किसी देश-प्रदेश में फैलती, फलती-फूलती आस्था चिकित्सा किसकी असफलता बताती है?
03 नवंबर 2026
सरकारी और निजी दोनों तरह के अस्पतालों में मरीजों के साथ होने वाली धोखाधड़ी की खबरों से अखबार पटे हुए हैं। यह भी तब है जब सरकार से भी इश्तहार मिलते हैं, और बड़े अस्पतालों से तो मिलते ही हैं। बड़े अस्पताल शायद सबसे बड़े विज्ञापनदाताओं के आधा दर्जन कारोबार में से एक होंगे, लेकिन उसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट से लेकर केन्द्र सरकार तक, दवा कंपनियों से लेकर अस्पतालों में गैरजरूरी जांच, ऑपरेशन, और अंधाधुंध बिलिंग को लेकर इतना कुछ सामने आ रहा है कि इश्तहारी अखबारों को भी इन खबरों को छापना पड़ रहा है। इन दिनों दवा कंपनियों के फर्जी रेट को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी हैरान है कि किस तरह छह सौ और सात सौ गुना (फीसदी नहीं, गुना), दाम पर अस्पताल दवाइयों की बिलिंग कर रहे हैं, और मनचाहे दाम छापकर कंपनियां बाजार में दवाएं उतार रही हैं। जब सारे तथ्य सुप्रीम कोर्ट के सामने आए तो जजों को समझ ही नहीं आया कि देश में यह चल क्या रहा है। लेकिन इलाज के अधिकतर इंतजाम देश में ऐसे हैं जो कि जजों को हैरान कर सकते हैं। हम तो राज्यों में भी इलाज के सरकारी इंतजाम में इतने बड़े-बड़े गड्ढे देखते हैं कि जिनमें जनता के टैक्स की पूरी ही रकम डूब जाती है, और वे आकाशगंगा के ब्लैकहोल की तरह सब कुछ समा लेते हैं।
केन्द्र और राज्य सरकारों ने गरीब और बाकी मरीजों के इलाज के लिए तरह-तरह की योजनाएं बनाई हुई हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और बाकी कर्मचारी इन योजनाओं में छेद ढूंढकर फर्जी इलाज दर्ज करते रहते हैं, और इन योजनाओं के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि को हर महीने लाखों तक ले जाते हैं। ऐसी मोटी नाजायज कमाई करने वाले सरकारी डॉक्टर और दूसरे कर्मचारियों के पकड़ाए जाने पर भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हमने कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ में देखा है कि किस तरह सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना के कार्ड की रकम लूटने के लिए राजधानी रायपुर के दर्जनभर अस्पतालों में दलालों के माध्यम से गांव-गांव तक जाल बिछाया था, और वहां से नौजवान उम्र की महिलाओं को लाकर बिना जरूरत उनके गर्भाशय निकाले जा रहे थे, ताकि बीमा की रकम अस्पताल वसूल कर सके। इंसान की देह के साथ ऐसी खिलवाड़ धड़ल्ले से चली, और कई सर्जनों की डॉक्टरी पर रोक भी लगाई गई थी। लेकिन साल-छह महीने की रोक के बाद वे सब फिर कामकाज में लग गए, और गांवों से लाई गई भोली-भाली महिलाएं बिना जरूरत, बिना उम्र आए गर्भाशय खो बैठीं क्योंकि कुछ लोगों को उससे कमाई हो सकती थी।
देश में डॉक्टरी के धंधे का हाल यह है कि सरकार इलाज बीमा मुहैया न कराए, तो अधिकतर आबादी इलाज नहीं करा पाएगी। सरकारें अपने अस्पतालों को लगातार कमजोर करती चल रही हैं ताकि निजी अस्पतालों का कारोबार बढ़े, और धीरे-धीरे सरकारें अपने इलाज बीमा कार्ड से निजी अस्पतालों में भी इलाज की छूट देती जा रही हैं। यह पूरा सिलसिला इतना भयानक है कि एक बार कोई बीमार पड़े, तो सरकारी इलाज से गुजरते हुए उसका भरोसा पूरी सरकार पर से उठ जाने का ही अधिक आसार रहता है। अगर निजी अस्पताल में जाएं, तो सरकारी कार्ड रहने पर भी उसे लूटने का बड़ा खतरा अधिकतर अस्पतालों में रहता है। अगर निजी खर्च से इलाज करवाएं तो अस्पताल मामूली सी दवाइयों के सैकड़ों गुना अधिक दाम वसूलते हैं, और बाहर से दवाई खरीदकर लाने की छूट नहीं देते। एक पुरानी कहावत इस सिलसिले में याद आती है, जबरा मारे भी, और रोने भी न दे। निजी अस्पतालों में से बहुत सारे ऐसे रहते हैं जो गैरजरूरी जांच करवाते हैं, अगर मरीज का निजी स्वास्थ्य बीमा है, और उस पर मोटी रकम बाकी है, तो गैरजरूरी बड़े ऑपरेशन का खतरा भी बने रहता है। सरकार, बीमा कंपनी, या अपनी जेब, किसी से भी बड़े भुगतान की उम्मीद अगर रहती है, तो फिर छोटे इलाज होने की संभावना खत्म हो जाती है।
ऐसे में लगता है कि लोग बीमार न पड़ें, सेहतमंद बने रहें, वही सबसे अच्छा है। हम खुद अपने इस संपादकीय में, और कॉलम या अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर लगातार सेहत को ठीक रखने की वकालत करते हैं। लेकिन हाल यह है कि लोग अगर पैदल चलने जाएं, तो सांडों और कुत्तों का खतरा रहता है, बाग-बगीचों या तालाब किनारे सैर पर जाएं, तो गंदगी भरी रहती है, सडक़ों पर साइकिल चलाएं तो लापरवाह गाड़ी आकर कुचल सकती है। सार्वजनिक जीवन में जब हर तरह की अराजकता बढ़ी हुई रहती है, तो प्राकृतिक जीवन में स्वस्थ बने रहने की संभावना घटने लगती है। अब ऐसे में कुछ लोगों को ईश्वर का सहारा लगता है, कई लोग मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च जाने लगते हैं कि वहां की आशीर्वाद से उनकी बीमारी ठीक हो जाएगी। कई लोग किसी चमत्कारी गुरू के पास जाने लगते हैं कि उससे वे ठीक हो जाएंगे। अब इन जगहों की हकीकत भी यह हो गई है कि धर्मस्थलों पर आने वाले दान में इतनी व्यापक और संगठित चोरी होने लगी है कि लोगों को लगने लगा है कि ईश्वर तो खुद को मिले हुए दान की भी हिफाजत नहीं कर पा रहा है, वह बीमारों की सेहत की हिफाजत कैसे करेगा? फिर चमत्कारी बाबाओं का हाल सुनाई पड़ता है कि हर कुछ हफ्तों में कोई न कोई तांत्रिक या बाबा, या धर्मगुरू, या किसी धर्म के ईश्वर का किसी और नाम वाला एजेंट बलात्कार करते हुए पकड़ाता है। मतलब यह कि जितना खतरा सरकारी या निजी अस्पतालों में हैं, उतना ही खतरा धर्मस्थलों और बाबाओं के पास भी है। लोग जाएं तो जाएं कहां? अब बदन तो कुदरत का दिया हुआ है, उसमें 19-20 चलते रहता है। ऐसे में बीमारों के लिए सहारा क्या है? दुनिया का यह भी तजुर्बा है कि इलाज के नाम पर जो अंधविश्वासी और चमत्कारी कारोबार चलते हैं, उनकी अधिक जरूरत लोगों को तभी पड़ती है जब उन्हें आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था या तो हासिल नहीं रहती है, या वह विश्वसनीय नहीं रहती है। चिकित्सा विज्ञान अपने आपमें विश्वसनीय है, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता हर जगह घटती चल रही है। ऐसे में लोग आस्था चिकित्सा की तरफ जाते हैं, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन भी दुनिया के ऐसे कोनों में उपयोगी मानता है जहां पर और कोई चिकित्सा सुविधा नहीं है। भारत में आज चारों तरफ चमत्कारी और करिश्माई चंगाई दरबारों का जो बोलबाला है, वह क्या बताता है? क्या आधुनिक चिकित्सा लोगों को हासिल नहीं है, उनकी पहुंच के बाहर है, या पूरी सरकारी चिकित्सा सुविधा, और निजी चिकित्सा कारोबार की विश्वसनीयता जमीन पर औंधे मुंह आ गिरी है? देखना है कि सुप्रीम कोर्ट देश की चिकित्सा सुविधा और सेवा को कहां-कहां ठीक कर सकता है, वरना बेबस-बीमार लोगों के लिए, हारे को हरिनाम तो है ही कि पिछले जन्म के कर्मों का फल मिल रहा है।
पत्रकारिता-सम्मान से बड़े हुए सीने, और छोटे हुए दिल, दोनों के लिए छोटी-छोटी दो-दो बातें
02 नवंबर 2026
छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव में दिए जाने वाले राज्य अलंकरणों की घोषणा हुई है जिसमें अलग-अलग किस्म के मीडिया के कुछ लोगों के नाम भी हैं। कई दूसरे लोगों ने, जिन्होंने इन अलंकरणों के लिए अर्जियां लगाई होंगी, उनमें निराशा भी होगी कि उन्हें इस सम्मान के लायक नहीं समझा गया। फिर जिन्हें बीते बरसों में ये सम्मान मिल चुके हैं, उनमें से कुछ लोग इस पर चल रही चर्चा में चुप रहते हैं जो कि सोशल मीडिया पर हर बरस चलती ही है। जिन लोगों को सरकार से सम्मान लेना ठीक लगता है, और मिला है, उन सभी लोगों को हमारी तरफ से बधाई। जिन लोगों को नहीं मिला है, और अगले बरस भी जिनकी हसरत जिंदा रहेगी, वे फिर अर्जी लगा सकते हैं। हमारी जितनी सीमित जानकारी है उसके मुताबिक इस राज्य के अलंकरणों के लिए, या कि देश में पद्म सम्मानों के लिए लोगों को खुद अर्जी भेजनी पड़ती है, या किसी और के नाम की सिफारिश करने पर उन लोगों की सहमति भी साथ में भेजनी पड़ती है। कुल मिलाकर उन्हीं के नाम घोषित होते हैं जिन्हें ये सम्मान नामंजूर होने का खतरा न हो। छत्तीसगढ़ में तो दर्जनों अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान या सफलता के लिए अलंकरण दिए जाते हैं, और अखबारों या टीवी चैनलों के लोगों को मिलने वाले सम्मानों को लेकर चर्चा या विवाद कुछ अधिक होते हैं, जबकि इन सम्मानों को तय करने के लिए बनने वाले निर्णायक मंडल में कुछ पत्रकार ही रहते हैं।
सरकार के अलावा भी देश में बहुत से दूसरे संगठन पत्रकारिता के पुरस्कार देते हैं। इनमें कुछ तो बहुत प्रतिष्ठित हैं जो कि पत्रकारों के ही पेशेवर संगठनों, या किसी दूसरे विवादहीन संगठन द्वारा दिए जाते हैं। लेकिन सरकारों के दिए जाने वाले पत्रकारिता पुरस्कार, या अलंकरण, या पत्रकारों को दिए जाने वाले पद्म सम्मान की बात कुछ अलग होती है। लोककला या समाजसेवा, साहित्य या खेलकूद, ग्रामीण विकास या दानशीलता का यह दावा कभी नहीं रहता कि वे लोकतंत्र के पांचवें, छठवें, सातवें, या आठवें स्तंभ हैं। अकेली पत्रकारिता ऐसी रहती है जिसका यह दावा रहता है कि वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। लोकतंत्र के स्तंभों को लेकर धारणा एकदम साफ है। संविधान में भारत में तीन ही स्तंभों को लोकतंत्र के पाये माना गया है, कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका। फिर लिखित शब्दों से परे धक्का-मुक्की करके पत्रकारिता ने अपने आपको एक और स्तंभ बना लिया। अब जब उसने अपने को स्तंभ बना ही लिया है, तो उसे चौथे स्तंभ की तरह रहना चाहिए। किसी टेबिल या कुर्सी को देखें, जिसके चार पैर हों, तो उनमें से कोई भी पैर दूसरे पैर से लिपटने की कोशिश नहीं करता, उसे खींचने या धकेलने की, या सहलाने की कोशिश भी नहीं करता। सारे पैर अपनी-अपनी जगह बोझ का अपना-अपना हिस्सा उठाते रहते हैं, और एक-दूसरे से पर्याप्त और सुरक्षित दूरी बनाए रखते हैं। कल्पना करें कि चार पांवों की कुर्सी के दो पैर एक-दूसरे के करीब आ जाएं, तो उन पर बैठे हुए लोकतंत्र का नीचे लुढक़कर जख्मी हो जाना तय सरीखा रहेगा। इसलिए सरकार के साथ पत्रकारिता को सम्मान का रिश्ता कायम करने के बजाय एक सम्माननीय दूरी बनाकर रखना चाहिए। इन दोनों में आपस में न तो कोई टकराव है, न ही इन दोनों में गलबहियों के किसी रिश्ते की जरूरत है।
अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने भोपाल में पत्रकारिता के एक कार्यक्रम में संचालक-पत्रकारों की कही एक बात पर आपत्ति की थी। एक वरिष्ठ पत्रकार ने पटवाजी का स्वागत करते हुए कहा था कि भोपाल के पत्रकारों से उनके बहुत मधुर संबंध हैं। इस पर पटवाजी ने अपनी बारी आने पर माइक से ही कहा था कि उनके पत्रकारों से पेशेवर संबंध हैं। सरकार और पत्रकार, इन दोनों की अपनी-अपनी अलग भूमिका रहती है, और अगर इन दोनों के बीच मधुर संबंध होने लगे, तो नुकसान तो लोकतंत्र का होगा। पटवाजी अपनी साफबयानी के लिए जाने जाते थे, उन्हीं के बस था कि पत्रकारों के कार्यक्रम में पत्रकारों के मुंह पर मंच और माइक से ऐसी बात कह सकें। लेकिन उनकी बात में दम था। शिष्टाचार के संबंध एक पेशेवर जरूरत है, राजनीति की भी, और पत्रकारिता की भी। लेकिन एक-दूसरे के किसी अतिरिक्त सम्मान की जरूरत नहीं है। कहने के लिए अलंकरण के नाम तय करने वाला एक निर्णायक मंडल होता है, लेकिन कई बार ऐसी धारणा बनती है कि सरकार अपने को पसंद, या नापसंद लोगों के नामों को लेकर अपने असर का इस्तेमाल करती है। हम छत्तीसगढ़ में इस बरस छांटे गए नामों के संदर्भ में यह बात नहीं कह रहे हैं, किसी एक साल के छांटे गए नाम महत्वहीन रहते हैं, बहुत लंबी, 25 बरस लंबी लिस्ट भी देखें, तो भी उससे हम कोई धारणा नहीं बना रहे। लेकिन हम नामों से परे एक सैद्धांतिक चर्चा कर रहे हैं कि क्या पत्रकारों को किसी भी सरकार, राज्य सरकार या केन्द्र सरकार से कोई सम्मान, अलंकरण, या पुरस्कार लेना चाहिए? देश में कई पत्रकारों और संपादकों को पद्मश्री जैसा देश का एक सबसे बड़ा सम्मान भी मिला है, और अभी हम नामों पर जाना नहीं चाहते कि किस सरकार ने किन लोगों को इसके लायक माना, किन लोगों ने इसके लिए कोशिश की, किन लोगों को यह नहीं मिल पाया, या किन लोगों ने इसके लिए मना कर दिया। मुद्दा है कि जहां चयन प्रक्रिया में सरकार का एक दखल रहता है, क्या वैसी प्रक्रिया से गुजरकर छांटे गए नामों से पत्रकारों का सम्मान सचमुच बढ़ता है? या उनके प्रति सरकार के एक रूझान का यह रूख रहता है?
हम इसमें पत्रकारों के व्यक्तिगत स्तर पर फैसले, या उनके संस्थानों के फैसले पर नहीं जा रहे। हमारी जानकारी में हैं कि कुछ संस्थानों ने अपने पत्रकारों को सरकारी सम्मान के लिए अर्जी देने से मना कर दिया था। कुछ संस्थान अपने पत्रकारों पर छोड़ते हैं कि वे चाहें तो अर्जी दें, और न चाहें तो अपने पाठकों से मिलने वाले सम्मान से खुश रहें। कुछ संस्थान इसमें सक्रिय रूप से कोशिश करते हैं कि उनके पत्रकारों को सम्मान मिले। हमको इनमें से किसी भी किस्म से न कोई शिकायत है, न कोई परहेज है, यह सब कुछ लोकतांत्रिक और जायज सीमा के भीतर स्वीकार्य बातें हैं। लेकिन हमारी अपनी सोच यह है कि पत्रकारों को सरकार से शिष्टाचार के बहुत अच्छे संबंध रखने चाहिए, लेकिन एक-दूसरे से सम्मान पाने का मोहताज नहीं होना चाहिए। यह हमारी सोच है, जो लोग इससे परे सोचते हैं, वे भी सम्मान के हकदार हैं, अपने पाठकों या दर्शकों से मिलने वाले एक बहुत ही ईमानदार और जायज सम्मान के, और अगर उन्हें ठीक लगता है तो सरकार से भी मिलने वाले सम्मान के।
जहां कहीं सरकार बीच में रहेगी, वहां बहुत सम्मानजनक लोगों को मिलने वाले जायज सम्मान को लेकर भी जायज और नाजायज दोनों किस्म के सवाल उठेंगे। और ऐसा उठना जायज इसलिए है कि सरकार और पत्रकार के रिश्ते समधी-मिलन जैसे नहीं रहने चाहिए। कल जब छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के नाम घोषित हुए हैं, तो सोशल मीडिया पर कुछ सुगबुगाहट चल रही है। इसी को देखते हुए हम इस मुद्दे पर अपनी सोच सामने रख रहे हैं, लेकिन इसका यह मतलब कहीं नहीं है कि यही एक सोच जायज है, और बाकी किस्म की सोच ठीक नहीं है। इसी राज्य में कई ऐसे पत्रकार हैं (जिस अखबार में यह लिखा जा रहा है, उससे बाहर के) जिन्होंने खूब अच्छा काम किया है, और वे अपनी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं, उन्हें न मिले किसी सम्मान का मलाल उनके पाठकों या दर्शकों को तो बिल्कुल भी नहीं है। जिन्हें सम्मान या अलंकरण नहीं मिले हैं, हम उनके हमदर्द हैं, और याद दिलाना चाहते हैं कि गांधी को कभी नोबल शांति पुरस्कार नहीं मिला था, इसलिए किसी पुरस्कार के लिए, सम्मान या अलंकरण के लिए काम करने के बजाय अपने पाठकों या दर्शकों के लिए अपना खूब अच्छा काम और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाएं। जिंदगी में किसी पेशे में उस पेशे को इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच मिलने वाला सम्मान ही सबसे बड़ा सम्मान होता है। दुनिया में सारे नोबल पुरस्कार विजेताओं की प्रतिमाओं को मिलाकर भी उतनी प्रतिमाएं नहीं लगी हैं, जितनी एक नोबल पुरस्कारविहीन गांधी की लगी हैं। इसलिए गांधीवादी उदारता के साथ पत्रकारिता जारी रखें।
उत्तर और दक्षिण की दो स्कूलों में अलग-अलग किस्म की हिंसा से उठते हैं कई गंभीर सवाल...
01 नवंबर 2026
देश के दो अलग-अलग प्रदेशों में कल हुई दो घटनाएं कई बातों पर सोचने के लिए मजबूर करती हैं। हरियाणा में तीसरी कक्षा के एक बच्चे ने अपनी ही स्कूल की केजी की एक छात्रा को क्लास के भीतर इस बुरी तरह पटक-पटककर मारा, और उसके बाद ईंट लेकर उसे ईंट से बुरी तरह कुचला, बाल पकडक़र घसीटे। यह सब कुछ स्कूल के सीसीटीवी कैमरे में कैद हुआ है। इस बच्ची को अस्पताल में 40 घंटे बाद होश आया है। डॉक्टरों का कहना है कि उसके चेहरे की कई हड्डियां टूट गई हैं, और उसे प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत पड़ेगी। सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने यह लिखा है कि 8 बरस के इस बच्चे की हिंसा देखते भी नहीं बनती है। अब हरियाणा सरकार ने स्कूल के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज की है, जिसे लापरवाह माना गया है। अभी मिली जानकारी के अनुसार तीसरी कक्षा का यह 8 बरस का बच्चा छोटी सी बच्ची को किसी बहाने से पहली मंजिल के क्लासरूम में ले जाकर उसका सिर बार-बार बेंच पर पटकता है, जूतों से मारता है, बालों से घसीटता है, और उसके बाद ईंट पटक-पटककर उसे मारता है। बच्ची के पिता का कहना है कि जब दूसरे बच्चों ने मारने वाले इस बच्चे से पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया, तो उसका जवाब था कि उसे इसमें मजा आता है। बच्ची का पिता मेहनत-मजदूरी करके कमाने वाला गरीब है। इतनी छोटी सी उम्र में बच्ची के साथ हुई ऐसी भयानक हिंसा से बाकी जिंदगी भी उसके दिमाग पर असर बना रहेगा।
अब एक दूसरी घटना आंध्रप्रदेश की है, वहां एक सरकारी स्कूल में 10वीं की एक क्लास में एक नौजवान घुस गया, और वह बैटरी से चलने वाली आरी लेकर गया था जिससे लोग पेड़ काटते हैं। उसने एक छात्रा पर हमला कर दिया, उसके दाएं हाथ को काट दिया, और चेहरे सहित कई जगह जख्मी कर दिया। कुछ दूसरे बच्चे भी इस हमले में जख्मी हुए, और कम से कम एक लडक़ी ने हमलावर को रोकने की कोशिश की, उसे भी उसने घायल कर दिया। एक सरकारी स्कूल में दिनदहाड़े भरी हुई क्लास में ऐसा हमला सभी माँ-बाप के हौसले पस्त करता है। अभी तक स्कूल में बाहर से आकर ऐसी हिंसा सिर्फ अमरीका जैसे देश में सुनाई पड़ती थी जहां बंदूकों से लोगों को थोक में मारने की एक सिरफिरी संस्कृति है, वहां हर महीने किसी न किसी जगह स्कूल के कई लोगों को मार डाला जाता है। लेकिन बैटरी से चलने वाली पेड़ तक काट डालने वाली ऐसी भयानक आरा मशीन से किसी पर हमले का ऐसा मामला तो स्कूल तो छोड़ दें, किसी और जगह भी सुनाई नहीं देता है।
इन दोनों घटनाओं में किसी एक तरह की दिमागी हालत नहीं है, दोनों अलग-अलग हैं, लेकिन अलग-अलग उम्र के दो लोगों के दिमागों में हिंसा की बात एक सरीखी है। आठ बरस का बच्चा जिस किस्म की हिंसा कर रहा है, और एक नौजवान स्कूल में जाकर जिस तरह आरी से काट डाल रहा है, ये दोनों ही लंबे मानसिक इलाज के लायक मामले हैं। यह नौजवान बालिग सुनाई पड़ता है, और उसके लिए तो सजा भी अलग किस्म की रहेगी। अब सवाल यह है कि हम अपने आसपास ही हर दिन कहीं न कहीं नाबालिगों को चाकूबाजी करते देखते हैं। अभी एक मामला तो ऐसा था जिसमें बिरयानी खाने के लिए किसी आम जगह पर सोए हुए आदमी की जेब से पैसे चुरा रहे नाबालिगों ने उसके जाग जाने पर चाकू मार-मारकर उसका कत्ल कर दिया। एक भी ऐसे किस्म के जुर्म नहीं हैं जिनमें नाबालिग सुनाई न पड़ते हों। और तो और छत्तीसगढ़ के एक सुधारगृह में रखे गए लडक़ों में से दर्जनभर लडक़े वहीं के गार्ड का कत्ल करके फरार हो गए थे। एक दूसरे सुधारगृृह में खिडक़ी तोडक़र भाग गए थे, एक और जगह वे गैस सिलेंडर लेकर सुधारगृह की छत पर पहुंच गए थे, और वहां से नीचे लोगों पर फेंकने की धमकी दे रहे थे। अब स्कूल और घर छोड़े हुए नाबालिग नशा करने के साथ-साथ नशा बेचने और नशे की तस्करी में भी लग गए हैं। ये सारी बातें अच्छी तरह दर्ज होती जा रही हैं। अब यह समझ से परे है कि इस उम्र में बेघर हो चुके, नशेड़ी बन चुके ये नाबालिग बच्चे और क्या-क्या नहीं करेंगे?
यह समझने की जरूरत है कि ऐसी नाबालिग पीढ़ी के सामने जिंदगी का कोई मकसद नहीं दिखता है कि जिसके लिए वे अपने आपको बचाकर रखें। बालिग बनने के पहले वे कई किस्म के नशे के आदी हो चुके रहते हैं, कई किस्म के जुर्म की कमाई पर जिंदा रहना सीख चुके रहते हैं, और जवान होते बदन की जरूरत को पूरा करने के लिए वे तरह-तरह के सेक्स-अपराध भी करते रहते हैं। कई ऐसे अपराध सामने आए हैं जिनमें बालिग मुजरिमों के साथ, उनके गिरोह में नाबालिग भी शामिल थे। इस तरह उनकी ट्रेनिंग भी जुर्म की होते चल रही है। आज जिन लोगों को यह लगता है कि जुर्म की राह पर चल पड़े ऐसे बच्चे अपने ही परिवारों की दिक्कत हैं, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि नशे के लिए ऐसे नाबालिग या बालिग किसी भी दिन सडक़ पर या किसी सार्वजनिक जगह पर किसी भी संपन्न या साधारण व्यक्ति की पसलियों में चाकू उतारकर नशे के लायक पैसा जुटा सकते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले मुम्बई में एक फिल्म अभिनेता पर हुए हमले में जिस तरह के साधारण नौजवान शामिल थे, उससे यह बात समझ पड़ती है कि देश में किसी बड़े व्यक्ति का कत्ल करने के लिए भी कुछ लाख रूपए लेकर सुपारी उठाने को तैयार लोगों की कमी नहीं है। जब समाज में ऐसे लोगों का अनुपात बढ़ते चलेगा, तो अपने आपको बंद घरों और बंद कारों में सुरक्षित महसूस करने वाले लोग भी सुरक्षित नहीं रह जाएंगे।
अब हरियाणा के उस छोटे बच्चे पर लौटें, जो कि अपनी ही स्कूल की छोटी सी बच्ची पर इतनी भयानक हिंसा का मजा ले रहा था, तो उसके बारे में आई शुरूआती जानकारी बताती है कि वह कोई हिंसक वीडियो गेम खेलने का शौकीन था। आज ही एक किसी वीडियो गेम के बारे में पश्चिम से खबर आई है कि उसमें हिंसा का एक सीन दिखाने के लिए दक्षिण कोरिया की एक विमान दुर्घटना के बाद बिखरी हुई लाशों के असली वीडियो डाले गए हैं। जब इस हादसे के मृतकों के परिवारों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर आपत्ति दर्ज कराई, तब उस वीडियो गेम कंपनी ने वे सीन हटाने का वादा किया है। आज जिन लोगों को अपने बच्चों को पिस्तौल, मशीनगन, तलवार, गदा, त्रिशूल, या दूसरे किस्म के हथियारों के खिलौने देने में कुछ अटपटा नहीं लगता है, उन्हें भी यह समझने की जरूरत है कि न तो बड़ों के देखे जाने वाले हर किस्म के हिंसक टीवी सीरियल या सिनेमा बच्चों के लायक रहते हैं, और न ही हथियारों वाले खिलौनों का असर मासूम रहता है। बड़ों को कई बार यह बात समझ नहीं पड़ती कि जिस कमरे में वे जुर्म और हिंसा की कहानियां टीवी पर देखते रहते हैं, वहां आते-जाते बच्चों पर भी उसका असर पड़ता है। कई माँ-बाप तो इस खतरनाक दर्जे के लापरवाह रहते हैं कि हिंसा और जुर्म के कार्यक्रमों के बीच उसी कमरे में बैठे बच्चे सब देखते-सुनते रहते हैं। उनके कौन से वीडियो गेम, या मोबाइल गेम हिंसा वाले रहते हैं, यह भी देखने की फुर्सत बहुत से माँ-बाप को नहीं रहती। कई माँ-बाप अपने बच्चों की मौजूदगी में अखबार पढ़ते हुए एक-दूसरे से हिंसा की खबरों की बातें करते हैं, और वे बातें बच्चों के कानों में भी पड़ती हैं। कई लोग फोन पर बात करते हुए एक दूसरी ही दुनिया में चले जाते हैं, और वे अपने आसपास कौन है इसे भूल ही जाते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है।
दिक्कत यह है कि बाल मनोविज्ञान को समझने वाले लोगों का हिन्दुस्तान में अकाल पड़ा हुआ है। गजब बात यह है कि इस देश में बेरोजगारों की फौज भी है, और परामर्शदाताओं का अकाल है। किसी को परामर्श देने की नौकरी देने के लिए ही उसे मनोविज्ञान की जानकारी देना जरूरी नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए भी मनोवैज्ञानिक समझ विकसित करना बेहतर बात होगी। आज सरकार अगर लोगों को कुछ पढ़ाने का प्रस्ताव रखे, तो लोग तुरंत ही उसके बाद नौकरी की उम्मीद करने लगेंगे। इसलिए औपचारिक पढ़ाई से परे, आधे-एक दिन के मनोवैज्ञानिक समझ के कार्यक्रम समाज के अलग-अलग तबकों के लिए होने चाहिए, ताकि वे अपने घर को संभाल सकें, और उठते-बैठते आसपास के दूसरे लोगों को भी नसीहत दे सकें। सरकार से परे सामाजिक संगठनों को भी अपने सदस्यों की पारिवारिक जिंदगी बेहतर बनाने के लिए ऐसी कोशिशें करनी चाहिए। हिन्दुस्तान में आज की जिंदगी में सभ्यता की महीन बातों की कोई इज्जत नहीं रह गई है, पता नहीं कैसे यह नौबत सुधर पाएगी, और फिलहाल तो अधिक असभ्यता की तरफ बढ़ता हुआ यह समाज अपने खुद के लिए और अधिक खतरा खड़ा करते ही दिख रहा है।
जिन राज्यों में पंजाब-हरियाणा दोनों आ सकते हैं, उनमें पड़ा हुआ है चैंपियनों का टोटा…1`
31 अक्टूबर 2026
भारत की महिला पहलवान मनीषा भानवाला ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल जीतकर नया इतिहास रचा। वे ऐसी पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। इसके आखिरी एक-दो मिनटों का वीडियो देखने लायक है जिसमें मनीषा पूरी ताक़त के साथ कुश्ती की चटाई पर मजे से घूम रही थी, और उसके सामने की अमरीकी खिलाड़ी दोनों हाथों को घुटने पर टेककर झुकी हुई थी, वह खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। हरियाणा की मनीषा ने हरियाणा की और बहुत सी महिला खिलाडिय़ों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा लिया है, लेकिन इस बार उसने अपने खेल में देश में सबसे ऊपर की जगह दर्ज करा ली है, और इस मुकाबले में तो पूरी दुनिया में।
इस कामयाबी को देखकर हमने कुछ ढूंढने की कोशिश की कि हरियाणा के मिट्टी-पानी में ऐसा क्या है कि वहां से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए इतने खिलाड़ी निकलते हैं। कुछ आंकड़ों को देखें, पेरिस के इस पिछले ओलंपिक में भारत के 117 खिलाडिय़ों में से 24 अकेले हरियाणा के थे, करीब 20.5 फीसदी। और हरियाणा की आबादी देश की आबादी की 2 फीसदी ही है। आबादी के अनुपात में हरियाणा ने 10 गुना अधिक खिलाड़ी उगले हैं। इसी ओलंपिक में हरियाणा के बगल के पंजाब को देखें, तो वहां के 19 खिलाड़ी थे। ये दोनों राज्य मिलकर भारतीय दल का 36 फीसदी थे। पंजाब की आबादी देश की आबादी की कुल सवा दो फीसदी के करीब है। इस तरह पंजाब-हरियाणा के खिलाड़ी सबसे आगे रहे। अब राज्य की सरहद के भीतर की बात अगर देखें, तो इन दोनों राज्यों में लोगों की क़द-काठी बहुत से दूसरे राज्यों के लोगों के मुकाबले अधिक रहती है। यह एक बहुत बड़ा शारीरिक कारण हो सकता है। देश की सरहद के इस हिस्से के लोगों की क़द-काठी ऐसी क्यों हैं इसके इतिहास में अगर जाएंगे तो हो सकता है कि कुछ लोगों को अप्रिय लगने वाले कुछ डीएनए तथ्य सामने रखना पड़े। लेकिन उससे परे हम इन दोनों राज्यों में खिलाडिय़ों के महत्व पर एक नजर डालें, तो लगता है कि एक तरफ तो हरियाणा लड़कियों और महिलाओं की जींस और उनके मोबाइल फोन पर पाबंदी लगाने वाली खाप पंचायतों के लिए भी जाना जाता है, लेकिन दूसरी तरफ कुश्ती की पोशाक में लड़कियों को खेलने की इजाजत देने में हरियाणा देश में सबसे आगे है। फिर लगे हुए इन दोनों राज्यों को देखें तो इनमें खेलों की एक बड़ी पुरानी मजबूत स्थानीय परंपरा है, गांव-गांव में अखाड़े रहे हैं, कस्बों में ईनामी मुकाबले होते हैं, और बहुत से परिवार यह मानते हैं कि किसी एक बड़े खिलाड़ी के निकल जाने से परिवार का भला भी हो सकता है। इसलिए वहां नई पीढ़ी को खेलने का अधिक हौसला और मौका भी दिया जाता है।
लेकिन थोड़ा सा और आगे चलें तो एक समाचार वेबसाइट, द क्विंट ने एक विश्लेषण किया था जिसमें 2023 के एशियाई खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धाओं के पदक विजेताओं के राज्यों का आबादी के आधार पर विश्लेषण किया गया था। इनमें हरियाणा सबसे आगे था, और उसके बाद मणिपुर, तेलंगाना, पंजाब और केरल भी अच्छे अनुपात वाले राज्यों में थे। लेकिन यह हिसाब-किताब सिर्फ 2023 के एशियाई खेलों के आधार पर था। अगर हम सभी अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत के अलग-अलग राज्यों की ताक़त, या वहां के खिलाडिय़ों की ताक़त को देखें, तो हरियाणा कुश्ती, मुक्केबाजी, हॉकी, एथलेटिक्स, और शूटिंग में बहुत मजबूत है। मणिपुर अपनी छोटी सी आबादी के अनुपात में फ़ुटबॉल, वेटलिफ्टिंग, मुक्केबाजी, और हॉकी में खासी उल्लेखनीय कामयाबी वाला राज्य है। पंजाब हॉकी, एथलेटिक्स, कुश्ती, और शूटिंग में मजबूत है। केरल भी एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, और वॉलीवॉल जैसे कुछ खेलों में मजबूत है। मिज़ोरम और गोवा छोटे-छोटे राज्य होने के बावजूद फुटबॉल में मौजूदगी रखते हैं। तमिलनाडु शतरंज में सबसे अधिक चैंपियन पेश करने वाला राज्य है, लेकिन इसके साथ-साथ वह एथलेटिक्स, हॉकी और शूटिंग में भी मौजूदगी रखता है। महाराष्ट्र शूटिंग, कुश्ती, बैडमिंटन, क्रिकेट, जैसे कई खेलों में आगे है।
अब हम उन राज्यों को देखें जिनमें आबादी तो अच्छी-खासी है, लेकिन खेलों के मामले में जो तकऱीबन ठन-ठन गोपाल हैं। बिहार और उत्तरप्रदेश में इक्का-दुक्का खिलाडिय़ों को छोड़ दें तो आबादी के अनुपात में उसकी खेल और खिलाड़ी सफलता तकऱीबन जीरो है। इन दोनों राज्यों में कई हरियाणा और कई पंजाब समा सकते हैं, अकेले यूपी में 4 हरियाणा और 4 पंजाब आ सकते हैं, बिहार में भी दो हरियाणा और दो पंजाब आ सकते हैं, लेकिन इनका खेलों से कोई लेना-देना नहीं दिखता है। मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है, और छत्तीसगढ़ के अलग होने के पहले वह और भी बड़ा था। लेकिन इन दोनों ही राज्यों में अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों का तकऱीबन अकाल है। किसी एक ओलंपिक, या एशियाई, राष्ट्रमंडल खेलों में कभी-कभार इन राज्यों से एक खिलाड़ी का नाम आ जाता है, लेकिन कुल मिलाकर इनकी हालत कमजोर है। एक दिलचस्प बात यह है कि देश में जिन दो राज्यों में फुटबॉल का सबसे पुराना इतिहास रहा है, उनमें, बंगाल और गोवा में अब राष्ट्रीय टीम के लायक़ खिलाड़ी घटते चले गए हैं। ओडिशा, बंगाल, कर्नाटक, आंध्र-तेलंगाना, जैसे और कई राज्य हैं जो कि अलग-अलग क्षमताओं के हैं, लेकिन वहां से खिलाड़ी अधिक नहीं निकल पाए। ओडिशा ने एक राज्य के रूप में देश की हॉकी टीम के प्रायोजक की भूमिका बीते कई बरस से निभाई है, और उसके चलते यह टीम आसमान पर भी पहुंच गई है, लेकिन इसका ओडिशा को कोई घरेलू फायदा नहीं हो सका।
हम घूम-फिरकर फिर उसी हरियाणा की मिसाल पर आते हैं तो कद-काठी वाले डीएनए से परे समाज और सरकार के काबू की चीजों को देखें तो यह साफ है कि गांव-गांव तक से खेलों को मिलने वाला प्रोत्साहन खिलाड़ी पैदा करता है, और उनमें से कुछ को चैंपियन बनने तक की ताक़त देता है। समाज भी आगे बढ़ाता है, और सरकार भी। हमें लगता है कि देश के बाकी सारे राज्यों को बैठकर आईना देखना चाहिए कि हरियाणा, पंजाब, और मणिपुर से वे क्या सबक ले सकते हैं? सरकारों की दिलचस्पी बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में रहती है, जिन पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन खेल के मैदानों को बाजार बना देना, उनका बाजारू इस्तेमाल करना, उनको धार्मिक और राजनीतिक कार्यक्रमों से पाटकर रखना, बच्चों के खिलाड़ी बनने की राह में एक बड़ी बाधा है। बड़े स्टेडियम में जाकर खेलने लायक़ तो वे तब ही बन सकते हैं जब वे गाँव और मोहल्ले के, स्कूलों के मैदानों पर खेलने का मौका पाएं, खेल मुकाबलों में जाने पर रोज़ खाने का भत्ता इतना रहे कि पेट भर सके, सोने के लिए दरी के बजाय गद्दा मिल जाए, स्कूलों में खेल का सामान मिल जाए, और मैदान शामियानों के गड्ढों के बिना खेलने लायक मिल जाए। बाकी प्रदेश अपने खेल प्रदर्शन को कैसे सुधार सकते हैं, इसे तो हमारी तरह की बहुत मामूली समझ रखने वाले लोग भी समझ पाते हैं, लेकिन सरकारों में बैठे हुए बड़े-बड़े दिग्गज, और खेल संघों की राजनीति पर क़ाबिज़ दानवीय ताकत रखने वाले लोग सब कुछ समझते हुए भी अपने छोटे-छोटे मतलब में व्यस्त रहते हैं। आज हरियाणा के बहाने हमें लिखने का मौका मिला है, तो लिख रहे हैं, आगे तो ताकतवर लोग बड़े समझदार हैं हीं।
नक्सल हिंसा खात्मे की बड़ी कामयाबी वाली इस राज्य की सालगिरह और सोचने के मुद्दे
30 अक्टूबर 2026
देखते ही देखते छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना की एक और सालगिरह आ गई। यह रजत जयंती वर्ष पूरा गुजर गया, और अब वर्तमान साय सरकार का कार्यकाल आधा होने के साथ ही राज्य अगले चुनाव की तरफ धीरे-धीरे बढ़ चला है। 25 बरस किसी राज्य की जिंदगी में न बहुत अधिक होते हैं, और न ही बहुत कम। इसलिए छत्तीसगढ़ को इस मौके पर पलटकर एक नजर यह जरूर देखना चाहिए कि वह कहां से कहां तक पहुंचा है, और फिर आगे देखकर सफर बढ़ाना चाहिए क्योंकि अगला मूल्यांकन चुनाव में तो होगा ही, लेकिन सरकारों और पार्टियों से परे यह करीब 25 बरस बाद होगा जब देश आजादी की सौवीं सालगिरह मना रहा होगा। पिछले बरस भी इन पहलुओं को लेकर बहुत से विश्लेषण हुए थे, लेकिन कब तक राज्य की भाजपा सरकार के कार्यकाल को बहुत समय नहीं हुआ था, और चुनावी घोषणापत्र की कुछ सबसे बड़ी बातों पर अमल ही मूल्यांकन का एक बड़ा पैमाना था। अब महतारी वंदन योजना के तहत प्रदेश की अधिकतर शादीशुदा महिलाओं को मिलने वाले हजार रूपए महीने इन सबका हक बन चुके हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह राशन और बिजली की रियायत एक चुनाव के बाद अगले चुनाव में वोटरों के लिए कोई मुद्दा नहीं रहतीं। इसलिए राज्य को अगले दो बरस में सरकार और सत्तारूढ़ दल से बेहतर और असरदार प्रदर्शन की उम्मीद रहेगी।
हम आज जब पिछली सालगिरह के बाद के इस एक बरस का मूल्यांकन करना चाहते हैं, तो बस्तर में नक्सल हिंसा का खात्मा इस राज्य के इतिहास की सबसे बड़ी घटना लगती है। न सिर्फ इस सरकार की उपलब्धि, बल्कि राज्य बनने के बाद से इस हिंसक उग्रवाद का खात्मा, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ दूसरे राज्यों से भी इसका खत्म होना एक असाधारण घटना रही। जब यह राज्य बना था, तो अविभाजित मध्यप्रदेश से विरासत में नक्सल हिंसा मिली थी, और छत्तीसगढ़ की सरकारों की कम या अधिक कोशिशों के बावजूद कुछ भी कारगर साबित नहीं हुआ था। हर बरस सैकड़ों जवान मारे जाते थे, और सैकड़ों ग्रामीण आदिवासी भी। ऐसा लहूलुहान बस्तर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की घोषित की गई 31 मार्च 2026 की तारीख के पहले इस हैरतअंगेज तरीके से नक्सल हिंसामुक्त हो जाएगा, इस पर अधिक लोगों को भरोसा नहीं था। लेकिन जिस अंदाज में नक्सल नेताओं से बातचीत हुई, साथ-साथ सुरक्षाबलों ने घेरेबंदी करके मुठभेड़ भी जारी रखी, उसका मिलाजुला असर बस्तर की शांति की शक्ल में सामने आया। आज दशकों के बाद बस्तर गोलियों और धमाकों से इतना आजाद हो चुका है कि पिछले दो-चार दिनों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां के सैकड़ों नेताओं की सुरक्षा घटाई जा रही है। अब बस्तर में किसी की जिंदगी पर भी पहले सरीखा खतरा नहीं मंडरा रहा है, बल्कि बेहतर यह कहना होगा कि कोई भी खतरा नहीं मंडरा रहा है।
यह नौबत बस्तर के विकास के लिए एक ऐतिहासिक संभावना लेकर आई है। जाने किस भरोसे से अमित शाह ने यह घोषणा की है कि बस्तर देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनेगा, जिस तरह नक्सल हिंसा खत्म हुई, उसी तरह अगर यह दूसरी घोषणा भी पूरी होती है, तो यह छत्तीसगढ़ के लिए दूसरी ऐतिहासिक घटना होगी। साथ ही आज सालगिरह के मौके पर यह राज्य सरकार, यहां की सरकारी मशीनरी, और बस्तर के सारे ही नेताओं के लिए चुनौती का एक मौका भी है कि हिंसा खत्म होने के बाद का वहां का शून्य विकास की जो चुनौती पेश कर रहा है, उसमें कौन-कौन क्या कर सकते हैं? हम इन आशंकाओं को बढ़ाना नहीं चाहते कि बस्तर की खदानों को निजी कारोबारियों के हवाले कर दिया जाएगा। जहां पर नक्सली नहीं थे, वहां पर भी खदानों का निजीकरण एक नियमित प्रक्रिया रही, और यह देश-प्रदेश में किसी भी सरकार के रहते हुए जारी रही। इसलिए सत्ता के खिलाफ इस आरोप को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना हमेशा से चलते रहा है। अगर किसी इलाके में खनिज हैं, तो वे पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाए बिना अगर निकाले जा सकते हैं, तो कोई भी सरकार उस तरफ आगे बढ़ेगी। बस्तर के विकास के लिए जितने बजट की जरूरत पड़ेगी, हो सकता है कि बस्तर की खदानों से उससे काफी अधिक मुनाफा सरकारों को मिले, और वह देश-प्रदेश के दूसरे काम भी आए। लेकिन खदानों के मुद्दे से परे भी सोचने की जरूरत है कि दशकों से जिस बस्तर के बहुत बड़े नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकार की काम की संस्कृति खत्म हो चुकी थी, वहां पर नियम-कानून के तहत काम करने की आदत कैसे शुरू हो पाएगी? अभी कुछ अखबारों की रिपोर्ट बताती हैं कि बस्तर के जंगलों में सरकारी विभाग ने किस तरह से भर्राशाही से सैकड़ों-हजारों करोड़ खर्च किए, जिस पर कोई निगरानी भी नहीं थी। ऐसी खबरें बताती हैं कि सरकारों को इन इलाकों में काम करने के लिए अधिक सावधानी सीखनी पड़ेगी। कई लोगों का यह भी मानना है कि आदिवासी इलाकों में वहां के जनप्रतिनिधि ही जनता के बड़े शोषक बन जाते हैं, इस पहचान से भी छुटकारा पाना नेताओं के लिए बेहतर होगा क्योंकि हिंसा खत्म होने के बाद लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढऩा तय है, और वे शोषकों की शिनाख्त बेहतर तरीके से कर पाएंगे।
अब बस्तर से परे बाकी छत्तीसगढ़ को देखें, तो सालगिरह के मौके पर सरकार को कमर कसकर यह देखने की जरूरत है कि जिन मौजूदा योजनाओं पर बरसों से खर्च हो रहा है, उस खर्च की कोई जवाबदेही तय हो पा रही है? आज तो हर दिन ऐसी दर्जनों खबरें आती हैं कि छोटी-छोटी सी योजना पर खर्च हुए करोड़ों रूपए फिजूल हो गए दिखते हैं, क्योंकि सारा काम ठप्प पड़ा है, इमारतें अधूरी हैं, मशीनें खराब हैं, जनता के किसी काम नहीं आ रही है। इसके बावजूद उसी ढर्रे से उसी तरह के नए कामों पर खर्च जारी है क्योंकि सरकारी अमले को नया खर्च हमेशा आकर्षक लगता है। पीछे के अधूरे कामों की जवाबदेही अगर तय नहीं होगी, तो मौजूदा सरकार को अपने आखिरी के बरस में अपने पहले के बरसों के किए गए काम मुंह चिढ़ाते खड़े रहेंगे। किसी सत्तारूढ़ पार्टी को किसी काम के होने से जितना नफा होता है, उससे अधिक नुकसान किसी अधूरे, बिगड़े हुए, या भ्रष्टाचार में डूब गए कामों से होता है। इसलिए सरकार को नई मुनादियों के साथ-साथ कड़ाई से यह भी जांचना-परखना चाहिए कि बीते बरसों में हुए काम, इस सरकार के आने के पहले की योजनाओं की भी आज क्या हालत है? चारों तरफ सरकारी कामकाज अधूरा, बंद, या बिगड़ा हुआ अगर दिखता रहेगा, तो नए शुरू होने वाले काम की साख भी कम रहेगी। भारत में चुनाव तो पांच-पांच साल के लिए होते हैं, सरकारें भी आती-जाती रहती हैं, लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल के काम पूरे करने, जारी रखने, सुधारने का जिम्मा भी नई सरकार पर रहता ही है। चाहे जिस सरकार ने खर्च किया हो, पैसा तो जनता की जेब का गया था, और आज वह काम आ रहा है, इसे जांचने का एक पुख्ता इंतजाम सरकार को करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि सरकारी लागत से हुए किसी भी काम की उत्पदकता की निरंतरता पर निगरानी रखना किसी भी नए काम को छेडऩे के मुकाबले अधिक जरूरी बात है।
सालगिरह के मौके पर खुशियों के जलसे तो अच्छी बात है, छत्तीसगढ़ के पास नक्सल हिंसा से मुक्त होने की एक बड़ी कामयाबी भी खुशियां मनाने के लिए है। लेकिन इसके साथ-साथ सरकार को अपने काम और राज्य को बेहतर बनाने के बारे में बड़ी गंभीरता से सोचना चाहिए। नक्सल हिंसा मोटेतौर पर बस्तर, और बाहर के कुछ आदिवासी जिलों तक सीमित थी। इसके खत्म होने की बात को पूरे प्रदेश में लोग लंबे समय तक याद नहीं रखेंगे, कम से कम वोट इससे बहुत अधिक प्रभावित नहीं होंगे। दूसरी तरफ महतारी वंदन जैसी योजनाओं का फायदा एक चुनाव में भाजपा को हो चुका है, अब तो दूसरे प्रदेशों ने इस एक हजार रूपए महीने के मुकाबले बहुत अधिक रकम भी महिलाओं को दी जा रही है, इसलिए अगले चुनाव में यह छत्तीसगढ़ की सत्तारूढ़ भाजपा के सामने भी चुनौती रहेगी। जलसों के इस मौके पर सरकार को कमर कसकर अगले दो बरस बेहतर बनाने की जरूरत है, चुनावी जीत-हार से परे भी हम तो राज्य के भले के लिए सरकारों के चौकस रहने, और जनता के पैसों के खर्च की जवाबदेही तय करने के हिमायती हैं।
सडक़ों पर नियम तोडऩे वालों का राज, बेकसूर लोग खतरे में
29 अक्टूबर 2026
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कल एक निजी स्कूल की बस सडक़ से उतरकर खेत में जा घुसी। बस में 25 बच्चे थे, एक बच्चा बुरी तरह घायल हो गया। आसपास के लोगों ने बताया कि स्कूल से निकलने के वक्त से ही ड्राइवर बहुत तेजी से गाड़ी चला रहा था, और उसकी लापरवाही से यह हादसा हुआ है। कहने के लिए हर कुछ महीनों में राज्य के हर शहर में स्कूली बसों के फिटनेस की जांच परिवहन विभाग करता है, लेकिन हर दिन बस चलाने वाले ड्राइवर किस तरह बस चलाते हैं, यह तो स्कूल मैनेजमेंट के नियंत्रण में रहता है, या स्थानीय ट्रैफिक पुलिस की नजरों में। कहने के लिए स्कूल-कॉलेज की बसों के पीछे यह लिखा रहता है कि लापरवाह ड्राइविंग हो रही हो, तो फलां नंबर पर फोन करें। लेकिन कई बसों पर लिखे हुए नंबरों से कोई जवाब नहीं मिलता। एक-एक छात्र-छात्रा को चढ़ाने के लिए स्कूल-कॉलेज बसें सडक़ के बीच अचानक रोक दी जाती हैं, और उनके पीछे की गाडिय़ों के लिए खतरा रहता है। ऐसी पीली बसें राज्य में चलने वाली मुसाफिर बसों जितनी ही खतरे में रहती हैं, अगर उनकी हालत ठीक न हो, या उनके ड्राइवर लापरवाह हों, नशे में हों, या हड़बड़ी में हों।
ऐसे हादसे सरकार के अलग-अलग विभागों और स्थानीय पुलिस के लिए जागने के रहते हैं। 25 बच्चों सहित बस खेत में घुस गई, और एक बच्चा बुरी तरह जख्मी हुआ, यह तो एक सीमित नुकसान है, लेकिन ऐसा अगर किसी नदी-नाले या खाई के किनारे हुआ रहता, तो दर्जनों बच्चों की जिंदगियां खतरे में रहतीं। हम आमतौर पर देखते हैं कि प्रदेश में किसी भी तरह की गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर मोबाइल पर बात करते चलते हैं। और तो और दुपहिया सवार लोग एक हाथ में मोबाइल थामे हुए, उसकी स्क्रीन पर उंगली चलाते हुए स्कूटर-बाइक चलाते रहते हैं, और सडक़ पर दूसरे लोगों पर खतरा बने रहते हैं। ऐसे लोगों को देखें तो लगता है कि मोबाइल पर उनकी एकाग्रता किसी योगी की योग-ध्यान में एकाग्रता से भी ऊंचे दर्जे की रहती है, और वे आसपास की दुनिया से बिल्कुल बेखबर चलते हैं। कहने के लिए बड़े शहरों में पुलिस के कैमरे हर चौराहों पर लगे हैं, और ऐसे सैकड़ों-हजारों कैमरों की रिकॉर्डिंग को पुलिस कंट्रोल रूम में दर्जनों कर्मचारी बैठकर देखते भी हैं। इसके बावजूद राजधानी रायपुर जैसे शहर में अगर कोई व्यक्ति कुछ घंटे व्यस्त सडक़ों पर घूम ले, तो उसे कम से कम सैकड़ों ऐसे लोग दिख जाएंगे जो कि गाड़ी भी चला रहे हैं, और मोबाइल फोन पर बात कर रहे हैं, और कई मामलों में तो संदेश भी टाइप कर रहे हैं।
सडक़ सुरक्षा जो कि किसी भी जनकल्याणकारी राज्य की एक सबसे बड़ी प्राथमिकता रहनी चाहिए, भारत के कई प्रदेशों में इसे सबसे अंत में रखा जाता है। सुप्रीम कोर्ट तक झल्लाकर यह बात कह चुका है कि सडक़-कानून लागू करने की जिम्मेदारी तो सरकार की है, सुप्रीम कोर्ट लाठी लेकर इस पर निगरानी तो नहीं रख सकता। फिर भी सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के मुताबिक हर राज्य में हाईकोर्ट के जज प्रदेश स्तर की सडक़ सुरक्षा कमेटी के मुखिया रहते हैं, और हर कुछ महीनों में उसकी बैठक सुनाई पड़ती है। इसमें जज के अलावा सरकार के कुछ विभागों के लोग रहते हैं, लेकिन ऐसी बैठकों से बरसों से चली आ रही सरकारी कमजोरी का कोई इलाज होते नहीं दिखता। हाईवे पर जानवरों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया को जानवरों के बाड़े बनाने का आदेश दिया था, इस पर इस अथॉरिटी ने अदालत को लिखकर दिया है कि इस पर अमल के लिए सात हजार करोड़ रूपए लगेंगे, जो कि उसके पास नहीं हैं। ऐसे हादसे हर कुछ हफ्तों में तब अखबारों में खबर बनते हैं जब या तो गोवंशीय जानवर थोक में मारे जाते हैं, या कुछ इंसान भी मरते हैं। इक्का-दुक्का मवेशियों की मौत खबरों में नहीं आतीं। दूसरी तरफ शहरों के भीतर ट्रैफिक नियम तोडऩे वाले लोगों के प्रति पूरे प्रदेश में हैरान करने वाली एक नर्मी-हमदर्दी दिखाई पड़ती है जिससे समझ नहीं पड़ता कि सरकार सडक़ों को महफूज बनाना क्यों नहीं चाहती? नियम तोडऩे वाले लोग नियम पालने वाले लोगों पर खतरा बने रहते हैं, लेकिन ऐसे खतरनाक लोगों का चालान करना भी सरकार नहीं चाहती।
आज जो लोग सार्वजनिक जगहों की टेक्नॉलॉजी की मामूली जानकारी भी रखते हैं, उन्हें भी पता है कि सीसीटीवी कैमरों, और स्पीड चेक करने, गाडिय़ों के नंबर दर्ज करने वाले रडार सरीखे उपकरणों से बहुत तेजी से टीवी स्क्रीन देखते हुए चालान हो सकते हैं, और अब तो सुप्रीम कोर्ट ने हैरान-परेशान होकर यह तक कहा है कि जो लोग ट्रैफिक चालान नहीं पटाते हैं, उनके बिजली बिल के साथ चालान की रकम जोडक़र क्यों नहीं भेजी जाती? इसके अलावा टोल टैक्स नाके एक और ऐसी जगह हैं जहां कम्प्यूटरों पर गाडिय़ों के नंबर दर्ज होते हैं। ऐसी जगहों पर भी बकाया चालान वाली गाडिय़ों के नंबर डाले जा सकते हैं, ताकि जिसका चालान बाकी हो, वह नाका पार ही न कर सके। अब हर गाड़ी के साथ कोई न कोई मोबाइल नंबर जोडऩे की शर्त भी लागू हो रही है, और इस तरह भी चालान पहुंचाने का काम आसान हो रहा है। खुद सडक़ के नियमों में यह शामिल है कि बार-बार नियम तोडऩे वाले लोगों के ड्राइविंग लाइसेंस, या उनकी गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन निलंबित या रद्द किए जा सकते हैं। लेकिन सरकार है कि वह कड़ाई बरतना ही नहीं चाहती।
हमारा लंबा तजुर्बा यह कहता है कि गुंडागर्दी करने वाले जितने लोग हैं, उनमें से अधिकतर की जिंदगी में तोड़ा जाने वाला पहला नियम ट्रैफिक का रहता है। कम उम्र से ही वे किसी की भी गाड़ी लेकर गैरजिम्मेदारी से दौड़ाते रहते हैं, और उन्हें पहला तजुर्बा यही होता है कि कानून तोडऩे से कुछ नहीं बिगड़ता। यही बात मिजाज में बैठते चलती है, और फिर नशा खरीदने से लेकर नशे की तस्करी, और बिक्री तक पहुंच जाती है, चाकू खरीदने से लेकर चाकू घुसाने तक आ जाती है, और तरह-तरह के जुर्मों तक भी। सरकार को यह समझना चाहिए कि नाबालिग लडक़ों पर अगर ट्रैफिक नियमों के तहत ही कार्रवाई होने लगेगी, तो उनके भीतर नियम-कानून के लिए हिकारत जड़ नहीं जमा सकेगी, और वे आगे इससे बड़ा जुर्म करते हुए हिचकने लगेंगे। इसलिए ट्रैफिक नियम तोडऩे को सिर्फ ट्रैफिक बिगाडऩे तक सीमित मानना गैरजिम्मेदारी की बात होगी, यह समाज में कानून व्यवस्था बिगाडऩे के लिए बीज बोने सरीखा रहता है। हाईकोर्ट के जज सडक़ सुरक्षा कमेटियों के मुखिया रहते हैं, उन्हें भी यह गौर करना चाहिए कि आज सबसे सस्ती टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल से कैमरों और रडार से चालान अगर हो सकते हैं, तो वे हर उम्र के लोगों के लिए एक सबक रहते हैं। इसके अलावा बिलासपुर की जिस ताजा घटना को लेकर आज हम यहां लिख रहे हैं, वह घटना यह भी सुझाती है कि हर बड़े शहर में स्कूल-कॉलेज की बसों के टाइम पर अलग से जांच करने वाले कुछ उडऩदस्ते रहने चाहिए, जिनका खर्च (कानूनी और सरकारी खर्च) नियम तोडऩे वाली बसों के चालान से ही निकल सकता है। ट्रैफिक अकेला ऐसा मामला है जिसमें अधिक चालान करके सरकार अधिक जुर्माना भी जुटा सकती है, और नियम तोडऩे को घटा भी सकती है। इन दोनों बातों को एक साथ रखकर देखें, तो लगता है इससे सरकार के दोनों हाथों में लड्डू हैं, यह अलग बात है कि सरकार इन्हें चखने से डरती है, कि कहीं वोटर नाराज न हो जाएं।
जलवायु परिवर्तन और बाकी नुकसान देखकर कृषि-नुकसान घटाने की तरकीबें जरूरी...
27 अक्टूबर 2026
एक चक्रवाती तूफान के चलते आज से तीन दिन चार राज्यों में भारी बारिश की मौसमी-भविष्यवाणी की गई है। हर बारिश गरीबों की बहुत बड़ी आबादी के लिए दिक्कत-परेशानी लेकर आती है। एक वक्त था जब मुम्बई की मानसूनी बारिश देखने के लिए खाड़ी के देशों से शेख कुनबे सहित आकर मुम्बई में समंदर किनारे की होटलों में रूकते थे, और बारिश देखते थे, क्योंकि रेगिस्तान वाले देशों में कभी ऐसी मानसूनी बारिश उन्हें देखने नहीं मिलती थी। लेकिन गरीब हिन्दुस्तानी के लिए बारिश में जीना दूभर होता है। किसान और खेतिहर मजदूर तो खेतों की फसल के मुताबिक बारिश से खुश रहते हैं, लेकिन कृषि अर्थव्यवस्था से परे के लोगों की निजी जिंदगी तकलीफ में डूब जाती है। शहरी बस्तियां अराजक और अनियोजित तरीकों से बसी हुई हैं, और वे तेज बारिशों में डूब जाती हैं। लोगों के घरों का सामान बर्बाद हो जाता है। कई दिनों तक रोजी छिन जाती है क्योंकि वे घर छोडक़र काम पर निकलने की हालत में नहीं रहते, और बर्बादी भी बहुत होती है। पानी में डूबा हुआ सामान बाद में काम का नहीं रह जाता।
लेकिन फसल और जल आपूर्ति के दो बड़े मकसद ऐसे हैं जो कि पानी से जुड़े हुए हैं। अभी पिछले तीन-चार दिनों से लगातार ये खबरें आ रही हैं कि दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी कितना कम रह गया है। कल की ही हैदराबाद की खबर थी कि वहां पर बीते बरसों के मुकाबले पानी के टैंकरों से सप्लाई कितने गुना बढ़ गई है, और यह मानसून के तुरंत बाद का हाल है। अभी ठंड के पूरे महीने बाकी हैं, और उसके बाद उस गर्मी के महीने बाकी हैं जो कि आज के लबालब प्रदेशों को भी सुखा डालती है। फिर खेती के लिए जो बारिश जरूरी और अच्छी होती है, उसके बारे में भी यह समझने जरूरी है कि फसल में पानी की जरूरत पूरे वक्त एक सरीखी नहीं रहती, कभी पानी कम लगता है, और कभी अधिक। ऐसे में जब जलवायु परिवर्तन के चलते हुए बारिश के महीने और हफ्ते बदल जा रहे हैं, कभी बहुत सीमित समय में बहुत अधिक बारिश हो जा रही है, जो कि बहकर नदियों के रास्ते समंदर चली जाती है, और कभी जब बारिश की जरूरत है, तो सूरज तपते रहता है, बादलों का ठिकाना नहीं रहता है। ऐसे में खेतों, इंसानों, और जानवरों की पानी की जरूरत पूरी होने का ठिकाना नहीं रह गया है। इसके अलावा आज देश में बहुत से कारखाने खूब सारा पानी मांगते हैं, और उन कारखानों को अधिकतर प्रदेशों में प्राथमिकता से पानी दिया जाता है, क्योंकि कोई भी राज्य कारखाने खोना नहीं चाहते। ऐसे में बांधों के जलाशयों में लगातार घटते चले जा रहे जलभंडार के बंटवारे में एक ऐसी खींचतान चल रही है, जिसमें लुभावनी राजनीति, कृषि और औद्योगिक अर्थव्यवस्था की प्राथमिकता तय करने का गलाकाट मुकाबला चलते रहता है।
अभी समुद्री तूफान से जुड़ी इस बेमौसम की बारिश, और उसमें भी अंधाधुंध बारिश को लेकर दो बातें लगती हैं। एक तो यह कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में धान की जो फसल खेतों में तैयार खड़ी है, वह तेज बारिश में गिर सकती है जिससे कटाई के बाद उपज कम मिलेगी। दूसरी बात यह कि पिछले बरस का भी जो धान अभी तक मंडियों के अहातों में खुले में पड़ा हुआ है, उसका और नुकसान होगा। धान का यह पूरा चक्र अपने आपमें एक आर्थिक दुष्चक्र सरीखा रहता है क्योंकि इसमें भारी सरकारी अनुदान के साथ किसान की फसल खरीदी जाती है, जिसमें सरकारी बजट का एक खासा हिस्सा खर्च होता है। इसके बाद इस धान के परिवहन से लेकर उसकी मिलिंग तक, और फिर उस चावल के राज्य और केन्द्र सरकार के गोदामों में पहुंचाने तक भ्रष्टाचार का एक बड़ा सिलसिला चलता है। इसके साथ-साथ एक दूसरा भ्रष्टाचार चलता है कि छत्तीसगढ़ जैसे बेहतर इंतजाम वाले राज्य में अड़ोस-पड़ोस के राज्यों से चोरी-छुपे लाकर धान बेचा जाता है, और उस पर भी छत्तीसगढ़ का धान-अनुदान बर्बाद होता है। इन सबके साथ-साथ जब मौसम की मार से भी धान खराब होता है, तो मानो बाजार भाव से खासे महंगे में खरीदे गए धान, और बनवाए गए चावल की तरह-तरह की बर्बादी होती है। इसी से जुड़ा हुआ चावल का दुष्चक्र शुरू होता है जिसमें केन्द्र और राज्य सरकारों की रियायती अनाज योजनाओं के तहत मुफ्त या सस्ते में चावल दिया जाता है, और उसमें भी एक बड़ी चोरी चलती है।
एक तरफ जलवायु परिवर्तन के चलते खेती की अर्थव्यवस्था पर न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में खतरा मंडरा रहा है। दूसरी तरफ लुभावनी राजनीति के चलते केन्द्र और राज्यों सरकारों की फसल-अनुदान और राशन योजनाओं पर जो भारी-भरकम रकम खर्च होती है, उसका एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और बर्बादी में भी चले जाता है। ऐसे में जब कभी मौसम की मार पड़ती है, तो उससे ये दोनों ही बातें बड़ी रफ्तार से बढ़ती हैं। देश में धान जैसी फसलों का मौसमी उत्पादन इतना अधिक है, और उसे गोदामों में कुछ महीनों ही रखने की जरूरत पड़ती है, इसलिए पक्के गोदाम बनाने का काम पूरी फसल के अनुपात में तो होने का कोई आसार नहीं दिखता है। आज की इस तूफानी बारिश के खतरे के वक्त गोदामों की कमी और भी अधिक खलती है। चाहे फसल राज्य सरकार की खरीदी हुई हो, या वह मिलिंग के लिए निजी राईसमिलरों को दी गई हो, या फिर वह केन्द्र और राज्य सरकार के अनाज गोदामों में पहुंची हुई हो, किसी भी वजह से उसका बर्बादी एक राष्ट्रीय बर्बादी है। आज जब केन्द्र सरकार देश में निजीकरण को बढ़ाते चल रही है, तो ऐसे में एक कल्पनाशील योजना बनाकर पक्के गोदामों को बढ़ाने का काम करना चाहिए ताकि फसल, या उससे तैयार किया गया अनाज रखने के लिए गोदाम रहें, और बर्बादी न हो। राज्यों को भी यह सोचना चाहिए कि आज उन्हें झेलनी पड़ रही बर्बादी के मुताबिक अगर वे अलग-अलग जिलों में, या अनाज उत्पादक केन्द्रों के बीच बड़े-बड़े निजी गोदामों को बढ़ावा दें, तो उससे उनकी कितनी बचत होगी? आज बाजार के कारोबारी नए कारोबार की संभावनाओं को देखकर तुरंत ही हिसाब लगा लेते हैं कि उनके पूंजीनिवेश पर मुनाफा कितना होगा। बड़े-बड़े फसल और अनाज गोदामों के लिए सरकारें अगर अपनी खाली जमीनें दें, और गोदामों को किराए पर लेने की किसी तरह की गारंटी दे सकें, तो इससे राष्ट्रीय बर्बादी घट सकती है। केन्द्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों, और गठबंधनों की सरकारों की पौन सदी हो चुकी है। अब तक अर्थशास्त्रियों, विशेषज्ञ-अफसरों, और कृषि-प्रबंधकों के पास पर्याप्त अनुभव हो चुका है। हम अपनी सीमित समझ से कोई असीमित सुझाव देना नहीं चाहते, लेकिन लगातार चल रही बर्बादी, और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को नुकसान देखते भी नहीं बन रहा है। देखें कि कौन सी सरकार कारोबार के साथ मिलकर एक संभावना ढूंढ पाती है।
बेवजह फख्र करने वाले दुनिया को उड़ते पंछी की नजरों से देखें
26 अक्टूबर 2026
अभी एक स्कूल के मिडिल और हाईस्कूल के बच्चों के बीच कुछ पत्रकारों को आमंत्रित करके मीडिया के पेशे के बारे में बच्चों को कुछ जानकारी दिलवाई गई, और उनको अपने सवालों के जवाब भी मिले। एक पत्रकार से बच्चों ने पूछा कि जब किसी दूसरे पड़ोसी देश के बारे में लिखना रहता है, तो किस तरह की दुविधा होती है? वहां जवाब दे रहे संपादक हैरान थे कि छोटे बच्चों के मन में पत्रकारिता का इतना गहरा और जटिल सवाल कैसे आया जिससे कि अधिकतर पत्रकार भी मुक्त रहते हैं। किसी और देश के साथ अपने देश के रिश्तों, मामलों, और टकराव पर लिखने वाले पत्रकार भी आमतौर पर हमारा देश, उनका देश, इस तरफ, उस तरफ जैसी भाषा लिखते हैं। जाहिर तौर पर वे एक देश के नागरिक होकर लिखते हैं, और ऐसे में दूसरे देश के बारे में उनकी लिखी गई बातें किसी निष्पक्ष या तटस्थ की लिखी हुई नहीं रह जाती, बल्कि जुड़े हुए दो देशों में से एक के नागरिक की लिखी हुई बातें रहती हैं। द्विपक्षीय मामलों में इस तरह का लिखा हुआ कोई वजन नहीं रखता, क्योंकि शांतिकाल में, सरहद से दूर, बिना किसी जंग के जब लिखा जाता है, तो किसी फौज के साथ जड़े हुए जर्नलिस्ट की तरह लिखना जरूरी नहीं रहता।
जिन लोगों को जानकारी न हो कि जंग की रिपोर्टिंग किस तरह होती है, उनके लिए यह बताना जरूरी है कि जंग में शामिल देशों में से किसी एक देश की फौज के साथ इम्बेड होकर, जडक़र ही कोई जर्नलिस्ट रिपोर्टिंग कर सकते हैं, क्योंकि दोनों तरफ के टकराव के बीच खुद होकर, अकेले जाकर रिपोर्टिंग नहीं की जा सकती। ऐसी रिपोर्टिंग के साथ इस बात का जिक्र अनिवार्य रूप से कर दिया जाता है कि संवाददाता ने किस फौज के साथ जडक़र यह रिपोर्ट की है। लेकिन शांतिकाल में सरहद से दूर बैठे विश्लेषकों के लिए यह कहीं जरूरी नहीं रहता कि वे एक देश के साथ जडक़र विश्लेषण करें या अपने विचार लिखें। वे अपने आपको किसी देश का नागरिक मानकर उस हिसाब से भी लिख सकते हैं, या अपने आपको सरहदों से ऊपर का एक निष्पक्ष, तटस्थ विश्लेषक या विचारक मानकर भी लिख सकते हैं। यह बारीकी अखबारनवीसी में भी अधिक दूर तक नहीं निभाई जाती, चीखते चैनलों को तो यह माकूल बैठ भी नहीं सकता। हमारे नियमित पाठकों ने महसूस किया होगा कि हम लंबे बरसों से बिना सरहद के किसी ओर हुए, एक वैश्विक जिम्मेदारी के साथ लिखते हैं, और जब दो देशों के मुद्दों पर लिखना होता है, तो हम उनमें से किसी भी देश के नागरिक नहीं रह जाते।
इस पर लिखने की आज इसलिए सूझ रही है कि सोशल मीडिया पर आज किसी ने यह लिखा है कि लोग बात-बात पर गर्व करने लगते हैं। किसी को किसी शहर में पैदा होने या रहने का गर्व रहता है, किसी को अपनी भाषा या बोली का, किसी को किसी देश का नागरिक होने, या किसी जात-धरम का होने का गर्व रहता है। ऐसे छोटे-छोटे गर्व करते हुए लोग यह भूल जाते हैं कि वे इस विशाल धरती के एक बड़े छोटे हिस्से के ही नागरिक हैं। जो भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है, उस भारत का भूभाग भी दुनिया में बड़ा विशाल दिखता है। लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि धरती की कुल जमीन का कुल 2.4 फीसदी ही भारत में हैं। और अगर हम जमीन और पानी दोनों की पूरी सतह को ले लें, तो भारत का पूरा इलाका 0.64 फीसदी है। दूसरी तरफ लोगों ने कई बार ऐसी तस्वीरें देखी होंगी जिनमें इस आकाशगंगा के अलग-अलग ग्रहों को आकार के हिसाब से दिखाया गया है, और उनमें पृथ्वी नाम का यह ग्रह कितनी छोटी गोली सरीखा दिखता है! फिर उस गोली के 0.64 फीसदी इलाके पर भारत है, और 140 करोड़ से अधिक आबादी में से एक ही कोई एक व्यक्ति है। अपने आपको जब दुनिया की हकीकत की विशालता के मुकाबले देखा जाए, तभी यह समझ पड़ता है कि छोटी-छोटी बातों पर गर्व करना कितना बेबुनियाद है। दुनिया भर के ग्रहों का संसार इतना विशाल है, और इंसानों की जानकारी से परे भी जाने कितनी ही आकाशगंगाएं और हो सकती है, इन सबके बीच एक इंसान समंदर के सैकड़ों किलोमीटर के तट पर रेत के एक कण से अधिक कुछ नहीं है, और कण होने का गर्व है कि वह एक चट्टान जितना बड़ा है!
जब किसी को दुनिया के दूसरे मुद्दों के मुकाबले अपने-आपको आंकना हो, अपने किसी पड़ोसी से, प्रतिद्वंद्वी या विरोधी से कोई मुकाबला करना हो, तो धरती से ऊपर आसमान पर उड़ते किसी पंछी की नजर से देखना चाहिए जिसे सरहद नहीं दिखती, जमीन बराबर दिखती है। अगर लोगों को कोई भी सार्थक विश्लेषण करना हो, या विचार लिखने हों, तो वे किसी एक पक्ष का होकर दूसरे पक्ष के खिलाफ नहीं लिखे जा सकते। दोनों ही पक्षों से बराबरी की दूरी बनाकर, अपने-आपको ऐसे दोनों देशों से, या दोनों प्रदेशों से, दोनों जातियों, या दोनों धर्मों से परे के होकर ही लिखा जा सकता है। एक काबिल और ईमानदार जज का अपना कोई धर्म हो सकता है, लेकिन जब दो धर्मों के बीच के किसी विवाद पर फैसला देना हो, तो उसे किसी भी धर्म से ऊपर उठकर ही काम करना होता है। प्रेमचंद की पंच-परमेश्वर कहानी में उनकी लिखी एक बात याद पड़ती है- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? कहानी में एक पंचायत चलती रहती है, और वहां इंसाफ मांगती एक महिला, एक दोस्त के खिलाफ फैसले से हिचकते हुए, धर्मसंकट और दुविधा में फंसे हुए एक पंच से सवाल करती है कि क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? हमारा ख्याल है कि जब कभी किसी देश-प्रदेश के नागरिक को, किसी जात-धरम के व्यक्ति को ऐसे द्विपक्षीय मामलों पर लिखना रहे, तो उसे प्रेमचंद की कहानी के एक किरदार के पूछे गए इस सवाल को याद रखना चाहिए।
जंग की बात निकली तो यह लिख देना जरूरी है कि आमतौर पर किसी जंग में पहली लाश सच की गिरती है। दोनों तरफ की राजनीतिक ताकतें अपनी फौजी दिलचस्पी से युद्धोन्माद को राष्ट्रवादी उन्माद में बदलती हैं, और किसी भी तरह के सवालों को भालों से भी अधिक नुकीला मान लिया जाता है। ऐसे वक्त सच लिखने के हौसले के लिए खासे अभ्यास हो चुके रहने की जरूरत पड़ती है। इसलिए जंग की चुनौतियों से घिरने के पहले ही लोगों को उड़ते हुए पंछी की नजर से बेसरहद दुनिया को देखने की आदत डालनी चाहिए। दुनिया की चुनौतीपूर्ण नौबतों में अपने-आपको बहुत छोटे-छोटे तबकों में बांटकर, उन पर फख्र करने से कुछ हासिल नहीं होता। कुछ छोटे बच्चों ने एक सवाल उठाया था, उसका जवाब देते हुए बात इतनी लंबी हो गई है। लोगों को गर्व करना हो, तो सचमुच की किसी बड़ी बात पर गर्व करें, बात-बात पर किया गया गर्व हवा भरे गुब्बारे से अधिक वजनदार नहीं रहता।
जाति बहिष्कार की हिंसा, बूढ़े बाप का अधेड़ बेटे ने तनाव में कर दिया कत्ल!
25 अक्टूबर 2026
छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके की खबर है कि एक गांव में 50 साल के बेटे ने अपने 70 साल के बाप का कत्ल कर दिया। यह बेटा कुछ अरसा पहले दूसरी जाति की एक लडक़ी या महिला से शादी करके अपने घर ले आया था, और पिता को डर था कि गैरजात में शादी से परिवार का सामाजिक बहिष्कार हो जाएगा। इसे लेकर बाप-बेटे में आए दिन झगड़ा होते रहता था, और इसी झगड़े के चलते बेटे ने बूढ़े बाप को मार डाला। छत्तीसगढ़ आदिवासी, दलित, और ओबीसी समुदायों की बहुतायत वाला प्रदेश है। बहिष्कार की जो बीमारी एक समय सवर्णों और नीची कही जाने वाली जातियों के लोगों के बीच चलती थी, वह अब चारों तरफ फैल गई है। एक जाति के भीतर ही उपजातियों के रिश्तों को लेकर बहिष्कार होने लगे हैं, कहीं सगोत्र विवाहों पर बहिष्कार होता है, तो कहीं दूसरी जाति पर। ऐसा लगता है कि जात और समाज के संगठन बहिष्कार की लाठी चला-चलाकर ही अपना दबदबा कायम रखते हैं। छत्तीसगढ़ में एक ओबीसी जाति में तो अंतरजातीय विवाहों पर इतने कड़े जाति बहिष्कार का चलन हो गया है कि 16 हजार से अधिक परिवार ऐसे बहिष्कार के शिकार हैं। फिर यह भी है कि ऐसे सारे बहिष्कार कुछ लाख रूपए का जुर्माना देकर खत्म भी करवाए जा सकते हैं। मतलब यह कि संपन्न परिवारों के लिए बहिष्कार कोई मुद्दा नहीं रहता, उनके लिए वह एक बार का एक खर्च ही रहता है। लेकिन बहुत से ऐसे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार रहते हैं, जो कि बहिष्कार के नाम से कांपते हैं, और कोशिश करते हैं कि कुछ जुर्माना भरकर किसी तरह जाति में वापिसी हो जाए। एक तरफ तो न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, बल्कि पूरे देश में शहरीकरण बढ़ रहा है जो कि जाति व्यवस्था के बाहुबल को कमजोर करने वाला विकास है, और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में जाति बहिष्कार करने का एक बाहुबल है जिसके दम पर किसी जाति के नेता अपनी हुकूमत बनाए रखते हैं।
आज जब दुनिया कहीं से कहीं निकल चुकी है, जब दुनिया का एक सबसे विकसित, संपन्न, और ताकतवर देश अमरीका दुनिया का मेल्टिंग पॉट कहलाता है, यानी एक ऐसा बर्तन जिसमें अलग-अलग कई धातुओं को पिघलाकर एक किया जाता है। दुनिया भर की अलग-अलग राष्ट्रीयता, धर्म, रंग, जाति के लोग मिल-जुलकर नए परिवार बनाते हैं, एक बिना सरहद वाला समाज बनाते हैं, और आगे बढ़ते हैं। ऐसे अमरीका के मुकाबले आज जब पिछड़े हुए हिन्दुस्तान के पिछड़े हुए प्रदेश छत्तीसगढ़ में पिछड़ी जातियों के लोग बहिष्कार नाम की तलवार चलाते हुए अपने ही लोगों का सिर काटते हैं, तो समझ पड़ता है कि ऐसे समाज अगले सौ-दो सौ साल भी मेल्टिंग पॉट वाले समाज का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। छत्तीसगढ़ तो फिर भी बहिष्कार करके संतुष्ट हो जाता है, भारत के कई हिस्सों में जाति या धर्म, या फिर महज संपन्नता का भेदभाव इतना हिंसक है कि पारिवारिक शान के नाम पर खून बहा दिया जाता है। और यह फिजूल की फर्जी शान सिर्फ परिवार की लडक़ी से जुड़ी रहती है। लडक़ी ने अगर किसी ऐसी जाति या धर्म के लडक़े से मर्जी से शादी कर ली जिसे कि उसका परिवार अपने से नीचा मानता है, तो ऑनरकिलिंग के नाम पर ऐसी लडक़ी को भी मार डाला जाता है, और कई मामलों में प्रेमी से उसके पति बने हुए व्यक्ति को भी। कत्ल करने को यह समाज अपनी शान समझता है, और फिर ऐसे कत्ल के बाद चाहे बाप-बेटे, चाचा-ताऊ कई लोग जेल ही क्यों न चले जाएं। हो सकता है कि जेल में भी वे अपनी मूंछें ऐंठते हुए घूमते रहते हों कि उन्होंने खानदान की इज्जत मिट्टी में मिलाने वाली बेटी को ही खत्म कर दिया, और साथ-साथ उसके प्रेमी या पति को भी। छत्तीसगढ़ अभी इतना खूनी नहीं हो पाया है, और यहां के जाति संगठन जाति बहिष्कार करके अपने बोकरा-भात का इंतजाम करते रहते हैं, कमाई भी करते रहते हैं।
जिन नेताओं से कुछ लोग समाज सुधार की उम्मीद करते हैं, उनमें से कुछ तो खुद ही ऐसे बहिष्कार का शिकार रहते हैं, और वे खुद भी अपनी जाति व्यवस्था के आतंकतले दबे रहते हैं। चूंकि वोटों के लिए ऐसे नेता इसी समाज व्यवस्था के मवाली ठेकेदारों के मोहताज रहते हैं, इसलिए इस कट्टर व्यवस्था के खिलाफ कोई मोर्चा भी नहीं खोलते। हम तो यह देखकर हैरान रहते हैं कि देश के अलग-अलग प्रदेशों में आज से एक-डेढ़ सदी पहले समाज सुधारकों ने जिस हौसले और बहादुरी से बाल विवाह और सतीप्रथा के खिलाफ मोर्चे खोले थे, जिस बहादुरी से छुआछूत को खत्म करवाया था, जिस बहादुरी से आर्य समाज ने हिन्दू धर्म के भीतर की जातियों के बीच शादियां करवाना शुरू किया था, वह पूरी बहादुरी छत्तीसगढ़ से दूर-दूर ही दिखती है। इस राज्य के इतिहास को याद करें तो जाति व्यवस्था की कट्टरता के खिलाफ कोई सामाजिक मोर्चा पहली नजर में तो याद नहीं पड़ता है। लोग अधिक से अधिक अपने आपको इस जाति व्यवस्था का शिकार बनने से किसी तरह बचा लेते हैं, और वही उनकी मानो सबसे बड़ी बहादुरी है।
हर कुछ महीनों में कहीं न कहीं से ऐसी खबर आती है कि जाति से बहिष्कृत किए गए परिवार में कोई मौत होने पर अंतरजातीय विवाह वाली किसी संतान के पहुंचने पर पूरा गांव या समाज मृतक की शवयात्रा को भी छोडक़र चले जाता है। अगर अंतरजातीय विवाह वाले अपने बच्चों को भी कोई परिवार आने-जाने देता है, तो बाकी समाज उससे रोटी-बेटी का रिश्ता तोड़ लेता है। कहने के लिए तो किसी भी किस्म के बहिष्कार के खिलाफ छत्तीसगढ़ में एक बड़ा कड़ा कानून बनाया गया है जो कि अंधविश्वास से लेकर जाति व्यवस्था की कट्टरता तक की हिंसा कम करने के लिए है। लेकिन बहुत से लोग अदालतों तक जाकर सिर पटकते रहते हैं कि उनकी जाति के भीतर उनका बहिष्कार चल रहा है, गांव में न उन्हें कोई काम देते, और न ही कोई उनसे लेन-देन करते, लेकिन अदालतें असरदार नहीं दिखती हैं। यह सिलसिला आज 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में भी ज्यों का त्यों बरकरार है। अब ऐसे में दो धर्मों के बीच किसी तरह के संबंध की तो बात भी करना बेकार है।
बीते जाने कितने ही दशक हो चुके हैं, भारत के और राज्यों में भी कहीं से जाति व्यवस्था के खिलाफ कोई सुधारवादी आंदोलन सुनाई नहीं पड़ता है। हाल के दशकों में तो लगातार कट्टरता ही बढ़ती चल रही है, क्योंकि बढ़ती कट्टरता ही वोटों के ध्रुवीकरण में काम आती है। लेकिन ऐसी नौबत में एक बात को लेकर हैरानी होती है कि क्या बहिष्कृत किए गए लोगों को उसी समाज में लौटने की कोशिश भी करनी चाहिए, और क्यों करनी चाहिए? छत्तीसगढ़ में एक रामनामी सम्प्रदाय है, जब राम के पूजक हिंदू समाज ने अपने इन दलित लोगों को मंदिरों में आने नहीं दिया था, तो इन लोगों ने पूरे बदन पर राम-राम गुदवाकर अपनी देह को ही मंदिर सा बना लिया था। यह पूरा का पूरा सम्प्रदाय, और इसकी प्रथाएं उसी छुआछूत के प्रति एक बहुत ताकतवर विद्रोह थी। राम का तो कोई अस्तित्व है नहीं कि उससे इस अन्याय को खत्म करने की उम्मीद की जाती, राम के नाम पर पूजा के हक के एकाधिकारवादियों के खिलाफ यह विद्रोह किया गया था, और उसने एक ताकतवर सम्प्रदाय को जन्म दिया। यह एक अलग बात है कि यह विद्रोह समाज व्यवस्था के दूसरे आर्थिक पहलुओं तक नहीं पहुंच पाया, और सिर्फ धार्मिक उपासना तक सीमित रहा। लेकिन क्या आज छत्तीसगढ़ में जाति व्यवस्था के तहत हिंसक और कट्टर बहिष्कार के शिकार परिवारों को इससे विद्रोह करके इस फौलादी ढांचे से बाहर निकलने की नहीं सोचना चाहिए? और यह सुझाते हुए खुद हमें लगता है कि छत्तीसगढ़ में जिस जाति में बहिष्कार नाम की हिंसा सबसे अधिक व्यापक है, उसी जाति के लोगों का हिन्दू धर्म छोडक़र ईसाई बनना क्या उसी किस्म का विद्रोह नहीं है? हम तो केवल आज एक मुद्दे पर चर्चा शुरू करके छोड़ दे रहे हैं, कोई लंबा समाजशास्त्रीय अध्ययन यहां पर मुमकिन नहीं है, लेकिन हमारे पाठक बहस को आगे बढ़ा सकते हैं, इस पर सोचने की जरूरत है कि एक बूढ़े बाप के लिए अपने अधेड़ बेटे को विजातीय विवाह के लिए ताने कसना जरूरी लगता था, और इस बेटे को इस तनाव में बूढ़े बाप का कत्ल करके बकाया उम्र जेल में काटना भी बेहतर लगने लगा था। छत्तीसगढ़ की यह ताजा घटना भी अगर लोगों को सोचने पर मजबूर न करे, तो फिर यह समाज विचारविहीन हो चुका है।
माँ और दुधमुंहे बच्चे के बुनियादी हकों से अनजान है हिन्दुस्तान !
25 अक्टूबर 2026

तमिलनाडु में अभी कुछ महीनों से एक महिला विधायक की जमकर आलोचना हो रही है कि वह सार्वजनिक कार्यक्रमों में गोद में अपनी छोटी सी बच्ची को लेकर जाती है। विरोधियों ने इसे जनता के बीच शोहरत पाने का एक नाटक कहा है, दूसरी ओर कुछ शिशु विशेषज्ञों ने भी इसे बच्ची की सेहत के खिलाफ बताया है कि भीड़ वाली जगहों पर कई तरह के संक्रमण का खतरा रहता है। यह महिला विधायक आर. पल्लवी चेन्नई की एक सीट से जीतकर विधानसभा आई हैं, और वे विधानसभा सत्र के दौरान भी एक सहायिका के पास अपनी बच्ची को सदन के बाहर छोडक़र सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं। जब राजनीतिक विरोधियों ने इसे राजनीतिक ड्रामा करार दिया तो उन्होंने कहा कि इतनी छोटी बच्ची को घर पर अकेला छोडक़र जिम्मेदारी निभाना मुमकिन नहीं है, इसमें कोई ड्रामा, या सीन क्रिएट करने वाली बात नहीं है। उन्होंने कहा भले ही आप किसी मां के दर्द को न समझ सकें, लेकिन कम से कम इसे बिना सोचे-समझे सोशल मीडिया पर ट्रोल न करें।
कुछ हफ्ते पहले हमने अपने अखबार में इस पर एक रिपोर्ट छापी थी, लेकिन अभी एक दूसरी खबर आई जिसकी वजह से छोटे बच्चों वाली माताओं पर लिखने की जरूरत लगी।
अभी मुंबई आईआईटी की एक मुस्लिम महिला मरियम हेन्ना की कहानी सामने आई है। जब आईआईटी में पीएचडी करने के लिए मरियम ने अर्जी दी, वे गर्भवती थीं। चार महीने बाद जब दाखिला इम्तिहान हुआ, तो उनका बेटा हो चुका था। पीएचडी के लिए चुन लिए जाने पर वे इस छोटे से बेटे के साथ केरल से मुंबई आ गईं, और जहां कहीं इतने छोटे बच्चे के देखरेख की सहूलियत नहीं थी, मरियम अपने बेटे को क्लासरूम, प्रयोगशाला, और बैठकों में भी लेकर जाती थी। यह सिलसिला थका देने वाला था, लेकिन इस जीवट महिला ने इन दोनों जिम्मेदारियों को साथ-साथ, और बखूबी निभाना तय कर लिया था। उन्हें आईआईटी के संवेदनशील प्राध्यापकों की भी मदद मिली, वे प्रयोगशाला के कोने में छोटा सा बिस्तर लगाकर खिलौनों के साथ बेटे को बिठाकर रखती थीं। उनके बेटे ने आईआईटी में ही खिसककर और घुटनों पर चलना सीखा। क्लासरूम में कभी प्राध्यापक उनके बेटे को गोद में उठा लेते थे, तो कई बार सहपाठी उसे संभालकर हेन्ना को काम करने का मौका देते थे।
योरप की कुछ संसदों में ऐसी महिला सांसद रही हैं जो कि अपने दुधमुँहे बच्चों को गोद में लेकर सदन की कार्रवाई के बीच ही दूध पिलाती रहती थीं, और कभी किसी ने इस बात पर आपत्ति की हो, यह सुनाई नहीं पड़ता। यह बहुत हैरानी की बात है कि तमिलनाडु की महिला विधायक की उठाई जा रही दोहरी जिम्मेदारी को लोग शोहरत पाने का शिगूफा समझ रहे हैं। दरअसल यह देश ही ऐसा है। यहां पर अपने बच्चे-बच्ची को दूध पिलाने की मां की, दुनिया की एक सबसे बुनियादी प्राकृतिक जरूरत में लोग अश्लीलता भी ढूंढ लेते हैं। यह देश बहुत ही क्रूर संवेदनाओं का देश है। जिंदगी की महीन चीजें, बारीक मानवीय जरूरतें, इस देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को छू भी नहीं गई हैं। यहां के लोग बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल करने के लिए आईना देखने के बजाय सालाना पुतला बनाकर उसे जलाते हैं। ऐसे लोगों से मां और उसके छोटे बच्चों की जरूरतों को समझने की उम्मीद भी नाजायज है।
कहने के लिए तो इस देश की बहुसंख्यक आबादी कृष्ण के बाल रूप पर मोहित रहती है, दीवारों पर तस्वीरें, और कैलेंडर, घरेलू पूजा, घरों में प्रतिमाएं, और कहानियों से लेकर गीतों तक बालकृष्ण से लेकर रामलला तक लोगों को सुहाते हैं, लेकिन घरेलू कामगारों से लेकर निर्माण स्थलों तक मजदूरिन के बच्चे मालिकों को खटकते हैं। महाराष्ट्र के गन्ना किसान महिलाओं को कटाई के मौसम में काम देने के लिए गर्भाशय निकलवा देने की शर्त रखते हैं, और ऑपरेशन करवाते हैं कि माहवारी के दिनों में उनकी मेहनत कम न हो जाए। और फिर यह देश चारों तरफ देवी प्रतिमाओं की पूजा में जुट जाता है, और भगवानों के बालरूपों की पूजा में भी।
लोगों को मां और बच्चों के गुणगान की कहानियां सुहाती हैं, और बच्चों की चाह में मन्नतें मानी जाती हैं, लेकिन अपनी औलाद की चाह में जमीन-आसमान एक कर देने पर उतारू लोग भी किसी को घरेलू कामकाज पर रखने के पहले यह ठोक-बजा लेते हैं कि उसके छोटे बच्चे तो नहीं है। दरअसल आठ हाथों वाली देवी प्रतिमाओं के किसी भी हाथ में औलाद थामी हुई नहीं रहती, वे हाथ हथियार, या औजार ही थामते हैं, और इसलिए वे देवी-प्रतिमाएं लोगों को सुहाती हैं। वही देवी अगर संतान थामे कामकाज की जगह पर पहुंच जाती है, तो वह खटकने लगती है।
चूंकि दुधमुँहे बच्चे वोटर बनने से बहुत दूर रहते हैं, और तमाम नेताओं को यह पता रहता है कि उनके पूरे राजनीतिक जीवन, या पूरे जीवनकाल में ये दुधमुँहे बच्चे शायद ही कभी वोटर बनें। इसलिए इन बच्चों के हक की कोई परवाह करने की जरूरत नेताओं को नहीं लगती। काम की जगहों पर बच्चों को दूध पिलाने का कोना आज भी अनहोनी किस्म का रहता है। कानून चाहे जो कहता रहे ऐसे कमरे बहुत कम जगहों पर शक्ल ले पाते हैं। अधिकतर दफ्तर और कारोबार इस फेर में रहते हैं कि बच्चे के आने के आसार ही जैसे ही दिखने लगे किस तरह ऐसे लोगों को जिम्मेदारी, या काम से दूर कर दिया जाए। ऐसे देश में आईआईटी मुंबई की इस मलियाली मुस्लिम महिला, और उसके प्रति संस्थान, शिक्षकों, और सहपाठियों का सकारात्मक सहयोग एक राहत देता है। अपने आसपास देखकर यह सोचने की जरूरत है कि ऐसी मां और उसके बच्चों के लिए हमारा क्या बर्ताव रहेगा अगर हमारा कामकाज उस महिला से जुड़ा रहेगा?
लगातार बढ़ता सरकारी ऑनलाईन काम, और साइबर हमलों के खतरे..
24 अक्टूबर 2026
अभी भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक, स्टेट बैंक के हजारों ग्राहकों की जानकारी लीक हो गई, और इंटरनेट पर मुजरिमों के बाजार, डार्क वेब पर बिकने के लिए मौजूद थी। खबर लगने पर स्टेट बैंक ने अपने ग्राहकों के लिए कुछ चेतावनी या सावधानी जारी की है। साथ ही एक अधूरा सा स्पष्टीकरण भी जारी किया है कि इस लीक से बैंक के सामान्य कामकाज पर फर्क नहीं पड़ा है। इस बारे में कोई खुलासा स्पष्टीकरण में नहीं है कि जिन हजारों लोगों की जानकारी बाजार में आ गई है, उनके लिए क्या-क्या खतरा हो सकता है। बिना एआई के भी हैकर आए दिन भारत की बहुत सारी सरकारी वेबसाइटों पर हमला करते ही रहते हैं। कई ऐसे मौके भी आए हैं जब पाकिस्तानी हैकरों ने भारत के कुछ सरकारी वेबसाइटों पर कब्जा कर लिया, और पाकिस्तान का झंडा वहां लहरा दिया। अभी भी सरकार और कारोबार दोनों के बहुत सारे वेबसाइट ऐसे रहते हैं जिन पर हमले होते ही रहते हैं। और यह सब एआई के इस्तेमाल के पहले का है। आज तो बहुत सारी बड़ी एआई कंपनियों के एजेंट (इंसान नहीं एआई) दुनिया के कई विकसित देशों की सरकारों की वेबसाइटों पर हमले कर रहे हैं। भारत में धीरे-धीरे न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकारों का बहुत सारा काम डिजिटल होते-होते, ऑनलाईन होते-होते अब अनिवार्य रूप से ऑनलाईन हो चला है। आपको बिजली-पानी जैसी मामूली म्युनिसिपल शिकायतों को भी दर्ज कराना हो, कलेक्टर दफ्तर से जुड़ी हुई कोई शिकायत दर्ज कराना हो, तो उसके लिए कॉल सेंटर हैं, या ऑनलाईन इंतजाम हैं। सरकार ने कागजी तौर पर तो ये सारे इंतजाम कर दिए हैं, लेकिन हकीकत में बहुत सारे प्रदेशों और शहरों में ये इंतजाम चौपट पड़े हैं। लोग घंटों फोन लगाते रहते हैं, शिकायत के नंबर ही नहीं लगते। ऑनलाईन शिकायत दर्ज कराते हैं, तो उसका कोई जवाब नहीं मिलता। अब एक खतरा यह है कि ऐसे ऑनलाईन रिकॉर्ड तक अगर किसी हैकर की पहुंच हो जाए, तो उन्हें एक साथ यह लिस्ट मिल जाएगी कि किस नंबर और पते वाले किस व्यक्ति की क्या शिकायत है, और उसके बाद तरह-तरह साइबर अपराधी उसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
हमारा तजुर्बा यह है कि किसी काम को डिजिटल और ऑनलाईन करना तो आसान है, लेकिन उसे हैकरों की घुसपैठ से बचाकर रखना खासा मुश्किल है। और हैकर की हरकतें हर बार आपको पता लग जाएं, ऐसा भी नहीं होता। कई बार तो वे सिर्फ जानकारी की नकल करके जा सकते हैं, और पहली नजर में ऐसे संस्थान का कोई नुकसान नहीं दिखेगा। यह सब कुछ तो इंसानी घुसपैठिए करते ही आ रहे थे, अब तो एआई कंपनियों के घुसपैठिए एजेंट ऐसे हैं जो कि दूसरी एआई कंपनियों तक घुसपैठ करके, उन कंपनियों के एआई-कम्प्यूटरों को मार-मारकर उनसे अपना काम करवा रहे हैं, और कई-कई दिनों तक इन दोनों कंपनियों को यह पता नहीं लग रहा कि किस कंपनी का छुट्टा सांड किस कंपनी के खेत में घुसकर उसे चर रहा है। अब एआई पर आधारित औजार इतने बढ़ते चले जा रहे हैं कि उनका हथियारों की तरह इस्तेमाल बहुत आसान और व्यापक होते जा रहा है। ऐसे में सरकारें अपने हर काम को ऑनलाईन करती चलें, तो किसी दिन उनका सिस्टम ध्वस्त हो जाने का खतरा अलग रहेगा, शिकायतकर्ता की ढेरों जानकारियां मुजरिमों के हाथ पहुंच जाने का खतरा भी बना रहेगा। डार्क वेब इंटरनेट का ऐसा हिस्सा है जहां दुनिया भर के मुजरिम लोगों की निजी, गोपनीय, और संवेदनशील जानकारी टका सेर बेचने के लिए टोकरी लिए बैठे रहते हैं। कोई व्यक्ति पांच-दस लाख लोगों के आधार कार्ड नंबर, और फोन नंबर लेकर ग्राहक ढूंढते रहते हैं, तो कोई दूसरे लोगों की चिकित्सा की जानकारी लेकर उसे बेचते रहते हैं।
हैकिंग किस दर्जे की हो रही है, इसकी सबसे ताजा मिसाल बहुत ही भयानक है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प का दामाद जारेड कुशनर बहुत से अंतरराष्ट्रीय विवादों में ट्रम्प का प्रतिनिधि होकर मध्यस्थता करने दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिलते रहता है, साथ ही कारोबारियों से भी वह अपने धंधे की बात करते रहता है। अब यह जानकारी अमरीकी मीडिया में आई है कि हॉलैंड की सरकार ने जारेड कुशनर के फोन पर एक ऐसी घुसपैठ की थी कि जब वह दुबई स्थित अपने बैंक खाते से लेन-देन कर रहा था, तो हॉलैंड की खुफिया एजेंसी इसके स्क्रीनशॉट देख रही थी। वह वॉट्सऐप के संदेशों में घुसपैठ नहीं कर पाई थी, लेकिन उसने रूस के एक ऐसे खुफिया एजेंट को फोड़ लिया था जो कि रूसी सरकार के लिए जारेड कुशनर के मोबाइल फोन में घुसपैठ करके उसकी स्क्रीन को देख रहा था। रूसी एजेंसी के कब्जे के ऐसे स्क्रीनशॉट को हॉलैंड की एजेंसी भी देख रही थी क्योंकि उसने इस रूसी एजेंट के मार्फत रूसी कम्प्यूटर तक घुसपैठ बना ली थी। अब जब ट्रम्प का दामाद दुनिया भर के तमाम विवादास्पद लोगों के साथ बड़े-बड़े लेन-देन कर रहा था, तो ये बातें दुनिया के कम से कम दो एजेंसियां देख रही थीं। उनसे पता लग रहा था कि कैसे खाड़ी के एक देश के राजकुमार से लेकर दुनिया के कुछ बड़े मुजरिमों तक के साथ ट्रम्प के दामाद का बड़ा-बड़ा लेन-देन चल रहा था। इस लेन-देन से अमरीकी सरकार की नीतियों को किसी देश के पक्ष में बदलने का सौदा भी किया जा रहा था। अब पल भर को सोचें कि ट्रम्प के दामाद का फोन तो बहुत ही खास सुरक्षित रहना चाहिए था, लेकिन जब उसके स्क्रीनशॉट दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियां देख रही थीं, और बैंकों का लेन-देन दर्ज कर रही थीं, तो फिर दुनिया में और क्या सुरक्षित माना जा सकता है?
यहीं पर यह भी समझने की जरूरत है कि वॉट्सऐप जैसे दुनिया के सबसे लोकप्रिय, और सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले मैसेंजर-एप्लीकेशन के संदेशों में घुसपैठ की भारत सरकार की मांग को खारिज करते हुए मेटा ने कुछ अरसा पहले भारत के एक हाईकोर्ट को कहा है कि सरकार अगर इस मांग पर अड़ी रहेगी, तो वह भारत में अपनी यह सेवा बंद ही कर देगा। जब दुनिया के अलग-अलग देशों में वहां के कानून की ताकत से लैस सरकारें अपनी खुफिया एजेंसियों के लिए दुनिया भर के संचार सिस्टमों में घुसपैठ में लगी रहेंगी, और एजेंसियां खुद होकर कानूनी या गैरकानूनी तरीके से यह घुसपैठ करती रहेंगी, तो फिर क्या सुरक्षित रह जाएगा? अभी कुछ ही बरस तो हुए हैं कि दुनिया भर के बहुत से देशों में यह बवाल खड़ा हुआ था कि वहां की सरकारें इजराइल के एक फौजी दर्जे के घुसपैठिया सॉफ्टवेयर, पेगासस की मदद से लोगों के फोन में घुसपैठ कर रही हैं। अमरीका ने तो इजराइल की बांहें मरोडक़र अपने देश के नंबरों को इस घुसपैठ से परे कर लिया था, लेकिन बाकी दुनिया को शायद ऐसी हिफाजत हासिल नहीं हो पाई थी।
इन तमाम बातों को देखें, तो यह समझ में आता है कि बिजली-पानी जैसी छोटी-छोटी शिकायतें दर्ज करने वाली वेबसाइटों या कॉल सेंटरों से लेकर गोपनीय जानकारी रखने वाले कम्प्यूटरों तक कुछ भी घुसपैठियों के हमलों से सुरक्षित नहीं हैं। हालत यह है कि अखबारों की वेबसाइटों पर भी हमले होते हैं, और वहां किसी दूसरे देश के कोई संगठन अपने नारे लिख देते हैं। इसलिए बढ़ते हुए डिजिटलीकरण, और ऑनलाईन के शौक के साथ-साथ यह तौलना भी जरूरी है कि हर दिन हैकिंग की नई तकनीक इस्तेमाल हो रही है, और अगर आप कोई भी काम ऑनलाईन करना चाहते हैं, तो उसे लगातार बचाए रखने की कोशिशों को भी इंतजाम में शामिल करना पड़ेगा। ऑनलाईन कोई भी काम ईंट-गारे की इमारत जैसे नहीं है कि एक बार बनाकर उसे छोड़ दिया गया। ऑनलाईन काम, कम्प्यूटर या कॉल सेंटर के काम पूरे ही वक्त एक साइबर-ढाल भी मांगते हैं, अपनी हिफाजत के लिए।
मुजरिमों के इश्तहार दिखा, बेशर्मी से कमाता फेसबुक
23 अक्टूबर 2026
फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इश्तहार देखकर खरीदी करना, और धोखा खाना इतना आम हो चुका है कि यह समझदार बच्चों को भी समझ आ जाता है कि विज्ञापन फर्जी है, बस फेसबुक को समझ नहीं आता। मार्क जुकरबर्ग की समझ बड़ी कमजोर है, क्योंकि आंखों के सामने नोट छाए रहते हैं, उनके कंप्यूटर इतने कमजोर हैं कि प्लेटफॉर्म को भुगतान करके छपने वाले फर्जी विज्ञापनों को वे पहचान नहीं पाते। जब धोखा खाए हुए लोग ऐसे विज्ञापनों के नीचे सैकड़ों की संख्या में यह लिखते हैं कि वे धोखा खा चुके हैं, सामान नकली है, विज्ञापन फर्जी है, तो भी ऐसे शब्दों को फेसबुक का महान कंप्यूटर नहीं पढ़ पाता। जो कम्प्यूटर आपकी पसंद-नापसंद के एक-एक शब्द को पहचानता है, आप किस तस्वीर पर कितने पल थमे हैं, इसका भी नोटिस लेता है, वह कम्प्यूटर मार्क जुकरबर्ग के खजांची को यह नहीं बता पाता कि विज्ञापन का जो भुगतान आ रहा है, वह फर्जीवाड़े के लिए है। वैसे तो फेसबुक बड़ा होशियार बनता है, लेकिन जब धोखेबाजी से पैसा मिले, तो वह तुरंत ही जालसाजों के साथ भागीदारी कर लेता है।
अभी कल ही एक महिला इसी तरह ठगी गई है, तो फेसबुक की आम हरकतें याद आईं। फेसबुक का ही एक दूसरा प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम है, और उस इंस्टाग्राम पर महीनों से ऐसे इश्तहार चले आ रहे हैं जो बच्चों के सेक्स-वीडियो बेचने वाले लोगों के हैं। भारत के बच्चों के ऐसे वीडियो बेचने वाले लोग इंस्टाग्राम पर इश्तहार देते हैं, और एक दूसरी मैसेंजर सर्विस टेलीग्राम पर वीडियो की बिक्री करते हैं। बीबीसी ने एक खोजी रिपोर्ट में महीनों पहले इस बात का भंडाफोड़ किया था कि मेटा नाम की कंपनी अपने फेसबुक और इंस्टाग्राम का इस्तेमाल चाइल्ड-पोर्नोग्राफी बेचने वाले लोगों को भुगतान लेकर करने दे रही है। कुछ महीनों के बाद बीबीसी की दूसरी रिपोर्ट आई कि ये विज्ञापन अब तक जारी हैं। दिलचस्प बात यह है कि मार्क जुकरबर्ग की कंपनी को जब यह पता भी लग जाता था कि चाइल्ड-पोर्नोग्राफी इस तरह से बेची जा रही है, तो भी उसकी कंपनी अमरीकी जाँच एजेंसियों को खबर करती थी, वह भारत सरकार को सीधे यह जानकारी नहीं देती थी। बीबीसी के मचाए हुए हल्ले के बाद और भारत सरकार के कई नोटिसों के बाद अब जाकर मेटा इस बात के लिए तैयार हुई है कि इस देश के बच्चों के साथ यह सबसे घिनौना जुर्म जब उसकी जानकारी में आएगा, तब वह अमरीकी एजेंसियों को बताने के बजाय सीधे भारत को इसकी जानकारी देगा। लेकिन ऐसे घिनौने जुर्म की कमाई के बारे में यह कंपनी कुछ नहीं कहती है। बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थान ने जब सुबूतों के साथ यह साबित कर दिया कि मेटा यह धंधा कर रही है, उसके बाद भी मार्क जुकरबर्ग जैसे कारोबारी को यह शर्म नहीं आई कि वह कहता कि ऐसे इश्तहारों से मिली कमाई को कंपनी दुनिया के बच्चों के लिए दे देगी।
दुनिया के ऐसे बड़े-बड़े टेक-कारोबारी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी इस घटिया दर्जे से निभाते हैं, और अमरीकी सरकार है कि इन्हीं कंपनियों को जिम्मेदारी दे रही है कि वे अपने विकसित किए हुए एआई को सुरक्षित रखने के लिए खुद ही इंतजाम करेंगे। यह तो वैसा ही हो गया कि मार्क जुकरबर्ग को किसी भारतीय अनाथालय का जि़म्मेदार बना दिया जाए। कारोबारी की क्या नैतिकता हो सकती है? हमने अभी-अभी तो भारत के उत्तराखंड में एक ऐसे होटल-कारोबारी का मामला देखा है जिसने वहां नौकरी करने वाली बेबस गरीब लडक़ी को होटल के एक खास मेहमान को खास सेवा देने के लिए दबाव डाला था, और अब वह ख़ास मेहमान देश की एक खास संवैधानिक कुर्सी तक पहुँच गया है। बस उस लडक़ी की मौत हो गई है, सुबूतों वाला कमरा बुलडोजर से गिरा दिया गया है। कारोबारों का हाल यही रहता है। अगर कारोबार की कोई नैतिकता रहती, तो भूखों की इस दुनिया में हथियार बनाने के कारखाने, रासायनिक हथियार बनाने के कारखाने कैसे चलते रहते? धर्म और कारोबार, इन दोनों की कोई नैतिकता नहीं होती। हमने फि़लिस्तीन पर बम बरसाने वाले इजराइलियों को देखा है, वहां के प्रधानमंत्री और फौजी अफ़सर यहूदियों के पूजा स्थल पर जाते रहते हैं, किसी यहूदी धर्मगुरु ने उन्हें नहीं रोका। अमरीका का कोई चर्च ट्रंप को बम बरसाने से नहीं रोकता। धर्म और कर्म, खासकर कारोबारी कर्म, इनसे किसी नैतिकता की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए मार्क जुकरबर्ग हो, या एआई विकसित करने वाली कंपनियां हों, उनसे समाज के भले की उम्मीद करना मासूमियत की बात होगी।
आज एआई कंपनियां रोजाना मजबूर हो रही हैं यह खुलासा करने के लिए कि उनके एआई एजेंट दुनिया में कहां-कहां घुसपैठ कर रहे हैं, कहां-कहां तबाही कर रहे हैं। लेकिन दुनिया के पूंजी निवेशकों का इतना पैसा एआई कंपनियां खर्च कर चुकी हैं कि वे अब वापस लौट नहीं सकतीं, वे एक-दूसरे से गला-काट मुकाबला बंद नहीं कर सकतीं, वे चीन के मुकाबले पीछे रहना मंज़ूर नहीं कर सकतीं, इसलिए वे एक ऐसे दैत्य को और अधिक, और अधिक ताक़त देने की मुहिम में जुटी हुई हैं, जिस दैत्य के लिए आज भी उनके पास कोई पिंजरा नहीं है। दुनिया में जंगखोर कंपनियां इस बात के लिए जानी जाती हैं कि वे बहुत से देशों के बीच गैरजरूरी जंग छिड़वाती हैं ताकि उनके हथियार खप सकें। यह सिलसिला कारखानों के इतिहास के साथ ही शुरू हुआ होगा। अमरीका जैसे देश में कार बनाने वाली कंपनियों ने शायद रेल कंपनियों की पटरियां उखड़वा दी थीं ताकि लोग कारों पर चलने पर मजबूर रहें। आज भी अमरीका को देखना हक्का-बक्का करता है कि सार्वजनिक परिवहन वहां किस हद तक सीमित है, और कार और पेट्रोलियम पर लोग किस हद तक मोहताज हैं। कारोबार ऐसा ही बेरहम रहता है। इसलिए किसी को इस धोखे में नहीं रहना चाहिए कि मार्क जुकरबर्ग किसी इश्तहार के नीचे सैकड़ों लोगों के लिखे गए फर्जी, धोखा, जालसाजी जैसे शब्दों को पढऩे की भी कोशिश करेगा। कुछ दशक पहले तक हिंदुस्तान में ऐसे इश्तहार छपते थे जिसमें कोई तांत्रिक अंगूठी बेचने वाला रहता था, जिसे पहनने के बाद सारी हसरतें पूरी हो जाती थीं। कहीं कोई वशीकरण मंत्र सिखाने वाला रहता था जिससे दुनिया की किसी भी हसीना को फंसाया जा सकता था। विज्ञापनों की कोई नैतिकता हो सकती है? उसका सिर्फ एक ही इस्तेमाल होता है कि लोगों के बीच किसी सामान, या सेवा को बिकवाना। आज भी कोई बंगाली बाबा, तो कहीं कोई और चमत्कारी विज्ञापन करते ही रहते हैं कि वे वशीकरण कर देंगे, दुश्मन को मार देंगे, किसी लडक़ी को फंसा देंगे, और ऐसे विज्ञापन छापने, या टीवी पर दिखाने वाले लोग भी आज भी मौजूद हैं।
भारत के बच्चों के सेक्स-वीडियो बेचने के धंधे में मार्क जुकरबर्ग जिस तरह लगा हुआ है, यही काम उसने अमरीका में किया होता, यूरोप में किया होता, तो जेल में होता। ठीक उसी तरह जिस तरह कोल्ड ड्रिंक, चॉकलेट, या बच्चों के आहार में भारत जितनी शक्कर अगर अमरीका और यूरोप में वही कंपनी मिलाती, तो जेल में होती। जिस देश का क़ानून कमज़ोर रहता है, और कानून पर अमल और भी अधिक कमजोर रहता है वहां पर इसी तरह अंतरराष्ट्रीय लुटेरे डेरा डाल देते हैं, और धंधा चलाते हैं।











