दीवारों पर लिक्खा है, 31 मई 2025



 

जुर्म के वीडियो देख-देखकर जुर्म से बच नहीं रहे, कर रहे..

 31 मई 2025 

 

कल की दो खबरें ऐसी हैं जिनमें एक बड़ी कंपनी के शोरूम से लाखों के महंगे मोबाइल की चोरी पकड़ाई, और यह पता लगा कि एक बड़े कारोबारी के बेटे ने अपने महंगे शौक पूरे करने के लिए लिए गए कर्ज को चुकाने यह चोरी की थी। चोरी तक तो ठीक था, अब पता यह लगा है कि उसने यूट्यूब पर देख-देखकर इस चोरी का तरीका तय किया, और चोरी के मोबाइल नकली बिल बनाकर लोगों को बेच दिए। अब ऐसे कई लोग गिरफ्तार हो गए हैं। एक दूसरी खबर और भी भयानक है, जिसमें इसी प्रदेश छत्तीसगढ़ में एक महिला के कत्ल में उसका सरकारी इंजीनियर पति गिरफ्तार हुआ, और उसने इंटरनेट पर लगातार यह ढूंढा था कि कत्ल के सुबूत कैसे मिटाए जाएं। इसके साथ-साथ उसने यूट्यूब पर जुर्म के करीब डेढ़ सौ एपिसोड और देखे थे, ताकि कत्ल का तरीका तय कर सके। इसके बाद उसने स्कूल से रोज के वक्त पर लौटती अपनी पत्नी को एक गाड़ी से कुचल डाला, और पहली नजर में यह सडक़ हादसे में मौत लग रही थी। बाद में पत्नी की बहन ने शक जाहिर किया, और जब पति की इंटरनेट सर्च हिस्ट्री देखी गई, तो पता लगा कि वह लंबे समय से बीवी को मारने की तैयारी कर रहा था। उसने यहां तक साजिश तैयार कर ली थी कि कत्ल में उसका हाथ न दिखे, इसलिए किस तरह उसके लोकेशन को फोन कहीं और दिखाता रहे। उसने अपना फोन ड्राइवर और एक सहयोगी के साथ दूर एक जगह, 70 किलोमीटर दूर भेज दिया, और वहां से उन्हें अलग-अलग कॉल करने को कहा ताकि उसकी खुद की मौजूदगी किसी और जगह दिखे। और इस वक्त वह 60 हजार रूपए में भाड़े पर लिए गए हत्यारे के साथ उस गाड़ी में बैठा था जिससे कुचलकर उसने पत्नी को मारा। 

अब अपराध के कार्यक्रमों को देखने के शौकीन कई लोगों को ऐसा लगता है कि वे जुर्म के तरीकों की जानकारी पाकर अपने को खतरों से बचा सकते हैं। हो सकता है उनका सोचना सही हो, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी है कि जुर्म के कार्यक्रम, चाहे वे फिल्मों के हों, या किसी टीवी के, वे लोगों को एक रास्ता भी दिखाते हैं। अभी कल की ही एक दूसरी खबर और भयानक है, जो कि राजधानी रायपुर के बगल की उद्योग नगरी भिलाई की है। वहां पर एक अधेड़ महिला फोन पर झांसा देने वाले ठगों से इतनी दहशत में आ गई कि मनीलॉंड्रिंग और सीबीआई की जांच जैसी धमकियां सुनकर, वह अपने बुजुर्ग मां-बाप के साथ एक महीने तक ठगों के ऑनलाईन कब्जे में डिजिटल अरेस्ट रही, और इन ठगों ने उसे धमकाकर किस्तों में 55 लाख रूपए ठग लिए। उसकी दहशत का हाल यह था कि बैंक ने इस तरह अंधाधुंध रकम निकालने पर इस महिला से पूछा भी कि वह किसी ऑनलाईन ठगी का शिकार तो नहीं है, लेकिन उसने इससे इंकार कर दिया क्योंकि उसे गिरफ्तारी का डर दिखाया गया था। 

अब ठगी का यह मामला दोनों किस्म की जानकारी बताता है। ठग भी हर दिन अखबारों में ऐसे जुर्म की खबरें पढक़र एक नया धंधा पा रहे हैं, दूसरी तरफ लोग भी इसे पढक़र सावधान हो रहे हैं। लेकिन आम लोगों के मुकाबले मुजरिमों की मनोवैज्ञानिक पकड़ अधिक मजबूत रहती है, और वे जानते हैं कि दहशत में कैसे लाया जाए। लोग हर दिन अखबारों में ठगी की ऐसी खबरें पढ़ते हैं, लेकिन अपने को बचा नहीं पाते। जब उन्हें गिरफ्तारी की धमकी मिलती है, तो उनकी सामान्य समझबूझ काम करना बंद कर देती है, और आत्मरक्षा में वे अपने पास की पाई-पाई दे देने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि सरकार की साइबर-सुरक्षा की तैयारी देश और दुनिया के साइबर-मुजरिमों की तैयारी के मुकाबले बहुत कमजोर है। अब भारत सरकार ने साइबर-जुर्म की शिकायत करने के लिए 1930 नंबर का फोन घोषित किया है, लेकिन कल ही जब रायपुर में एक सावधान महिला अकाउंटेंट ने उसे दिए जा रहे धोखे को भांपकर, सारे सुबूतों और स्क्रीनशॉट के साथ 1930 नंबर पर शिकायत की, तो वहां उसके साथ बदतमीजी की गई। अब दहशत में आए हुए लोग अगर किसी तरह साइबर-धोखाधड़ी की शिकायत भी करना चाहें, और उनके साथ बदसलूकी हो, तो वे कहां जाएं? जब तक उनके खाते खाली नहीं हो जाते, तब तक ठग उनके खून की आखिरी बूंद भी चूस लेते हैं, और उसके बाद सरकार के करने का बहुत कम बचता है। 

हम इस मुद्दे पर तकरीबन हर महीने एक बार लिख देते हैं, और सरकार को यह सुझाते भी हैं कि उसे साइबर-अपराधों, या दूसरे किस्म के आर्थिक अपराधों की जांच एजेंसियों से परे खुफिया-निगरानी एजेंसी अलग से बनानी चाहिए, जो कि जुर्म के सिलसिले को शुरू में ही पकड़ सके। लेकिन ऐसी किसी एजेंसी के पास जानकारी देने का हौसला तो लोगों का तभी होगा जब वहां उनके साथ बदतमीजी न हो। केन्द्र और राज्य सरकारों को अपने-अपने स्तर पर साइबर-जागरूकता बढ़ानी चाहिए, ताकि उसके नागरिकों की जमापूंजी इस तरह लूटी न जा सके। यह भी समझने की जरूरत है कि ऐसे हर जुर्म के बाद इन मुजरिमों की आर्थिक ताकत भी बढ़ जाती है, और उनका तजुर्बा भी। और जुर्म की कमाई जाहिर है कि दूसरे किस्म के जुर्म में ही इस्तेमाल होती है, और सरकार की नीयत अगर कालेधन पर काबू पाने की है, तो जुर्म की पूरी कमाई तो सिर्फ कालाधन ही रहती है। हमने पहले भी यह सुझाया है कि सरकार को अपने बैंकिंग सिस्टम में एआई की मदद से ऐसी निगरानी रखनी चाहिए कि जहां कहीं किसी खाते से अंधाधुंध पैसा निकल रहा हो, या किसी खाते में अंधाधुंध पैसा पहुंच रहा हो, या किसी खाते से पैसा आते ही दूसरे खाते में भेजा जा रहा हो, तो बैंक के कम्प्यूटर तुरंत ही एजेंसियों को अलर्ट कर दें। भिलाई के इस मामले में बैंक को शक भी हो गया था कि इस महिला के खाते से असामान्य रूप से रकम दूसरे खातों में भेजी जा रही है, फिर भी उस बैंक ने किसी जांच एजेंसी को, या पुलिस को खबर नहीं की। अब बैंकिंग गोपनीयता के भीतर अगर आज ऐसी गुंजाइश नहीं भी है, तो भी ऐसी संभावना का रास्ता निकालना चाहिए। आज बिना चाकू-पिस्तौल के सिर्फ एक मोबाइल फोन लेकर, और सीबीआई या नार्कोटिक्स ब्यूरो, या ईडी के अफसर बनकर लोग वीडियो कॉल पर किसी परिवार की जिंदगी भर की कमाई को खा जा रहे हैं। इससे परे यह भी समझने की बात है कि एक अधेड़ और दो बुजुर्ग लोगों को महीने भर डिजिटल अरेस्ट रखने से उस तनाव में उनकी जिंदगी पर कोई भी खतरा आ सकता था। ऐसे हर मामले का बारीकी से अध्ययन करके सरकारों को अपने इंतजाम की कमजोरियों को परखना चाहिए, और सुधारना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

इस बार पाकिस्तानी पीठ को गदा से कोई नहीं बचा सकते

30 मई 2025 

 

हिन्दुस्तान हैरान करते चल रहा है। हाईकोर्ट के जज इस्तीफा देकर अदालत से सीधे एक राजनीतिक दल के दफ्तर जाते हैं, और चुनाव में उम्मीदवार बनाकर लोकसभा पहुंच जाते हैं। कोई दूसरे जज सरकार को सुहाने वाला फैसला देकर बिना चुनाव राज्यसभा पहुंच जाते हैं, और कोई तीसरे जज रिटायर होते ही किसी राजभवन। फिर मानो यह काफी न हो, तो भारत के थलसेनाध्यक्ष उपेन्द्र द्विवेदी अभी एक धर्मगुरू, जगतगुरू रामभद्राचार्य से जाकर सार्वजनिक रूप से अपनी फौजी यूनिफॉर्म में मंत्र पाते हैं, और दक्षिणा में रामभद्राचार्य उनसे पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर मांगते हैं। एकदम धार्मिक भावना से भरपूर यह तस्वीर समाचारों में आई है जिसमें जनरल उपेन्द्र द्विवेदी उन्हें मिली एक गदा थामे खड़े हैं, और उनके चेहरे की मुस्कुराहट देखते ही बनती है। यह मुस्कुराहट रामभद्राचार्य नहीं देख पाए होंगे क्योंकि उनकी शोहरत की एक बड़ी वजह यह भी है कि वे नेत्रहीन रहते हुए भी जाने कितने ही धार्मिक ग्रंथों को याद रखते हैं। जिस आस्था के साथ थलसेनाध्यक्ष ने यह गदा थामी है, और पाकिस्तान से उसके हिस्से वाले कश्मीर को छीनने का आदेश पाया है, वह अभूतपूर्व और ऐतिहासिक है। आजादी से लेकर भारत के इस अमृतकाल तक शायद ही कभी कोई सेनाप्रमुख इस तरह से एक धार्मिक गुरू से मंत्र पाने, और साथ-साथ इतनी खुशी पाने के लिए वर्दी में पहुंचे हों। लेकिन आज देश के बड़े-बड़े लोग मौसम विभाग की तरफ से हवा में पजामे की तरह फहराए जाने वाले हवा का रूख बताने वाले कपड़े को देखकर चल रहे हैं, और इस रूख के सामने धर्मनिरपेक्षता, या फौज की परंपराएं तो महत्वहीन हैं ही। 

अधिक वक्त नहीं हुआ है, जब इन्हीं रामभद्राचार्य ने जयपुर में चल रही रामकथा के बीच नवंबर 2024 में कहा था कि यह देश गांधी परिवार का नहीं है, यह सनातनियों का है, विधर्मियों का नहीं है। उन्होंने कहा था कि अब हम सत्ता परिवर्तन नहीं चाहते, हमारे प्रधानमंत्री के तौर पर चौथी बार नरेन्द्र मोदी ही बने, ऐसी मेरी इच्छा है। उन्होंने कहा था- इस बार कुंभ में हम ऐसा कुछ करेंगे कि विश्व के नक्शे से पाकिस्तान का नामोनिशान मिट जाएगा। रामभद्राचार्य की इस बात पर पाकिस्तान में दहशत फैल गई थी। कुंभ शुरू होने में ठीक दो महीने लगे थे, और खत्म होने में फिर और वक्त लग गया था, तब तक पाकिस्तान के लोगों की नींद हराम हो गई थी कि कुंभ के चलते उनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा। पता नहीं क्यों ऐसा हो नहीं पाया, और भारत के थलसेनाध्यक्ष को रावलपिंडी, या करांची संभालने के बजाय चित्रकूट आकर रामभद्राचार्य का आशीर्वाद लेने का समय मिल गया। लेकिन इस बार जिस दक्षिणा की मांग रामभद्राचार्य ने की है, उसके बाद सुनाई पड़ा है कि पाकिस्तानियों की नींद एक बार फिर हराम हो गई है कि भारत सरकार के कहे फौज कुछ कर पाए या न कर पाए, रामभद्राचार्य की मांगी दक्षिणा देने के लिए फौज अब जाने क्या-क्या नहीं करेगी। इस कार्यक्रम की तस्वीरें पाकिस्तान में एक डरावनी फिल्म की तरह देखी जा रही हैं जिनमें जनरल उपेन्द्र द्विवेदी सुनहरी गदा पकड़े फौजी यूनिफॉर्म में खड़े हैं। ऐसा सुना गया है कि पाकिस्तानियों को अब रात भर सपने में अपने ऊपर गदा ही पड़ते हुए दिख रही है। 

मौसम विभाग का लहराया गया पजामा हवा का रूख बता रहा है। उत्तरप्रदेश में कांवड़ यात्रा पर गुलाब की पंखुडिय़ां बरसाने के लिए वहां की पुलिस के सबसे बड़े अफसर हेलीकॉप्टर से जाकर अपनी सरकारी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, और छत्तीसगढ़ में गृहमंत्री विजय शर्मा के गृहनगर कवर्धा में पहुंचने वाले कांवडिय़ों की आरती उतारने के लिए एसपी की अगुवाई में पूरा पुलिस बल फूल बरसाते, दीयों से आरती उतारते, अपनी फिल्म बनवाता है, और एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक धार्मिक वातावरण चारों तरफ छा जाता है। कवर्धा पुलिस ड्रोन कैमरों का भी इस्तेमाल करके इस मौके की रिकॉर्डिंग करवाती है, ताकि यह दिखे कि स्वर्ग से देखने वाले देवताओं को यह दृश्य कैसा दिख रहा होगा। ऐसा लगता है कि भारतीय थलसेनाध्यक्ष को यूनिफॉर्म में आरती उतारती, और फूल बरसाती छत्तीसगढ़ और यूपी की पुलिस से प्रेरणा मिली होगी, और रामभद्राचार्य की कुंभ के वक्त की अधूरी मनोकामना पूरी करने के लिए मंत्र और गदा पाकर अब जनरल उपेन्द्र द्विवेदी सौ गुना उत्साह के साथ सरहद पर जाएंगे। अभी यह साफ नहीं है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को पाने के लिए भारत सरकार का भी कोई फैसला लगेगा, या रामभद्राचार्य की फरमाइश काफी होगी। 

जिस तरह अमरीका में डोनल्ड ट्रंप के दुबारा राष्ट्रपति बनने के बाद लोकतांत्रिक परंपराओं, और संस्थाओं को पूरी तरह अवांछित मानकर, जो ट्रम्प कहे वह सही पर अमल किया जा रहा है, कुछ उसी तरह का हाल हिन्दुस्तान में अभी हिन्दुत्व के पक्ष में, या पाकिस्तान के खिलाफ चल रहा है। यह तो जरा सी कोई चूक रह गई, वरना रामभद्राचार्य ने तो नवंबर 2024 में ही कह दिया था कि पाकिस्तान का नामो-निशान मिट जाएगा, और अभी मई 2025 में जब भारत ने पाकिस्तान पर हवाई हमला शुरू किया, तो रामभद्राचार्य से परे भी बहुत से लोगों को लगा था कि पाकिस्तान अब खत्म हो ही जाएगा। यह एक अलग रहस्यमय बात है कि पाकिस्तान को कुछ दिनों के लिए छोड़ क्यों दिया गया है, और कश्मीर को लाकर रामभद्राचार्य के चरणों में समर्पित क्यों नहीं किया गया है। लेकिन अब इस बात का पक्का भरोसा है कि जनरल द्विवेदी दक्षिणा दे पाएंगे। देखते हैं आगे पाकिस्तानियों की पीठ पर गदा कितने दिनों में पड़ती है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मई 2025



 

वक्त के पहले आए मानसून से जागरूकता का मौका भी

29 मई 2025 

 

मौसम बहुत से लोगों को अगर राहत देने वाला लगे, तो उन्हें लगता है कि सब कुछ बहुत अच्छा हो गया। लेकिन सच तो यह है कि धरती पर जलवायु और मौसम, इनका जो चक्र बना हुआ है, उसमें अगर अधिक फेरबदल होता है, तो उससे धरती की जिंदगी तबाही की तरफ बढ़ जाती है। धरती पर तापमान लगातार बढ़ते चल रहा है, कभी भी कहीं पर बारिश इतनी हो जाती है कि बाढ़ आ जाती है, और योरप के जिन शहरों ने कभी बाढ़ देखी नहीं थी, वहां सडक़ों पर सैलाब में कारें बहते हुई दिखीं, तमाम बसाहट की ग्राउंड फ्लोर की पूरी तबाही हो गई। इसी तरह अफ्रीका के कई देश ऐसे भयानक सूखे के शिकार हो गए कि दसियों लाख इंसान और उतने ही जानवर अपनी बसाहट छोडक़र सैकड़ों और हजारों मील दूर जाने को मजबूर हो गए। लेकिन मौसम की मार की ऐसी पराकाष्ठा से परे भी कई चीजें धीमी रफ्तार से हो रही हैं, जैसे भारत में इस बार मानसून एक पखवाड़े पहले खिसक गया है। 

अब शहरी लोगों को तो मानसून का मतलब पानी, कारोबारियों को इसका मतलब छाते और रेनकोट बेचना, इतना ही है। मानसून की तारीखें एक पखवाड़े पहले आ जाने से खेती पर क्या असर पड़ेगा, और आगे जाकर फसल को जिन दिनों में अधिक पानी की जरूरत रहेगी, उन दिनों पानी उतना बरसेगा या बादलों में ही उतना नहीं रह जाएगा, ऐसी कई बातें हैं जो कि शहरी सडक़ों पर नहीं दिखती हैं। और ये बातें जब फसल की कमजोरी हो चुकी रहती है, तब सामने आती हैं। अभी कुछ बरस पहले उत्तर भारत में गर्मी में अंधाधुंध लू चली, तापमान इतना बढ़ गया कि गेहूं की फसल में बालियों में दूध ठीक से नहीं पड़ पाया, और उत्पादन घट गया। ऐसी नौबत पूरी दुनिया में जगह-जगह आ रही है, खासकर उन जगहों पर जहां एक निश्चित तापमान पर, एक औसत बारिश से लोगों का रोजगार चलता था, फसल होती थी, उन तमाम जगहों पर अब एक अनिश्चितता ऐसी भर गई है कि मानो ट्रम्प दुनिया के बादलों पर काबू करके बैठा है, और जब जहां जैसा चाहता है उस तरह हिलाता है। 

दरअसल ट्रम्प की चर्चा के बिना जलवायु परिवर्तन की बात इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया का यह सबसे ताकतवर निर्वाचित तानाशाह अंधाधुंध हद तक बेदिमाग भी है। उसने राष्ट्रपति बनते ही पेरिस जलवायु समझौते से अमरीका को बाहर कर लिया, और पर्यावरण को बचाने की, जलवायु परिवर्तन को धीमे करने की तमाम कोशिशों को वह ग्रीन फ्रॉड कहता है। उसकी नजर एक बहुत घटिया दर्जे के कारोबारी की है जिसके लिए आज शाम तक का मुनाफा ही सबसे अधिक मायने रखता है, फिर चाहे उसकी वजह से अगले हफ्ते बहुत बड़ी बर्बादी ही क्यों न आ जाए। पर्यावरण से परे की एक बात यहां पर करना जरूरी है कि आज सुबह की खबर है कि अमरीकी अदालत में ट्रम्प के अधिकतर टैरिफ-फैसलों को रोक दिया है, अदालत ने कहा है कि ये ट्रम्प के अधिकार क्षेत्र से बाहर के फैसले हैं। लेकिन पिछले सवा सौ से अधिक दिनों के अपने कार्यकाल में ट्रम्प दुनिया में तरह-तरह की तबाही तो लाते ही जा रहा है, और उसकी मनमानी से दुनिया के पर्यावरण में जो बर्बादी हो रही है, वह तो बरसों तक नहीं सुधर पाएगी। 

अब चूंकि पूरा हिन्दुस्तान मानसून पर चलने वाला देश है, इसलिए इसमें आए हुए एक पखवाड़े के फर्क की वजह से हिन्दुस्तानी आज जलवायु परिवर्तन के बारे में कुछ समझने की कोशिश कर सकते हैं। दूसरा यह कि भारत सरकार के मौसम विज्ञान विभाग से निकली हुई वैज्ञानिक जानकारी को सरल भाषा में अलग-अलग क्लास के बच्चों के लिए भी तैयार करना चाहिए ताकि वे मानसून में आए इस बड़े फेरबदल के साथ-साथ धरती पर चल रहे जलवायु परिवर्तन को भी बेहतर तरीके से समझ सकें। जब किसी देश में भूकम्प आता है, तो वहां के तमाम बच्चों को भूकम्प के बारे में समझाने का एक बेहतर वक्त रहता है। इसलिए बिना तैयारी पहुंच गए इस मानसून को लेकर आज भारत में बच्चे-बड़े, सभी कुछ अधिक ध्यान से इस मुद्दे को समझेंगे। लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि क्या भारत उन देशों में शामिल है जो कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं? यह बात भी समझनी होगी कि संपन्न और विकसित देशों में कई देश ऐसे गैरजिम्मेदार हैं जो कि सामानों और साधनों की अंधाधुंध खपत करते हैं। वैसे तो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देशों की लिस्ट में भारत का नाम तीसरे नंबर पर ही है लेकिन अमरीका और चीन के बाद भारत एक देश के रूप में जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार तो है, लेकिन अगर हम आबादी के रूप में देखें, तो भारत में प्रति व्यक्ति जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी बहुत कम आती है। प्रति व्यक्ति प्रदूषण फैलाने में पहले पांच देश तो खाड़ी के हैं, कतर, कुवैत, यूएई, बहरीन, सउदी अरब में हर व्यक्ति प्रदूषण फैलाने में दुनिया में सबसे आगे हैं। और इसके बाद जाकर ऑस्ट्रेलिया, अमरीका, कनाडा, दक्षिण कोरिया, और रूस की बारी है। मतलब यह कि देश की सीमाओं के आधार पर चीन दूसरे और भारत तीसरे नंबर पर जरूर है, लेकिन प्रति व्यक्ति प्रदूषण के मामले में चीन 19वें नंबर पर है, भारत 30वें नंबर पर। मतलब यह कि एक औसत नागरिक का प्रदूषण में योगदान बहुत कम है। 

लेकिन यह बात राहत की नहीं है। पेरिस जलवायु समझौते जैसे कई समझौतों में भारत के भी दस्तखत हैं, और ट्रम्प के उससे निकल जाने पर भी भारत उसमें बना हुआ है। भारत तो अपनी जमीन पर प्रदूषण घटाने की कोशिशों को लगातार जारी रखना चाहिए क्योंकि कोयले से बिजली बनाने का कोई तेज रफ्तार विकल्प भारत के पास नहीं है, और अभी तो अगले कई बरस यह प्रदूषण बढ़ते ही जाना है, और उसके बाद जाकर यह स्थिर होगा। भारत को पर्यावरण के हर मोर्चे पर, हर पैमाने पर इसलिए जिम्मेदार रहना चाहिए क्योंकि आने वाला वक्त ऐसा हो सकता है जिसमें कोई अंतरराष्ट्रीय समझौता सचमुच ही अमल में आ जाए, अधिक प्रदूषण करने वाले देशों पर बड़ा जुर्माना लग जाए। आज भी ऐसी बात तो होती ही है।

कुल मिलाकर हम अपनी पहली बात पर आते हैं कि मानसून बदलने से आज देश में जलवायु चर्चा में है, और बच्चों से लेकर बड़ों तक भारत सरकार को आसान शब्दों में वैज्ञानिक तथ्य रखने चाहिए, और लोगों को जागरूक बनाने का यह एक बड़ा मौका है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मई 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मई 2025



 

स्कूल फेल ठगों पर भी सरकार का कोई बस नहीं

 28 मई 2025 

 

राजस्थान से ठगी का एक ऐसा नया मामला सामने आया है जिसमें 10वीं फेल ठग ने बड़े-बड़े कारोबारियों को क्रिप्टोकरेंसी का झांसा दिखाकर उनसे दसियों लाख रूपए एक-एक से ठग लिए, उन्हें विदेशों में क्रूज पर पार्टियां देकर, महंगे होटलों में ठहराकर 10 गुना तक कमाई का सपना दिखाया गया, और सब अपने पैसों से हाथ धो बैठे। इधर छत्तीसगढ़ में जगह-जगह ऐसे मामले सामने आए हैं कि कस्बों के छोटे-छोटे से लोग कहीं शेयर बाजार का झांसा देकर, तो कहीं किसी फाइनेंस कंपनी में पूंजीनिवेश करवाकर, तो कहीं क्रिप्टोकरेंसी में मोटी कमाई के सपने दिखाकर लोगों को लूटे जा रहे हैं। गांव-देहात से निकले हुए, कम पढ़े-लिखे लोग भी बड़े पैमाने पर ठगी कर रहे हैं। देश में बरसों से टेलीफोन पर जालसाजी करने की अघोषित राजधानी बने हुए जामताड़ा में तो कहा जाता है कि स्कूल फेल लडक़े घर-घर में फोन पर लोगों को धोखा देने, और ठगने को कुटीर उद्योग की तरह चलाते हैं। ऐसे कम पढ़े-लिखे लोगों की ऐसी मौलिक प्रतिभा देखकर लगता है कि अगर इन्हें किसी सही राह पर मौका मिलता, तो हो सकता है कि वे किसी भले कारोबार में भी आगे बढ़ गए होते। 

आज देश भर में क्रिप्टोकरेंसी, शेयर, चिटफंड जैसे कई तरह के सपने बेचने वाले लोग जिस तरह से लोगों की जिंदगी भर की बचत, और कमाई लूट रहे हैं, उस बारे में सरकार को कुछ करना चाहिए। आज सरकार सिर्फ ठगी हो जाने, पैसा निकल जाने के बाद लकीर पीटने के अंदाज में मुजरिमों को गिरफ्तार करती है, लेकिन अधिकतर पैसा जा चुका रहता है। इसके अलावा टेलीफोन, और इंटरनेट पर लोगों को ब्लैकमेल करने, उन्हें पोर्नो फिल्म देखने की धमकी देकर उनसे उगाही करने, उनके बैंक खातों से ड्रग्स का धंधा चलने की दहशत पैदा करके उनसे अकाऊंट का एक-एक रूपया चूस लेने का काम अलग चल रहा है। एक और धंधा बड़े जोरों पर है जिसमें कोई लडक़ी फोन करके सेक्स की बातें करके, अपना बदन दिखाने का झांसा देकर लोगों के कपड़े उतरवाती है, और फिर ऐसे जवान या बड़े बुजुर्ग लोगों के बिना कपड़ों के वीडियो बना लिए जाते हैं, और ब्लैकमेलिंग का यह सिलसिला बहुत सी आत्महत्याओं तक पहुंच जाता है। 

हमने पहले भी इसी जगह सुझाया है कि सरकार को आर्थिक अपराधों की जांच एजेंसियों से परे, आर्थिक अपराधों पर निगरानी रखने की खुफिया एजेंसी विकसित करनी चाहिए जो कि रात-दिन इंटरनेट और टेलीफोन पर नजर रखकर, बैंकों के संदिग्ध खातों में रकम का तेजी से आना-जाना देखकर जुर्म को समय रहते पकड़ सके। आज सट्टेबाज और दूसरे किस्म के अपराधी नासमझ और सीधे-साधे लोगों के बैंक खातों को किराए पर ले लेते हैं, और उनमें जुर्म का पैसा तेजी से आने लगता है, और उसी तेजी से जाने भी लगता है। भारत में बैंकिंग का जिस तरह डिजिटलीकरण हुआ है, हर बैंक लेन-देन जिस तरह कम्प्यूटरों पर दर्ज होता है, खुफिया एजेंसियां बैंकों की मदद से आसानी से यह पता लगा सकती हैं कि किसी खाते से अगर किसी अनजान खाते में रातोंरात बड़ी-बड़ी रकम जाने लगी है, कुछ दिनों के भीतर ही खाता खाली होने लगा है, और जिन खातों में रकम जा रही है, वहां से पल भर में आगे बढ़ा दी जा रही है, तो ऐसे मामलों की निगरानी आज एआई की मदद से आसानी से हो सकती है। अगर किसी खाते में सट्टे का पैसा हर दो-चार मिनट में जमा हो रहा है, तो क्या उस बैंक को अपने ऐसे खाते का पता नहीं चलता? बैंकों के कम्प्यूटरों को ही यह निर्देश दिए जा सकते हैं कि किसी भी अस्वाभाविक लेन-देन, जमा-निकासी पर वह खतरे की घंटी बजा दे, और बैंक के कोई अधिकारी-कर्मचारी उसे व्यक्तिगत रूप से परख लें। एक-एक खच्चर-खाता महीनों तक काम करता है, और वह पकड़ में नहीं आता, तो यह बैंकिंग सिस्टम में एक बड़ी कमजोरी है, और यह सिलसिला तोडऩा चाहिए। 

केन्द्र सरकार ने देश भर में बैंकों से जुड़े हर कामकाज का डिजिटलीकरण कर दिया है, और जालसाजी में लोगों की जमा रकम को लूटा न जाए, यह जिम्मेदारी भी सरकार की ही है। इसलिए हम ऐसे निगरानीतंत्र को जरूरी समझते हैं जो कि बाजार से भी मिलने वाली खबरों को देखे, और बैंकों में कोई भी अस्वाभाविक गतिविधियां भी परखे। सरकार को यह भी चाहिए कि साइबर-जुर्म में अगर लोगों का पैसा डूबता है, तो उसका एक बीमा होना चाहिए। सरकार, बैंक, और खातेदार, ये सब लोग मिलकर ऐसे बीमे का खर्च उठा सकते हैं, ताकि लोगों की जिंदगी भर की कमाई इस तरह डूब न सके। आज टेक्नॉलॉजी ने बैंकों के सारे कामकाज को ऑनलाईन कर दिया है, और लोग रात भर अपने घर में बैठकर भी पूरा पैसा कहीं भी ट्रांसफर कर सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ऐसे संगठित जुर्म से लडऩे में बड़ा मददगार हो सकता है क्योंकि वह पल भर में खातों से ऐसी अस्वाभाविक आवाजाही को पकड़ सकता है। आज टेलीफोन पर वॉट्सऐप सरीखे बहुत से इनक्रिप्टेड संदेशों के भीतर तक सरकार की आम पहुंच नहीं हो सकती, इसलिए इन पर निगरानी रखना भी आसान नहीं है, और जब तक सरकार ऐसे प्लेटफॉर्म को यह सुबूत नहीं देती है कि उसका जुर्म में इस्तेमाल हो रहा है, तब तक वे सरकार को संदेशों तक पहुंच नहीं देते। ऐसे में सरकार को बैंकों पर ही सबसे कड़ी नजर रखनी होगी जो कि उसकी पहुंच के भीतर है। बैंकों पर यह जिम्मेदारी डालनी होगी कि अस्वाभाविक लेन-देन होने पर एजेंसियों को तुरंत खबर करना उनकी जिम्मेदारी रहेगी, नहीं तो नुकसान उनका रहेगा।

(Daily Chhattisgarh)

सर्वदलीय सहयोग, और ओछे राजनीतिक हमले, दोनों साथ-साथ कैसे?

27 मई 2025 

 

भारत से सांसदों के सात प्रतिनिधि मंडल 32 देशों के लिए भेजे गए हैं, जो अलग-अलग जगहों पर जाकर वहां भारत सरकार का पक्ष रखेंगे कि पाकिस्तान की तरफ से कैसी आतंकी कार्रवाई की वजह से भारत को उस पर फौजी कार्रवाई करनी पड़ी है, और किस तरह पाकिस्तान लगातार ऐसी हरकतों में लगे रहता है। इसके लिए केन्द्र की मोदी सरकार की तरफ से अलग-अलग पार्टियों के सांसदों को चुना गया है, और इनमें मोदी सरकार ने उसकी कटु आलोचक विपक्षी पार्टियों से भी उनके सांसद मनोनीत करने की अपील की थी, ताकि देश के बाहर देश की एकता की एक तस्वीर पेश की जा सके। यह एक अलग बात है कि कांग्रेस के भीतर से जो नाम सरकार के मांगे उसे दिए गए थे, उनमें से सिर्फ एक नाम लिया गया था, और उससे परे के एक नाम, शशि थरूर को सरकार ने जोड़ा था। बाद में सरकार का यह कहना था कि उसने कांग्रेस को सिर्फ सूचना दी थी, उससे कोई नाम नहीं मांगे थे। लेकिन इस घरेलू विवाद को छोड़ दें क्योंकि अब प्रतिनिधि मंडल अलग-अलग देशों में पहुंच रहे हैं, और वहां भारत का पक्ष रख रहे हैं। 

इस बीच कल आई यह खबर हक्का-बक्का करती है कि इन्हीं प्रतिनिधि मंडलों में शामिल भाजपा के निशिकांत दुबे ने अमरीकी सरकार का 1963 का एक गोपनीयतामुक्त टेलीग्राम पोस्ट करते हुए यह लिखा है- आयरन लेडी इंदिराजी और उनके पिताजी नेहरूजी कश्मीर के अवैध कब्जे पाकिस्तान के द्वारा 1948 के बाद दुबारा मध्यस्थ अमेरिका और ब्रिटेन के दबाव में भारत सरकार के मंत्री स्वर्णसिंहजी व जुल्फिकार अली भुट्टो की लगातार बैठक 1962 से 1964 के बीच हुई। इस कागज को गौर से पढि़ए, भारत ने पुंछ और उरी पाकिस्तान के द्वारा जबर्दस्ती हथियाए भूभाग को पाकिस्तान को देने का फैसला ही कर लिया था। इतने पर ही मामला नहीं रूका, गुरेज में पूरी नीलम और किशनगंगा घाटी के साथ लाईन ऑफ कंट्रोल की अंतरराष्ट्रीय सीमा। भारत की आज की समस्या का एकमात्र कारण कांग्रेस का हाथ? किसके साथ? 

अब निशिकांत दुबे ने एक्स पर ऐसे एक टेलीग्राम की कॉपी पोस्ट की है, और उसके ठीक नीचे एक पाठक ने एक्स के एआई ग्रोक से पूछा क्या यह जो बता रहा है वो सच है? इसके जवाब में ग्रोक ने वहीं पर अपनी राय दी है- निशिकांत दुबे का दावा कि 1962-64 में भारत ने कश्मीर के कुछ हिस्सों जैसे पुंछ, उरी, नीलम घाटी, और किशनगंगा घाटी को पाकिस्तान को देने का फैसला किया था, ऐतिहासिक रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है। डी-क्लासिफाईड दस्तावेज, और शैक्षिक स्रोत बताते हैं कि स्वर्णसिंह भुट्टो वार्ता में क्षेत्रीय समायोजन पर चर्चा हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हुआ। दस्तावेज संभावित समायोजन की बात करते हैं, परंतु विशिष्ट क्षेत्रों को सौंपने का कोई सुबूत नहीं है। इसलिए यह दावा गलत प्रतीत होता है। कश्मीर मुद्दा जटिल है, और इसकी सटीक समझ के लिए और शोध जरूरी है। 

सांसदों के विदेश प्रवास के बीच, जब मोदी सरकार ने अपनी कटु आलोचक पार्टियों के सांसदों को भी देश की एकता की तस्वीर पेश करने के लिए भेजा है, तब एक प्रमुख दल कांग्रेस के दो प्रधानमंत्रियों का नाम लिखते हुए 1963 के किसी कथित दस्तावेज के हवाले से, नेहरू पुण्यतिथि के ठीक एक दिन पहले ऐसा आरोप लगाना सरकार की कौन सी सूझबूझ है? इसके पहले भी निशिकांत दुबे देश में रहते हुए सुप्रीम कोर्ट के पिछले न्यायाधीश के खिलाफ देश के इतिहास का सुप्रीम कोर्ट पर सबसे गंदा और ओछा आरोप लगा चुके हैं, जिसमें उन्होंने उस वक्त के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को देश में चल रहे सभी गृहयुद्धों के लिए जिम्मेदार ठहराया था। बाद में भाजपा ने इस बयान से किनारा कर लिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की साख को खराब करने की यह खुली कोशिश हैरान कर गई थी कि सत्तारूढ़ पार्टी का सांसद किस हद तक जा सकता है, और सीजेआई पर तोहमत लगाने के लिए वह देश में कई गृहयुद्ध चलने की बात भी कह सकता है। इसके बाद दूसरी बार तब हैरानी हुई जब भाजपा ने लोकसभा में 240 और राज्यसभा में 86 सांसदों के रहते हुए ऐसे निशिकांत दुबे को देश की एकता दिखाने के लिए बनाए गए प्रतिनिधि मंडल में रखा, जिसने नेहरू पुण्यतिथि की पहली शाम देश के इतिहास को यह तोहफा दिया। इससे सवाल यह उठता है कि निशिकांत दुबे इस प्रतिनिधि मंडल में देश को एक बताने के लिए बाहर गए हैं, या देश के इतिहास को गालियां बककर वे नेहरू को विदेश से श्रद्धांजलि दे रहे हैं। अब कांग्रेस के जो सांसद भारत सरकार की मुहिम का साथ देने के लिए इन प्रतिनिधि मंडलों में गए हैं, वे अगर विदेश प्रवास से वापिस लौट जाएं, तो क्या वे कुछ गलत करेंगे? क्या अपने गुजरे हुए नेताओं को प्रसंगहीन गालियां बर्दाश्त करना राष्ट्रीय एकता के नाम पर उनकी जिम्मेदारी मानी जाएगी? अमरीकी सरकार का 1963 का कोई डी-क्लासिफाईड दस्तावेज जो संदेश दिखा रहा है, क्या उस संदेश के आधार पर नेहरू पुण्यतिथि पर नेहरू को इस तरह कोसा जाए?

सच तो यह है कि यह सिलसिला किसी भी तरह मासूम नहीं लगता है। जो निशिकांत दुबे अभी सुप्रीम कोर्ट में अपनी पिछली नाजायज और अलोकतांत्रिक बयानबाजी के लिए कटघरे में खड़ा ही है, उसी को ऐसे नाजुक कूटनीतिक अभियान पर भेजना, और फिर उसका विदेश से कांग्रेस पर ऐसा हमला करना, यह किस तरह की राष्ट्रीय एकता मुहिम है? अगर भाजपा की किसी रणनीति के तहत यह बयान नहीं दिया गया है, तो भाजपा को चाहिए कि इस बयान को नाजायज, गैरजरूरी, और पूरी तरह अवांछित ठहराए, और निशिकांत दुबे को वापिस बुलाए। ऐसा न होने पर कांग्रेस पार्टी को यह तय करना चाहिए कि सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद से अपने पार्टी-पुरखों के बारे में ऐसी गालियां सुनकर इस दौरे में शामिल रहना क्या अपने को देशप्रेमी साबित करने के लिए जरूरी है? क्या अपने को देशप्रेमी साबित करने के लिए इस तरह का अपमान झेलना जरूरी है? विपक्ष ने मोदी सरकार को पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी कार्रवाई के लिए अपनी पूरी सहमति दी थी। इसके बाद लोगों को याद होगा कि ऑपरेशन सिंदूर के वक्त भाजपा ने सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदा सरकार को कांग्रेस और यूपीए जैसी कमजोर न होने की बात लिखी थी। वह सिलसिला चल ही रहा है। इसका कोई मकसद जाहिर तौर पर हमको समझ नहीं पड़ रहा है, और न ही इससे केन्द्र सरकार या देश को कोई मजबूती या साख मिल रही है। सर्वदलीय सहयोग, और ओछे राजनीतिक हमले, ये दोनों बातें साथ-साथ भला कैसे चल सकती हैं?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मई 2025



 

...कर्ज के लिए बच्चा गिरवी, छुड़ाने के लिए माँ पैसे लेकर गई, तो हत्या की खबर मिली

 26 मई 2025 

 

आंध्रप्रदेश के तिरुपति जिले की एक खबर है कि एक बहुत गरीब आदिवासी महिला ने तमिलनाडु के एक साहूकार के पास अपने 12 बरस के बेटे को गिरवी रखकर कर्ज लिया, और जब वह कुछ हफ्ते बाद पैसे चुकाने लौटी तो पता चला कि उसके बेटे की हत्या करके उसे दफन कर दिया गया है। यह साहूकार बत्तख पालने का काम करता था। यह कर्ज लेने की नौबत भी इसलिए आई थी कि पति की मौत के बाद वहीं के एक दूसरे आदमी ने इस महिला पर दावा किया था कि परिवार पर उसका कर्ज है, इस कर्ज चुकाने के लिए दूसरे साहूकार ने परिवार के किसी सदस्य को मजदूरी करने के लिए बंधक रखने की शर्त रखी थी, और इसीलिए इस महिला को अपने बेटे को वहां बंधुआ मजदूर या गिरवी रखना पड़ा था।

यह आंध्रप्रदेश की गरीब आदिवासी महिला का हाल है जहां के मुख्यमंत्री दुनिया में किसी भी प्रदेश की सबसे महंगी राजधानी बनाने जा रहे हैं, यह वही आंध्रप्रदेश है जहां के तिरुपति के भगवान की कमाई दुनिया के किसी भी हिन्दू मंदिर में सबसे अधिक है, यह वही आंध्रप्रदेश है जहां पर मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू देश की साइबर या सिलिकॉन राजधानी बनाना चाहते हैं। उस प्रदेश की आदिवासी महिला का यह हाल बताता है कि देश में दलितों और आदिवासियों का क्या आम हाल चल रहा है। कल ही इसी जगह पर हमने लिखा था कि किस तरह गुजरात में एक दलित नौजवान अपने इलाके की दुकान पर सामान खरीदने गया, और बातचीत में उसने ओबीसी दुकानदार के बेटे को बेटा कहकर संबोधित कर दिया। बस इतनी सी बात पर उसे पीट-पीटकर मार डाला गया। कल दलित की बारी आई थी, और आज इस आदिवासी महिला की खबर आई है।

देश में हिन्दू धर्म के तहत आने वाली सभी जातियों को एक करने की बातें बहुत से लोग बोलते हैं, आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने कई मौकों पर कहा है कि जात-पात को खत्म करने की जरूरत है, खासकर मंदिर और श्मशान जैसी जगहों पर सभी के लिए बराबरी रहनी चाहिए। लेकिन कदम-कदम पर जाति व्यवस्था की हिंसा दिखती है। जिस आदिवासी महिला की हम चर्चा कर रहे हैं, हो सकता है कि उसके आदिवासी होने की वजह से ही उसके साथ यह हिंसा न हुई हो, लेकिन यह बात तो सच है ही कि देश में दलित और आदिवासी तबके आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे ही कमजोर हैं, और सबसे अधिक जुल्म के शिकार भी हैं। ऐसे में अगर मंदिर और श्मशान जैसी जगहों पर बराबरी की सोच सामने रखी भी जा रही है, तो उस पर कोई अमल नहीं हो रहा है।

आंध्र के इस मामले को लेकर सरकारों को, और देश की बैंकिंग व्यवस्था को भी इस आत्मविश्लेषण की जरूरत है कि सबसे कमजोर ऐसे लोगों की मदद में ये सब असफल क्यों हो रहे हैं? जगह-जगह लोग फर्जी फाइनेंस कंपनियों में पूंजीनिवेश कर रहे हैं, और उनका पैसा डूब रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ आरबीआई जैसी बैंक रेगुलेटरी संस्था क्यों समय रहते इस तरह की फाइनेंस कंपनियों पर रोक नहीं लगा पाती हैं, इस पर भी सोचना चाहिए। लोग न सिर्फ अपनी सीमित पूंजी ऐसी कंपनियों में लगाते हैं, बल्कि सोने के गहनों पर लोन देने वाली बहुत सी कंपनियां भी बाजार में हैं, और उनके खिलाफ भी तरह-तरह की जालसाजी की शिकायतें आती रहती हैं। कई किस्म के साहूकार बाजार में हैं, और उनका कारोबार प्रचार के बिना चलता नहीं है। देश के कुछ सबसे बड़े फिल्म कलाकार ऐसे गोल्ड लोन का इश्तहार करते हुए दिखते हैं। वे सुबह एक बड़ी कंपनी के गहनों को खरीदने का इश्तहार करते हैं, और शाम तक वे गोल्ड लोन फाइनेंस कंपनी में गहने गिरवी रखने को बढ़ावा देते हैं।

आज देश भर में सहारा इँडिया जैसी बड़ी फाइनेंस कंपनी भी सुप्रीम कोर्ट तक में कार्रवाई झेल रही है, दूसरी तरफ छोटी-मोटी अनगिनत कंपनियां हर प्रदेश की अदालतों में कटघरे में हैं। कहने के लिए तो गांव-गांव तक बैंक पहुंच गए हैं, और हर गरीब के जन-धन खाते में खुल गए हैं, खासकर आदिवासियों के लिए कई और किस्म की योजनाएं चल रही हैं, लेकिन 21वीं सदी में आकर भी अगर इस देश के सबसे विकसित राज्यों में बच्चे को गिरवी रखना पड़ रहा है, और साहूकार उसका कत्ल कर दे रहा है, तो यह सरकारों के मुंह पर तमाचा है।

हम आदिवासी मुद्दे से परे होकर भी देखें, तो यह बात साफ है कि समाज में एक अकेली रह गई महिला को लूटने वाले कई लोग इकट्ठे हो जाते हैं। हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं कि अकेली महिला से उसकी देह लूटने, या उसके जमीन-मकान को हड़पने के लिए आसपास के लोग उसे टोनही बताकर प्रताडि़त करना शुरू कर देते हैं, ताकि उस पर कब्जा किया जा सके। कई जगह देह शोषण के लिए तैयार न होने पर वैसी महिला को मौतों के लिए जिम्मेदार टोनही कह दिया जाता है, और उसका हर तरह से बहिष्कार होता है, उसके साथ हिंसा होती है। इस एक ताजा घटना के कई पहलू हैं। लेकिन इनमें से हर किसी के बारे में सोचना तो सरकार को ही पड़ेगा। साहूकारी और हिंसा राज्य की कार्रवाई के विषय हैं, और बैंकिंग की जरूरत को पूरा करना केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला है। इस एक मामले को लेकर सबको अपने-अपने इंतजाम को परख लेना चाहिए कि कहां क्या कमी रह गई, कहां क्या चूक हुई, और ऐसी नौबत दुबारा न आए उसके लिए क्या किया जा सकता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मई 2025



 

ओबीसी बच्चे को बेटा पुकार देने भर से गुजरात में दलित को मार डाला

25 मई 2025 

 

गुजरात की एक खबर है कि वहां अमरेली में एक नौजवान दुकान पर कुछ सामान खरीदने गया, और दुकानदार के बेटे को बेटा कहकर बात कर ली, तो वहां मौजूद दर्जन भर लोगों ने उसे इतना मारा कि गंभीर चोटों से उसकी मौत हो गई। तेरह लोगों में से नौ को गिरफ्तार कर लिया गया है, और बाकी की तलाश जारी है। दुकानदार ओबीसी तबके का था, और यह ग्राहक नौजवान दलित तबके का। इसलिए दुकानदार के बच्चे को बेटा कहने पर जाति की गालियां देते हुए लाठी-कुल्हाडिय़ों से इस दलित नौजवान को मारा गया, अस्पताल में उसकी मौत हो गई। 

अब हिन्दुस्तान में जिन लोगों को लगता है कि जाति व्यवस्था खत्म हो चुकी है, उन लोगों को यह सोचना चाहिए कि बोलचाल में अपने से ऊंची समझी जाने वाली जाति के किसी छोटे बच्चे को बेटा कह देना जानलेवा हो सकता है। सोशल मीडिया अभी ऐसे वीडियो से उबल रहा है जिन्हें मध्यप्रदेश का बताया जा रहा है, और वहां एक गांव में दलित दूल्हा घोड़ी पर चढक़र निकल रहा है, और शायद किसी ऊंची समझी जाने वाली जाति की महिला गालियां बकते हुए दूल्हे को घोड़ी से उतारने की कोशिश करती है, और उसके बाद इस महिला का परिवार भी लाठियां लेकर जुट जाता है। देश में जगह-जगह दलितों के साथ इस तरह का बर्ताव चलता ही रहता है। दिलचस्प बात यह है कि देश में जाति व्यवस्था खत्म करने के, या खत्म हो जाने के तमाम फतवे ऊंची कही जाने वाली जातियों से ही आते हैं, जिन्हें कभी जाति-प्रताडऩा झेलनी नहीं पड़ी। जिन लोगों ने पूरी जिंदगी से जाति के आधार पर भेदभाव, हिंसा, और प्रताडऩा झेली है, वे जानते हैं कि क्रूर और हिंसक जाति व्यवस्था एक ऐसी हकीकत है जो कि कड़े कानूनों के बावजूद खत्म नहीं हुई है, और अक्सर ही जाति-हिंसा से बचने के लिए, या उसके हो जाने के बाद सजा दिलवाने के लिए ऐसी जाति के लोगों को एक होना पड़ता है, सडक़ों पर आना पड़ता है, तब कहीं जाकर उनकी बात सुनी जाती है, रिपोर्ट लिखी जाती है। इसके बाद भी पुलिस जांच, अदालती कार्रवाई के दौरान ऊंची कही जाने वाली जातियों का दबदबा, और उनकी संपन्नता की ताकत इतनी रहती है कि दलित घायल, या दलित लाश को इंसाफ मिल पाना आसान नहीं रहता है। 

देश में जगह-जगह कुछ चुनिंदा तबके भी यह बात उठाते रहते हैं कि हिन्दू धर्म के सारे लोगों को एक साथ रहना चाहिए, मंदिर से लेकर मरघट तक सबके लिए एक जैसे रहना चाहिए। लेकिन असल जिंदगी में क्या कोई यह कल्पना कर सकते हैं कि मंदिरों पर दलितों का उतना ही हक रहेगा, जितना कि ब्राम्हणों का रहता है? क्या कोई दलित धर्म की पढ़ाई करने के बाद किसी मंदिर में पुजारी नियुक्त हो सकेगा? पूरे देश में जो एक राज्य, तमिलनाडु संगठित दलित आंदोलन से उपजी राजनीति पर चलता है, वहां पर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने गैरब्राम्हणों को पुजारी बनाने की इजाजत देने का आदेश दिया था। दस बरस बाद मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन ने इस काम को आगे बढ़ाया, और सरकार-संचालित मंदिरों में 24 गैरब्राम्हण पुजारी नियुक्त किए गए, जिनमें कुछ दलित भी थे। इन सभी को सरकारी मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण संस्थाओं से प्रशिक्षण के बाद नियुक्त किया गया था। सामाजिक समानता आंदोलनकारियों ने इस पहल का समर्थन किया था, लेकिन परंपरागत ब्राम्हण संगठनों ने इसका विरोध किया। अब भी तमिलनाडु के कुछ मंदिरों में दलित पुजारी नियमित रूप से पूजा करवा रहे हैं। लेकिन बाकी देश में क्या हाल है, यह लोग अपने-अपने इलाके में पता लगा सकते हैं कि उनके राज्य में समाज और सरकार इस बारे में क्या कर रहे हैं। तमिलनाडु के कम से कम पांच जिलों में दलित पुजारी चर्चित और प्रमुख मंदिरों में पूजा-पाठ से लेकर दूसरे तमाम धार्मिक संस्कार करवा रहे हैं। 

देश में सिर्फ कानून से अगर कुछ होना रहता, तो संविधान लागू होने के अगले ही दिन दलितों से भेदभाव बंद हो जाना चाहिए था, लेकिन दलित प्रताडऩा धड़ल्ले से जारी है। इन दिनों एक सबसे अधिक चर्चित धार्मिक नौजवान को एक दलित के आकर पैर छूने की कोशिश करने पर अपने आपको पीछे घसीट लेने का वीडियो चारों तरफ चल रहा है, और इसके फर्जी होने की गुंजाइश हमें कम लगती है क्योंकि हिन्दू धर्म के अधिकतर बाबा इसी तरह जात-पात पर भरोसा रखने वाले हैं। अभी-अभी ज्ञानपीठ से सम्मानित एक नेत्रहीन बाबा तो ऐसे हैं जो कि ब्राम्हणों में भी नीच और अधम ब्राम्हणों की जातियां धारा प्रवाह गिनाते हैं। जब ब्राम्हणों के भीतर इतना भेदभाव है, तो दलितों के बारे में उनकी क्या सोच होगी, इसका अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं है। 

देश में बात-बात पर दलितों के खिलाफ, और सरकारी आरक्षण की वजह से बाकी आरक्षित तबकों के भी खिलाफ एक बहुत मजबूत पूर्वाग्रह चले आ रहा है जो कि कम होने का नाम नहीं लेता। कभी-कभी दूसरे धर्म से टक्कर लेने, उसे टक्कर देने के चक्कर में लोग कुछ देर के लिए अपने धर्म के भीतर की जाति व्यवस्था को स्थगित रखते हैं, और दूसरे धर्म से हिसाब चुकता होते ही फिर हंटर निकाल लेते हैं। आज अगर आरक्षण की मदद से दलित कुछ जगहों पर पहुंचे नहीं रहते, तो उनका पूरा का पूरा समाज कमजोर ही रहता, और अधिकतर लोग अछूत कहे जाने वाले कामकाज में ही उलझे रहते। आरक्षण ने सामाजिक न्याय दिलवाने में मदद की है, उसके महत्व को कम नहीं आंका जाना चाहिए। आज जरूरत इस बात की अधिक है कि शोषक तबकों के लोगों में से सुधारवादी लोग सामने आएं, और आकर अपनी जात के अहंकारी लोगों को सुधारने का काम करें। समाज सुधार का यह सिलसिला बड़ा लंबा चलेगा, क्योंकि मीडिया से लेकर न्यायपालिका तक शोषक तबके के लोगों का खूब बोलबाला है, और उनके जाति पूर्वाग्रह जल्द खत्म नहीं होने वाले हैं।

(Daily Chhattisgarh)

आपदा में अवसर की तरह, बुराई से भी प्रेरणा संभव

25 मई 2025

मध्यप्रदेश में अभी मंदसौर जिले के एक भाजपा नेता, मनोहरलाल धाकड़, सडक़ पर सेक्स करते टोल नाके, या हाईवे के किसी और सीसीटीवी पर इतनी अच्छी तरह रिकॉर्ड हो गए कि इस वीडियो के किसी खंडन-मुंडन की भी गुंजाइश नहीं रह गई। उनकी कार की नंबर प्लेट भी इस सेक्स के साथ-साथ पूरे वक्त स्क्रीन पर बनी रही। 

उनके पक्ष में सिर्फ एक बात जाती है कि उनके साथ की महिला अपनी मर्जी से उनका साथ देते दिख रही थी, उसे सडक़ पर सेक्स से कोई परहेज नहीं दिख रहा था, बदन पर किसी ताबीज का डोरा भी नहीं था, और वह बड़े उत्साह से इस नेता का साथ दे रही थी। साथ ही वह बालिग दिख रही थी, इसलिए जबरिया सेक्स जैसा कोई आरोप कम से कम इस नेता पर नहीं दिख रहा है। लेकिन सोशल मीडिया पर चारों तरफ इसके फैल जाने से सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी अपने नेता की अधिक मदद करने की हालत में नहीं है, और मंदसौर के एसपी को सोशल मीडिया पर आकर कहना पड़ा कि यह वायरल वीडियो दिल्ली-मुम्बई 8-लेन एक्सप्रेस-वे पर थाना भानपुरा इलाके का पाया गया है, और इस बारे में जुर्म दर्ज कर जांच की जा रही है। इस भाजपा नेता की पत्नी जिला पंचायत सदस्य है, जो कि पार्टी के लिए एक और शर्मिंदगी की वजह बनती है। 

भाजपा ने इस आदमी से अपना पल्लू छुड़ाते हुए कहा है कि यह ऑनलाईन सदस्य बना था, लेकिन पार्टी का प्राथमिक सदस्य नहीं है। दूसरी तरफ एक तलवारनुमा हथियार हवा में लहराते हुए मनोहरलाल धाकड़ का एक फोटो भी चारों तरफ फैल रहा है, जो कि उनके गौरव का सुबूत है। 

अब जिस व्यक्ति के पास निजी कार है, जो हाईकोर्ट पर अपनी प्रेमिका या किसी धंधे वाली महिला के साथ कार में घूम रहा है, जो महिला इतनी दुस्साहसी है कि वह बिना कपड़े कार से उतरकर आराम से तरह-तरह से सेक्स करने में जुट जाती है, उस व्यक्ति के पास हजार-दो हजार में मिलने वाला होटल का कोई कमरा भी न हो, यह समझना थोड़ा अटपटा लगता है। फिर ऐसा भी लगता है कि क्या यह व्यक्ति एक दुस्साहसी रोमांच करते हुए सेक्स करना चाहता था, ताकि खुली सडक़ पर हाईवे के किनारे अपनी नंबर प्लेट के बगल में सेक्स करते हुए एक अलग किस्म का रोमांच पाए? क्या यह व्यक्ति मनोविज्ञान की भाषा में एक्जीभिशनिज्म का शिकार है जो कि अपने बदन का, अपनी हरकतों का प्रदर्शन करना चाहते हैं। दुनिया भर में ऐसे लोग रहते हैं जो कि अपनी पसंद का निशाना छांटकर उनके सामने अपने बदन को उघाड़ते हैं, और उससे उत्तेजना पाते हैं। 

मनोविज्ञान में तरह-तरह की मानसिक विकृतियों, और मानसिक स्थितियों का जिक्र है। अभी दो-चार दिन पहले ही मेरे शहर में एक बुजुर्ग ऐसा पकड़ाया जो कि महिलाओं के सैंडल लेकर उसके साथ सेक्स कर रहा था। उसे वीडियो कैमरों पर भी दर्ज किया गया, और अपनी ही रिहायशी इमारत में वह किसी दूसरे घर के दरवाजे पर रखी महिलाओं के चप्पल-सैंडल उठाकर उनके साथ सेक्स करने लगता है। 

चाहे मध्यप्रदेश में इस भाजपा सदस्य का मामला हो, चाहे रायपुर में चप्पल से सेक्स करने वाले इस बुजुर्ग का, मनोविज्ञान में ऐसी हर तरह की चीजों की व्याख्या है। पुलिस अपना काम करती है, लेकिन बहुत से लोग इस तरह के मनपसंद सेक्स के बिना तसल्ली नहीं पाते हैं। अब कार के मालिक को भी कहीं एक कोना नसीब न हो, अपनी कार की पीछे की सीट भी नसीब न हो, यह कल्पना कुछ मुश्किल है। हो सकता है कि उसको खुले आसमान तले ऐसे रोमांचक सेक्स बिना संतुष्टि न मिलती हो। 

दरअसल इस देश के आम लोगों की जिंदगी में सेक्स की जितनी सीमित परिभाषाएं हैं, उनमें दुनिया में दूसरी जगहों पर दशकों या सदियों से दर्ज परिभाषाएं भी नहीं गिनी जातीं। दुनिया भर में लोगों की जो किस्में हैं, वे भारत में सिवाय मनोविज्ञान की किताबों के चर्चा में भी नहीं आतीं। सेक्स के बारे में किसी भी तरह की चर्चा से जो आम परहेज हिन्दुस्तान के अधिकतर लोगों में रहता है, वह भी न तो लोगों की यौन-इच्छाओं की विविधता को समझने देता, और न ही उन्हें लेकर कोई कानूनी आपत्ति होने तक जानने देता।

दो बालिग लोगों के बीच एक खुली सडक़ पर रातदहाड़े सीसीटीवी कैमरों के सामने हुए इस सेक्स पर कानून अपना काम करते रहेगा, भाजपा को जो करना रहेगा, वह करती रहेगी, लेकिन इससे इतना तो हुआ है कि लोगों के बीच सेक्स एक बार चर्चा में आया है। जितने लोग इस आदमी को धिक्कार रहे हैं, उनमें से हो सकता है बहुत से लोग जलन की वजह से भी ऐसा कर रहे हों कि यह आदमी इस तरह मजा कर रहा है, और उनकी अपनी जिंदगी से सेक्स समय के पहले आखिरी पतझड़ झेलकर सूख चुका है। 

दुनिया के किसी भी दूसरे देश के मुकाबले भारत में मंदिरों की दीवारों पर बाहर की तरफ खुले में सेक्स-प्रतिमाएं लदी हुई हैं। अभी किसी का यह शोध सामने नहीं आया है कि ऐसे तमाम मंदिरों में कुल मिलाकर कितने आसन दिखते हैं। लेकिन लोग धरम का करम मानकर ऐसे मंदिरों में परिवार सहित जाते भी हैं, और इन्हीं दीवारों के सामने परिवार सहित खड़े होकर फोटो भी खिंचवाते हैं। इसलिए सेक्स सैकड़ों सदी पहले इतना बड़ा मुद्दा नहीं था, जितना बड़ा मुद्दा आज के भारतीय नवशुद्धतावादियों ने बना दिया है। अब मंदसौर के इस नेता के हमउम्र लोगों को अपने बारे में सोचना चाहिए कि खुली सडक़ पर न सही, किसी निजी जगह पर सेक्स के लिए उनके मन में कितना उत्साह बाकी है? जैसे लोग आपदा में अवसर ढूंढते हैं, ऐसे मैं किसी बुराई में छिपी हुई अच्छाई को ढूंढने का आदी हूं। और मैं इसमें भारत के बहुत ेसे लोगों के लिए उत्साह और प्रेरणा का सामान देख रहा हूं, बस सडक़ों का खतरा न उठाएं, ऐसे उत्साही साथी को ढूंढकर आपसी सहमति से, सुरक्षा के साथ किसी निजी जगह पर जिंदगी का सुख उठाएं।

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मई 2025


 

एआई से डॉक्टरी-जांच और वकालत की गिरेगी फीस, इलाज और इंसाफ तेज होगा?

24 मई 2025 

 

अमरीका में अभी एक व्यक्ति को अपनी सेहत के चलते हवाई सफर रद्द करना पड़ा, तो होटल और एयरलाईंस ने उसे भुगतान वापिस करने से मना कर दिया। इस पर इस आदमी ने एआई की मदद से अपने मेडिकल सर्टिफिकेट की जानकारी देकर ऐसे तर्क ढूंढे कि जिनका कोई जवाब एयरलाईंस के पास नहीं था, और घंटे भर के भीतर उसने भुगतान लौटाना मान लिया। आज भारत में भी बहुत से वकील एआई का इस्तेमाल करके प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार करते हैं, और बाद में उनमें से कुछ लोग अपनी अक्ल भी लगाकर अदालत में दाखिल करने लायक दस्तावेज बनाते हैं। लेकिन लोग खुद भी अपनी सामान्य जानकारी के लिए एआई से कानूनी बारीकियों को समझ सकते हैं, और जरूरत पडऩे पर अपने वकील या डॉक्टर से उन पहलुओं की चर्चा भी कर सकते हैं। कुछ समय पहले तक कुछ डॉक्टर अपने क्लिनिक में ऐसे नोटिस लगाकर रखते थे कि गूगल से मिले ज्ञान से उपजे सवालों के जवाब देने के लिए अलग से फीस ली जाएगी। लेकिन गूगल एक सर्च इंजन है जो कि मौजूदा जानकारी को ढूंढकर सामने रखता है, उसकी अपनी कोई ऐसी कृत्रिम बुद्धि नहीं है जो कि विश्लेषण करके नतीजे सामने रखे। एआई इस मायने में सर्च इंजन से बिल्कुल और बहुत आगे की चीज है। 

अब जब मेडिकल डायग्नोसिस जैसे काम एआई की मदद से हजारों गुना रफ्तार से होने लगेंगे, कई गुना अधिक सही होने लगेंगे, तो जाहिर है कि उसकी लागत भी घटेगी, और यह शुरू हो चुका है। एक एक्सरे से लेकर एमआरआई रिपोर्ट तक को देखकर मौजूदा या संभावित बीमारी का पता लगाने में एआई की क्षमता सबसे काबिल डॉक्टर की क्षमता से भी दर्जनों या सैकड़ों गुना अधिक है। एआई दुनिया के करोड़ों एमआरआई के तजुर्बों से सीखते हुए वैज्ञानिक आधार पर भविष्यवक्ता जैसा हो सकता है, और इससे इलाज बहुत तेज रफ्तार, एकदम पुख्ता, और सस्ता हो जाना तय है। आज विशेषज्ञ चिकित्सक किसी भी देश में सबसे महंगे पेशेवर लोगों में से हैं, और अगर उनके काम का बोझ एआई से सौ गुना कम हो जाएगा, तो जाहिर है कि बाजार में ऐसे विशेषज्ञ-डॉक्टरों, या वकीलों की जरूरत घट जाएगी, और उनकी फीस भी। जो बात पश्चिम के देशों में इस्तेमाल में आ चुकी है, उनमें यह भी है कि कई किस्म के कैंसर मरीजों की बीमारी का बारीक विश्लेषण करके एआई ऐसी दवा तैयार करता है, जो कि उसी मरीज के लिए रहती है, और उस मरीज को उससे बेहतर और कोई दवा मिल नहीं सकती। कुल मिलाकर यह कि बीमारी की शिनाख्त इंसानी डॉक्टरों के मुकाबले अधिकतर मामलों में बहुत जल्दी, बहुत सही, और इलाज के तरीकों से लेकर दवा तक, हर कदम पर एआई की मदद से बेहतर असर! एआई एक तरफ जहां बहुत सी नौकरियां खाने वाला है, वहीं पर वह इलाज के मामले में तो गरीबों की बड़ी मदद भी करना शुरू कर चुका है।

अब अगर हम हिन्दुस्तान जैसे देश को देखें जहां 48 बरस बाद कत्ल के जुर्म से एक आदमी को 103 बरस की उम्र में जेल से बेकसूर मानकर रिहा किया गया है, तो ऐसे देशों में एआई की मदद से अगर निचली अदालतों से भी मामलों का विश्लेषण हो सकेगा, उन पर कौन से कानून लागू होंगे, इसे देखा जा सकेगा, वकीलों और जजों की उपलब्धता का तालमेल बिठाया जा सकेगा, तो आज कछुआ चाल से चलने वाले अदालती मामले हो सकता है कि खरगोश की तरह छलांग लगाकर आगे बढऩे लगें। छोटे वकीलों से लेकर सबसे बड़े वकीलों तक को एआई की मेहरबानी से उनके मामलों में मौजूदा कानून, और पुराने केसों के विश्लेषण पल भर में हासिल रहेंगे, और आज पूरी दुनिया में एआई का ऐसा इस्तेमाल वकील कर ही रहे हैं। ऐसी प्रारंभिक मदद के बाद इंसानी समझ का आखिरी में इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन काम का 90 फीसदी बोझ तक एआई से घट सकता है, जाहिर है कि ऐसे में वकीलों की फीस भी कम हो सकती है, और अदालतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले मुकदमे कुछ बरसों में ही खत्म हो सकते हैं। वकील और जज एआई से यह समझ सकते हैं कि ऐसे मामलों में ऊंची अदालतों के कौन-कौन से फैसले रहे हैं, जो कि आज की बहस पर लागू होते हैं, और इससे सबका काम आसान होने लगेगा। यह कुछ उसी किस्म का रहेगा कि बनती हुई दस मंजिला इमारत की दसवीं मंजिल पर ईंट और गारा पहुंचाने के लिए जो मजदूर लगते हैं, उनकी जगह पलक झपकते ये सामान दसवीं मंजिल पहुंच जाएंगे, और उसके बाद सिर्फ मिस्त्री का जुड़ाई का थोड़ा सा काम बाकी रहेगा। 

इसकी एक दिलचस्प मिसाल हमने खुद इस्तेमाल की। अपने शहर के प्रेस कॉम्पलेक्स में जहां हमारा दफ्तर है, वहां सामने सडक़ पर हर बारिश में कई दिन तीन-चार फीट तक पानी भर जाता है, दुपहिए, और कारें तैरने लगते हैं। हमने एआई से पूछकर यह समझने की कोशिश की कि इस पानी को किस तरफ निकाला जा सकता है, तो उसने हमारे शहर के अलग-अलग मोहल्लों की समुद्र की सतह से ऊंचाई बताते हुए आधे मिनट में ही यह दिखा दिया कि इस इलाके से किस तरफ नाला ले जाया जा सकता है जिधर ढलान की वजह से ही पानी बहकर निकल जाएगा। अब शहर की टोप्पोग्राफी के नक्शे लेकर अगर बैठते, और इन्हीं बातों को तलाशते, तो हो सकता है कि उसमें कुछ घंटे लग जाते। लेकिन एक मिनट के भीतर हमें हमारे इलाके के चारों तरफ जमीन के चढ़ाव या ढलान का नक्शा मिल गया।

स्कूल-कॉलेज से लेकर रिसर्च तक एआई की वजह से लोगों पर से काम का बोझ घट रहा है, और गंभीर छात्र-छात्राओं के सामने इस बचे हुए समय का इस्तेमाल बेहतर मौलिक काम करने के लिए बचा रहता है। एआई की निकाली हुई जानकारी, और उसके किए हुए विश्लेषण के बाद भी मौलिकता की गुंजाइश बहुत रहती है, और लोग अपनी प्रतिभा का वहां पर उपयोग कर सकते हैं। इस तरह स्कूल-कॉलेज में, या रिसर्च गाईड के स्तर पर लोगों की मौजूदगी में जो कमी है, उसे एआई बड़ी अच्छी तरह पूरी कर सकता है, और फिर उसकी निकाली जानकारी का मानवीय विश्लेषण चूक के खतरों को घटा सकता है। एक तरफ काम आसान हो रहा है, दूसरी तरफ रोजगार घटते चले जाएंगे। इसी मुद्दे पर कुछ हफ्ते पहले हमने लिखा था कि लेखों के लेखक, संपादक, प्रूफ रीडर, फैक्ट चैकर, डिजिटल डिजाइनर किस तरह अप्रासंगिक होने वाले हैं, और इसका असर दिखना भी शुरू हो गया है, अधिकतर मीडिया संस्थानों में लोगों की भर्ती इस तरह के कामों के लिए बंद सी हो चुकी है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मई 2025



 

कबीर कह गए थे कि मरे जानवर की आह से भी लोहा भस्म हो जाता है..

23 मई 2025 

 

अमरीकी शह पर इजराइल हर दिन जिस तरह सौ-पचास बेकसूर फिलीस्तीनियों को गाजा में मार रहा है, उनकी आह असर तो रखती होगी। कबीर कह गए थे कि मरे हुए जानवर के चमड़े से बनी धौंकनी से भभकी हुई आग से लोहा भी भस्म हो जाता है, तो ये तो फिर बेइंसाफी के शिकार फिलीस्तीन के इंसान हैं जिनमें मरने वालों में निहत्थे औरत-बच्चों की बहुतायत है, और कुछ गिने-चुने ही हमास के हथियारबंद लोग हैं। जो लोग सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातों को लेकर ईश्वर का हवाला देते हैं, उन पर थोड़ी हैरानी होती है क्योंकि फिलीस्तीन में तो अभी बचे हुए दसियों लाख लोग बिना छत के हैं, और ऊपरवाले के लिए यह अधिक आसान होगा कि वह उन्हें देख सके। बीच में कांक्रीट की छत रहे तो उसके पार देखने में ईश्वर को कुछ दिक्कत हो सकती है, लेकिन फिलीस्तीनी सरीखे बेघर, बेछत, भूखे और बीमार, कुपोषण के शिकार, बदन के हिस्से खो चुके जख्मी लोगों को तो ईश्वर आसानी से देख लेता होगा। अब ऐसे ईश्वर को देखते हुए देखकर उसे मानने वाले लोगों के मन में क्या आता है उसे वे ही जानें, लेकिन हम इतना जानते हैं कि कबीर के कहे मुताबिक बेकसूर पर किए गए जुल्म लोहे को भी भस्म करने की ताकत रखते हैं, और फिलीस्तीन के दिल से निकली हुई आह की लपट आज अमरीका के लोकतंत्र को जलाकर राख कर रही है।

कल जिन लोगों ने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामापोसा के साथ अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को अपने दफ्तर में बहस करते, उन्हें धमकाते हुए देखा है, वह एक बहुत दुर्लभ न सही, लेकिन ट्रम्प के पहले वैसे नजारे का कोई इतिहास नहीं रहा है। एक के बाद एक विदेशी मेहमानों, और राष्ट्रप्रमुखों, शासनप्रमुखों के साथ ट्रम्प अपने खुद के दफ्तर में जिस भयानक दर्जे की बदतमीजी कर रहा है, उससे दुनिया में शिष्टाचार की परंपरा ठीक वैसे ही तहस-नहस हो रही है जैसे कि गाजा में फिलीस्तीनियों के मकान इजराइली हमले में ध्वस्त हुए हैं। इसी दफ्तर में ट्रम्प ने इसके पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की, ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टार्मर, और फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों का ऐसा ही अपमानजनक नजारा पेश किया था। मीडिया के कैमरों के सामने विदेशी अतिथियों को नीचा दिखाना, धमकाना, उनसे परले दर्जे की बदसलूकी करना, यह सब करने वाला ट्रम्प अमरीकी इतिहास का पहला राष्ट्रपति बना है, और उसने अमरीकी लोकतंत्र को घटिया साबित करने में कोई कसर नहीं रखी है।

लेकिन इससे परे भी ट्रम्प सरकार, और उसके खरबपति सहयोगी-सलाहकार जिस तरह पूरी दुनिया में अमरीका का नाम डुबा रहे हैं, वह भी गाजा में भूख से मरते हुए बच्चों के दिल से निकली हुई आह का नतीजा है। वरना किसने यह सोचा था कि जो अमरीका पूरी दुनिया में मदद के तरह-तरह के प्रोजेक्ट चलाते हुए दुनिया में अपना प्रभामंडल बनाए हुए था, उसे ट्रम्प ने कार्यकाल सौ दिन पूरा होने के पहले ही बंद कर दिया, और दुनिया के दसियों लाख भूखों, और गरीबों, बीमारों, और मरणासन्न लोगों की आह ट्रम्प को लगने लगी। एक सूदखोर-कारोबारी तानाशाह की तरह ट्रम्प ने दुनिया के जरूरतमंद तबकों की मदद के हर प्रोजेक्ट को बंद कर दिया, खुद अमरीका के भीतर लाखों लोगों को बेरोजगार कर दिया, पूरी दुनिया से पहुंचे हुए जरूरतमंद शरणार्थियों, या घुसपैठियों को गैरजरूरी हिंसक और अपमानजनक तरीके से निकाल दिया, उन सबकी आह भी इस अमरीकी राष्ट्रपति को लग रही है। फिलीस्तीन के समर्थक छात्रों को जिस तरह से देश निकाला दिया जा रहा है, उसके खिलाफ अमरीकी की ही छोटी-छोटी अदालतें ट्रम्प के खिलाफ फैसले दे रही हैं, और यह नौबत अमरीकी इतिहास में पहली बार आई है कि देश में एक आपातकाल, एक विदेशी हमला जताते हुए ट्रम्प आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल कर रहा है, और संसद से परे सैकड़ों-हजारों फैसले ले रहा है। दुनिया के बहुत से देशों में अमरीका ने बमबारी करके लाखों लोगों को मारा है, और आज मानो उन तमाम की लाशों की चमड़ी धौंकनी बनकर अमरीकी लोकतंत्र को जला रही हैं। खुद अमरीका के भीतर ट्रम्प ने दुनिया भर में छेड़े हुए टैरिफ-वॉर की वजह से ऐसी भयानक आर्थिक परेशानी खड़ी कर दी है कि कारोबारी आयात नहीं कर पा रहे हैं, आम अमरीकी खरीदी नहीं कर पा रहे हैं, और अमरीकी अर्थव्यवस्था एक अभूतपूर्व और खतरनाक बवंडर के बीच फंस गई है। अफगानिस्तान, इराक हो, सीरिया हो, या फिलीस्तीन हो, लाखों बेकसूरों पर बरसने वाले अमरीकी बमों का हिसाब किसी को तो चुकता करना था, और वह ट्रम्प की शक्ल में अमरीका में हो रहा है जो कि अमरीकी लोकतंत्र को मलबा बनाकर छोड़ रहा है। यह पूरा सिलसिला इतना भयानक खतरनाक है कि अमरीकी संसद, वहां की न्यायपालिका, वहां खुद ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि चार बरस के कार्यकाल में ट्रम्प अमरीका को कहां ले जाकर पटकेगा।

लोगों को याद रखना चाहिए कि दुनिया का रिवाज है कि आम बोने वाले को आम मिलते हैं, और बबूल बोने वाले को बबूल मिलते हैं। अमरीका की जनता ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प बोया है, और अब वह बर्बादी की फसल के सामने खड़ी है। दुनिया का इतिहास एक सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसा बददिमाग तानाशाह पहली बार देख रहा है, और खुद अमरीकी जनता अपनी बर्बादी के बाद इस बात पर शायद अफसोस करेगी कि उसने चार बरस की यह तबाही चुनी थी। सरकार और देश को चलाना, दुनिया के तमाम देशों में एक मुखिया देश रहना, पूरी दुनिया में एक शांति कायम करना, इसके लिए एक जनकल्याणकारी इंसान की जरूरत पड़ती है, ट्रम्प जैसे आत्ममुग्ध तानाशाह, सूदखोर कारोबारी, और बदजुबान बदचलन के बस का यह काम नहीं रहता। फिर भी यह अमरीका को गाजा जैसी जगहों के बेकसूर मरने वालों की आह का तोहफा है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मई 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई 2025



 

नक्सल मोर्चे पर एक के बाद एक कामयाबी भी पूरी कामयाबी नहीं!

  22 मई 2025 

 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पिछले दो-तीन दिनों से चल रही मुठभेड़ के बाद कल पुलिस ने नक्सलियों के एक सबसे बड़े नेता सहित 27 नक्सलियों को मारने की घोषणा की है, और उनकी लाशें भी बरामद की हैं। अभी दस दिन पहले भी छत्तीसगढ़ पुलिस ने बस्तर में एक पहाड़ी पर चल रही लंबी मुहिम के बाद 32 नक्सलियों को मारने की घोषणा की थी, जिनमें से 22 एक साथ मारे गए थे। अपने एक सबसे बड़े नेता, जिस पर पुलिस ने डेढ़ करोड़ का ईनाम रखा हुआ था, उसे खोकर नक्सली जाहिर तौर पर कमजोर हो गए दिखते हैं। राज्य में भाजपा सरकार आने के बाद से लगातार जिस तरह बस्तर के इलाके में नक्सली मारे जा रहे हैं, वह हैरान करने वाला सिलसिला है। दूसरी तरफ यह बरसों में पहला मौका है जब ऐसी अधिकतर मौतों को नक्सलियों ने अपने लोगों की माना है, और एक-दो मामलों में ही उन्होंने दो-चार लोगों के बारे में कहा है कि वे नक्सली नहीं थे, आम ग्रामीण थे। नक्सल-मुठभेड़ में नक्सलियों की मौतें भाजपा के इस शासन काल में पांच सौ के करीब पहुंच रही हैं, और इसके पहले कांग्रेस के पूरे पांच बरस में भी नक्सलियों को ऐसी टक्कर कभी नहीं मिली थी। राज्य बनने के बाद पहले तीन साल की कांग्रेस सरकार विरासत में मिली हुई नक्सल समस्या पर कुछ भी नहीं कर पाई थी, बाद की पन्द्रह बरस की रमन सिंह सरकार का मिलाजुला रिकॉर्ड रहा, और उसने मानवाधिकार हनन के आरोप झेलते हुए भी मुहिम जारी रखी थी। कुल पन्द्रह बरसों में दस बरस केन्द्र में यूपीए सरकार थी, लेकिन भाजपा के रमन सिंह ने कभी कोई अवांछित टकराव मनमोहन-सरकार से नहीं लिया था, और दोनों के तालमेल से नक्सल विरोधी अभियान चल रहा था। यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के इतिहास का नेताओं पर सबसे बड़ा नक्सल हमला, झीरम, भी रमन सिंह के कार्यकाल में हुआ था, जिसमें कांग्रेस के बहुत से बड़े-बड़े नेता छांट-छांटकर मार दिए गए थे।

अब छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के साथ ही 2024 की शुरूआत से ही सरकार ने बहुत खुले अंदाज में नक्सलियों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। करीब साल भर उस पर नक्सलियों की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। दूसरी तरफ राज्य की पुलिस की अगुवाई में केन्द्रीय सुरक्षा बल थोड़े से बढ़े, क्योंकि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश से नक्सल हिंसा खत्म करने की घोषणा की थी, और उनकी पार्टी की सरकार ने इसे चुनौती की तरह लेकर नक्सलियों को कमजोर करने का असाधारण, और अभूतपूर्व अभियान चलाया। बीते बरसों में जिस तरह छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों पर अंधाधुंध हिंसा के आरोप लगते थे, गांव जला देने, और बलात्कार के आरोप लगते थे, वह पूरा सिलसिला इस बार शुरू ही नहीं हुआ। पहले डेढ़-डेढ़ दर्जन लोगों को एक-एक फर्जी मुठभेड़ में मार डालने की बात न्यायिक जांच में ही सामने आई, लेकिन अब तो उस तरह के कोई आरोप भी नहीं लगे। समाज के एक मुखर तबके ने हमेशा की तरह यह घिसा-पिटा नारा लगाना जारी रखा कि बेकसूर आदिवासी मारे जा रहे हैं, लेकिन पांच सौ के करीब नक्सलियों के मारे जाने पर भी ऐसे आरोप पांच-दस लोगों के लिए भी नक्सलियों ने नहीं लगाए, और तकरीबन तमाम लोगों को अपना मानकर बयान जारी किए, और लिस्ट जारी की। यह नौबत सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचे हुए मामलों के लंबे इतिहास से बिल्कुल अलग रही।

एक बात पर गौर करना जरूरी है कि इस भाजपा सरकार के तहत बस्तर में नक्सल विरोधी मुहिम चलाने वाली पुलिस की राजनीतिक लीडरशिप होते नहीं दिखी। पुलिस को उसका काम दे दिया गया, उसमें न राजनीतिक दखल दिखी, और न ही राजनेता बैठकर नक्सल विरोधी रणनीति बनाते रहे, किसी अभियान या मुहिम का श्रेय पाते रहे। नेताओं ने अपने आपको इस मुहिम से अलग रखा, और पुलिस को उसका काम करने दिया। आज पिछले सवा साल में पुलिस की असाधारण कामयाबी के पीछे शायद यह भी एक वजह रही कि सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी ने पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों के काम में दखल नहीं दी, और उन्होंने पेशेवर अंदाज में नक्सलियों के खात्मे का काम तेजी से जारी रखा। यहां यह बात भी चर्चा के लायक है कि मारे गए नक्सलियों के अनुपात में ग्रामीणों और सुरक्षाबलों की मौतें बहुत ही कम हुईं, जो कि अपने आपमें एक नया इतिहास है।

अभी इसी महीने बस्तर की एक बड़ी पहाड़ी पर नक्सलियों के एक इतने बड़े अड्डे पर पुलिस ने कब्जा किया जो कि किसी ने सोचा भी नहीं था। कहीं खंदक, कहीं गुफाएं, और कहीं हथियार बनाने के वर्कशॉप! एक पहाड़ी पर उन्होंने अपनी दुनिया ही बसा रखी थी, और अगर पहाड़ी के दूसरी तरफ तेलंगाना निकल भागने का मौका नक्सलियों को नहीं मिला होता, तो उनकी मौतों की गिनती और अधिक रहती। हम देश के भीतर के लोगों को, चाहे वे हथियारबंद आंदोलन ही क्यों न चला रहे हों, उन्हें मारने को सरकार की पहली प्राथमिकता नहीं मानते। हमारा मानना है कि पहली प्राथमिकता बातचीत होनी चाहिए, क्योंकि पड़ोस के नेपाल से लेकर दुनिया के कई दूसरे देशों तक हथियारबंद आंदोलन बातचीत से ही खत्म हुए हैं, और ऐसे आंदोलनकारी लोकतांत्रिक राजनीति की मूलधारा में लाए गए हैं। नक्सली पूरी तरह से भारतीय हैं, और उनके साथ भी बातचीत की एक संभावना निकाली जा सकती थी, निकाली जानी चाहिए। सरकार ने अपनी तरफ से बहुत पहल की, लेकिन उस वक्त नक्सलियों ने सरकार को अनसुना किया, और अब जब वे बहुत कमजोर पड़ चुके हैं, तो वे बार-बार बातचीत की सार्वजनिक अपील कर रहे हैं, लेकिन अब सरकार अपने आपको ऐसे किसी दबाव में आने से परे रख रही है। फिर भी हमारा मानना है कि और मौतों के बजाय जिनमें नक्सलियों के साथ-साथ ग्रामीणों और सुरक्षाबलों की मौतें भी शामिल हैं, सरकार को बातचीत जरूर करनी चाहिए क्योंकि नक्सलवाद सिर्फ बंदूकों से खत्म हो जाएगा, ऐसी संभावना कम है, और एक विचारधारा के रूप में भी उसे खत्म करने के लिए बातचीत से नक्सलियों को लोकतंत्र की मूलधारा में लाना बेहतर होगा।

(Daily Chhattisgarh)

एक शहर की तो मिसाल है, लेकिन बिखरी हुई संभावनाओं का हर जगह ऐसा ही हाल है...

 21 मई 2025 

 

सरकार के कामकाज में जहां 25-30 बरस तक काम करने वाले अफसरों को योजनाएं बनानी चाहिए, या समस्याओं को सुलझाना चाहिए, वहां पर जब बार-बार अदालत को दखल देना पड़े, तो यह साफ रहता है कि निर्वाचित और सत्तारूढ़ जनप्रतिनिधि अफसरों की अपनी टीम के साथ काम ठीक से नहीं कर पा रहे। अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रदेश के पहले सरकारी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में मरीजों के साथ आए घरवालों के रूकने या खाना बनाने का कोई इंतजाम न होने पर हाईकोर्ट ने अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग से जवाब-तलब किया है। अदालत का कहना है कि यह सरकारी अस्पताल है, और अगर एक हजार मरीजों की क्षमता वाले इस अस्पताल में मरीजों के साथ दो-दो लोग भी आते हैं, तो उतने लोगों के रहने-खाने का क्या इंतजाम किया गया है? वैसे तो मेकाहारा नाम से पहचाने जाने वाले इस अस्पताल के बगल में दो-दो ऐसे भवन बने हुए हैं, जहां बहुत ही मामूली भुगतान करके मरीजों के साथ के लोग ठहर सकते हैं, और खा सकते हैं। समाजसेवा के इस इंतजाम का भी खर्च जो लोग नहीं उठा पाते, या जिन्हें वहां जगह नहीं मिल पाती, ऐसे लोगों को अस्पताल कैम्पस में किसी भी जगह पड़े देखा जा सकता है। 

आज हम राजधानी रायपुर की इस दिक्कत को लेकर जो चर्चा कर रहे हैं वह है तो रायपुर की, लेकिन बहुत से शहरों में योजना की इस तरह की दिक्कत है। यहां पर मेडिकल कॉलेज, कैंसर अस्पताल, मेडिकल कॉलेज का हॉस्पिटल, एडवांस हार्ट केयर सेंटर, डेंटल कॉलेज, फिजियोथैरेपी कॉलेज, जैसे कई संस्थान अगल-बगल में चल रहे हैं। लेकिन यहां पर आबादी का दबाव इतना बढ़ता चल रहा है कि हर किस्म की क्षमता चुक जा रही है। अब अगर इसी एक जगह की दिक्कत और संभावनाओं को देखें, तो दिखता है कि मेडिकल कॉलेज के ठीक सामने कई एकड़ पर बसा हुआ जेल का कैम्पस है, और जेल का पुराना मुख्यालय भी है जो कि खाली हो चुका है। अब अगर सरकार जेल को अपनी एक पुरानी योजना के मुताबिक शहर से कुछ दूरी पर ले जाती है, तो वहां पर कम खर्च में आधुनिक जेल बन सकती है, सबको अधिक सहूलियत हो सकती है, और जेल का यह बहुत बड़ा कैम्पस शहर के बीचोंबीच मौजूदा मेडिकल कॉलेज के सामने चिकित्सा उपयोग में लाया जा सकता है। इसके मिलने के बाद अगले 25-50 बरस तक चिकित्सा विभाग को शहर में और जगह की जरूरत नहीं रहेगी। दूसरी तरफ जेल को बाहर ले जाना 20-25 बरस पुरानी योजना है, और वहां से कैदियों को अदालत लाने का काम आज भी बसों से ही होता है, जो बाद में भी जारी रह सकता है। 

सरकारी जमीन के लंबे समय के इस्तेमाल को योजना में तो लिया जा सकता है, लेकिन जब शहरी मास्टर प्लान बनते हैं, तो सत्ता का अधिकतम ध्यान इस पर रहता है कि कैसे जमीनों का उपयोग बदलकर खुद फायदा लिया जा सकता है, या पसंदीदा लोगों को दिलवाया जा सकता है। इसी के तहत अपनी ग्रीनलैंड, या आमोद-प्रमोद की जमीन को रिहायशी या कारोबारी बनवा लिया जाता है, या इसी तरह के पसंद-नापसंद के दूसरे काम किए जाते हैं। सरकार का जो ध्यान शहर के ढांचे, उसके विस्तार, और सरकारी या निजी जमीनों के सबसे बेहतर इस्तेमाल पर रहना चाहिए, वह जरूरत किनारे बैठी रह जाती है। फिर सरकारी जमीन पर खुद सरकार के अलग-अलग विभागों, स्थानीय संस्थाओं, शहर विकास प्राधिकरण या हाऊसिंग बोर्ड की नजर लगी रहती है, और सरकार के भीतर राजनीतिक खींचतान और दबाव के वजनतले शहरी विकास के तर्क धरे रह जाते हैं। जिस विभाग को जहां जमीन दिखी, उसे आबंटित कराकर वहां निर्माण करवाने में सबकी कमाई होती है, इसलिए जमीन पर सबकी नजर और नीयत लगी रहती है। 

जब सरकार की खुद की योजनाएं रहती हैं, तो इन बातों को अनदेखा कर दिया जाता है कि शहर के किस हिस्से में कितनी भीड़ बढ़ाने वाली योजनाएं बनाना ठीक या गलत होगा। शहर के जो हिस्से लगातार ट्रैफिक जाम से घिरे रहते हैं, वहां पर भी पुरानी मंडी की बहुत लंबी-चौड़ी जमीन पर बहुमंजिला योजना बना ली जाती है, और यह भी नहीं देखा जाता कि उसका दबाव आसपास की सडक़ों पर कितना पड़ेगा। सरकार के भीतर भी कारोबार की संभावनाओं वाली योजनाओं को लेकर आपसी मुकाबला चलते रहता है, और जब जिस नेता की चलती है, वे अपने विभाग के लिए, या अपने म्युनिसिपल, प्राधिकरण, या मंडल के लिए जमीन ले लेते हैं। सच तो यह है कि शहरी मास्टर प्लान बनाना होता ही है 25-30 बरस बाद के हिसाब से, लेकिन हकीकत में आज बढऩे वाली दिक्कत को देखते हुए भी कई योजनाओं को आगे बढ़ा दिया जाता है। 

हम एक बार फिर रायपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल से जुड़ी हुई दिक्कतों की बात करें, तो अस्पताल के ठीक सामने सौ-पचास एकड़ का जेल परिसर तुरंत ही अस्पताल की योजना में लेना चाहिए, जेल को शहर के बाहर ले जाना चाहिए, और चिकित्सा सुविधाओं, चिकित्सा शिक्षा का एक ऐसा विस्तार हो सकता है जिसके लिए सडक़ के दोनों तरफ के परिसरों को सुरंग और ओवरब्रिज से जोड़ा जा सकता है, जैसा कि मुम्बई जैसे शहरों में भी हुआ है। हालांकि अभी मामला अदालत की वजह से खबर में आया है, फिर भी राज्य सरकार की ही 25 बरस पुरानी योजना पर दुबारा गौर करने से कोई रोक तो है नहीं, और किसी शहर के लिए, शहर के बीच इतनी बड़ी संभावना निकलना आसान भी नहीं रहता है। राज्य सरकार को तुरंत इस बारे में गौर करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मई 2025



 

बदजुबान मंत्री से रियायत, और मुस्लिम प्रोफेसर पर...

20 मई 2025 

 

मध्यप्रदेश के एक बदजुबान मंत्री की भारतीय सेना की मुस्लिम महिला कर्नल को आतंकियों की बहन बताकर दिए गए भयानक भडक़ाऊ बयान पर मुख्यमंत्री या सत्तारूढ़ भाजपा ने कुछ नहीं किया है, बल्कि जब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खुद होकर इस मामले में मंत्री के खिलाफ चार घंटे में एफआईआर करने का आदेश दिया, तब भी एफआईआर में मंत्री को बचाने की भरसक कोशिश की गई। उसके बाद से हाईकोर्ट, और उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मंत्री पर दोनों अदालतों का जो रूख है, उसे देखते हुए भी भाजपा हैरान करने की हद तक चुप है। इससे और कुछ नहीं हो रहा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जो भी मकसद एक हिन्दू, और एक मुस्लिम महिला फौजी अफसरों को पाकिस्तान पर हमले की प्रेस ब्रीफिंग में रखने के पीछे था, उसकी बहुत बुरी हार हुई है। एक तरफ तो देश हर दिन की प्रेस ब्रीफिंग को टीवी पर जीवंत देखकर भारत के हिन्दू-मुस्लिम समुदायों को एक साथ भी देख रहा था, और दूसरी तरफ एक मुस्लिम देश पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी जुबान में ठोस जानकारी देने का काम एक मुस्लिम हिन्दुस्तानी फौजी महिला अफसर कर रही थी, उससे पाकिस्तान को भी एक संदेश जा रहा था। लेकिन बदजुबानी और बकवास के लिए पहले से बदनाम चले आ रहे मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच और माईक से जिस तरह आधा दर्जन, या अधिक बार इस भारतीय महिला कर्नल को आतंकियों की बहन करार दिया, वह सुनना भी भयानक था, और भाजपा और मोदी सरकार का इसे बर्दाश्त करना तो और भी भयानक है। एक बदजुबान कई मौकों पर अपनी असलियत दिखा सकता है, लेकिन आज जब मोदी सरकार देश की सभी पार्टियों से यह उम्मीद करती है कि उसके सांसद दुनिया भर में जाकर भारत सरकार की पाकिस्तान पर की गई फौजी कार्रवाई को जायज ठहराएं, तो घर के भीतर इस किस्म की गंदगी को झाड़ू से साफ करके बाहर निकालने का काम भाजपा क्यों नहीं कर रही है, यह समझ से परे है। 

और कुछ नहीं तो भाजपा को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के दो जजों की बेंच, और सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच की कही हुई बातों को ही सुन लेना चाहिए। ये बातें किसी विपक्षी पार्टी की कही हुई नहीं है, और ऐसा भी नहीं है कि लगातार दो बड़ी अदालतों के दो-दो जज आए दिन एक किस्म का इतना कड़ा रूख अख्तियार करते हों। फिर यह भी है कि इस मंत्री ने माफी मांगते हुए जिस किस्म की अगर-मगर, किन्तु-परन्तु की भाषा का इस्तेमाल किया है, उससे भी समझ पड़ता है कि अदालतों के ऐसे कड़े रूख के बावजूद मंत्री के कस-बल अभी निकले नहीं हैं, और अदालत को यह कहना पड़ा है कि मंत्री की यह माफी घडिय़ाली आँसू सरीखी है। इसके साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने मंत्री के इस बयान की जांच के लिए जितने खुलासे में जाकर मध्यप्रदेश के तीन आईपीएस अफसरों का एक विशेष जांच दल बनाया है, और उसकी रिपोर्ट हफ्ते भर में मांगी है, वह सब देखकर भाजपा को मौके की नजाकत समझनी थी। एक पार्टी के रूप में अगर भाजपा इसे नहीं समझ पाई, तो भारत सरकार के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात को समझना था कि आज जब पूरा देश फौज के साथ खड़ा है, और खुद भाजपा पूरे देश में तिरंगा यात्रा निकाल रही है, तब उनकी पार्टी का मध्यप्रदेश का एक मंत्री किस तरह की साम्प्रदायिक नफरत वाली गंदगी फैला रहा है, एक फौजी अफसर, एक महिला को नीचा दिखा रहा है। यह देखना थोड़ा सा हैरान करता है कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, और भारत के आज के सबसे कामयाब नेता मिलकर भी इस मौके की नजाकत को समझ नहीं रहे हैं, और ऐसे मंत्री को पालकर रख रहे हैं। 

इसके साथ ही समानांतर चल रहा एक दूसरा मामला अगर साथ-साथ रखकर नहीं देखा जाएगा, तो वह आज के हिन्दुस्तान के साथ बेइंसाफी होगी। हरियाणा में दर्ज कराई गई एक एफआईआर के आधार पर देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, अशोका यूनिवर्सिटी के एक मुस्लिम प्रोफेसर को गिरफ्तार किया गया है, उन पर महिलाओं की गरिमा के खिलाफ लिखने, और फौज के खिलाफ लिखने जैसे कई आरोप लगाए गए हैं। मध्यप्रदेश के मंत्री के जुर्म को अनदेखा करना जितना भयानक है, उतनी ही भयानक इस मुस्लिम प्रोफेसर पर की गई कार्रवाई है। हरियाणा के महिला आयोग ने एक शिकायत की, और पुलिस ने आनन-फानन इस प्रोफेसर को गिरफ्तार किया है। प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा था- ‘इतने सारे दक्षिणपंथी टिप्पणीकार कर्नल सोफिया कुरैशी की तारीफ कर रहे हैं, ये देखकर मैं खुश हूं, लेकिन ये लोग शायद इसी तरह से मॉबलिचिंग के पीडि़तों, मनमाने ढंग से बुलडोजर चलाने, और बीजेपी के नफरत फैलाने के शिकार लोगों को लेकर भी आवाज उठा सकते हैं कि इन लोगों को भारतीय नागरिक के तौर पर सुरक्षा दी जाए। दो महिला सैनिकों के जरिए जानकारी देने का नजरिया महत्वपूर्ण है, लेकिन इस नजरिए को हकीकत में बदलना चाहिए, नहीं तो यह केवल पाखंड है। सरकार जो दिखाने की कोशिश कर रही है, उसकी तुलना में आम मुसलमानों के सामने जमीनी हकीकत अलग है। लेकिन साथ ही इस प्रेस कांफ्रेंस से पता चलता है कि भारत अपनी विविधता में एकजुट है, एक विचार के रूप में पूरी तरह से मरा नहीं है।’ इस पोस्ट के अंत में प्रोफेसर खान ने तिरंगे झंडे की फोटो के साथ जय हिन्द लिखा था।

अब अगर इन बातों को देखें, तो इनमें से एक भी बात महिला की गरिमा के खिलाफ नहीं है, और न ही फौज के खिलाफ है। इसमें कोई नई बात भी नहीं है, क्योंकि भारत में बहुत सारे लोग लगातार यह बात लिखते आए हैं कि देश में जगह-जगह धार्मिक आधार पर, और साम्प्रदायिक नीयत से मुस्लिमों पर हमले हो रहे हैं, और उन पर बुलडोजर चल रहे हैं, और उनकी मॉब-लिचिंग हो रही है। उन्होंने इसमें कोई भी नई बात नहीं कही है। कल जब इंडिया टुडे समूह के एक अंग्रेजी टीवी चैनल पर एक महिला एंकर ने हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष को उनके नोटिस के लिए घेरा, और बार-बार, एक दर्जन से अधिक बार यह पूछा कि उन्होंने अपने नोटिस में प्रोफेसर खान से जिन लाईनों के लिए जवाब मांगा है, खान की पोस्ट में वो लाईनें हैं कहां, तो आयोग अध्यक्ष की बोलती बंद हो गई, उन्हें किसी कागज में वे लाईनें नहीं दिखीं जिनका जिक्र करते हुए प्रोफेसर खान को नोटिस जारी किया गया था। 

आज देश में जब ये दोनों मामले समानांतर चल रहे हैं, अलग-अलग लेकिन एक ही साथ खबरों में बने हुए हैं, तो यह हैरानी होती है कि एक प्रदेश की भाजपा सरकार, और दूसरे प्रदेश की भाजपा सरकार का दो बयानों पर यह कैसा रूख है! एक में मंत्री की बदजुबानी, और उसकी नफरती बातों पर हाईकोर्ट, और सुप्रीम कोर्ट अपना घंटों का वक्त लगा रहे हैं, और दूसरी तरफ एक मुस्लिम प्रोफेसर की लिखी हुई बहुत साधारण बातों को लेकर उसे महिलाविरोधी, और फौजविरोधी साबित किया जा रहा है। ये दोनों मामले सुप्रीम कोर्ट तक अलग-अलग पहुंचे हुए हैं, एक मामले में तो अदालत का शुरुआती रूख दिख गया है, और दूसरे मामले में हमारा ख्याल है कि प्रोफेसर खान को अदालत से तुरंत राहत मिलेगी, और हरियाणा पुलिस को झिडक़ी। देखते हैं क्या होता है। आज जब भारत के सर्वदलीय सांसद बाहर जाकर दुनिया को भारत के रूख से सहमत कराने में लगे हैं, तब मध्यप्रदेश और हरियाणा के ये दो मामले भारत सरकार के रूख को कमजोर करने में लगे हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 मई 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मई 2025



 

सीजेआई के लिए शिष्टाचार की अनदेखी शर्मनाक, पर इसकी जरूरत क्यों हो?

  19 मई 2025 

 

देश में अब तक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने 52 लोगों में से जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई दूसरे दलित हैं। वे अंबेडकरवादी बौद्ध हैं, और भारत के आम दलितों की तरह वे भी बहुत ही वंचित समाज से निकलकर आए हैं, और इस जगह तक पहुंचने का उनका सफर भारतीय लोकतंत्र की एक मजबूत संस्कृति भी बताता है जिसके तहत यह मुमकिन हो पाया। वे महाराष्ट्र के विदर्भ में अमरावती में पैदा हुए, म्युनिसिपल स्कूल में पढ़े, और वकालत में आए। देश के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद वे अभी अपने गृह प्रदेश महाराष्ट्र के पहले दौरे पर पहुंचे, और वे मुम्बई में बौद्ध समुदाय के तीर्थ, चैत्यभूमि जाकर डॉ.अंबेडकर को श्रद्धांजलि देकर उनका आशीर्वाद लेने वाले थे, लेकिन विमानतल पर कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से उस पर निराशाभरी प्रतिक्रिया जाहिर की। उन्होंने कहा कि देश में मुख्य न्यायाधीश के लिए सरकार की तरफ से जो शिष्टाचार नियम लागू हैं, उनकी अनदेखी करते हुए उनके लिए एयरपोर्ट पर मुख्य सचिव, डीजीपी, और मुम्बई पुलिस कमिश्नर में से कोई भी नहीं पहुंचे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के बीच आपस में सम्मान रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र का कोई व्यक्ति देश का मुख्य न्यायाधीश बनता है, और पहली बार महाराष्ट्र आता है, तो भी अगर ये तीनों अफसर मौजूद रहना नहीं चाहते, तो उन्हें इस पर सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह शिष्टाचार कोई साधारण औपचारिकता नहीं है, और इसलिए वे सार्वजनिक रूप से इस बारे में कह रहे हैं, वरना वे इस तरह की छोटी बातों में उलझना नहीं चाहते। 

यह एक शर्मनाक स्थिति है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को अपने ही प्रदेश में, और पहले ही प्रवास पर इस तरह की उपेक्षा देखने मिली। मुख्य सचिव सुजाता सौनिक, डीजीपी रश्मि शुक्ला, और मुम्बई पुलिस कमिश्नर देवेन भारती सीजेआई की सार्वजनिक प्रतिक्रिया की खबरें आने के बाद चैत्यभूमि के उनके कार्यक्रम में हड़बड़ाए हुए पहुंचे। यह भी एक संयोग है कि इन तीन अफसरों में दो तो महिलाएं ही हैं, और मुख्य सचिव के रूप में सुजाता सौनिक महाराष्ट्र की पहली महिला मुख्य सचिव भी है। देश के मुख्य न्यायाधीश का महाराष्ट्र की राजधानी पहुंचना, और पद संभालने के बाद पहली बार पहुंचना, मौजूदा शिष्टाचार-नियमों से परे भी राज्य के लिए उत्साह की एक बात होनी चाहिए थी, और शायद यह एक समझदारी की बात होती, अगर मुख्यमंत्री भी उनसे मिलने पहुंचते, क्योंकि सीएम और सीजेआई दोनों ही नागपुर शहर के भी रहे। लेकिन ऐसा कोई उत्साह देखने मिला नहीं। उत्साह और शिष्टाचार के नियमों से परे, हमें तो सामाजिक रूप से यह बात भी महत्वपूर्ण लगती है कि एक दलित सीजेआई, एक दलित तीर्थ के लिए आ रहे हैं, और प्रोटोकाल के मुताबिक जिन अफसरों को वहां जाना चाहिए था, उनमें से एक या अधिक नाम सवर्ण तबके के दिख रहे हैं। हम बात-बात पर जात पर जाना तो नहीं चाहते, लेकिन इस सामाजिक हकीकत को कैसे अनदेखा किया जाए? 

जहां तक प्रोटोकाल नियमों की बात है, तो इन्हें बदलने की जरूरत है। अगर प्रदेश के तीन सबसे बड़े अफसर सीजेआई या प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर जाने-आने, और वहां खड़े रहने में दो घंटे का समय जाया करेंगे, तो वह वक्त जनता के कामकाज को छोडक़र ही होगा। ऐसा भी भला क्या शिष्टाचार हो सकता है जिसमें किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के स्वागत में, बिना किसी काम के बड़े-बड़े लोगों को झोंक दिया जाए? हमारे हिसाब से तो आने वाले ऐसे मेहमानों के लिए मुनासिब सुरक्षा व्यवस्था रहना चाहिए, ताकि उन्हें कोई खतरा न हो। इसके अलावा वे जिस कार्यक्रम के लिए आ रहे हैं, उससे संबंधित लोग वहां पहुंचें ताकि वे रास्ते में अतिथि को कार्यक्रम की जानकारी दे सकें। इससे परे किसी शिष्टाचार की जरूरत क्यों होनी चाहिए? मुख्यमंत्री या राज्यपाल का जहां जाना हो, वे शिष्टाचार के हिसाब से जाएं, क्योंकि उनके जिम्मे सरकारी दफ्तर में पूरे वक्त बैठने का कोई काम भी नहीं रहता, लेकिन अफसरों को शिष्टाचार और स्वागत में झोंकने के सामंती नियमों को क्यों जारी रखा जाए? हमें अधिक खुशी होती अगर सीजेआई कल के इस अनुभव के बाद मुख्य न्यायाधीश के पद को शिष्टाचार-सूची से बाहर करने की सिफारिश केन्द्र सरकार से करते, या कम से कम निजी स्तर पर यह लिखते उनके इस पद पर रहते हुए कोई शिष्टाचार व्यवस्था न की जाए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के आने पर हो सकता है कि राज्य के हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, या वहां के रजिस्ट्रार को उनसे काम की कोई बात करनी हो, वैसे होने पर उनका चले जाना जायज होता, लेकिन शिष्टाचार के लिए वह भी क्यों होना चाहिए? उन्हें काम से काम रखना चाहिए। 

हिन्दुस्तान में शिष्टाचार का आतंक इतना है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के आने पर खुले एयरपोर्ट या हैलीपैड पर 45-46 डिग्री की गर्मी में भी कलेक्टर, और भी कुछ अफसरों को बंद गले का कोट, या सूट-टाई पहनकर खड़ा होना पड़ता है। यह पूरी सामंती और राजसी व्यवस्था है, और इस पाखंड का खात्मा देश के आजाद होते ही हो जाना चाहिए था। यह सब कुछ जनता के पैसे बर्बाद करने पर होता है, और यह मान लिया जाता है कि तथाकथित वीवीआईपी अतिथि के सम्मान में जनता का काम छोडक़र लोग अपने वक्त की बर्बादी करें, और यातना भी झेलें।

पता नहीं शिष्टाचार का ऐसा आनंद लेने वाले बड़े जजों के सामने, अगर कोई जनहित याचिका जाए, और यह अपील करे कि वक्त की ऐसी बर्बादी खत्म की जाए, ताकि अफसर अपना काम कर सकें, तो जजों को यह बात जनहित की लगेगी या नहीं? लेकिन हम इस सिलसिले को अलोकतांत्रिक और अमानवीय मानते हैं। हमारा यह भी मानना है कि जहां जिसकी जरूरत न हों, वहां उसे एक सामंती शिष्टाचार के तहत पुतले की तरह खड़ा न किया जाए, यह कामकाजी अफसरों या कर्मचारियों की हेठी भी है, और जनता के पैसों की बर्बादी भी है। सीजेआई जस्टिस गवई ने इस मुद्दे को उठाया है, हमारा मानना है कि उन्हें इसे तर्कसंगत अंत तक भी ले जाना चाहिए, और इस पाखंडी प्रोटोकाल को खत्म करवाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)