दीवारों पर लिक्खा है, 30 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

अगर मदरसे गला काटना पढ़ा रहे हैं, तो उसकी भी जांच हो और रोक लगे...

   30 जून 2022
  

राजस्थान में एक हिन्दू दर्जी की एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर जिस तरह दो मुस्लिमों ने गला काटकर हत्या की है, और उसे मोहम्मद पैगंबर का कथित अपमान करने वाली नुपूर शर्मा के समर्थन के खिलाफ किया गया बताया है, उससे चारों तरफ खलबली मची हुई है। सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर इतनी हिंसक कार्रवाई शायद पहली बार हुई है, और शायद पहली बार ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर धमकी देते हुए इस तरह वीडियो जारी हुआ है। लेकिन इन तमाम बातों पर हम कल लिख चुके हैं, और आज इससे जुड़े हुए एक पहलू पर लिखने की वजह केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के एक बयान से आई है, जिन्होंने यह सवाल उठाया है कि  मदरसों में छोटे बच्चों को यह पढ़ाया जाता है कि ईशनिंदा (अल्लाह की निंदा), की सजा सिर काटना है। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम कानून कुरान से नहीं आता है, वह बाद के राजाओं के समय इँसानों का लिखा हुआ जो सिर काटने की सजा लिखता है। आरिफ मोहम्मद खान ने इस पर अफसोस जाहिर किया कि यह कानून बच्चों को मदरसों में पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पांच-छह बरस की उम्र से ही ऐसा कानून मदरसों में पढ़ाया जाता है, और अगर बच्चे उससे प्रभावित होते हैं, और उसके मुताबिक काम करते हैं, तो फिर वे अपने धर्म की रक्षा के नाम पर कोई भी काम करने को तैयार हो सकते हैं। उन्होंने यह राय भी जाहिर की कि चौदह बरस की उम्र तक बच्चों को सामान्य शिक्षा ही देनी चाहिए, और यह उनका मौलिक अधिकार भी है। उन्होंने कहा कि इस उम्र के पहले उन्हें कोई विशेष शिक्षा नहीं देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा है, इसकी फिर से जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुरान ऐसी सजा नहीं सुझाता, यह बाद के लोगों ने लिखा है।

आज देश राजस्थान के इस ताजा धार्मिक हमले को लेकर विचलित है, इसलिए ऐसे हमलावरों की सोच के हर पहलू पर चर्चा हो रही है। आरिफ मोहम्मद खान भाजपा के बनाए हुए राज्यपाल हैं, और उनका नाम अभी कुछ दिन पहले तक राष्ट्रपति पद के संभावित एनडीए उम्मीदवार के लिए भी खबरों की अटकलों में था। लेकिन भाजपा से उनके संबंधों की वजह से उनकी बात का वजन कम नहीं होता। मदरसों के खिलाफ हिन्दूवादी ताकतों की सोच के पीछे उनकी बदनीयत हो सकती है, लेकिन एक जाहिर सा दूसरा सवाल यह भी है कि क्या आज के जमाने में गरीब मुस्लिम बच्चों को बचपन से ही मदरसों में धर्म की शिक्षा देना, और उन्हें सामान्य औपचारिक स्कूली शिक्षा से दूर रखना कोई जायज बात है? ईसाई स्कूलों में भी बच्चों को धार्मिक पाठ पढ़ाए जाते हैं, या उनसे धार्मिक प्रार्थना करवाई जाती है। कुछ दूसरे अल्पसंख्यक धर्मों के स्कूलों में भी ऐसा होता होगा क्योंकि उनका दर्जा ही धार्मिक अल्पसंख्यक आधार पर बने हुए शैक्षणिक संस्थान है। ऐसे किसी भी स्कूल-कॉलेज में अगर बच्चों को आज की बाकी औपचारिक शिक्षा से परे सिर्फ धर्म पढ़ाया जाएगा, तो वह उन बच्चों की जिंदगी खराब करने के अलावा और कुछ नहीं रहेगा। मुस्लिम मदरसों को धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक होने के नाते मर्जी का पाठ्यक्रम पढ़ाने की छूट मिली भी हो, तो भी उस तबके के गरीब बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार को यह सोचना होगा कि क्या उन्हें सिर्फ इसी तरह की शिक्षा देना जायज है?

भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर धर्मनिरपेक्ष ताकतें लगातार सक्रिय रहती हैं। इनमें ऐसे राजनीतिक दल भी रहे जिन्होंने शाहबानो के वक्त एक अकेली मुस्लिम महिला के हकों के खिलाफ अड़े हुए मुस्लिम दकियानूसी मर्दों के वोटर-बाहुबल के सामने समर्पण कर दिया था, और संसद में नया कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। फिर धार्मिक आधार पर ही इस तबके को कई तरह की छूट देने का सिलसिला भी चले आ रहा था जिसकी कुछ बातों को केन्द्र की मोदी सरकार ने बदला है। इसमें मुस्लिम महिला के अधिकार बढ़ाने के लिए तीन तलाक के खिलाफ बनाया गया कानून है। मोदी सरकार की दूसरी कई नीतियों के चलते हुए तीन तलाक के कानून को भी मुस्लिम विरोधी करार दिया गया जबकि इससे मुस्लिम महिला के अधिकार बढ़ रहे थे, और मुस्लिम पुरूष के अधिकार कम हो रहे थे। देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय का साथ देते हुए मुस्लिम महिला के अधिकारों को अलग से देखने से कई बार कतराती भी हैं, क्योंकि वह इसे मुस्लिम समाज के भीतर का मुद्दा मानती हैं। अब हिन्दू समाज में भी बाल विवाह से लेकर सतीप्रथा तक बहुत सी बातें समाज के भीतर की थीं, लेकिन समाज के भीतर का कोई सुधार इन बातों को खत्म नहीं कर पा रहा था, और आखिर में देश की सरकार को कानून बनाकर ही हिन्दू समाज की इन रूढिय़ों को खत्म करना पड़ा था। तमाम कानून के बावजूद आज भी बाल विवाह बड़े पैमाने पर चल रहा है, और कानून भी उसे नहीं रोक पा रहा है। ऐसे में मदरसों को लेकर अगर उनमें धर्म शिक्षा से परे औपचारिक शिक्षा की बात होती है, तो उसे मुस्लिम समुदाय के धार्मिक मामलों में दखल नहीं मानना चाहिए। ऐसे मदरसे दुनिया में एक ऐसी पीढ़ी ला रहे हैं जो कि धार्मिक व्यवस्था पर परजीवी की तरह टिकी रहेगी, और आधुनिक दुनिया में अधिक आगे बढऩे के लायक नहीं बनेगी। किसी तबके को धार्मिक अल्पसंख्यक आधार पर शिक्षा के ऐसे धार्मिक अधिकार को देने का एक मतलब यह भी है कि उस धर्म की एक पीढ़ी के बहुत से लोगों को हमेशा के लिए पिछड़ा बना देना। यह सिलसिला उस समुदाय के साथ भी बेइंसाफी है, और बच्चों की उस पीढ़ी के साथ तो बेइंसाफी है ही जो कि अपना फैसला खुद नहीं ले पाती।

चाहे स्कूल-कॉलेज हो, चाहे किसी दूसरे धर्म से जुड़े हुए ऐसे तथाकथित सांस्कृतिक संगठन हों जो कि धार्मिक आधार पर बच्चों के दिमाग में जहर भरते हैं, कट्टरता भरते हैं, उन सब पर रोक लगानी चाहिए। आज देश में कई तरह की धार्मिक कट्टरता एक-दूसरे की प्रतिक्रिया में बढ़ती चली जा रही हैं, इस पर रोक लगाने के लिए भी पढ़ाई-लिखाई में से धर्म की भूमिका कम करने की जरूरत है। और सिर्फ धार्मिक पढ़ाई तो एक पीढ़ी के भविष्य को बर्बाद कर देने के अलावा कुछ नहीं है, और ऐसे लोग अपने धार्मिक स्थानों पर दान पर पलने वाले लोग बनकर रह जाते हैं, जिन्हें किसी धार्मिक फतवे से किसी हिंसा में झोंक देना आसान रहता है। इसलिए देश के तमाम शैक्षणिक संस्थानों को धार्मिक शिक्षा से अलग करने की जरूरत है, और जब व्यापक स्तर पर ऐसा किया जाएगा तो समझ आएगा कि इससे सिर्फ मदरसे प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि दूसरी धर्मों के शैक्षणिक संस्थान भी प्रभावित होंगे, उनकी पढ़ाई की किताबें भी प्रभावित होंगी। फिलहाल तो राजस्थान की इस ताजा हिंसा को देखते हुए इस बात की जांच की जरूरत है कि क्या मदरसों में ईशनिंदा पर गला काटने की सजा सिखाई जा रही है?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

हिन्दुस्तान में तालिबानी-हत्या, इस असाधारण दौर में देश के असाधारण लोग चुप न रहें...

  29 जून 2022
  

राजस्थान के उदयपुर में कल ऐसी धार्मिक-आतंकी वारदात हुई है कि जिसने हिन्दुस्तान को तालिबान के मुकाबले ला खड़ा किया है। वहां के एक हिन्दू दर्जी के सोशल मीडिया पेज पर शायद उसके आठ बरस के बेटे ने नुपूर शर्मा के समर्थन में एक पोस्ट की थी। एक टीवी बहस पर नुपूर शर्मा ने मोहम्मद पैगंबर के बारे में आपत्तिजनक बातें कही थीं, जिसकी प्रतिक्रिया में हिन्दुस्तान के मुसलमानों से लेकर मुस्लिम देशों तक ने विरोध दर्ज किया था, और कई देशों के विरोध के बाद भारत में भाजपा ने अपनी इस राष्ट्रीय प्रवक्ता को पद से हटाया था, और सरकार ने उसके खिलाफ जुर्म दर्ज किए थे। तब से अब तक नुपूर शर्मा गिरफ्त से बाहर है। देश में धर्मान्ध हिन्दुओं का एक तबका पूरी ताकत से नुपूर शर्मा के साथ खड़ा है, और दूसरी तरफ मुस्लिम इस बात से आहत हैं कि उसे अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। ऐसे माहौल के बीच सोशल मीडिया उबला पड़ा है, और साम्प्रदायिकता मानो इस देश का मुख्य खानपान हो गई है, और लोगों के पास मानो नफरत को फैलाना ही अकेला रोजगार बचा है। कम से कम अधिक मुखर और हमलावर लोगों ने सोशल मीडिया पर नुपूर शर्मा पर इस देश को दो हिस्सों में बांट दिया है, और इसी माहौल में जब राजस्थान के इस हिन्दू दर्जी के आठ बरस के बेटे ने बाप के सोशल मीडिया अकाऊंट पर नुपूर शर्मा की हिमायत में कुछ पोस्ट किया, तो उस पर उदयपुर के कुछ मुस्लिमों ने उसे हिंसक धमकी दी थी। इस पर कन्हैयालाल नाम के इस दर्जी को पुलिस ने पकड़ा था, और फिर छोड़ भी दिया था। अब दो मुस्लिम उसके पास कपड़े का नाप देने के नाम पर आए, एक ने नाप देते-देते कटार जैसे बड़े हथियार से उसका गला रेत दिया, और दूसरा मुस्लिम उसका वीडियो बनाते रहा जिसे बाद में अपने बयान के साथ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हत्या की धमकी के साथ सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। इस बहुत ही भयानक तालिबानी हिंसा के बाद पूरे राजस्थान में साम्प्रदायिक तनाव है, और गनीमत यह है कि ये दोनों हत्यारे गिरफ्तार कर लिए गए हैं।

हिन्दुस्तान अपने आज के साम्प्रदायिक तनाव के साथ बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। कट्टर, धर्मान्ध, और साम्प्रदायिक ताकतों में से किसी भी एक ताकत से लैस हिन्दुस्तानी दूसरे का गला काटने की ताकत रखते हैं। धार्मिक कट्टरता और साम्प्रदायिक नफरत इस देश में आज सबसे अधिक ताकतवर इंजन बन गए हैं, और कुछ तबकों में डबल इंजन की नफरत चल रही है। राजस्थान में पिछले कुछ महीनों में बार-बार साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन घटनाओं से कुछ कम दर्जे के तनाव देश के अधिकतर प्रदेशों में छाए हुए हैं। ऐसे में राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से अपील की है कि उनकी बातों का सार्वजनिक असर होता है, और उन्हें देश की आम जनता से शांति की अपील करने को कहा है। केन्द्र सरकार ने उदयपुर की इस तालिबानी-हत्या की जांच एनआईए को दी है, जो कि आतंकी पहलू के नजरिये से इस मामले की जांच करेगी। इस बीच एक खबर यह भी है कि भाजपा के जिन दो प्रवक्ताओं/नेताओं, नुपूर शर्मा, और नवीन जिंदल ने मोहम्मद पैगंबर के बारे में आपत्तिजनक बातें कही थीं, उनमें से नवीन जिंदल को उदयपुर का यह वीडियो भेजकर उसी तरह मारने की धमकी दी गई है। यह तनाव उम्मीद से परे का नहीं है, और ऐसे बयानों से लेकर ऐसे कत्ल तक का मकसद देश में हत्यारे तनाव को बढ़ाना ही रहता है, और साम्प्रदायिक ताकतें इसमें बहुत कामयाब हुई दिख रही हैं। आज इस देश के लोग जीने-खाने और कमाने की फिक्र को छोडक़र किसी धर्म के अपमान करने को अपना पेशा बना चुके हैं, और ऐसे लोगों के चलते देश में कोई भी महफूज नहीं रहेंगे।

यह वक्त हिन्दुस्तान को अब भी और जलने देने से बचाने का है, और अधिक खत्म हो जाने के पहले इसे थाम लेने का है। हाल के बरसों में देश के अमन-चैन, और भाई-बहनचारे की जो तबाही हुई है, उनसे उबरने में इन बरसों जितनी पीढिय़ां लग जाने वाली हैं, इसलिए तबाही के हर बरस को और आगे की एक पीढ़ी की बर्बादी मानकर इस खतरे का अंदाज लगाना चाहिए। जहां कन्हैयालाल का आठ बरस का बेटा एक नफरतजीवी नुपूर शर्मा की हिमायत में सोशल मीडिया पर नफरत का ट्वीट करता है, तो आज साम्प्रदायिकता ने किस पीढ़ी तक को तबाह कर दिया है, उसे समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए। गहलोत अपने राज्य राजस्थान की साम्प्रदायिक घटनाओं को रोकने में नाकामयाब दिख सकते हैं, लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि पूरे देश के लोगों पर गहलोत की बात का असर नहीं हो सकता, और मोदी-शाह की बात का असर हो सकता है। इसलिए कम से कम प्रधानमंत्री को अपनी चुप्पी तोडक़र, देश के आज के माहौल पर कुछ बोलना चाहिए, और कुछ से अधिक काफी बोलना चाहिए। नाजुक मौकों पर चुप्पी के कई गलत मतलब भी निकाले जाते हैं, इसलिए जो जिम्मेदारी के ओहदों पर बैठे हुए लोग हैं, जो शोहरत-हासिल लोग हैं, उन लोगों को नाजुक मौकों पर चुप रहने का हक नहीं दिया जा सकता। आज देश में धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता जितनी तबाही ला रही है, वह देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय खतरा बन चुकी है। ऐसे मौके पर प्रधानमंत्री को खुलकर सामने आना चाहिए, और उन्हें अपना आदर्श मानने वाले लोगों के बीच भी जिस तरह की गलतफहमी या खुशफहमी फैली हुई है, उसे दूर करना चाहिए। किसी को ऐसा लग सकता है कि साम्प्रदायिक हिंसा से परे बड़े-बड़े कारखाने तो चलते ही रहते हैं, और उनसे देश की जीडीपी चलना जारी रहता है, लेकिन यह हकीकत नहीं है। उदयपुर का कन्हैयालाल आज किसी दूसरे के सामान का ग्राहक नहीं रह गया है, और अपने ग्राहकों के लिए अब वह कपड़े नहीं सिलने वाला है। उसके कातिल भी अब न कोई ग्राहक रह जाएंगे, और न ही कारीगर। इस तरह देश की साम्प्रदायिक हिंसा कारोबार को खतम कर रही है, जिसकी रफ्तार धीमी लग सकती है, लेकिन इसका असर हर हिन्दुस्तानी पर पड़ रहा है, खासकर अगर वे अरबपति न हों।

देश को साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता से उबारने की जरूरत है। जो ताकतें विवेकानंद से लेकर सरदार पटेल तक, और भगत सिंह से लेकर विनायक दामोदर सावरकर तक को अपना आदर्श मानती हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि आज वे सब अपने आदर्श कहे जाने वाले इन तमाम लोगों की कही बातों के ठीक खिलाफ काम कर रहे हैं। मन, वचन, और कर्म का यह विरोधाभासी पाखंड खत्म होना चाहिए। एक मेहनतकश कन्हैयालाल को दूसरे मेहनतकश मोहम्मद के हाथों मरवाने की तोहमत कुछ जटिल रास्तों से अपने ठिकाने तक पहुंच सकती हैं, सीधे-सीधे नहीं। यह देश इस नुकसान को झेलने की हालत में नहीं है, और ऐसा देश जाने किस जुबान से विश्व गुरू बनने का दंभ पाले हुए है। यह असाधारण समय है, और इसकी मांग है कि देश के असाधारण लोग इस वक्त चुप न रहें, हालात को सम्हालने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करें।

(Daily Chhattisgarh)

भूख से लडऩे वालों की संपन्न सरहदों से लड़ाई खत्म करने की जरूरत..

  28 जून 2022
    

अमरीका के कई सरहदी राज्यों में वैसे तो पड़ोस के देशों से लोगों की गैरकानूनी घुसपैठ चलती ही रहती है, लेकिन अभी कुछ घंटे पहले वहां के टैक्सास में एक बड़ी लॉरी लावारिस पड़ी मिली जिसके भीतर 46 लाशें पड़ी हुई थीं। जाहिर तौर पर ये गैरकानूनी तरीके से अमरीका में आए हुए लोग थे जो कि मानव-तस्करी का कारोबार करने वाले लोगों की इस लॉरी में आगे ले जाए जा रहे थे। इसके भीतर न कोई एयरकंडीशनिंग थी, न ही पीने का पानी भी था, और इन 46 लाशों के बीच 16 लोग जिंदा भी मिले हैं जो कि लू और गर्मी की वजह से बुरी तरह तप रहे थे, और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। अमरीका की मैक्सिको के साथ सरहद के करीब का यह हादसा वहां के पुलिस अफसरों को भी हिला गया है क्योंकि उन्होंने इतनी बड़ी संख्या में ऐसी लाशें नहीं देखी थीं। मानव तस्कर तरह-तरह के तकलीफदेह सफर से लोगों को अमरीका में लाते हैं, और सरहद से दूर ले जाते हैं, लेकिन मौतों का यह रिकॉर्ड नया है। अमरीका में मैक्सिको से आते पिछले महीने ही दो लाख 40 हजार अवैध घुसपैठियों को पकड़ा गया था, और कितने लोग आए होंगे इसका कोई अंदाज अभी नहीं है। लेकिन यह हाल सिर्फ अमरीका का हो ऐसा भी नहीं है, योरप के अधिकतर देशों में बाहर के देशों से ऐसी घुसपैठ चलती ही रहती है, और लोगों को याद होगा कि जब सीरिया, लिबिया, अफगानिस्तान जैसे देशों में गृहयुद्ध जैसे हालात थे, तो वहां के लोग भी दूसरे देशों में पहुंचते थे, और समुद्र तट पर एक छोटे बच्चे की लाश की तस्वीर लोगों को अब भी परेशान करती है।

यह हादसा उस दिन सामने आया है जिस दिन अमरीकी राष्ट्रपति जी-7 देशों के प्रमुख लोगों के साथ दुनिया की आर्थिक असमानता और मानवाधिकारों पर चर्चा कर ही रहे हैं। इस बैठक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री भी मौजूद थे, और ब्रिटेन पिछले कुछ महीनों से अपनी एक शरणार्थी योजना को लेकर विवादों में घिरा हुआ है। ब्रिटेन पहुंचने वाले अवैध शरणार्थियों के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक अफ्रीकी देश रवांडा के साथ एक समझौता किया है, और ब्रिटेन अपनी दिक्कतों को बढऩे से रोकने के लिए ऐसे आ रहे शरणार्थियों को अपने खर्च से रवांडा भेजेगा, और वहां पर उनके लिए बनाए गए शरणार्थी शिविरों का खर्च भी उठाएगा। यह नीति खुद ब्रिटेन में बहुत बुरी आलोचना से घिरी हुई है, और मानवाधिकार की फिक्र करने वाले लोग यह मानते हैं कि यह शरणार्थियों के प्रति जिम्मेदारी पूरी करना नहीं है, उन्हें मामूली खर्च से अपनी आंखों से, और अपनी सरहद से दूर धकेल देना भर है। खैर, ब्रिटिश सरकार के इस बारे में अपने तर्क हो सकते हैं, और हर देश की शरणार्थी नीति अपनी घरेलू फिक्रों, और वहां के खतरों को देखते हुए ही बनाई जा सकती है। कुछ मुस्लिम देशों से आने वाले शरणार्थियों को जगह देकर योरप के कई देशों में जिस तरह के सांस्कृतिक टकराव सामने आ रहे हैं, वे भी वहां स्थानीय सरकारों पर एक दबाव बने हुए हैं। इससे परे भी जब बाहर से आए हुए शरणार्थियों में से कुछ लोग धार्मिक आधार पर आतंकी हमले करने लगते हैं, तो स्थानीय आबादी के बीच भी शरणार्थियों के खिलाफ एक नाराजगी खड़ी होने लगती है। ऐसी बहुत सी बातें शरणार्थियों को जगह देने के साथ जुड़ी हुई हैं, और कुछ देशों में तो शरणार्थी नीति किसी राजनीतिक दल की जीत या हार भी तय कर देती हैं।

आज दुनिया में आर्थिक असमानताएं इतनी अधिक हैं कि बहुत से देशों में भूखे मरने के बजाय लोग जिंदगी दांव पर लगाकर किसी ऐसे देश में घुस जाना चाहते हैं जहां पर उनके जिंदा रहने की तो गारंटी रहेगी ही, हो सकता है कि उनकी अगली पीढ़ी उन विकसित देशों की पूरी संभावनाएं हासिल कर सकें। यह उम्मीद इस कदर दुस्साहस दे देती है कि लोग रबर की छोटी सी बोट पर सवार होकर समंदर पार करके ऐसे किसी देश तक पहुंचने का खतरा उठाते हैं, क्योंकि उन्हें यह तो मालूम रहता ही है कि उनके पहले ऐसी कोशिश करने वाले लोगों में से कुछ को कामयाबी भी मिली थी। और अपने देश के गृहयुद्ध के बीच, वहां की भुखमरी के बीच अपने बच्चों को हर दिन मरते देखने से बेहतर उन्हें यह लगता है कि जिंदगी के लिए एक कोशिश की जाए। आज जब जी-7 या किसी दूसरे किस्म के देशों के समूह बैठकर बाकी दुनिया की भी बात करते हैं, तो इस पर भी बात होनी चाहिए कि दुनिया के किसी भी देश के नागरिकों के कितने न्यूनतम अधिकारों की गारंटी करना संपन्न और विकसित देशों की जिम्मेदारी रहेगी। दुनिया में जब तक सबसे गरीब लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होंगी, धार्मिक और राजनीतिक आधार पर हिंसा जारी रहेगी, गरीबों की अमीर देशों में घुसपैठ जारी रहेगी, और यह सिलसिला सरहदी सिपाहियों के रोके रूकने वाला नहीं है।

दुनिया के संपन्न और विकसित देशों को सबसे गरीब देशों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए अपनी वैश्विक जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। आज धरती के किसी हिस्से पर कोई देश है, और किसी दूसरे हिस्से पर कोई दूसरा देश। लेकिन धरती तो एक ही है, और उसके हर इंसान का एक न्यूनतम अधिकार वैश्विक संपदा पर है ही। इस अधिकार का सम्मान करने की बात होनी चाहिए, और ऐसा किए बिना कोई भी देश अपनी इंसानियत का दावा नहीं कर सकेंगे। जब कोई हादसा एक सीमा से परे का तकलीफदेह होता है, तो ही वह सोचने पर मजबूर करता है। अमरीका में कल जितनी बड़ी संख्या में जिस हालत में लाशें मिली हैं, उन्हें देखते हुए दुनिया को एक ईकाई मानकर हालात सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

विधायकों के प्लेन और होटल पर खर्च क्या अब भी चर्चा के लायक हैं?

  27 जून 2022
   

सोशल मीडिया की मेहरबानी से किसी भी जलते-सुलगते मुद्दे पर खास से लेकर आम लोगों तक को अपने मन की बात कहने का मौका हासिल है। और इसी के चलते हुए अभी लगातार यह बात लिखी जा रही है कि महाराष्ट्र से शिवसेना के विधायकों को लेकर पहले भाजपा शासित गुजरात और फिर भाजपा शासित असम ले जाने वाले विमानों का खर्चा कहां से आ रहा है? लोग यह भी पूछ रहे हैं कि विधायकों का पहला बड़ा जत्था गुवाहाटी पहुंच जाने के बाद छोटे-छोटे जत्थों के लिए फिर से विमान जुटाने का खर्च कहां से आ रहा है? और एक बात यह भी उठ रही है कि पिछले कई राज्यों की राज्य सरकारें पलटने के वक्त सत्तारूढ़ पार्टी के बागी विधायकों को दूसरी पार्टी के राज्य वाले प्रदेश के महंगे होटल या रिसॉर्ट में ठहराने का खर्च कहां से आता है? बाढ़ में डूबे हुए असम में नदियों के पानी में लाशों के तैरने की तस्वीरें इंटरनेट पर तैर रही हैं, और ऐसे माहौल में ये सवाल बड़ी तल्खी के साथ उठाए जा रहे हैं कि महाराष्ट्र में सरकार पलटने के लिए यह पूरा खर्च कौन उठा रहा है? केन्द्र सरकार की एजेंसियां इसकी जांच क्यों नहीं कर रही हैं?

इस मुद्दे पर किसी का पक्ष लेने के बजाय हम इसकी बुनियादी बातों पर जाना चाहते हैं कि महाराष्ट्र जैसे राज्य में मुम्बई में किसी एक जमीन या इमारत पर कारोबारी इजाजत देने पर सत्ता को दसियों करोड़ रूपये मिल सकते हैं, और मिलते भी रहे होंगे। ऐसे में 25-50 लाख रूपये अगर विशेष विमानों और महंगी होटलों पर खर्च हो भी रहे हैं, तो उसे मुद्दा बनाने का मतलब असल मुद्दे को छोड़ देना है। अगर नीयत सांप को मारने की है, तो उसके गुजर जाने के बाद उसकी लकीर पर लाठी पीटने से क्या हासिल होगा? आज राजनीतिक पार्टियों की सत्ता जिस बड़ी दौलत में खेलती हैं, उसके सामने कुछ दर्जन विधायकों का हफ्ते-दस दिन किसी होटल में रहना कोई बड़ा खर्च नहीं है। और यह पहली बार भी नहीं हो रहा है।

लोगों को याद होगा कि अभी कुछ बरस पहले ही जब कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की भाजपा सरकार में शामिल वहां के सबसे बड़े खदान कारोबारी और सरकार में मंत्री रेड्डी बंधु जब अपनी ही सरकार गिराना चाहते थे, तो वे बाढ़ में तबाह कर्नाटक के दर्जनों विधायकों को लेकर कई दिन आन्ध्र के हैदराबाद के किसी सात सितारा होटल में पड़े हुए थे। जैसे-जैसे राजनीति में भ्रष्टाचार बढ़ते चल रहा है, सत्ता की कमाई बढ़ते चल रही है, वैसे-वैसे सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त के रेट बढ़ रहे हैं, सौदेबाजी बढ़ रही है, और नई सत्ता पर पूंजीनिवेश करने के लिए बड़े कारोबारियों में उत्साह भी बढ़ रहा है। जो लोग राज्यों के कामकाज से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि राज्य की चुनिंदा ताकतवर कुर्सियों पर अपने पसंदीदा अफसरों को लाने के लिए बड़े कारोबारी बड़ा पूंजीनिवेश करने को एक पैर पर खड़े रहते हैं। यही हाल केन्द्र सरकार में कुछ खास मंत्रालयों के मामले में होता है जहां आने वाले अफसरों का अपनी मर्जी का होने के लिए देश के बड़े कारोबारी सरकार पर अपने सारे असर का इस्तेमाल करते हैं, जरूरत रहती है तो पेशगी भी देते हैं, और फिर किस्त भी बांध देते हैं। जिस देश में और उसके प्रदेशों में भ्रष्टाचार के पैमाने इतने ऊपर जा चुके हैं, वहां अगर महाराष्ट्र की नई सरकार अपनी मर्जी से बनवाने के लिए होटल, हवाई जहाज, और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों पर दस-बीस करोड़ रूपये खर्च भी होने जा रहे हैं, तो इतनी रकम तो मुम्बई कीकिसी एक खास पुलिस-कुर्सी के लिए करने लोग तैयार रहते हैं।

हम किसी भी किस्म के भ्रष्ट पूंजीनिवेश की वकालत नहीं कर रहे हैं, लेकिन जब लोकतंत्र दांव पर लगा है, तब कुछ करोड़ के बिल पकडक़र उस पर बहस करने से असल मुद्दा तो धरे ही रह जाएगा। आज भारत की राजनीति में त्रिपुरा के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री रहे माणिक सरकार जैसे आदर्शों की उम्मीद नहीं करना चाहिए जिनके चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक उनके पास 10 हजार 8 सौ रूपये थे, और जो तनख्वाह पार्टी में जमा कर देते थे, और वहां से उन्हें गुजारे के लिए पांच हजार रूपये महीने मिलते थे। उनकी जिंदगी में केन्द्र सरकार की कर्मचारी रही पत्नी की पेंशन से भी मदद मिलती थी जिसने पति के मुख्यमंत्री रहते हुए भी पूरे वक्त रिक्शे से सरकारी दफ्तर आना-जाना किया करते थे। और माणिक सरकार ऐसी ईमानदारी वाले अकेले वामपंथी मुख्यमंत्री नहीं थे। उसी त्रिपुरा में उनके पहले नृपेन चक्रवर्ती मुख्यमंत्री रहे, और उनकी ईमानदारी का भी यही हाल रहा। नृपेन चक्रवर्ती जब मुख्यमंत्री निवास पहुंचे थे तो उनका सारा सामान टीन की एक पेटी में था। एक दशक बाद जब वे मुख्यमंत्री निवास से हेमेले हॉस्टल गए, तो रिक्शे पर उनके साथ वही एक पेटी गई। दस बरस मुख्यमंत्री रहते हुए इस पेटी में कोई नया सामान नहीं जुड़ा।
 
जिस देश ने ऐसे लोगों का और उनकी पार्टी का चुनावी नक्शे से नामोनिशान मिटा दिया है, उन्हें अब विशेष विमानों में एक होटल से दूसरे रिसॉर्ट जाने वाले विधायक और सांसद ही नसीब होने चाहिए, और नसीब हैं।  इन छोटे-छोटे खर्चों को अगर कोई आज बड़ी मुद्दा मान रहे हैं, तो यह दाऊद इब्राहिम के स्टेडियम में सिगरेट पीने जितना बड़ा ही जुर्म है, जिस पर खूब लंबी बहस हो सकती है, उसके बाकी के तमाम जुर्मों को अनदेखा करते हुए। लोगों को लोकतंत्र के लिए मायने रखने वाले मुद्दों के पहलुओं को उनकी असल अहमियत के अनुपात में ही महत्व देना चाहिए। भारत की राजनीति अब गांधीवादी मूल्यों का खेल नहीं रह गई है। इसलिए अब कुछ करोड़ों के खर्च पर बहस खर्च करना सिवाय बेवकूफी के कुछ नहीं है। मुम्बई का शहरी विकास विभाग का एक छोटा सा अफसर यह पूरा खर्च उठा सकता है, और इतने से खर्च को लेकर भाजपा पर तोहमतें लगाना भी ठीक नहीं है। राजनीतिक दल होटल के कमरे, और प्लेन की सीट पर खर्च नहीं करते, वे संसद और विधानसभा के भीतर की सीटों को खरीदते-बेचते हैं। इसलिए सोशल मीडिया और बाकी मीडिया पर भी जो लोग विधायकों के जनवासे के खर्च पर सवाल उठा रहे हैं, उनकी मासूमियत पर तरस आता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

एक-एक अफसर से सोने-चांदी की ईटों के ऐसे भंडार का मतलब?

 26 जून 2022
   

पंजाब के चंडीगढ़ में एक आईएएस अफसर के बेटे ने अपनी लाइसेंसी बंदूक से खुद को गोली मार ली। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है, और परिवार का कहना है कि पंजाब विजिलेंस की जो टीम उनकी घर की तलाशी लेने आई थी, उसी ने बेटे को गोली मार दी हैं। यह आईएएस अफसर, संजय पोपली, कुछ दिन पहले भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, और उसकी काली कमाई की जांच के लिए विजिलेंस कई जगह छापेमारी कर रही है, और इसी सिलसिले में उसके घर पहुंची थी जहां परिवार में यह हादसा हुआ। विजिलेंस को इस अफसर के घर से बारह किलो सोना, तीन किलो चांदी की ईटें मिली हैं, और अनगिनत दूसरे महंगे सामान भी। इस अफसर की जांच पाईप लाईन टेंडर मंजूर करने के लिए एक फीसदी कमीशन मांगने के आरोप के बाद हुई थी, और वहां से इन सामानों के साथ-साथ हथियार और कारतूस भी मिले, जिन्हें लेकर एक अलग मामला दर्ज किया गया है। पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार ने पहले दिन से भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मोर्चा खोलने की घोषणा की थी, और देश का शायद यह पहला मौका था कि मुख्यमंत्री ने काम सम्हालने के कुछ हफ्तों के भीतर ही अपने एक मंत्री को भ्रष्टाचार के जुर्म में गिरफ्तार करवा दिया। अब यह महज दिखावा मानना या कहना तो नाजायज होगा क्योंकि सरकार के मंत्री का ऐसा भ्रष्ट होना सरकार के लिए बदनामी भी लेकर आता है, लेकिन पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने हौसला दिखाया था।

अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस पार्टी की सरकारों के रहते हुए पिछले दशकों में पंजाब भ्रष्टाचार में डूबा हुआ राज्य बन गया था, और वहां मंत्री भी नशे की तस्करी में शामिल बताए जाते थे। दोनों ही तरह की सरकारें जमीन से कट गई थीं, सामंती और कुनबापरस्त अंदाज में चल रही थीं, और शायद यही वजह थी कि वोटरों ने इस बार हैरतअंगेज नतीजे देते हुए इन तीनों ही पार्टियों को खारिज कर दिया था, और आम आदमी पार्टी को सत्ता दे दी थी। लोगों को यह भी याद रहना चाहिए कि दो चुनाव पहले दिल्ली में भी वोटरों ने कांग्रेस और भाजपा को एकमुश्त खारिज करते हुए आम आदमी पार्टी को सत्ता दी थी, और अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में सरकार दुबारा लौटकर भी आई। दिल्ली में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम केजरीवाल का एक बड़ा नारा रहा, और अगर लगातार दो चुनावों के नतीजे कोई संकेत हैं, तो वोटरों ने उनके इस नारे पर भरोसा किया दिखता है।

लेकिन पंजाब, दिल्ली, और आम आदमी पार्टी से परे देश में भ्रष्टाचार की बात करें, तो सरकारों का एक बड़ा बजट भ्रष्टाचार के हवाले हो जाता है। अलग-अलग सरकारों में भ्रष्टाचार के तौर-तरीके अलग हो सकते हैं, कहीं पर हर ठेकेदार से रिश्वत और कमीशन ली जाती है, कहीं पर अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग को एक बड़ी इंडस्ट्री की तरह चलाया जाता है, और कहीं-कहीं बड़े कारोबारियों को सरकारी कामकाज में उपकृत करके उनसे पर्दे के पीछे भागीदारी कर ली जाती है। हिन्दुस्तान में अलग-अलग पार्टियों और देश-प्रदेश की सरकारों के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन पूरा देश भ्रष्टाचार में बुरी तरह डूबा हुआ है, और आम जनता उसमें पिस रही है। आज जब यूक्रेन यूरोपीय समुदाय का मेंबर बनने की कोशिश कर रहा है, तो यूक्रेन का मौजूदा भ्रष्टाचार इस राह का रोड़ा बना हुआ है। यूरोपीय यूनियन जैसा विकसित लोकतंत्रों और सभ्य समाजों का गठबंधन भ्रष्टाचार को एक बड़ा मुद्दा मानता है, और किसी को सदस्य बनाने के पहले उस देश की सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जवाब देना पड़ता है, कानून बनाने पड़ते हैं, और उन पर अमल भी करना पड़ता है। आज हिन्दुस्तान ऐसे किसी समुदाय की सदस्यता की जरूरत से बहुत दूर है, लेकिन अगर ऐसी कोई नौबत रहती, तो हिन्दुस्तान कभी यूरोपीय यूनियन जैसी संस्था का सदस्य नहीं बन सकता था।

आज की ही एक दूसरी खबर बताती है कि जिस बिहार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सुशासन बताया जाता है, उसकी राजधानी पटना में सरकारी निगरानी विभाग ने एक ड्रग इंस्पेक्टर के घर पर छापा मारा तो वहां से पांच बोरों में भरे हुए चार करोड़ के नोट मिले, दर्जनों जमीनों के कागज मिले, कई कारें मिलीं, और गहने, बैंक खाते मिले। अब ड्रग इंस्पेक्टर तो राज्य सेवा का एक छोटा अफसर होता है, और बिहार को नीतीश कुमार का सुशासन कहा जाता है, वहां यह हाल है। आज अगर एक प्रदेश के एक अफसर के घर के स्टोर रूम से सोने-चांदी का ऐसा जखीरा निकल रहा है, दूसरे छोटे अफसर के घर बोरों में करोड़ों के नोट निकल रहे हैं, और दूर-दूर तक उसकी दौलत बिखरी होने की जांच जारी ही है, तो फिर पूरे देश को कुल मिलाकर किस तरह बेचा जा रहा है, यह साफ है। हमारा तो यह मानना है कि भ्रष्ट अफसरों से जितनी जब्ती हो पाती है, वह उनकी काली कमाई का एक बहुत ही छोटा हिस्सा रहता है, बाकी तो चारों तरफ बेनामी जायदाद और दूसरे देशों के बैंकों में चले जाता है। ऐसे में देश-प्रदेश की सरकारें अगर कोई ईमानदार नीयत रखती हैं, तो उन्हें किसी के इतने अधिक भ्रष्ट हो जाने के बहुत पहले ही उसे दबोच लेने का इंतजाम रखना चाहिए। जब भ्रष्ट अफसर अरबपति हो जाएं, उसके बाद उन पर हाथ डाला जाए, तो उसका मतलब है कि वे सरकारी पैसों और कामकाज की दसियों गुना अधिक बर्बादी कर चुके हैं, जनता के हितों और सरकारी कामकाज की क्वालिटी को बेच चुके हैं। यह हालत ऑल इंडिया सर्विस कही जाने वाली नौकरियों की है, जिनके लिए देश भर से सबसे चुनिंदा लोगों को छांटा जाता है, और फिर वे आनन-फानन देश के सबसे भ्रष्ट लोग भी बनने का खतरा रखते हैं। यह सिलसिला अखिल भारतीय सेवाओं की साख को खत्म कर चुका है, और केन्द्र सरकार और अलग-अलग प्रदेशों में हर किस्म के भ्रष्टाचार के नमूने मौजूद हैं।

अच्छी साख वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने डेढ़ दशक पहले एक सर्वे किया था तो उसमें पाया था कि पचास फीसदी हिन्दुस्तानी रिश्वत देकर, या कोई पहचान जुटाकर सरकारी काम करवा पाते हैं। 2021 में भ्रष्टाचार पर जनधारणा का एक सर्वे हुआ, उसमें दुनिया के 180 देशों में हिन्दुस्तान को 85वें जगह पर रखा गया था, यानी यह देश दुनिया के 84 और देशों के मुकाबले अधिक भ्रष्ट मिला था। केन्द्र और राज्य सरकारों के कई विभाग भ्रष्टाचार की सबसे अधिक गुंजाइश रखने वाले माने जाते हैं, और मंत्रियों में इन विभागों को पाने के लिए गलाकाट मुकाबला तो चलता ही है, अफसर भी इन विभागों या ऐसी जगहों पर तैनाती के लिए लूटपाट करने को तैयार रहते हैं।

पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार सचमुच ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लगी हुई है, या यह उसका दिखावा है, जो भी हो, देश-प्रदेश की  तमाम सरकारों को अपने राज के भ्रष्टाचार पर काबू पाना चाहिए, और जनता के बीच के लोगों को भी चाहिए कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अलग-अलग तरह की लड़ाई लड़ें। यह इसलिए भी जरूरी है कि भ्रष्टाचार सबसे गरीब जनता के बुनियादी हक भी खा जाता है, लोगों को अपने परिवार की लाश के पोस्टमार्टम के लिए भी रिश्वत देनी होती है, और मानवाधिकारों का इससे बुरा कुचलना और क्या हो सकता है? लोग अपने-अपने आसपास के भ्रष्टाचार को देखें, और अपनी जिम्मेदारी सोचें।

(Daily Chhattisgarh)

इनको मालूम है ईश्वर की हकीकत लेकिन, दिल...

26 जून 2022

 

जिस अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद अमरीकी और पश्चिमी मदद बंद हो जाने से लोग भुखमरी के करीब पहुंच रहे हैं, वहीं पर बड़ा बुरा भूकंप आया, और हजार के करीब लोग अपने कच्चे मकानों के मलबे में ही दबकर मर गए। तालिबान-सरकार के पास न अस्पताल हैं, न इलाज है, और न ही मकानों का मलबा उठाने के लिए मशीनें हैं कि लोगों को बचाया जा सके। दूसरी तरफ रूस और यूक्रेन के बीच जो जंग चल रही है, उसके चलते यूक्रेन के अनाज भंडार वहां से निकाले नहीं जा रहे हैं, और नतीजा यह है कि दुनिया के कई देशों तक पहुंचने वाला यह अनाज बर्बाद होने जा रहा है, और खाने के बिना दसियों लाख लोग भुखमरी की कगार पर हैं। ये तमाम गरीब अफ्रीकी देश हैं, जहां की आबादी मुस्लिम और ईसाई है, धर्मालु है, ठीक उसी तरह की है जिस तरह की अफगानिस्तान में गरीब मुस्लिम हैं।

अब दुनिया की आज की इस पूरी तस्वीर को देखें तो लगता है कि जहां अधिक गरीबी और अधिक भुखमरी है, वहीं पर और अधिक मुसीबतें भी आ रही हैं। इस हाल को देखकर उन नास्तिकों के सोचने का तो कुछ नहीं है जो कि ईश्वर को नहीं मानते। लेकिन जो लोग ईश्वर को मानते हैं उनको यह सोचना चाहिए कि सबसे बदहाल लोगों पर मुसीबतों के और पहाड़ गिराना ईश्वर का कौन सा तरीका है? जिस ईश्वर को सर्वत्र, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान कहा जाता है, उसकी शक्ति तब कहां चली जाती है जब जम्मू के एक मंदिर में पुलिस से लेकर पुजारी तक, आधा दर्जन लोग एक गरीब खानाबदोश बच्ची से मंदिर में सामूहिक बलात्कार करते हैं, और उसे मार डालते हैं। उस वक्त कण-कण में मौजूद ईश्वर कहां रहता है? उस बच्ची से जिस जगह बारी-बारी से बलात्कार हो रहा था, उस जगह पर भी तो हर कण में ईश्वर के रहने की गारंटी धर्मालु लोग मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। तो फिर उस बच्ची की देह बलात्कार के दौरान कैसे हिली होगी? कैसे बलात्कारियों के शरीर के कुछ हिस्से उस ईश्वर की मर्जी के बिना बलात्कार के लायक तैयार हो जाते हैं? नास्तिक को तो इनमें से किसी सवाल का जवाब ढूंढने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसे धर्म और ईश्वर के पूरे पाखंड की अच्छी तरह खबर है, लेकिन आस्थावानों को अपने ईश्वर से अगली प्रार्थना के दौरान ये सवाल जरूर पूछने चाहिए।

दरअसल धर्म ने आस्थावानों को सभी तरह की पाप की धारणा से मुक्त हो लेने की पूरी सहूलियत जुटाकर दी है। तथाकथित ईश्वर के एजेंट और दलाल तरह-तरह की तरकीबें निकालकर रखते हैं कि किस तरह के जुर्म और उससे लगने वाले पाप से मुक्ति पाई जा सकती है। कुछ धर्मों में थोड़ा-बहुत जुर्माना रखा गया है कि किसी पंडित-पुरोहित को कुछ खिलाकर, कुछ दान देकर, कुछ और भूखों को अन्न देकर किस तरह पापमुक्ति हो सकती है। ऐसे मुक्त लोग एक नए उत्साह के साथ, एक नई ताकत के साथ फिर बलात्कार करने के लिए धरती में घूमना शुरू कर देते हैं, और धर्म उनके लिए वियाग्रा सरीखा रहता है जो कि उनकी उत्तेजना बढ़ाते रहता है। जुर्म और पाप से असली सजा मिलने का डर अगर किसी को रहता, तो उनका बदन उत्तेजित ही नहीं हो पाता। लेकिन धर्म से सहूलियतें बहुत रहती हैं, और ऐसी एक सहूलियत लोगों को बलात्कार के लिए तैयार होने में मदद करती है। एक बूढ़ा पुजारी भी अपने ही मंदिर में दूसरे धर्म की गरीब बच्ची से सामूहिक बलात्कार को न सिर्फ तैयार हो जाता है, बल्कि अपने बाद और लोगों को भी न्यौता दे-देकर बुलाता है, इसका मतलब है कि उसे ईश्वर की ताकत के बारे में सही-सही अंदाज है, क्योंकि मंदिर में मौजूद प्रतिमाओं के इतने करीब ऐसा काम भी ईश्वर को दिखेगा नहीं, वह कुछ करेगा नहीं, और वह दरअसल है ही नहीं, इसका पूरा भरोसा बलात्कारी पुजारी को रहा होगा, तभी एक गरीब बच्ची को देखकर भी उसका बूढ़ा बदन उत्तेजना से तैयार हो गया होगा।

सोशल मीडिया पर कल से कुछ वीडियो तैर रहे हैं जिनमें तीन-चार बरस की एक मुस्लिम बच्ची और उसी उम्र के एक बच्चे को गंदी गालियां देते हुए कोई जाहिर तौर पर हिन्दू लगने वाला नौजवान उनके मुंह से अल्लाह के नाम गंदी गालियां निकलवाना चाह रहा है, और इस पूरे सिलसिले का वीडियो भी बनाया गया है, जो कि फैलाया गया होगा। और ये वीडियो इंस्टाग्राम पर एक अकाऊंट में पोस्ट भी किए गए हैं जो कि पोस्ट करने वाले की शिनाख्त भी बताते हैं, और उनका यह हौसला भी कि वे तीन-चार बरस के बच्चों को किस किस्म की गंदी गालियां देकर उनसे अल्लाह को गंदी गालियां दिलवाना चाह रहे हैं। अब धर्म ऐसा ही होता है। अपने धर्म और अपने ईश्वर का नाम दूसरे धर्म के लोगों से लिवाने के लिए लोग बुरी तरह हिंसा करते भी आए दिन किसी न किसी वीडियो में दिखते हैं। इसी तरह वे दूसरे धर्म के ईश्वर के नाम गालियां देते हुए, और गालियां दिलवाने के लिए हिंसा करते हुए भी दिखते हैं। अब ऐसे धर्मों के ईश्वर अगर कहीं पर हैं, तो वे धार्मिक फिल्मों या धार्मिक सीरियल की तरह अपने ऐसे हिंसक भक्तों के हाथ-पैर क्यों नहीं तोड़ते? जब कभी आस्थावान लोग अपने ईश्वर से अगली बार मोबाइल फोन पर, या किसी प्रार्थना के दौरान बात करें, तो उन्हें इस बारे में भी पूछना चाहिए।

जिन लोगों को भी धर्म को लेकर कोई गलतफहमी है, वे जान लें कि दुनिया के सबसे बड़े हिंसक जुर्मों के दौरान ईश्वर तो अपनी हकीकत के मुताबिक बेअसर रहा, लेकिन उनके एजेंट और दलाल धर्मगुरुओं ने भी न हिटलर के सामने मुंह खोला, और न यहूदियों के सामने। कोई धर्म अपने लोगों को बमबारी से नहीं रोक पाया, जंग से नहीं रोक पाया, सामूहिक जनसंहार से नहीं रोक पाया। धर्म और ईश्वर की यही हकीकत है। कैमरा थामे हुए नौजवान तीन-चार बरस के बच्चों से उनके ईश्वर को गंदी गालियां दिलवाने का वीडियो बनाकर पोस्ट कर रहे हैं। इनको अपने ईश्वर की हकीकत भी मालूम है, और अपने देश की आस्थावान और धर्मालु सरकार की हकीकत भी। उन्हें मालूम है कि तीन-चार बरस के किस धर्म के बच्चों से उनके ईश्वर के लिए गंदी गालियां दिलवाना महफूज काम है, जिससे न ईश्वर खफा होगा, न सरकार खफा होगी।

आज का यह लिखना उन लोगों पर असर डालने के लिए नहीं है जो कि अपने ईश्वर के नाम पर सबसे भयानक किस्म के जुर्म कर रहे हैं, उन्हें तो अच्छी तरह मालूम है कि ऐसा कोई ईश्वर है नहीं, और ऐसे जुर्म की कोई सजा भी नहीं मिलेगी। यह लिखना उन लोगों से सवाल है जो कि ईश्वर को सचमुच मानते हैं, उसे सच का जानते हैं, और फिर भी जो ऐसे हिंसक जुर्म को भी अटपटा नहीं पाते।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों से बाकी दुनिया को सबक लेने की जरूरत

 25 जून 2022
 

अमरीका में पिछले दो-चार दिनों में वहां की सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों ने अमरीकी समाज को बड़ा झटका दिया है। खासकर समाज के उस हिस्से को जो संविधान में दिए गए एक बुनियादी अधिकार के साथ बंदूकों को लेकर कुछ शर्तें जोडऩा चाहते हैं क्योंकि आए दिन नौजवान किसी तनाव या नफरत को लेकर सार्वजनिक जगहों पर गोलीबारी कर रहे हैं, और कई लोगों को मार डाल रहे हैं। अमरीका के मौजूदा कानून में 18 बरस के होते ही लोग मनचाही बंदूकें खरीद सकते हैं, और ऐसे हमलावर हथियार भी बेहिसाब लेकर रख सकते हैं जिनमें से एक-एक हथियार से पलक झपकते दर्जन भर लोगों को मार डाला जा सकता है। अमरीकी सरकार हाल के महीनों की ऐसी गोलीबारी के बाद लगातार कोशिश कर रही थी कि एक जनमत ऐसा तैयार हो जो बंदूकें रखने के बुनियादी हक के साथ-साथ कुछ सावधानियों की शर्तें जोडऩे की इजाजत सरकार को दे। अभी अमरीका के न्यूयॉर्क राज्य का एक कानून सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया जो कि लोगों को सार्वजनिक जगहों पर हथियार लेकर चलने से रोकता था। अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों में से जिन छह ने इस फैसले पर सहमति दी है, उनमें से तीन को पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में नियुक्त किया गया था। अमरीकी न्याय व्यवस्था हिन्दुस्तान जैसे देश से अलग है, और वहां पर सुप्रीम कोर्ट के जज मरने तक काम करते हैं, और ऐसे में किसी जज के गुजरने पर ही मौजूदा राष्ट्रपति को अपनी पसंद का जज बनाने का मौका मिलता है। इसलिए राष्ट्रपति की अपनी विचारधारा वाले जज अनायास ही बनते हैं, और ट्रंप को ऐसे तीन जज बनाने का मौका मिला था।

अमरीकी सुप्रीम कोर्ट का दूसरा फैसला पचास बरस पहले के इसी अदालत के एक फैसले को खारिज करने वाला है, और इस फैसले से देश भर में अमरीकी महिलाओं को गर्भपात का फैसला लेने का हक खत्म हो गया है। सिर्फ एक-दो बहुत ही सीमित किस्म के मामलों में गर्भपात हो सकेंगे, जैसे कि गर्भपात न होने से अगर गर्भवती की जिंदगी को खतरा है, तो बड़ी कड़ी मेडिकल सिफारिश पर ही ऐसा गर्भपात हो सकेगा। अमरीका में गर्भपात हमेशा से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है, और चुनावों के दौरान भी पार्टियों और नेताओं को इस मुद्दे पर अपना रूख साफ करना होता है। अमरीकी सुप्रीम कोर्ट से ऐसे ही फैसले की उम्मीद की जा रही थी क्योंकि वहां के जजों ने डोनल्ड ट्रंप के नियुक्त किए हुए, और कन्जर्वेटिव विचारधारा के जजों का बहुमत है, और पांच जजों ने बहुमत से यह फैसला दिया, तीन जज इसके खिलाफ रहे। इस फैसले से भी अमरीका के उदारवादी, नागरिक अधिकारों के हिमायती, और डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक बहुत निराश हुए हैं, और इसे महिला अधिकारों के आंदोलन की एक बहुत बड़ी हार माना जा रहा है।

ये दोनों फैसले बिल्कुल ही अलग-अलग संदर्भों में हैं, लेकिन ये दोनों ही मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन की सोच के खिलाफ गए हैं, और अमरीका के काले लोग, दूसरे देशों से वहां पहुंचे हुए दूसरी नस्लों के लोग, प्रवासी और शरणार्थी लोग इन सबकी उम्मीदों पर पानी फेरने वाले रहे हैं। जिस अमरीका में आधी सदी से महिलाओं को गर्भपात का फैसला लेने का हक था, आज वह तस्वीर पूरी तरह पलट गई है। इसी तरह बरसों से यह बहस चली आ रही थी कि लोगों के हथियार रखने के साथ कुछ शर्तें जोड़ी जानी चाहिए ताकि हिंसक, नफरतजीवी, और विचलित मानसिक स्थिति के लोग हमलावर हथियार इक_े न कर सकें। लेकिन आज हालत यह है कि अनगिनत अमरीकी परिवार अपनी खरीदी हुई बंदूकों की घर के भीतर ही जब नुमाइश करते हैं तो ऐसा लगता है किसी फौजी बटालियन के हथियारों की दशहरे की पूजा हो रही है। अभी कुछ हफ्तों के भीतर जिस तरह दो बड़ी-बड़ी सामूहिक हत्याएं दो नौजवानों ने की हैं, उसके बाद तो ऐसा लग रहा था कि गनकंट्रोल पर बात कुछ बन सकेगी, और जनमत तैयार हो सकेगा, लेकिन न्यूयॉर्क के कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत ही निराश करने वाला है, और आज की अमरीका की जरूरत, वहां के आम लोगों की हिफाजत के खिलाफ है।

अमरीका के घरेलू मामलों से बाकी दुनिया का अधिक लेना-देना नहीं है, क्योंकि न तो बाकी दुनिया की महिलाओं को गर्भपात के लिए अमरीका जाना है, और न ही जब तक किसी सैलानी पर अमरीका में गोली चले, तब तक वहां गए पर्यटकों को भी कोई खतरा नहीं है। लेकिन इससे दुनिया भर के सोचने के लिए यह मुद्दा उठता है कि जजों की निजी सोच किस तरह किसी देश की तस्वीर बदल सकती है। अमरीका में न्यायपालिका को लेकर तरह-तरह के विश्लेषण करने की छूट लोगों को है। हिन्दुस्तान में अदालतें जिस तरह की टिप्पणी पर अवमानना का केस शुरू कर दें, वैसी टिप्पणी अमरीका में आम हैं कि कौन से जज कैसी सोच रखते हैं, और किस मामले में वे किस तरह फैसला दे सकते हैं, यह आमतौर पर लिखा जाता है। यह भी आमतौर पर लिखा जाता है कि किस राष्ट्रपति ने उन्हें जज बनाया है। इसलिए अमरीका की बात अलग है, लेकिन दुनिया के बाकी देशों को अपनी-अपनी न्याय व्यवस्था के भीतर यह सोचने की जरूरत है कि वहां किस तरह के जज बनाए जा रहे हैं, किस तरह की ताकतें जज छांट रही हैं, और रिटायर होने के बाद जज सरकार से किस-किस तरह के उपहारों और उपकारों की उम्मीद कर रहे हैं। यह सब समझने की बात है, और किसी जिम्मेदार लोकतंत्र को अपने आपको ऐसी फिक्र से बेपरवाह नहीं रखना चाहिए। दुनिया के तमाम देशों को, खासकर उन्हें जिन्हें अपनी न्यायपालिका पर बड़ा गुरूर है, उन्हें अमरीका में ट्रंप के बनाए जजों, और उनके ऐसे फैसलों को लेकर आई नौबत पर विचार करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

क्या कम्प्यूटर भावनाओं से लैस हुए जा रहे हैं? पहला मामला आया है..

 24 जून 2022

 

विज्ञान, विज्ञान कथाओं के मुकाबले कभी-कभी अधिक रफ्तार से आगे बढ़ते दिखता है। विज्ञान और तकनीक में इंसानी कामयाबी उसकी कल तक की उम्मीद के मुकाबले बहुत आगे चल रही है। अब ऐसे में गूगल के एक ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस इंजीनियर ने जब यह दावा किया कि वह भाषा की समझ के प्रयोग करते हुए इसी मकसद के लिए बनाई गई एक मॉडल के साथ बात कर रहा था, तब उसने पाया कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस वाली यह मॉडल अपनी भावनाओं के साथ बोलने लगी थी। अब तक ऐसे कम्प्यूटर उनमें डाली गई जानकारी, याददाश्त, और उसके कम्प्यूटर-विश्लेषण के आधार पर जवाब देते हैं, लेकिन यह मॉडल ऐसी एक बातचीत के दौरान भावनाओं के साथ बोलने लगी, तो यह इंजीनियर भी हक्का-बक्का रह गया। उसने यह बात अपनी वेबसाइट पर लिखी, और कंपनी ने उसे अभी काम से अलग कर दिया है। गूगल ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के साथ जुड़े हुए बहुत से नैतिक पहलुओं पर भी शोध और काम करते चल रहा है, और ब्लेक मोइन नाम का यह इंजीनियर इन्हीं पहलुओं पर काम कर रहा था। अब काम से सस्पेंड हो जाने के बाद ब्लेक का कहना है कि उसकी कम्प्यूटर मॉडल (चैटबोट) ने भावनाएं हासिल कर ली हैं, और उसने अब ब्लेक से कहा है कि वह उसके लिए एक वकील तलाश दे। हालांकि गूगल ने, और दूसरे ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस विशेषज्ञों ने ब्लेक के इस दावे को खारिज कर दिया है कि कोई कम्प्यूटर भावनाएं हासिल कर सकता है।

यह अकेली खबर जितनी हैरानी खड़ी करती है, उतने ही सवाल भी खड़े करते हैं। अगर कृत्रिम बुद्धि पाने वाले कम्प्यूटर भावनाएं भी पाने लगेंगे, और भावनाओं के आधार पर फैसले लेकर काम करने लगेंगे, तो शायद वे उन्हें एक खास मकसद से बनाने वाले इंसानों के काबू के बाहर हो जाएंगे। अभी भी विज्ञान के साथ यह एक बड़ा खतरा जुड़ा हुआ ही है कि उसकी ताकत इंसानों के काबू के बाहर हो सकती है। अभी तक तो विज्ञान और तकनीक इंसानों के हाथ औजार और हथियार की तरह काम कर रहे हैं, लेकिन जैसे-जैसे उनमें कृत्रिम बुद्धि बढ़ाई जा रही है, विश्लेषण करने की क्षमता बढ़ाई जा रही है, वैसे-वैसे वे उस खतरे की तरफ बढ़ रहे हैं जो कि इन कम्प्यूटरों में भावनाएं, और चेतना आ जाने पर हो सकता है। आज कम्प्यूटर अपनी कृत्रिम बुद्धि से कई तरह के काम करने के लायक बनाए गए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें भावनाओं से लैस नहीं किया गया है, या उन्होंने खुद भावनाएं हासिल नहीं की हैं। लेकिन विज्ञान और टेक्नालॉजी में कई बार यह होता है कि खोज किसी चीज की जाती है, और हासिल कोई और चीज हो जाती है। किसी बीमारी का इलाज ढूंढा जाता है, और किसी और बीमारी का इलाज हाथ लग जाता है। ऐसे में ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को बढ़ाते चलते इंसानों को हो सकता है कि उस पल की खबर न लगे जब ऐसे कम्प्यूटर अपनी कृत्रिम बुद्धि से भावनाएं हासिल कर लें, नैतिकता के अपने पैमाने तय कर लें, और अपने फैसले खुद लेने लगें। ऐसी नौबत बहुत आसान नहीं लग रही है, और इसीलिए कम्प्यूटर के भावनाओं के इस ताजे दावे की वजह से गूगल ने अपने एक इंजीनियर को सस्पेंड कर दिया है।

दुनिया में ऐसी कई फिल्में बनी हैं जिनमें कम्प्यूटर मशीनों, या रोबो को बेकाबू होकर अपनी भावनाओं से काम करते दिखाया है। वे अच्छे और बुरे का फैसला खुद लेने लगते हैं, और उन्हें बनाने वाले लोगों को भी हक्का-बक्का कर देते हैं। और ऐसी नौबत फिल्मों और विज्ञान कथाओं से परे, असल जिंदगी में बहुत दूर रह गई हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है। अब पल भर के लिए यह कल्पना करें कि भारत की संसदीय राजनीति में सही और गलत का फैसला करने के लिए ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस किसी कम्प्यूटर पर नियम-कायदे और लोकतंत्र की परंपराओं को डाला जाए, और फिर यह कहा जाए कि जिन लोगों का आचरण असंसदीय है, असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है, उन लोगों को सजा दी जाए, और कम्प्यूटर ऐसे लोगों के फोन बंद कर दे, उनके बैंक खातों का काम बंद कर दे, उनकी कार को रिमोट से बंद कर दे, और उन्हें पकडऩे के लिए पुलिस भेज दे, तो क्या होगा? अभी तक इंसान जाहिर तौर पर तो ऐसे कम्प्यूटर नहीं बना रहे हैं जिनके बेकाबू हो जाने का खतरा हो, लेकिन जब दुनिया की महाशक्तियां फौजी दर्जे की रिसर्च के नाम पर बहुत से अनैतिक काम करती हैं, तो क्या वे ऐसे रोबोसोल्जर नहीं बना रही होंगी जो कि जंग के मैदान में दुश्मनों को छांट-छांटकर, खुद फैसले लेकर उन्हें मारे? आज तो जंग के हथियारों में भी घोषित तौर पर ऐसे हथियार या मशीनी सैनिक नहीं बनाए जा रहे हैं जो मारने का फैसला भी खुद लें, लेकिन क्या फौजों और उनकी सरकारों पर सचमुच ही इतना भरोसा किया जा सकता है कि वे पर्दे के पीछे भी ऐसी टेक्नालॉजी विकसित नहीं कर चुके होंगे?

अब कृत्रिम बुद्धि से लैस रोबो भावनाओं और नैतिक मूल्यों से भी कब लैस कर दिए जाएंगे, यह महज वक्त की बात लगती है। अभी गूगल के इस ताजा मामले के बाद यह भी बहस चल रही है कि ऐसे रोबो, या चैटबोट के साथ लगातार काम करने वाले लोग क्या उनसे ऐसे भावनात्मक संबंध भी बना लेंगे कि वे उन्हें अपने रिसर्च के दायरे के बाहर भी भावनाओं से लैस करने की सोचने लगें? कुछ लोग इसे एक सचमुच का खतरा मानते हैं कि लगातार किसी चैटबोट के साथ काम करते हुए इंजीनियर और उसके बीच ऐसे भावनात्मक संबंध हो जाएं कि इंजीनियर या शोधकर्ता उसे इंसानी दर्जे के करीब लाने लगे, अपनी मोहब्बत को जिंदा शक्ल देने लगे। अब गूगल से अभी सस्पेंड इस इंजीनियर ने अपनी इस चैटबोट के कहे उसके लिए एक वकील छांटकर उससे संपर्क करवा दिया है, और वकील से बातचीत करके चैटबोट ने उसे अपना केस दे भी दिया है। यह पूरा सिलसिला एक विज्ञान कथा की तरह लग रहा है, लेकिन यह उस गूगल कंपनी के भीतर की बात है जिसके बिना आज के एक आम और औसत इंसान की जिंदगी कुछ घंटे भी नहीं चलती।

आज से दस-बीस बरस में ऐसे मामले-मुकदमे शायद देखने मिल जाएं कि चैटबोट के लिए किसी ने अपने जीवनसाथी को छोड़ा, और चैटबोट से शादी कर ली। या चैटबोट ने ईर्ष्या में अपने रिसर्चर की प्रेमिका को मार डाला। देखें आगे क्या-क्या होता है...

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

अग्निपथ पर सरकार अटल, अब जनता के बीच से ही आवाज उठे

 23 जून 2022

 

हिन्दुस्तान में फौज एक बड़ा मुद्दा है। हर बरस 25-50 हजार लोगों को नौकरी देने की ताकत से परे भी बहुत सी बातें हैं जो हिन्दुस्तान में फौज की अहमियत बताती हैं। इनमें से एक तो यह है कि यह एक साथ दो ऐसे देशों से घिरा हुआ है जिनसे हिन्दुस्तान के रिश्ते दुश्मनी के माने जाते हैं। दूसरी बात यह कि इन दोनों के आपसी रिश्ते दुनिया में सबसे अधिक मीठे रिश्तों वाले देशों सरीखे हैं। और जब इन दोनों से एक साथ हिन्दुस्तान की तनातनी चल रही है, तो इस मुल्क की फौज को इन दोनों से एक साथ जूझने के लिए तैयार रहना चाहिए। आज इस फौज को लेकर जितने तरह के सवाल उठ रहे हैं, वे ऐसी किसी तैयारी से बिल्कुल परे के हैं, और फौज पर आज की तारीख में लदे हुए पेंशन के बोझ को आगे चलकर घटाने की नीयत के हैं। ऐसा माना जा रहा है कि अग्निपथ नाम की नई योजना सरकार की फौजी योजना नहीं है, वह एक वित्तीय योजना है कि सस्ते में सैनिक कैसे जुटाए जा सकते हैं, और उनका बोझ फौज पर डालने से कैसे बचा जा सकता है। किफायत बुरी बात नहीं है, लेकिन जिस अंदाज में यह किफायत की जा रही है, वह अंदाज बड़ा अटपटा है, और लोगों के मन में ऐसे शक खड़े कर रहा है जिनके बारे में बहुत पहले किसी ने कहा था कि शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है। आज की मौजूदा सरकार के पास तो जनता के बीच खड़े हो गए शक का इलाज बिल्कुल भी नहीं है।

देश के फौजी और प्रतिरक्षा के दूसरे मामलों के जानकार लोगों का कहना है कि अग्निपथ नाम की यह योजना इस रहस्यमय तरीके से रातों-रात सामने रख दी गई कि इस पर देश में कोई लोकतांत्रिक बहस भी नहीं हो पाई, लोगों से राय भी नहीं ली जा सकी। और इसमें ऐसी किसी फौजी गोपनीयता की बात भी नहीं थी कि परमाणु विस्फोट करने के पहले कैसे उस राज को उजागर किया जाए। आज अग्निपथ का जितना विरोध हो रहा है, और उसकी जितनी आलोचना हो रही है, और उसे बचाने के लिए सरकार को जिस तरह फौजी वर्दियों को सामने बिठाकर उसका बचाव करना पड़ रहा है, उन सबसे सरकार की साख अच्छी नहीं हो रही है। इस पर आज लिखने की एक ताजा वजह यह है कि देश के आज मौजूद एकमात्र परमवीर चक्र विजेता और सियाचीन के हीरो, कैप्टन बानासिंह ने एक अखबार से बातचीत में खुलकर कहा है कि अग्निपथ की वजह से भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, और ये योजना सेना को बर्बाद कर देगी, और पाकिस्तान चीन को फायदा पहुंचाएगी। बानासिंह 73 बरस की उम्र में सर्वोच्च फौजी सम्मान के साथ रिटायर्ड जिंदगी जी रहे हैं, और उन्होंने कहा कि जिस तरह अग्निपथ योजना सब पर थोपी गई है, वह तानाशाही के समान है। उन्होंने कहा कि सैनिक बनना खेल नहीं है, इसके लिए सालों की ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है, और महज छह महीने में कैसे किसी की ट्रेनिंग हो सकती है? उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने इस योजना को लाने का फैसला किया, उन्हें सशस्त्र बलों के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

किसी एक रिटायर्ड बहादुर फौजी की बात से असहमत होने वाले लोग भी हो सकते हैं, लेकिन फौजी रणनीति के जानकार बहुत से दूसरे लोगों का यह मानना है कि अग्निपथ और अग्निवीर का यह सिलसिला लोगों पर थोप दिया गया है, और चूंकि सरकार ने एक बार यह फैसला ले लिया है, तो अब उसे किसी भी कीमत पर लोगों पर लादा जा रहा है। जिस तरह नोटबंदी का फैसला लेकर, उसे लोगों पर लादने के लिए लगातार उसमें बदलाव किए गए थे, जिस तरह लॉकडाउन और टीकाकरण के फैसले लेकर फिर उन्हें लागू करवाने के लिए लगातार फेरबदल किए गए थे, जिस तरह जीएसटी को हड़बड़ी में आधी रात की आजादी की तरह का जलसा संसद में करके उसे लागू किया गया था, और उसके बाद उसमें सैकड़ों फेरबदल किए गए, ठीक उसी तरह दो दिनों के भीतर ही अग्निपथ के साथ भी हो रहा है, और सडक़ों पर आगजनी को देख-देखकर सरकार तरह-तरह के रास्ते निकालते दिख रही है कि चार बरस में रिटायर होने वाले अग्निवीरों को कहां-कहां नौकरी दी जा सकेगी। एक-एक करके भाजपा राज्य इसकी घोषणा कर रहे हैं, और उन राज्यों का नाम लिए बिना देश के सबसे बड़े फौजी अफसर खौल रही नौजवान पीढ़ी को गैरफौजी बातें समझाने में लगे हुए हैं। बिना किसी अपवाद के तमाम विश्लेषक इस बात को लेकर भी सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि सरकारी और राजनीतिक बातों को सार्वजनिक रूप से समझाने के लिए फौज का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। और तो और, तीनों सेनाओं के सबसे बड़े अफसरों की संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में वर्दियों से यह तक कहलवा दिया गया कि अग्निपथ के खिलाफ आगजनी करवाने में कोचिंग सेंटरों का हाथ है जिन्होंने उन्हें फौजी बनवाने के लिए लाखों रूपए ले लिए थे। अब इतनी बात तो अब तक पुलिस भी किसी चार्जशीट में नहीं लिख पाई है, और ऐसी विवादास्पद और साबित न हुई बात फौज के सबसे बड़े अफसरों के मुंह से कहलवाई जा रही है।

यह पूरा सिलसिला एक खतरा खड़ा कर रहा है। फौज में आज सैनिकों का एक ही दर्जा है, उन सबके रिटायर होने की एक ही शर्तें हैं। लेकिन अग्निवीरों के पहुंचने के बाद वहां पर दो अलग-अलग तबके एक ही किस्म के काम में खड़े हो जाएंगे, कुछ तो अपनी नौकरी पूरी करके रिटायर होंगे, और बाकी पूरी जिंदगी पेंशन और सहूलियतें पाएंगे, और दूसरा तबका उन अग्निवीरों का रहेगा जो चार साल बाद वहां से निकाल दिए जाएंगे, और फिर किसी इंडस्ट्री में या भाजपा कार्यालय में चौकीदार का काम करेंगे। इस तरह के चार बरस लोगों की जिंदगी में देश के लिए जान कुर्बान कर देने की कितनी प्रेरणा भर सकेंगे, यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है। और लोगों को यह शक है कि फौज के भीतर एक ही किस्म के काम के लिए, एक ही किस्म की वर्दी में इन दो किस्म के सैनिकों के बीच भेदभाव वहां के माहौल को खराब भी कर सकता है। दिक्कत यह है कि आज इस देश में सरकार की मर्जी से असहमति रखने को देशद्रोह करार दिया जा रहा है, और योग के नाम पर देश का एक सबसे बड़ा कारोबार खड़ा कर देने वाले रामदेव ने दो दिन पहले ही अग्निपथ के विरोधियों को देशद्रोही करार दिया है।

चूंकि सरकार अपनी इस योजना को हर कीमत पर पूरी तरह लागू करने पर आमादा है, इसलिए आज इस पर चर्चा की जरूरत फिर लग रही है। लोगों के अलग-अलग मंचों को इस पर चर्चा करनी चाहिए, क्योंकि हमने मोदी सरकार के तमाम बड़े फैसलों को लागू होने के बाद जनता के दबाव में सुधरते भी देखा है, और किसान कानूनों की तरह वापस होते भी देखा है। कई फैसलों को बिना लागू हुए ताक पर रखे जाते भी देखा है। इसलिए चार बरस के ठेके पर नौजवानों को शहादत के जज्बे के लिए तैयार करने की सरकार की जिद पर लोगों को शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध करना चाहिए, हो सकता है कि सरकार को खुद समझ में आए कि उसने जिद में गलत फैसला ले लिया है। यह देश मौजूदा सरकार का ही नहीं है, यह देश तमाम लोगों का है, और इसे सरकार के फैसलों पर सोचना चाहिए ताकि आने वाली पीढिय़ां उसे न भुगतें।

(Daily Chhattisgarh)

किसी धर्म-जाति के राष्ट्रपति बनने से भला उस धर्म-जाति के भले का क्या लेना-देना?

 22 जून 2022


अखबार की जिंदगी भी बड़ी अजीब रहती है, अक्सर ही पहले पन्ने पर जगह पाने के लिए खबरों में धक्का-मुक्की होती है, और अगर पहला पन्ना तैयार करने वाले लोगों को मेहनत से परहेज न हो, तो आखिरी पलों तक खबरें ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर होती रहती हैं। अब कल ही एक तरफ तो महाराष्ट्र की शिवसेना में अभूतपूर्व और बड़ी बगावत चल रही थी, सरकार गिरने के आसार दिख रहे थे, और दूसरी तरफ देश की विपक्षी पार्टियों ने मिलकर एक आकस्मिक एकता दिखाते हुए यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया। और जैसा कि पहले से तय था, कुछ घंटों के बाद देश पर सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए की मुखिया भाजपा ने एक भूतपूर्व भाजपा विधायक, और राज्यपाल रह चुकीं द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद प्रत्याशी घोषित किया है। इन दोनों ही नामों के साथ कई तरह की चर्चा शुरू हुई, यशवंत सिन्हा भाजपा की अगुवाई वाली अटल सरकार में महत्वपूर्ण वित्तमंत्री और विदेश मंत्री रह चुके हैं, लेकिन कल सुबह तक वे ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में थे, और विपक्ष के संयुक्त सर्वसम्मत उम्मीदवार बनने के पहले उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दिया। यह बात जगजाहिर है कि ममता बैनर्जी और कांग्रेस के बीच एक अनबोला सा चल रहा है, और बड़ी तनातनी चल रही है, इस बीच में अगर ममता की पसंद को कांग्रेस खुलकर अपना पूरा समर्थन दे रही है, तो यह कल का एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम था। और खासकर उन घंटों में यह सहमति या एकता नजर आई जब उन्हीं घंटों में महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर असहमति और फूट सुर्खियों में थी। राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार सामने आ चुके हैं, लेकिन विधायकों और सांसदों के बहुमत से चुने जाने वाले राष्ट्रपति के लिए आज आंकड़े किसके साथ हैं, यह बात साफ है, और अब से राष्ट्रपति चुनाव मतदान तक हो सकता है कि शिवसेना के बहुत से विधायकों के वोट भी भाजपा उम्मीदवार के साथ चले जाएं।

लेकिन ये राजनीतिक घटनाक्रम अभी उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है, और इस पर लिखने की अधिक जरूरत नहीं है। एक दूसरा मुद्दा जो इन्हीं सबके बीच से निकलकर आ रहा है, वह द्रौपदी मुर्मू का है। वे ओडिशा में सरकारी नौकरी में छोटी सी कुर्सी से उठकर वार्ड चुनाव लड़ते हुए विधायक बनी, और दो कार्यकाल विधायक रही, मंत्री भी रहीं। वे सिर्फ भाजपा में रहीं, और इस नाते 2015 में वे झारखंड की राज्यपाल बनाई गईं। वे ओडिशा की आदिवासी हैं, और देश के आदिवासी राज्य झारखंड में राज्यपाल रहीं, और अब उन्हें एक आदिवासी महिला के रूप में भाजपा ने अगला राष्ट्रपति बनाने का फैसला लिया है। उनका नाम सामने आने के बाद देश में यह चर्चा जोरों से चल रही है कि क्या एक आदिवासी महिला होने के नाते वे आदिवासियों या महिलाओं की हिफाजत के लिए कुछ कर पाएंगी, या फिर वे मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की तरह होकर रह जाएंगी जो एक दलित होने के नाते इस पद पर लाए गए थे, और जिनके कार्यकाल के दौरान देश के दलितों ने खूब जुल्म झेले हैं, और राष्ट्रपति की तरफ से हमदर्दी के कुछ शब्द भी नहीं आए। अब सोशल मीडिया इस बात पर उबला पड़ा है कि द्रौपदी मुर्मू जब झारखंड की राज्यपाल रहीं उस दौरान वहां आदिवासियों पर खूब जुल्म हुए, सरकारी फैसले आदिवासियों के खिलाफ लिए गए, लेकिन राजभवन में रहते हुए उन्होंने इनमें से किसी बात का विरोध नहीं किया।

अब राष्ट्रपति बनाते वक्त किसी तबके को महत्व देने, या किसी तबके को संतुष्ट करने की बात तो ठीक हो सकती है, लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद क्या ऐसे लोग अपने तबके का कोई भला कर पाते हैं? या क्या उन्हें अपने तबके का अलग से कोई भला करना चाहिए? जो ओहदा देश की संवैधानिक व्यवस्था में सबसे ऊपर बनाया गया है, और जिसकी हकीकत भी सब जानते हैं कि यह ओहदा मोटेतौर पर केन्द्र सरकार का चेहरा देखकर काम करता है, उस ओहदे पर किसी को किस उम्मीद के साथ बिठाया जाता है? यह बात तो साफ है कि जिस तरह ज्ञानी जैलसिंह अपने पूरे कार्यकाल प्रधानमंत्री राजीव गांधी से नापसंदगी से देश में एक अनिश्चितता बनाए हुए थे, वैसा राष्ट्रपति तो कोई भी सरकार नहीं चाहेगी। सरकार तो आमतौर पर फखरूद्दीन अली अहमद किस्म का राष्ट्रपति चाहेगी जिससे आपातकाल की घोषणा पर आधी रात को दस्तखत करवा लिए गए थे। इसलिए किसी भी सरकार से राष्ट्रपति को अधिकार देने की उम्मीद करना फिजूल की बात है।

अब सवाल यह उठता है कि अगर प्रचलित जनधारणा के मुताबिक राष्ट्रपति केन्द्र सरकार की रबर स्टैम्प ही है, तो किसी भी ईमानदार और इज्जतदार व्यक्ति को रबर स्टैम्प क्यों बनना चाहिए? और जहां तक संवैधानिक सीमाओं की बात है, तो भारत की संवैधानिक व्यवस्था में भी राष्ट्रपति के लिए बहुत सी बातें मुमकिन हैं। राष्ट्रपति देश के हालात पर अपनी बात कह सकते हैं, और उन्हें केन्द्र सरकार भी इससे नहीं रोक सकती। राष्ट्रपति कोई इंटरव्यू दे सकते हैं, कोई लेख लिख सकते हैं, सरकार के भेजे प्रस्तावों को रोककर देर कर सकते हैं, उन्हें कम से कम एक बार तो अपनी आपत्ति या सुझाव लगाकर वापिस भेज सकते हैं, लेकिन अगर कोई राष्ट्रपति अपने इन संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल भी नहीं करते हैं, तो वे अपने को इस कुर्सी पर बिठाने वाले के प्रति वफादारी दिखाते हैं, या राष्ट्रपति का दूसरा कार्यकाल पाने के लिए सरकार की सेवा करते हैं। जो एक बार इस ओहदे पर पहुंच गए, उन्हें हटाना तो आसान नहीं रहता, इसलिए उन्हें पांच बरस के एक कार्यकाल की सहूलियतों की तो गारंटी रहती है। इसके बाद भी अगर पुरानी वफादारी या आगे की उम्मीद न हो, तो यह रबर स्टॉम्प भी देश का भला कर सकता है, सरकार के गलत कामों पर उसकी फजीहत कर सकता है। लेकिन ऐसे राष्ट्रपति पहली बात तो बनाए नहीं जाते, और दूसरी बात यह कि बनने के बाद वैसे रह नहीं जाते। इसलिए देश के सबसे बड़े संवैधानिक ओहदे का लगभग हमेशा ही बेजा इस्तेमाल होते आया है, पुरानी वफादारी और शुक्रगुजारी दिखाने के लिए, या दूसरे कार्यकाल की उम्मीद के लिए। ऐसे में अगर कोई राष्ट्रपति केन्द्र सरकार या देश की किसी सरकार के असंवैधानिक कामकाज को देखते हुए भी उसे अनदेखा करते हैं, तो वे हौसले की कमी, और निजी स्वार्थ की वजह से करते हैं, या फिर ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं कि उनकी कुछ कमजोर बातें सरकार के हाथ हों।

आज एक आदिवासी महिला के राष्ट्रपति बनने की संभावनाओं से न तो आदिवासियों के खुश होने की कोई बात है, और न ही महिलाओं के खुश होने की। इन दोनों के खिलाफ देश भर में पिछले बरसों में जो माहौल बना हुआ था, उसमें राज्यपाल रहते हुए भी, और उसके बाद भी उन्होंने मुंह खोला हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। इसलिए उनके आने से देश के आदिवासी समुदाय में उत्साह की कोई वजह नहीं है, और न ही महिलाओं में उत्साह की। आने वाला वक्त बताएगा कि क्या वे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करेंगी, या वफादारी और उम्मीद के साथ वक्त काटेंगी। भारत के राष्ट्रपति पद को गैरजरूरी महत्व नहीं देना चाहिए, यह समारोहों के लिए बनाया गया दिखावे का एक ओहदा है, जिस पर बैठे लोगों के सामने इस पसंद का मौका रहता है कि वे चाहें तो असर डाल सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

 

परिवार का आकार और खर्च दोनों छोटे बनाए रखें

 21 जून 2022


मुम्बई की एक रिपोर्ट है कि 2021 में वहां नए जन्म का रजिस्ट्रेशन कोरोना के पहले के बरस 2019 के मुकाबले 24 फीसदी गिर गया है। 2019 में 1 लाख 48 हजार से अधिक जन्म रजिस्ट्रेशन हुआ था, जो 2020 में गिरकर 1 लाख 20 हजार हो गया, अब 2021 में वह कुल 1 लाख 13 हजार रह गया है। इसकी एक बड़ी वजह मुम्बई में बाहर से आकर काम करने वाले लोगों का लॉकडाउन के दौरान अपने गांव लौट जाना रहा, और उसके बाद से अब तक वे सारे लोग काम पर लौटे नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि जो काम मुम्बई में हासिल था, वह अपने गांव या कस्बे में मिल रहा होगा, लेकिन लॉकडाउन के दौरान महानगरों से जो हौसला टूटा, तो वह फिर जुड़ नहीं पाया। ऐसा भी देखा गया है कि मजदूर अगर लौटकर आ भी गए हैं, तो भी उनके परिवार नहीं लौटे हैं, और नतीजा यह है कि अगर उनमें नई संतान होती भी है तो उसका रजिस्ट्रेशन कहीं और हुआ होगा। लोगों को लगा कि मुसीबत के वक्त न मालिक काम आए, न महानगर।

ऐसे कामगारों के अलावा जानकारों का यह भी अंदाज है कि मुम्बई में जन्म घटने के पीछे लोगों पर छाई हुई आर्थिक अनिश्चितता भी एक वजह थी। मंदी छाई हुई थी, लोगों को यह समझ नहीं पड़ रहा था कि कोई भी नया खर्च वे कैसे उठाएंगे, और अस्पतालों के नाम से दहशत हो रही थी। ऐसे में बीमारी और बदहाली से घिरे हुए लोगों ने चाहे-अनचाहे यह समझदारी दिखाई कि ऐसे दौर में परिवार नहीं बढ़ाए। जबकि खतरा यह था कि महीनों तक घर बैठे हुए लोग आबादी बढ़ा सकते थे, लेकिन वह नौबत नहीं आई। हो सकता है कि पूरे देश के ऐसे आंकड़े कुछ और तस्वीर दिखाएं क्योंकि पूरा देश तो महानगर मुम्बई है नहीं। लेकिन ऐसा लगता है कि देश की बड़ी आबादी ने आज की आर्थिक हकीकत का अहसास करते हुए यह समझ लिया है कि नए मुंह और पेट तुरंत कमाने वाले नए हाथ लेकर नहीं आने वाले हैं, और इसलिए अच्छे कहे जाने वाले दो बच्चों का भी यह शायद सही वक्त नहीं है।

अभी आबादी के आंकड़ों को लेकर तो हम अधिक विश्लेषण करना नहीं चाहते क्योंकि पूरे देश के आंकड़े सामने भी नहीं हैं, और कोरोना-लॉकडाउन के इस दौर को लेकर अधिक अटकल भी नहीं लगानी चाहिए। लेकिन एक बात तय है कि हिन्दुस्तान में आज जिंदा रहना जितना महंगा हो गया है, पढ़ाई और इलाज जिस तरह लोगों की पहुंच के बाहर होते चल रहा है, रोजगार सिमटते चल रहे हैं, इन सबको देखते हुए लोगों को पहले कमाई की गारंटी करनी चाहिए, उसके बाद ही शादी या नए परिवार जैसे खर्च बढ़ाने चाहिए। आज परिवार को बढ़ाना एक दिन का खर्च नहीं है, जन्म और अस्पताल का बिल तो एक बार ही जुट सकता है, लेकिन नई जिंदगी का रोजाना का खर्च, और किसी परेशानी के वक्त अचानक आने वाला खर्च जुटाना आज अधिकतर लोगों की पहुंच के बाहर हो चुका है। आज एक बार फिर अग्निपथ और अग्निवीर के बारे में लिखने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन सेना से चार बरस बाद रिटायर कर दिए जाने वाले अग्निवीरों को केन्द्रीय सुरक्षा बलों, राज्य सरकारों, या निजी कंपनियों में नौकरी देने का भरोसा या गारंटी उस वक्त बेमायने लगते हैं जब यह दिखता है कि सरकारी से लेकर निजी क्षेत्र तक लगातार नौकरियों की कटौतियां चल रही हैं, सरकारों में लाखों कुर्सियां सोच-समझकर खाली रखी गई हैं, ताकि तनख्वाह का बोझ घट सके। यह नौबत न तो अग्निपथ से सुधरने वाली है, न ही अधिक बिगडऩे वाली है। इसलिए लोगों को परेशानी से जूझने की अपनी क्षमता पर अधिक भरोसा करना चाहिए, अच्छे दिन आने की उम्मीद पर कम भरोसा करना चाहिए।

लोगों को परिवार बढ़ाने से परे भी अपने खर्चों पर काबू रखना चाहिए, क्योंकि आज जो कमाई है, वह कल जारी रह सकेगी इसकी कोई गारंटी नहीं हैं। दूसरी तरफ बढ़े हुए खर्च कम कर पाना आसान नहीं रहता, इस बात की तो गारंटी सी रहती है। भारत जैसे देश में सकल राष्ट्रीय उत्पादन के आंकड़े चाहे हौसला बहुत पस्त न करें, लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि इन आंकड़ों में मनरेगा मजदूरों से लेकर अडानी-अंबानी की कमाई के, उत्पादन के आंकड़े भी शामिल हैं। और आज देश में कमाई का जो अनुपातहीन बंटवारा है, उसमें अडानी-अंबानी की दोगुनी होती दौलत और कई गुना बढ़ती कमाई के आंकड़ों से देश के गरीब और मध्यम वर्ग को खुश होने की जरूरत नहीं है। आने वाला वक्त इससे और अधिक कड़ा हो सकता है, और लोगों को न सिर्फ अपने काम को बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हुनर के बाजार में उनकी कद्र बनी रहे, बल्कि उन्हें लगातार अपने खर्चों पर काबू भी रखना चाहिए। अभी पूरी दुनिया में आसमान पर पहुंच रही महंगाई के कम होने का आसार नहीं दिख रहा है, और लोगों को खर्च घटाते जाने की कोशिश भी करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

इस घर को आग लग गई घर के चिराग से, पार्टियों के बड़बोले नेताओं के खतरे

 20 जून 2022


आज देश में कांग्रेस पार्टी से परे बाकी तमाम लोगों के लिए सेना में भर्ती की नई योजना अग्निपथ सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। कांग्रेस पार्टी की बात कुछ अलग है, उसके नए संचार प्रमुख, राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने कल ही ट्वीट किया है कि आज 20 जून का देश भर का कांग्रेस का प्रदर्शन अग्निपथ के खिलाफ और राहुल गांधी पर केन्द्रित प्रतिशोध की राजनीति के खिलाफ रहेगा। आज जब देश की बहुत सी पार्टियां और संगठन अग्निपथ के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, तो इस व्यापक मुद्दे से कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को जोडक़र अग्निपथ के महत्व को घटाने के अलावा और कुछ नहीं कर रही। खैर, जयराम रमेश आज अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जो कि अपने बयान से आज अपनी पार्टी का नुकसान कर रहे हैं। भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय ने कल वीडियो कैमरों के सामने जिस तरह यह बात कही कि अग्निपथ से भर्ती होने वाले सैनिक रिटायर होने के बाद भाजपा कार्यालय के सुरक्षाकर्मी बनने में प्राथमिकता पाएंगे, वह बात उनकी पार्टी का बहुत बड़ा नुकसान कर गई है, और भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार जो जनधारणा प्रबंधन करना चाह रही थी, कैलाश विजयवर्गीय ने उस कोशिश को मानो लात ही मार दी। दूसरी तरफ कल ही केन्द्र सरकार के एक मंत्री, जी.किशन रेड्डी ने औपचारिक प्रेस कांफ्रेंस में यह कहा कि अग्निवीरों को सेना से निकलने के बाद काम की कमी नहीं रहेगी क्योंकि उन्हें ड्राइवरी, बिजली मिस्त्री का काम, नाई और धोबी का काम सिखाया जाएगा। फिर मानो भाजपा इस तरह की बातों में आगे न निकल जाए इसलिए कांग्रेस के एक एमएलए इरफान अंसारी अपनी बेवकूफी की बातों के साथ दो दिनों से समाचार बुलेटिनों पर छाए हुए हैं, और अभी उनका यह बयान बार-बार दिखाया जा रहा है कि चार साल सैनिक रहकर निकले हुए लोग बाहर आकर हथियार उठा लेंगे, और सडक़ों पर खून-खराबा होगा। जिस तरह अग्निपथ योजना के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए नौजवान भीड़ सडक़ों और पटरियों पर हिंसा कर रही है, कुछ उसी किस्म की हिंसा अलग-अलग पार्टियों के नेता कैमरा और माईक देखते ही कर रहे हैं, और लापरवाही और गैरजिम्मेदारी से बकवास करते हुए ये लोग अपनी खुद की पार्टी या अपनी खुद की सरकार को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

लोगों को याद होगा कि अभी दो हफ्ते ही गुजरे हैं जब भाजपा के दो प्रवक्ताओं ने पार्टी को एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक मुसीबत में डाला है, और अपनी पार्टी के साथ-साथ उन्होंने इस पूरे देश को भी दुनिया के बीच हिकारत के घेरे में डाल दिया है, और एकमुश्त तमाम मुस्लिम देशों को भारत के आमने-सामने कर दिया है। उसके तुरंत बाद भी ऐसी अनौपचारिक खबर आई थी कि भाजपा के प्रवक्ता धर्म के मामलों पर नहीं बोलेंगे, कई और मुद्दों पर पार्टी के बड़े नेताओं से बात करने के बाद ही बोलेंगे, जिन्हें पार्टी ने अधिकृत किया है वे ही लोग टीवी चैनलों पर जाएंगे। इस अनौपचारिक खबर से ऐसा लगने लगा था कि अब भाजपा के प्रवक्ताओं की जुबान पर पार्टी की लगाम रहेगी। लेकिन जब कोई केन्द्रीय मंत्री, या कैलाश विजयवर्गीय सरीखे बड़े नेता किसी जलते-सुलगते मुद्दे पर ऐसे लापरवाही के शब्द इस्तेमाल करते हैं, तो यह समझ आता है कि पार्टी के प्रवक्ताओं और नेताओं पर पार्टी का कोई बस नहीं है। यही हाल दूसरी कई पार्टियों के बारे में भी कहा जा सकता है, और आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी सुनाई अपने बचपन की कहानियों को लेकर उनकी आलोचना के साथ-साथ उनकी मां का भी जिस तरह का मजाक बनाया जा रहा है, उस पर भी कोई पार्टी अपने लोगों को कोई जिम्मेदारी सिखाते नहीं दिख रही है, क्योंकि हर पार्टी के पास भाजपा के कई नेताओं के इससे भी बुरे बयानों की मिसालें कायम हैं, और जुबानी गिरावट का यह सिलसिला बेधडक़ आगे बढ़ते चल रहा है।

आज अग्निवीरों को लेकर एक तरफ तो फौजी वर्दी पहने हुए बड़े अफसर मीडिया के सामने आकर उन्हें अपनी बराबरी का सैनिक बता रहे हैं, अपने बगल में सुला रहे हैं, अपने से किसी मायने में कम नहीं बता रहे हैं, और ऐसा करके वे सरकार की शांति कायम करने की नीयत का साथ दे रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार के ही हिमायती लोग तरह-तरह से इन अग्निवीरों को मनरेगा मजदूरों से बेहतर गिनाकर लोगों को यह तुलना करने पर मजबूर कर रहे हैं कि अग्निवीर मनरेगा मजदूरों से तो बेहतर ही रहेंगे। सरकार के हिमायती इन लोगों को यह भी समझ नहीं है कि मनरेगा मजदूर सरहद पर जान कुर्बान करने के लिए नहीं जाते हैं, अपने गांव के बगल ही मिट्टी खोदते हैं। देश का सिलसिला कुछ तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से, और कुछ बाकी मीडिया की मेहरबानी से भी इतना बिगड़ चुका है कि अब लोग सेना भर्ती के तरीके पर उठाए सवालों को सेना को कमजोर करने की साजिश कह रहे हैं, दुश्मन देश की सेना को मजबूत करने की साजिश कह रहे हैं। जिसके मुंह में जो आ रहा है वह कहे जा रहे हैं, और जो बात जितनी अधिक अटपटी है, जितनी अधिक खटकने वाली है, वह मीडिया में उतनी ही अधिक अहमियत भी पा रही है। ऐसा लगता है कि जो सोशल मीडिया, और मीडिया भी, लोकतंत्र का बड़ा औजार माने जाते हैं, वे एक ऐसी लाठी बन गए हैं जिसे घुमा-घुमाकर लोकतंत्र के टुकड़े किए जा रहे हैं।

आज हर मोबाइल फोन एक मीडिया संस्थान बन गया है, और हर नागरिक मीडियाकर्मी। ऐसे में रद्दी से रद्दी नेता को भी कई कैमरे नसीब हो जाते हैं, और सामने कैमरे देखकर, खबरों में आने की उनकी हसरत उमडऩे लगती है, और वे अपनी पार्टी या अपने संगठन का नुकसान भी करने की कीमत पर उटपटांग बोलने लगते हैं। कल तक मोदी सरकार के विरोधी यह कह रहे थे कि चार साल बाद फौज से निकलकर अग्निवीर दर्जे के सैनिक अडानी और अंबानी के सिक्यूरिटी गार्ड बन पाएंगे, कैलाश विजयवर्गीय ने चार कदम आगे बढक़र उन्हें भाजपा दफ्तर का सिक्यूरिटी गार्ड बना दिया। फिर मानो कैलाश विजयवर्गीय के मुकाबले केन्द्रीय मंत्री जी.किशन रेड्डी को हीनभावना होने लगी, तो उन्होंने रिटायर्ड अग्निवीरों को ड्राइवर, बिजली मिस्त्री, नाई और धोबी बना दिया। अब देश के दर्जनभर राज्यों में लगी हुई आग को बुझाने में लगी मोदी सरकार को उसके घर के चिरागों से ही आग लग रही है। बहुत सी दूसरी विपक्षी पार्टियों के पास जलने लायक कुछ बचा नहीं है, इसलिए उन्हें आज समझ नहीं आ रहा है कि उनके नेता और प्रवक्ता उनका क्या नुकसान कर रहे हैं। हिन्दुस्तान के मीडिया की दिक्कत यह हो गई है कि सोशल मीडिया के बीच जिंदा रहने के लिए उसे तरह-तरह से सोशल मीडिया की अराजकता से मुकाबला करना पड़ता है। फिर यह भी है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने ग्राहकों की जरूरतों, और अपनी तकनीक की सीमाओं के चलते हुए चाहे-अनचाहे सनसनी पर ही जिंदा रहता है, और अधिक गैरजिम्मेदारी उसे अधिक कामयाब भी बनाती है।

इस पूरे दौर में राजनीतिक दलों को एक ही सहूलियत है कि उसके बकवासी नेताओं के मुकाबले दूसरी पार्टियों में भी बकवासी नेता हैं, और नुकसान किसी एक पार्टी का ही नहीं हो रहा है। लेकिन तमाम पार्टियों के नुकसान होने को राहत मानने वाली हिन्दुस्तानी राजनीति इस बात की तरफ से बेफिक्र और बेखबर है कि इससे हिन्दुस्तान की सार्वजनिक जीवन की हवा जहरीली होती चल रही है, और यहां पर अब कोई न्यायसंगत, तर्कसंगत संवाद मुमकिन नहीं रह गया है।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

की-रिंग या बैग तलाशने को बना एयरटैग बन गया कत्ल का सामान

 19 जून 2022

 

टेक्नालॉजी ने दुनिया से निजता छीन ली है। अब बहुत कम प्राइवेट रह गया है, और प्राइवेसी शब्द सिर्फ शब्द के रूप में ही मायने रखता है, बाकी कोई प्राइवेसी रह नहीं गई। जो लोग मोबाइल फोन, इंटरनेट, कम्प्यूटर, और दूसरे तरह के हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं, वे कदम-कदम पर अपने पदचिन्ह छोड़ते जाते हैं, जिनकी मदद से सरकारी एजेंसियां तो उन तक पहुंचती ही हैं, अब हत्यारे और जीवनसाथी भी लोगों पर नजर रखने में इन सबका इस्तेमाल करने लगे हैं।

अभी अमरीका से यह खबर आई कि एप्पल कंपनी के एक सबसे छोटे सामान, एयरटैग से एक महिला ने अपने प्रेमी का पीछा कर लिया, उसे एक दूसरी महिला के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया, और फिर प्रेमी को उसने अपनी कार के नीचे कुचलकर मार डाला। यह एयरटैग एक छोटी सी की-रिंग सरीखा होता है जिसे किसी सामान के साथ जोडक़र रखा जा सकता है, और बाद में वह सामान न मिलने पर अपने एप्पल फोन के मार्फत उस एयरटैग तक पहुंचा जा सकता है। इस महिला ने अपनी प्रेमी की कार में ऐसा एक एयरटैग रख दिया था, और फिर अपने फोन पर उसकी लोकेशन देखते हुए वह उस शराबखाने तक पहुंच गई जहां प्रेमी एक दूसरी महिला के साथ था।

यह काम तो बाजार में कानूनी रूप से मिलने वाले छोटे से मासूम, की-रिंग या बैग तलाशने के उपकरण की तरह मौजूद है, जिसे बनाने वालों ने इसके मार्फत कत्ल की कल्पना शायद नहीं की होगी। लेकिन आज महज कुछ हजार रूपयों के ऐसे एयरटैग का इस्तेमाल करके दुनिया में कहीं भी लोग अपने भागीदारों, जीवनसाथियों, या प्रेमियों पर नजर रख सकते हैं। दो दिन पहले की इस खबर और उसके बाद आज उस पर लिखी गई इस बात के बाद सभी लोगों को कुछ अधिक सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि एक जूठा सेब भी आज जासूसी कर रहा है।

यह खतरा कत्ल तक तो अभी पहुंचा है, लेकिन पिछले कुछ महीनों से एप्पल पर निजता भंग करने का उपकरण बनाने की तोहमतें लग ही रही थीं। जो लोग किसी के साथ कोई जुर्म करना चाहते हैं वे लोग भी किसी के सामान में, या गाड़ी में एयरटैग डालकर उन पर निगरानी रख रहे हैं। अब ऐसी जासूसी कर रहे एयरटैग को पकडऩे के लिए इंटरनेट पर ट्रैकर डिटेक्ट नाम का एप्लीकेशन आ गया है, और मुफ्त का यह एप्लीकेशन डाउनलोड करके लोग यह पता लगा सकते हैं कि उनके अगल-बगल में ऐसे कोई एयरटैग काम कर रहे हैं क्या जो कि अपने मालिक से कुछ देर से अलग हैं। इसके बाद ऐसे एयरटैग का बीपर शुरू करके उस तक अपना हाथ भी पहुंचाया जा सकता है, और उसकी बैटरी निकालकर फेंककर उसे बंद भी किया जा सकता है। इससे लोग अपनी की जा रही जासूसी को बंद कर सकते हैं।

अब सवाल यह है कि यह तो बात एक पूरी तरह से कानूनी उपकरण की हुई है जो कि बड़ी आसानी से दुकानों में उपलब्ध है, या ऑनलाईन ऑर्डर करके किसी आईफोन की तरह ही खरीदा जा सकता है। लेकिन गैरकानूनी तौर पर बिकने वाली ऐसी बहुत सी अघोषित चीजें बाजार में हैं जिनसे लोग दूसरों पर नजर रख सकते हैं। अभी दुनिया भर से आने वाली रिपोर्ट बताती हैं कि जब बड़ी-बड़ी कंपनियों को अपने कर्मचारियों से घरों से ही काम करवाना पड़ा, तो उन्होंने कम्प्यूटर और ऑनलाईन पर उनके कंपनी के काम पर नजर रखने के लिए दुनिया के ऑनलाईन जासूसों का सहारा लिया, और यह निगरानी रखी कि लोग किस जगह से काम कर रहे हैं, कितने घंटे काम कर रहे हैं, और ऑफिस के काम के अलावा क्या-क्या कर रहे हैं। ऐसी निगरानी रखने वाली, और अपने को साइबर-सुरक्षा कंपनी बताने वाली एजेंसियों ने इसी दौरान अपना कारोबार बहुत बढ़ा लिया है।

लेकिन कंपनियों से परे, जैसा कि अमरीका के इस ताजा कत्ल में हुआ है, लोग अपने करीबी लोगों के मोबाइल फोन से भी उन पर तरह-तरह की नजर रख सकते हैं। कुछ पल के लिए किसी से उनका फोन मांगकर गूगल मैप की हिस्ट्री देखकर यह जाना जा सकता है कि पिछले दिनों में वे किस वक्त कहां-कहां गए हैं। लोगों के फोन और लैपटॉप पर दर्ज वाईफाई पासवर्ड देखकर भी वे जगहें तलाशी जा सकती हैं जहां वह वाईफाई काम करता है। किसी के फोन पर लोकेशन शेयर करने में कुछ पल ही लगते हैं, और उसके बाद आप बैठकर अपने फोन पर दूसरों की लोकेशन देख सकते हैं।

जुर्म के ये तरीके जानना और समझना इसलिए जरूरी नहीं है कि जुर्म कैसे किया जाए। इन तरीकों से वाकिफ लोग ऐसे जुर्म के शिकार होने से भी बच सकते हैं, और अनजान रहकर वे ऐसे जाल में फंस सकते हैं। ट्रैकिंग डिवाइसों का यह सिलसिला एप्पल ने शुरू नहीं किया है, बरसों पहले से जापान में बच्चों के स्कूल बैग में ट्रैकिंग डिवाइस लगाने का काम चल रहा है ताकि मां-बाप अपने फोन पर देख सकें कि किसी वक्त पर उनके बच्चे कहां हैं। अब तो एप्पल की मामूली सी घड़ी ऐसी आ गई है जिसे पहनने वाले अगर अचानक कहीं गिर जाएं, तो पहले से तय किए हुए नंबरों पर उनके गिरने का एसएमएस चले जाए, और शायद लोकेशन भी।

बहुत से उपकरण लोगों की जिंदगियों को बचाने वाले हैं, लेकिन बहुत से उपकरण निगरानी रखने वाले, और जुर्म में मददगार भी हैं। टेक्नालॉजी अच्छी नीयत से बनाई जाती है, लेकिन वह आगे जाकर किन हाथों में पहुंचेगी, इसकी नियति तय नहीं की जा सकती है। आत्मरक्षा के नाम पर खरीदी गईं बंदूकें अमरीका में आज सामूहिक हत्याओं के काम आ रही हैं। इसलिए कारोबारी भागीदार हो, या पारिवारिक जीवनसाथी, प्रेमी हो या सरकार हो, सबसे सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि जिनकी पहुंच आपकी गाड़ी, आपके घर-दफ्तर तक और आपके फोन-कम्प्यूटर तक है, वे आप पर नजर रखने की सबसे अधिक ताकत भी रखते हैं। जब तक आप फोन, इंटरनेट, और उपकरणों से परे हैं, तब तक आप बेफिक्र रह सकते हैं, लेकिन उसके बाद टेक्नालॉजी के साथ बढ़ाया हुआ आपका हर कदम आपको अधिक खतरे में डालने वाला रहता है।

(Daily Chhattisgarh)

हिन्दुस्तान में फैलाई हिंसा से धमाके हुए अफगान में

 19 जून 2022


अफगानिस्तान के काबुल में एक गुरुद्वारे पर आईएस के आतंकियों ने हमला किया। हमला बहुत बड़ा था, दर्जन भर से अधिक विस्फोट किए गए, हथगोलों और रायफलों से लैस आतंकी गुरुद्वारे के अंदर घुसे, और दो लोगों मार डाला। इसके बाद अफगानिस्तान के आज के शासक, तालिबान ने इन आईएस आतंकियों को मार गिराया। खबरें बताती हैं कि अफगानिस्तान में हाल ही में सिक्ख धर्मस्थलों पर यह पांचवां बड़ा हमला है, और इनमें से अधिकतर की जिम्मेदारी आईएस ने ली है। इस बार आईएस ने इस हमले के बाद यह बयान जारी किया है कि उसने हिन्दुस्तान में (भाजपा प्रवक्ता) नुपूर शर्मा और नवीन जिंदल द्वारा पैगंबर का अपमान करने के जवाब में यह हमला किया है। अफगानिस्तान के घरेलू हालात ऐसे हैं कि तालिबान का भी आईएस आतंकियों पर कोई बस चल नहीं रहा है, और आज दुनिया के सबसे कट्टर इस्लामी आतंकी समूहों में से एक, आईएस वहां जब तब हमले करते रहता है।

अफगानिस्तान के किसी आतंकी हमले या मुठभेड़ के बारे में यहां लिखने की कोई वजह नहीं बनती थी, लेकिन इस बार आईएस ने इस हमले के बाद जो बयान दिया है, वह हिन्दुस्तान के लिए फिक्र की बात है। हिन्दुस्तानी लोग दुनिया के अधिकतर देशों में बसे हुए हैं, और दुनिया का ऐसा कोई इस्लामी देश नहीं है जहां पर हिन्दुस्तानी न हों। ऐसे में हिन्दुस्तान ने इस्लाम पर किया हुआ कोई भी हमला कई देशों में हिन्दुस्तानियों को निशाना बना सकता है, और बनाता ही है। जो आतंकी हमले हैं वे तो दिख जाते हैं, लेकिन जो आर्थिक हमले होते हैं, वे आसानी से दिखते नहीं हैं। जब न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर की जुड़वां इमारतों पर ओसामा-बिन-लादेन के आतंकियों ने विमान टकराकर हमला किया था, तो उसके जवाब में पूरी दुनिया में ही मुस्लिमों को जगह-जगह आर्थिक बहिष्कार झेलना पड़ा था, और उनके कारोबार में बड़ी गिरावट आई थी। अभी भारत में धार्मिक कट्टरता, साम्प्रदायिकता, और असहिष्णुता का नुकसान दुनिया भर में हिन्दुस्तानियों को कई अघोषित तरीकों से हो रहा है। और जो लोग अपनी-अपनी बसाहट में दुनिया भर में ऐसा नुकसान झेल रहे हैं, वे भी खुलकर इस बारे में कुछ बोलना नहीं चाहते हैं क्योंकि यह सिलसिला और आगे न बढ़े।

यह पहले भी कई बार लिखा जा चुका है कि खाड़ी के देशों में दसियों लाख हिन्दुस्तानी काम करते हैं, और उनके घर भेजे गए पैसों से भारत की विदेशी मुद्रा की जरूरत भी पूरी होती है, और भारतीय घरेलू अर्थव्यवस्था भी उसकी वजह से आगे बढ़ती है। ऐसे में हिन्दुस्तान के जिन नफरतजीवियों को तरह-तरह के फतवे देना सूझता है, उन्हें इस बात का अहसास भी नहीं है, और इसकी फिक्र भी नहीं है कि दूसरे देशों में अल्पसंख्यक कामगार तबके के हिन्दुस्तानियों, और हिन्दुओं का क्या हाल होगा। जिन्हें अपने मुहल्ले से बाहर निकलना नहीं है, और सबसे करीब की सडक़ पर उत्पात करना है, सबसे पास की बस्तियों में आग लगानी है, उन्हें दूर बसे अपने ही धर्म के लोगों की फिक्र की बात भला कैसे सूझेगी, क्यों सूझेगी? नतीजा यह है कि दुनिया के माहौल से बेखबर और बेफिक्र ऐसे धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोग हिन्दुस्तान में आग लगाकर यहां तो खुद बच निकलने की गारंटी कर लेते हैं, लेकिन दूसरे देशों में हिन्दुस्तानी लोग उसका दाम चुकाते हैं।

आज हिन्दुस्तान में धर्मान्धता, और साम्प्रदायिकता की जो आंधी चल रही है, उस बीच लोगों को यह भी दिखाई नहीं दे रहा है कि एक देश के रूप में भारत की सभ्य दुनिया में कितनी बेइज्जती हो रही है। और न सिर्फ दूसरे देशों के पूंजीनिवेशकों ने हाल ही के हफ्तों में बहुत बड़ी रकम हिन्दुस्तान से निकाल ली है, बल्कि चीन के विकल्प के रूप में भारत को जो महत्व मिलना था वह भी कहीं आसपास दिख नहीं रहा है। कुछ लोगों को हिंसक हिन्दुस्तानियों के हाथों में झंडे-डंडों से इसका रिश्ता समझ नहीं आएगा, लेकिन साम्प्रदायिकता की आग में झोंके जा रहे देश में पूंजीनिवेश करने भी लोग बाहर से नहीं आएंगे। आबादी के बहुसंख्यक हिस्से को जब सत्ता की तरफ से हिफाजत मिल जाती है, तब उसके भीतर अगर साम्प्रदायिक हिंसा सुलगती रहती है, तो वह लपटों में बदलने में वक्त नहीं लगता। और ऐसी लपटों में सबसे पहले अर्थव्यवस्था आती है, इस देश में भी, और इस देश के बाहर बसे हिन्दुस्तानियों की भी।

आज अफगानिस्तान के एक सिक्ख गुरुद्वारे को भारत में भाजपा प्रवक्ताओं के बयानों की वजह से इस्लामी आतंकियों का हमला झेलना पड़ा है। सिक्खों का इन बयानों से भी कोई लेना-देना नहीं था, और तो और इन प्रवक्ताओं में भी कोई निजी हैसियत में सिक्ख नहीं थे, लेकिन हिन्दुस्तानी होने की वजह से सिक्खों ने वहां कुछ साम्प्रदायिक हिन्दुओं के फैलाए जहर के दाम चुकाए हैं, अपनी जिंदगियां खोई हैं, और गुरुद्वारे पर हमला झेला है। देश के भीतर जो लोग बढ़ाई जा रही साम्प्रदायिकता पर चुप हैं, वे यह बात समझ लें कि दुनिया भर में जगह-जगह हिन्दुस्तानी लोग इसके दाम चुका रहे हैं, चुकाते रहेंगे। हिन्दुस्तान में जो लोग इस आग को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं, उनसे अफगानिस्तान के इस ताजा हमले को लेकर सवाल होने चाहिए कि यहां पर हिंसा फैलाते हुए क्या उन्हें दुनिया भर में बसे भारतवंशियों की फिक्र है?

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जून 2022


 (Daily Chhattisgarh)

सेना भर्ती में बुनियादी फेरबदल किस रफ्तार से, किस कीमत पर?

 18 जून 2022


एक बार फिर देश की मोदी सरकार की एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना से बड़ा बवाल उठ खड़ा हुआ है। अग्निपथ योजना के तहत देश के नौजवान फौज में भर्ती होकर अग्निवीर बनने के पहले ही देश के आधा दर्जन राज्यों में प्रदर्शन करते हुए ट्रेन और बस में आग लगाने की वीरता दिखा रहे हैं। यह मामला बड़ा जटिल है, और हम देश की सुरक्षा से जुड़ी हुई इस फौजी नीति में आमूलचूल बदलाव का अतिसरलीकरण करना भी नहीं चाहते। लेकिन अलग-अलग जानकार लोगों की कही हुई, और लिखी हुई जो बातें अब तक सामने आई हैं, वे हैरान करती हैं कि क्या मोदी सरकार सचमुच ही बिना काफी सोच-विचार के ऐसा फैसला ले सकती है? आज देश में दस करोड़ से अधिक बेरोजगार हैं, इनमें फौज में जाने की हसरत रखने वाले करोड़ों नौजवान हैं, इनमें से लाखों ऐसे हैं जो पिछले पांच-दस बरस से इसकी तैयारी कर रहे हैं, और आज उन्हें पता लग रहा है कि उनके लिए खुल रही नौकरी कुल चार बरस की है, और इन चार बरसों के बाद न उन्हें पेंशन रहेगी, न उनको भूतपूर्व सैनिकों को मिलने वाली किसी भी तरह की सहूलियत रहेगी, तो ऐसे बेरोजगार नौजवान आपा खोकर आग लगाते सडक़ों और पटरियों पर हैं।

केन्द्र सरकार की अग्निपथ योजना को लेकर सरकार से बाहर के लोगों के मन में अनगिनत आशंकाएं हैं। इनमें से एक आशंका कांग्रेस पार्टी ने खुलकर सामने रखी हैं कि चार बरस हथियारबंद ट्रेनिंग और काम के बाद जब ये नौजवान एकदम से बेरोजगार होकर पच्चीस बरस की उम्र में फिर काम तलाशेंगे, तो हथियारों की उनकी ट्रेनिंग उन्हें गलत रास्ते पर भी ले जा सकती है। यह आशंका कांग्रेस से परे भी बहुत से लोगों ने जाहिर की है, और दुनिया के कई दूसरे देशों का ऐसा तजुर्बा भी है कि सेना से निकले हुए ऐसे ठेके के सैनिक बिना किसी सरकारी सहूलियत और बंदिश के निजी कारोबारी सैनिक बन जाते हैं, और कहीं वे बड़ी कंपनियों के लिए दूसरे देशों में हथियारबंद काम करते हैं, तो कहीं किसी देश में जंग में भाड़े पर काम करते हैं। रूस की ऐसी ही एक निजी सेना के लोग इन दिनों यूक्रेन में काम कर रहे हैं, और भाड़े पर कत्ल कर रहे हैं, और वागनर ग्रुप नाम की यह प्राइवेट मिलिट्री पहले सीरिया में भी काम कर चुकी है।
 
कुछ लोगों की यह खुली आशंका है कि आज हिन्दुस्तान में निजी कंपनियां जितनी विकराल होती जा रही हैं, उन्हें अगले बरसों में अपने होने वाले और अधिक विस्तार की हिफाजत के लिए निजी सेना की जरूरत पड़ेगी, और प्राइवेट सिक्यूरिटी के नाम पर उन्हें ऐसे हथियार-प्रशिक्षित लोग लगेंगे, और चार बरस में हिन्दुस्तानी फौज से रिटायर होने वाले ऐसे लोग ऐसी निजी सुरक्षा वर्दियों के लिए तैयार रहेंगे। लोगों ने इस सिलसिले में देश की एक सबसे बड़ी कंपनी की निजी सिक्यूरिटी एजेंसी का नाम भी गिना दिया है कि शायद उसी की भर्ती के लिए हिन्दुस्तानी फौज के रास्ते यह रास्ता निकाला जा रहा है।

एक दूसरी आशंका जो बहुत बड़ी है वह देश के एक रिटायर फौजी जनरल ने गिनाई है, और कुछ गैरफौजी जानकार लोगों ने भी। उनका कहना है कि अग्निपथ के रास्ते अग्निवीरों की नियुक्ति में देश के किसी इलाके के लिए कोई कोटा नहीं रहेगा, किसी तबके का कोई आरक्षण नहीं रहेगा, और भारतीय सेना में हमेशा से चली आ रही लड़ाकू और योद्धा जातियों के आधार पर बनी हुई रेजिमेंट नहीं रहेंगी। पूरे देश से जब एक साथ सेलेक्शन की जब एक लिस्ट बनेगी, तो यह भी मुमकिन है कि उसके अधिकतर लोग दो-चार राज्यों के ही हों। और फौज की इस तरह बदलती हुई शक्ल से राष्ट्रीय एकता पर किस तरह का असर पड़ेगा, इसका अंदाज लगाना अभी नामुमकिन है। लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों से फौज में भर्ती के लिए जो कोटा रखा जाता था, वह इस अग्निपथ-अग्निवीर में खत्म कर दिया गया है, और फौज के बड़े जानकार लोग इसे एक बड़ा खतरा मान रहे हैं। इस देश की राष्ट्रीय एकता की इस तरह की अनदेखी बहुत लंबे समय में जाकर भारी पड़ सकती हैं क्योंकि हिन्दुस्तानी फौज आज धर्म और साम्प्रदायिकता से परे, जाति और क्षेत्रीयता से परे, राष्ट्रीय एकता की एक बड़ी मिसाल है, जिसका कि बिगडऩा शुरू होगा, तो एक-दो पीढ़ी बाद उसका नुकसान और खतरा पता चलेगा।

आज हिन्दुस्तानी फौज में जाकर देश के लिए जान कुर्बान करने का जज्बा सस्ते में नहीं आता है। सैनिकों को यह मालूम रहता है कि उनकी नौकरी के बाद इस देश की सरकार उनके परिवार को पेंशन, इलाज, रियायती सामान जैसी अनगिनत सहूलियतें देगी, उनके रिटायरमेंट के बाद उनके पुनर्वास के लिए तरह-तरह की योजनाएं रहेंगी, और उनके परिवार का भविष्य बुनियादी जरूरतों के लिए हिफाजत से रहेगा। आज चार बरस के अग्निवीर पांचवें बरस में किसी कंपनी के सिक्यूरिटी गार्ड बन जाएं तो बहुत रहेगा, न उनके हाथ पेंशन रहेगी, न इलाज, न बच्चों की पढ़ाई, न और कुछ। और इन्हीं चार बरसों में देश के लिए कुर्बान होने का मौका आने पर उनसे कुर्बानी की उम्मीद भी की जाएगी। मतलब यह कि वे अपनी जवानी के बेहतरीन बरस देश पर कुर्बान होने को तैयार रहें, खतरा उठाएं, और चार बरस बाद रिटायर होकर किसी कारखाने के गार्ड बन जाएं, या एटीएम की चौकीदारी करें। इनमें से कोई रोजगार खराब नहीं है, लेकिन ऐसे रोजगार के लिए कोई देश पर कुर्बानी का जज्बा जुटा पाएंगे, यह उम्मीद करना कुछ ज्यादती होगी।

इस योजना की घोषणा के दो दिन के भीतर, और दो दर्जन आगजनी के बाद इसमें भर्ती की उम्र में दो बरस की ढील घोषित की गई है। हैरानी की बात यह है कि मोदी मंत्रिमंडल में आज मंत्री, और रिटायर्ड थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह ने मीडिया के वीडियो कैमरे के सामने यह बात कही कि उन्हें इस योजना के बारे में कुछ नहीं पता है, वे इसे तैयार करने वाले लोगों में नहीं थे, उन्हें इसके बारे में मालूम नहीं है। अब अगर केन्द्रीय मंत्रिमंडल के इतने बड़े एक भूतपूर्व फौजी से ही इस बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है, और जैसा कि सारे जानकार लोग बता रहे हैं कि फौजी भर्ती में आमूलचूल फेरबदल का कोई पायलट प्रोजेक्ट भी नहीं बना, तो ऐसा लगता है कि यह नोटबंदी, जीएसटी, कृषि कानून, नागरिकता कानून सरीखा ही एक और बिना तैयारी का फैसला है जिसमें मौजूदा विशेषज्ञों की राय भी नहीं ली गई है। यह सिलसिला इस देश की इतनी पुरानी फौज के लिए भी ठीक नहीं है, और उसी वजह से वह देश की हिफाजत के लिए भी ठीक नहीं है। संसद में बहुमत वाली सरकारें हर किस्म का फैसला लेने की ताकत रखती हैं, लेकिन जब सरकारें कई फैसले महज इसलिए लेने लगती हैं कि वे उन्हें लेने की ताकत रखती हैं, तो ये फैसले देश के खिलाफ भी हो सकते हैं, और सरकारों के खुद के खिलाफ भी।

आज करोड़ों बेरोजगारों के देश में दस लाख नई नौकरियों की उम्मीद से जश्न का माहौल रहना था, लेकिन आज केन्द्र सरकार के भागीदारों से परे कोई भी इसका हिमायती नहीं दिख रहा है। एक रिटायर्ड मेजर जनरल जी.डी. बक्शी जो कि आए दिन टीवी पर आग उगलते दिखते हैं, और मोदी सरकार के एक बड़े प्रवक्ता की तरह काम करते हैं, उन्होंने कहा है कि अग्निपथ स्कीम के बाद पीढिय़ों से फौज में जा रहे लोगों का सामाजिक ताना-बाना बिखर जाएगा। उन्होंने साफ कहा है कि चार साल में एक साल तो छुट्टी में मेडिकल में ही चला जाएगा, तीन साल में जवान मोर्चे पर क्या जंग लड़ेगा? चार साल के बाद जब सैनिक लौटेगा, और उसे काम नहीं मिलेगा तो वह मुजरिम ही बनेगा। उन्होंने कहा कि इससे भारतीय सेना का रेजिमेंटल सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा।

हम अभी अग्निपथ योजना से फौज को होने वाले नफे और नुकसान पर अपनी तरफ से कोई नतीजा नहीं निकाल रहे हैं, लेकिन जानकार लोगों की कही बातों से जो नतीजे निकल रहे हैं, उनमें से कुछ बातों को सामने रख रहे हैं। देश को इस बारे में और सोचने की जरूरत है, और सरकार को इस फैसले को स्थगित रखना चाहिए, यह देश को एक अलग तरीके से धीरे-धीरे विभाजित करने वाला फैसला हो सकता है, और कई तरह से खतरे में डालने वाला फैसला भी। आज इसे लेकर देश भर में जो उपद्रव चल रहा है, उसमें बेरोजगार नौजवानों से शांत रहने की हमारी अपील का क्या कोई मतलब होगा, जब देश के प्रधानमंत्री ही किसी भी हिंसक उपद्रव पर शांत रहने की अपील नहीं कर पा रहे हैं?

(Daily Chhattisgarh)