छोटे-छोटे बच्चों के किए बड़े-बड़े जुर्म देखकर अब पूरी तरह जागने की जरूरत
30 नवंबर 2022
महाराष्ट्र के जालना की एक बड़ी अजीब सी खबर है। वहां एक महिला ने सुबह स्कूल जाने के लिए अपनी चौदह बरस की बेटी को जगाया जो कि स्कूल में एक मोबाइल फोन चोरी करते पकड़ाई थी, और उसने स्कूल जाना बंद कर दिया था। मां के जगाने पर वह गुस्से में बाथरूम में घुसी जहां उसकी सात बरस की चचेरी बहन नहा रही थी। उसने गुस्से में छोटी बहन का गला ब्लेड से काट दिया, और उस बच्ची की मौत हो गई। मां ने अपनी बेटी को रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने दरवाजा भीतर से बंद कर रखा था, और उसका हमला कामयाब रहा। बाद में इस महिला ने ही पुलिस को जानकारी दी। अब हिंसा की यह घटना जिन लोगों को न हिला पाए, उनके लिए छत्तीसगढ़ के बेमेतरा की एक और खबर है। पुलिस को दस बरस की एक बच्ची की फांसी लगाकर आत्महत्या की सूचना मिली। जब इसका पोस्टमार्टम कराया गया तो पता लगा कि उसके साथ बलात्कार हुआ था। जब आसपास जांच की गई तो पड़ोस के एक नाबालिग लडक़े पर शक हुआ, और पूछताछ में उसने मंजूर किया कि वह मोबाइल पर अश्लील वीडियो देखते रहता था, और उसने पड़ोस में इस छोटी लडक़ी को पकडक़र रेप किया, उसके विरोध और बात खुल जाने के डर से उसके नाक-मुंह दबा दिए। इसके बाद उसने चुनरी से फांसी का फंदा बनाकर उसे टांग दिया, और छत के रास्ते अपने घर चले गया। अब उस लडक़े को बाल संप्रेक्षण गृह भेजा गया है।
ये दो खबरें बहुत विचलित करती हैं। मां-बाप अपने बच्चों को स्कूल जाने को न कहें, तो क्या कहें? अगर वे पढ़ेंगे-लिखेंगे नहीं, तो आगे चलकर परिवार और दुनिया पर एक खतरनाक बोझ बनेंगे। और अगर बच्चों का गुस्सा इस कदर बेकाबू है कि मां के जगाने पर वह छोटी बहन का गला काट डाले, तो एक गरीब परिवार अपने बच्चों की और कितनी परवाह कर सकता है, उन्हें हिफाजत से रखने के लिए और क्या कर सकता है। ठीक वही हाल छत्तीसगढ़ की इस बच्ची का है जो कि जाहिर तौर पर गरीब दिखती है, और पड़ोस के पोर्न-प्रभावित लडक़े के लिए एक आसान शिकार साबित हुई। घर-परिवार के भीतर की ऐसी हिंसा को रोकने का कोई तरीका दुनिया की किसी पुलिस के पास नहीं हो सकता है। यह तो परिवार और समाज के ही कुछ करने की बात है। बच्चों की सोच किस तरफ जा रही है, वे मोबाइल या कम्प्यूटर पर क्या देख रहे हैं, उन पर कैसा असर हो रहा है, और वे किसी गलत काम को करने का कितना मौका पा रहे हैं, यह देखना पुलिस के बस का बिल्कुल नहीं हो सकता। जब ऐसे जुर्म की खबर लगती है तब ही पुलिस का दाखिला होता है, जो अदालत के फैसले के बाद खत्म हो जाता है। लेकिन सरकार और समाज मिलकर स्कूलों के माध्यम से या मुहल्लों के रास्ते बच्चों को हिंसा से दूर रखने की कुछ तरकीबें जरूर निकाल सकते हैं।
मोबाइल फोन को लेकर बच्चों की दीवानगी पिछले बरसों में लॉकडाउन और वर्क फ्रॉम होम के दौरान एकदम से बढ़ गई है। लोग घरों में बैठे फोन और कम्प्यूटर पर काम करते थे, या बिना काम के भी इन्हीं उपकरणों पर समय गुजारते थे, और इन्हें देख-देखकर बच्चों ने भी टीवी, कम्प्यूटर, और मोबाइल की लत लगा ली। कोई एक-दूसरे को मना भी नहीं कर पाए। स्कूल-कॉलेज के बच्चों को पढ़ाई के लिए भी मोबाइल और कम्प्यूटर जरूरी हो गया। इंटरनेट के साथ जब ये उपकरण बच्चों को मिल गए, तो वे क्या देखते हैं, और उससे क्या सीखते हैं, यह उन्हीं के बस की बात रह गई। कामकाजी मां-बाप बच्चों पर पूरे वक्त निगरानी तो रख नहीं सकते थे, नतीजा यह हुआ कि बच्चे कहीं-कहीं से पोर्न तक पहुंचने लगे, और फिर वहीं फंसने लगे। लोगों को याद होगा कि पिछले बरस भी छत्तीसगढ़ में इसी किस्म का एक भयानक मामला हुआ था जिसमें परिवार के ही कई नाबालिग भाईयों ने मोबाइल फोन पर पोर्न देख-देखकर घर में ही छोटी बहन के साथ बलात्कार किया था। बाद में जब मामला उजागर हुआ तो परिवार और पुलिस को यह भी ठीक से समझ नहीं आया कि घर के भीतर के इस मामले में घर के तमाम लडक़ों को पुलिस के रास्ते सुधारगृह भेजा जाए, या क्या किया जाए।
अब जब डिजिटल जिंदगी एक हकीकत बन चुकी है, घरों में छोटे-छोटे बच्चे बिना वीडियो देखे खाने-पीने से भी मना कर देते हैं, रोजाना कई-कई घंटे टीवी या कम्प्यूटर-फोन के सामने बैठे रहते हैं, तब इस नौबत का कोई इलाज ढूंढना जरूरी है। इससे उनके दिल-दिमाग और आंखों पर तो असर पड़ ही रहा है उनका विकास भी प्रभावित हो रहा है। बच्चों के वीडियो-खेल भी गोलीबारी और हिंसा से भरे हुए हैं, और जब वे इंटरनेट और यूट्यूब पर कुछ भी ढूंढते हैं, तो जाहिर है कि किसी न किसी वक्त तो पोर्न तक पहुंच ही जाएंगे। टीवी के बुलेटिनों में रात-दिन तरह-तरह के सेक्स और जुर्म की खबरें घरों में चलती ही रहती हैं, और मां-बाप को यह परवाह भी कम जगहों पर ही रहती है कि इन्हीं के सामने उनके बच्चे भी बैठे हैं। ऐसे में हिंसा, सेक्स, अराजकता, और जुर्म इन सबका मिलाजुला असर बच्चों पर कई तरह से पड़ रहा है, और आसपास के दूसरे बच्चे उनके नाबालिग-जुर्म का शिकार हो रहे हैं। अब घर के लोग भी अपने बच्चों को कितनी तरह से बचाकर रख सकते हैं? खुद के घर के बच्चों से, पड़ोस के बच्चों से, या घर-पड़ोस के परिचित बड़े लोगों से बच्चों को आखिर कितने दूर रखा जा सकता है? लेकिन इस सिलसिले को शुरू में ही रोक देना जरूरी है क्योंकि ऐसे सेक्स-हिंसा में फंसे हुए बच्चे अगर पकड़ में नहीं आएंगे, उनकी शिनाख्त नहीं हो पाएगी, तो वे ऐसे कई जुर्म और भी कर सकते हैं, और आमतौर पर उनके शिकार उनसे छोटे बच्चे ही रहेंगे।
नाबालिग बच्चों के मुजरिम बन जाने से उनकी बाकी की पूरी जिंदगी बहुत बुरी तरह प्रभावित होती है। हिन्दुस्तान में सुधारगृहों का जो हाल है, उनका तजुर्बा यह है कि वहां गए हुए बच्चे कई और किस्म के जुर्म सीखकर लौटते हैं। दूसरी तरफ इस देश में मनोचिकित्सक और मानसिक परामर्शदाता जरूरत से बहुत ही कम हैं, और जिन बच्चों को उनकी जरूरत है उनमें से बहुत ही गिने-चुने को वे नसीब होते हैं। सरकार और समाज की बाकी कोशिशों के साथ-साथ एक बात और यह की जानी चाहिए कि विश्वविद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के कोर्स चलाए जाएं, और स्कूल-कॉलेज में, या समुदाय में उनकी सेवाएं उपलब्ध हों। आज बहुत महंगे निजी स्कूलों में तो परामर्शदाता कुछ घंटों के लिए रहते हैं, लेकिन शायद एक फीसदी बच्चों को भी वे नसीब नहीं होते। गरीब और सरकारी स्कूलों, और छोटी निजी स्कूलों तक परामर्शदाता तभी हो सकते हैं, जब ऐसे पाठ्यक्रम बड़े पैमाने पर प्रशिक्षित लोगों को तैयार कर सकें।
कश्मीर पर बनी फिल्म इस हद तक खारिज!
29 नवंबर 2022
हिन्दुस्तान के भीतर, और बाहर बसे भारतवंशियों के बीच द कश्मीर फाईल्स नाम की फिल्म को लेकर जो बहस साल भर से चल रही थी, वह कल फिर जिंदा हो गई है जब भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में निर्णायक मंडल के अध्यक्ष इजराईली फिल्ममेकर नवाद लपिड ने इसे एक प्रोपेगेंडा और भद्दी फिल्म करार दिया। समापन समारोह के मंच से उन्होंने केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर और हिन्दुस्तान के दूसरे बड़े अफसरों की मौजूदगी में उन्होंने इस फिल्म के बारे में जितनी कड़ी बात कही, वह इस समारोह के इतिहास में अभूतपूर्व थी। उन्होंने कहा कि निर्णायक मंडल ने मुकाबले में शामिल की गईं जितनी फिल्में देखीं, उनमें से बाकी सभी फिल्में बहुत अच्छी क्वालिटी की थीं, और उन्होंने बहुत शानदार बहस छेड़ी। लेकिन कश्मीर फाईल्स को देखकर सारा निर्णायक मंडल विचलित और हैरान था, यह एक प्रोपेगेंडा और भद्दी फिल्म जैसी लगी जो कि इस तरह के प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल के कलात्मक मुकाबले के लायक नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे आमतौर पर लिखित भाषण नहीं देते हैं, लेकिन इस बार वे लिखा हुआ भाषण पढ़ रहे हैं क्योंकि वे सटीकता के साथ अपनी बात कहना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वे इस फिल्म के बारे में खुलकर अपनी बात कह रहे हैं क्योंकि वे खुलकर कहना चाहते हैं।
द कश्मीर फाईल्स नाम की यह फिल्म विवेक अग्निहोत्री की बनाई हुई है, और इसमें कश्मीरी पंडितों की त्रासदी के कथानक को फिल्माया गया है। इस फिल्म के आते ही जानकार लोगों ने खुलकर इसके खिलाफ लिखा कि यह कश्मीर के लोगों को और बुरी तरह बांटने की नीयत से बनाई गई है, और कश्मीर की आम जनता पर भी एक हमला है। इस फिल्म को हिन्दुस्तान के भाजपा-समर्थकों, और दूसरे मुस्लिमविरोधी संगठनों ने हाथोंहाथ लिया था, और भाजपा राज्यों ने इसे जगह-जगह टैक्सफ्री किया था। यह फिल्म केन्द्र सरकार के राजनीतिक एजेंडा को बढ़ाने वाली मानी गई थी, और खासकर कश्मीर में मोदी सरकार के मातहत चल रहे राज्यपाल के शासन को ताकत देने की नीयत से बनाई गई भी कही गई थी। हाल के बरसों में कई ऐतिहासिक कहानियों पर हिन्दुस्तान में ऐसी फिल्में बनीं जिनसे लोगों के राजनीतिक रूझान को एक खास चुनावी मोड़ दिया जा सके। इसके अलावा पिछले दशकों के कुछ हादसों और वारदातों को लेकर भी ऐसी फिल्में बनीं जिन्होंने पूरे मुस्लिम समाज को मुजरिम या खलनायक की तरह पेश किया, और हिन्दुस्तान में धार्मिक ध्रवीकरण का एक एजेंडा सेट किया। अभी हिन्दुस्तान में इस किस्म की फिल्मों और टीवी सीरियलों पर काम चल रहा है जिससे कि दक्षिणपंथी सोच को मजबूत किया जा सके। कश्मीर फाईल्स ऐसी ही एक फिल्म मानी गई थी, और वह धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील ताकतों से लगातार आलोचना पा रही थी। दूसरी तरफ नफरतजीवी संगठनों को इस फिल्म से एकजुट होने का एक नया मौका मिला था, और इसे कश्मीर के इतिहास का एक सच्चा पन्ना बताकर स्थापित किया जा रहा था।
जिस तरह हिन्दुस्तान में आज बहुत से दूसरे मुद्दे दो अलग-अलग किस्म की सोच का समर्थन और विरोध पा रहे हैं, द कश्मीर फाईल्स वैसा ही एक मुद्दा बनकर लोगों के सामने रही है, और कुछ महीनों की ऐसी जिंदगी के बाद इस फिल्म पर चर्चा खत्म हो चुकी थी, और हिन्दुस्तान के मुस्लिमविरोधी लोगों ने भक्तिभाव से इस फिल्म को बढ़ावा दिया था। अभी फिल्म फेस्टिवल में निर्णायक मंडल की ओर से अध्यक्ष की कही इस बात के पहले यह फिल्म खबरों से हट चुकी थी, लेकिन अब फिर यह चर्चा में है। भारत में इजराईल के राजदूत ने इस इजराईली फिल्मकार के बयान को पूरी तरह से खारिज करते हुए इस पर भारत के लोगों से माफी मांगी है। लेकिन सवाल यह है कि एक फिल्म समारोह के पूरी तरह से मनोनीत निर्णायक मंडल ने अगर एकमत होकर कोई राय सामने रखी है, तो उस पर इजराईल के राजदूत को माफी मांगने का क्या हक है? उस पर तमाम लोग अपनी प्रतिक्रियाएं दे सकते हैं, लेकिन निर्णायक मंडल अध्यक्ष का इजराईली हो जाने से इजराईल के राजदूत का माफीनामा जायज नहीं हो जाता। इजराईल की अपनी मजबूरियां हैं कि वह भारत को नाराज करना नहीं चाहता है क्योंकि भारत इजराईल के कुल निर्यात का आधा हिस्सा खरीदता है। दुनिया की सबसे तेज कारोबारी कही जाने वाली यहूदी नस्ल के लोगों की सरकार अगर अपने सबसे बड़े ग्राहक का भी सम्मान नहीं करेगी, तो कारोबार में मार खाएगी। इसलिए इजराईल के राजदूत ने आनन-फानन जो अफसोस जाहिर किया है, और अपने देश के फिल्मकार को धिक्कारा है, वह एक कारोबारी की मजबूरी है। सवाल यह है कि कई देशों के फिल्मकारों से मिलकर बना हुआ एक निर्णायक मंडल किसी एक देश की सरकार, या उसकी सोच के प्रति जवाबदेह नहीं रहता है, वह अपने समारोह में दाखिल फिल्मों के लिए जवाबदेह रहता है।
इससे एक बात और साबित होती है कि किसी भी देश की सरकार, या वहां के धार्मिक संगठन कोई फिल्म तो बनवा सकते हैं, या किसी और की बनाई हुई फिल्म को बढ़ावा दे सकते हैं, लेकिन वे उस फिल्म को उत्कृष्टता के पैमाने पर खरी साबित नहीं करवा सकते। कश्मीरी पंडितों की त्रासदी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है, लेकिन उसे भडक़ाऊ अंदाज में, उसका राजनीतिक शोषण करने के लिए बनाई गई फिल्म को अगर उत्कृष्टता के पैमाने पर कमजोर पाया जा रहा है, तो अच्छे फिल्मकार तो उत्कृष्टता की ऐसी कमी पर अपनी बात रखेंगे ही। और भारत का अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह दुनिया के सबसे बड़े फिल्म समारोहों में से एक है, और भारत में हर बरस दुनिया की सबसे अधिक फिल्में भी बनती हैं। इसलिए अगर इसके निर्णायक मंडल ने कुछ महसूस किया है, तो उनकी सोच पर गौर करना चाहिए, बजाय इसके कि उसके खारिज किया जाए। इजराईली राजदूत ने इस इजराईली फिल्मकार के बयान को खारिज करने के लिए जिस तरह आनन-फानन एक बयान दिया है, वह दो देशों के संबंधों को आंच से बचाने की कोशिश है। लेकिन फिल्मों की उत्कृष्टता के पैमाने कूटनीति से तय नहीं होते हैं। यह अच्छा हुआ कि भारत सरकार के तय किए हुए निर्णायक मंडल से ही निकलकर ऐसी सर्वसम्मत बात इस फिल्म के बारे में आई है। बाकी तो फिर हिन्दुस्तान और दूसरी जगहों के धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोगों का यह अधिकार है कि ऐसी आलोचना को खारिज करके अपना एजेंडा जारी रखें।
महिला पर तो हिजाब लाद दिया पर अपनी मर्द-औलादों पर काबू नहीं पाया समाज ने
28 नवंबर 2022
उत्तरप्रदेश के मेरठ का एक मामला सामने आया
है जिसमें स्कूल की एक टीचर के साथ क्लास के तीन लडक़ों की छेडख़ानी, और
छींटाकशी का उन्होंने खुद ही वीडियो बनाया, अश्लील टिप्पणी करते हुए अपनी
खुद की आवाज रिकॉर्ड की, अश्लील हावभाव दिखाते हुए अपने चेहरे रिकॉर्ड किए,
और वीडियो को चारों तरफ फैला भी दिया। ये लडक़े, और उनके साथ एक लडक़े की
बहन, ये सब तकनीकी रूप से ही नाबालिग हैं, लेकिन बालिग होने के करीब हैं,
और उनकी हरकत जैसा कि साफ दिख रहा है, बालिगों से बढक़र है। इस टीचर ने पहले
प्रिंसिपल से इस बात की शिकायत की, और क्लास बदलने को कहा, लेकिन न तो
प्रिंसिपल ने यह बात सुनी, और न ही क्लास के भीतर और क्लास के बाहर भद्दे
कमेंट करते हुए वीडियो बनाने वाले इस तथाकथित नाबालिग गिरोह ने अपनी हरकतें
बंद कीं। नतीजा यह हुआ कि इस शिक्षिका को थक-हारकर पुलिस में जाना पड़ा,
और पुलिस अब इन चारों को उठाकर अदालत में पेश किया है। नाबालिग होने से
इनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है लेकिन इन्हें किसी सुधारगृह में रखा गया होगा।
यह वीडियो चारों तरफ फैला हुआ है, और इसकी वजह से यह शिक्षिका डिप्रेशन में
बताई जा रही है, और घरवालों का कहना है कि वह आत्महत्या की सोच रही है।
यह वीडियो कई बातें दिखाता है, और चौंकाता भी है। इसमें लडक़े बड़े फख्र से अपना चेहरा दिखाते हुए, अश्लील हावभाव दिखाते हुए शिक्षिका को दिखाते हैं, और तरह-तरह के भद्दे फिकरे कसते हैं। उन्हीं का बनाया हुआ वीडियो बताता है कि जब यह शिक्षिका स्कूल के अहाते में जा रही है, तो राह पर बैठे हुए ये लडक़े अश्लील बातें कहते हुए फिर अपना वीडियो बनाते हैं, और वह शिक्षिका क्लास के भीतर भी किताब से अपना चेहरा ढक लेने को मजबूर हो जाती है, और बाहर भी इन्हें पार करके किसी तरह चली जाती है। शिक्षिका हिजाब बांधे हुए है, साड़ी पर कोट पहने हुए है, वह किसी भी तरह से भडक़ाती हुई नहीं दिखती है। और जब यह सब फिल्माया जा रहा है तो लडक़ों की अश्लील बातें सुनकर क्लास में बड़ी संख्या में मौजूद लड़कियां हॅंसती हुई भी दिखती हैं। जिन लडक़ों के सामने शिक्षिका का कोई बस नहीं चल रहा, जिनका दुस्साहस इतना है कि वे खुद की ही गुंडागर्दी का, छेडख़ानी का ऐसा वीडियो फैला रहे हैं, उनसे लड़कियां भी क्लास में क्या भिड़ जातीं। लेकिन वे ऐसी हरकतों पर हॅंसती हुई दिखती हैं जो कि 12वीं में पहुंचने के बाद उनकी जागरूकता कितनी है, इसका एक सुबूत है। इनमें से कई छात्र-छात्राएं वोट डालने के लायक भी हो चुके होंगे या कुछ महीनों में हो जाएंगे, और जागरूकता के ऐसे स्तर के साथ वे किस तरह की सरकार चुनेंगे, यह भी हैरानी होती है।
किसी शिक्षिका की शिकायत पर भी स्कूल प्रशासन अगर कार्रवाई न करे, तो यह भी सदमा पहुंचाने वाली बात है, क्योंकि किसी महिला के लिए आज हिन्दुस्तान में पुलिस में जाकर रिपोर्ट करना भारी शर्मिंदगी की वजह रहती है, और थाने से लेकर अदालत तक उसे ही बुरी निगाह से देखा जाता है। यह घटना यह भी बताती है कि एक आम हिन्दुस्तानी स्कूल में पढ़ाई का माहौल कैसा है। स्कूल से सर्टिफिकेट लेकर, और कॉलेज से डिग्री लेकर निकलने वाले लोग किस स्तर के रहते हैं। यह मामला उत्तरप्रदेश का है जहां के औसत लोग औसत दर्जे से नीचे के पढऩे वाले माने जाते हैं। यही हाल दक्षिण भारत का, या महाराष्ट्र का होता, तो शायद हालात इतने खराब नहीं दिखते। उत्तरप्रदेश में सभी तरह के मामलों में अराजकता का जो आम हाल है, वह वहां की ऐसी स्कूलों पर भी झलक रहा है।
लेकिन इस मामले में एक और पहलू पर गौर करने और चर्चा करने की जरूरत है। हिजाब लगाई हुई और पूरे कपड़े पहनी हुई इस शिक्षिका के साथ इस छेडख़ानी के दुस्साहस वाले तीनों लडक़ों के जो नाम कुछ खबरों में सामने आ गए हैं, वे सारे ही मुस्लिम नाम हैं। अब मुस्लिम समाज के भीतर हिजाब के हिमायती लोग बिना हिजाब अपनी बच्चियों को पढऩे भेजने के भी खिलाफ रहते हैं। उनके मुताबिक लड़कियों को सारे बाल बांधकर और ढांककर रखने चाहिए। मर्दों के बनाए हुए जिन नियमों को यह समाज अपनी लड़कियों और महिलाओं पर ज्यादती के साथ थोपता है, वह समाज अपने लडक़ों को किस तरह तैयार करता है, यह भी मेरठ के इस मामले में साफ दिखता है। स्कूल राममनोहर लोहिया के नाम पर है, वहां पर बिना हिजाब छात्राएं भी दिख रही हैं। लेकिन हिजाब से ढंकी हुई एक शिक्षिका से खुली छेडख़ानी करने और उस पर गर्व करने वाले तमाम लडक़े मुस्लिम हैं। अब मुस्लिम समाज को यह सोचना चाहिए कि उन्होंने एक शिक्षिका पर तो हिजाब लादा हुआ है, कहने के लिए हो सकता है कि उस शिक्षिका ने अपनी पसंद से यह हिजाब बांधा हुआ हो, लेकिन इसी मुस्लिम समाज के लडक़े अपनी शिक्षिका के साथ अश्लील हरकतें कर रहे हैं, उन्हें दुस्साहस से रिकॉर्ड कर रहे हैं, और अब पुलिस कार्रवाई के बाद उनके परिवार शिक्षिका को ही धमका रहे हैं। यह धर्म के नाम पर हिजाब जैसे प्रतिबंध लागू करने वाले मुस्लिम समाज के सोचने की बात है कि उसे अपने लडक़ों की जुबान को बांधना था, उनकी उंगलियों को बांधना था, लेकिन वह तो किया नहीं गया, उन गुंडे लडक़ों को बचाया जा रहा है, और इस शिक्षिका का साथ नहीं दिया जा रहा है जिसने मुस्लिम समाज की हिजाब की परंपरा को ढोया है।
हम उत्तरप्रदेश में इस अराजकता के साथ-साथ मुस्लिम समाज के इस रिवाज के बारे में भी बात करना चाहते हैं कि जब तक समाज के लडक़े और मर्द इस तरह बिगड़े रहेंगे, तब तक महिलाओं पर नाजायज रोकटोक से भी कोई फायदा नहीं होगा। महिलाओं को आत्मविश्वास के साथ, और बराबरी से हक से जीने का मौका मिलना चाहिए, जो कि मुस्लिम, और बाकी समाज भी नहीं दे पा रहे हैं। इस एक मामले को समाज के सामने नमूने की तरह पेश करना चाहिए, इन लडक़ों को उम्र की रियायत की वजह से जो भी मामूली सजा मिलेगी, वह नाकाफी रहेगी, अदालत को इनके परिवारों पर भी कोई जुर्माना थोपना चाहिए। दूसरी तरफ स्कूल मैनेजमेंट के ऐसे बर्ताव को देखते हुए प्रिंसिपल और दूसरे जिम्मेदार लोगों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। एक ढकी हुई शिक्षिका अगर आज मवाली छात्रों की वजह से, और मैनेजमेंट की उदासीनता से आत्महत्या की कगार पर है, तो यह मामला एक सैंपल केस की तरह सामने रखने की जरूरत है कि कानून क्या कर सकता है।
हकीकत की जमीन से कटी हसरतें फंसाती हैं जालसाजी में
27 नवंबर 2022
अभी कुछ दिन पहले एक क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज डूब गया। उसकी वजह से दसियों हजार लोग भी डूब गए जिन्होंने उस एक्सचेंज के मार्फत पूंजीनिवेश किया था। यह लंबे समय से चले ही आ रहा था कि क्रिप्टोकरेंसी का कोई ठिकाना नहीं है कि वह कब डूब जाए, लेकिन फिर भी इस दुनिया में सपने पूरे करने के लिए तांत्रिक अंगूठी के खरीददार मौजूद हैं, सडक़ों पर लोग मदारी से तेल की शीशी खरीदने तैयार हैं, तो ऐसे में क्रिप्टोकरेंसी के खरीददार भी मौजूद हैं, और उसके मार्फत कारोबार करने वाले भी। जब दुनिया के कुछ सबसे बड़े कारोबारी किसी एक क्रिप्टोकरेंसी में पूंजीनिवेश की घोषणा करते हैं, तब बाकी लोगों का तो इस के झांसे में आ जाना तय है। और लोगों के पास इतना इफरात पैसा है कि चांद पर जमीन बेचने वाले लोगों से भी लोग कागज का एक टुकड़ा बड़े ऊंचे दामों पर खरीद रहे हैं, इसलिए क्रिप्टोकरेंसी आज धोखेबाजों और जालसाजों की पहली पसंद बन चुकी है।
अब ऐसे में कुछ हफ्ते पहले जब भारत के वीआईपी लोगों के लिए वॉट्सऐप पर बनाए गए एक क्रिप्टोकरेंसी पूंजीनिवेश सलाहकार ग्रुप में मुझे भी जोड़ा गया, तो इसका मजा लेने के लिए इन हफ्तों में मैं इस पर रोजाना चल रही बातचीत के सैकड़ों मैसेज देख रहा हूं। इसके ढेर सारे लोग, किसी एक गिरोह के मेंबरों की तरह लगातार यह पोस्ट कर रहे हैं कि उन्होंने कितने डॉलर लगाए, और एक दिन के भीतर उन्हें कितना मुनाफा हुआ। इसके बाद जालसाजों की टोली के बाकी लोग इस ग्रुप के विश्लेषक की तारीफ के कसीदे पढऩे लगते हैं कि एनालिस्ट ने उन्हें पिछले एक हफ्ते में कितने लाख रुपयों का फायदा करवा दिया है। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कोई और लिखने लगते हैं कि उन्होंने अगले दिन की ट्रेडिंग के लिए और कितने लाख रुपयों का इंतजाम करके रखा है। लोग अपने हसरत की कार के मॉडल की चर्चा करते हैं, कोई वहां पर महल सा मकान खरीदने की बात करते हैं, और दिन में कुछ बार उन्हें किसी एक खाते में सैकड़ों अमरीकी डॉलर एक या दो मिनट के भीतर जमा करने को कहा जाता है, और लोग उस पर टूट पड़ते हैं। ऐसे डिपॉजिट के असली या नकली स्क्रीन शॉट इसी ग्रुप में पोस्ट किए जाते हैं, और कुछ देर में लोग अपने कमाए मुनाफे की चर्चा करने लगते हैं।
यह पूरा सिलसिला पहली नजर में ही धोखाधड़ी और जालसाजी का दिख रहा है, जिसमें बिटकॉइन नाम की क्रिप्टोकरेंसी में पूंजीनिवेश करके आनन-फानन मोटा मुनाफा कमाने का झांसा दिया जा रहा है, और हिंदुस्तान के बाहर के किसी देश से चलाया जा रहा है यह वॉट्सऐप ग्रुप झारखंड के जामताड़ा से अनपढ़ नौजवानों के चलाए साइबर-ठगी किस्म का है, फर्क बस इतना है कि इसमें बैंक एटीएम कार्ड बंद होने का झांसा नहीं दिया जा रहा बल्कि डॉलर से क्रिप्टोकरेंसी में पूंजीनिवेश करके हर दिन लाखों-करोड़ कमाने का झांसा दिया जा रहा है।
अब हिंदुस्तान तो ऐसा देश है जिसमें लोग जमीन में गढ़ा खजाने पाने की उम्मीद में किसी तांत्रिक के झांसे में आकर कभी अड़ोस-पड़ोस के बच्चों की बलि दे देते हैं, तो कभी अपने खुद के बच्चों की भी। ऐसे लोगों के पास अगर बैंक खाते के मार्फत किसी तरह के लेन-देन की समझ और सहूलियत हो, तो वे क्रिप्टोकरेंसी के ऐसे झांसे का शिकार बनने के लिए एक पैर पर खड़े रहेंगे। और वही हो भी रहा है। लोगों के सपने असीमित हैं, असल जिंदगी में आगे बढऩे की संभावनाएं सीमित हैं, इसलिए लोग लडक़ी फंसाने के लिए वशीकरण मंत्र से लेकर तांत्रिक अंगूठी तक पाने पर आमादा हैं। जिन लोगों को हिंदुस्तानी फौज में नौकरी मिली हुई है, वे लोग भी फेसबुक पर अपनी खूबसूरती के जलवे बिखेरती किसी हसीना के जाल में फंसकर फौज की खुफिया जानकारी उसे देने पर आमादा हैं, और बदले में उस हसीना को पाने की चाहत ठीक वैसे ही है जैसी किसी इस्लामी आतंकी की चाहत होती है कि मजहब के लिए शहीद होने पर उसे जन्नत में 72 हूरें नसीब होंगी।
अब ऐसी चाहतों वाले लोगों को धोखा खाने से बचा पाना मुमकिन नहीं है। जिसकी हसरतें अपनी हकीकत से कटी हुई होती हैं, जमीन पर जिनके पांव नहीं टिके होते हैं, उन्हें झांसा देना अधिक आसान होता है। चाहे शेयर बाजार में पूंजीनिवेश हो, चाहे क्रिप्टोकरेंसी के रास्ते लाखों रुपये रोज कमाने के सपने हों, चाहे पेटीएम के शेयर में पूंजीनिवेश करके कमाने की ताजा-ताजा फ्लॉप हो चुकी कोशिश हो, तमाम किस्म के धोखे लोगों को तभी होते हैं, जब उनके सपने अपनी जमीन को छोडक़र मजहज आसमान में ही उडऩे लगते हैं। रोजाना ही ऐसे कई एसएमएस आते हैं कि उन्हें रोज पांच से दस हजार रुपये कमाई के घर बैठे काम के लिए छांटा गया है। और जिन लोगों को लगता है कि उनके ठलहा बैठे इतिहास के बाद भी उन्हें लाख-पचास हजार रुपये महीने के लायक समझा गया है, तो फिर वे ठगे जाने के ही लायक होते हैं। लोगों को अपने सपनों पर काबू रखना आना चाहिए, जागी आंखों की अपनी हसरतों को भी बेकाबू नहीं होने देना चाहिए, वरना जालसाजी और ठगी से उन्हें किसी देश की सरकार या पुलिस नहीं बचा सकते।
नेता को जब दूर का कुछ भी दिखना बंद हो जाता है तो...
27 नवंबर 2022
केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का ताजा ट्वीट
राहुल गांधी की एक तस्वीर के साथ है। राहुल की पहनी हुई शॉल पर ओम का
निशान उल्टा दिख रहा है इसलिए शिव की आरती करते राहुल की तस्वीर को स्मृति
ने उल्टा टांग दिया और लिखा कि अब ठीक है, ओम नम: शिवाय। स्मृति ईरानी जैसा
समर्पण बढ़ा दुर्लभ है। उन्होंने एक वक्त अपनी एक सहेली के पति के प्रति
ऐसा समर्पण रखा कि उस घर में आग लगा दी, और उसके पति को अपना पति बना डाला।
खैर यह बात उनके राजनीति में आने के बाद हम नहीं लिख रहे हैं, वे पहले भी
मॉडलिंग और टीवी पर अभिनेत्री थीं, और उस वक्त से ये बातें खबरों में अच्छी
तरह बनी हुई थीं। लेकिन किसी का इतिहास उसका पीछा तो नहीं छोड़ता है,
इसलिए स्मृति ईरानी की ये बातें भी विस्मृत नहीं होती हैं, और खबरों में
बनी रहती हैं। समर्पण की उनकी आदत पुरानी और मजबूत है। वे राजनीति में आईं,
तो उन्हें सोनिया-राहुल की अमेठी-रायबरेली सीटों पर झोंका गया, और वे वहीं
समर्पित होकर रह गईं। उनका सारा कामकाज इन्हीं दो नेताओं और इन्हीं दो
सीटों तक सीमित रह गया। आज सच तो यह है कि बिना गूगल किए हमें भी याद नहीं
है कि स्मृति ईरानी किस विभाग की मंत्री हैं। मंत्री की हैसियत से उनका
पिछला काम क्या था, यह भी किसी को याद नहीं होगा। एक वक्त जरूर वे अपनी
क्षमता से कई गुना अधिक की मानव संसाधन मंत्री बना दी गई थीं, और जल्द ही
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चूक समझ आ गई थी, और अगला मंत्रालय स्मृति
ईरानी को उनकी क्षमता के मुताबिक दिया गया था, लेकिन इतने बरस मंत्री रहते
हुए भी उनका कुल ध्यान इन दो संसदीय सीटों के मंत्री जितना ही रहा। उनकी
ताजा ट्वीट भी इसी का एक सुबूत है कि वे कितने काम के लायक हैं।
अब अगर राहुल के ओढ़े कपड़े को उल्टा दिखाने के लिए वे महादेव की आरती को उल्टा कर सकती हैं, तो उनके गढ़े हुए इस पोस्टर को हिंदुत्व के वे सैनिक तो बर्दाश्त कर सकते हैं जो कि नाम देखकर काम की भावना तय करते हैं। अब अगर आरती के दीयों को थामे हुए राहुल की इस तस्वीर को कोई धर्मनिरपेक्ष नेता पोस्ट करते, तो अब तक उनकी मां-बहन को बलात्कार की धमकियां मिलने लगतीं। लेकिन ये तो उनकी अपनी स्मृति ईरानी है, इसलिए किसी धमकी के खतरे की कोई बात नहीं है। इस फौज को भी मालूम है कि स्मृति ईरानी को कौन सा समर्पित काम दिया गया है, और यह फौज उनके पीछे खड़ी है। दिक्कत सिर्फ यही है कि स्मृति ईरानी की जो कोई भी राजनीतिक संभावनाएं हो सकती थीं, उन सबको इस एक समर्पण ने खत्म कर दिया है। लोगों को याद होगा कि सोनिया गांधी के खिलाफ सिर मुंडाकर, जमीन पर सोने की संसद में घोषणा करने वाली सुषमा स्वराज का आगे बढऩा उस नफरत के चलते ही खत्म हो गया था, और जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और उन्हें संसद के भीतर अपने से सीनियर सुषमा स्वराज को सोनिया-मंत्रालय देने की मजबूरी न रही, तो सुषमा स्वराज एकदम से हाशिए पर चली गई थीं। घाघ नेता अपने सैनिकों को इसी तरह छोटे-छोटे मोर्चो पर झोंक देते हैं। नरेन्द्र मोदी ने स्मृति ईरानी को केंद्र सरकार में जाने कौन सा मंत्रालय दिया है और असल में अमेठी-रायबरेली का मंत्री बनाया है। यह सिलसिला राहुल-सोनिया के महत्व को बढ़ाने का है, और स्मृति ईरानी की राजनीति को सीमित समेट देने का भी है। इसी मोदी सरकार में नितिन गडकरी जैसे दिग्गज मंत्री भी हैं जो कि घटिया बातें करने के बजाय बेहतर काम करके दिखाते हैं, और नेहरू की भी तारीफ करने का हौसला रखते हैं। लेकिन स्मृति ईरानी की चर्चा करते हुए नितिन गडकरी की बात करना गडकरी के लिए बेइंसाफी की बात होगी। जिस किसी की राजनीति एक संसदीय सीट, या उस सीट के विपक्षी नेता तक सीमित रह जाती है, वे महज एक सांसद बनने के लायक रह जाते हैं, और एक वक्त शायद ऐसा आएगा भी।
दहशत और नफरत के इन हरकारों के लिए स्टेडियम के आकार का कटघरा..
26 नवंबर 2022
उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर के एक नौजवान का एक
वीडियो सोशल मीडिया पर तैरा, और उसे एक खास विचारधारा की साइबर-फौज ने
दूर-दूर तक पहुंचाया। इस विचारधारा के जाने-माने लोग भी इस पर टूट पड़े
क्योंकि इसमें मुस्लिम दिखता यह नौजवान अपना नाम राशिद खान बतलाते हुए यह
कह रहा है कि श्रद्धा नामक युवती के 35 टुकड़े करके आफताब पूनावाला ने ठीक
किया था, वह तो 35 की जगह 36 टुकड़े कर सकता है। अब एक हिन्दू लडक़ी के साथ
ऐसा भयानक हैवानियत का काम करने वाले मुस्लिम युवक तो पकड़ाया जा चुका है,
अब एक दूसरा मुस्लिम दिखता, अपना नाम राशिद खान बतलाता यह नौजवान उस लाश का
एक टुकड़ा और करने की बात कर रहा है, तो यह बात देश में कई लोगों को
लगातार फैलाने लायक लगी। दसियों हजार लोग अपनी इस ड्यूटी पर जुट गए। अब एक
दिक्कत आ गई, उत्तरप्रदेश के योगीराज की पुलिस के बुलंदशहर के एसएसपी ने एक
वीडियो पोस्ट करके कहा कि सोशल मीडिया पर तैर रहे इस नौजवान के वीडियो की
जांच की गई, तो वह कोई राशिद खान नहीं, बुलंदशहर का विकास नाम का नौजवान
निकला जिसके खिलाफ पहले से जुर्म के पांच मामले दर्ज हैं। इसे झूठ फैलाने
और साम्प्रदायिकता के लिए गिरफ्तार भी कर लिया गया है। लेकिन इसके पहले
जैसी कि उम्मीद थी मुस्लिमविरोधी मानसिकता वाले दसियों हजार लोग ट्विटर पर,
और शायद लाखों लोग वॉट्सऐप पर फैला चुके हैं, और नफरत फैलाने के इस यज्ञ
में वे अपनी आहुति दे चुके हैं।
यहां पर सवाल यह उठता है कि दिल्ली के मजदूर बाजार में तीन सौ रूपये रोजी पर काम करने वाला यह हिन्दू नौजवान क्योंकर अपने को राशिद खान बताता है, और हिन्दू लडक़ी की लाश के और अधिक टुकड़े करने की वकालत करता है? यह सब उस वक्त हो रहा है जब गुजरात में चुनाव हैं, वहां पर ध्रुवीकरण का हाल यह है कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह कल ही वहां जाकर 2002 में सिखाए गए सबक के बाद की शांति गिना रहे हैं। इसी वक्त एक साजिश के तहत ऐसा वीडियो बनाया जाता है, विकास कुमार मुस्लिम हुलिए सरीखी दाढ़ी बना लेता है, अपना नाम राशिद खान रख लेता है, और देश के आज के एक सबसे हिंसक जुर्म की वकालत करते हुए उसे और आगे बढ़ाने की बात करता है। दो-तीन दिनों के भीतर यह वीडियो फर्जी साबित हो गया, लेकिन बुलंदशहर के एसएसपी का खंडन का वीडियो तो उन जगहों तक पहुंच नहीं सकेगा जहां तक विकास उर्फ राशिद खान के वीडियो को समर्पित या भत्ताभोगी साइबर-फौज पहुंचा चुकी है। जब तक सच जूतों के फीते बांधता है, तब तक झूठ शहर के दो फेरे लगा चुका रहता है। और जब देश की मानसिकता को सोच-समझकर, बड़ी साजिश और बड़ी कोशिश से साम्प्रदायिकता के लिए उपजाऊ जमीन बनाया जा चुका है, तो फिर अफवाहों को यह जमीन सोखने के लिए उसी तरह तैयार रहती है जिस तरह जून की जमीन पहली बारिश को सोखने तैयार रहती है। क्या इस वीडियो को महज संयोग कहा जा सकता है कि यह गुजरात चुनाव के ठीक पहले आया है, हिन्दी में बना हुआ है, इसका झूठ लोगों को बड़ी आसानी से समझ पड़ रहा है, और यह मुस्लिमों के खिलाफ दहशत और नफरत दोनों फैला रहा है? इस सिलसिले में मासूम कुछ भी नहीं है, हो भी नहीं सकता। जब देश में एक विचारधारा को किसी भी कीमत पर आगे बढ़ाने के लिए, किसी एक मजहब को किसी भी कीमत पर पीछे धकेलने के लिए समर्पित कार्यकर्ता और भाड़े के भोंपू दोनों ही अपार संख्या में मौजूद हैं, तो फिर धार्मिक ध्रुवीकरण करके लोकतांत्रिक चुनावों को धार्मिक जनमतसंग्रह क्यों न बना दिया जाए, यह तो एक बड़ा आसान काम है। जब विकास पर भरोसा न हो, तो फिर उसे राशिद खान नाम का खूनी खलनायक बनाकर पेश किया जा सकता है, और शायद वही हुआ भी है। ऑल्टन्यूज नाम की जिस फैक्टचेक वेबसाईट के दो संस्थापकों में से एक को अभी महीनों तक तरह-तरह के फर्जी मामले गढक़र बिना जमानत जेल में रखा गया था, और जिसे दिल्ली की एक अदालत ने जमानत देते हुए पुलिस को फटकार लगाई थी, उसने इस ताजा झूठ की सिलसिलेवार जांच करके सामने रखा है कि विकास के राशिद खान बनकर इस हिंसा की बात को सोशल मीडिया के किन प्रमुख लोगों ने, भाजपा के किन दिग्गज लोगों ने, किन-किन तथाकथित पत्रकारों ने हाथोंहाथ लिया और आगे बढ़ाया। यह इस देश की अदालत को सोचना है कि जब देश की सरकारें ऐसे संगठित और साजिश वाले जुर्म के खिलाफ कोई असरदार कार्रवाई करना नहीं चाहती हैं, तब अदालत का क्या जिम्मा बनता है? ऐसे मामलों की सुनवाई की नीयत अगर अदालत की सचमुच ही होगी, तो उसे कटघरे के लिए किसी स्टेडियम का इस्तेमाल करना होगा, और सोशल मीडिया के नफरतजीवी लोगों को हांककर वहां लाना होगा। और अगर ऐसी साजिशों और उन्हें बढ़ावा देने का यह सिलसिला इसी तरह चलने देना है, तो फिर लोकतंत्र और इंसानियत से बचने की उम्मीद करना बेकार होगा।
अपने बहुत बड़े जश्न को स्थगित रखने का हठयोग जो जानते हैं, उनकी बात..
25 नवंबर 2022
दुनिया का एक देश ऐसा है जहां की टीम मैच
जीतती है, तो भी वह देश जीतता है, और उसकी टीम अगर हार जाती है, तो भी वह
देश जीतता है। इसका नजारा कतर में चल रहे विश्वकप फुटबॉल में अभी देखने
मिला जब जापान में एक दिग्गज देश जर्मनी पर जीत पाई, और जापानी प्रशंसकों
ने जीत के जश्न को तब तक मनाना शुरू नहीं किया जब तक उन्होंने पूरा
स्टेडियम साफ नहीं कर दिए। जहां मैच खत्म होने की सीटी बजते ही खेल प्रशंसक
उत्साह से हिंसा तक कई किस्म से जश्न मनाना शुरू कर देते हैं, जापानी
दर्शकों ने आदतन कचरे की थैलियां निकालीं, और तमाम दर्शकों के फेंके गए
खाने के पैकेट और दूसरे चीजों का कचरा बंटोरना शुरू कर दिया। जब स्टेडियम
पूरा साफ हो गया, तब उन्होंने इस बड़ी जीत का जश्न मनाना शुरू किया। लोगों
ने याद किया कि चार बरस पहले रूस में हुए विश्वकप में जब उनकी टीम बेल्जियम
से हारी थी, तब भी जापानी दर्शकों ने ठीक इसी तरह स्टेडियम साफ किया था।
जापानी बच्चों को बचपन से ही स्कूल के क्लासरूम और बरामदे साफ करना सिखाया
जाता है, और वहां की स्कूलों का यह आम नजारा रहता है कि अपने इस्तेमाल की
जगहों को साफ करना सीखा जाए, और रोजाना किया जाए। जापानी जिंदगी के इस
तौर-तरीके पर फख्र भी करते हैं, और असल जिंदगी में इस पर सौ फीसदी अमल भी
करते हैं।
जो लोग फुटबॉल मैच देखने आठ हजार किलोमीटर से अधिक का सफर करके कतर आए हुए हैं, रहने की महंगी जगहों पर ठहरे हुए हैं, वे इतनी बड़ी जीत का रोमांच छोडक़र अपनी संस्कृति की इस बुनियादी सीख पर चल रहे हैं, तो वह एक बहुत बड़ा अनुशासन भी है। एक खूबी यह भी है कि वे अपनी सादगी और अपने अनुशासन को नुमाइश की तरह पेश नहीं कर रहे, उनका बस चलता तो वे अदृश्य रहकर भी यह सफाई कर लेते, लेकिन जब वह मुमकिन नहीं है, तो वे अपनी खुशी को स्थगित रखकर यह सफाई कर रहे हैं। इससे दुनिया के उन देशों को जरूर सीखना चाहिए जो अपनी मौजूद, या नामौजूद और महज मान ली गई संस्कृति पर गर्व करते हैं, अपने देश को सबसे अधिक गौरवशाली मानते हैं, और अपने को विश्वगुरू मानते हैं। एक वक्त जर्मनी में हिटलर ने अपनी नस्ल को दुनिया की सबसे अच्छी नस्ल माना था, और नस्लवादी हिंसा में उसने दसियों लाख लोगों का कत्ल किया था। कहीं कोई जाति अपने को सबसे अच्छा मानती है, तो कहीं कोई देश, और कहीं कोई धर्म। लेकिन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि जिस किसी बात पर उन्हें गर्व है, क्या उनका अपना चाल-चलन, उनका व्यवहार उस गर्व के लायक है? हिन्दुस्तान के लोगों को अब यह बात भूल चली होगी कि कुछ बरस पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में सफाई अभियान शुरू किया था, और उनके सहित देश के तमाम लोग झाड़ू लिए हुए सडक़ों पर पिल पड़े थे, जहां सडक़ें चकाचक थीं, वहां भी चुनिंदा साफ-सुथरा कचरा लाकर बिखेरा गया था, ताकि कैमरों के सामने उसे साफ किया जा सके। एक वीडियो तो ऐसा भी था जिसमें मोदी खुद कचरे का बोरा टांगे हुए किसी समुद्रतट पर कचरा बीनते दिख रहे थे। लेकिन कुछ महीनों के भीतर यह सिलसिला इतिहास बन गया। यह मानो काठ की हांडी में पकाया गया खाना था, और काठ, यानी लकड़ी, की हंडी बार-बार तो चूल्हे पर चढ़ती नहीं। नतीजा यह हुआ कि देश अब पहले के मुकाबले और अधिक गंदा है, लेकिन अब कोई सफाई की चर्चा भी नहीं करते, और तो और सफाई के इस इतिहास की सालगिरह भी नहीं मनाते। असल और दिखावे में यह एक बड़ा फर्क होता है कि कैमरे हटने के साथ-साथ दिखावा घर चले जाता है, और असल खड़े रहता है, कोई जश्न भी शुरू करने का जायज मौका रहने पर भी स्टेडियम साफ कर लेने तक। अपने ही भाड़े के कैमरों के सामने दिखावे के लिए इतिहास में एक बार सफाई करने वाला मुल्क विश्वगुरू नहीं हो जाता।
हिन्दुस्तान में तो लोगों का गंदगी करने का सिलसिला उनकी आर्थिक ताकत के अनुपात में रहता है। जो जितनी अधिक खरीदी कर सकते हैं, जितनी अधिक खपत कर सकते हैं, वे उसी अनुपात में कचरा पैदा करते हैं, और बिखराते हैं। दूसरी दिलचस्प बात इस विश्वगुरू के साथ यह है कि इसके सबसे संपन्न, और आमतौर पर सवर्ण भी, तबके का यह मानना है कि उसे दलित तबके के सफाई कर्मचारी दुनिया खत्म होने तक हासिल रहेंगे ही। अपनी कमाने और गंदगी फैलाने की क्षमता से अधिक भरोसा उन्हें दलितों की मौजूदगी पर है, और उन्हें यह पक्का भरोसा है कि दलित गटर में डूब-डूबकर कचरा साफ करने के लिए मौजूद रहेंगे, नालियों में तो वे उतरे ही रहेंगे, और घूरे के ढेरों पर हिन्दुस्तानी गरीब कचरा छांटते हुए इस पहाड़ को कम करते रहेंगे। सफाई करने वालों की अनंतकाल तक मौजूदगी का इतना पक्का भरोसा करने के लिए इस देश को विश्वगुरू होना तो जरूरी है ही। अगर किसी समाजविज्ञानी प्रयोग की तरह एक पखवाड़े कचरा साफ करना बंद हो जाए, गटर और नालियों को साफ करना बंद हो जाए, तो शायद विश्वगुरू-जमात के लोग एक बार यह सोचने को मजबूर होंगे कि अगर यह पखवाड़ा कुछ महीनों खिंच गया तो क्या होगा?
इस विश्वगुरू के साथ दिक्कत यह है कि इसने अपने इतिहास के और भी पहले के पौराणिक काल से लेकर अब तक झूठे गौरव के इतने सारे पेशेवर गवाह खड़े कर लिए हैं कि इसे सचमुच के किसी गौरव की कमी भी नहीं खलती। जब लोगों के पास अपना गढ़ा हुआ इतिहास हो, उसकी कहानियां भी अपने मनपसंद किरदारों को लेकर गढ़ी गई हों, इतिहास की ऐसी तमाम कहानियों को खारिज करने की भी ताकत हो जो कि बहुत गौरवशाली नहीं लगतीं, तो फिर ऐसे में अपनी खुद की नजर में अपने को विश्वगुरू बनाने का यह जोश कोई ठंडा नहीं कर सकते। कैमरों से परे हिन्दुस्तानी उतने ही गंदे हैं जितने गंदे वे हमेशा से रहते आए हैं, और यह गंदगी ताजा शहरी संपन्नता के साथ-साथ बढ़ती चल रही है। लेकिन इसी के साथ-साथ, इसी अनुपात में गर्व भी बढ़ते चल रहा है। जिस विश्वगुरू की अपनी जिंदगी देश के दलितों की आजीवन उपलब्धता के भरोसे पर टिकी है, उस विश्वगुरू के पास जापान जैसे देश से, जापानियों जैसे लोगों से भी सीखने का कुछ नहीं है। स्वघोषित विश्वगुरू सीखने से ऊपर उठ चुके होते हैं, कोई शिष्य रहकर ही सीख सकते हैं, गुरू बनकर नहीं, और हिन्दुस्तान तो आज विश्वगुरू है! उसका भला सीखने से क्या लेना-देना? उसके पास तो एक ऐसा पुराना इतिहास है जिसने यह तय कर रखा है कि कौन सी जातियां अपनी तमाम आने वाली पीढिय़ों सहित गटर साफ करने में लगी रहेंगी ताकि लोग इत्मिनान से गंदगी फैला सकें। इसलिए जापानियों को अगर दुनिया को सिखाने की कोई उम्मीद भी है, तो उन्हें कहीं और जाना चाहिए, हिन्दुस्तानी सीखने से बहुत ऊपर जा चुके हैं, विश्वगुरू को भला कोई क्या सिखाएंगे?
सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग में ऐसा आयुक्त चाहता है जो नाश्ते में नेताओं को खाए
24 नवंबर 2022
देश का चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की
प्रक्रिया पर जनहित के कई मुद्दे उठाने वाले देश के एक प्रमुख वकील प्रशांत
भूषण, और कई दूसरे लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की है, और इस
सुनवाई के चलते केन्द्र सरकार ने एक अफसर की रिटायर होने की अर्जी मंजूर
की, और खड़े-खड़े उसे चुनाव आयुक्त बना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर
चल रही सुनवाई के बीच ऐसी नियुक्ति से असहमति जताते हुए इसकी फाईल मंगवाई
है कि यह देखा जा सके कि इस नियुक्ति में कुछ गलत तो नहीं हुआ है। केन्द्र
सरकार के वकील ने अदालत की इस दिलचस्पी से असहमति जताई लेकिन अदालत ने उसे
दरकिनार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधानपीठ इस व्यापक महत्व के मुद्दे पर दायर की गईं कई याचिकाओं को जोडक़र सुनवाई कर रही है। इसमें इस बुनियादी बात को भी तय किया जाना है कि आज केन्द्र सरकार जिस तरह अपने पसंदीदा किसी रिटायर्ड अफसर को चुनाव आयुक्त बना देती है वह मनमानी किस तरह खत्म की जा सकती है। आज देश के इस एक सबसे नाजुक संवैधानिक दफ्तर में पसंदीदा लोगों को बिठाकर केन्द्र सरकार अपनी पसंद के चुनावी और राजनीतिक फैसलों की उम्मीद कर सकती है, और यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। लंबे समय से यह मांग की जा रही है, और विधि आयोग ने बहुत पहले से यह सिफारिश भी की है कि चुनाव आयुक्त छांटने के लिए कमेटी में नेता प्रतिपक्ष भी रहना चाहिए, ताकि सरकार अपनी मनमानी न कर सके। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार इन बातों को लिखते हैं कि रिटायरमेंट के बाद के ऐसे वृद्धावस्था पुनर्वास के लिए बहुत से अफसर आखिरी के कुछ बरसों में सत्ता की चापलूसी में लग जाते हैं, इसके साथ-साथ वे पुनर्वास के कार्यकाल में इस चापलूसी को जारी रखने का भरोसा भी दिलाते हैं। इसलिए हम बार-बार यह सुझाते आए हैं कि जिन राज्यों में कोई अफसर या जज काम कर चुके हैं, उन राज्यों में उन्हें कोई पुनर्वास नियुक्ति नहीं मिलनी चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर काबिल अफसरों और जजों की एक लिस्ट बननी चाहिए, और अलग-अलग प्रदेशों में उसमें से अपने प्रदेश के बाहर के लोगों को छांटा जाना चाहिए। ऐसा ही केन्द्र सरकार की सभी संवैधानिक नियुक्तियों पर होना चाहिए, बिना नेता प्रतिपक्ष या मुख्य न्यायाधीश के ऐसी नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए।
कल सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर दिलचस्प बहस चली और जजों ने कहा कि चुनाव आयोग में टी.एन.शेषन जैसे व्यक्ति रहने चाहिए ताकि जरूरत पडऩे पर प्रधानमंत्री के खिलाफ भी कोई कार्रवाई करनी हो तो आयोग में उसका हौसला हो। लोगों को याद होगा कि टी.एन.शेषन एक रिटायर्ड कैबिनेट सेक्रेटरी थे, और उन्हें प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया था। वे छह बरस इस कुर्सी पर रहे, और उन्होंने यह साबित कर दिया कि हिन्दुस्तान जैसे अराजक चुनावों वाले देश में चुनाव किस तरह ईमानदारी से करवाए जा सकते हैं, और इस संवैधानिक ओहदे की ताकत कितनी होती है। लोगों को शेषन की कही वह बात याद होगी कि वे नाश्ते में नेताओं को खाते हैं। शेषन का मामला कुछ अधिक नाटकीय था, उनके तौर-तरीके अधिक तानाशाह से थे, फिर भी उन्होंने चुनाव आयोग की सत्ता की इस लोकतंत्र में पहली बार स्थापित किया। लोग अब रिजर्व बैंक और चुनाव आयोग जैसी बहुत सी जगहों पर बिना रीढ़ के लोगों की आवाजाही देख रहे हैं, और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह शुरुआती रूख हौसला बढ़ाता है कि चुनाव आयोग में देश के सबसे अच्छे लोगों को ही लाया जाना चाहिए, और इसके लिए चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। मोटेतौर पर अदालत का रूख सिर्फ सरकार की मर्जी के चुनाव आयुक्त बनने के खिलाफ है, और भारत जैसे लोकतंत्र का यह लंबा तजुर्बा है कि किसी भी संवैधानिक पद को सिर्फ सरकार की मर्जी पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
भारत में केन्द्र हो या राज्य, सरकार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बहुमत से बनती हैं, और उस पर पांच बरस बाद चुनाव में जाने का एक दबाव भी रहता है। ऐसे में उसके फैसले हर वक्त ही चुनावी दबाव के रहते हैं, और सच तो यह है कि किसी भी सरकार को बिना चुनावी दबाव के पांच बरस भी नहीं मिलते हैं क्योंकि हर एक-दो बरस में इस देश में कहीं न कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। ऐसे में केन्द्र और राज्यों में सभी संवैधानिक या इस किस्म के दूसरे पदों पर नियुक्तियों में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, और सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीश की एक कमेटी होनी चाहिए, और इसमें खुलकर चर्चा के बाद नाम तय होना चाहिए। भारत में किसी भी सरकार और किसी भी निर्वाचित नेता को इतने अधिकारों के लायक नहीं माना जाना चाहिए कि वे अपने विवेक से ऐसे संवैधनिक पदों को तय कर लें। ऐसे फैसले एक व्यवस्था के तहत होने चाहिए, पारदर्शी तरीके से होने चाहिए, और अधिक बेहतर तो यह होगा कि इसके लिए लोगों की अर्जियां भी बुलाई जानी चाहिए। अभी सुप्रीम कोर्ट में यह मामला बहुत शुरुआती बहस देख रहा है, और कई बार जुबानी जमाखर्च फैसलों से बिल्कुल अलग भी रह जाती है, फिर भी जजों का यह रूख उम्मीद बंधाता है कि खुद प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी का चुनावी भविष्य जिस कुर्सी से प्रभवित हो सकता है, उस कुर्सी का फैसला अकेले प्रधानमंत्री या उनकी सरकार न लें। इस पर बहस दिलचस्प होगी, और हमारी उम्मीद है कि सरकार की लुकाछिपी अदालत में उजागर हो जाएगी, और देश को निष्पक्ष और ईमानदार चुनाव आयुक्त मिल सकेंगे।
ईरान की जनता और टीम, दोनों से सीखने की जरूरत
23 नवंबर 2022
कतर में हो रहे विश्व कप फुटबॉल में अपने
पहले मैच के पहले ईरान की टीम ने राष्ट्रगान नहीं गाया। आयोजकों की तरफ से
हर टीम के देश का राष्ट्रगान बजाया जाता है, और परंपरागत रूप से सभी
खिलाड़ी उसे गाते भी हैं। लेकिन ईरान में पिछले कुछ महीनों से जिस तरह जनता
सरकार के खिलाफ सडक़ों पर है, मानवाधिकार आंदोलन पर जिस तरह सरकारी जुल्म
टूट पड़े हैं, और करीब चार सौ मौतों का पिछले कुछ महीनों का ही अंदाज है,
उसे देखते हुए ईरानी फुटबॉल टीम ने अपने देश की जनता का साथ देने और सरकार
का विरोध करने का यह प्रतीकात्मक तरीका निकाला है। जाहिर है कि वे अपने देश
की टीम बनकर वहां उतरे थे, न कि देश की सरकार की टीम बनकर।
आज दुनिया में कई जगहों पर सरकारों के खिलाफ लोगों के आंदोलन चलते रहते हैं। जो लोकतांत्रिक देश हैं, वहां पर भी देश या प्रदेशों की सरकारें अपनी नीतियों और फैसलों के खिलाफ किसी जनआंदोलन को बर्दाश्त नहीं करतीं। अब यह उस देश में लोकतंत्र की मजबूती या कमजोरी की बात रहती है कि वहां पर जनआंदोलन कितने जिंदा रह पाते हैं। ईरान के बारे में जो कुछ भी सुनाई पड़ता है, वहां की सरकार एक धर्म की, कट्टर और दकियानूसी सरकार है, और उसका मानवाधिकार का बहुत ही खराब रिकॉर्ड रहा है। जो फुटबॉल टीम आज प्रतीकात्मक विरोध में राष्ट्रगान गाए बिना खेल रही है, उसकी घरवापिसी के बाद उसकी गिरफ्तारी हो सकती है, और उसे सजा हो सकती है। ईरान जैसा इस्लामिक देश ही क्यों, आज तो भारत जैसे लोकतांत्रिक इतिहास वाले देश को देखें, तो यहां पर भी अगर कोई टीम अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में इस तरह का प्रतीकात्मक विरोध करेगी, तो उसके देश लौटने के पहले ही सोशल मीडिया पर दसियों लाख लोग उसे गद्दार और देशद्रोही करार देंगे, और उसके लिए कैद की मांग करेंगे, एयरपोर्ट पर कालिख लिए उनका इंतजार करेंगे। जब दुनिया के ऐसे लोकतांत्रिक देश, जहां पर कि संवैधानिक संस्थाओं के ढांचे तो हैं, वहां पर भी जब लोगों के लिए अहिंसक और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध मुमकिन नहीं रह गया है, वह सजा का सामान बन गया है, तब ईरान की फुटबॉल टीम की बहादुरी की तारीफ की जानी चाहिए कि एक धर्मान्ध तानाशाह देश से कुछ दिनों के लिए बाहर आने पर भी उन्होंने ऐसा हौसला दिखाया है जो कि घर लौटने पर उनके लिए कैद और सजा का सामान बनना तय है।
ईरान के खिलाडिय़ों के इस हौसले से दूसरे देशों के और लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि ईरान के मुकाबले अधिक आजादी वाले देशों को अगर अपनी जमीन पर हक अधिक मिलते हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी अधिक होती है। हिन्दुस्तान में खासकर यह देखने में आ रहा है कि सरकारों के जुल्म के सामने लोकतांत्रिक हौसले घुटने टेक दे रहे हैं। जुल्म का सिलसिला इतना लंबा है कि सामाजिक आंदोलनकारियों को कई-कई बरस बिना जमानत जेल में रखा जा रहा है। यह जरूर है कि कुछ महीनों के भीतर जिस तरह ईरान में सैकड़ों लोगों को सरकारी दस्तों ने मार डाला है, उतनी बुरी नौबत हिन्दुस्तान में नहीं है, लेकिन दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के लोगों को यह समझना चाहिए कि ईरान की अवाम के मुकाबले आज वे कितने महफूज बैठे हुए हैं, और कट्टरपंथी और जुल्मी ईरान सरकार के मुकाबले वहां की जनता किस हौसले से खड़ी है। अब या तो एक बात यह भी हो सकती है कि जुल्म का सिलसिला जब हद पार कर जाता है तब जनता उठ खड़ी होती है। ईरान में जिस तरह हिजाब न पहनने, या खिसक जाने पर एक लडक़ी को सरकारी नैतिक-पुलिस ने कैद में मार ही डाला, और उसी को एक प्रतीक मानकर ईरानी महिलाओं के आजादी के हक के लिए जिस तरह वहां का हर तबका उठकर खड़ा हो गया है, वह एक बहुत ही अभूतपूर्व नौबत है, और इससे दुनिया भर की अलोकतांत्रिक सरकारों को जाग जाना चाहिए। जागना तो सरकारों से परे दुनिया भर की जनता को भी चाहिए कि ईरानी जनता हक की लड़ाई की जैसी मिसाल बनकर उभरी है, उसे देखकर दूसरे देशों में भी लोगों को सीखना चाहिए, अपनी सामाजिक जवाबदारी पूरी करनी चाहिए।
जिस तरह सरकारें एक-दूसरे के जुल्म देखकर जुल्म की नई तरकीबें सीखती हैं, उसी तरह जनता को भी लोकतांत्रिक आंदोलनों की दूसरी मिसालें देखकर अपने भीतर ऐसे आंदोलन का हौसला पैदा करना चाहिए। एक तरफ हिन्दुस्तान में अंग्रेजों से अहिंसक लड़ाई लड़ रहे गांधी और उधर अमरीका में मानवाधिकार के लिए लड़ रहे मार्टिन लूथर, किंग जूनियर के सामने स्थितियां बिल्कुल अलग-अलग थीं, दोनों की कभी मुलाकात नहीं हुई थी, लेकिन किंग ने गांधी की अहिंसा की सोच को पढक़र अपना एक रास्ता बनाया था, और लिखा था कि गांधी उनके लिए राह दिखाने वाली रौशनी रहे। दो लोगों के बीच दुनिया में कोई बात होना भी जरूरी नहीं रहता, पाकिस्तान ने लड़कियों के पढऩे के हक के लिए कट्टरपंथी आतंकियों की गोलियां खाने वाली मलाला हो, या विकसित देशों के बीच से पर्यावरण बचाने के लिए लडऩे वाली ग्रेटा थनबर्ग हो, उनकी मिसालें ही दुनिया में बहुत से लोगों को हौसला देती हैं, राह दिखाती हैं। ईरान की फुटबॉल टीम और ईरान में देश भर में सडक़ों पर आंदोलन कर रही जनता आज दुनिया भर के सामने एक बड़ी मिसाल हैं, और दुनिया को इनसे सीखने का मौका चूकना नहीं चाहिए। दुनिया की सरकारें तो कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जाल के चलते एक-दूसरे के खिलाफ कुछ नहीं बोलती हैं, लेकिन आम जनता को तो दूसरे देश की लोकतांत्रिक अवाम के साथ खड़ा रहना आना चाहिए। हिन्दुस्तान की सरकार और हिन्दुस्तान की जनता, इन दोनों की सोच भी अलग-अलग हो सकती है, और दोनों के तरीके भी अलग-अलग हो सकते हैं। जनता को अपने देश की सरकार से परे अपनी खुद की अंतरराष्ट्रीय नैतिक जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
हिंसा की ताजा वारदातों से उपजते हैं कई सवाल
22 नवंबर 2022
लिव-इन-रिलेशनशिप में एक मुस्लिम ने हिन्दू
लडक़ी के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, तो हिन्दू समाज का मुस्लिमविरोधी तबका इस पर
उबला हुआ है। जवाब में बहुत से समझदार लोगों ने ऐसी कई खबरें पोस्ट की हैं
जिनमें किसी हिन्दू ने किसी गैरहिन्दू जीवनसाथी को मारा है। ऐसी खबरें
तलाशने के लिए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी, ये खबरें इंटरनेट पर खूब अच्छे
से सभी वेबसाईटों पर आई हुई हैं, और उनके सच होने में होने कोई शक नहीं है।
अब इस एक ताजा घटना को लेकर इस किस्म की या दूसरी पारिवारिक हिंसा की और
बहुत सी खबरें बढ़-चढक़र सामने आ रही हैं। मथुरा में हाईवे के किनारे एक
सूटकेस में एक युवती की खून से सनी लाश मिली, और पुलिस ने न सिर्फ दिल्ली
की इस लडक़ी की शिनाख्त कर ली बल्कि यह भी पता लगा लिया कि लडक़ी ने मर्जी से
शादी की थी, और उसकी मां की मदद से बाप ने अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर से उसे
मार डाला, और सूटकेस में बंद करके हाईवे किनारे फेंक आए। लाश ठिकाने लगाने
में मां भी बराबरी से साथ गई थी। परिवार में सभी हिन्दू थे, और जिस लडक़े से
उसने शादी की थी, वह भी हिन्दू ही था, बस अलग जाति का था।
परिवारों के भीतर जितनी भयानक हिंसा हो रही है, वह दिल दहलाती है और चौंकाती भी है। अपनी ही औलाद को, या अपने ही पति-पत्नी को इस बुरी तरह मारना, और खबरों से यह जानकारी पाने के बाद मारना कि ऐसे तमाम कातिल जल्द ही पकड़ में आ जाते हैं, क्योंकि पुलिस किसी लाश के मिलने पर सबसे पहले आसपास में कातिल ढूंढना शुरू करती है। और अब मोबाइल फोन, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की मेहरबानी से इस किस्म के तमाम जुर्म पकडऩा आसान हो गया है। पारिवारिक या पहचान के, प्रेमसंबंधों के कातिलों का पकड़ा जाना बस दो-चार दिनों की बात होती है, लेकिन लोग हैं कि जाने किस अतिआत्मविश्वास में ऐसे कत्ल करके बैठे रहते हैं। अभी चार दिन पहले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक दुकानदार नौजवान ने अपनी प्रेमिका के लाखों रूपये शेयर मार्केट में गंवा देने के बाद उसके पैसे मांगने पर अपनी दुकान में उसका कत्ल कर दिया, और फिर अपनी ही कार में उस लाश को रखकर शहर में ही एक जगह उसे छोड़ दिया, और दुकान चलाने लगा। अब इसमें लाश की बरामदगी और इस नौजवान की गिरफ्तारी में एक-दो दिन से अधिक लगने भी नहीं थे, और यह गिरफ्तारी तेजी से हो गई, लेकिन दूसरों की खबरों को पढऩे वाले हत्यारे भी क्या सोचकर ऐसा गेम करते हैं जिसमें उनका गिरफ्तार होना महज वक्त की बात रहती है, यह हैरान करने वाली बात है।
हिन्दुस्तान इतना बड़ा देश है कि यहां पर इस किस्म के जुर्म को किसी जाति या धर्म से जोडक़र देखना नासमझी होगी। हर धर्म और जाति में ऐसे मुजरिम मिल रहे हैं, और जुर्म के पहले तक के तनातनी के रिश्ते मिल रहे हैं। अभी जब प्रेमिका की लाश के 35 टुकड़े करके नया फ्रिज खरीदकर उसमें भरकर रखा गया, और रोज दो-दो टुकड़े जंगल में फेंके गए, तो इस खबर को पढक़र साम्प्रदायिक लोगों ने बड़े फ्रिज को ऊंचे कद की हिन्दू लडक़ी से जोडक़र मुस्लिम समुदाय पर हमला किया, तो कई लोगों ने ऐसे लतीफे गढ़े कि कोई बीवी रोज झगड़ा करती थी, लेकिन जब से उसका पति घर में एक बड़ा फ्रिज लेकर आया है, तब से वह चुप रहने लगी है। पारिवारिक या प्रेमसंबंधों की हिंसा को मजाक का सामान बना लेना यही बताता है कि समाज में लोग हिंसा के आदी हो चल रहे हैं, करने के न सही, तो कम से कम देखने और बर्दाश्त करने के। जिस समाज में बलात्कार की घटनाएं लोगों को चौंकाना बंद कर चुकी होती हैं, वहां पर बलात्कार को लेकर लतीफे बनने लगते हैं। सोशल मीडिया की मेहरबानी से हिन्दुस्तान अपने लोगों की ऐसी हर किस्म की बीमार और हिंसक सोच का गवाह बनते चल रहा है।
अब इस चर्चा में सोचने की एक बात यह है कि परिवार के भीतर के रिश्ते हों, या फिर प्रेमसंबंध हों, लोग अपने भूतकाल के साथ जीना क्यों नहीं सीख पाते? अगर बालिग औलाद है, और वह अपनी मर्जी से शादी करके कहीं चली गई है, तो फिर मां-बाप को उसमें खानदान की इज्जत का मुद्दा बनाकर खूनखराबा क्यों करना चाहिए? इसी तरह प्रेमसंबंध जब तक चले, तब तक चले, उसके बाद अगर नहीं निभता है, तो किसी को मारने पर क्यों उतारू होना चाहिए? लोग दरअसल अपने भूतकाल के साथ जीना नहीं सीख पाते, फिर चाहे वह भूतपूर्व मालिक और भूतपूर्व नौकर का रिश्ता ही क्यों न हो। अच्छे-खासे पढऩे-लिखने वाले लोग भी अपनी बकाया जिंदगी अपने भूतपूर्व मालिक या नौकर के खिलाफ लिखने, बोलने, और भडक़ाने को समर्पित कर देते हैं। लोग भूतकाल की फिक्र में इतने डूब जाते हैं कि वे जुर्म के बाद के अंधेरे भविष्य की भी नहीं सोच पाते। यह सिलसिला लोगों के मानसिक रूप से विकसित न होने की वजह से भी होता है। वे पढ़-लिख तो लेते हैं, पढ़े-लिखे लोगों सरीखी जिंदगी भी गुजारते हैं, लेकिन उनमें समझ नहीं आ पाती। कभी वे परिवार की साख के नाम पर ऑनरकिलिंग पर उतारू हो जाते हैं, तो कभी रिश्तों पर पूर्णविराम लगाकर नई जिंदगी शुरू करने के बजाय बाकी की जिंदगी जेल में गुजारने जैसा काम कर बैठते हैं।
लोगों को पहले तो समाज, फिर अपने आसपास के दायरे, और फिर खुद के बारे में यह सोचना चाहिए कि क्या किसी भी वजह से कोई ऐसा जुर्म करना चाहिए जिससे कि बाकी की पूरी जिंदगी खुद जेल में रहें, और बाकी परिवार बर्बाद रहे?
सजायाफ्ता मुजरिमों के जीवनसाथी के क्या हक?
21 नवंबर 2022
जिन दिनों इस जगह पर लिखने के लिए आसानी से
कोई मुद्दा नहीं सूझता, अदालती खबरें एक अच्छा जरिया होती है। अदालतों में
इतने किस्म के मामले पहुंचते हैं कि उनमें से बहुत से मामलों के मानवीय या
लोकतांत्रिक, सरकारी या संवैधानिक पहलू कुछ न कुछ लिखने को मजबूर करते हैं।
ऐसा ही एक मामला अभी सुप्रीम कोर्ट से आया है जिसमें राजस्थान हाईकोर्ट के
एक फैसले पर रोक लगाई गई है। राजस्थान में बलात्कार के एक मुजरिम को
नाबालिग लडक़ी से गैंगरेप के मामले में बीस साल की कैद हुई थी, और सजा शुरू
होते ही उसकी पत्नी ने बच्चा पैदा करने के अपने मौलिक अधिकार का हवाला देते
हुए पति को एक महीने की पैरोल देने की याचिका अदालत में लगाई थी। मामला
राजस्थान हाईकोर्ट में पन्द्रह दिन की पैरोल के साथ निपटाया गया। यह तर्क
एक हिसाब से सही था क्योंकि बीस बरस की कैद काटकर निकलने के बाद यह मुजरिम
अपनी पत्नी के साथ इस उम्र में पहुंचा रहता कि उनके बच्चे शायद न भी हो
पाते, इसलिए पत्नी की यह अपील तर्कसंगत थी। लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट ने
राजस्थान सरकार में इसके खिलाफ तर्क दिया कि राजस्थान के पैरोल नियमों के
मुताबिक रेप या गैंगरेप के मामलों में पैरोल नहीं दिया जा सकता। इस तर्क के
बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है।
हमने पहले भी कई मौकों पर यह बात लिखी है कि जेल में बंद कैदी के जीवनसाथी के अधिकारों को रोकना जायज नहीं होगा, और उनके हक का ख्याल रखते हुए कैद के दौरान भी जीवनसाथी को एक न्यूनतम देह-संबंध बनाने की सहूलियत मिलनी चाहिए। हम कई बरस से इस बारे में लिखते आ रहे थे, और अभी सितंबर 2022 में पंजाब देश का पहला ऐसा राज्य बना है जिसने सजायाफ्ता मुजरिमों को अच्छे चाल-चलन के आधार पर उनके जीवनसाथी के साथ देह-संबंध बनाने की छूट दी है, और जेलों को इसका इंतजाम करने को कहा है। दुनिया के दर्जन भर प्रमुख देशों में ऐसी छूट है, और इनमें पाकिस्तान तक शामिल है। पंजाब की तीन चुनिंदा जेलों से इसकी शुरुआत हो रही है, और जेल की सहूलियतों के मुताबिक दो महीनों में एक बार दो घंटे के लिए अच्छे चाल-चलन वाले कैदियों को इसकी छूट मिलेगी। इससे वे जेल में अपना चाल-चलन बेहतर रख सकेंगे, और परिवार भी टूटने से बच सकेगा। जेलों में बंद महिलाओं को भी इसकी सहूलियत मिलने जा रही है। परिवार-मुलाकात नाम का यह कार्यक्रम कैदियों के जीवनसाथियों के संक्रामक रोग से मुक्त होने पर ही हो सकेगा।
राजस्थान का मामला इससे थोड़ा सा अलग भी है, और कुछ-कुछ इस किस्म का भी है। भारतीय न्याय व्यवस्था और सरकारों के अधिकारों के तहत एक कैदी को इंसान बने रहने की कितनी सहूलियत दी जा सकती है, दी जानी चाहिए, यह अदालतों और सरकार दोनों को अलग-अलग, और मिलकर भी तय करना होगा। हमारा यह मानना है कि सजा किसी को तकलीफ देने के अकेले मकसद से नहीं होने चाहिए। सजा का मकसद लोगों में सुधार की कोशिश होनी चाहिए, और यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सजा के बाद लोगों को लौटकर अपने उसी परिवार में वापिस आना है, उसी समाज में जीना है। इन सब बातों को ध्यान में रखें, तो राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला सही लगता है जिसने एक पत्नी के गर्भवती होने, और बच्चे पैदा करने के हक का सम्मान किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस फैसले के खिलाफ कोई फैसला नहीं दिया है, महज उस पर रोक लगाई है, हो सकता है कि इस मामले में आखिरी फैसला हाईकोर्ट सरीखा ही आए। राजस्थान सरकार को भी यह समझने की जरूरत है कि अगर बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के मामलों में पैरोल न देने का नियम उसने बनाया हुआ है, तो क्या इससे सचमुच ही किसी कैदी में सुधार की संभावनाएं बढ़ जाती हैं? पंजाब में हमने बलात्कार के एक चर्चित बाबा, राम-रहीम को कई बार जेल से बाहर पैरोल पर आते देख लिया है। अगर राजस्थान सरकार पैरोल से मना करती है, तो भी वह पंजाब की परिवार-मुलाकात योजना की तरह की कोई सहूलियत शुरू कर सकती है जिससे कि मुजरिमों के जीवनसाथियों को उनके मौलिक अधिकार मिल सकें।
दरअसल जुर्म और सजा का सारा इंतजाम दुनिया के देशों में लोकतंत्र, मानवाधिकार, और सभ्यता के विकास से जुड़ा रहता है। जो देश इन बुनियादी मूल्यों के पैमानों पर कमजोर रहते हैं, वहां पर मौत की सजा भी दी जाती है, और कुछ अलोकतांत्रिक देशों में कैदियों के हाथ-पैर भी काटे जाते हैं। जैसे-जैसे देशों की सभ्यता विकसित होती है, वैसे-वैसे वहां पर लोगों के मौलिक अधिकारों की फिक्र बढ़ती है जिनमें कैदी भी शामिल होते हैं। भारत के सभी प्रदेशों को पंजाब की तरह परिवार-मुलाकात का इंतजाम करना चाहिए क्योंकि कैदियों के जीवनसाथियों को बिना किसी जुर्म के ऐसे अलगाव की सजा न मिले। यह अच्छा है कि राजस्थान का यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा हुआ है, और सुप्रीम कोर्ट के सामने आज यह मौका है कि वह राजस्थान सरकार के इस विरोध की रौशनी में पंजाब सरकार के उदार और मानवीय इंतजाम को भी परख सके, और पूरे देश के लिए एक सरीखी एक नीति बना सके। भारत सरीखे लोकतंत्र में बहुत से अदालती फैसले किसी एक छोटी सी अपील से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच से निकलते हैं, और पूरे देश पर लागू होते हैं। भारत की जेलों में कैदियों की बदहाली की खबरें तो बहुत आती हैं, लेकिन अगर जेलों को सचमुच ही सुधारगृह बनाना है, तो कैदियों को, और उनके परिवारों को इंसान मानकर उन्हें कुछ हक देने भी पड़ेंगे।
विम्बलडन से भारतीय संसद तक महिलाओं के हक बड़े ही मुश्किल
20 नवंबर 2022
करीब डेढ़ सौ बरस पुराने, दुनिया के सबसे मशहूर टेनिस टूर्नामेंट, विम्बलडन, का एक नियम अब जाकर बदला है जिसके बाद अगले बरस से महिला खिलाडिय़ों को अपनी टेनिस ड्रेस के भीतर रंगीन अंडरवियर पहनने की छूट मिलेगी। लंबे समय से महिला खिलाडिय़ों की यह मांग चली आ रही थी कि माहवारी के दौरान उनके दिमाग में लगातार यह तनाव रहता है कि खेलते हुए उनकी सफेद अंडरवियर पर खून के दाग न दिखने लगें। यह मामला उस ब्रिटेन का है जो कि पश्चिम में एक विकसित लोकतंत्र माना जाता है, और वहां पर पुरूषों के दबदबे वाले विम्बलडन में महिलाओं की इस बुनियादी जरूरत को समझने में, मानने में डेढ़ सौ बरस लगे हैं। यहां पर महिलाओं के मुकाबलों का इतिहास 1984 से चले आ रहा है, और यहां चैम्पियन बनने वाली महिलाएं किसी भी मायने में पुरूष खिलाडिय़ों से कम चर्चित नहीं रहती हैं, लेकिन महिलाओं की इस बुनियादी जरूरत को मानने का काम अब जाकर हो पाया है। जैसा कि टेनिस देखने वाले जानते हैं, महिलाओं का खेल का ड्रेस छोटा होता है, और उनकी अंडरवियर दिखती ही रहती है। ऐसे में इतनी भाग-दौड़ वाले खेल में महिलाओं को अगर अपनी बदन की जरूरत के लिए विम्बलडन संचालकों को बरसों तक समझाना पड़ा, तो यह महिलाओं के खिलाफ पुरूषप्रधान दबदबे का एक सुबूत छोड़ और कुछ नहीं है।
महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह पूरी ही दुनिया में अलग-अलग शक्लों में हमेशा ही रहा है। कहने के लिए अमरीका का लोकतंत्र हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के मुकाबले डेढ़ सौ से अधिक बरस पुरानी है, लेकिन जब गुलाम हिन्दुस्तान के राज्यों में एक-एक प्रदेश में महिलाओं को वोट देने का हक मिल रहा था, तकरीबन उसी समय अमरीका में भी महिलाओं को वोट देने का संवैधानिक हक दिया गया। हिन्दुस्तान के पहले चुनाव से ही यहां के दलितों को वोट देने का बराबरी का हक था, लेकिन अमरीका में लोकतंत्र के बाद करीब एक सदी लग गई जब काले मर्दों को वोट देने का हक मिला, और इसके बाद काली महिलाओं को वोट देने के हक में और एक सदी लग गई। भेदभाव का यह सिलसिला संविधान और कानून में हिन्दुस्तान में तो पहले दिन से खत्म था, लेकिन अमरीका जैसे लोकतंत्र में बराबरी का यह बुनियादी हक देने में सदियां लग गईं। अमरीका में लोकतंत्र आने के करीब दो सदी बाद काली महिलाओं का वोट डालना शुरू हो पाया।
अभी जब हिन्दुस्तान में अनारक्षित तबके के गरीब लोगों को आरक्षण देने पर सुप्रीम कोर्ट का बहुमत से सहमति का फैसला आया, उस वक्त यह बात भी उठी कि आरक्षण के पैमाने पूरी तरह से इंसाफ नहीं कर पाते हैं। जहां पर दलितों या आदिवासियों को आरक्षण हैं, वहां पर उनके बीच की एक चौड़ी और गहरी खाई को आरक्षण के नियम अनदेखा करते हैं। आरक्षित तबके के भीतर शहरी और ग्रामीण के बीच बड़ा फासला है, लडक़े और लडक़ी के बीच बड़ा फासला है, संपन्न और विपन्न के बीच तो बड़ा फासला है ही, लेकिन दलित और आदिवासी आरक्षण में इनमें से किसी समस्या का कोई समाधान नहीं है। महज जन्म के आधार पर सबको एक बराबरी से आरक्षण का हकदार मान लिया गया है। एक लडक़ी या महिला को उसके लडक़ी या महिला होने से जो नुकसान झेलना पड़ता है, उसका कोई इलाज आरक्षण में नहीं हैं।
हमने बात विम्बलडन से शुरू जरूर की है, लेकिन वहीं पर खत्म नहीं हो रही है। भारतीय संसद में महिला आरक्षण विधेयक दशकों से पड़ा हुआ है लेकिन बड़ी राजनीतिक पार्टियां उसे पास करना नहीं चाहतीं। जबकि इस देश में 1993 से एक संविधान संशोधन करके पंचायत स्तर तक महिला आरक्षण किया गया जो कि कामयाबी से काम कर रहा है। उसी वक्त संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण की बात कही गई, लेकिन आज तक यह कानून नहीं बन पाया। संसद और विधानसभाओं में गांव-गांव तक में महिला नेतृत्व को संभव मान लिया, और पंचायतों के पंच पदों पर भी महिला आरक्षण कर दिया, लेकिन संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण देने से भी पुरूषप्रधान व्यवस्था को तकलीफ हो रही है। विम्बलडन से हिन्दुस्तानी संसद तक, महिलाओं को उनके हक देने के मामलों में मर्दों की टालमटोल एक सरीखी है। आज हालत यह है कि न तो संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं को आरक्षण है, बल्कि राजनीतिक दल एक तिहाई महिलाओं को टिकट भी नहीं देते। उत्तरप्रदेश के जिस पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इक्का-दुक्का सीट छोड़ जीत की और कोई उम्मीद नहीं थी, वहीं पर प्रियंका गांधी ने लडक़ी का नारा लगाकर 40 फीसदी उम्मीदवार महिलाओं को बनाया था। लेकिन उसके बाद पंजाब के चुनाव हुए, अभी हिमाचल के चुनाव हुए, गुजरात के हो रहे हैं, कहीं भी कांग्रेस पार्टी ने न तो 40 फीसदी महिलाओं को टिकट दी, न ही एक तिहाई सीटों पर महिलाओं को लड़वाया। अगर संसद में आरक्षण पास नहीं हो सका है, तब भी किसी पार्टी को तो कोई नहीं रोकते कि वे एक तिहाई महिला उम्मीदवार न बनाएं।
जिस ब्रिटेन को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है, जो उन गिने-चुने देशों में से है जहां महिला प्रधानमंत्री रही हैं, वहां भी महिलाओं की चड्डी का रंग तय करने में पुरूषों को मजा आता है। पूरी दुनिया में महिलाओं की हक की लड़ाई तेज करने की जरूरत है, और हिन्दुस्तान में भी आए दिन यह जरूरत दिखती ही है। सोशल मीडिया की मेहरबानी से यह लड़ाई अब पहले के मुकाबले कुछ आसान हुई है, और लोगों को बराबरी के हक की बात उठाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहिए।
विम्बलडन से भारतीय संसद तक महिलाओं के हक बड़े ही मुश्किल
20 नवंबर 2022

करीब डेढ़ सौ बरस पुराने, दुनिया के सबसे मशहूर टेनिस टूर्नामेंट, विम्बलडन, का एक नियम अब जाकर बदला है जिसके बाद अगले बरस से महिला खिलाडिय़ों को अपनी टेनिस ड्रेस के भीतर रंगीन अंडरवियर पहनने की छूट मिलेगी। लंबे समय से महिला खिलाडिय़ों की यह मांग चली आ रही थी कि माहवारी के दौरान उनके दिमाग में लगातार यह तनाव रहता है कि खेलते हुए उनकी सफेद अंडरवियर पर खून के दाग न दिखने लगें। यह मामला उस ब्रिटेन का है जो कि पश्चिम में एक विकसित लोकतंत्र माना जाता है, और वहां पर पुरूषों के दबदबे वाले विम्बलडन में महिलाओं की इस बुनियादी जरूरत को समझने में, मानने में डेढ़ सौ बरस लगे हैं। यहां पर महिलाओं के मुकाबलों का इतिहास 1984 से चले आ रहा है, और यहां चैम्पियन बनने वाली महिलाएं किसी भी मायने में पुरूष खिलाडिय़ों से कम चर्चित नहीं रहती हैं, लेकिन महिलाओं की इस बुनियादी जरूरत को मानने का काम अब जाकर हो पाया है। जैसा कि टेनिस देखने वाले जानते हैं, महिलाओं का खेल का ड्रेस छोटा होता है, और उनकी अंडरवियर दिखती ही रहती है। ऐसे में इतनी भाग-दौड़ वाले खेल में महिलाओं को अगर अपनी बदन की जरूरत के लिए विम्बलडन संचालकों को बरसों तक समझाना पड़ा, तो यह महिलाओं के खिलाफ पुरूषप्रधान दबदबे का एक सुबूत छोड़ और कुछ नहीं है।
महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह पूरी ही दुनिया में अलग-अलग शक्लों में हमेशा ही रहा है। कहने के लिए अमरीका का लोकतंत्र हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के मुकाबले डेढ़ सौ से अधिक बरस पुरानी है, लेकिन जब गुलाम हिन्दुस्तान के राज्यों में एक-एक प्रदेश में महिलाओं को वोट देने का हक मिल रहा था, तकरीबन उसी समय अमरीका में भी महिलाओं को वोट देने का संवैधानिक हक दिया गया। हिन्दुस्तान के पहले चुनाव से ही यहां के दलितों को वोट देने का बराबरी का हक था, लेकिन अमरीका में लोकतंत्र के बाद करीब एक सदी लग गई जब काले मर्दों को वोट देने का हक मिला, और इसके बाद काली महिलाओं को वोट देने के हक में और एक सदी लग गई। भेदभाव का यह सिलसिला संविधान और कानून में हिन्दुस्तान में तो पहले दिन से खत्म था, लेकिन अमरीका जैसे लोकतंत्र में बराबरी का यह बुनियादी हक देने में सदियां लग गईं। अमरीका में लोकतंत्र आने के करीब दो सदी बाद काली महिलाओं का वोट डालना शुरू हो पाया।
अभी जब हिन्दुस्तान में अनारक्षित तबके के गरीब लोगों को आरक्षण देने पर सुप्रीम कोर्ट का बहुमत से सहमति का फैसला आया, उस वक्त यह बात भी उठी कि आरक्षण के पैमाने पूरी तरह से इंसाफ नहीं कर पाते हैं। जहां पर दलितों या आदिवासियों को आरक्षण हैं, वहां पर उनके बीच की एक चौड़ी और गहरी खाई को आरक्षण के नियम अनदेखा करते हैं। आरक्षित तबके के भीतर शहरी और ग्रामीण के बीच बड़ा फासला है, लडक़े और लडक़ी के बीच बड़ा फासला है, संपन्न और विपन्न के बीच तो बड़ा फासला है ही, लेकिन दलित और आदिवासी आरक्षण में इनमें से किसी समस्या का कोई समाधान नहीं है। महज जन्म के आधार पर सबको एक बराबरी से आरक्षण का हकदार मान लिया गया है। एक लडक़ी या महिला को उसके लडक़ी या महिला होने से जो नुकसान झेलना पड़ता है, उसका कोई इलाज आरक्षण में नहीं हैं।
हमने बात विम्बलडन से शुरू जरूर की है, लेकिन वहीं पर खत्म नहीं हो रही है। भारतीय संसद में महिला आरक्षण विधेयक दशकों से पड़ा हुआ है लेकिन बड़ी राजनीतिक पार्टियां उसे पास करना नहीं चाहतीं। जबकि इस देश में 1993 से एक संविधान संशोधन करके पंचायत स्तर तक महिला आरक्षण किया गया जो कि कामयाबी से काम कर रहा है। उसी वक्त संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण की बात कही गई, लेकिन आज तक यह कानून नहीं बन पाया। संसद और विधानसभाओं में गांव-गांव तक में महिला नेतृत्व को संभव मान लिया, और पंचायतों के पंच पदों पर भी महिला आरक्षण कर दिया, लेकिन संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण देने से भी पुरूषप्रधान व्यवस्था को तकलीफ हो रही है। विम्बलडन से हिन्दुस्तानी संसद तक, महिलाओं को उनके हक देने के मामलों में मर्दों की टालमटोल एक सरीखी है। आज हालत यह है कि न तो संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं को आरक्षण है, बल्कि राजनीतिक दल एक तिहाई महिलाओं को टिकट भी नहीं देते। उत्तरप्रदेश के जिस पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इक्का-दुक्का सीट छोड़ जीत की और कोई उम्मीद नहीं थी, वहीं पर प्रियंका गांधी ने लडक़ी का नारा लगाकर 40 फीसदी उम्मीदवार महिलाओं को बनाया था। लेकिन उसके बाद पंजाब के चुनाव हुए, अभी हिमाचल के चुनाव हुए, गुजरात के हो रहे हैं, कहीं भी कांग्रेस पार्टी ने न तो 40 फीसदी महिलाओं को टिकट दी, न ही एक तिहाई सीटों पर महिलाओं को लड़वाया। अगर संसद में आरक्षण पास नहीं हो सका है, तब भी किसी पार्टी को तो कोई नहीं रोकते कि वे एक तिहाई महिला उम्मीदवार न बनाएं।
जिस ब्रिटेन को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है, जो उन गिने-चुने देशों में से है जहां महिला प्रधानमंत्री रही हैं, वहां भी महिलाओं की चड्डी का रंग तय करने में पुरूषों को मजा आता है। पूरी दुनिया में महिलाओं की हक की लड़ाई तेज करने की जरूरत है, और हिन्दुस्तान में भी आए दिन यह जरूरत दिखती ही है। सोशल मीडिया की मेहरबानी से यह लड़ाई अब पहले के मुकाबले कुछ आसान हुई है, और लोगों को बराबरी के हक की बात उठाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहिए।
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र, तुम्हारी जय हो!
19 नवंबर 2022
एक हवाला केस में दिल्ली की सबसे बड़ी
तिहाड़ जेल में बंद केजरीवाल सरकार के मंत्री सत्येन्द्र जैन के कुछ वीडियो
सामने आए हैं जिनमें वे जेल में मालिश करवा रहे हैं, और चम्पी करवा रहे
हैं। भाजपा ने ये वीडियो जारी करते हुए जेल में बंद मंत्री को वीवीआईपी
सहूलियतें देने का आरोप लगाया है, और जांच एजेंसी ईडी ने कोर्ट में एक
हलफनामा देकर, कई तस्वीरें जमा कराके गिरफ्तार मंत्री के ऐशोआराम की बात
कही है। मनीलॉड्रिंग केस में गिरफ्तार, सत्येन्द्र जैन को ईडी ने करोड़ों
रूपये की गैरकानूनी अफरा-तफरी में गिरफ्तार किया था, और एजेंसी ने अदालत को
बताया है कि सत्येन्द्र जैन उनके खिलाफ मामले के अन्य आरोपियों के साथ
अपनी कोठरी में घंटों मीटिंग करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस जेल में बंद एक
बड़े चर्चित ठग सुकेश चन्द्रशेखर ने दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर को एक
चिट्ठी लिखकर कहा है कि उसे जेल में सुरक्षा और सहूलियत देने के नाम पर
सत्येन्द्र जैन ने दस करोड़ रूपये वसूले थे। अब जैसे-जैसे गुजरात का चुनाव
करीब आ रहा है, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार के खिलाफ आरोप
बढ़ते चल रहे हैं, और कई तरह के सुबूत भी सामने आ रहे हैं।
हिन्दुस्तान में ताकतवर लोगों पर अगर न्याय प्रक्रिया के तहत कोई कार्रवाई होती भी है तो उसका यही हाल होता है। और यह ताकत सिर्फ सत्ता की ताकत नहीं रहती, यह सुकेश चन्द्रशेखर जैसे ठग और जालसाज की ताकत भी रहती है जो कि तिहाड़ जेल में रहते हुए तरह-तरह के बहुत से मोबाइल फोन से अलग-अलग मामलों में फंसे हुए लोगों को फोन पर धमकाकर उनसे उगाही करता था, उनको ठगता था। अब जेल में मोबाइल की सहूलियत एक बड़ा जुर्म है, और मुजरिम के हाथ में वह एक हथियार भी है, लेकिन दिल्ली के तिहाड़ जेल से लेकर छत्तीसगढ़ की जेलों तक का यही हाल है, और जेलों में बंद बड़े मुजरिम और गैंगस्टर वहां से जुर्म का अपना कारोबार चलाते हैं। बाहरी लोगों की नजरों से दूर जेल के भीतर की दुनिया अपने आपमें सरकारी जुर्म का एक बड़ा कारोबार रहती है, और सत्ता या पैसों की ताकत से वहां लोग मनचाही जिंदगी जीते हैं। पंजाब में पिछले महीनों में कत्ल की जो बड़ी वारदात हुई हैं, उनके पीछे हिन्दुस्तानी जेलों में बंद बड़े गैंगस्टरों का हाथ मिला है जो कि जेलों की हिफाजत के हाल का एक बड़ा सुबूत है।
लेकिन जेलों से परे भी हिन्दुस्तान की सारी न्याय व्यवस्था उन लोगों के हाथ बिकी हुई है जिनके बारे में प्रचलित भाषा में कहा जाता है कि वे चांदी का जूता मारकर काम करवा सकते हैं। यानी न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग जूता खाकर काम करने के लिए तैयार रहते हैं, अगर वह जूता चांदी का होता है। मुकदमों से जुड़ा सिलसिला पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों से शुरू होता है, और वहीं से भारी भ्रष्टाचार भी शुरू हो जाता है, और रिश्वत से परे राजनीतिक दबाव भी बराबरी का असर रखता है। पूरी जांच को भ्रष्ट कर देना, सुबूतों और गवाहों को तोड़-मरोड़ देना, मामले को पहले तो अदालत तक पहुंचने ही नहीं देना, और अगर पहुंच गया है, तो उसे अंतहीन आगे बढ़ाते चलना, यह सब बहुत ही बुनियादी और आम बातें हैं। ताकतवर मुजरिम इसी दौर में बरसों निकाल देते हैं, हर तरह के जुर्म और जुल्म जारी रखते हैं, लेकिन कटघरे से आंखमिचौली खेलते रहते हैं। फिर अगर किसी तरह अदालत से बचना मुमकिन नहीं रहा तो लोग कामयाब और घाघ वकील रखकर हक के नाम पर इंसाफ को पटरी से उतारने में पूरी ताकत लगा देते हैं। और बरसों बाद अगर कोई फैसला हो भी गया, तो संपन्न मुजरिमों के लिए ऊपर की बड़ी-बड़ी अदालतें हैं, जिनमें भारी असर रखने वाले बड़े-बड़े वकील हैं, और वहां भी न्याय प्रक्रिया या फैसले प्रभावित करने या खरीदने की कई तरकीबें हैं। ऐसे में जब बिना जमानत जेल में रहने की मजबूरी हो, तो वहां पर सहूलियतों का एक पूरा बाजार चलता है, और जेलों के अफसर करोड़ों की कमाई करते हैं, या सत्ता को खुश रखने के लिए बिना भुगतान पाए कुछ कैदियों की मालिश करते हैं। यह सिलसिला सिर्फ दिल्ली की तिहाड़ जेल का नहीं है, देश भर में यही हाल है, और चूंकि हिफाजत के नाम पर जेलों को कई तालों के भीतर रखा जाता है, इसलिए वहां बंद तालों की आड़ में हर तरह के गैरकानूनी काम किए जा सकते हैं। लोगों का यह आम तजुर्बा है कि किसी भी किस्म की ताकत रखने वाले मुजरिम जब जेल पहुंचते हैं, तो बड़ी रफ्तार से उनकी तबियत बिगड़ती है, और वे पहले जेल के अस्पताल ले जाए जाते हैं, और फिर वहां से बाहर के बड़े अस्पतालों में। यह एक अलग बात है कि फादर स्टेन स्वामी जैसे प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता को अपनी बहुत अधिक उम्र और बीमारियों की वजह से कांपते हाथों के बावजूद गिलास से कुछ पीने के लिए एक नली (स्ट्रॉ) देने के खिलाफ भी एनआईए ने विशेष अदालत में जान लगा दी थी, और स्टेन स्वामी मर गए, उन्हें पानी पीने के लिए प्लास्टिक की एक नली भी नहीं लेने दी गई। सरकारें जिन्हें नापसंद करती हैं, और जिन्हें पसंद करती हैं, उनके बीच नर्क और स्वर्ग सरीखा फासला जेल और हिरासत में खड़ा कर दिया जाता है।
हिन्दुस्तान में लोकतंत्र एक बड़ा ढकोसला बन चुका है। गरीब को बाकी बातों के साथ-साथ पांच बरस तक यह कहकर भी धोखा दिया जाता है कि उसके वोट से सरकार बनती है, वह लोकतंत्र में भाग्यविधाता है। जबकि हकीकत यह है कि वह वोट किसी को भी दे, उसके विधायक और सांसद ऊपर जाकर अपनी आत्मा और वोट दोनों की एक जोड़ी बनाकर बेचते हैं, और आम वोटर का यह घमंड बेबुनियाद साबित होता है कि वे सरकार चुनते हैं। एक तरफ नैतिकता से परे महज साजिश से बनी हुई सरकारें, सरकारों के अंधाधुंध भ्रष्टाचार, पैसों की असीमित ताकत, इन सबके सामने इंसाफ भीगी बिल्ली की तरह एक कोने में दुबक जाने को मजबूर हो जाता है। अब सरकारों में यह नैतिकता नहीं रह गई है कि अपने भ्रष्ट और दुष्ट लोगों को बाहर करे, न्याय व्यवस्था में यह ताकत नहीं रह गई है कि ताकतवर और गरीब के कानूनी हक बराबर कर सके। ऐसे में भ्रष्टाचार जेल के भीतर मालिश करवाता है, और वहां गलत मामले में फंसाकर डाले गए ईमानदार शायद भ्रष्टाचार का बदन दबाते हैं। लोकतंत्र, तुम्हारी जय हो!
यह मामला साम्प्रदायिक नहीं, लिव इन रिलेशनशिप का मामला है, इसे समझें..
18 नवंबर 2022
दिल्ली में लिव इन रिलेशनशिप में साथ रह रहे
एक हिन्दू-मुस्लिम जोड़े के बीच की हिंसा ने देश का दिल दहला दिया है।
मुस्लिम नौजवान ने हिन्दू लडक़ी के साथ किसी विवाद या मतभेद के बाद उसे मार
डाला, उसके 35 टुकड़े कर दिए, नया फ्रिज खरीदकर उसमें भरकर रखा, और दिल्ली
के एक जंगल में जाकर रोज दो टुकड़े फेंके। महीनों बाद जाकर किसी तरह से यह
मामला सामने आया, तो पुलिस जांच शुरू हुई, और यह मुस्लिम नौजवान गिरफ्तार
हुआ। इसके बाद से जैसा कि होना था, मुस्लिम नौजवानों पर लव-जेहाद की तोहमत
लगाते हुए सोशल मीडिया पर इस समुदाय पर भारी हमले चल रहे हैं, और जिन लोगों
को आमतौर पर समझदार माना जा सकता है, वैसे लोग भी घोर साम्प्रदायिक बातें
लिख रहे हैं, बिना यह याद रखे कि पिछले बरसों में ऐसे कई मामले सामने आए
हैं जिसमें हिन्दू जोड़ों में ही पति या प्रेमी ने साथी के टुकड़े कर दिए,
और ऐसे एक मामले में तो सुशील शर्मा नाम के नौजवान ने अपनी पत्नी की हत्या
करके उसे जलाने के लिए एक तंदूर में झोंक दिया था। यह कत्ल तंदूर हत्याकांड
के नाम से खबरों में बरसों तक रहा। इसलिए कत्ल के ये तरीके धर्मों से परे
हैं, और कई धर्मों के लोग साथी का कत्ल करके उसके टुकड़े कर देते हैं।
इसलिए हम आज इस मुद्दे पर लिखते हुए हिन्दू-मुस्लिम नजरिये से नहीं लिख रहे
हैं, बल्कि लिव इन रिलेशनशिप पर लिखना चाह रहे हैं।
हिन्दुस्तान में जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा, पढ़ाई और रोजगार के लिए लडक़े-लड़कियों का दूसरे शहरों में जाकर रहना शुरू हुआ, हमउम्र लोगों से मुलाकात शुरू हुई, मोहब्बत या देह-संबंध बने, और कई मामलों में लडक़े-लड़कियों ने साथ रहना भी शुरू किया। कई लोग इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक से अधिक मामलों में लिव इन रिलेशनशिप पर टिप्पणी की है, और फैसला दिया है, उसने यह साफ किया है कि बालिग लोगों के बीच इस तरह से रहना पूरी तरह उनका कानूनी हक है, और उन्हें इससे कोई नहीं रोक सकते। लेकिन ऐसा भी नहीं कि ऐसे रहने के खिलाफ कोई कानूनी मामले चल रहे थे, इसका विरोध मोटेतौर पर परिवार और समाज की तरफ से होता है, और वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से थमने वाला नहीं है। अब यहां पर सवाल यह उठता है कि एक मुस्लिम नौजवान के हाथ टुकड़े होने वाली हिन्दू युवती की मिसाल देकर लोग लिव इन रिलेशनशिप के खिलाफ बहुत कुछ कह सकते हैं। केन्द्रीय मंत्री कौशल किशोर ने कल यह बयान दिया है कि शिक्षित लड़कियां अपने मां-बाप को छोडक़र लिव इन रिलेशनशिप में रहने की गलती की जिम्मेदार हैं। इस पर शिवसेना की राज्यसभा सदस्य प्रियंका चतुर्वेदी ने इस मंत्री को कैबिनेट से हटाने की मांग प्रधानमंत्री से की है। इस एक वारदात से इस देश में साथ रहने वाले लडक़े-लड़कियों पर समाज का कहर कुछ अधिक हद तक टूटना तय है क्योंकि यह मिसाल इतनी हिंसक और तकलीफदेह है कि यह लोगों को बाकी पहलुओं के बारे में सोचने का मौका नहीं देगी। यह याद करने का मौका भी नहीं देगी कि बहुत से शादीशुदा जोड़ों के बीच ठीक ऐसी ही हिंसा पहले हो चुकी है, एक ही धर्म के जोड़ों के बीच ऐसी हिंसा हो चुकी है, और कई परिवारों में तो लडक़ी के प्रेमप्रसंग या प्रेमविवाह से खफा परिवारों ने भी उनके टुकड़े किए हुए हैं। अब अगर एक लडक़ी के टुकड़े होने से लिव इन रिलेशनशिप इतनी खराब मानी जा रही है, तो घर के भीतर लडक़ी के टुकड़े होने की मिसाल से क्या पूरे परिवार ही तोड़ दिए जाएं, और मां-बाप, बच्चे सब अलग-अलग रहें?
लोगों को किसी भयानक मिसाल की रौशनी में सोचते-विचारते अपनी तर्कशक्ति नहीं खोना चाहिए, और साथ-साथ न्यायसंगत भी बने रहना चाहिए। दुनिया के जिन देशों में लिव इन रिलेशनशिप एक पूरी तरह आम बात है, वहां पर ऐसे जोड़ों के बीच हिंसा कम होती है, और हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां आज भी ऐसे रिश्ते बहुत कम हैं, वहां लड़कियों के साथ सडक़ों से लेकर दूसरी जगहों तक यौन-हिंसा और दूसरे किस्म की हिंसा बहुत होती है। दूसरी बात यह है कि लिव इन रिलेशनशिप के बाद जिन जोड़ों में शादी होती है, उनके बीच तालमेल बेहतर होता है क्योंकि प्रेम-प्रसंग के दिखावे से उबरकर ऐसे जोड़े साथ रहते हुए एक-दूसरे के सबसे अच्छे और सबसे बुरे पहलू देख चुके रहते हैं, और शादी के बाद उन्हें सदमा लगने के खतरे घट जाते हैं। इसलिए जिन लोगों को लिव इन जिंदगी बेहतर लगती है, उनके लिए शायद वह बेहतर रहती भी है। शादी के बाद कुछ नई बातें देखकर तलाक की नौबत आए, इससे बेहतर यह है कि साथ रहने के बाद ठीक न लगे तो अलग हो जाएं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एकदम सही था, और हिन्दुस्तान की आज की सामाजिक नौबत के हिसाब से सही समय पर आया था, क्योंकि देश की पुलिस किसी नौजवान जोड़े के साथ रहने पर उनके खिलाफ वेश्यावृत्ति जैसे कई कानून लागू करते आई है, और अब जाकर पुलिस के हाथ से शोषण और जुल्म का यह हथियार निकला है।
इस ताजा वारदात ने दो धर्मों के बीच का मामला होने से हिंसक सोच का एक सैलाब सा खड़ा कर दिया है। जिन लोगों के मन में मुस्लिमों से नफरत है, उन्हें अपनी हिंसा निकालने के लिए एक सुनहरा मौका हाथ लगा है, और वे उस काम में जुट गए हैं। लेकिन साम्प्रदायिकता से परे लोगों को यह सोचना होगा कि लिव इन रिलेशनशिप के मामले में हिन्दू-मुस्लिम से परे सोचने की जरूरत है, जिन लोगों को जीने का यह तरीका पसंद नहीं है, वे इसे सामाजिक रूप से नापसंद करते रहें, जिन्हें यह तरीका पसंद है, वे साथ-साथ रहते रहें, लेकिन इस वारदात के बहाने जो लोग अपनी साम्प्रदायिकता की भड़ास निकालना चाहते हैं, वे खुद उजागर हो रहे हैं, और वे यह याद भी करने का मौका जुटाकर दे रहे हैं कि इसके पहले किन-किन हिन्दुओं ने अपने साथी के साथ ऐसी ही हिंसा की थी। एक नाजायज मिसाल दूसरी बहुत सी मिसालों को खड़ा करती है, और वही आज हो रहा है।
पर्यावरण से खतरा धरती को नहीं, लोगों को खुद है
17 नवंबर 2022
दुनिया में पर्यावरण को जितने किस्म के खतरे
हैं, और बढ़ते चल रहे हैं, उनकी कल्पना भी आसान नहीं है। इंसान हर दिन
अपने कई तरह के काम से धरती और उसके पर्यावरण के लिए तरह-तरह की चुनौतियां
खड़ी करते जा रहे हैं, जिनका कोई आसान इलाज नहीं है। इनमें से एक चुनौती
बहुत से लोग आबादी को मानते हैं जो कि अभी तीन दिन पहले आठ अरब पार कर चुकी
है, और हर सेकेंड पर दो नए जन्म हो रहे हैं। ऐसा अंदाज है कि 2080 तक यह
आबादी 10.4 अरब पहुंचकर फिर स्थिर हो जाएगी, या गिरने लगेगी। मतलब यह कि आज
से सवा गुना आबादी हो जाने तक इसमें किसी गिरावट का अंदाज आज नहीं है।
आबादी के मामले में पर्यावरण के संदर्भ में हमारी सोच कुछ अलग है, लेकिन आज
हम इस जगह पर सिर्फ आबादी पर चर्चा खत्म करना नहीं चाहते हैं, इसलिए हम कई
लोगों की नजरों में पर्यावरण को एक बड़ा खतरा कही जाने वाली आबादी की
चर्चा भर कर रहे हैं कि बहुत से लोग उसे पर्यावरण तबाह करने की बड़ी वजह
मानते हैं। लेकिन आबादी से परे भी कई और किस्म की चीजें हैं जिनके बारे में
भी गौर करना चाहिए।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले दस से अधिक बरसों में एक से अधिक बार इस बात को लिख चुके हैं कि दुनिया में बढ़ते हुए मोबाइल फोन देखते हुए उसके चार्जर एक सरीखे करने की कोशिश करनी चाहिए, और अब जाकर यूरोपीय संघ ने इसकी पहल की है, और अगले एक-दो बरस के भीतर सारे योरप में एक ही एक किस्म के चार्जर रह जाएंगे जिसकी वजह से एप्पल जैसी बड़ी कंपनी को अपने फोन का चार्जिंग पोर्ट बदलना पड़ेगा। इससे धरती पर प्लास्टिक का कचरा कम होगा, और लोगों की जिंदगी तो आसान होगी ही होगी। कुछ ऐसा ही काम बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों की बैटरियों को लेकर भी सोचा जा रहा है, और भारत सरकार इस पर जो नीति बना रही है उसमें बैटरी और उससे चलने वाली गाडिय़ां बनाने वाले निर्माताओं से राय मांगी गई है कि इनके पैमाने कैसे तय किए जा सकते हैं ताकि कम किस्म की बैटरियों से सभी गाडिय़ां चलें, और ऐसी चार्ज की हुई बैटरियों को बदलने के सर्विस स्टेशन शुरू हो सकें ताकि लोगों को अपने-अपने घरों पर ऐसी चार्जिंग का इंतजाम न करना पड़े। इस बारे में भारत सरकार कोई नीति बनाने, और पैमाने लागू करने के पहले दुनिया भर से इस मामले के तजुर्बे का अध्ययन भी कर रही है, और लोगों से सलाह भी उसने मांगी है। आज जिस तरह गाडिय़ों से निकलने वाले टायरों के पहाड़ धरती के पर्यावरण के लिए एक समस्या बनने जा रहे हैं, उसी तरह कल को बैटरियों का यही हाल न हो कि उनके पहाड़ लग जाएं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि बैटरियों में जिस तरह की धातुएं लगती हैं, वे धरती पर सीमित तादाद में ही हैं, और उनकी कमी की वजह से नई बैटरियां बनना उतना आसान नहीं है। इसलिए बैटरियों को उनकी पूरी जिंदगी तक निचोड़ लेना भी जरूरी है, और उसके बाद भी उनके भीतर बची धातुओं का इस्तेमाल जरूरी है। इसके लिए सरकारों को बैटरी नीति बनानी होगी, और भारत जैसे बड़े देश में अगर यह समय रहते किया जा रहा है, तो उससे आगे की बर्बादी का खतरा घटेगा। ठीक इसी तरह की एक फिक्र पुराने मोबाइल फोन को लेकर हो रही है। मोबाइल फोन में कई तरह की धातुएं लगती हैं, और लोग नया फोन लेने के बाद पुराने फोन को री-साइकिलिंग के लिए देने की नहीं सोच पाते। पुराने सामान का मोह नहीं जाता, और उसे री-साइकिलिंग के लिए देने पर कोई फायदा नहीं दिखता। ऐसे में दुनिया के हर इंसान के पास एक से अधिक मोबाइल होने का खतरा खड़ा हो रहा है, और उसे बनाने में लगी धातुओं के दुबारा इस्तेमाल की संभावना खत्म हो रही है। अब देश और कुछ कंपनियां पुराने फोन वापिस लेने की पहल कर रहे हैं, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे देश में, जहां पर लोग कबाड़ को सहेजकर रखने के आदी हैं, वहां पर यह परेशानी तो रहेगी ही।
पर्यावरण को सामान बनाने वाले कारखानों से भी बहुत नुकसान होता है, और जब गैरजरूरी सामान बढ़ते जाते हैं तो उन्हें बनाते हुए धरती पर कार्बन का बोझ बढ़ता है। अब इंसानों का एक ग्राहक के रूप में इस्तेमाल कंपनियों को बहुत सुहाता है, इसलिए जिसकी भी खरीदने की ताकत है, उसे जरूरत से कई गुना सामान बेचने की तरकीब बाजार चलाते ही रहता है। नई-नई फैशन के सामान हर दिन बाजार में उतरते हैं, और लोगों को लुभाते चलते हैं। पर्यावरण की फिक्र की बात करने वाले फिल्मी सितारे या खिलाड़ी भी किसी को खपत कम करने नहीं कहते क्योंकि लोगों की खपत बढऩे से ही उनकी मॉडलिंग जुड़ी हुई है, उनकी कमाई जुड़ी हुई है। इसलिए हर कुछ महीनों में फैशन बदलते जाती है, ताकि खरीदी बढ़ती जाए। अब यह जागरूकता कैसे आ सकती है, यह सोचने की बात है कि सितारों की चकाचौंध के झांसे में आकर गैरजरूरी सामान खरीदने में समझदारी नहीं है, धरती को बचाने में समझदारी है। और शुरू में हमने आबादी को लेकर जो अलग राय रखी थी, वह इससे भी जुड़ी हुई बात है। दुनिया की सबसे गरीब आबादी की प्रति व्यक्ति सामानों की खपत इतनी सीमित है, महज जिंदा रखने की उनकी जरूरतें इतनी गिनी-चुनी हैं कि दुनिया की संपन्न आबादी के एक-एक इंसान सैकड़ों विपन्न लोगों से अधिक खपत करते हैं। इसलिए बढ़ती हुई आबादी धरती पर बोझ नहीं है, साधनों और सुविधाओं के बंटवारे में गैरबराबरी बोझ है जिसकी वजह से गरीबों की भूख ऐसी दिखती है कि मानो वह बढ़ती आबादी की वजह से है, और अमीरों की चर्बी नहीं दिखती क्योंकि उसे जिम की मशीनों पर बिजली जला-जलाकर छांटा जाता है। अगर दुनिया की संपन्न और विपन्न आबादी के बीच सामानों का बंटवारा थोड़ा सा न्यायसंगत हो जाए तो 2080 में होने वाली सवा गुना आबादी भी धरती को बर्बाद नहीं करेगी।
आज संपन्नता के साथ दिक्कत महज निजी खपत की नहीं है, हम अपने आसपास की ऐसी म्युनिसिपलें देखते हैं जो कि अपनी संपन्नता की वजह से लोगों के घरों से कचरा इक_ा करते हुए उन्हें जागरूक करने की तरफ से बेफिक्र रहती हैं। लोग अगर अपने घर पर ही कचरे को छांटकर अलग-अलग करें तो उससे उसका उत्पादक उपयोग भी हो सकता है, और धरती बर्बादी से बच सकती है। लेकिन अगर म्युनिसिपलों के पास पैसा अधिक है, तो वे अपने नागरिकों को जिम्मेदार बनाने के बजाय उन्हें गैरजिम्मेदार वोटर बनाकर रखना चाहती हैं, और कचरे के निपटारे में लोगों की जिम्मेदारी का अहसास भी नहीं कराया जाता। नतीजा यह होता है कि कचरे के निपटारे की लागत बढ़ जाती है, और उसकी री-साइकिलिंग की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। ऐसी ही नौबत के चलते आज दिल्ली में कचरे के पहाड़ खड़े हो गए हैं, और अब वहां के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने घोषणा की है कि ब्रिटेन की किसी कंपनी को लाकर इस कचरे का निपटारा किया जाएगा।
पर्यावरण को मिलती चुनौतियां असीमित हैं, लेकिन आज इस चर्चा का मकसद इस बारे में ध्यान खींचना ही था, यहां पर किसी लेख की तरह तमाम बातों को शामिल करना मुमकिन नहीं है। पर्यावरण के साथ दिक्कत यह है कि जो पीढ़ी लापरवाह है, उसे आमतौर पर लापरवाही का नुकसान नहीं भुगतना पड़ता, इसका बोझ उसकी आने वाली पीढ़ी पर पड़ता है जो कि जहरीली, दमघोंटू हवा में फेंफड़ों की बीमारी पाने की वारिस बनती है। लोगों को अपने बच्चों के फेंफड़ों के बारे में सोचकर, उनको कैंसर के खतरे के बारे में सोचकर पर्यावरण के बारे में सोचना चाहिए। इंसान इस हद तक मतलबपरस्त हैं कि इस जुबान से कम में पर्यावरण के बारे में किसी को सोचने की जरूरत भी नहीं लगेगी।











