प्रेमी जोड़ों की खुदकुशी दो मौतों से बहुत अधिक
संपादकीय
31 दिसंबर 2019

साल के आखिरी दिन जब नए साल के स्वागत की तैयारियां चल रही हैं तब छत्तीसगढ़ के एक कस्बाई शहर से तकलीफदेह खबर आई है कि एक नौजवान जोड़े ने एक साथ टंगकर खुदकुशी कर ली। इनमें से एक हिंदू और एक मुस्लिम होना भी एक वजह थी कि घरवालों को यह शादी मंजूर नहीं थी। लंबे समय से इनमें मोहब्बत थी और वे एक किराए का घर लेकर साथ रह रहे थे। घरवालों के एतराज से वे दुखी थे और उनसे माफी मांगते हुए यह आत्महत्या की।
चूंकि आज दुनिया एक जलसे की तैयारी में लगी हुई है, इसलिए ऐसे दिन दुख की कोई बात अधिक सालती है। वरना हिंदुस्तान में हर दिन शायद दर्जन भर जोड़े, या प्रेमी-प्रेमिका अकेले खुदकुशी करते हैं क्योंकि यह समाज उन्हें साथ नहीं रहने देना चाहता। हिंदू-मुस्लिम का फासला तो कुछ अधिक ही लंबा और गहरा है, इस समाज में तो लोग हिंदुओं के बीच भी दो जातियों के प्रेमी-प्रेमिका को जीने नहीं देते, और कई जगहों पर मां-बाप इनको मारकर इनसे खुदकुशी का हक भी छीन लेते हैं। यह सब 21वीं सदी में हो रहा है जब भारतवंशी लड़कियां अंतरिक्ष में जाकर लौट रही हैं, और खेल से लेकर फिल्म और कारोबार तक में दुनिया में अगुवाई कर रही हैं। अतिसंपन्नता के साथ ऐसी मौतें घट जाती हैं क्योंकि समाज के जिस तबके के पास अथाह दौलत होती है, वे लोग अमूमन धर्म और जाति के फर्क से ऊपर उठकर जिंदगी का आनंद उठाते हैं। लेकिन आबादी में सबसे बड़ा हिस्सा बना हुआ मध्यम वर्ग दकियानूसी बातों को परपंरा मानते हुए उसके लिए मरने-मारने को तैयार रहता है, और ऐसे तबके के भीतर अपनी मर्जी से प्रेम और शादी करने की इजाजत कई बार नहीं रहती, अक्सर ही नहीं रहती। यह बात समझने की जरूरत है कि अपने जाति-सामाजिक घमंड के लिए औलाद को कत्ल करने वाला तथाकथित सम्मान तभी खबरों में आता है जब बात हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाती है। अपने दबे-कुचले अरमानों को लेकर जब नौजवान पीढ़ी मन-मारकर अपनी पसंद की शादी नहीं कर पाती, या पसंद के खिलाफ शादी करने को बेबस होती है, तो उसी पीढ़ी की वैवाहिक जीवन से परे की भी संभावनाएं बहुत बुरी तरह मारी जाती हैं। हिंदुस्तानी नौजवानों को जब अपनी पसंद से प्रेम और शादी की इजाजत नहीं मिलती, तो वे अपने करियर, या जिंदगी के बाकी दायरों में भी अपनी संभावनाओं तक नहीं पहुंच पाते, और कमजोर साबित होते हैं। दूसरी तरफ आज बाकी दुनिया की जिस नौजवान पीढ़ी के साथ उसका मुकाबला है, वह अपनी मर्जी से जीकर, मर्जी का पढ़कर, मर्जी के साथी से शादी करके, या बिना शादी किए मर्जी से मां-बाप बनकर एक अलग ही आत्मसंतोष और आत्मविश्वास के साथ जीने वाली पीढ़ी रहती है जिससे मुकाबले में हिंदुस्तानी नौजवान सोच अपने जख्मों की वजह से पिछड़ जाती है। चूंकि ऐसे मुकाबले का कोई पैमाना नहीं होता, और ऐसे नुकसान को आंका नहीं जा सकता, इसलिए आम हिंदुस्तानी लड़के-लड़कियों के नुकसान को समझना मुश्किल रहता है। लेकिन आज जब दुनिया के बहुत से देशों में शादी नाम की संस्था ही अप्रासंगिक हो चुकी है, जब धर्म और जाति महत्वहीन हो चुके हैं, जब शादी के लिए दो समलैंगिक साथियों का होना भी काफी है, जब बिना शादी हुए बच्चे कहीं सवाल खड़े नहीं करते, तो जाहिर है कि दुनिया के वैसे देशों में नौजवान पीढ़ी का आत्मविश्वास अधिक रहता है, और वहां पर कोई निराश हिंदुस्तानी प्रेमी जोड़ों की खुदकुशी जैसी बात की कल्पना भी नहीं कर सकते। हिंदुस्तानी समाज उदार होने के बजाय एक नई कट्टरता की ओर बढ़ते दिख रहा है, और इससे देश की संभावनाएं घट रही हैं।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
नागरिकता-आंदोलन में धार्मिक नारों पर बहस
संपादकीय
30 दिसंबर 2019

देश में चल रहे नागरिकता-कानून विवाद के बीच एक और बहस शुरू हुई है कि इस कानून का विरोध करते प्रदर्शनों में इस्लाम से जुड़े कुछ नारों को लगाना सही है या गलत? दरअसल ऐसे आंदोलन के जो वीडियो पोस्ट किए गए हैं, उनमें से कुछ में सार्वजनिक जगहों पर आंदोलनकारी इस्लाम के कुछ शब्दों को जोड़कर नारे लगा रहे हैं। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन कांगे्रस सांसद शशि थरूर ने इसे लेकर यह पोस्ट किया कि हिंदुत्व-अतिवाद के खिलाफ लड़ाई में इस्लामी-अतिवाद की जगह नहीं होनी चाहिए। हम लोग, जो कि नागरिकता के मुद्दे पर सरकार का विरोध कर रहे हैं, वह भारत को एक रखने के लिए है, लेकिन भारत की विविधता और बहुलता की जगह किसी दूसरे धार्मिक कट्टरपंथ को नहीं दी जा सकती। थरूर के इस ट्वीट के जवाब में तुरंत बहुत से मुस्लिम लोगों ने लिखा कि कौन कहता है कि ला इलाहा इल्लल लाह अतिवाद है? उसने लिखा कि कम से कम यह तो समझने की कोशिश कीजिए कि आम मुसलमान कहते क्या हैं, अतिवाद से इसका कोई लेना-देना नहीं है। इस बहस में ट्विटर पर बहुत से लोग हिंदू और मुस्लिम की बहस में उलझ गए, और किसी जानकार ने यह भी लिखा कि अरबी भाषा के इस इस्लामी नारे का मतलब है- अल्लाह के सिवाय और कोई ईश्वर नहीं है।
यह बहस दिलचस्प है क्योंकि यह एक पूरी तरह राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन में धर्म के दाखिले को लेकर है। यह पहला मौका नहीं है कि ऐसा हो रहा है, देश में बहुत बार राजनीतिक आंदोलनों में हिंदू-पार्टियां जय श्रीराम या ऐसा कोई दूसरा नारा लगाते आई हैं। लेकिन इस बार का नागरिकता-कानून विरोधी आंदोलन किसी राजनीतिक दल का न होकर छात्रों का आंदोलन है जिसमें भाजपा-एनडीए विरोधी कई पार्टियां अलग-अलग हद तक शामिल हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि ये पार्टियां या छात्र संगठन गैरमुस्लिम, गैरइस्लामिक भी हैं, और इनमें से बहुतेरे तो नास्तिक भी हैं। फिर एक बड़ी बात यह भी है कि चाहे नागरिकता कानून में संशोधन का खास निशाना मुस्लिमों पर हो, इस संशोधन के विरोधियों ने इसे महज मुस्लिमों का मुद्दा मानकर उन्हीं के जिम्मे नहीं छोड़ा है, बल्कि देश के बहुत से दूसरे धर्मों के, बिना धर्म वाले लोग बहुतायत से इस आंदोलन में शामिल हैं, और शायद मुस्लिमों के मुकाबले बढ़-चढ़कर शामिल हैं। इसलिए जब ऐसे आंदोलन में किसी एक धर्म के नारे जुड़ रहे हैं, तो वह फिक्र की बात है। जिस तरह यह कहा जाता है कि धर्म को राजनीति से जोडऩा गलत है, उसी तरह धर्म को राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन से जोडऩा भी गलत ही रहेगा, और वह प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) हो जाएगा। जो आंदोलन एक नाजायज कानून के खिलाफ है, और जो कानून हिंदुओं को भी बेजमीन, बेदखल करने जा रहा है, उसका विरोध करने का आंदोलन किसी धर्म से नहीं जोडऩा चाहिए। और अगर इस बहस में लगाए जा रहे नारे का मतलब किसी एक धर्म के ईश्वर को ही अकेला ईश्वर मानना है, तो इससे बहुत से आंदोलनकारी असहमत होंगे।
चाहे जेएनयू का विवाद रहा हो, चाहे जामिया का, या फिर एएमयू का, जहां-जहां कुछ या अधिक मुस्लिम छात्र-छात्राओं पर भी हमले हुए, वहां-वहां देश के तमाम धर्मों के लोगों ने यह देखे बिना छात्र-छात्राओं का साथ दिया कि वे किस धर्म के हैं। जेएनयू के कन्हैया कुमार का साथ देने में या शेहला राशिद का साथ देने में देश के लोगों ने यह सोचा भी नहीं कि वे किस धर्म के हैं। ऐसे में धर्म को छात्रों के आंदोलन, या नागरिकता आंदोलन से परे रखना ही आंदोलन को बचा सकेगा। लेकिन यह लिखते हुए हम शशि थरूर की बात पर गंभीर आपत्ति दर्ज करना चाहते हैं कि एक धार्मिक नारे को वे बड़ी हड़बड़ी और जल्दबाजी में धार्मिक-अतिवाद करार दे रहे हैं। धर्म को लेकर कोई लापरवाह टिप्पणी उस धर्म से नफरत करने वाले लोगों के हाथ में हथियार हो सकती है, और किसी भी धर्म को लेकर गैरजिम्मेदार बात अपना मकसद ही खो बैठती है। शशि थरूर अगर हमारे यहां लिखे हुए तर्कों को उठाते और धर्म को अलग रखने को कहते तो वह बात अधिक तर्कसंगत और न्यायसंगत होती, वह बात एक बेहतर असर डालती। लेकिन उन्होंने बड़ी हड़बड़ी में इसे अतिवाद करार दे दिया जो कि उनकी एक बुनियादी चूक है। कुल मिलाकर इस विवाद पर हम आखिर में यही कहना चाहते हैं कि यह आंदोलन देश के भलाई के लिए एक महत्वपूर्ण छात्र और राजनीतिक आंदोलन है, और इस पर धर्म का साया इसे कमजोर करने के अलावा और कुछ नहीं करेगा। धर्म को, किसी भी धर्म को, ऐसे आंदोलनों से अलग रखा जाना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
फौजी वर्दी के राजनीतिक इस्तेमाल के बड़े खतरे
संपादकीय
29 दिसंबर 2019

एक बड़ी पुरानी कहानी है। एक आदमी के तीन बेटे थे, और तीनों ही तुतलाते थे। जवान हो जाने के बावजूद इस वजह से उनकी शादी नहीं हो पा रही थी। किसी तरह तीन कन्याओं के एक पिता से बात हुई तो इस आदमी ने अपने बेटों को समझाया कि मेहमान उन्हें देखने आएंगे, और उस वक्त अपना मुंह बंद रखना। किसी भी बात का जवाब मत देना, नहीं तो शादी नहीं हो पाएगी। कन्याओं का पिता आया, अच्छे-भले दिखने वाले लड़कों को देखा, और साथ में सब खाने बैठे। लड़कियों के पिता ने इन लड़कों से कुछ पूछना चाहा तो वे चुप रहे, उनके पिता ने कहा कि वे इतने सुशील हैं कि वे पिता की मौजूदगी में कुछ बोलते नहीं हैं। इतने में कहीं से एक छोटा सा चूहा आकर पिता की थाली के पास घूमने लगा, तो एक बेटे का सब्र जवाब दे गया, और उसने अपने पिता से चूहे के बारे में बताया। पिता ने घूरकर देखा, तो दूसरे बेटे ने अपने भाई को डांटा कि पिता ने चुप रहने कहा था, भूल गए? और दो भाईयों की यह लापरवाही देखकर तीसरे ने खुश होकर पिता के सामने शेखी बघारी, कि दोनों भाई बोले लेकिन वह तीसरा चुप रहा। लड़कियों के पिता को हकीकत दिख गई, और खाना खत्म करके वह चले गया।
यह कहानी बताती है कि किस तरह बेमौके बोलने का क्या नतीजा होता है। अभी दो दिन पहले भारतीय थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने देश में चल रहे नागरिकता संशोधन के विरोध पर कड़ा प्रहार करते हुए सार्वजनिक बयान दिया था और न सिर्फ नागरिकता कानून के बारे में कहा था बल्कि देश में नेता कैसे होने चाहिए और कैसे नहीं होने चाहिए यह भी कहा था। उनका यह बयान हक्का-बक्का करने वाला था क्योंकि यह देश के अंदरूनी, गैरफौजी, सामाजिक-राजनीतिक मामले पर दिया गया बयान था जो कि पहली नजर में ही फौज के अधिकार क्षेत्र और उसकी जिम्मेदारी दोनों से परे का मामला था। भारतीय लोकतंत्र पाकिस्तान के लोकतंत्र जैसा नहीं है जहां पर फौज के मुखिया कभी कारोबारियों को बुलाकर देश की आर्थिक स्थिति के बारे में बात करें, तो कभी वहां के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की निंदा का लिखित बयान जारी करें, उसका विरोध करें। जनरल रावत इसके पहले भारत और भारत सरकार की ओर से लगते हुए ऐसे बयान पाकिस्तान के खिलाफ कई बार दे चुके हैं जो कि पूरी तरह से नाजायज थे, भड़काने वाले थे, और राजनीतिक थे। किसी भी फौजी मुखिया के लिए ऐसे बयान देना अधिकार के बाहर का मामला था, लेकिन वे कई बार ऐसा करते आए थे, और बार-बार ऐसा करने पर यही माना जा सकता है कि वे केंद्र सरकार की सहमति और अनुमति से, या सरकार के कहे हुए ऐसा बयान देते थे। अभी ताजा राजनीतिक बयान को लेकर यह अटकलें भी लग रही हैं कि केंद्र सरकार ने सेना के तीनों अंगों के ऊपर एक संयुक्त कमांड बनाने का जो फैसला दो दिन पहले लिया है, क्या उसी कुर्सी को ध्यान में रखकर जनरल रावत ने यह बयान एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दिया जो कि मीडिया में खुलासे से आना तय ही था?
अब मानो किसी कुर्सी की रेस में लगे हुए लोग बयानों का मुकाबले कर रहे हों, कल भूतपूर्व वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल बीएस धनोआ ने एक बयान दिया कि पाकिस्तान पर हवाई वार करने के प्रस्ताव पिछली सरकारों ने दो बार खारिज कर दिए थे, 2001 में अटल सरकार ने, और 2008 में मनमोहन सरकार ने। उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से कहा कि 2001 में संसद पर हमले के बाद, और 2008 में मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद वायुसेना ने केंद्र सरकार को पाकिस्तान पर जवाबी हवाई कार्रवाई का प्रस्ताव दिया था, लेकिन दोनों वक्त सरकारें इस पर तैयार नहीं हुईं, और उससे दुश्मन को यह भरोसा मिला कि भारत जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा। धनोआ ने यह भी कहा कि वायुसेना की जवाबी कार्रवाई की क्षमता और तैयारी थी, लेकिन सरकारों ने हवाई वार का राजनीतिक फैसला नहीं लिया।
रिटायर होने के बाद भी किसी फौजी अफसर को अपने वक्त की सरकार के राजनीतिक फैसले लेने या न लेने की बात पर कुछ कहने का हक रहना चाहिए? प्रधानमंत्री के स्तर पर लिए गए होंगे ऐसे सर्वाधिक गोपनीय और राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसलों के बारे में क्या उस वक्त वर्दी में रहे किसी फौजी को कभी भी कुछ बोलने का हक रहना चाहिए? यह सवाल छोटा नहीं बहुत बड़ा इसलिए है कि यह बयान इस देश के दो पिछले प्रधानमंत्रियों को नीचा और छोटा दिखाने वाला बयान भी है, और देश के ताजा हालात देखें, तो यह बयान बहुत मासूम भी नहीं लगता है, और बहुत अनायास भी नहीं लगता है। भारतीय लोकतंत्र में फौज के ऊपर निर्वाचित राजनीतिक सरकार को इसीलिए रखा गया है कि दूसरे देशों के साथ रिश्तों के फैसले वर्दियों के हाथ के बम-बंदूक न करें। लोकतंत्र में बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब फौज की कार्रवाई को वाहवाही मिलती है, लेकिन फौज को लोकतंत्र में अगर नाजायज भूमिका दी जाएगी, तो उस लोकतंत्र का पाकिस्तान सरीखा होने का एक खतरा रहेगा जिसमें फौज सरकार और अदालत पर हावी हो जाती हैं। जिन लोगों का एक बड़ा शगल युद्धोन्माद है उन्हें यह खतरा समझ नहीं आएगा क्योंकि युद्धोन्माद को पूरा करने के लिए एक हमलावर-मिजाज वाली फौज की जरूरत पड़ती है। लेकिन जो लोग लोकतंत्र में अलग-अलग संस्थाओं की अलग-अलग भूमिकाएं देखते हैं, और उसकी गंभीरता को समझते हैं, वे वर्दियों की इस अतिसक्रियता, और ऐसे बड़बोलेपन के खतरों को समझ सकते हैं।
जनरल रावत ने देश के भीतर के राजनीतिक और सार्वजनिक आंदोलनों, छात्र आंदोलनों को लेकर पूरी तरह नाजायज बयानबाजी की है, और कुछ एक बड़े रिटायार्ड फौजियों ने उनके खिलाफ यह सवाल उठाया भी है। एक फौजी के देश के लोकतांत्रिक आंदोलनों के खिलाफ दिया गया ऐसा बयान आंदोलनों की इज्जत तो मटियामेट नहीं करता, फौजी वर्दी की इज्जत को जरूर कम करता है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या आज किसी को सचमुच इस बात की परवाह रह गई है कि फौजी वर्दी का राजनीतिक उपयोग नहीं किया जाना चाहिए?
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
भूपेश की अपने सामने खड़ी की हुई चुनौती, और कामयाबी का रास्ता
संपादकीय
28 दिसंबर 2019

छत्तीसगढ़ में कल से तीन दिनों के लिए राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव शुरू हुआ है जिसमें देश के तकरीबन हर राज्य के आदिवासी लोकनर्तकों समेत कुछ दूसरे देशों से भी आदिवासी नृत्य टीमें आई हैं। बात वैसे तो महज नृत्य-संगीत की है, लेकिन इस मौके पर आदिवासियों के बुनियादी मुद्दों पर भी जरा सी चर्चा हुई है। कांगे्रस सांसद राहुल गांधी ने उद्घाटन समारोह के भाषण में याद दिलाया कि आदिवासी समुदाय की बेहतरी के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने उद्योग के लिए ली गई उनकी जमीन वापस की है, और तेंदूपत्ता संग्रह की मजदूरी भी बढ़ाई है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में हिंसा में कमी आई है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बताया कि आदिवासी इलाकों में सुपोषण अभियान शुरू किया गया है, और वहां के लोगों के इलाज के लिए हाट-बाजार में क्लीनिक योजना भी शुरू की गई है। मुख्यमंत्री ने बताया कि आदिवासी बस्तर के दंतेवाड़ा में आज साठ फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं जबकि प्रदेश का आंकड़ा चालीस फीसदी है और राष्ट्रीय औसत बाईस फीसदी है। मुख्यमंत्री ने अपने सभी मंत्रियों सहित अगले चार वर्षों में दंतेवाड़ा की गरीबी को राष्ट्रीय औसत से कम करने का संकल्प लिया। यह भी एक संयोग है कि कल ही छत्तीसगढ़ में इंडियन इकॉनॉमिक एसोसिएशन का तीन दिन का वार्षिक सम्मेलन शुरू हुआ जिसमें देश के सैकड़ों अर्थशास्त्री इक_े हो रहे हैं। इसमें उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू की मौजूदगी में उद्घाटन समारोह में भूपेश बघेल ने इस बात को फिर गिनाया और कहा कि राज्य बनने के समय छत्तीसगढ़ का बजट छह हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर करीब एक लाख करोड़ पहुंच चुका है, लेकिन राज्य में गरीबी की रेखा के नीचे की आबादी छत्तीस फीसदी से बढ़कर चालीस फीसदी हो गई है।
आदिवासी नृत्य-संगीत एक अलग बात है, लेकिन इसके बीच आदिवासी समुदाय की तकलीफों पर भी गौर करने का यह एक मौका है। मेजबान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खुद होकर आदिवासी बस्तर के सबसे आदिवासी इलाके दंतेवाड़ा में गरीबी का हाल बताया है जो कि देश के भीतर तकरीबन हर जगह आदिवासियों का हाल बताता है कि वे और के मुकाबले खराब हाल में हैं। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में खुद होकर मुख्यमंत्री ने यह आसमान छूता हुआ दावा किया है कि साठ फीसदी से अधिक की गरीबी को घटाकर वे राष्ट्रीय औसत बाईस फीसदी तक लाएंगे। पहली नजर में यह असंभव लगता है, लेकिन सरकार तो सरकार होती है, अगर वह इसे एक चुनौती की तरह ले, इस जिले में एक सबसे काबिल और ईमानदार कलेक्टर तैनात करे, इस जिले की तमाम खाली सरकारी कुर्सियों को भरे, यहां पर संवेदनशील पुलिस अफसर तैनात करे, और केंद्र-राज्य की सारी योजनाओं को बहुत गंभीरता से लागू करे, तो एक छोटी सी संभावना बनती है कि भूपेश बघेल अपने खुद के सामने खड़ी की गई एक चुनौती से पार पा सकें। लेकिन यह काम आसान बिल्कुल नहीं होगा, और यह काम असंभव भी नहीं है। सरकार कमर कस ले, और हर दिन का इस्तेमाल करे, इस जिले के लोगों के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की तमाम योजनाओं को लागू करे तो यह एक दिलचस्प प्रयोग हो सकता है। शासन और प्रशासन के ऐसे कुछ और प्रयोग देश के कुछ और जिलों में भी हुए हैं जिन्हें पूरी दुनिया में सराहा गया है। मुख्यमंत्री को चाहिए कि सबसे काबिल और ईमानदार अफसरों को छांटकर उन्हें इस चुनौती के साथ पूरे चार साल का कार्यकाल देकर वहां भेजे, और हर महीने देखे कि कितनी प्रगति हुई है। इस विकास के लिए वहां पर आदिवासी जीवन समझने वाले समाजशास्त्रियों और कुछ प्रतिष्ठित जनसंगठनों का भी साथ लेना चाहिए। हम इसे कोई चुनावी घोषणा नहीं मान रहे हैं, और यह भूपेश बघेल का हौसला है कि वे एक ऐसे लक्ष्य को सामने रख रहे हैं जिसमें कामयाबी का हिसाब राज्य सरकार नहीं करेगी, केंद्र की मोदी सरकार करेगी।
खुद छत्तीसगढ़ के लोगों को इस बात का एहसास नहीं है कि प्रदेश का सबसे अधिक लोहा उगलने वाला जिला दंतेवाड़ा बाकी प्रदेश के औसत से डेढ़ गुना अधिक गरीब है। इसी दंतेवाड़ा से देश की सबसे बड़ी खनिज कंपनी, एनएमडीसी को सबसे बड़ी कमाई भी होती है, और दंतेवाड़ा से गरीबी दूर करने के लिए एनएमडीसी से भागीदारी की उम्मीद भी की जा सकती है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
लेकिन ऐसी सावधानी में ही समझदारी है...
संपादकीय
27 दिसंबर 2019

लगातार परेशानियों से गुजरते हुए पाकिस्तान में एक और दिक्कत इमरान खान के एक मंत्री पर आई है जो कि भारत के खिलाफ बहुत आक्रामक बयान देने के लिए जाने जाते हैं। वहां के रेलमंत्री शेख रशीद का एक ऐसा वीडियो कॉल सामने आया है जो वहां कि एक चर्चित और विवादास्पद महिला ने पोस्ट किया है। इसमें वह रेलमंत्री से वीडियो कॉल पर बात कर रही है, और उन्हें याद दिला रही है कि वे उस अश्लील वीडियो भेजा करते थे। इस बातचीत को इस महिला ने सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर दिया, और तबसे यह वहां पर बड़ी खबर बना हुआ है। पाकिस्तान एक इस्लामिक देश होने के नाते सेक्स के मामले में कुछ अधिक सामाजिक रोक-टोक वाला देश है, और वहां पर ऐसी खबर और ऐसा वीडियो किसी का सार्वजनिक जीवन खत्म कर सकता है।
वैसे बात महज पाकिस्तान की नहीं है, हिंदुस्तान में भी कुछ विवादास्पद वीडियो सामने आने पर आंध्र के राज्यपाल पद से नारायण दत्त तिवारी को हटना पड़ा था, कई स्वामियों का आध्याम का बड़ा कारोबार सेक्स वीडियो ने खत्म कर दिया, और देश भर में कई अफसरों का कॅरियर भी ऐसी ही संबंधों के उजागर होने से खत्म हुआ। ताजा मामला मध्यप्रदेश का है जहां पर बड़ी संख्या में नेता और अफसर हनीट्रैप में फंसे हुए मिले, और अब उसकी बिजली कहीं लोगों पर गिर रही है, तो कहीं वह बिजली पूरी इमारतों को गिरा रही है। कुछ और पहले चलें तो अमरीकी राष्ट्रपति भवन में एक प्रशिक्षु कर्मचारी के साथ संबंधों को लेकर राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर महाभियोग भी चल चुका है, और महीनों तक इस मामले की सुनवाई टीवी पर किसी भी उत्तेजक फिल्म या सीरियल के मुकाबले अधिक दर्शक पाती रही।
अब वक्त ऐसा आ गया है जब टेक्नॉलॉजी ने लोगों के लिए फोन पर वीडियो कॉल आसान कर दी है, और लोग अपने अंतरंग पलों को किसी के साथ भी बांट सकते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि बिना किसी खुफिया कैमरे के भी, लोग अपने वीडियो या ऑडियो कॉल पर फंस जा रहे हैं, और जिन पर सबसे अधिक भरोसा रहता है, वैसे ही लोग सबसे बड़ा भांडाफोड़ करने की अनोखी ताकत भी पा लेते हैं। मध्यप्रदेश में नामीगिरामी और सबसे ताकतवर रहे अफसर और मंत्री अपनी अश्लील बातों के साथ आज सोशल मीडिया और इंटरनेट पर भारी लोकप्रिय बने हुए हैं, और जाहिर है कि उनकी निजी जिंदगी इससे बर्बाद हुई ही होगी। इसके पहले भी हम कई बार ऐसे मौकों पर, और बेमौके भी इस बारे में लिख चुके हैं कि लोगों को अपनी निजी जिंदगी के ऐसे शर्मिंदगी वाले सुबूत अपने सबसे करीबी लोगों के हाथ भी नहीं देने चाहिए क्योंकि एक भी दिन ऐसा नहीं आता है जब एक वक्त के सबसे करीबी और सबसे भरोसेमंद लोग आज पुराने ऑडियो-वीडियो या पुरानी तस्वीरें लेकर ब्लैकमेलिंग करते खबरों में न दिखें। लोगों को इस टेक्नॉलॉजी के खतरे को समझना जरूरी है कि दिल-दिमाग की बात जुबान पर आई, और सुबूत बन बैठी, ऐसी नौबत है। दूसरी बात लोगों को आम खबरों से यह भी समझने की है कि इंसान का मिजाज हमेशा एक सा नहीं बने रहता। आज जो लोग आपको सबसे अधिक चाहते हुए दिख रहे हैं, वे कल और परसों आने तक आपके खून के प्यासे भी हो सकते हैं, और यह लहू बहाने के साथ-साथ वे आपको बदनाम करने का भी पूरा इंतजाम कर सकते हैं। धोखा तो ऐसे ही लोग दे सकते हैं जो कि किसी वक्त करीब रहे हुए हों। इसलिए लोगों को अपने दिल-दिमाग की हसरतों को इस हद तक तो काबू में रखना चाहिए कि उनके कमजोर पल किसी और के हाथ जाकर एक हथियार न बन जाएं जिसके सामने वे बाकी पूरी जिंदगी कमजोर बने रहने को मजबूर हो जाएं। यह बात हमारे लिए कहना आसान है, लेकिन दुनिया के इंसानों के लिए इस पर अमल बहुत मुश्किल है। लेकिन ऐसी सावधानी में ही समझदारी है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
समझदार लोग यह सिलसिला खत्म करने की कोशिश करें
संपादकीय
26 दिसंबर 2019

अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह वहां पड़ रही भारी ठंड के बीच खुले में बैठने के लिए सिर पर शॉल लपेटे हुए थे। इस पर सोशल मीडिया में कई तरह के मजाक चलने लगे। लोगों ने पिछले कई बरस में भाजपा के नेताओं द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के ट्रेडमार्क हो चुके मफलर पर कसे गए तंज निकालकर उन्हें याद दिलाया कि अब अमित शाह और राजनाथ सिंह को भी मफलर और शॉल से सिर-कान लपेटने पड़ रहे हैं। पिछले बरसों में केजरीवाल की खांसी को लेकर भी इतना मजाक बनाया जाता था कि मानो वह उनका कोई कुसूर हो। इसी तरह की बात कुछ समय पहले सीढिय़ों पर लडख़ड़ाकर गिरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर चली थी, बहुत से मजाक बने थे, और बहुत से कार्टून भी। जब इनकी आलोचना हुई कि ऐसे निजी हादसे का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, तो लोगों ने याद दिलाया कि सोनिया गांधी को एक बार चक्कर आने पर नरेन्द्र मोदी ने क्या कहा था, और सोनिया की बीमारी को लेकर देश भर में उनके राजनीतिक विरोधी सोशल मीडिया पर कैसी ओछी बातें लिखते ही रहते हैं।
दरअसल किसी की निजी तकलीफ बहुत से लोगों के मन में खुशी की एक लहर दौड़ा देती है। सड़क पर कोई केले के छिलके पर फिसलकर गिर जाए तो जो लोग उठाने के लिए आगे बढ़ते भी हैं, वे भी पहले हँसते हैं, फिर हाथ बढ़ाते हैं। दूसरों की तकलीफ का मजा लेना इंसानों के भीतर एक आम बात है, और इस कमजोरी से उबरने के लिए लोगों को मेहनत करनी होती है। लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पहली बार अंगे्रजी में भाषण दिया, तो उनकी अंगे्रजी के उच्चारण कमजोर या गलत होने की बात करते हुए उनका बहुत मजाक उड़ाया गया था। उस वक्त हमने इसी जगह उनके हौसले की तारीफ की थी कि अपनी खुद की भाषा से परे एक और भाषा का इस्तेमाल करना बड़ी बात है, और ऐसी कोशिश करने वालों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। ऐसा ही मौसम की मार से बचने के लिए अमित शाह और राजनाथ सिंह का मजाक नहीं बनाया जाना चाहिए।
लेकिन भारतीय राजनीति लगातार बढ़ते हुए ओछेपन की शिकार है। विरोधी विचारधारा के लोगों के लिए घटिया शब्दों का इस्तेमाल करना, उन्हें मूर्ख या दुष्ट साबित करना बढ़ते ही चल रहा है। एक लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद के चलते हुए भी व्यक्ति के रूप में एक-दूसरे को बर्दाश्त करना आना चाहिए, लेकिन वह खत्म हो चला है। लोगों को शायद यह भी याद हो कि किस तरह मुख्यमंत्री रहते हुए राबड़ी देवी ने उस वक्त के बिहार के एक राज्यपाल को लंगड़ा कहा था। हिंदुस्तान में लोग अपने को हजारों बरस की एक संस्कृति का वारिस मानते और बताते हुए एक झूठे दंभ में डूबे रहते हैं, लेकिन यहां कि कहावत-मुहावरे देखें, यहां कि भाषा देखें तो हिंदुस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सभ्यता से भी दूर है। बहुत से हिंदुस्तानी एक निहायत ही असभ्य और अमानवीय, हिंसक और बेइंसाफ जुबान का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया पर जो लोग पेशेवर हैं, और हमला करने के लिए भुगतान पाते हैं, या जो नफरत से भरे हुए हैं, और जुबानी हिंसा से खुशी पाते हैं, उन लोगों ने हिंदुस्तानी संस्कृति को गटर तक पहुंचा दिया है। हिंदुस्तान का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सबसे हिंसक, सबसे अश्लील, और सबसे अधिक आपत्तिजनक शब्दों की रिकॉर्डिंग को बार-बार बजाकर अपने दर्शक बढ़ाने की कोशिश में लगे दिखता है। समझदार लोगों को इस अलोकतांत्रिक सिलसिले को खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
जन्मदिन पर अटलजी को याद करने की कई वजहें
संपादकीय
25 दिसंबर 2019

भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने पूरे जीवन एक हिंदू नेता भी बने रहे, और हर बरस उनका जन्मदिन ईसाईयों के सबसे बड़े त्यौहार, यीशु मसीह के जन्मदिन, क्रिसमस पर आते रहा, मनाया जाते रहा। आज भी उनके जन्मदिन पर देश भर में उन्हें याद किया गया, और खासकर उनके कार्यकाल, उनकी कार्यशैली, और उनकी बातों को याद किया गया। वाजपेयी किसी भी कोने से भाजपा के किसी भी दूसरे नेता के मुकाबले कम हिंदू नहीं थे, और वे जनसंघ के दिनों से पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता भी थे जिन्हें जनसंघ का पोस्टरब्यॉय कहा जाता था। जब तक एनडीए के बहुमत के साथ वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री नहीं बने, तब तक जनसंघ और भाजपा का स्थाई नारा रहता था- अबकी बारी, अटल बिहारी।
जनसंघ और भाजपा के सबसे बड़े नेता रहने की वजह से वाजपेयी देश की बाकी अधिकतर पार्टियों की आलोचना का शिकार भी होते रहे, और उनके बारे में यह चर्चा भी रही कि उनका नर्म-हिंदुत्व एक सोची-समझी रणनीति के तहत है, और उनकी असली सोच वही है जो कि बाबरी मस्जिद के गिरने के वक्त एक भाषण के वीडियो में सामने आई थी। ऐसी तमाम आलोचनाओं और चर्चाओं के बीच एक बात उनके सारे संसदीय जीवन में बनी रही कि विचारधारा के टकराव से परे, उनकी व्यक्तिगत कड़वाहट और टकराहट लोगों को याद नहीं पड़ती। लोगों को उनका वह भाषण याद पड़ता है जो कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के गुजरने पर संसद में दिया था, और जिसे एक महान श्रद्धांजलि कहा जाता है। उनकी दरियादिली, उनके बड़प्पन, और नेहरू के प्रति उनके सम्मान से चाहे उनके चाहने वाले कुछ लोग खफा ही क्यों न हुए हों, उन्होंने नेहरू के प्रति सम्मान में कोई कटौती नहीं की। और एक वक्त ऐसा भी आया जब वाजपेयी को कई दशक बाद जाकर गंभीर इलाज की जरूरत पड़ी, तो उस वक्त के कांगे्रस प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें भारतीय संसदीय प्रतिनिधि मंडल का मुखिया बनाकर संयुक्त राष्ट्र संघ भेजा, ताकि वहां भारत का एक मजबूत प्रतिनिधित्व भी हो सके, और वाजपेयी का इलाज भी हो सके। यह बात अटलजी ने राजीव गांधी की बेवक्त की मौत के बाद एक से अधिक बार सार्वजनिक रूप से कही। उन्होंने लखनऊ के सांसद रहते हुए उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन के दौरान कांगे्रस के मोतीलाल वोरा के राजभवन के अपने संस्मरण भी कई बार सुनाए कि वे अपने चुनाव क्षेत्र के काम लेकर वोराजी के पास जाते थे, तो उनकी खातिर होने के साथ-साथ तुरंत ही उनका काम भी होता था, और कुछ मौकों पर वोराजी उन्हें लेकर भी मौकों पर जाते थे।
आज जब देश में राजनेताओं के बीच कड़वाहट इतनी अधिक हो गई है कि परस्पर विरोधी पार्टियों के लोगों का साथ उठना-बैठना भी बंद हो गया है, और संसद की छत तले बैठने की जब मजबूरी रहती है, तब भी बहुत से विरोधी लोग एक-दूसरे की तरफ देखे बिना, एक-दूसरे की हस्ती को नकारते हुए, या हिकारत के साथ जवाब दे देते हैं, या आरोप लगा लेते हैं। ऐसे माहौल में लोगों को अटलजी की याद और अधिक आती है कि राजनीतिक मतभेद को दुश्मनी के दर्जे तक ले जाए बिना भी किस तरह अपनी पार्टी की विचारधारा पर काम किया जा सकता है। उनके मिजाज और तौर-तरीकों की वही बात उनके धुरविरोधी वामपंथियों को भी उनके साथ उठने-बैठने में असहज नहीं करती थी। आज उनकी पार्टी सत्ता में है, और दूसरे कार्यकाल का पहला बरस चल रहा है। आज भाजपा को एनडीए के मुखिया की हैसियत से भी यह सोचने की जरूरत है कि इतने छप्परफाड़ वोट और बहुमत पाने के बाद भी वह विपक्षी पार्टियों की दोस्ती और सद्भावना क्यों नहीं पा रही है? लोकतंत्र महज गिनती नहीं होता है, लोकतंत्र का मतलब परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच भी सद्भावना का संबंध होता है। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काम की हुई कई पार्टियों, और कई नेताओं का उनके बारे में तजुर्बा बीच-बीच में छपते रहता है, और सद्भावना का वह एक महत्व लोकतंत्र में कभी कम नहीं आंका जा सकता, और उसी लिए अटलजी को भी कभी कम नहीं आंका जा सकेगा।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
जनता का काम म्युनिसिपलों का वोट देने से खत्म नहीं...
संपादकीय
24 दिसंबर 2019

छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल चुनावों के नतीजे अभी आ ही रहे हैं, और उनका रूख इतना मिलाजुला है कि कांगे्रस और भाजपा में से कौन कितने आगे है, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। पिछले पन्द्रह बरस भाजपा प्रदेश में सरकार चला रही थी, और कांगे्रस पार्टी राजधानी रायपुर सहित बहुत से शहरों-कस्बों में म्युनिसिपलों पर काबिज थी। इसलिए अगर स्थानीय शहरी संस्थाओं के इस चुनाव में सत्ता के खिलाफ नाराजगी की बात की जाए, तो वह दोनों ही पार्टियों के खिलाफ रही होगी, और राज्य में इस मतदान के ठीक पहले प्रदेश की भूपेश बघेल सरकार का एक साल भी पूरा हुआ था, इसलिए उस सत्ता से भी अगर किसी की कोई नाराजगी रही होगी, तो वह भी इस चुनाव में निकली होगी। ये चुनाव महज वार्ड स्तर के हुए हैं, और निगम-पालिका के मुखिया का सीधा चुनाव नहीं हुआ है और पार्षद ही उन्हें चुनेंगे। लेकिन एक बात जो खुलकर दिख रही है वह यह कि वार्ड के चुनाव में भी तकरीबन सभी जगह इन्हीं दोनों पार्टियों का बोलबाला रहा है, और निर्दलीय उम्मीदवार बहुत ही कम संख्या में जीते हैं। ऐसा भी नहीं हो सकता कि कोई निर्दलीय उम्मीदवार अच्छे न रहे हों, लेकिन यह जाहिर है कि इन दोनों पार्टियों के अपने समर्पित और समर्थक वोट मायने रखते हैं, और उन्हीं से जीत-हार हुई है। आज शाम तक सभी निगम, पालिका, और नगर पंचायतों की तस्वीर साफ हो जाएगी, और उसके बाद शायद कुछ ही जगहों पर जोड़-तोड़ की जरूरत पड़े, अधिकतर जगहों पर पार्टियां स्पष्ट बहुमत के साथ महापौर और अध्यक्ष चुन पाएंगी।
स्थानीय संस्थाओं में अगर कुछ और छोटी पार्टियों के भी अधिक लोग जीते होते, निर्दलीय अधिक संख्या में जीते होते, तो वह म्युनिसिपल के भीतर जनहित के बेहतर फैसले लेने के लिए एक अच्छी बात होती। जब किसी एक पार्टी का बड़ा बहुमत स्थानीय संस्था में हो जाता है, तो उसके फैसलों में मनमानी अधिक होने लगती है। स्थानीय संस्थाओं की लीडरशिप, और उनकी भूमिका प्रदेश सरकार और उसके मुखिया की जिम्मेदारियों से अलग होती हैं, और ऐसे में म्युनिसिपलों में एक बेहतर संतुलन बना रहना अच्छी बात होती। छत्तीसगढ़ में पिछले दो दशक में म्युनिसिपलों में सबसे बड़ी दिलचस्पी करोड़ों से लेकर सैकड़ों करोड़ तक के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने में दिखाई है जिनमें भारी भ्रष्टाचार की गुंजाइश थी, और वैसे आरोप भी लगते थे। दूसरी तरफ शहरों को बेहतर बनाने के लिए बड़े खर्च के बिना भी जो काम हो सकते थे, उनमें दिलचस्पी बहुत कम रही क्योंकि लोगों की कमाई उसमें नहीं रहती। अब जब स्थानीय संस्थाएं दुबारा काम शुरू करने वाली हैं, दोनों ही पार्टियों के अपने स्थानीय निर्वाचित नेताओं की सोच को बेहतर बनाने की भी जरूरत है ताकि जमीन के हर टुकड़े को दुहने की कोशिश न हो, शहरों को कांक्रीट का जंगल न बनाया जाए, बची-खुची खुली जगह को खुला रखने की दरियादिली भी सीखी जाए। यह बात हमारा कहना आसान है, राजनीति और सत्ता में ऐसा करना बड़ा मुश्किल है। लेकिन इस मौके पर हम शहरी विकास, इंजीनियरिंग, और आर्किटेक्चर के जानकार लोगों से भी अपील करते हैं कि म्युनिसिपलों की नई सत्ता के पहले दिन से ही इन संस्थाओं की घोषणाओं और योजनाओं को तकनीकी आधार पर जनकल्याण की कसौटी पर कसें, और सार्वजनिक बहस छेड़ें। जो तकनीकी विशेषज्ञ हैं, वे ही अगर चुप रह जाएंगे तो उनका ज्ञान समाज के किसी काम का नहीं रह जाएगा। स्थानीय संस्थाओं को हम और अधिक अधिकार देने के हिमायती हैं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों को अधिक हद तक सरकारी और सार्वजनिक रूप से तय करने के भी हिमायती हैं। जिम्मेदारियों के बिना, जवाबदेही के बिना महज अधिकार बढ़ाने का काम नहीं हो सकता, और सबसे बड़ी बात यह कि जनता का काम वोट डालने के बाद पांच बरस खत्म नहीं हो जाते। जनता को अपने पार्षदों और अपने महापौर-अध्यक्षों से लगातार सवाल पूछने होंगे, तभी स्थानीय विकास हो सकेगा। फिलहाल स्थानीय संस्थाओं के अगले पांच बरस के लिए सभी को शुभकामनाएं।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
झारखंड में मोदी-शाह के राष्ट्रीय मुद्दे बेअसर रहे?
संपादकीय
23 दिसंबर 2019

झारखंड के आंकड़े अभी आ ही रहे हैं, लेकिन अब तक रुझान बता रहे हैं कि वहां सत्ता भाजपा के हाथ से जाती दिख रही है, और झारखंड मुक्ति मोर्चा का कांग्रेस के साथ गठबंधन सत्ता पर आना तय दिख रहा है। अगर अगले कुछ घंटों में आंकड़ों में पूरा ही उलटफेर न हो जाए तो भाजपा के एक और राज्य कम हो जाएगा। महाराष्ट्र में गैरभाजपा सरकार बनने के साथ देश के नक्शे पर भगवा रंग जितना सिमट गया था, उसमें से कुछ और हिस्सा अगले कुछ घंटों में कम हो सकता है। यह राज्य पिछले करीब दो दशक के अपने अस्तित्व में डेढ़ दशक से अधिक भाजपा के कब्जे में रहा, ठीक छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की तरह। और अब यह राज्य छत्तीसगढ़ की राह चलते दिख रहा है। अब तक सत्तारूढ़ रही भाजपा की सीटों में बड़ी गिरावट आई है, और जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन को उससे भी बड़ा फायदा हुआ है।
झारखंड के चुनावी नतीजों को लेकर अभी टीवी चैनलों पर जो बहस चल रही है, उसमें वैसे भी इतने जटिल पहलू सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय मुद्दों की भरमार, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे राष्ट्रीय स्तर के चेहरों का इस चुनाव पर छा जाना, जैसी बातें सामने आ रही हैं, और इस चुनाव के आखिरी दो दौर के मतदान पर संसद में पारित नागरिक संशोधन का असर भी बताया जा रहा है जिसके चलते हिंदू-मुस्लिम धु्रवीकरण इस राज्य में भी हुआ। हमारा हमेशा से यह मानना रहता है कि चुनावी विश्लेषक भी अपनी हाल की भविष्यवाणियों के समर्थन में तर्क ढूंढ लेते हैं, और नतीजों का उसी के मुताबिक विश्लेषण करते हैं। किसी एक सीट पर जीत या हार के भी इतने जटिल कारण होते हैं कि पूरे प्रदेश के नतीजों का विश्लेषण खासा मुश्किल होता है, और खासकर जब राष्ट्रीय मुद्दे भी उन पर हावी हों। लेकिन कुछ बातें झारखंड के इन नतीजों में खुलकर दिखती हैं।
नागरिकता संशोधन विधेयक के अलावा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का मुद्दा भी उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुत जमकर हावी है, और वहां के आदिवासी समुदाय भी इससे बहुत विचलित हैं। दूसरी तरफ पड़ोस के छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार से राज्य के आदिवासी समुदाय की संतुष्टि इसमें दिखती है कि विधानसभा चुनावों में तकरीबन पूरा आदिवासी बस्तर, और पूरे का पूरा आदिवासी सरगुजा कांग्रेस के साथ गया, और बाद में बस्तर में हुए विधानसभा उपचुनाव में दोनों सीटें कांग्रेस ने जीतीं। छत्तीसगढ़ में किसान कर्जमाफी से लेकर धान के बढ़े हुए दाम तक ने, और आदिवासियों की जमीन वापिसी, वनोपज के बढ़े हुए दामों ने देश भर में कांग्रेस को एक अलग साख दिलाई है, और हमारा यह मानना है कि लगे हुए राज्य झारखंड के आदिवासियों के बीच इसकी चर्चा जरूर हुई होगी। भूपेश बघेल ने तीन-चार चुनावी दौरों में दस-बारह जगहों पर आमसभा में भाषण भी दिए, और उन्होंने छत्तीसगढ़ में किए गए वायदों को पूरा करने का जिक्र भी किया, और झारखंड में भी ऐसा करने का ऐलान भी किया। झारखंड ने कांग्रेस पार्टी, और वहां गए कांगे्रस के एक सबसे बड़े प्रचारक भूपेश बघेल की साख और राजनीतिक वजन में इजाफा भी किया है। यहां पर यह चर्चा भी जरूरी है कि छत्तीसगढ़ सरकार में एक सबसे वरिष्ठ मंत्री और सरगुजा से आने वाले टी.एस. सिंहदेव को कांग्रेस ने झारखंड में प्रत्याशी चयन का प्रभारी बनाया था।
लेकिन झारखंड में भाजपा की हार को महज राज्य की भाजपा सरकार के कामकाज से जोड़कर देखना ठीक नहीं है क्योंकि मोदी-शाह ने पूरा चुनाव प्रचार राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा था, और ऐसा लगता है कि जनता उस पर भरोसा नहीं कर पाई। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर आखिरी के दो दौर के मतदान में नागरिकता संशोधन की वजह से धार्मिक धु्रवीकरण नहीं हुआ होता तो इन जगहों पर भाजपा को सीटें और भी कम मिली होतीं। ऐसे में यह भाजपा के लिए दिल्ली की हार जैसी बात दिखती है।
महाराष्ट्र के बाद झारखंड में भाजपा सत्ता से बाहर, और कांग्रेस सत्ता के भीतर दिख रही है। इससे देश की राजनीतिक तस्वीर खासी बदल रही है, और राजनीतिक समीकरण भी। कांग्रेस पर गठबंधन सरकार में रहते हुए उसे कामयाब बनाने की बहुत बड़ी ऐतिहासिक जिम्मेदारी रहेगी क्योंकि दोनों जगहों पर उसे दूसरी पार्टी के मुख्यमंत्रियों के मातहत काम करना होगा, या महाराष्ट्र में करना पड़ रहा है। लेकिन गठबंधन को कामयाब बनाने की कामयाबी ही अगले आम चुनाव में कांग्रेस का कुछ भला कर सकती है। झारखंड के बारीक विश्लेषण अगले कुछ दिनों तक सामने आते रहेंगे, आज यहां लिखी बात उसका एक छोटा सा पहलू ही है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
पोप के पिछले साल के आंसू, और इस साल...
संपादकीय
22 दिसंबर 2019

क्रिसमस के हफ्ते भर पहले पोप ने यह ऐलान किया है कि नाबालिकों के यौन शोषण में चर्च अब गोपनीयता के नियम का इस्तेमाल नहीं करेगा। अब तक चर्च में एक ऐसा नियम लागू था जिसके तहत पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों को छुपा दिया जाता था और किसी भी देश में चर्च सरकारी जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों न खबर देते थे, और न ही जांच में सहयोग करते थे। चर्च का यह मानना था कि ऐसा करके वे यौन शोषण के पीडि़तों की निजता, और अभियुक्तों की प्रतिष्ठा की रक्षा करता था। अब वैटिकन से जारी नए आदेश के मुताबिक चर्च ने यह बंदिश हटा ली है।
हम बरसों से चर्च, और बाकी धर्मों की भी बहुत सी संस्थाओं में बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ लिखते आए हैं, और उन कड़ी कार्रवाई की मांग करते रहे हैं। चर्च के भीतर भी बहुत से नेता ऐसी मांग करते रहे हैं, और यह ताजा फेरबदल बच्चों के यौन शोषण में कमी लाने में मदद कर सकता है। चर्च के ही एक सबसे अनुभवी आर्चबिशप का कहना है कि इससे जांच में आने वाली अड़चनें घटेंगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। हमने करीब एक बरस पहले इस मामले पर पोप और चर्च की कड़ी आलोचना के साथ उस वक्त की खबरों पर लिखा था- ''पोप फ्रांसिस ने चिली में गिरजाघरों के पादरियों द्वारा दुष्कर्म और यौन शोषण के शिकार बच्चों से मुलाकात की और उनकी आपबीती सुनी। दर्दभरी दास्तां सुनते समय पीडि़त बच्चों के साथ पोप भी रो पड़े। बाद में उन्होंने कहा, यह पीड़ा और शर्म का विषय है। पोप ने बच्चों के कल्याण के लिए प्रार्थना की। चर्च पदाधिकारियों के उत्पीडऩ की घटनाओं से चिली में भारी गुस्सा है। सोमवार को पोप का दौरा शुरू होने से पहले लोगों ने विरोध स्वरूप दो चर्चों में आगजनी भी की। दौरे में यौन शोषण के शिकार लोगों से पोप की यह दूसरी मुलाकात है। इससे पहले 2015 में फिलेडेल्फिया की यात्रा में पोप फ्रांसिस यौन शोषण के शिकार लोगों से मिले थे। पोप की इस ताजा मुलाकात पर अर्जेटीना के बिशप की ओर से अटपटी टिप्पणी आई है। उन्होंने कहा, पोप हमेशा चर्च पदाधिकारियों के यौन शोषण की चर्चा करते हैं। वह राजनीतिज्ञों के ऐसे ही आचरण पर कभी नहीं बोलते।''
हमने उस वक्त लिखा था- ''अब सवाल यह उठता है कि क्या पोप के ऐसे आंसुओं की कोई कीमत है? जब तक किसी देश के कानून के खिलाफ जुर्म करने वाले ऐसे पादरियों को पुलिस, अदालत और जेल का सामना न करना पड़े, तब तक उनसे जख्मी हुए बच्चों के लिए आंसू बहाना एक फिजूल का पाखंड है। यह मामला अपने किस्म का अकेला नहीं है, और वेटिकन के तहत आने वाले ईसाई संगठनों में स्कूलों, हॉस्टलों, और चर्चों में पहले भी ऐसा होते आया है, और ऐसे हर बलात्कारी को चर्च बचाते भी आया है। अभी-अभी लंदन में कुछ मदरसों में बच्चियों के साथ ऐसा हुआ, और किसी धार्मिक संगठन ने उसके खिलाफ कुछ नहीं किया। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले भारत के बाहर सबसे मशहूर हिन्दू संगठन इस्कॉन के हॉस्टलों में इसी तरह बच्चों का यौन शोषण सामने आया था, और उस वक्त शायद इस संगठन ने सैकड़ों करोड़ का हर्जाना देकर अदालत के बाहर उस मामले को खत्म करवाया था। अमरीकी कानून इस तरह के जुर्म पर भी रूपयों से समझौता अदालत के बाहर करने देता है, लेकिन दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर यौन शोषण को हर्जाना देकर छोड़ा नहीं जा सकता।''
हमने लिखा था- ''हमारा यह मानना है कि पोप सरीखे दुनिया के सबसे अधिक अनुयायियों वाले अकेले धार्मिक मुखिया को इंसानियत और कानून इन दोनों के लिए कुछ अधिक सम्मान दिखाना चाहिए था। यह सिलसिला गलत है कि धर्म का चोगा पहनने वाले बलात्कारियों को अफसोस जाहिर करके और आंसू बहाकर छोड़ दिया जाए। इससे इस धर्म के बाकी संस्थानों में भी यह संदेश जाता है कि वे कुछ भी करके बच सकते हैं। ऐसे लोगों को पूरी जिंदगी के लिए धार्मिक संस्थानों से बाहर तो करना ही चाहिए, उन्हें कानून के हवाले भी तुरंत ही करना चाहिए।''
हमने लिखा था- ''भारत में हम लगातार देख रहे हैं कि धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए संगठनों ने तरह-तरह के बाबा और बापू लोग नाबालिग बच्चियों से बलात्कार को एक आदतन हरकत बनाकर चल रहे हैं, और यौन शोषण की भयानक कहानियां सामने आ रही हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए, और हमाराख्याल है कि जिस धर्म या आध्यात्म के संगठन या मुखिया ऐसे जुर्म करते पकड़ाते हैं, उनकी संस्थानों की दौलत जब्त करने का भी कानून बनाना चाहिए। फिलहाल पोप के आंसुओं पर महज रोया जा सकता है, क्योंकि वे एक पाखंड के अलावा कुछ नहीं हैं।''
अब करीब साल भर बाद हम अपनी ऊपर लिखी हुई किसी भी बात की गंभीरता को कम नहीं आंक रहे, और पोप की इस ताजा घोषणा के असर को देखने में कई बरस लग जाएंगे कि यह सचमुच ही पादरियों के हाथ बच्चों के यौन शोषण को रोकने में कारगर कदम रहेगा, या यह महज दिखावे का एक ढोंग साबित होगा। यह बात याद रखने की जरूरत है कि धर्म में जहां-जहां ब्रम्हचर्य की शर्त लादी जाती है, वहां-वहां बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण की घटनाएं होती ही हैं।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
झूठ, हिंसा और नफरत के सैलाब को उजागर करें
संपादकीय
21 दिसंबर 2019

देश के बहुत बड़े हिस्से में और कई प्रदेशों में कॉलेज के छात्रों के अलावा मुस्लिम और हिन्दू दोनों समुदायों के लोगों के साथ दूसरे धर्म-जातियों के लोग भी सड़कों पर हैं। नागरिकता संशोधन और नागरिकता रजिस्टर, इन दोनों के खिलाफ जिस तरह का माहौल देश भर में दिख रहा है, वह शायद छह बरस की मोदी सरकार को पहली बार ही नसीब हुआ है। संसद में बाहुबल के चलते अपनी पसंद का कानून बना लेना एक अलग बात है लेकिन कम्युनिस्टों से लेकर हिन्दूवादी पार्टी शिवसेना तक, और एनडीए के साथी दल नीतीश कुमार के जेडीयू जैसे लोग अब नागरिकता विधेयक से अलग हो रहे हैं कि वे अपने राज्यों में इसे लागू नहीं करेंगे। कांग्रेस के मुख्यमंत्री पहले ही इसके खिलाफ बोल चुके हैं, पूरा उत्तर-पूर्व आंदोलन में झुलस रहा है, कई जगहों पर हालात बेकाबू हैं, और सरकार के कुछ मुंह यह बोलने में लगाए गए हैं कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का काम अभी शुरू नहीं हो रहा है, और लोगों को इससे दिक्कत नहीं होने दी जाएगी। कुल मिलाकर देश में केन्द्र सरकार के इन दो कानूनों को लेकर इतना बड़ा अविश्वास खड़ा हुआ है कि वह अभूतपूर्व है। दूसरी बात जो सरकार के लिए अधिक फिक्र की हो सकती है वह यह कि लोग इसकी दहशत से उबरकर अब झंडे-डंडे लेकर खड़े हैं, और संविधान के राज की मांग कर रहे हैं। यह पूरी नौबत एकदम ही अभूतपूर्व है, और एक कार्टूनिस्ट ने आज का सही नजारा दिखाया है कि देखने में अक्षम विपक्ष छात्रों की ऊंगली पकड़कर चल रहा है। छात्रों के आंदोलन को पप्पू या बबुआ कहकर खारिज करना मुमकिन नहीं होगा, और शायद इसीलिए झूठ की एक बड़ी जंग छेड़ दी गई है, जिस पर आज चर्चा होनी चाहिए।
पुराने वक्त से यह बात प्रचलन में है कि तस्वीर झूठ नहीं बोलती। बाद में जैसे-जैसे वीडियो का चलन बढ़ा तो लोगों को वीडियो पर तिलस्म सा भरोसा होने लगा कि जब एक तस्वीर झूठ नहीं बोलती तो वीडियो कैसे झूठ बोलेगा? लेकिन आज सोशल मीडिया देखें तो हिंसा की पुरानी तस्वीरें निकालकर, अड़ोस-पड़ोस के देशों के हिंसा के कुछ पुराने वीडियो निकालकर उन पर हिन्दुस्तानी शहरों के नाम चिपकाकर उन्हें फैलाया जा रहा है, और लोगों के नाम से बयान बनाकर उनको फैलाना तो और भी आसान है। कहने के लिए हिन्दुस्तान का सूचना तकनीक कानून देश के सबसे कड़े कानूनों में से है, लेकिन न तो उसका कोई असर दिखता, और न ही किसी को उसकी परवाह लगती। इक्का-दुक्का केस कहीं-कहीं पर दर्ज होते दिखते हैं, लेकिन किसी को सजा की कोई परवाह नहीं दिखती, और सोशल मीडिया का सबसे बड़ा इस्तेमाल नफरत और हिंसा फैलाने के लिए किया जा रहा है। एक दूसरी दिक्कत यह भी है कि यह काम कोई अनजाने में नहीं कर रहे हैं, जानते-बूझते बदनीयत से कर रहे हैं, और ऐसी जनचर्चा है कि नफरत का सैलाब फैलाने वाले इसका भुगतान भी पाते हैं।
आज जरूरत यह भी है कि सोशल मीडिया या और किसी जगह पर सोची-समझी साजिश के तहत अगर नफरत और हिंसा फैलाने का काम हो रहा है, तो कम से कम उन राज्यों में तो सरकारों को केन्द्र सरकार के बनाए कानून के तहत कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जिन राज्यों में सरकारें नफरत फैलाने में हिस्सेदार नहीं हैं। यह न सिर्फ ऐसी राज्य सरकारों का अधिकार है, बल्कि उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। यह उन लोगों की भी सामाजिक जिम्मेदारी है जो दूसरों को नफरत फैलाने के लिए झूठी तस्वीरों और झूठे वीडियो का इस्तेमाल करते देख रहे हैं। ऐसा देखते हुए भी अगर दूसरे गैरनफरतजीवी लोग चुप रहेंगे, तो समाज में लगती आग से किसी दिन उनकी कुनबा भी जल सकता है। जब देश जलने-सुलगने लगता है, तो वह आग छांट-छांटकर नहीं फैलती, और महज छांटे हुए निशानों को नहीं जलाती। सोशल मीडिया और मीडिया पर झूठ फैलाने वालों का भांडाफोड़ करने के लिए देश में कुछ जिम्मेदार वेबसाईटें बड़े सीमित साधनों में काम कर रही हैं, और वे लगातार साजिश का भांडाफोड़ करती हैं। समाज के जिम्मेदार लोगों को ऐसे भांडाफोड़ को भी देख परखकर, सच पाए जाने पर उनको आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए क्योंकि झूठ फैलाने में तो करोड़ों लोग लगे हैं, कुछ लाख लोग झूठ का भांडा फोडऩे में भी हाथ बंटाएं। कुल मिलाकर आज हिन्दुस्तान में एक बहुत बड़े तबके की झिझक पूरी तरह खत्म हो गई है, और बेशर्मी ने उनकी आत्मा पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि नफरत और झूठ फैलाते उन्हें जरा भी हिचक नहीं लगती। लेकिन लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ऐसे लोगों के हवाले करके चुप बैठ जाना ठीक नहीं है। देश के तमाम जिम्मेदार लोगों को हर दिन थोड़ा सा वक्त निकालना होगा, और झूठे इतिहास, झूठे वर्तमान, और भविष्य को लेकर बेबुनियाद आशंकाओं की नफरत फैलाने वालों की हकीकत उजागर करनी होगी। हर जिम्मेदार व्यक्ति को पहले तो अपने परिवार, फिर अपने दोस्त, फिर दफ्तर या कारोबार के साथियों से बातचीत में सच और झूठ का फर्क बताना होगा, तभी आने वाली पीढिय़ां बिना नफरत और खतरे के जी सकेंगी।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
जीभ को नाराज करके बाकी बदन पर एहसान की जरूरत
संपादकीय
20 दिसंबर 2019

देश की सबसे बड़ी पर्यावरण-संस्था सेंटर फॉर साईंस एंड इनवायरमेंट, सीएसई ने पर्यावरण के परंपरागत मुद्दों से कुछ हटकर खानपान पर अभी एक बहस रखी जिससे यह सामने आया कि हिन्दुस्तान में पैकेटबंद मीठा-नमकीन किस्म के सामान किस कदर सेहत के खिलाफ हैं। ऐसे सामानों में शक्कर, नमक, या कुछ रसायन इतने अधिक हैं कि उनसे सेहत को नुकसान पहुंचना तय है। बाजार में अधिक चलने वाले कई ब्रांड के अधिक चलने वाले सामानों का रासायनिक विश्लेषण करके सीएसी ने एक चार्ट भी प्रकाशित किया है कि किस-किसमें कितना फीसदी नुकसानदेह सामान मिला हुआ है। देश में शायद यह अपने किस्म का एक पहला बड़ा आयोजन था जो कि किसी स्वास्थ्य-संस्था के बजाय पर्यावरण संस्था ने खानपान को लेकर देश के सबसे चर्चित पांच सितारा रसोईयों को भी साथ रखा, और चर्चा को महज कागजी होने से बचाया।
देश में खानपान का हाल एक बहुत फिक्र की बात है। यह बात जरूर है कि यह अमरीका जैसे देश से बहुत बेहतर है क्योंकि वहां पर लगातार जंक कहे जाने वाले बहुत ही नुकसानदेह खानपान की वजह से आबादी का एक बड़ा हिस्सा इतने भारी मोटापे का शिकार हो चुका है कि वह एक किस्म का राष्ट्रीय खतरा माना जा रहा है। भारत में भी दिल्ली जैसे उत्तर भारतीय शहर में महंगे स्कूल-कॉलेज को देखें, महंगे बाजारों में घूमते लोगों को देखें, तो अंधाधुंध मोटे लोग सबसे नुकसानदेह चीजें खाते-पीते दिखते हैं। इस नौबत को सुधारने में लोगों की दिलचस्पी धीरे-धीरे इसलिए कम हो रही है कि उनकी खर्च की ताकत में हासिल महंगे इलाज पर उन्हें बहुत भरोसा है कि आखिर में जाकर बाईपास से सब ठीक हो जाएगा, खाओ-पिओ ऐश करो। देश में ऐसी सोच महज उसी पीढ़ी का नुकसान नहीं कर रही है, बल्कि वह इस पीढ़ी के डीएनए से आगे बढऩे वाली तमाम पीढिय़ों को दिक्कत वाले जींस देकर जा रही है। इसके साथ-साथ देश की सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं पर ऐसे लोग इतना अधिक बोझ डाल रहे हैं कि कम आय वाले लोगों को ऊंचा इलाज पाने की कतार में जगह ही नहीं मिल रही है।
हम सेहत के बचाव और चुस्त-दुरूस्त रहने के बारे में हर बरस एक-दो बार लिखते हैं कि बीमारियों से बचाव ही एकमात्र इलाज है, और कोई तरीका नहीं है कि एक बार खो चुकी सेहत को दुबारा पाया जा सके। देश के जो सबसे महंगे अस्पताल लोगों को यह भरोसा हासिल कराते हैं कि उनके पास तमाम बड़ी बीमारियों का इलाज है, उनको भी मालूम है कि इलाज की उनकी सीमा है, मेडिकल साईंस की भी एक सीमा है, और बदन को पहुंचा हुआ हर नुकसान दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे में केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को एक तरफ तो जनता को जागरूक करना चाहिए कि वे सेहत के लिए नुकसानदेह खान-पान से कैसे बचें। दूसरी तरफ उन्हें होटलों और बाकी खानपान के धंधों पर यह नियम भी लागू करना चाहिए कि वे हर सामान छोटी प्लेट में भी उपलब्ध कराएं ताकि लोगों को मजबूरी में अधिक खाना न पड़े, या प्लेट में जूठा न छोडऩा पड़े। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक फिट-इंडिया का नारा दिया है जो कि एक अच्छी जागरूकता हो सकता है अगर इसके साथ-साथ देश भर के शहरों में सैर के लिए बाग-बगीचे, और योग-ध्यान करने की जगह, उन्हें सीखने की सहूलियत उपलब्ध कराई जा सके। ये दोनों बातें मिलीजुली हैं, एक तरफ जागरूकता बढ़ाई जाए, सेहतमंद रहने की प्राकृतिक सहूलियत मुहैया कराई जाए, और दूसरी तरफ बाजार में खाने के लिए मजबूर लोगों को कम मात्रा में भी खरीदने की सुविधा रहे। छोटी प्लेट अनिवार्य करने की बात लंबे समय से चल रही है, लेकिन इस पर अमल हो नहीं पाया है। पता नहीं राज्य सरकारें अपने अधिकारों से अपने इलाकों में ऐसा कर सकती हैं या नहीं, लेकिन अगर ऐसे अधिकार हों तो जागरूक राज्यों को ऐसा करना ही चाहिए। फिर समाज के भीतर, परिवार के भीतर लोगों को तमाम डिब्बाबंद, पैकेट वाले, और टेलीफोन से ऑर्डर करके बुलाए जाने वाले खाने का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए। सबसे सेहतमंद खाना वह होता है जो घर पर बनता है, जिसमें घी-तेल का कम इस्तेमाल होता है, जिसमें चर्बी कम होती है, और जिसमें फल-सब्जी का अधिक से अधिक उपयोग होता है। इस जगह पर इससे ज्यादा खुलासे से चर्चा नहीं हो सकती, लेकिन लोगों को अस्पतालों से अधिक भरोसा अपनी जीवनशैली पर करना चाहिए कि अस्पतालों की नौबत ही न आए। यह जानकारी कोई परमाणु-रहस्य नहीं है, और कदम-कदम पर उपलब्ध है। जरूरत महज इतनी है कि अपनी जीभ पर काबू रखकर, उसे नाराज करके, बाकी बदन पर एहसान किया जाए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
मोदी सरकार और किसी की न सही, चेतन भगत की लिखी बात तो सुन ले
संपादकीय
19 दिसंबर 2019

जब किसी नेता या सरकार के सामने बहुत विरोध हो रहा हो, उसके फैसलों पर सवाल उठ रहे हों, और पिछले फैसले एक के बाद एक नुकसानदेह साबित हो रहे हों, तो यह वक्त ऐसा रहता है कि अपने दरबार से परे के लोगों की बात भी सुननी चाहिए। और यह बात हम पिछले बरसों में मोदी सरकार के बारे में ऐसे कई मौकों पर लिख चुके हैं जब एनडीए में उसकी भागीदार रही शिवसेना ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या केन्द्र की किसी नीति या फैसले का विरोध किया हो। शिवसेना भाजपा के मुकाबले अधिक उग्र हिन्दुत्ववादी पार्टी रही है, और भाजपा के सबसे पुराने भागीदारों में से एक भी, इसलिए जब तक वह केन्द्र और महाराष्ट्र के गठबंधन में भाजपा के साथ थी, उसकी की गई आलोचना किसी कंपनी या संस्था के भीतर बैठकर काम करने वाले बाहरी ऑडिटर की आपत्ति सरीखी थी, जिसे अनदेखा करना खतरनाक था। अब पिछले दो-तीन दिनों में दो ऐसे लोगों ने मोदी-अमित शाह की ताजा नागरिकता-नीति को लेकर, छात्र आंदोलनों पर सरकार की कड़ी मार को लेकर लिखा है जिस पर सरकार को गौर करना चाहिए। देश के एक वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रकाश वैदिक कोई वामपंथी पत्रकार नहीं रहे हैं, और भाजपा के भी अनगिनत नेताओं से उनके मधुर और अंतरंग संबंध रहे हैं। उन्होंने केन्द्र सरकार के ताजा फैसलों को लेकर खासी आलोचना की है, जबकि उनकी सोच किसी भी तरह से मुस्लिमों से किसी रियायत की नहीं है।
वेदप्रकाश वैदिक ने लिखा है कि पड़ोसी देशों से भारत आए लोगों को शरण देने के लिए जो शर्त रखी है वह अधूरी है, अस्पष्ट है, और भ्रामक है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि क्या पाकिस्तान से मुस्लिम लोग प्रताडऩा की वजह से छोड़कर दूसरे देशों में नहीं भागते हैं? उन्होंने लिखा- इस कानून के पीछे छिपी साम्प्रदायिकता दहाड़ मार-मारकर चिल्ला रही है, भाजपा ने अपने आपको मुस्लिमविरोधी घोषित कर दिया है, भाजपा जब विपक्ष में थी तब वोट पाने के लिए यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण समझ में आता था, पर अब तो वह सत्ता में है। उन्होंने आगे लिखा है कि बंगाल, असम, त्रिपुरा, और पूर्वोत्तर के अन्य प्रांतों में सारे हिन्दू क्यों भड़के हुए हैं? वहां की भाजपा सरकारें क्यों हक्का-बक्का हैं? भाजपा के इस कानून ने देश के परस्पर विरोधी दलों को भी एकजुट कर दिया है। उन्होंने भाजपा के छेड़े हुए नागरिकता के इस ताजा मुद्दे को फर्जी करार दिया है, और सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद की है कि वह इसे असंवैधानिक घोषित करे तो वह भारत को इस निरर्थक और फर्जी संकट से बचा सकता है।
इसी के ठीक अगले दिन एक अलग पीढ़ी के एक गैरपत्रकार, उपन्यासकार चेतन भगत ने एक बड़ा लेख लिखा है जिसे देखकर पहली नजर में ऐसा लगता है कि किसी और के लिखे लेख में उनका नाम चिपक गया है। वे आमतौर पर हिन्दुत्ववादियों की तारीफ करते दिखते हैं, मोदीभक्त रहते आए हैं, और देश के उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, और प्रगतिशील लोग उन्हें हिकारत से देखते हैं। वे हिन्दुस्तान के अंग्रेजी लेखकों में सबसे अधिक संख्या में बिकने वाले उपन्यासों के लिए इतने मशहूर हैं कि उन्हें अंग्रेजी का गुलशन नंदा कहकर साहित्यिक-गाली दी जाती है, लेकिन वे सोशल मीडिया पर आए दिन ताजा मुद्दों पर भी कुछ-कुछ लिखते हैं। उनका लिखा हुआ कोई भी ट्वीट याद करें तो वह मोदी की तारीफ से स्तुति के बीच का याद पड़ता है, लेकिन आज का उनका लेख मोदी के बारे में कहता है- हां में हां मिलाने वाले यसमैन से घिरा नेतृत्व। उन्होंने राजनीति के पाठकों को इस लेख से हक्का-बक्का किया है कि चेतन भक्त कहे जाने वाले इस लेखक को क्या हो गया है। और हमें पूरा भरोसा है कि इस लेख के सामने आते ही नरेन्द्र मोदी से लेकर भाजपा और संघ के लोग भी हैरानी और सदमे के बीच कहीं होंगे। लेकिन चेतन भगत की लिखी हुई बातों को अगर मोदी सरकार नहीं पढ़ेगी, या उस पर गौर नहीं करेगी, तो वह नुकसान छोड़ कुछ नहीं पाएगी। उन्होंने नोटबंदी, जीएसटी, 370 के खात्मे, और अब नागरिकता संशोधन कानून इन सभी की आलोचना करते हुए इनसे हुए नुकसान गिनाए हैं, और लिखा है कि नागरिकता संशोधन कानून को किसी अच्छे समय, अच्छे शब्दों, आम राय बनाने के लिए लंबे जनविमर्श, और स्पष्ट तौर पर कहें तो अच्छे इरादे की जरूरत थी। इस आखिरी शब्द से यह साफ है कि भाजपा के इस सबसे पसंदीदा अंग्रेजी उपन्यासकार नौजवान को नागरिकता संशोधन के पीछे एक बदनीयत दिख रही है जिसे वे खुलकर लिख रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि भाजपा के बड़े फैसलों का नियमित अंतराल में ऐसा विरोध होते चल रहा है। चेतन भगत ने यह भी लिखा कि हिन्दू-मुस्लिम के सामाजिक समीकरणों से बार-बार छेड़छाड़ भारत जैसे देश में कभी भी एक अच्छा विचार नहीं रहा। उन्होंने लिखा कि अगस्त में 370 हुआ, करीब एक महीने पहले राम मंदिर का फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया, क्या मुस्लिमों को एक और चोट देना जरूरी था?
इसके बाद चेतन भगत ने गिनाया है- क्या भाजपा को नहीं पता है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर छह सालों में सबसे कम है? क्या वह नहीं जानती कि बार-बार हिन्दू-मुस्लिम के सामाजिक ताने-बाने को छेडऩे से निवेशकों पर गलत प्रभाव पड़ता है, और यह हमारे विकास पर असर डालता है? उन्होंने लिखा कि नेतृत्व को यसमैन घेरे हुए हैं, समझदार बातों, प्रतिभाशाली और स्वतंत्र राय रखने वालों को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। भाजपा की लगातार हो रही राजनीतिक विजय ने इस संस्कृति को इतना अधिक कड़ा कर दिया है कि इसे बदलना मुश्किल है। लेकिन अगर इसे न बदला गया, तो एक दिन ऐसी स्थिति आ सकती है कि चारों तरफ आग ही आग होगी।
इन दो पत्रकार-लेखकों की बातों को यहां लिखकर हम यही कहना चाहते हैं कि मोदी सरकार को कम से कम ऐसे लोगों की बात तो सुननी चाहिए जो कि या तो उनके खुद के हैं, हिमायती हैं, या कम से कम मोदीविरोधियों के पैरोकार नहीं हैं। देश भर के विश्वविद्यालयों में चल रहे आंदोलनों की गिनती को घटाकर बताने से हकीकत नहीं छुपेगी, और इस देश को ऐसी आग में झोंकना भी ठीक नहीं है जो अगली पांच-दस सरकारों पर भी भारी पड़ेगी।
(Daily Chhattisgarh)
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