नए साल का मौका कुछ छोडऩे और कुछ पकडऩे का भी होता है

  31 दिसंबर 2021

   

नए साल का मौका एक वक्त तो डायरी कैलेंडर बदलने का रहता था, लेकिन अब तो मोबाइल फोन ने डायरी और कैलेंडर दोनों की जरूरत को खत्म कर दिया है। नतीजा यह है कि शायद ही कोई डायरी और कैलेंडर आते होंगे, या उसका इस्तेमाल करते होंगे। ऐसे में बाकी तमाम चीजें ज्यों की त्यों बनी रहतीं, अगर कोरोना का हमला नहीं हुआ रहता। आज हालत यह है कि बहुत सी जगहों पर सरकारी हुक्म से, और बहुत सी जगहों पर अपनी मर्जी से भी, लोग नए साल के जश्न से दूर हैं। लेकिन फिर भी मोबाइल फोन की मेहरबानी से लोग एक-दूसरे को बहुत से संदेश भेज रहे हैं, और कुछ डिजाइनें घूम-घूमकर बहुत से लोगों की तरफ से आ रही हैं। लोगों के पास वक्त भी कम रहता है और कल्पनाशीलता भी कम, इसलिए लोग किसी की गढ़ी हुई डिजाइन को आगे बढ़ाते रहते हैं, या किसी के बनाए हुए संदेश को। लेकिन यह मौका बहुत से लोग अपने-आपको धोखा देने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। नया साल नए वायदों और नई कसमों का वक्त भी रहता है, और लोग कई किस्म के संकल्प लेते हैं। इनमें से बहुत से संकल्प तो किसी नशे से पीछा छुड़ाने के होते हैं, लेकिन कुछ और खाने-पीने की नुकसानदेह चीजों को छोडऩे के रहते हैं, तो बहुत से उत्साही लोग नए साल से सुबह-शाम की सैर, कसरत, योग, या जिम शुरू करने  की कसमें भी खाते हैं। बुरी आदतों को छोडऩा, और अच्छी आदतों को शुरू करना, यह नए साल के मौके पर सबसे लोकप्रिय कसमें रहती हैं, और इन्हीं के मार्फत लोग अपने-आपको धोखा देते हैं। फिर भी दो-चार फीसदी लोग भी अगर इन पर कायम रहते हैं तो वे अपने नए साल को सचमुच चमकता हुआ नया साल बना सकते हैं।

बुरी आदतों को छोडऩा और अच्छी आदतों को शुरू करना, दोनों में से अधिक मुश्किल कौन रहता है, यह सोच पाना आसान नहीं है. हो सकता है कि इन दोनों के बीच कड़ा मुकाबला रहता हो, और एक ड्रॉ की नौबत आती हो। फिर भी इन दोनों की कोशिश करना चाहिए क्योंकि किसी के लिए इन दोनों में से किसी एक ही को छांटने की मजबूरी तो रहती नहीं है, लोग इन दोनों को अगर साथ-साथ करें तो इन्हें खुद एक-दूसरे से बढ़ावा भी मिलता है. हम कुछ तो अपने खुद के तजुर्बे से यह नसीहत देने की हालत में हैं कि जब कभी समझदारी आती है, वह अकेले नहीं आती, सहेलियों के साथ आती है। लोग किसी एक मामले को लेकर जिम्मेदार नहीं होते हैं अगर वह खाने-पीने को लेकर जिम्मेदार बनते हैं, तो वे अपने आप सैर, कसरत या योग के लिए भी जिम्मेदार हो जाते हैं। इसी तरह जो लोग कसरत या योग शुरू करते हैं, वे लोग अपने-आप खाने-पीने को लेकर चौकन्ने हो जाते हैं। और ये दोनों बातें एक-दूसरे से बड़ी गहराई से जुड़ी हुई इसलिए हैं कि एक पर ध्यान देते ही दूसरे का महत्व समझ आने लगता है। इसलिए लोगों को तुरंत ही इन दोनों में से किसी एक को पकडऩा चाहिए तो दूसरी बात अपने-आप साथ चलने लगती है।

 आज तो टेक्नोलॉजी की मेहरबानी से बहुत सी चीजें आसान हो गई हैं। तकरीबन हर किसी के हाथ में एक मोबाइल फोन रहता ही है और मोबाइल फोन पर मुफ्त के दर्जनों ऐसे एप्लीकेशन हासिल हैं जो कि आपके पैदल चलने, दौडऩे, या साइकिल चलाने का हिसाब-किताब रखते हैं आपकी रफ्तार बताते हैं, आपकी तय की हुई दूरी बताते हैं, और हर हफ्ते या हर दिन आपके पिछले रिकॉर्ड के मुकाबले ताजा रिकॉर्ड की तुलना करके भी आपके सामने रखते हैं। इसमें कोई खर्च नहीं होता है। एक बार यह सिलसिला शुरू हो जाए तो उत्साह बने रहता है और जो लोग इस सफर पर बढ़ निकलते हैं, उनका यह भी मिजाज होने लगता है कि वे उठते-बैठते दूसरे लोगों से अपने फिटनेस की चर्चा करने लगते हैं। फिटनेस का ख्याल रखते हुए लोगों को यह समझ आता है कि एक दिन पहले खाई हुई मिठाई का नुकसान घटाने के लिए कितने किलोमीटर पैदल चलना पड़ेगा, यह याद आते ही लोगों को हर बार मिठाई सामने आते ही किलोमीटर याद आने लगते हैं। इस तरह खानपान और फिटनेस इन दोनों की एक यारी है जो कि साथ-साथ चौकन्ना होकर चल सकती है, या कि साथ-साथ लापरवाह होकर।

लोगों को नए साल के इस मौके पर हम यही नसीहत या सलाह देना चाहते हैं कि वे अगर अपने खुद पर हर दिन एक-दो घंटे खर्च करने का फैसला लें, तो उनका तन और मन भी ऐसा फैसला लेंगे कि वे उनकी जिंदगी को इन खर्च किए हुए घंटों से कई गुना अधिक बढ़ा दें। इस बात के महत्व को समझने की जरूरत है कि लोग निठल्ले हों, या जरूरत से ज्यादा व्यस्त रहते हों, सबके पास अपने ऊपर खर्च करने के लिए दिन में एक-दो घंटे रहने चाहिए। यह एक किस्म का पूंजी निवेश होता है जिसका नफा कुछ महीनों के भीतर ही बढ़ी हुई ताकत और बढ़ी हुई ऊर्जा की शक्ल में मिलने लगता है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि सेहत का ख्याल न रखने से जितने किस्म की बीमारियां घर कर जाती हैं, वे बीमारियां दिवाला भी निकाल सकती हैं, और दिवाली का मजा भी खत्म कर सकती हैं, जिंदगी की उत्पादकता भी घटा सकती हैं, और उम्र तो घटती ही है। इसलिए अपनी सेहत को बेहतर रखने के लिए हर दिन 1-2 घंटों का पूंजी निवेश सबसे अधिक फायदा देने वाला म्यूच्युअल फंड है, इस बात को याद रखते हुए सुबह-शाम वक्त निकालने का सिलसिला शुरू भर करना होता है, और कुछ ही महीनों में वह जिंदगी का सबसे मजेदार हिस्सा बन जाता है। जो लोग सुबह-शाम पैदल चलना या दौडऩा नहीं करते हैं, जो योग-ध्यान या कसरत नहीं करते हैं, उन्हें यह अंदाज भी नहीं रहता कि यह कोई यातना-प्रताडऩा नहीं है, एक बहुत ही मजे और सुख का सिलसिला है जिसका स्वाद विकसित होने में कुछ महीनों का समय जरूर लग सकता है।

नए साल के इस मौके पर यह भी समझने की जरूरत है कि लोग अपनी अगली पीढ़ी के लिए कारोबार खड़ा कर जाते हैं, मकान बना जाते हैं, गहने और बैंक डिपॉजिट छोड़ जाते हैं। इनमें से कोई भी चीज अगली पीढ़ी के लिए इतने काम की नहीं रहती, जितने काम की उनकी सेहत हो सकती है। और उन पर अच्छी सेहत की कोई भी नसीहत इतना असर नहीं कर सकती जितना कि आप अपनी मिसाल सामने रखकर डाल सकते हैं। जो लोग अपनी फिटनेस और अपनी सेहत पर ध्यान देते हैं, और मेहनत करते हैं, वे अपनी अगली पीढ़ी की बेहतर सेहत की एक किस्म से गारंटी भी कर जाते हैं। परिवार में किसी एक का फिट रहना बाकी लोगों के लिए बिन बोली चुनौती सरीखा रहता है और उसका असर होता ही होता है। लोग अपने परिवार से परे, अपने दोस्तों के बीच, अपने दफ्तर और पड़ोस के लोगों के बीच, एक मिसाल की तरह रहते हैं, अच्छे कामों के लिए भी, और बुरे कामों के लिए भी। इसलिए नए साल के इस मौके पर लोगों को नशे और बुरी आदतों को छोडऩा तो तय करना ही चाहिए, और इसके साथ-साथ अच्छे खान-पान और बेहतर जीवन शैली का संकल्प भी लेना चाहिए। आज बीमारियां इतनी जानलेवा और इतनी महंगी हो रही हैं कि उनसे जूझ पाना हर किसी के बस का नहीं रह गया है। किसी बीमारी के होने से बच जाना ही सबसे अच्छा इलाज है। इसलिए जीवन शैली से होने वाली अनगिनत जानलेवा बीमारियों से बचने का सबसे सस्ता और आसान रास्ता है बिना किसी खर्च वाली ऐसी जीवन शैली को अपना लेना जिसमें आसान सी कसरत करके, पैदल चलकर, और दौडक़र, योग और ध्यान करके, और सेहतमंद चीजें खाकर अपने को अधिक उत्पादक बनाकर रखना और बीमारियों से दूर रखना। आज के दिन इससे अधिक जरूरी बात हमें और कोई नहीं सूझ रही है और इसे अधिक नैतिक अधिकार से कहने का दमखम आज इसलिए है कि पिछले कई महीनों से हमने ऐसी बेहतर जीवन शैली का अनुभव किया है और उसका फायदा देखा है। इससे सस्ता और इससे अधिक सुखद और कोई काम नहीं हो सकता, बस यही है कि इसका टेस्ट डेवलप होने में कुछ हफ्तों या कुछ महीनों का समय लग सकता है।

(Daily Chhattisgarh)

सोशल मीडिया की धुंध में, जिसके ऐसे-ऐसे यार उसको दुश्मन की क्या दरकार ?

 30 दिसंबर 2021

   

सोशल मीडिया पर हिंदुस्तान के बहुत से लोग लगातार दूसरों को धमकियां देने का काम करते हैं, और तरह-तरह की गालियां देते हैं। बहुत से लोगों का यह मानना है कि वैचारिक आधार पर यह हमला जिस किस्म का दिखता है, उससे यह लगता है कि ये किसी एक संगठन से जुड़े हुए लोग हैं जो कि भुगतान पाकर रात-दिन अलग-अलग नाम से किसी पर हमला करते हैं, किसी को विचलित करने का काम करते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया पर कुछ लोग अपने नाम के साथ फ़ख्र से यह भी लिखते हैं कि उन्हें देश के कौन सबसे चर्चित और बड़े लोग फॉलो करते हैं। यह भी हो सकता है कि जब इतने बड़े लोग जो कि गिने-चुने लोगों को ही फॉलो करते हैं, वे जब ऐसे धमकीबाजों को और ऐसे नफरतजीवियों को फॉलो करते हैं, तो हो सकता है कि उन्होंने सोच-समझकर ही इन पर यह मेहरबानी की हो। यह बात हक्का-बक्का करती है लेकिन सोशल मीडिया पर किसने, किसे, किसलिए फॉलो किया है यह तो पता लगता नहीं है। इस बीच कुछ ऐसे लोग भी सोशल मीडिया पर देखते हैं जिन्होंने अपने प्रोफाइल पर किसी एक पार्टी का झंडा लगा रखा है, और उस पार्टी के नेता की तस्वीर भी लगा रखी है। इसके अलावा उनकी पोस्ट में एक चौथाई पोस्ट ऐसी भी रहती हैं जो कि उस पार्टी के प्रचार की रहती है और उस पार्टी की सकारात्मक बातों को भी वे आगे बढ़ाते रहते हैं। लेकिन कई ऐसे अकाउंट भी देखने में आ रहे हैं जो जाहिर तौर पर अपने को किसी एक पार्टी का तरफदार साबित करते हैं, और फिर साथ-साथ दूसरी पार्टियों के नेताओं के खिलाफ गंदी गालियां लिखते हैं, धमकियां लिखते हैं, उनके खिलाफ नफरत की बातें लिखते हैं। तो इससे एक तस्वीर ऐसी बनती है कि एक पार्टी के लोग दूसरी पार्टी के लोगों के खिलाफ इस तरह की गंदी बातें लिख रहे हैं। जबकि ऐसे लोग किसी पार्टी के हैं या नहीं यह देखने की फुर्सत उस पार्टी को भी नहीं रहती। जबकि होना यह चाहिए कि अपने आपको किसी पार्टी का समर्थक बताने वाले लोग अगर उसके नेता और उसके झंडे की तस्वीरें इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उनकी पोस्ट की हुई चीजों को भी वह पार्टी देखे, और अगर उनमें अश्लीलता, हिंसा, या धमकी दिखे, तो तुरंत फेसबुक, ट्विटर, या इंस्टाग्राम में शिकायत दर्ज कराए कि ऐसे गलत लोग उनकी पार्टी और नेता के फोटो का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।

सोशल मीडिया ऐसी दोधारी तलवार है कि जिसमें कौन दोस्त है, और कौन दुश्मन है, यह कभी-कभी तो साफ हो जाता है, लेकिन कभी-कभी यह धुंधला भी रहता है। ऐसा भी रहता है कि दिख तो दोस्त रहे हैं, लेकिन काम दुश्मन सरीखा कर रहे हैं। इसलिए आज किसी भी कारोबार को किसी वैचारिक या राजनीतिक संगठन को, जिन्हें सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी या अपने बारे में कही जाने वाली बातों से कोई फर्क पड़ता हो, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी कैसी छवि वहां बन रही है। हम तो ऐसे दर्जनों अकाउंट देख-देखकर हक्का-बक्का हैं कि क्या इन्हें उन पार्टियों या धार्मिक आध्यात्मिक संगठनों की तरफ से अब तक कोई नोटिस नहीं मिला है कि उनकी हरकतों से ये संगठन भी बदनाम हो रहे हैं? आज किसी से दुश्मनी निकालनी हो तो उसका एक आसान तरीका दिख रहा है कि उसके समर्थक की तरह बनकर एक सोशल मीडिया अकाउंट बनाया जाए और उनके समर्थन की चार बातें पोस्ट की जाए और उसके बाद चालीस बातें उनके विरोधियों को धमकी, हिंसा या अश्लीलता की पोस्ट की जाए। किसी को बदनाम करने के लिए उसी का हिमायती, उसी का दोस्त बनकर यह काम अधिक आसानी से किया जा सकता है। आज बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है और सार्वजनिक जीवन में जो राजनीतिक दल या संगठन सक्रिय हैं वह इसे अनदेखा करने की मासूमियत का दावा नहीं कर सकते। जो लोग जनता के बीच में जी रहे हैं उनकी यह भी जिम्मेदारी बनती है कि उनके समर्थक बनकर सक्रिय लोग किस किस्म के हैं इस पर नजर रखी जाए। सोशल मीडिया आज न सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में जनधारणा प्रबंधन (परसेप्शन मैनेजमेंट) का इतना बड़ा औजार और हथियार बन चुका है कि उसकी ताकत को अनदेखा करना ठीक नहीं है। अभी हमारे पास कई ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट हैं जो पहली नजर में किसी एक पार्टी के समर्थक दिख रहे हैं, लेकिन उस पार्टी के विरोधियों के लिए वैसी जुबान में गालियां और अश्लील बातें लिख रहे हैं जैसे कि पहले लोग शौचालयों के भीतर दरवाजों पर कुरेद देते थे। अब हैरानी की बात यह भी है कि बहुत से लोग जो अपने-आपमें बहुत भले हैं वे भी किसी तरह झांसे में आकर ऐसे लोगों के सोशल मीडिया दोस्त हो गए हैं। इनकी लिखी हुई बातें इतनी अधिक गंदी हैं कि उनका कोई जिक्र भी यहां नहीं हो सकता, इसलिए हम बतौर सावधानी यहां पर सार्वजनिक जीवन के लोगों को यह समझाना चाह रहे हैं कि उन्हें अपने समर्थक से दिखने वाले लोगों के प्रति अधिक सावधान रहना चाहिए क्योंकि उनके किए हुए कुकर्म उनके समर्थन पाने वाले नेताओं या संगठनों की भी इज्जत खराब करते हैं। यह भी हो सकता है की एक साजिश के तहत बड़े पैमाने पर ऐसा किया जा रहा हो लेकिन उसकी छानबीन का हमारे पास कोई जरिया नहीं है, जिन लोगों का नाम इससे बदनाम हो सकता है उन्हें यह परवाह हो तो वे खुद ही इसकी शिकायत कर सकते हैं। फिलहाल लोगों को हमारी यही सलाह है कि किसी की तस्वीर या उसका झंडा देखकर, उसके किसी के समर्थक देखते हुए सोशल मीडिया अकाउंट को सच्चा मान लेना ठीक नहीं होगा। हो सकता है कि बदनाम करने की नीयत से कोई समर्थक बनकर ऐसा कर रहा हो।

(Daily Chhattisgarh)

मुगलों की निशानी ताजमहल से तालिबानी अंदाज़ में क्यों नहीं निपटना चाहिए?

 29 दिसंबर 2021

   

नफरत नजरों को छीन लेती है। कुछ लोगों की नजरों को तो कुदरत छीनती है लेकिन नफरत उनकी नजरों को भी छीन लेती है जिन्हें कुदरत ने नजरें दी हुई है। नतीजा यह होता है कि ना हकीकत दिखाई पड़ती, और न दिमाग उस मुताबिक काम करता। उत्तर प्रदेश सरकार में पूरे प्रदेश का भगवाकरण करने की मुहिम इस हद तक बढ़ गई है कि मुस्लिम विरोध की नफरत उसकी सोच-समझ को पूरी तरह खत्म कर बैठी है। एक-एक कर अलग-अलग शहर-मोहल्ले और सडक़ों के नाम बदलते हुए सरकार का दिमाग ही खत्म हो गया है। या फिर यह भी हो सकता है कि पूरे का पूरा दिमाग बाकी मुस्लिम नामों को तलाश करने में लगा हुआ होगा कि अगला नाम क्या बदला जाए। इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज रख देना तो हिंदूकरण का अंत होना चाहिए था, लेकिन बात वहां पर थमी नहीं। राज्य सरकार की वेबसाइट देखें तो उस पर प्रयागराज के बारे में सामान्य जानकारी यह मिलती है कि इस शहर के अकबर प्रयागराजी एक प्रमुख आधुनिक शायर थे, और तेग प्रयागराज, राशिद प्रयागराज जैसे और शायरों की जगह प्रयागराज ही थी। अगर उर्दू साहित्य में इन नामों को तलाशा जाए तो इनका लिखा हुआ एक शेर ना मिले, शेर तो शेर, सियार या लोमड़ी भी ना मिले। इसलिए कि अकबर प्रयागराजी अकबर इलाहाबादी थे, और तेग प्रयागराज, तेग इलाहाबादी थे, और राशिद प्रयागराज, राशिद इलाहाबादी थे। उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग की वेबसाइट इन उर्दू शायरों के नाम को प्रयागराज ही बना कर पेश कर रही है। पता नहीं कब्र में अकबर इलाहाबादी किस तरह बेचैनी से करवट बदल रहे होंगे।

नफरत के इस सिलसिले ने चीजों के हिंदूकरण कि यह पराकाष्ठा पेश की है जिसमें लोगों के नामों को बदलकर उनका हिंदूकरण किया जा रहा है। अब कृष्ण के बारे में लिखने वाले अनगिनत मुस्लिम शायरों और कवियों के नाम का हिंदूकरण अभी बाकी ही है, और पता नहीं कबीर को कौन सा नाम अलॉट किया जाएगा, शायद वे अब कृष्णवीर कहलायेंगे। आमतौर पर किसी राज्य सरकार का अमला भी इस दर्जे का बेवकूफ नहीं होता है कि जिंदा या मरे हुए शायरों के नाम को वह अपने बदले हुए शहरों के नाम के मुताबिक बदल दे, लेकिन उत्तर प्रदेश की बात अनोखी है, वहां पर मुस्लिम नामों और मुस्लिमों से नफरत इस हद तक बढ़ गई है कि उसने सरकारी अमले की अक्ल पर भी पर्दा डाल दिया है। दुनिया के इतिहास में इस दर्जे की घटिया हरकत और बेवकूफी का मिलाजुला मेल शायद ही कहीं और देखने मिलेगा। लेकिन अच्छा है इतिहास में नफरत और बदनीयत को इसी तरह साफ-साफ दर्ज होना चाहिए।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार को भगवा रंग से अपनी मोहब्बत और हरे रंग से अपनी नफरत के चलते हुए अब कुछ काम और करने चाहिए। अपने प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों को लगाकर भगवे और केसरिया रंग की फसलें तैयार करनी चाहिए और पेड़-पौधों के हरे रंग को भी बदलकर भगवा-केसरिया करने का विज्ञान ढूंढना चाहिए। इसके अलावा योगी सरकार को अपने प्रदेश की महिलाओं का पूरा भारतीयकरण करने के लिए उनके उबटन की मुल्तानी मिट्टी पर रोक लगानी चाहिए क्योंकि वह तो पाकिस्तान के मुल्तान से आती है, हिंदू त्योहारों के उपवास के खाने में काले नमक या सेंधा नमक के इस्तेमाल पर भी रोक लगानी चाहिए क्योंकि यह भी पाकिस्तान से आता है, और हिंदुस्तान में नहीं होता। रामलला के मंदिर से लेकर बाकी मंदिरों तक तमाम जगहों पर केसर के इस्तेमाल पर रोक लगानी चाहिए क्योंकि इसे कश्मीर की वादियों में मुस्लिम उगाते हैं, और वही इसे इक_ा करके बेचते हैं। फिर अफगानिस्तान से आने वाले मेवे पर भी रोक लगानी चाहिए क्योंकि वह भी तालिबानी सरकार के मातहत आने वाला एक मुस्लिम देश है और मुस्लिम हाथों के बिना कोई मेवा हिंदुस्तान पहुंच नहीं पाता। हाल के बरसों में थोड़ा बहुत मेवा अमेरिका से भी आता है और कैलिफोर्निया ब्रांड सहित कुछ दूसरे मेवे बाजार में दिखाई पडऩे लगे हैं, लेकिन यह जाहिर है कि वहां पर भी ऐसे बागानों के मजदूर गौमांस खाने वाले लोग हैं, इसलिए उनके छुए हुए सामान को तो बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। योगी सरकार को अपनी धार्मिक शुद्धता कायम रखनी चाहिए और दुनिया के किसी भी गौभक्षक देश से न तो मोबाइल फोन आने देने चाहिए, और ना ही कंप्यूटर। अभी जो मेट्रो शुरू हो रही हैं, और जो एयरपोर्ट बनने जा रहे हैं, उनके सामान भी किसी गौभक्षक देश से नहीं आने देने चाहिए। योगी आदित्यनाथ एक बहुत मजबूत नेता है और वह बिना गौभक्षकों के अपनी सरकार को, अपने प्रदेश को अच्छी तरह चला सकते हैं। प्रदेश की लाइब्रेरी से ऐसी तमाम किताबों को हटा देना चाहिए जो किसी वक्त किसी इलाहाबादी, बाराबंकवी, लखनवी, कानपुरी की लिखी हुई होंगी, और अब अगर उनके नए संस्करण उत्तर प्रदेश में बेचने हैं तो उन्हें प्रयागराजी जैसे नाम से दोबारा छापा जाए तो ही उन्हें बिकने दिया जाए। उत्तर प्रदेश को धार्मिक शुद्धता की एक मिसाल बनाकर पेश करना चाहिए और योगी आदित्यनाथ इसकी पूरी क्षमता रखते हैं। फिर संसद में भाजपा को श्राप देने वाली जया बच्चन के ससुर हरिवंश राय बच्चन के लिखे हुए को भी बदलने का वक्त है जिसमें प्रयागराज को इलाहाबाद कहकर जगह-जगह बदनाम किया गया है। उनकी किताबों को भी प्रदेश के बाहर करने का अब सही वक्त, और मौका है।  

योगी आदित्यनाथ एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति से संपन्न नेता हैं। और उन्हें उत्तर प्रदेश के खेतों में किसी भी हरी फसल को इजाजत नहीं देनी चाहिए। हरा रंग एक किसी धर्म से जुड़ा हुआ दिखता है, और योगीराज में ऐसी फसलें ठीक नहीं हैं। वहां पर लाल-केसरिया टमाटर के ऐसे पौधों को ही छूट मिलनी चाहिए जिनके पत्ते भी भगवा केसरिया, पीले या लाल रंग के हैं। ऐसा अगर तुरंत नहीं हो पाता है तो भी किसानों पर यह बंदिश लगानी चाहिए कि वह गोरखपुर के शहरी अफसरों से भगवा रंग लेकर अपनी फसलों को रंगें, तभी उन्हें पकने का मौका दिया जाएगा। और उत्तर प्रदेश को तो यह फैसला भी लेना चाहिए कि एक मुस्लिम के बनाए हुए ताजमहल को राज्य में रहने की छूट दी जाए या नहीं? अभी-अभी तो भाजपा के एक किसी बड़े मंत्री ने यह बयान दिया था कि ताजमहल बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट दिए गए थे। जिस निर्माण के बाद मजदूरों और कारीगरों के हाथ काट दिए गए हैं, उस निर्माण को, और खासकर उस मकबरे को वहां पर रहने की इजाजत कैसे दी जा सकती है? ऐसे मामलों में धर्म के आधार पर राज करने वाले तालिबान ने एक मिसाल पेश की है कि उन्होंने अफगानिस्तान से बुद्ध की आसमान छूती प्रतिमा को बमों से उड़ा कर चूर-चूर कर दिया। अब अगर ताजमहल को यह सरकार ना उड़ा सके तो यह तो तालिबानों के मुकाबले कमजोर सरकार साबित होगी। योगी आदित्यनाथ और चाहे जो भी हों, एक कमजोर नेता तो बिल्कुल नहीं हैं, और उत्तर प्रदेश के पर्यटन नक्शे को देखें तो राज्य भर में मुस्लिम शासकों की बनाई हुई ऐसी ढेर सारी इमारतें हैं जिन्हें उड़ाना चाहिए। और यह काम अगर योगी आदित्यनाथ जैसा मजबूत नेता नहीं कर सकेगा, तो फिर तो आगे और कोई भी नहीं कर सकेगा।

उत्तर प्रदेश में एक आसार है कि चुनाव कुछ महीने आगे बढ़ जाएं ऐसे में योगी आदित्यनाथ को प्रयागराजी अमरूदों को इलाहाबादी अमरूद कहने पर सजा का इंतजाम करना चाहिए, और जितने किस्म के शायर और लेखक मुस्लिम उपनाम वाले हैं, उन्हें भी कोई ना कोई हिंदू उपनाम देना चाहिए ताकि कहीं भी उत्तर प्रदेश का शासन अफगानिस्तान के शासन के मुकाबले कमजोर न गिना जाए। कब्रिस्तानों में शायरों की कब्र में इतनी बेचैनी भर देने की जरूरत है कि वे सब कफन फाडक़र निकलें, और माइकल जैक्सन के गाने की दफन लाशों की तरह इलाका छोडक़र चले जाएँ।

(Daily Chhattisgarh)

यूपी, भगवान भरोसे हिन्दू होटल, जहाँ पकाने-खिलाने को कुछ नहीं !!

 28 दिसंबर 2021

   

केंद्र सरकार के नीति आयोग ने देश के तमाम राज्यों का एक हेल्थ इंडेक्स जारी किया है जिसमें 2019-20 में राज्यों की स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल रहा, इसका मूल्यांकन किया गया है। नीति आयोग के इस मूल्यांकन का यह चौथा साल ऐसा है जिसमें केरल देश में अव्वल रहा। और ये चारों साल मोदी सरकार के शासनकाल के ही हैं, और केरल के साथ कोई खास रियायत की गई हो ऐसा तो नहीं माना जा सकता। दूसरी तरफ 19 बड़े राज्यों में सबसे आखिर में उत्तर प्रदेश का नंबर है जिसे कि देश का सबसे कामयाब राज्य साबित करने की कोशिश चुनावी माहौल के बीच चल ही रही है। केंद्रीय गृह मंत्री वहां कहकर आ रहे हैं कि इस उत्तर प्रदेश में आधी रात को भी कोई लडक़ी गहनों से लदकर दुपहिया पर जा सकती है और वह सुरक्षित रहेगी। दूसरी तरफ हर दिन ऐसी खबर आ रही है कि किस शहर में शहर के बीच चलती हुई गाड़ी में किसी लडक़ी या महिला से कैसे बलात्कार हो रहा है। खैर हम दूसरी बातों पर अभी जाना नहीं चाह रहे हैं और केवल स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बात करना चाहते हैं, तो इसमें 19 बड़े राज्यों की लिस्ट में सबसे आखिर में यूपी है, और उसके ठीक पहले भाजपा के गठबंधन वाला बिहार है जहां पर कहने को डबल इंजन की सरकार है। अब दिलचस्प बात यह है कि इस लिस्ट को देखें तो इसमें शुरू के 4 सबसे अच्छे राज्य केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, और आंध्र प्रदेश से चारों के चारों दक्षिण भारत के हैं, और दक्षिण भारत का बचा हुआ अकेला राज्य कर्नाटक इस लिस्ट में नौवें नंबर पर हैं जहां पर कि भाजपा की सरकार है। शुरू के चारों दक्षिण भारतीय राज्य बिना भाजपा की सरकार वाले हैं। लिस्ट में आखिरी के 3 राज्य देश के सबसे बड़े राज्यों में से हैं, और मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को सबसे बदहाल पाया गया है। जहां केरल को इस हेल्थ इंडेक्स में 82.20 नंबर दिए गए हैं, वही उत्तर प्रदेश को 30.57 नंबर मिले हैं। ऐसे ही इस फर्क का अंदाज लगाया जा सकता है।

यह बात समझने की जरूरत है कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जिस तरह से धर्म और जाति का नाम लेकर पूरे-पूरे शहर को भगवा रंग से रंगकर, बसों से लेकर सरकारी इमारतों तक का, और हज हाउस से लेकर कांग्रेस भवन तक का रंग बदलकर अपने को कामयाब मान रही है, वह हकीकत में कोई कामयाबी नहीं है। जिस तरह से केरल लगातार स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे अव्वल माना जा रहा है, पाया जा रहा है, उसे देखें और इसी दौरान उत्तर प्रदेश में गंगा पर तैरती हुई लाशों को देखें, रेत में उथली दफनाई गई और सतह चीरकर बाहर आती हुई लाशों को देखें तो यह फर्क साफ समझ आता है कि गंगा के तट पर महाआरती, गंगा आरती, और हर बात पर धार्मिक नारे, धार्मिक उन्माद, इनसे असल जिंदगी नहीं चलती। केरल के दूसरे पैमानों को देखने की जरूरत भी है क्योंकि केरल वह राज्य है जहां पर सत्तारूढ़ वामपंथी लोगों और वहां के आर एस एस के लोगों के बीच हिंसक संघर्ष चलते ही रहता है। इसलिए केरल के साथ उत्तर प्रदेश की तुलना करना दो राजनीतिक विचारधाराओं की तुलना करने तरीका भी हो जाता है, कम से कम ऐसी दो राजनीतिक विचारधाराओं की शासन व्यवस्था की तुलना। केरल देश में पढ़ाई-लिखाई में सबसे आगे चलने वाला राज्य है जहां के लोग दुनिया में चारों तरफ जाकर काम करते हैं और वहां से पैसा घर भेजते हैं। केरल का भौतिक विकास बहुत हो रहा है और वहां के लोग तकनीकी शिक्षा और प्रशिक्षण पाकर तरह-तरह के हुनर सीखते हैं और उनका कोई मुकाबला नहीं है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में लगातार धर्म को पेट पालने का एक विकल्प बनाकर पेश किया जा रहा है जिससे किसी से भजन भी नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि भूखे पेट भजन नहीं हो पाते। राज्य में पढ़ाई-लिखाई का हाल बुरा है, नौकरियों का हाल बुरा है, प्रति व्यक्ति आय का हाल बुरा है, और देश के बीचों-बीच रहते हुए भी उत्तर प्रदेश में विकास, केरल जैसे एक किनारे के राज्य के मुकाबले कहीं भी नहीं है। केरल की प्रतिव्यक्ति आय उत्तर प्रदेश से 3.8 गुना अधिक है. उत्तर प्रदेश, जाहिर है कि अपने डबल इंजन भाई, बिहार के साथ देश में सबसे नीचे की दो जगहों पर है, इनसे कम प्रति व्यक्ति आय और कहीं नहीं है।

यह समझने की जरूरत है कि यह सिलसिला बहुत हद तक धार्मिक उन्माद से प्रभावित है जहां कि लोगों की सोच को मार-मारकर कुंदकर दिया गया है कि उनके दिमाग में किसी तरह से भी कोई वैज्ञानिक तथ्य या तर्क का आग्रह न आ जाए। जनता को लोकतांत्रिक और प्रगतिशील सोच से कैसे दूर किया जा सकता है, और कैसे उन्हें एक उन्मादी ध्रुवीकरण से उपजी भीड़ में बदला जा सकता है, इसकी एक जलती-सुलगती मिसाल उत्तर प्रदेश में देखने मिलती है। अब जब मोदी सरकार के नीति आयोग ने अपने इंडेक्स में बहुत साफ-साफ केरल को नंबर वन, और यूपी को आखिरी करार दिया है, तो इसे सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं से जोडक़र नहीं देखना चाहिए, राज्यों की बाकी स्थिति को भी देखना चाहिए। यह एक अच्छा मौका है कि चुनाव के ठीक पहले मोदी सरकार के नीति आयोग ने ही यह आंकड़े जारी किए हैं, किसी और के तैयार किए हुए रहते तो यह बात उठती कि यह चुनाव को प्रभावित करने के लिए, और योगी की महान सरकार को बदनाम करने के लिए तैयार किए गए आंकड़े हैं। अब उत्तर प्रदेश के लोगों के समझने की यह बात है कि उन्हें भगवा सरकार के रूप में भगवान भरोसे ही छोड़ दिया गया है, और इस सरकार का आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था से कुछ भी लेना देना नहीं है। भगवान भरोसे हिन्दू होटल, जहाँ पकाने-खिलाने को कुछ नहीं !!

(Daily Chhattisgarh)

क्या गृहयुद्ध और मानवसंहार खड़े करवाते भगवों से हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होतीं?

 27 दिसंबर 2021

   

कल सुप्रीम कोर्ट के 76 वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश को एक चिट्ठी लिखी कि हरिद्वार और दूसरी जगहों पर एक धर्म को निशाना बनाकर मानवसंहार का जो फतवा दिया जा रहा है, उस पर अदालत खुद होकर कार्यवाही शुरू करे। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर यह बात सूझनी थी और उत्तर प्रदेश सरकार सहित ऐसी तथाकथित धर्म संसद के आयोजकों को नोटिस जारी करना था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी शायद क्रिसमस के आसपास की छुट्टियों पर थे। बेहतर तो यह होता कि मुख्य न्यायाधीश जहां थे वहीं से वे टेलीफोन पर उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के नाम नोटिस जारी करते और वहीं बैठकर सुनवाई शुरू कर देते तो उससे अदालत की सोच की गंभीरता देश को पता लगती और देश के उन अल्पसंख्यक मुस्लिम लोगों के मन में एक भरोसा कायम होता जिन्हें आज खुला निशाना बनाया जा रहा है और जिन्हें मारने के लिए फतवा दिया जा रहा है। इससे देश के उन हिंदुओं के मन में भी भरोसा कायम होता जो हिंदू धर्म का नाम लेकर ऐसे हत्यारे फतवे देने वाले लोगों के साथ नहीं हैं, जो अमनपसंद हैं और जो सर्वधर्म सम्मान करने वाले हिन्दू हैं।

आज हिंदू धर्म के नाम पर भगवा कपड़े पहने हुए कई किस्म के मुजरिम और कई किस्म के नफरतजीवी चारों तरफ सक्रिय हैं और कल जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को यह चिट्ठी पहुंची हुई होगी, उस वक्त छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक तथाकथित धर्म संसद चल रही थी जो सांप्रदायिक हरकतें झेल रहा है। छत्तीसगढ़ देश के बीच सांप्रदायिक सद्भाव का एक टापू सरीखा रहते आया है लेकिन यहां भी कुछ हफ्ते पहले कबीरधाम नाम के जिले में कवर्धा नाम के शहर में कबीर की तमाम नसीहतों के खिलाफ जाकर एक सांप्रदायिक हिंसा भड़की और उसे और अधिक भड़काने के लिए कोशिशें जारी ही हैं. इसी दौरान कल के इस आयोजन में एक भगवे ने गांधी को गालियां बकते हुए माइक और मंच से ही गोडसे को इसके लिए धन्यवाद दिया कि उसने गांधी को निपटा दिया। गांधी को आमतौर पर इतनी गंदी गाली गोडसेपूजक भी नहीं देते हैं जितनी कि कल इस भगवे ने दी। आधी रात एक रिपोर्ट पर इस भगवे के खिलाफ जुर्म कायम हुआ है, लेकिन उसके पहले इस धर्म संसद में शामिल, छत्तीसगढ़ में हिंदू धर्म के एक सबसे प्रमुख व्यक्ति महंत रामसुंदर दास ने उसी आयोजन में शामिल रहते हुए इस भाषण का विरोध किया और इसका बहिष्कार किया। यह कम हौसले की बात नहीं थी क्योंकि महंत रामसुंदर दास की सारी जमीन ही हिंदू धर्म पर टिकी हुई है, और वे कांग्रेस पार्टी के पूर्व विधायक भी हैं, और राज्य की गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष भी हैं. ऐसे में उनकी दोहरी जिम्मेदारी बनती थी क्योंकि कांग्रेस सरकार का कोई मंत्री स्तर दर्जा प्राप्त पूर्व विधायक अगर ऐसी सांप्रदायिकता के विरोध में खड़ा नहीं होता तो पार्टी और सरकार पर कई किस्म की तोहमतें भी लगतीं।

 हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ सरकार को एक मिसाल कायम करनी चाहिए और ऐसी हिंसक बातें करने वाले के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जुर्म दर्ज करके कार्रवाई करनी चाहिए ताकि उत्तर प्रदेश को भी एक सबक मिल सके कि देश में गृह युद्ध छिड़वाने का काम जो लोग कर रहे हैं, उन लोगों पर कैसी कार्रवाई की जानी चाहिए। देश में वैसे तो संघीय व्यवस्था है और राज्य अपने-अपने दायरे में अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि बहुत से मामलों में किसी राज्य को आगे बढ़कर एक मिसाल कायम करनी होती है जिससे कि और राज्य भी सबक ले सकते हैं। यह ऐसा ही एक मौका है और छत्तीसगढ़ को एक लोकतांत्रिक जिम्मेदार रुख दिखाना चाहिए और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। आज के माहौल में एक धर्म की बात करते हुए एक धर्म के नाम पर इकट्ठा होकर गांधी को इस तरह से गालियां देना, गोडसे की पूजा करना, और दंगा फैलाने की कोशिश करना, इसे छोटी हरकत मानना गैरजिम्मेदारी होगी यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का है और छत्तीसगढ़ सरकार को बेधड़क कार्रवाई करनी चाहिए।

आज हिंदुस्तान को और खासकर उत्तर भारत को केंद्र में रखकर उस प्रदेश में, और देश भर में जिस तरह की नफरत फैलाई जा रही है वह छोटी बात नहीं है. इससे चुनाव में एक धार्मिक ध्रुवीकरण तो हो सकता है इससे धर्मांध और बेवकूफ तबकों को एकजुट किया जा सकता है, लेकिन यह सिलसिला देश के भीतर एक तबाही लेकर आएगा यह बात तय है। लोगों को इस बात को भी याद रखना चाहिए कि अभी देश के कुछ बहुत जिम्मेदार रिटायर्ड फौजियों ने एक बयान जारी करके इस खतरे को गिनाया है कि देश के भीतर ऐसे हालात खड़े करना, इतनी नफरत फैलाना, यह राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक खतरा है। उस बयान को भी ध्यान से देखा जाना चाहिए, और कायदे की बात तो यह होती कि सुप्रीम कोर्ट इस बयान को देखते ही नींद से जागता, और हरिद्वार जैसी धार्मिक नगरी से धार्मिक हिंसा से एक धर्म को खत्म कर देने के मानवसंहार के जो खतरे दिए गए थे, उन वीडियो पर सबसे कड़ी कार्रवाई करता, लेकिन देश को बांट देने की आग रखने वाले ऐसे वीडियो ने भी सुप्रीम कोर्ट को विचलित नहीं किया, रिटायर्ड फौजी अफसरों की नसीहत को भी उसने अनसुना कर दिया, और सुप्रीम कोर्ट के 76 वकीलों ने कल जो लिखा है उस पर भी अब तक सुप्रीम कोर्ट का कोई रुख सामने नहीं आया है। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है. सुप्रीम कोर्ट के पिछले कुछ महीनों के ताजा रुख को देखते हुए मौजूदा मुख्य न्यायाधीश से हिंदुस्तानी लोकतंत्र को कुछ उम्मीदें बंध रही हैं। ऐसी उम्मीदें भी हरिद्वार से शुरू नफरत की आग को देखते हुए अब निराश हो रही हैं।

यह मौका हिंदुस्तान के बाकी उन लोकतांत्रिक प्रदेशों का भी है जो कि सोशल मीडिया पर फैल रहे ऐसे वीडियो को देखते हुए, ऐसे भाषणों को देखते हुए, हरिद्वार से लेकर रायपुर तक लगाई जा रही आग को देखते हुए, ऐसे नफरतजीवियों के खिलाफ जुर्म दर्ज कर सकते हैं। देश के प्रदेशों को अपने-अपने प्रदेशों में खतरा समझना चाहिए और सांप्रदायिकता को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जुर्म दर्ज करने चाहिए क्योंकि हरिद्वार का आयोजन तो उत्तर प्रदेश के अतिथि सत्कार के बीच हुआ था जहां की सरकार इन लोगों पर मेहरबान है, और शायद इनका चुनावी इस्तेमाल भी कर रही है, लेकिन देश के सभी प्रदेशों को जिन्हें देश के सांप्रदायिक सद्भाव की फिक्र है, उन सभी को सोशल मीडिया पर और खबरों में तैरते हुए ऐसे वीडियो देखकर अपने अपने प्रदेश की शांति व्यवस्था के हित में इन लोगों पर जुर्म दर्ज करने चाहिए, इन पर कड़े से कड़े कानून लगाने चाहिए और देश को एक बहुत बड़े और खूनी सांप्रदायिक विभाजन से बचाना चाहिए। यह खतरा छोटा नहीं है, यह खतरा आज सोच-समझकर देश में जगह-जगह खड़ा किया जा रहा है, और इसके खिलाफ अगर मुमकिन हो तो हिंदू धर्म के कुछ जिम्मेदार लोगों को भी अदालत जाना चाहिए कि हिंदू धर्म के नाम पर जो हिंसा और नफरत फैलाई जा रही है वह उनकी धार्मिक भावनाओं को जख्मी कर रही है, और ऐसे भगवे लोगों के खिलाफ कारवाई की जाए, उनका मुंह बंद किया जाए। इन लोगों ने सोच-समझकर और एक साजिश के तहत देश में गृह युद्ध फैलाने की जितनी कोशिशें की हैं, और जो कर रहे हैं, इनकी बाकी पूरी जिंदगी अगर जेल में कटे तो भी वह इनके साथ रहमदिली होगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 दिसंबर 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 दिसंबर 2021


 

कालाधन चाहे किसी का भी हो, किसी को उससे हमदर्दी क्यों हो?

  26 दिसंबर 2021

   

चुनाव के मुहाने पर खड़े हुए उत्तर प्रदेश के एक बड़े शहर कानपुर में इत्र के एक बड़े व्यापारी पर पड़े आयकर छापे को लेकर कुछ लोग उसे इससे जोड़ रहे हैं कि पिछले दिनों समाजवादी पार्टी ने जो समाजवादी इत्र बाजार में उतारा था, उस इत्र को बनाने वाले कारोबारी पर यह छापा पड़ा है। हो सकता है कि यह बात सच भी हो लेकिन सवाल यह भी है कि इस कारोबारी के ठिकानों से अब तक ढाई सौ करोड़ रुपए से अधिक के नगद नोट मिल चुके हैं, 15 किलो सोना और 50 किलो चांदी बरामद हो चुकी, और नोटों की गिनती अभी जारी है। भारत के इतिहास में इतनी बड़ी नगद रकम किसी और कारोबारी से मिलने की याद पहली नजर में तो नहीं आ रही है, और अगर ऐसा हुआ भी होगा तो भी यह अपने आपमें एक बहुत बड़ी रकम है। ढाई सौ करोड़ रुपए के नोट कम नहीं होते हैं खासकर उस वक्त जबकि हिंदुस्तान में नोटबंदी को इस मकसद से लागू करना बताया गया था कि इससे कालेधन में कमी आएगी। अब वर्षों से जिस प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का राज्य चल रहा है वहां पर अगर दो नंबर का इतना बड़ा कारोबार चल रहा था, तो जाहिर है कि राज्य के बहुत से लोगों की जानकारी में भी यह रहा होगा और राज्य पुलिस के खुफिया विभाग के पास भी इस जानकारी को जुटाने का कोई ना कोई जरिया रहा होगा। ऐसे में इतनी बड़ी रकम की बरामदगी हक्का-बक्का करती है कि क्या आज भी हिंदुस्तान में कारोबार के लिए नगद काले धन की इतनी बड़ी आवाजाही चल रही है? और यह भी कि एक अकेले व्यापारी के पास अगर काले धन का ऐसा भंडार निकलता है तो उस पर कार्यवाही तो होनी चाहिए फिर चाहे वह चुनिंदा समाजवादी समर्थक क्यों न हो या किसी और पार्टी का समर्थक क्यों ना हो। अब यह तो जो सत्तारूढ़ पार्टी रहेगी उसके साथ यह बात लागू होगी कि वह अपनी नापसंद के दस नंबरी लोगों को पहले निशाना बनाए, अधिक से अधिक यह उम्मीद की जा सकती कि तमाम लोगों पर ऐसी कार्रवाई हो, लेकिन इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस पर कार्रवाई हुई है वह कोई मासूम कारोबारी नहीं था।

आज एक तरफ तो हिंदुस्तानी बैंक दो-चार लाख की नकदी निकालने पर भी छोटे-छोटे कारोबारियों के लिए दिक्कत खड़ी करते हैं, उस पर कई तरह से कोई भुगतान करना होता है, या अपना पैन कार्ड देना पड़ता है, और छोटे व्यापारियों के लिए नगद में कोई भी काम करना अब आसान नहीं रह गया है। लेकिन एक इत्र व्यापारी अगर सैकड़ों करोड़ रुपए की नगदी लेकर बैठा है तो यह इस बात का सबूत है कि बाजार में धड़ल्ले से न सिर्फ काला धन चल रहा है बल्कि वह नकली नोटों की शक्ल में भी चल रहा है। नोटों की इतनी बड़ी बरामदगी नोटबंदी की नाकामयाबी का एक बड़ा सबूत भी है। अब भारत की अर्थव्यवस्था में काले धन को कैसे घटाया जा सकता है, यह आसान नहीं रह गया है। बहुत तरह के दावे बहुत से राजनीतिक दल करते हैं और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के बाहर से कालेधन को लाने के बारे में और नोटबंदी से काले धन को घटाने के बारे में कई बातें कही थीं। पिछले 7 बरस में देश में कितना काला धन लौट पाया इसकी कोई जानकारी लोगों को नहीं है। इसके साथ-साथ नोटबंदी से अगर कोई फायदा हुआ हो तो उसकी भी कोई जानकारी लोगों के पास नहीं है, और न ही मोदी सरकार ने या भाजपा ने नोटबंदी के कुछ महीनों के बाद से लेकर आज तक उसकी किसी कामयाबी को किसी चुनावी सभा में गिनाया है। जाहिर है कि वह पूरी मशक्कत पानी में गई, और ऐसा लगता है कि लोगों के पास थोड़े बहुत नकली नोट या खराब नोट जो थे, उन्हें भी बैंकों में किसी तरह खपा दिया गया।

आज हिंदुस्तान में जीएसटी की वजह से या नोटबंदी के तुरंत बाद से, लॉकडाउन और बाजार की मंदी की वजह से छोटे-छोटे कारोबारी एक किस्म से सडक़ों पर आ गए हैं। बहुत से छोटे-छोटे काम धंधे बंद हो गए हैं और यह बात राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में इसलिए खुलकर नहीं दिखती है कि देश के कुछ सबसे बड़े उद्योग घरानों का कारोबार आसमान पर पहुंच रहा है उनकी संपत्ति छलांग लगाकर बढ़ रही है. जब राष्ट्रीय उत्पादकता की बात आती है तो इस तरह संपन्न तबकों की बढ़ी हुई उत्पादकता और कमाई देश की बेरोजगार हो चली जनता या धंधा खो चुके कारोबारियों के नुकसान के साथ मिलकर एक औसत तस्वीर बताती है। ऐसी औसत तस्वीर में देश के सबसे खुशहाल तबके और देश के सबसे बदहाल तबके का जिक्र अलग-अलग नहीं हो पाता है। हिंदुस्तान में इतने बड़े पैमाने पर काला धन केंद्र सरकार की सारी टैक्स और जांच प्रणाली दोनों के लिए बड़ी चुनौती है। कानपुर का यह इत्र कारोबारी चाहे समाजवादी इत्र बनाने वाला हो या न हो, या फिर यह पैसा समाजवादी पार्टी के चुनावी खर्च के लिए रखा गया हो या कारोबार का काला धन हो, जो भी हो, इतने बड़े काले धन पर कार्रवाई तो होनी ही चाहिए। ऐसे बड़े काले कारोबारियों के साथ किसी की हमदर्दी नहीं होनी चाहिए। और फिर चुनिंदा कारोबारियों को सजा देना, और चुनिंदा कारोबारियों को बढ़ावा देना, इसमें नया कुछ भी नहीं है। भारत में इंदिरा गांधी के समय से ही धीरूभाई अंबानी जैसे कुछ चुनिंदा कारोबारी सत्ता का बढ़ावा पाते थे और ऐसी चर्चा रहती थी कि वे सरकार की नीतियां तय करते थे। इसलिए हर सरकार के चहेते कारोबारी रहते हैं, और विपक्ष के करीबी कई कारोबारी सत्ता के निशाने पर भी रहते हैं। जो भी हो, टैक्स चोरों और काले धंधेबाजों पर कार्रवाई होनी ही चाहिए और अगर बाकी लोगों के पास ऐसे बाकी धंधेबाजों के बारे में कोई जानकारी है तो उसे भी उजागर किया जाना चाहिए। काले धंधे पर कार्रवाई अकेले सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि जिस-जिसको इसके बारे में जानकारी है उन्हें इसकी शिकायत सरकार की एजेंसियों या न्यायपालिका से करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

देश की फिक्र क्या एक अकेले हाई कोर्ट जज का काम है?

 25 दिसंबर 2021

   

उत्तर प्रदेश में फरवरी में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के चुनाव आयोग दोनों का नाम लेकर यह अपील की है की कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए चुनावों को टालने पर विचार करना चाहिए और चुनावी सभाओं और रैलियों पर तुरंत ही रोक लगानी चाहिए। हाईकोर्ट ने लीक से हटकर अपने इस सुझाव को प्रधानमंत्री और चुनाव आयोग के नाम एक अपील की तरह जारी किया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोरोना मोर्चे पर अब तक की कामयाबी की तारीफ भी की है।

हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ते हुए कोरोना संक्रमण और मौतों का जिक्र किया है और कहा है कि तीसरी लहर हमारे दरवाजे पर खड़ी हुई है ऐसे में फरवरी में होने जा रहे चुनावों को एक दो महीनों के लिए टाला जाना चाहिए। जस्टिस शेखर कुमार यादव ने इस अदालती अपील में कहा है कि राजनीतिक दलों की बड़ी-बड़ी आम सभाओं और रैलियों से लोगों के लिए एक खतरा खड़ा होगा। उन्होंने चुनाव आयोग से यह भी अपील की है कि वे राजनीतिक दलों से यह कहें कि वे रैलियों और आम सभाओं के रास्ते प्रचार न करें बल्कि अखबारों और टीवी का इस्तेमाल करें।  जस्टिस यादव ने कहा कि जान है तो जहान है अगर जिंदगी बची रही तो चुनावी रैलियां और आम सभाएं बाद में भी हो सकती हैं, और उन्होंने याद दिलाया कि संविधान की धारा 21 लोगों को जीने का अधिकार देती है। जस्टिस यादव ने प्रधानमंत्री से भी इस भयानक नौबत को ध्यान में रखते हुए विचार करने की अपील की है।

जज ने कहा है कि अगर कोरोना के बढऩे को समय पर नहीं रोका गया तो इसके नतीजे इसकी दूसरी लहर से भी अधिक खतरनाक होंगे। उन्होंने याद दिलाया कि उत्तर प्रदेश के ग्राम पंचायत चुनावों और पश्चिम बंगाल के चुनावों में बहुत लोग कोरोनावायरस से मारे गए थे। इस पर पूछे जाने पर सरकार की तरफ से केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि यह फैसला चुनाव आयोग को लेना है कि चुनाव कब होंगे। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का यह कहना है कि वह अगले हफ्ते उत्तर प्रदेश जाएगा, वहां की समीक्षा करेगा और फिर उचित फैसला लेगा।

अभी राजनीतिक दलों ने हाई कोर्ट के जज की इस अपील पर कुछ नहीं कहा है क्योंकि चुनाव हर राजनीतिक दल को अच्छा लगता है। हर किसी के पास अपनी बात कहने का एक मौका रहता है और लोगों की हिफाजत, या लोकतंत्र की हिफाजत राजनीतिक दलों की आखिरी प्राथमिकता रहती हैं। जैसा कि हिंदुस्तान के चुनावों का आम ढर्रा है, लोगों को शराब पिलाकर, उन्हें तोहफे बांटकर, नगद रकम देकर, धर्म और जाति का ध्रुवीकरण करके, भावनात्मक और भडक़ाऊ झूठे मुद्दे उठाकर, वोटरों को प्रभावित करने की एक साजिश में अधिकतर पार्टियां जुट जाती हैं, और लोकतंत्र या देश-प्रदेश का भला उनकी आखिरी प्राथमिकता रहती है। हमने बंगाल के चुनाव के वक्त भी देखा कि तमाम राजनीतिक दलों ने लाखों लोगों की एक-एक चुनावी आमसभा से लोगों की जिंदगी पर होने वाले खतरों के खिलाफ कोई फिक्र नहीं की और हर बड़ी पार्टी के बड़े नेता ने लाखों लोगों को इक_ा किया, उसके लिए एक-एक गाड़ी में सैकड़ों लोगों को भरकर चुनावी सभा में लाया गया।

वैसा ही आज उत्तर प्रदेश में चल रहा है और उत्तर प्रदेश में तो केंद्र और राज्य में दोनों पर भाजपा काबिज होने की वजह से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के स्तर पर बड़े-बड़े सरकारी कार्यक्रम हो रहे हैं जिनमें उद्घाटन और शिलान्यास चल रहे हैं, और जिन्हें लेकर कोई चुनावी आपत्ति भी नहीं की जा सकती, और ऐसे कार्यक्रमों में सरकारी इंतजाम से लोगों को इकट्ठा किया जा रहा है। इनसे परे भी राजनीतिक कार्यक्रम हो रहे हैं जिनमें लाखों लोगों की भीड़ जुटने का दावा सत्तारूढ़ पार्टी ही कर रही है। एक तरफ तो आज देश में अधिकतर राज्यों में रात का कफ्र्यू या तो लगाया जा चुका है, या उस पर विचार चल रहा है। केंद्र सरकार ने तमाम राज्यों को यह सलाह दी है कि वे रात के कफ्र्यू लगाने के बारे में सोचें। आज एक दर्जन राज्यों में कोरोना का नया खतरनाक वेरिएंट ओमिक्रॉन दाखिल हो चुका है, और और उसके खतरे से जूझने के लिए हिंदुस्तान पता नहीं कितना तैयार है। हिंदुस्तान में आज आधी से अधिक आबादी तो बिना टीकों के है और जिन्हें पहला टीका लगा है उनमें से भी बहुत से लोगों को दूसरा टीका नहीं लगा है। दुनिया के विकसित देश तीसरे और चौथे बूस्टर डोज की तरफ बढ़ रहे हैं और हिंदुस्तान में अभी आधी आबादी के लिए टीकाकरण शुरू ही नहीं हो पाया है। ऐसे में देश नए खतरे को किस हद तक झेल पाएगा यह सोच पाना बड़ा मुश्किल है।

लोगों को यह भी याद रहना चाहिए कि जिस उत्तर प्रदेश को लेकर यह बात हो रही है उस उत्तर प्रदेश में पिछली लहर में लगातार इतने लोग मारे गए थे कि उनकी लाशों को गंगा में बहाया गया था, या गंगा के तट पर रेत में दबा दिया गया था, जो बाद में उजागर होकर दुनिया की कुछ सबसे भयानक तस्वीरें बना रही थीं। वह दौर कई किस्म की सरकारी नाकामयाबी का एक भयानक दौर था, और देश के किसी भी दूसरे राज्य में वैसी तबाही नहीं देखी थी। इसलिए आज हाईकोर्ट के एक जज की फिक्र के साथ-साथ राज्य सरकार और केंद्र सरकार को भी जनता की फिक्र करनी चाहिए और राजनीतिक दलों को भी यह चाहिए कि इस मुद्दे पर अपना रुख साफ करें। आज पार्टियां चुप्पी साधकर बैठी हैं जबकि चुनाव उत्तर प्रदेश के अलावा भी दूसरे राज्यों में होने जा रहा है और ऐसे तमाम राज्यों को, वहां चुनाव लडऩे जा रही पार्टियों को, अपना रुख साफ करना चाहिए। हिंदुस्तान में अब अखबार और टीवी चैनल, मोबाइल फोन और तरह-तरह के मैसेंजर, इन सबकी जनता के बीच में इतनी घुसपैठ हो चुकी है अगर कोई चुनाव करवाना भी है तो उस चुनाव की तारीखों को फैलाकर रखना चाहिए ताकि किसी भी जगह भीड़ और धक्का-मुक्की की नौबत ना आए, मतदान केंद्र बढ़ाने चाहिए, आम सभाओं और किसी भी किस्म की भीड़ को पूरी तरह से रोक देना चाहिए। वरना लोकतंत्र के नाम पर जो ढकोसला चुनाव की शक्ल में होता है, और जिसे तमाम किस्म की अलोकतांत्रिक बातों से प्रभावित किया जाता है, उसे कोरोना वायरस के सबसे बड़े आयोजन की तरह इतिहास में दर्ज किया जाएगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर 2021


 

क्या यह टीके न लगवाने के निजी फैसले की छूट देने का वक्त है?

24 दिसंबर 2021

  

ऑस्ट्रेलिया की सरकार अभी अपने एक फैसले को लेकर कई जगह आलोचना झेल रही है जिसमें वह तैयारी कर रही है कि जिन लोगों ने कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाई है उनके बीमार होकर अस्पताल पहुंचने पर अपने इलाज का खर्च वे खुद उठाएं और सरकार पर इसका बोझ न आए। डॉक्टरों के कुछ संगठन इसे एक अनैतिक फैसला कह रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ सरकार के अपने तर्क हैं। ऑस्ट्रेलियन सरकार ने सिंगापुर को देखकर यह फैसला लिया है जहां की सरकार बहुत लोकतांत्रिक नहीं मानी जाती है और उसने यह तय किया है कि जो लोग अपनी पसंद से बिना वैक्सीन रहना चाहते हैं, वे कोरोना वायरस के शिकार होने पर अपने इलाज का खर्च खुद उठाएं। ऑस्ट्रेलिया ने सिंगापुर के इसी फैसले पर चलना तय किया है और अभी वहां सरकार इसकी तैयारी कर रही है। सरकार के एक मंत्री जिन्हें इस अभियान के लिए जिम्मेदार बनाया गया है उन्होंने कहा कि देश की चिकित्सा व्यवस्था वैसे ही बहुत ज्यादा बोझ ढो रही है और इस पर ऐसे लोगों का बोझ और नहीं डालना चाहिए जो इंटरनेट पर बेवकूफी की बातों पर भरोसा करते हैं, और मेडिकल सलाह को अनदेखा करते हैं। इस मंत्री ने कहा कि ऐसे लोगों की अस्पताल में भर्ती से अस्पताल की सीमित क्षमता खत्म होती है जिसकी वजह से डायबिटीज या अस्थमा जैसी दूसरी बीमारियों के मरीजों के भी मरने की नौबत आ जाती है क्योंकि उन्हें इलाज के लिए बिस्तर नहीं मिलते। सरकार का यह फैसला विवाद छेड़ रहा है क्योंकि कई देशों में ऑस्ट्रेलियाई सरकार के इस फैसले को गलत माना जा रहा है। अधिकतर देशों में इसे लोगों की मर्जी पर छोड़ा गया है कि वे चाहें तो टीका लगवाएं ,चाहें तो टीका न लगवाएं, लेकिन इसका असर यह है कि अमेरिका जैसे अधिक पढ़े-लिखे देश में भी टीका न लगवाने वाले लोगों की भारी भीड़ है। इनमें ऐसे लोग भी हैं जिन्हें टीकों पर भरोसा नहीं है क्योंकि इनकी पर्याप्त क्लीनिकल ट्रायल नहीं हुई है, और इनमें ऐसे लोग भी हैं जो अपने शरीर में किसी बाहरी पदार्थ के डाले जाने के खिलाफ हैं। हिंदुस्तानी लोगों को याद होगा कि जब महात्मा गांधी अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ पूना के आगा खान पैलेस में ब्रिटिश सरकार के कैदी बनाकर रखे गए थे, उस वक्त कस्तूरबा की तबीयत बहुत खराब हुई और जो ब्रिटिश डॉक्टर उन्हें देखने आया, उसने पेनिसिलिन का इंजेक्शन लगाने की तैयारी की। इसे देखकर बापू ने पूछा कि वह क्या कर रहे हैं तो डॉक्टर ने कहा कि उनकी जान बचाने के लिए पेनिसिलिन का इंजेक्शन जरूरी है. इस पर गांधी ने कहा कि वे तो शरीर में किसी भी बाहरी चीज को दाखिल करने के खिलाफ हैं क्योंकि यह प्रकृति के खिलाफ है, लेकिन उन्होंने फैसला कस्तूरबा पर छोड़ा जो कि गांधी की इस बात को सुन चुकी थीं। आखिर में डॉक्टर को इंजेक्शन नहीं लगाने दिया गया और गांधी की गोद में सिर रखे-रखे कस्तूरबा गुजर गईं। कुछ वैसा ही बाहरी पदार्थों से परहेज पश्चिम के भी बहुत से देशों में है जो कि किसी भी तरह का इंजेक्शन लेना नहीं चाहते, कोई टीका लगवाना नहीं चाहते।

अब मुद्दा यह है कि जो लोग वैक्सीन पर भरोसा नहीं करते हैं, या जिन्हें अपने शरीर में बाहरी इंजेक्शन लगवाने से परहेज है, ऐसे लोग भी बीमार पडऩे पर इलाज के लिए उसी चिकित्सा विज्ञान के पास अस्पताल जाते हैं जिस चिकित्सा विज्ञान ने यह वैक्सीन भी विकसित की है। वे वहां अस्पताल में भर्ती होने के बाद वही इंजेक्शन लगवाते हैं जिन्हें लगवाने का वे विरोध कर रहे हैं। तो इस तरह वैक्सीन न लेने वाले लोग किसी भी देश की सरकार की सीमित चिकित्सा सुविधा पर एक बड़ा बोझ बन रहे हैं क्योंकि वे अधिक संख्या में बीमार पड़ रहे हैं, उन्हें अधिक संख्या में अस्पताल जाने की जरूरत पड़ रही है, और वहां पर भी कई किस्म की बीमारियों के उन तमाम मरीजों के हक के बिस्तर पर कब्जा कर रहे हैं जिन्हें किसी न किसी दूसरी बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल में दाखिल होना था, जिन्होंने एक जिम्मेदार की तरह वैक्सीन लगवा रखी थी, लेकिन जिन्हें आज अस्पताल में बिस्तर नहीं मिल रहा है।

आज ऑस्ट्रेलिया की सरकार की सोच को कोई कितना ही अनैतिक कहें, सवाल यह भी है कि जब कोई बीमारी महामारी का दर्जा पाती है, वह देशों की सरहदों के भी आर-पार चारों तरफ पूरी मानव प्रजाति पर एक खतरा बनकर मंडरा रही है, तब भी क्या लोगों को चिकित्सा विज्ञान की सलाह के खिलाफ ऐसी आजादी दी जा सकती है कि वे वैक्सीन ना लगवाएं, लेकिन जरूरत पडऩे पर वे अस्पतालों में जाएं? अस्पतालों में उनको आने से मना नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना उनके मानवीय अधिकारों का उल्लंघन होगा, लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी है कि ऐसे लोगों का इलाज मुफ्त में क्यों किया जाए?

अमेरिका के सबसे बड़े महामारी विशेषज्ञ इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि वहां के करोड़ों लोग अब तक बिना वैक्सीन के चल रहे हैं और जिस तरह अभी लाखों लोग कोरोना वायरस का शिकार हर दिन हो रहे हैं, उसमें ऐसे लोग पता नहीं कितना बड़ा बोझ बनेंगे? वहां की सरकार ने यह तय किया है कि कोरोनावायरस की जांच-किट लोगों के घरों पर मुफ्त में भेजी जा रही है ताकि लोग का घर बैठे जांच कर सकें। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि ऐसे लोग जो घर पर रहते हुए वैक्सीन से भी परहेज कर रहे हैं वे इस जांच किट का क्या इस्तेमाल करेंगे, और अगर वे अपने आपको कोरोना पॉजिटिव पाते हैं तो भी क्या करेंगे? ऐसे बहुत से सवाल हर देश में खड़े हो रहे हैं जहां पर टीकाकरण पर्याप्त नहीं हुआ है। खुद हिंदुस्तान के टीकाकरण का जो हाल है उस पर हमने दो-तीन दिन पहले इसी जगह पर लिखा है कि किस तरह देश की 40 फ़ीसदी आबादी का टीकाकरण शुरू भी नहीं हुआ है जो कि 18 बरस से कम उम्र की है। फिर बाकी 60 फ़ीसदी आबादी में आधे लोग ऐसे हैं जिनको एक ही टीका लगा है, और बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें कोई टीका नहीं लगा है। यह दुनिया के लोकतांत्रिक देशों के लिए भी सोचने और समझने की बात है कि महामारी की नौबत में लोगों को निजी आजादी कितनी दी जाए? क्योंकि ऐसे लोग न केवल आत्मघाती साबित हो सकते हैं, बल्कि ये लोग बाकी पूरे देश के लिए भी एक खतरा हो सकते हैं। और जानकार लोगों का यह मानना है कि दुनिया का कोई भी देश अपने नागरिकों को वैक्सीन का तीसरा और चौथा बूस्टर डोज देकर भी अपने देश को पूरी तरह महफूज नहीं रख सकता जब तक कि पूरी दुनिया के तमाम देशों के लोगों को पर्याप्त वैक्सीन ना लग जाए। कोई भी सुरक्षित टापू नहीं रह सकता, जब तक कि आसपास के दूसरे देश या टापू सुरक्षित ना हों। अब ऐसे में किसी देश के लापरवाह नागरिक जो कि चिकित्सा विज्ञान की सलाह के खिलाफ जाकर टीके लगवाने से परहेज कर रहे हैं, वे न सिर्फ अपने देश के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं, और क्या किसी देश को ऐसा अधिकार भी हासिल है कि वह अपने नागरिकों को बाकी दुनिया के लिए खतरा बन जाने दे? इसलिए आज जब अलग-अलग देश-प्रदेश अपने लोगों पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रहे हैं कि अगर उन्होंने पर्याप्त टीकाकरण नहीं करवाया है तो वे सार्वजनिक जगहों पर नहीं जा सकते, भीड़ भरी जगहों पर नहीं जा सकते, तो यह रोक-टोक बहुत लोकतांत्रिक चाहे ना हो यह एक वैज्ञानिक रोक-टोक है, और पूरी दुनिया पर छाए हुए महामारी के खतरे को देखते हुए यह लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित करके महामारी की जरूरतों को पूरा करने का वक्त भी है।

तमाम देशों को बहुत ही कड़ाई से टीकाकरण की शर्तों को लागू करना चाहिए और अपने अलावा दूसरे गरीब देशों के टीकाकरण का इंतजाम भी करना चाहिए क्योंकि जब तक किसी भी एक देश में कोरोनावायरस बाकी रहेंगे तब तक वहां से इनका बाकी दुनिया में फैलने का खतरा तो बने ही रहेगा। दुनिया ने अभी ताजा-ताजा देखा है कि 2 बरस पहले किस तरह चीन के वुहान से शुरू होकर कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला और पूरी दुनिया का जीना हराम कर दिया इसलिए आज कोई गरीब देश भी अगर बिना टीकों के है तो तीसरा और चौथा बूस्टर डोज़ लेने वाले जर्मन और ब्रिटिश नागरिक भी अपने घरों में बैठे हुए भी सुरक्षित नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)

क्या किसी नेता की अपील से देश के लोग कोई चीज खाना काम-ज्यादा कर सकते हैं?

23 दिसंबर 2021

  

जापान के प्रधानमंत्री ने 2 दिन पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर देश के लोगों से अपील की कि वे अधिक से अधिक दूध पिएं,  इसके अलावा वे पकाने के काम में भी दूध का अधिक इस्तेमाल करें क्योंकि वहां पैदा होने वाला दूध खराब होने की नौबत आ रही है। कोरोना की वजह से लोगों का बाहर घूमना, होटलों में खाना कम हो रहा है, और दूध की खपत घट गई है, लेकिन दूध पैदा होना पहले की तरह जारी है तो उसके खराब होने की नौबत न आए इसलिए जापान सरकार के मंत्री कहीं प्रेस कॉन्फ्रेंस में दूध पीते दिख रहे हैं, तो कहीं प्रधानमंत्री लोगों से दूध का अधिक इस्तेमाल करने की अपील करते दिख रहे हैं। लोगों से नाश्ते के तौर तरीके में बदलाव लाने के लिए कहा जा रहा है ताकि दूध का अधिक इस्तेमाल हो सके।

यह एक बड़ी अटपटी नौबत है कि देश के प्रधानमंत्री को किसी एक चीज को अधिक खाने-पीने के लिए अपील करनी पड़ रही है। हालांकि हम हिंदुस्तान में बहुत से राज्यों में दूध की मांग कम होने पर या उसका उत्पादन बढऩे पर दूध कारखानों को देखते हैं कि वे किस तरह उसे सुखाकर दूध पाउडर बना लेते हैं और बाद में मांग बढऩे पर उसे घोल कर, दूध बनाकर लोगों के घर भेजते हैं, और बड़ी आसानी से उत्पादन और मांग के इस फासले को पाट लिया जाता है। पता नहीं जापान में ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है क्योंकि वह तो हिंदुस्तान के मुकाबले भी बहुत अधिक विकसित और उच्च तकनीक वाला देश है, लेकिन हम इस खबर के एक छोटे से पहलू पर लिखने जा रहे हैं, इसलिए जापान की दिक्कत की बारीकियों से यहां कोई अधिक वास्ता नहीं है। यह समझने की जरूरत है कि जब किसी देश में किसी चीज की जरूरत से अधिक पैदावार हो जाती है या जरूरत से बहुत कम, तो देश के नेता अपील करके उस नौबत को सुधारने में कैसे मदद कर सकते हैं। अब हिंदुस्तान में हर बरस दो-चार बार कभी प्याज की कमी हो जाती है, तो कभी टमाटर के दाम आसमान पर पहुंचते हैं। खाने के तेल के दाम तो आसमान पर ही टंग गए हैं जो वहां से नीचे उतरने का नाम नहीं लेते। यही हाल पेट्रोल और डीजल का भी है। लेकिन पूरे देश में कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या दूसरे नेता लोगों के सामने कोई मिसाल पेश करते नहीं दिखते कि किस तरह वे अपने काफिले की कारें कम करें, अपनी कार के आकार को कम करें, अपने अफसरों के ईंधन की खपत को घटाएं, या लोगों को खाने-पीने के सामानों के लिए यह सुझाव दें कि जिन दिनों किसी चीज की कमी हो रही है उन दिनों कुछ दिनों के लिए बिना प्याज और टमाटर भी लोग काम चला सकते हैं, तो चलाएं। ऐसी अगर कोई अपील हो और लोग अगर इस तरह उसे मानें, तो हो सकता है कि चीजों की कमी भी खत्म हो जाए और जो हाय-तौबा मीडिया में सामने आता है वह भी कुछ घट जाए।

यह तो हुई सतह पर तैरती हुई खबरों की बात, लेकिन इनसे परे केंद्र और राज्य सरकारें दूध और फल सब्जी जैसी चीजों के लिए मार्केटिंग का ऐसा एक नेटवर्क खड़ा करने में भी मदद कर सकती हैं जिनमें बिचौलियों की जेब में जाने वाली मोटी रकम किसान और ग्राहक के बीच बंट जाए। अभी सब्जी उगाने वाले लोगों के बारे में यह पता लगता है कि उन्हें कई बार तो सब्जी तुड़वाकर खेत से बाजार तक लाने में जो खर्च आता है उतना पैसा भी बाजार से नहीं मिलता। दूसरी तरफ ग्राहक लगातार इस बात की शिकायत करते हैं कि सब्जियां बहुत महंगी होती जा रही हैं। तो यह पैसा जाता कहां है ? सब्जी मंडियों के आढ़तियों की जेब में अगर इतना बड़ा हिस्सा जा रहा है तो केंद्र और राज्य सरकारों को फल-सब्जी-दूध के ऐसे बाजार बनाने चाहिए जहां पर किसान बेचने बैठ सकें। डेयरी के लोग सीधे दूध बेच सकें, या फल-सब्जी उगाने वाले लोग मंडी में सीधे सामान बेच सकें। ऐसा होने पर एक तरफ तो किसी सामान की उपज बढऩे पर उसकी खपत की अपील भी की जा सकती है और उसकी कमी होने पर उससे कुछ दिन परहेज करने की भी।

हिंदुस्तान में बहुत से लोकप्रिय नेता अभिनेता हैं, खिलाड़ी और चर्चित लोग हैं जिनकी बात का लोगों पर बड़ा असर होता है और वे अगर एक सार्वजनिक अपील करें तो उन्हें मानने वाले लोग अपनी रोज की जिंदगी में कुछ चीजों की खपत को कम या अधिक भी कर सकते हैं। लोगों को याद होगा कि बहुत पहले जब हिंदुस्तान की कोई जंग चल रही थी तो लोगों ने एक वक्त का खाना छोड़ा था, और एक प्रधानमंत्री की अपील पर देश की महिलाओं ने फौज के लिए अपने गहने उतारकर दे दिए थे। जिन लोगों को लोकप्रियता हासिल रहती है या जिनकी बातों को मानने वाले लोग बड़ी संख्या में रहते हैं उन्हें कई किस्म के नेक कामों के लिए अपने असर का इस्तेमाल करना चाहिए। आज दिक्कत यह हो गई है कि खेल और सिनेमा जैसे चकाचौंध शोहरत वाले सितारे मोटी रकम लिए बिना समाजसेवा की कोई ट्वीट भी नहीं करते। दूसरी तरफ नेता अपने सारे असर को वोटों की शक्ल में भुनाते हुए अपनी लोकप्रियता भी खो बैठते हैं और उनकी बातें मोटे तौर पर बेअसर होने लगती हैं। जो उनके समर्थक रहते हैं उनके बीच भी उनका असर कम होता है। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या इन लोगों की बातों का लोगों पर ऐसा असर हो सकता है कि लोग अपना खाना पीना बढ़ा लें या घटा दें? हर देश प्रदेश में ऐसे लोग रहते हैं जिनकी बातों को लोग गंभीरता से लेते हैं, और ऐसे लोगों को अपने असर का समाज के भले के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। कुछ बरस पहले तबाही का शिकार हुए उत्तराखंड के लोगों के बनाये सामान खरीदने के लिए ऐसे अपील हुई थी।

(Daily Chhattisgarh)

 

नफरत ने लोगों को जोडक़र इस हद तक एक कर दिया है

22 दिसंबर 2021

  

उत्तराखंड के चंपावत जिले में एक स्कूल के सवर्ण बच्चे पिछले एक हफ्ते से स्कूल में दोपहर का खाना नहीं खा रहे हैं क्योंकि वह एक दलित महिला द्वारा बनाया जा रहा है। इन बच्चों ने पहले दिन तो बिना किसी विवाद के इस महिला का पकाया हुआ खाना खा लिया था, लेकिन अगले दिन से सवर्ण बच्चे घरों से अपना टिफिन लेकर आने लगे और इस दलित भोजनमाता का बनाया हुआ खाना खाने से मना कर दिया। इस सरकारी इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल का कहना है कि 57 छात्र-छात्राओं में से कुल 17 वहां खा रहे हैं जो कि दलित समुदाय के हैं, बाकी ने खाना बंद कर दिया है। जबकि खाना पकाने के लिए दलित महिला की नियुक्ति एक कमेटी ने की थी जिसमें स्कूल मैनेजमेंट के लोग भी थे और पालक शिक्षक संघ के लोग भी थे। उत्तराखंड में ऊंची कक्षाओं वाली स्कूल को इंटर कॉलेज भी कहा जाता है और दलित महिला के पकाए खाने को खाने के बजाय यहां के सवर्ण छात्र-छात्रा घर से खाना लेकर आ रहे हैं।

यह तो मामला है स्कूल का, जहां पर छात्र-छात्राओं के सवर्ण मां-बाप एक दलित महिला को खाना पकाने पर रखने के खिलाफ बात कर रहे हैं और जाहिर है कि उनके कहे हुए ही उनके बच्चे घर से टिफिन लेकर आ रहे हैं। लेकिन एक दूसरी खबर को इसके साथ जोडक़र देखने की जरूरत है। अभी मध्य प्रदेश के एक प्रमुख राजनीतिक कार्यकर्ता बादल सरोज ने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया है जिसमें कोई एक हिंदू प्रवचनकर्ता भगवे कपड़ों में धर्म की बहुत सी बातों को कर रहा है और साथ-साथ उनसे अधिक बातें मुस्लिमों के खिलाफ घोर सांप्रदायिक और नफरत फैलाने वाली कर रहा है। किसी भी सेहतमंद दिमाग वाले के लिए इतनी नफरत की बातें सुनना मुश्किल है लेकिन इस नफरतजीवी के सामने बैठे भक्तजन तालियां बजा रहे हैं और इस भीड़ में बैठे हुए छोटे-छोटे बच्चे नफरत की बातों पर हाथ जोडक़र तालियां बजाते दिख रहे हैं। जाहिर है कि अपने परिवार के बड़े लोगों के साथ वहां पहुंचे हुए ऐसे छोटे बच्चे पांच-दस बरस की उम्र से ही नफरत की ऐसी हिंसक बातों को सुन रहे हैं कि मुस्लिमों के खिलाफ क्या-क्या किया जाना चाहिए।

इन दो बातों को अगर मिलाकर देखें तो ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान में नफरत पर जीने वाले लोग न केवल आज की हवा को जहरीली करने के खतरों से बेफिक्र हैं बल्कि वे अपनी आने वाली पीढिय़ों को भी एक जहरीली हवा देकर जाना चाह रहे हैं। उनके लिए हिंदुस्तान का संविधान, इसकी बुनियादी बातें, इंसानियत की बुनियादी बातें, कोई मायने नहीं रखतीं, वे सिर्फ नफरत पर जी रहे हैं और नफरत को ही बढ़ाते चलना चाहते हैं। जिस तरह तिल का लड्डू बनाने के लिए गुड़ की चाशनी तिलों को जोडऩे का काम करती है उसी तरह हिंदुस्तान में नफरत धार्मिक हिंसा, जातिवादी हिंसा के नाम पर लोगों को बहुत तेजी से एक कर लेती है, उन्हें जोडक़र एक लड्डू के दानों की तरह मजबूत बना देती है। चारों तरफ आज लोग आने वाली पीढ़ी के भविष्य से बेफिक्र, आज ही हिंदुस्तान को इतनी खतरनाक जगह बनाने पर आमादा हैं कि जिसकी कोई हद नहीं। ऐसे लोगों के लिए कोई धार्मिक प्रवचन हो या यह स्कूल का खाना हो या ट्रेन और बस में बैठ कर बातें करना हो, हर जगह नफरत इनकी पहली प्राथमिकता रहती है। फिर ऐसा भी नहीं है कि लगातार हिंसक नफरत की बातें करने वाले समाज में सिर्फ तनाव खड़ा करके उतना ही नुकसान करते हैं। लगातार ऐसी हिंसा और नफरत सोचने वाले लोग अपने दिल-दिमाग पर भी इसका असर पाते हैं और उनका खुद का कामकाज भी इससे बहुत बुरी तरह प्रभावित होता है। उनके परिवार और आस पड़ोस में, काम की जगह पर जो लोग उनके प्रभाव में रहते हैं उन तक भी ऐसी हिंसक नफरत फैलती है और फिर यही हिंसक नफरत लहरों की तरह दौड़-दौडक़र वापस उन तक आती हैं।

समाज में जो सामाजिक और राजनीतिक चेतना रहनी चाहिए, मानवीय मूल्यों की जो समझ लेनी चाहिए, जो दूसरों के अधिकारों और अपनी जिम्मेदारी के प्रति सम्मान रहना चाहिए, वह सब बहुत रफ्तार से खत्म हो चला है। लोगों को सच से एलर्जी हो गई है और समझदारी की बातों से परहेज हो गया है। देश की हवा ऐसी घोर सांप्रदायिक और हिंसक हो गई है कि जिसकी कोई हद नहीं। सवाल यह है कि जो लोग ऐसी नफरत के हिमायती नहीं हैं वे लोग चुप हैं, और जो लोग नफरत के वकील हैं वे झंडे-डंडे लेकर सडक़ों पर हैं। जहां भलमनसाहत घर के भीतर आरामकुर्सी पर हाथ टिकाए महफूज रहती है वहां नफरत सडक़ों पर राज करती है। इसे हमने जगह-जगह देखा है और यह हिंसा मिजाज में ऐसे बैठ जाती है कि वह फिर अपने धर्म की रक्षा के नाम पर, किसी शक के आधार पर, किसी की भी सामूहिक हत्या कर लेती है और उसे अपने धर्म को बचाने का नाम दे देती है।

कहीं पर गाय को बचाने के नाम पर ऐसी हत्याएं हो रही हैं, तो कहीं पर किसी हिंदू-मुस्लिम लडक़े-लडक़ी को मिलने से रोकने के लिए ऐसी हत्याएं हो रही हैं। धर्म और जाति के नाम पर फैलाई जा रही नफरत मासूम नहीं है, यह वोटों की राजनीति करने के लिए, चुनाव जीतने के लिए सोच समझकर साजिशन फैलाई जा रही है। इसके खतरों को समझना जरूरी है। समाज में जो जिम्मेदार लोग हैं उनको मुंह खोलना होगा, उनको ऐसे मामलों में सामने आना होगा। आज जो लोग अपने बच्चों को एक दलित महिला के पकाए हुए खाने को खाने से रोक रहे हैं, वे उन बच्चों की पूरी पीढ़ी को एक जातिवादी नफरत में झोंक रहे हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए आज देश का कानून इसे खत्म करने की ताकत रखता है, लेकिन उस ताकत के इस्तेमाल की राजनीतिक इच्छाशक्ति तो उन लोगों के पास जरूरी है जो कि सरकार हांकते हैं।

(Daily Chhattigarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 दिसंबर 2021


 

धर्मग्रन्थ की बेअदबी के शक में स्वर्णमंदिर में हुई भीड़त्या !

20 दिसंबर 2021

  

पंजाब में स्वर्ण मंदिर में कल शाम हुई वारदात बहुत ही भयानक है। एक बहुत कमजोर सा दिख रहा कोई नौजवान स्वर्ण मंदिर के गुरु ग्रंथ साहब के पास तक पहुंचा और रेलिंग पर से कूदकर वह ग्रांट साहब के करीब पहुंच गया। इसके बाद उसने कुछ उठाने की कोशिश की, जिसे लेकर अलग-अलग लोगों का अलग-अलग कहना है। कुछ का कहना है कि उसने वहां रखी हुई सोने की एक ऐतिहासिक तलवार उठाने की कोशिश की थी, कुछ का कहना है कि उसने वहां से फूल उठाने की कोशिश की थी। जो भी हो वहां से उसे तुरंत दबोच कर मंदिर के ऑफिस में ले जाया गया और उसे इतना मारा गया कि उसकी मौत हो गई। मारने वालों में से एक व्यक्ति ने मीडिया से बतलाया-‘मैंने इस नौजवान की दो उंगलियां तोड़ दी। जब हमने उससे उसकी पहचान के बारे में पूछा तो उसने कहा कि वह खुद के बारे में नहीं जानता है, इसके बाद संगत के लोगों ने उसे मारना शुरू किया और वह मर गया।’ मरने वाले की लाश को देखें तो वह बहुत ही कमजोर दिख रहा है, और मारने वालों की भीड़ के बीच देर तक उसकी लाश बिना ढके हुए खुली पड़ी हुई थी। बाद में जब पुलिस ने उसकी लाश को अस्पताल पहुंचाया तो वहां हथियारबंद सिखों ने प्रदर्शन किया और लाश बाहर ले जाने का विरोध किया।

पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने भी गुरु ग्रंथ साहब की बेअदबी की इस घटना पर दुख जाहिर किया है, हालांकि मुख्यमंत्री के ट्वीट में मरने वाले नौजवान का कोई जिक्र नहीं है। ऐसा ही हाल अकाली दल के ट्वीट का है, अरविंद केजरीवाल के ट्वीट का है, और बाकी तमाम लोगों का है। तमाम लोगों ने गुरु ग्रंथ साहब की बेअदबी पर तो दुख जताया है, लेकिन वहां भक्तों के मारे इस नौजवान के बारे में मुख्यमंत्री ने भी कुछ नहीं कहा है, और ना ही बाकी नेताओं ने। चारों तरफ यही माहौल है कि सिखों के सबसे बड़े धार्मिक ग्रंथ के अपमान की यह साजिश थी, कुछ लोगों का कहना है कि पंजाब में चुनाव होने जा रहे हैं और किसान आंदोलन खत्म होने के बाद अब बदले हुए हालात में किसी राजनीतिक मुद्दे की तलाशो में साजिशन ऐसा किया गया हो सकता है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले जब दिल्ली की सरहद पर किसान आंदोलन चल रहा था उस वक्त उसके पास ही डेरा डाले हुए निहंगों ने एक दलित नौजवान को पकड़ा था और उस पर आरोप लगाया था कि वह सिखों के एक धार्मिक ग्रंथ का अपमान कर रहा है और उसके हाथ-पैर काट-काटकर उसे रस्सियों पर बांधकर टांग दिया गया था और बाद में शहीद के अंदाज में हत्यारे निहंगों ने पुलिस के सामने अपने को पेश किया था। पिछले कुछ वर्षों से पंजाब में कोई न कोई ऐसी घटना हो रही है जिसे लेकर सिक्खों के धर्म प्रतीकों की बेअदबी की बात उठती है, और वह राजनीतिक मुद्दा बने रहती है।

दुनिया में कुछ धर्मों के लोग अपने धार्मिक ग्रंथों के लिए दूसरे धर्म वालों के मुकाबले अधिक संवेदनशील हैं। इनमें से सिक्ख हैं और मुस्लिम भी हैं। धार्मिक ग्रंथों को लेकर जगह जगह इन दोनों धर्मों के लोगों के लिए खुद भी परेशानी खड़ी होती है, और फिर इनकी की हुई हिंसा सबके लिए परेशानी खड़ी करती है। अब सवाल यह है कि आज के वक्त में जब धार्मिक ग्रंथ आसानी से चारों तरफ हासिल किए जा सकते हैं, तब उनकी बेअदबी किसी अनजानी वजह से भी हो सकती है, और सोच-समझकर किसी साजिश के तहत भी हो सकती है। लोगों को याद होगा कि बांग्लादेश में अभी कुछ महीने पहले दुर्गा पूजा के वक्त हिंदुओं के खिलाफ जितने दंगे हुए और हिंदुओं को जिस तरह से मारा गया, उस वक्त भी यही तोहमत लगाई गई थी कि एक किसी पूजा मंडप में किसी हिंदू देवी-देवता की गोद में कुरान रखी हुई मिली थी और उसे देखकर मुस्लिमों का गुस्सा भडक़ा था। कल स्वर्ण मंदिर में जो हुआ है उसे सत्ता की राजनीति करने वाले लोगों में से तो कोई भी हिंसा की एक घटना करार नहीं देंगे क्योंकि सिख धर्म के धर्मालुओं के बीच अपने वोटों को बरकरार रखना है। लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी नौजवान ने ऐसी कोई बेअदबी कर भी दी थी, तो उसे कानून के हवाले करना चाहिए था, न कि धर्म को कानून से ऊपर साबित करते हुए इस तरह वहां मंदिर परिसर में ही उसकी हत्या कर देना। सिक्खों की कौम दुनिया में हर किस्म की मुसीबत में मदद करने के लिए सबसे आगे रहने वाली कौम है। हिंदुस्तानी फौज में किसी एक कौम के लोग सबसे ज्यादा हैं, तो वह भी शायद सिक्ख ही होंगे। इसलिए ऐसी बहादुर और ऐसी सेवाभावी कौम को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। किसी ने भी धार्मिक प्रतीकों का अपमान किया है यह आरोप लगाकर जगह-जगह दुनिया में लोगों को मारा जाता है। पाकिस्तान में भी ईशनिंदा का एक ऐसा कानून बना हुआ है कि जो कोई इस्लाम का, या मोहम्मद पैगंबर का अपमान करते दिखे उसे सजा दिलवाई जाती है, या भीड़ अगर चाहती है तो उसे घेरकर मार डालती है। लेकिन हिंदुस्तान एक मजबूत न्याय व्यवस्था वाला देश है और यहां पर किसी धर्म के लोगों को कोई शिकायत अगर है, तो उन्हें ऐसे नौजवान को पकडक़र कानून के हवाले करना था और वीडियो कैमरों के सबूतों के साथ उसे सजा दिलवाना मुश्किल काम भी नहीं होता। धर्म के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेना एक खराब बात है और उससे उस धर्म की सकारात्मक छवि भी खराब होती है।

यह सिलसिला पंजाब चुनावों के ठीक पहले सामने आया है इसलिए वहां का मुख्यमंत्री भी यह बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है कि जिस नौजवान की हत्या हुई है उसकी भी जांच की जाएगी। अभी तक जितनी जानकारी सामने आई है उसमें यह भी खुलासा नहीं हुआ है कि इस नौजवान की नीयत क्या थी और जिस तरह उससे पूछताछ में समझ में आया है, वह विचलित या अस्थिर चित्त का दिख रहा है। ऐसे में प्रदेश का मुख्यमंत्री भी ऐसी खुली हत्या की जांच की बात करने से भी अगर डर रहा है तो यह राजनीति और सरकार पर धर्म के दबदबे का एक बड़ा सबूत है, यह सिलसिला ठीक नहीं है। किसी भी धर्म के लोगों को यह बात मानकर चलना चाहिए कि अगर उसे मानने वाले लोग अपनी धार्मिक किताब की सीख और नसीहत पर अमल कर रहे हैं, तो उस किताब का कोई अपमान नहीं हो सकता। एक किताब या उसके कुछ पन्ने मान-अपमान से ऊपर रहते हैं। धार्मिक ग्रंथ का अपमान तभी होता है जब उस धर्म के लोग हिंसा करते हैं, कोई आतंक फैलाते हैं, या बेकसूरों को मारते हैं। कोई और व्यक्ति किसी धर्म की बेअदबी नहीं कर सकते। कल की घटना बहुत ही तकलीफदेह है और एक धर्म स्थान में ऐसी हिंसा होना अपने-आपमें बहुत बुरी बात तो है ही, यह बात भी बहुत तकलीफ देती है कि कोई संगठन, कोई सरकार, कोई नेता, राजनीतिक दल, कोई भी इस हत्या के बारे में कुछ बोलने को ही तैयार नहीं है। चुनाव सामने हैं लेकिन फिर भी ऐसी भीड़त्या को अनदेखा नहीं करना चाहिए, और हर धर्म के लोगों को यह चाहिए कि वे अपने धार्मिक ग्रंथों की हिफाजत और कड़ी करें ताकि उन तक पहुंचना आसान काम ना रहे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 दिसंबर 2021


 

वैक्सीन से परहेज करते पश्चिम को हिंदुस्तान से सीखने की जरूरत

 19 दिसंबर 2021

  

हिंदुस्तान में तो अभी कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा सीमित मन जा रहा है क्योंकि न अधिक पॉजिटिव मिले हैं और न ही इससे मौतें हो रही हैं। लेकिन दुनिया के वैज्ञानिकों और जानकार लोगों का यह मानना है कि 77 देशों में तो यह अभी तक जाँच में मिल चुका है, लेकिन अगर जांच के अलावा भी अंदाज लगाएं तो यह हर देश में पहुंच चुका होगा। ऐसे में हिंदुस्तान में भी इसका हमला कितना हो चुका है इसका अंदाज जांच के नतीजों से नहीं निकल सकता क्योंकि इस देश में लोग जांच से बचते हुए इधर-उधर घूमते रहते हैं। लेकिन कोरोना की यह नई किस्म कितनी खतरनाक है इसका अंदाज लगाने के लिए ब्रिटिश सरकार का यह अंदाज देखना चाहिए कि वहां पर अगले 4 महीनों में 75 हजार लोगों की मौत ओमिक्रॉन से होने की आशंका है। यह आंकड़ा भारत के मुकाबले यूके की छोटी आबादी के अनुपात में देखने की जरूरत है, और अगर ऐसी नौबत हिंदुस्तान में आती है तो इस संख्या से कई गुना अधिक लोगों की मौत यहां हो सकती हैं, हिंदुस्तान की आबादी यूके से 13 गुना अधिक है। फर्क सिर्फ यही है कि हिंदुस्तान में सरकार जितनी वैक्सीन लगा पा रही हैं, उससे अधिक लोग वैक्सीन लगवाने के लिए तैयार हैं। दूसरी तरफ पश्चिम के देशों में लोग वैक्सीन को लेकर कई तरह की आशंकाओं से भरे हुए हैं और उन्हें अपनी संवैधानिक आजादी की अधिक फिक्र है कि वैक्सीन लगवाना कानूनी अनिवार्य नहीं है। सरकारें लोगों को मना-मना कर थक गई हैं और यूरोप के कई विकसित देशों में तो जब सरकार ने यह तय किया कि सार्वजनिक जगहों पर लोगों की आवाजाही उसी हालत में हो सकेगी जब उन्होंने वैक्सीन लगवा ली होगी, तो लोगों ने वहां दंगा कर दिया, पुलिस को गोलियां भी चलानी पड़ी। लोगों का वैक्सीन पर भरोसा कम है, और अपने नागरिक अधिकारों पर अधिक। नतीजा यह हो रहा है कि सबसे विकसित देश आज सबसे अधिक खतरनाक हालत में हैं, क्योंकि वहां तमाम आबादी को लगाने के लिए टीके तो हैं, लेकिन आबादी का एक बड़ा हिस्सा टीके लगवाने को तैयार नहीं है।

जब लोगों की सोच ऐसी हो जाती है तो उससे किस तरह का खतरा पैदा होता है यह समझने की जरूरत है। यूरोप और अमेरिका में बहुत सी जगहों पर लोग खुलकर टीकों के खिलाफ खड़े हुए हैं। और वे अपनी मर्जी के पक्ष में संविधान में दिए गए अधिकारों को भी गिनाते हैं। हो यह रहा है कि लोग टीके नहीं लगवा रहे हैं और जब संक्रमण बढ़ रहा है तो यह लोग अस्पताल जा रहे हैं। टीके लगवाने के पीछे इनका तर्क है कि उन्हें विज्ञान पर भरोसा नहीं है, कि यह वैक्सीन अभी पूरे ट्रायल से गुजरी नहीं है। दूसरी तरफ जब वह बीमार पड़ते हैं तो इसी चिकित्सा विज्ञान पर पूरा भरोसा हो जाता है, और वे इलाज के लिए अस्पताल जा रहे हैं, और किसी भी देश में इलाज की सीमित क्षमता को खत्म कर दे रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि टीके लगवाए हुए लोग जब कोरोनावायरस से संक्रमित होकर या किसी और बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचते हैं तो वहां उन्हें जगह नहीं मिल रही। अब विज्ञान पर जिन्हें भरोसा नहीं है, और जो बिना टीकों के रहना चाहते हैं, उन्हें इलाज के लिए विज्ञान पर पूरा भरोसा है। यह नौबत इन तमाम देशों में टीके लगवाए हुए लोगों के लिए अधिक बड़ा खतरा बन रही है जो कि सामाजिक जिम्मेदारी से काम ले रहे हैं। लेकिन दूसरे गैरजिम्मेदार लोगों की लापरवाही की सजा भुगत रहे हैं। यह कुछ वैसा ही है कि सडक़ पर ठीक से गाड़ी चलाते हुए लोग किसी नशेड़ी ड्राइवर की लापरवाह ड्राइविंग की सजा भुगतते हैं।

हिंदुस्तान दुनिया के उन देशों में है जहां पर वैक्सीन के लिए प्रतिरोध सबसे ही कम है। लोगों को हैरानी भी हो सकती है कि यह देश धर्म के बोझ से दबा हुआ है, यहां तरह-तरह के अंधविश्वास हैं, यहां लोगों की वैज्ञानिक सोच को लगातार खत्म किया जा रहा है, फिर भी लोग वैक्सीन के खिलाफ क्यों नहीं है? और क्यों लंबी-लंबी कतारें लगाकर भी लोग वैक्सीन लगा रहे हैं, जबकि इसके लिए किसी तरह के कोई इनाम नहीं रखे गए हैं। दुनिया के कई देशों में तो बड़े-बड़े इनाम रखने के बाद भी लोग वैक्सीन लगवाने सामने नहीं आ रहे हैं। दरअसल हिंदुस्तान में आजादी के बाद से लगातार आधी सदी तक तो लोगों की सोच को वैज्ञानिक बनाकर रखा गया था, और हर तरह के विज्ञान के लिए लोगों के मन में बड़ा सम्मान था। लोगों ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी, चिकित्सा विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, कृषि विज्ञान जैसे बहुत से क्षेत्रों में विकास देखा था, और उसके फायदे भी देखे थे। लोगों ने भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो को उस समय से काम करते देखा था जब उपग्रह को साइकिल और बैलगाड़ी पर ले जाकर वहां से अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी की जाती थी। इसलिए लोगों की सोच वैज्ञानिक बनी हुई थी, और देश के हर बच्चे को जब पोलियो ड्रॉप्स दिए गए तो भी तमाम आबादी ने उत्साह के साथ इस वैक्सीन को मंजूर किया। इसके अलावा भी कई और तरह की वैक्सीन इस देश में बच्चों को दी गई और कम पढ़े-लिखे, गांवों में रहने वाले, जंगलों में रहने वाले लोगों ने भी अपने बच्चों को सारे टीके लगवाए थे। उसी समय की सोच अब तक काम आ रही है और कोई कोरोना वैक्सीन प्रतिरोध नहीं कर रहा है। आबादी में जिन लोगों को अभी वैक्सीन लगना शुरू नहीं हुआ है या जिस उम्र के लिए शुरू भी हो गया है और उनकी बारी नहीं आई है, वे सारे लोग वैक्सीन का इंतजार कर रहे हैं, उससे कतरा नहीं रहे हैं। पश्चिम के विकसित देशों के मुकाबले कम पढ़े-लिखे हिंदुस्तान से दुनिया को आज बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। भारत की आज की इस हालत से यह भी साबित होता है कि लोगों के वैज्ञानिक का सोच जो कि बहुत लंबे समय में ढलकर मजबूत हुई है, उसे आनन-फानन रफ्तार से खत्म भी नहीं किया जा सकता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 दिसंबर 2021


 

विधानसभा में रेप पर हुआ ऐसा सर्वदलीय हँसी-ठट्ठा

 18 दिसंबर 2021

  

जब कभी ऐसा लगने लगे कि कोई नेता या कोई पार्टी अपने सबसे घटिया बयान दे चुके हैं तो उसी वक्त वह कुछ और नया लेकर आते हैं जो गंदगी का एक नया रिकॉर्ड कायम करने के लिए काफी रहता है। कर्नाटक में कांग्रेस के एक बड़े नेता और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रमेश कुमार ने विधानसभा के भीतर अध्यक्षों से बातचीत करते हुए यह बयान दिया कि एक बात कही जाती है कि जब बलात्कार होना एकदम तय हो, तो लेट जाओ और इसका मजा लो। इस बयान के बाद रमेश कुमार खुद हँसते हुए दिखते हैं, दूसरे सदस्य भी हँसते हुए दिखते हैं, और तो और विधानसभा अध्यक्ष भी जोरों से हँसते हुए दिखते हैं जिनकी हँसी देर तक चलती है। सच तो यह है कि दूर बैठे हुए विधानसभा की कार्यवाही के इस हिस्से का कन्नड़ भाषा का जितना वीडियो देखा जा सकता है और सदन की कार्रवाई के इस हिस्से को जितना सुना जा सकता है उससे ऐसा लगता है कि आज के विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में चल रहे हंगामे से थककर सामने बैठे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार को देखा और कहा आप जानते हैं रमेश कुमार, मुझे लगता है कि अब हमें सिर्फ इस स्थिति का आनंद लेना चाहिए मैंने फैसला लिया है कि अब न मैं उन्हें शांत कराने की कोशिश करूंगा और न ही स्थिति को व्यवस्थित करने की। विधानसभा अध्यक्ष की इस बात का एक पुराना संदर्भ दिखता है कि जब 2 साल पहले रमेश कुमार स्पीकर थे तब भी उन्होंने इसी किस्म का एक बयान बलात्कार को लेकर दिया था। और हो सकता है कि इस बार विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार से बात करते हुए उसी बात के बारे में बोल रहे हों। लेकिन जो भी हो, ऐसा न भी हो तो भी कम से कम यह तो देखा ही जा सकता है कि एक भूतपूर्व विधानसभा अध्यक्ष के रेप को लेकर महिलाओं के खिलाफ ऐसे भयानक हिंसक और अश्लील बयान पर सदन में और सदस्य भी हँसते हैं, और मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष भी हँसते हैं, जबकि ऐसा घटिया बयान सदन की कार्यवाही से तुरंत ही निकाल दिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया। यह ताजा मामला यह याद दिलाता है कि किस तरह इसी कर्नाटक विधानसभा में बैठकर ब्लू फिल्म देखने का मामला सामने आया था।

जिस कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रही हों, जिसकी मौजूदा अध्यक्ष सोनिया गांधी हों, उस पार्टी का इतना बड़ा नेता, जो कि 2 बार विधानसभा अध्यक्ष था, वह इतनी गंदी और घटिया बात कहकर एक लुकाछिपी वाली माफी मांगकर बच निकल रहा है। कल के विधानसभा के अपने बयान के बारे में आज रमेश कुमार ने कहा -‘अगर मेरे बयान से महिलाओं की भावनाएं आहत हुई हैं तो मुझे माफी मांगने में कोई दिक्कत नहीं है’। दूसरी तरफ लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने कहा है कि रमेश कुमार को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए थी, लेकिन आप जब उन्होंने माफी मांग ली है तो इस मामले को और तूल नहीं देना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष जो कि जाहिर तौर पर भाजपा के हैं, उन्होंने कहा कि जब रमेश कुमार ने माफी मांग ली है तो इस मामले को और नहीं खींचना चाहिए। खैर यह दोनों हँसी-ठहाके में भागीदार रहे हैं तो दोनों की एक दूसरे के साथ हमदर्दी भी जायज है।

विधानसभा और संसद देश के यह दोनों ही निर्वाचित सदन अपने-आपको तरह-तरह के विशेष अधिकारों के घेरे में रखते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कि सुप्रीम कोर्ट के जज अदालत की अवमानना के कानून को छोडऩा ही नहीं चाहते हैं, फिर चाहे वे जज की कुर्सी पर बैठकर किसी की भी अवमानना क्यों ना करते हों। ऐसे में देश के ताकतवर तबकों ने अपने-आपको विशेषाधिकार और अवमानना के कानूनों से घेर कर रखा हुआ है क्योंकि उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम है कि उनके बीच में जो गड़बडिय़ां चल रही हैं, जो खामियां हैं, उन्हें लेकर लोग उन पर हमले कर सकते हैं। और आम लोगों पर भले भीड़ के हमले ऐसे होते चलें कि उनमें किसी को चिथड़े उड़ाकर मार डाला जाए, लेकिन संसद और अदालत की तरफ कोई नजर उठाकर भी ना देख सके, इसलिए ऐसे कानून बनाए गए हैं। और यही वजह है कि गंदगी की बातें कहकर भी सांसद और विधायक बच जाते हैं क्योंकि इन सदनों के भीतर कही गई बातों को लेकर उनके खिलाफ कोई अदालती कार्यवाही नहीं की जा सकती, किसी अदालतों में कही गई जुबानी बात के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। तमाम देश के तमाम किस्म के कानून महज आम जनता के लिए हैं, जिसे कुचलना बहुत आसान है, जिसे कानून भी मार सकता है और जिसे गैरकानूनी हिंसक भीड़ भी घेरकर मार सकती है, और फिर अगर संसद या विधानसभा के भीतर बाहुबल हो तो ऐसी हत्यारी भीड़ को बचाने का काम भी हो सकता है।

हिंदुस्तान में इतने बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए लोग भी महिलाओं से होने वाले बलात्कार को लेकर जिस तरह का हँसी-ठट्ठा करते हैं, वह देखना भी भयानक है। या उससे कहीं कम नहीं है जिन मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने गई महिला से थाने के पुलिस वाले भी बलात्कार करने में जुट जाते हैं। विधानसभा के भीतर जहां देश के कानून के लिए महिलाओं के लिए सबसे अधिक सम्मान की सोच रहनी चाहिए, वहां पर ऐसी घटिया और हिंसक सर्वदलीय सोच सामने आती है तो यह जाहिर है कि ऐसे नेता सदन के कैमरे और माइक्रोफोन से परे महिलाओं के बारे में कैसी सोच रखते होंगे। यह तो कांग्रेस पार्टी के आज दुर्दिन चल रहे हैं कि वह अपने नेताओं के खिलाफ किसी कार्रवाई करने की ताकत आज नहीं रखती है, वरना ऐसे विधायक को कांग्रेस पार्टी को तुरंत ही निलंबित करना चाहिए था।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर 2021


 

विधानसभा में रेप पर हुआ ऐसा सर्वदलीय हँसी-ठट्ठा

 16 दिसंबर 2021

 

जब कभी ऐसा लगने लगे कि कोई नेता या कोई पार्टी अपने सबसे घटिया बयान दे चुके हैं तो उसी वक्त वह कुछ और नया लेकर आते हैं जो गंदगी का एक नया रिकॉर्ड कायम करने के लिए काफी रहता है। कर्नाटक में कांग्रेस के एक बड़े नेता और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रमेश कुमार ने विधानसभा के भीतर अध्यक्षों से बातचीत करते हुए यह बयान दिया कि एक बात कही जाती है कि जब बलात्कार होना एकदम तय हो, तो लेट जाओ और इसका मजा लो। इस बयान के बाद रमेश कुमार खुद हँसते हुए दिखते हैं, दूसरे सदस्य भी हँसते हुए दिखते हैं, और तो और विधानसभा अध्यक्ष भी जोरों से हँसते हुए दिखते हैं जिनकी हँसी देर तक चलती है। सच तो यह है कि दूर बैठे हुए विधानसभा की कार्यवाही के इस हिस्से का कन्नड़ भाषा का जितना वीडियो देखा जा सकता है और सदन की कार्रवाई के इस हिस्से को जितना सुना जा सकता है उससे ऐसा लगता है कि आज के विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में चल रहे हंगामे से थककर सामने बैठे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार को देखा और कहा आप जानते हैं रमेश कुमार, मुझे लगता है कि अब हमें सिर्फ इस स्थिति का आनंद लेना चाहिए मैंने फैसला लिया है कि अब न मैं उन्हें शांत कराने की कोशिश करूंगा और न ही स्थिति को व्यवस्थित करने की। विधानसभा अध्यक्ष की इस बात का एक पुराना संदर्भ दिखता है कि जब 2 साल पहले रमेश कुमार स्पीकर थे तब भी उन्होंने इसी किस्म का एक बयान बलात्कार को लेकर दिया था। और हो सकता है कि इस बार विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार से बात करते हुए उसी बात के बारे में बोल रहे हों। लेकिन जो भी हो, ऐसा न भी हो तो भी कम से कम यह तो देखा ही जा सकता है कि एक भूतपूर्व विधानसभा अध्यक्ष के रेप को लेकर महिलाओं के खिलाफ ऐसे भयानक हिंसक और अश्लील बयान पर सदन में और सदस्य भी हँसते हैं, और मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष भी हँसते हैं, जबकि ऐसा घटिया बयान सदन की कार्यवाही से तुरंत ही निकाल दिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया। यह ताजा मामला यह याद दिलाता है कि किस तरह इसी कर्नाटक विधानसभा में बैठकर ब्लू फिल्म देखने का मामला सामने आया था।

जिस कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रही हों, जिसकी मौजूदा अध्यक्ष सोनिया गांधी हों, उस पार्टी का इतना बड़ा नेता, जो कि 2 बार विधानसभा अध्यक्ष था, वह इतनी गंदी और घटिया बात कहकर एक लुकाछिपी वाली माफी मांगकर बच निकल रहा है। कल के विधानसभा के अपने बयान के बारे में आज रमेश कुमार ने कहा -‘अगर मेरे बयान से महिलाओं की भावनाएं आहत हुई हैं तो मुझे माफी मांगने में कोई दिक्कत नहीं है’। दूसरी तरफ लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने कहा है कि रमेश कुमार को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए थी, लेकिन आप जब उन्होंने माफी मांग ली है तो इस मामले को और तूल नहीं देना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष जो कि जाहिर तौर पर भाजपा के हैं, उन्होंने कहा कि जब रमेश कुमार ने माफी मांग ली है तो इस मामले को और नहीं खींचना चाहिए। खैर यह दोनों हँसी-ठहाके में भागीदार रहे हैं तो दोनों की एक दूसरे के साथ हमदर्दी भी जायज है।

विधानसभा और संसद देश के यह दोनों ही निर्वाचित सदन अपने-आपको तरह-तरह के विशेष अधिकारों के घेरे में रखते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कि सुप्रीम कोर्ट के जज अदालत की अवमानना के कानून को छोडऩा ही नहीं चाहते हैं, फिर चाहे वे जज की कुर्सी पर बैठकर किसी की भी अवमानना क्यों ना करते हों। ऐसे में देश के ताकतवर तबकों ने अपने-आपको विशेषाधिकार और अवमानना के कानूनों से घेर कर रखा हुआ है क्योंकि उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम है कि उनके बीच में जो गड़बडिय़ां चल रही हैं, जो खामियां हैं, उन्हें लेकर लोग उन पर हमले कर सकते हैं। और आम लोगों पर भले भीड़ के हमले ऐसे होते चलें कि उनमें किसी को चिथड़े उड़ाकर मार डाला जाए, लेकिन संसद और अदालत की तरफ कोई नजर उठाकर भी ना देख सके, इसलिए ऐसे कानून बनाए गए हैं। और यही वजह है कि गंदगी की बातें कहकर भी सांसद और विधायक बच जाते हैं क्योंकि इन सदनों के भीतर कही गई बातों को लेकर उनके खिलाफ कोई अदालती कार्यवाही नहीं की जा सकती, किसी अदालतों में कही गई जुबानी बात के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। तमाम देश के तमाम किस्म के कानून महज आम जनता के लिए हैं, जिसे कुचलना बहुत आसान है, जिसे कानून भी मार सकता है और जिसे गैरकानूनी हिंसक भीड़ भी घेरकर मार सकती है, और फिर अगर संसद या विधानसभा के भीतर बाहुबल हो तो ऐसी हत्यारी भीड़ को बचाने का काम भी हो सकता है।

हिंदुस्तान में इतने बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए लोग भी महिलाओं से होने वाले बलात्कार को लेकर जिस तरह का हँसी-ठट्ठा करते हैं, वह देखना भी भयानक है। या उससे कहीं कम नहीं है जिन मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने गई महिला से थाने के पुलिस वाले भी बलात्कार करने में जुट जाते हैं। विधानसभा के भीतर जहां देश के कानून के लिए महिलाओं के लिए सबसे अधिक सम्मान की सोच रहनी चाहिए, वहां पर ऐसी घटिया और हिंसक सर्वदलीय सोच सामने आती है तो यह जाहिर है कि ऐसे नेता सदन के कैमरे और माइक्रोफोन से परे महिलाओं के बारे में कैसी सोच रखते होंगे। यह तो कांग्रेस पार्टी के आज दुर्दिन चल रहे हैं कि वह अपने नेताओं के खिलाफ किसी कार्रवाई करने की ताकत आज नहीं रखती है, वरना ऐसे विधायक को कांग्रेस पार्टी को तुरंत ही निलंबित करना चाहिए था।

(Daily Chhattisgarh)

 

मोदी सरकार का यह फैसला हिंदुस्तानी लड़कियों का भविष्य बहुत बदल सकता है

 15 दिसंबर 2021

 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तय किया है कि भारत में शादी के लिए निर्धारित कानूनी उम्र, लड़कियों के लिए भी 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष कर दी जाए। अभी लडक़ों के लिए यह 21 बरस और लड़कियों के लिए 18 बरस है। अब शादी के कानून में संशोधन के लिए यह मामला संसद में जाएगा और संशोधन के बाद यह लागू हो जाएगा। इसके पीछे केंद्र सरकार की बनाई हुई एक कमेटी की सिफारिशें हैं जिसने यह कहा था कि कम उम्र में लड़कियों की शादी होने से वे कम उम्र में मां बनती हैं, और मां-बच्चे दोनों की सेहत पर उससे फर्क पड़ता है। इस कमेटी ने अपनी सिफारिशों में यह भी कहा था कि उसने देश भर में नौजवान पीढ़ी के लोगों से बात की है, जिनमें शहरी और ग्रामीण दोनों किस्म के लोग बराबरी से शामिल किए गए थे, और उस कमेटी का यह कहना था कि शादी की उम्र को लड़कियों के लिए भी 21 बरस कर देना चाहिए। दूसरी तरफ जब यह चर्चा छिड़ी थी उस वक्त कुछ लोगों ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि देश के जिन समुदायों में कम उम्र में बच्चों की शादी का चलन है, वहां अभी भी 18 बरस से कम उम्र के बच्चों की शादी करने पर वे शादियां कानून में अवैध करार दी जाती हैं, और ऐसे में अगर लड़कियों की उम्र भी 21 वर्ष कर दी जाएगी तो अवैध या गैरकानूनी करार दी जाने वाली शादियां अधिक हो जाएंगी और लोगों को कानून तोडऩे वाला माना जाएगा जो कि अच्छी बात नहीं होगी। इस समुदाय का यह भी तर्क था कि भारत में तो आज भी एक चौथाई शादियां तय की गई उम्र से कम उम्र में ही होती हैं, और कानून से इसमें कोई गिरावट नहीं आ रही है, इसमें जो बहुत मामूली गिरावट आ रही है वह लड़कियों के लिए पढ़ाई-लिखाई के मौके बढऩे से और उनके कामकाज की संभावनाएं बढऩे से आ रही है।

यह मामला बड़ा ही जटिल है और सीधे-सीधे इस फैसले का समर्थन या इसका विरोध करना इस मुद्दे का अतिसरलीकरण होगा जो कि ठीक नहीं रहेगा। भारत में बाल विवाह एक समय तो गरीब और अमीर सभी तबकों के बीच चलता था लेकिन हाल के दशकों में यह गरीबों के बीच अधिक होता है। इसकी एक वजह होती है कि जहां मां-बाप दोनों मजदूर रहते हैं, दोनों काम करने बाहर जाते हैं, वहां मजदूर बस्ती में या किसी अकेले झोपड़े में किसी लडक़ी को छोडक़र जाना खतरे का मामला लगता है। भारत में जितनी बड़ी संख्या में बलात्कार दर्ज हो रहे हैं उन्हें देखते हुए मां-बाप दहशत में भी रहते हैं, इसलिए भी वे चाहते हैं कि कम उम्र में लडक़ी की शादी हो जाए ताकि बिना किसी विवाद के, बिना किसी हंगामे के, लडक़ी अपने ससुराल चली जाए और उसके बाद वह अपने पति और ससुराल की जिम्मेदारी रहे। इस सोच में कुछ बहुत गलत भी नहीं है क्योंकि यह गरीबी की बेबसी पर उपजी हुई सोच है जिसे इस बेबसी के खत्म होने तक बदलना मुमकिन नहीं है। दूसरी तरफ आज देश के एक बड़े हिस्से में लड़कियों की पढ़ाई के मौके बढ़ रहे हैं, वे स्कूलों में पढऩे के बाद कॉलेजों में अधिक संख्या में जा रही हैं, और कामकाज करने के लिए भी लड़कियां बड़ी संख्या में आगे आ रही हैं। ऐसे में 18 बरस की उम्र के बाद अगर कानूनी शादी करना मां-बाप के हाथ में रहता है तो लडक़ी की अधिक पढ़ाई के बिना, लडक़ी के कामकाज या रोजगार की संभावनाओं के बिना उसकी शादी कर दिए जाने की आशंका ही अधिक रहती है। यहां पर गरीब मां-बाप जैसी बेबसी तो नहीं रहती है, लेकिन संपन्न मां-बाप के लिए भी यह जरूरी नहीं रहता कि लडक़ी इतना पढ़े कि वह किसी कामकाज के लायक हो सके, और ऐसे बहुत से मामलों में जल्द शादियां हो जाती हैं। ऐसे मामलों में शादी की उम्र बढ़ जाने से लड़कियों के अधिक पढऩे की एक संभावना तो पैदा होगी ही, लड़कियों के 21 वर्ष के बाद शादी होने से, उसके बाद ही उनके मां बनने से, जच्चा-बच्चा दोनों की सेहत पर एक सकारात्मक असर पड़ेगा जो कि छोटी बात नहीं रहेगी। जैसा कि चिकित्सा वैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों का अध्ययन कहता है कि लड़कियों की शादी की उम्र 3 वर्ष बढ़ जाने से उनका कम उम्र में मां बनना बंद होगा और देश की शिशु मृत्यु दर, मातृ (जननी) मृत्यु दर भी घटेगी, बच्चों में कुपोषण भी घटेगा, क्योंकि कम उम्र की मां अपने बच्चे को बेहतर पोषण नहीं दे पाती है। इसलिए लडक़ी की पढ़ाई-लिखाई के हिसाब से, उसके कामकाज और रोजगार की संभावनाओं के हिसाब से, और उसके मां बनने के हिसाब से भी, आयु सीमा को बढ़ाया जाना एक अच्छा फैसला लगता है। भारत में क्योंकि समाज व्यवस्था ऐसी है कि स्कूल कॉलेज में सेक्स एजुकेशन से परहेज किया जाता है, और कम उम्र की लड़कियों को शादी के बाद की शारीरिक जिम्मेदारियों की इतनी समझ नहीं रहती, इसलिए भी 18 बरस के बजाय 21 बरस की उम्र बेहतर लग रही है।

लेकिन अब सवाल यह रहता है कि देश की आधी आबादी जितनी गरीब है और उस तबके में अगर किसी लडक़ी के मां-बाप दोनों ही मजदूर हैं या बाहर काम करते हैं तो वहां पर किस तरह लडक़ी का ख्याल रखा जा सकेगा? इस कड़वी सामाजिक हकीकत को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा। बच्चियों की सामाजिक सुरक्षा पर अधिक ध्यान देने के साथ-साथ यह भी सोचना होगा कि शादी की उम्र को 3 बरस बढ़ाने के बाद गरीब बच्चियों के लिए 18 से 21 वर्ष की उम्र तक क्या-क्या पढऩे और सीखने के लायक संभावनाएं सरकार मुहैया करा सकती है? सरकार की जिम्मेदारी संसद में उम्र बढ़वाने के संविधान संशोधन तक नहीं है, इससे बढ़ी हुई उम्र का बेहतर इस्तेमाल कैसे हो सकता है यह भी देखना होगा, और इससे भारत में एक बहुत बड़ी कामयाबी भी हासिल हो सकती है। जच्चा-बच्चा की सेहत अपने-आपमें एक बड़ी कामयाबी रहती है और उसके अलावा अगर लडक़ी की पढ़ाई-लिखाई, उसके रोजगार, उसके शिक्षण-प्रशिक्षण में इन 3 वर्षों में कोई महत्वपूर्ण बात जोड़ी जा सकती है, तो उससे भारत की लड़कियां अधिक आत्मनिर्भर भी हो सकेंगी। आज भी देश में एक चौथाई शादियां 18 वर्ष से कम उम्र में हो रही हैं, उन्हें भी सरकार को ठीक से रोकना होगा और 3 बरस की यह बढ़ी हुई जिम्मेदारी मोटे तौर पर राज्य सरकारों पर आएगी कि 21 बरस के पहले लडक़ी की शादी ना हो सके।

अब हम नौजवान पीढ़ी के दिल-दिमाग की बात करें तो उनके लिए भी यह फैसला इसलिए बेहतर है कि पुराने वक्त में तो कम उम्र में शादियां हो जाती थीं, और लड़कियां एक गुलाम की तरह ससुराल चली जाती थीं, और शादियां किसी तरह से निभ जाती थीं। आज हालत यह है कि लड़कियां कुछ पढ़-लिखकर शादी करती हैं, लेकिन उनका रोजगार शुरू होने के पहले शादी हो जाती है, और शादी के बाद अगर उनकी कोई महत्वाकांक्षा कुचलने से बची रहती है तो शादियों में कभी-कभी दिक्कत भी आती है। इसलिए 18 बरस के बजाय 21 बरस की उम्र में शादी लड़कियों के लिए इसलिए बेहतर होगी कि वे तब तक मानसिक रूप से अधिक परिपच् हो चुकी रहेंगी, दुनिया को अधिक देख चुकी रहेंगी, और शादी में उनकी अपनी मर्जी भी कुछ हद तक काम कर पाएगी। 18 बरस की लडक़ी के मुकाबले 21 बरस की लडक़ी पर मां-बाप की मनमर्जी कुछ कम हद तक चलेगी, इससे समाज का परंपरागत ढांचा तो निराशा होगा, लेकिन इससे लड़कियों का भला होगा। कुल मिलाकर आखिर में कहने के लिए यही एक बात रह जाती है कि गरीब परिवारों में बेबसी में लड़कियों की जो शादी कम उम्र में की जाती है उस बारे में क्या होगा इसकी फिक्र करनी चाहिए, और देश की संसद और विधानसभाओं में इसकी फिक्र कम हो पाएगी क्योंकि वहां गरीब ही कम बच गए हैं, लगभग नहीं।

(Daily Chhattisgarh)

बिना अधिक हल्ले के केंद्र सरकार लाने जा रही है एक और डिजिटल औजार, जो हो सकता है हथियार..

 15 दिसंबर 2021

 

अभी हिंदुस्तान में आधार कार्ड को लेकर लोगों की जिंदगी की निजता भंग होने की फिक्र टली नहीं है कि एक और फिक्र का सामान तैयार होने लगा है। केंद्र सरकार यह योजना बना रही है कि भारतीय डाक-तार विभाग देश के हर घर, दुकान, मकान का एक डिजिटल नंबर तैयार करेगा जो कि उस घर का पोस्टल एड्रेस रहेगा। यह बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है कि लोगों को लंबा-चौड़ा पता लिखने के बजाय सिर्फ एक डिजिटल नंबर डाल देना काफी होगा लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं रहेगी। हर मकान, दुकान, दफ्तर का एक नंबर रहेगा और उस नंबर से वहां पहुंचने वाली चिट्टियां, वहां पहुंचने वाले सामान पहुंच जाएंगे। आज जिस तरह से लोग खाने-पीने का सामान बुलाते हैं, ऑनलाइन आर्डर करके खरीदे गए सामानों को कूरियर कंपनियां पहुंचाती हैं, और जिस तरह से किसी पते को गूगल मैप पर लोगों को भेजकर उन्हें वहां आने का रास्ता बताया जाता है, या टैक्सी बुलवाई जाती है, उन सबको देखें तो लगता है कि एक डिजिटल नंबर से जिंदगी बड़ी आसान हो जाएगी। लेकिन दूसरी तरफ यह भी है कि ऐसे एक डिजिटल नंबर से सरकारी एजेंसियां आज नहीं तो कल, पल भर में यह पता लगा लेंगी कि किस पते पर किस कूरियर एजेंसी से कब क्या सामान पहुंचा, कब कहां से चिट्ठी आई, कब खाने का क्या-क्या सामान बुलवाया गया और फिर तो निजी कारोबारियों के कंप्यूटरों से सरकारी एजेंसियां ये जानकारी निकाल ही लेंगी कि हिंदुस्तान के किस पते पर किस टैक्सी से लोग पहुंच रहे हैं, कितने देर बाद वहां से वापस निकल रहे हैं। इस तरह की तमाम संभावनाएं सरकार के लिए तो संभावनाएं रहेंगी, लेकिन निजता की बात उठाने वाले लोगों के लिए ये आशंकाएं रहेंगी। यह कम खतरे की बात नहीं रहेगी कि सरकारी एजेंसियों के कंप्यूटर किसी घर पर चिट्ठियों से लेकर टैक्सियों की आवाजाही तक सभी चीजों को एक साथ जोडक़र एक स्क्रीन पर देख सकेंगी और उससे अपने नतीजे निकाल सकेंगी। लोगों की जिंदगी पर निगरानी रखने का काम केंद्र सरकार के लिए और अधिक आसान हो जाएगा क्योंकि ऐसे पोस्टल एड्रेस के नंबर का जब-जब जहां-जहां इस्तेमाल होगा, उनको एक साथ देखा जा सकेगा, उनका विश्लेषण किया जा सकेगा और लोगों की जिंदगी की कोई निजता नहीं बचेगी।

आधार कार्ड की अनिवार्यता की वजह से आज हिंदुस्तान में लोगों की आवाजाही, लोगों की खरीदी बिक्री, उनके बैंकों और दूसरे सरकारी कामकाज की कोई निजता नहीं रह गई है। लोग एयरपोर्ट पर कितने बजे कहां पहुंच रहे हैं, कहां सफर कर रहे हैं, किस बैंक खाते से भुगतान कर रहे हैं, किस खाते से खरीदारी कर रहे हैं, मोबाइल फोन से होने वाले भुगतान में वे किस वक्त किस जगह पर किस सामान को खरीद रहे हैं, इसे पल भर में जाना जा सकता है। आज आम तो आम, अच्छे खासे जानकार लोगों को भी इस बात का एहसास नहीं हो रहा कि उनके डिजिटल पद चिन्ह किस तरह सुबह से रात तक चारों तरफ निशान छोड़ते चल रहे हैं, और आधार कार्ड, सिम कार्ड, एटीएम कार्ड, क्रेडिट कार्ड, और टेलीफोन पर आधारित भुगतान के दूसरे तरीके हर व्यक्ति के 24 घंटों में सैकड़ों निशान बना जाते हैं। जब सरकार देश के लोगों की नागरिकता तय करने पर जुटी हुई हो, तो फिर ऐसी जानकारी उसके हाथ में एक बहुत बड़ा औजार या हथियार बनना भी तय है।

अभी केंद्र सरकार की डिजिटल एड्रेस की तैयारी एक प्रस्ताव के स्तर पर है, लेकिन यह जाहिर है कि जिस तरह संसद में केंद्र सरकार पर सत्तारूढ़ गठबंधन का विशाल बहुमत है, वह अपनी किसी भी बात को वहां से पास करवा सकती है। अब सवाल यही उठेगा कि निजता के मुद्दे उठाने वाले सामाजिक संगठन किस तरह अदालत में जाकर कई सवालों के जवाब केंद्र सरकार से मांगने की कोशिश करते हैं। दुनिया के अधिक देशों में ऐसे किसी डिजिटल एड्रेस का तजुर्बा भी नहीं है। ऐसे में इससे ऑनलाइन कारोबार करने वाले लोगों को तो फायदा हो सकता है कि उन्हें पता ढूंढने के बजाय मोबाइल फोन पर नक्शा सीधे किसी घर पर ले जाकर खड़ा कर दें, लेकिन ऐसे कारोबारियों से परे किसका फायदा इससे होगा यह अभी साफ नहीं है। और फिर बहस के लिए यह मान भी लें कि जिनके घर-दफ्तर का पता डिजिटल हो जाएगा उन्हें खुद भी कोई सहूलियत होगी, तो भी यह सवाल तो रहता ही है कि ऐसे डिजिटल पते के हर इस्तेमाल की जानकारी सरकार के कंप्यूटरों पर दर्ज होगी या कारोबारियों के। और फिर सरकार जब चाहे तब उन पतों की पूरी जिंदगी को खंगाल सकती है, उस पर अपने कंप्यूटरों से ही पूरी निगरानी रख सकती है। किसी भी सरकार के हाथ इतनी ताकत से उसके बेजा इस्तेमाल की गारंटी हो जाती है। आज भी भारत की सरकार पेगासस जैसे खुफिया फौजी घुसपैठिए सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कोई हलफनामा देने से मना कर चुकी है और मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट को एक जांच कमेटी बनानी पड़ी है कि सरकार ने इसका इस्तेमाल किया है या नहीं। ऐसे में डिजिटल एड्रेस को अगर केंद्र सरकार अनिवार्य कर पाती है, तो उसके लिए लोगों पर नजर रखना, लोगों की जासूसी करना एक बहुत आसान काम हो जाएगा। देखना है कि ऐसे किसी औजार को बनाकर उसे हथियार की तरह इस्तेमाल करने से केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट रोक पाता है या नहीं।

(Daily Chhattisgarh)