डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस सरकार तो क्या, बाजार भी नहीं रोक पा रहा है...
30 सितंबर 2024
छत्तीसगढ़ सरकार ने सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को लेकर अपना बरसों पुराना एक ऑर्डर दुबारा जारी किया, तो बड़ी खलबली मच गई है। सरकारी सेवा शर्तों में जिन डॉक्टरों को नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस मिलता है, वे भी धड़ल्ले से बाहर बाजार में प्रैक्टिस करते हैं। सेवा शर्तों में उन्हें महज अपने घर पर मरीज देखने की छूट रहती है, लेकिन अधिकतर सरकारी डॉक्टर बाजार में क्लिनिक खोलकर, या बड़े अस्पतालों से जुडक़र वहां नाम की तख्ती लगाकर प्रैक्टिस करते हैं। सरकारी नौकरी में जितने सर्जन और एनेस्थेटिस्ट हैं, वे या तो अपने नर्सिंग होम चलाते हैं, या किसी और निजी अस्पताल में हर दिन घंटों काम करते हैं। यह सब कुछ नियमों के खिलाफ है, लेकिन विधायक बनने के पहले से नेता ऐसे डॉक्टरों के मरीज रहते हैं, बड़े-बड़े अफसर अपने परिवारों को लेकर इन्हीं डॉक्टरों के क्लिनिक जाते हैं, और इसलिए आदेश निकालने से ज्यादा सरकार इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।
अब अगर सरकारी मेडिकल कॉलेजों को देखें, तो वहां पढ़ाने वाले, और कॉलेज के अस्पताल के बाहर निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर सबसे अधिक ताकतवर होते हैं क्योंकि सत्ता के सर्वोच्च लोगों को जब जरूरत पड़ती है, तो ये सीनियर डॉक्टर ही सबसे पहले बुलाए जाते हैं, और इन्हीं की राजनीतिक पहुंच सबसे अधिक होती है। इसके साथ-साथ इस हकीकत को अनदेखा करना ठीक नहीं होगा कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पढ़ाने के लिए डॉक्टर मिल नहीं रहे हैं, और खुद सरकार तरह-तरह का फर्जीवाड़ा करके राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की टीम आने पर मेडिकल कॉलेजों में प्राध्यापक-चिकित्सकों की फर्जी हाजिरी दिखाती है, और किसी तरह मेडिकल सीटें रद्द होने के खतरे को टालती है। ऐसी हालत में जब चिकित्सा-प्राध्यापक मिल ही नहीं रहे हैं, तब निजी प्रैक्टिस के नियम को उन पर लागू करके उन पर कोई कार्रवाई करना भला कैसे मुमकिन हो सकेगा? इसलिए जहां डिमांड से बहुत कम सप्लाई है, वहां पर डॉक्टरों की कमी के बाद उन पर कोई नियम नहीं लादे जा सकते हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब मेडिकल कॉलेज की हर कुर्सी भरी रहे, और सरकार मनमानी करने वाले चिकित्सक-प्राध्यापकों को हटाने की हालत में रहे। ऐसा तो पूरे देश में कहीं भी नहीं है क्योंकि उत्तर भारत के हिन्दीभाषी प्रदेशों में मेडिकल कॉलेजों की ही कमी है, और नए कॉलेज न खुल पाने की एक वजह प्राध्यापकों की कमी भी है। दूसरी तरफ दक्षिण भारत के राज्यों में राष्ट्रीय औसत से अधिक मेडिकल कॉलेज हैं, और वहां दक्षिण भारतीय प्राध्यापक पूरे के पूरे लग जाते हैं।
अब जहां पर जरूरत के मुकाबले डॉक्टरों की कमी है, वहां पर हाल यह है कि देश के बहुत से बड़े-बड़े अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर भी उन अस्पतालों से परे अपने निजी क्लिनिक भी कुछ घंटे चलाते हैं, और प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। हो सकता है कि उनके निजी क्लिनिक में आने वाले मरीजों में से जिनको अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ती होगी, उन मरीजों से इन बड़े अस्पतालों को कारोबार मिलता होगा, और इसीलिए अस्पताल अपने इन विशेषज्ञ डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस की छूट भी देते होंगे। दरअसल डॉक्टरी का पेशा, और इलाज का कारोबार, इन दोनों की प्राथमिकताएं बिल्कुल अलग-अलग होती हैं, और इनमें जब सरकारी व्यवस्था त्रिकोण का तीसरा कोण बन जाती है, तो यह पूरा मामला बड़ा जटिल हो जाता है। देश में जब तक विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता नहीं बढ़ेगी, तब तक निजी और सरकारी अस्पतालों के बीच विशेषज्ञ डॉक्टरों की खींचतान इसी तरह बनी रहेगी। दूसरी तरफ यह भी समझने की जरूरत है कि कोई भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल सीधे विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं उगलते। वे पहले तो एमबीबीएस डॉक्टर बनाते हैं, और फिर उनके अनुपात में एक बहुत छोटा सा हिस्सा विशेषज्ञ डॉक्टर बनता है। इसलिए देश में जब तक एमबीबीएस की सीटें नहीं बढ़ेंगी, तब तक न तो विशेषज्ञ डॉक्टर बढ़ेंगे, और न ही मेडिकल कॉलेज बढ़ेंगे।
लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले हमने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के एक फैसले की आलोचना की थी जिसने दक्षिण भारत के राज्यों में एमबीबीएस की सीटें बढ़ाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि वहां राष्ट्रीय औसत से अधिक मेडिकल सीटें हैं। आयोग पहले उत्तर भारत और हिन्दीभाषी राज्यों में मेडिकल सीटें बढ़ाना चाहता है, और इसलिए दक्षिण में चिकित्सा शिक्षा का विस्तार उसने हुक्म निकालकर रोक दिया है। अब यह एक राष्ट्रीय विसंगति है कि जिस दक्षिण भारत में चिकित्सा शिक्षा का (और बाकी उच्च शिक्षा का भी) एक बड़ा ढांचा तैयार किया है, उसे तो विस्तार से रोका जा रहा है, लेकिन उत्तर भारत के राज्य, और हिन्दी राज्य न तो ऐसा ढांचा बना पा रहे हैं, न बाहर के डॉक्टर जाकर इन राज्यों में काम करना चाहते हैं, और यहां आनन-फानन सीटों की बढ़ोत्तरी की गुंजाइश भी नहीं है। ऐसे में उत्तर भारत में भी पढ़ाने के लिए डॉक्टर तो दक्षिण भारत से ही आते दिखते हैं। दक्षिण के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में उत्तर भारत और हिन्दी राज्यों से भी हर बरस हजारों चिकित्सा छात्र जाते हैं, जिनमें से बहुत से डॉक्टर बनकर अपने राज्यों में लौटते हैं। ऐसे में दक्षिण में विस्तार को रोकना खुद राष्ट्रीय जरूरत के खिलाफ है, और परले दर्जे की अदूरदर्शिता होने के साथ-साथ यह दक्षिण के साथ बेइंसाफी भी है। चूंकि कुछ राज्य नालायक और निकम्मे रह गए हैं, इसलिए देश के मेहनती और विकसित राज्यों को भी विस्तार और विकास से रोका जाए ताकि उत्तर-दक्षिण सब राष्ट्रीय औसत के पास रहें।
हमने सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस से निकली बात दूर तक ले जाकर उत्तर और दक्षिण को लेकर केन्द्र सरकार की एक निहायत, नाजायज सोच तक पहुंचा दी है, लेकिन जो लोग राष्ट्रीय हित को देखेंगे, वे सरकारी नीति की खामी बड़ी आसानी से देख सकेंगे। आज सरकारी मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टर अपनी शर्तों पर काम करने की हालत में हैं, उनकी इस ताकत को कम तभी किया जा सकता है जब देश में सरकारी कुर्सियों से अधिक डॉक्टर इन कुर्सियों के लिए कतार में लगे हों। आज छत्तीसगढ़ और इस किस्म के दूसरे राज्यों के बस में कुछ भी नहीं है। निर्वाचित नेताओं से मंत्री-मुख्यमंत्री बने हुए लोग जनता में खपत के लिए चाहे जो भी बयान दे दें, उन पर कोई अमल नहीं हो सकता, खासकर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के मामले में। भारत सरकार को देश के किसी भी हिस्से से डॉक्टर तैयार होने को बढ़ावा देना चाहिए। आज तो हालत यह है कि रूस, चीन, और बांग्लादेश तक से डॉक्टरी पढक़र हिन्दुस्तानी नौजवान लौट रहे हैं, और यहां पर काम कर रहे हैं। जब विदेशों में पढ़े डॉक्टरों को यहां जगह मिल रही है, तो फिर दक्षिण भारत से परहेज करना, और उत्तर भारत को बराबरी पर लाने के नाम पर परहेज करना एक बेदिमाग फैसला लगता है। चूंकि यूपी-बिहार में उद्योग नहीं लगे हैं इसलिए तमिलनाडु और गुजरात में भी उद्योग बढऩा रोक दिया जाए, क्या यह किसी समझदारी की बात होगी?
नकली का सिलसिला यहां तक, खुली नकली एसबीआई ब्रांच!
29 सितंबर 2024
पिछले कुछ बरसों में लगातार हिन्दुस्तान में साइबर-फ्रॉड बढ़ते चल रहा है। मोबाइल फोन पर लोगों को ठगना, जालसाजी में उलझाना, बदनामी का डर दिखाकर ब्लैकमेल करना तो बढ़ते चल ही रहा है, इतने किस्म की धोखेबाजी चल रही है कि जांच करने वाली एजेंसियां शायद किसी नई तरकीब से हजारों जुर्म हो जाने के बाद ही उसकी कल्पना कर पाती होंगी। झारखंड का जामताड़ा ऐसा बदनाम हुआ कि वहां के मानो हर बेरोजगार को मोबाइल फोन से धोखाधड़ी करने, और लोगों को ठगने में महारथ हासिल हो गई थी। इस पर किसी बड़ी मनोरंजन कंपनी ने फिल्म या सीरियल भी बनाया है। लेकिन मामला यहां से बहुत आगे बढ़ गया है, और अब देश में ऐसे बहुत से कस्बे और शहर हो गए हैं जहां पर लोग साइबर और ऑनलाईन धोखाधड़ी के एक्सपर्ट हो गए हैं। वॉट्सऐप पर शेयर में पूंजीनिवेश का झांसा देकर लोगों से करोड़ों रूपए ठग लिए जा रहे हैं, तो कहीं क्रिप्टोकरेंसी से कमाई का बड़ा लुभावना धोखा दिया जा रहा है, और लोग पूरी जिंदगी की कमाई इसमें झोंक दे रहे हैं। एक और बहुत लोकप्रिय तकनीक लोगों को अश्लील और नग्न वीडियो कॉल में उलझाकर उनको ब्लैकमेल करने की है।
अब अगर देखें तो ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान किसी को गोली मारकर, या बंदूक की नोंक पर लूटने से आगे निकल गया है। अब लुटेरे मुंह पर कपड़ा बांधकर, चाकू-छुरा दिखाकर लूटने से बहुत आगे बढ़ चुके हैं। और अब मोबाइल फोन और ऑनलाईन पर बैंकों या भुगतान के किसी और तरीके का इस्तेमाल करते हुए लोगों को ठगा और लूटा जा रहा है। हमने कुछ अरसा पहले इस बारे में रक्तहीन-अपराध बढ़ते जाने की बात कही थी। अब कल छत्तीसगढ़ के एक गांव में ठगों ने एसबीआई की एक नकली ब्रांच ही खोल दी। भारतीय स्टेट बैंक का बोर्ड लग गया, लोग भीतर बैठकर काम भी करने लगे। धोखेबाजी के मुखिया, और इस नकली ब्रांच के मैनेजर बनकर बैठे पंकज पांडेय नाम के आदमी के खिलाफ जुर्म भी दर्ज कर लिया गया, जिसने बाकी कर्मचारियों को नौकरी देकर ‘बैंक-कर्मचारी’ बना दिया था। हफ्ते भर से यह ब्रांच खुल रही थी, लोग बैठ रहे थे, और खुशी-खुशी वहां पहुंचने वाले लोगों को कहा जा रहा था कि सर्वर चालू होते ही काम शुरू हो जाएगा। देश में कुछ और जगहों पर हाल के बरसों में स्टेट बैंक की नकली ब्रांच खुल चुकी हैं, लेकिन यह छत्तीसगढ़ में ऐसा पहला कारनामा था। बाद में इसकी चर्चा सुनाई पडऩे पर एसबीआई के अफसरों ने आकर जांच-पड़ताल की, और पुलिस में रिपोर्ट की। इस मामले से एक बहुत पुरानी हिन्दी फिल्म याद पड़ती है जिसमें डकैतों के हमले में पुलिस मारी जाती है, और एक फरार मुजरिम धर्मेन्द्र किसी गांव-कस्बे में पहुंचकर एक फर्जी थाना खोल देता है। अब एसबीआई की नकली ब्रांच खुलने लगी हैं। इसे लेकर एक मजाक की बात यह हो सकती है कि लोगों को एसबीआई की इस ब्रांच के नकली होने का शक तब हुआ, जब नए-नए नियुक्त किए गए फर्जी कर्मचारियों ने लंच के घंटों में भी काम जारी रखा। यह तो भला हुआ कि इस धोखाधड़ी में लोगों के लुटने के पहले ही इसे पकड़ लिया गया, वरना आम लोग तो किसी बेहिसाब कमाई के झांसे में जिंदगी भर की मेहनत की कमाई को झोंक देने में पल भर भी नहीं लगाते।
हिन्दुस्तान के लोग तरह-तरह की चिटफंड कंपनियों में झोंक दी गई अपनी बचत के जख्मों से तो उबर नहीं पाए हैं, और दूसरी तरफ वे नए झांसों में फंसने के लिए उतावले बैठे रहते हैं। ऐसी धोखाधड़ी, और ठगी की खबरें तो आती हैं, लेकिन मोटी कमाई का सुनहरा झांसा लोगों को इन्हें अनदेखा करके दांव लगा देने का एक अजीब सा उत्साह और हौसला दे देता है। हमारा ख्याल है कि सरकार को बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए क्योंकि एक तो हर जुर्म की जांच सरकार के मत्थे आती है, दूसरी बात यह भी कि जालसाजों के हाथ बड़ी रकम पहुंच जाने पर वह जुर्म की दुनिया के हाथ मजबूत करती है। फिर इस सिलसिले से न तो सरकार को कोई टैक्स मिलता, और न ही जुर्म की रकम आसानी से देश की अर्थव्यवस्था में लौटती। देश के बेकसूर नागरिकों की बचत इस तरह लुट जाने से उनकी जिंदगी भी तबाह होती है। इसलिए सरकारों को बहुत बड़े पैमाने पर लोगों को जागरूक करने का अभियान छेडऩा चाहिए। अब तो वॉट्सऐप और सोशल मीडिया जैसे मुफ्त के माध्यम सरकार या हर किसी को हासिल हैं, और ऐसे हर जुर्म की खबरों का वहां प्रचार हो सकता है। अभी पुलिस अपने नजरिए से प्रेसनोट बनाकर जारी करती है, लेकिन आम लोगों को जिन तरीकों से खतरा समझ में आ सकता है, वह एक अलग पेशेवर तरीका होता है, और सरकारों को जागरूकता के वैसे वीडियो बनाकर फैलाने चाहिए।
दूसरी तरफ समाज के
भीतर भी धर्म, जाति, इलाके, पेशे, या शौक से जुड़े हुए जितने किस्म के संगठन हैं, उन्हें
भी अपने लोगों को बचाने के लिए जागरूकता के कार्यक्रम चलाने चाहिए। इसके बिना बचने
का कोई जरिया नहीं है, क्योंकि जालसाज और ठग हर पल कोशिश में लगे रहते हैं, और अपनी
हर कामयाबी के बाद उनका उत्साह भी बढ़ता है, और वे जुर्म को और अधिक बड़े पैमाने पर
ले जाते हैं। भारत सरकार को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि वह संचार साधनों पर अपने
काबू का इस्तेमाल करके कैसे इन मुजरिमों पर रोक लगा सकती है, उसके स्तर पर रोकथाम और
बचाव अधिक आसान है, और उसे ही इसके साथ-साथ जागरूकता की भी पहल करनी चाहिए।
पति और पत्नी के रिश्तों के बीच दुनिया का सबसे भयानक जुर्म...
29 सितंबर 2024
हिन्दुस्तान की हिन्दू संस्कृति में पति-पत्नी के साथ को सात जन्मों का माना जाता है। खैर, सात किसने देखे हैं, एक जन्म भी साथ निभ जाए, तो काफी होता है। लेकिन दुनिया की कुछ दूसरी संस्कृतियों में भी पति-पत्नी अपने साथ को उजागर करने के लिए हाथ की किसी खास उंगली में अंगूठी पहनते हैं, और यह उनके किसी जीवनसाथी की तरफ ठीक वैसा ही इशारा होता है जैसा कि भारत में हिन्दू महिलाओं के गले में मंगलसूत्र, या उनकी मांग में सिंदूर से उजागर होता है। पश्चिम की, भारत में बदनाम, संस्कृति में भी कई मर्द ऐसे होते हैं जो बीवी के गुजर जाने के बाद भी ऐसी अंगूठी पहने रहते हैं, और यह उजागर करता है कि वे किसी नए रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं।
एक खबर बेंगलुरू की है कि वहां पति को छोडक़र अलग रहने वाली महालक्ष्मी नाम की 29 बरस की एक महिला का ओडिशा के एक आदमी से प्रेमसंबंध हो गया था, और दोनों के बीच बहस होने पर उसने महालक्ष्मी का कत्ल करके उसके 59 टुकड़े कर दिए, और उन्हें फ्रिज में भरकर चले गया। बाद में जब इस फ्लैट से बदबू बाहर निकलने लगी, तो लोगों ने पुलिस को खबर की, और उसे लाश के टुकड़े मिले, पता लगाते हुए वह कातिल तक पहुंची, लेकिन उसे पुलिस की खबर लगने पर उसने जुर्म कुबूल की चिट्ठी लिखकर खुदकुशी कर ली। अब यह तो बिना किसी पश्चिमी प्रभाव वाला खालिस हिन्दुस्तानी मामला है जिसमें प्रेम या देहसंबंध से शुरूआत होकर कातिल और लाश तक संबंध पहुंच गया था। बात-बात में पश्चिम को कोसना पूरब की अपनी दिक्कतों का कोई हल नहीं होता।
ऐसे ही पश्चिम के एक देश फ्रांस से अभी एक खबर आई जो स्तब्ध कर देने वाली है। वहां अदालत ने 71 बरस के एक आदमी पर यह मुकदमा चल रहा था कि वह अपनी बीवी को दवाईयों से बेसुध कर देता था, और उसके बाद इंटरनेट पर पहले से छांटे गए लोगों को न्यौता देकर बुलाकर रखता था, और अपनी पत्नी पर उनसे बलात्कार करवाता था। ऐसे 50 लोगों पर यह मुकदमा चल रहा था जिन्होंने पति के बुलावे पर आकर बेसुध पत्नी के साथ सेक्स किया था। इनमें से कुछ लोगों को इस पति ने यह भरोसा दिलाया था कि पत्नी खुद ऐसा सेक्स चाहती है, और वह बेसुध होने का नाटक कर रही है। नौ बरस चले इस मुकदमे में आखिर में 71 बरस के इस आदमी ने यह माना कि वह बलात्कारी है, और उसी की तरह जो 50 दूसरे लोग इस अदालत में मौजूद हैं, वे भी बलात्कारी हैं। उसने अपनी पत्नी, बच्चों, और उनके भी बच्चों से माफी मांगते हुए कहा कि उसका यह जुर्म माफी के लायक तो नहीं है, लेकिन उसे अफसोस है। उसने अदालत में मौजूद 50 आरोपियों के बारे में कहा कि उन सबको यह मालूम था कि वह उन्हें अपनी पत्नी से बलात्कार करने के लिए बुला रहा है।
फ्रांस में चला यह मुकदमा अपने आपमें दुनिया का अनोखा मुकदमा है जिसमें किसी आदमी ने अपनी पत्नी से ऐसे बलात्कार करवाए, और फिर उसके फोटो और वीडियो भी लेकर रखे थे जिनसे जांच अधिकारी इन आमंत्रित बलात्कारियों तक पहुंच पाए। इस पत्नी ने दस बरस तक चले ऐसे बलात्कारों से नावाकिफ रहते हुए अदालत में यही कहा कि उसके लिए यह कल्पना भी मुश्किल थी कि उसका पति उसके साथ ऐसा कर सकता है। उसने पल भर भी ऐसा नहीं सोचा, और उसे पति पर पूरा भरोसा था। अदालत में जब जांच अफसरों ने इस पत्नी को बलात्कार की ये तस्वीरें दिखाईं जो उसके पति ने ही खींची हुई थीं, तो वह हक्का-बक्का रह गई। यह शादी 20 बरस के आसपास की उम्र में हुई थी, और पत्नी आखिरी दिन तक यह मानकर चल रही थी कि उनकी शादी मजबूत है। आसपास के लोग भी उन्हें एक आदर्श जोड़ा मानते थे। लेकिन 2011 से इस पति ने अपनी इस खूंखार कल्पना को शक्ल देना शुरू कर दिया था, और वह नींद की गोलियां पीसकर पत्नी के खाने और पीने में मिला देता था, और जब वह बेहोश हो जाती थी तो वह अनजाने मर्दों को बुलाकर खुद भी उनके साथ मिलकर पत्नी से बलात्कार करता था। ऐसे मर्दों को उसने इंटरनेट पर एक समूह के माध्यम से छांटा था जिसका नाम ‘विदाउट हर नॉलेज’ (उसकी जानकारी के बिना) था। अब पुलिस को जांच में ऐसा अंदाज लग रहा है कि उसने दस बरसों में 90 मर्दों को बुलाकर पत्नी का दो सौ से अधिक बार बलात्कार करवाया।
जिन लोगों को सात जन्मों के रिश्तों पर भरोसा रहता है, उन्हें यह भी समझना चाहिए कि एक जन्म तक निभ जाने वाला रिश्ता भी बड़ा ही आदर्श रहता है। वरना इन दिनों लगातार यह भी पढऩे मिलता है कि किस तरह एक शादीशुदा जोड़े ने किसी एक ने दूसरे के कत्ल के लिए भाड़े के हत्यारों को सुपारी दी। और महिलाओं की बढ़ती हुई आजादी के चलते अब कुछ मामलों में महिलाएं भी किसी प्रेमी के साथ मिलकर, या अपने मायके के लोगों के साथ मिलकर पति को निपटाने लगी हैं, जो कि परंपरागत रूप से प्रेमी या पतियों का ही एकाधिकार होता था।
हम फ्रांस के इस भयानक और अनोखे जुर्म की कहानी इसलिए सुना रहे हैं कि 90 लोगों से दो सौ बार से अधिक बलात्कार से गुजर जाने पर भी पत्नी को इसका अहसास नहीं था, और वह आखिरी दिन तक अपने पति को भला इंसान और अपनी शादी को वफादार और भला ही मान रही थी।
यह तो 2020 में एक दुकान में एक सुरक्षा कर्मचारी ने इस पति को कुछ महिलाओं के स्कर्ट के नीचे से फोटो खींचते हुए पकड़ा, और फिर इसकी रिपोर्ट होने पर जांच अफसरों ने जब उसके कम्प्यूटर वगैरह की जांच की तो उसमें ऐसे तीन सौ फोटो और वीडियो मिले जिनमें मर्द किसी बेसुध महिला से बलात्कार और सेक्स कर रहे थे। बाद में समझ आया कि यह महिला इसी आदमी की पत्नी थी। और फिर इसी आदमी के ऐसे संदेश मिले जिसमें वह अपने छांटे हुए आदमियों को यह संदेश भेजता था कि उसने बीवी को दवाओं से बेसुध कर दिया है, और फिर वह उन्हेंं आकर बलात्कार करने का न्यौता देता था। उसने अपने कम्प्यूटर पर ऐसे फोटो और वीडियो तारीख और मर्दों के नाम सहित दर्ज करके सहेजकर रखे थे, और इसी वजह से पुलिस को उन्हें तलाश करने में दिक्कत नहीं हुई।
जब इस पत्नी को अदालत में बुलाया गया, तो वह अपने पति को एक अच्छा इंसान बताते हुए उसका बचाव करती रही, लेकिन जब उसे इस आदमी का तस्वीरों और वीडियो का गोदाम दिखाया गया, तो उसकी दुनिया पल भर में उजड़ गई। पचास बरस के साथ का इस तरह का अंत हो सकता है यह न उसने सोचा था, न उन्हें जानने वाले किसी और ने सोचा था। अब 70 बरस से अधिक की उम्र में वह पति के बिना रह गई है, और बाकी जिंदगी उसके सामने मुंह फाड़े खड़ी है।
पति के आमंत्रित बलात्कारियों में से कुछ ने अदालत में यह बचाव सामने रखा है कि उन्हें यह अंदाज नहीं था कि यह महिला बेसुध है। वे यह मान रहे थे कि यह अलग किस्म की सेक्स-कल्पनाओं वाला जोड़ा है जो कि एक साथ तीन लोगों के सेक्स का शौकीन है, और पत्नी ऐसे सेक्स के दौरान बेसुध होने का नाटक करने का भी शौक रखती है। अब ऐसे तमाम लोग 20-20 बरस की कैद के खतरे में हैं। जांच अफसरों को यह भी पता लगा है कि ऐसे आमंत्रित बलात्कारियों में से एक ने इसी तरकीब का इस्तेमाल अपनी पत्नी पर भी किया, उसे बेहोश किया, और फिर दूसरे मर्दों को बलात्कार के लिए बुलाया, जिनमें यह पहला पति भी शामिल था, और वह भी गया था।
यह
निजी जिंदगी में इतने हिंसक तौर-तरीकों वाला एक अनोखा और दुर्लभ मामला जरूर है, लेकिन
लोगों को यह भी पता रहना चाहिए कि बहुत से ऐसे जोड़े रहते हैं जो कि एक नए रोमांच की
चाह में जोड़े के बीच की अंतरंगता को कुछ औरों के सामने भी अलग-अलग हद तक उजागर करते
हैं। कुछ लोग अपने निजी पलों के फोटो और वीडियो बनाकर अपने करीबी लोगों में बांटते
हैं, कुछ लोग दूसरे जोड़ों के साथ मिलकर कुछ सेक्स खेल खेलते हैं। जितने तरह के लोग,
उतने तरह के प्रयोग।
आज इस मुद्दे पर बातचीत इसलिए जरूरी है कि न तो पश्चिम में अधिकतर जोड़े इस तरह के एडवेंचर करते, और न ही पूरब में ऐसा करने वाले कुछ जोड़े होना हैरानी की बात होगी। अब एक जोड़ा 50 बरस तक ऐसे हिंसक दौर से गुजरा, और एक भागीदार को उसकी हवा भी नहीं लगी, इससे समझा जा सकता है कि धोखा कितना लंबा चल सकता है। लोगों को सावधान रहना चाहिए कि जो उन्हें दिख नहीं रहा है, महसूस नहीं हो रहा है, वह जरूरी नहीं है कि न ही हो। लोगों को अधिक सावधान रहना चाहिए, आपसी रिश्तों में भी।
दवा और दुआ में से अधिक जरूरी को छांटने में लगती है अक्ल, और वैज्ञानिक चेतना
28 सितंबर 2024
दो दिन पहले की रिपोर्ट है कि भारत सरकार के दवा नियंत्रक ने 50 से अधिक दवाओं को घटिया मानते हुए एक रिपोर्ट दी है, और इस फेहरिस्त में बहुत आम प्रचलित दवाएं शामिल हैं जिनमें जीवन रक्षक डायबिटीज की दवा, हाई ब्लड प्रेशर की दवा भी है। अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि सरकार इस पर क्या करने जा रही है, और ये दवाएं देश की बड़ी दवा कंपनियों की बनाई हुई भी हैं। कुछ दवाओं के बारे में यह समाचार भी आया है कि उनके कैप्सूल के खोल में चेहरे पर लगाने वाला पावडर भरकर सरकारी अस्पतालों को सप्लाई कर दिया गया है। एक से बढक़र एक नामी-गिरामी कंपनियां घटिया दवाई बनाने की दोषी पाई गई हैं। और एक दिक्कत यह है कि आन्ध्र, अरूणाचल, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल, मणिपुर, राजस्थान, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, तमिलनाडु, पांडिचेरी, तेलंगाना, दिल्ली, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, अंडमान-निकोबार, दादर-नगर हवेली, दमन-दीव, लक्षदीप ने भारत सरकार के दवा नियंत्रक को उनके राज्य में दवा की क्वालिटी पर कोई रिपोर्ट नहीं दी है। अब इस लंबी लिस्ट के बाहर क्या देश में कोई राज्य बच भी गया है? जितनी लंबी लिस्ट रिपोर्ट न देने वाले राज्यों की है, उतनी ही लंबी लिस्ट देश की प्रमुख दवा कंपनियों की भी है।
कल की एक दूसरी खबर है कि किस तरह देश के एक सबसे प्रमुख हिन्दू मंदिर, तिरुपति में लड्डुओं में मछली के तेल, गाय और सुअर की चर्बी मिले होने की जांच के लिए आन्ध्र सरकार ने एक विशेष जांच दल बनाया है। लड्डुओं से परे जो जीवन रक्षक दवाएं हैं, उनके घटिया क्वालिटी के होने को लेकर किसी जांच दल की अभी खबर नहीं है। इस देश में धर्म से जुड़ा प्रसाद जांच का सामान है, लेकिन सभी धर्मों के लोगों की जिंदगियां बचाने वाली दवाएं अगर घटिया बन रही हैं, मिलावटी हैं, उनमें दवा की जगह चेहरे का पावडर भर दिया गया है, तो भी उसकी किसी जांच की न तो मांग उठ रही है, और न ही मानो जनता को इसकी कोई परवाह रह गई है। यह गजब की हैरान करने वाली नौबत है कि लोगों को अपने परिवार की जिंदगी के लिए जरूरी दवाओं से अधिक मंदिर के प्रसाद की परवाह है। इससे यह भी पता चलता है कि जनता किस हद तक अंधभक्ति का शिकार हो चुकी है, और उसे विज्ञान की कोई परवाह नहीं रह गई है जो कि इन दवाओं को बनाता भी है, और इनमें घटिया क्वालिटी को पकड़ता भी है।
दरअसल देश में भावनात्मक मुद्दों का सैलाब इतना बड़ा हो गया है कि जिंदगी के असल मुद्दे किनारे हो गए हैं। यह एक अलग बात है कि तमाम किस्म के पाखंडी और देवदूत होने का दावा करने वाले लोग भी जब खुद बीमार पड़ते हैं, तो वे आधुनिक विज्ञान से चलने वाले अस्पतालों में ही जाते हैं। और बात-बात में अंधभक्ति और अंधविश्वास फैलाने वाले बड़े-बड़े लोग तो दूसरे देशों के अस्पतालों तक भी जाकर इलाज करवाते हैं, और देश की आम जनता को अलग-अलग धर्मों के प्रवचन करने वाले लोगों, चमत्कारी बाबाओं, चंगा करने वाले पादरियों, तांत्रिकों, और बैगा-गुनिया के हवाले कर देते हैं। कल की ही खबर है कि किस तरह उत्तरप्रदेश में एक स्कूल के संचालक ने स्कूल को कामयाब करने के लिए एक बच्चे की बलि दे दी, और इस स्कूल संचालक का पिता ही बलि देने वाला तांत्रिक था।
देश के लोगों में वैज्ञानिक चेतना टुकड़ों में नहीं आती, ऐसा नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति किसी एक मामले में तो तर्क और समझ से काम ले, और बाकी मामलों में वे अंधविश्वासी हो जाएं। लोगों का मिजाज एक साथ ही बनता और बिगड़ता है। आज देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को गाय के नाम पर, धर्म के नाम पर, प्रसाद में चर्बी के नाम पर, हिजाब और बुर्के के नाम पर, किसी धर्म के प्रचार के नाम पर इस हद तक भडक़ाया जा सकता है कि वे हिंसक हो जाएं, और इंसानों का कत्ल करने को जायज मानने लगें। आज देश में जगह-जगह गौ-गुंडे अपने आपको गौरक्षक कहते हुए जब कानून अपने हाथ में लेते हैं, पांवोंतले कुचलते हैं, और दूसरे धर्म या दूसरी जाति के लोगों को गौ-हत्यारे कहते हुए मार डालते हैं, और सरकारें उन्हें बचाने का काम करती हैं, तो फिर यह हिंसक धर्मान्धता, और अंधविश्वास जंगल की आग की तरह चारों तरफ तेजी से फैलते हैं। यही अंधविश्वास है जो प्रसाद को राष्ट्रीय बहस का सामान मानता है, और जिसे घटिया और नकली दवाईयां पाना बुरा नहीं लगता, उसका विरोध जरूरी नहीं लगता।
हमारे पास की ही
एक दूसरी खबर है कि एक स्कूल में क्लास चलते हुए बीच में एक बच्चे ने जयश्रीराम का
नारा लगा दिया, और शिक्षिका ने उसे सजा देने के लिए क्लास के बाहर खड़ा कर दिया। यह
बात बच्चे के मां-बाप से होकर जब एक हिन्दूवादी छात्र संगठन तक पहुंची, तो उसके कार्यकर्ता
स्कूल पहुंचकर प्रदर्शन करने लगे, और उस शिक्षिका के खिलाफ कार्रवाई मांगने लगे। अब
एक क्लास के भीतर पढ़ाई के दौरान एक धार्मिक नारा लगाने को जायज हक मानते हुए, उस पर
मामूली सजा देने पर शिक्षिका के खिलाफ अगर आंदोलन हो रहा है, तो इसका यही मतलब है कि
स्कूलों में अब पढ़ाई की नहीं, कीर्तन भर की जरूरत रह गई है। ऐसी सोच किसी राजनीतिक
दल को वैज्ञानिक चेतनाविहीन लोगों के वोट जरूर दिलवा सकती है, लेकिन किसी देश को आगे
नहीं बढ़ा सकती। देश को दवा, और दुआ में से अगर किसी एक को प्राथमिकता देनी है, तो
यह याद रखें कि जो लोग सोते-जागते बात दुआ की करते हैं, वे भी अपनी तबियत खराब होते
ही दौड़े-भागे दवा की शरण में पहुंच जाते हैं, और भगवा लंगोटी वाले बाबा को ऑक्सीजन
मास्क लगाए आईसीयू में लोगों ने देखा हुआ ही है।
भारतीयों का बुनियादी मिजाज बेईमान क्यों?
27 सितंबर 2024
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों का आत्मसमर्पण बरसों से सरकार का एक बड़ा अभियान रहा है। और अधिकारी इसे अपनी एक उपलब्धि बताते हैं कि उन्होंने कितने नक्सलियों का समर्पण करवाया। अब छत्तीसगढ़ सरकार नक्सल पुनर्वास की एक नीति बना रही है जिससे आकर्षित होकर और अधिक नक्सली हथियार छोड़ सकें। बरसों से पुलिस पर यह आरोप भी लगता है कि वह किसी को भी नक्सली बताकर उनका आत्मसमर्पण करवा देती है, उन्हें कुछ हजार रूपए मिल जाते हैं, और पुलिस मानकर चलती है कि गांव में भूतपूर्व नक्सली कहलाने पर भी कोई नुकसान नहीं होता है, इसलिए यह पुलिस-नीति खराब नहीं है। सरकारों में कभी लोग आदिवासियों के अधिकारों को लेकर संवेदनशील नहीं रहते हैं, इसलिए वे आदिवासियों के किसी अपमान की सोचे बिना, उनका ऐसा समर्पण करवाते चलते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर चर्चा की एक वजह सामने आई कि नक्सलियों की आवाजाही वाले एक जिले बालोद में एसपी के पास पहुंचकर तीन लोगों ने अपने को एक माओवादी संगठन का सदस्य बताया, और आत्मसमर्पण की इच्छा जाहिर की। नक्सलियों के आत्मसमर्पण पर कोई सजा होती नहीं है, और कुछ रकम मिल जाती है, इसलिए वे फर्जी नक्सली बनकर सरेंडर कर रहे थे। पुलिस ने असलियत पता लगने पर इनके खिलाफ भी जुर्म दर्ज कर लिया है।
सरकार की किसी योजना का फायदा उठाने के लिए लोग किस हद तक चले जाते हैं, यह देखते ही बनता है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों जगहों पर सरकार की तरफ से लंबे समय से सामूहिक विवाह की योजना चल रही है जिसमें शादी करने वाले जोड़ों को सरकार की तरफ से बहुत सा घरेलू सामान भी तोहफे में मिलता है, और शायद कुछ रकम भी मिलती है। बहुत से ऐसे आयोजन रहते हैं जिनमें शामिल जोड़ों के बारे में पता लगता है कि वे पहले से शादीशुदा हैं, कुछ के तो बच्चे भी हैं, लेकिन सरकारी उपहार के चक्कर में वे एक बार फिर शादी के लिए खड़े हो जाते हैं। अभी कल-परसों ही किसी जगह की एक खबर थी कि एक जगह जमीन आबंटन में एक परिवार को एक भूखंड मिलना था। ऐसे में आठ शादीशुदा जोड़ों ने तुरंत तलाक की कार्रवाई पूरी की, और 16 भूखंड के हकदार बन गए। कुछ हफ्ते पहले राजस्थान का एक मामला सामने आया था कि वहां के एक इलाके में हजारों ऐसे नौजवान हैं जिन्होंने अपने आपको 70 या अधिक बरस का बताने वाले आधार कार्ड बनवा लिए हैं, और बरसों से वृद्धावस्था पेंशन ले रहे हैं। सरकार की किसी योजना का फायदा लेने के लिए हिन्दुस्तान के लोग किसी भी तरह का झूठा हलफनामा देने के लिए तैयार हो जाते हैं। ऐसे ही रंग-ढंग देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अभी दो दिन पहले ही यह कहा है कि मेडिकल कॉलेजों में देश के बाहर बसे हिन्दुस्तानियों के बच्चों के नाम पर शुरू किया गया एनआरआई कोटा खत्म किया जाए, क्योंकि इसका सिर्फ बेजा इस्तेमाल हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि किसी एनआरआई के दूर के रिश्तेदार को भी एनआरआई कोटे में दाखिला दिया जाना चाहिए जैसा कि पंजाब, हिमाचल, और यूपी करते आ रहे हैं।
अभी कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ की एक खबर छपी थी कि किस तरह एक गांव के बहुत सारे खानाबदोश परिवारों के लोगों से अपना अंतरंग संबंध बताते हुए किसी दूसरे प्रदेश के संपन्न लोग उनकी किडनी लेकर अपने मरीजों को लगवाने की कानूनी औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। और उनसे अपना घरोबा जताने के लिए वे उनकी झोपडिय़ों में बैठकर, उनके साथ खाना खाते हुए फोटो भी खींचा रहे हैं ताकि उनसे किडनी लेने को जायज ठहराया जा सके। भारत में अंग प्रत्यारोपण को लेकर कानून बहुत कड़ा है, लेकिन उसे धोखा देने के तरीके उससे अधिक बड़े हैं। जब तक सरकार कानून बना पाती है, तब तक जुर्म करने वाले लोग उसमें छेद ढूंढकर उसे चौड़ा करना शुरू कर देते हैं ताकि बिना सांस खींचे उसमें से निकल सकें। हर दिन कितने ही मामले छपते हैं जिनमें लोग धोखाधड़ी करके किसी जमीन को खरीद-बेच लेते हैं, और यह धोखा सिर्फ निजी जमीन को लेकर नहीं होता, अच्छे-खासे धर्मालु और आस्थावान लोग रात-दिन इस फेर में रहते हैं कि कैसे किसी मठ-मंदिर की जमीन, कैसे किसी गौशाला की जमीन को हड़पा जाए। इसमें बड़े-बड़े तथाकथित और स्वघोषित समाजसेवी और दानदाता भी रहते हैं, जो साल में एक बार गाय को चारा देते हुए फोटो खिंचवाते हैं, और उसके बाद 364 दिन गाय या अनाथ बच्चों के हक को लूटने की साजिश में जुटे रहते हैं।
कुल मिलाकर हिन्दुस्तान के लोगों का चरित्र ऐसा है कि ट्रेन टिकट में रियायत पाने के लिए लोग एक वक्त किसी स्वतंत्रता सेनानी को लेकर चलते थे ताकि उसके सहयोगी बनकर मुफ्त में या बहुत रियायत में सफर कर सकें। कई लोगों ने ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को सफर के सामान की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। रियायती या मुफ्त राशन पाने के लिए, अस्पताल में मुफ्त इलाज के लिए, अधिकतर लोग फर्जी आय प्रमाणपत्र बनवाने को बुरा नहीं मानते। कई संपन्न परिवार गरीबों वाला राशन कार्ड बनवाकर उसका अनाज अपने घरेलू कामगारों को दिलवाकर उन्हें कम मजदूरी देने की योजना भी बनाकर चलते हैं। यह देश अपने लोगों की ऐसी नीयत की वजह से दुनिया भर में बदनाम है कि यहां के लोग, कम से कम इस देश में रहते हुए, बुनियादी तौर पर बेईमान हैं। और बहुत से लोग इसलिए अभी तक बेईमान साबित नहीं हुए हैं कि वे इतने गरीब और कमजोर हैं कि उनको बेईमानी करने का मौका भी नहीं मिलता है। अब जो लोग करोड़पति हैं, वे लोग भी किसी जमीन की खरीदी-बिक्री में पैसे बचाने के लिए रिहायशी जमीन का भूउपयोग कृषि करवा लेते हैं, और फिर कम रेट की रजिस्ट्री करवाकर उसका फिर रिहायशी या कारोबारी इस्तेमाल करते हैं।
जिस भारत को अपनी संस्कृति, और अपने इतिहास पर इतना गर्व है, जिसमें राष्ट्रवाद को एकदम धारदार और हमलावर बनाकर रखा गया है, उस भारत में लोगों की रोजाना की सोच इस कदर भ्रष्ट और बेईमान कैसे है, इसके बारे में सोचना चाहिए। यहां लोग महंगी होटल में ठहरते ही सबसे पहले यह देखने लगते हैं कि वहां से क्या-क्या सामान चुराकर घर ले जाया जा सकता है, इस खतरनाक लत से छुटकारा इसलिए पाना चाहिए कि बहुत से हिन्दुस्तानी दूसरे देशों में सैलानी बनकर जाते हैं, और किसी होटल या सुपर बाजार में चोर की तरह पकड़ाते हैं। न पकड़ाने वाले लोग अपने दोस्तों के बीच फख्र से बताते हैं कि वे कहां-कहां से क्या-क्या चुरा लाए, कहां-कहां बच्चों की उम्र कम बताकर कौन सी बचत कर ली, और किस-किस तरह से कोई दूसरी बेईमानी कर ली।
हिन्दुस्तानी लोगों को अपनी सोच के बारे में आत्ममंथन करना चाहिए कि उन्हें ईमानदारी छू क्यों नहीं गई है? यह भी समझना चाहिए कि छोटी-छोटी बातों में परले दर्जे की बेईमानी इस देश में तो चल सकती है, दुनिया के सभ्य देशों में जाने पर ऐसे लोग कैसे-कैसे खतरे में पड़ते हैं।
हिरासत-हत्या गृहमंत्री को फख्र का सामान लगी है?
26 सितंबर 2024
महाराष्ट्र के बदलापुर की एक स्कूल में जब कुछ हफ्ते पहले दो छोटी बच्चियों से यौन शोषण का मामला सामने आया, और अक्षय शिंदे नाम का एक नौजवान उसमें पकड़ाया, तो बड़ा बवाल हुआ। ट्रेनें रोकी गईं, और जगह-जगह प्रदर्शन हुए। महाराष्ट्र की शिंदेसेना-भाजपा गठबंधन सरकार के लिए यह खास शर्मिंदगी का मौका इसलिए भी था कि इसी वक्त बंगाल के कोलकाता में सरकारी मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर से बलात्कार और उसकी हत्या का मामला देश भर को विचलित कर रहा था, और वह वहां की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के खिलाफ भाजपा के हाथ एक बड़ा मुद्दा लगा था। ऐसे में जब एक-एक करके कई भाजपा राज्यों में तरह-तरह से बलात्कार की घटनाएं आने लगीं तो भाजपा के हमलों की धार खत्म हो गई। अब महाराष्ट्र में बदलापुर की यह घटना एक नया नाटकीय मोड़ ले चुकी है क्योंकि बच्चियों के यौन शोषण के आरोपी अक्षय शिंदे की पुलिस हिरासत में हथकड़ी लगे-लगे पुलिस गोली से मौत हो गई, और इसे महाराष्ट्र के बाम्बे हाईकोर्ट ने बड़ी हैरानी और गंभीरता के साथ लिया है, और राज्य की पुलिस को कटघरे में खड़ा किया है। अदालत ने इस बात को मानने से इंकार कर दिया कि हथकड़ी लगे हुए मामूली कद-काठी के एक गिरफ्तार को चार-चार पुलिस अफसर नहीं संभाल सके, और उन्होंने आत्मरक्षा में इस आरोपी को गोली मारने की बात कही है जो कि पैरों पर मारने के बजाय सीधे सिर पर मारी गई है। अदालत ने पुलिस की कहानी को किसी भी तरह मानने से इंकार कर दिया है।
लेकिन हम पुलिस की फर्जी मुठभेड़ें बहुत से प्रदेशों में देखते रहते हैं, और आज की यह बात सिर्फ पुलिस मुठभेड़ तक सीमित नहीं है। दरअसल जैसे ही यह मुठभेड़ ‘मौत’ हुई, वैसे ही महाराष्ट्र में मुम्बई में कई जगहों पर गृहमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस के होर्डिंग लग गए जो फडऩवीस को पिस्तौल और मशीनगन लिए हुए दिखा रहे हैं, और होर्डिंग पर बस दो शब्द लिखे हैं- बदला पूरा। अब सवाल यह उठता है कि संविधान की शपथ लेकर काम संभालने वाली सरकारें अगर संविधान के ठीक खिलाफ जाकर अंधाधुंध मुठभेड़-हत्याएं करती हैं, बुलडोजरी इंसाफ करती हैं, तो कम से कम संविधान की शपथ दिलवाना बंद कर देना चाहिए। अगर एक निहत्थे, और हथकड़ी से जकड़े हुए मामूली से नौजवान को चार-चार हथियारबंद पुलिसवाले काबू नहीं कर सकते, और सिर में गोली मारना ही उनके पास अकेला विकल्प है, तो यह जाहिर है कि यह उस आरोपी को काबू में रखने के लिए नहीं, गृहमंत्री को होर्डिंग पर अपनी कामयाबी दिखाने का मौका देने के लिए किया गया काम है।
यह सिलसिला बहुत ही भयानक है। यह वही मुम्बई है जहां पर पुलिस के कुछ अफसर रिवॉल्वर का ट्रिगर दबाने के ऐसे शौकीन हो गए थे कि एक-एक के नाम दर्जनों मुठभेड़-हत्याओं का रिकॉर्ड दर्ज है। यह एक अलग बात है कि ऐसे ही एक सबसे चर्चित अफसर प्रदीप शर्मा को अभी फर्जी मुठभेड़-हत्या में उम्रकैद भी हुई है। इसके बावजूद पुलिस में हमेशा ही कुछ ऐसे अफसर रहते हैं जो कि पहले तो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की शोहरत हासिल करते हैं, और उसके बाद वे अंडरवल्र्ड के किसी एक गिरोह के साथ मिलकर दूसरे गिरोह के लोगों को मार गिराने की सुपारी उठाते हैं, तो कभी जमीनों के धंधे में माफिया बन जाते हैं। पुलिस को जब कभी किसी गैरकानूनी काम के लिए बढ़ावा दिया जाता है, तो पुलिस सिर्फ उसी काम को करके नहीं थमती है। पुलिस उसके आगे बढ़ते हुए अपनी मर्जी के भी कई काम करती है, और बहुत से मामलों में वह धंधेबाज होकर भाड़े के हत्यारे का काम भी करने लगती है, रिवॉल्वर का डर दिखाकर वह वसूली-उगाही में भी लग जाती है।
हमारा ख्याल है कि बाम्बे हाईकोर्ट ने इस ताजा मुठभेड़-हत्या की कमजोर नब्ज पर हाथ धर दिया है, और जनता के बीच वाहवाही पाने के लिए करवाई गई राजनीतिक हत्याओं की ऐसी तेज जांच ही होनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि 2019 में हैदराबाद में एक 26 बरस की डॉक्टर से बलात्कार, और उसके कत्ल के मामले में गिरफ्तार चार लोगों को पुलिस ने जुर्म की जगह ले जाते हुए नेशनल हाईवे के किनारे एक पुल के नीचे मुठभेड़ बताकर मार डाला था। बाद में एक न्यायिक जांच आयोग ने इसमें शामिल पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी, लेकिन उसे तेलंगाना हाईकोर्ट ने मई 2024 में स्टे कर दिया था। और जनता के बीच इन चार मुठभेड़-हत्याओं को लेकर पुलिस की ऐसी वाहवाही हुई थी कि पुलिस पर फूल बरसाए गए थे।
पुलिस को इस हद तक हत्यारा बनाने का एक बड़ा नुकसान यह होता है कि उसका अनुशासन पूरी तरह खत्म हो जाता है, वह अराजक हो जाती है, और चूंकि वह खुद जुर्म करने लगती है इसलिए उसे बाकी मुजरिम उतने बुरे भी नहीं लगते। लेकिन मुजरिम बनने के बाद पुलिस दूसरे कई किस्म के जुर्म भी करने लगती हैं। पंजाब में आतंक के दिनों में केपीएस गिल की पुलिस ने मानवाधिकारों को जितना कुचला था, जितने बेकसूर लोगों का कत्ल किया था, उसमें आज बहुत सारे पुलिसवाले कैद भुगत रहे हैं। अब सीसीटीवी कैमरों, मोबाइल फोन लोकेशन जैसे बहुत से वैज्ञानिक सुबूतों का वक्त है, और ऐसे में पुलिस को भी जुर्म करने से बचना चाहिए, और नेताओं को पुलिस से कत्ल करवाने से परहेज करना चाहिए। कुछ ऐसी हिन्दी फिल्में बनी हैं जिनमें कोई पुलिस अफसर ही मंत्रियों और नेताओं का कत्ल करते दिखते हैं।
महाराष्ट्र में गृहमंत्री अगर बदलापुर के आरोपी की पुलिस हिरासत में इस तरह हुई हत्या के बाद बदला-पूरा के होर्डिंग लगवाते हैं, या उनकी ऐसी हथियारबंद तस्वीर के साथ ऐसे होर्डिंग लगते हैं, तो यह देश में कानून के राज की बहुत बड़ी हेठी है। अदालत को तो ऐसे होर्डिंग की जांच भी करवानी चाहिए कि वे कैसे लगे हैं, और कैसे यह माना जा रहा है कि गृहमंत्री ने यह बदलापुर का बदला पूरा किया है। लोकतंत्र में हिरासत के मुजरिम की हत्या अगर किसी नेता को अपने फख्र का सामान लगती है, तो यह शर्मनाक नौबत है। इसका मतलब है कि जनता के मन में भी कानून का सम्मान खत्म हो गया है, और वह बंदूक की नली से निकले इंसाफ पर तालियां बजाती है। फिर सरकार और नक्सलियों में फर्क क्या रह गया, वे भी तो अपने हत्यारे फैसलों को बंदूक की नली से निकली क्रांति बताते हैं।
कंगना का अगला गलत बयान उनकी नहीं, पार्टी की गलती कहलाएगी...
25 सितंबर 2024
एक पेड़ या पौधे के फल के ऐसे रेशे रहते हैं जिन्हें किसी पर छिडक़ दिया जाए तो उन्हें लगातार खुजली आने लगती है। छत्तीसगढ़ के इलाके में उसे केंवाच कहा जाता है, और शरारत करने वाले लोग उसे होली के मौके पर गुलाल में मिलाकर, या वैसे ही किसी पर छिडक़ देते हैं, और वे घंटों तक इस खुजली से जूझते रहते हैं। कुछ लोगों के मुंह में कुदरत केंवाच डालकर भेजती है, और जब तक वे कोई नाजायज और निहायत गैरजरूरी बात बोल न लें, तब तक मुंह की खुजली जारी रहती है। पिछले एक महीने में पार्टी की जमकर झिडक़ी खाने के बाद भी ताजा-ताजा सांसद बनी हुई कंगना रनौत का हाल कुछ ऐसा ही है। जिन किसानों के बारे में कंगना के हिंसक बयानों पर पार्टी ने अपने आपको उनसे अलग कर लिया था, और सार्वजनिक रूप से कहा था कि कंगना पार्टी की तरफ से कोई भी बयान देने का हक नहीं रखती हैं, उसी कंगना ने अब फिर किसानों के बारे में एक नया बखेड़ा छेड़ा है। उन्होंने यह कहा है कि निरस्त किए गए किसान कानूनों को वापिस लाना चाहिए, और किसानों को खुद इसकी मांग करनी चाहिए। देश में महीनों तक चले किसान आंदोलन के बाद शायद सात सौ से अधिक आंदोलनकारियों की मौत के बाद मोदी सरकार को पहली बार पूरी शर्मिंदगी से अपने बाहुबल से संसद में पास करवाए गए किसान कानूनों को वापिस लेना पड़ा था। और तब से अब तक भाजपा और मोदी किसान कानूनों से जुड़ा यह अप्रिय सिलसिला याद भी करना नहीं चाहते हैं। लेकिन बिना किसी मौके के कंगना ने एक बार फिर अपनी औकात से बढक़र, बेवजह किसान कानूनों की याद दिला दी, और पार्टी के लिए एक बड़ी असुविधा पैदा कर दी। पार्टी के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता को सार्वजनिक रूप से कंगना की सोच का खंडन करना पड़ा, और कहना पड़ा कि उनका यह बयान कहीं से भी पार्टी की नीति नहीं है, और पार्टी अपने को इससे अलग करती है। कंगना की समझ को लेकर लोगों के बीच कई तरह का शक हो सकता है, लेकिन उनका परिचय ही बताता है कि वे 38 बरस की हैं। राजनीतिक समझ शून्य व्यक्ति भी इस उम्र में आकर, और एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के सैकड़ों सांसदों में से एक बनकर बार-बार पार्टी की सार्वजनिक झिडक़ी, और एयरपोर्ट पर एक महिला किसान आंदोलनकारी बेटी की थप्पड़ खाने से बचने लायक समझ वाली तो होना चाहिए, लेकिन कंगना को यह सहज समझ शायद छू भी नहीं गई है। इसके अलावा ऐसा भी लगता है कि वे भाजपा के भीतर स्मृति ईरानी के छोड़े गए एक विशाल शून्य को भरने की हड़बड़ी में हैं, और इसीलिए बिना सोचे-विचारे पार्टी की फजीहत करने का शगल पाल बैठी हैं।
इस तरह के बयान देने वाले कुछ और भी लोग रहते हैं जो मुंह पहले खोलते हैं, और दिमाग का इस्तेमाल बाद में करते हैं, अगर दिमाग रहता है तो। सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग अश्लील, हिंसक, भडक़ाऊ, और विवादास्पद बयान देने के शौकीन रहते हैं। इनकी वजह से कहीं चुनाव आयोग उन्हें नोटिस देता है, तो कहीं सुप्रीम कोर्ट उन पर हेट-स्पीच की एफआईआर करने को कहता है। यह सिलसिला हाल के दशकों में कुछ तेज हो गया है। पहले तो इतना बुरा हाल नहीं था, लोग अधिक सोच-समझकर बोलते थे, लेकिन इन दिनों ऐसा लगता है कि कैमरों के सामने बोल लेने के बाद, सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देने के बाद लोग अपनी कही बातों पर अगर सोचते होंगे, तो सोचते होंगे। ऐसा लगता है कि आज की टेक्नॉलॉजी ने लोगों की सोच को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। पिछले कुछ दशकों में मोबाइल फोन पर एसएमएस भेजने की ऐसी तकनीक लोगों को हासिल हुई कि वे कुछ पलों में मैसेज टाईप करके भेज देते हैं, जो कि पल भर में पहुंच जाता है, और कुछ मिनटों में शायद उसका जवाब भी आ जाता है। बात और आगे बढ़ गई, और अभी कुछ बरस से तो वॉट्सऐप जैसे कई मैसेंजरों पर लोग वीडियो कॉल पर बात करते हैं, अपनी आवाज में संदेश रिकॉर्ड करके भेज देते हैं, कोई वीडियो, फोटो, या लिखित संदेश पल भर में किसी एक को या सैकड़ों लोगों को भेज देते हैं। नतीजा यह है कि एक वक्त पोस्टकार्ड की रफ्तार से जाने वाले संदेश अब पोस्टकार्ड पर पता लिखने जितनी देर में दुनिया के किसी भी कोने से जवाब भी ला देते हैं। लोग अपनी बात सोशल मीडिया पर पल भर में पोस्ट कर देते हैं, और जब तक उसके बारे में कोई सफाई देने की बात उन्हें सूझे, तब तक तो सैकड़ों लोग उसे आगे बढ़ा चुके रहते हैं, धिक्कार चुके रहते हैं। जब दुनिया में अपनी बात को फैलाना बिजली की रफ्तार से हो रहा है, तो लोगों को अपनी जुबान और उंगलियों को कुछ काबू में रखना चाहिए। खासकर उन लोगों को जो एक बड़े संगठन या संस्थान का हिस्सा हैं।
यह बात सिर्फ राजनीति के लोगों की नहीं है, जिंदगी के हर दायरे के लोगों पर यह लागू होती है। जो विकसित और सभ्य लोकतंत्र हैं, वहां किसी कंपनी के कर्मचारी अगर नफरती, हिंसक, नस्लभेदी बात पोस्ट करते मिलते हैं, तो कंपनियां पल भर में उन्हें निकाल बाहर करती हैं। यह एक अलग बात है कि हिन्दुस्तान जैसे देश में ऐसे लोग काफी लंबे समय तक खप जाते हैं, बच जाते हैं। कंगना रनौत को भाजपा में आने के बाद कई मौकों पर दिए गए ऊटपटांग बयानों के पहले यह सहूलियत हासिल थी कि वे पार्टी के किसी बड़े नेता या प्रवक्ता से अपनी सोच पर पार्टी का रूख समझ लेतीं। लेकिन उन्होंने इतनी जहमत नहीं उठाई। नतीजा यह हुआ कि एक महीने में शायद दूसरी-तीसरी बार पार्टी को यह सफाई देनी पड़ रही है कि कंगना की कही बातें उनकी अपनी शौच है, वह पार्टी की सोच नहीं है। सार्वजनिक जीवन के किसी भी व्यक्ति के लिए यह बड़ी शर्मिंदगी की बात रहनी चाहिए थी, और पहली सार्वजनिक झिडक़ी के बाद कंगना को यह काम अपने कमसमझ वाले दिल-दिमाग के भीतर ही करना था। लेकिन ऐसा लगता है कि वे किसी भी कीमत पर सार्वजनिक जीवन में एक अधिक बड़ी मौजूदगी दर्ज करवाना चाहती हैं। जिंदगी में टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल ने लोगों के फैसले लेने, काम करने, बात करने, इन सबकी रफ्तार सैकड़ों गुना तेज कर दी है, लेकिन टेक्नॉलॉजी की रफ्तार से इंसानी समझ का विकास नहीं हुआ है, उसमें कई और पीढिय़ां लग जाएंगी। ऐसे में बेवकूफी की बात अब मानो लाउडस्पीकरों पर गूंजती है, और फोन के मैसेंजरों से पल भर में दुनिया भर में पहुंच जाती है। लोगों को अपनी बेवकूफी की नुमाइश नहीं करना चाहिए, और बाकी लोगों में एक गलतफहमी बने रहने देना चाहिए।
अब यहां पर एक छोटी
सी बात हमें परेशान करती है कि हरियाणा चुनाव के ठीक पहले जिस तरह से बृजभूषण शरण सिंह
पहलवान लड़कियों को बदनाम करने और धमकाने में सार्वजनिक रूप से जुट गए थे, और भाजपा
को उन्हें समझाईश देकर चुप कराना पड़ा था, कुछ वैसा ही कंगना भी बार-बार कर रही हैं।
ऐसा लगता है कि सबसे बड़ी बन गई इस पार्टी को लीडरशिप-विकास की एक ट्रेनिंग अपने लोगों
को देनी चाहिए, जिसमें कम से कम पार्टी की नीतियों को, और नेता-कार्यकर्ता को उसके
अधिकार क्षेत्र को ठीक से समझाना चाहिए। अगर कंगना अगले कुछ महीनों में फिर अपने मुंह
की खुजली दूर करते हुए कोई नाजायज और गैरजरूरी बयान देती हैं, तो इसमें उनकी गलती नहीं
रहेगी, पार्टी की ही गलती रहेगी। किसी नेता के सिलसिलेवार गलत काम गलती नहीं रहते,
वे गलत काम ही रहते हैं। और यह बात नेता के अलावा पार्टी पर भी लागू होती है।
सडक़ों से जानवर हटाने हाईकोर्ट जुटा लाठी लेकर, सरकार जिम्मा पूरा करे...
24 सितंबर 2024
कल एक बार फिर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट राज्य सरकार और नेशनल हाईवे अथॉरिटी पर खफा हुआ है क्योंकि राजमार्गों से जानवरों को हटाने में ये पूरी तरह नाकामयाब रहे हैं। एक जनहित याचिका पर सडक़ों पर जानवरों की वजह से होने वाले हादसों का मामला उठाया गया था, और मुख्य न्यायाधीश वाली एक दो जजों की बेंच इसकी सुनवाई कर रही है। वह साल भर से सरकार को बोलते आ रही है कि सडक़ों से जानवरों को हटाया जाए, और उनके मालिक उन्हें इस तरह सडक़ों पर छोड़ देते हैं, इसके लिए उन पर जुर्माना लगाया जाए। ऐसे जानवर न सिर्फ राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजमार्गों पर डेरा डाले रहते हैं, बल्कि वे शहरों के भीतर की सडक़ों पर भी ट्रैफिक रोकते हुए पड़े या खड़े रहते हैं। इसके अलावा शहर की कॉलोनियों में भी लोगों से कुछ खाना मिलने की उम्मीद में गायों और सांडों का डेरा लगे ही रहता है। इस बीच कल सुबह ही बिलासपुर-कोरबा के बीच एक तेज रफ्तार मालवाहक की चपेट में 20 से अधिक जानवर आ गए, जिनमें 18 की मौके पर ही मौत हो गई। इसके ड्राइवर को गिरफ्तार किया गया है। जिस गौवंश को लेकर जनता तुरंत उत्तेजित हो जाती है, वह पूरे प्रदेश में सडक़ों पर डेरा डाले हुए है, लेकिन उसका कोई इंतजाम हो नहीं पा रहा है।
छत्तीसगढ़ के साथ एक दिक्कत यह है कि पिछले पूरे पांच बरस कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार गौशाला, गौठान, गौवंश, गोबर, गोमूत्र जैसे कई नारे लगाती रही, हजारों करोड़ रूपए सालाना इन पर खर्च भी किया गया, लेकिन जो असली जमीनी दिक्कत थी, वह ज्यों की त्यों बनी रही। न सडक़ों से जानवर हटे, और न ही किसानों के खेतों में अवारा जानवरों का फसलों का हमला ही थमा। अभी हालत यह है कि कुछ जगहों पर किसान अवारा मवेशियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं कि वे फसल बर्बाद कर रहे हैं। जशपुर में सैकड़ों किसानों ने सडक़ जाम कर दी कि अवारा मवेशी उनकी साल भर की फसल को खा जा रहे हैं, और अगर यही सिलसिला चलते रहा तो किसानों के भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। ऐसी नौबत उत्तरप्रदेश में भी हर जगह देखने मिल रही है जहां पर गौवंश को कसाईघर नहीं जाने दिया जाता, और उनकी आबादी बढ़ती जा रही है। लेकिन खेतों को बचाने के लिए जानवरों को कसाईघर भेजना जरूरी नहीं है, उनके लिए अलग से बाड़े बनाकर उन्हें वहां रखना एक समाधान हो सकता है, लेकिन न पिछली सरकार के कार्यकाल में यह हुआ, और न ही अभी होते दिख रहा है।
गाय को मां मानना बड़ी अच्छी बात है, लेकिन यह मां मोटेतौर पर घूरों पर गंदगी खाकर जिंदा है, और उसके पेट से 25-50 किलो पॉलीथीन सर्जरी में निकलता है। सरकारी अनुदान से चलने वाली गौशालाओं का भ्रष्टाचार इतना भयानक है कि भाजपा की रमन सिंह सरकार के वक्त ऐसी अनुदान प्राप्त गौशालाओं में दर्जनों गायों के भूख से मरने के मामले सामने आए थे। लोगों की सामान्य जानकारी भी यही है कि गौशाला चलाने के नाम पर ऐसी संस्थाओं के पदाधिकारी पैसों की अफरा-तफरी करके खुद तो हट्टे-कट्टे सांड सरीखे हो जाते हैं, और गाएं भूख से मरती रहती हैं। इसलिए सरकार गौशाला या गाय के लिए शरणस्थली तो बना सकती है, उसे चलाने का मतलब अंधाधुंध भ्रष्टाचार होगा। आज जब इंसानी मरीजों वाले सरकारी अस्पतालों में मनमाना भ्रष्टाचार चलता है, तो बेजुबान जानवरों के हिस्से की घास खाकर इंसान ही मोटे होते रहेंगे। लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से किसी समाधान या इलाज पर काम न करने का मतलब तो देश-प्रदेश को बंद करना हो जाएगा क्योंकि यहां तो हर मामले में, हर काम में भ्रष्टाचार रहता ही है। इसलिए इस चर्चा से परे राज्य सरकार, पंचायत और म्युनिसिपल को जानवरों को रखने के बाड़े बनाने पड़ेंगे, ताकि सडक़ों से जानवर हटें।
आज जब सडक़ पर किसी जानवर को किसी गाड़ी से चोट लग जाने पर उस गाड़ी के मालक-चालक के खिलाफ जुर्म दर्ज होता है, तो उससे एक बुनियादी सवाल यह भी खड़ा होता है कि सडक़ पर किसका हक है, वह किस इस्तेमाल के लिए बनी है? सडक़ पर गाडिय़ों के सामने जानवरों के आने पर या तो उन जानवरों के मालिकों के खिलाफ जुर्म दर्ज होना चाहिए, या फिर सडक़ के रख-रखाव के जिम्मेदार विभाग या पंचायत-म्युनिसिपल पर कार्रवाई होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में किसी गाड़ी से किसी जानवर को बिना लापरवाही के भी ठोकर लग जाए तो पशुओं पर अत्याचार का मामला दर्ज होता है, और कई मामलों में मौके पर ही गौभक्त होने का दावा करने वाले लोग सडक़ पर इंसाफ कर देते हैं। यह नौबत कानून की बुनियादी समझ के खिलाफ है। सडक़ों पर चलने के लिए लोग टैक्स देते हैं, और इसके बाद सडक़ों को ठीक रखने, वहां से जानवरों की बाधा हटाने का जिम्मा सरकार का होता है। लेकिन सरकार अपना नियमित कामकाज नहीं करती है, जिम्मेदारी नहीं निभाती है, तब जाकर अदालत को दखल देनी पड़ती है।
छत्तीसगढ़ में बरसों के बाद यह गणेशोत्सव ऐसा निकला है जिसमें लाउडस्पीकरों का हमला कम हुआ है। हाईकोर्ट लगातार लाठी लेकर बैठा था, और अपने आदेशों पर अमल करवाने के लिए बार-बार चेतावनी जारी कर रहा था। जब अफसरों को अदालत की अवमानना में जेल जाने का खतरा नजर आया, तब जाकर लाउडस्पीकरों की गुंडागर्दी पर काबू किया गया। लेकिन सवाल यह है कि कानून पर अमल की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को सरकार कब तक अनदेखा करती रहेगी, और कब तक हाईकोर्ट उन्हीं मुद्दों को लेकर लगातार सरकार के पीछे पड़े रहेगा? राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं को अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए, सडक़ों पर जानवरों की मौजूदगी से बहुत से इंसानों की मौत भी होती है जिसके लिए इन सडक़ों के रख-रखाव के जिम्मेदार विभाग ही मुजरिम हैं। सरकार को अदालती कटघरे में एक ही मामले पर बार-बार इस तरह खड़े होने से बचना चाहिए। यह नौबत बड़ी शर्मिंदगी की है, और जानवरों के जिन मालिकों को अपनी कानूनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है, उनकी गिरफ्तारी भी शुरू होनी चाहिए क्योंकि वे जनसुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा खड़ा करते हैं। अब चूंकि जानवरों का कसाईघर जाना बंद कर दिया गया है, इसलिए सरकार को ही इस बढ़ती हुई आबादी का इंतजाम करना होगा।
वातावरण और खानपान से हजारों किस्म के रसायनों का इंसानी बदन में बना डेरा
23 सितंबर 2024
एक अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित एक शोधपत्र के मुताबिक खानपान के सामानों की पैकिंग से इंसान के शरीर में पहुंचने वाले रसायनों की जांच करने पर 36 सौ से अधिक ऐसे केमिकल मिले हैं। ये केमिकल इंसान के शरीर के हर हिस्से में पहुंच रहे हैं, और इनसे होने वाले नुकसान का पूरा अंदाज लगाना आसान नहीं है। लेकिन इनमें से कई रसायन बहुत ही चिंताजनक खतरनाक किस्म के हैं, और ये इंसान के खून, पेशाब, और मां के दूध में भी मिल रहे हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले हमने माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण के बारे में इसी जगह पर लिखा था, और लोगों के रोज के कपड़ों, पानी, और खानपान के बोतल और डिब्बों से निकलने वाले माइक्रो प्लास्टिक इंसान के बदन के हर हिस्से में पहुंच चुके हैं, और दुनिया के सबसे साफ-सुथरे, और प्रदूषण मुक्त देशों में भी एकदम स्वस्थ वालंटियरों में, 22 में से 17 के खून के नमूनों में माइक्रो प्लास्टिक निकले हैं। अब उसके बाद की यह ताजा खबर और अधिक फिक्र पैदा करती है कि खानपान की पैकिंग से 36 सौ से अधिक किस्म के रसायन बदन में पहुंचे हुए मिले हैं।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार लोगों को इस बात के लिए सावधान करते हैं कि बाजार का खाना कम से कम खाना चाहिए। फैक्ट्रियों में बने खाने-पीने के सामान बहुत अलग-अलग किस्मों से नुकसानदेह होते हैं, उनमें नमक, शक्कर, स्वाद बढ़ाने वाले रसायन, तरह-तरह के तेल-घी-मक्खन, खराब होने से बचाने के लिए प्रिजरवेटिव, और भी न जाने क्या-क्या रहता है। हम खासकर बच्चों के संदर्भ में यह बात लिखते हैं कि घर के बने हुए खाने-पीने के सामान उनके लिए सबसे अच्छे रहते हैं, और बाहर के सामान नुकसानदेह होते हैं। अब अगर इतने किस्म के रसायन खून और दूध तक पहुंच जा रहे हैं, तो मां के शरीर से बच्चे के पैदा होने के पहले खून आते-जाते रहता है, और बच्चे के पैदा होने के बाद वे मां के दूध पर ही जिंदा रहते हैं। अब अगर इंसान के शरीर में खून के रास्ते दिल और दिमाग तक माइक्रो प्लास्टिक पहुंचते हैं, इतने किस्म के रसायन पहुंचते हैं, तो इसके खतरों को समझने की जरूरत है। ये खतरे हवा और पानी के प्रदूषण से, सामानों की पैकिंग से, फल-सब्जी, और खाए जाने वाले प्राणियों से लगातार बने रहते हैं। आज ही एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह सडक़ों पर चलने वाली गाडिय़ों के टायर घिसने से निकलने वाले बहुत बारीक कण सांसों के रास्ते सीधे बदन में पहुंचते हैं, और जब सडक़ों से बहता पानी नदी, तालाब, और खेतों में जाता है, तो यह घिसा हुआ रबर पानी और फल-सब्जियों के रास्ते भी कई दूसरे रसायनों से मिलकर इंसान के बदन में दाखिल होता है।
चूंकि जब तक किसी प्रदूषण की गंध न आए, या धुएं की शक्ल में वह न दिखे, उसका स्वाद न आए, या आंखें न जलें, हमें न प्रदूषण दिखता, न कोई खतरा दिखता। नतीजा यह होता है कि जब तक प्रदूषण हमारे दिल की धमनियों में जम चुका रहता है, दिमाग में पहुंच चुका रहता है, अजन्मे बच्चों में पहुंच जाता है, तब तक हमें इसका अहसास भी नहीं होता। अब ऐसे में लोगों के बीच प्रदूषण को लेकर निजी जागरूकता की न तो कोई संभावना है, और न ही उस जागरूकता का कोई इस्तेमाल है। यह तो सरकारों के देखने की बात है कि किस तरह के प्रदूषण को कैसे घटाया जा सकता है। लोगों की निजी जागरूकता इतने काम आ सकती है कि जिन चीजों से रसायन बदन में पहुंचते हैं, उन्हें खरीदना बंद करें, खाना-पीना बंद करें, और उनका इस्तेमाल कम से कम करें। एक तरफ लोगों में जागरूकता की कमी है, दूसरी तरफ बाजार का हमला इतना आक्रामक है कि वह लोगों को अंधाधुंध रसायनों, और खतरनाक पैकिंग के सामान खरीदने के लिए झोंक देता है। दुनिया के कई जिम्मेदार देशों ने जंक फूड कहे जाने वाले चीजों के इश्तहार बच्चों के कार्यक्रमों में दिखाना रोका जा रहा है। इसमें टीवी के इश्तहार भी हैं, और ऑनलाईन इश्तहार भी हैं, और बच्चे इन दोनों को देखकर नुकसानदेह खानपान की तरफ आकर्षित होते हैं। फिर हमें ऐसी मिसालों के लिए पश्चिम के संपन्न और उदार अर्थव्यवस्था के देशों की तरफ देखने की जरूरत नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तान में भी अब घर बैठे मोबाइल ऐप से बच्चे भी खाना बुलाना सीख गए हैं, तो तरह-तरह के रसायनों वाला खान-पान, तरह-तरह की लापरवाह और खतरनाक पैकिंग में घर पहुंचने लगा है, और जागरूकता से परे के मां-बाप को यह सहूलियत का भी लगने लगा है कि कुछ पकाना नहीं पड़ता, और बच्चे बिना परेशान किए खा लेते हैं।
बाहरी खान-पान का यह सिलसिला बढ़ते ही जा रहा है। ऐसे में जागरूकता बढ़ाना कुछ हद तक मददगार हो सकता है, लेकिन इसके साथ-साथ सरकारों को भी पैकिंग-मटेरियल को लेकर कानून कड़े करने होंगे। आज भी बड़े-बड़े रेस्त्रां के खाने की पैकिंग का प्लास्टिक फूड ग्रेड का नहीं होता। जो बड़े-बड़े ब्रांड पुट्ठे के डिब्बों में फास्ट फूड भेजते हैं, वे भी खानपान के लायक नहीं रहते। जब घटिया प्लास्टिक में गर्म और खौलता खाना पहुंचता है, या उसी को दुबारा माइक्रोवेव में गर्म किया जाता है, तो उससे फिर कई तरह के रसायन पैदा होते हैं। भारत जैसे देश में न ग्राहक की जागरूकता है, न ग्राहक के बचाव के लिए कानून कड़े हैं, न किसी कानून पर अमल ईमानदारी से होता है। इसके बाद हर किस्म के संगठित उद्योग और कारोबार की लॉबी इतनी मजबूत रहती है कि वह सरकार से पैकिंग पर चेतावनी और जानकारी छापने से बच भी जाती है।
आज तरह-तरह के प्रदूषण के नुकसान लोगों को अपनी खुद की पीढ़ी में भी सांस की गंभीर बीमारियों की शक्ल में दिख रहे हैं, लेकिन खान-पान में पहुंचने वाले, या पानी के रास्ते मिलने वाले माइक्रो प्लास्टिक, और रसायन की शिनाख्त आसान नहीं है। इसलिए जब कई पीढिय़ां खतरे में पड़ चुकी होंगी, तब जाकर हो सकता है कि लोगों की नींद खुले। तब तक नुकसान इतना हो चुका रहेगा कि वह अगली कई पीढिय़ों को नुकसान पहुंचाना जारी रखेगा। आज जब हिन्दुस्तान जैसे देश में लोग आंखों से दिखते प्रदूषण को भी अनदेखा करके रहने में कोई दिक्कत महसूस नहीं करते, तो ऐसा समाज बड़े लंबे नुकसान को न्यौता दे चुका है। देखें यह बर्बादी कहां तक पहुंचती है।
किसी मवाली की ताकत के पीछे के नेता को कभी न भूलें
22 सितंबर 2024
अभी एक ऐसे सूदखोर को पकड़ा गया जो कि बंदूक की नोंक पर एक कारोबारी का अपहरण करके उससे पीटकर अपना कर्ज वसूल रहा था। यह साहूकार इतने मोटे ब्याज पर पैसा देता था कि उस पर पांच लाख कर्ज देकर तीस लाख वसूल लेने का मामला भी दर्ज है। उसने पहले भी एक कर्जदार कारोबारी पर ऐसा हमला किया था, और उसका अपहरण करके हिंसा करने के आरोप में उस पर हत्या के प्रयास का मामला चल रहा था। अब पुलिस ने उसे ऐसे कई मामलों में गिरफ्तार किया है तो पता लग रहा है कि वह एक जाति के संगठन के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष का भाई है।
कहीं धर्म के आधार पर, कहीं जाति के आधार पर, और कहीं क्षेत्रीयता के आधार पर ऐसे दर्जनों संगठन चलते हैं जो मोटेतौर पर लैटरपैड पर जिंदा रहते हैं, लेकिन बीच-बीच में कहीं पर चर्चित, विवादास्पद, और बनते कोशिश हिंसक प्रदर्शन करके अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहते हैं। वे बात किसी धर्म या जाति की हिमायत की करते हैं, लेकिन उनकी हरकतें नफरत फैलाने की रहती हैं, और वे एक काल्पनिक दुश्मन खड़ा करके या किसी धर्म या जाति को दुश्मन करार देकर अपने आपको एक रक्षक की तरह पेश करते हैं, और इस ताकत को हासिल करके वे जिंदगी के बाकी तमाम दायरों में भक्षक की तरह वसूली और उगाही करते हैं।
हम देखते हैं कि तरह-तरह के मुद्दों को लेकर कागजी संगठन बनते हैं, कहीं पर्यावरण के नाम पर, कहीं भ्रष्टाचार पकडऩे या खत्म करने के नाम पर, कहीं मानवाधिकार बचाने के नाम पर, तो कहीं महिला अधिकारों के लिए ऐसी नेतागिरी चलती रहती है जिससे कि अखबारों में नाम आता रहे, किसी प्रदर्शन के बहाने उनका चेहरा किसी छोटे-मोटे समाचार चैनल पर दिखता रहे, या आजकल तो अपना खुद का यूट्यूब चैनल बनाकर पुलिस से लेकर मुजरिम तक सब अपने आपको हीरो साबित करते रहते हैं, ऐसे में कल तक के कागजी संगठनों को आज एक साधारण मोबाइल फोन से बनने वाले वीडियो के माध्यम से समाज का नेता बनने की एक पूरी तरह मुफ्त सहूलियत हासिल रहती है।
ऐसे कोई भी संगठन लगातार इस ताक में रहते हैं कि कब किसी फिल्म का लेकर धर्म और जाति का बखेड़ा खड़ा किया जाए, और उस बहाने खबरों में रहा जाए, वसूली और उगाही की जाए, और उससे हासिल शोहरत से कुछ अधिक ऊंचे दर्जे के जुर्म भी किए जाएं। यह एक पूरी तरह से कामयाब साबित सिलसिला है, और इसका इस्तेमाल अनगिनत लोग करते हैं। हमने तो कभी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नाम पर दशकों तक उगाही करने वाला संगठन देखा है, तो जब नए छोटे राज्य नहीं बने थे, तब राज्य बनाने के नाम पर ऐसे संगठनों की भरमार थी।
इनमें सबसे अधिक घातक, लेकिन जुर्म में सबसे अधिक मददगार और कामयाब संगठन धर्म के आधार पर बनते हैं, और अगर वे किसी दूसरे धर्म के खिलाफ हैं, कट्टर हैं, हिंसक हैं, तो फिर उसके नेता जल्द ही यह उम्मीद कर सकते हैं कि कुछ बड़े अपराधों में थोड़े-थोड़े वक्त के लिए जेल जाकर, जमानत पर बाहर आकर, वे जमीन-मकान खाली करवाने का धंधा भी कर सकते हैं, और किसी दूसरे की जमीन पर कब्जा भी कर सकते हैं। किसी शराबखाने के देर रात तक खुले रखने के खिलाफ वे रोजाना बयान जारी कर सकते हैं, पुलिस को लिखकर दे सकते हैं, और अपना खुद का हफ्ता बंधवा सकते हैं। ये लोग सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई जानकारी को लेकर, अपने खुद के समाचार पोर्टल बनाकर, खुद के यूट्यूब चैनल शुरू करके, या फेसबुक पर किसी के खिलाफ अभियान चला सकते हैं, और उसे अपना कारोबार भी बना सकते हैं।
अभी जो साहूकार पकड़ाया है, वह एक जाति की सेना के अध्यक्ष का भाई है। इस जाति की यह सेना कहीं राजपूत सम्मान को लेकर सडक़ों पर रहती है, या किसी फिल्म के किरदार या कहानी को लेकर टॉकीजों में मामूली तोडफ़ोड़ करके असाधारण कवरेज पा जाती है, और फिर उस ताकत से उसके लोग तरह-तरह की गुंडागर्दी करते हैं। बहुत से संगठन समाज में आतंक पैदा करने के लिए ऐसा काम करते हैं, और उसके बाद किसी त्यौहार पर, या किसी समाज सेवा के काम के बहाने बाजार से रंगदारी-टैक्स वसूलते हैं।
बहुत सी पार्टियों के नेता ऐसे मवालियों को पालकर रखते हैं क्योंकि उन्हें चुनावों के बीच भी गुंडागर्दी के लिए ऐसे लोगों की जरूरत रहती है। अफसरों को अपनी कमाऊ कुर्सी बचाए रखने के लिए सत्तारूढ़, और विपक्ष के भी नेताओं को खुश रखना रहता है, और इसी चक्कर में दोनों ही तरफ के पसंदीदा मवालियों को हर तरह की छूट देकर रखना इन अफसरों की मजबूरी हो जाती है। जब कभी किसी संगठन के मवाली को देखें, तो याद कर लें कि वह संगठन किस पार्टी या नेता का समर्थन करता है। यह भी याद कर लें कि उन्हें पुलिस से बचाने के लिए किस नेता की दखल हर बार काम आती है। किसी भी मवाली की गिरफ्तारी के मौके पर राजनेताओं के बारे में भी जनता को अपनी सोच बनानी चाहिए जिनकी वजह से जनता के साथ गुंडागर्दी करने वाले ऐसे लोगों को ताकत हासिल रहती है।
कानून तोडक़र कमाई का भरोसा कितना जायज?
22 सितंबर 2024
हिन्दुस्तान में त्यौहारों पर जो अराजकता सामने आती है उसका एक नमूना कुछ दिन पहले भिलाई में देखने मिला जब एक गणेश पंडाल के अराजक लाउडस्पीकर का पुलिस तक जाकर विरोध करने के बाद भी जब उसका कोई असर नहीं हुआ तो दिल के मरीज बुजुर्ग ने खुदकुशी कर ली। वह ध्वनि प्रदूषण और कोलाहल से उपजी शायद पहली खुदकुशी थी। अब उसी भिलाई की खबर है कि वहां एक डीजे संचालक ने इन त्यौहारों में अधिक कमाई के लिए 25 लाख रूपए कर्ज लेकर नया म्युजिक सिस्टम खरीदा था, और हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई रोक की वजह से डीजे का कारोबार ठप्प होने से उसने खुदकुशी कर ली है। अगर यह खबर सच है, तो यह एक ऐसे कारोबार की खुदकुशी बताती है जो कि गैरकानूनी पैमानों पर चल रहा था। संगीत बजाने पर तो कोई रोक नहीं है, लेकिन बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में बड़े-बड़े स्पीकर लादकर, सैकड़ों रंग-बिरंगी दूर तक फेंकी जा रही रौशनी वाली लाईटों के साथ सडक़ों पर सबका जीना हराम करने वाले कारोबार पर तो दस बरस से अधिक से भी रोक चली आ रही है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने अनगिनत मामलों में ऐसे फैसले सुनाए हैं, और आदेश दिए हैं। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट बरसों से लगातार सरकार को चेतावनी देते आ रहा है, और वह सरकार और जिले के अफसरों के खिलाफ जितनी कड़ी जुबान में बोलते आया है, उससे यह साफ था कि कानून क्या है। अब अगर किसी कारोबार ने यह मान लिया है कि बाकी तमाम लोगों का जीना हराम करके उसे अपनी कमाई करनी है, तो उसके लिए अदालत, सरकार, कानून, या चैन से जीने का हक रखने वाली जनता तो जवाबदेह है नहीं।
अब सवाल यह उठता है कि भिलाई में डीजे संचालक की यह कथित खुदकुशी अगर सचमुच ऐसे कारोबारी नुकसान की वजह से हुई है, तो इस नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है? जब यह बात साफ है कि कानून इसके खिलाफ है, जनता की मौत हो रही है, सभ्य समाज हिंसक होते चल रहा है, और निठल्लों की फौज सडक़ों पर नाचती है जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त होता है, लाखों लोगों का रोज का कामकाज प्रभावित होता है, और पुलिस एक निहायत ही गैरजरूरी दबाव में उलझ जाती है कि उसे अलग-अलग धर्मों के धर्मान्ध लोगों का विरोध झेलकर अदालत के आदेश पर अमल करना होता है, कानून का पालन करवाना होता है, या फिर मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ता, और डॉक्टरों की आलोचना झेलनी पड़ती है। हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ सरकार को पिछले बरसों में हाईकोर्ट के दखल के बिना भी अपनी साधारण संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करते हुए इस अराजकता को खत्म करना था। लेकिन न पिछली कांग्रेस सरकार ने यह किया, न ही मौजूदा भाजपा सरकार का ऐसा कोई इरादा दिखता है। हाईकोर्ट की रोजाना की दखल के बीच भी छत्तीसगढ़ में सिर्फ अफसरों के स्तर पर ऐसे गोलमोल आदेश जारी किए गए जिनका कोई मतलब नहीं था। ऐसे ढुलमुल रवैये का नतीजा यह हुआ कि नेताओं की शह पर गैरकानूनी शोरगुल करने वाले डीजे संचालकों के हौसले आसमान पर बने रहे, और हालत यह हो गई कि उन्होंने सोशल मीडिया पर कान खराब होने की चेतावनी देने वाले डॉक्टर को हिंसक धमकी देना शुरू कर दिया। यही अराजकता उनका हौसला इस गैरकानूनी धंधे में आगे पूंजीनिवेश तक ले गई, और कर्ज लेकर भी उन्होंने कानून तोडऩे वाला सामान खरीदना जारी रखा। अब इसके लिए अदालत या सरकार, या समाज के आम लोग तो जिम्मेदार हो नहीं सकते, अगर किसी को ऐसा खतरा उठाने का शौक है। कानून को तोडक़र किए जाने वाले कारोबार में किसी नुकसान की आशंका पर तो उस कारोबारी को ही सोचना पड़ता है। फिर यह कारोबार तो ऐसा है जो महज टैक्स चोरी का नहीं है, यह आम जनता की जिंदगी बर्बाद करने वाला कारोबार है, और इसमें घाटे को लेकर अगर किसी कारोबारी ने खुदकुशी की है तो वह बात तो तकलीफदेह है, लेकिन इस कारोबार के लोगों को आपस में ही यह सोचना होगा कि शोरगुल की गुंडागर्दी पर अब जब अदालत भारी पड़ रही है, और पिछले कुछ बरसों से लगातार पड़ रही है, तो इस धंधे से धीरे-धीरे हाथ समेट लेना बेहतर होता, न कि इसमें और पूंजीनिवेश करना।
सरकार और अदालत जिस
बात को गैरकानूनी करार दे चुकी है, उसमें पैसा लगाना लोगों के अपने विवेक का मामला
रहता है। आज अगर कोई खेती की जमीन खरीदकर उस पर गैरकानूनी प्लॉटिंग करके उस पर सडक़,
नाली बनाकर, बिजली के खंभे तनवाकर प्लॉट बेच रहे हैं, तो प्रशासन उसे जब तहस-नहस करता
है, तो वे अपनी पूंजीनिवेश का रोना नहीं रो सकते, यह काम शुरूआत से ही गैरकानूनी था।
ऐसे बहुत से काम है। कहीं कोई बिजली चोरी करके उसे मुफ्त का सामान मानकर कारखाना चलाए,
और उसे पकड़ लिए जाने पर खुदकुशी करे, तो इसे कोई जुर्म तो कहा नहीं जा सकता। बहुत
से स्कूल-कॉलेज मान्यता मिलने के पहले दाखिला दे देते हैं, और बाद में मान्यता न मिलने
पर बच्चों के भविष्य की दुहाई देते हैं।
लाउडस्पीकर का गैरकानूनी शोरगुल करने का कारोबार हो, या गैरकानूनी टैक्सी चलाने का, या अवैध प्लॉटिंग करने का, इन सब पर सरकार को समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए, कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि यह सिलसिला जड़ से ही मिटाया जा सके। जब अराजक धंधों का बड़ा सा पेड़ लहलहाने लगे, उसके बाद उसकी टहनियों को काटना भी भारी पड़ता है। लेकिन जब वह बीज से निकलकर जमीन फोड़ता ही है, तभी उसे निकालकर फेंकना आसान रहता है। सरकार को कानून तोडऩे वाले धंधों को बिना देर किए हुए खत्म करना चाहिए ताकि लोग उनमें अधिक पूंजीनिवेश का रोना न रोएं। डीजे संचालक की खुदकुशी तकलीफ की खबर है, लेकिन यह कानून तोडऩे की ताकत पर लोगों के भरोसे का नतीजा है कि यह धंधा अदालत को ठेंगा दिखाते हुए हमेशा ही जारी रहेगा। लोगों को यह समझना चाहिए कि गैरकानूनी काम किसी भी दिन बंद हो सकता है, और उसमें पैसा डालना, पैसे को अंधेरे गहरे कुएं में डालने सरीखा ही रहता है।
दुनिया के आतंकियों को इजराइल ने दिखाई नई राह, दिया एक नया हथियार
21 सितंबर 2024
इजराइल ने अपनी सरहद से लगे देश लेबनान की जमीन पर बसे हुए हथियारबंद संगठन, हिजबुल्ला, पर हमला करने के लिए मिसाइल और रॉकेट हमलों के साथ-साथ जो नया पेजर और वॉकीटॉकी हमला किया है, उसने पूरी दुनिया के सामने एक नया खतरा, और एक नई चुनौती पेश कर दी है। दो दिनों तक लगातार, पहले दिन पेजरों पर एक संदेश आया, और हजारों पेजरों में विस्फोट हुआ। दर्जन भर लोग मर गए, और हजारों लोग घायल हुए। देश भर में अलग-अलग जगह जहां-जहां पेजर इस्तेमाल हो रहे थे, उनमें हजारों की संख्या में विस्फोट हुआ। ये पेजर सिर्फ हिजबुल्ला के लड़ाके इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, इन्हें आम लोग भी इस्तेमाल कर रहे थे, और कम से कम एक अस्पताल की एक नर्स अपने पेजर में हुए धमाके से मारी गई। अगले दिन हिजबुल्ला के इस्तेमाल किए जाने वाले वॉकीटॉकी में भी धमाके हुए, और करीब 30 लोग मारे गए। इन धमाकों से बेकसूर आम नागरिक भी मारे गए, और बच्चे भी। इनके आसपास आग भी लग गई, और कई दूसरे तरह की बर्बादी भी हुई। लेबनान की खबर कहती है कि वहां कई घरों और इमारतों के ऊपर सोलर पैनल में भी धमाके हुए, और उनसे जुड़ी बैटरियों में भी।
पेजर मोबाइल कंपनियों के नेटवर्क से जुड़े हुए नहीं थे, ये एक अलग रेडियो सर्विस से चलते थे, और ये मोबाइल फोन के मुकाबले अधिक सुरक्षित रहते थे, इसलिए हिजबुल्ला इनका इस्तेमाल करता था ताकि न इसकी लोकेशन इजराइल को दिख सके, न ही वह इसके टेक्स्ट-मैसेज में तांक-झांक कर सकें। लेकिन इजराइल ने इससे हजार कदम आगे बढक़र एक दूसरा हैरतअंगेज कारनामा कर दिखाया। उसने फौजी कार्रवाई करने के लिए आम जनता को भी बेधडक़ मारने से परहेज नहीं किया। अभी तक उसने अपनी परंपरा के मुताबिक इस खुफिया हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन हर किसी को यह अंदाज है कि सिवाय इजराइल इस काम को किसी और ने नहीं किया है। योरप के बने हुए ये पेजर खाड़ी के किसी देश से किसी के भुगतान के बाद लेबनान पहुंचे थे, और ऐसा अंदाज है कि इन्हें हिजबुल्ला के लिए उसके समर्थक और प्रायोजक देश ईरान ने भिजवाया था। लेकिन इनमें से बहुत से पेजर आम लोग भी इस्तेमाल कर रहे थे। अभी तक की जांच से समझ यही आया है कि फैक्ट्री से निकलने के बाद और लेबनान पहुंचने के पहले किसी जगह इजराइल ने इसके स्टॉक में घुसपैठ की, और हर पेजर को खोलकर उसके भीतर आरडीएक्स जैसा बहुत खतरनाक विस्फोटक ऐसे चिप और प्रोग्राम के साथ डाला जिससे कि पेजर पर कोई एक खास संदेश पहुंचते ही उसमें विस्फोट हो जाए।
अब हम लेबनान और इजराइल के इस मुद्दे से ऊपर उठकर पूरी दुनिया के लिए इस तकनीकी खतरे और चुनौती पर बात करना चाहते हैं। मोबाइल फोन से भी छोटा पेजर अगर विस्फोटक बनाया जा सकता है, तो आज तो दुनिया की अधिकतर आबादी मोबाइल फोन, लैपटॉप, पॉवर बैंक, ब्लूटूथ, और कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक सामान इस्तेमाल करती है जो कि वाईफाई या इंटरनेट से जुड़े भी रहते हैं। अब अगर किसी सामान में विस्फोटक डाल देना इतना ही आसान है, तो फिर हिजबुल्ला जैसे फौजी दर्जे के हथियारबंद संगठन की सारी सावधानी के बाद भी अगर इजराइल ऐसा कर पाया है, तो फिर कल किसी भी देश की किसी कंपनी में घुसपैठ करके वहां से किसी एक खास देश, या संगठन, या कारोबार के लिए जाने वाले कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सामान में भी ऐसा ही किया जा सकता है। एक किस्म से देखें तो जिस तरह छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सली जंगल में जगह-जगह ऐसे विस्फोटक लगाकर रखते हैं कि जिन पर किसी का पैर पड़े, या वहां से कोई गाड़ी निकले तो बड़ा विस्फोट हो जाए, उसी तरह अब इजराइल इतनी ताकत रखता है कि दुनिया के किसी देश से दुनिया के किसी खरीददार तक जाने वाले सामानों को वह बम बना दे।
अब सवाल यह उठता है कि सबसे अधिक कड़ी हिफाजत में रहने वाले दुनिया के नेता या सबसे बड़े कारोबारी भी मोबाइल फोन, लैपटॉप, और कमरे में दर्जनों दूसरी वाईफाई-इंटरनेट से जुड़ी चीजों का इस्तेमाल करते हैं। अब अगर कारखानों से निकलने के बाद महत्वपूर्ण व्यक्तियों तक पहुंचते हुए ये सामान बम बना दिए जाएं, तो लोग कितने सामानों से कैसा परहेज कर सकते हैं? अभी फटे पेजरों में तीन-तीन ग्राम आरडीएक्स डालने का अंदाज लगाया जा रहा है, तीन ग्राम का तो कोई ऐसा पुर्जा जैसा दिखता विस्फोटक भी मोबाइल फोन या दूसरे उपकरण में लगाया जा सकता है जो कि उसे खोलने पर भी समझ न पड़े। ऐसे में अभी एक अमरीकी लेख में यह खतरा बताया गया है कि अधिकतर अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में अब वाईफाई मुहैया रहता है, और लोग पूरे सफर में अपने फोन-लैपटॉप का इस्तेमाल करते ही हैं। अब अगर उन पर किसी संदेश को भेजकर उनमें विस्फोट करवाया जा सकता है, तो कोई भी अंतरराष्ट्रीय उड़ान या उसके मुसाफिर तभी तक महफूज हैं, जब तक इजराइल उन्हें मारना जरूरी नहीं समझता।
आज
ऐसी कल्पना करना भी मुश्किल है कि दुनिया के कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति तमाम संचार उपकरणों,
और इंटरनेट-वाईफाई जैसे सिग्नलों से दूर रह सकते हों। और फिर जब इजराइल ने एक राह दिखा
ही दी है, तो फिर दुनिया के आतंकी संगठन बहुत अधिक पीछे भी नहीं रहेंगे। अगले कुछ वक्त
में वे लोगों की गाडिय़ों में, जो कि अब इंटरनेट से जुड़ी रहती हैं, घर के फ्रिज, एसी,
और दूसरे घरेलू उपकरण जो कि इंटरनेट से जुड़े रहते हैं, इन सबको बम बनाकर चुनिंदा लोगों
के आसपास पहुंचाने का काम हो सकता है। और जब कोई निजी उपकरण लेकर लोग किसी विमान में
उड़ेंगे, तो उन्हें उड़ाकर पूरे विमान को उड़ाना भी आसान बात हो सकती है। इजराइल वैसे
भी दुनिया का सबसे बड़ा मुजरिम-देश है, जिसके खिलाफ प्रस्ताव पास कर-करके संयुक्त राष्ट्र
संघ अपने को दुनिया का सबसे बेअसर संगठन साबित कर चुका है। उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद
दुनिया में सत्ता और बड़े कारोबार से जुड़े भयानक जुर्म करने के लिए बदनाम है। और जिस
तरह से वह फिलीस्तीन में हमास के हथियारबंद लड़ाकों को मारने के लिए उनसे सौ-सौ गुना
बेकसूर निहत्थे नागरिकों को मार रहा है, उससे जाहिर है कि वह किसी एक मुसाफिर को मारने
के लिए पूरे के पूरे विमान को भी उड़ा सकता है, या किसी सभागृह में अगर इजराइल विरोधी
लोग इकट्ठा हैं, और उनमें से कुछ के मोबाइल-लैपटॉप तक उसकी घुसपैठ हो चुकी है, तो वह
सभागृह के सैकड़ों लोगों को भी उड़ा सकता है। इजराइल ने बेकसूर नागरिकों पर इस बार
के ताजा हमले से यह साबित किया है कि बेकसूर मौतों से उसे कोई परहेज नहीं है। उसने
दुनिया भर के आतंकियों को एक नई राह दिखाई है, और आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मेहरबानी
से आतंकी संगठन भी अपने निशाने आसानी से छांट सकते हैं, और यह पता लगा सकते हैं कि
उन्होंने कौन से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ऑर्डर किए हैं, और रास्ते में उन पार्सलों में
घुसपैठ करके उनमें विस्फोटक और ऐसा प्रोग्राम डाल सकते हैं कि उन्हें जब चाहे तब बम
की तरह उड़ा सकें। दुनिया पर यह एक बहुत बड़ा वास्तविक खतरा इस रफ्तार से आया है कि
किसी भविष्यवाणी के बिना कोई उल्का पिंड धरती से आ टकराया है। इजराइल की आतंकी क्षमता
और घुसपैठ की उसकी ताकत की यह नई नुमाइश उसके अमरीकी पितामह की फिक्र का सामान भी है
क्योंकि इजराइल की राह पर चलकर कोई अमरीका विरोधी आतंकी अब कहीं भी, किसी भी विमान
को गिराने की साजिश कर सकते हैं। दुनिया के आज के ओसामा-बिन-लादेनों को एक नई प्रेरणा
देने, और एक नया हथियार देने के लिए इजराइल का नाम हमेशा ही इतिहास में काले अक्षरों
में लिखा जाएगा।
तिरुपति के लड्डुओं में गाय और सुअर की चर्बी से उठे सवाल, और हल
20 सितंबर 2024
दुनिया में हिन्दुओं की श्रद्धा के एक सबसे बड़े केन्द्र, आन्ध्रप्रदेश के तिरुपति मंदिर की ताजा खबर दिल दहलाने वाली है। वहां राज्य सरकार ने इस मंदिर में हर दिन बनने वाले तीन लाख लड्डुओं में इस्तेमाल होने वाले कई ट्रक घी को जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा, तो पता लगा कि इसमें मछली का तेल, गाय की चर्बी, और सुअर की चर्बी मिली हुई थी। यह घी एक निजी सप्लायर से मंदिर लगातार ले रहा था, जिसके पहले कर्नाटक राज्य के दुग्ध संघ के एक प्रतिष्ठित ब्रांड, नंदिनी का घी मंदिर में इस्तेमाल किया जाता था। यह मंदिर दुनिया में सबसे अधिक कमाई वाला हिन्दू मंदिर है, और यहां रोज करीब पौन लाख दर्शनार्थी भक्त आते हैं। हर दिन करीब साढ़े तीन लाख लड्डू बनते हैं, और राज्य की पिछली जगन मोहन सरकार ने पांच निजी फर्मों को इसके लिए घी सप्लाई करने का ठेका दिया था। अब गुजरात स्थित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की प्रयोगशाला ने लड्डुओं और घी की जांच करके बताया है कि इसमें मछली-तेल, गाय और सुअर की चर्बी मिली है। घी के कारोबार में यह जानकारी आम है कि उसके दाम कम करने के लिए लोग उसमें जानवरों की चर्बी मिला देते हैं। कर्नाटक दुग्ध संघ ने मंदिर को दिए जा रहे दूध पर लंबे समय से दी जा रही रियायत जारी रखने से मना कर दिया था, और उसके बाद जगन सरकार के मनोनीत मंदिर ट्रस्ट ने खुले बाजार से घी सप्लाई करने के ठेके तय किए थे। खबरें बताती हैं कि मुख्यमंत्री रहते हुए जगन मोहन रेड्डी ने तिरुपति मंदिर के ट्रस्ट में अपने चाचा और दूसरे किसी रिश्तेदार को भी मनोनीत कर दिया था, और उन्हीं के कार्यकाल में यह घी-में-चर्बी कांड सामने आया है। अब जगन मोहन रेड्डी से बहुत खराब रिश्तों वाली चन्द्राबाबू नायडू की सरकार आन्ध्र में है, और गुजरात में भी भाजपा की सरकार है, और एनडीडीबी केन्द्र सरकार के मातहत सहकारी संघ है, जिसकी प्रतिष्ठित प्रयोगशाला ने यह रिपोर्ट दी है। आन्ध्र में पिछली जगन सरकार के रहते आज के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू से भयानक बदसलूकी की गई थी, और ऐसे में तमाम राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए हो सकता है कि कुछ लोगों को घी की ऐसी जांच रिपोर्ट पर कुछ शक भी हो।
किसी धर्मस्थल पर कुछ सप्लाई करते हुए, या धर्मस्थल की सम्पत्ति में घपला करते हुए किसी को कोई परहेज रहता हो, ऐसा हमें बिल्कुल ही नहीं लगता। हम अपने चारों तरफ मठ-मंदिर, चर्च, मस्जिद, और दूसरे धर्मस्थानों की जमीनों का अवैध कारोबार देखते हैं। अधिकतर धार्मिक स्थानों के ट्रस्टी वहां की जमीनें बेच खाते हैं, प्रतिमाओं के गहने बेच देते हैं, संपत्ति की अफरा-तफरी करते हैं। अगर ईश्वर पर ही उनका भरोसा होता, तो ऐसा करते हुए वे अपने लिए नर्क की गारंटी मान लेते, और इससे दूर रहते। लेकिन उन्हें मालूम है कि ऊपर किसी तरह का कोई नर्क नहीं है, और स्वर्ग की धारणा इसी जमीन पर हकीकत है, अगर ईश्वर के नाम पर जमा पैसा चुराया जाए। फिर अभी तिरुपति में जो नया चर्बीकांड सामने आया है, वह मामूली भ्रष्टाचार से बहुत आगे बढक़र है। इससे तो उन शाकाहारियों की आस्था पर भी चोट लगी है जो कि अपनी धार्मिक या दूसरी किस्म की मान्यताओं के चलते मांसाहार से दूर रहते हैं, यहां तक कि बहुत से लोग अंडे भी नहीं खाते। अब अगर इन बरसों में ऐसे लोगों ने तिरुपति का प्रसाद खाया होगा, तो आज उनके दिल पर क्या गुजर रही होगी? लोग किसी के जन्मदिन के केक को भी यह मानकर छोड़ देते हैं कि उसमें शायद अंडा मिला होगा, अब ऐसे लोग आज अपने बदन के साथ आराम से रह नहीं पाएंगे क्योंकि उसमें गाय और सुअर की चर्बी घुस चुकी है। यह मामला सिर्फ ट्रस्ट को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का भ्रष्टाचार नहीं है, यह करोड़ों लोगों की धार्मिक और शाकाहार की भावनाओं को जख्मी करने का भी है। अगर इस पूरे सिलसिले के पीछे कोई राजनीतिक साजिश नहीं है, और अगर ये सैम्पल किसी दूसरी प्रतिष्ठित प्रयोगशाला में भी चर्बी ही साबित करते हैं, तो ऐसे कारोबारियों, और भ्रष्ट ट्रस्टी-अधिकारियों पर बहुत कड़े कानूनों के तहत मुकदमा चलना चाहिए। लोग तो तिरुपति जाकर लौटते हैं, तो वहां का प्रसाद अधिक से अधिक लोगों में बांटते हैं कि इससे उन्हें और अधिक पुण्य मिलेगा। चर्बी का ऐसा कारोबार तो लोगों की आस्था को हिलाकर रख देगा, और इससे बाजार में प्रचलित घी के बहुत से ब्रांड भी नुकसान झेलेंगे। देश में एक चर्चित और विवादास्पद आयुर्वेद ब्रांड भी अपना घी इस दाम पर बेचता है जिस पर घी बनाने की लागत भी नहीं निकल सकती। कई लोगों का शक है कि यह ब्रांड भी इस दाम पर खालिस घी नहीं बेच सकता। तिरुपति से निकला हुआ संदेश तो यही है कि बाजार में मौजूद हर ब्रांड को ठीक से परखा जाए ताकि लोगों की धार्मिक और शाकाहारी भावनाओं की हत्या न हो। फिर इस बात को समझने की जरूरत है कि मांसाहारी लोगों में भी एक बड़ी आबादी ऐसी है जो गाय की चर्बी की कल्पना नहीं कर सकती, दूसरी तरफ एक दूसरे धर्म से जुड़ी हुई आबादी है जो कि सुअर को छूने की भी कल्पना नहीं कर सकती। इस तरह घी के कारोबार में चर्बी को बर्दाश्त करना मुमकिन नहीं है। यह भी समझने की जरूरत है कि जब दुनिया के सबसे बड़े हिन्दू मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए चर्बी खपाई जा रही थी, तो फिर बाजार में घी की बड़ी खपत वाले बिस्किट और केक के कारखाने, खानपान की दूसरी चीजों के कारखाने, रेस्त्रां, और फास्ट फूड के कारोबारी पता नहीं क्या-क्या इस्तेमाल करते होंगे।
हम एक बार फिर तिरुपति पर लौटें, तो यह पूरा मामला धर्म के मामले में सरकार चला रहे नेताओं के मनोनीत ट्रस्टियों का मामला है। धर्म और राजनीति का घालमेल बड़ा खतरनाक होता है, और इन दोनों का मेल जानलेवा भी हो सकता है। इससे लोकतंत्र पर भी चोट पहुंचती है, और लोगों के खान पान की आस्था पर भी। धर्म और राजनीति का मेल बहुत किस्म के जुर्म करने की ताकत और मिसाल रखता है, हम अपने आसपास के धार्मिक ट्रस्टों पर काबिज राजनेताओं को देखते हैं, तो उनके लिए ईश्वर के नाम पर हर तरह का जुर्म बड़ा आसान लगता है। हम मंदिर के लड्डुओं में गाय और सुअर की चर्बी को धार्मिक मामले से अधिक शाकाहार का मामला मानना चाहते हैं। धार्मिक आस्था तो कई तरह के जुर्म के साथ-साथ भी चलती है, लेकिन शाकाहार की भावना किसी भी तरह के धार्मिक जुर्म से परे रहती है। तिरुपति के इस मामले में जिम्मेदार लोगों को बहुत कड़ी सजा मिलनी चाहिए, और शाकाहारियों की किसी संस्था को तिरुपति मंदिर ट्रस्ट की तरफ से उन तमाम लड्डुओं के दाम दान में देने चाहिए जो कि इन घी सप्लायरों से आए घी से बनकर बिके हुए लड्डुओं से कमाए गए थे। तिरुपति मंदिर लड्डुओं को बेचता भी है, उसकी रसीद कटती है, सप्लाई का ठेका शुरू होने से अब तक का हिसाब पल भर में निकल आएगा, और उस जुर्माने से शाकाहार की धारणा को बढ़ाया जा सकता है।











