परिवार और कारोबार, दोनों मिलकर बदन से निकाल रहे हैं दुश्मनी
31 जुलाई 2026
महाराष्ट्र सरकार ने यह तय किया है कि स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में जंकफूड नहीं बिकने दिया जाएगा। इसका मकसद बच्चों को ऐसे खानपान से दूर रखना है जिसमें शक्कर अधिक हो, नमक और फैट अधिक हो, और जिनसे शरीर को कोई पोषण तत्व बहुत कम हों। समाचार बताता है कि इस लिस्ट में समोसा, वड़ापाव, चिप्स, कोल्डड्रिंक, मीठे पेय पदार्थ, चॉकलेट, कैंडी, पैकेट वाले स्नैक्स, और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ शामिल हैं। महाराष्ट्र सरकार का यह मानना है कि बच्चों में मोटापा, डायबिटीज, दिल के रोग, और जीवनशैली संबंधी दूसरी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। लेकिन महाराष्ट्र से परे दूसरे राज्यों में ऐसी कोई पहल सुनाई नहीं पड़ रही है।
भारत का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) बताता है कि बच्चों और किशोरों में मोटापा लगातार बढ़ रहा है, वयस्कों में भी अधिक वजन पिछले दशक में तेजी से बढ़ा है। भारत में दस करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीडि़त हैं, और बड़ी संख्या में लोग प्री-डायबिटीक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बचपन में मोटापा रोका नहीं गया, तो अगली पीढ़ी में टाईप-2 डायबिटीज पहले के मुकाबले कम उम्र में ही दिखने लगेगा। अब भारत में सिर्फ संपन्न बच्चों के अधिक प्रोसेस्ड खानपान बढऩे से अगर ऐसा हुआ रहता, तो भी बात समझ में आती। इस देश में गरीबों के बीच भी डायबिटीज बढ़ रहा है, और गरीबों के बच्चे भी फैक्ट्रियों के बने पैकेटबंद अधिक नमक-शक्कर-फैट वाले खानपान के आश्रित हो गए हैं। गरीब मजदूर मां-बाप भी पकाने का वक्त न होने पर आसपास की किसी दुकान से ऐसे सामान खरीदकर बच्चों को बहला लेते हैं।
एक दूसरी दिक्कत यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बनाया हुआ जो खानपान भारत में उपलब्ध है, उनमें सेहत के लिए नुकसानदेह नमक-शक्कर-फैट, और दूसरे किस्म के रसायनों की भरमार है, जबकि यही कंपनियां अमरीका और योरप जैसे अधिक जागरूक देशों में इन्हीं ब्रांड के इन्हीं सामानों में इन नुकसानदेह तत्वों की मात्रा बहुत कम रखते हैं। चॉकलेट से लेकर कोल्डड्रिंक तक, और दूसरे तमाम पैकेटबंद खानपान तक ये कंपनियां हिन्दुस्तानी कानून कमजोर होने, और उस पर अमल बहुत ढीला होने की वजह से ग्राहकों के लिए भारी नुकसानदेह सीमा में जाकर भी उनकी जुबान को अपने स्वाद का आदी बनाने का हमलावर बाजारू काम करती हैं। दुनिया के जिम्मेदार देश सामानों की पैकिंग पर, उनके इश्तहारों में, नुकसानदेह बातों को प्रमुखता से दिखाने पर जोर डालते हैं। भारत में कानून जनता की सेहत के हिसाब से नहीं बनाए गए हैं, और कारोबारियों की मर्जी से नियम-कानून बनते हैं, और उन पर अमल तो कैसा होता है, यह भारत के किसी भी आम सरकारी कामकाज को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है। महाराष्ट्र का स्कूलों के आसपास ऐसा जंकफूड न बिकने देने का फैसला जमीन पर जितना असर डालेगा, उससे कहीं अधिक असर लोगों की सोच पर डालेगा, और इससे पैदा होने वाली हलचल से लोगों को यह समझ आएगा कि यह खानपान कितना नुकसानदेह है, और देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा किस खतरे की तरफ बढ़ रहा है।
भारत कई तरह की दिक्कतों से गुजर रहा है। इस देश से भुखमरी खत्म हो गई है क्योंकि सरकार की कई तरह की राशन योजनाओं से सबसे गरीब लोगों को बिना दाम, या लगभग बिना दाम अनाज मिल जाता है। फिर गरीबी रेखा के ऊपर के लोग भी रियायती अनाज पाते हैं, और उनकी मजदूरी इतनी हो गई है कि वो परिवार का पेट भरने जितना अनाज ले सकते हैं। दिक्कत एक दूसरी है कि यह खानपान पूरी तरह से अन्न-आधारित है, इसमें दूसरे पोषक तत्व जरा भी नहीं हैं। गेहूं, चावल, मक्का, जैसे अनाजों से जिंदा रहने की ताकत तो मिल जाती है, लेकिन सबसे गरीब आबादी के अधिकतर हिस्से के पास फल, सब्जी, दूध, अंडा जैसे दूसरे पोषक तत्वों के लिए कोई इंतजाम नहीं है। इससे भी लोगों का खानपान उन्हें एक स्वस्थ बदन नहीं दे पाता। देश में धार्मिक आधार पर दूसरों के खानपान तय करने की जिद ने भी करोड़ों लोगों को बदन के लिए जरूरी प्रोटीन से दूर कर दिया है। पश्चिम बंगाल का उदाहरण एकदम ताजा है, जहां पर भाजपा सरकार आते ही कोलकाता की स्कूलों में दोपहर के भोजन का काम एक हिन्दू धार्मिक संगठन इस्कॉन को दे दिया गया, और उसने मिड-डे-मील से अंडा बंद कर दिया। कई हफ्तों से इसे लेकर वहां आबादी के एक बड़े हिस्से के बीच विरोध चल रहा था, और अभी कल-परसों ही सरकार की घोषणा आई है कि वहां इस्कॉन के परोसे जाने वाले दोपहर के भोजन से अलग अंडा भी दिया जाएगा। इस तरह भारत में खानपान को लेकर एक अलग किस्म की दिक्कत चल रही है, और इस देश की अधिकतर आबादी के खानपान में प्रोटीन की कमी है। शाकाहारियों के भोजन में प्रोटीन की कमी रहती है, और दूसरे लोगों के खानपान में भी मांसाहार पर लगी तरह-तरह की रोक-टोक से प्रोटीन का संकट आ खड़ा हुआ है।
लोगों के बीच खानपान को लेकर जागरूकता की बड़ी कमी है। आमतौर पर बदन की शक्कर की जरूरत का एक बहुत छोटा हिस्सा ही प्रोसेस की हुई मीठी चीजों से मिलना चाहिए, और बाकी की मिठास खानपान की दूसरी प्राकृतिक चीजों से मिलनी चाहिए। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि चीजों में मिलाई गई शक्कर किसी व्यक्ति के दिन भर की कैलोरी के दस प्रतिशत से कम होना चाहिए, और बाकी का ग्लूकोज गेहूं-चावल, ज्वार-बाजरा, दाल-फल, दूध-सब्जी जैसी चीजों से मिलना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन यह भी कहता है कि अधिक अच्छा यह होगा कि बदन की ग्लूकोज-जरूरत का पांच फीसदी से कम हिस्सा ही मिलाई गई चीनी से आए। लेकिन जब बच्चों के खानपान में कोल्डड्रिंक, बिस्किट, केक-मिठाई, जूस, चॉकलेट, आइस्क्रीम, ब्रेकफास्ट सीरियल इन चीजों को देखें, तो संपन्न परिवारों के बच्चों को 90 फीसदी ग्लूकोज मिलाई हुई शक्कर से मिलता है, और यही वजह भारत में आबादी के कम उम्र में ही डायबिटीज हो जाने के खतरे के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। देश में इस जागरूकता की जरूरत है कि बच्चों-बड़ों, किसी को भी कारखाने में बनी चीनी, या चीनी मिले हुए सामानों की कोई भी जरूरत नहीं रहती है। लेकिन आज हालत यह है कि 250 एमएल सॉफ्टड्रिंक की एक बोतल ही किसी को डब्ल्यूएचओ की सुझाई गई सीमा से अधिक शक्कर दे देती है।
संपन्न बच्चे अपने आसपास होने वाली दूसरे बच्चों की दावतों में आए दिन इसी तरह का खाते हैं, घरों में फ्रिज रहते हैं, उनमें से ऐसी ही चीजें निकालकर खाते हैं, और अब तो मोबाइल पर भेजे गए एक संदेश पर ही घर बैठे आइस्क्रीम या चॉकलेट पहुंच जाते हैं, जो कि एक दिन में ही एक बच्चे को हफ्ते भर से अधिक की शक्कर दे देते हैं। यह सिलसिला इतना खतरनाक हो चुका है कि डायबिटीज की दवा बनाने वाली कंपनियां चैन की नींद सो रही होंगी कि भारत में उनका बाजार बिना किसी मेहनत के लगातार बढ़ते ही चले जाना है। यह बाजार इसलिए भी बढ़ते चले जाना है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजाना मेहनत के कोई काम नहीं करता। लोगों की जीवनशैली में साइकिल, पैदल, खेलकूद, योग जैसी चीजें जगह नहीं बना पा रही हैं। नतीजा यह हो रहा है कि बाजार के बाजारू हमले से खानपान खतरनाक होते चल रहा है, जिसके खिलाफ कोई जागरूकता नहीं है, और सेहतमंद जीवनशैली की कोई सोच नहीं है। महाराष्ट्र सरकार के स्कूलों से जुड़े इस फैसले की वजह से हमें एक बार इस मुद्दे पर लिखने का मौका फिर से मिला है, जरूरी यह है कि अधिक से अधिक परिवारों को मिसाल देकर यह समझाया जाए कि उनके खानपान की कौन-कौन सी चीजें उन्हें खतरे में डाल रही हैं। इससे अधिक सरकार अपने नियमों में फेरबदल करके कर सकती है, यह बहुत हक्का-बक्का करने वाली बात है कि जो कंपनियां विकसित देशों में जिम्मेदार हैं, वे हिन्दुस्तान में कारोबारी जुर्म करने का ऐसा दुस्साहस रखती है।
टेक्नॉलॉजी लोकतांत्रिक अधिकारों को दे रही है एक अभूतपूर्व ताकत...
30 जुलाई 2026
इन दिनों मोबाइल फोन के वीडियो-कैमरों, और सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से, फिर मोबाइल फोन की कॉल रिकॉर्डिंग से, नेताओं और अफसरों की तरह-तरह की बददिमागी सामने आती है। फिर दूसरी मेहरबानी सोशल मीडिया की है जिसकी वजह से बिना किसी खर्च से ऐसी सनसनीखेज बातें चारों तरफ फैल जाती हैं। इनमें से अधिकतर बातों को देखकर यह लगता है कि अगर यह वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो कोई इन बातों पर भरोसा भी नहीं करते, और सरकार या अदालत को कोई कार्रवाई भी नहीं करनी पड़ती। अब तो मजबूरी में कभी-कभी लोग ऐसी रिकॉर्डिंग में फंस जाते हैं। यह देखकर लगता है कि निजी जिंदगी के मुद्दों को छोडक़र बाकी हर तरह की सार्वजनिक, या सरकारी बातों की रिकॉर्डिंग क्यों नहीं हो जानी चाहिए?
विकसित और लोकतांत्रिक देशों में पुलिस के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे अपनी यूनिफॉर्म के सामने एक कैमरा टांगकर रखें, जो कि उनकी कार्रवाई की रिकॉर्डिंग करता चले। कई जगहों पर ऐसी रिकॉर्डिंग पुलिस कंट्रोलरूम तक लगातार जाती भी रहती है, और अगर पुलिस कोई ज्यादती करती है, तो वह भी तुरंत ही कंट्रोलरूम में दर्ज होती जाती है। भारत के कुछ प्रदेशों में पुलिस के लिए ऐसे कैमरे लिए गए, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने से पुलिस बचती रही, और कई प्रदेशों में ये कैमरे एक बार भी इस्तेमाल हुए बिना खत्म हो गए। लेकिन हम महज जंतर-मंतर के प्रदर्शन और उस पर पुलिस कार्रवाई की बात नहीं कर रहे, जहां कहीं भी पुलिस कार्रवाई होती है, या सरकारी दफ्तर में अफसरों और बाबुओं का जो बर्ताव होता है, वह रिकॉर्ड करने में क्या हर्ज है? सरकारी दफ्तरों, अदालतों, या म्युनिसिपलों और पंचायतों में भी लोगों से बड़ी बदसलूकी होती है, ऐसे में अगर लोगों को यह हक रहे कि वे अपनी बातचीत की रिकॉर्डिंग कर सकें, तो सरकारी व्यवहार सुधर जाएगा। आज बहुत कम लोग ऐसे हैं जो होशियारी से इस तरह की रिकॉर्डिंग कर लेते हैं, अधिकतर लोग तो इतना हौसला नहीं जुटा पाते, क्योंकि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी हों, या निर्वाचित नेता हों, वे रिकॉर्डिंग देखते ही हमला करने लगते हैं, बहुत से लोगों के मोबाइल फोन तोड़ दिए जाते हैं, रिकॉर्डिंग मिटा दी जाती है।
हमारा यह मानना है कि निजी जिंदगी की बातों को छोडक़र सरकार से औपचारिक बातचीत के सिलसिले की रिकॉर्डिंग की एक कानूनी छूट रहनी चाहिए। और यह छूट सिर्फ राजा और प्रजा के बीच नहीं रहनी चाहिए, राज्य के अपने ढांचे के भीतर भी अगर कोई सत्तारूढ़ नेता, या अफसर किसी मातहत को कोई निर्देश देते हैं, तो दोनों ही पक्षों को उसकी रिकॉर्डिंग की औपचारिक अनुमति रहनी चाहिए। यह होने से गलत काम के लिए कहना भी बंद हो जाएगा, और किसी जांच की नौबत आने पर ऐसी रिकॉर्डिंग सुबूत के तौर पर काम भी आएगी। आज हालत यह रहती है कि सरकार के ढांचे में ऊपर बैठे लोग अपने मातहत लोगों से जुबानी निर्देश देकर ही अधिकतर काम करवा लेते हैं, और फाइलों पर वैसे आदेश करने से बचते हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए। आज जब टेक्नॉलॉजी ने पारदर्शिता और लोकतंत्र के कुछ नए पैमाने तय करने की सहूलियत दी है, तो फिर उसका इस्तेमाल करना चाहिए। आज इस लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी अदालतों की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग होती है, संसद या विधानसभाओं की कार्रवाई की पूरी रिकॉर्डिंग होती है, फिर चाहे इन सबमें से कुछ चुनिंदा का प्रसारण होता हो, और बाकी रिकॉर्ड में रहती हो। ऐसा ही पुलिस की कार्रवाई में भी होना चाहिए, और अगर पुलिस कोई ज्यादती नहीं करती है, तो यह उसके अपने बचाव में एक सुबूत की तरह काम आएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने देश के हर थाने में सीसीटीवी कैमरे लगवाने का आदेश दिया था, और कमोबेश हर राज्य उस पर अमल भी कर रहे हैं। अब ऐसे कैमरों की क्षमता और पहुंच को बढ़ाने के लिए भी कहा गया है, और उसके लिए केन्द्र सरकार भी राज्यों की आर्थिक मदद कर रही है। कुल मिलाकर टेक्नॉलॉजी 21वीं सदी की सबसे बड़ी, और सबसे भरोसेमंद गवाह बन रही है, सुबूत बन रही है। सार्वजनिक जगहों पर लगे कैमरों के अलावा थानों के भीतर भी कैमरे लग रहे हैं, और अस्पतालों, या दूसरी सार्वजनिक आवाजाही की जगहों पर भी। इन सबका फायदा समाज को मिल रहा है। अभी मुम्बई में सत्तारूढ़ पार्टी का एक पार्षद एक सरकारी अस्पताल में घुसकर डॉक्टर और महिला कर्मचारियों को पीटता हुआ रिकॉर्ड हुआ, तो उसकी गिरफ्तारी भी हुई, और हाईकोर्ट ने उसे जमानत देने से भी इंकार कर दिया।
टेक्नॉलॉजी अगर निजी जिंदगी की निजता में दखल नहीं दे रही है, तो फिर सार्वजनिक जीवन में एक सुबूत के तौर पर वह एक बड़ा पुख्ता औजार है, और किसी जुर्म के खिलाफ तो वह एक कानूनी हथियार भी है। आज भी लोगों के बीच हो रही हिंसा, कोई सडक़ हादसा, किसी और तरह का जुर्म, इन सबको रिकॉर्ड करने के लिए कैमरों जैसे उपकरण बड़े मददगार हो रहे हैं, और वे अगर नहीं रहते, तो पुलिस न कई तरह के जुर्म सुलझा पाती, और न ही अदालत में किसी को मुजरिम साबित कर पाती। देश के कानून में तो ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल जायज है, लेकिन सरकार के भीतर, सरकारे के ढांचे के लोगों के बीच भी इसकी एक औपचारिक इजाजत होनी चाहिए, जिसके बिना इसे अभी भी चोरी-छिपी रिकॉर्डिंग, या स्टिंग ऑपरेशन माना जाएगा, और उसे शासकीय सेवक के आचरण के खिलाफ दर्ज किया जाएगा। इसे पूरी तरह औपचारिक और कानूनी बना देने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट के एक शब्द से बिल से निकले तिलचट्टे, और आज का अदालती रूख
29 जुलाई 2026
जंतर-मंतर को लेकर पहले तो पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट तुरंत कुछ सुनना नहीं चाहती थी, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक जुबानी टिप्पणी चारों तरफ घूमती रही कि उनके पास इस जुबानी जिक्र को सुनने को समय नहीं है, बाद में उन्होंने मीडिया की रिपोर्टिंग को गलत करार दिया, और कहा कि उनके सामने कोई याचिका नहीं आई थी, एक वकील ने सिर्फ जिक्र किया था जिस पर वे सुनवाई नहीं कर सकते थे। इस तरह वे भारत के ऐसे पहले मुख्य न्यायाधीश हो गए हैं जिन्हें दस हफ्तों के भीतर अपनी जुबानी टिप्पणियों के लिए दो बार मीडिया पर गलतबयानी की तोहमत लगानी पड़ी। अब जब जंतर-मंतर पर, और संसद की राह पर दिल्ली पुलिस ने निहत्थे और लोकतांत्रिक आंदोलनकारियों पर जो हमले किए, जिस तरह से लाठियों से उनके सिर और पैर तोड़े, जिस तरह पैलेट गन के छर्रे लोगों के बदन में घुसे मिल रहे हैं, और जिस तरह बिहार में एके-47 नाम की असॉल्ट रायफल से पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोलियां चलाई हैं, उन सब पर जब बहुत से लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब सुप्रीम कोर्ट ने उसे सुनना तय किया, दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा, लेकिन राहत महज इतनी दी कि जिन बेदाग लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उन्हें छोड़ा जाए।
अब किसी आंदोलन में शामिल लोगों में बेदाग किसे करार दिया जाए? किसी की अपने पड़ोसी से कोई झड़प हुई हो, और पुलिस में एक मामला दर्ज हो, किसी का सडक़ पर किसी से झगड़ा हुआ हो, और उसका मामला दर्ज हो, तो वह भी पुलिस की जुबान में बेदाग नहीं कहलाएगा। देश की राजधानी में कई विश्वविद्यालय हैं, और लाखों छात्र पढ़ते हैं, ऐसे में छात्र आंदोलन चलते ही रहते हैं, किसी और आंदोलन में जिन लोगों के खिलाफ पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया होगा, उन लोगों को भी पुलिस अब बेदाग मानने से इंकार कर देगी। सुप्रीम कोर्ट का एक शब्द सैकड़ों-हजारों नौजवानों पर भारी पड़ सकता है, और जो दिल्ली पुलिस छात्रों पर पैलेट गन चला रही है, छात्राओं के बदन में लाठी घुसा रही है, महिला को थप्पड़ मार रही है, वह पुलिस हर किसी को दागदार साबित करने पर जुट जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि पहले किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज रहा होगा, लेकिन वे अगर जंतर-मंतर पर शांत हैं, तो उन्हें बेदाग होने की शर्त से क्यों लादा जा रहा है? यह तो सुप्रीम कोर्ट इनकी बातों को सुनता भी नहीं, लेकिन जब बड़े-बड़े वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के अहाते में ही कैमरों के सामने खड़े होकर छात्रों के मुद्दों का समर्थन किया, आंदोलन के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकार को गिनाया था, और यह सब करने के बाद राष्ट्रगान भी गाया था, तो वकीलों का यह रूख देखकर चीफ जस्टिस का एक-दो दिन पहले का रूख पिघला, और इस बार छात्रों पर जुल्म करने वाली दिल्ली पुलिस पर सुनवाई हुई। यह तो अदालत के बाहर भी अभी साबित हो चुका है कि राजधानी के एक बड़े पुलिस अफसर के आदेश पर आंदोलनकारियों पर पैलेट गन चलाई गई थी, जो कि शायद सरकार के ही नियमों के खिलाफ थी। यह तो अगर आंदोलनकारियों के बदन को छलनी की तरह छेदने वाले छर्रों के फोटो और वीडियो मौजूद नहीं रहते, खोजी पत्रकारों ने अगर पुलिस का यह आदेश ढूंढ नहीं निकाला होता, तो पुलिस तो पैलेट गन की बात मानने को तैयार ही नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट का रूख बहुत ही निराश करता है। जजों के अपने राजनीतिक पूर्वाग्रह हो सकते हैं, चीफ जस्टिस को इस बात का मलाल हो सकता है कि उनके कहे हुए एक शब्द, कॉकरोच को लेकर इस देश के इतिहास का एक खासा बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया, और इस आंदोलन के चलते हर दिन देश और दुनिया इस बात का जिक्र भी कर रहे हैं कि यह तिलचट्टा किस बिल से निकला है। आमतौर पर आंदोलनों को सरकारें कुचलने की कोशिश करती हैं, और अदालतें उनमें आंदोलनकारियों के अधिकार बचाने की। इस बार उल्टा हुआ है, आंदोलनकारियों को पहली राहत सरकार से मिली है, उसकी चाहे जो भी वजह रही हो, और सुप्रीम कोर्ट उसी शहर में बैठे हुए भी शांतिपूर्ण, निहत्थे, लोकतांत्रिक आंदोलनकारी नौजवानों को कोई भी राहत देने में पिछड़ गया। अब जब खींचतान कर सुप्रीम कोर्ट इस आंदोलन में गिरफ्तार लोगों के बारे में सुनवाई कर भी रहा है, एक राहत सी दिखती हुई कोई चीज दे भी रहा है, तो भी वह बेदाग लोगों को ही छोडऩे की एक ऐसी शर्त जोड़ रहा है जिसका बेजा इस्तेमाल करने का भरपूर मौका और अधिकार दिल्ली पुलिस को मिल जाएगा। इतने जुल्म ढाने वाली दिल्ली पुलिस के हाथ में इस तरह का एक हथियार देना सुप्रीम कोर्ट की एक गलत उदारता है, और आंदोलनकारी कॉकरोच जनता पार्टी ने यह आपत्ति ठीक ही की है कि ऐसी शर्त जोडक़र सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का साथ दिया है। यह बड़ी अजीब सी नौबत है कि एक तरफ सरकार आंदोलनकारियों से बातचीत का लोकतांत्रिक तरीका दिखाकर अपने मंत्री का इस्तीफा ले रही है, और दूसरी तरफ अदालत इन्हीं आंदोलनकारियों में से बहुत से लोगों के खिलाफ कड़ाई बरतने का हथियार पुलिस को दे रही है।
हिन्दुस्तान की अदालतों को कॉकरोच या तिलचट्टा शब्द से एक जाहिर
परहेज हो सकता है, लेकिन ऐसा परहेज अगर अदालती रूख में झलकेगा, तो इससे अदालत का कोई
लोकतांत्रिक सम्मान नहीं बढऩे जा रहा। हम अदालत को संविधान से परे सिर्फ जनभावनाओं
पर काम करने जैसी कोई बात नहीं सुझा रहे, लेकिन जब सत्ता की पूरी ताकत किसी भी निहत्थे
और शांत आंदोलनकारियों पर टूट पड़ती है, तो लोकतंत्र तो अदालत की तरफ ही देखता है कि
वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा निराश किया है।
बहुत देर से इस मामले को सुना है, और बहुत कम राहत दी है। टू लेट, एंड टू लिटिल। लोकतंत्र
में संसद, अदालत, और सरकार के बीच शक्तियों का संतुलन इसीलिए बनाया गया था कि जब कभी
इनमें से कोई एक बददिमाग हो जाए, तो बाकी दो के पास उसे काबू में करने की ताकत रहे।
इस मामले में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था कम से कम कागजों पर तो अमरीका के आज के
बददिमागी के शिकार लोकतंत्र के मुकाबले बहुत अच्छी है, दूसरी तरफ वह ब्रिटेन के शाही
घराने से ग्रस्त लोकतंत्र से भी बहुत अच्छी है। लेकिन यह तभी अच्छी है, जब लोकतंत्र
के ये तीनों स्तंभ अपनी-अपनी जगह पर रीढ़ की हड्डी ठीक से सीधी रखकर अपनी जिम्मेदारी
पूरी करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर इस लोकतंत्र में संतुलन तीनों में से
किसी एक स्तंभ की तरफ झुक जाने का खतरा रहता है, अमूमन सरकार की तरफ। भारत की न्यायपालिका
को देश की जनता को इतना निराश नहीं करना चाहिए कि वह लोकतंत्र की रक्षा करने में अपनी
जिम्मेदारी भी नहीं निभा पा रही है।
जंतर-मंतर की लड़कियों से गैंगरेप सुझाने वाला विचारक!
28 जुलाई 2026
ठीक जिस समय आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत समलैंगिकों के प्रति सहनशीलता रखने की बात कर रहे थे, और यह मान रहे थे कि एलजीबीटीक्यू लोगों में से कुछ को प्रकृति ने ही वैसे बनाए हैं, ठीक उसी समय केरल के आरएसएस के एक बड़े पुराने, बुजुर्ग, और प्रमुख विचारक टी.जी.मोहनदास कह रहे थे कि उनके काबू में होता, तो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर गोलियां चला देते, और वे जब मर जाते, तो उन्हें अस्पताल पहुंचा देते। यही नहीं उन्होंने इस आंदोलन में शामिल लड़कियों और महिलाओं के लिए कहा कि इस प्रदर्शन में आने वाली महिलाओं को गैंगरेप से भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ये लोग बलात्कार पसंद करती हैं। उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट करके ये बातें कहीं, और कहा कि वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाली ये आंदोलनकारी महिलाएं बलात्कार पसंद करती हैं। इस बयान से आरएसएस ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वह ऐसे बयानों की कड़ी निंदा करता है। संघ ने यह भी कहा कि मोहनदास अभी संघ में किसी जिम्मेदारी के पद पर नहीं है। लेकिन इसके पहले का मोहनदास का परिचय बताता है कि वे आरएसएस के कई संगठनों में अलग-अलग पदों पर रह चुके हैं, और भाजपा के भी बौद्धिक प्रकोष्ठ के केरल राज्य संयोजक थे। वे इसके पहले भी हिन्दुत्व के मुद्दों को लेकर अदालती लड़ाई भी लड़ते रहे हैं। वे लगातार लिखते हैं, और उनके लेख संघ परिवार के प्रकाशनों में छपते रहते हैं।
ये बुजुर्ग विचारक तो इन बातों को कैमरे के सामने यूट्यूब पर बोलकर उजागर हो गए हैं, लेकिन लोग तरह-तरह से आंदोलनकारियों के खिलाफ हिंसक बातें कर रहे हैं। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले वीडियो में आंदोलनकारियों को शांत कर रहे हैं, दूसरे वीडियो में उनका आभार मान रहे हैं, सरकार के बड़े-बड़े मंत्री आंदोलनकारियों से बातें कर रहे हैं, उनका अनशन खत्म करवा रहे हैं, उनकी मांग पूरी करते हुए अपने मंत्री का इस्तीफा ले रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, या उसके हमखयाल लोगों की प्रतिक्रिया अब तक बहुत ही अश्लील और हिंसक तरीके से जारी है। एक तरफ तो इतने बड़े आंदोलन के सामने सरकार को, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो झुकना पड़ा, और परदे के पीछे की कोई नूरा कुश्ती रही होगी, तो हम अभी परदा हटाकर देख नहीं सकते, दूसरी तरफ सरकार के साथी या हिमायती माने जाने वाले लोग आंदोलनकारियों के बारे में जिस जुबान में बातें कर रहे हैं, उनसे सरकार का ही बड़ा नुकसान हो रहा है। अगर ये लोग गोलियों से मार डालने लायक थे, अगर इस आंदोलन की लड़कियां और महिलाएं सामूहिक बलात्कार के लायक थीं, अगर ये लोग देशद्रोही हैं, गद्दार हैं, पाकिस्तानी एजेंट हैं, तो फिर सरकार ने इनसे बात क्यों की थी? एक तरफ तो सरकार ने वक्त रहते इस आंदोलन को सुलझाने की, लचीलापन दिखाने की वाहवाही पाई है। दूसरी तरफ इस आंदोलन की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं है कि लुके-छिपे अंदाज में ये खबरें आ रही हैं कि दिल्ली और बिहार में आंदोलनकारियों पर कितने किस्म के जुर्म दर्ज किए जा रहे हैं। सरकारी एजेंडे पर सार्वजनिक रूप से बोलने वाले अश्लील और हिंसक बातें कर रहे हैं। इससे सरकार ही कमजोर साबित हो रही है कि अगर आंदोलनकारी इतने ही बुरे और घटिया थे, तो सरकार उनसे बात करके उनकी मांगों पर झुकी क्यों? और मंत्रियों से इस्तीफा न लेने की अपनी परंपरा को छोड़ा क्यों? अभी तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का वह वीडियो चारों तरफ तैर ही रहा है जिसमें वे कहते दिख रहे हैं कि यह यूपीए सरकार नहीं है, इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते।
अब सरकार की फजीहत, और आंदोलनकारियों को अपमानित करके उकसाने से परे की बात अगर हम करें, तो केरल के इस हिन्दुत्व-आंदोलनकारी बुजुर्ग के बारे में भी सोचने की जरूरत है। यह लगातार संघ के संगठनों के ओहदों पर रहा, संघ के प्रकाशनों में लिखता रहा, और उम्र के इस पड़ाव पर आकर अगर वह ऐसी हिंसक और अश्लील बातें कर रहा है, तो इस विचारधारा के लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि सारी उम्र इसमें गुजार देने के बाद भी इस आदमी की सोच ऐसी है, तो दिक्कत कहां पर है? किसी भी संस्था, संगठन, या विचारधारा के लिए यह परले दर्जे की शर्मिंदगी की बात रहती है कि उसे अपने एक सबसे ही सक्रिय बुजुर्ग को धिक्कारना पड़े, उसकी कड़ी निंदा करनी पड़े। ऐसा संगठन के या विचारधारा के कोई नए लोग करें, तो भी समझ पड़ता है। जब संगठन के अपने इलाके के भीष्म पितामह ऐसा करने लगें, तो सारे कुल का अपमान होता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हर कुछ हफ्तों-महीनों में उदारता की कोई एक बात कहकर खबरों में रहते हैं, लेकिन इस दर्जे की अलोकतांत्रिक और हिंसक बात कहने वाले उनके अपने पुराने स्तंभों की सोच पर संगठन को कुछ और विचार भी करना चाहिए। जिस भारत में देश की प्रतीक ही भारतमाता कही जाती है, जहां पर देवियों की प्रतिमाओं की पूजा की परंपरा देश भर में है, वहां पर जीती-जागती छात्राओं को सामूहिक बलात्कार का मजा लेने वाली कहना सिर्फ निंदा और धिक्कार से दब जाने वाली बात नहीं है। इस बारे में केरल के किसी पदाधिकारी से ऊपर भी संघ के किसी को कुछ, कुछ अधिक कहना चाहिए।
देश में जिस पार्टी, संगठन, या विचारधारा के समर्थक या अनुयायी लोकतंत्र के खिलाफ, देश के संविधान के खिलाफ, मानवता के खिलाफ बातें करते हैं, उनके खिलाफ धिक्कार उनके घर से निकलना चाहिए। ऐसे लोगों की निंदा बाकी समाज को करनी पड़े, और ये लोग खुद चुप बैठे रहें, तो इस चुप्पी से इनका सम्मान नहीं बढ़ता। अभी जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी नौजवानों में से कुछ के पोस्टर लोगों को बहुत बुरे लगे कि उनमें प्रधानमंत्री या दूसरे नेताओं के लिए अलग-अलग किस्म की गालियां इस्तेमाल की गई थीं। हजारों लोगों ने गालियों की इस जुबान को जमकर कोसा, और उसके जवाब में उससे भी गंदी गालियां भी दे डालीं। लेकिन इसी मौके पर कई लोगों ने यह भी याद दिलाया कि लोकसभा के भीतर भाजपा का एक सांसद जब एक दूसरे मुस्लिम सांसद को देशद्रोही और आतंकी कह रहा था, उसके धर्म का नाम लेकर गंदी, अश्लील, और हिंसक गालियां बक रहा था, तब हर्षवर्धन, और रविशंकर प्रसाद नाम के दो भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री उसके अगल-बगल बैठे मजा ले रहे थे, जोर-जोर से हँस रहे थे। अब जंतर-मंतर के नौजवानों ने इतनी गालियां कहां से सीखीं, तो इसके जवाब में लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि लोकसभा में भाजपा के सांसद रमेश विधुड़ी की दी हुई गालियां सुनकर नौजवानों ने भी अपनी गालियों को संसदीय माना।
गंदी मिसालें किसी संगठन, संस्था, विचारधारा का सम्मान नहीं बढ़ातीं, बल्कि विरोधियों के लिए एक मिसाल छोड़ जाती हैं, और देश की जनता में जो सभ्य हिस्सा है, उसके बीच सम्मान खत्म करवा देती हैं। जो विचारधारा अपने आपको महान बताए, उसे तो अपने लोगों पर बेहतर काबू रखना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में गंदगी का सिलसिला खत्म करना चाहिए। अगर किसी को यह लगता है कि ताजा आंदोलनकारी पीढ़ी, जेन-जी किसी की दी हुई गंदी गालियों को सुनकर चुप रह जाएगी, तो उन्हें इस खुशफहमी से बाहर आ जाना चाहिए। यह पीढ़ी इस मोहनदास की बुढ़ापे की इज्जत को ठिकाने लगाने की ताकत अपनी चुटकियों पर रखती है। इस आदमी को लड़कियों के गैंगरेप की बात करने के पहले इतना तो सोचना था कि इसके माँ-बाप ने इसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी की तरह मोहनदास रखा था, किसी और बात की, अपने संगठन की इज्जत न भी रखनी होती, तो भी कम से कम गांधी के नाम की इज्जत तो रखनी थी। हालांकि सब कुछ जानते हुए हमें यह उम्मीद करनी नहीं चाहिए।
अपने दिल-दिमाग के स्पंज को निचोडक़र जगह बनाएं
27 जुलाई 2026
जंतर-मंतर के छात्र और नौजवान आंदोलन की वजह से एक बार फिर इस देश में गालियों, अश्लील टिप्पणियों, या उनके जवाब में हिंसक धमकियों, अश्लील बातों का सैलाब आया हुआ है। हमें तो अखबार के धंधे की वजह से खबरों को लगातार पढऩा पड़ता है, बहुत से वीडियो भी देखने पड़ते हैं, खासकर ऐसे जो कि टीवी की मिलावट से परे के, सोशल मीडिया के खालिस वीडियो रहते हैं। इन सबको देखते महीना हो रहा है, और अब दिमाग कुछ भारी होने लगा है, मन उचटने लगा है। ऐसा लगने लगा है कि चाहे कितना ही जमीनी मुद्दों का आंदोलन क्यों न हो, उसे लेकर नकारात्मकता कितनी झेली जा सकती है? यह तो आंदोलन में कई सकारात्मक बातें थीं, इसलिए उसे लगातार देखते चलने की दिलचस्पी भी थी, लेकिन आंदोलन पर हमला करने वाले लोग इसे साम्प्रदायिकता की हद तक ले जा रहे थे, वह नकारात्मकता बहुत भारी पड़ रही थी। इसलिए आज किसी भी एक आंदोलन से परे, किसी भी आंदोलन से परे, बात असल जिंदगी में सकारात्मकता, और नकारात्मकता की।
आज लोग अगर जरा सी भी ऑनलाइन जिंदगी जीते हैं, तो वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने, या कम से कम उसे देखते चलने के लिए मजबूर रहते हैं। जो लोग सोशल मीडिया पर मौजूद नहीं रहते, वे एक किस्म से अपने दायरे और तबके के लिए असामाजिक प्राणी हो जाते हैं। ऐसे में लोगों के दायरे में जो लोग रहते हैं, उन्हीं का लिखा हुआ, पोस्ट किया हुआ, या मैसेंजरों पर फारवर्ड किया हुआ अधिक पढऩे और देखने में आता है। नतीजा यह है कि असल जिंदगी में जो स्थितियां आती हैं, उनमें सकारात्मक और नकारात्मक का जो अनुपात रहता है, उससे बिल्कुल अलग अनुपात लोगों की ऑनलाइन जिंदगी में हो सकता है, होता है। असल जिंदगी में अधिकतर लोगों की अब तक की पूरी जिंदगी में जिन लोगों से नफरत करने की कोई वजह नहीं रहती, ऑनलाइन यह लगने लगता है कि ये लोग तो नफरत के लायक हैं! और ऑनलाइन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जब मैसेंजर सर्विसों के साथ मिलकर एक मिला-जुला औजार बनकर लोगों के हाथ लग जाते हैं, तो फिर लोग उसका मनमर्जी इस्तेमाल करने लगते हैं। दुनिया में स्विस आर्मी चाकू बड़ा मशहूर है। एक ही चाकू में दर्जन-दो दर्जन किस्म के अलग-अलग जरूरी औजार रहते हैं, जो कि एक किस्म की मिनी टूल किट रहते हैं। सोशल मीडिया और मैसेंजर मिलकर लोगों के हाथ कुछ इसी तरह का स्विस आर्मी नाइफ बन जाते हैं, एक ही साथ कई किस्म के औजार, और कई किस्म के हथियार भी।
ऐसे में हमें लगता है कि लोगों को अपनी असल जिंदगी की असल घटनाओं के अनुपात के साथ-साथ ऑनलाइन जिंदगी, या संदेशों पर भी सकारात्मक और नकारात्मक का एक अनुपात बनाए रखना चाहिए। इन दिनों बड़े तो बड़े, छोटे-छोटे बच्चे भी सडक़ों पर जिस तरह की हिंसक और नफरती बातें करते दिखते हैं, वह उन पर सोशल मीडिया, और मैसेंजरों से प्रभावित बड़े लोगों का असर भी दिखता है, और अब तक भारत में नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कोई रोक तो लगी नहीं है, इसलिए बच्चे खुद भी सोशल मीडिया और मैसेंजरों की नकारात्मकता से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। हम सिर्फ हिंसक, अश्लील, या साम्प्रदायिक बातों की बात नहीं कर रहे, इनसे कम प्रभावित होने पर भी लोगों के दिल-दिमाग पर एक निरंतर-नकारात्मकता का जो असर होता है, उसके खतरे भी समझना जरूरी है। हमने दुनिया के कुछ मनोवैज्ञानिकों की इस बारे में कही और लिखी गई बातों से समझने की कोशिश की। उनका कहना है कि भावनाएं भी संक्रामक होती हैं, जैसे हँसी फैलती है, वैसी ही गुस्सा, भय, नफरत, और निराशा भी फैलती हैं। लगातार क्रोध, अपमान, और षडय़ंत्र की भाषा सुनने-पढऩे वाले लोग भी धीरे-धीरे उसी भावनात्मक वातावरण में जीने लगते हैं। दूसरी बात मानव मनोविज्ञान के साथ यह है कि लोगों के मन में एक नकारात्मकता-पूर्वाग्रह रहता है, यानी इंसानी दिमाग बुरी खबरों पर अच्छी खबरों के मुकाबले अधिक तेजी से प्रतिक्रिया देता है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर गुस्से, अपमान, डर, और नफरत वाली पोस्ट अधिक ध्यान खींचती है, दिमाग उन्हें अधिक देर तक याद रखता है। फिर एक और मनोवैज्ञानिक तथ्य यह है कि इंसानी दिमाग एक प्रतिध्वनि-कक्ष भी रहता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपनी तरह सोचने वाले लोगों को पढ़ते, और सुनते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें लगने लगता है कि पूरी दुनिया उन्हीं की तरह सोचती है, और इससे उनकी असहमति सहने की क्षमता कम होती जाती है। सामाजिक मनोविज्ञान का एक और बहुत मजबूत सिद्धांत समूह-ध्रुवीकरण है। जब समान विचार वाले लोग बार-बार एक-दूसरे से बातचीत करते हैं, तो वे अपनी धारणाओं और मान्यताओं के लिए पहले से अधिक कट्टर हो जाते हैं, मानो करेला नीमचढ़ा भी हो गया। मनोविज्ञान कहता है कि ऐसे दस लोग हल्की नाराजगी लेकर भी बैठे हों, तो लगातार एक-दूसरे की बात सुनते-सुनते वे गुस्से की पराकाष्ठा तक पहुंच सकते हैं। मनोविज्ञान का एक और सिद्धांत कहता है कि यदि कोई व्यक्ति पूरे वक्त सिर्फ जुर्म, हिंसा, धर्म, साजिश, और नफरत की पोस्ट पढ़ते हैं, तो उन्हें लगता है कि पूरी दुनिया सिर्फ इन्हीं चीजों से भरी हुई है। वास्तविकता नहीं बदलती, लेकिन लोगों की मानसिक सोच उसके बारे में बदल जाती है। फिर इसके बाद एक खतरनाक चीज और बाकी है। आज सोशल मीडिया के भीतर जो एल्गोरिद्म काम करता है, वह लोगों की दिलचस्पी देखकर उसी किस्म के कंटेंट और दिखाता है। अगर किसी ने दस नफरती वीडियो देखे, तो प्लेटफॉर्म आपको ग्यारहवां भी वैसा ही दिखाएगा, और इस तरह कोई व्यक्ति एक मानसिक सुरंग में पहुंच सकते हैं, जिसमें चारों तरफ और कुछ नहीं दिखता, सुरंग के अलावा।
ये मनोवैज्ञानिक सिद्धांत ढूंढते-ढूंढते अंत में एआई, चैटजीपीटी ही हमें सुझा रहा है कि आपके संपादकीय के लिए, या साप्ताहिक कॉलम के लिए यह लाईन अच्छी रहेगी- ‘मनुष्य केवल अपने खानपान से नहीं बनते, वे अपने पढऩे, सुनने, और साथ रहने वालों से भी बनते हैं। यदि कोई रोज नफरत खाते हैं, तो एक दिन उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे कभी इंसानियत भी खाया करते थे। शरीर का डीएनए माता-पिता से मिलता है, लेकिन दिमाग का डीएनए बहुत हद तक उन लोगों से बनता है जिन्हें हम हर दिन पढ़ते हैं, सुनते हैं, और अपना मानते हैं।’ एआई ने एक दिन पहले के हमारे अखबार की सामग्री को देखकर भी ये बातें सुझाई हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि इस अखबार की सोच क्या है। जब कृत्रिमबुद्धि पर भी हमारी लगातार बातचीत का ऐसा असर होता है, तो मानवबुद्धि पर भी ऐसा ही असर होता होगा। हममें से हर किसी को बड़ा सावधान रहना होगा कि अपनी मानसिक सेहत को किस तरह ठीक रखें, किस तरह नकारात्मकता से दूर रहें। आज सोशल मीडिया, मैसेंजर, और एआई के जमाने में यह पहले के मुकाबले अधिक मुश्किल भी है कि नकारात्मकता से दूर रहा जाए। इसके लिए लगातार कोशिश करनी होगी, और सिर्फ सकारात्मक चीजों को देखते चलने से आपका सोशल मीडिया अकाउंट आपको धीरे-धीरे अधिक सकारात्मक चीजें दिखाने भी लगेगा। हम कभी-कभी लोगों के दिल-दिमाग की तुलना एक स्पंज से करते हैं, जो कि कहीं बिखरे हुए पानी को सोखने के लिए भी इस्तेमाल होता है। इंसानी दिल-दिमाग भी एक स्पंज जैसा है, वह अगर अपनी पूरी क्षमता का सोख चुका रहता है, तो फिर वह और कुछ नहीं समा सकता। इसलिए अगर हमारे दिल-दिमाग नकारात्मकता से लबालब हो जाएंगे, तो फिर सकारात्मकता के लिए उसमें जगह भी नहीं बचेगी। ऐसे में इस स्पंज को दबाकर पूरी तरह निचोड़ देना जरूरी है, ताकि नकारात्मकता निकल जाए, और सकारात्मकता के लिए कुछ जगह खड़ी हो। एक वक्त कहा जाता था कि लोगों को बुरी संगत से बचना चाहिए, आज टेक्नॉलॉजी के इस जमाने में असल जिंदगी की संगत तो सबकी घट गई है, लेकिन आभासी दुनिया में सोशल मीडिया, और ऑनलाइन की संगत बढ़ गई है, उसे भी देख-समझकर सावधानी से छांटने की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी पेड़ के ठीक विकास के लिए उसकी गैरजरूरी डालियों को काटा जाता है।
न्यायपालिका को नसीहत, इस बार घर के भीतर से
26 जुलाई 2026
किसी भी देश में वहां का सुप्रीम कोर्ट इस बात का एक सुबूत, संकेत, और नमूना रहता है कि देश में आजादी और इंसानियत का क्या हाल है। अमरीका में तो आम जनता की आजादी एक अलग ऊंचे दर्जे की है, और वहां पर किस राष्ट्रपति ने किस जज को मनोनीत किया है, किस जज ने पहले क्या-क्या फैसले दिए हैं, उन सब पर खुली चर्चा होती है। लोग खुलकर जजों के नाम के साथ यह लिखते हैं कि वे प्रगतिशील हैं, उदारवादी हैं, या संकीर्णतावादी, दकियानूसी हैं। किसी बड़ी बेंच के जजों को लेकर यह गिनती भी लगा ली जाती है कि उसमें दकियानूसियों का अल्पमत है, या बहुमत है। इसे वहां कोई बुरा नहीं मानते। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसा मुमकिन नहीं है। हर जज अपने आपको ईमानदार, निष्पक्ष, तटस्थ बताना चाहते हैं, और उनके इन पहलुओं पर सवाल उठाने का, इन पर चर्चा करने का यहां रिवाज भी नहीं है। ऐसे में जब बहुत से जज मानो आजादी की सालगिरह की परेड में सत्ता के साथ कदमताल करते दिखते हैं, तो भी आम जनता के लिए कुछ कहने का कुछ नहीं रह जाता, कुछ करने का तो बिल्कुल रहता ही नहीं है। ऐसे में कभी-कभी जब कोई जज अदालत में अपनी जुबानी बात से, या अदालत के बाहर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में, या इंटरव्यू में कोई उदारवादी बात कहते हैं, तो एकदम से लगता है कि अरे, आजादी अभी इतनी बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज, उज्जल भुइयां ने अभी एक कार्यक्रम में बोलते हुए इस बात पर बड़ी फिक्र जताई है कि न्यायपालिका आज जमानत देते हुए किसी छात्र-कार्यकर्ता, या प्रदर्शनकारी, आंदोलनकारी को जमानत इस शर्त पर देती है कि वे सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट नहीं करेंगे, सार्वजनिक बैठकों में हिस्सा नहीं लेंगे, या बैठकों में कुछ बोलेंगे नहीं। उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा असर डालती हैं। उन्होंने कहा कि लोगों का यह पूछना पूरी तरह जायज होगा कि क्या अदालतें ऐसी शर्तें लगाकर यह संदेश दे रही हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहस, असहमति, और विरोध उसकी आत्मा हैं, लेकिन हाल के बरसों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी आपराधिक मामलों में बदल दिया गया।
हम अपने अखबार के इस संपादकीय कॉलम को अमूमन अपने ही विचारों के लिए रखते हैं, लेकिन कभी-कभी किसी और की कही हुई बातें हमारे अपने विचारों से तालमेल रखती हुई रहती हैं, तो हम उन्हें यहां ज्यों का त्यों लिखते हैं, और कभी-कभी वे हमारे विचारों से भी बेहतर होती हैं, तो हम उन्हें पूरे खुलासे से यहां लिखते हैं, जो कि उनसे हमारी पूरी सहमति का एक सुबूत रहता है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि आजकल विश्वविद्यालयों में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले छात्रों को गिरफ्तार किया जाता है, कई बार उन्हें 30-40 दिन तक जमानत भी नहीं मिलती, विश्वविद्यालय उन्हें निलंबित कर देते हैं, और फिर उन्हें अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल लोकतंत्र के लिए फिक्र का सामान है। उन्होंने ऐसे मामलों का जिक्र किया जिनमें किसी व्यक्ति ने किसी मंत्री की टिप्पणी पर फेसबुक पोस्ट लिखनी, तो उसके खिलाफ एफआईआर हो गई, और जब अदालत से अग्रिम जमानत मिली, तो शर्त रखी गई कि वे फेसबुक पर कुछ पोस्ट नहीं करेंगे। जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति के भाग जाने की आशंका नहीं है, तो उसका पासपोर्ट जमा कराने जैसी शर्तें, या सोशल मीडिया पर पूर्ण रोक लगाने जैसी शर्तें कितनी न्यायसंगत है? उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें लोगों की मौलिक स्वतंत्रता को गंभीर रूप से सीमित कर देती हैं।
उन्होंने एक ऐसे मामले का भी जिक्र किया जिसमें यूपी में कुछ नौजवानों को गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने, और चिकन-बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा- ‘मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन-बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं हैं, यदि कोई काम अपराध ही नहीं है, तो लोगों को महीनों तक जेल में कैसे रखा जा सकता है?’
उन्होंने बाम्बे हाईकोर्ट का भी जिक्र किया जहां फिलीस्तीन के समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शन को इजाजत नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि अदालतों को लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों के अधिकार के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए। इस बार के भाषण के पहले भी जस्टिस भुइयां कुछ दूसरे मौकों पर सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने पहले भी कहा है कि न्यायपालिका को अपने आपको राजा के प्रति, राजा से भी अधिक वफादार बनने से बचना चाहिए।
यहां हम जिक्र करना चाहेंगे कि राजा वाली यह बात फ्रांस के 1789 की क्रांति के बाद बड़े जोर-शोर से उठी थी। जब इसके बाद राजशाही दुबारा कायम हुई, तो राजा ने यह महसूस किया कि वक्त बदल गया है, और कई किस्म के सुधारों की जरूरत है, तो भी राजा के चाटुकारों ने उसे यह समझाने की कोशिश की कि पुरानी राजशाही की सारी सामंती बातें लागू होनी चाहिए, और इसी वक्त से यह बात लिखी जाने लगी कि कुछ लोग राजा के प्रति राजा से भी अधिक वफादार होकर दिखना चाहते हैं, दिखाना चाहते हैं। जस्टिस भुइयां की यह बात सीधे-सीधे न्यायपालिका के संदर्भ में ही कही गई थी, और सरकार की कार्रवाईयों वाले मामलों को लेकर कही गई थी, इसलिए इसमें कोई गलतफहमी नहीं है कि उन्होंने हिन्दुस्तान के जजों को यहां की सरकारों के प्रति, सरकारों से अधिक वफादार बनकर दिखाने से बचने की सलाह दी है।
हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र किसी पत्थर की तरह गतिहीन, गतिशून्य व्यवस्था नहीं रहता। वह तो उतरती हुई एक पहाड़ी नदी की तरह लगातार रास्ते तय करते चलता है। वह रास्ते में कहीं चट्टानों को आकार देता है, तो कहीं चट्टानें उसका रूख मोड़ती हैं। लोकतंत्र हमेशा परिवर्तनशील रहता है, वह किसी टंकी में जमा पानी की तरह काई का शिकार नहीं होता, वह बहता पानी रहता है। इसलिए समय-समय पर जब कभी किसी भी व्यक्ति की कही लोकतांत्रिक बातें पढऩे-सुनने मिलें, तो उन पर सोच-विचार भी करना चाहिए, उन्हें आगे भी बढ़ावा चाहिए। कई लोग गुडमॉर्निंग के पोस्टरों को हजारों लोगों को भेजकर दिन शुरू करते हैं, और फिर बाकी दिन में अपनी पसंद के धर्म या आध्यात्म की और कुछ घिसी-पिटी बातों को बढ़ाते रहते हैं। जब लोगों के हाथ में हजारों लोगों तक मुफ्त में कुछ भेजने का औजार है, उन्हें ऐसी बातें आगे बढ़ानी चाहिए जो उनके संपर्क के लोगों में भी लोकतांत्रिक-इंसानियत को बढ़ा सके, इंसाफ की बात कर सके। हम तो जस्टिस भुइयां की कही बातों जैसी बातों को आगे बढ़ाने के लिए अपने इस संपादकीय कॉलम का भी इस्तेमाल करते हैं, लोगों को पाखंड और कट्टरता को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए, जिंदगी के असल मुद्दों, और उदारता से भी अपने परिचितों का परिचय कराना चाहिए।
हर नाजुक मौका इस देश में उजागर कर देता है बड़े-बड़े दांत-नाखून...
26 जुलाई 2026

बाकी दुनिया में बीते बरसों में क्या फर्क पड़ा है, उसका तो ठीक-ठीक अंदाज नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तान में पिछले 10-15 बरस में जब भी कोई बड़ी बात होती है, बहुत से लोगों के कई किस्म के मेडिकल टेस्ट अपने आप हो जाते हैं, और उसकी रिपोर्ट सोशल मीडिया पर आने लगती है। यह दिखने लगता है कि किन लोगों की सोच क्या है, वह किस हद तक हिंसक और आतंकी हो सकती है, किस हद तक अश्लील हो सकती है, और इन लोगों का किसी भी तर्क या इंसाफ से नाता कितना टूट चुका है, दूरी कितनी बढ़ चुकी है। हम इसे मेडिकल रिपोर्ट इसलिए कह रहे हैं कि ये अपनी मानसिक हालत, और मुजरिम सोच के सुबूत खुद ही सोशल मीडिया पर बिखेरते चलते हैं, और किसी भी जिम्मेदार, लोकतांत्रिक सरकार के लिए यह बात आसान हो सकती है कि वह अपने ऐसे नागरिकों का दिमागी, और कानूनी इलाज कर सके। अब ऐसी डॉक्टरी शायद लोकप्रिय नहीं होती, इसलिए सरकार इससे बचती है। और इस वजह से यह मानसिक रोग, और मुजरिम मानसिकता दोनों बढ़ते चलते हैं।
फिलहाल इस पर लिखने की इसलिए सूझी कि जंतर-मंतर पर अभी-अभी निपटे तिलचट्टों, और उनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का जो आंदोलन निपटा है, उसने भी लाखों हिन्दुस्तानियों के छुपे हुए बड़े दांतों, और बड़े-कड़े नाखूनों को उजागर कर दिया है। एक तरफ सरकार अपने पूरे अस्तित्व की एक सबसे बड़ी चुनौती झेलते हुए उससे निपटने के लिए आधी रात में भी दीये का तेल जला रही थी, दूसरी तरफ आंदोलनकारियों से नफरत करने वाले लोग नागरिक की ओढ़ी हुई खाल से बाहर आकर अपनी नफरत और अपनी हिंसा दिखा रहे थे।
जंतर-मंतर पर आज की जुबान में चर्चित बिल्कुल ताजा पीढ़ी, जेन-जी के लोग तो राजनीतिक कटाक्ष से लेकर गंदी गालियों तक के पोस्टर लिए खड़े थे। ये उनमें से कुछ की आम जुबान में थे, और कुछ के मन की भड़ास से निकला हुआ यह कटाक्ष था। वयस्क मनोरंजन और अश्लील भाषा के हिसाब से देखें तो इस आंदोलन में इस पीढ़ी की रचनात्मक कल्पनाशीलता भी खुलकर दिख रही थी, जो कि असंसदीय तो थी, लेकिन वह आहत संवेदनाओं से उपजी हुई भी थी। जब सत्ता के करीबी इन आंदोलनकारियों को गद्दार, और टुकड़े-टुकड़े गैंग करार दे रहे थे, तो यह पीढ़ी भी अपनी जुबान में उसका जवाब दे रही थी, और दो अलग-अलग किस्म की गंदगियों या गालियों के बीच फर्क करना हमारे बस का है नहीं।
इस आंदोलन के नारों और पोस्टरों से इस पीढ़ी की बेफिक्र और अराजक आजाद जुबान शायद पहली ही बार इस देश के लोगों के सामने इस हद तक आई है, लेकिन इनके जवाब में जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे इनसे अधिक खतरनाक हैं। इस आंदोलन में शरीक होने पहुंचे 18-20 बरस के दो लडक़ों को रोककर, एक कार में पीछे की सीट पर ताकतवर-मालिकाना अंदाज में पसरा हुआ, एक धर्म की पूरी खाल ओढ़ा हुआ, उस धर्म का सारा श्रृंगार किया हुआ, एक आदमी इन लडक़ों को रोककर उनसे सबसे गंदी मुमकिन जुबान में जितनी गालियां दे रहा है, उन्हें बार-बार टटोल रहा है कि वे किसी दूसरे धर्म के तो नहीं हैं, और उन्हें मार-मारकर कैमरे पर यह कहलवा रहा है कि वे जंतर-मंतर के इन देशद्रोहियों के आंदोलन में दुबारा नहीं आएंगे। यह हिंसक हमलावर बेधडक़ अपना चेहरा उजागर करता है, और अपने धर्म की पूरी साज-सज्जा के साथ बेकसूर लडक़ों को माँ-बहन की गालियां भी बकता है। वह खुद ही इसका वीडियो बनवाता है, और इन लडक़ों को मजबूर करता है कि वे झुककर कार की खिडक़ी से अपना चेहरा दिखाएं, और कहें कि वे यहां दुबारा नहीं आएंगे। एक पूरी तरह गैरधार्मिक, लोकतांत्रिक, और शांतिपूर्ण आंदोलन के खिलाफ दिल्ली में एक धर्म का नाम लेकर बड़े-बड़े आव्हान करने वाला एक पूरी तरह साम्प्रदायिक नेता लाख लोगों का जुलूस लेकर जंतर-मंतर पहुंचने की मुनादी करता है, और इस आंदोलन को अपने धर्म के खिलाफ करार देता है। इसके पहले कि जुलूस पहुंच पाए, मजबूर सरकार को आंदोलनकारियों की सारी मांगें माननी पड़ीं, और यह धार्मिक खाल वाला नेता दूसरी घोषणा करता है कि उनके पहुंचने की घोषणा से ही तिलचट्टे डरकर भाग गए।
जंतर-मंतर तो एक नमूना है। हर आंदोलन या हर धार्मिक-भावनात्मक मुद्दा इस देश में पैथोलॉजी लैब का काम करता है, और लोगों के दिल-दिमाग में भरी हुई नफरत, हिंसा, और अश्लीलता को उजागर करता है। सोशल मीडिया पर लोग खुद होकर अपनी ऐसी दिमागी-बीमारी की रिपोर्ट खुद दस्तखत करके पोस्ट करते हैं, वह इस बार भी हुआ, बड़े उत्साह के साथ हुआ, बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोगों ने अपने दिमागी मर्ज की रिपोर्ट पोस्ट की, क्योंकि उन्हें अंदाज नहीं था कि सरकार इतनी जल्दी झुक जाएगी, और आंदोलनकारियों की हर बात मान ली जाएगी।
इस आंदोलन के दौर ने यह भी साबित किया कि हिन्दुस्तान को किसी नेता से अधिक जरूरत मनोचिकित्सक की है। यहां के लोग होमोफोबिक, ट्रांसफोबिक, इस्लामोफोबिक, आजादीफोबिक, नौजवानफोबिक, वयस्कफोबिक किस्म के हैं। अब आंदोलन खत्म होने के बाद भी लोगों का यह लिख-लिखकर भेजना जारी है कि इस आंदोलन में ट्रांस और समलैंगिक लोग शामिल थे, पोस्टरों पर गालियां लिख रहे थे, लडक़े साड़ी पहनकर नाच रहे थे, क्या भारत के लोग इससे सहमत हो सकते हैं? इस किस्म की शायद लाखों पोस्ट सोशल मीडिया पर आ चुकी है, कुछ दर्जन ऐसे बड़े लंबे-लंबे संदेश हमें भी वॉट्सऐप पर मिले हैं, लेकिन धर्म की खाल ओढ़े हुए इंसानों की हिंसक और अश्लील बातें, उनकी हिंसा, उनकी धमकियां इनमें से किसी को परेशान नहीं करतीं। किसी की धार्मिक भावनाएं इस बात से आहत नहीं होतीं कि उन्हीं के ईश्वर की कोई तस्वीर लगाकर, जय-जयकार करने वाले लोग उस तस्वीर के ठीक नीचे दूसरों का नाम लिखकर उन्हें माँ-बहन की गालियां देते हैं, उनकी बहन-बेटियों को बलात्कार की धमकियां देते हैं।
मैं तो सोशल मीडिया पर हर दिन 8-10 घंटे रहता ही हूं, अपने धर्म के झंडे-डंडे सहित सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों की हिंसा-अश्लीलता से उस धर्म के लोगों को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उन्हें जंतर-मंतर पर नौजवान आंदोलनकारियों के वयस्क भाषा के कटाक्ष से बड़ी दिक्कत है जो कि हिंसक नहीं है, जो कि धमकी नहीं है, जो कि किसी ईश्वर का नाम लेकर नहीं है, जो कि किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। पूरी तरह से अधार्मिक रहा यह आंदोलन, धर्म और जाति के किसी भी नारे से मुक्त भी रहा, और इसके बावजूद उसे एक धर्म का विरोधी करार देते हुए लाख लोगों को वहां ले जाकर तिलचट्टों को मार डालने की खुली धमकी से किसी कोई परेशानी नहीं होती!
भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों से, जायज या नाजायज सरकारी या राजनीतिक फैसलों से इतना तो हो रहा है कि लोग अपने गले में अपने ऐसे डीएनए का माला पहनकर भी खड़े हो जाते हैं जो बताता है कि वे पाषाण युग के हैं, और उसके बाद की सभ्यता के किसी भी विकास से वे पूरी तरह अछूते, और पूरी तरह कुंवारे हैं, उनका चरित्र एकदम शुद्ध है, और उनकी सोच अभी चक्के के आविष्कार के युग में भी नहीं पहुंची है। मैं तो एकदम खालिस नास्तिक हूं, फिर भी इस देश में धर्म के चोले, प्रतीक, और उसकी साज-सज्जा से लैस नफरती जब दूसरे धर्म के लोगों का साथ देने का आरोप लगाते हुए अपने ही धर्म के लोगों को भी माँ-बहन की गालियां बकते हैं, उन्हें पीटते हैं, तो मैं हैरान होता हूं कि कण-कण में व्याप्त उनका ईश्वर यह देखकर क्या सोच रहा होगा? आप भी सोचकर देखिए कि क्या इससे आपकी धार्मिक, या नास्तिक, किसी भी किस्म की भावना आहत होती है, या आपकी मानवीय भावनाएं अब पत्थरों के बीच दबकर जीवाश्म (फॉसिल) हो चुकी हैं?
जंतर-मंतर का एक सबक, अखबार मीडिया नाम की छतरी से बाहर निकलें
25 जुलाई 2026
जंतर-मंतर के आंदोलन के बीच कुछ टीवी समाचार चैनलों के जाने-माने चेहरों के साथ कुछ बदसलूकी की खबरें भी हैं। अखबारी या दूसरे किस्म के रिपोर्टरों से अलग, टीवी चैनलों के रिपोर्टर चैनल के लोगो लगे माइक लेकर चलते हैं, और चेहरों के साथ-साथ चैनल का नाम भी उजागर होते चलता है, जो कि टीवी चैनलों का कारोबारी तौर-तरीका भी है। यह पहला मौका नहीं है कि कुछ चुनिंदा चैनलों, और चुनिंदा रिपोर्टरों को भीड़ की नाराजगी झेलनी पड़ी हो। देश में अलग-अलग कई आंदोलनों के दौरान जब कोई टीवी चैनल अपने आक्रामक रूख से उस आंदोलन का विरोधी रहता है, रात-दिन उसके खिलाफ एक एजेंडा आगे बढ़ाते रहता है, तो उसके मैदानी लोगों को यह नाराजगी झेलनी पड़ती है। ऐसा किसान आंदोलन के समय भी हुआ, और बहुत सारे दूसरे आंदोलनों में भी साख इन लोगों के काम करने के आड़े आई। देश के मीडिया का ही एक हिस्सा ऐसे सत्ता समर्थक टीवी चैनलों को गोदी मीडिया कहता है, और हम अपने लिखने में इस शब्द से परहेज करते हुए भी यह बात तो लिखने को बेबस हैं कि कई टीवी चैनलों का रोजाना का एजेंडा किसी भी हद तक जाकर, परले दर्जे के झूठ बोलकर किसी के प्रति अंधभक्ति दिखाना, या किसी के प्रति नफरत फैलाना रहता है। अक्सर ही यह एजेंडा एक ही रहता है, और एक एजेंडे से ही ये दोनों काम साथ-साथ पूरे किए जाते हैं। इसके लिए अलग-अलग तबकों के प्रतिनिधि बताकर ऐसे नफरती और जहरीले लोगों को बहस के पैनल में बिठाया जाता है कि देश की हवा में नफरत और अधिक घुल जाए। फिर मानो यह भी काफी न हो, तो पाकिस्तान से ऐसे पैनलिस्ट जोड़े जाते हैं जो भारत के कुछ लोगों को तरह-तरह से गालियां दें, और उन गालियों को भी ये चैनल अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल करते हैं। परले दर्जे के झूठ, और नफरत को लगातार बढ़ावा देने वाले कुछ ऐसे बहुत ही जाने-माने शोहरती एंकर-एंकरानियां हैं जो इंच-इंच हवा में नफरत घोल देने के अकेले मकसद से काम करते दिखते हैं।
ऐसे लोगों के साथ जब किसी आंदोलन के दौरान बदसलूकी होती है, तो उसे मीडिया के साथ बदसलूकी करार दिया जाए, या न दिया जाए? यह सवाल इसलिए मायने रखता है कि इस देश में आजादी की लड़ाई के वक्त से अखबार जिस तरह से जिम्मेदारी निभाते आ रहे थे, और अब भी अधिक या कम हद तक निभाते हैं, उस जिम्मेदारी से बिल्कुल ही मुक्त, टेक्नॉलॉजी के एक नए विस्फोट से जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आया, और छाया है, उसके तौर-तरीके इतने अलग हैं कि पत्रकारिता के तौर-तरीके, उसके कोई नीति-सिद्धांत, और उसके कोई मूल्य इस पर लागू नहीं होते। फिर गलती कभी किसी टेक्नॉलॉजी की तो रहती नहीं है, उसे इस्तेमाल करने वाले अगर इसे एक नफरती, साम्प्रदायिक, धर्मान्ध एजेंडा लागू करने के लिए रात-दिन इस्तेमाल करते हैं, तो क्या उसे उसी मीडिया में गिना जाए जिसमें अखबार भी गिनाते हैं? हमने अभी जंतर-मंतर के इस आंदोलन के पहले भी कई बार यह लिखा है कि अब मामला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भी आगे बढक़र इंटरनेट आधारित वेबमीडिया तक पहुंच गया है, न्यूज पोर्टल, या समाचार वेबसाइटें हावी हो गई हैं, टीवी चैनल भी कुछ हद तक किनारे हो गए हैं, और इन सबसे पहले यूट्यूब और दूसरे प्लेटफॉर्म इन सबके ऊपर आ गए हैं। ऐसे में क्या इन सबको मीडिया कहा जाए?
केरल की बोट रेस जिन लोगों ने देखी है वे जानते हैं कि किस तरह एक बहुत संकरी, और बहुत लंबी बोट पर दो-दो लोग अगल-बगल, एक बड़ी लंबी कतार में बैठते हैं, और एक साथ चप्पू चलाते हैं। बंदूक से निकली गोली की तरह ये बोट इन सबकी सामूहिक ताकत से आगे बढ़ती हैं। इनको एक बोट, या नाविक कहा जाना समझ में आता है। लेकिन पल भर के लिए यह मान लें कि यह बोट मीडिया है, और इसमें चप्पू चलाने वाले खरगोश, शेर, वनभैंसे, हाथी, जिराफ, साही, भालू, लोमड़ी दर्जनों किस्म के लोग हैं, तो क्या इससे मीडिया नाम की यह बोट आगे बढ़ सकेगी? हमें न तो मीडिया नाम के एक विशाल छाते से कोई लेना-देना है, और न ही केरल की किसी नाव से, हम सिर्फ अखबारों की फिक्र करते हैं कि इसे आज प्रचलित दूसरे कई किस्म के तथाकथित मीडिया के साथ एक नाव पर सवार नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह मुमकिन नहीं है। अखबार की तकनीक अलग है, उसकी सीमाएं अलग हैं, और उसकी पहुंच और क्षमता भी अलग हैं। ऐसे में उसे किसी दूसरी तकनीक पर आधारित, किसी दूसरे किस्म के समाचार-विचार के माध्यम के साथ एक नाव पर नाविक नहीं बनाना चाहिए। खासकर ऐसी नाव पर जिस पर दूसरे नाविकों की प्राथमिकताएं पानी में चप्पू चलाने के बजाय उसी चप्पू से दूसरों का सिर तोडऩे की हो, उसी चप्पू को रंग में डुबाकर दीवार पर गालियां लिखने की हो, ऐसे चप्पूबाजों के साथ किसी गंभीर नाविक को एक नाव चलाने का काम नहीं करना चाहिए। इसीलिए हम पहले भी कई बार ऐसे ही बदसलूकी की शिकायतों के मौकों पर कह चुके हैं, लिख चुके हैं कि प्रेस को, यानी अखबारों को मीडिया नाम के विशाल छतरी के साए से बाहर आकर प्रेस नाम की अपनी पुरानी छतरीतले काम करने चाहिए। आज भी देश के जिन आंदोलनों में आंदोलनकारियों की हिकारत और नफरत जिन तथाकथित मीडियाकर्मियों पर उतरती है, उनमें कोई भी अखबार वाले नहीं रहते। मतलब यही है कि अखबार जो कि अपना छपा हुआ सुबूत छोड़ जाते हैं, वे नफरत के शिकार नहीं होते। और जो टीवी समाचार चैनल नफरत के शिकार होते हैं, उनमें से अधिकतर, या तकरीबन सभी को अंदोलनकारियों से परे भी आम जनता जहरीला मानने लगी है। यही वजह है कि आज यूट्यूब, और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर ऑडियो-विजुअल माध्यम लेकर नए-नए अकेले लोग काम कर रहे हैं, शोहरत भी पा रहे हैं, वाहवाही भी पा रहे हैं, और उनमें से कई लोग ठीक-ठाक कमाई भी कर रहे हैं। इसी से साबित होता है कि कैमरा और माइक्रोफोन कोई खराब औजार नहीं है, उन्हीं से अच्छा काम भी हो रहा है, भरोसेमंद काम भी हो रहा है, देश में नफरत को घटाने की कोशिश भी हो रही है, ये एक अलग बात है कि भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने से लीक होती मिक गैस की तरह चौबीसों घंटे में हवा में जहर घोलने वाले बहुत से टीवी चैनलों की फैलाई नफरत का पूरा मुकाबला यूट्यूबर नहीं कर पाते। अब जब अरबों के कारोबार अपनी पूरी ताकत से नफरत की दुकान चला रहे हों, तब छोटे-छोटे फेरीवाले, और खोमचेवाले उनका पूरा मुकाबला नहीं कर सकते, लेकिन इस देश में ऐसे छोटे, और कम खर्चीले नए-नए माध्यम एक बहुत विश्वसनीय, और सकारात्मक माध्यम बनकर सामने आए हैं।
लोकतंत्र की सेहत के लिए यह एक अच्छी बात है कि कोई न कोई लोकतांत्रिक, और सकारात्मक माध्यम समाज को उपलब्ध है, और जहरीले चेहरे, गले, दिमाग, और आवाज की शिनाख्त अब लगातार बढ़ती चल रही है, और गली-गली में उन्हें धक्के खाने की नौबत भी आ रही है। जिन लोगों को इन धक्कों को मीडिया पर हमला करार देना हो, वे जरूर देते रहें, हम अब मीडिया की जुबान में अपने आपको शामिल नहीं करते, और हम पुरानी फैशन के, पुरानी विचारधारा के प्रेस में ही अपने को गिनते हैं, इसलिए धक्के खाने वाले लोगों के बारे में हम यह नहीं कहते कि प्रेस धक्का खा रही है। हकीकत भी यही है कि इस लोकतंत्र में प्रेस धक्के नहीं खा रही है। बल्कि प्रेस को धक्के खाने लायक काम करने वाले लोगों के साथ एक छतरीतले रहना भी नहीं चाहिए। उनका काम अलग है, अखबारों को अपनी आज भी खासी बची हुई विश्वसनीयता और साख के साथ अपना काम जारी रखना चाहिए, यह कम आकर्षक हो सकता है, लेकिन इतिहास में यह अच्छा दर्ज होगा।
एक जिम्मेदार लोकतंत्र असहमति के बाद भी आंदोलनों से सीखता है
24 जुलाई 2026
जंतर-मंतर अपने नाम से ही कुछ रहस्यमय किस्म की चीज या जगह लगती है। ऐसा लगता है कि किसी मंत्र पढऩे की जगह होगी। आज वहां बीते एक दशक से अधिक वक्त का सबसे बड़ा मंत्र पढ़ा जा रहा है। छात्र, नौजवान, बेरोजगार तो वहां पर तिलचट्टे बनकर दसियों हजार की संख्या में इकट्ठे हैं, या पहुंचते जा रहे हैं, आ-जा रहे हैं। उनसे परे भी उनके परिवारों के लोग, और दूसरे बहुत से ऐसे बुजुर्ग लोग भी वहां पहुंच रहे हैं जो इस धारणा से सहमत हैं कि इस देश में छात्रों और बेरोजगारों के साथ बेइंसाफी और बेइमानी हो रही है। एक अपार, अभूतपूर्व, और असाधारण जनसमर्थन का सैलाब इन आंदोलनकारियों के पक्ष में जुट गया है। यह पूरा जनसैलाब अब न तो बीती रात आधी रात तक अनशन कर रहे लद्दाखी सामाजिक आंदोलनकारी सोनम वांगचुक का मोहताज रह गया, और न ही कॉकरोच जनता पार्टी लाँच करने वाले अभिजीत दीपके का। कॉकरोच जनता पार्टी वैसे भी कोई पार्टी नहीं थी, वह तो भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ नौजवानों का व्यंग्यात्मक विद्रोह था जो कि आज पिछले एक दशक के सबसे बड़े आंदोलन की शक्ल लेते दिख रहा है। दिल्ली सरहद पर किसानों का आंदोलन संगठित, गठा हुआ, एक जगह सीमित आंदोलन था, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन अपने नाम और मिजाज के मुताबिक देश की हर नाली-गली तक पहुंच गया है। कई प्रदेशों में दर्जनों शहरों में तिलचट्टा-आंदोलन का विस्तार हो रहा है, और कल मुम्बई में एक पुलिस लॉरी जो कि शायद आंदोलनकारियों को ले जा रही थी, उसे सामने खड़े होकर बलपूर्वक रोकती हुई एक आधुनिक मॉडल युवती की जो तस्वीर सामने आई है, वह चीन में थ्यानमान चौक पर टैंकों के सामने खड़े एक युवक की याद दिलाता है। और कल से सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर इस युवती का यह फोटो ट्रेंड कर रहा है। हम इस आंदोलन पर पिछले हफ्ते में दो-चार लिख और बोल चुके हैं, इसलिए आज इसके पीछे की वजहों, इस आंदोलन के वक्त देश की लोकतांत्रिक स्थितियों, और किसी भी जिम्मेदार लोकतंत्र में ऐसी नौबत के समाधान को लेकर बात करना चाहते हैं।
बीते कई महीनों से देश में नीट इम्तिहान, और दूसरे दाखिला या नौकरी इम्तिहानों के भ्रष्टाचार को लेकर छात्र और नौजवान पीढ़ी, और बहुत हद तक उनके लिए जिम्मेदार उनके माँ-बाप भी बहुत विचलित चले आ रहे थे। लेकिन केन्द्र सरकार की कार्रवाई बहुत ही सीमित थी, और ऐसा लगता है कि सरकार को अभी कुछ हफ्ते पहले तक यह लगा ही नहीं था कि निराश और नाराज छात्रों की कोई ऐसी एकजुटता हो सकती है। यही वजह रही कि सरकार के लोग, सत्तारूढ़ पार्टी के लोग, और उनके दरबारी चारण और भाट लगातार छात्र-छात्राओं को गद्दार, देशद्रोही, विदेशी फंड पाने वाले, और टुकड़े-टुकड़े गैंग करार देते रहे। अभी दो दिन पहले एक राजकीय गीतकार ने भी कुछ ऐसी ही जुबान में आंदोलनकारियों के खिलाफ पोस्ट किया है। एक तरफ तो सरकार एक बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती झेल रही है, दूसरी तरफ उसकी तरफ से बोलने वाले लोग आज भी मौके की नजाकत को समझ नहीं पा रहे हैं। बीती आधी रात के करीब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छात्रों से कुछ अपील का एक सेल्फी वीडियो जारी किया जो कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अपने किस्म की पहली कार्रवाई थी। आज देश भर में कई शहरों में कॉकरोच-आंदोलन की घोषणा की गई है, संसद के भीतर और बाहर, सडक़ और प्रधानमंत्री निवास पर विपक्ष ने राहुल गांधी की अगुवाई में एक असाधारण विरोध-प्रदर्शन किया है, और सरकार को बुरी तरह से घेरा है। ऐसा लगता है कि सरकार ने देश की बेचैन होती जनभावनाओं को समझने में महीनों की देर कर दी, और इसीलिए आधी रात की रील की जरूरत पड़ रही है। फिर भी हम सरकार के लिए कोई असुविधा पैदा करने की, या कि मौजूदा असुविधा को बढ़ाने की नीयत नहीं रखते। हमारा मानना है कि सरकार हो, विपक्ष, या कोई और आंदोलनकारी, लोकतंत्र में हर किसी को अपनी गलतियां सुधारने का मौका मिलना चाहिए, और आज शायद मोदी सरकार उसी का इस्तेमाल कर रही है। फिर भी इस मौके पर हमें दुनिया के बहुत से महान लोगों की अलग-अलग वक्त पर कही गई कई बातें याद पड़ती हैं, जो हमारे विचारों के मुकाबले भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण और वजनदार हैं, इसलिए हम उन्हें यहां पर लिख रहे हैं, ताकि यह बात सनद रहे, और भारतीय लोकतंत्र के लिए सबक रहे।
20वीं सदी के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दार्शनिक हन्ना अरेन्ट ने लिखा था कि नागरिक अवज्ञा तब जन्म लेती है, जब बड़ी संख्या में नागरिक यह मानने लगते हैं कि बदलाव के सामान्य रास्ते काम नहीं कर रहे हैं, और उनकी शिकायतें न तो सुनी जाएंगी, न उन पर कार्रवाई होगी। गांधी ने लिखा था असहयोग अनुशासन और त्याग का उपाय है, और यह विरोधी विचारों के सम्मान की भी मांग करता है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर की विख्यात लाईन है- दंगा उन लोगों की भाषा है जिन्हें सुना नहीं गया। जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा था- लोकतंत्र की परीक्षा चुनाव के दिन नहीं होती, उस दिन होती है जब उसके खिलाफ नारे लग रहे हों। नेल्सन मंडेला ने लिखा था- किसी समाज का चरित्र इस बात से पहचाना जाता है कि वह अपने सबसे कमजोर, और सबसे असहमत नागरिकों के साथ कैसा बर्ताव करता है। एक बात को बहुत से अलग-अलग विचारकों ने लिखा और कहा है- अहिंसक विरोध लोकतंत्र की विफलता नहीं, बल्कि उसकी एक अनिवार्य विशेषज्ञता है। कुछ ्और लोगों ने लिखा है- लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यही नहीं है कि सरकारें हर बार सही होती हैं। उसका सबसे बड़ा सौंदर्य यह है कि नागरिक बिना डर के यह कह सकते हैं कि सरकार गलत है। किसी और ने लिखा है- जब हजारों नौजवान सडक़ों पर उतर आएं, तो जिम्मेदार लोकतंत्र का पहला कर्तव्य उन्हें हराना नहीं, उन्हें सुनना होता है। अमरीका के एक शुरूआती राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने लिखा था- कभी-कभार होने वाला विरोध किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। गांधी, मार्टिन लूथर किंग, और नेल्सन मंडेला, इन तीनों ने हेनरी डेविड थोरो से कई तरह की प्रेरणा ली थी। थोरो ने लिखा था- जिस सरकार में किसी बेकसूर को जेल जाना पड़े, वहां एक इंसाफपसंद इंसान की जगह भी जेल ही है। गांधी ने लिखा था- जब समय बोलने की मांग करे, तब चुप रहना कायरता है। जॉन एफ केनेडी ने लिखा था- जो लोग शांतिपूर्ण परिवर्तन को असंभव बना देते हैं, वे हिंसक परिवर्तन को अनिवार्य बना देते हैं। एक चेक राष्ट्रपति की एक किताब का सार था कि आम लोगों की सामूहिक नैतिक शक्ति राज्य की संस्थागत शक्ति से बड़ी हो सकती है। अमत्र्य सेन ने लिखा था- लोकतंत्र सिर्फ मतदान नहीं है, वह सामाजिक तर्क-वितर्क भी है। राममनोहर लोहिया ने लिखा था- जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं। जस्टिस डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने लिखा था- कि असहमति ही लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है। (कुकर का सेफ्टी वॉल्व प्रेशर बढऩे पर कुकर को फटने से बचाता है)।
इसलिए हम इन तमाम बातों को गिनाते हुए यह कहना चाहेंगे कि एक जिम्मेदार लोकतंत्र अपने नौजवानों को हराने की कोशिश नहीं करता, वह उन्हें सुनता है, उनसे बहस करता है, उनसे असहमत भी होता है, लेकिन कभी-कभी उनसे सीखता भी है।
अपने ही शब्दों के घातक असर से कोई सबक नहीं!
23 जुलाई 2026
अभी जब दिल्ली हाईकोर्ट से निराशा मिलने के बाद जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनरतले एक व्यापक जनआंदोलन कर रहे छात्रों और नौजवानों के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की कि प्रदर्शनकारियों की पुलिस बुरी तरह पिटाई कर रही है, इसके वीडियो सुबूत मौजूद हैं, अगर अदालत चाहे तो वे सुबूत दिखाए जा सकते हैं, तो इस पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस अपील को सिरे से खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की, और कहा अपना समय बर्बाद मत कीजिए, और हमारा समय भी बर्बाद मत कीजिए। उन्होंने कहा कि हमें वीडियो में दिलचस्पी नहीं है, हमारे पास देखने का समय नहीं है। यह बात याद रखने की है कि यह आंदोलन नीट जैसी दाखिला इम्तिहान के पेपर आऊट के खिलाफ किया जा रहा है, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का यह नाम तो जस्टिस सूर्यकांत की ही एक टिप्पणी से उपजा हुआ है। उन्होंने 15 मई को एक अलग मामले की सुनवाई करते हुए कहा था- ‘समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं। कुछ युवा ऐसे हैं जो रोजगार नहीं मिलने, और पेशे में जगह न बना पाने के कारण कॉकरोच की तरह हर जगह फैल जाते हैं।’ जब इस टिप्पणी की बहुत आलोचना हुई तो उन्होंने सफाई दी और कहा कि उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया।
अब हम दिल्ली में छात्रों के शांतिपूर्ण और अहिंसक, लोकतांत्रिक और जायज, और पूरी तरह से गैरराजनीतिक आंदोलन पर खुली पुलिस गुंडागर्दी को देखते हुए जब इन्हीं जस्टिस सूर्यकांत का यह ताजा रूख देखते हैं, तो हैरानी होती है कि दो महीने पहले के अपने शब्दों से उपजे इस आंदोलन की याचिका अदालत पहुंचने पर एक बार फिर उन्होंने संवेदनाशून्य शब्दों का इस्तेमाल किया है। जब सोशल मीडिया, और मीडिया का कुछ हिस्सा ऐसे वीडियो से भरा हुआ है जिसमें पुलिस बिना वर्दी के मुंह पर कपड़ा बांधे सिर पर हेलमेट लगाए, पुलिसिया प्लास्टिक-लाठी चलाते हुए निहत्थे छात्रों और नौजवानों को बुरी तरह पीट रही है, पुलिस का एक बड़ा अफसर मार खाकर निकलती हुई एक निहत्थी युवती के पिछवाड़े में लाठी ठूंसते हुए दिख रहा है, जब निहत्थी छात्राओं को घेरकर लाठियों से पीटा जा रहा है, तब दिल्ली हाईकोर्ट जाने पर वह भी तिलचट्टों की बात सुनने से इंकार कर दे रहा है, और उसके इंकार के पीछे की वजहों को समझा जा सकता है। फिर जब यही मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचता है, और बेतहाशा पुलिस हिंसा के खिलाफ अदालत का ध्यान खींचा जाता है, तो मुख्य न्यायाधीश इसे अपने समय की बर्बादी कहते हैं, और वकील को सुझाते हैं कि वह भी अपना समय बर्बाद न करे। वे कहते हैं कि उन्हें वीडियो में दिलचस्पी नहीं है, उनके पास देखने का समय नहीं है। आज उन्हीं के शब्दों से आहत युवा पीढ़ी कॉकरोच बनकर जंतर-मंतर पर पूरी तरह लोकतांत्रिक आंदोलन कर रही है, और पुलिस घोषित और जाहिर तौर पर हिंसा कर रही है, तो चीफ जस्टिस के पास न समय है, न इस हिंसा के वीडियो-सुबूत देखने में उनकी दिलचस्पी है। यह देखकर हमारे जैसे हक्का-बक्का हुए लोग दो महीने पहले के उनके शब्द, और आज के उनके शब्द एक साथ रखकर देखने पर मजबूर हैं।
आज जब एमनेस्टी इंटरनेशनल, और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इस आंदोलन पर पुलिस जुल्म के खिलाफ बयान जारी कर रहे हैं, जब दुनिया के अलग-अलग देशों में बिखरे हुए प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान इस आंदोलन को जायज ठहरा रहे हैं, और पुलिस कार्रवाई को पूरी तरह नाजायज, तो उस वक्त उसी शहर में कुछ किलोमीटर दूर बसा हुआ सुप्रीम कोर्ट इस मामले को देखने-सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता। कोई हैरानी नहीं है कि उसके पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी तिलचट्टों को सुनने से इंकार कर दिया था। हम इस एक जैसी बेरूखी को समझ रहे हैं, लेकिन क्या इससे न्यायपालिका के इतिहास में इन जजों का यह रूख सम्मान के साथ दर्ज होगा? छात्रों और नौजवानों के जिस आंदोलन के लिए न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि दुनिया के अलग-अलग देशों से बेचेहरा और बेनाम लोग तरह-तरह के खानपान, टूथपेस्ट-टूथब्रश जैसे कई तरह के सामान का भुगतान करके उन्हें जंतर-मंतर पर डिलीवर करवा रहे हैं, जहां के मार खाए हुए नौजवानों के लिए आसपास की मस्जिदों और गुरुद्वारों ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं, और लंगर चला रहे हैं, जहां भूखे पेट और मुंह से कई गुना अधिक खानपान लोग ला-लाकर छोड़ रहे हैं, देश की उस हवा से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के एयरकंडीशंड कोर्टरूम अपने-आपको अछूता रख रहे हैं। हम न्यायपालिका को किसी नाजायज हवा से प्रभावित होने नहीं कह रहे, लेकिन उसी के शब्दों से आहत पूरी नौजवान पीढ़ी के इस तरह विचलित होने को देखने को जरूर कह रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश लोकतंत्र के तीन में से एक स्तंभ के सबसे अधिक ताकतवर व्यक्ति होते हैं, वे कुछ भी कह सकते हैं, वे कुछ भी कर सकते हैं। इसी सुप्रीम कोर्ट का यह इतिहास रहा है कि 2020 में जब अर्नब गोस्वामी नाम के एक नफरती टीवी जर्नलिस्ट की अंतरिम जमानत अर्जी बाम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की थी, तो सुप्रीम कोर्ट ने आनन-फानन अगले ही दिन, मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में अवकाशकालीन बेंच ने तुरंत सुनवाई की थी, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर लंबा फलसफा लिखते हुए अंतरिम जमानत दी थी। एक दूसरा केस याद पड़ता है जिसमें 2022 में पैगम्बर मोहम्मद पर टिप्पणी करने वाली नुपूर शर्मा की अर्जी पर अवकाशकालीन बेंच ने तुरंत सुनवाई करते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। और सबसे ही दिलचस्प मामला तो अपने वक्त के मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगोई का था जिन पर सुप्रीम कोर्ट की ही एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया था, और 20 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट बंद रहने के बावजूद अचानक एक ‘अत्यंत सार्वजनिक महत्व की विशेष बेंच’ का गठन किया गया, गोगोई ने खुद इस बेंच की अध्यक्षता की, और आरोपों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताया। जिस पर यौन शोषण के आरोप लगे थे, जिसे कटघरे में होना था, वह खुद जज बनकर बैठा था, और उसके साथ दो दूसरे जज भी बैठे थे। एक हैरतअंगेज बात यह थी कि यौन शोषण के आरोपों के इस मामले को इसी सुप्रीम कोर्ट ने इस आरोप के साथ सुनवाई के लिए दर्ज नहीं किया, बल्कि इस केस का नाम रखा गया- ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े अत्यंत सार्वजनिक महत्व के विषय’। इसे न्यायपालिका को अस्थिर करने की बड़ी साजिश बताया गया था।
जिस सुप्रीम कोर्ट का अपना आचरण हाल के बरसों में इस तरह का रहा है, जिसके अभी हाल के एक मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ अपने घर की गणेश पूजा को लेकर राजनीतिक आरोपों से घिरे थे, उस सुप्रीम कोर्ट के पास आज देश की राजधानी में निहत्थे और शांतिपूर्ण दसियों हजार नौजवानों पर गैरकानूनी तरीकों से पुलिस के हमले को सुनने और देखने का न समय है, न दिलचस्पी। देश में कॉकरोचों को मारने वाली फैक्ट्रियों का कुल उत्पादन मिलाकर भी कॉकरोचों की इस नई पीढ़ी को नहीं मार पाएगा। और ऐसे कारखाने चाहे किसी लोकतांत्रिक संस्था या स्तंभ की शक्ल में ही क्यों न हों, उनके हमलों से भी ये कॉकरोच अपनी लोकतांत्रिक प्रतिरोधक क्षमता से बच जाएंगे। अपनी एयरकंडीशंड मीनारों में बैठे लोग अपनी फिक्र करें।
जंतर-मंतर पर पहुंचता गुमनाम-बेचेहरा समर्थन एक असाधारण बात...
22 जुलाई 2026
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का शुरू किया हुआ, सामाजिक कार्यकर्ता, और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक का आगे बढ़ाया हुआ, और अब नौजवान और छात्र पीढ़ी की भारी मौजूदगी वाला आंदोलन किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी असुविधा हो सकता है। अगर केन्द्र की मोदी सरकार इसे असुविधा मान ले, और बिना अधिक देर किए हुए आंदोलन के लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू करे, तो यह सरकार के लिए ही असुविधा के अंतहीन विस्तार से बचने का जरिया हो सकता है। आमतौर पर किसी भी लोकतंत्र में आम लोगों तक पहुंच चुका कोई आंदोलन सत्ता के लिए असुविधा रहता ही है। फिर उसमें असंगठित आम लोग जितने अधिक जुड़ते हैं, असुविधा उसी अनुपात में बढ़ती चलती है। जंतर-मंतर पर कोई संगठन अब आंदोलन का इंचार्ज नहीं रह गया, उसका कोई नेता भी नहीं रह गया, कॉकरोच जनता पार्टी कोई पार्टी भी नहीं है, लेकिन जंतर-मंतर पर अगर कुछ है, तो वह बेचेहरा आंदोलनकारियों के हाथ एक जायज मुद्दा है, इम्तिहानों में गड़बड़ी का। इसके अलावा वहां पर एक ऐसी भीड़ है जो लाठियों से डर नहीं रही है। अनजाने लोग इस धरनास्थल पर खाना पहुंचा रहे हैं, पानी पहुंचा रहे हैं। खाना डिलीवर करने वाले बहुत से लोगों को भुगतान के साथ ऑर्डर मिल रहा है कि जंतर-मंतर पर किसी को भी डिलीवर कर दो। लोग गाडिय़ों में भर-भरकर पानी की बोतलें ला रहे हैं। बिना किसी भी संगठन के, और नेता के इस तरह का आंदोलन जनता से जैसा स्वस्फूर्त समर्थन पाते दिख रहा है, वह सरकार के लिए दिक्कत की बात होनी चाहिए, अगर सरकार को ऐसी दिक्कत का अहसास हो तो।
हमने बीते हफ्ते में एक-दो बार और भी लिखा था कि सरकार को किसी भी शांतिपूर्ण-लोकतांत्रिक आंदोलन से उनकी जायज मांगों पर जरूर ही बात करनी चाहिए। लोकतंत्र में तो शांतिविहीन और अलोकतांत्रिक आंदोलनों से भी उनकी नाजायज मांगों पर भी बात करने की परंपरा दुनिया के तमाम लोकतंत्रों में है। हमने छत्तीसगढ़ के बस्तर की मिसाल भी दी थी कि वहां किस तरह नक्सलियों से स्थानीय पत्रकारों के माध्यम से सरकार ने बात की ही थी, और वह सफल भी रही। भारत का इतिहास बताता है कि पंजाब में राज्यपाल बनाए गए अर्जुन सिंह ने एक शांति समझौता करने में कामयाबी पाई थी। उत्तर-पूर्व में बहुत सारे उग्रवादी समूहों से भारत सरकार ने समय-समय पर बात की ही है। और ये तो इस देश के शांतिपूर्ण छात्र और नौजवान हैं जो कि दाखिला इम्तिहानों के भ्रष्टाचार से सदमे में आए हुए निराश हैं, और उनकी निराशा पर इस देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने नमक रगडऩे का काम किया, जब उन्होंने बिना किसी प्रसंग के अदालत में एक निहायत गैरजरूरी, और नाजायज जुबानी टिप्पणी की, और इस पीढ़ी को कॉकरोच कहा। वैसे तो कॉकरोच को हम बहुत अपमान के लायक नहीं पाते, क्योंकि कॉकरोच गरीब जनता के पैसों पर अमीरों के अंदाज में राजशाही के सुख नहीं भोगते, कॉकरोच जहां जाते हैं, वहां पर स्थानीय शासन-प्रशासन को एक वीवीआईपी-दहशत में नहीं डालते, किसी प्रोटोकॉल की मांग नहीं करते। फिर भी दुनिया भर में तिलचट्टों को गैरजरूरी माना जाता है, और उन्हें मार डालना इंसान के घरों की साफ-सफाई और सेहत के लिए जरूरी माना जाता है। अब सवाल यह है कि बेरोजगारों से भरे हुए इस देश में मुख्य न्यायाधीश बिना किसी उकसावे और भडक़ावे के अगर किसी पीढ़ी को, करोड़ों नौजवानों को तिलचट्टा कह रहा है, तो उसका मतलब तो यही है कि वे तिलचट्टों जितने ही गैरजरूरी हैं। आज ऐसे दसियों हजार तिलचट्टों ने जंतर-मंतर पर लाठियां खाते हुए यह साबित किया है कि उन्हें बाजार से कोई स्प्रे खरीदकर नहीं मारा जा सकता, उन्हें बिना नाम और बिना वर्दी वाले लठैत तैनात करके भी नहीं मारा जा सकता। वे वीडियो हिला देते हैं जिनमें पुलिसवालों को और लाठियां मारने की चुनौती देते हुए एक नौजवान खुली सडक़ के बीच निहत्थे खड़ा हुआ है, और लाठियों के वार से किसी भी इंसान के, जानवर के बदन में पैदा होने वाले दर्द के अहसास से भी मानो वह ऊपर हो गया है। जब किसी नौजवान पीढ़ी को लाठियों की मार का अहसास भी न हो, तो उसे डराना, दबाना, कुचलना नामुमकिन सा रहता है।
हम कल दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसे लेकर कोई भविष्यवाणी करना नहीं चाहते। हो सकता है कि यह आंदोलन खुद होकर एक धीमी मौत हासिल कर ले, और यह भी हो सकता है कि यह किसान आंदोलन की तरह महीनों तक चले, और बढ़ते चले जाए। कुछ खबरें विचलित करती हैं कि किस तरह सिक्ख समाज जंतर-मंतर के हजारों, दसियों हजार आंदोलनकारियों को खाना-पानी पहुंचाने में जुट गया है, एक खबर यह भी कहती है कि घायलों के लिए गुरुद्वारा खोल दिया गया है। ये दोनों ही काम किसी भी जिम्मेदार जात या धरम के संगठन के लिए लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के हैं। ये आंदोलनकारी देशविरोधी नहीं हैं कि उन्हें खिलाना देश के खिलाफ हो। ये छात्र और नौजवान अपने आंदोलन को बिना किसी राजनीतिक समर्थन के खुद चला रहे हैं, इसलिए कोई सत्तारूढ़ पार्टी भी, सरकार भी इन पर राजनीति करने की तोहमत नहीं लगा सकतीं। कांग्रेस अपना आंदोलन इसी मुद्दे को लेकर अलग चला रही है। आम आदमी पार्टी तिलचट्टे को देखकर उसी तरह दहशत में दिख रही है, जिस तरह कई घरों में कुछ लोगों को तिलचट्टों से दहशत रहती है, और वे उन्हें देखते ही कूदकर पलंग या टेबिल पर चढ़ जाते हैं। आम आदमी पार्टी के आमतौर पर समझदारी की बातें करने वाले सांसद संजय सिंह ने एक भयानक ही गैरजिम्मेदारी का, और अपनी ही खिल्ली उड़ाता बयान दिया है। संजय सिंह का कहना है कि कॉकरोच-धरना कमजोर करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी को अपने निवास पर धरने पर बिठा दिया है। उन्होंने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया है कि वह कॉकरोच-आंदोलन को कमजोर करना चाहती है। आम आदमी पार्टी अभी यह समझ नहीं पा रही है कि वह दिल्ली की सडक़ों पर बढ़ते हुए कॉकरोचों के बीच किस तरफ पांव धरे, किस तरफ जाए। लेकिन इस दहशत और असमंजस में वह मोदी और राहुल पर किसी मिलीजुली साजिश की तोहमत लगाकर अपनी रही-सही साख और खत्म कर रही है। लेकिन आम आदमी पार्टी हमारी आज की बातचीत का मुद्दा नहीं है। कांग्रेस या राहुल गांधी भी कल की गिरफ्तारी के बावजूद हमारा मुद्दा नहीं हैं। हमारा मुद्दा जंतर-मंतर पर चल रहा एक ऐसा आंदोलन है जो अब तिलचट्टों का भी नहीं रह गया, उसमें अब देश के मक्खी, मच्छर, छिपकली, मकड़ी, सभी शामिल हो गए हैं। यह नौबत किसी भी जिम्मेदार लोकतंत्र के लिए फिक्र खड़ी करती है, अब इस नौबत को कौन गंभीर मानते हैं, और कौन नहीं, हम इस पर नहीं जा सकते।
जंतर-मंतर का यह आंदोलन जब तक भी चले, तब तक वह शांतिपूर्ण बना रहे, यह हमारी सबसे बड़ी हसरत है, और यही इस आंदोलन की लाईफलाईन है। आम लोग, न सिर्फ छात्र और नौजवान पीढ़ी, बल्कि बाकी लोग भी जिस तरह इस आंदोलन के साथ शांतिपूर्ण तरीके से जुड़े हैं, वह असाधारण और अभूतपूर्व है। देश में छात्रों से जुड़े हुए मुद्दे सचमुच ही बहुत गंभीर हैं। हम सिर्फ नीट इम्तिहान की बात नहीं कर रहे, छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस सरकार के नियुक्त किए गए लोगों ने पीएससी में जो घोटाला किया था, वह नीट से भी और भयानक था, यह एक अलग बात है कि कांग्रेस के खिलाफ छत्तीसगढ़ में प्रदर्शन कर रही भाजपा को भी आज यह मुद्दा याद नहीं पड़ रहा है। देश के कई राज्यों में दाखिला, और नौकरी के इम्तिहानों में जिस तरह के संगठित भ्रष्टाचार के मामले पकड़ाए हैं, उनसे देश की नौजवान, छात्र, बेरोजगार पीढ़ी में आत्मघाती निराशा हो जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश में व्यापमं का ऐतिहासिक-बेमिसाल घोटाला, राजस्थान के कई इम्तिहानों में लगातार ऐसे घोटाले कि इम्तिहान के दिन पूरे-पूरे शहरों के इंटरनेट बंद कर दिए जाते हैं। ऐसी निराशा से घिरी हुई नौजवान पीढ़ी से बात करने में अगर देश-प्रदेश की सरकारें देर करेंगी, परहेज करेंगी, तो वे अपना ही बड़ा नुकसान करेंगी। जंतर-मंतर के आंदोलन को बेनाम और बेचेहरा जनता की तरफ से प्रचार की किसी हसरत के बिना जो समर्थन दिया जा रहा है, उस खतरे की घंटी को जो सरकार न सुने, वह पानी सिर तक पहुंच जाने पर जरूर ही खतरे का घंटा सुनेगी। लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता रास्ता रहता है, जिनके साथ किसी किनारे पहुंचने की कोई भी उम्मीद न हों, उनसे भी बातचीत करनी ही चाहिए, लेकिन जब तक कोई सरकार में नहीं पहुंच जाते, तब तक वे हमारी इस बात से सहमत रहते हैं, वहां पहुंचने के बाद उन्हें बातचीत गैरजरूरी लगने लगती है।
दिल्ली में ऐतिहासिक कॉकरोच आंदोलन और उसका एक पोस्टमार्टम
21 जुलाई 2026
दिल्ली में कल का दिन एक बहुत ही जटिल लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन का दिन रहा। पिछले कुछ हफ्तों से वहां कॉकरोच जनता पार्टी और लद्दाख के पर्यावरण सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जंतर-मंतर पर एक अनशन-आंदोलन चला रहे थे। सोनम की हालत लगातार गिरने के बाद उन्हें पुलिस ने अस्पताल ले जाकर भर्ती किया, और दूसरी तरफ पहले की घोषणा के मुताबिक कल सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन आंदोलनकारियों ने संसद चलो मार्च का आव्हान किया था, जिसमें दसियों हजार प्रदर्शनकारी जुटे। जैसा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन में होता है, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को छोटी-बड़ी चोटें आईं, और कई पुलिसवाले भी घायल हुए। कुल मिलाकर लठैती जैसी हिंसा, कुछ पथराव, और कुछ आंसू गैस के साथ कल का दिन किसी तरह निपट गया। कल जिस वक्त सडक़ों पर यह प्रदर्शन चल ही रहा था, कॉकरोच पार्टी के दो नेता सरकार से बातचीत करने के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी.नड्डा के पास पहुंचे थे, और काफी लंबी बातचीत के बाद एक मांग पत्र देकर वे लौटे हैं। यह बात भी कुछ अटपटी थी कि जब प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, और आलोचना के घेरे में घिरे शिक्षामंत्री, ये सभी दिल्ली में थे, तो स्वास्थ्य मंत्री क्यों बात कर रहे थे? इस आंदोलन का कोई भी हिस्सा स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़ा हुआ तो नहीं था। खैर, सरकार किसी भी मोर्चे पर अपने किसी भी चेहरे को सामने कर सकती है, उससे इस बात पर फर्क नहीं पड़ता कि जिस वक्त सडक़ों पर खुद होकर भी पहुंचे हुए हजारों छात्र और नौजवान पुलिस की लाठियां खा रहे थे, लहू गंवा रहे थे, तब आंदोलन के नेता न तो मोर्चे पर मौजूद थे, और न ही उन्होंने प्रदर्शनकारियों को पहले से भरोसे में लिया था कि वे सरकार से बात करने जा रहे हैं।
यह आंदोलन थोड़ा सा अटपटा है। इसकी शुरूआत नीट इम्तिहान के पर्चे आऊट होने से हुई थी, और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक लापरवाह जुबानी टिप्पणी के जवाब में सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी बनी। यह कोई राजनीतिक दल न होकर सिर्फ एक मंच है, लेकिन इसने हिन्दुस्तान की इम्तिहानों की गड़बडिय़ों से थके हुए लोगों के साथ-साथ बेरोजगारों को भी अपनी ओर खींच लिया, और कल का दिल्ली का प्रदर्शन देखें तो दुनिया भर में जिस पीढ़ी को जेन (जनरेशन)-जी कहा जाता है, वह पीढ़ी इस आंदोलन में शरीक थी, और लाठियों के जख्मों से बेपरवाह भी थी। पिछले कुछ हफ्तों से जंतर-मंतर पर चल रहे इस आंदोलन का कोई ठोस ढांचा अब तक नहीं बन पाया है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक, अमरीका में पढ़ रहे भारतवंशी छात्र अभिजीत दीपके के भारत आकर यह आंदोलन शुरू करने पर उससे सोनम वांगचुक जैसे जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता जुड़ गए, और किसी भी दूसरे अनशनकारी के बिना वे अकेले ही बेमुद्दत अनशन पर बैठ गए। बीस दिन में करीब 10 किलो वजन गंवाकर वे कुछ खतरे में दिख रहे थे, और सरकार ने, चाहे बहुत ही अटपटे तरीके से चादरों का घेरा डालकर, उन्हें अस्पताल पहुंचाया। अब अस्पताल से सोनम वांगचुक जो बातें कह रहे हैं, वे अपने आपमें कुछ विरोधाभासी हैं। उनका अनशन जारी है, या उन्होंने तोड़ दिया है, या वे किन शर्तों पर तोड़ेंगे, यह सब धुंध में घिरा है। दूसरी तरफ यह बात अपने आपमें विरोधाभासों से घिरी हुई है कि इतने हफ्तों में न सरकार ने इनसे बातचीत की सोची, न ही कॉकरोचों ने। कल जब संसद शुरू हो रही है, जब प्रदर्शन-जुलूस संसद तक जाने वाला है, उसी दिन सुबह 6 बजे से बातचीत की गहमागहमी शुरू होती है, और संसद के चलते-चलते वह दोपहर को केन्द्रीय मंत्री नड्डा के घर पर चलती रहती है।
जैसा कि लोकतंत्र में किसी भी असंगठित आंदोलन के साथ होता है, इस आंदोलन के साथ भी वही चल रहा है। लेकिन केन्द्र सरकार तो एक बहुत ही संगठित संस्था है, वह तो कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर पैदा होने वाला कोई मंच नहीं है, वह तो दशकों से काम करने वाले नेताओं और अफसरों का एक बड़ा संगठन है। ऐसे में देश की राजधानी दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय-चर्चित भारतीय सामाजिक आंदोलनकारी को अनशन से मौत के करीब पहुंचने देना भी बड़ी नासमझी की बात थी, और उससे भी अधिक नासमझी की बात थी इतने हफ्तों तक आंदोलनकारियों से कोई भी बात नहीं करना। उनकी मांगें परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की थी, और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी। ऐसी कई मांगें बातचीत के कुछ दौर गुजर जाने पर कम हो सकती हैं, किसी भी आंदोलन में कम होती ही हैं। ऐसे में सरकार बात न करने पर अड़ी रहकर अपना खुद का भला नहीं कर रही थी। जिन लोगों को भी यह लगता है कि लोकतंत्र में बातचीत की गुंजाइश रहने पर भी सरकार के लिए बातचीत करना जरूरी नहीं रहता, उनकी लोकतंत्र की समझ बड़ी कमजोर रहती है। हमारा तो यह मानना है कि अगर कोई आंदोलनकारी अहिंसक तरीके से, सार्वजनिक रूप से, व्यापक जनहित के लिए कुछ मांगों को उठा रहे हैं, तो वे नापसंद होने पर भी सरकार को उनसे बात करके एक सहमति तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए। दिल्ली का यह सिलसिला बहुत ही अटपटा इसलिए भी रहा कि इस आंदोलन का न कोई चेहरा है, न कोई केन्द्र है, और न इस पर किसी का कोई काबू है। ऐसे में एक जुलूस कब भीड़ में तब्दील हो जाए, कब अहिंसक लोग हिंसा पर उतर आएं, कब भीड़ यह तय कर ले कि किसी बातचीत की जरूरत नहीं है, यह सब सोचना मुश्किल रहता है। यहीं पर आकर एक संगठित राजनीतिक दल, या मजदूर संगठन, या किसी और लोकतांत्रिक संस्था की कमी खलती है जो आंदोलनों के दौर से गुजरे हुए रहते हैं, और जिन्हें किसी मांग को पूरा करवाने के लिए चलने वाले सिलसिले का तजुर्बा रहता है, और मोलभाव, समझौते का अंदाज रहता है। कॉकरोच जनता पार्टी, और सोनम वांगचुक व्यापक जनसमर्थन के बाद भी अपने आंदोलन की मांगों को किसी तर्कसंगत किनारे तक पहुंचाने का अनुभव नहीं रखते।
एक दूसरी बड़ी बात यह कि इस आंदोलन ने अपने आपको गैरराजनीतिक करार दिया, लेकिन आंदोलनकारियों की यह हसरत कभी खत्म नहीं हुई कि राजनीतिक दल, और उनके नेता आकर समर्थन करें। आज सोनम समर्थन और सहानुभूति के केन्द्र में हैं, लेकिन उन्होंने राहुल गांधी से धरनास्थल पर आने की सार्वजनिक उम्मीद जाहिर की, और यह कहा कि अगर वे जंतर-मंतर नहीं आएंगे, तो यह उनका छोटापन होगा। यह बहुत ही अटपटी बात थी क्योंकि अपने को गैरराजनीतिक कहते हुए देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता से इतनी बड़ी उम्मीद करना जायज तो नहीं था। अगर ये आंदोलनकारी देश के विपक्षी नेताओं से समर्थन की उम्मीद करते थे, तो इन्हें तमाम पार्टियों को पत्र लिखकर सहयोग मांगना था, लेकिन यह आंदोलन अपने को गैरराजनीतिक करार देने में लगे रहा। जायज मांगों, नीतियों, और रणनीति के बीच बड़ा फासला होता है। मांगें सही हो सकती हैं, ये ही मांगें देश में कांग्रेस सहित कई विपक्षी पार्टियां कॉकरोच पार्टी के पहले से उठाती आई हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श के बिना उन्हीं मांगों पर एक आंदोलन शुरू करना, और फिर उनके इसमें शामिल न होने पर शिकायत करना कुछ कमअक्ली की बात है। आज भी सोनम वांगचुक का अस्पताल से जो बयान जारी हुआ है, उसमें उन्होंने कहा है कि विभिन्न दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर इस मुद्दे को संसद में उठाने का आश्वासन दें, तो वे अनशन तोड़ेंगे। अब विपक्षी दल तो संसद में इस मुद्दे पर सरकार के साथ पूरी और खुली बहस की मांग लेकर लोकसभा अध्यक्ष से आज ही मिले हैं। संसद में विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से अपने काम कर रहा है, उसके लिए उसे किसी आंदोलनकारी को जाकर अस्पताल में जानकारी या जवाब देने की जरूरत तो है नहीं। इस हिसाब से जंतर-मंतर का इस बार का यह आंदोलन, जो कि कल दिल्ली में पिछले 14 बरस का संसद पर सबसे बड़ा प्रदर्शन भी कहा जा रहा है, वह बिखरी हुई तैयारी, और सोच का आंदोलन है। इसे आंदोलनकारी अपने हिसाब से, और अपने से सहमत वहां पहुंचे भारी जनसमूह के साथ चलाने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन देश के विपक्ष के साथ इस आंदोलन का रिश्ता सिर्फ आंदोलनकारियों की शर्तों से तय नहीं हो सकता, चाहे सरकार से बात करनी हो, चाहे विपक्ष से, एक खुली बातचीत से ही चीजें तय होती हैं। कल सुबह ही आंदोलनकारियों की सरकार से पहली बात शुरू हुई है, और विपक्ष से तो उनकी कोई बात शुरू हुई भी नहीं है। इसलिए आज कॉकरोच-वांगचुक, और बाकी आंदोलनकारी जनता अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करने, या सरकार से कोई समझौता करने के लिए स्वतंत्र हैं, और देश के विपक्षी दल संसद में सरकार से बहस करने के लिए स्वतंत्र हैं। एक ही किस्म की मांगों को लेकर कई किस्म के आंदोलन चल सकते हैं, लोकतंत्र में इन सबको एक साथ जगह देने का लचीलापन रहता है, इसलिए इन दोनों ही पक्षों को एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं रहनी चाहिए। कोई भी दो खेमे हों, उनके बीच सहमति के लिए बातचीत लगती ही है। कॉकरोचों को यह सोचना होगा कि उन्हें विपक्ष के साथ की जरूरत है, या नहीं। फिलहाल विपक्ष से किसी बातचीत के पहले तो वे सरकार से बातचीत करने में लगे हैं, और उसमें भी कोई बुराई नहीं है।









