अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण-विरोधी फैसले से हिन्दुस्तान भी नसीहत ले..

30 जून 2023 

 

अमरीका के सुप्रीम कोर्ट की खबर है कि उसने वहां 1960 के दशक से यूनिवर्सिटी दाखिलों में चल रहे सकारात्मक पक्षपात की व्यवस्था को खत्म किया है। इसे वहां अफरमेटिव एक्शन कहा जाता था जिसके तहत वंचित नस्लों के बच्चों को उनकी विविधता के आधार पर विश्वविद्यालयों में कुछ प्राथमिकता दी जाती थी। इसके तहत काले लोगों और सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों को एक किस्म से आरक्षण दिया जाता था, जैसा कि भारत में दलित-आदिवासी, और ओबीसी बच्चों को मिलता है। पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसे एक शानदार फैसला कहा है, और वहां का जो गोरा समुदाय मोटेतौर पर ट्रंप का हिमायती रहता है, उसके लोग भी खुशी मना रहे हैं क्योंकि इससे उनके बच्चों के लिए अवसर बढ़ेंगे। राष्ट्रपति जो बाइडन ने इससे पूरी तरह असहमति जताई है और कहा है कि इस फैसले का 9 जजों में से 6 ने समर्थन किया है जो कि कंजरवेटिव हैं, और 3 ने विरोध किया है जो कि लिबरल हैं। अमरीकी न्याय व्यवस्था में राष्ट्रपति के मनोनीत उम्मीदवार संसद की कमेटी की लंबी सुनवाई के बाद जज बनते हैं, और उनकी राजनीतिक विचारधारा, उनकी सामाजिक सोच, देश के विवादास्पद मुद्दों पर उनके पूर्वाग्रह ऐसी सुनवाई में खुलकर सामने आते हैं, इसलिए कोई अदालती फैसला आने के पहले अमरीका खुलकर चर्चा करता है कि कौन से जज अपनी राजनीतिक सोच के चलते किस किस्म का फैसला देंगे, इसे वहां पर अदालत की अवमानना में नहीं गिना जाता, और न ही अदालत को प्रभावित करने की कोशिश कहा जाता। वहां जज और लोकतांत्रिक व्यवस्था में इतनी परिपक्वता है कि वे ऐसे छोटे-मोटे प्रभावों से ऊपर रहते हैं। 

अब अमरीका में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सरकार के लोग खुलकर बोल रहे हैं, और सरकार यह बतला रही है कि इस फैसले के बावजूद वह किस तरीके से विश्वविद्यालयों में विविधता बनाए रखने का काम कर सकती है, यह देखना इसलिए सुखद है कि अदालत अगर संकीर्णतावादी है, तो सरकार खुलकर समाज के वंचितों के पक्ष में कुछ करने की बात कर रही है। अदालत ने दाखिले के मामले में रंग के आधार पर कोई भी भेदभाव करने को गैरकानूनी करार दिया है, चाहे यह भेदभाव एक नीति के आधार पर सामाजिक-वंचितों को मौका देने के लिए ही क्यों न हो। इसे अगर देखें तो यह बात समझ आती है कि जिस अदालत में एक-एक करके कई जज किसी संकीर्णतावादी राष्ट्रपति के बनाए हुए हो जाते हैं, तो उसके फैसले भी वंचित तबकों के खिलाफ होने लगते हैं, बड़ी संवैधानिक बेंच का बहुमत भी वंचितों पर वार करने वाला होने लगता है। हिन्दुस्तान में भी इस बात को समझने की जरूरत है कि धर्म और जाति के आधार पर नहीं, बल्कि विचारधारा और सोच के आधार पर ऐसे जज अगर भर दिए जाएंगे जो कि कमजोर तबकों के खिलाफ होंगे, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ होंगे, तो फिर वे उसी तरह मनुस्मृति का हवाला देते रहेंगे जैसा कि पिछले दिनों गुजरात के एक जज ने दिया था, और बलात्कार की शिकार नाबालिग के वकील को मनुस्मृति पढऩे की सलाह दी थी। आज भी हिन्दुस्तान के बहुत से हाईकोर्ट के बहुत से जज बहुत ही दकियानूसी किस्म की सोच सामने रखते हैं, और यह डर लगता है कि ऐसे लोग अगर सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाएंगे, तो वहां तो उनके दिए हुए हर फैसले पर पुनर्विचार भी मुमकिन नहीं रह जाएगा। जहां तक जजों की अपनी जाति और उनके धर्म का सवाल है, तो कुछ लोगों का मानना है कि यह बात मायने रखती है, और कुछ दूसरे लोगों का यह मानना रहता है कि अयोध्या में मंदिर के पक्ष में फैसला देने वाले एक जज मुस्लिम थे, और एक दलित मुख्य न्यायाधीश ऐसे भी हुए हैं जिनके फैसलों में वंचितों की कोई हिमायत नहीं लिखी। इसलिए जजों के अपने जाति और धर्म की बात सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिए जरूरी हो सकती है जैसा कि सामाजिक मुद्दों पर लिखने वाले कुछ लेखकों का कहना है। और दूसरी तरफ वह बेअसर भी हो सकती है क्योंकि हमने न सिर्फ जजों में, बल्कि नेताओं में भी कई ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने खुद ऊंची कही जाने वाली जातियों के होते हुए भी, सामंती पृष्ठभूमि से आने के बावजूद समाज के सबसे वंचित लोगों के लिए सबसे अधिक किया। इसलिए दोनों ही स्तरों पर यह बात जरूरी है कि देश की सबसे बड़ी अदालतों में ऐसे जज ही रहें जिनके मन में वंचित तबकों के लिए सामाजिक सरोकार हो, जो लोकतंत्र बनने के पहले के अलोकतांत्रिक इतिहास के आभामंडल से मुक्त हों, और जो संवैधानिक व्यवस्था को पौराणिक व्यवस्था के ऊपर समझते हों। चूंकि जजों की कुर्सियां गिनी-चुनी रहती हैं, और 140 करोड़ आबादी पर सुप्रीम कोर्ट के तीन दर्जन से कम ही जज रहते हैं, इसलिए जाति और धर्म की विविधता के साथ-साथ न्यायिक क्षमता, न्यायप्रियता, और सामाजिक सरोकार इन सबको निभाने वाले जज ढूंढना बहुत मुश्किल भी नहीं होगा, अगर हाईकोर्ट के स्तर पर भी इन्हीं तमाम पैमानों का ध्यान रखा जाएगा। आज हालत यह है कि हाईकोर्ट में अगर दकियानूसी सोच के जज दाखिल हो जाते हैं, तो वरिष्ठता के आधार पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचने की एक बड़ी संभावना रखते हैं, और एक बार ऐसे लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए तो वहां पर जजों को छांटने वाला जो कॉलेजियम सिस्टम है, उसमें पहुंचे दकियानूसी लोग दूसरे दकियानूसी को हाईकोर्ट के लिए छांटते रहेंगे, और फिर ऐसे ही जजों का बहुमत संविधानपीठ पर भी रहेगा, और एक दिन वह अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा, विवादास्पद, और अन्यायपूर्ण फैसले की तरह सकारात्मक-भेदभाव नाम की आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने जैसा काम करेगा। लोगों को अदालतें इंसाफ देने वाली दिखती हैं, लेकिन इंसाफ कई रूप-रंगों में, कई किस्म के पूर्वाग्रहों पर सवार होकर, कई तरह के बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर आता है, और देश के इतिहास को बदलकर रख देता है। इसलिए देश की सत्ता की ताकत, धर्म और जाति के असर, इन सबके बीच जजों में, अदालतों में, देश के वंचितों के हक को प्राथमिकता देने की सोच को जिंदा रखना होगा, वरना ये तकनीकी फैसले इंसाफ कहे जाएंगे, और वे हकीकत में बेइंसाफ होंगे। 

(Daily Chhattisgarh)

धर्म को लेकर खड़े किए गए बखेड़े कहीं से मासूम नहीं...

  29 जून 2023 

 

जिस फिल्म आदिपुरूष को लेकर देश भर में विवाद चल रहा है, और बहस हो रही है कि उसमें धार्मिक पात्रों को बहुत घटिया तरीका से दिखाया गया है, और उनके मुंह से घटिया जुबान में बातें कहलाई गई हैं, इन्हें लेकर लोग अदालतों तक गए, और सोशल मीडिया पर तो फिल्म की धज्जियां उड़ ही रही हैं। चूंकि हमने वह फिल्म देखी नहीं है, इसलिए उसकी बारीकियों के बारे में कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन मुद्दे की बात यह है कि जिस तरह के लेखक इसके पीछे हैं, उनकी अपनी साख और राजनीतिक प्रतिबद्धता की वजह से यह लग रहा है कि ऐसी फिल्म लिखना और बनाना कोई मासूम बात नहीं है। यह भी समझने की जरूरत है कि पिछले बरसों में हिन्दुस्तान में फौजी मोर्चों से लेकर कश्मीर से लेकर केरल तक पर जिस तरह की एजेंडा-फिल्में बनी हैं, उन्हें एक विचारधारा के विस्तार के लिए पहले औजार की तरह, और फिर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्हें चुनावों के साथ जोडक़र सुर-ताल के मुताबिक चुनाव प्रचार के साथ एक नकारात्मक और नफरती माहौल खड़ा करने के लिए बनाया और दिखाया जा रहा है। इसमें से कोई भी बात मासूम नहीं है, खासकर इसलिए कि जब एक राजनीतिक दल के नेता देश भर में किसी फिल्म को बढ़ावा देने के लिए एकमुश्त टिकटें खरीदकर अपने समर्थकों सहित सिनेमाघर जाते हैं, तो यह जाहिर हो जाता है कि उन फिल्मों से उनका और उनकी पार्टी का क्या लेना-देना है। ऐसे में आज जब आदिपुरूष नाम की एक फिल्म एक धार्मिक एजेंडा सेट करने के हिसाब से सामने आई, और जब अपने घटियापन को लेकर वह निशाना बनी, तो उस पर थोड़ी सी चर्चा एक अदालती बहस को लेकर होनी चाहिए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जस्टिस राजेश सिंह चौहान, और जस्टिस प्रकाश सिंह की वेकेशन बेंच ने आदिपुरूष के निर्माताओं को यह कहते हुए फटकारा कि इसमें रामायण के पात्रों को बड़े शर्मनाक तरीके से दिखाया गया है। इस फिल्म पर रोक लगाने की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जजों ने यह जुबानी टिप्पणी की कि रामायण, कुरान, या बाइबिल पर विवादित फिल्में बनाई ही क्यों जाती हैं जो लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं? बेंच ने कहा- मान लीजिए कुरान पर एक छोटी डॉक्यूमेंट्री बनाई जाती, तो क्या आप सोच सकते हैं कि उससे कानून व्यवस्था की किस तरह गंभीर समस्या खड़ी हो जाती? लेकिन हिन्दुओं की सहिष्णुता के कारण ही फिल्मकारों की भयंकर भूलों के बाद भी हालात बुरे नहीं होते। उन्होंने कहा कि एक फिल्म में भगवान शंकर को त्रिशूल लेकर दौड़ते दिखाया गया है, अब इस फिल्म में भगवान राम और रामायण के अन्य पात्रों को बड़े शर्मनाक ढंग से दिखाया गया है, क्या यह रूकना नहीं चाहिए? इस फिल्म के लेखक मनोज मुंतसिर शुक्ला सहित फिल्म सेंसर बोर्ड और सूचना प्रसारण मंत्रालय को भी अदालत ने नोटिस जारी किया है।

लोगों को याद होगा कि दशकों पहले रामानंद सागर ने रामायण नाम का सीरियल बनाया था, जिसे देखने के लिए ट्रेन ड्राइवर ट्रेन रोक देते थे, देश के बड़े हिस्से में कफ्र्यू की तरह सन्नाटा छा जाता था, और जिसके लेखक एक मुस्लिम, राही मासूम रजा थे। वह सीरियल अभी लॉकडाउन को कामयाब बनाने के लिए केन्द्र सरकार ने एक बार फिर दिखाया था, ताकि लोग घर पर बंधे भी रहें, और उनका वक्त भी गुजर सके। लेकिन एक मुस्लिम के लिखे इस धारावाहिक और उसके एक-एक संवाद को लोग याद रखते हैं, और एक शब्द पर भी कोई विवाद आज तक नहीं हुआ। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर घटिया बातें लिखने और मंचों से उतनी ही घटिया बातें बोलने वाले लोगों के आज लिखे गए ऐसे धार्मिक सीरियल या फिल्मों से लगातार विवाद खड़ा हो रहा है, और वह विवाद ही असली मकसद है। 

बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि इस देश में लोगों की धार्मिक भावनाएं बड़ी नाजुक रहती हैं, और बड़ी जल्दी आहत हो जाती हैं, और इसलिए धार्मिक मुद्दों पर संभलकर काम करना चाहिए। लेकिन हमारा देखा हुआ यह है कि इन्हीं नाजुक भावनाओं को भडक़ाने के हिसाब से बहुत से काम किए जाते हैं, और कई किस्म के झूठों पर कश्मीर फाईल्स से लेकर केरल स्टोरी तक बनाई जाती हैं, जिनका मकसद ही समाज में नफरत फैलाना रहता है, और जो इस मकसद को ठीक चुनाव के पहले बखूबी पूरा भी करती हैं। दुनिया के जो परिपक्व लोकतंत्र हैं, वहां पर धार्मिक भडक़ावा इतना आसान नहीं रहता है, वहां धर्म का मखौल उड़ाने वाले लोगों को भी समाज में पर्याप्त और बराबरी का हक मिला होता है, और उस आजादी के चलते हुए वहां किसी कलाकृति में धर्म का इस्तेमाल कलाकार के लिए हिफाजत का भी रहता है, और देखने वाले भी उसे देखकर सडक़ों पर आग लगाने नहीं उतरते। लेकिन हिन्दुस्तान अब बारूद के ढेर पर बिठाया जा चुका है, और धार्मिक भडक़ावा यहां दीवारों पर नारे लिखने के लिए इस्तेमाल होने वाले गेरू की तरह का ही एक सामान हो गया है। इसलिए यहां पर कट्टरता फैलाने के लिए कभी कोई फिल्म बनती है, कभी किसी फिल्म का विरोध करवाकर किसी धर्म के लोगों को यह समझाया जाता है कि कोई दूसरा धर्म उनके खिलाफ है। यह पूरा सिलसिला देश में बढ़ी हुई साम्प्रदायिकता का एक संकेत और सुबूत है। हम अभी भी आदिपुरूष नाम की इस फिल्म के बारे में टिप्पणी नहीं कर रहे हैं क्योंकि उसको देखा नहीं है, लेकिन लोकतंत्र के लचीलेपन का बेजा इस्तेमाल करके, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा करके देश में जितने किस्म से फिल्म, कला, साहित्य का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है, उसके खतरों को हर बार अदालत जाकर रोकना मुमकिन नहीं है, लेकिन इस देश के लोग अगर ऐसे खतरनाक हथियारों से किए जा रहे जुर्म को पहचानना नहीं सीखेंगे, तो किसी लोकतंत्र का कोई कानून भी उन्हें नहीं बचा पाएगा।

(Daily Chhattisgarh)

समान नागरिक संहिता का प्रधानमंत्री का नारा 2024 के पहले 5 राज्यों के लिए

 28 जून 2023 

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल मध्यप्रदेश के अपने राजनीतिक-चुनाव पूर्व कार्यक्रम में मंच और माईक से समान नागरिक संहिता का मुद्दा छेड़ा है। उन्होंने धीरे-धीरे, एक-एक शब्द को जोर देकर यह कहा है कि एक ही परिवार में दो लोगों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते, ऐसे दोहरी व्यवस्था से घर कैसे चल पाएगा? वे भाजपा कार्यकर्ताओं के बूथ स्तर के कार्यक्रम में बोल रहे थे, लेकिन उन्हें मालूम था कि उनकी कही बातें देश के तमाम टीवी चैनलों पर लाईव टेलीकास्ट हो रही हैं। उन्होंने कहा यूनिफॉर्म सिविल कोड के नाम पर लोगों को भडक़ाने का काम हो रहा है। उन्होंने कहा एक घर में परिवार के एक सदस्य के लिए एक कानून हो, और दूसरे सदस्य के लिए दूसरा कानून हो, तो क्या वो घर चल पाएगा? कभी भी चल पाएगा? ऐसी दोहरी व्यवस्था से घर कैसे चल पाएगा? उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग मुसलमानों के हिमायती बनते हैं वे अगर सचमुच ही हिमायती होते तो अधिकतर मुस्लिम परिवार पढ़ाई और रोजगार में पीछे नहीं रहते, मुसीबत की जिंदगी जीने को मजबूर नहीं रहते। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है, वह डंडा मारती है, कहती है कॉमन सिविल कोड लाओ, लेकिन वोट बैंक के भूखे ये लोग इसमें अड़ंगा लगा रहे हैं। 

प्रधानमंत्री की ये बातें इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि एक कॉमन सिविल कोड से देश के मुस्लिमों, आदिवासियों, और हिन्दुओं के कई अलग-अलग तबकों में प्रचलित अलग-अलग धार्मिक-सामाजिक नियम-कायदे बदलकर एक होंगे। आज भारत में शादी, तलाक, विरासत, और गोद लेने के मामले में अलग-अलग समुदायों में उनकी धार्मिक आस्था और रीति-रिवाजों के आधार पर अलग-अलग कानून है। समान नागरिक संहिता के तहत इन सभी को एक सरीखा बनाया जाएगा। इसमें आदिवासियों के रीति-रिवाजों पर क्या फर्क पड़ेगा इस बारे में सोचे बिना देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं का एक तबका प्रधानमंत्री की इस बात पर इसलिए खुश है कि इससे सडक़ किनारे पंक्चर बनाने वाले अब्दुल के हक बदलेंगे। मोदी ने 2024 के चुनाव के पहले संसद के अपने अभूतपूर्व बाहुबल के चलते ऐसा लगता है कि इसकी तैयारी कर रखी है, और वे मध्यप्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावों के पहले इस चर्चा को छेडक़र हिन्दुओं के उस तबके के वोटों की गारंटी कर रहे हैं जिन्हें मुस्लिमों पर वार या मार करने वाले हर फैसले सुहाते हैं। हम यहां पर यूनिफॉर्म सिविल कोड के गुण-दोष का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, वह एक लंबा, जटिल, और तकनीकी-कानूनी मामला है, उस पर हम अलग से बात करेंगे, लेकिन जो बात प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कही है, एक परिवार वाली उस बात पर आज बात करना जरूरी है। 

पूर्व केन्द्रीय वित्तमंत्री और कांग्रेस नेता पी.चिदम्बरम ने प्रधानमंत्री के बयान को पूरी तरह गलत बताया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा है कि समान नागरिक संहिता को सही ठहराने के लिए एक परिवार और राष्ट्र के बीच तुलना गलत है। उन्होंने कहा कि एक परिवार जहां खून के रिश्तों से बंधा होता है, वहीं एक देश संविधान के सूत्र में बंधा होता है, जो कि एक राजनीतिक-कानूनी दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि एक परिवार के भीतर भी विविधता होती है, और भारत के संविधान में भी विविधता और बहुलता को मान्यता दी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को पिछले विधि आयोग की रिपोर्ट पढऩा चाहिए जिसमें बताया गया था कि इस समय इसे लागू करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि बीजेपी के कारण आज देश बंटा हुआ है, और लोगों पर थोपा गया कॉमन सिविल कोड इस विभाजन को बढ़ाएगा। चिदम्बरम ने कहा कि समान नागरिक संहिता के लिए प्रधानमंत्री की इस तगड़ी वकालत का मकसद महंगाई, बेरोजगारी, नफरती जुर्म, भेदभाव, और राज्यों के अधिकार नकारने जैसे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए है, लोगों को सावधान रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार चलाने में नाकामयाब होने के बाद भाजपा वोटरों का ध्रुवीकरण करने को लेकर समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठा रही है। 

हिन्दुस्तान में मुस्लिम समुदाय के लोगों पर टिकी राजनीति करने वाले एआईएमआईएम के सांसद और मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने मोदी से सवाल किया है कि क्या आप हिन्दू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) को खत्म करेंगे जिसकी वजह से देश को हर साल तीन हजार करोड़ से अधिक का टैक्स नुकसान हो रहा है? आरजेडी सांसद मनोज झा संसद में अपने गंभीर बयानों के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने कहा कि मोदी आजकल कुछ बेचैन हो रहे हैं, उन्हें यूनिफॉर्म सिविल कोड पर 21वें विधि आयोग की रिपोर्ट पढऩी चाहिए, उन्हें संविधान सभा की बहस भी पढऩी चाहिए।

समान नागरिक संहिता की मांग बहुत पुरानी है, और यह देश में उस विविधता के लिए एक चुनौती भी रहेगी जिसके लिए भारत जाना जाता है। फिर मोदी के भाषण को लेकर, देश को एक परिवार बताने को लेकर एक सवाल यह भी उठता है कि अगर नागरिक संहिता के लिए देश एक परिवार है, तो ऐसे में नाजुक और भडक़ाऊ मुद्दों पर इस परिवार के अलग-अलग लोगों को उनकी पोशाक के आधार पर कैसे पहचाना जा सकता है? एक घर में रहने वाले लोग तो अपनी मर्जी और पसंद से अलग-अलग पोशाक पहनते हैं, महज पोशाक के आधार पर जब कुछ सदस्यों को परिवार के बाकी सदस्य हिंसा का शिकार बनाएं, तो वह किस तरह का परिवार हो सकता है? भारत सरीखे विविधता वाले लोकतांत्रिक देश को एक परिवार कहना अपने आपमें परिवार के सबसे ताकतवर तबके के फायदे की चतुराई दिखती है। जिसका सबसे अधिक दबदबा हो वह अपने से दबे-कुचले लोगों को परिवार बताए, तो उस परिभाषा का कोई मतलब नहीं रहता। दुनिया में जो सबसे चतुर मालिक होते हैं, वे अपने कर्मचारियों को अपने परिवार का सदस्य बताते हैं, और वह उनके शोषण करने का एक मासूम दिखता तरीका होता है। इसलिए भारत को उसके विविधतावादी रूप में ही मंजूर करना ठीक है, और एक देश के लिए एक परिवार की मिसाल देना निहायत ही गलत बात है, और इसकी ठीक-ठीक व्याख्या चिदम्बरम ने की है। और अगर किसी का परिवार की मिसाल दिए बिना मन नहीं मान रहा है तो उसे याद रखना चाहिए कि एक परिवार के भीतर भी अलग-अलग लोग अलग-अलग किस्म का खाना-पीना पसंद करते हैं, अपने मर्जी के कपड़े पहनते हैं, अपनी मर्जी के जीवन-साथी को छांटकर शादी करते हैं, एक परिवार के भीतर अलग-अलग धार्मिक आस्था के लोग भी हो सकते हैं, और आस्थाहीन लोग भी रह सकते हैं। परिवार किसी एक दादा के तहत गुलामों के एक झुंड का नाम नहीं होता, परिवार अलग-अलग महत्वाकांक्षाओं और जीवनशैली के लोगों का भी होता है, जो कि किसी नियम से बंधे नहीं होते हैं, जो जहां तक मुमकिन हो सके एक-दूसरे के हिसाब से तालमेल बिठाकर चलते हैं, वरना एक परिवार के लोग भी एक परिवार के रहते हुए भी, अलग-अलग घरों में भी रहते हैं, और एक परिवार भी बने रहते हैं। इसलिए परिवार की मिसाल को एक मुखिया के गुलामों के परिवार की तरह नहीं देखना चाहिए। प्रधानमंत्री ने भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच इस मुद्दे का अतिसरलीकरण करके उसे मंच से दिए गए नारों की जुबान में कहा है, उसका असल जिंदगी में कोई महत्व नहीं है, एक देश को उसके संवैधानिक स्वरूप में देखा जा सकता है, एक परंपरागत भारतीय-हिन्दू परिवार की तरह उसे देखना जायज नहीं है, देश ऐसी तंगदिल परिभाषा से बहुत अधिक व्यापक होता है।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जून, 2023



 

राष्ट्रपति बाहर, मंत्री भीतर, मंदिर का यह कैसा न्यौता?

27 जून 2023 

 

पहली नजर में सनसनीखेज, या हक्का-बक्का करने वाली तस्वीरें अपने आपमें सच होते हुए भी सच बखान करती हों, ऐसा जरूरी नहीं होता। एक तस्वीर अपने आपमें खरी हो सकती है, लेकिन उस तस्वीर से संदर्भ निकालने में चूक भी हो सकती है। अभी सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की एक तस्वीर छाई हुई है जिसमें वे रथयात्रा के दिन दिल्ली में भगवान जगन्नाथ के मंदिर में गई हुई हैं, और वहां पर प्रतिमाओं के कमरे के बाहर वे रेलिंग के बाहर खड़ी हैं। चूंकि यह तस्वीर राष्ट्रपति भवन ने ट्वीट की है, इसलिए इसमें किसी छेडख़ानी की गुंजाइश नहीं है। दूसरी तरफ इसी मंदिर की एक और तस्वीर सोशल मीडिया पर है जिसमें केन्द्रीय रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव प्रतिमाओं के करीब जाकर पूजा कर रहे हैं। दोनों ही तस्वीरें बारीकी से देखने पर एक ही पूजागृह की हैं, उसी किस्म के कपड़ों में पुजारी हैं, और दीवारों की टाईल्स तक एक सरीखी है। दोनों तस्वीरें सरकारी ट्विटर हैंडल से पोस्ट की गई हैं, इसलिए उनमें कोई फेरबदल नहीं हुआ है। अब दलितों के कुछ ट्विटर हैंडल से यह बात लिखी गई कि एक आदिवासी होने के नाते राष्ट्रपति को बाहर खड़ा किया गया, और अश्विनी वैष्णव भीतर प्रतिमाओं तक ले जाकर पूजा करवाई गई। यह बात तस्वीरों से बिल्कुल साफ-साफ दिखती है, इसे लेकर बहुत से और लोगों ने कई और किस्म की बातें भी लिखी हैं, और एक आदिवासी के साथ ऐसा सुलूक बहुत से लोगों को खटक गया है। लेकिन इस बारे में चारों तरफ से नाराजगी आने के बाद जब बीबीसी ने मंदिर से उसका पक्ष पूछा तो उनका कहना था कि तस्वीरों को लेकर ऐसा विवाद करना निंदनीय है। मंदिर के पूजक ने कहा कि वहां पूजा का प्रोटोकाल होता है, मंदिर के गर्भगृह में वही पूजा कर सकते हैं जिसको हम महाराजा के रूप में आमंत्रित करते हैं। उन्होंने कहा कि जिन्हें आमंत्रित किया गया है वो अंदर आकर भगवान के सामने प्रार्थना और पूजा करेंगे, और फिर झाड़ू लगाकर वापिस जाएंगे। राष्ट्रपति व्यक्तिगत तौर पर भगवान का आशीर्वाद लेने आई थीं तो वे अंदर कैसे जाएंगी? उन्होंने कहा कि जिसको हम आमंत्रित करेंगे, बस वे ही अंदर जाएंगी। 

अब सवाल यह उठता है कि देश की राजधानी का मंदिर राष्ट्रपति के वहां पहुंचने की खबर का जानकार तो रहा ही होगा, और अगर आमंत्रित करने की ऐसी कोई रस्म है, तो राष्ट्रपति को भी आमंत्रित किया जा सकता था। जब अश्विनी वैष्णव और धर्मेन्द्र प्रधान जैसे केन्द्रीय मंत्रियों को आमंत्रित किया गया था, तो फिर राष्ट्रपति के वहां आने की खबर आने के बाद उन्हें आमंत्रित क्यों नहीं किया गया ताकि वे भी प्रतिमाओं के करीब जाकर पूजा करने का महत्व पा सकें? इस मौके पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि 2018 में उस वक्त के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सपत्निक ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर गए थे, और वहां पर जब वे जगन्नाथ भगवान के रत्न सिंहासन पर माथा टेकने पहुंचे तो वहां मौजूद पुजारियों और मंदिर सेवकों ने उनके लिए रास्ता नहीं छोड़ा, और वे उनकी पत्नी के भी सामने आ गए। जाहिर है कि एक दलित राष्ट्रपति के प्रतिमा तक पहुंचने की वजह इसके पीछे रही होगी। बीबीसी की एक रिपोर्ट कहती है कि राष्ट्रपति ने पुरी से वापिसी से पहले कलेक्टर अरविंद अग्रवाल से अपनी नाखुशी जाहिर कर दी थी, और बाद में इसे लेकर राष्ट्रपति भवन की ओर से भी असंतोष व्यक्त किया गया था लेकिन इसके बावजूद मंदिर कमेटी की बैठक में चर्चा के बाद भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
 
हम अकेली इस घटना को लेकर कुछ लिखना नहीं चाहते, लेकिन देश के मंदिरों में दलितों और आदिवासियों के साथ ऐसे सुलूक में हैरानी की कोई बात नहीं है। इसका इतिहास बहुत पुराना रहा है, यही वर्तमान की हकीकत है, और यही धर्म का भविष्य भी रहेगा क्योंकि धर्म का मानवीय कहे जाने वाले मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। धर्म का मिजाज हमेशा से हिंसक और बेइंसाफ रहा है, उसमें कमजोर लोगों, गरीबों, महिलाओं, बीमारों, और नीची कही जाने वाली जातियों के प्रति हिकारत और हिंसा दोनों लबालब रही हैं। दिक्कत सिर्फ यही है कि जिस मंदिर के पुजारी देश की राजधानी में 50 केन्द्रीय मंत्रियों में से दो का वरण कर रहे हैं, उन्हें पूजा के लिए आमंत्रित कर रहे हैं, उसी मंदिर में उसी दिन राष्ट्रपति के पहुंचने पर उन्हें पूजागृह के बाहर रखा जा रहा है। यह छोटी बात नहीं है, ऐसा भी नहीं है कि मंदिर ट्रस्ट के लोगों और पुजारियों को राष्ट्रपति के ओहदे की अहमियत का पता न हो, लेकिन यह भी तय है कि उन्हें राष्ट्रपति की जाति का पता होगा, और ऐसा लगता है कि जाति ही अकेली वजह होगी कि देश की राष्ट्रपति होने के बावजूद पुजारी उन्हें वहां आने पर भी पूजा के लिए आमंत्रित नहीं कर रहे हैं, और लकड़ी की एक रेलिंग के पीछे उन्हें खड़ा रख रहे हैं। यह बात इस देश के लोकतंत्र के खिलाफ है, और जिस धर्म के लोग ऐसा कर रहे हैं, उस धर्म के सम्मान के भी खिलाफ है। 21वीं सदी में आकर भी अगर कोई धर्म लोकतंत्र की संवैधानिक सत्ता में अपने हिंसक भेदभाव को छोडऩे से मना करता है, तो वह धर्म सम्मान के लायक नहीं है।
 
लेकिन इससे परे की एक दूसरी बात यह है कि देश के दलितों का हिन्दू धर्म के प्रति जो रूख रहता है, उसे भी समझना चाहिए। दलितों ने हिन्दू धर्म की ऐसी ही हिंसा के चलते उसे छोडक़र दूसरे धर्म अपनाए, और एक हिंसक भेदभाव से बाहर हो गए। हिन्दुओं के भीतर की जाति व्यवस्था उसमें इंसानियत कही जाने वाली बातों की जगह ही नहीं बनने देती। इस बात को वे लोग नहीं समझेंगे जो जातियों के इस ढांचे में ऊपर हैं, इस बात को वे ही लोग समझ पाएंगे जो कि मनु के बनाए हुए इस पिरामिड में सबसे नीचे नींव के पत्थरों की तरह कुचले जा रहे हैं। ऐसे में जरूरी यह भी है कि दलितों और आदिवासियों को संगठित हिन्दू धर्म के भेदभाव वाले रूख से परे अपना भविष्य देखना चाहिए। जहां किसी को हिकारत से देखा जाता है वहां पर उन्हें अपनी जगह क्यों तलाशनी चाहिए? राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तो अब किसी भी निर्वाचन से परे हो चुकी हैं, इसलिए उन्हें बहुसंख्यक वोटरों के बहुमत की परवाह नहीं करनी चाहिए। देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति के रूप में उन्हें आदिवासी मुद्दों को खुलकर सामने रखना चाहिए, उन्होंने पिछले दिनों देश के मुख्य न्यायाधीश के सामने न्याय व्यवस्था को लेकर कुछ खुली-खुली बातें साफ-साफ रखी भी थीं। अगर पिछले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी मंदिर के पुजारियों को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी, तो द्रौपदी मुर्मू को भी उनके साथ हुए इस भेदभाव को इतिहास में अच्छी तरह दर्ज करना चाहिए, हो सकता है कि उनकी इस पहल से देश के बाकी आदिवासियों की हालत के बारे में लोगों का ध्यान जाए।

(Daily Chhattisgarh)

नीतीश का खाना निकला भी नहीं कि कांग्रेस और आप के मुंह से गालियां निकलने लगीं...

  26 जून 2023 

 

पटना में विपक्षी दलों की बैठक में नीतीश की मेहमाननवाजी में खाया गया खाना अभी बदन से पूरी तरह निकला भी नहीं होगा कि लोगों में सार्वजनिक बवाल शुरू हो गया है। एक किस्म से इसकी शुरुआत कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच हुई है, और कांग्रेस के महासचिव अजय माकन ने केजरीवाल पर विपक्षी एकता तोडऩे का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि केजरीवाल की भाजपा से सांठगांठ है, वे भ्रष्टाचार में शामिल हैं, उनके दो दोस्त पहले से ही जेल में हैं, और अब केजरीवाल भी बस गिरफ्तार होने वाले हैं, और वे जेल नहीं जाना चाहते। अजय माकन ने यह भी गिनाया कि एक तरफ तो आम आदमी पार्टी कांग्रेस से (मोदी के अध्यादेश के खिलाफ) समर्थन चाहती है, दूसरी तरफ वह लगातार कांग्रेस पर हमले कर रही है। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने अभी राजस्थान जाकर कांग्रेस के तीन बार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ हमला बोला है। दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ जिस दिन केजरीवाल और बाकी विपक्षी दलों की बैठक होनी थी, उस दिन सुबह भी आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता ने कांग्रेस के खिलाफ कहा, ऐसा कहते हुए अजय माकन ने कहा कि जेल न जाने के लिए केजरीवाल भाजपा से समझौता करके विपक्ष की एकता को खंडित करने के लिए इस बैठक में पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि केजरीवाल विपक्षी पार्टियों की बैठक में इसी नीयत से जाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी भी मुद्दे पर केजरीवाल कांग्रेस का समर्थन चाहते हैं तो इस तरह कांग्रेस के खिलाफ बयान थोड़े ही दिए जाते हैं। इस पर आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयान गिनाए हैं कि वे भी आम आदमी पार्टी के खिलाफ बोलते रहे हैं। आप प्रवक्ता ने यह भी गिनाया कि कांग्रेस आप के चुनाव लडऩे पर आपत्ति जताती है कि उससे भाजपा को मदद होती है, तो कांग्रेस बताए कि पिछले तीस साल में कांग्रेस गुजरात में भाजपा को क्यों नहीं हरा पाई, क्या इसका दोष भी केजरीवाल को देंगे? असम, नगालैंड, पुदुचेरी, त्रिपुरा, मेघालय, सिक्किम, मणिपुर, अरूणाचल में तो आप चुनाव नहीं लड़ी, फिर वहां कांग्रेस क्यों हारी? 

विपक्ष की एकता की कोशिशों के चलते हुए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच का यह विवाद सिर्फ दिल्ली की स्थानीय राजनीति का है जहां कांग्रेस की लंबी सत्ता को आम आदमी पार्टी ने खत्म किया, और कांग्रेस अब तक उस दर्द से उबर नहीं पाई है। केजरीवाल भाजपा के मोहरे हैं या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है, लेकिन जब व्यापक विपक्षी एकता की बात हो रही है, तो सबसे पहले कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की इस तूतू-मैंमैं को अलग रखवाना चाहिए, वरना केजरीवाल सचमुच ही भाजपा के मोहरे साबित होने में देर नहीं लगाएंगे। किसी बड़ी बैठक को कामयाब करने में वहां मौजूद हर किसी की ईमानदार भागीदारी की जरूरत रहती है, लेकिन किसी बैठक को बर्बाद करने के लिए वहां मौजूद एक लापरवाह, गैरजिम्मेदार, या मक्कार काफी हो सकते हैं। देश की राजधानी का स्थानीय राजनीति को पूरे देश की विपक्षी एकता की संभावनाओं को तबाह नहीं करने देना चाहिए। 

न सिर्फ कांग्रेस के साथ, बल्कि देश की बहुत सी पार्टियों के साथ एक दिक्कत यह भी है कि वह किसी राज्य के मुद्दों पर बोलने के लिए अपने उसी राज्य के प्रवक्ता को झोंक देती है। भाजपा को जब बिहार के बारे में कुछ कहना रहता है, वह रविशंकर प्रसाद को लगाती है, ऐसा ही दूसरे राज्यों के बारे में दूसरी पार्टियों का भी होता है। दिक्कत यह होती है कि ऐसे प्रवक्ता स्थानीय राजनीति के अपने जख्मों को सहलाते हुए भी कोई बात करते हैं, और जरूरत से अधिक बात करते हैं। पार्टियों को किसी मुद्दे पर उन्हीं प्रवक्ताओं को लगाना चाहिए जिनके निजी स्थानीय राजनीतिक हित उन मुद्दों से जुड़े हुए न रहें। कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों के पास तो बहुत से प्रवक्ता हो सकते हैं, और एक नीतिगत फैसला लिया जाना चाहिए कि प्रवक्ताओं की निजी राजनीति को उनके उठाए जा रहे मुद्दों पर असर नहीं डालने देना चाहिए। यह कुछ उसी तरह की बात है कि किसी राज्य के व्यक्ति को उसी राज्य में राज्यपाल बनाकर नहीं भेजा जाता। सार्वजनिक और व्यापक हितों को किनारे रखकर ऐसे प्रवक्ता अपने पुराने हिसाब चुकता करते हैं। 

अब चूंकि हम पार्टी प्रवक्ताओं की बात कर ही रहे हैं, तो लगे हाथों इसके एक दूसरे पहलू पर भी बोलना जरूरी है। देश की बहुत सी बड़ी पार्टियां वकीलों को अपना प्रवक्ता बनाती हैं क्योंकि वे अदालत में किसी बात को तर्कपूर्ण ढंग से साबित करने के पेशे से आते हैं। इससे भी पार्टी की बात धरी रह जाती है, उसकी मूल भावना धरी रह जाती है, और वकालत के अंदाज में वकील-प्रवक्ता तर्कों में उलझकर रह जाते हैं। इनके मुकाबले गैरवकील प्रवक्ता बेहतर होते हैं, जो कि अदालती जिरह के अंदाज में नहीं फंसते, और आम लोगों को समझ आने वाली भाषा में बात करते हैं। 

अब अगर कांग्रेस और आप के आपसी झगड़ों पर लौटें, तो इन दोनों पार्टियों से संपर्क वाले दूसरे नेताओं को चाहिए कि इन दोनों से अलग-अलग बात करके इन्हें सडक़ों पर मारपीट से रोकें। सार्वजनिक जगहों पर, सार्वजनिक माध्यम से जिस तरह से ये दोनों पार्टियां उलझ रही हैं, उससे विपक्षी एकता की संभावनाएं तो खराब हो ही रही हैं, ऐसी संभावनाओं के लिए जो वरिष्ठ नेता लगातार कोशिश कर रहे हैं उनके लिए भी शर्मिंदगी का सामान खड़ा हो रहा है। केजरीवाल और कांग्रेस का झगड़ा दिल्ली की स्थानीय राजनीति का झगड़ा है, और ये दोनों ही पार्टियां बहुत खराब मिसाल पेश कर रही हैं। किसी एक का बयान आने पर दूसरी पार्टी अगर इतना ही कह देती कि उसे इस पर कुछ नहीं कहना है तो भी उस पार्टी की इज्जत बढ़ जाती, और पहले वाले की बात का वजन खत्म हो जाता, लेकिन प्रवक्ताओं का पेशा चूंकि बोलना रहता है, मीडिया के सामने चेहरा और आवाज रखना होता है, इसलिए वे बिना जरूरत भी बोलते हैं, जरूरत से अधिक भी बोलते हैं, यह कुछ इसी किस्म का होता है जिस तरह कि किसी शादी की दावत में रखे गए ऑर्केस्ट्रा को बहुत ऊंची आवाज में गाना-बजाना अच्छा लगता है ताकि उसकी मौजूदगी का अहसास होता रहे, प्रवक्ताओं को भी बोलना इसी तरह अच्छा लगता है। इस निहायत गैरजरूरी बकबक पर काबू पाना विपक्षी एकता के लिए जरूरी है।  

(Daily Chhattisgarh)

हिटलर से अरब-खरब गुना बुरा तानाशाह खड़ा न करें..

25  जून 2023

 

ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर रोज कई किस्म की चर्चाएँ सामने आ रही हैं, और मैं भी इसी पन्ने पर कुछ बार इस बारे में लिख चुका हूं। अब कुछ लोगों का ऐसा अंदाज है कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस मानव बुद्धि के मुकाबले इतना आगे निकल जाएगा कि दुनिया के दूसरे ग्रहों पर अगर कोई प्राणी हैं, और अगर वे धरती के लोगों से संपर्क करेंगे, तो वे धरती पर हो सकता है कि सबसे पहले ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से संपर्क करें, बजाय इंसानों के। यह बात कुछ अटपटी लग सकती है, लेकिन कृत्रिम बुद्धि आज भी बहुत से मामलों में मानवीय बुद्धि को पार कर चुकी है, और एक ऐसी आशंका है कि जल्द ही आज चल रही रिसर्च ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को इंसानी समझ से आगे ले जा सकती है। ऐसे में हो सकता है कि कृत्रिम बुद्धि और दूसरे ग्रहों के प्राणी एक-दूसरे से संपर्क करने में, एक-दूसरों के संदेश समझने में इंसानों के मुकाबले अधिक काबिल साबित हों। 

आज दुनिया के बहुत से वैज्ञानिक, शोधकर्ता, और ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के कारोबारी यह सार्वजनिक मांग कर चुके हैं कि कृत्रिम बुद्धि पर आगे शोधकार्य रोक देना चाहिए, क्योंकि नया विकास इसकी ताकत को तो अंधाधुंध बढ़ा दे रहा है, लेकिन इससे पैदा होने वाले खतरों का अंदाज लगाने की भी ताकत इंसानी समझ में पूरी तरह नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धि का ऐसा ही विकास अगर जारी रहा तो वह बहुत जल्द इंसानों पर काबू पाने की हालत में आ जाएगी, और चूंकि वह इंसानों की तरह की सभ्यता और संस्कृति की नीति और समझ के बोझ से लदी हुई नहीं होगी, वह इंसानी सभ्यता को, और इंसानियत कही जाने वाली बात को पल भर में खत्म भी कर सकती है, और अपनी समझ के फैसलों को सही मानते हुए दुनिया को खत्म कर सकती है। 

इस बात को इस तरह से समझने की जरूरत है कि वैज्ञानिकों ने उस बम को तो बना लिया था जिसे अमरीका के नेताओं ने जापान के हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराया था, लेकिन वैज्ञानिक-समझ बम की क्षमता तक सीमित थी, उससे होने वाली तबाही और दुनिया में हथियारों की दौड़ न तो उनकी समझ की बात थी, और न ही उनका एजेंडा थी। इसलिए जब विज्ञान और टेक्नालॉजी बिना नैतिकता के, बिना मानवीयता के काम करते हैं, तो वे तबाही के किसी भी किस्म के सामान बना सकते हैं। यह हाल तब है जब वैज्ञानिक और शोधकर्ता अपनी विशेषज्ञता के दायरे में अपनी कामयाबी के नशे में डूबे हुए भी कहीं न कहीं इंसानियत पर टिके रहते हैं। लेकिन ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ऐसे किसी भी नैतिक दबाव से पूरी तरह आजाद हो सकता है। 

एक छोटी सी कल्पना अगर सामने रखें, कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को अगर यह सूझ जाएगा कि इंसान धरती के पर्यावरण को, धरती को बर्बाद कर रहे हैं, और धरती के करोड़ों अलग-अलग प्राणियों की नस्लों को, पेड़-पौधों की किस्मों को खत्म कर रहे हैं, उनका हक छीन रहे हैं, इंसान धरती को दे कुछ भी नहीं रहे हैं, और उसे हमेशा के लिए बर्बाद कर दे रहे हैं, तो हो सकता है कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यह तय कर ले कि धरती से ऐसे इंसानों का खत्म हो जाना इस ग्रह के लिए बेहतर होगा, और इसमें कुछ गिने-चुने इंसानों को बचाकर एक बार फिर मानवीय नस्ल बढ़ाई जा सकेगी। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यह भी तय कर सकेगा कि आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पैमानों पर किन नस्लों के लोग सबसे अच्छे होंगे, उनमें कौन से लोग बेहतर होंगे, ऐसे कुछ हजार, लाख या कुछ करोड़ लोगों को छोडक़र ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यह भी तय कर सकता है कि बाकी तमाम लोगों को किस तरह खत्म किया जाए। आज भी जो लोग ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मौजूदा क्षमता को देखते हुए उसकी विध्वंसकारी ताकत का अंदाज लगा रहे हैं, उनका मानना है कि यह अपनी मर्जी से दुनिया में किसी भी दर्जे की तबाही ला सकता है, कितने भी लोगों को खत्म कर सकता है। यही वजह है कि एआई के रिसर्च और कारोबार में लगे हुए सैकड़ों और हजारों लोग इसके खिलाफ अभी खड़े हुए हैं कि इसे और आगे न बढ़ाया जाए। 

लोगों को एक कहानी याद होगी कि किस तरह किसी गुरू के चार शिष्य हाड़-मांस जोडक़र एक शेर खड़ा करते हैं, और फिर अपनी काबिलीयत परखने के लिए उसमें प्राण भी फूंक देते हैं, और जैसे ही वह शेर जिंदा होता है, वह इन्हीं शिष्यों को खा जाता है। इसलिए इंसानों को आज ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को और अधिक ताकतवर, और अधिक काबिल बनाने की अपनी क्षमता को अधिक परखने का खतरा नहीं उठाना चाहिए। जिसके खतरे इंसानी समझ से परे हैं, महज उसकी संभावनाओं को टटोलने के लिए उसकी ताकत बढ़ाते चलना इसी किस्म के शेर को खड़ा करना होगा। 

अमरीका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हार्वर्ड के एक प्रोफेसर ने दूसरे ग्रहों के प्राणियों से संपर्क की किसी संभावना को लेकर ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का जो खतरा बताया है, वह इसके खतरों की महज एक कल्पना है, ऐसी अनगिनत और स्थितियां आ सकती हैं जिनमेंं ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस इंसानों के लिए, दूसरे प्राणियों और प्रकृति के लिए, पूरी की पूरी धरती के लिए जानलेवा हो सकता है। वह दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध को रोकने के लिए परमाणु हथियारों को खतरनाक पाएगा, और पूरी दुनिया के परमाणु हथियारों के जखीरों को एक साथ खत्म करना तय कर लेगा, तो इससे महज हथियार खत्म नहीं होंगे, पूरी दुनिया ही खत्म हो जाएगी। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अगर किसी देश की आबादी को जुल्मी पाएगा, तो हो सकता है उसके खिलाफ कोरोना जैसे किसी वायरस का हमला तय कर ले, अगर उसे लगेगा कि दुनिया को कोयले के प्रदूषण से बचाना है, तो वह दुनिया भर के कोयला-बिजलीघरों को बंद और खत्म करने के लिए पल भर में तरीके ढूंढ लेगा, खदानों को तबाह कर देगा, बिजलीघरों को ठप्प कर देगा, बिजली के ग्रिड बर्बाद कर देगा। जिन कारखानों के प्रदूषण उसे धरती के लिए नुकसानदेह लगेंगे, उन कारखानों को वह तबाह कर देगा। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अपने आपमें दुनिया का सबसे खतरनाक तानाशाह बनने की पूरी ताकत रखेगा, इसलिए हिटलर से अरब-खरब गुना अधिक ताकतवर एक तानाशाह खड़ा करने की जिद छोडऩी चाहिए, और जब तक ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के खतरों से बचाव के रास्ते न सूझ जाएं, तब तक उसमें और प्राण नहीं फूंकने चाहिए। ये तमाम खतरे तो आज लोगों को सूझ रहे हैं, लेकिन कृत्रिम बुद्धि लोगों की कल्पनाओं से परे नए खतरे सोच सकती है, नई बर्बादी कर सकती है। 

(Daily Chhattisgarh)

पटना जाना आसान है, पर एक-दूसरे से पटना उतना आसान नहीं है..

 25 जून 2023 

 

पटना में बहुत सी विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने मिलकर बात की, और अपने मतभेदों को कुछ घंटों के लिए किनारे खिसकाकर अगले आम चुनाव में साथ खड़े होने की एक संभावना टटोली है। आज की तारीख में यह छोटी बात नहीं है कि एक नाव पर ऐसे लोग सवार हो जाएं जो आमतौर पर एक-दूसरे के डूबने की कामना करते हैं। हिन्दुस्तानी विपक्ष को यह बात समझ आ रही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव नाम के इस नाव पर वे सब एक साथ सवार हैं, और किसी दूसरे के डूबने की कामना खुद को भी डुबाकर छोड़ेगी। इसलिए इस चुनावी नदी को पार करने के लिए मोदी के मुकाबले बाकी बहुत सी पार्टियों के नेता जब तक हाथ में हाथ नहीं डालेंगे, तब तक वे किसी किनारे नहीं पहुंच पाएंगे। 

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विपक्ष की कोई एकता, उसका गठबंधन, तब तक कामयाब नहीं हो सकता, जब तक उसमें कोई वैचारिक एकता नहीं हो जाती। भारत का संसदीय लोकतंत्र एक ऐसी चुनाव व्यवस्था पर टिका हुआ है जिसमें वोटरों के सामने पेश किए गए विकल्पों में से ही बेहतर को चुनने का हक उसे रहता है, यह बेहतर हो सकता है कि अच्छा भी न हो, लेकिन वह बाकी के मुकाबले बेहतर हो सकता है। इसलिए हिन्दुस्तानी चुनाव लोगों के सामने बुरे के मुकाबले बेहतर विकल्प पेश करने का नाम है, और यह विकल्प आदर्श हो, अच्छा हो, ऐसा जरूरी भी नहीं है। कुछ और चलताऊ भाषा में कहें तो गब्बर के मुकाबले सांभा, या सांप के मुकाबले बिच्छू पेश करने जैसी बात भी रहती है जहां पर लोग कम बुरे को चुनते हैं। ऐसे में बहुत बड़ी वैचारिक एकता की जरूरत नहीं है जो कि किसी पार्टी के भीतर भी हो जाए वह भी जरूरी नहीं रहता। बहुत सी पार्टियों में आंतरिक विरोधाभास, विसंगतियां, और मतभेद बने रहते हैं, और कई बार ऐसे मतभेद उन पार्टियों को आत्मविश्लेषण का मौका देते हैं, और ऐसे आत्ममंथन से उन्हें मजबूत भी करते हैं। इसलिए अगर विपक्ष का कोई एक ढीलाढाला गठबंधन भी होता है, तो भी कोई बुराई नहीं है, बहुत से चुनावों में यह देखने में आया है कि पार्टियां कुछ सीटों का आपसा में बंटवारा कर लेती हैं, और कुछ सीटों पर वे ही पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ एक दोस्ताना मुकाबला भी करती हैं। एक-दूसरे के खिलाफ बदजुबानी नहीं करतीं, लेकिन लड़ती हैं। इसलिए भारतीय चुनाव में पूरी वैचारिक एकता एक आदर्श और काल्पनिक स्थिति ही हो सकती है, उसका हकीकत से कुछ लेना-देना नहीं है।

इसलिए पटना में जितने विपक्षी लोग बैठे, वह अपने आपमें एक कामयाबी है। हो सकता है कि इससे 2024 का कोई विपक्षी गठबंधन कोसों दूर हो, और यह भी हो सकता है कि यह बैठक वैसे किसी गठबंधन में तब्दील भी न हो पाए, फिर भी आपसी तालमेल, आपसी सहमति छोटी बात नहीं होती है। जो दो लोग एक कमरे में सांस लेने के आदी नहीं रहते, वे लोग अगर बैठकर बात कर रहे हैं, एक-दूसरे की सांस को बर्दाश्त कर रहे हैं, तो लोकतंत्र के लिए यह अपने आपमें एक कामयाबी है। दुनिया के परिपक्व और सभ्य लोकतंत्रों में तो सत्ता और विपक्ष भी एक-दूसरे से बात करते हैं, संसद के भीतर भी एक-दूसरे को सुनते हैं, और संसद के बाहर भी। एक वक्त जब मोतीलाल वोरा उत्तरप्रदेश के राज्यपाल थे, और वहां राष्ट्रपति शासन चल रहा था, तो लखनऊ में ही बसे हुए अटल बिहारी वाजपेयी अक्सर चाय पीने राजभवन चले जाते थे, और उनके बताए हुए हर सार्वजनिक काम मोतीलाल वोरा प्राथमिकता से पूरे करते थे। अब वक्त वैसी सज्जनता का नहीं रह गया, और अब सत्ता और विपक्ष के नेताओं के बीच की मुलाकात शिवाजी की एक कहानी में एक मुलाकात और बघनखे से विरोधी को चीर देने सरीखी रहती है, और लोगों के बीच सार्वजनिक जीवन और लोकतंत्र का शिष्टाचार भी खत्म हो चुका है। लोग एक-दूसरे के प्रति शक से घिरे रहते हैं, और यह खतरा रहता है कि कौन क्या रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, किन बातों का कैसा बेजा इस्तेमाल किया जाएगा। इसलिए आज अगर आधा-एक दर्जन पार्टियों के नेता अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं, और शिकायतों-मतभेदों के बावजूद एक साथ बैठे हैं, तो सीटों का लेन-देन चाहे न हो, कम से कम सोच का लेन-देन तो हो ही सकता है। 

हमारा ख्याल है कि 2024 को लेकर मोदी की चुनौती को अगर छोड़ भी दिया जाए, तो भी यह बात याद रखना चाहिए कि राज्यों के चुनावों के लिए भी इन पार्टियों का साथ उठना-बैठना लोकतंत्र के लिए अच्छा है। और किसी भी चुनाव से परे एक जनमत के लिए, जनहित के मुद्दों के लिए, संसदीय रणनीति के लिए भी इनका उठना-बैठना एक बेहतर नौबत है। यह भी मानकर नहीं चलना चाहिए कि सारे के सारे विपक्षी दल एक साथ आना जरूरी है। हो सकता है कि विपक्ष के ऐसे एक से अधिक गठबंधन तैयार हों, और बाद में ऐसे दो गठबंधनों के बीच भी किसी तरह का चुनावी तालमेल हो सकता है। भारतीय लोकतंत्र में मोदी अपनी पार्टी के साथ देश के किसी भी गठबंधन से अधिक ताकतवर हो चुके हैं। वे अपनी सोच और अपनी रणनीति के तहत देश में एक बहुत व्यापक ध्रुवीकरण भी कर चुके हैं जो कि धर्म के आधार पर है, जातियों के आधार पर है, खानपान और पहरावे के आधार पर है, सामुदायिक रीति-रिवाज और संस्कारों के आधार पर है। किसी भी लोकतंत्र में इन मुद्दों पर इतने ताकतवर ध्रुवीकरण से कई किस्म के खतरे ही खड़े होते हैं। फिर यह बात याद रखना चाहिए कि अपार ताकत किसी भी सत्ता को तानाशाह बनाकर ही छोड़ती है, उससे परे और कोई रास्ता नहीं रहता। इसलिए लोकतंत्र में ताकत का एक संतुलन जरूरी रहता है, और भारतीय चुनावी राजनीति में अब ऐसा कोई भी संतुलन बिना विपक्षी एकता, एकजुटता, गठबंधन, या तालमेल के मुमकिन नहीं है। जरूरी नहीं है कि 1977 की तरह इस देश का विपक्ष एक-दूसरे में विलीन होकर जनता पार्टी बना ले, लेकिन यह तो हो ही सकता है कि सीटों का तालमेल किया जा सके, और भाजपा-एनडीए के मुकाबले हर सीट पर एक-एक मजबूत उम्मीदवार की संभावना तलाशी जा सके। लोगों को इतनी जल्दी बहुत अधिक हासिल कर लेने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, अभी 2024 के चुनावों को खासा वक्त है, और विपक्ष को आपसी समझ विकसित करने का एक मौका देना चाहिए, उसकी हर बैठक से लोकतंत्र का भविष्य तय हो जाने की उम्मीद जागती होगी।

(Daily Chhattisgarh)

शरणार्थी बोट के सैकड़ों डूबे, पर पश्चिमी मीडिया पांच पनडुब्बी-पर्यटकों में डूबा रहा

   24 जून 2023 

 

एक भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले दो-तीन दिनों में अपनी बातों से लगातार लोगों का ध्यान खींचा है। वे बहुत कमउम्र में राष्ट्रपति बन गए थे, और दो कार्यकाल की सीमा पूरी कर लेने के बाद अब वे किसी सरकारी ओहदे पर नहीं रह सकते, इसलिए वे एक स्वतंत्र नागरिक की हैसियत से अपनी सोच अधिक खुलकर रखते हैं। कल ही उनका वह बयान सामने आया था जिसमें उन्होंने कहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति को मोदी से बातचीत में भारत में धार्मिक भेदभाव का मुद्दा उठाना चाहिए। अब उन्होंने एक अलग कार्यक्रम में पश्चिमी मीडिया के पाखंड पर हमला बोला है। और कहा है कि अभी ग्रीक के पास एक शरणार्थी बोट डूब जाने से 82 लोगों की मौत और सैकड़ों के डूबने की आशंका पर पश्चिमी मीडिया की खबरों में इसे ठीक से जगह नहीं मिली, दूसरी तरफ डूबे हुए टाइटेनिक को देखने गए पांच पर्यटकों की मौत से पश्चिमी मीडिया लदे रहा। ओबामा ने कहा कि ग्रीक में सैकड़ों लोगों के डूबने की आशंका ठीक से खबर नहीं बन पाई, और टाइटेनिक पर्यटन वाली पनडुब्बी टाइटन में फंसे पांच लोगों को बचाने की खबरें पूरे वक्त चलती रहीं। 

बात सही है क्योंकि ग्रीक के पास जिस बोट को बचाने के लिए वहां की सरकार को संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी संस्थान ने खबर दी थी, उसे बचाने के लिए ग्रीक सरकार ने कुछ नहीं किया, और इस बोट पर सवार करीब सात सौ लोग मदद के लिए गुहार लगाते रहे लेकिन वहां तक पहुंचा ग्रीक जहाज उन पर कुछ पानी की बोतलें और खाने का कुछ सामान फेंककर चले आया। इस जहाज पर पाकिस्तान के भी करीब साढ़े तीन सौ लोग थे जो कि बेहतर भविष्य के लिए ग्रीक या इटली की तरफ जा रहे थे। इसमें और लोग लीविया और सीरिया के भी थे जहां पर जीना मुहाल हो गया है, और लोग डूबकर मर जाने की कीमत पर भी किसी ऐसे देश पहुंच जाना चाहते हैं जहां पर जिंदगी बेहतर हो। लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले इसी तरह अमरीका में दाखिल होने की कोशिश करते हुए हिन्दुस्तान के गुजरात के एक परिवार के चार लोग मारे गए थे। 

हिन्दुस्तान में ऐसी खबरें हर बरस कुछ बार आती हैं कि देश के कितने अरबपति, खरबपति बीते बरसों में यह देश छोडक़र गए हैं। अब तो ऐसा अनुमान भी आने लगा है कि अगले बरस कितने लोग छोडक़र जाएंगे। अतिसंपन्न लोगों का हजारों की संख्या में हर बरस देश छोडक़र जाना एक अलग मामला है। लेकिन काम की तलाश में, जिंदा रहने की कोशिश में जब लोग अपना देश छोडक़र समंदर के रास्ते या बिजली की तारों वाली बाड़ से निकलकर किसी दूसरे देश पहुंचते हैं, तो उनकी अपनी मजबूरियां रहती हैं। यह बात सही है कि किसी भी देश के पास शरणार्थियों को जगह देने की क्षमता सीमित रहती है, लेकिन पश्चिम के बर्ताव से एक बात साफ समझ आती है कि वहां की सरकारों या वहां के नागरिकों में से कुछ में एक रंगभेद दिखाई पड़ता है। यह रंगभेद अफ्रीकी और एशियाई लोगों के खिलाफ अधिक दिखता है, और इन्हीं देशों में यूक्रेन से निकले हुए लाखों लोगों के लिए घर-घर में जगह बन गई, तो यूरोपीय लोगों के लिए देशों और लोगों के दिल में कुछ अधिक जगह दिखती है। ऐसा भी नहीं है कि यह सिर्फ योरप के साथ है, हिन्दुस्तान में भी पाकिस्तान से आए हुए हिन्दू सिन्धियों के लिए लोगों और सरकारों के दिल में जगह रहती है, लेकिन म्यांमार से निकाले गए मुस्लिम रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए कोई जगह नहीं रहती। ऐसा शायद हिन्दुस्तान में धर्म की वजह से भी होता है, और योरप में भी यूक्रेन के लोगों के धर्म और पाकिस्तान, लीविया, सीरिया के लोगों के धर्म को लेकर एक फर्क दिखता है। 

आज दुनिया के कई देश गिरती हुई आबादी के शिकार हैं, वहां बूढ़ी आबादी बढ़ती चली जा रही है, और कामकाजी पीढ़ी सिकुड़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थान को एक टिकाऊ शरण योजना पर काम करना चाहिए कि जिन देशों में कामकाजी लोग घट गए हैं, बुजुर्गों की देखभाल के लिए लोग आज भी कम हैं, और कल और अधिक कम पड़ेंगे, उन देशों में कामों के लिए दूसरे देशों के लोगों को कैसे तैयार किया जा सकता है। भाषा, संस्कृति, तौर-तरीके और रीति-रिवाज, अलग-अलग कामों के हुनर सिखाकर लोगों को नई जगहों के लायक तैयार किया जा सकता है, जहां वे महज रहम से जगह पाने वाले शरणार्थी न रहें, जहां वे कामगार रहें, और उनकी हालत बेहतर रहे। इसके साथ-साथ उन्हें इन नए देशों में उत्पादकता जोडऩे के लायक भी बनाया जाना चाहिए। यह बात हम इसलिए भी सुझा रहे हैं कि दुनिया के कई देशों में लोगों की संपन्नता काफी अधिक है, और वे बहुत कम काम करते हैं, और भी कम करना चाहते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह आसानी से मुमकिन हो सकता है कि वे बाहर से आए हुए लोगों को मामूली मेहनताने के काम पर रख सकें, और खुद अधिक कमाई के बेहतर काम कर सकें। एक-एक बोट को बचाना तो जरूरी है ही, लेकिन यह स्थाई समाधान नहीं है। आज बहुत सारे ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच हैं जिन पर देश छोडक़र जाने वाले लोगों और लोगों की जरूरत वाले देशों के बीच एक तालमेल बिठाया जा सकता है। अभी ऐसी कोई पहल हो रही हो, यह हमें पढ़ा हुआ याद नहीं पड़ता है। दुनिया की आबादी को जरूरत के मुताबिक इस तरह दुबारा एडजस्ट करने के बारे में सोचना चाहिए, और इससे एक टिकाऊ इंतजाम हो सकेगा, जो कि दान और मदद पर नहीं टिका रहेगा, मेहनत और जरूरत के आधार पर होगा। 

बराक ओबामा ने एक जलता-सुलगता सवाल खड़ा किया है, और न सिर्फ पश्चिमी मीडिया बल्कि हिन्दुस्तानी मीडिया का भी रूख ऐसा ही रहता है, और हिन्दुस्तान के लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि यहां की जिंदगी के असल मुद्दों को किस तरह किनारे धकेलकर फर्जी भडक़ाऊ मुद्दे देश की बहस पर लादे जाते हैं, किस तरह सबसे संपन्न तबकों की दिलचस्पी के मुद्दे लादे जाते हैं। हिन्दुस्तान में भी एक विमान दुर्घटना में हुई मौतें, ट्रेन दुर्घटना में हुई मौतों के मुकाबले सैकड़ों गुना अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। जिस मौत के बाद जितना बड़ा इश्तहार मिलने की उम्मीद होती है, वह मौत खबरों में उतनी ही बड़ी अहमियत पाती है।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून, 2023



 

अमरीका में मोदी के सामने अलग-अलग कई तबकों ने उठाई भारत में साम्प्रदायिकता

  23 जून 2023 

 

अमरीका प्रवास पर गए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने वहां के राष्ट्रपति की डेमोक्रेटिक पार्टी के 75 नेताओं की लिखी एक चिट्ठी भी थी जिसमें उन्होंने अपने राष्ट्रपति जो बाइडन से यह अपील की थी कि मोदी के साथ बातचीत में उन्हें भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर जुल्म की बात भी उठानी चाहिए। यह बात और कई लोगों ने भी उठाई थी, और भारत में अल्पसंख्यकों के हिमायती एक अमरीकी तबके ने मोदी के स्वागत में वहां की सडक़ों पर ऐसी इलेक्ट्रॉनिक वैन भी दौड़ाई थीं जिनमें तीनों तरफ बड़े-बड़े पर्दों पर भारत के कई धार्मिक अल्पसंख्यक सवाल लिखे हुए थे। इनमें मोदी के लिए शर्मिंदगी पैदा करने वाले कुछ नारे भी थे, और यह अमरीकी लोकतंत्र में एक आम व्यवस्था है जिसे भारत की तरह रोका नहीं जा सकता। लेकिन यह एक बड़ा संयोग था कि एक पिछले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इसी मौके पर मोदी के लिए भारत में अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर कुछ बातें कहीं। यह एक अधिक बड़ा संयोग इसलिए था कि ओबामा से अमरीका के एक प्रमुख टीवी समाचार चैनल सीएनएन पर उसकी एक सबसे सीनियर रिपोर्टर-एंकर इंटरव्यू कर रही थी, और उसने ओबामा से पूछा-  दुनिया में लोकतंत्र खतरे में हैं, इसे तानाशाहों और तानाशाही से चुनौती मिल रही है, बाइडन इस वक्त अमरीका में मोदी का स्वागत कर रहे हैं जिन्हें ऑटोक्रेटिक या फिर अनुदान डेमोक्रेट माना जाता है, किसी राष्ट्रपति को ऐसे नेताओं से किस तरह पेश आना चाहिए? इस सवाल के जवाब में बराक ओबामा ने कहा कि अगर वह मोदी से बात कर रहे होते तो आज हिन्दू बहुसंख्यक भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की हिफाजत चर्चा के लायक है, मेरा तर्क होता कि अगर आप अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा नहीं करते हैं तो मुमकिन है कि भविष्य में भारत में विभाजन बढ़े, ये भारत के हितों के विपरीत होगा। 

उल्लेखनीय है कि 2015 में ओबामा ने कहा था कि भारत तब तक सफलता की सीढिय़ां चढ़ता रहेगा जब तक वह एक देश के रूप में एकजुट रहे, और धार्मिकता या किसी अन्य आधार पर अलग-थलग न हो। ओबामा ने दिल्ली में एक भाषण में कहा था कि एक अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की कामयाबी उसकी एकता पर निर्भर करती है, और दुनिया में हम जिस शांति की उम्मीद करते हैं, वह लोगों के दिलों से शुरू होती है, और हिन्दुस्तान से अधिक महत्वपूर्ण यह और कहीं नहीं है। भारत तब तक कामयाब रहेगा जब तक यह धार्मिक आस्था के आधार पर विभाजित न बंटे। यह बात भी याद रखी जानी चाहिए कि ओबामा के राष्ट्रपति रहते मोदी तीन बार अमरीका गए थे, और एक बार ओबामा को भारतीय गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनाया गया था। मोदी परंपरागत कूटनीति के तौर-तरीकों से अलग हटकर ओबामा को अपना दोस्त बराक बताते रहे हैं, इसलिए आज उस बराक की कही हुई बात चर्चा के लायक है। 

अमरीका के एक और सबसे प्रमुख डेमोक्रेट नेता बर्नी सेंडर्स अमरीकी राष्ट्रपति की दौड़ में एक बार शामिल हो चुके हैं, उन्हें अमरीका में बड़ी गंभीरता से सुना जाता है, उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि मोदी के साथ बैठक के दौरान बाइडन को धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में बात करनी चाहिए। उन्होंने लिखा कि मोदी सरकार ने प्रेस और सिविल सोसाइटी पर कड़ा प्रहार किया है, राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया है, और आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया है जिसकी वजह से भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए बहुत कम जगह बची है। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रपति को मोदी के साथ बैठक में ये तथ्य रखने चाहिए। 

डेमोक्रेटिक पार्टी के 75 नेताओं ने भारत में मोदी के कार्यकाल में हुए मानवाधिकार उल्लंघनों को विस्तार से बताते हुए राष्ट्रपति बाइडन को लिखा है- हम चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच दोस्ती सिर्फ साझा हितों पर न टिकी हो, बल्कि साझा मूल्यों पर भी टिकी हो। इनमें से कुछ नेताओं ने अमरीकी संसद में मोदी के भाषण के बहिष्कार की घोषणा भी की है। कुछ नेताओं ने लिखा है कि मोदी सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यकों का दमन किया है, और आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवादी समूहों का मनोबल बढ़ाया है। एक नेता ने लिखा कि मोदी सरकार ने पत्रकारों और मानवाधिकार के बात करने वालों को बिना किसी परवाह के निशाना बनाया है, और वे मोदी का भाषण सुनने नहीं जाएंगे। दूसरी तरफ पिछले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की अगली राष्ट्रपति-उम्मीदवारी की दावेदार निकी हेली ने मोदी के प्रवास का स्वागत किया। 

मोदी से अमरीकी राष्ट्रपति भवन में हुई प्रेस कांफ्रेंस में भारत में मुस्लिमों के हक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में एक प्रतिष्ठित अखबार की पत्रकार ने सवाल किया। इस पर मोदी ने कहा- लोकतंत्र हमारी स्पिरिट है, लोकतंत्र हमारी रगों में है, लोकतंत्र को हमारे पूर्वजों ने शब्दों में ढाला है, संविधान के रूप में। हमारी सरकार लोकतंत्र के मूलभूत मूल्यों को आधार बनाकर बने हुए संविधान के आधार पर चलती है। यहां जाति, पंथ, धर्म, या लैंगिक स्तर पर किसी भेदभाव की जगह नहीं होती। उन्होंने कहा जब हम डेमोक्रेसी को लेकर जीते हैं, तो भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत में सरकार की ओर से मिलने वाले फायदे सबको हासिल हैं, यहां लोकतांत्रिक मूल्यों में कोई भेदभाव नहीं है, न धर्म के आधार पर, न जाति के आधार पर। अमरीकी पत्रकार के इस सवाल को भारत में बहुत से लोग, खासकर पत्रकार ट्विटर पर पोस्ट कर रहे हैं कि सवाल ऐसे पूछे जाते हैं। 

कुल मिलाकर इस बात को समझने की जरूरत है कि भारत में आज अल्पसंख्यकों के साथ जो सुलूक किया जा रहा है, वह लोगों की नजरों में हैं, और दुनिया भर में लोकतांत्रिक लोग इसे इतिहास में अपने बयानों से अच्छी तरह दर्ज कर रहे हैं। यह एक अलग बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति के सामने अपने देश के कारोबार की मजबूरियां हैं, और अमरीकी सामान हिन्दुस्तान को बेचने के चक्कर में बाइडन को एक लोकतांत्रिक राष्ट्रपति के बजाय एक काबिल सेल्समैन की तरह बर्ताव अधिक करना पड़ रहा है। लेकिन उससे फर्क नहीं पड़ता, जब उनकी पार्टी के 75 सांसद और बड़े नेता इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठा रहे हैं, तो वह अमरीकी लोकतंत्र में तो ठीक तरह से दर्ज हो ही रहा है। हम पहले भी इस बात को लिख चुके हैं कि आज की दुनिया में कोई भी देश अपने आपको बाहरी टिप्पणियों से परे का एक फौलादी कैप्सूल साबित नहीं कर सकता, आज पूरी दुनिया एक गांव है, और इसके लोगों की एक-दूसरे के मामलों में दखल रहेगी ही। इसलिए भारत अपने ऐसे मामलों को घरेलू मुद्दा और निजी मामला नहीं बता सकता जिसे पूरी दुनिया एक लोकतांत्रिक दिलचस्पी और जिम्मेदारी का मामला मानती है। आज विश्व की जिम्मेदारी देशों की सरहद के भी आरपार है, और कोई भी देश अपने ऐसे मामलों को लेकर बाहरी प्रतिक्रिया को अपने घरेलू मामलों में दखल नहीं बता सकता।    

(Daily Chhattisgarh)

गीता प्रेस को गांधी पुरस्कार से अधिक बड़ा फर्जीवाड़ा और क्या हो सकता है?

 22 जून 2023 

 

गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार देकर देश की मोदी सरकार ने जनता का बर्दाश्त एक बार और परखने का प्रयोग किया है। बहुत से साम्प्रदायिक, जातीय, ऐतिहासिक मुद्दों पर, रीति-रिवाजों और संस्कारों पर यह सरकार ठीक उसी तरह प्रयोग करते आ रही है जिस तरह लोगों में प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने के लिए कुछ किस्म की चिकित्सा प्रणाली में धीरे-धीरे दवा देकर यह काम किया जाता है। सरकार लोगों में बर्दाश्त बढ़ा रही है। इस अखबार ने  अपने यूट्यूब चैनल के लिए कल देश के एक चर्चित लेखक अक्षय मुकुल को इंटरव्यू किया जिन्होंने गीता प्रेस के इतिहास और उसके प्रभाव पर बरसों तक रिसर्च करके एक महत्वपूर्ण किताब, गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिन्दू इंडिया, लिखी है। अक्षय मुकुल ने इस किताब से परे कई लेख भी ऐसे लिखे हैं जो कि गीता प्रेस को गांधी के नाम वाला राष्ट्रीय पुरस्कार देने के सरकार के फैसले को कटघरे में खड़ा करता है। लेकिन ‘छत्तीसगढ़’ को दिए इंटरव्यू में अक्षय मुकुल कहते हैं अब इन 9 बरसों में मोदी सरकार के फैसलों ने चौंकाना बंद कर दिया है। वे इसे नवसामान्य स्थिति मानते हैं। गीता प्रेस को ऐतिहासिक तथ्यों और संदर्भों में समझने के लिए यह किताब मददगार है, और आज यहां इस मुद्दे पर लिखने के लिए भी हमें इससे समझ मिल रही है। 

गीता प्रेस के संस्थापकों में से एक, हनुमान प्रसाद पोद्दार गांधी के लगातार संपर्क में रहे, गांधी उन्हें पसंद भी करते थे, गांधी से गीता प्रेस की पत्रिका, कल्याण, के लिए कभी-कभी लिखवा भी लिया जाता था, लेकिन पोद्दार पूरी तरह से एक सवर्ण, बनिया, ब्राम्हणवादी, जातिवादी, महिलाविरोधी, दलितविरोधी, अल्पसंख्यकविरोधी, और धार्मिक कट्टरता वाले व्यक्ति थे। गांधी के रहते हुए ही वे गांधी से सीधे संपर्कों के बावजूद गांधी के हरिजन प्रेम के खिलाफ रहे, साथ खाने के खिलाफ रहे, शुद्धता के लिए अड़े रहे, दलितों के मंदिर प्रवेश के खिलाफ रहे, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमेशा एक मोर्चा चलाते रहे, लगातार नफरत फैलाते रहे, और हिन्दू समाज के भीतर भी वे एक ब्राम्हणवादी व्यवस्था को बढ़ावा देकर उसे भी कायम रखने का काम करते रहे। गौरक्षा के नाम पर इंसानों को थोक में मारने वालों के खिलाफ भी गीता प्रेस के पास कुछ नहीं था, और वह गाय पर अपने विशेषांक निकाल-निकालकर हिन्दू समाज को गाय के प्रति अतिसंवेदनशील उत्तेजना से भरने का काम करती रही। आरएसएस और हिन्दू महासभा से गीता प्रेस का इतना घरोबा रहा कि गांधी-हत्या के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार को भी हजारों दूसरे लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया था। यह शायद दुनिया के इतिहास का अकेला ऐसा मौका रहा होगा कि गांधी ने पोद्दार को अपना जितना करीबी माना था, अपने साम्प्रदायिक कट्टरता के संबंधों की वजह से उन पोद्दार को गांधी-हत्या के बाद गिरफ्तार किया गया था। कल्याण ने हिन्दू समाज के भीतर जातियों को लेकर चल रहे जुल्म के खिलाफ कोई आंदोलन शुरू नहीं होने दिया, और वह लगातार दलितों को पिछले जन्म के कुकर्मों की सजा बताता रहा, उन्हें संघर्ष के लायक चेतना से दूर रखने की साजिश चलाता रहा। वह महिलाओं के लिए खासकर इतना दमनकारी रहा कि उन्हें परिवार के पुरूषों का गुलाम बनाकर रखने के अलावा उसने कोई भूमिका नहीं दी। 


लेकिन हिन्दुस्तान का वह दौर ऐसा था कि उसने गांधी की छाया भी जिस पर पड़ जाए उसे भी एक विश्वसनीयता मिल जाती थी, फिर गांधी तो गीता प्रेस की पत्रिका के लिए लिख भी देते थे, और गीता प्रेस दूसरी जगहों पर गांधी के लिए हुए का वह हिस्सा छाप लेता था, जो उसे धर्म के अनुकूल लगता था। इस तरह गांधी के समग्र से परे गांधी के लेखन के कतरों का इस्तेमाल करके गीता प्रेस एक अलग किस्म की साख पा लेता था। लेकिन वह हिन्दू धर्म के प्रकाशक का काम करते हुए, मुस्लिमों से नफरत, दलितों को अछूत रखने, औरतों को कुचलने जैसे काम में लगे रहा। 

लोकतंत्र में कई तरह की चीजों की छूट रहती है, इनमें से इस बात की भी छूट हो सकती है कि लोग औरत के खिलाफ दकियानूसी बातें फैलाएं, उसे गुलाम की तरह रखें, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह सोच बढ़ाते चलें। लेकिन ये सारी की सारी सोच गांधी की जिंदगी में ही गांधी के खिलाफ थी, गीता प्रेस ने गांधी के खिलाफ खुलकर लिखने का काम भी किया था, उनकी खुलकर आलोचना की थी। ऐसे में भारत सरकार का यह फैसला कि गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार दिया जाए, जले पर नमक छिडक़ने की तरह का है। इस देश में आज गांधी को प्रिय तमाम सिद्धांत और तमाम तबके कुचले जा रहे हैं। हरिजनों पर जुल्म हो रहा है, अल्पसंख्यकों को मारा जा रहा है, और जातिवाद इस देश को तबाह कर रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाले निर्णायक मंडल ने आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान अगर गीता प्रेस को गांधी के नाम का शांति पुरस्कार दिया है, तो यह गांधी का मखौल बनाना, और गांधी के मूल्यों से नफरत करने वालों को गांधी की साख देना है। इस पुरस्कार को देते हुए सरकारी बयान कहता है कि मोदी ने शांति और सामाजिक सद्भाव के गांधीवादी आदर्शों को बढ़ावा देने में गीता प्रेस के योगदान का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि मानवता के सामूहिक उत्थान में योगदान देने के लिए गीता प्रेस के महत्वपूर्ण और अद्वितीय योगदान को यह पुरस्कार दिया जा रहा है जो सच्चे अर्थों में गांधीवादी जीवनशैली की प्रतीक संस्था है। 

अब गीता प्रेस के योगदान को देखें, तो देश की आधी औरत-आबादी के वह खिलाफ है, देश के दलितों के वह खिलाफ है, वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ है, उसने समाज में विभाजन पैदा करने, और चौड़ा करने के लिए पूरी जिंदगी कोशिश की है, और ऐसी संस्था को केन्द्र सरकार का यह सम्मान गांधी के अपमान के अलावा कुछ नहीं है। अगर इस संस्था में ईमानदारी होती, तो उसे इस मौके पर गांधीवादी मूल्यों से अपनी कट्टर असहमति गिनाते हुए गांधी के नाम का पुरस्कार लेने से मना कर देना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। इस संस्था ने महज इस पुरस्कार की नगद रकम लेने से मना कर दिया है, और पुरस्कार मंजूर कर लिया है। 

गांधी का दिल तो बहुत बड़ा था, वे तो ऊपर जहां कहीं भी होंगे, वे ऊपर जहां कहीं भी हनुमान प्रसाद पोद्दार होंगे, उनसे बात-मुलाकात होने पर कोई नाराजगी नहीं दिखाते होंगे। गांधी ने तो जीते जी भी किसी से नफरत नहीं की, लेकिन हनुमान प्रसाद पोद्दार गांधी की संतान की तरह उनके करीब भी रहे, और उनके जीते जी ही लगातार गांधी के मूल्यों के खिलाफ अभियान चलाते रहे। भारत सरकार का यह फैसला शर्मनाक है, और यह बेईमानी भी है कि किसी सोच के एक विरोधी को इस तरह उसके नाम का सम्मान दे दिया जाए। भारत सरकार को मनुस्मृति में कोई पुरस्कार स्थापित करके उसे गीता प्रेस को देना था, उसे मुस्लिमों को कुचलने वाले अभियान के नाम पर एक पुरस्कार स्थापित करके उसे भी गीता प्रेस को दे देना था। यह गीता प्रेस के भी हित में नहीं है कि उसके दफ्तर में लाठी लिए एक ऐसा बूढ़ा खड़ा रहे जिसे कलम की लाठी से गीता प्रेस पीटते रहा।   

(Daily Chhattisgarh)

ट्विटर के मालिक से भारतीय लोकतंत्र की फिक्र की उम्मीद गलत

21 जून 2023 

 

ट्विटर को लेकर हिन्दुस्तानी सरकार का जो रूख रहा है उस पर उसके एक भूतपूर्व मुखिया जैक डोर्सी और मौजूदा मुखिया एलन मस्क के अलग-अलग बयान देखने लायक हैं। जैक डोर्सी ने कुछ दिन पहले एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि किसान आंदोलन के दौरान भारत सरकार ने ट्विटर को बंद करने की धमकी तक दी थी। उनसे पूछा गया था कि दुनिया भर के ताकतवर लोग आपके पास आते हैं, और कई तरह की मांगें करते हैं, आप अगर नैतिक सिद्धांतों वाले हैं तो ऐसी नौबत से कैसे निकलते हैं? इसके जवाब में जैक डोर्सी ने कहा था कि मिसाल के तौर पर भारत ऐसा देश है जहां किसान आंदोलन के दौरान सरकार बहुत किस्म की मांगें कर रही थीं। सरकार के आलोचक कुछ खास पत्रकारों के बारे में (उनके अकाउंट बंद करने) के बारे में कहा गया था। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की ओर से कहा गया था कि भारत में ट्विटर को बंद कर देंगे, कर्मचारियों के घरों पर छापे मार देंगे, जो कि सरकार ने किया भी। उन्होंने कहा कि सरकार ने कहा कि अगर आप हमारी बात नहीं मानेंगे तो हम आपके ऑफिस बंद कर देंगे। उन्होंने कहा कि यह उस भारत में हो रहा था जो लोकतांत्रिक देश है। दूसरी तरफ ट्विटर के आज मालिक और मुखिया एलन मस्क ने अमरीका गए हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के बाद भारत में ट्विटर को दी गई चेतावनी के बारे में मीडिया के पूछे गए सवालों के जवाब में कहा कि ट्विटर के पास स्थानीय सरकारों की बातों को मानने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। अगर हम स्थानीय सरकार के कानूनों का पालन नहीं करते हैं तो हम बंद हो जाएंगे, इसलिए हम जो सबसे अच्छा कर सकते हैं, वह किसी भी देश में कानून के करीब रहकर काम करना है, हमारे लिए इससे अधिक कुछ करना असंभव है नहीं तो हम ब्लॉक या गिरफ्तार हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि वे पूरी दुनिया में अमरीका के अंदाज में काम नहीं कर सकते क्योंकि हर देश के अलग कानून है। 

अब भारत में किसान आंदोलन के दौरान मोदी सरकार का ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के प्रति क्या रूख था, वह तो ट्विटर के भूतपूर्व सीईओ के इस इंटरव्यू से समझ पड़ता है, और यह भी दिखता है कि जैक डोर्सी ने सरकार के सामने कम से कम कुछ हद तक टिके रहने की कोशिश की थी क्योंकि उनके बताए मुताबिक वहां छापे पडऩे की नौबत आई थी, लेकिन कारोबार का पिछला मुखिया आज कारोबार की अधिक परवाह किए बिना कई बातें कह सकता है जो कि आज का मुखिया नहीं कह सकता। दूसरी बात यह भी है कि एलन मस्क अकेले एक कारोबार वाले नहीं हैं, उन्होंने मोदी से हिन्दुस्तान में अपनी इलेक्ट्रिक कार टेस्ला के कारोबार की भी बात की है जो कि एशिया के इस हिस्से में उनकी चीन की फैक्ट्रियों का एक विकल्प बन सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि जिस दिन चीन ताइवान पर आर्थिक या फौजी हमला करने को सोचेगा, तो वह उसकी इंटरनेट केबलें भी काट सकता है, और उस वक्त निचले अंतरिक्ष में मंडरा रहे एलन मस्क के इंटरनेट उपग्रह ताइवान के काम आ सकते हैं, लेकिन ऐसा करने पर टेस्ला के चीन में चल रहे कारखानों की सेहत पर असर पड़ सकता है। इसलिए भी चीन में कारखाना चला रहीं दुनिया की दूसरी कंपनियां भारत को उसमें जोडऩा चाहती हैं, और यहां पर भी कारखाने डालना चाहती हैं। इसलिए एलन मस्क अगर मोदी के साथ मिलकर टेस्ला की बात कर रहा है, तो यह तो हो नहीं सकता कि वह ट्विटर की बात न करे। इसलिए ट्विटर के इन दो मुखिया लोगों ने जो कहा है उसे उनके कारोबारी हितों से परे भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। 

भारत में सरकार अमरीकी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध नहीं लगा रही थी, वह उसे भारत के लोगों के, या विदेशों के भी, अकाउंट बंद करने को कह रही थी, और इसके लिए हो सकता है कि वह भारत का कोई कानून गिना रही हो, या बिना कानून गिनाए भी ऐसा कर रही हो। अब यह ट्विटर के हाथ में था कि वह भारतीय अदालत में जाकर सरकार के ऐसे दबाव, सुझाव, या प्रतिबंध के खिलाफ अपील करती। जब कोई प्लेटफॉर्म इतना बड़ा हो जाता है, तो वह लोगों के विचारों को मौका देने के लिए लोकतांत्रिक दिखता जरूर है, लेकिन वह रहता तो कारोबार ही है। और कोई कारोबारी किसी देश की सरकार से कितना लड़े या कितना न लड़े, यह उस कारोबारी की अपनी हिम्मत पर भी रहता है, और अगर उसके कोई नीति-सिद्धांत हों, तो उस पर भी रहता है। फिर यह भी है कि जैक डोर्सी का हिन्दुस्तान में कोई और कारोबारी मामला नहीं था, और अब ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार या एलन मस्क, या दोनों की दिलचस्पी से भारत मेें टेस्ला कारों का एक बड़ा कारखाना शुरू होने की संभावना टटोली जा रही है, और ऐसे में एक कारोबारी अपनी अधिक कमाई के कारोबार के भले के लिए कम कमाई के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर समझौता भी कर सकता है। इसीलिए पूरी दुनिया में यह एक आदर्श स्थिति मानी जाती है कि मीडिया जैसे नाजुक कारोबार करने वाले लोगों के और अधिक दूसरे कारोबारी हित नहीं रहने चाहिए। हितों का अधिक टकराव मीडिया की अपनी अंदरुनी आजादी को भी खत्म कर सकता है जैसा कि अखबारों और टीवी में देखने मिलता है। और दूसरी तरफ ऐसा टकराव आज सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स के कम्प्यूटरों के इस्तेमाल से होने वाली पसंद-नापसंद पर भी हावी हो सकता है। 

यह भारतीय लोकतंत्र में सरकार से परे की लोकतांत्रिक संस्थाओं के भी सोचने की बात है कि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार के दबाव की ऐसी बात सामने आती है, तो अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उस पर क्या किया जाए? ऐसा दबाव न तो मोदी सरकार ने पहली बार इस्तेमाल किया है, और न ही आखिरी बार। फिर यह भी है कि ऐसा इस्तेमाल करने वाली वह अकेली सरकार भी नहीं है, राज्यों में जहां-जहां जिसका बस चलता है, घोषित और अघोषित रूप से अभिव्यक्ति के सभी तरीकों पर दबाव का इस्तेमाल करने का लालच शायद ही कोई छोड़ पाते हैं। ऐसी नौबत उन सभ्य और विकसित, परिपक्व और गरिमामय लोकतंत्रों में ही काबू में रह सकती है, जहां लोकतांत्रिक आजादी का सम्मान होता है। हिन्दुस्तान अभी ऐसी फिक्र से कोसों दूर है, या कोसों दूर चले गया है। इसलिए यहां पर इन बातों की अब कोई परवाह नहीं है, और ट्विटर के कारोबारी-मालिक से हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की फिक्र की उम्मीद नाजायज होगी, यहां के लोकतांत्रिक संस्थान खुद यह सोचें कि अपने घर को कैसे सुधारें।  

(Daily Chhattisgarh)

राजनीति से आई एक खबर ने चेहरे पर मुस्कुराहट ला दी...

20 जून 2023 

 

राजनीतिक की खबरें अकसर ही मुंह का स्वाद खराब करने वाली होती हैं, कभी-कभी ही उन्हें पढक़र चेहरे पर मुस्कुराहट आ पाती है। ऐसी ही एक खबर आज सामने है। महाराष्ट्र में शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के प्रमुख नेता संजय राउत ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को चिट्ठी लिखकर बीस जून को विश्व गद्दार दिवस घोषित करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि महाराष्ट्र के लाखों लोग दस्तखत करके संयुक्त राष्ट्र भेजने वाले हैं कि इस प्रदेश में शिवसेना के शिंदे गुट ने पार्टी तोडक़र जिस तरह भाजपा के साथ सरकार बनाई थी, इसे संयुक्त राष्ट्र विश्व गद्दार दिवस के रूप में मान्यता दे जिस तरह 21 जून के विश्व योग दिवस मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमरीका गए हुए हैं और ऐसी खबर है कि वे कल 21 जून को संयुक्त राष्ट्र संघ में योगाभ्यास करेंगे। मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने कुछ बरस पहले इस दिन अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाना शुरू किया है, और ऐसा लगता है कि संजय राउत का संयुक्त राष्ट्र महासचिव को भेजा गया खत इस मौके पर ही मोदी की पार्टी, और उनके राज्यपाल के असंवैधानिक कामकाज पर तंज कसने के लिए लिखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत साफ-साफ फैसला दिया है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल ने असंवैधानिक फैसला लेकर उद्धव ठाकरे की सरकार गिराने का काम किया था। संजय राउत ने मोदी के संयुक्त राष्ट्र में रहते हुए गद्दार दिवस का यह प्रस्ताव एक बड़े ही मौलिक और अनोखे अंदाज के व्यंग्य के रूप में भेजा है।

लेकिन व्यंग्य से बाहर आएं, तो जो संजय राउत ने लिखा है उसे हम व्यापक संदर्भ में बरसों से लिखते चले आ रहे हैं कि दलबदल करने वाले लोगों के नई पार्टी से चुनाव लडऩे पर कुछ बरसों के लिए रोक लगनी चाहिए। शिवसेना सहित बहुत सी पार्टियों में यह आम बात है कि सांसद और विधायक नई पार्टी में चले जाते हैं, और रातोंरात वहां के उम्मीदवार हो जाते हैं। पिछले एक दशक में भाजपा से अधिक शायद ही किसी दूसरी पार्टी में ऐसा हुआ हो कि बाहर से लोगों को लाकर, पीढिय़ों से अपनी पार्टी में बने हुए लोगों के सिर पर बिठा दिया जाए। कांग्रेस से जाने कितने ही लोगों को लाकर भाजपा ने ऐसा किया है, और लोग मजाक में भाजपा के बारे में कहते हैं कि भाजपा कांग्रेसमुक्त भारत के अपने नारे को इस हद तक पूरा कर रही है कि वह खुद कांग्रेसयुक्त पार्टी हो गई है। ताजा मिसाल मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं, जिनके खिलाफ पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सारे नारे गढ़े गए थे, और उसी महाराज को लाकर भाजपा के सिर पर ताज की तरह बिठा दिया गया है, और भाजपा के बहुत से पुराने लोग अपने को जूतों की तरह तिरस्कृत पा रहे हैं। भाजपा ने महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार को गिराने के लिए शिवसेना को भी इसी तरह तोड़ा था, और राज्यपाल और विधानसभाध्यक्ष के नाजायज और असंवैधानिक फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के बाद अब कहने को क्या रह जाता है। इसलिए आज संजय राउत की चिट्ठी एक जख्मी शेर की कराह है, जो मोदी के न्यूयॉर्क में रहते उनके मेजबान यूएन को भेजी गई है, ताकि उन्हें याद दिलाया जा सके कि उनका मेहमान 21 जून के योग दिवस के पहले 20 जून को एक और अंतरराष्ट्रीय दिवस का हकदार बनाया जाना चाहिए। 

हम फिर से अपनी बात पर लौटें, तो यह समझने की जरूरत है कि दलबदल कानून के तहत अब किसी पार्टी के संसदीय दल के दो तिहाई लोग जब पार्टी बदलते हैं, तभी वे दलबदल कानून से बचते हैं। इसलिए दो तिहाई जैसी बड़ी संख्या को एकदम से खारिज करना तो ठीक नहीं है, उसे तो दल विभाजन मानना ही होगा, लेकिन जो इक्का-दुक्का लोग अपने कार्यकाल के बीच में दलबदल करते हैं, और नई पार्टी में जाकर उसके उम्मीदवार हो जाते हैं उस पर कम से कम छह बरस के लिए अपात्रता लगानी चाहिए। दलबदल के बाद वे नई पार्टी में एक कार्यकाल के फासले से ही चुनाव लड़ सकें। ऐसा अगर नहीं किया जाएगा तो हिंदुस्तानी लोकतंत्र सैकड़ों बरस पहले की गुलामों और औरतों की मंडी की तरह होकर रह जाएगा कि मोटे बटुए वाले लोग मनमानी खरीददारी करके घर लौटेंगे। चूंकि संसदीय लोकतंत्र में आमतौर पर काम आने वाली गौरवशाली परपंराएं हिंदुस्तान में आमतौर पर पेनिसिलिन से भी कम असरदार रह गई हैं, और बेशर्मी ने अपार प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है, इसलिए यहां पर कड़े कानून बनाना जरूरी है। गरिमा भारतीय राजनीति को छोडक़र कबकी जा चुकी है, और अब कड़े कानूनों से नीचे और किसी बात का असर नहीं हो सकता। इसलिए दलबदलू सांसदों और विधायकों को संसद या विधानसभा का नामांकन दुबारा भरने के पहले छह बरस का फासला रखना चाहिए ताकि यह गंदगी कुछ घट सके। आज तो पंजाब की एक पुरानी कहावत की तरह आग लेने आई, और घर संभाल बैठी जैसा हाल हो गया है कि पूरी जिंदगी किसी पार्टी के खिलाफ काम करने वाले इम्पोर्ट किए जाते हैं, और पूरी जिंदगी पार्टी का काम करने वाले लोगों के बाप बनाकर बिठा दिए जाते हैं। ऐसे पार्टीपिता की ताजपोशी संगठन में तो ठीक है, लेकिन संसद और विधानसभाओं को इस गंदगी से बचाना जरूरी है। 

(Daily Chhattisgarh)

मणिपुर के धमाकों से अधिक आवाज है मोदी की चुप्पी की...

 19 जून 2023 

 

मणिपुर के हालात बहुत ही खराब दिख रहे हैं। अभी घंटे भर पहले तक की खबरें बता रही हैं कि वहां हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है, अब तक मैतेई और कुकी समुदायों के बीच की हिंसा में सौ से अधिक मौतें हो चुकी हैं, और डेढ़ महीने का वक्त गुजर चुका है। दोनों तरफ के घरों में आग लग रही है, गोलीबारी चल रही है, और राज्य की पुलिस के अलावा देश की फौज और तरह-तरह की पैरामिलिट्री मिलकर भी हिंसा को रोक नहीं पा रही हैं। दोनों तरफ से की जा रही हिंसा में पुलिस और दूसरे सैनिक भी मारे जा रहे हैं। एक केन्द्रीय मंत्री के घर को भी आग लगा दी गई है, और इसके बाद उनका कहना था कि राज्य में कोई सरकार नहीं रह गई है, जबकि राज्य में उन्हीं की भाजपा की सरकार है, और भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। इस छोटे से राज्य के 16 में से 11 जिलों में कफ्र्यू चल रहा है, इंटरनेट बंद है, दूसरे प्रदेशों से पढऩे आए छात्र-छात्राओं को वापिस भेज दिया गया है, कुकी आदिवासियों में से 50-60 हजार बेदखल होकर राहत शिविरों में हैं, और हाल के बरसों के हिन्दुस्तान की एक सबसे भयानक हिंसा यहां सामने आई है जब गोली से जख्मी छोटे बच्चे को लेकर अस्पताल जाती उसकी मां को एम्बुलेंस सहित जलाकर राख कर दिया गया। मणिपुर हाईकोर्ट के एक फैसले से तीन मई से यह हिंसा शुरू हुई है, इस फैसले में राज्य सरकार को कहा गया था कि वह राज्य के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को आदिवासी आरक्षण की लिस्ट में जोडऩे की सिफारिश केन्द्र सरकार को भेजे। इससे राज्य में कुकी आदिवासी आरक्षित तबके के भीतर सबसे कमजोर तबका हो जाते, और उनके हाथों से आरक्षण की हिफाजत खत्म ही हो जाती। उसी एक मुद्दे को लेकर यह ताजा हिंसा चल रही है, और अब वहां के कुकी समुदाय का यह मानना और कहना है कि मौजूदा भाजपा मुख्यमंत्री के तहत उनके इस राज्य मेें रहने की कोई संभावना नहीं है, और उनके लिए केन्द्र सरकार एक अलग केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाए, या कोई और व्यवस्था करे। 

हिन्दुस्तान के अधिकतर लोगों का उत्तर-पूर्वी लोगों से कोई वास्ता नहीं रहता है, रिश्ता तो रहता ही नहीं है, बाकी हिन्दुस्तान की उनमें दिलचस्पी भी नहीं रहती है। ऐसे में हम जब-जब मणिपुर के मुद्दे को उठाते हैं, तो वह तकरीबन अनदेखा, अनसुना रह जाता है। खैर, किसी मुद्दे का महत्व इससे तय नहीं होना चाहिए कि उसे कितने लोग देखते या सुनते हैं। हिन्दुस्तान के लोगों की दिलचस्पी की गिनती लगाई जाए, तो सबसे अधिक दिलचस्पी एक किसी ग्लैमरस युवती, उर्फी जावेद के बदन पर हथेली जितने बड़े कपड़ों के तीन टुकड़ों में सबसे अधिक है, और डिजिटल मीडिया पर उसी दिलचस्पी की गिनती लगाकर इस देश की सरकारें मीडिया को इश्तहार देती हैं। जाहिर है कि सरकारें भी नहीं चाहतीं कि देश में किसी गंभीर मुद्दे पर बात हो, इसलिए सनसनी के झाग का हर बुलबुला अपने मीडिया संस्थान के लिए बाजार और सरकार दोनों से कमाई की ताकत रखता है, फिर चाहे उसका सामाजिक सरोकार शून्य ही क्यों न हो। ऐसे देश में मणिपुर की चर्चा करना फायदे का काम नहीं है, लेकिन वह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का काम जरूर है जिसे पूरा करने पर सरकार या बाजार किसी का साथ नहीं मिलता है। फिर भी इस, और ऐसे मुद्दों पर बार-बार लिखना जरूरी है ताकि बाकी हिन्दुस्तान के लोगों को भी लगे कि मणिपुर कोई मुद्दा है। 

केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को अगर मणिपुर की आज की नौबत में कुछ और अधिक करने की जरूरत नहीं लग रही है, तो वहां से सामने आया एक ताजा वीडियो मोदी-शुभचिंतकों को प्रधानमंत्री की जानकारी में लाना चाहिए। हो सकता है कि यह एक वजह मणिपुर की कुछ और फिक्र करने का सामान जुटा सके। वहां पर इम्फाल ईस्ट जिले के मैतेई समुदाय के कुछ लोगों ने इतवार को मोदी के मन की बात के प्रसारण का बहिष्कार किया। वे जिले के एक केन्द्र में इक_ा हुए और अपने ट्रांजिस्टर पटक-पटककर तोड़ डाले और इस वीडियो में दिखता है कि उन्होंने ट्रांजिस्टर के टुकड़ों को रौंदकर भी अपना गुस्सा निकाला। वहां के एक प्रमुख सामाजिक नेता ने एक वेबसाइट से कहा कि मणिपुर के निवासियों के लिए प्रधानमंत्री के मन की बात गैरजरूरी है, उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने (हिंसा रोकने के लिए) कुछ नहीं किया, वे आज तक चुप्पी साधे हुए क्यों है? उन्होंने कहा कि यह विरोध-प्रदर्शन हिंसा शुरू होने के 46 दिन बाद भी उनकी चुप्पी के खिलाफ है। दिल्ली की खबरें बताती हैं कि कर्नाटक चुनाव के वक्त से ही मणिपुर की हिंसा पर मोदी का ध्यान खींचते हुए देश की कई विपक्षी पार्टियों ने प्रधानमंत्री को इस पर गौर करने को कहा था, और 12 जून से 10 पार्टियों का एक प्रतिनिधिमंडल मणिपुर पर प्रधानमंत्री से मुलाकात के लिए वक्त मांगते खड़ा है। इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस, जेडीयू, सीपीआई, सीपीएम, आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक, तृणमूल, शिवसेना (उद्धव), आप, और एनसीपी शामिल हैं। लेकिन इन्हें अब तक मोदी से वक्त नहीं मिल पाया है। 

देश-विदेश के कई राजनीतिक टिप्पणीकारों ने यह सवाल उठाया है कि मोदी जिस तरह चीन पर बोलने से बचते रहे, चीन का नाम भी नहीं लिया, उसी तरह वे अब मणिपुर पर चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि इस हिंसाग्रस्त मणिपुर में उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री हैं, और यह शायद के इतिहास में पहला मौका होगा कि ऐसे हिंसाग्रस्त प्रदेश में केन्द्र सरकार और दोनों जगह सत्तारूढ़ भाजपा अपनी जिम्मेदारी सीधे निभाने के बजाय एक दूसरे उत्तर-पूर्वी राज्य असम के भाजपा मुख्यमंत्री को मणिपुर भेजती है, मानो वे तमाम उत्तर-पूर्वी राज्यों के प्रभारी मुख्यमंत्री भी हैं। मणिपुर तो जिस तरह जल रहा है, वहां जितनी लाशें गिर चुकी हैं, वहां नफरत जितनी फैल गई है, और शांति की संभावना कमजोर हो गई है, वह सब एक तरफ है, इस देश में मोदी के शुभचिंतकों को जिनकी उन तक पहुंच हो, उन्हें मोदी को यह समझाना चाहिए कि इतिहास में देश के खतरों के वक्त इस्तेमाल की गई चुप्पी सबसे अधिक बड़े अक्षरों में दर्ज होती है, और मोदी के नाम ऐसी कई चुप्पियां दर्ज हो चुकी हैं, होती जा रही हैं। यह सिलसिला भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है, देश के प्रधानमंत्री को ऐसी चुप्पी का हक नहीं दिया जा सकता। लोगों को याद है कि इतिहास में बाबरी मस्जिद को गिरते देखते हुए घर पर चुप बैठे प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव का नाम इतिहास में मस्जिद गिराने देने के लिए जिम्मेदार की तरह दर्ज है। प्रधानमंत्री को मणिपुर की फिक्र चाहे न हो, उन्हें कम से कम अपनी साख, और इतिहास में अपनी दर्ज हो रही, और दर्ज होने वाली जगह की फिक्र जरूर करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

गर्मी का अवसाद, समर डिप्रेशन, लोगों को पता ही नहीं चलता कि..

18  जून 2023

 

दुनिया में कम रौशनी के मौसम को अवसाद या डिप्रेशन से जोड़ा जाता है। जिन देशों में महीनों तक सूरज नहीं निकलता, या बहुत कम निकलता है, वहां पर लोग डिप्रेशन के शिकार बहुत मिलते हैं। ऐसे लोगों को सलाह दी जाती है कि जब सूरज की रौशनी मिले, तब उसका इस्तेमाल कर लें। लेकिन गर्मी के मौसम की वजह से भी डिप्रेशन हो सकता है, यह चिकित्सा विज्ञान में अच्छी तरह दर्ज है। इसकी कुछ वजह तो गर्मी हो सकती है, लेकिन इसकी बहुत सी वजहें इस मौसम में होने वाले, किए जाने वाले, और न कर सकने वाले बहुत किस्म के कामों से जुड़ी रहती हैं। 

अभी एक दोस्त के समर डिप्रेशन में घिरे होने की खबर मिली, तो इस बारे में कुछ पढ़ा। उससे पता लगा कि हिन्दुस्तान जैसे देश में गर्म मौसम के वक्त अधिकतर देश में स्कूलों की छुट्टियां रहती हैं, बच्चे घरों पर रहते हैं, और उनके पास करने को अधिक कुछ नहीं रहता है। जो परिवार संपन्न रहते हैं, उनके बच्चे तो फिर भी कहीं घूमने चले जाते हैं, रिश्तेदारों के यहां हो आते हैं, लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय बच्चों के लिए बाहर जाने की गुंजाइश बड़ी कम रहती है। ऐसे में वे लगातार घर पर रहते हैं, और उनकी उम्मीदें कुछ रहती हैं, मां-बाप की हैसियत कुछ और रहती है। परिवार बच्चों को कई-कई हफ्ते-महीने लगातार घर पर देखने और बर्दाश्त करने के लायक नहीं रह जाता, और जिस तरह कोई भी अच्छी चीज जरूरत से अधिक होने पर परेशानी का सबब बनती है, उसी तरह बच्चों का पूरे वक्त घर पर रहना पूरे परिवार के लिए एक अलग किस्म का तनाव रहता है। यह तनाव कुछ-कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि लॉकडाउन के वक्त कामकाजी लोगों के घर रहने से परिवार के बाकी लोग एक अलग किस्म के तनाव में रहते थे। और तो और लोगों के घर के बाहर के प्रेम और देहसंबंध भी इतना लंबा फासला हो जाने से तनाव से घिरे रहते थे, और वह कहीं न कहीं परिवार के भीतर झलकने लगता था। 

समर डिप्रेशन एक मेडिकल शब्दावली है जिसे सीजनल अफेक्टिव डिस ऑर्डर कहा जाता है, समरटाईम एसएडी। कुछ देशों में जहां पर लोग सैर-सपाटे को जा पाते हैं, या गर्मियों में समंदर के किनारे या स्वीमिंग पूल पर जाते हैं, वहां उन्हें अपने शरीर को लेकर तनाव होता है। लोग कपड़ों के भीतर महफूज महसूस करते हैं, क्योंकि वहां चर्बी को छुपाने को ऊपर कपड़ा रहता है, लेकिन जब सिर्फ नहाने या तैरने के कपड़े बदन पर रहते हैं, तो चर्बी चीख-चीखकर लोगों को दिखाती है कि देखो मैं कितनी हूं। बहुत से लोग गर्मियों में इस वजह से भी तनाव में रहते हैं, और डिप्रेशन में आ जाते हैं कि उनका बदन दिखाने लायक नहीं रह गया है। 

ठीक उसी तरह जिस तरह कि एक आम हिन्दुस्तानी परिवार में हर त्यौहार तनाव लेकर आता है कि गरीबी कितनी भी हो कुछ तो कपड़े खरीदने होंगे, घर में कुछ रंग-रोगन करना होगा, और खाने-पीने और मेहमानों पर भी कुछ तो खर्च होगा ही। इस खर्च का इंतजाम हर किसी के लिए आसान नहीं रहता है, और ठीक इसी तरह का तनाव गर्मियों की लंबी छुट्टियों में आ जाता है जब कूलर या एसी की वजह से बिजली का बिल बढऩे लगता है, घर पर रह गए बच्चे रात-दिन खाने-पीने की चीजें चाहते हैं, घूमने जाना चाहते हैं, फिल्म और मॉल जाना चाहते हैं, खेल के सामान और खेल के कपड़े-जूते खरीदना चाहते हैं, स्वीमिंग पूल की मेंबरशिप लेना चाहते हैं, और दोस्तों की तरह या उनके साथ दूसरे शहर घूमने भी जाना चाहते हैं। यह सब कुछ घर चलाने वाले मां-बाप के लिए बड़े तनाव की वजहें रहती हैं जो कि डिप्रेशन में तब्दील होती हैं, समर डिप्रेशन की एक वजह यह भी रहती है।

फिर मां-बाप के सिर पर यह भी आता है कि बच्चों को व्यस्त रखना, उन्हें एक क्लास से लाना और दूसरे में पहुंचाना, घर के कम्प्यूटर, इंटरनेट, और टीवी को बच्चों और अपने बीच किसी तरह बांटना। ऐसी बहुत सी बातें गर्मी की छुट्टियों को लेकर आती हैं, और इन दिनों जिस तरह बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज में, दोस्तों के बीच खर्चीली चीजों को देखकर आते हैं, और वैसा ही कुछ करना चाहते हैं, तो उनसे लगातार मनाही का एक संघर्ष चलना भी लोगों को डिप्रेशन में डाल देता है। यह मनोचिकित्सा विज्ञान ने दर्ज किया हुआ है कि बाहर पढऩे वाले बच्चे जब लंबी छुट्टियों पर घर आते हैं, तो वे मां-बाप के पूरे रूटीन को बदलकर रख देते हैं, उनका सोना-जागना सब कुछ बदल जाता है, और बच्चों की उम्मीदों पर खरा उतरना एक मुश्किल चुनौती रहती है। 

छुट्टियों के पहले अधिकतर लोगों को इन तमाम बातों के बारे में सोच लेना चाहिए, और कम से कम खर्च के बारे में तो साल भर से यह इंतजाम करके रखना चाहिए कि छुट्टियों का खर्च कैसे पूरा होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह कि त्यौहार के खर्च का इंतजाम रखना पड़ता है, या कर्ज और उधार लेना पड़ता है। अपने शहर में कपड़ा और राशन तो उधार मिल भी जाता है, लेकिन सिनेमाघर की टिकट, आइस्क्रीम, या दूसरे शहरों की टिकट और होटल तो उधार मिल भी नहीं सकती। इन बातों के अलावा मौसम की मार भी रहती है, गर्मी लोगों को परेशान करती ही है, खाने-पीने को ठंडा और मीठा अच्छा लगता है जो कि बहुत से लोगों के लिए परेशानी का सबब रहता है, और बहुत से परिवार ऐसे बुरे अनचाहे रिश्तेदार-मेहमान झेलते हैं कि बंगाली की एक कहावत याद आती है- मेहमान और मछली तीसरे दिन बदबू मारने लगते हैं। 

इसलिए आपके आसपास के लोग अगर आपसे बहुत गर्मजोशी से बात नहीं कर रहे हैं, तो याद रखें कि वे समर डिप्रेशन से भी गुजरते हो सकते हैं। इसलिए उनके साथ नर्मी बरतें, हमदर्दी रखें, और उनका हौसला बंधाते रखें कि ये छुट्टियां भी निकल जाएंगी, ठीक उसी तरह जिस तरह कि जिंदगी के और बहुत से मुश्किल दौर निकल जाते हैं।

(Daily Chhattisgarh) 

रूस-यूक्रेन के बीच अफ्रीकी मध्यस्थता, हिन्दुस्तान कहां है?

18 जून 2023 

 

दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ कई कदम आगे बढ़ गई है। जिन लोगों को यह लग रहा था कि यूक्रेन पर रूस का हमला जल्द खत्म हो जाएगा, उन्होंने इस जंग का एक बरस पूरा हो जाते देखा, और आज अधिकतर लोगों को यह भरोसा होगा कि ऐसा एक बरस और भी निकल सकता है। जंग धीमा पडऩे का नाम नहीं ले रहा, चीन जैसे दोस्त रूस के साथ जमकर खड़े हैं, ईरान रूस को हथियार भेज रहा है, हिन्दुस्तान जैसा बड़ा देश तमाशबीन बना हुआ है, और एक बहुत ही समझदार खरीददार की तरह वह रूस से सस्ते में जो-जो हासिल हो सकता है, उसे पा रहा है। यह भी उस वक्त हो रहा है जब अफ्रीकी देशों के मुखिया कल इन दोनों देशों में बीच-बचाव करने के लिए और अमन कायम करने के लिए यूक्रेन पहुंचे हुए थे, और आज वे रूस पहुंच गए होंगे। दोनों ही राष्ट्रपतियों से बात करके अफ्रीकी राष्ट्रप्रमुख शांति की पहल कर रहे हैं, और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा इस प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई कर रहे हैं। आज सुबह की खबर है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ बैठक में इस प्रतिनिधिमंडल ने यूक्रेन से रूस लाए गए बच्चों को वापिस भेजने कहा है, और कहा है कि यह जंग खत्म होनी चाहिए। उन्होंने दोनों देशों पर पर्याप्त दबाव डाला है कि वे जंग खत्म करें। इन देशों का यह भी कहना है कि इस जंग का सबसे बुरा असर अफ्रीकी देशों पर पड़ रहा है उनमें से जो अनाज खरीदने की हालत में हैं, उन्हें यूक्रेन से अनाज खरीदने नहीं मिल रहा, और जो अफ्रीकी देश अंतरराष्ट्रीय मदद पर जिंदा हैं, वहां भी मदद में अनाज नहीं जा पा रहा। 

आज दुनिया के तमाम देशों के लोगों को अपने-अपने देश के अंतरराष्ट्रीय रूख को भी देखना और समझना चाहिए। नाटो के तहत तमाम योरप और अमरीका का रूख साफ है। चूंकि जंग में गिरने वाली लाशें सिर्फ यूक्रेन और रूस की हैं, इसलिए नाटो देशों के लिए यह आसान है कि वे फौजी सामान से यूक्रेन की मदद करते रहें, और इस जंग में रूस की ताकत जितनी चुक जाए, उतना ही अच्छा है। बहुत से लोग इस बात को लिख भी चुके हैं कि पश्चिमी देश यूक्रेन में एक प्रॉक्सी-वॉर लड़ रहे हैं, यानी बिना वहां गए हुए अपनी मर्जी का जंग चला रहे हैं। संपन्न देशों में जब तक ताबूत नहीं लौटते, तब तक जनता में हाय-तौबा नहीं होता। यूक्रेन-रूस में आज यही हो रहा है। यूक्रेन से दसियों लाख शरणार्थी दूसरे देशों में जा रहे हैं, और लाशें यूक्रेन में ही थम जा रही हैं। दूसरी तरफ गोपनीयता के कानून से अपनी जनता के आंख-कान में पिघला सीसा डालकर रखने वाले रूसी राष्ट्रपति पुतिन लोगों को यही पता नहीं लगने दे रहे कि जंग में कितने रूसी मारे गए हैं। और इस जंग में रूस वाग्नर नाम की एक निजी भाड़े की फौज का भी व्यापक इस्तेमाल कर रहे हैं जिसके लोगों की मौत होने पर रूस को उनकी गिनती भी नहीं करनी पड़ती। इस तरह एक बददिमाग, अहंकारी, और आत्मकेन्द्रित रूसी तानाशाह इस जंग को यूक्रेन पर थोपकर हर कीमत पर इसे चला रहा है, और दूसरी तरफ पश्चिमी देश यूक्रेनियों के कंधों पर बंदूक रखकर खुद घर बैठे यह जंग लड़ रहे हैं। दोनों देशों के बीच बातचीत का कोई माहौल नहीं है, और इक्का-दुक्का कुछ देशों ने दोनों से पहल जरूर की है, लेकिन वजन पड़े ऐसी कोई कोशिशें अब तक हुई नहीं हैं। अफ्रीकी नेताओं का यह प्रतिनिधिमंडल ऐसा पहला बड़ा प्रयास है, और इसके महत्व का सम्मान करना चाहिए। 

जहां तक हिन्दुस्तान का सवाल है, तो विदेश गए हुए राहुल गांधी से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी का रूख इस मुद्दे पर ठीक वही है जो कि भाजपा (मोदी सरकार) का रूख है। मतलब साफ है कि भारत की ये दोनों बड़ी पार्टियां भारत के रूस से बहुत पुराने, बहुत व्यापक, और बहुत परखे हुए रिश्तों को लेकर एक ही किस्म की समझ रखती हैं, दोनों ही पार्टियां हिन्दुस्तान के हित में रूस को नाराज करने वाली कोई बात भी करना नहीं चाहती हैं। लेकिन इससे एक नुकसान हो रहा है। हाल ही में सउदी अरब और ईरान के बीच ऐतिहासिक तनावों के बाद अभी एक ऐतिहासिक समझौता चीन ने कराया, और इससे लोग हक्का-बक्का भी रह गए, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि चीन ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी दखल और कामयाबी साबित कर दिखाई है। इसके बाद चीन के प्रतिनिधि यूक्रेन और रूस भी हो आए। अपने देश के हितों को ध्यान में रखकर तनातनी में चुप रहना एक बात है, लेकिन ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर कुछ भी न कहना भारत के महत्व का घट जाना भी है। कोई तटस्थता ऐसी नहीं हो सकती जो कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही इस जंग पर पूरी तरह चुप रहे, जिस जंग से अफ्रीका के सवा सौ अरब लोगों का खाना-पीना मुहाल हो रहा हो, उसे देखते हुए भी चुप रहे। यह हिन्दुस्तान की तटस्थता नहीं है, यह हिन्दुस्तान की जरूरत से अधिक सावधानी है। दुनिया में जिसे बड़े नेता बनना होता है, उसे अपने देश के तात्कालिक हितों से परे जाकर भी कई कड़वे फैसले लेने पड़ते हैं, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तो यह बात भी रहती है कि आप फैसले चाहे न ले सकें, अपनी दखल और दिलचस्पी रखते तो दिखना ही चाहिए, जैसा कि चीन कर रहा है। 

देश के आम लोगों का विदेश नीति में अधिक काम नहीं रहता है, वह पूरी तरह से सरकार का मोर्चा रहता है, लेकिन लोगों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की समझ रहनी चाहिए, और सार्वजनिक मंचों पर, सोशल मीडिया पर लोगों को अपने देश को लेकर उन्हें अपनी सोच उजागर करते रहना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

धार्मिक अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट से नीचे कोई कार्रवाई मुमकिन नहीं...

17 जून 2023 

 

गुजरात के जूनागढ़ में दो दिन पहले एक दरगाह के अवैध निर्माण को लेकर भारी हिंसा हुई। स्थानीय प्रशासन ने इस दरगाह को अवैध निर्माण के खिलाफ नोटिस दिया था, और पांच दिन बाद उसे तोडऩे का नोटिस लगाने म्युनिसिपल के लोग पहुंचे थे जिसके विरोध में बड़ी भीड़ जुट गई, पुलिस पर पथराव शुरू हो गया, और गाडिय़ों को तोडक़र आग लगा दी गई। मोदी के गुजरात में इतने बवाल की हिम्मत होनी नहीं चाहिए थी जहां अभी पिछले विधानसभा चुनाव में ही केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपने प्रचार में 2002 में सिखाए गए सबक के असर की चर्चा करके आए थे। लेकिन तनाव हुआ, और लाठीचार्ज, आंसू गैस, पथराव, बड़ी पुलिस तैनाती सभी कुछ वहां देखने मिल रही है। यह भी हो सकता है कि इस अवैध सामुदायिक निर्माण को लेकर अब प्रशासन वहां पहले के मुकाबले कुछ अधिक कड़ी कार्रवाई कर सके क्योंकि हिंसा की शुरुआत इस तबके ने की है, इसलिए अब अगर वह किसी बुरे निशाने पर आता है, तो उसके साथ हमदर्दी कम रहेगी। 

लेकिन हम किसी एक राज्य, और किसी एक धर्म पर गए बिना एक सामान्य चर्चा करना चाहते हैं कि हिन्दुस्तान में किस तरह धर्म के नाम पर गुंडागर्दी चलती है, और एक धर्म के देखादेखी अधिकतर बाकी धर्म भी उसी राह पर चल निकलते हैं, और फिर इनमें से किसी को भी काबू करना नामुमकिन इसलिए हो जाता है कि हर एक के पास गिनाने के लिए दूसरों की मिसालें रहती हैं। अक्सर यह भी होता है कि सत्तारूढ़ पार्टियां अगर किसी धर्म के लोगों के थोड़े-बहुत भी समर्थन की उम्मीद करती हैं, तो वे भी उस धर्म के लोगों को एक समूह या समुदाय के रूप में नाराज करना नहीं चाहतीं। सत्तारूढ़ पार्टी बेफिक्र होकर तब फैसले ले सकती है जब वह भाजपा जैसी पार्टी हो, और जिसे यह पुख्ता मालूम हो कि मुस्लिम मतदाता उसके लिए वोट नहीं डालेंगे, इसलिए उन्हें खुश रखने की कोई जरूरत नहीं है, या उसे नाराज करने में कोई दिक्कत नहीं है। जब तक पार्टी और वोटर के रिश्ते इस तरह के साफ न हों, तब तक सत्ता की दुविधा दिखती ही है, और इसी दुविधा का फायदा उठाकर धार्मिक गुंडागर्दी अपने पांव जमाती है, और फिर अपनी मसल्स बढ़ाती है। 

सुप्रीम कोर्ट के बहुत साफ-साफ फैसले हैं जिनमें जिला कलेक्टरों पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि देश में कहीं भी किसी सार्वजनिक जगह पर कोई भी धार्मिक अवैध निर्माण नहीं होना चाहिए, वरना इन अफसरों को सीधा जिम्मेदार ठहराया जाएगा। लेकिन ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी अगर सरकारी कुर्सियों के लिए होते हैं, और किसी अफसर के नाम से नहीं होते, तो वे बेअसर होते हैं। हम अपने आसपास चारों तरफ सरकारी जमीन, सडक़ों की चौड़ाई, बगीचों और मैदानों पर, तालाबों के किनारे पाटकर, नदियों से सटकर इतने धार्मिक अवैध निर्माण देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को देश के तमाम जिला प्रशासन सस्पेंड कर देने पड़ेंगे। यह भी लगता है कि अदालतें हुक्म सुनाकर फिर आंखें बंद कर लेती हैं, क्योंकि अपने हुक्म की आखिर कितनी बेइज्जती वे बर्दाश्त कर सकती हैं? जनता के बीच के लोग एक तो जागरूक कम हैं, दूसरा यह कि धार्मिक आतंक से तमाम लोग इतने डरे-सहमे रहते हैं कि वे हिंसक धार्मिक, और अक्सर ही साम्प्रदायिक भीड़ से अकेले लडऩा नहीं चाहते, क्योंकि किसी इलाके में वहां के बहुसंख्यक लोगों को दुश्मन बनाकर जीना ही दुश्वार हो जाता है, वह आसान तो बिल्कुल ही नहीं रहता। 


तो ऐसे में किया क्या जाए? हिन्दुस्तान में कभी भी यह सुनने में नहीं आएगा कि किसी जाति और धर्म की भीड़ ने एकजुट होकर किसी अस्पताल या स्कूल के लिए सरकारी या सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जा किया, उनके लिए कोई इमारत बनाई। ऐसी सारी गुंडागर्दी सिर्फ धर्म के नाम पर, सिर्फ धर्म के लिए होती है, और वह जंगल की आग की तरह ऐसे जुर्म को दूसरों में भी बढ़ाते चलती है। गुजरात में तो खैर पक्के इरादों वाली एक मजबूत सरकार है, और वहां पर उसका रूख बड़ा साफ है, इसलिए वहां तो वह इस घटना से निपट लेगी, लेकिन बाकी देश में बहुत से प्रदेश ऐसे हैं जहां पर किसी एक या दूसरे धर्म, किसी एक या दूसरी जाति को खुश रखने के लिए सत्तारूढ़ और विपक्षी राजनीतिक दल बड़ी मेहनत करते हैं, और वहां धार्मिक या सामुदायिक अवैध निर्माणों को छूना भी अफसरों के लिए आसान नहीं होता है। ऐसा लगता है कि वक्त आ गया है कि किसी जनसंगठन या सामाजिक कार्यकर्ता को इस मुद्दे को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट को देश के तमाम इंजीनियरिंग कॉलेजों के प्राध्यापकों-छात्रों से उनके शहरों का सर्वे कराना चाहिए कि उसके कई बरस पहले के फैसले के बाद सार्वजनिक जगहों पर कितने धार्मिक अवैध निर्माण हुए हैं, और उस दौरान जितने कलेक्टर रहे हों, या सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जिन अफसरों के ओहदों का जिक्र हो, उन सबके सीआर में इस गैरजिम्मेदार अनदेखी का जिक्र करवाना चाहिए, और उन्हें सजा के बतौर उनकी तनख्वाह काटनी चाहिए। जब तक जनता पहल नहीं करेगी, तब तक शासन-प्रशासन तो बेपरवाह बने ही रहेंगे, सुप्रीम कोर्ट भी खुद होकर शायद ही अपनी इज्जत की फिक्र करे। भारत की व्यवस्था यही है कि लोगों को जाकर सुप्रीम कोर्ट को हिलाना पड़ता है कि कहां उसकी बेइज्जती हुई है, फिर सुबूतों से उसे साबित करना पड़ता है कि सचमुच ही बेइज्जती हुई है, तब जाकर जज सरकारों को नोटिस देते हैं कि उन पर अदालत की अवमानना का मुकदमा क्यों न चलाया जाए। हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान में अगर कुछ मुद्दों पर एक साथ सैकड़ों या हजारों अफसरों को सजा दी जानी चाहिए, तो वह धार्मिक अवैध निर्माणों को लेकर, और हेट-स्पीच को लेकर दी जानी चाहिए, ताकि वह बाकी फैसलों को लेकर भी अफसरों को, और नेताओं को चौकन्ना करे। सुप्रीम कोर्ट को दो जांच कमिश्नर नियुक्त करने चाहिए जो कि देश भर में इंजीनियरिंग छात्र-शिक्षकों से धार्मिक अवैध निर्माण का सर्वे करवाए, और मीडिया मॉनिटरिंग करके यह तय करे कि कहां-कहां हेट-स्पीच दी जा रही है, और कोई मामला दर्ज नहीं हो रहा है। इससे कम में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और आदेशों पर किसी अमल की संभावना नहीं दिखती है। 

(Daily Chhattisgarh)

बोरिस जॉनसन से सीखें, या ब्रिटिश खबरें रोकें?

   16 जून 2023 

 

लोगों को जब अपने घर में कोई चीज मनपसंद नहीं मिलती है, तो वे बाहर उसे तलाशते हैं। इसमें शादीशुदा जोड़ों के देह-सुख से लेकर खाने-पीने की चीजों तक बहुत सी चीजें रहती हैं कि लोग बाहर जाकर क्यों मुंह मारते हैं। अब ऐसे में जब लोगों को अपने मुल्क में मीडिया की आजादी न दिखे, तो दूसरे बेहतर लोकतंत्रों में आजाद मीडिया देख लेना चाहिए कि कहीं तो मीडिया आजाद है, और उस मुल्क की मीडिया की आजादी पर खुश हो लेना चाहिए, क्योंकि अपने घर पर वह आजादी नसीब नहीं है। इसी तरह जब नेताओं को लेकर यह निराशा होती है कि उनके खिलाफ कुछ भी तोहमत लग जाए, वे कितने ही बड़े जुर्म में क्यों न फंस जाएं, उनके चेहरे पर न शर्म दिखती न शिकन, तो फिर इन दोनों श को देखने के लिए कुछ दूसरे बेहतर लोकतंत्रों की तरफ झांक लेना चाहिए। ऐसा ही एक मामला ब्रिटेन का है कि तोहमत लगने पर नेताओं को कैसी मिसाल पेश करनी चाहिए, हिन्दुस्तान में तो ऐसा देखने का सुख नसीब नहीं हो सकता, इसलिए उस ब्रिटेन को चलें जिसने हिन्दुस्तान को गुलाम बना रखा था। 

कोरोना महामारी के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने प्रधानमंत्री आवास पर एक पार्टी दी थी, जिसमें कई लोग शामिल हुए थे जो कि वहां काम करने वाले थे, उस पार्टी में ब्रिटेन के प्रचलन के मुताबिक कुछ दारू-शारू भी पी गई थी। बाद में जब यह बात लीक हुई और लोगों को पता लगा कि देश के आम लोगों पर तो कोरोना-प्रतिबंधों के चलते आवाजाही पर भी रोक थी, पार्टी करना तो दूर की बात थी, उस वक्त उनका प्रधानमंत्री ऐसी पार्टी कर रहा था, तो इस पार्टीगेट-कांड की वजह से बोरिस जॉनसन को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। खुद उनकी पार्टी के लोग खुलकर उनके खिलाफ खड़े हो गए थे, और संसद में इस पार्टी को लेकर झूठ बोलने की तोहमत भी उन पर लगी थी। लंदन की पुलिस ने भी इस मामले की जांच की थी, और प्रधानमंत्री को इस पार्टी के लिए पेनाल्टी नोटिस जारी किए थे। हिन्दुस्तान के लोगों को पुलिस की ऐसी आजादी की खुशी मनाने के लिए भी ब्रिटेन की तरफ देखना चाहिए कि कोरोना के बीच ऐसी पार्टी की जांच करके पुलिस ने प्रधानमंत्री और उनके उस वक्त के वित्तमंत्री ऋषि सुनक दोनों को पेनाल्टी नोटिस जारी किए थे। अब संसदीय कमेटी की रिपोर्ट पर संसद में चर्चा होगी, और आगे की फजीहत को देखते हुए बोरिस जॉनसन ने संसद से तुरंत प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है। वे संसदीय जांच कमेटी के नतीजों से असहमत थे, और अपने को बेकसूर भी मानते हैं, लेकिन संसद में और शर्मिंदगी झेलने के बजाय उन्होंने उसे छोड़ देना बेहतर समझा। 

अब जिन देशों में लोग संसद और विधानसभाओं में बलात्कार के मामले झेलते हुए, बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की खुली तोहमतें झेलते हुए बाकी तमाम जिंदगी भी सदन में बने रहना चाहते हैं, उनके देश-प्रदेश के लोगों को खुशी पाने के लिए गोरी संसद की तरफ देखना चाहिए, जो कि एक वक्त हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने वाले गोरों की संसद है, लेकिन जिसमें थोड़ी सी शर्म बाकी भी है। हिन्दुस्तान के बारे में अक्सर कहा जाता है कि इसने अपनी संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से सीखी है, उसने वहां से संसदीय परंपराएं, और शर्म नहीं सीखी है। और अगर थोड़ी-बहुत सीखी भी रही होगी, तो वह नेहरू और शास्त्री के साथ चल बसी होंगी। बाद के वक्त में संसदीय परंपराओं को कूट-कूटकर खत्म करने का जो सिलसिला चला, वह हाल के बरसों में तो एकदम ही फास्ट फार्वर्ड तरीके से आगे बढ़ रहा है, और संसद के धार्मिक अनुष्ठान के वक्त दर्जन भर बलात्कार और यौन शोषण का आरोपी सांसद वहां मुस्कुरा रहा था, और उसकी शिकार लड़कियां सडक़ों पर पीटी जा रही थीं। गौरवशाली परंपराएं यहां इतिहास बन चुकी हैं, और जहां के इतिहास से यहां की संसदीय व्यवस्था बनाई गई थी, वहां पर अब भी एक थानेदार जाकर प्रधानमंत्री निवास में हुई दारू पार्टी की जांच कर सकता है, करता है, नोटिस जारी करता है।

बोरिस जॉनसन के इस्तीफे को लेकर यह भी सोचने की जरूरत है कि उनका संसद भवन तो सैकड़ों बरस पुराना है, एक बार तो आगजनी में जल भी चुका है, लेकिन उसमें संसदीय-आत्मा जिंदा है। वहां प्रधानमंत्री की पार्टी के लोग भी प्रधानमंत्री के आचरण के खिलाफ खुलकर बोल सकते हैं, बोलते हैं। वहां प्रधानमंत्री की एक गलती पर उसकी पार्टी के सांसद उसके खिलाफ वोट डालने को तैयार रहते हैं, और उसे इस्तीफा देना पड़ता है। हिन्दुस्तान में गौरव के लिए हजार करोड़ से संसद का नया भवन बना है, उस इमारत पर गर्व किया जा सकता है, हालांकि कई लोगों का यह मानना है कि वह योरप के कई नस्लवादी देशों की इमारतों से बिल्कुल ही मिलती-जुलती इमारत बनाई गई है, और उस नस्लवादी इतिहास की याद दिलाती है। लेकिन हिन्दुस्तानी संसद भवन किस वजह से उन फासिस्ट डिजाइनों पर बनी है, यह आर्किटेक्चर के छात्रों के लिए शोध का एक विषय हो सकता है, और वे गुजरात जाकर इसके आर्किटेक्ट से बात कर सकते हंै, हम तो इमारत के भीतर की आत्मा पर बात करना चाहते हैं, जिसे हजार करोड़ के बजट में नहीं बनाया जा सकता, नहीं बचाया जा सकता। 

प्रधानमंत्री निवास पर कोरोना के बीच काम कर रहे सरकारी लोगों के बीच हुई पार्टी को लेकर पहले प्रधानमंत्री पद से, और फिर संसद से इस्तीफा देना पड़ा। अब ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान में सरकारों और संसद-विधानसभाओं के लोग ब्रिटिश खबरों पर रोक लगाना बेहतर समझेंगे कि हिन्दुस्तानी लोग वहां की मिसालें न गिनाने लगें। लोकतंत्र कांक्रीट के ढांचों का नाम नहीं होता, वह शर्म, गरिमा, नीति-सिद्धांतों जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों का नाम होता है। संसद की इमारत और दस-बीस बरस नहीं बनती, लेकिन पुरानी इमारत में ही एक आजाद बहस हो पाती, देश की फिक्र हो पाती, लोकतंत्र और इंसानियत के सिद्धांतों पर फैसले लिए जा सकते, तो उस देश की संसदीय व्यवस्था गौरवशाली होती। इमारत सिर्फ डिजाइनर और ठेकेदार के लिए गौरव की बात हो सकती है, उस इमारत की आत्मा के बिना वहां चल रहे संस्थान के लिए वह गौरव की बात नहीं हो सकती। हिन्दुस्तान की हजार करोड़ की इस ताजा इमारत के भीतर बृजभूषण शरण सिंह की आत्मा बैठी हुई है, और जिन लोगों को भारतीय संसदीय व्यवस्था पर गर्व करने की हसरत है, उन्हें ऐसी आत्मा से छुटकारा पहले पाना होगा, उसके बाद सोचना होगा कि गर्व के लिए और क्या-क्या जरूरी है। फिलहाल कुछ दावतों के लिए ब्रिटेन में प्रधानमंत्री गिर गया, और कई बलात्कारों के बावजूद भारतीय संसद अपने सेंगोल को थामे हुए गर्व से फूले नहीं समा रही है। इस पाखंड को समझने की जरूरत है, और उस समझ का नाम ही लोकतंत्र है। 

(Daily Chhattisgarh)