बाजार में ठगी का एक नया सामान आया है, सम्मोहन...

30 सितंबर 2025 

 

आज लोगों को फोन पर तरह-तरह के फर्जी संदेश और ऑफर भेजकर ठगने का धंधा जोरों पर है। न सिर्फ हिंदुस्तान में, बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में साइबर ठगी, सेक्सटॉर्शन खूब चल रहा है। आज ही सुबह की रिपोर्ट है कि चीन म्यांमार में चल रहे फर्जी कॉल सेंटरों पर कार्रवाई करके चीनियों को गिरफ्तार कर रहा है, लेकिन जिस कंबोडिया के साथ चीन के अच्छे रिश्ते हैं, वहां भी फर्जी कॉल सेंटरों में दसियों हजार लोग काम कर रहे हैं, जो दुनिया भर के देशों में फोन करके उन्हें ब्लैकमेल करते हैं, ठगते हैं। भारत सरकार की रोक के बावजूद आज भी दूसरे देशों से चलाए जा रहे दर्जनों लोन एप्लीकेशन भारत में काम कर रहे हैं, और एक बार उनसे कर्ज ले लेने वालों का वे पूरा खून निचोड़ लेते हैं। डिजिटल अरेस्ट नाम की एक दहशत पैदा करके लोगों को एक-एक महीने तक फोन से ही अपने कब्जे में रखते हैं, और उनके बैंक खाते खाली करवा लेते हैं। इन तौर-तरीकों के बारे में हम हर कुछ महीनों में लिखते हैं कि कैसे सरकार को ऐसे साइबर-अपराधों की रोकथाम के लिए खुफिया एजेंसियां बनानी चाहिए।

लेकिन कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक महिला डॉक्टर के साथ हुई ठगी का तरीका बड़ा अटपटा है। अगर पुलिस में लिखाई गई रिपोर्ट, और सुबूत के तौर पर दी गई सीसीटीवी रिकॉर्डिंग सब सही हैं, तो फिर यह एक नया खतरनाक सिलसिला शुरू होते दिख रहा है। इस ताजा घटना में एक महिला डॉक्टर के क्लीनिक में पहुंचे दो साधुओं ने डॉक्टर से बात करते हुए उसे हिप्नोटाईज कर लिया, और उससे एक यूपीआई खाते में हजारों रुपये ट्रांसफर करवा लिए और उसे देवी-देवताओं की फोटो और रूद्राक्ष की माला देकर चले गए। डॉक्टर का कहना है कि जब अगले दिन उसने अपने फोन पर रकम जाने की जानकारी देखी, और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग देखी, तो उसे ठगी का अहसास हुआ, और उसने पुलिस रिपोर्ट की। पुराने लोगों को याद होगा कि कुछ दशक पहले इस प्रदेश में सडक़ पर भगवान दिखाने के नाम पर जमकर ठगी होती थी, लोगों से उनके गहने उतरावाकर पोटली बनाकर ठग उन्हें कोई दूसरी पोटली थमा देते थे, और सौ कदम चलने कहते थे कि उसे बाद भगवान के दर्शन होंगे। इसमें आए दिन लोग ठगाते थे, लेकिन उस वक्त कोई सीसीटीवी कैमरे नहीं थे, इसलिए ठग पकड़ाते नहीं थे। अब मोबाइल फोन, लोकेशन, बैंक खातों में लेनदेन, और सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की मेहरबानी से लोग न सिर्फ पकड़ाते हैं, बल्कि उनके खिलाफ सुबूत भी पुख्ता मिल जाते हैं।

अब अगर साधुओं के हुलिए में आकर ठग किसी को हिप्नोटाईज कर रहे हैं, तो यह तो एक बहुत ही खतरनाक नौबत है। आज भारत की हवा में धर्म जितना घुला हुआ है, किसी धार्मिक पोशाक में पहुंचे लोगों को तो बेरोकटोक महिलाएं घरों में आ जाने देंगी, और उनका सत्कार भी करने लगेंगी। अब अपनी क्लीनिक में काम करती हुई डॉक्टर, वहां पर दूसरे कर्मचारी के रहते हुए भी इस तरह की ठगी की शिकार हो गई है, तो घरेलू महिलाएं तो और अधिक खतरे में रहेंगी। सुबह होती नहीं है कि रिहायशी बस्तियों में धर्म के नाम पर, गाय या किसी अनाथाश्रम के नाम पर चंदा मांगने के लिए, या किसी यज्ञ हवन के नाम पर दान मांगते हुए धार्मिक चोलों में लोग पहुंचने लगते हैं। उन्हें कड़ाई से मना कर दिया जाए, तो उनके आशीर्वचन पलभर में श्राप में बदल जाते हैं। अगर डॉक्टर से ठगी की यह घटना सही है, तो पुलिस को इसे तेजी से हल करना चाहिए, साथ-साथ एक साधारण सावधानी भी चारों तरफ फैलानी चाहिए कि सम्मोहन करके ठगी करने वाले लोग घूम रहे हैं, लोग अनजाने लोगों से कुछ दूर ही रहें।

अब इस एक घटना से परे आम बात यह है कि चारों तरफ लोग जुर्म से मोटी कमाई करने को एक आसान रास्ता मानकर चल रहे हैं। वे सट्टेबाजी की बुकिंग कर रहे हैं, नशे की तस्करी और बिक्री कर रहे हैं, वैध-अवैध शराब की गैरकानूनी बिक्री कर रहे हैं, हर किस्म का साइबर क्राइम तो कर रही रहे हैं। इन सबको मिलाकर देखें तो लगता है कि लोगों को जेल जाने के खतरे का या तो पूरा अहसास नहीं है, या वे उस खतरे की कीमत पर भी जुर्म से कमाई करके आलीशान जिंदगी जीना चाहते हैं। इसी छत्तीसगढ़ के महादेव सट्टा नाम का दसियों हजार करोड़ का ऐसा साम्राज्य खड़ा हुआ कि उसका सरगना दुबई में बैठकर आज तक धंधा चल रहा है, और उसकी गिरफ्तारी की बस अफवाहें ही बीच-बीच में आती हैं। इस बीच जांच एजेंसियों का कहना है कि महादेव सट्टा की काली कमाई में नेताओं और अफसरों को सैकड़ों करोड़ रुपये मिले। अब जुर्म की कमाई अगर इतनी आसान और इतनी आलीशान है, तो बहुत हैरानी की बात नहीं है कि गांव-गांव तक लोग शेयर बाजार में पूंजी निवेश, और क्रिप्टोकरेंसी के धंधे का झांसा देकर लोगों को ठग रहे हैं।

भारत सरकार को यह अंदाज सामने रखना चाहिए कि जुर्म और ठगी की अर्थव्यवस्था अब देश की मुख्य अर्थव्यवस्था का कितना फीसदी हो चुकी है? यह बढ़ते चल रहा है। और पूरी दुनिया में साइबर क्राइम से जितनी कमाई आज की जा रही है, वह दुनिया के बहुत से देशों की कुल अर्थव्यवस्था से अधिक बड़ी बन चुकी है। फिलहाल तो इस पर चर्चा हमने इसलिए की है कि लोग किसी के सम्मोहन के शिकार न हों, यह ठगने का एक नया तरीका दिख रहा है, और इससे तुरंत ही सावधान हो जाना चाहिए। पुलिस को भी जांच के बाद बड़े पैमाने पर लोगों के बीच जागरूकता फैलानी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

सरहदी-आदिवासी प्रदेशों में इतना तनाव क्या ठीक है?

29 सितंबर 2025 

 

कुछ हफ्ते पहले नेपाल में एक जनआंदोलन के बाद सत्तापलट हुआ, तो हमने लिखा था कि बाकी देशों को भी इससे सबक लेना चाहिए। अलग-अलग कई किस्म के देशों में जनता का आंदोलन सरकार को पलट चुका है, या सरकार को अपना रूख बदलने पर मजबूर कर चुका है। अरब स्प्रिंग कहे जाने वाले जनआंदोलन की शुरूआत 2010-11 में ट्यूनिशिया से हुई थी, बाद में यह मिस्र, लीबिया, यमन, बहरीन, और सीरिया जैसे देशों में फैल गया। कुछ देशों में इसने सत्ता प्रमुख को हटने या गिरने पर मजबूर किया, तो कुछ जगहों पर यह गृहयुद्ध बन गया। इसे जनजागरूकता का एक बड़ा आंदोलन कहा जाता है। फिर हाल के बरसों में हमने श्रीलंका, बांग्लादेश में जनता की बगावत, या जनक्रांति से सत्ता बदलते देखी है, और सबसे ताजा मिसाल तो नेपाल की अभी सामने है।

भारत एक बहुत बड़ा देश है, और ऊपर जिन देशों का हमने जिक्र किया है उन सबसे अलग यह एक बड़ा मजबूत लोकतंत्र है। यहां पर किसी जनआंदोलन से सत्तापलट जैसा कोई खतरा नहीं है, लेकिन जनआंदोलनों के सत्ता के लिए अपने खतरे रहते हैं, और लोगों को याद होगा कि 2014 में यूपीए सरकार के जाने की वजह दिल्ली में केजरीवाल, और उनके भागीदारों के चलाए जनआंदोलन भी थे। अन्ना हजारे, रामदेव, किरण बेदी, केजरीवाल, और श्रीश्री रविशंकर ने मिलकर जो माहौल बनाया था, और रामदेव 35 रूपए में डीजल-पेट्रोल, 40 रूपए में डॉलर, हर खाते में विदेशों से लौटे कालेधन के 15-15 लाख, देश के हर गांव को स्विटजरलैंड जैसा बनाना, ये सारे हसीन सपने भगवा लंगोटी के साथ देश को पेश कर रहे थे, और लोगों ने इस आंदोलन के बाद यूपीए सरकार को चुनाव में हटा दिया था। इस तरह भारत में जनआंदोलन कोई बगावत या क्रांति नहीं बनते, लेकिन वे एक सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकते हैं, कभी-कभी बने हैं।

अब हम लद्दाख की बात करना चाहते हैं जहां पर राज्य में छठी अनुसूची लागू करने की भाजपा के ही घोषणापत्र की बात दुहराते हुए एक गांधीवादी आंदोलनकारी सोनम वांगचुक आंदोलन कर रहे थे। उनका अनशन और आंदोलन अहिंसक चल रहा था, लेकिन लद्दाख में कुछ दूसरे आंदोलनकारी बेकाबू हो गए, पुलिस गाडिय़ों, और भाजपा दफ्तर को आग लगा दी। इस हिंसा का विरोध करते हुए सोनम वांगचुक ने अपना अनशन खत्म कर दिया, लेकिन इस केन्द्रशासित प्रदेश पर काबिज केन्द्र सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करके राजस्थान की जोधपुर जेल भेज दिया है। लोगों को अच्छी तरह याद है कि जब मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को तोडक़र तीन अलग-अलग इलाके बनाए थे, तो लद्दाख के सोनम वांगचुक ने मोदी सरकार की तारीफ की थी, उन्हें धन्यवाद दिया था। वे बुनियादी तौर पर एक पर्यावरणवादी हैं, और पूरी दुनिया में उन्हें उनके इस पहलू की वजह से बड़े सम्मान से देखा जाता है। वे मोदी सरकार की कुछ पर्यावरण पहल की तारीफ कर चुके हैं, सार्वजनिक रूप से भी, और केन्द्र सरकार को चिट्ठी लिखकर भी। ऐसे में लद्दाख में हुई आगजनी की हिंसा की तोहमत उन पर थोपते हुए उनको गिरफ्तार करके जिस तरह एक गर्म प्रदेश जोधपुर की जेल में भेजा गया है, उससे केन्द्र सरकार ने बातचीत की एक संभावना को खत्म कर दिया है। देश के सरहदी राज्यों को लेकर भारत सरकार पर अलग-अलग समय पर अलग-अलग दबाव बने रहते आए हैं, लेकिन केन्द्र सरकार और देश के हित में यही रहता है कि इन राज्यों में शांतिपूर्ण बातचीत के लिए कोई स्थानीय नेता रह सकें। कश्मीर के मामले में तो अभी-अभी यह तथ्य सामने आया है कि वहां के कुछ अलगाववादी नेताओं को भी भारत के अलग-अलग कुछ प्रधानमंत्रियों, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान में बसे नेताओं से बातचीत का जिम्मा दिया था। जब कभी किसी तनावग्रस्त इलाके में बातचीत के लिए नेता उपलब्ध हों, तो सरकार का काम आसान होता है। लेकिन आज लद्दाख में सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी से न सिर्फ वहां से दिल्ली को जोडऩे वाला एक पुल गिरा दिया गया है, बल्कि पूरी दुनिया में इस पर्यावरणवादी आंदोलनकारी की वजह से लद्दाख का मुद्दा खबरों में आ गया है, और दुनिया की नजरें लद्दाख पर टिक गई है। एक बहुत अच्छी अंतरराष्ट्रीय साख वाले शांतिप्रिय आंदोलनकारी को लद्दाख जैसे नाजुक इलाके से हटाना सरकार की एक बड़ी चूक है। हम देख रहे थे कि लद्दाख में चीन के साथ साढ़े 8 सौ किलोमीटर लंबी सरहद है, और लद्दाख के कई हिस्सों पर चीनी कब्जे को लेकर विवाद भी है। पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान इलाके से भी लद्दाख जुड़ा हुआ है, और अफगानिस्तान से भी। लद्दाख से बड़ी संख्या में पहाड़ी स्थितियों में काम करने के काबिल नौजवान भारतीय फौज में जाते हैं, और एक सरहदी राज्य को इस तरह उलझाना समझदारी नहीं है। कुछ रिटायर्ड फौजी अफसर कल ही यह याद दिला रहे थे कि लद्दाख ऐसी खिलवाड़ के लायक प्रदेश नहीं है।

लेकिन लगे हाथों हम असम की बात करना चाहते हैं जहां पर राज्य की आबादी के करीब 12 फीसदी आदिवासी समुदाय आंदोलन करते हुए सडक़ों पर हैं जिन्हें आरक्षण के तबके में शामिल नहीं किया गया है। पिछले कुछ महीनों में ये समुदाय लगातार बेचैन हैं, और अभी-अभी इनके बहुत बड़े-बड़े जुलूस निकले हैं, बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए हैं। लद्दाख और असम दोनों जगहों पर स्थानीय जनता को यह आशंका है कि उनकी जमीन बाहरी कारखानेदारों को, या खदान मालिकों को दी जा सकती है। असम में अभी एक स्वायत्तशासी परिषद, बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के चुनाव में केन्द्र और राज्य दोनों जगह सत्तारूढ़ भाजपा की करारी शिकस्त हुई है। वहां भाजपा की सीटें आधी रह गईं, और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने बहुमत पा लिया है। अब एक बड़े स्थानीय चुनाव में शिकस्त, राज्य में भाजपा के देश के सबसे हमलावर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ जनआक्रोश के साथ-साथ जब वहां के आदिवासी आंदोलन को देखें, तो लगता है कि इस एक और सरहदी राज्य में बेचैनी कुछ अधिक फिक्र की बात होनी चाहिए। असम का भूटान के साथ बॉर्डर तो ढाई सौ किलोमीटर से कुछ अधिक है, लेकिन वह अधिक फिक्र की बात नहीं है। बांग्लादेश के साथ ठीक इतना ही लंबा बॉर्डर है, और यह देश की एक बहुत संवेदनशील सरहद है।

लद्दाख और असम के साथ जोडक़र मणिपुर को भी देखा जाना चाहिए, जहां पर 2023 से आदिवासी-गैरआदिवासी हिंसा चल रही है, सैकड़ों लोग मारे गए हैं, और दसियों हजार लोग बेदखल होकर शरणार्थी शिविरों में हैं। राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री के खिलाफ भयानक आक्रोश रहा है, और उन्हें लंबे समय तक बनाए रखने से भी सुलगता हुआ तनाव लपटों में बदला है। अब दो बरस से अधिक का वक्त हो चुका है, और मणिपुर में हिंसा का खात्मा अभी करीब दिख नहीं रहा है। जिन तीन राज्यों का हम जिक्र कर रहे हैं, इन तीनों में ही आंदोलन कर रहे लोग आदिवासी हैं, उनके मुद्दे भी स्थानीयता के, और आदिवासी हकों के हैं। यह समुदाय शहरियों के मुकाबले अधिक लंबे और समर्पित आंदोलन चलाने वाला है। देश की सरकार वैसे तो बहुत ताकतवर और समझदार है, लेकिन इन तीन राज्यों पर एक साथ चर्चा करना जरूरी था, सरकार तो अपना काम करती रहती है, देश की जनता को भी इनके बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि ये तीनों ही राज्य दूसरे देशों के साथ लगे हुए हैं। मणिपुर की म्यांमार के साथ चार सौ किलोमीटर लंबी सरहद है, बांग्लादेश से भी 14 किलोमीटर सीमा जुड़ी हुई है। ऐसे माहौल में लद्दाख के एक शांतिपूर्ण आंदोलनकारी को सजा दिए सरीखे गर्म प्रदेश में ले जाकर कैद करना, और पाकिस्तान के साथ संबंधों की तोहमत लगाकर बदनाम करना, अटलजी के शब्दों में, अच्छी बात नहीं है।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

अपनी विधा, और अपनी शैली से परे सरोकार और एकजुटता के शब्द भी..

 28 सितंबर 2025

नेपाल में हुए बड़े जनआंदोलन के बाद के सत्तापलट को लेकर भारत में भी यह सुगबुगाहट चल रही थी कि श्रीलंका के बाद बांग्लादेश, और बांग्लादेश के बाद नेपाल, इन सत्तापलटों के बाद क्या भारत में भी उसका कुछ असर हो सकता है? भारतीय संसद के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संविधान बचाने, और चुनाव आयोग का भांडाफोड़ करने के अभियान के तहत भारत में भी नौजवानों के बारे में यह कहा कि वे लोग संविधान बचाएंगे। नेपाल के जनआंदोलन से शुरू शब्दावली, जेन-जी, यानी 25-30 बरस उम्र के नौजवान, जेन-जी का इस्तेमाल राहुल गांधी ने किया, तो उस पर बड़ी जलती-सुलगती प्रतिक्रिया आई कि वे इस देश में लोगों को बगावत के लिए उकसा रहे हैं। लेकिन अभी उस राजनीतिक विवाद पर मैं बात नहीं कर रहा। मैं लद्दाख में चल रहे जनआंदोलन में अचानक हिंसा आने, और आगजनी करने के बाद वहां के अहिंसक आंदोलनकारी सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी से उपजे माहौल की बात कर रहा हूं। सोनम को लेह के 15 डिग्री तापमान से गिरफ्तार करके राजस्थान के जोधपुर में 36 डिग्री तापमान पर ले जाकर वहां की जेल में रखा गया है, और इसे लोग आंदोलन को तोडऩे की एक सरकारी हरकत बता रहे हैं। 

अब फेसबुक पर एक पत्रकार-साहित्यकार दोस्त, दिनेश श्रीनेत ने आज ही यह लिखा है कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अलग-अलग हिन्दी साहित्यकारों के फेसबुक पेज पर जाकर देखा कि इस ताजा जलते-सुलगते मुद्दे पर कौन क्या लिख रहे हैं, तो उन्हें बड़ी निराशा हुई कि हिन्दी साहित्यकार अपने आपमें मगन पड़े हुए हैं, अपनी किताबों, आयोजनों, और मंच की बात कर रहे हैं, रॉयल्टी और पुरस्कार की बात कर रहे हैं, लेकिन वे देश के सबसे ज्वलंत मुद्दों, और उनके पीछे के आंदोलनों पर कुछ भी नहीं लिख रहे हैं। उनकी निराशा हम आज इसी पेज पर इस कॉलम के नीचे देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उससे परे कुछ और बातों पर सोचने की जरूरत है। 

हिन्दी साहित्य में कई बड़े-बड़े साहित्यकारों को लेकर यह चर्चा उठती है कि जिंदगी के असल मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं होती, और लोग अपनी-अपनी पसंदीदा विधा में गुलमोहर के सुर्ख रंग से लेकर बादलों तक पर लिखते रहते हैं, और बस्तियों को जलाने से उठे काले बादल उन्हें नहीं दिखते, और न ही बिखरा हुआ सुर्ख लहू उनकी कोई टिप्पणी पाता। बहुत से लोग नामी-गिरामी साहित्यकारों की वकालत करते हैं कि वे अखबारों के लिए रिपोर्टिंग तो कर नहीं रहे हैं कि हर ताजा घटना पर उन्हें लिखना ही है। वे अपनी विधा में लिखी गई कविताओं और कहानियों में भी अपने ‘किस्म से, अपनी शैली में’ प्रतिरोध दर्ज करते हैं। 

मैं इन दोनों बातों के बीच एक अलग ही शून्य में देखकर यह सोचता हूं कि किसी कवि या साहित्यकार को, या उपन्यासकार को आसपास हो रही घटनाओं पर साहित्य की रचना करना जरूरी न लगे, वहां तक तो बात ठीक है, लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हुए भी जो लोग आज की दुनिया के जुल्म और ज्यादती पर कुछ भी नहीं लिखते, क्या वे किसी भी किस्म का लेखक होने का हक रखते हैं? मैं कविता पढ़ता नहीं, समझता भी नहीं, लेकिन इतना समझता हूं कि जिस कवि के पास कविता लिखने को शब्द हैं, भाव हैं, उसके पास फिलीस्तीन के बारे में, नेपाल के बारे में, किसी भीड़त्या के बारे में, अफगानिस्तान की महिलाओं के बारे में कुछ भी, एक टिप्पणी भी लिखने लायक शब्द तो रहते होंगे? जो लेखक, कवि, साहित्यकार ऐसे ऐतिहासिक जुल्म के बारे में, बेइंसाफी के बारे में अगर कोई टिप्पणी लिखना भी जरूरी नहीं समझते, तो यह समाज को उनसे मिलने वाली एक आम निराशा है, इसका उनकी साहित्यिक विधा से कुछ भी लेना-देना नहीं है। 

मैं कुछ और अधिक खुलासे से अपनी बात रखूं, तो वह यह है कि कोई कवि कवि होने के अलावा साक्षर भी तो है, और कवि होने के अलावा इंसान भी तो है, उसके लिए कविता से परे भी कुछ शब्द लिखना मुमकिन है। इसके बावजूद अगर गाजा को लेकर, अपने देश की साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर कुछ वाक्यों की कोई छोटी सी टिप्पणी लिखने के बजाय अगर वे अपने ही सम्मान, अलंकरण, पुरस्कार, और काव्यपाठ में मगन हैं, तो फिर वे कवि हो सकते हैं, मेरी नजर में इंसान नहीं हो सकते। मेरा तो यही मानना है कि इंसान और जानवरों में शायद सामाजिक समझ और सरोकार का ही एक बड़ा फर्क है जो कि इंसानों को अधिक अहंकार का हकदार बनाता है। लोग अगर आसपास बिखरे लहू के लालरंग के बजाय किसी सुहागन के सिंदूर के लालरंग पर कविता लिखते हैं, तो यह उनका बुनियादी हक तो है, लेकिन यह मुझे हक्का-बक्का भी करता है। 

जिनके पास आंखें हैं, और जो देख सकते हैं, जिनके पास कान हैं, और जो सुन सकते हैं, जिनके पास नाक है, और जो आसपास जलती हुई चीजों को सूंघ सकते हैं, जिनके पास दिमाग है, और वे आसपास की हिंसा और बेइंसाफी को समझ सकते हैं, वे अगर अपने होठों और जुबान का इस्तेमाल इन मुद्दों पर न करें, अपनी की-बोर्ड पर दौड़ती उंगलियों से दुनिया के जख्मों के लिए म र ह म टाईप न कर सकें, तो इसमें उनके भीतर के कवि की कोई कमी नहीं है, उनके भीतर की तथाकथित इंसानियत की ही कमी है। मैंने दिनेश श्रीनेत के जिस लेख के कुछ हिस्से पढक़र ही इस मुद्दे पर लिखना तय किया, हो सकता है कि मैं उससे कहीं पर प्रभावित रहूं, और कहीं मैं उससे अलग भी सोच और लिख रहा होऊंगा। लेकिन मेरा यह मानना है कि जिन लोगों के पास अक्षर हैं, वे दुनिया के कुछ सबसे गहरे जख्मों के हिज्जे भी न लिख सकें, तो उन्हें साक्षर क्यों माना जाए? साक्षर होना तो पढऩे-लिखने की एक बड़ी छोटी सी तकनीकी क्षमता है, जिसे कोशिश करके तोते को भी सिखाया जा सकता है। लेकिन तोते को सामाजिक-सरोकारी शायद नहीं बनाया जा सकता। 

कुल मिलाकर मेरा यही कहना है कि हम किसी रचनाकार से दुनिया में चारों तरफ घट रही घटनाओं पर रचना लिखने की उम्मीद न भी करें, तो भी बोलने की उम्मीद तो कर सकते हैं, चार लाईनें लिखने की उम्मीद तो कर सकते हैं? एक शायर जुल्म के खिलाफ गजल चाहे न लिखे, गद्य के दो वाक्य तो वह लिख ही सकता है? पाकिस्तान में जियाउल हक की फौजी हुकूमत के दौरान फैज की क्रांतिकारी गजल, हम देखेंगे गाने वाली इकबाल बानो ने वे शब्द नहीं लिखे थे, महज गाए थे। एक का हुनर लिखना था, एक का हुनर गाना था, और उस स्टेडियम में बैठकर फौजी तानाशाह से डरे बिना जिन लोगों ने उसे सुना था, वे भी क्रांतिकारी थे। इसलिए हर क्रांतिकारी, हर सरोकारी का लिखना जरूरी नहीं होता, गाना जरूरी नहीं होता, वे महज साधारण सी बात भी लिखकर एकजुटता दिखा सकते हैं। लेकिन जिन लोगों में एकजुटता दिखाने की जरूरत के मौके पर महज अपने आपका बाजार बढ़ाने की हवस हो, तो वह बात तो मुझे खटकती है। आज इतनी बातें लिखने के लिए मेरे पास अखबार का संपादकीय कॉलम है, अपना खुद का साप्ताहिक कॉलम है, एक वीडिटोरियल है, लेकिन इन सबके बिना भी मैं दस-बीस शब्दों में किसी सरोकार से एकजुटता भी दिखा सकता हूं, अपने अखबार और यूट्यूब चैनल से परे। 

जब लोगों से एक साधारण सी एकजुटता के शब्दों की उम्मीद की जाती है, और वैसे में भी जब लोग साहित्य की अपनी शैली और विधा की आड़ ले लेते हैं, तो वैसे लोग मुझे वैसे ही लगते हैं जो कि उस गली से आ-जा रहे थे जहां एक नौजवान, एक लडक़ी को दर्जनों बार चाकू मार रहा था, और उसे मार ही डाला, लोग आते-जाते ही रहे। लोगों की यह आवाजाही एक कविता हो सकती है, लेकिन वह सरोकार नहीं हो सकती। आते-जाते लोग यह दावा कर सकते हैं कि उनका काम महज आवाजाही है, लेकिन उनके बगल में होते हुए खुले कत्ल से अगर उनके माथे पर बल नहीं पड़ता, तो वैसा माथा किसी सम्मान के तिलक का हकदार कम से कम मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है  कि कुदरत ने इंसानों को जो पांच इन्द्रियां दी हैं, वे प्रतिरोध और प्रतिकार की ताकत भी रखती है, उनके लिए किसी छठी इन्द्रिय की जरूरत नहीं पड़ती है, महज मामूली से सरोकार और हौसले की जरूरत पड़ती है। इस सरोकार के बिना आपकी लिखी कविता शब्दों के घूरे से अधिक कुछ और हो सकती है? 

जिनके पास शब्द हों, भाव हों, कागज-कलम और की-बोर्ड हो, उसके बाद भी अगर उनके पास आसपास गिरती लाशों पर कहने को कुछ न हो, तो उनके सोचने, और शौचने में क्या फर्क है?

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

एक तो फिल्मी सितारा, और फिर राजनीति में, दीवानगी भरे तमिलनाडु में दर्जनों मौतें...

 28 सितंबर 2025 

 

तमिलनाडु के करूर नाम की जगह पर लोकप्रिय फिल्म अभिनेता विजय थलापथि की राजनीतिक रैली कल शाम जानलेवा हो गई, जब वे घंटों देर से वहां पहुंचे, और इंतजार करते हुए थके हुए लोग उनके करीब आने को बेकाबू होने लगे। मंच तक पहुंचने के लिए उनके लिए जो रास्ता रखा गया था, उसे छोडक़र वे भीड़ के बीच से मंच तक जाने लगे, और उनके करीब आने को टूट पड़े लोग भगदड़ में कुचले गए। अभी दोपहर तक 39 लोग मारे जा चुके हैं जिनमें आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे हैं। 50 से अधिक लोग बुरी तरह जख्मी हैं, और अलग-अलग अस्पतालों में हैं। अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम तमिल राजनीति में सत्तारूढ़ डीएमके के खिलाफ अगले बरस का विधानसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं, और इसके चलते ही कल जिन दो जगहों पर उनकी आमसभा हुई, दोनों जगह पर वे घंटों लेट पहुंचे, और पहली जगह की भगदड़ में तो मौतें नहीं हुईं, लेकिन दूसरी आमसभा में हुई मौतों के बाद इस बड़े फिल्म अभिनेता ने श्रद्धांजलि के दो शब्द भी नहीं कहे, और विशेष विमान से चेन्नई चले गया। शासन-प्रशासन का कहना है कि इस रैली के लिए पुलिस ने जो सावधानियां बरतने के लिए कहा था, इस अभिनेता की पार्टी ने उनमें से कोई बात नहीं मानी, और उसके घंटों लेट पहुंचने की वजह से लोग चक्कर खाकर गिर रहे थे, और करीब आने के लिए भगदड़ भी हो रही थी। मुख्यमंत्री ने इसे तमिलनाडु में किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में अब तक हुई सबसे अधिक मौतों का हादसा कहा है। उल्लेखनीय है कि तमिल राजनीति में बड़ी संख्या में फिल्मी सितारों का इतिहास रहा है, और उनमें से कुछ मुख्यमंत्री भी बने हैं। वहां पर फिल्मी सितारों के लिए भी एक ऐसी दीवानगी रहती है जो कि देश में और कहीं भी नहीं दिखती, और यही दीवानगी लोगों को राजनीतिक सफलता के आसमान पर पहुंचा देती है। तमिल फिल्मों से जुड़े सीएन अन्नादुराई फिल्म स्क्रिप्ट लिखते थे, और फिल्मों के रास्ते उन्होंने द्रविड़ आंदोलन को भी लोकप्रिय किया था। एम.जी.रामचन्द्रन तमिल फिल्मों के सुपरस्टार थे, और वे दस बरस मुख्यमंत्री रहे, उनके बाद उनकी राजनीतिक वारिस कही जाने वाली जे.जयललिता तो छह बार मुख्यमंत्री बनीं, जो कि एनजीआर के साथ ही लोकप्रिय अभिनेत्री की जोड़ी थीं। एम.करूणानिधि ने 75 से अधिक तमिल फिल्में लिखीं, और वे पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। विजयकांत, और कमल हासन जैसे कुछ लोग भी राजनीति में आए, लेकिन बहुत आगे नहीं बढ़े। अब ताजा दाखिला विजय थलपथि का है, वे 2024 में राजनीतिक दल बनाकर 2026 के चुनावों की तैयारी में लगे हुए हैं। लेकिन तमिल फिल्म और राजनीति के रिश्ते पर आज की बात खत्म करने का हमारा कोई इरादा नहीं है, हम लोगों की भीड़ में भगदड़ से होने वाली मौतों की बात करना चाहते हैं। अभी कुछ अरसा पहले ही कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में क्रिकेट टीम के जीत के आने के बाद निकाले गए विजय जुलूस में भगदड़ हुई, और 11 प्रशंसक कुचलकर मारे गए, 50 से अधिक जख्मी हुए। कुछ गलत जानकारियों के चलते हुए ढाई लाख से अधिक लोग एक जगह जुट गए थे, और आयोजकों ने भीड़ काबू करने की कोई तैयारी नहीं की थी। 

क्रिकेट और सिनेमा, सी से शुरू होने वाले ये दो शब्द हिन्दुस्तान में धर्म के तुरंत बाद का दर्जा रखते हैं। खबरों से लेकर वोटों तक ये दोनों चीजें लोगों को बुरी तरह प्रभावित करने की ताकत रखती हैं। इसीलिए किसी भी दूसरे खेल के मुकाबले क्रिकेट खिलाड़ी राजनीति से लेकर राज्यसभा और लोकसभा के मनोनयन तक सबसे अधिक जगह पाते हैं। इन्हीं को टक्कर देकर इनसे अधिक संख्या फिल्म से जुड़े लोगों की रहती है, जो कि राजनीतिक दलों में शामिल होते हैं, चुनाव भी लड़ते हैं, और संसद में मनोनीत भी किए जाते हैं। राजनीतिक दल भीड़ को जुटाने, और रुझाने की इनकी क्षमता अच्छी तरह जानते हैं, और इसीलिए इन्हें अपनी पार्टी में लेकर आने को एक किस्म से चुनावी जीत ही मान लिया जाता है। यहां तक कि चुनावी इस्तेमाल से परे भी बड़े-बड़े दिग्गज फिल्मकारों को संसद में मनोनीत करके राजनीतिक दल इस मनोनयन से मिली शोहरत को भी वोटरों के बीच भुना लेती है, फिर चाहे ये फिल्मकार संसद में पांच बरस में मुंह भी न खोलें। ऐसे लोग दक्षिण भारत में जब राजनीतिक दल बनाकर चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो राजनीतिक संतुलन बदलने की एक बड़ी संभावना भी पैदा हो जाती है। आज तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके के खिलाफ विजय थलपथि के उतरने से उन तमाम राजनीतिक दलों को खुशी हुई होगी जो कि अगले चुनाव में डीएमके की शिकस्त देखना चाहते हैं। जनता में दीवानगी का हाल दक्षिण भारत में चुनाव और फिल्म दोनों में देखने मिलता है, और फिल्म स्टार नेता की बेमौसम की इस राजनीतिक रैली में लोगों की बेतहाशा भीड़ बताती है कि फिल्म से राजनीति में आकर शोहरत और कामयाबी की उम्मीद लगाना गलत नहीं है। लेकिन जिस तरह फिल्म सितारे शूटिंग पर घंटों लेट पहुंचते हैं, उसी तरह कल यह फिल्म कलाकार 6 घंटे देर से पहुंचा, और दक्षिण की तेज धूप में सुबह से भूखे-प्यासे बैठे हुए लोग चक्कर खाकर गिरने लगे थे, और बाद में भीड़ बेकाबू हुई, भगदड़ में कई महिलाओं के पैर टूट गए, और रिकॉर्ड संख्या में 39 मौतें हुई हैं। 

सार्वजनिक जगह पर किसी भी तरह की भीड़ हो, वह पूरी तरह से राज्य सरकार की जिम्मेदारी रहती है, और राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला रहता है। लेकिन कागज पर ली और दी जाने वाली इजाजत का जमीनी अमल से कोई लेना-देना नहीं बचता, और भीड़ इसी तरह बेकाबू और जानलेवा हो जाती है। जैसा कि बेंगलुरू की भगदड़ के बाद वहां की क्रिकेट टीम ने लोगों के लिए मुआवजे की घोषणा की थी, उसी तरह कल तमिलनाडु में इस फिल्म अभिनेता ने मरने वालों के लिए 20-20 लाख रूपए देने की घोषणा की है, लेकिन इससे बदइंतजामी, और भीड़ के बेकाबू होने में उनकी गैरजिम्मेदारी का जुर्म कम नहीं होना चाहिए। क्रिकेट हो या सिनेमा इसके कामयाब लोगों के पैसा बेतहाशा हो सकता है, लेकिन बेतहाशा पैसे को, उससे दिए जा रहे मुआवजे को आपराधिक जिम्मेदारी खत्म करने के लिए इस्तेमाल नहीं होने देना चाहिए। 

भारत में शासन-प्रशासन के लोगों को भीड़-प्रबंधन की कुछ बुनियादी जरूरतों को कड़ाई से लागू करना सीखना चाहिए। जरूरत पड़े तो ऐसी जगहों के कई किलोमीटर दूर ही लोगों को रोक देना चाहिए, ताकि किसी एक जगह पर प्रबंधन-क्षमता से अधिक बड़ा जमावड़ा न हो सके। और यह बात सिर्फ क्रिकेट और सिनेमा से जुड़ी भीड़ पर लागू नहीं होती, यह बात हर किस्म की भीड़ पर लागू होती है, और जिला चलाने वाले अफसरों के साथ-साथ, कुछ प्रबंधन-विशेषज्ञों को मिलकर क्राउड-मैनेजमेंट की बुनियादी शर्तें तय करनी चाहिए। अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए आम लोग तो ऐसे ही इकट्ठे होंगे, लेकिन जिन्होंने आयोजन किया है, और जो लोग इंतजाम में लगे हैं, ऐसे सारे सरकारी-गैरसरकारी लोगों को बेहतर तैयारी सीखनी चाहिए। भगदड़ में मौतें इन दोनों ही तबकों की एक बड़ी असफलता है।

(Daily Chhattisgarh) 

जगह-जगह सुलगती आग के खतरे देखने की जरूरत

 27 सितंबर 2025 

 

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा के एक गांव में परसों शाम एक सतनामी नौजवान की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इस युवक ने सतनामी समाज के खिलाफ दूसरी जाति के एक युवक की सोशल मीडिया पोस्ट हटाने को लिखा था, और हिन्दू धर्म के किसी नारे को लेकर स्कूल से किसी शिक्षक को हटाने का मामला था जिस पर सोशल मीडिया पर हुई असहमति कत्ल तक पहुंच गई। अब सतनामी समाज में समाज के एक लडक़े के कत्ल को लेकर बड़ा आक्रोश है, और शव को चौक पर रखकर चक्काजाम किया गया है। पीडि़त परिवार को एक करोड़ का मुआवजा, और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग भी की जा रही है। अभी हम सोशल मीडिया पोस्ट के बाद पैदा हुए, और बढ़े जातिवादी तनाव की बारीकियों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन समाज की हवा में धर्म और जाति को लेकर जो तनातनी फैली हुई है, उसके बारे में हर जिम्मेदार तबके को फिक्र करने की जरूरत है। अभी दो-तीन दिन पहले ही इस जिले से लगे हुए कवर्धा में एक आदिवासी युवती के साथ तीन नौजवानों ने सामूहिक बलात्कार किया, और गृहमंत्री का अपना जिला, अपना चुनाव क्षेत्र होने से पुलिस ने तेजी से उन्हें गिरफ्तार भी किया है। अब वहां पर आदिवासी समाज आंदोलन कर रहा है, और 50 लाख मुआवजा मांग रहा है। लोगों को याद होगा कि पिछले बरस बलौदाबाजार जिले में सतनामी समाज के एक आंदोलन के बाद वहां तनाव इतना खड़ा हुआ कि कलेक्टर और एसपी के दफ्तर जला दिए गए थे। सरकार, और राजनीति, न तो मिलकर, और न ही अलग-अलग इस तनाव को निपटा पाए हैं। 

छत्तीसगढ़ आज अलग-अलग धर्मों के बीच तनाव भी झेल रहा है, और हिन्दू धर्म के भीतर की अलग-अलग जातियां भी समय-समय पर एक-दूसरे से टकरा रही हैं। ओबीसी के भीतर भी अलग-अलग जातियों के बीच राजनीतिक खींचतान, और तनातनी बड़ी आम बात है। ऐसे में हिन्दू समाज जैसी कोई चीज नहीं है, और हिन्दुओं के बीच कई तरह की जातियां, और उनके भीतर की उपजातियों में टकराव की नौबत कई जगह आती है। आदिवासी से ईसाई बनने का बवाल खासकर बस्तर में अधिक चल रहा है, लेकिन अब तो पूरे प्रदेश के शहरी इलाकों में भी हर इतवार किसी न किसी जगह ईसाई परिवार में चल रही प्रार्थना को लेकर धर्मांतरण के आरोप लगाकर बजरंग दल जैसे संगठन वहां पहुंचकर कानून अपने हाथ में ले रहे हैं, और फिर पुलिस मानो उनकी मदद के लिए वहां पहुंच रही हैं। इससे परे एक नया घटनाक्रम अगर लोगों के ध्यान में नहीं आया है, तो उसे भी देखने की जरूरत है। भीम आर्मी नाम का संगठन जो कि हिन्दुत्ववादी संगठनों से परे मोटेतौर पर दलितों के बीच काम करता है, उसने अभी सामने आकर कुछ जगहों पर ईसाईयों पर हमलों का विरोध किया है, और ईसाईयों के साथ एकजुटता दिखाई है। पिछले ही इतवार को एक जगह भीम आर्मी के लोग लाठियां लेकर ईसाई परिवार के घर के बाहर और छत पर हिफाजत देने के लिए खुद तैनात हो गए थे कि ईसाई प्रार्थना का विरोध करने आने वाले लोगों से वे निपटेंगे। इस नौबत को समझने की जरूरत है कि धर्मांतरण के आरोप लगाते हुए कुछ संगठन कानून अपने हाथ में ले रहे हैं, और पुलिस की मौजूदगी में भी ईसाई प्रार्थना सभा के लोगों को मार रहे हैं। इसके साथ-साथ पुलिस उस ईसाई परिवार के, और उस घर में मौजूद लोगों के खिलाफ हिन्दू धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के जुर्म दर्ज कर रही है, और धर्मांतरण के भी। अगर आमतौर पर अनुसूचित जाति समाज के लोगों के बीच से आने वाले भीम आर्मी के लोग अगर ईसाई लोगों के साथ खुद होकर इस तरह खड़े हो रहे हैं, तो ऐसे सामाजिक नवध्रुवीकरण के खतरों को भी राज्य की राजनीतिक ताकतों को समझना चाहिए। एक-एक जानवर और लाउडस्पीकर पर खुद होकर संज्ञान लेने वाला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पता नहीं हर इतवार अब नियमित हो चली इस हिंसा को क्यों नहीं देख पा रहा है। आज जब प्रदेश में कुछ संगठन कानून को हाथ में लेने के अधिकारप्राप्त हैं, कुछ दूसरे संगठन इसके खिलाफ लाठियां लेकर मौके पर तैनात हो रहे हैं, तो ऐसे में अगर सरकार और राज्य की पुलिस अपनी न्यूनतम संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगी, तो कानून व्यवस्था की रस्सी जब हाथ से फिसलना तेज हो जाती है, तो फिर उसे थामना किसी के बस में नहीं रहता।

राज्य को अपनी इस बुनियादी जिम्मेदारी को नहीं भूलना चाहिए कि वह कानून लागू करने के अधिकार को आउटसोर्स नहीं कर सकता। सरकार भला किसी धार्मिक, धर्मांध, या साम्प्रदायिक संगठन को रेलवे स्टेशन पर ईसाई ननों के साथ हिंसा करने की जिम्मेदारी कैसे दे सकती है, और कुछ हफ्ते पहले दुर्ग में यही हुआ है, और इसके खिलाफ केरल भाजपा के अध्यक्ष, भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने वहां से छत्तीसगढ़ आकर इसका विरोध किया, और ननों की जमानत का इंतजाम किया। लेकिन ईसाईयों के जिन मामलों में केरल की ननें शामिल नहीं हैं, उन छत्तीसगढ़ी ईसाईयों को हिंसा और हमलों से कौन बचाएगा? आज तो छत्तीसगढ़ में पुलिस ऐसी घटनाओं के वक्त बजरंग दल के एक प्रकोष्ठ की तरह कार्रवाई करते दिख रही है, और यह नौबत न सिर्फ ईसाईयों से जुड़े मामलों के बेकाबू करेगी, बल्कि इससे पैदा अराजकता कदम-कदम पर राज्य की कानून व्यवस्था के लिए खतरा बनेगी। अराजकता की आग को सुलगने की छूट दी जा सकती है, उसे सुलगाया जा सकता है, लेकिन फिर वह जंगल की आग की तरह फैलती है, और उसे काबू करना किसी के बस में नहीं रहता। इतवार की प्रार्थना सभाओं पर होने वाले हमलों को अगर सरकार की मौन स्वीकृति मिली है, तो इस अराजकता का विस्तार कवर्धा में आदिवासी प्रदर्शन तक, और बेमेतरा में सतनामी प्रदर्शन तक हो रहा है। भारत जैसे जटिल सामाजिक ताने-बाने में ऐसा नहीं हो सकता कि किसी जात या धरम के खिलाफ चुनिंदा तनाव किया जाए, और बाकी समाज उससे कुछ भी न सीखे। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से किसी चिंगारी को कहीं से भी चारों तरफ फैलाया जा सकता है। आज हर दिन किसी जात या धरम के खिलाफ लिखा जा रहा है। ऐसे में अगर पुलिस अपने चुनिंदा रूख को जारी रखेगी, तो इससे राज्य में कानून व्यवस्था चौपट होगी, इस खतरे को शायद कई लोग समझ नहीं पा रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितंबर 2025



 

संस्कृतियों और सभ्यताओं के टकराव के नतीजे...

26 सितंबर 2025 

 

दुनिया के गोले पर अलग-अलग इलाकों की संस्कृतियां अलग-अलग हैं। संस्कृतियों के अलावा कुदरत के मुताबिक इन इलाकों की संपन्नता, विपन्नता, या इनकी जिंदगी के दूसरे हाल-बेहाल भी अलग-अलग हैं। योरप जैसे इलाके में आने वाले दर्जनों देशों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वे हमेशा से अफ्रीका जैसे सूखे और अकाल के शिकार देशों के मुकाबले बेहतर हालत में रहते हैं। अभी हम दुनिया के इतिहास में अधिक गहराई और खुलासे से जाना नहीं चाहते, लेकिन जिन इलाकों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने अधिक तरक्की की, औद्योगीकरण यहां बढ़ा, और यहां आर्थिक सफलता भी अधिक रही। दूसरी तरफ खाड़ी के कुछ ऐसे देश रहे जो जमीन के नीचे पेट्रोलियम भंडारों की वजह से दुनिया में अनुपातहीन तरीके से अधिक संपन्न रहे। अब इसके अलावा धर्म भी एक बड़ा मुद्दा रहा, खाड़ी के देशों सहित कुछ अफ्रीकी देशों में इस्लाम का बड़ा प्रचार रहा, और योरप सहित बहुत से इलाके ईसाइयत के प्रभाव वाले रहे। भारत और नेपाल दो ही देश हिन्दू धर्म के प्रभाव में रहे, और संख्या में इनसे कई गुना अधिक देश बौद्ध धर्मावलंबी रहे।

इस लंबी पृष्ठभूमि के बाद हम असल मुद्दे पर आना चाहते हैं कि मध्य-पूर्व और खाड़ी के देशों से गृहयुद्ध और जंग की वजह से बड़ी संख्या में शरणार्थी योरप के देशों में पहुंचे। इनके अलावा अफ्रीकी देशों से भी शरणार्थी योरप में घुसते ही हैं क्योंकि जान की बाजी लगाकर भी वे एक बेहतर जिंदगी चाहते हैं। योरप के कई देश बांहें फैलाकर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को अपने यहां बसाते रहे हैं, लेकिन हाल के बरसों में वहां माहौल कुछ बदल गया है। एक तो मुस्लिम शरणार्थियों के धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर, उनके पोशाक जैसे सामाजिक मुद्दों को लेकर योरप के बहुत से देशों के स्थानीय लोगों में एक बेचैनी चली आ रही थी। और उसका नतीजा फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, और इटली जैसे कई देशों में शरणार्थी, और प्रवासी विरोधी दक्षिणपंथी पार्टियों के उभार के रूप में सामने आया है। अब शरणार्थियों, जो कि मोटेतौर पर मुस्लिम हैं, उनके खिलाफ स्थानीयता का दावा करने वाले तबकों में एक प्रतिरोध विकसित होते चले गया, और यह महज रोजगार और आर्थिक अवसरों के टकराव तक सीमित नहीं रहा, यह बढ़ते-बढ़ते संस्कृतियों और सभ्यता के टकराव तक चले गया है। ये टकराव बहुत से देशों के चुनावों को इस तरह प्रभावित कर रहे हैं, जैसा कि इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। योरप से परे इजराइल तक में आज वहां की सरकार में एक ऐसी संकीर्णतावादी पार्टी गठबंधन की भागीदार है, जितनी संकीर्णता इजराइल की सरकार में पहले कभी नहीं थी। जब राष्ट्रीयता का उभार उन्माद तक पहुंच जाता है, तब अपने देश के बहुसंख्यक धर्म से परे के धर्मों को दुश्मन के पुतले की तरह खड़ा कर देना बड़ा आसान रहता है, और योरप के कई देशों में अभी लगातार यही चल रहा है। फिर मानो स्थानीय लोगों का प्रतिरोध काफी नहीं था, बाहर से पहुंचे हुए लोगों ने अपनी संस्कृति को लेकर जो कट्टरता जारी रखी, और योरप के उदार, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष माहौल में घुलने-मिलने से परहेज किया, उसने भी स्थानीयता के समर्थकों को प्रवासियों और शरणार्थियों के खिलाफ कर दिया। आज योरप के आधा दर्जन ऐसे देशों में वहां की उदारवादी पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो रहा है क्योंकि वे नस्लवादी, दक्षिणपंथी, और प्रवासी विरोधी पार्टियों के धार्मिक उन्माद की धार का मुकाबला नहीं कर पा रही हैं।

भारत में भी कई तरह के चुनावी-राजनीतिक कारणों से, धार्मिक और साम्प्रदायिक वजहों से अड़ोस-पड़ोस के देशों से आकर वैध-अवैध तरीके से बसे हुए बांग्लादेशी मुस्लिमों, और म्यांमार के मुस्लिम रोहिंग्या लोगों के खिलाफ भावना एक बड़ा चुनावी-राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। विदेशी और घुसपैठिया होना उसका एक पहलू है, और उसका दूसरा पहलू स्थानीय बहुसंख्यक हिन्दू समाज के मुकाबले इन दोनों देशों से आए घुसपैठिया या शरणार्थियों का मुस्लिम होना भी है। जिस तरह योरप के देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों का इस मुद्दे पर बड़ा उभार हुआ है, और करीब आधा दर्जन देशों में चुनावी नतीजों में उन्हें बड़ी कामयाबी मिली है, कुछ उसी किस्म का माहौल हिन्दुस्तान में भी बना हुआ है, और भाजपा की असाधारण चुनावी कामयाबी के पीछे ऐसे ध्रुवीकरण का योगदान भी गिना जाता है।

अब हम योरप की बात पर फिर लौटें, तो वहां ईसाई संस्कृति, और मुस्लिम संस्कृति के बीच सामाजिक और धार्मिक टकराव एक बड़ी वजह रही है, और दुनिया में अलग-अलग कई जगहों पर आतंकी घटनाओं में कुछ मुस्लिम संगठनों का घोषित रूप से शामिल होना भी संस्कृतियों के इस टकराव में एक बड़ा मुद्दा रहा है। आज अगर हम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में उदारवादी तबके की रहमदिली से शरणार्थियों को मिली जगह के बारे में सोचें, तो कुछ गिने-चुने इस्लामी-आतंकी संगठनों के पश्चिम के देशों में किए गए आतंकी-हमलों की वजह से हर मुस्लिम की साख इन देशों में शक के दायरे में आई है, और इस नौबत को सुधारने का कोई आसान तरीका किसी के पास नहीं है। भारत में ऐसी घटनाएं तो अधिक नहीं हुई हैं, फिर भी एक नारा सा चला हुआ है कि हर मुस्लिम चाहे आतंकी न हो, हर आतंकी मुस्लिम क्यों होता है? यह बात तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह सही न हो, लेकिन जनधारणा में खपत के लिए यह बात मजबूत तरीके से लोगों के बीच बैठी हुई है।

हम योरप और हिन्दुस्तान के दो बिल्कुल ही अलग-अलग नौबतों वाले मॉडलों की चर्चा एक साथ इसलिए कर रहे हैं कि दुनिया के देशों को, अलग-अलग संस्कृतियों और सभ्यताओं को, एक-दूसरे से सीखना चाहिए। आज जो नुकसान शरणार्थियों का योरप में हो रहा है, उसी तरह का नुकसान हिन्दुस्तान में भी हो रहा है। इन दोनों ही जगहों पर अनुदारवादी राजनीति का उभार हो रहा है, उसे अभूतपूर्व सफलता मिल रही है। ऐसे में जिस धर्म, और राष्ट्रीयता के लोगों को अपनी जमीन छोडक़र दूसरी जगह जाकर रहना-खाना है, उन्हें अपनी धार्मिक-संस्कृति के बारे में भी सोचना चाहिए, और उस दूसरी जमीन की लोकतांत्रिक-सभ्यता के बारे में भी। कुछ लोगों का हाल के महीनों में यह भी मानना है कि पश्चिम के देशों में भारतीयों पर कई जगह हमले इसलिए हो रहे हैं कि वहां पर वैध-अवैध तरीके से गए और बसे हुए भारतीय वहां की स्थानीय संस्कृति और सभ्यता में घुलने-मिलने के बजाय अपनी अलग पहचान कायम रखने को गौरव की बात मान रहे हैं। अपनी जड़ों पर गौरव तो ठीक है, लेकिन पेड़ के पत्ते जिस हवा में लहलहा रहे हैं, उस हवा के साथ घुल-मिलकर रहना भी उतना ही जरूरी होता है। शायद इसीलिए बड़े बुजुर्ग यह कह गए थे- जैसा देस, वैसा भेस। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

यह चर्चा अप्रिय है, सोच-समझकर पढ़ें...

25 सितंबर 2025 

 

पिछले पखवाड़े जबसे यह घोषणा हुई थी कि बहुत से सामानों में जीएसटी घटेगा, तब से बाजार में सनसनी फैली हुई थी कि नवरात्रि के वक्त सरकार की तरफ से मिलने वाली यह रियायत बाजार को एक नया उत्साह देगी। ऐसा अंदाज है कि चीजों पर औसतन 7 फीसदी जीएसटी घटा है, और बाजार के जानकार बताते हैं कि लोग तो यह तय कर चुके रहते हैं कि किस त्यौहार पर उन्हें कितना खर्च करना है, इसलिए उतनी ही रकम से बाजार में खरीदी-बिक्री 7 फीसदी बढ़ जाने का भी एक अंदाज है। अर्थशास्त्री सोचते हैं कि इससे अर्थव्यवस्था का चक्का 7 फीसदी अतिरिक्त घूमेगा। फिर केंद्र और भाजपा की राज्य सरकारों ने इस रियायत को एक उत्सव की तरह मनाना तय किया है। भाजपा और उसके नेता औपचारिक रूप से इसे एक बचत उत्सव के रूप में मना रहे हैं।

 आज बाजार में जब उत्साह का सैलाब आया हुआ दिख रहा है, और चर्चाएं इसे और आगे बढ़ा रही हैं, तो ग्राहक का अपनी क्षमता से बाहर जाकर खर्च करना एक स्वाभाविक बात होगी। सभी तरह के ऑटोमोबाइल पर बड़ी कटौती दिख रही है, और जो लोग अभी तक कोई दुपहिया या चौपहिया लेने के सपने महज इसलिए देखते रह जाते थे कि उनके पास दस-बीस फीसदी रकम कम पड़ती थी, वे अब एक बार कड़ा फैसला लेकर अपनी पसंद की कोई गाड़ी ले सकते हैं, क्योंकि घटी हुई जीएसटी से गाडिय़ों के दाम खासे कम हुए हैं। इसी तरह बाकी तमाम सामान के लिए भी बाजार रियायतें भी प्रचारित कर रहा है, और फाइनेंस कंपनियां भी लोगों को तथाकथित जीरो फाइनेंस पर लोन देने के लिए माला लेकर खड़ी हुई हैं। नवरात्रि के पहले दिन के कारों के उठाव के आंकड़े बताते हैं कि टाटा की 10 हजार, हुंडई की 11 हजार, और मारूति की 30 हजार गाडिय़ां एक दिन में उठी हैं। लोगों को याद होगा कि देश के हर शहर में कार डीलरों ने बड़े-बड़े मैदानों को किराए पर लेकर वहां कारों का खुला गोदाम बना रखा था क्योंकि कार फैक्ट्रियों के अहातों में कार रखने की जगह नहीं बची थी। अब ऐसा लगता है कि यह पूरा स्टॉक दीवाली तक लोगों के घरों में पहुंच जाएगा। शहरी सडक़ों पर त्यौहारी ट्रैफिक जाम में हजारों नई गाडिय़ों का जाम और जुड़ जाएगा।
 
उत्सव और उत्साह के इस माहौल में ग्राहक को अपना दिमाग, और अपना दिल भी, अपनी जगह पर मजबूती से जमाए रखना चाहिए। सपने तो पूरे परिवार के बहुत से होते हैं, लेकिन भारत के एक फीसदी से भी कम परिवार ऐसे हैं जो अपने हर सपने पूरे कर सकते हैं, या फिर यह भी हो सकता है कि उनके और बहुत से ऐसे सपने हों जिनका हमें अंदाज न लगता हो। ऐसे माहौल में लोग अपनी क्षमता से बाहर जाकर खरीददारी कर सकते हैं, और बाद में उसकी किस्तें पटाते हुए, उनकी क्षमता चुक सकती है। आज आसान फाइनेंस, और कुछ मध्यमवर्गीय लोगों के पास के क्रेडिट कार्ड की वजह से लोग अंधाधुंध खरीददारी की कगार पर खड़े हैं। सामान खरीदते हुए यह अंदाज नहीं लगता कि हर बरस गाडिय़ों के बीमे पर कितना पैसा लगता है, सर्विसिंग पर कितना पैसा लगता है, और पेट्रोल-डीजल पर तो लगता ही है जिसमें कि जीएसटी की कोई कटौती नहीं हुई है। मध्यम वर्ग के दिल-दिमाग में सपने उफनते रहते हैं, लेकिन उसके दिमाग की उंगलियां कैलकुलेटर पर नहीं चलतीं। नतीजा यह होता है कि एक बार की खरीदी के बाद के खर्च उसे नए चमचमाते सामानों की चमक में नहीं दिखते। वैसे भी हिन्दुस्तानी लोग मकान बनाते हुए, शादियां करते हुए, और साल के सबसे बड़े त्यौहार की खरीददारी करते हुए दिमाग का इस्तेमाल कम ही करते हैं। तर्क यह रहता है कि मकान तो जिंदगी में एक ही बार बनता है, शादी बार-बार तो होती नहीं, और त्यौहार तो साल का सबसे बड़ा त्यौहार है।

मध्यम वर्ग को कोई सामान खरीदते हुए सबसे पहले तो यह सोचना चाहिए कि आज कमाई का जो जरिया है, जो नौकरी है, कल अगर वह नहीं रह गई, तो इन चीजों का भुगतान कैसे होगा? फिर मध्यमवर्ग अपनी बचत के आखिरी सिक्के तक को कई बार ऐसे खर्च में झोंक देता है, भुगतान की अपनी ताकत से बाहर जाकर कर्ज ले लेता है, और यह सबकुछ करते हुए वह मानकर चलता है कि आज जितनी कमाई तो जारी रहेगी ही। लेकिन आज छोटी-बड़ी कई किस्म की नौकरियों में लोगों को निकाला जाता है। एआई की मेहरबानी से पत्रकारों से लेकर अनुवादकों तक, टाइपिस्ट से लेकर लेखकों तक बहुत से लोगों की नौकरियां अब वैसे भी खत्म हो गई हैं। जहां लोगों को हटाया नहीं जा रहा, वहां भी नए लोगों को भर्ती नहीं किया जा रहा है। कब किसकी नौकरी चली जाए, किसका कारोबार ठप्प हो जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं है। एक अकेले ट्रम्प के हमले से हिन्दुस्तान में लाखों लोग बेरोजगार हो चुके हैं, और यह ठिकाना नहीं है कि बंद हो चुके कारखाने और कारोबार कभी शुरू हो पाएंगे या नहीं। ऐसे में नौकरी खोने वाले लोगों के पास उनके ताजा खरीदे हुए नए चमचमाते सामान अपनी बकाया किस्तों के साथ मुंह चिढ़ाते खड़े रहेंगे। फिर एक दूसरी नौबत भी सोचने की जरूरत है। आज के वक्त में तरह-तरह के हादसों में और बड़ी महंगी-महंगी बीमारियों के चलते लोगों के सिर पर कब आसमानी बिजली की तरह कोई खर्च आकर गिरता है, और वह चि_ी लिखकर नहीं आता। लोगों की ऐसी पारिवारिक जिम्मेदारियां पूरी करने की कुछ ताकत तो उन्हें बचाकर रखनी चाहिए क्योंकि हर वक्त कर्ज मिल जाए, यह भी जरूरी नहीं रहता। यह भी जरूरी नहीं रहता कि सिर पर गिरी आसमानी बिजली से नुकसान कितना होता है। आज तो महंगे इलाज और महंगी दवाईयां इस हद तक नजरों के सामने हैं कि लोगों को क्षमता से बाहर जाकर भी इलाज के बारे में सोचना तो पड़ता है।

आज की बात जीएसटी-किफायत उत्सव, और त्यौहार के माहौल में लोगों को कुछ उदासी की लग सकती है, लेकिन बचत और मुसीबत की सावधानी उसी वक्त तो सुझाई जा सकती है जब लोग फिजूलखर्ची करने की खतरनाक कगार पर खड़े हुए हों। भारत के इस हिस्से में नवरात्रि से लेकर दीवाली तक ही सबसे अधिक खर्च हो जाता है, और आज अगर लोग संभलकर, सोचकर खर्च नहीं करेंगे, तो बहुत से लोग आगे चलकर परेशानी में फंसेंगे। लोगों को खर्च का उत्साह देने वाले आज बहुत से लोग हैं, पूरा बाजार है, पूरी सरकार है, लेकिन लोगों को उनके जीवन की असली आशंकाओं की याद दिलाना भी किसी की जिम्मेदारी होनी चाहिए, और इसीलिए हम यह पूरी तरह से अप्रिय चर्चा यहां पर कर रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 सितंबर 2025

(Daily Chhattisgarh)


 

बद से शुरू होने वाली गालियों की पूरी फेहरिस्त बयान कर सकती है ट्रंप...

 24 सितंबर 2025 

 

दुनिया में किसी को बेदिमाग कहना भी उसका एक किस्म से अपमान होता है, क्योंकि दिमाग तो सबके पास रहता है, फिर भी जिनमें बुद्धि की बड़ी कमी दिखती है, उन्हें बोलचाल में बेदिमाग कह दिया जाता है। फिर जो अपनी बुद्धि का बेजा इस्तेमाल ही करते हैं, उन्हें बददिमाग कह दिया जाता है। इससे परे कुछ लोग जो सनक में आकर कोई भी उटपटांग बात करते हैं, गलत-सलत फैसला ले लेते हैं, उन्हें सनकी कहा जाता है। ऐसे करीब डेढ़ सौ अलग-अलग विशेषणों को जोडक़र ही ट्रंप का परिचय दिया जा सकता है। कहने के लिए यह आदमी दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सबसे ताकतवर ओहदे पर बैठा है, लेकिन यह पूरी तरह से तानाशाह हो चुका है, और इसने सबसे पहले तो अमरीकी लोकतंत्र को हरा दिया है। डोनल्ड ट्रंप ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव को हारने के बाद जिस कबीलाई अंदाज में अपने समर्थकों को अमरीकी संसद पर हमला करने के लिए भडक़ाया था, उसके मामले-मुकदमे तो अमरीकी अदालतों में चल ही रहे हैं। इस आदमी की बदचलनी के मुकदमे भी अदालत में साबित हो चुके हैं, और यह बहुत ही उटपटांग किस्म का लोकतंत्र है कि ट्रंप के कुसूरवार साबित होने के बावजूद उसे कोई सजा नहीं हुई है। वह टैक्स चोरी के मामलों से घिरा हुआ है, बदजुबानी की उसकी मिसालें तरह-तरह की रिकॉर्डिंग में घूमती ही रहती हैं। आज की दुनिया में बद से शुरू होने वाले सबसे अधिक शब्द अगर किसी एक आदमी (इंसान लिखने से हम परहेज कर रहे हैं क्योंकि उसके साथ कुछ किस्म के मानवीय गुणों के जुड़े होने की उम्मीद जुड़ी रहती है) पर लागू होते हैं, तो वह डोनल्ड ट्रंप हैं। आप इंटरनेट, या एआई पर बद से शुरू होने वाले शब्दों को ढूंढें, तो उस फेहरिस्त से आपको ट्रंप की पूरी तस्वीर मिल पाएगी।

फिलहाल पिछले दो दिनों में इस कमीने इंसान ने कई किस्म की घटिया बातें कही हैं। अमरीका में नफरत फैलाने वाले एक संकीर्णतावादी प्रचारक, के कत्ल को उसने बिना किसी बुनियाद के अपने विरोधियों से जोडक़र उनको कातिल साबित करने की कोशिश की है। लेकिन यह तो कम घटिया हरकत थी, कल जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप को 15 मिनट बोलने का मौका मिला, तो उसने 56 मिनट से अधिक बकवास की। पूरी तरह से बेमौके, बेबुनियाद आरोप लगाते हुए उसने दुनिया के तमाम देशों की मौजूदगी में ब्रिटेन की राजधानी लंदन के मुस्लिम मेयर सादिक खान पर हमला किया। एक ब्रिटिश शहर के मेयर से दुनिया के तमाम देशों का क्या लेना-देना था? लेकिन ट्रंप अपनी नफरत और अपनी हमलावर जुबान का यह कातिल मेल मानो डॉक्टरी सलाह पर दिन में चार बार अपने मुंह से निकालता है, और राजनीतिक विश्लेषक हर दिन यह सोचते रह जाते हैं कि इन चारों में से सबसे अधिक घटिया कौन सी बात थी। ट्रंप ने योरप में प्रवासियों के संकट पर कहा- मैं लंदन को देखता हूं जहां एक बेहद खराब मेयर है, एक बहुत ही खराब मेयर। वे लंदन को शरिया कानून की ओर ले जाना चाहता है और वह एक अलग देश बन गया है।

अभी पिछले हफ्ते ट्रंप ब्रिटेन के दौरे पर था, और उसने सार्वजनिक रूप से कहा था कि लंदन का मेयर सादिक खान दुनिया के सबसे खराब मेयर में से है, और मैंने उनसे वहां मेरे स्वागत में न आने के लिए कहा है। मुझे लगता है कि वे आना चाहते थे लेकिन मैं नहीं चाहता कि वे आएं। सादिक खान लंदन के पहले मुस्लिम मेयर हैं, और उनके ऑफिस में ट्रंप के शरिया कानून वाले बयान के जवाब में कहा है- हम उनके (ट्रंप के) नफरत से भरे और दकियानूसी सोच वाले बयानों को जवाब देकर अहमियत देना नहीं चाहते। लंदन दुनिया का सबसे बेहतरीन शहर है जो प्रमुख अमरीकी शहरों की तुलना में अधिक सुरक्षित है। हमें खुशी है कि अमरीकी नागरिक रिकॉर्ड संख्या में लंदन में बसने आ रहे हैं। ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने सोशल मीडिया पर लिखा- सादिक खान लंदन में शरिया कानून लागू करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वे ऐसे मेयर हैं जो (समलैंगिकों, और एलजीबीटीक्यू की) प्राइड मार्च में शामिल होते हैं, जो अलग-अलग पृष्ठभूमि और विचारों के लिए खड़े होते हैं, जो हमारे शहर को बेहतर बना रहे हैं, और हमें गर्व है कि वे हमारे मेयर हैं।

किसी देश की राजधानी में पहुंचने वाला दूसरे देश का राष्ट्रपति उस राजधानी के मेयर को लेकर इस तरह की घटिया और गंदी, नफरती और हिंसक बातें करे, और खुलकर यह कहे कि वह नहीं चाहता कि (उस शहर का प्रथम नागरिक) मेयर उसके स्वागत भोज में आए। पिछली आधी सदी की हमारी अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ और याददाश्त में ऐसा घटिया और कोई बयान दुनिया के किसी तानाशाह ने भी नहीं दिया, लेकिन गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स को इस गंदे आदमी का कार्यकाल पूरा होने पर यह तय करने के लिए एआई की मदद लेनी होगी कि उसका सबसे घटिया बयान कौन सा था।

लेकिन दूसरे देशों के साथ ट्रंप जो कर रहा है, वह उसके अपने देश के साथ कुछ अधिक हद तक हो रहा है। हम किसी टोने-टोटके पर भरोसा नहीं करते, लेकिन यह मानते हैं कि लोगों के अच्छे और बुरे काम लौटकर उनके पास जरूर आते हैं, चक्रवृद्धि ब्याज सहित। अमरीकी वोटरों ने जिस तरह इस घटिया आदमी को चुना था, उसके दाम आज हर अमरीकी चुका रहे हैं। अमरीका में लोकतंत्र को तबाह करके ऐसा बना दिया गया है जैसाकि वह फिलिस्तीन के गाजा की इमारतें हों। लोकतंत्र के इस मलबे पर खड़े रहकर यह बददिमाग आदमी (इंसान लिखना ठीक नहीं है) जिस तरह अमरीका की हर परंपरा को खत्म कर रहा है, वहां की अर्थव्यवस्था को खत्म कर रहा है, दुनिया भर में अमरीका के पिछली आधी सदी में कमाए गए दोस्तों को खत्म कर रहा है, अमरीकी साख को खत्म कर चुका है, दुनिया में सामाजिक सरोकार की अपनी जिम्मेदारी को इस माफियानुमा कारोबारी ने गटर में बहा दिया है, इन सब बातों को देखकर लगता है कि गाजा में आधे लाख से अधिक जो बेकसूर औरत-बच्चे इजराइली हमलों में, अमरीकी बमों से मारे गए हैं, उन सबकी सामूहिक बद्दुआ अमरीका को लग रही है, और अमरीका आज अपने इतिहास के सबसे अस्थिर दौर से गुजर रहा है, तबाही की तरफ बढ़ रहा है। जहां तक भारत के लिए ट्रंप के रुख की बात है, तो यह आदमी अब तक 35-40 बार यह झूठ बोल चुका है कि उसने भारत और पाकिस्तान के बीच जंग रुकवाई है। ये दोनों ही देश इस बात का खंडन कर चुके हैं, लेकिन बेशर्म ट्रंप की जुबान बंद होने का नाम नहीं लेती है, और इस झूठ के सहारे वह नोबल शांति पुरस्कार की सीढ़ी चढऩे की कोशिश कर रहा है, खुलकर कई बार यह बोल चुका है कि वह यह पुरस्कार चाहता है। अमरीकी इतिहास का यह सबसे घटिया राष्ट्रपति जिस अंदाज में हर दिन हजार-पांच सौ बेकसूर फिलिस्तीनियों का कत्ल करवा रहा है, उसके बाद भी उसे नोबल शांति पुरस्कार पाने की हसरत है, यह बात हैरान करती है।

कल ट्रंप ने अमरीका के भीतर यह दावा किया कि जो बहुत ही आम दर्द निवारक दवा पैरासिटामॉल है, उसके गर्भवती महिलाओं के इस्तेमाल से उनके होने वाले बच्चों को एक गंभीर बीमारी, ऑटिज्म का खतरा रहता है। कल के कल विश्व स्वास्थ्य संगठन, अमरीकी डॉक्टरों के एसोसिएशन, और भारतीय डॉक्टरों ने कहा है कि यह सबसे सुरक्षित दवा है, और ट्रंप एक पूरी तरह से अवैजानिक बात कह रहे हैं। घर-घर में इस्तेमाल होने वाली इस दवा को लेकर दहशत फैलाने का ट्रंप का यही गैरजिम्मेदारी का अंदाज कोरोना वैक्सीन के समय भी था, और ट्रंप समर्थकों में से बहुत से लोग वैक्सीन के खिलाफ अभियान चला रहे थे। इस आदमी की गैरजिम्मेदार सोच की एक बड़ी मिसाल यह है कि कोरोना वैक्सीन के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाने वाले रॉबर्ट कैनेडी जूनियर को ट्रंप ने अपना स्वास्थ्य मंत्री बनाया है। जो व्यक्ति कोरोना के दौर में अमरीकियों की सेहत पर अपनी गैरजिम्मेदार बयानबाजी से सबसे बड़ा खतरा खड़ा कर चुका था, वह ट्रंप का स्वास्थ्य मंत्री है।

कुल मिलाकर इस आदमी के बारे में लिखना न चाहते हुए भी हर कुछ दिनों में इसके इतने सारे हिंसक बयान इक_े हो जाते हैं कि उन पर लिखना पड़ता है। आज दुनिया के समझदार देश, और उन देशों के समझदार नेता बदजुबान ट्रंप के साथ किसी तरह की मुंहजोरी में नहीं उलझ रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि यह बद्तमीज कब क्या बैठेगा इसका ठिकाना नहीं है। दुनिया का यह गब्बर रामगढ़ नाम की दुनिया में कब किसे क्या कहेगा, किसके सिर में गोलियां उतार देगा, इसका ठिकाना तो है नहीं, यह कहते हुए हम गब्बर नाम का किरदार गढऩे वाले सलीम-जावेद से माफी भी चाहते हैं।

अभी ट्रंप के कार्यकाल को करीब साढ़े तीन बरस बचे हैं, दुनिया में इस ट्रंपकालीन अमरीका के खिलाफ तरह-तरह के छोटे-बड़े समूह बनने जरूरी हैं ताकि अमरीकी गुंडागर्दी का ठीक से जवाब दिया जा सके। भारत के चीन और रूस दोनों के साथ तालमेल के बाद ट्रंप का मिजाज कभी जमीन पर आ टिकता है तो कभी उसकी बददिमागी आसमान पर पहुंच जाती है। भारत, सहित दुनिया के तमाम देशों को इस अस्थिर दिमाग वाले मवाली से दूर और सावधान रहना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

गाडिय़ों पर जात-धरम की नुमाइश पर जुर्माना तो करें

23 सितंबर 2025 

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को देखते हुए उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने अभी एक आदेश निकाला है जो कि जाति व्यवस्था से लदे हुए उत्तरप्रदेश के लिए बड़ी अटपटी बात होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी 16 सितंबर को यह निर्देश दिया है कि सडक़ों पर चलने वाली किसी गाड़ी पर जाति के नाम, नारे, या स्टिकर नहीं होने चाहिए। किसी भी तरह से गाड़ी चलाने वाले या मालिक की जाति की नुमाइश नहीं होनी चाहिए। अदालत ने कहा है कि ऐसे किसी भी जाति प्रदर्शन पर मोटर व्हिकल एक्ट के तहत कार्रवाई की जाए। इसके अलावा हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस के दस्तावेजों में, किसी नोटिस में, जब तक जाति का उल्लेख कानूनी रूप से जरूरी न हो, (जैसे एसटी-एससी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जाति के आधार पर अलग कानून से कार्रवाई होती है) तब तक किसी की जाति का उल्लेख न किया जाए। अब यूपी सरकार ने पुलिस और अदालती रिकॉर्ड से जाति का कॉलम हटाने का आदेश निकाला है, और गाडिय़ों पर किसी भी जाति का जिक्र होने पर जुर्माना हो सकता है। सरकार ने यह भी कहा है कि सोशल मीडिया पर जाति गौरव, या जातियों के बीच मनमुटाव बढ़ाने वाले कंटेंट पर निगरानी की जाए, और कार्रवाई की जाए। यूपी सरकार ने तो यह भी कहा है कि पूरे राज्य में जाति आधारित रैलियों, और राजनीतिक आयोजनों पर रोक लगाई जा रही है। देश के मोटरवाहन अधिनियम में वाहनों पर जाति या धर्म से संबंधित कोई भी स्टिकर लगाना गैरकानूनी है, इसमें पांच सौ रूपए से लेकर पांच हजार रूपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। पिछले बरस 13 सितंबर के यूपी हाईकोर्ट के आदेश में धर्म संबंधी स्टिकर पर भी कार्रवाई करने की बात की गई थी, और कहा गया था कि सरकार जाति-धर्म से जुड़े सभी स्टिकर, बोर्ड, झंडे तुरंत हटवाए, और चालान करने के अलावा जरूरत होने पर गाड़ी जब्त भी की जाए।

अब यह मामला तो इलाहाबाद हाईकोर्ट और यूपी सरकार का है, लेकिन मोटरवाहन अधिनियम तो पूरे देश पर एक सरीखा लागू है। उसी के प्रावधानों को अदालत ने कड़ाई से लागू करने के लिए कहा है। इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्याय क्षेत्र से बाहर भी बाकी देश में भी इस पर अमल होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अलग मामलों में इसी तरह के आदेश दिए हैं कि गाडिय़ों पर जाति-धर्म, राजनीतिक पार्टी, या निजी पहचान के चिन्ह लगाना कानून गलत है। दिल्ली पुलिस ने 2022 में एक अभियान चलाकर जात-धरम के स्टिकर हटवाए थे। मध्यप्रदेश में 2023 में हाईकोर्ट के आदेश पर ऐसी ही कार्रवाई हुई थी। राजस्थान में 2022 में ऐसा किया गया था। हरियाणा और पंजाब में 2021-22 से पुलिस ऐसी कार्रवाई कर रही है, वहां हाईकोर्ट ने कहा था कि ऐसे स्टिकर जातिवाद और हिंसा को बढ़ावा देते हैं। इस तरह यह बात साफ है कि मोटरवाहन अधिनियम से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों तक बार-बार यह बात सामने आई है कि गाडिय़ों पर जात-धरम की नुमाइश करना गैरकानूनी है, और जुर्माने से लेकर गाड़ी जब्ती तक कई तरह की कार्रवाई की जा सकती है। 

अब हम जमीनी हकीकत पर आएं, तो न सिर्फ निजी गाडिय़ों पर, बल्कि सरकारी गाडिय़ों पर भी जात-धरम की नुमाइश धड़ल्ले से चलती है। मुस्लिमों के बीच जो शुभ संख्या मानी जाती है, वह 786 ऐसी बहुत सी सरकारी गाडिय़ों में नंबर प्लेट पर दिखती है जिन्हें सत्तारूढ़ नेता या अफसर अपने कार्यकाल में खरीदते हैं। अब यह धर्म से जुड़ा हुआ अंक जरूर है, लेकिन यह आरटीओ का दिया हुआ नंबर भी है। हो सकता है कि यह मामला मोटरवाहन अधिनियम, और अदालतों के आदेशों में न आए, लेकिन इस एक संख्या से लोगों को यह तो दिख ही जाता है कि यह किस धर्म के व्यक्ति की गाड़ी होने की संभावना है। लेकिन आरटीओ की दी हुई नंबर प्लेट से परे अगर देखें, तो उत्तर भारत के राज्यों में, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में दसियों लाख गाडिय़ां ऐसी हैं जिनमें जात और धर्म के स्टिकर लगे हैं, किसी धर्म के  आराध्य की तस्वीरों के स्टिकर लगे हैं, तरह-तरह के धार्मिक नारे लिखे हैं। बहुत सी गाडिय़ां तो हम अपने आसपास ही ऐसी देखते हैं जिनमें नंबर प्लेट की जगह ब्राम्हण, ठाकुर, कुर्मी, जैसी कई तरह की जातियां लिख दी जाती हैं। कई गाडिय़ां ऐसी रहती हैं जिनकी नंबर प्लेटों पर नंबर तो नहीं रहता, लेकिन सिक्ख धर्म का निशान लगाया हुआ रहता है। और तो और अब तो कुछ ऐसे नंबर हैं जिनके अंकों को नंबर प्लेट पर इस तरह तोड़-मरोडक़र लिखा जाता है कि वे अंक नहीं दिखते, राम दिखते हैं। जात और धरम की नुमाइश, किसी भी ताकतवर, या अर्जी-फर्जी संगठनों के असली-नकली पदनामों वाली तख्तियां गाडिय़ों पर लगा दी जाती हैं, और ऐसी कई तख्तियां तो नंबर प्लेट की जगह लगा दी जाती हैं। मानवाधिकार के नाम पर देश में ढेर सारे फर्जी संगठन बने हैं, और उनके नाम, पदनाम के जिक्र वाली ऐसी नंबर प्लेट गाडिय़ों पर लगा दी जाती हैं जिनके पीछे पुलिस विभाग के रंग का बैकग्राउंड भी रहता है। मतलब यह कि अपनी असली या नकली ताकत की नुमाइश का कोई भी मौका लोग नहीं छोड़ते हैं। 

हम तो दशकों से इस बात के खिलाफ लिखते चले आ रहे हंै, और देश का मोटरवाहन अधिनियम भी सरकारों पर यह जिम्मेदारी डालता है कि यह सिलसिला खत्म किया जाए, लेकिन निर्वाचित सरकारों के किसी भी जात, धरम, संगठन पर कार्रवाई करते हुए हाथ कांपने लगते हैं। बड़े-बड़े जात-धरम के झंडे गाडिय़ों पर लहराते रहते हैं, और सरकारों को इन्हें अनदेखा करना सहूलियत का काम लगता है। नतीजा यह होता है कि सडक़ों पर न सिर्फ आम जनता, बल्कि ट्रैफिक पुलिस भी ध्यान से यह देख लेती है कि ट्रैफिक-गुंडागर्दी करने वाले लोग किस जात-धरम के हैं, और उन्हें धरने पर उनके किस नेता का फोन तुरंत आ जाएगा। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट बहुत सारे मामलों में सक्रिय है, और सरकार को कटघरे में खड़े रखता है। यह मामला सामाजिक जीवन में जात, धरम, ओहदे जैसे भेदभाव को बढ़ाने वाला है, और छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट को भी देश के कानून को यहां कड़ाई से लागू करने के लिए राज्य सरकार से हलफनामा लेना चाहिए। जात और धरम का जहर इतना अधिक फैल चुका है कि उसकी नुमाइश उसे और फैलाती है। अदालती दखल के बिना सरकार कुछ भी नहीं करेगी।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)




 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितंबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

क्रिकेट को लेकर तनातनी, पहले से बढ़ाए उन्माद का नतीजा, अभी और खतरे

22 सितंबर 2025 

 

मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक कुछ पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाडिय़ों की तस्वीरें और उनके वीडियो छाए हुए हैं जिनमें वे भारत के साथ हुए क्रिकेट मैच के दौरान तरह-तरह के इशारों से भारत की खिल्ली उड़ाते दिख रहे थे। कभी वे बल्ले को बंदूक की तरह दिखा रहे थे, तो कभी हाथों से हवाई जहाज गिरा देने के इशारे कर रहे थे कि किस तरह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने भारत के आधा दर्जन लड़ाकू विमान गिराए हैं। इनके अलावा हाथों की कुछ हरकतें अश्लील भी मानी जा रही है। इस टूर्नामेंट में इसके पहले भी पहले मैच के बाद भारत के खिलाडिय़ों ने पाकिस्तान के खिलाडिय़ों से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया था जिसे खेलकूद की दुनिया में अशिष्टता माना जा रहा था। भारत में बहुत से तबकों की प्रतिक्रिया यह रही कि पहलगाम हमले के बाद और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान से जो तनातनी चल रही थी, पाकिस्तान पर भारत सरकार ने जो आरोप लगाए थे, उन्हें देखते हुए पाकिस्तान के साथ मैच खेलना ही नहीं था। भारत की नदियों से पाकिस्तान को जाने वाले पानी को लेकर भारत सरकार ने शुरू से कहा था  कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते। ऐसे में भारत में बहुत से लोगों का यह मानना था कि पाकिस्तान के साथ क्रिकेट क्यों खेला जाए?

भारत सरकार की तरफ से यह सफाई दी गई थी कि चूंकि यह टूर्नामेंट दो देशों के बीच का नहीं था, बल्कि यह कई देशों के बीच का था, इसलिए भारत का इसमें खेलने से मना करना मुमकिन नहीं था। इस सरकारी कथन के जवाब में लोगों ने दुनिया के इतिहास के बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय, और बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंटों की लिस्ट गिना दी थी कि कब और किस देश ने कौन से टूर्नामेंट का बहिष्कार किया था। लोगों ने इस बात के लिए भी आलोचना की थी कि क्रिकेट के साथ विज्ञापनों और स्पांसरशिप की कमाई जुड़ी रहती है, प्रसारण से भी कमाई होती है, इसलिए सिर्फ कमाई को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान से मैच का बहिष्कार नहीं किया गया। खैर, हम दो देशों के बीच के रिश्तों में गैरजरूरी बहिष्कार के खिलाफ रहते आए हैं, और भारत सरकार के कथन से सहमति या असहमति से परे हमारा यह मानना है कि सरहद पर चल रहे तनाव से खेलकूद, कला, संस्कृति, फिल्म, टेलीविजन, साहित्य को अलग भी रखा जा सकता है। हमने इस बात की भी वकालत की थी कि पाकिस्तान से बड़ी संख्या में जो जरूरतमंद लोग बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते हैं, उसे जारी रखा जाना चाहिए। आम लोगों की आवाजाही चलने देनी चाहिए। लेकिन दोनों देशों ने अपनी-अपनी जमीन पर जब नफरत के फतवे हवा में गूंजते हैं, तो अक्ल किनारे धरी रह जाती है। राष्ट्रवादी और युद्धोन्मादी उन्माद लोगों के तर्क और न्याय की समझ को ढांक लेते हैं। ऐसे में हर चीज के बहिष्कार के फतवे होने लगते हैं, और इस बार के तनाव से पहले भी भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले तनाव के बाद से कारोबार पर रोक चली आ रही थी, जिससे इन दोनों ही देशों का बड़ा आर्थिक नुकसान हो रहा था।

अगर कुछ लोगों को लगता है कि सरहद की लड़ाई, या दूसरे की जमीन पर आतंकी हमले गैरफौजी, गैरराजनीतिक मामलों के बहिष्कार से थम जाएंगे, तो यह नासमझी की बात है। हम तो खून और पानी साथ-साथ बहने या न बहने जैसी बात के भी खिलाफ हैं। हम पड़ोसी देश के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने के हिमायती हैं क्योंकि देश गरीब हो या अमीर हो, पड़ोसी से दुश्मनी बड़ी महंगी पड़ती है। और पाकिस्तान के क्रिकेट-बहिष्कार से भारत को भला क्या ही हासिल हो गया रहता, आज पाकिस्तान ने सऊदी अरब से जो फौजी संधि की है, वह हमारे हिसाब से तो पाकिस्तान के परमाणु बम बनाने के बाद का सबसे ताकतवर फौजी फैसला है। अगर किसी सरकार, या राजनीतिक ताकत का बस चलता, तो उन्हें ऐसी किसी संधि को रोकने की कोशिश करनी थी, लेकिन वह तो हुआ नहीं, अब क्रिकेट या टीवी कलाकारों के बहिष्कार से सिर्फ फतवों का पेट भरता है, देश की हिफाजत नहीं बढ़ती। आज पाकिस्तान-सऊदी फौजी पैक्ट से सऊदी की अथाह दौलत का जितना कुछ भी सहारा दीवालिया पाकिस्तान को मिलेगा, वह कम नहीं रहेगा, और सऊदी को अपने दुश्मनों के किसी हमले, या उनके साथ जंग की नौबत में पाकिस्तान की परमाणु हथियार क्षमता का पूरा साथ मिलेगा। इधर हिन्दुस्तान के लोग पाकिस्तान से क्रिकेट के खिलाफ रोना रो रहे हैं, और उधर शायद भारत सरकार को पाक-सऊदी इस नए याराना की खबर भी नहीं हुई। जब भी कोई देश गैरजरूरी और सतही भावनात्मक, या चर्चित मुद्दों में उलझ जाता है, तो वह असल खतरों को अनदेखा करने की कीमत पर ही ऐसा कर पाता है। 

भारत और पाकिस्तान दोनों ही सरकारों के सामने अपनी जनता को संतुष्ट करना, अपने आपको राष्ट्रवादी साबित करना, अपने को पड़ोसी देश से अधिक ताकतवर साबित करना पड़ता है। यह चुनावी और राजनीतिक मजबूरी सरकारों को गैरजरूरी विवादों में उलझाकर रखती है, और सरकारें देश की सुरक्षा जरूरतों से परे महज जनधारणा प्रबंधन में लग जाती हैं। फिर भी हम इस बात का जिक्र करना चाहेंगे कि जब क्रिकेट को लेकर, पहलगाम, और ऑपरेशन सिंदूर को लेकर दोनों ही देशों में उन्माद चल रहा था, उस बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ यह ऐतिहासिक और असाधारण मिलिट्री पैक्ट किया है, जो कि उसकी बहुत बड़ी कामयाबी है। भारत के तमाम उन्मादी तबकों को यह देखना चाहिए कि पिछले कई दशक के उनके उन्माद से न तो पाकिस्तान का परमाणु हथियार संपन्न होना रूक पाया, न ही चीन का असाधारण समर्थन मिलना रूका, और न ही अभी सऊदी के साथ उसकी यह संधि रूकी। किसी भी समझदार देश को सतही उन्माद में अपनी जनता को उलझाकर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि उन्माद को कोई समाज, संगठन, सरकार बढ़ा भर सकते हैं, घटा नहीं सकते। और बढ़े हुए उन्माद का हाल एक बड़े किए गए काल्पनिक राक्षस सरीखा रहता है, जिसका पेट भरना लोगों की जिम्मेदारी हो जाती है। भारत और पाकिस्तान में जनता का पड़ोसी देशों के खिलाफ पैदा किया गया, और बढ़ाया गया उन्माद ऐसा ही हो चुका है कि दोनों देश परस्पर नफे के बजाय उन्मादी नुकसान को झेलते हुए अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं, और अपनी ही कमर तोड़ रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 सितंबर 2025



 

हिंसानियत में डूबे कुछ हिन्दुस्तानियों के लिए हॉलैंड से आया है एक संदेश

 21 सितंबर 2025

हॉलैंड की संसद में कल एक महिला सांसद ने खलबली मचा दी जब वे फिलीस्तीन के झंडे के रंगों का ब्लाऊज पहनकर वहां पहुंची। जाहिर तौर पर यह टॉप फिलीस्तीन के साथ हमदर्दी और एकजुटता दिखाने के लिए था। सदन के भीतर स्पीकर वहां की धुर दक्षिणपंथी पार्टी के थे, और उन्होंने इस पर आपत्ति की, और कहा कि सांसदों के कपड़े निष्पक्ष रहने चाहिए। लेकिन यह महिला सांसद सदन से बाहर जाने के पहले कुछ वक्त अपने अधिकार और जिम्मेदारी पर अड़ी रही। उसने स्पीकर को चुनौती भी दी कि अगर वह नियम तोड़ रही है तो उसे शारीरिक रूप से सदन से निकाल दिया जाए, लेकिन फिर वह वहां से बाहर चली गई।

फिर जब वह सदन में लौटी तो उसने तरबूज की तस्वीर वाला टॉप पहन रखा था जो कि फिलीस्तीन का ही प्रतीक माना जाता है। तरबूज का छिलका हरे रंग का होता है, भीतर गूदा लाल होता है, बीज काले होते हैं, और छिलके और गूदे के बीच का रंग सफेद होता है। इस तरह तरबूज फिलीस्तीनी झंडे के हर रंगों वाला होता है। अब इस पर विरोध करने का हक सदन में किसी को नहीं था, और सदन की कार्रवाई का यह पूरा हिस्सा सोशल मीडिया पर उसे पूरी दुनिया की तारीफ दिला रहा है, लगभग पूरी दुनिया की, मुझे यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि फिलीस्तीनियों की मौत का जश्न मनाते हुए लोगों को भी इस महिला का यह हौसला सुहा रहा होगा।

हॉलैंड की डच-पॉलिटिक्स इन दिनों दक्षिणपंथियों के उभार की शिकार है, और सदन में जब कुछ लोगों ने फिलीस्तीनी झंडे वाले पिन अपने कोट या टाई पर लगा रखे थे, दक्षिणपंथी सांसदों ने गाजा में इजराइली बंधकों के समर्थन में पीली रिबीन बांध रखे थे। हॉलैंड में आज सरकार ने गाजा में इजराइली फौजी कार्रवाई को जनसंहार मानने से इंकार कर दिया है, और वहां के कई सांसद इसका विरोध कर रहे हैं। इस सांसद, एस्थर आउवहांड, ने अपने देश की सरकार की नैतिक मुर्दानगी का विरोध करने के लिए फिलीस्तीनियों के साथ ऐसी एकजुटता दिखाई थी।

अपने देश की सरकार की नीतियों के खिलाफ जाकर, देश के बहुसंख्यक ईसाई तबके की नाराजगी का खतरा उठाकर भी एक महिला सांसद ने यह हौसला दिखाया है। अभी मेरे पास यह लिखने की कोई वजह नहीं है कि हॉलैंड की ईसाई बहुसंख्यक जनता इस महिला सांसद के साथ रहेगी, या उसके विरोध करेगी, फिर भी राजनीतिक रूप से मैंने इसे खतरा उठाना लिखा है। अब लिखते-लिखते जब मैं इस बारे में पढ़ रहा हूं तो भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय मीडिया के आंकड़े बता रहे हैं कि हॉलैंड की 65 फीसदी आबादी अपनी सरकार की इजराइल-गाजा नीति के खिलाफ है। हॉलैंड का मीडिया बताता है कि कुल 18 फीसदी लोग सरकारी नीति का समर्थन कर रहे हैं। 60 फीसदी वोटर चाहते हैं कि वहां का मंत्रिमंडल इजराइल के खिलाफ अधिक कड़ा प्रस्ताव पारित करे। 59 फीसदी लोग यह मानते हैं कि इजराइली कार्रवाई अनुपातहीन है। आधे से ज्यादा डच आबादी यह मानती है कि हॉलैंड को, इजराइल को हथियारों की सप्लाई बंद कर देना चाहिए, और इजराइली सामानों का बहिष्कार भी करना चाहिए। 33 फीसदी लोग तुरंत ही एक फिलीस्तीनी राज्य को मान्यता देने के पक्ष में हैं, और इससे भी अधिक लोग वहां पर मानवाधिकार कुचले जाने को लेकर फिक्रमंद हैं। आधी से ज्यादा आबादी यह मानती है कि इजराइल नस्लभेद कर रहा है। आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा, 64 फीसदी यह मानता है कि गाजा में तुरंत युद्धविराम होना चाहिए, और यह भी कि गाजा में जितनी मानवीय मदद की जरूरत है उतनी जाने देने की इजाजत इजराइल दे।

हॉलैंड के आंकड़े बताते हैं कि वहां पर 6 फीसदी आबादी मुस्लिम है, जाहिर है कि मतदाताओं में इससे अधिक अनुपात तो मुस्लिम वोटरों का हो नहीं सकता। फिर भी वहां के बहुत से सांसद और कुछ पार्टियां इजराइली हिंसा और जुल्म के खिलाफ अपने ईसाई, या नास्तिक हो चुके वोटरों के बीच एक तकरीबन सौ फीसदी मुस्लिम गाजा के साथ खड़ी हुई है। जिन पार्टियों ने सार्वजनिक रूप से इजराइल का जमकर विरोध किया है, उनमें आधा दर्जन राजनीतिक दल हैं, और संसद की डेढ़ सौ सीटों में से करीब 45 सांसद इन पार्टियों के हैं।

मैं फिलीस्तीन के मुद्दे पर इतनी बारीकी से इसलिए पढ़ और लिख रहा हूं कि गाजा पर इजराइली जुल्म, अवैध कब्जे, और फौजी हमलों के खिलाफ जख्मी फिलीस्तीनियों से एकजुटता दिखाने के लिए एशिया से गाजा गए हुए एक अमन-कारवां में कोई 15 बरस पहले मैं भी शामिल था। मैं उस वक्त बीबीसी-लंदन, और कुछ दूसरे मीडिया संस्थानों के लिए साथ-साथ रिपोर्टिंग भी कर रहा था, और अपने हुनर से फोटोग्राफी भी कर रहा था। मैंने इजराइलियों के जुल्म के शिकार लोगों को रूबरू देखा हुआ है, उनकी बातें सुनी हुई हैं। हमारे ठीक पहले एक दूसरा शांति-कारवां वहां गया था, और उस पर इजराइली हमले में करीब 12 लोग मारे गए थे। हमारे कारवां पर भी फौजी हमले, या किसी और किस्म के हमले की आशंका बनी हुई थी, लेकिन इजराइल ने ऐसा कोई हमला इसलिए नहीं किया कि हममें 50 से अधिक हिन्दुस्तानी थे, और भारत इजराइली निर्यात का आधे से अधिक का अकेला खरीददार है। दुनिया का कोई समझदार कारोबारी इतने बड़े ग्राहक देश के बहिष्कार का खतरा नहीं उठाता।

लेकिन हॉलैंड की इस बहादुर महिला सांसद, और हमारे सरीखे कारवां की याद से परे आज की हिन्दुस्तान की एक और वजह है जिससे इस बारे में यहां लिखना हो रहा है। आज इस देश में मुस्लिमों से नफरत करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि इस बात पर खुश हैं कि गाजा में हो, या कहीं और, मुस्लिम जहां भी मारे जा रहे हैं, वे धरती पर से घट तो रहे हैं। यह एक अलग बात है कि ऐसी हिंसक और नफरती सोच रखने वाले लोग आज एक अखंड भारत की कल्पना भी करते हैं जिससे बांग्लादेश, पाकिस्तान सब आज के भारत में मिल जाएंगे। उन्हें यह समझ नहीं पड़ता कि इन दोनों मुस्लिम-बहुल देशों को मिलाकर बने अखंड भारत में मुस्लिमों का अनुपात तो बहुत अधिक बढ़ जाएगा, और इसके साथ-साथ न तो नफरतियों को नापसंद लोगों को पाकिस्तान धकेला जा सकेगा, और न ही आज जिन्हें बांग्लादेशी घुसपैठिया कहा जाता है, उन्हें कहीं निकाला जा सकेगा।

मुस्लिमों की मौत की कामना तो सार्वजनिक रूप से करने में भी बहुत से लोगों को हिचक नहीं है, और न ही अखंड भारत के सपने से ऐसे लोग अभी तक जाग रहे हैं। ऐसे ही लोगों को बताने के लिए आज का यह लिखना जरूरी है कि 6 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले हॉलैंड में एक गैरमुस्लिम महिला सांसद सत्ता की मर्जी के खिलाफ जाकर, संसद के स्पीकर की चेतावनी को अनदेखा करके फिलीस्तीनियों का साथ देने इस तरह कपड़े बदल-बदलकर भी अपनी नीतियां कायम रख रही है। आज की दुनिया में जो शक्ति संतुलन है, उसमें फिलीस्तीन और इजराइल के बीच कुछ भी करने में भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं रह गई है। और जब इस देश की उस मोर्चे पर कोई ताकत नहीं है, कोई अहमियत नहीं है, तो इस देश में इजराइल के पक्ष में हवन करने, और फिलीस्तीनी बच्चों की लाशों की पोटलियों की तस्वीरों पर खुशियां मनाने वाले लोगों की भी इजराइल को कोई जरूरत नहीं है।

दुनिया में नस्लवादी जनसंहार करने के लिए इतिहास के एक सबसे बड़े मवाली और गैंगस्टर डोनल्ड ट्रम्प की अगुवाई में इजराइल अकेला काफी है। लेकिन इतिहास ऐसे लोगों को दर्ज करता है जिन्होंने ऐतिहासिक मानवीय चुनौतियों के दौर में क्या कहा था, और क्या किया था। पौन सदी-एक सदी पहले का भारत का इतिहास गवाह है कि गांधी ने फिलीस्तीनियों के हक के बारे में, और इजराइलियों के अवैध कब्जे के बारे में क्या लिखा था। आज मासूम और बेकसूर फिलीस्तीनियों की मौत पर जो हिन्दुस्तानी मुस्लिम घटने की खुशी मना रहे हैं, उन्हें भी इतिहास दर्ज करते चल रहा है। मैं अभी यह कहने की हालत में नहीं हूं कि इंसानियत की बर्बादी के बेगाने जश्न में नाचते हुए ये हिन्दुस्तानी दीवाने गिनती या अनुपात में कितने है, लेकिन ये दर्ज अच्छी तरह हो रहे हैं। जिस तरह किसी कब्र के पीछे लगे पत्थर में यह दर्ज होता है कि वहां कौन दफन हैं, इन लोगों के नाम इंसानियत की कब्र के पीछे के पत्थर पर दर्ज रहेंगे।

छप्परफाड़ कमाई की चाह दिमाग किनारे बैठा देती है

21 सितंबर 2025 

 

पूरे देश से ही इन दिनों ऐसी खबरें आ रही हैं कि शेयर बाजार में पूंजीनिवेश का झांसा देकर, या क्रिप्टोकरेंसी में पैसा लगाकर, किसी चिटफंड कंपनी का सदस्य बनाकर लोगों को लूटा जा रहा है। यह लूट ठगी या जालसाजी से थोड़ी सी अलग इसलिए है कि डिजिटल अरेस्ट करने की धमकी देकर, जिन लोगों को ब्लैकमेल किया जाता है, निचोड़ लिया जाता है, उनसे ये मामले अलग हैं। ये मामले अधिक रकम कमाने की लालच में लोगों के खुद पूंजीनिवेश करने के हैं। इनमें दिया गया धोखा थोड़ा अलग किस्म का है, लेकिन अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी लुटाकर, नोटों के पेड़ पाने की लालच में ऐसा करने वाले लोग कम नहीं हैं। कल भी छत्तीसगढ़ के दुर्ग में एक आदमी-औरत पकड़ाए हैं जिन्होंने शेयर बाजार से अंधाधुंध कमाई का झांसा देकर लोगों से 12 करोड़ रूपए ठग लिए। शेयर बाजार में नामौजूद कंपनियों के नाम पर लोगों ने धोखा खाया। पिछले पांच बरस से हम हर हफ्ते चिटफंड कंपनियों के लोगों की गिरफ्तारियां देखते आ रहे हैं, लेकिन गिरफ्तारियों से बावजूद डूबी हुई रकम तो अब वापिस आ नहीं सकती।

आज बैंकों और कुछ दूसरे सरकारी वित्तीय संस्थाओं की बहुत सी भरोसेमंद योजनाएं हैं जिनमें लोग पैसा जमा करके, या लगाकर ठीकठाक कमाई कर सकते हैं। इनमें से जो योजनाएं शेयर मार्केट में पूंजीनिवेश की हैं, उनमें भी लोगों के पास यह अलग-अलग पसंद रहती है कि वे कुछ अधिक कमाई के लिए कुछ अधिक खतरे वाली कंपनियों में पूंजीनिवेश करना चाहते हैं, या अधिक सुरक्षित कंपनियों में पूंजीनिवेश वाली कम मुनाफे की योजनाओं में पैसा डालना चाहते हैं। खतरों से खेलने की ये सीमाएं सरकारी और बड़े निजी बैंकों में मौजूद हैं, और योजनाओं में काफी हद तक सीमाओं और संभावनाओं की जानकारी भी दी जाती है। ऐसी पॉलिसी या डिपॉजिट स्कीम बेचने के लिए इन सबके एजेंट भी हैं, लेकिन जो भी वित्तीय संस्थान धोखाधड़ी की नीयत नहीं रखते हैं, वे सपने नहीं दिखा सकते, वे सीमाएं और संभावनाएं बता सकते हैं। इस बीच लोगों को सपने देखने की चाह ऐसी रहती है कि वे जालसाजों की दिखाई राह पर दौड़ पड़ते हैं। आज चारों तरफ जो लोग जालसाजी के शिकार हैं, वे ऐसे ही लोग हैं जो कि नोटों का पेड़ पाने के लिए जमीन में नोट दफन करके उसे खाद-पानी देने को तैयार हो जाते हैं, और जालसाज उन नोटों को लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं।

हम सरकार की कुछ दूसरी कमियों और खामियों की चर्चा तो करते रहते हैं जिनकी वजह से जालसाजी और धोखाधड़ी पनपती और बढ़ती हैं, लेकिन पूंजीनिवेश को लेकर हम यह नहीं कह सकते कि सरकार, या सरकार के मान्यता प्राप्त भरोसेमंद बैंकों की कमी है, उनकी योजनाएं नहीं हैं, इसलिए लोग जालसाजों की पूंजीनिवेश योजना की तरफ जाने को मजबूर होते हैं। भारत में आज सरकार की मान्यता प्राप्त और सरकारी निगरानी वाली हजारों योजनाएं लोगों के सामने हैं, लेकिन किसी भी कानूनी और जायज योजना की तरह उनके मुनाफे की एक सीमा है। और लोगों की टकसाल की रफ्तार से कमाई की हसरत ऐसी है कि उसे लेकर एक पुराना फिल्मी गाना याद आता है, कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोडऩे लगता है...। इस गाने में जिस प्रेम का जिक्र है, उसे अगर कमाई की चाहत की तरह देखें, तो लोग अपनी बुद्धि की सुझाई गई सीमा रेखा को अक्सर तोडऩे लगते हैं क्योंकि उन्हें किसी जालसाज के दिखाए गए हसीन सपनों की मृगतृष्णा हकीकत लगने लगती है।

अब कोई अनपढ़ हो, अखबारों से परे हो, तो उसे जालसाजी से अनजान रहने का संदेह का लाभ दिया जा सकता है। लेकिन जो लोग हर दिन के अखबार में एक-एक दर्जन जालसाजी की खबरें पाते हैं, वे भी अगर पहला मौका मिलते ही अगले जालसाज को अपनी सारी बचत देने को बेताब रहते हैं, तो उन्हें कौन बचा सकते हैं? अखबार आज भी अधिकतर आबादी को हासिल हैं। और अगर अखबार खुद ही किसी जालसाजी की योजना में हिस्सेदार न हों, तो वे दूसरी जालसाजी की खबरें भी छापते रहते हैं। कुल मिलाकर आज के इस डिजिटल दौर में लोगों को छपे हुए शब्दों से परे भी खबरें हासिल हैं, और उन्हें पढक़र सबक लेने को विलासिता मानते हुए 40 फीसदी जीएसटी भी नहीं है। ऐसे में अगर लोग आज भी अपनी मेहनत, या हराम की दौलत को दांव पर लगाने के लिए बेसब्र और उतारू रहते हैं, तो क्या किया जा सकता है? किसी को फर्जी ओटीपी भेजकर उसका बैंक खाता खाली कर देना एक अलग किस्म का जुर्म है, और उस जुर्म के शिकार मोटी कमाई की चाह में पूंजीनिवेश नहीं करते हैं। लेकिन जालसाजों की फर्जी योजनाओं में रातों-रात छप्परफाड़ कमाई की उम्मीद में अवैध प्लॉटिंग की जमीन खरीदने वाले जानते-बूझते लोगों की तरह पैसा लगाने वालों को कौन बचा सकते हैं? अवैध प्लॉटिंग में तो फिर भी प्लॉटिंग अवैध रहती है, जमीन के टुकड़े का अस्तित्व तो रहता है, फर्जी पूंजीनिवेश में तो फर्जी, पूंजी, और निवेश, ये तीनों ही शब्द फर्जी रहते हैं।

फिर भी चाहे लोग अपनी बेवकूफी से पैसा डुबा रहे हों, घूम-फिरकर सरकार की कुछ तो जिम्मेदारी आती ही है। सरकार को ऐसी फर्जी योजनाओं के प्रति जनता को जागरूक करने के अभियान तरह-तरह से चलाने चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद अपने प्रसारणों में कहा है कि डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई चीज भारत में नहीं है, इसके बावजूद हर दिन देश में सैकड़ों लोग डिजिटल अरेस्ट होने के लिए बेचैन रहते हैं। ऐसे लोगों को जालसाजों और धोखेबाजों से बचाना आसान काम तो नहीं है, फिर भी सरकार को नए तरीके ढूंढने चाहिए। प्रधानमंत्री का एडवांस में दिया गया भरोसा भी जहां काम न कर रहा हो, वहां कोई और राह ढूंढी जाए, क्योंकि जालसाजी और धोखाधड़ी होने के बाद सारी कानूनी और अदालती कार्रवाई करना तो सरकार के ही मत्थे आता है।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 सितंबर 2025



 

पाक-सऊदी सैन्य-समझौते के खतरे समझने की जरूरत

20 सितंबर 2025 

 

किसी देश के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों के बारे में वहां की जनता को भी अपनी सरकार के बयान से परे फिक्र रखनी चाहिए। सरकारों की अपनी सीमाएं रहती हैं कि वे सार्वजनिक रूप से क्या कहें, और क्या न कहें। हर सरकार तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प सरीखी गैरजिम्मेदार नहीं हो सकतीं, कि मुंह खोले और बकवास करे। इसलिए जनता को अपनी सरकार के कहे बिना भी कई चीजों को समझते रहने की कोशिश करनी चाहिए। अब अभी भारत के पड़ोसी, और फौजी मामलों में सबसे बड़े दुश्मन देश पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाला फौजी समझौता हुआ है। इस सैन्य समझौते के तहत अब पाकिस्तान और सऊदी अरब एक-दूसरे पर हुए किसी भी हमले की नौबत में उसे अपने पर हमला मानेंगे। पाकिस्तान ने चार कदम आगे बढक़र यह भी कहा है कि उसकी परमाणु क्षमता भी सऊदी अरब के साथ रहेगी। अभी तक इस समझौते की शब्दावली सामने नहीं आई है, लेकिन यह बात साफ है कि ये दोनों देश फौजी मामलों में एक-दूसरे के इतने करीब कभी नहीं थे। भारत के लिए यह फिक्र की बात इसलिए है कि पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न, और आर्थिक रूप से विपन्न देश है, और सऊदी अरब परमाणु हथियार के बिना है, लेकिन उसका बहुत बड़ा खजाना है। एक सहज बुद्धि से इन दो बातों को जोडक़र देखें तो ऐसा लगता है कि यह खाली पड़े पीपल को बेघर भूत मिलने सरीखा है, एक को घर मिला, और दूसरे को किराएदार।

हम अभी इस पूरे मामले की जटिलता को समझने की कोशिश ही कर रहे हैं, क्योंकि फिलीस्तीन पर हमला करते-करते अभी इजराइल ने फिलीस्तनी संगठन हमास के नेताओं को मारने के नाम पर एक मुस्लिम देश कतर पर जिस तरह हवाई हमले किए, उससे नुकसान तो बहुत कम हुआ, लेकिन मुस्लिम देश हड़बड़ाकर जिस तरह एक साथ बैठे हैं, वैसा शायद ही पहले कभी हुआ हो। गाजा में 65 हजार लोगों का कत्ल हो गया, लेकिन मुस्लिम देशों के चेहरों पर शिकन नहीं पड़ी, लेकिन संपन्न देशों के बीच के एक देश कतर पर जरा सा हवाई हमला हुआ, तो इस्लामिक देश इकट्ठे होकर इस्लामिक नाटो बनाने की बात करने लगे। लोगों को मालूम ही है कि नाटो एक सैनिक संगठन है जिसमें योरप के देशों के साथ-साथ अमरीका भी है, और यह संगठन हाल के बरसों की लड़ाई में यूक्रेन का साथ दे रहा है, और रूस के खिलाफ खड़ा हुआ है। इसी किस्म का कोई संगठन इस्लामिक देशों के बीच बन सके, यह बहुत आसान शायद न हो, लेकिन भारत के लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अगर ऐसा कोई संगठन बनता है, तो पाकिस्तान तो उसका अनिवार्य हिस्सा रहेगा, और भारत उसके बाहर ही रहेगा। ऐसे में परमाणु हथियार संपन्न पाकिस्तान रणनीतिक महत्व किसी भी तरह के इस्लामिक सैनिक संगठन में बहुत अधिक रहेगा, और हो सकता है कि यह उसकी मौजूदा फटेहाली का एक समाधान भी हो सके। यह बात कहना बहुत तर्कसंगत और न्यायसंगत तो नहीं होगा, लेकिन इस तस्वीर को देखने का एक सहज नजरिया यह भी हो सकता है कि अतिसंपन्न इस्लामिक देशों के हाथ आज के अतिविपन्न पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की ताकत एक किस्म से भुगतान पर हासिल रहेगी।

यह पूरी तस्वीर बहुत ही बिखरी हुई, और विशाल है, इसलिए हम सिर्फ इसके कुछ हिस्सों की चर्चा कर रहे हैं, कोई निष्कर्ष नहीं निकाल रहे हैं। सउदी अरब पाकिस्तान के साथ से हासिल किसी भी तरह की ताकत से ईरान और इजराइल, दोनों परस्पर दुश्मन देशों के खिलाफ अपना बाहुबल बढ़ा सकता है। इस तस्वीर में कुछ विरोधाभासी बातें भी हैं कि सऊदी अरब अमरीका से भी ठीक रखेगा, लेकिन इजराइल के खिलाफ रहेगा। आज इजराइल पर यह खतरा मंडरा रहा है कि अगर पाकिस्तान की परमाणु क्षमता तक सऊदी अरब की पहुंच हो गई है, तो यह सीधे-सीधे इजराइल के अस्तित्व पर एक खतरा भी है। दूसरी तरफ मुस्लिम देशों के संगठन इजराइल के खिलाफ तो हैं, लेकिन सारे के सारे देश इजराइल से फौजी-दुश्मनी निभाना चाहते हों, ऐसा भी नहीं है। इस तरह बड़े जटिल और विसंगतियों भरे हुए मुस्लिम देशों के आपसी रिश्तों पर यह ताजा पाक-सऊदी फौजी समझौता क्या फर्क डालेगा, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन यह बात तय है कि इजराइल और अमरीका अपने मुस्लिम-विरोधी रूख के चलते तमाम मुस्लिम देशों को एक साथ बैठने का एक मौका जुटाकर दे रहे हैं, और इनकी संपन्नता किस तरह एक फौजी ताकत में बदल सकती है, यह आने वाला वक्त बताएगा।

इससे जुड़े हुए एक और पहलू पर सोचने की जरूरत है। दुनिया के कुछ बड़े राजनीतिक विश्लेषक पहले भी इस बात को लिखते आए हैं कि दुनिया में आज मुस्लिम और ईसाई बहुसंख्यक देशों के बीच सभ्यता, और संस्कृति का एक टकराव चल रहा है। इस्लामी सभ्यता, और पश्चिमी सभ्यता के बीच के टकराव का नतीजा था कि न्यूयॉर्क की इमारतों पर ओसामा-बिन-लादेन के विमानों का हमला हुआ था, और उसके पहले इराक और अफगानिस्तान पर, सीरिया और दूसरे मुस्लिम ठिकानों पर अमरीकी और पश्चिमी (ईसाई) देशों का हमला हुआ था। इसलिए मुस्लिम और ईसाई दुनिया के बीच भी आज इजराइल की वजह से एक नया ध्रुवीकरण हो सकता है, जिसका विश्लेषण हमारे लिए बहुत आसान नहीं है, लेकिन तमाम संबंधित देशों के लोगों को अपनी सरकार के घोषित बयानों से परे जाकर भी इस बारे में पढऩा चाहिए, और सोचना-समझना चाहिए।

ट्रम्प नाम के एक बेदिमाग और बददिमाग की वजह से आज पूरी दुनिया में भूचाल सा आया हुआ है, किसी देश के पैर टिक नहीं पा रहे हैं कि ट्रम्प की अगली बददिमागी से क्या होगा। हमें यह बात तो साफ लग रही है कि संपन्न मुस्लिम देशों की एक धेले की हमदर्दी भी गरीब फिलीस्तीन के साथ नहीं है, लेकिन कतर पर इजराइली हवाई हमले से अब इस्लामिक देशों की नैतिकता पर छाई हुई चर्बी पर कुछ जोर पड़ रहा है। देखते हैं आगे और किस-किस तरह के गठबंधन होते हैं। फिलहाल तो पाक-सऊदी सैन्य-समझौते की वजह से आज इस्लामिक दुनिया के हाथ मानो डेढ़ सौ से अधिक परमाणु हथियार लगे हैं। और देखना है कि चीन, रूस, और अमरीका सहित बाकी नाटो का रूख इस बदले हुए शक्ति संतुलन की तरफ कैसा रहता है। 

(Daily Chhattisgarh)