दीवारों पर लिक्खा है, 30 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने महिलाओं के दो तबकों को दी शानदार मजबूती...

30 सितंबर  2022
   

किसी भी विकसित लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट को आम लोग एक अदालत मान लेते हैं। दरअसल यह बहुत से जजों की अलग-अलग, और मिलीजुली कई किस्म की अदालतें का एक समूह होता है जिसका फैसला वैसा ही हो सकता है जैसा कि उसे लिखने वाले जज हों। किसी एक वक्त में एक मामला एक जज से एक किस्म का फैसला पा सकता है, और अगर वह किसी दूसरे जज के सामने पड़ा होता, तो हो सकता है कि फैसला उसका ठीक उल्टा भी होता। और हर मामले में ऐसी पुनर्विचार याचिका की गुंजाइश नहीं होती कि एक जज के फैसले से असहमति के बाद दूसरे अलग जज उस मामले को सुने ही सुनें। फिर यह भी रहता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सोच क्या है, वे खुद अपनी निजी विचारधारा के चलते किन मामलों को सुनना चाहते हैं, या किन मामलों को किन जजों की बेंच में भेजना चाहते हैं। ऐसे कई मुद्दे रहते हैं जिनकी वजह से देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले अलग-अलग किस्म के आते हैं, फिर भी हिन्दुस्तान इस मायने में अमरीका जैसे देश से बिल्कुल अलग है जहां पर जजों की निजी विचारधारा, उनकी पसंद और नापसंद सार्वजनिक रूप से अच्छी तरह दर्ज होती है, और फैसला आने के पहले ही लोग यह विश्लेषण कर लेते हैं कि जजों के कितने बहुमत से कैसा फैसला आएगा। वहां के जजों के मुकाबले हिन्दुस्तानी जजों के पूर्वाग्रहों की पहचान उतनी मजबूत नहीं रहती है, और यहां पर फैसले कई बार चौंकाने वाले भी रहते हैं। यह एक अलग बात है कि भारत में भी अब बहुत से जजों को लेकर पहले से यह शिनाख्त बन जाती है कि वे किस विचारधारा के हैं, और उनसे किसके पक्ष में फैसले की उम्मीद की जानी चाहिए।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने अभी एक शानदार फैसला दिया है जिसमें भारत की महिलाओं के हक एक बार फिर से, कुछ अधिक दूर तक परिभाषित किए गए हैं। जस्टिस डी.वाई.चन्द्रचूड़ की अगुवाई में जस्टिस ए.एस. बोपन्ना, और जस्टिस जे.बी.पारदीवाला ने अभी गर्भपात के अधिकार पर फैसला देते हुए महिलाओं के गर्भवती होने को उनके शादीशुदा होने से अलग कर दिया है, और यह साफ मान लिया है कि अविवाहित महिला भी सेक्स-संबंधों का उतना ही बुनियादी अधिकार रखती है जितना कि एक शादीशुदा महिला, और इस तरह से एक अविवाहित महिला भी गर्भपात की बराबरी की हकदार है, और वह उन्हीं पैमानों की हकदार है जो कि एक शादीशुदा महिला के गर्भपात के मामले में लागू होते हैं। यह एक संयोग ही रहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सुरक्षित गर्भपात दिवस के दिन आया। एक दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने इस मामले पर फैसला देते हुए यह माना है कि शादीशुदा जिंदगी में भी एक महिला पति की सेक्सहिंसा का शिकार हो सकती है, और अगर उसकी सहमति के बिना, उसकी मर्जी के खिलाफ अगर ऐसा सेक्स हुआ है, तो इसके बाद के गर्भपात का हक उसे है। अदालत ने यह भी साफ किया है कि महिला को ऐसे गर्भपात के लिए सेक्स उसकी मर्जी के खिलाफ हुआ होने को साबित करने की जरूरत नहीं होगी। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि भारत सरकार ने संसद और सुप्रीम कोर्ट में अपना यह पक्ष रखा है कि वह शादीशुदा जिंदगी के भीतर मर्द द्वारा जबर्दस्ती किए गए सेक्स को भी बलात्कार मानने के खिलाफ है। अब सुप्रीम कोर्ट ने आज गर्भपात के इस मामले में इस स्थापित कानून के खिलाफ फैसला दिया है जो कि पत्नी से जबर्दस्ती सेक्स को भी रेप नहीं मानता। सुप्रीम कोर्ट ने कल के इस फैसले में मैरिटल रेप पर तल्ख टिप्पणियां की हैं, और कहा है कि सेक्सहिंसा के लिए यह मान लेना लापरवाही होगी कि केवल अजनबी ऐसा करते हैं, परिवारों के भीतर महिलाएं लंबे समय से ऐसी हिंसा झेलती हैं, और अगर कानून इसे अनदेखा करेगा तो यह रेप की शक्ल भी ले लेता है। अदालत ने यह साफ किया कि चाहे मौजूदा कानून के तहत मैरिटल रेप अपराध नहीं है, लेकिन गर्भपात कानून के तहत पत्नी के साथ जबरिया संबंध बनाना रेप माना जाएगा, और ऐसे रेप से होने वाली संतान को जन्म देना और पालना महिला को सजा देने सरीखा होगा।

एक तरफ जब दुनिया का सबसे विकसित और संपन्न देश अमरीका आज गर्भपात के मुद्दे पर दो फांक हो चुका है। वहां के दो प्रमुख राजनीतिक दल तो इस बंट ही गए हैं, इन दोनों दलों के परंपरागत समर्थक भी इस पर बुरी तरह बंट गए हैं, और अब अमरीका के अधिकतर राज्य इसे लेकर अपने अलग कानून बना रहे हैं क्योंकि वहां के सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं से गर्भपात के फैसले का अधिकार छीन लिया है। वहां के सुप्रीम कोर्ट जजों के बारे में पहले से यह आशंका चली आ रही थी कि उनमें पिछले दकियानूसी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के मनोनीत किए गए जजों की बहुतायत है, और वे गर्भपात के खिलाफ फैसला देंगे, और वैसा ही हुआ। दिलचस्प बात यह है कि अमरीका में गर्भपात के खिलाफ वही सोच काम करती है जो सोच चर्च से निकली है। धर्म को मानने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं से इस अधिकार को छीन लेने का हिमायती रहा है। दूसरी तरफ भारत किसी भी मायने में अमरीका के मुकाबले कम धर्मालु देश नहीं है, और यहां के कई धर्मों में तो किसी जीव-जंतु को भी नुकसान पहुंचाने के खिलाफ नसीहतें हैं। लेकिन गर्भपात के मामले में हिन्दुस्तान एकदम से उदारवादी हो जाता है, क्योंकि अनचाही लड़कियों के बीच लडक़ों की चाहत पूरी करने का यही एक जरिया रहता है। खैर, अभी हम उस मुद्दे पर जाना नहीं चाहते क्योंकि आज मामला महिला की निजी पसंद का है, उसके अपने फैसले का है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अच्छा फैसला दिया है जिसमें शादीशुदा और गैरशादीशुदा महिलाओं के सेक्स, मां बनने, या गर्भपात के फैसलों को बराबर माना है। दूसरी बात यह कि शादीशुदा जिंदगी में पति के हाथों बलात्कार की शिकार होने वाली महिला को भी यह हक दिया है कि वह चाहे तो गर्भपात करवा सकती है। इस फैसले से अमरीकी सुप्रीम कोर्ट जैसी अदालतों को भी कुछ सीखना चाहिए। फिलहाल भारतीय महिला का एक और अधिकार कम से कम कानूनी रूप से मजबूत स्थापित हुआ है, जो कि कम राहत की बात नहीं है। इस फैसले से यह भी साबित होता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से जैसे भी निजी पूर्वाग्रहों की आशंका देश को हो, उनके मातहत काम करने वाले जजों की बेंच उन पूर्वाग्रहों की फिक्र किए बिना अपने अलग सोच के फैसले दे सकती हैं।

(Daily Chhattisgarh)

सोशल मीडिया की वजह से पुरानी बातें अब हमेशा गूंजते रहने का खतरा है..

29 सितंबर  2022
    

पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन अभी गुजरा, तो बिना हो-हल्ले के चले गया। उनके प्रशंसकों में से कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी कही यह बात याद दिलाई कि उन्हें उम्मीद है कि इतिहास उनके साथ अधिक रहमदिल रहेगा। यह बात मनमोहन सिंह ने अपने कटु आलोचकों की बातों के जवाब में कही थीं। ऐसे आलोचकों का अधिकांश हिस्सा इस बात के लिए उनका सबसे बड़ा आलोचक रहता था कि वे कम बोलते थे, धीमा बोलते थे, साधारण जुबान बोलते थे, दावे नहीं करते थे, और सपने तो बिल्कुल ही नहीं दिखाते थे। इन बातों की वजह से उनकी खिल्ली उड़ाने वाले लोगों की कमी नहीं थी, और ऐसे लोग उन्हें मौनमोहन सिंह कहा करते थे। आज पता नहीं लोगों को वह काम और सिर्फ काम करने वाला, और तकरीबन मौन रहने वाला प्रधानमंत्री याद पड़ रहा है। शायद इसलिए भी ऐसा हो रहा है कि वे बोलते कम थे, लेकिन उनके वक्त डॉलर की कीमत 62 रूपये ही थी, जो कि आज 82 रूपये की करीब हो गई है। उनके वक्त पेट्रोल 71 रूपये था, और डीजल 55 रूपये, अब आज तो इनके सौ-सौ रूपये पार करने के बाद लोग इस बारे में सोचना भी बंद कर चुके हैं कि आज क्या रेट है। गैस का सिलेंडर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री के वक्त 410 रूपये का था, जो कि अब 11 सौ रूपये के पार है। देश की कमाई और नौकरियों के आंकड़े भी उस वक्त बहुत ऊपर थे, और आज मटियामेट हैं। लेकिन फिर भी इस देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को मलाल इस बात का है कि मनमोहन सिंह के वीडियो पर्याप्त संख्या में यूट्यूब पर नहीं हैं, और यही हिन्दुस्तानी वोटरों के एक तबके का सबसे बड़ा मलाल है।

लेकिन ऐसा मलाल उस वक्त और देखने लायक हो जाता है जब आज सोशल मीडिया पर मौजूद पुरानी तस्वीरें, पुराने ट्वीट, पुराने फेसबुक पोस्ट, पुराने बैनर-पोस्टर, और पुराने वीडियो देखने मिलते हैं। उस वक्त मनमोहन सिंह के खिलाफ सबसे अधिक बोलने वाले, उनकी सबसे अधिक खिल्ली उड़ाने वाले बहुत दमदार भाषण देने वाले लोगों के जो वीडियो आज सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं, वे यह भी याद दिलाते हैं कि लोगों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। जिस तरह के भाषण उस समय, 2014 के पहले तक प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उतर चुके नरेन्द्र मोदी ने दिए, वे आज कब्र फाडक़र उनका पीछा कर रहे हैं। उस वक्त स्मृति ईरानी ने 410 रूपये की गैस के खिलाफ सिलेंडर लेकर जिस तरह के प्रदर्शन किए थे, उसके पोस्टर आज उनका भी पीछा कर रहे हैं। लोगों को खासकर एक वीडियो बार-बार देखने में बड़ा मजा आ रहा है जिसमें 62 रूपये के डॉलर वाले वक्त के मनमोहन सिंह की खिल्ली उड़ाते हुए मोदी कहते दिखते हैं कि जिस देश का रूपया गिरता है, उस देश का प्रधानमंत्री गिरा हुआ रहता है। रूपये के गिरते हुए दाम को लेकर मोदी की कही हुई और भी कई बातें आज उनका पीछा कर रही हैं। और लोगों के मन में, सोशल मीडिया पर उनकी जुबान से बार-बार यह सवाल उठ रहा है कि जब रूपया एक डॉलर में 82 जितना गिर जाता है, तब प्रधानमंत्री कहां रहता है? क्या ऐसे रेट वाले रूपये वाला प्रधानमंत्री गिरा हुआ रहता है या उठा हुआ रहता है?

दरअसल चुनाव और राजनीति की गर्मी में अकेले मोदी ही नहीं, कुछ और नेता भी ओछी बातें कहते हैं, और इन्हीं बातों का इतिहास लोगों को औसत दर्जे का नेता, या बड़ा नेता बनाता है। और मोदी तो केन्द्र सरकार या अपनी पार्टी के केन्द्रीय संगठन में एक दिन भी काम किए बिना सीधे प्रधानमंत्री की दौड़ में पहुंचे हुए एक प्रादेशिक नेता थे, जिनका पेट्रोलियम और डॉलर से सीधे कोई वास्ता नहीं पड़ा था, इसलिए उनसे तो बोलने में कई तरह के गलत काम हुए, लेकिन श्रीश्री रविशंकर और रामदेव जैसे तथाकथित आध्यात्मिक लोग भी उस वक्त डॉलर और पेट्रोल के दाम तय कर रहे थे, और टीवी स्टूडियो में बैठकर नौजवान पीढ़ी को बरगला रहे थे कि उन्हें 70 रूपये लीटर का पेट्रोल अच्छा लगेगा या 35 रूपये लीटर का? यही दोनों डॉलर भी 35 रूपये में दिला रहे थे, और विदेशों से कालाधन लाकर हर हिन्दुस्तानी के खाते में 15-15 लाख रूपये भी डाल रहे थे, जैसा कि नरेन्द्र मोदी ने उस वक्त कहा था। लोगों की कही हुई कुतर्क की बातें दूर तक उनका पीछा करती हैं, और यूट्यब, इंटरनेट, सोशल मीडिया, और वॉट्सऐप की मेहरबानी से अब यह पीछा कभी खत्म ही नहीं होता है। यह अलग बात है कि अपने करोड़ों भक्त होने का दावा करने वाले ऐसे स्वघोषित आध्यात्मिक दुकानदार पूरी बेशर्मी से अब नये दावे करने में जुटे रहते हैं क्योंकि उनका इस बात पर अपार भरोसा है कि दुनिया में जब तक बेवकूफ जिंदा हैं, तब तक धूर्त भूखे नहीं मर सकते।

लेकिन राजनीति, आध्यात्म या सामाजिक जीवन के कुछ कामयाब और मशहूर लोग अगर सचमुच में महानता हासिल करना चाहते हैं, तो जिंदगी और चाल-चलन की बुनियादी ईमानदारी के अलावा उन्हें ऐसे झूठे दावे करने से भी बचना चाहिए। देश के प्रधानमंत्री के बड़े-बड़े दावों वाले वीडियो कुछ बरस के भीतर ही खुद उनकी बेइज्जती करते नजर आएं, यह बात किसी को भी महानता तक नहीं ले जा सकती। आज ऐसे वक्त कम बोलने की ताकत और खूबी समझ पड़ती है कि बड़बोलापन महानता तक पहुंचाने का एक्सप्रेस-हाईवे नहीं है, वह राह का रोड़ा भर है। बहुत से लोगों को इस नौबत को देखकर नसीहत लेना चाहिए। भक्तिभाव से परे जब किसी नेता का ईमानदार मूल्यांकन होता है, तो इनमें से कोई भी बात अनदेखी नहीं की जाती, यह याद रखते हुए ही लोगों को बोलना चाहिए। लेकिन लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि जब उनकी पार्टी के लोग बलात्कार करते पकड़ाएं, हत्या करते पकड़ाएं, और वे उस पर भी मुंह न खोलें, उनकी पार्टी की सरकारें मुजरिमों की तरह काम करें, फिर भी उस पर उनका मुंह न खुले, तो ऐसी चुप्पी की गूंज भी इतिहास से जाती नहीं है। और अब फेसबुक और ट्विटर जैसी मुफ्त की डायरियों की शक्ल में लोगों के पुराने कहे हुए, और न कहे हुए, सभी का रिकॉर्ड अच्छी तरह दर्ज रहता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

अंतिम संस्कार पर सरकारी खर्च का भी विरोध करने वाली जनता ही जागरूक है

     28 सितंबर  2022
   

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे का राजकीय सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया तो खुद जापान में इस पर की गई फिजूलखर्ची का जमकर विरोध हो रहा है। इस पर करीब सौ करोड़ रूपये खर्च होने का अंदाज है, और इस सरकारी खर्च से परे उन 217 देशों का खर्च अलग है जिनके प्रतिनिधि इस अंतिम संस्कार के लिए पहुंचे थे। जापानी और बौद्ध परंपरा के अनुसार 8 जुलाई को हुई इस हत्या के बाद 15 जुलाई को ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था, और अब महीनों बाद यह प्रतीकात्मक राजकीय अंतिम संस्कार हुआ है जिसमें उनकी अस्थियों को श्रद्धांजलि दी गई है, और इसमें भारतीय प्रधानमंत्री सहित दर्जनों देशों के मुखिया पहुंचे हैं। यह कुछ दिनों के भीतर दुनिया का एक दूसरा बड़ा अंतिम संस्कार है, इसके ठीक पहले ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ के अंतिम संस्कार में भी ऐसे ही दुनिया भर से लोग जुटे थे। जापान में अभी इस अंतिम संस्कार पर खर्च को लेकर कई सर्वे हुए जिनमें पता लगा कि देश की आधी से ज्यादा आबादी इसे गलत खर्च मान रही है। राजधानी टोक्यो में दस हजार लोगों ने दो दिन पहले इस अंतिम संस्कार को रद्द करने की मांग करते हुए जुलूस निकाला, और प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर एक व्यक्ति ने विरोध करते हुए खुद को आग लगा ली।

जापान बहुत गरीब देश नहीं है, लेकिन अंतिम संस्कार पर जनता के पैसों से एक बड़ा खर्च करने का वहां विरोध हो रहा है। जहां सरकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री के राजकीय अंतिम संस्कार का विरोध करते हुए हजारों लोग जुलूस निकाल रहे हैं, उस समाज की जागरूकता को समझने की जरूरत है। हिन्दुस्तान में सत्ता पर बैठे हुए नेता अपनी पसंद और नापसंद पर, अपनी सनक पर, और अपने शौक पर सैकड़ों-हजारों करोड़ रूपये खर्च कर देते हैं। जिस देश की आधी आबादी सरकारी रियायती या मुफ्त के अनाज की वजह से जिंदा है, उस देश में एक-एक प्रतिमा पर तीन-तीन हजार करोड़ रूपये खर्च कर दिए जाते हैं। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने अंबेडकर और कांशीराम के साथ अपनी प्रतिमाएं खड़ी करने के लिए, और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह के चट्टानी बुत बनवाने के लिए शायद हजार करोड़ से अधिक खर्च किए थे, और अब हर चुनाव के वक्त उन हाथियों को ढांकने के लिए दसियों लाख रूपये और खर्च होते हैं। जनता के बीच यह जागरूकता होनी चाहिए कि वह नेताओं की फिजूलखर्ची पर सवाल उठा सके। ऐसे सवाल उठाने के लिए हिम्मत भी लगती है, और सरकारों में बर्दाश्त भी लगता है। आज एक असुविधाजनक सवाल के जवाब में अगर बुलडोजर निकल पड़ते हैं, तो कोई क्या खाकर ऐसे सवाल उठा सकते हैं? लेकिन ऐसी चुप्पी का भुगतान लोकतंत्र को करना होता है जिसमें जनता के खजाने को पांच बरस के निर्वाचित नेता इस अंदाज से लुटाते हैं कि सौ-दो सौ बरस पहले के कोई हिन्दुस्तानी राजा अपने गले की माला लुटा रहे हों। वैसे राजाओं के दिन लद गए, सामंत भी अब नहीं रहे, लेकिन जनता के पैसों पर मनमानी करने की आदत नहीं गई, बल्कि यह ऐसे लोगों को भी लग गई है जो कि सादगी का दावा करते थकते नहीं हैं।

अब यहां पर एक सवाल और उठता है कि किसी के गुजरने पर उसके शरीर को मेडिकल कॉलेज को दान करके एक सामाजिक जिम्मेदारी भी पूरी की जाती है, और फिजूल के अंतिम संस्कार से भी बचा जाता है। लेकन हम सिर्फ आम लोगों को ही ऐसा त्याग करते देखते हैं, किसी भी चर्चित और बड़े व्यक्ति, खासकर सत्तारूढ़ या सत्ता से जुड़े हुए नेता का शरीर कभी चिकित्सा शिक्षा के लिए पहुंचते नहीं दिखता। जबकि हालत यह है कि जिंदा रहते हुए ये नेता खुद को समाज की प्रेरणा मानकर चलते हैं, और उनकी गुजर जाने पर उनकी स्मृतियों को उनके साथी या अनुयायी प्रात:स्मरणीय बताते हैं, यानी दिन की शुरुआत उनकी स्मृतियों से की जानी चाहिए। ऐसे लोग अपना शरीर मेडिकल साईंस को देने की घोषणा क्यों नहीं कर जाते? इससे तो अंतिम संस्कार पर होने वाला अंधाधुंध खर्च भी बचेगा, लकडिय़ां या जमीन पर जगह भी बचेगी, और वे किसी काम भी आ सकेंगे। जब अमरीका में 15-20 बरस पहले भूतपूर्व राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन का निधन हुआ, तो अमरीकी सरकार में छुट्टी रखी गई थी। उस दिन का हर कर्मचारी-अधिकारी का वेतन रीगन के राजकीय अंतिम संस्कार के खर्च में जोड़ दिया गया था, और इस तरह यह खर्च तीन हजार करोड़ रूपये से अधिक आंका गया था। खर्च का यह भयानक आंकड़ा देखने के बाद अमरीका में इस तरह की छुट्टी देना शायद बंद कर दिया गया था।

हम घूम-फिरकर फिर जनता के पैसों की बर्बादी की अपनी फिक्र पर आते हैं, तो सत्तारूढ़ नेता मरने के बाद तो जनता पर जितना भी बड़ा बोझ बनते हों, वे जीते-जी भी कम बड़ा बोझ नहीं रहते हैं। जिन नेताओं को गली के कुत्ते भी न काटें, वे भी सरकारी खर्च पर बंदूकबाज साथ लिए चलते हैं। सत्ता से जुड़े लोग अपने घर-दफ्तर में न सिर्फ हिफाजत बल्कि बाकी बातों के लिए भी सरकारी खर्च करवाते हैं। इन सबका जमकर विरोध होना चाहिए। आज सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी निकालना आसान है कि किन कर्मचारियों की तैनाती कहां हैं, कितनी गाडिय़ां कहां तैनात हैं, और सत्तारूढ़ नेताओं पर जनता का कितना पैसा खर्च हो रहा है। लोकतंत्र में पारदर्शिता की उम्मीद करने वाली संस्थाओं को यह चाहिए कि न सिर्फ सूचना के अधिकार के तहत, बल्कि तरह-तरह के फोटो और वीडियो से भी यह जानकारी जुटाते चलें कि कहां-कहां पर जनता के पैसों की बर्बादी हो रही है। और ऐसे सुबूत लेकर उन जजों के सामने भी जाना चाहिए जो कि राजनेताओं से कहीं अधिक बढक़र ऐसी बर्बादी करते हैं, और जनता को सडक़ों पर से दूर धकेलते हुए सायरनों के साये में सडक़ों का सफर तय करते हैं। कम से कम कुछ ऐसे छोटे राजनीतिक दल हो सकते हैं जो कि ऐसी अय्याशी में नहीं लगे रहते, और उन्हें तरह-तरह से ऐसे असुविधाजनक सवाल उठाने चाहिए। लगातार सवाल उठाए बिना लोकतंत्र में और कोई जरिया तो है नहीं कि लोगों को कटघरे में खड़ा किया जा सके। जनता के पैसों की फिजूलखर्ची के इस हमाम में तो नेता, अफसर, जज, सभी बिना तौलियों के हैं, इसलिए इनमें से किसी को कोई शर्म तो आनी नहीं है, जनता के बीच से ही मतदाताओं की जागरूकता के लिए ऐसे सवाल उठाने होंगे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितम्बर 2022


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दीवारों पर लिक्खा है, 27 सितम्बर 2022


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अब घर बैठे सुप्रीम कोर्ट की बहस सुनना, जजों को देखना मुमकिन, आगे क्या?

    27  सितंबर  2022
   

सुप्रीम कोर्ट में आज एक नया इतिहास गढ़ा जा रहा है जब संवैधानिक मामलों की सुनवाई का जीवंत प्रसारण होगा। इनके ऑडियो-वीडियो की लाईव स्ट्रीमिंग इंटरनेट पर की जाएगी, और जिन्हें दिलचस्पी हो वे उन्हें देख-सुन सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों की बैठक में यह फैसला लिया गया। इसकी बुनियाद 2018 में कानून के एक छात्र की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला था, और उसमें संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामलों की अदालती कार्रवाई की लाईव स्ट्रीमिंग की इजाजत दी गई थी, और कहा गया था कि यह खुलापन सूरज की रौशनी की तरह है जो कि सर्वश्रेष्ठ कीटाणुनाशक रहता है। अब अदालत में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण, महाराष्ट्र का शिवसेना विवाद, दिल्ली और केन्द्र सरकारों के बीच के विवाद जो कि संविधानपीठ के सामने है, उनकी लाईव स्ट्रीमिंग की जाएगी। आम जनता को यह देखने मिलेगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत किस तरह काम करती है, और बहस में कौन से वकील क्या कहते हैं। हो सकता है कि इसका अधिकतर हिस्सा आम लोगोंं की समझ से परे हो, लेकिन जिस तरह सूचना के अधिकार के तहत हासिल की जा सकने वाली फाईलों का भी अधिकतर हिस्सा लोगों की समझ से परे होता है, फिर भी वहां तक लोगों की पहुंच ही एक हक रहती है, इसी तरह सुप्रीम कोर्ट पर से रहस्य का यह पर्दा हटना एक बड़ी बात रहेगी। आज तो लोग मीडिया के मोहताज रहते हैं जिनके मार्फत मीडिया की पसंद के तथ्य खबरों में सिर चढक़र बोलते हैं, और लोगों को पूरी तस्वीर जानने-समझने का कोई मौका हासिल नहीं रहता। एक ही अदालती कार्रवाई पर अलग-अलग मीडिया अलग-अलग किस्म से खबरें पेश करते हैं, और उन्हें मिलाकर ही जागरूक लोग यह समझ पाते हैं कि पूरी खबर क्या है। इन्हें सुप्रीम कोर्ट की ही वेबसाइट पर बिना किसी खर्च के देखा जा सकेगा। आज सुप्रीम कोर्ट में तीन अलग-अलग संविधानपीठें सुनवाई करने वाली हैं, और इन सबकी कार्रवाई को देखना एक अनोखा लोकतांत्रिक मौका है।

जब सूचना का अधिकार कानून आया था, तब भी हमने इस बात को बार-बार लिखा था कि यह मांगकर सूचना पाने का अधिकार नहीं होना चाहिए, यह सूचना देने की जिम्मेदारी का अधिकार रहना चाहिए। यह सरकारों की और जन-संस्थानों की जवाबदेही होनी चाहिए कि वे खुद होकर अपने से जुड़ी हर सूचना को पारदर्शी तरीके से इंटरनेट पर लगातार डालते रहें, ताकि किसी को सूचना मांगने के लिए उन्हीं दफ्तरों के धक्के न खाने पड़ें, और महीनों बाद जाकर फिर अपील के रास्ते पर जाना पड़े। होना तो यह चाहिए कि सूचना के अधिकार में आने वाले हर कागज को सरकारी विभाग खुद होकर अपनी वेबसाइट पर डालें, ताकि लोगों को पता चलता रहे कि उनका मामला कहां तक पहुंचा है, दूसरों के मामले कहां तक पहुंचे हैं, कैसे किसी एक टेबिल पर कोई फाईल महीनों अटकाई गई है, और कैसे कोई फाईल पहियों वाले जूते पहनकर नीचे से ऊपर तक सरपट दौड़ लगा रही है। सूचना के अधिकार कानून के शब्दों को सरकारी अमले ने पकड़ लिया है, और निचले दर्जे के बाबू से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक लगातार इसी में लगे रहते हैं कि कैसे किसी सूचना को न देने से काम चल सकता है। अभी ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है जिसमें अखिल भारतीय वनसेवा के एक अफसर की भ्रष्ट लोगों पर मांगी गई जानकारी देने से पीएमओ कतरा रहा है, और तरह-तरह के तर्क दे रहा है। ऐसा भी नहीं कि जो सुप्रीम कोर्ट आज अपनी संविधानपीठों की कार्रवाई का जीवंत प्रसारण करने जा रहा है, वह खुद अपनी बातों को उजागर करने में दिलचस्पी रखता है। देश की इस सबसे बड़ी अदालत ने बहुत ही अलोकतांत्रिक तरीके से जजों के बारे में जानकारियों को गोपनीय बना रखा है, और कुछ बरस पहले तो हालत यह थी कि इसे अपने इस प्रशासनिक निर्णय के खिलाफ लगी याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में ही अपना बचाव करना पड़ा था। इसलिए यह मान लेना गलत होगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत का अपना घरेलू चालचलन पारदर्शी और लोकतांत्रिक है। फिर भी यह बात कुछ तो मायने रखेगी कि देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण कुछ बुनियादी मुद्दों वाले मामलों पर अदालत में मौजूद वकीलों और पत्रकारों से परे भी लोग इन्हें देख-समझ पाएंगे। और कुछ नहीं तो इससे कम से कम देश के दसियों लाख वकीलों, और लाखों जजों को सीखने का एक मौका भी मिलेगा। आम जनता को भी बिना अधिक समझे हुए भी यह समझने मिलेगा कि सुप्रीम कोर्ट किस तरह हिन्दी फिल्मों की अदालत से अलग होती है।

अभी कानूनी समाचारों की कुछ वेबसाइटें लगातार महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई की रिपोर्टिंग में हर वकील की कही बात, जज की हर टिप्पणी, इन्हें एक-एक शब्द पोस्ट करती हैं। सुप्रीम कोर्ट को यह भी सोचना चाहिए कि जिस तरह विधानसभाओं और संसद की कार्रवाई में एक-एक शब्द टाईप होते चलता है, और फिर उसे जारी कर दिया जाता है, वैसा ही सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं कर सकती? आज जजों की जुबानी कही बातें अदालत के आदेश या फैसले में नहीं आती हैं, और उन्हें लेकर कई बार विवाद भी खड़ा होता है कि जज को ऐसा कहना चाहिए था या नहीं, और कई बार तो यह भी साफ नहीं हो पाता कि जज ने ठीक-ठीक क्या कहा था। इसलिए अगर अदालत खुद ही अपनी कार्रवाई को सार्वजनिक करते चलेगी, तो सिर्फ जुबानी कई बातें कहने वाले जजों की जवाबदेही भी बढ़ेगी, और वे अधिक चौकन्ने होकर बोलेंगे। लोकतंत्र धीरे-धीरे, लेकिन लगातार विकसित होने वाली व्यवस्था का नाम है। जहां तक लोकतंत्र पहुंच चुका है, उसके और आगे बढऩा ही लोकतंत्र होता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट अब तक जितना खुला है, उससे अधिक खुलना ही उसके लिए जिम्मेदारी की बात होगी। आज से देखें कि यह नया प्रयोग देश की जनता में कितनी उत्सुकता जगाता है, और उनकी कितनी कानूनी समझ बढ़ाता है। लेकिन धीरे-धीरे लोग हिन्दुस्तानी अदालती कार्रवाई को ठीक उसी तरह देखने लगेंगे, जिस तरह कि वे संसद की कार्रवाई को देखते हैं, और यह सब लोगों की लोकतांत्रिक परिपक्वता बढ़ाने वाले काम होंगे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

कांग्रेस के इस घर को आग लग गई घर के चिराग से...

     26  सितंबर  2022
  

ठीक उस वक्त जब सोशल मीडिया पर राहुल गांधी की पदयात्रा की दिल को छू लेने वाली तस्वीरें हर कुछ घंटों में सामने आ रही थीं, और भारत जोड़ो यात्रा से राहुल विरोधियों में एक बेचैनी फैल रही थी, कांग्रेस पार्टी के भीतर से भी पार्टी की इस मुहिम को आग लग गई। अभी कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरा भी नहीं गया है, और राजस्थान में नए मुख्यमंत्री बनाने के लिए सोनिया गांधी की ओर से भेजे गए पर्यवेक्षक पहुंचे, और वहां कांग्रेस विधायकों में बगावत हो गई। शायद कांग्रेस के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ होगा कि राज्य के विधायकों ने हाईकमान के भेजे पर्यवेक्षकों से मिलने भी इंकार कर दिया। अभी तक की ताजा खबर के मुताबिक पार्टी के दो बड़े पदाधिकारी और वे पर्यवेक्षक दिल्ली लौट जा रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरने वाले, सोनिया परिवार के भरोसेमंद अशोक गहलोत ने भी राज्य के कांग्रेस विधायकों के बागी तेवरों को अपने से बेकाबू बता दिया है, और राज्य के 107 कांग्रेस विधायकों में से 90 ने अपने इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष को दे दिए हैं। इन सबका कहना है कि किसी ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा सकता जिसने पहले भाजपा के साथ मिलकर सरकार गिराने की कोशिश की थी। जाहिर है कि उनका निशाना मुख्यमंत्री पद के दावेदार सचिन पायलट हैं जिन्होंने 2020 में एक बार अपने कुछ विधायकों को लेकर राज्य के बाहर डेरा डाला था, और मुख्यमंत्री गहलोत को हटाने या उनकी सरकार गिराने की कोशिश की थी। तब किसी तरह हफ्तों की मशक्कत के बाद उन्हें शांत किया गया था, और ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस हाईकमान गहलोत के पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनकी जगह पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनवा सकेगी। लेकिन अब ऐसा लगता है कि राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट का समर्थन दर्जन भर कांग्रेस विधायकों तक ही सीमित रह गया है, यह एक और बात है कि उनकी बगावत की बिना पर हो सकता है कि भाजपा राज्य में सत्ता पलट की कोशिश कर सके। कांग्रेस हाईकमान से पहली बगावत तो तब नजर आई जब दिल्ली से गए दो बड़े पर्यवेक्षक मुख्यमंत्री निवास पर कांग्रेस विधायकों का इंतजार करते रहे, और उन्होंने वहां जाने से इंकार कर दिया, एक दूसरी जगह मिले, और विधानसभा अध्यक्ष को अपने इस्तीफे दे दिए।

इस मामले को कुछ बारीकी से देखने की जरूरत है। अभी तो अशोक गहलोत ने कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का फार्म भी नहीं भरा है। और उनकी जगह नया मुख्यमंत्री बनाने के लिए पर्यवेक्षक राजस्थान भेज दिए गए। अभी कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव नतीजा निकलने में कई हफ्ते लग सकते हैं, और राजस्थान विधायक दल के भीतर ऐसा बवाल खुद पार्टी हाईकमान ने खड़ा कर दिया। अब अगर यह सोची-समझी रणनीतिक-धुंध नहीं है, तो फिर यह बड़ी चूक है। और अगर यह एक सोचा-समझा काम है, तो भी यह खासा बड़ा दांव है क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा विधायकों के बीच संख्या का इतना बड़ा फासला नहीं है कि कांग्रेस इतना बड़ा खतरा उठा सके। और आज जब देश में माहौल यह है कि जनता किसी भी निशान पर वोट डाले, उसके चुने विधायक कमल छाप पर ही वोट डालते हैं, तो कांग्रेस के लिए अपने शासन के दो राज्यों में से एक में इतनी बड़ी अस्थिरता खासा खतरनाक काम है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों को यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि कांग्रेस को नया मुख्यमंत्री चुनवाने की इतनी क्या हड़बड़ी थी। अभी तो गहलोत न तो कांग्रेस अध्यक्ष का फॉर्म भर पाए थे, न ही अध्यक्ष का चुनाव हो पाया था। ऐसे में मुख्यमंत्री की कुर्सी तो खाली हुई भी नहीं थी। गहलोत राजस्थान में ही बैठे हैं, और उनका वारिस तय करने दिल्ली से पार्टी पर्यवेक्षक पहुंच गए। यह मामला किसी मरणासन्न आदमी की मिजाज कुर्सी के लिए जाने वाले के हाथों होने वाली विधवा के लिए रिश्ता भेजने जैसा है। और इसका तर्क कांग्रेस के लोग ही बेहतर बता सकते हैं जिन्हें अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने का कोई बड़ा मौका हाल ही में नहीं मिला था। कोई पार्टी किस तरह अपनी फजीहत कराने में इतनी समर्पित हो सकती है, यह देखना हो तो कांग्रेस को देखना चाहिए। भाजपा पिछले कुछ दिनों से लगातार कांग्रेस के बारे में यह कहती आ रही थी कि कांग्रेस पहले अपनी पार्टी को तो जोड़ ले, फिर देश को जोडऩे की बात करे, और आज वह नौबत आ ही गई। राजस्थान से बैरंग रवाना होने के पहले केन्द्रीय पर्यवेक्षक अजय माकन को यह कहते हुए निकलना पड़ा कि गहलोत गुट के विधायकों ने अनुशासनहीनता की है। अब अगर 102 विधायकों में से 90 को अनुशासनहीन कहने की नौबत आ रही है, तो यह कांग्रेस के लिए या तो शर्मिंदगी की बात है, या फिर बड़े खतरे की।

राजस्थान में कांग्रेस विधायकों के बीच बगावत नई नहीं है, दो बरस पहले भी सचिन पायलट की अगुवाई में एक बगावत हो चुकी है, जिसके बाद यह चर्चा थी कि कांग्रेस ने अपने ही कुछ विधायकों को खरीदकर मामला ठंडा किया था। अब पार्टी के बहुसंख्यक विधायकों के ये बागी तेवर उन अशोक गहलोत की अगुवाई में सामने आए हैं जो कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सोनिया परिवार की पसंद बताए जा रहे हैं। अगर पार्टी अध्यक्ष बनने के पहले गहलोत के ये तेवर हैं, तो पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद क्या वे पूरी तरह बेकाबू, बागी, या अपनी मर्जी के अध्यक्ष नहीं हो जाएंगे? और दूसरी बात यह भी है कि आज जब पार्टी उन्हें पूरे देश का अपना संगठन दे रही है, तब क्या उनकी यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे अपने ही राज्य में अपने ही विधायकों के बीच सार्वजनिक बगावत की ऐसी नौबत न आने देते? यह पूरा सिलसिला कांग्रेस लीडरशिप से बेकाबू संगठन का सुबूत है, और आने वाले दिनों में यह देखना है कि यह राहुल गांधी की पदयात्रा से बनते अच्छे माहौल को किस तरह बर्बाद करेगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर आज हो रही कार्रवाई काफी नहीं, और जरूरी

    25  सितंबर  2022
  

दुनिया भर की पुलिस और साइबर जांच एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर कल हिन्दुस्तान में सीबीआई ने 21 राज्यों में करीब पांच दर्जन जगह तलाशी ली, और कई लोगों को बच्चों से जुड़ी हुई सेक्स सामग्री रखने के जुर्म में गिरफ्तार किया। कुछ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां लगातार चाइल्ड-सेक्स सामग्री पर नजर रखती हैं, और जो लोग इन्हें इंटरनेट पर किसी जगह रखते हैं, एक-दूसरे को भेजते हैं, डाउनलोड करते हैं, या अपलोड करते हैं, उन पर लगातार नजर रखी जाती है, और उसी के तहत हर कुछ महीनों में भारत में दर्जनों लोग गिरफ्तार भी होते हैं। बच्चों से जुड़ी सेक्स सामग्री कुछ खास दिमागी हालत के लोग पसंद करते हैं, और ऐसे लोग दुनिया के कई पर्यटन केन्द्रों पर भी जाते हैं जहां पर बच्चों को सेक्स के धंधे में उतारा जाता है। कई देश इस बात के लिए खासे बदनाम हैं, और बच्चों से सेक्स में दिलचस्पी रखने वाले, पीडोफाइल, इन जगहों पर चक्कर लगाते रहते हैं।

मनोविज्ञान ऐसे लोगों को मानसिक रूप से बीमार मानता है, और कानून इन लोगों को मुजरिम मानता है। लेकिन समाज में घर-परिवार के भीतर, या जान-पहचान की जगहों पर, स्कूल और खेल के मैदानों पर, और अनाथाश्रमों से लेकर बच्चों को रखने की दूसरी कई किस्म की जगहों पर ऐसे शौक रखने वाले मुजरिम मंडराते रहते हैं। यह खासकर ऐसी जगहों पर अधिक होता है जहां पर परेशानी में फंसे हुए बच्चों को रखा जाता है। ऐसे बच्चों की मानसिक हालत अधिक नाजुक रहती है, और उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से जीतना अधिक आसान समझा जाता है। दुनिया में कई जगहों पर सरकारों और जांच एजेंसियों का यह तजुर्बा रहा है कि परेशानहाल बच्चों को रखने की ऐसी जगहों पर स्वयंसेवक और समाजसेवी बनकर पहुंचने वाले लोगों में भी बहुत से लोग बच्चों से सेक्स की मानसिकता वाले होते हैं, और वे सोच-समझकर आसान निशाना पाकर इन बच्चों तक पहुंचते हैं।

दुनिया के अधिकतर देशों में बच्चों से सेक्स, या उनकी सेक्स सामग्री बनाना जुर्म है, लेकिन विकसित देशों से परे बहुत से देशों में जांच एजेंसियां इस बारे में खासी लापरवाह रहती हैं, और उनकी नजर में यह जुर्म बहुत प्राथमिकता में नहीं आता। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों के दबाव से, उनकी निगरानी में पकड़ में आने वाले लोग आज कम्प्यूटर, मोबाइल, और इंटरनेट की वजह से तुरंत ही शिनाख्त के घेरे में आ जाते हैं, और उन पर गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई भी तुरंत हो जाती है। हिन्दुस्तान में जिस तरह के आम लोग इस जुर्म में पकड़ा रहे हैं, उससे यह भी लगता है कि उन्हें इसकी गंभीरता का अहसास नहीं रहता, और अपनी सेक्स-प्राथमिकताओं की वजह से, या किसी सनसनी के लिए वे ऐसे वीडियो आगे बढ़ाते चलते हैं। इन लोगों को देखकर यह भी लगता है कि लोगों में एक साइबर-जागरूकता की जरूरत है ताकि वे ऐसे जुर्म से बच सकें। आज कम्प्यूटर और फोन की वजह से लोगों की पहुंच ऐसी मैसेंजर सर्विसों तक है जिनसे वे एक पल में कोई ऑडियो या वीडियो दसियों हजार लोगों तक भेज सकते हैं। जब संचार के औजार इतने सहज सुलभ हो गए हैं, तो लोगों को ही कानून और सही-गलत की जानकारी देना जरूरी है। सोशल मीडिया के बड़े विकराल कारोबार में अरबों डॉलर कमाने वाले फेसबुक और ट्विटर जैसे कारोबार भी हैं, जो कि अपने प्लेटफॉर्म पर कई तरह की नग्न और अश्लील सामग्री रोकते हैं। लेकिन ये प्लेटफॉर्म भी लोगों को चाइल्ड-पोर्नोग्राफी जैसी बातों के लिए जागरूक नहीं करते हैं, किसी के पोस्ट करने के बाद उसकी सामग्री को हटा भर देते हैं। इनकी एक सामाजिक जवाबदेही यह भी है कि वे अपने सदस्यों को जागरूक करते चलें, अभी ऐसा कोई अभियान फेसबुक और ट्विटर की तरफ से दिखाई नहीं पड़ता है।

हिन्दुस्तान में लोगों में जितनी साइबर-जागरूकता आई है, उससे कई गुना अधिक रफ्तार से साइबर-औजार आ गए हैं। लोग इनके खतरों को समझ सकें, उसके पहले वे खुद खतरे में पड़ जाते हैं। आज सोशल मीडिया पर बड़े नामी-गिरामी लोग भी यह नहीं समझ पाते कि कौन सी चीजें पोस्ट करना गलत हो सकता है, और वे कानून के घेरे में आ सकते हैं। चूंकि चाइल्ड-पोर्नोग्राफी के शिकार बच्चे जिंदगी भर के लिए जख्म पाते हैं, इसलिए समाज को इस बारे में अधिक सावधान रहना चाहिए। बच्चों के साथ सेक्स-जुर्म करने वाले लोग उनकी पूरी जिंदगी के लिए उनकी मानसिकता को घायल कर जाते हैं, इसलिए इस बारे में हर देश-प्रदेश को बहुत सावधानी से और तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। अभी हिन्दुस्तान में बीच-बीच में जो कार्रवाई होती है, वह दुनिया के दूसरे देशों के संगठनों से मिली हुई जानकारी और सुबूत के आधार पर होती है। ऐसी कार्रवाई का दायरा बढऩा चाहिए, और ऐसे मुजरिमों पर की गई कार्रवाई का प्रचार भी होना चाहिए, ताकि दूसरे लोग सावधान हो जाएं, और सुधर जाएं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

सत्ता के घरेलू मुजरिमों पर वक्त रहते काबू पाने की बहुत बड़ी जरूरत..

   24  सितंबर  2022
  

उत्तराखंड में भाजपा सरकार एक नई फजीहत में फंसी हुई है, राज्य के एक पूर्व भाजपा मंत्री का बेटा अपने दो साथियों के साथ अपनी एक कर्मचारी युवती की हत्या में गिरफ्तार हुआ है। और इसे लेकर वहां खड़े हुए भारी जनाक्रोश को देखते हुए सरकार ने इस मंत्री-पुत्र के एक पर्यटक-रिसॉर्ट को बुलडोजर से तोड़ा-फोड़ा है। राज्य के भाजपा नेता और पूर्व मंत्री विनोद आर्य के नौजवान बेटे ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर रिसॉर्ट की एक कर्मचारी को पहाड़ी से धक्का देकर गंगा में गिराकर मार डाला। ऐसी खबरें हैं कि मंत्री-पुत्र पुलकित आर्य अंकिता नाम की इस युवती पर दबाव डालता था कि वह रिसॉर्ट में ठहरे ग्राहकों के साथ देह संबंध बनाए, और ऐसा न करने पर उसने 19 बरस की इस कर्मचारी को मार डाला। आसपास के गांवों के लोगों ने रिसॉर्ट में भी तोडफ़ोड़ की है, और पुलिस गाड़ी से निकालकर इन गिरफ्तार आरोपियों को भी पीटा है। जनाक्रोश को देखते हुए मुख्यमंत्री के निर्देश पर इस रिसॉर्ट में बुलडोजर से तोडफ़ोड़ की गई है।

ऐसा लगता है कि आजकल कुछ राज्य सरकारें भारी जनाक्रोश खड़ा हो जाने पर बुलडोजर को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं, या फिर वे किसी तबके में दहशत पैदा करने के लिए भी ऐसा कर रही हैं। उत्तराखंड में पार्टी के ही एक भूतपूर्व हिन्दू मंत्री को दहशत में लाने की तो कोई वजह नहीं दिखती, लेकिन यह जरूर दिखता है कि बुलडोजर से तोडफ़ोड़ लोगों को एक बड़ी कार्रवाई लगती है, और जनधारणा प्रबंधन के तहत कुछ राज्य सरकारें हाल के महीनों में कई जगह ऐसा कर रही हैं। सवाल यह उठता है कि किसी हत्या के आरोपी की संपत्ति को बुलडोजर से गिराने का कोई कानून देश में नहीं है, और दूसरी तरफ अगर कोई निर्माण अवैध था, तो ऐसे जुर्म और उसके खिलाफ खड़े हुए जनाक्रोश के बिना भी उसे गिरा दिया जाना चाहिए था। ऐसी सरकारी कार्रवाई चाहे वह यूपी में हो, एमपी में, या कहीं और, यह सरकार की कोई अच्छी नीयत नहीं बताती है। या तो सरकार लोगों में दहशत पैदा करने के लिए किसी तबके के खिलाफ ऐसी मुहिम छेड़ती है, या फिर जब वह खुद जनाक्रोश से दहशत में आ जाती है, तो ऐसा करती है। दोनों ही मामलों में यह कानून को हाथ में लेने की बात है, लेकिन हैरानी यह है कि देश की बड़ी-बड़ी अदालतों तक जब ऐसे मामले पहुंचे, तो अदालतों ने उन्हें दखल देने के लायक नहीं पाया।

अब इस मामले के एक दूसरे पहलू को देखें, तो सत्ता से जुड़े हुए लोग, सत्ता की ताकत से बलात्कार और कत्ल जैसे जुर्म करते हैं, और बहुत से मामलों में वे सुबूतों और गवाहों की कमजोरी से, या बिक जाने से, बच भी जाते हैं। जब तक कोई वीडियो-सुबूत न हो, या जनआंदोलन खड़ा न हो गया हो, सत्ता अपने पसंदीदा लोगों को बचाती चलती है, और नापसंद लोगों को फंसाते चलती है। देश भर के अधिकतर राज्यों में केन्द्र और राज्यों की पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों का ऐसा ही रूख नेताओं से जुड़े अधिकतर मामलों में दिखता है। इससे एक तरफ तो लोगों के बीच अदालती इंसाफ को लेकर भरोसा खत्म होता है, और दूसरी तरफ मुजरिमों के हौसले बढ़ते हैं। एक वजह कि सत्ता से जुड़े हुए लोग कहीं किसानों के आंदोलन को अपनी गाड़ी से कुचलते हैं, कहीं कत्ल और रेप करते हैं, और कहीं सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करके अवैध निर्माण करते हैं। इन सब बातों से ऐसा लगता है कि देश में कानून का राज इतना कमजोर पड़ गया है कि वह सत्ता का चेहरा देखकर काम करता है, और इंसाफ की जगह चापलूसी ने ले ली है।

ऐसे देश में भी भूले-भटके कभी-कभी मनु शर्मा जैसे सत्तारूढ़ परिवार के कातिल को सजा मिलती है, लेकिन उससे भी सत्ता की बाकी बिगड़ैल औलादों को कोई सबक नहीं मिलता। सत्ता की ताकत लोगों को इस हद तक बददिमाग कर देती है कि वे कानूनी खतरों की परवाह छोड़ देते हैं। हमने छत्तीसगढ़ से लेकर देश के बहुत से दूसरे राज्यों में देखा है कि बड़े-बड़े नेताओं की तमाम संभावनाओं को उन्हीं की बिगड़ैल औलादों ने खत्म कर दिया। आज चूंकि अधिकतर राज्यों में भाजपा की सरकार है, इसलिए इस किस्म के अधिकतर जुर्म भाजपा से जुड़े नेताओं के ही सामने आ रहे हैं, लेकिन दूसरी पार्टियों का भी राज जहां पर है, या पहले जब कभी था, वे पार्टियां भी ऐसे जुर्म से परे नहीं रही हैं। हिन्दुस्तानी राजनीति में शायद वामपंथी दल ही अकेले ऐसे अपवाद रहे जिन्होंने ऐसे पारिवारिक जुर्म को बढ़ावा नहीं दिया। हाल के महीनों में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के परिवार के लोगों की जिस तरह की अंधाधुंध कमाई की जानकारी सामने आ रही है वह भी हक्का-बक्का करने वाली है, और वह ममता की निजी सादगी को, गरीबी और बिना तनख्वाह काम करने के तथाकथित त्याग को पाखंड साबित करती है। ऐसा भला कैसे हो सकता है कि ममता के आधा दर्जन भाई-भतीजे अरबपति हो जाएं, और ममता को खबर न हो। सस्ती साड़ी और रबर की चप्पल एक मुखौटा अधिक लगती है, और शायद परिवार के ऐसे धंधों की वजह से ही ममता की बोलती भी बंद है।

देश के राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुर्म के ऐसे कारोबार पर शुरू से नजर रखें, और उन्हें काबू में रखें। जब सार्वजनिक रूप से भांडाफोड़ हो जाए, उसके बाद इस तरह की कार्रवाई, बुलडोजर चलाना भला किस काम का। ऐसे लोग कितने बलात्कार कर चुके हैं, कितने कत्ल कर चुके हंै, कितनी लड़कियों के बदन बेच चुके हैं, इसका क्या पता लगेगा। और ऐसी बात भी नहीं कि किसी राजनीतिक दल के नेताओं के बारे में सत्ता और संगठन तक जानकारी न पहुंचती हो। हर पार्टी में हर स्तर के नेता के विरोधी और प्रतिद्वंद्वी भी होते हैं, और उनकी बातों को अनसुना करके ही कोई पार्टी अपने भीतर मुजरिमों को और बड़ा मुजरिम बनने देती है। सार्वजनिक जीवन का यह तकाजा होना चाहिए कि सुबूत इक_े हो जाने पर मजबूरी में कार्रवाई करने वाली पुलिस से परे, ऐसे मुजरिमों के राजनीतिक संगठनों को भी ऐसे जुर्म पर मुंह खोलना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितम्बर 2022


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ईरान में हिजाब की होली, बाकी दुनिया को भी इस हौसले का साथ देना चाहिए

   23  सितंबर  2022
   

ईरान में हिजाब के खिलाफ महिलाओं का आंदोलन एक अभूतपूर्व आक्रामकता पर पहुंच गया है। देश के लोगों पर बड़ी कड़ाई से काबू और कब्जा रखने वाली ईरानी सरकारी के लिए यह फिक्र और परेशानी की नौबत है, लेकिन दूसरी तरफ ईरानी महिलाओं के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई भी है। एक युवती को ईरान की नैतिकता-पुलिस ने हिजाब न लगाने, या ठीक से न लगाने के लिए गिरफ्तार किया, बाद में उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, और उसकी मौत हो गई। इसे पुलिस ज्यादती करार देते हुए ईरानी महिलाएं वहां के कई शहरों में सरकार की लादी हुई पोशाक की रोकटोक, और उसे लागू करवाते ज्यादती करने वाली नैतिकता-पुलिस के खिलाफ सडक़ों पर उतर आईं, उन्होंने चौराहों पर अपने हिजाब की होली जलाना शुरू कर दिया, विरोध-प्रदर्शन करते हुए सडक़ों पर उन्होंने अपने बाल काटने शुरू कर दिए, और वीडियो कैमरों के सामने उन्होंने तानाशाह की मौत के नारे लगाए। तानाशाह का सीधा-सीधा मतलब ईरान के धार्मिक प्रमुख, सुप्रीम लीडर कहे जाने वाले अली खमैनी से है।

ईरान इस्लाम की अपनी व्याख्या को कड़ाई से लागू करने वाला देश है, और वहां महिलाओं की पोशाक पर कई तरह की रोक है। अभी कल ही अमरीकी टीवी चैनल सीएनएन की एक सबसे सीनियर महिला जर्नलिस्ट का न्यूयार्क में पहुंचे ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के साथ इंटरव्यू तय था। लेकिन उन्होंने इंटरव्यू के दौरान सिर पर स्कार्फ बांधने से मना कर दिया, और राष्ट्रपति ने उनसे मिलने से इंकार कर दिया। इस पत्रकार का तर्क था कि वह पहले भी ईरानी राष्ट्रपतियों से ईरान के बाहर इंटरव्यू कर चुकी हैं, और अमरीका में चूंकि महिलाओं के स्कार्फ बांधने का कोई नियम नहीं है, इसलिए किसी ने कभी इस बात पर जोर भी नहीं डाला था। लेकिन शायद अभी ईरान में हिजाब को लेकर चल रहे आंदोलन को देखते हुए ईरानी राष्ट्रपति इस पर अड़ गए, और यह इंटरव्यू नहीं हो सका।

ईरान में बरसों बाद यह नौबत देखने में आ रही है जब सार्वजनिक रूप से महिलाएं न सिर्फ हिजाब जला रही हैं बल्कि वे तानाशाह की मौत भी मांग रही हैं। यह आंदोलन छोटे-बड़े कई शहरों में फैला हुआ है, और सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट बंद कर दिया है ताकि सोशल मीडिया और मैंसेजर सर्विसों से जुड़ा हुआ यह आंदोलन कुछ पोस्ट न कर सके। बाईस बरस की महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत से भडक़ी हुई महिलाएं अब अपना हक पाने के लिए सरकार के खिलाफ एक अभूतपूर्व आंदोलन कर रही हैं, और तमाम पश्चिमी दुनिया तो उनके इस आंदोलन के साथ है ही। आसपास के जो देश ईरान के खिलाफ रहते हैं, वहां पर भी इस आंदोलन के लिए एक हमदर्दी है। दुनिया में अब ऐसे कम ही मुस्लिम देश बचे हैं जहां महिलाओं पर पोशाक की पाबंदी को ऐसी कड़ाई से लादा जाता है, और इससे ढील चाहने वाली महिलाओं को सजा दी जाती है। लोगों को याद होगा कि एक वक्त ईरान भी आजाद खयालों का देश था, और महिलाओं की पोशाक पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन तब तत्कालीन शाह के खिलाफ एक इस्लामिक आंदोलन हुआ, और शाह को बेदखल करके इस्लामिक सरकार बनाई गई, और तब से अब तक ईरान लगातार शरीयत की अपनी व्याख्या को लागू करते आया है जिसमें सऊदी अरब की तरह महिलाओं पर कई तरह की रोक लगाई गई है।

ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी देशों और अमरीका के निशाने पर रहते आया है जिन्हें यह लगता है कि दुनिया के उस हिस्से में बसे इजराईल को ईरान से खतरा हो सकता है। इसलिए ईरान पश्चिम के आर्थिक प्रतिबंध भी झेलते आया है, और उससे पश्चिमी दुनिया का लेन-देन, आवाजाही, सब कुछ बहुत सीमित है। इस तरह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह के प्रतिबंधों से घिरा हुआ ईरान एक कट्टर मुस्लिम देश बना हुआ महिलाओं की पोशाक पर बहुत कड़ी रोकटोक लगाने वाला देश है। ईरान और सऊदी अरब, और अब तालिबान के कब्जे वाले अफगानिस्तान में महिलाओं पर लगाई गई तरह-तरह की रोकटोक को लेकर दुनिया भर में महिला-अधिकारों की वकालत करने वाले फिक्रमंद हैं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर महिला संगठनों तक इस पर बोलते आए हैं, लेकिन धार्मिक कट्टरता हर वकालत को अनसुनी कर देती है।

इस बार का यह हिजाब विरोधी आंदोलन इतना आक्रामक हो गया है कि उस पर पुलिस कार्रवाई से 31 महिलाओं की मौत भी हो चुकी है, और 30 से अधिक शहरों में आंदोलन फैल चुका है, और आंदोलनकारियों को देश भर में गिरफ्तार किया जा रहा है। बराबरी के हक पाने के लिए महिलाओं का यह आंदोलन बहुत ही महत्वपूर्ण है, और यह धर्म की कट्टरता को एक चुनौती भी है। हम यह तो नहीं कहते कि ये शहादत तुरंत ही सुधार ले आएंगी, लेकिन ये धार्मिक-कट्टर सरकार को कुछ सोचने को मजबूर जरूर कर सकती है। यह एक ऐसा मौका है कि दुनिया के लोगों को आगे आकर ईरानी महिलाओं के हक का साथ देना चाहिए। दुनिया की कई सरकारें ईरान के साथ अपने संबंधों को देखते हुए इस मुद्दे पर चुप रहेंगी, सोशल मीडिया पर यह भी सवाल उठाया गया है कि हिन्दुस्तान जैसे देश में सरकार तो सरकार, कोई राजनीतिक दल भी इस पर बोलने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में दुनिया भर के आजादी के हिमायती लोगों को खुलकर सामने आना चाहिए, और महिलाओं से भेदभाव के इस इस्लामिक माहौल का विरोध करना चाहिए। जो लोग भारत में मुस्लिम महिला के अधिकारों को लेकर फिक्र कर रहे हैं, उनके मुंह भी ईरानी महिलाओं के इस महत्वपूर्ण आंदोलन को लेकर खुल नहीं रहे हैं। महिलाएं तकरीबन तमाम दुनिया में दबी-कुचली रहती हैं, और जब वे एक अलोकतांत्रिक और बर्बर सरकार के खिलाफ सडक़ों पर उतरी हैं, तो दुनिया को उनका साथ देना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितम्बर 2022


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उम्र हो गई लेकिन गहलोत की नाजायज हसरतों का ऊफान ठंडा नहीं पड़ रहा..

   22  सितंबर  2022
  

कांग्रेस अध्यक्ष के लिए होने जा रहे चुनाव को लेकर यह चर्चा है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सोनिया परिवार के पसंदीदा हैं। ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि वे उम्रदराज हैं, और एक या दो कार्यकाल के बाद उनकी अधिक महत्वाकांक्षा या उम्र नहीं रह जाएगी, और अगर राहुल गांधी को दुबारा कोई ओहदा देने की नौबत आएगी तो गहलोत कोई जवान रोड़ा नहीं रहेंगे। यह एक अच्छी बात है कि कांग्रेस के भीतर एक औपचारिक चुनाव की औपचारिकता हो रही है, और एक से अधिक लोगों के अध्यक्ष चुनाव में उतरने की चर्चा है। इस मुद्दे पर अभी लिखने को कुछ खास नहीं है, लेकिन चुनाव के सवालों के बीच जब गहलोत से पूछा गया कि अगर वे कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं तो क्या वे ‘एक व्यक्ति एक पद’ के नियम के मुताबिक मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे? तो उनका जवाब था कि अध्यक्ष का चुनाव तो खुला चुनाव है, और इसे कोई भी लड़ सकता है, पार्टी का यह नियम मनोनीत पदों के लिए है। उन्होंने बड़े खुलासे से यह बात साफ कर दी कि वे पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए भी मुख्यमंत्री तो बने ही रहेंगे।

कांग्रेस पार्टी की बर्बादी के लिए कुछ लोग शौकिया तौर पर सोनिया-परिवार पर तोहमत लगाते हैं, लेकिन गहलोत का यह ताजा बयान बताता है कि पार्टी के बहुत से नेताओं के अहंकार, और उनकी मतलबपरस्ती पार्टी के आज के बदहाल के लिए बराबरी से जिम्मेदार हैं। अब देश भर में फैली हुई कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए, मिट्टी में मिली हुई दिखती पार्टी को उठाकर खड़े करने की एक बड़ी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने के बजाय गहलोत साथ-साथ मुख्यमंत्री भी बने रहना चाहते हैं। यह बात उन लोगों को हक्का-बक्का करती है जिन्हें लगता है कि एक पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्ष होने के बाद शायद कांग्रेस की हालत सुधर जाए। पार्टटाईम पार्टी अध्यक्ष तो सोनिया गांधी भी हैं, और अगर राजस्थान का मुख्यमंत्री पार्टटाईम पार्टी अध्यक्ष रहना चाहता है, तो उसकी बात कौन सुनेगा? कांग्रेस के सिर पर छाए गहरे काले बादल छंटने का आसार नहीं दिखता। इस ऐतिहासिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी किसी की हसरत अपने प्रदेश का मुख्यमंत्री भी साथ-साथ बने रहने की है, तो वह हसरत पार्टी के लिए जानलेवा रहेगी। अदालत के कटघरे में घिरा हुआ कोई मुजरिम जिस तरह अपने बचाव के लिए तरह-तरह के तर्क ढूंढता है, कुछ उसी तरह के तर्क गहलोत दो कुर्सियों पर बैठे रहने के लिए जुटा रहे हैं कि ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का नियम सिर्फ मनोनीत लोगों के लिए है।

आज देश में कांग्रेस के कुल दो मुख्यमंत्री बचे हैं, उनमें से एक का लालच आज अगर इतना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी वह एक राज्य का सीएम बने रहना चाहता है, तो फिर ऐसे लोगों को पार्टी के लिए त्याग करने के दावे नहीं करने चाहिए। यह बात हम वैसे तो कांग्रेस को लेकर लिख रहे हैं, और गहलोत के बयान के बाद लिख रहे हैं, लेकिन भारतीय राजनीति को देखते हुए यह बात साफ है कि पार्टियों के अध्यक्ष पद पर, या प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री जैसे पदों पर लोगों का आना सीमित समय के लिए होना चाहिए। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका में राष्ट्रपति कुल चार बरस का कार्यकाल लेकर आते हैं, और वे अधिक से अधिक दो ऐसे कार्यकाल पा सकते हैं, और उसके बाद बाकी तमाम जिंदगी किसी सरकारी ओहदे पर नहीं जा सकते। आज हिन्दुस्तान में पीएम और सीएम की कुर्सी पर लोग तमाम जिंदगी बने रह सकते हैं, उस पर कोई रोक नहीं है। और फिर इस कुर्सी पर लगातार बने रहने के लिए लोग तरह-तरह के जायज और नाजायज तरीकों से ताकत जुटाते हैं, समर्थन जुटाते हैं, और विरोधियों को शांत करने के लिए तरह-तरह की जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अगर पार्टियां यह तय नहीं करती हैं कि उनके पीएम और सीएम दो कार्यकाल से अधिक नहीं रहेंगे, तो फिर चुनाव आयोग को ही इस तरह की बात उठानी चाहिए, और कहीं न कहीं से इस पर बहस शुरू होनी चाहिए। लोकतंत्र में हर बीमारी का इलाज कानून से नहीं निकल सकता, दुनिया के बहुत से गौरवशाली और विकसित लोकतंत्र परंपराओं पर चलते हैं, और इन परपंराओं को कानून बनाकर नहीं बनाया जा सकता। जो राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोडऩे के बाद परिवार से बाहर के किसी अध्यक्ष के लिए दो बरस से जिद पर अड़े हैं, उन्हें ही पार्टी के पिछले शिविर में इस बात को उठाना था कि पार्टी अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, सीएम और पीएम जैसे पदों पर दो बार से अधिक कोई लगातार नहीं रहेंगे। अगर जिंदगी में कभी दुबारा किसी को उसी कुर्सी पर आना भी है, तो भी कार्यकाल के बराबरी का फासला बीच में होना जरूरी रहना चाहिए।

जब पार्टियों के भीतर किसी भी तरह का लोकतंत्र न रह जाए, तब उन पार्टियों के तय किए हुए उम्मीदवार मनमाने होंगे, और उनसे बनी हुई सरकारें भी मनमानी करती रहेंगी। देश की मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था देश की पार्टियों की मजबूत आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बिना नहीं बन सकती। एक-एक कुनबे में कैद पार्टी लीडरशिप, और उनके लड़े गए चुनावों से लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। जिन अशोक गहलोत की बात से आज की यह चर्चा शुरू हुई है, उसे सार्वजनिक रूप से खारिज करने की जरूरत है। आज देश में कांग्रेस के पास गिने-चुने ओहदे रह गए हैं, और उनमें से दो सबसे बड़े ओहदे अगर कोई एक आदमी कब्जाना चाहता है, तो यह बहुत ही नाजायज सोच है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है 21 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

महिला खिलाडिय़ों को पुरूष शौचालय में खाना देने वाला यह गजब देश!

    21  सितंबर  2022
  

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर से निकला हुआ एक वीडियो चारों तरफ फैल रहा है जिसमें राज्य कबड्डी प्रतियोगिता में आई महिलाओं को शौचालय में खाना परोसा दिखाया गया है। यह खुलेआम दिन की रौशनी में हो रहा है, और शौचालय के फर्श पर से सबको खाना दिया जा रहा है। शौचालय को देखकर बताया जा सकता है कि यह पुरूषों के लिए बना हुआ है, और मूत्रालयों के सामने ही फर्श से लड़कियां खाना ले रही हैं। हिन्दुस्तान में गरीब खिलाडिय़ों को आमतौर पर ऐसे ही दौर से गुजरना होता है। जो निजी मुकाबलों वाले खेल रहते हैं, वहां तो कुछ खिलाडिय़ों के मां-बाप संपन्न होने की वजह से उनके साथ सफर कर लेते हैं, उन्हें ठीक से ठहरा लेते हैं। लेकिन तमाम किस्म के मुकाबलों के तकरीबन तमाम खिलाडिय़ों को ऐसी ही बदहाली में सफर करना होता है, काम चलाऊ जगह पर नहाना-सोना होता है, और शौचालय में खाना पकाने और खिलाने का यह मामला तो भारत में खेलों के प्रति सरकारी रूख का एक नया रिकॉर्ड है। और सरकार से परे भी इस देश में जितने खेल संगठन हैं, उनमें से अधिकतर का यही हाल है। इसी उत्तरप्रदेश के खेलों से जुड़े एक नेता का एक अश्लील वीडियो अभी कुछ दिन पहले ही सामने आया था जिसमें वे एक महिला के साथ अंतरंग हालत में दिख रहे थे। यह बात भी भारतीय खेलों में कई जगह सुनाई पड़ती है कि खिलाडिय़ों को टीम में चुने जाने के लिए कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं।

एक तरफ कुछ चुनिंदा खेलों, और चुनिंदा प्रदेशों से निकलकर खिलाड़ी दुनिया भर में लगातार देश का नाम रौशन करते हैं, लेकिन हरियाणा, पंजाब, मणिपुर जैसे कुछ गिने-चुने राज्यों को छोड़ दें, तो अधिकतर राज्यों से कोई खिलाड़ी निकलकर आगे बढ़ते नहीं दिखते हैं, जबकि वहां आबादी बहुत है, और वहां राज्यों में सौ तरह की सरकारी फिजूलखर्ची भी दिखती है। और हम खेलों को किसी अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में मैडल के हिसाब से भी नहीं देखते। हम खेलों को टीम भावना और खिलाड़ी भावना विकसित करने के लिए जरूरी समझते हैं, लोगों को जिंदगी भर फिटनेस और अच्छी सेहत की तरफ ले जाने के लिए भी कमउम्र से खेल जरूरी समझते हैं। लेकिन अधिकतर राज्यों में स्कूल शिक्षा विभाग आमतौर पर भ्रष्ट रहता है, और उसी के चलते खेलों के सामान से लेकर खेल के आयोजनों तक सब कुछ बर्बाद रहता है। फिर स्कूलों से ही बच्चों पर पढ़ाई-लिखाई का दबाव इतना बढ़ा दिया जाता है कि खेलों में दिलचस्पी को अधिकतर मां-बाप वक्त की बर्बादी मानकर चलते हैं, और हम आधी सदी पहले से यह नारा सुनते आए हैं- खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब।

अब स्कूलों की किताबी शिक्षा को हिन्दुस्तान में इतना महत्व दे दिया गया है कि बच्चों के मां-बाप अपने बच्चों को उससे परे कुछ करने ही देना नहीं चाहते। ऐसे माहौल के बीच अगर कुछ बच्चे अपने मां-बाप की सहमति, अनुमति, या उनके दिए हौसले से खेलों में आगे बढऩा चाहते हैं, तो न उनके खानपान का इंतजाम रहता, न उनके पास जूते और सामान रहते, और न ही उनके लिए सफर या रहने-खाने का ठीकठाक इंतजाम रहता। हालत यह है कि अंतरराष्ट्रीय मैडल लाने वाले अधिकतर खिलाड़ी किसी निजी कारोबार से मदद पाकर तैयारी किए हुए रहते हैं, वे रवानगी के आखिरी पल तक सरकार या खेल संघों की तानाशाही से जूझते रहते हैं, जो मैडल लेने के करीब पहुंचे रहते हैं, उनके कोच को बदलने में खेल संघों की राजनीति जुट जाती है, और क्वार्टर फाइनल के पहले का मुकाबला तो ये खिलाड़ी अपने खेल संघों और अपनी सरकारों से जीतकर ही टूर्नामेंट में पहुंच पाते हैं।

आज देश भर में खेलों को राजनीति से अलग करने की बात चलते रहती है, खेल संघों में सिर्फ खिलाड़ी-पदाधिकारी रहें, यह बात भी लंबे वक्त से कही जा रही है, लेकिन हम बीसीसीआई से लेकर राज्यों के क्रिकेट संघों तक, और भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन से राज्यों के ओलंपिक संघ तक देखते हैं कि अधिकतर जगहों पर गैरखिलाड़ी नेता, अफसर, कारोबारी काबिज हैं, और वे इन खेलों पर कब्जा करके अपना सार्वजनिक अस्तित्व बनाए रखते हैं, शायद मोटी कमाई भी करते हैं। खेल संघों के लोग और सरकार के खेल विभागों के लोग खिलाडिय़ों का सौ तरह से शोषण भी करते हैं, और उस बारे में अधिक लिखने का मतलब कई मां-बाप का हौसला पस्त करना होगा।

उत्तरप्रदेश के जिस जिले में लड़कियों के लिए पुरूष शौचालय में खाना पकाकर वहां खिलाया गया है, फर्श पर धरा खाना दिखता है, उनकी टीम में अगर एक भी नेता या अफसर के बच्चे होते, तो पूरा माहौल बदल गया होता। गरीब बच्चों के खेल में खिलाडिय़ों का यही हाल देखने मिलता है। दुनिया के न सिर्फ विकसित देश, बल्कि कई गरीब देश भी अपने खिलाडिय़ों को सहूलियत, अच्छा माहौल, और हिफाजत देकर उन्हें आगे बढ़ाते हैं। हिन्दुस्तान में बचपन से ही खिलाड़ी जिस गंदी राजनीति, भ्रष्ट सरकारी कामकाज, और तानाशाह खेल संघ देखते हुए आगे बढ़ते हैं, उनके मन में इन सबके लिए हिकारत पनपती होगी। खिलाडिय़ों के बीच से इन सबके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। अभी यह एक वीडियो सामने आया, तो देश भर में इससे खबरें बनीं, और हमें भी यह लिखना सूझा। ऐसे अधिक से अधिक भांडाफोड़ होने चाहिए, और उसके बाद ही किसी तरह के सुधार का रास्ता खुल सकेगा

(Daily Chhattisgarh)

पुलिस के मिजाज की हिंसा के सुबूत जुटाने की जरूरत

   20  सितंबर  2022
  

मध्यप्रदेश के झाबुआ में कॉलेज छात्रों को उनके सीनियर छात्र परेशान कर रहे थे, पीट रहे थे तो उन्हें यह खतरा था कि वे हॉस्टल लौटेंगे तो और मार खाएंगे। उन्होंने पुलिस से हिफाजत मांगी तो वह नहीं मिली। इस पर उन्होंने जिले के पुलिस अधीक्षक को फोन किया, और मदद मांगी कि वहां से उन्हें और बुरी गंदी-गंदी गालियां सुनने मिलीं, और गिरफ्तारी की धमकी भी। यह बातचीत फोन पर रिकॉर्ड कर ली गई थी, और मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा। आवाज की जांच करने के बाद एसपी को सस्पेंड कर दिया गया है। इस घटना में नया कुछ भी नहीं है, सिवाय इसके कि एक बड़े अफसर से फोन पर की गई बातचीत रिकॉर्ड कर लिए जाने से जो सुबूत जुटा, उसकी बिना पर अफसर पर यह कार्रवाई हो सकी, अगर यह रिकॉर्डिंग नहीं होती, तो जिले के पुलिस कप्तान का कुछ भी नहीं बिगड़ा होता। आज चारों तरफ इस तरह की कॉल रिकॉर्ड करने की बात सामने आती है, और उसके बाद भी अगर लोग टेलीफोन पर धमकी देने, हिंसक और अश्लील बात करने से नहीं कतराते हैं, तो यह उनकी समझ की कमी भी है। आज वक्त ऐसा है कि हर किसी को यह मानकर चलना चाहिए कि उनकी बातचीत रिकॉर्ड तो हो ही रही है, और इसके लिए किसी खुफिया एजेंसी की जरूरत नहीं है, जिससे बात हो रही है वे भी इसकी रिकॉर्डिंग कर सकते हैं।
लेकिन बात रिकॉर्डिंग से परे की है, और पुलिस की बददिमागी की है। किसी भी जिले का पुलिस अधीक्षक बनना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पाना होता है। अफसर के हाथ में सरकार बहुत से घोषित और अघोषित अधिकार देती है, और उससे कई तरह की जायज और नाजायज उम्मीद भी करती है। अंग्रेजों के समय में जिस तरह जिला कलेक्टर अंग्रेज सरकार के एजेंट रहते थे, उसी तरह आज देश के अधिकतर प्रदेशों में कलेक्टर और एसपी सरकार के ऐसे ही एजेंट रहते हैं। और इसी हैसियत की वजह से वे करोड़ों-अरबों कमाते हैं, सरकार की राजनीतिक पसंद और नापसंद के मुताबिक कानून को हांकते हैं, और यह करते हुए वे बड़े बददिमाग भी हो जाते हैं। मध्यप्रदेश कोई अकेला ऐसा राज्य नहीं है, देश के अधिकतर राज्यों में जिलों के कलेक्टर और एसपी का यही हाल रहता है। और उनका यह मिजाज मातहत लोगों पर भी उतरते चलता है। इन दोनों दफ्तरों की जवाबदेही बहुत कम कर दी जाती है, और नतीजा यह होता है कि वे सामंती अंदाज में काम करने लगते हैं। हिन्दुस्तान में यह बात कही भी जाती है कि असली ताकत पीएम, सीएम, और डीएम में होती है। डीएम की देखादेखी जिलों के एसपी भी तानाशाह हो जाते हैं, और एक मामूली सी एफआईआर होने या न होने का फैसला भी पुलिस कप्तान की मर्जी से होता है। अभी लगातार यह देखने में आता है कि सत्ता से जुड़े हुए बड़े-बड़े कारोबारी अपनी कारोबारी दिलचस्पी के मामले पुलिस की दखल से निपटाने लगते हैं।
अब मध्यप्रदेश में तो पुलिस कप्तान ने सिर्फ गालियां दी हैं, और गिरफ्तारी की धमकी दी है, लेकिन देश भर से ऐसे वीडियो आते ही रहते हैं जिनमें बहुत बुरी तरह बर्ताव करते हुए पुलिस शिकायतकर्ताओं को ही पीटती दिखती है। अभी कल ही उत्तर भारत का कोई वीडियो सामने आया है जिसमें परिवार की लडक़ी से बलात्कार की शिकायत करने पहुंचे परिवार को पुलिस अफसर ही बहुत बुरी तरह पीटते दिख रहा है। हमारा अपना आम जिंदगी का तजुर्बा यही रहा है कि पुलिस को किसी मामले में दखल देने के लिए बुलाया जाए, तो वह आते ही गालियां देना, और पीटना शुरू कर देती है। ऐसे में शरीफ लोगों को धीरे-धीरे यह लगने लगता है कि मामूली गाली-गलौज और पिटाई की शिकायत करके पुलिस को बुलाने का उल्टा ही नतीजा होता है, और यही दोनों बातें और अधिक होने लगती हैं।
यह सोचा जाए कि पुलिस का ऐसा हिंसक बर्ताव क्यों रहता है, तो अलग-अलग समय पर बने हुए पुलिस आयोगों की रिपोर्ट सरकारों के पास धूल खाते पड़ी हैं जिनमें पुलिस के काम करने के हालात सुधारने की सिफारिश की गई है। यह बात बड़ी आम है कि अगर ऊपरी कमाई की गुंजाइश न रहे, तो पुलिस की नौकरी में किसी भी दूसरे सरकारी महकमे के मुकाबले काम के घंटे अधिक रहते हैं, रात-दिन का ठिकाना नहीं रहता है, कई किस्म के खतरे रहते हैं, और छुट्टियां नहीं मिलती हैं। फिर भी लोग पुलिस की नौकरी पाने के लिए लगे रहते हैं। ऊपरी कमाई की सहूलियत को अगर छोड़ दें, तो पुलिस की नौकरी में आमतौर पर नेताओं की जी-हजूरी करने, और सत्ता के पसंदीदा मुजरिमों को छोडऩे, सत्ता के खिलाफ बागी तेवर रखने वाले बेकसूरों के खिलाफ झूठे केस बनाने का काम पुलिस में रात-दिन चलता है। नतीजा यह होता है कि पुलिस की सोच से इंसाफ पूरी तरह खत्म हो चुका रहता है, और उसे यही लगता है कि या तो उसे ऊपर के लोगों की मर्जी का काम करना है, या अपने स्तर पर कोई फैसला लेना है तो अपनी मर्जी चलाना ही उसका अधिकार है। जहां जिम्मेदारी की सोच खत्म हो जाती है, जहां रिश्वत देकर कुर्सी पाई जाती है, जहां पर कुर्सी पाकर कमाई करना ही मकसद रह जाता है, वहां पर नैतिकता, लोकतंत्र, जवाबदेही जैसे शब्द निरर्थक हो जाते हैं। इसलिए पुलिस की बदसलूकी, उसकी हिंसा का सीधा रिश्ता राजनीतिक दखल और दबाव से टूटे हुए मनोबल से रहता है। फिर यह भी है कि जब एक बार राजनीतिक दबाव की वजह से माफिया को बचाना है, और शरीफ को फंसाना है, तो ऐसे जुर्म से सने हुए अपने हाथों से पुलिस अपने लिए भी कमाने लगती है।
पुलिस सरकार का एक कोई दूसरा आम महकमा नहीं है, वह न्याय व्यवस्था का एक हिस्सा भी है। पुलिस से ही न्याय व्यवस्था शुरू होती है, और वही अदालत में फैसला होने तक जांच, सुबूत, गवाह, निष्कर्ष, और अदालती बहस का सामान जुटाती है। जब पुलिस ही टूटे मनोबल की भ्रष्ट संस्था हो जाती है, तो इंसाफ का पूरा सिलसिला ही पहले स्टेशन पर ही पटरी से उतर जाता है, और फैसले तक का लंबा सफर कदम-कदम पर एक भ्रष्ट और निकम्मी पुलिस के साथ तय होता है। लेकिन हमारी लिखी बहुत सी बातें, खासकर काम की अमानवीय परिस्थितियों की बात छोटे पुलिस कर्मचारियों पर तो लागू होती है, लेकिन बड़े अफसरों पर नहीं। किसी जिले के एसपी किसी अमानवीय स्थिति में काम नहीं करते, वे सहूलियतों से घिरे रहते हैं, और मातहत कर्मचारियों की फौज उनकी मालिश-पॉलिश करने को तैनात रहती है। इसलिए उनकी गाली-गलौज को काम के किसी बोझ से जोडक़र नहीं देखा जा सकता। अगर वे कमजोर आम लोगों के साथ ऐसा बर्ताव करते हैं, तो वे मिजाज से हिंसक और अराजक हैं। हमने मध्यप्रदेश के एक मामले को महज मिसाल बनाकर यह बात यहां लिखी है, देश भर में अगर लोग पुलिस अफसरों से फोन पर बात करते हुए, या मिलते हुए बातचीत रिकॉर्ड करने लगें, तो आधे अफसरों के सस्पेंड होने की नौबत आ जाएगी। फिलहाल इस मामले से यह सबक तो मिलता ही है कि लोगों को जहां भी हो सके बातचीत रिकॉर्ड करना चाहिए ताकि ऐसी कार्रवाई हो सके। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

यह जहर यूनियन कार्बाइड कारखाने के दर्जे का है...

   19  सितंबर  2022
   

उत्तरप्रदेश के योगीराज का एक दिलचस्प मामला सामने आया है। पिछले पांच दिनों से देश के कई उत्साही, समर्पित, राष्ट्रवादी, और हिन्दुत्व-रक्षक टीवी चैनल यूपी के एक डॉक्टर के आंसुओं के साथ बहकर निकलते बयान को देश भर के घरों में पहुंचा रहे थे, और घरों का फर्श गीला कर रहे थे। यह डॉक्टर रोते-रोते बता रहा था कि किस तरह उसे एक अंतरराष्ट्रीय कॉल पर धमकी दी गई है कि उदयपुर और अमरावती के बाद अब सर तन से जुदा की बारी उसकी है। मतलब यह कि हिन्दू होने की वजह से उसका सिर कलम कर दिया जाएगा। मामला भयानक बतलाते हुए बड़े-बड़े टीवी चैनल टूट पड़े थे, और यह डॉक्टर रोते-रोते ही मशहूर हो गया था। इसके आंसुओं के साथ स्क्रीन पर मुस्लिमों के पहले के किसी प्रदर्शन के वीडियो जोडक़र एक बहुत ही भयानक माहौल बना दिया गया था। और फिर यह सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में हो रहा था, और एक ऐसे व्यक्ति के साथ हो रहा था जो कि भाजपा का पश्चिमी उत्तरप्रदेश का क्षेत्रीय मीडिया प्रभारी भी था। डॉ. अरविंद वत्स च्अकेलाज् नाम के इस नेता-डॉक्टर का फेसबुक भाजपा की तस्वीरों से भरा हुआ है। उसकी पुलिस शिकायत के बाद देश का नफरती मीडिया इस शिकायत को दुहने में लग गया था, और इस आदमी को देश का अगला हिन्दू शहीद साबित करने में लग गया था। लेकिन साइबर-जुर्म अधिक लंबे नहीं चलते, और इस मामले के गुब्बारे की हवा चार-पांच दिन में ही निकल गई।

यूपी के गाजियाबाद की पुलिस ने एक प्रेस नोट जारी करके कल दोपहर बाद यह बताया है कि डॉ. अरविंद की रिपोर्ट की जांच करने पर पता लगा कि उसने वॉट्सऐप पर धमकी की एक फर्जी घटना गढ़ी थी ताकि उसे लोकप्रियता मिल जाए। जिस नंबर से इस डॉक्टर ने धमकी की कॉल आना बताया वह नंबर डॉक्टर के ही एक पुराने परिचित का निकला जिससे इलाज के बारे में डॉक्टर की बात होते रहती थी। उसे सिर तन से जुदा करने की धमकी वाला कॉल बताने की उसने कोशिश की थी, लेकिन इस झूठ का भांडाफोड़ हो गया। उस नंबर वाले ने बताया कि वह इस डॉक्टर से मिल भी चुका है, और उनसे इलाज भी करवाता है। उसने अपनी बीमारी की तस्वीरें पहले भेजी हुई हैं, और डॉक्टर ने दवाईयां भी लिखर भेजी हुई हैं। अब झूठी शोहरत पाने के चक्कर ने इस डॉक्टर ने अपने को सिर कलम करने की धमकी मिलने की रिपोर्ट लिखाई थी। योगी की पुलिस ने ही यह प्रेस नोट जारी किया है कि यह फर्जी रिपोर्ट लिखाने वाले इस डॉक्टर के खिलाफ अब कार्रवाई की जा रही है।

अब एक सवाल यह खड़ा हो रहा है कि देश के बड़े-बड़े विख्यात और कुख्यात टीवी चैनलों ने इस एक रिपोर्ट की जांच भी होने के पहले इसके साथ जोडक़र जिस तरह से मुस्लिमों के किसी प्रदर्शन के वीडियो दिखाए, और इस डॉक्टर को एक हिन्दू शहीद की तरह पेश किया, उस उगले हुए इलेक्ट्रॉनिक जहर को अब कौन निगलेगा? लोगों के बीच तो वह जहर फैलाया जा चुका है, उससे जितने लोगों के मन में नफरत का सैलाब पैदा होना है वह हो चुका है, ऐसे टीवी चैनलों के समाचार बुलेटिनों के वीडियो क्लिप वॉट्सऐप पर इतने फैल चुके हैं कि वे अनंतकाल तक तैरते ही रहेंगे। तो अब यह पूरा मामला झूठा साबित होने के बाद टीवी चैनलों पर इसे लेकर जुटे हुए दो-दो, चार-चार स्टार-एंकर अब कहां जाएंगे? जिन हिन्दूवादी कथित संतों ने इस डॉक्टर के आंसू पोंछते हुए मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाई थी, वे अब कहां मुंह छिपाएंगे? वैसे आज हिन्दुस्तान में नफरत की बात करने वालों को मुंह छिपाने की जरूरत नहीं रहती क्योंकि उनके जहर के खरीददार बहुत हैं। जहर जितना अधिक जानलेवा हो, उसकी उतनी ही बड़ी जगह भी टीवी चैनलों पर बन जाती है। और फिर हिन्दुस्तान में आज तक किस टीवी चैनल ने लोगों को मुंह छिपाने को मजबूर किया है? अभी तो वे सारे टीवी एंकर शोहरत के (या बदनामी के?) आसमान पर पहुंचे हुए हैं जिन्होंने दो हजार के नोट में एक चिप रहने का रहस्य खोला था, और बताया था कि जमीन की कितनी गहराई में यह नोट रहने पर भी मोदी का उपग्रह उसकी लोकेशन ढूंढ निकालेगा, और आकर दबोच लेगा। इस तरह की बहुत सारी शानदार मिसालें हाल के बरसों में टीवी समाचार चैनलों ने पेश की हैं, और इनमें से किसी को भी मुंह नहीं छिपाना पड़ा, क्योंकि जब झूठ का भांडाफोड़ होने की नौबत आती है, तो कभी कंगना छा जाती है, तो कभी चीता आ जाता है।

आज इस देश में प्रेस कौंसिल से लेकर ब्रॉडकास्टिंग पर काबू रखने वाले एक संगठन का भी अस्तित्व है। लेकिन मजे की बात यह है कि बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोगों की अगुवाई वाले ये संगठन मीडिया के किसी भी तरह के जुर्म के दर्जे के कारनामों पर भी कुछ नहीं करते। नतीजा यह है कि मीडिया एक गंदा शब्द हो गया है, और उसके साथ तरह-तरह के विशेषण इस्तेमाल होने लगे हैं, जो कि असल में गालियां हैं। आज हिन्दुस्तान में यह सोचने की जरूरत है कि भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कारखाने से निकली जहरीली गैस सरीखी जो खबरें ये टीवी चैनल पेश कर रहे हैं, और इस देश के लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ नफरत से भर रहे हैं, उनका क्या इलाज हो सकता है? आज तो हिन्दुस्तानी समुदाय इनके किए हुए इतना बीमार हो चुका है कि उसकी नफरती सोच का इलाज भी अगले दो-चार चुनावों के गुजर जाने तक मुमकिन नहीं दिख रहा है। जब बात-बात में देश के गद्दार होने के तमगे लोगों को बांटे जाते हैं, तो यूपी के इस डॉक्टर के बारे में तो कानून को तय करना चाहिए कि नफरत फैलाने, साम्प्रदायिकता भडक़ाने, और उसकी शोहरत पाने की यह हरकत कितने बरस कैद के लायक है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 सितम्बर 2022


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साइबर-मुजरिम बनने से भी बचें, और साइबर-जुर्म का शिकार बनने से भी...

   18  सितंबर  2022
 

चंडीगढ़ के एक निजी विश्वविद्यालय में कल से भूचाल आया हुआ है। वहां लड़कियों के हॉस्टल में एक लडक़ी ने साठ लड़कियों के नहाते हुए वीडियो बना लिए, और उन्हें अपने एक दोस्त को भेज दिया। उस दोस्त ने ये वीडियो फैला दिए। कल जब यह मामला उजागर हुआ तो आठ छात्राओं की खुदकुशी की कोशिश करने की खबर है। इनमें से कुछ की हालत गंभीर है, कुछ बेहोश हैं। हालांकि कुछ खबरों में पुलिस का यह बयान भी है कि आत्महत्या की कोशिश किसी ने नहीं की है, लड़कियां महज बेहोश हैं। विश्वविद्यालय में देर रात से छात्रों का प्रदर्शन चल रहा है। शुरुआती खबरों में बताया गया है कि वीडियो बनाने वाली छात्रा के दोस्त ने ये वीडियो इंटरनेट पर भी डाल दिए, और सामाजिक शर्मिंदगी के खतरे में शायद लड़कियों ने आत्महत्या की कोशिश की है।

इस मामले के कई पहलू हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है। एक गल्र्स हॉस्टल के भीतर ऐसी नौबत कैसे आई कि कोई लडक़ी अपने साथ की साठ छात्राओं का नहाते हुए वीडियो बना सके? दूसरी बात यह कि चाहे इससे निजता खत्म होती है, नहाना कोई जुर्म नहीं है, और नहाते हुए वीडियो फैल जाने से अगर कई छात्राओं को आत्महत्या करना जरूरी लग रहा है, तो यह समाज के भी सोचने की बात है कि उसने अश्लीलता के कैसे पैमाने बना रखे हैं कि महज नहाने के वीडियो से लड़कियों को आत्महत्या को मजबूर होना पड़े। फिर एक बड़ी बात यह भी है कि किसी यूनिवर्सिटी की छात्रा और उसके दोस्त को यह काम करते हुए यह नहीं सूझा कि आज टेक्नालॉजी की मेहरबानी से किसी भी किस्म का साइबर क्राईम शिनाख्त से परे नहीं रह पाता। रोजाना अखबारों में साइबर-जुर्म के मुजरिमों की गिरफ्तारी की खबरें आती हैं, उसके बाद भी लोग ऐसा जुर्म करने का खतरा नहीं समझ पाते हैं। सिर्फ यही एक घटना नहीं है, हिन्दुस्तान में हर कुछ हफ्तों में लोग गिरफ्तार होते हैं कि उन्होंने बच्चों के सेक्स-वीडियो इंटरनेट पर पोस्ट किए हैं। हर दिन दर्जन-दो दर्जन लोग साइबर-ठगी में गिरफ्तार होते हैं। इन सबकी खबरें भी छपती हैं। मामूली जानकारी रखने वाले लोगों को भी पता है कि किसी भी तरह के जुर्म में, साइबर-जुर्म की शिनाख्त सबसे तेज और सबसे आसान रहती है, और उसके सुबूत भी अदालतों में खड़े रहते हैं। यह सब होने के बाद भी आज लोग अगर दूसरों के नग्न वीडियो पोस्ट करने का खतरा उठा रहे हैं, तो ऐसे लोगों की साइबर-समझ पर भी तरस आता है, और यह साफ लगता है कि हिन्दुस्तान के लोगों को साइबर-जुर्म, करने से, और उसका शिकार बनने से बचाने के लिए अधिक जनजागरण की जरूरत है।

अब दो बहुत ही मामूली औजारों के बारे में बात करना जरूरी है। आज हिन्दुस्तान के अधिकतर हाथों मेें ऐसे मोबाइल फोन हैं जिनसे तस्वीरें खींची जा सकती हैं, वीडियो बनाए जा सकते हैं, और बातचीत रिकॉर्ड की जा सकती है। जिंदगी की निजता को खत्म करने का यह एक बड़ा हथियार है, जो कि दिखता एक मासूम औजार है। लोगों को अपने फोन के ऐसे इस्तेमाल से बचना चाहिए जिसके खिलाफ कोई शिकायत होने पर उनके फोन और कम्प्यूटर सबसे पहले जब्त हो जाएं। आईटी एक्ट के तहत शिकायत होने पर पहली नजर में जुर्म दिखने पर तुरंत ही लोगों के ये उपकरण जब्त होते हैं, और शिकायतकर्ता से परे भी दर्जनों लोगों की निजी जानकारी किसी भी फोन या कम्प्यूटर पर हो सकती है। जांच एजेंसियों में भी लोगों के हाथ दूसरे लोगों की ऐसी जानकारी पहुंचना ठीक नहीं है। इसलिए ऐसी किसी भी नौबत के बारे में सोचकर लोगों को यह चाहिए कि वे अपने फोन, कम्प्यूटर, सोशल मीडिया अकाऊंट, ईमेल का इस्तेमाल सावधानी से करें क्योंकि कोई दूसरे लोग भी इनका बेजा इस्तेमाल करते हैं, तो सबसे पहले आप खुद फंसते हैं। और जिसकी शिकायत होगी उससे परे भी बहुत सारे लोगों की जिंदगी इससे मुश्किल हो सकती है।

हिन्दुस्तान में आज हालत यह है कि झारखंड के जामताड़ा नाम के गांव या कस्बे में रहने वाले सैकड़ों नौजवान रात-दिन मोबाइल फोन से लोगों को ठगने का काम कर रहे हैं। और इनमें से कोई नौजवान मामूली से अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं। दूसरी तरफ खासे पढ़े-लिखे लोग जिनमें कामयाब कारोबारी भी हैं, और बड़े-बड़े सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोग भी झांसे में आ रहे हैं, धोखा खा रहे हैं, और अपनी रकम लुटा दे रहे हैं। इससे पता लगता है कि साइबर-औजारों की समझ रखने वाले लोग, जनता के मनोविज्ञान को समझकर किस तरह जुर्म का कारोबार चला सकते हैं, और पढ़े-लिखे लोग अपना सब कुछ गंवा सकते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान में निजी जीवन की निजता को सम्हालकर रखने से लेकर, अपने बैंक खातों की जानकारी को भी सम्हालकर रखने की ट्रेनिंग देने की बहुत जरूरत है। टेक्नालॉजी छलांगें लगाकर आगे बढ़ रही है, मुजरिमों की कल्पनाएं उन पर सवार होकर दूर-दूर का सफर कर रही है, बस लोग ही, पढ़े-लिखे लोग भी, अज्ञानी बने बैठे हैं जिन्हें खतरे समझ ही नहीं आ रहे। इन सब बातों के बारे में लोगों को जागरूक करना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, सोशल मीडिया पर सक्रिय या जानकार लोग भी इसका अभियान चला सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

...घर में कैद रखी महिलाएं, कलादीर्घाओं से बाहर भी हैं

4 सितम्बर 2022

 

औरतों के साथ भेदभाव हिन्दुस्तान में कुछ अधिक सर चढक़र बोलता है, लेकिन जिस पश्चिम से अधिक संवेदनशील होने, और बराबरी के अधिकार देने की उम्मीद की जाती है, वहां भी महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मामले सिर चढक़र बोलते दिखते हैं। जिंदगी के अलग-अलग बहुत से दायरों में महिलाओं के खिलाफ समाज की सोच दिखाई पड़ती है, लेकिन अभी कला की एक इतिहासकार ने एक किताब लिखी है जो पिछले कुछ सौ बरसों का सिर्फ महिला चित्रकारों का इतिहास बताती है, क्योंकि चित्रकला के इतिहास मेें महिलाओं की जगह पुरूषों के वजनतले बुरी तरह दबी हुई है।

इस बारे में अभी कुछ लोगों ने लिखना शुरू किया है, और ऑस्ट्रेलिया की नेशनल गैलरी पर किया गया एक अध्ययन बताता है कि वहां कलाकृतियों के संग्रह में सिर्फ एक चौथाई कलाकृतियां ही महिलाओं की बनाई हुई हैं। लेकिन यह फिर भी बाकी दुनिया के मुकाबले बेहतर है जहां पर कलादीर्घाओं में प्रदर्शित प्रमुख कलाकृतियों में से 90 फीसदी पुरूषों की बनाई हुई हैं। अभी प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी महिला कलाकार की बनाई हुई दुनिया की अब तक सबसे महंगी बिकी पेंटिंग, दुनिया की सौ सबसे महंगी पेंटिंग्स में भी नहीं हैं। जाहिर है कि किसी महिला कलाकार का नाम जुड़ जाने से ही उसका महत्व कम होने लगता है, और इसकी एक वजह शायद यह भी है कि दुनिया में कलाकृतियां खरीदने वाले तकरीबन तमाम लोग मर्द ही हैं।

तो अब एक यह बहस चल रही है कि क्या किसी महिला कलाकार, और किसी पुरूष कलाकार की बनाई हुई पेंटिंग्स में ऐसा बुनियादी फर्क रहता है कि वे कला के पैमानों पर कमजोर रहती हैं?

इसी बात को देखने के लिए अभी एक प्रयोग किया गया जिसमें कला की समझ रखने वाले लोगों को एक ही किस्म की शैली वाली ऐसी पेंटिंग्स दिखाई गईं जिनके पीछे महिला और पुरूष दोनों ही कलाकारों का हाथ था। चित्रकारों के नाम छुपा दिए गए थे, और महज पेंटिंग देखकर लोगों को अपनी पसंद तय करनी थी। आधे से अधिक लोगों ने महिला चित्रकारों की बनाई गई पेंटिंग्स पसंद कीं। लेकिन जब इन्हीं लोगों के सामने प्रमुख कलाकारों की जानी-मानी और चर्चित पेंटिंग्स रखी गईं, तो उन्होंने पुरूष कलाकारों की बनाई पेंटिंग्स पसंद कीं, शायद इसलिए कि उन कलाकारों के नाम उन्हें मालूम थे। लेकिन फिर ऐसा क्या हो जाता है कि जब असल जिंदगी की सरकारी और प्रमुख कलादीर्घाओं में कलाकृतियों को रखने की बारी आती है तो वहां पुरूषों का एकाधिकार दिखता है? क्या ऐसा इसलिए होता है कि संग्रहालयों और कलादीर्घाओं का इंतजाम मोटेतौर पर पुरूषों के हाथ रहता है, मीडिया से लेकर कलाकृतियों के खरीददारों तक, नीलामघरों तक पुरूषों का तकरीबन एकाधिकार रहता है। क्या सचमुच ही पुरूषों का एकाधिकार उनके मातहत आने वाले दायरों में दूसरे पुरूषों को बढ़ावा देता है? और क्या इस तरह पुरूषप्रधान समाज और भी अधिक पुरूषप्रधान होते चलता है?

हम इसे पश्चिम से बहुत दूर हिन्दुस्तान में, और कला से बहुत दूर राजनीति और सार्वजनिक जीवन से जोडक़र देखें तो शहरों के वार्डों से लेकर गांवों की पंचायतों तक महिलाओं के आरक्षण के बाद भी उनके ओहदों को उनके मर्द ही दुहते दिखते हैं। अभी कुछ हफ्ते पहले ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के म्युनिसिपल कमिश्नर ने महिला पार्षदों की जगह उनके पतियों से बात करने से मना कर दिया था जो कि एक आम बात रहते आई है। गांव-गांव में आरक्षण की वजह से पंच और सरपंच बनीं महिलाओं का काम उनके पति देखते हैं, और उनका एक औपचारिक नामकरण भी पंच-पति, और सरपंच-पति हो चुका है। देश के कई प्रदेशों में तो ये पति कागजात पर सील लगाकर दस्तखत भी करते हैं। जिस तरह आज हिन्दुस्तान में यह हाल हो गया है कि वोटर विधायक चुनने के लिए किसी भी निशान पर वोट डाले, चुना हुआ विधायक तो कमल पर ही वोट डालेगा। ठीक उसी तरह लोग भले आरक्षण की वजह से महिला को चुनें, काम तो उनका पति ही करेगा। ऐसे लोगों को हिकारत की नजर से देखने वाले कुछ लोग पंच-पति को पाप, और सरपंच-पति को सांप कहकर भी बुलाते हैं।

यह भेदभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोहरत पाने वाली महिलाओं के साथ भी होता है। क्रिकेट में महिला टीम को पुरूषों के मुकाबले बहुत कम मेहनताना मिलता है, फिल्मों में महिला कलाकार को पुरूषों के मुकाबले बड़ी कम फीस मिलती है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही न्यूजीलैंड ने अपने पुरूष और महिला क्रिकेट खिलाडिय़ों के लिए बराबर मेहनताना घोषित किया है। हिन्दुस्तान जैसे देश में पुरूष खिलाडिय़ों को बहुत अधिक फायदे हैं।

कला को लेकर अभी एक किताब भी ऐसी आई है जो पिछली कुछ सदियों में महिला कलाकारों के महत्व को बताने वाली है क्योंकि पुरूषों के साथ जोडक़र जब उन्हें देखा जाता है तो वहां उनकी कोई जगह ही नहीं बनती। जिंदगी के दूसरे दायरों में भी इस भेदभाव को समझने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 सितम्बर 2022


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एक केला दान देते दर्जन भर लोग फोटो खिंचाते हैं, और दस करोड़ का गुमनाम दान!

   17  सितंबर  2022
  

चारों तरफ से बुरी खबरों के बीच चंडीगढ़ से एक अच्छी खबर आई है कि वहां पीजीआई से पहले जुड़े रहे किसी एक व्यक्ति ने अपना नाम उजागर किए बिना इस मेडिकल इंस्टीट्यूट को दस करोड़ रूपये दान किए हैं। समाचारों में बताया गया है कि इस पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन के रीनल ट्रांसप्लांट सेंटर में अगस्त में 24 किडनी ट्रांसप्लांट हुए थे, और इनमें से एक मरीज इस दानदाता का रिश्तेदार था। आज हिन्दुस्तान में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लोगों को दानदाता ढूंढते बरसों इंतजार करना पड़ता है, एक-एक, दो-दो बरस तक कानूनी कागज पूरे नहीं होते, और कई महीनों की जांच के बाद अस्पताल में उनकी बारी आती है। ऐसे में चंडीगढ़ के इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल को बिना किसी शोहरत की उम्मीद के मिला इतना बड़ा दान बाकी लोगों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।

दुनिया में दान की परंपरा कई देशों में धर्म के साथ जुड़ी रही है। चर्च में लोगों के सदस्य बनने और दान देने का रिवाज हिन्दू मंदिरों के मुकाबले अधिक औपचारिक है, और वह पैसा दुनिया के बहुत से देशों में जाता भी है। दूसरी तरफ कई धर्मों में लोग दान तो करते हैं, लेकिन उनका पैसा या तो मंदिरों और मठों में कैद रह जाता है, वहां सोने की शक्ल में तिजौरियों में बंद रहता है, और उनका किसी भी तरह का सामाजिक इस्तेमाल नहीं हो पाता। हिन्दुस्तान में धर्म से परे दान की परंपरा बड़ी सीमित है। देश के कुछ बड़े कारोबारियों ने अपनी सारी दौलत का एक बड़ा हिस्सा समाजसेवा के लिए देने की घोषणा की है, और अजीम प्रेमजी जैसे अरबपति लगातार खर्च कर भी रहे हैं। अजीम प्रेमजी और नारायण मूर्ति जैसे लोग आम मुसाफिर विमानों में इकॉनॉमी क्लास का सस्ता सफर करते हैं, और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा जनसेवा में लगाते हैं। दूसरी तरफ इस देश को लूटने के अंदाज में काम करने वाले कई चर्चित और विवादास्पद कारोबारी दान के नाम पर दो-चार दाने समाज की तरफ फेंक देते हैं, और अपनी दौलत दिन दूनी रात चौगनी बढ़ाते रहते हैं।

हिन्दुस्तान में ढेर सारे जनसंगठन, धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं, तरह-तरह के अंतरराष्ट्रीय क्लबों के भारतीय यूनिट दान के नाम पर जो कुछ करते हैं, उससे कई गुना अधिक प्रचार अपने लिए जुटाते हैं। बहुत से धार्मिक और सामाजिक संस्थानों के लोग अस्पतालों में जाकर मरीजों को एक-एक फल देकर साथ में दर्जन-दर्जन भर लोग फोटो खिंचवाते हैं, और उसे अखबारों में छपवाते हैं। अधिकतर संगठन अपने बैनर तैयार रखते हैं, और आधा दर्जन घड़े लेकर कोई प्याऊ भी शुरू किया जाता है, तो उसके पीछे बैनर लेकर एक दर्जन लोग फोटो खिंचवाने लगते हैं, और फिर उसे सोशल मीडिया पर फैलाते हैं। दान का आकार प्रचार के आकार से किसी तरह भी अनुपात में नहीं रहता। फिर दान तो वह होना चाहिए जो अपनी जरूरतों में कटौती करके, अपने साधनों को निचोडक़र दूसरे लोगों की जरूरत के लिए दिया जाए। यहां तो लोग अपने जेब खर्च जितना दान देते हैं, और किसी महान दानदाता जितनी शोहरत जुटाते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे दानदाताओं की नीयत का मखौल भी उड़ते रहता है, और उनकी तस्वीरों की लोग खिल्ली भी उड़ाते हैं। लेकिन दानदाताओं की अपार सहनशक्ति होती है, जो वे फिर कुछ दिनों में बाजार में सबसे सस्ता मिलने वाला फल लेकर और फोटोग्राफर लेकर अस्पताल रवाना हो जाते हैं, और घंटे भर में दान की संतुष्टि पाकर प्रचार में जुट जाते हैं।

दान के प्रचार में हम बहुत बुराई भी नहीं मानते क्योंकि बिलगेट्स जैसे बड़े कारोबारी ने जब अपनी दौलत का आधा हिस्सा समाजसेवा में देने का फैसला लिया, उस बारे में दुनिया को बताया, तो उनकी देखादेखी, और उनकी प्रेरणा से दुनिया के बहुत सारे दूसरे कारोबारियों ने भी इस तरह का संकल्प लिया, और समाज को वापिस देना शुरू किया। इसलिए नेक काम का प्रचार दूसरे लोगों को नेक काम के लिए प्रेरित भी करता है। लेकिन इसका एक अनुपात रहना चाहिए। हिन्दुस्तान में बहुत ही सीमित दान और असीमित प्रचार दिखता है, और खटकता भी है।

हाल ही के बरसों में जब देश में कोरोना फैला, और सरकार ने कारोबारियों से दान की उम्मीद की, तो देश के दो सबसे बड़े कारोबारियों ने अपनी एक-एक घंटे की कमाई भी शायद दान में नहीं दी। दूसरी तरफ टाटा एक ऐसा उद्योग समूह था जिसने डेढ़ हजार करोड़ रूपये से अधिक दान दिया था। इस तरह की बातों को समाज के बीच चर्चा का सामान भी बनाना चाहिए, जब तक सोशल मीडिया पर, और जनता के बीच इस तरह की तुलना करके बातचीत नहीं होगी, तब तक तो घंटे भर की कमाई देने वाले लोग भी अपने प्रचारतंत्र से अपनी महानता दिखाते रहेंगे। दान और समाजसेवा को लेकर इस देश में जागरूकता की जरूरत है, और इससे जुड़े सवाल उठाने के लिए जनता में जनजागरण की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)

इससे अधिक जायज और कौन सा तरीका हो सकता है दलबदल करने का!

   16  सितंबर  2022
   

हिन्दुस्तान की राजनीति बड़ी दिलचस्प है। पहले लोग कई काम आत्मा की आवाज पर करते थे। जब कभी विधानसभा या संसद में पार्टी के फैसले के खिलाफ वोट देना होता था, तो लोग कहते थे कि अंतरात्मा की आवाज पर वोट दिया। लेकिन फिर यह बात जब बहुत खुलकर सामने आई कि अंतरात्मा की आवाज गांधी की तस्वीरों वाले बड़े नोटों से निकलती है, तो दलबदल का कानून बना, और अंतरात्मा को कुछ आराम दिया गया। अब दलबदल कानून के तहत विधायकों या सांसदों की अंतरात्मा जब सामूहिक रूप से जागती है, तभी जाकर इस कानून से रियायत मिलती है। नतीजा यह निकला कि पहले जो जागना या जगाना सस्ते में हो जाता था, अब वह थोक में होता है, और काफी बड़ी खरीदी एक साथ करनी पड़ती है। विधायक दल या सांसद दल के लोग जब थोक में आत्मा बेचते हैं, जीते जी स्वर्ग जैसा अहसास होता है तो निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का दूसरी पार्टी में परकाया प्रवेश हो पाता है। 

अब इसका सबसे ताजा मामला गोवा में सामने आया जहां पर कांग्रेस के 11 विधायकों में से 8 भाजपा में चले गए। जाहिर है कि पिछला चुनाव इन लोगों ने भाजपा के खिलाफ ही लड़ा था, लेकिन अब अंतरात्मा अगर परकाया प्रवेश पर उतारू हो गई है, तो इसमें भला विधायकों की काया कोई रोड़ा कैसे बन सकती है? नतीजा यह हुआ कि करीब पांच बरस कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे दिगम्बर कामत भी भाजपा में चले गए। बाकी लोगों के मुकाबले दिगम्बर कामत का मामला सच में ही कुछ अलौकिक किस्म का रहा। उन्होंने न्यूज कैमरों के सामने कहा कि वे एक मंदिर गए, और वहां देवी-देवताओं से पूछा कि उनके दिमाग में भाजपा में जाने की बात उठ रही है, उन्हें क्या करना चाहिए? इस पर ईश्वर ने कहा कि बिल्कुल जाओ, फिक्र मत करो। अब यह बात तो बहुत साफ है कि जब ईश्वर ही किसी बात की इजाजत दे दें, तो फिर फिक्र की क्या बात है, और किसी नैतिकता या दलबदल कानून की, जनता के प्रति जवाबदेही की बात रह भी कहां जाती है? 

अब दिगम्बर कामत से सबक लेकर आज रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन भी यह कह सकते हैं कि वे चर्च गए थे, और वहां उन्होंने ईश्वर से कहा कि उनके मन में यूक्रेन पर हमले की बात आ रही है, क्या करें? और इस पर ईशु मसीह ने कहा कि बिल्कुल करो, फिक्र मत करो। अब ऐसी ईश्वरीय मंजूरी लेकर अगर कोई हमला किया गया है, तो संयुक्त राष्ट्र या पश्चिमी दुनिया का क्या हक बनता है कि वह इसे गलत करार दे? किसी भी धर्म के प्रति आस्था आमतौर पर कानून और संविधान से ऊपर मानी जाती है। अब दिगम्बर कामत पांच बरस कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, अभी वे कांग्रेस टिकट पर जीते थे, यह बात क्या ईश्वर को मालूम नहीं है? लेकिन इसके बाद भी अगर ईश्वर इजाजत दे रहा है, तो फिर किसी को इसे दलबदल नहीं कहना चाहिए, यही कहना चाहिए कि जो ऊपर वाले को मंजूर था। 

धर्म, और ईश्वर की धारणा लोगों के लिए कई किस्म की सहूलियत मुहैया कराती हैं। कोई कत्ल हो जाए, जवान लडक़े हैं, किसी का रेप कर बैठें, महाकाल के प्रदेश में कुपोषित बच्चों का दलिया खा जाएं, काबिल बेरोजगारों को पीछे धकेलकर नौकरियों को बेच दें, या हजार किस्म के दूसरे जुर्म करें, तो भी कोई दिक्कत नहीं है। पकड़ाए जाने पर यही कहना चाहिए कि वे अपने उपासना स्थल गए थे, उन्होंने अपने ईश्वर से पूछा था, और ईश्वर ने कहा कि ठीक है कत्ल करने से मत झिझको, रेप करने से मत झिझको, जाओ और करो, तो फिर इसके खिलाफ कोई सजा कैसे हो सकती है? अभी-अभी सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक मामलों की एक सुनवाई के दौरान एक वकील ने जजों को याद दिलाया कि देश की बड़ी अदालतों के बहुत सारे जज धार्मिक प्रतीक से लैस होकर कोर्ट में बैठते हैं। तो यह भी जाहिर है कि जब ईश्वर की इजाजत लेकर कोई जुर्म किया जाएगा, तो उन पर धार्मिक प्रतीक वाले जज कौन सा फैसला देंगे? इसलिए धर्म से मुजरिमों के दिल बड़े मजबूत होते हैं, और उनका हौसला टूट नहीं पाता है। और जब किसी धर्म के बलात्कारियों के किसी गैंगरेप से बचाने के लिए उस धर्म के झंडे-डंडे लेकर जुलूस निकलने लगते हैं, तो जाहिर है कि सर्वज्ञ, सर्वत्र, और सर्वशक्तिमान ईश्वर की उससे असहमति तो हो नहीं सकती है। अगर ईश्वर असहमत होता, तो उसके नाम पर निकाले जा रहे ऐसे जुलूसों पर बिजली तो गिरा ही सकता था, ऐसे तमाम लोगों को राख कर ही सकता था। लेकिन चूंकि बलात्कार समर्थक लोग ईश्वर की खुली निगाहों के नीचे जुलूस निकालते हैं, ईश्वर के नारे लगाते हैं, इसलिए यह मानने में कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए कि उनमें ईश्वर की मौन सहमति रहती है। और यह भी जाहिर है कि दुनिया के तमाम धर्मों में जब ईश्वर को कण-कण में मौजूद बताया जाता है, तो जब छोटी बच्चियों से दर्जन भर लोग गैंगरेप करते हैं, तो उस वक्त भी वहां पर ईश्वर तो मौजूद रहा ही होगा, और हमने बहुत सारी धार्मिक फिल्मों में देखा है, और हर धार्मिक कहानी में पढ़ा है कि किस तरह ईश्वर दुष्टों का पल भर में नाश कर देता है। इसलिए जब बच्चियों के बलात्कारी गिरोह को लंबी जिंदगी मिलती है, तो उसका बड़ा साफ मतलब है कि ऐसा सर्वशक्तिमान उस गैंगरेप को रोकना नहीं चाहता था, वरना वह आसमानी बिजली गिराकर सबको भस्म कर सकता था। 

ऐसी ही धार्मिक सहूलियत का फायदा अब विधायकों और सांसदों को मिल रहा है, और हम दिगम्बर कामत की उनके ईश्वर से बातचीत पर जरा भी शक नहीं करते क्योंकि वह ईशनिंदा जैसा काम हो जाएगा, और हमको भी अपनी जान प्यारी है। किसी होटल या रिसॉर्ट में हुए दलबदल की आलोचना करना तो ठीक हो सकता है, लेकिन किसी उपासना स्थल पर ईश्वर की सहमति और अनुमति लेकर किया गया दलबदल आलोचना के घेरे में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि ऐसे आलोचकों को याद रखना चाहिए कि ईश्वर किस तरह भस्म कर सकता है। हरिइच्छा से ऊपर कोई राजनीतिक नैतिकता नहीं हो सकती, दलबदल कानून नहीं हो सकता, क्योंकि लोकतंत्र तो अभी ताजा-ताजा फसल है, ईश्वर तो अनंतकाल से रहते आए हैं, और वे अगर दिगम्बर कामत को किसी रंग का चोला पहनने को कह रहे हैं, तो इस पर कोई आलोचना नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस को यह मानकर चुप बैठना चाहिए कि वह क्या लेकर आई थी, और क्या लेकर जाएगी।
 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 सितम्बर 2022


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