30 सितंबर 2012
संपादकीय
भारत के पिछले राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (2009-10) के आंकड़े अगर सही है तो 2004-05 के इसी सर्वे की तुलना में देश में काम करने वाली महिलाओं की संख्या में दो करोड़ दस लाख से अधिक की कमी इस दौरान हो गई है। इस मामले पर कल सीपीएम की वरिष्ठ नेता और सांसद बृंदा कारत ने कहा है कि इसके एक गहरे विश्लेषण की जरूरत है कि देश के कामगारों में से महिलाएं इतनी घट क्यों गई हैं। बृंदा ने सरकार का यह पक्ष भी सामने रखा है कि पिछले सर्वे में पन्द्रह बरस से बड़ी बहुत सी लड़कियों ने अपना काम मजदूरी लिखाया था, लेकिन अब उन्होंने पढ़ाई को अपना मुख्य काम लिखाया है।
इन आंकड़ों में आई ऐसी गिरावट पहली नजर में कुछ अटपटी लगती है। आबादी बढ़ रही है, महिलाओं में शिक्षा बढ़ रही है, और उनके कामकाज के मौके भी बढ़ रहे हैं, इससे ऐसा लगता है कि देश के कामगारों में महिलाओं का अनुपात, कम से कम कम तो नहीं ही होना चाहिए। लेकिन इन आंकड़ों की हकीकत पल भर के लिए छोड़ भी दें, तो एक दूसरी बात पर चर्चा इस बहाने हो सकती है कि महिलाओं को कामकाज, रोजगार, और स्वरोजगार के मौके अधिक दिलाने के लिए क्या-क्या हो सकता है, क्योंकि उससे उनकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, और परिवार से लेकर समाज तक उनको अधिक सम्मान का दर्जा भी मिलेगा। इस बारे में हम छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में की गई कुछ पहल का जिक्र करना चाहेंगे। यहां पर राज्य सरकार ने महिलाओं के लिए सरकारी नौकरी में आने की उम्र सीमा इतनी बढ़ा दी है कि महिलाएं बच्चे हो जाने के बाद, उनकी कुछ बरस देखरेख कर लेने के बाद फिर नौकरी के लिए अर्जी दे सकती हैं। इस राज्य में राज्य सरकार की नौकरियों के लिए एक महिला अब पैंतालीस बरस की उम्र तक अर्जी दे सकती है, जो कि शायद पूरे देश में सबसे अधिक रियायत है। ऐसा इसलिए भी जरूरी था, और समझदारी का काम है कि आदमी को तो न बच्चे पैदा करने होते, न उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करना होता। यह काम करते-करते एक महिला की उम्र इतनी निकल चुकी होती है कि वह कई किस्म की जगहों पर काम ही नहीं पा सकती। इस तरह की कुछ और छूट भी महिलाओं को यहां पर मिली है, और इससे उनके कामकाजी होने की संभावनाएं बढ़ती हैं। एक पुराना सरकारी नारा है कि नारी पढ़ेगी तो विकास गढ़ेगी। एक साक्षर महिला परिवार के बच्चों को भी आगे पढऩे में मदद करती है। इसी तरह एक आत्मनिर्भर और कामकाजी महिला परिवार की कमाई को बढ़ाती ही है, वह समाज में महिलाओं का दर्जा भी ऊपर लाती है। और ऐसी महिला किसी अच्छे या बुरे वक्त में अपनी शादीशुदा बेटी के लिए भी अधिक मददगार हो सकती है।
लेकिन इन बातों के साथ-साथ बृंदा कारत ने कुछ और बातों को भी उठाया है जिस पर केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्यों को भी गौर करना चाहिए। उन्होंने लिखा है कि सरकार के बहुत से जनकल्याणकारी कार्यक्रमों, जैसे एकीकृत बाल विकास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और दोपहर का भोजन, में महिलाओं की सबसे बड़ी भूमिका है, लेकिन इन कामगार महिलाओं को सरकारी कामगार का दर्जा नहीं मिलता, इसलिए उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पाती। इस तरह सरकार ही उनकी सेवाओं का पूरा इस्तेमाल करती है लेकिन उन्हें न सही दर्जा देती न सही नौकरी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार अपने कई किस्म के कामकाज अब बाहरी एजेंसियों से करवाने लगी है, और वहां पर महिलाओं को काम पर कम रखा जाता है।
हमारा ख्याल है कि महिला के लिए बेहतर मौके, न सिर्फ देश की उत्पादकता बढ़ाते हैं, बल्कि कामकाजी महिला के परिवार की हालत भी सुधारते हैं, जिनमें बच्चों का खानपान भी शामिल है, और उनकी पढ़ाई, सबका इलाज भी शामिल है। इस तरह एक कामकाजी महिला सरकार पर से कुछ किस्म के बोझ कम भी करती है। ठीक-ठाक खाने वाले बच्चे सरकारी इलाज पर कम बोझ बनते हैं। इसी तरह ठीक-ठाक कमाने वाली महिला अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से परे भी पढ़ाने की सोच सकती हैं। एक आत्मनिर्भर महिला परिवार और समाज की प्रताडऩा के खतरे से भी कुछ हद तक तो उबरती ही है। और हम इस बारे में अधिक चर्चा की संभावना देखते हुए यहां पर सिर्फ इस बात की शुरूआत करके इसे यहीं छोड़ रहे हैं।































