाफ की बात कर रहे हैं, और भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को और कुछ नहीं करना है, आजादी के पहले से गांधी फिलीस्तीनियों के हक के बारे में जो लिखते आ रहे थे, उनको उठाकर पढऩा भर है। उस वक्त गांधी ने जो लिखा वह इंसानियत के हक में एक ईमानदार बात थी, और एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय सोच से उपजी हुई थी। गांधी ने अपने अखबारों में गांव-गांव से आई चि_ियों के जवाब में जनशिक्षण के लिए जितने खुलासे से फिलीस्तीनियों के बारे में लिखा था, उसे अगर आज की मोदी सरकार पढ़ भी ले, तो वह संसद में मुंह चुराने से बचेगी।
लेकिन आज इस देश की सरकार कारोबारियों के असर में है, और हकीकत तो यह है कि इंदिरा गांधी शायद आखिरी ऐसी प्रधानमंत्री थीं, जिनका यह हौसला था कि वे फिलीस्तीनियों के साथ खड़ी रहीं। अमरीका और इजराईल इन दोनों का दुनिया के कारोबार पर बड़ा दबदबा है, और कारोबार से परे भी फौजी दबदबा काफी है। लेकिन इंदिरा गांधी में वह हौसला था कि उन्होंने इसकी परवाह किए बिना फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात को अपना भाई बनाया था, और फिलीस्तीनियों को हिन्दुस्तान का दोस्त माना था। इंदिरा ही फिलीस्तीनियों के जख्मों पर मरहम रखने वाली हमदर्द भी थीं। आज हिन्दुस्तान की विदेश नीति, और देशनीति दोनों ही कारोबार तले दबी हुई हैं, और दुनिया का इतिहास इतने बड़े देश, ऐसे गौरवशाली इतिहास वाले लोकतंत्र का नाम बड़े अफसोस के साथ दर्ज कर रहा है। हमारा मानना है कि भारत के लोगों को संसद के बाहर एक जनसंसद लगाकर दुनिया की इस सबसे बड़ी मौजूदा बेइंसाफी पर बात करनी चाहिए, और वही सरकारी चुप्पी के मुंह पर तमाचा होगा।
मेहरबानियां लुटाने का जरिया नहीं संवैधानिक संस्थाएं
18 जुलाई 2014
संपादकीय
पिछले चौबीस घंटों में 6 साल की बच्ची से लेकर युवती और परिपक्व महिलाओं के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में ज्यादतियां होने की खबरें मिलीं। लखनऊ में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मुलाकात के मौके पर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद, शहर के करीब एक युवती के साथ निर्भया कांड जैसी दरिंदगी की खबर है, तो बंगलौर के पास एक गांव में, मिड डे मील के खराब स्तर की शिकायत करने पर एक महिला डॉक्टर और उसकी सहायिका के कपड़े गांव के सरपंच की मौजूदगी में दबंगों ने उतार लिए। उधर बिहार में एक राजनीतिक दल की महिला नेता को दबंगों ने सड़क पर कपड़े उतार कर पीटा और कोई बचाने तक नहीं आया। बेंगलौर के एक बड़े स्कूल में पहली कक्षा में पढ़ती 6 साल की बच्ची के साथ स्कूल के खेल शिक्षक और जिम टीचर द्वारा कथित सामूहिक बलात्कार की खबर अभी ताजा ही है। निर्भया कांड के बाद बलात्कार कानून को व्यापक और सख्त बनाने के बावजूद, महिलाओं के साथ देश में ऐसा सुलूक थमते कहीं नहीं दिख रहा है, जैसे लोगों को इस व्यवस्था की नाकामी का पूरा इत्मीनान हो।
इन सबके बीच नई सरकार की महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बने महिला आयोग को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग जैसे अधिकार और दोषियों को सजा देने की सत्ता की मांग कर रही है। एक अंग्रेजी अखबार के साथ बातचीत में मेनका ने बताया है कि कैसे आज की तारीख में महिला आयोग को कोई गंभीरता से नहीं लेता, जिनके खिलाफ शिकायतें हों वह बुलाए जाने पर आयोग के सामने पेश होना तक जरूरी नहीं समझते, और महिला आयोग में जाने वाली महिलाएं अपने पैसे और वक्त गंवाने के बावजूद कुछ हासिल नहीं कर पातीं। ऐसी हालत के लिए महिलाओं के अधिकारों के प्रति सत्ता पर बैठे लोगों की नीयत सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। निर्भया फंड बनाकर उसमें रखे गए एक हजार करोड़ रुपये में से एक साल में एक भी रुपया खर्च नहीं किया जाना इसकी एक मिसाल है, जबकि इस दौरान औरतों पर जुल्म के बहुत से मामले हुए। खुद मेनका गांधी ने कहा है कि महिला आयोग राजनीतिक मेहरबानियां लुटाने का जरिया बन चुके हंै। महिला आयोग ही नहीं, ज्यादातर संवैधानिक ,वैधानिक संस्थाओं, समितियों, पदों पर इस तरह की नियुक्तियां किए जाने के मामले देखने मिलते हंै। बहुत बार यह भी देखा जाता है कि नौकरी जारी रहते हुए अफसर अपने रिटायर होने के बाद इस तरह के संवैधानिक पद पाने का जुगाड़ करने, सत्ता में बैठे राजनीतिक दल के मनमाफिक काम करते हैं, या अपने मनमाफिक अफसरों से अपनी मर्जी के हिसाब से संवैधानिक संस्थाएं चलाने, सत्ता में आई राजनीतिक पार्टियों द्वारा उन्हें ऐसे पद दे दिए जाते हंै। ऐसा होने से न केवल जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल होता है,इन ओहदों और सुविधाओं के बदले ऐसे लोगों का इस्तेमाल सत्ता के स्वार्थ और हित साधने के लिए भी किए जाने की गुंजाईश भी रहती है। इस तरह संवैधानिक संस्थाएं वह काम भी नहीं कर पातीं, जिनके लिए यह बनाई जाती हैं।
यही नहीं इस तरह संवैधानिक संस्थाओं में ओहदा पा जाने वालों और इन संस्थाओं के फर्ज के बीच हितों के टकराव की भी पूरी गुंजाईश रहती है। मिसालन किसी एक राज्य में लंबी सेवा बजा चुके अफसर को रिटायर हो जाने के बाद जब कोई संवैधानिक पद मिल जाता है, तो उससे जिनके खिलाफ सुनवाई की उम्मीद की जाती है उनमें ज्यादातर लोग ऐसे होते हंै, जिनके साथ या जिनके हित में, उसने नौकरी में रहते हुए काम किया है। अब ऐसी व्यवस्था के अहसान तले दबा ऐसा पूर्व अफसर किसी संवैधानिक संस्था में जगह पाकर उसके मकसद कैसे पूरे कर पाएगा? बात सिर्फ किसी अफसर की व्यक्तिगत निष्ठा की ही नहीं रह जाती। हो सकता है ऐसे ओहदे पर बिठाए पूर्व अफसर बहुत काबिल हों, उनमें काम करने का जज़्बा भी हो, लेकिन नौकरी के दिनों के उनके अनुभव उनके हाथ रोके, इसकी गुंजाईश से इंकार नहीं किया जा सकता। हमने इस जगह कई बार संवैधानिक पदों को इस तरह रिटायर अफसरों और मनपसंद नेताओं में बांटने का विरोध किया है।
हमारा कहना है कि अगर सरकार को लगता है कि कोई अफसर, या उससे करीब से जुड़ा कोई नेता किस संवैधानिक पद के लिए बहुत अच्छा है, तो उसे उसके राज्य के अलावा दूसरे राज्य में ओहदा दिया जाए। हालांकि सारे संवैधानिक ओहदों के साथ ऐसा इंसाफ कर पाना तब तक मुमकिन नहीं होगा, जब तक कि उन पर रिटायर अफसरों या करीबी नेताओं को ही बैठाने की नीयत रखी जाएगी। राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष पद की तरफ लौटें तो पेशेवर काबीलियत के हिसाब से भी इस पद की कोई जरूरत होती है। हम मानते हंै कि अगर सरकार महिलाओं के अधिकारों को लेकर इतनी संजीदा है, कि उसे देश में एक राष्ट्रीय महिला आयोग रखना है, तो उसकी कप्तानी वह किसी ऐसी महिला को दे, जो अपनी काबीलियत से इस ओहदे के लिए इज्जत पैदा कर सके। मेनका गांधी ने इस इंटरव्यू में जिक्र किया है कि कैसे सरकारी महकमे के एक आला अफसर ने, महिला आयोग के बुलावे पर आना भी जरूरी नहीं समझा। जाहिर था सरकार के रवैये से उसे यहां संदेश मिला हुआ है कि महिला आयोग के दांत दिखाने भर के हैं, इनमें काटने लायक पैनापन नहीं है। जब तक संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सरकार का ऐसा रवैया कायम रहेगा, वह असरदार होने की बजाय बोगस और दिखावे भर की बनी रहेगी, तथा जनता, और उसके संवैधानिक अधिकारों के बीच रोड़ा बनी रहेगी।
हमारा मानना है कि इस बारे में किसी सामाजिक कार्यकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की पहल करनी चाहिए कि तमाम आयोगों, समितियों, संवैधानिक संस्थाओं के ओहदों पर नियुक्तियां करते समय , इनमें ओहदे पाने वालों के सियासी रुझान, और वफादारी पर भी इस तरह गौर किया जाए कि हितों के टकराव की नौबत ना आए, पारदर्शिता बनी रहे और उस ओहदे से जुड़ी पेशेवर काबीलियत से समझौता ना किया जाए। इतना तय करके ही सरकार राष्ट्रीय महिला आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं के लिए अपनी संजीदगी दिखा सकती है।
तकलीफ की जिंदगी ढोने के बजाय मरने का हक बेहतर
17 जुलाई 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और देशभर के लोगों से राय जाननी चाही है कि लोग अपनी मर्जी से मरना चाहें, तो उन्हें इसकी कानूनी इजाजत मिलनी चाहिए, या नहीं। आज भारत में अंग्रेजों के बनाए हुए कानून के तहत आत्महत्या की कोशिश एक सजा वाला जुर्म है। खुदकुशी में कोई कामयाब हो जाते हैं, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है, लेकिन कोशिश के बाद कोई बच जाए, जो उसके लिए सजा का इंतजाम है।
यह भारत में संस्कृति, धर्म, सामाजिक मूल्यों, और कानून से जुड़ी हुई बात है कि लोगों को अपनी जान देने का हक रहना चाहिए या नहीं? इससे इंसानी जिंदगी का यह बुनियादी सवाल भी जुड़ा हुआ है कि जिंदगी पर हक किसका है? जिसका बदन है, जान पर उसी का हक है, या परिवार का हक है, या समाज और सरकार का हक है? और यह बहस सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं है, दुनिया के कई देशों की है। ऐसे में स्विटजरलैंड में जब डॉक्टरी मदद से आत्महत्या का हक दिया गया, तो दुनिया के कई देशों से लोग वहां मरने के लिए पहुंचते हैं। लेकिन बात सिर्फ यूरोप के इस विकसित और संपन्न देश में निजी आजादी की सोच के एक अलग दर्जे की नहीं है, खुद भारत के भीतर जैन समाज में कई बार संथारा लेने की खबर आती है जो कि एक धार्मिक और सामाजिक परंपरा है। इसके तहत जब कोई प्राण छोड़ देने की सोचते हैं, तो वे खाना-पीना बंद कर देते हैं, और परिवार-समाज उनकी मौत तक उनका साथ देते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट जो राय चाह रहा है, उसके तहत यह बात भी सामने आ रही है कि गांधी ने भी कुछ हालात में लोगों के जान देने के हक की वकालत की थी।
चूंकि आज देश में इस मुद्दे पर रायशुमारी हो रही है, इसलिए हम यहां पर अपनी बात भी कहना जरूरी समझते हैं। लोगों को कुछ खास स्थितियों में अपनी जान देने का हक होना चाहिए। जब लोग बिल्कुल लाइलाज हो जाएं, और उनकी बची हुई धड़कनों में दर्द के सिवाय उनके पास कुछ न बचे, तो उनको अपनी जान देने का फैसला लेने की छूट रहनी चाहिए। इसके लिए सरकार और अदालत मिलकर एक ऐसा पुख्ता ढांचा बनाएं, जो कि यह जांच करे कि जमीन-जायदाद की वजह से, या किसी और जुर्म की नीयत से तो किसी को मरने के लिए प्रेरित नहीं किया जा रहा है? ऐसे इंतजाम के बाद लोगों को छूट मिलनी चाहिए। लंबे समय से यह परंपरा पूरी दुनिया में चली आ रही है कि जानवरों को भी इलाज से परे हो जाने पर बिना दर्द की मौत देने के लिए जहर की इंजेक्शन लगाए जाते हैं। ऐसे में इंसानों को बहुत खराब हालत होने पर जबर्दस्ती जिंदा रखना ठीक नहीं है। यह न तो ऐसे इंसानों के बदन के लिए ठीक है, और न ही उनके परिवार के लिए। जहां पर लोग ऐसी नौबत आ जाने पर खुद होकर जान देने की सोचें, तो उनकी बची हुई जिंदगी में लगातार तकलीफ और अपमान देने के बजाय, उन्हें जान देने का हक देना चाहिए।
भारत बहुत सारे मामलों में अंग्रेजों के वक्त के कानून को ढोते चल रहा है। खुद अंग्रेजों ने अपने देश में जिन कानूनों को खत्म कर दिया है, उनको भी भारत गोरों की खड़ाऊ की तरह माथे पर चढ़ाकर इक्कीसवीं सदी में जी रहा है। समलैंगिकता इनमें से एक है, और भी ऐसे कई कानून हैं। भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता की घोषित जगह थी, और स्वैच्छिक मृत्यु भी भारतीय संस्कृति और भारत के धर्मों में हमेशा से रही है। इसलिए मौजूदा कानून को एक अंधे कानून की तरह ढोते चलना ठीक नहीं है। हम कुछ खास हालात में जान देने के हक को सही मानते हैं, और इसका बेजा इस्तेमाल न हो उसके लिए एक पुख्ता जांच-पड़ताल का इंतजाम किया जाना चाहिए।
चारों तरफ इतना बुरा हो रहा है कि अच्छे-बुरे की चर्चा जरूरी
16 जुलाई 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के भिलाई से एक दर्दनाक खबर आई है कि किस तरह कर्ज चुकाने के बजाय एक आदमी ने दोस्तों के साथ मिलकर, कर्ज देने वाले के परिवार को बंधक बनाने का नाटक किया, और किस तरह लूट की घटना पेश करते हुए कर्ज से बचने की कोशिश की। उसमें तो तमाम पढ़े-लिखे दोस्त गिरफ्तार हो ही गए, अभी खबर यह आई है कि इस कर्जदार की पत्नी ने आत्महत्या कर ली। इस तरह के कोई न कोई मामले छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों से रोज आ रहे हैं, और जुर्म के आंकड़ों को बढ़ाने के अलावा ये एक सामाजिक फिक्र भी खड़ी करते हैं। आपसी संबंधों में, मां-बाप, बेटा-बेटी के रिश्तों में, पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका में, बहुत पुराने दोस्तों में जिस तरह के जुर्म सामने आ रहे हैं, उनसे नुकसान न सिर्फ जुर्म के शिकार परिवारों का होता है, बल्कि मुजरिम का परिवार भी जेल और अदालत के बाहर रहते हुए भी सजा पाते रहता है। लेकिन बड़ा नुकसान इससे अलग है, सामाजिक और मानवीय संबंधों में भरोसा उठने से जितना अधिक नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती, और न ही जुर्म के आंकड़ों में भरोसा टूटने की गिनती लगाई जा सकती।
यह पूरा सिलसिला एक इंसान के दूसरे इंसान पर से भरोसा उठ जाने का है, कोई कर्ज चुकाने के बजाय कत्ल कर रहा है, कोई कर्ज की वसूली के लिए कत्ल कर रहा है, कहीं पर कोई नशे में बच्चों को मार रहा है, तो कहीं नशे में बच्चे मां-बाप का कत्ल कर रहे हैं, कहीं पर जादू-टोने के शक में परिवार के लोग ही दूसरे को मार रहे हैं। ऐसी तमाम वारदातें बताती हैं कि समाज में लोगों की सोच में कितनी और कैसी कमजोरी है। और यह कमजोरी सिर्फ पढ़ाई-लिखाई की कमी से उपजी हुई नहीं है। यह कमजोरी लोगों में एक तो वैज्ञानिक सोच की कमी से है, दूसरी यह उन मूल्यों की कमी से है, जिन्हें कि इंसानियत कहा जाता है। इसके अलावा कहीं पैसे कमाने की हड़बड़ी में लोगों में जुर्म की तरफ बढ़ जाने की लापरवाही है, तो कहीं पर धोखा देकर भी दूसरों से कमा लेने की आरामतलबी है।
समाज में लोगों की सोच बेहतर करना पुलिस का काम नहीं है, और न ही सरकार के बाकी हिस्से का। यह तो किसी भी देश-प्रदेश में, समाज में, लोगों में बेहतर सोच से ही हो सकता है, किसी लाठी या कानून से नहीं। भारत में लोग दूसरों के अधिकार और अपनी जिम्मेदारी की तरफ से पूरी तरह बेखबर रहते हैं, और सोच-समझकर अनजान रहते हैं। अगर लोग अपनी जिम्मेदारी को पहले सोचकर दूसरों के अधिकार की इज्जत करना सीखते, तो इनमें से कई किस्म के जुर्म कम हो जाते। लेकिन शायद लोगों को इंसानियत से अधिक भरोसा भारत में कानून की व्यवस्था के बेअसर होने पर है, इसलिए लोग जुर्म करके बच जाने की उम्मीद रखते हैं। एक और पहलू इस पूरे तस्वीर का यह है कि परिवार के भीतर जो लिहाज लोगों में रहता था, समाज का जो दबाव लोगों पर रहता था, वह भी बढ़ते हुए जुर्म के साथ-साथ हल्का होने लगता है। अब लोग एक-दूसरे के जुर्म की मिसाल से बेधड़क होते चलते हैं, और मानो एक मुजरिम दूसरे मुजरिम को राह दिखाते चलता है। अच्छी राह दिखाना भी मुश्किल होता है और अच्छी राह पर चलना सीखना भी तकलीफदेह होता है। लेकिन हिंसा और जुर्म बहुत आसान होते हैं, हिसाब चुकता करने के लिए भी, अपनी दिक्कतें दूर करने के लिए भी, और अपने लिए अधिक आराम या सुख जुटाने के लिए भी। इसके साथ-साथ कुछ लोगों के बीच एक ऐसा घमंड होता है, जो उनको दूसरों के मुकाबले अपने बेहतर होने की खुशफहमी में रखता है। ऐसी तमाम बातें अधिकतर अपराधों के पीछे हैं, और समाज को अपने भीतर से ही लोगों को अधिक जागरूक करने, और जिम्मेदार बनाने का काम करना पड़ेगा। हम एक बहुत ही नीरस मुद्दे पर यह चर्चा छेड़ बैठे हैं, लेकिन हमारे हिसाब से यह मुद्दा कम महत्व का नहीं है, और इस बारे में लोगों को, खासकर जिम्मेदार और अच्छे-भले लोगों को अपने बच्चों के साथ चर्चा जरूर करनी चाहिए, और दोस्तों से भी कहना चाहिए कि वे भी अपने बच्चों से अच्छे और बुरे के फर्क की बात जरूर करें। आज का मीडिया खबरों को सामने रख सकता है, लेकिन किसी अच्छी राह को दिखाने का काम उसके लिए कुछ मुश्किल भी होता है। ऐसे में लोगों को अपना ख्याल खुद भी करना होगा।
अच्छे अफसरों से बुरे सुलूक का सिलसिला खत्म हो
15 जुलाई 2014
संपादकीय
बरसों से केंद्र और हरियाणा दोनों जगहों पर कांगे्रस की सरकार के तहत उनकी आंखों की किरकिरी बने हुए हरियाणा के आईएएस अफसर अशोक खेमका को आखिरकार हरियाणा से आजादी मिली और केंद्र सरकार ने 2010 से चली आ रही उनकी अर्जी को मानकर उनको केंद्र सरकार में जगह दी है। अशोक खेमका का मामला भारत के लोकतंत्र में सरकारी कामकाज की एक बहुत अच्छी और बहुत बुरी दोनों किस्म की मिसाल है। एक बहुत ताकतवर राजनीतिक परिवार के खिलाफ एक अफसर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए खड़ा हो सकता है, और किस हद तक प्रताडि़त हो सकता है, इस पर अशोक खेमका खबरों में आए। दूसरी तरफ सत्ता को हांक रही एक राजनीतिक पार्टी अपने राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए सरकारी बांहों को किस हद तक मरोड़ सकती है, इसकी भी मिसाल हरियाणा की कांगे्रस सरकार ने पेश की थी।
आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के आसमान को चीरते हुए जिस सरदार पटेल की प्रतिमा को खड़ा करने जा रहे हैं, उन्हीं का नाम भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के पीछे आता है। गुजरात की प्रशासनिक अकादमी वल्लभ भाई पटेल के नाम पर ही रखी गई है, और राष्ट्रीय पुलिस अकादमी भी उन्हीं के नाम पर है। सरदार पटेल जिस कड़ाई के हिमायती थे, वैसी कड़ाई और ईमानदारी को शासन-प्रशासन में लागू करना ही उनका असली सम्मान होगा, प्रतिमा खड़ी होती है तो हो, और नहीं होती है, तो न हो। प्रतिमा से अधिक जरूरी है मिसालें खड़ी होना। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में जब पूरे देश के लिए केंद्र और राज्य के संबंधों को देखते हुए राष्ट्रीय सेवाओं का ढांचा बनाया गया, तो उसमें अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों को यह सुरक्षा भी दी गई थी, कि वे राज्यों और केंद्र के बीच, एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच, सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों के बीच, कई तरह की जगहों पर भेजे जा सकें, और खुद होकर भी इसके लिए अर्जी दे सकें।
अशोक खेमका पर हरियाणा सरकार का जो रूख रहा, या दूसरे कई अफसरों के मामलों में दूसरे राज्यों का जो रूख रहा, उसको देखते हुए यह लगता है कि अफसरों के पास टकराव की नौबत में राज्य से केंद्र जाने, या केंद्र से राज्य जाने के विकल्प कुछ आसान बनाने चाहिए। अशोक खेमका 2010 से केंद्र सरकार में आना चाहते थे, या अधिक सही यह कहना होगा कि वे हरियाणा से निकलना चाहते थे। वैसे में उन्हें बहुत ही विपरीत और बागी माहौल में चार बरस तक बनाए रखना, और प्रताडि़त करना ठीक नहीं था। अशोक खेमका की बीस बरस की नौकरी में जिस तरह करीब पचास बार तबादला हुआ है वह किसी भी अच्छे अफसर का हौसला तोड़ देने वाली बात है। केंद्र और राज्यों को मिलकर यह देखना चाहिए कि ऐसी नौबत कैसे घटे। और हम यह बात सिर्फ अखिल भारतीय सेवाओं के बारे में नहीं कह रहे, देश की किसी प्रादेशिक सरकार में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी एक मामले के खबरों में आने की वजह से इस पर चर्चा का मौका आया है, लेकिन इतने चर्चित न होने पर भी किसी अफसर के साथ ऐसा न हो यह देखना चाहिए।
सवाल एक अखबारनवीस के आतंकी से मुलाकात का नहीं है
14 जुलाई 14
संपादकीय
भारत में एक वक्त मीडिया के बड़े ओहदों पर रहे, और फिर बाद में लगातार बाबा रामदेव और हिन्दू संगठनों के करीब और उनके पसंदीदा रहे वेदप्रताप वैदिक पाकिस्तान जाकर हाफिज सईद से मिल आए, तो बहुत से सवाल उठने लगे। सवाल इसलिए नहीं उठे कि वे पत्रकार हैं, और मुंबई पर आतंकी हमले के आरोपी से मिलकर आए। मुजरिमों से मीडिया के लोग आए दिन बात करते हैं, कहीं किसी टीवी चैनल पर छोटा शकील से बातचीत सुनाई जाती है, तो बहुत से अखबारों में नक्सलियों से बातचीत होती है। सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि वेदप्रताप वैदिक जिन बाबा रामदेव के करीब हैं, उनके खेमे से तब सवाल उठे थे जब कश्मीर का एक आंदोलनकारी अपने पाकिस्तान दौरे के दौरान हाफिज सईद के साथ एक सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच पर दिखा था, और उसकी मौजूदगी को लेकर उसके खिलाफ भारत में देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग उठी थी। हिन्दू संगठनों ने इस तस्वीर को लेकर खासा बवाल मचाया था, और आज बाबा रामदेव के एक करीबी के नाते वेदप्रताप वैदिक को जवाब देना पड़ रहा है।
दरअसल पत्रकारिता लंबे समय से एक ऐसा पेशा बना हुआ था, जिसके साथ किसी दूसरे किस्म के पेशे या कारोबार, आंदोलन या सामाजिक काम का घालमेल ठीक नहीं माना जाता था। पत्रकारिता को बाकी पेशों से अलग एक अलग इज्जत इसीलिए मिलती थी कि उसके लोग दूसरा काम नहीं करते थे। इसीलिए उनको लोकतंत्र में एक चौथे स्तंभ का अघोषित दर्जा भी मिला हुआ था, और देश में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन चलता था, जिसकी वजह से पत्रकार और गैरपत्रकार कर्मचारियों के लिए बार-बार वेतन आयोग भी बनाए गए। बाकी पेशों के लोगों को ऐसा कोई दर्जा नहीं मिला था, और न ही बाकी किसी कारोबार को ऐसी इज्जत मिली थी। लेकिन जहां कोई खास दर्जा मिलता है, खास इज्जत मिलती है, खास हक मिलते हैं, वहीं पर खास जिम्मेदारी भी बनती है। मीडिया के साथ एक जिम्मेदारी यह भी जुड़ी हुई है कि इसके लोग सक्रिय राजनीति में हिस्सा न लें, किसी ऐसे आंदोलन में हिस्सा न बनें, जिससे कि उनकी अखबारनवीसी पर असर पड़े, या आंच आए।
वेदप्रताप वैदिक जैसे बहुत से ऐसे लोग हैं, जो एक पैर को मीडिया की नाव पर रखकर चलते हैं, और दूसरा पैर किसी वैचारिक आंदोलन, या सामाजिक आंदोलन पर रखे रहते हैं। बहुत से अखबारनवीस ऐसे भी हुए जो कि राजनीतिक दल की तरफ से राज्यसभा में पहुंचे, उस पार्टी के अखबार के मीडियाकर्मी हुए, और फिर भी पत्रकार होने का दावा करते रहे। ऐसे लोग कभी चुनाव लड़ते हैं, कभी किसी पार्टी के प्रवक्ता बन जाते हैं, कभी किसी कारपोरेट घराने के जनसंपर्क अफसर बन जाते हैं, और फिर भी पत्रकार होने का दावा करते हैं। ऐसे ही लोग सवालों से घिरते हैं, और वेदप्रताप वैदिक बाबा रामदेव के आंदोलन का हिस्सा बने हुए आज ऐसे सवालों से बच नहीं सकते।
लेकिन फिर भी हम ऐसे सवालों के हिमायती नहीं हैं। हमारा मानना है कि बातचीत दुश्मनों के बीच भी होती रहनी चाहिए, और कल कश्मीर के किसी आंदोलनकारी ने हाफिज सईद के साथ बात की थी, तो वह भी गलत नहीं था, और आज अगर रामदेव के एक साथी ने बात की है, तो वह भी ठीक है। ठीक अगर कुछ नहीं है, तो किसी पत्रकार का गैरपत्रकार-मकसद के आंदोलन से गहरे तक जुडऩा है, उसका झंडा लेकर चलना है, और फिर भी पत्रकार रहने का दावा करना है। लोगों को पूरी ईमानदारी के साथ एक ही काम करना चाहिए, या कम से कम एक से अधिक ऐसे काम करना चाहिए, जिनका कि आपस में कोई टकराव न हो, जिनको लेकर जनता के मन में किसी तरह की गलतफहमी न हो। भारत में बहुत सी विचारधाराओं और राजनीतिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े हुए लोग पत्रकार रहने का दावा करते हैं, उनको अगर किसी आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी करनी है, तो उन्हें ईमानदारी से खालिस अखबारनवीसी से अलग हो जाना चाहिए।
लोग मौसेरा भाई सोच रहे थे लेकिन यह चचेरा भाई निकला
13 जुलाई 2014
संपादकीय
बिहार के आक्रामक भाजपा सांसद गिरिराज सिंह पिछले कुछ महीनों से सिर्फ बुरी वजहों से खबरों में हैं। पहले उन्होंने मोदी विरोधियों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी थी, जिसे कि पार्टी ने खारिज कर दिया था। बाद में उनके घर से एक चोरी के बाद चोरों से एक-सवा करोड़ की नगदी बरामद हुई, तो उन्होंने साफ-साफ जवाब देने के बजाय इसे अपने कजन (कई तरह के रिश्ते के भाई-बहन) की रकम बताया, और रकम की इस बरामदगी को राजनीतिक साजिश कहा। अब कल जब पुलिस मेें उनके एक चचेरे भाई ने आकर रकम को अपना कहा, तो सवाल यह बच गया कि इसमें गिरिराज सिंह के खिलाफ राजनीतिक साजिश क्या थी?
दरअसल राजनीति में जो लोग हैं, वे जनता को तब तक बेवकूफ समझते हैं, और बेवकूफ बनाते हैं, जब तक कि उन्हें खुद खासी बड़ी अदालत से सजा न हो जाए। और अगर वे परले दर्जे के भ्रष्ट या दुष्ट हैं, तो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ते हुए भी अपने को बेकसूर बताते हैं, और कानून की अदालत से सजा मिलने पर अपने को जनता की अदालत में बेगुनाह साबित करने की बात कहते हैं, और जनता के बीच बदनामी के सुबूत सामने आ जाएं, तो फिर वे कानून की अदालत में अपने को बेगुनाह साबित करने की बात कहते हैं। इन दो अदालतों के बीच भ्रष्ट लोग अपनी पूरी जिंदगी की राजनीति कर लेते हैं, और सत्ता पर काबिज भी रह जाते हैं।
सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का तकाजा अब किताबों के बीच दफन हो चुका है, और अब पेशेवर मुजरिम की तरह लोग जितने लंबे समय तक बचते चल सकें, उतने समय तक बचते चलते हैं। गिरिराज सिंह के मामले को यहां मिसाल की तरह इस्तेमाल करें, तो चोरी के दिन न वे अपने कजन का नाम बता सके, और एक साजिश की तोहमत लगाकर उन्होंने चुप्पी साध ली। चौथे दिन जाकर एक कजन बरामद हुआ, और इतनी लंबी नगदी का क्या काम था, इसकी जानकारी बरामद होने में पुलिस और इंकम टैक्स को और पता नहीं कितने दिन लगेंगे।
हिन्दुस्तान में सार्वजनिक नैतिकता इस कदर अनचाही बात हो गई है, कि आज अगर मदर टेरेसा जिंदा होतीं, तो अनचाहे बच्चे की तरह लोग नैतिकता को ले जाकर उनके आश्रम के दरवाजे के झूले पर छोड़कर आ जाते। अब सरकार और पार्टी में, दूसरे सार्वजनिक और संवैधानिक ओहदों पर लोगों के आने और जाने को लेकर किसी तरह की कोई हिचक और झिझक नहीं रह गई है। बुरे से बुरे आरोपों से घिरे हुए लोग कुर्सियों पर आते और जाते रहते हैं, और भारतीय लोकतंत्र को अब इस नई सार्वजनिक संस्कृति के साथ जीने की आदत डालनी पड़ी है।
दरअसल जनता के सामने चुनाव के नाम पर जो पसंद परोसी जाती है, उसमें नेताओं के लिए तो कौन बनेगा करोड़पति जैसे विकल्प रहते हैं, जनता के लिए महज ये विकल्प बचते हैं कि उनको किसके हाथों लुटना सुहाएगा। चुनाव में मानो अमिताभ बच्चन चार नाम पेश करते हैं, कि इनमें से किसी एक बुरे को छांट लें, या किसी एक बुरी पार्टी को छांट लें। लोगों को चुनावों के वक्त का यह नारा याद होगा कि कभी किसी पार्टी को जरूरी बताते हुए उसके उम्मीदवार को मजबूरी बताकर भी वोट मांगे जाते हैं, और कभी किसी उम्मीदवार को जरूरी बताते हुए पार्टी को मजबूरी मानकर वोट देने को कहा जाता है।
इन मुद्दों पर हम इतनी बार लिखते हैं, कि लिखते-लिखते खुद ही थक जाते हैं, लेकिन जनता के बीच सवाल उठने अब बंद हो चुके हैं। गिरिराज सिंह का पूरा मामला कुछ देर के लिए खबरों में आया, और खत्म हो गया। बाकी पार्टियों के नेताओं के बारे में भी ऐसी ही खबरें आती-जाती रहती हैं, और जनता यह सोचते रह जाती है कि कौन से कजन ममेरे भाई हैं, और कौन से कजन (चोर-चोर) मौसेरे भाई हैं। लेकिन जनता की सोच अब उसके दिल-दिमाग में दफन है, क्योंकि न उसके पास बोलने का हौसला है, और न सचमुच में बड़े मुजरिमों के खिलाफ मीडिया में कोई बड़ी जगह बाकी है।
लोकतंत्र के पतन को, लोकतंत्र का विकास मानने की खुशफहमी
12 जुलाई 2014
संपादकीय
भारत के उत्तरप्रदेश को देखें, तो मुजफ्फरनगर के जिन इलाकों में दंगों में दर्जनों लोग मारे गए, और दसियों हजार बेघर हुए, वहां तब से लेकर अब तक लगातार जाति और धर्म की राजनीति, राजनीतिक दलों और नेताओं के हाथों खेली जा रही है। जहां पर सांसद और विधायक दंगा भड़काते पकड़ाते हैं, वहां पर अमन-चैन की कोशिश के बजाय मंदिर-मस्जिद पर लगे लाउडस्पीकरों को हटाने को लेकर एक ऐसा तनाव खड़ा किया जाता है कि मानो इनको हटाए बिना देश का विकास रूक जा रहा है। हकीकत यह है कि पूरे देश में धर्मस्थलों के लाउडस्पीकर लोगों का जीना हराम करते हैं, सुप्रीम कोर्ट के हुक्म के बाद भी इन पर कोई काबू नहीं किया जाता, सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश के बाद भी सार्वजनिक जगहों पर और सड़क किनारे धर्मस्थलों का अवैध निर्माण नहीं रूक रहा है। ऐसे में यह बात लगती है कि क्या चुनावी राजनीति में अधिक नंबर पाने के लिए लोग सांप्रदायिकता और जातिवाद को बढ़ाते हुए ही भारत को 22वीं सदी में ले जाएंगे?
विज्ञान और टेक्नालॉजी में उपलब्धियां, आर्थिक विकास, शहरीकरण, और शिक्षा का विस्तार, इन सबसे भी हिन्दुस्तानी इंसानों के भीतर की वह हिंसा कम नहीं हो रही, जो कि दूसरे धर्म, दूसरी जाति के लोगों का गला काटे बिना शांत नहीं बैठती। और आज दिक्कत यह है कि भारत की बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां ऐसी हिंसा से परहेज नहीं कर रही हैं। ऐसे में यह लगता है कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है, या गड्ढे में जा रहा है? इस देश में लगातार कामयाबी से होने वाले चुनावी मतदान को लोग लोकतंत्र की कामयाबी मान लेते हैं। लोकतंत्र एक अलग चीज है, और मतदान की कामयाबी उसका एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। लोकतंत्र का बाकी तमाम हिस्सा तो दो चुनावों के बीच देश में लोगों के हक और लोगों की जिम्मेदारी के बीच के एक न्यायसंगत संतुलन का होना चाहिए, लेकिन वह कहीं नजर नहीं आता है। दुनिया में लोकतांत्रिक तरीके से होने वाले चुनाव और मतदान को लेकर भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र करार दिया जाता है। लेकिन लोकतंत्र की जो बुनियादी सोच है, उसका न हिन्दुस्तानी चुनावों में कोई असर होता, और न फिर बाद में पांच बरस की सरकार के दौरान यह होता है। भारतीय चुनाव जिस तरह दो नंबर के पैसों का कारोबार हो गए हैं, और उसके बाद जिस तरह से वोट खरीदकर लोग राज्यसभा और विधान परिषदों में पहुंचते हैं, जगह-जगह पूंजीनिवेश से मंत्री बनते हैं, और फिर अपनी लागत की वसूली के लिए पांच बरस जुट जाते हैं, वह देखने लायक है। और इस वसूली के जुर्म में वे कभी पकड़ाते भी हैं, तो अगले कई चुनाव वे जमानत पर रहते हुए निपटा लेते हैं, सत्ता पर आ जाते हैं, और आखिरी सजा के पहले जिंदगी के आखिरी दिन भी भोग चुके रहते हैं।
हिन्दुस्तान में तस्वीर इतना निराश करती है, कि कई बार यह हैरानी होती है कि ऐसे तथाकथित लोकतांत्रिक चुनावों के खिलाफ कोई मजबूत जनआंदोलन शुरू क्यों नहीं होता? देश के बहुत बड़े हिस्से में लोकतंत्र के नाम पर चल रहे पाखंड के खिलाफ माओवादी सोच के लोगों ने बरसों से हिंसा का सैलाब फैलाया हुआ है, लेकिन लोकतंत्र की मरम्मत का काम लोकतंत्र को खारिज करने से नहीं हो सकता। रास्ता लोकतंत्र के भीतर ही निकालना होगा, बाहर से इसका कोई इलाज आयात नहीं हो सकता। और आज दिक्कत यह है कि चुनावों को जीतने के लिए जिन नारों को खड़ा किया जाता है, उनके तले किसी ईमानदार सोच की कोई जमीन भी नहीं होती। आम जनता की दिक्कत यह है कि भारत की चुनाव प्रणाली के तहत उसे किसी पार्टी को चुनने की आजादी नहीं है, उसे स्थानीय उम्मीदवारों के रास्ते ही किसी पार्टी को चुनना होता है। ऐसे में वह पार्टी को चुनें, या उम्मीदवार को, इसको लेकर एक धुंध छाई रहती है, और आखिर तक यह भी समझ नहीं आता कि मतदाता ने किसी पार्टी के पक्ष में वोट दिया है, या किसी उम्मीदवार के पक्ष में, या फिर किसी पार्टी के खिलाफ वोट दिया है, या किसी उम्मीदवार के खिलाफ? यह भी समझ नहीं आता कि चुनाव में कितने वोटों की खरीद-बिक्री हुई है?
ऐसे माहौल में चुनावों से देश और प्रदेशों में सरकारें आती-जाती हैं, और इसे ही लोकतंत्र का विकास मान लिया गया है। हमारा यह मानना है कि भारत में चुनाव जिस तरह से हो रहे हैं, उनसे लोकतंत्र का पतन ही हो रहा है।
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