संपादकीय
28 फरवरी 2013
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सरकारी इलाके में मंत्रियों के बंगलों के ठीक सामने कल विधानसभा उपाध्यक्ष के तेज रफ्तार काफिले से कुचलकर एक छात्रा सड़क पर मारी गई, और पुलिस घंटों तक इसी कोशिश में लगी रही कि कैसे मामले को रफा-दफा किया जाए। हम कई बार इस मौके पर लिख चुके हैं कि इस देश में राजा और प्रजा के बीच फासला जिस तरह से बढ़ाया जा रहा है, उससे प्रजा के मन में राजाओं के लिए हिकारत बढ़ती जा रही है। और सत्ता पर काबिज लोगों के रूख से आगे बढ़कर यह हिकारत लोकतंत्र को निशाना बना रही है जिसे कि सत्ता के नशे में चूर लोग नाकामयाब साबित करने में लगे हैं। एक व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र से बेहतर कोई दूसरी व्यवस्था इस दुनिया में अब तक बनी नहीं है, और गांधी जैसे सादगीपसंद महान इंसान की तस्वीर लगाकर इस लोकतंत्र को हांकने वाली भारतीय सत्ता दुनिया में सबसे बुरा मिजाज जाहिर करती है।
इस देश में वीवीआईपी नाम का एक ऐसा दर्जा खड़ा किया गया है जिसकी हिफाजत के नाम पर देश और प्रदेश की सरकारें गरीबों का पेट काटकर खड़े किए गए सुरक्षा दस्ते को झोंक देती हैं। इस दर्जे को जनता के पैसे पर ऐशो-आराम जुटाकर दिया जाता है। और इस दर्जे को सड़कों को रौंदते हुए, इंसानी जिंदगी को रौंदते हुए चलने का विशेषाधिकार भी इस लोकतंत्र के भीतर निकालकर दे दिया गया है। जिस प्रदेश में आधे से अधिक आबादी रियायती चावल की वजह से दिन में दो बार खाना खा पाती है, उसके हक के पैसों से लालबत्तियों और सायरनों वाले बड़े-बड़े काफिले जनता को सड़क के किनारे फेंकते हुए दौड़ते हैं। और यह काम सिर्फ सरकार नहीं करती, राज्यपाल से लेकर हाईकोर्ट के जजों तक, और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों तक, हर किसी को तानाशाह ताकत की इस हिंसक नुमाइश से खूब खुशी मिलती है। कोई कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के इन नए राजाओं से यह पूछे कि ये इतनी तेजी से सायरन बजाते हुए आखिर कौन सी आग बुझाने जाते हैं? आखिर किस जख्मी या बीमार के इलाज के लिए जाते हैं? आखिर कौन से जुर्म को रोकने के लिए जाते हैं? और इनका सड़कों पर इस तरह से जिंदगियों को कुचलते हुए जाने का हक लोकतंत्र के किस हिस्से से मिलता है?
छत्तीसगढ़ में कल जिस तरह से एक नौजवान छात्रा सत्ता की ऐसी ही बददिमागी के पहियों तले कुचलकर मारी गई, उसके बाद भी अगर यहां के लोग आवाज नहीं उठाते हैं, तो कल बारी उनमें से किसी के बच्चों की होगी, किसी के बूढ़े मां-बाप की होगी, किसी की खुद की भी होगी। इसलिए लोगों को उन अदालतों तक जाकर ऐसे खूनी काफिलों के खिलाफ, ऐसी गैरकानूनी तेज रफ्तार के खिलाफ, ऐसे सायरनों और लालबत्तियों के खिलाफ जनहित याचिका लगानी चाहिए, जिन पर हिंदुस्तानी अदालतें पता नहीं किस कलेजे से इंसाफ करेंगी। जज खुद होकर ऐसे मामलों में अदालती कार्रवाई शुरू कर सकते हैं, लेकिन वे खुद सड़कों पर ऐसी तानाशाही का मजा लेते हैं। जनहित याचिका के अलावा लोगों को लालबत्ती और सायरन के आतंक के साथ चलने वाले लोगों को चुनाव में भी निपटाना चाहिए। एक-एक जज के लिए सड़कों पर पुलिस अलग से इंतजाम करती है, और इन जजों को यह भी समझ नहीं आता कि पुलिस की कमी का रोना रोते हुए सरकार विचाराधीन कैदियों को पेशियों पर नहीं ला पाती। भारतीय लोकतंत्र में इंसाफ की सोच खत्म हो चुकी है। अब यहां पर ताकतवर तबके सहूलियतों और फायदे की एक-एक बूंद को उस अंदाज में दुहते हैं, जिस अंदाज में दूध दुहने वाली मशीनें गाय के थन से खून तक दुह लेती हैं। आज जिसके हाथ ताकत है वे देश-प्रदेश को, लोकतंत्र को, आम लोगों के हक को दुहकर अपने लिए खीर बनवाते चलते हैं।
ऐसी नौबत में इस देश में बहुत से लोगों का भरोसा नक्सलियों पर अगर हो जाता है, तो उसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। लोगों का भरोसा अगर चुनाव पर से उठ जाता है, और लोग उसे कुछ सौ या हजार रूपये दिलवाने वाला वोट मान लेते हैं, तो उसमें भी कोई हैरानी नहीं है। भारत में लोकतंत्र की हर किस्म की सत्ता पर बैठे हुए लोग लोकतंत्र को एक बुरा नाम दे रहे हैं। हम इस बात को राजधानी की सड़क पर हुई एक मौत से शुरू भर कर रहे हैं, यहां पर खत्म नहीं कर रहे हैं। इससे भी हजार गुने अधिक दर्जे की बददिमागी और बेदिमागी देश के उन हिस्सों में आम जनता के साथ होती है जिन तक मीडिया के कैमरों का ध्यान नहीं है। और वैसे ही इलाकों में नक्सली पनपते दिखते हैं।

















