31 जुलाई 2013
संपादकीय
आंध्र प्रदेश से काटकर तेलंगाना नया राज्य बनाने का कांगे्रस, यूपीए, और केंद्र सरकार का फैसला आधी सदी से अधिक चले आ रहे एक संघर्ष, और सैकड़ों जानों की कुर्बानी के बाद आया है। अधिक अच्छा तो यह हुआ होता कि दशकों पहले यह हो गया रहता, लेकिन लोकतंत्र में जनता के दबाव के बिना बहुत से फैसले कई बार नहीं हो पाते, और कई बार जनता के दबाव में गलत फैसले भी हो जाते हैं। तेलंगाना का फैसला जनता के दबाव में हुआ एक सही फैसला है, और इससे अधिक बड़ा जनआंदोलन लोकतंत्र के भीतर और कुछ भी नहीं हो सकता था।
आज विचारों के इस कॉलम में हम बहुत अधिक जानकारी भरना नहीं चाहते जो कि समाचारों में आ रही है, और जो इसी अखबार में अलग-अलग लेखों में आएगी। हम आज मोटे तौर पर भारत में छोटे राज्यों की जरूरत की वकालत करना चाहते हैं, जिसके मुताबिक यह फैसला एकदम सही है। इस देश में आजादी के बाद जिस तरह से राज्यों को मिलाकर एक संघीय गणतंत्र खड़ा किया गया, उसके अपने फायदे उस वक्त थे। लेकिन अब विकास के साथ-साथ प्रशासन को मुमकिन बनाने के लिए छोटे राज्यों की जरूरत एक हकीकत है, और कई छोटे राज्यों ने कामयाबी साबित भी की है। पहले बने छोटे राज्यों में हरियाणा आर्थिक विकास में बहुत आगे बढ़ा, और तेरह बरस पहले जो तीन नए राज्य बने, उनमें से छत्तीसगढ़ ने कामयाबी का एक नया रिकॉर्ड कायम किया। आज तेलंगाना के अलावा देश में जगह-जगह नए राज्य बनाने की जरूरत है, और जो बहुत बड़े-बड़े राज्य फीका प्रशासन झेल रहे हैं उनको ऐसे राज्यों में बांटना बेहतर होगा जो नए राज्यों के पैमाने पर पूरे उतरते हों, खरे उतरते हों, और जहां जनता अपना राज्य चाहती भी हो। कुछ जगहों पर धर्म के आधार पर या देश की सरहद पर फौजी जरूरतों को देखते हुए हो सकता है कि नया राज्य बनाना समझदारी न भी हो। लेकिन जहां-जहां ऐसी गुंजाइश है, वहां पर छोटे राज्यों से उन इलाकों का आगे बढऩा मुमकिन हो पाएगा, बड़े राज्यों के भीतर किसी इलाके से चली आ रही बेइंसाफी दूर होगी।
कल जब तेलंगाना का फैसला आ जाने के बाद देश भर में इस पर बहस चल रही थी, तब यह बात भी सामने आई कि तेलंगाना इलाके से आंध्र के मुख्यमंत्री पद पर तीन या चार लोग आए। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव भी तेलंगाना इलाके के ही थे। इसके बावजूद तेलंगाना का विकास नहीं हो पाया, तो इसके लिए बाकी आंध्र को क्यों कोसा जाए? लेकिन छत्तीसगढ़ में हम यह बात देख चुके हैं कि छत्तीसगढ़ के श्यामाचरण शुक्ल कम या अधिक वक्त के लिए तीन बार अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इसी इलाके मोतीलाल वोरा पूरे कार्यकाल के लिए अविभाजित मप्र के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन छत्तीसगढ़ के साथ कोई इंसाफ उनके दौर में भी नहीं हो पाया। दो कार्यकाल अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद दिग्विजय सिंह छत्तीसगढ़ के साथ इंसाफ नहीं कर पाए। और नया राज्य बनने के बाद इस इलाके ने जो तरक्की देखी, वह मध्यप्रदेश में रहते हुए शायद कभी नहीं देख पाता। एक मिसाल गिनाना काफी होगा कि इतनी बिजली पैदा करने वाले छत्तीसगढ़ के ग्यारह लोकसभा क्षेत्रों में खेती के जितने बिजली कनेक्शन दिए गए थे, उससे अधिक बिजली कनेक्शन यहां से बाहर के छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र में कमलनाथ की वजह से दिए गए थे। कदम-कदम पर इस राज्य के साथ परले दर्जे की बेईमानी हुई थी, और यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के नए राज्य बनने के बाद मध्यप्रदेश के नेताओं की यहां कोई कदर नहीं रह गई है।
अब जनता की राजनीतिक भावनाएं, उनकी क्षेत्रीय उम्मीदें, पहले सरीखी नहीं रह गईं कि उन्हें दूर बैठे कोई भी काबू में रख सके। अब लोग क्षेत्र के आधार पर, धर्म और जाति के आधार पर, औरत और मर्द के आधार पर, उम्र के आधार पर, सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं और बड़े राज्य में यह सब मुमकिन नहीं है। तेलंगाना का फैसला देर से सही, सही फैसला है, और इसके बाद बहुत से नए राज्य बनने का सिलसिला शुरू होना चाहिए। कुछ लोगों को झारखंड का एक नया और छोटा राज्य बनना एक खराब मिसाल की तरह याद पड़ता है, लेकिन उसकी नाकामयाबी का उस राज्य के आकार से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा, वह वहां के भ्रष्टाचार और वहां की राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा, जो कि कोई बड़ा राज्य भी हो सकता था। उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी हमने सत्ता के गठबंधनी-बंटवारे के तहत अस्थिरता आते देखी है, और कर्नाटक जैसे विकसित राज्य में भी झारखंड से अधिक भ्रष्टाचार देखा है। हरियाणा जैसे नए और छोटे राज्य में सारे भ्रष्टाचार, और सारी राजनीतिक अस्थिरता से निकलकर ही आर्थिक विकास आया है। इसलिए कुछ राज्यों की बुरी मिसालों के साथ-साथ, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की अच्छी मिसाल को भी याद रखना चाहिए।
इस देश में बनने वाले आयोगों की सिफारिशों पर कुछ नहीं होता यह सोचकर हम इस सलाह को देने से रूक सकते हैं कि राज्य पुनर्गठन आयोग बनाना चाहिए और पूरे देश में नए राज्यों की जरूरत और संभावना को तथ्यों और तर्कों के आधार पर देखना चाहिए, लेकिन आज यही सलाह जायज होगी। केंद्र सरकार को अलग-अलग राज्यों के विभाजन पर राजनीतिक फैसले लेने के बजाय ऐसे आयोग को बनाकर उसकी रिपोर्ट पर गंभीरता से चर्चा करनी चाहिए, और बड़े राज्यों के पिछड़े इलाकों को उनकी बाकी संभावनाओं के आधार पर, दूसरे इलाकों को उनकी प्रशासनिक जरूरत के आधार पर नए राज्य बनाने का विचार करना चाहिए। कुछ लोगों को यह देश का बंटवारा लग रहा है। यह सोच नासमझी की है, और जब किसी एक कारोबार का भी चार भाईयों में बंटवारा होता है, तो अधिकतर मामले में वे चारों अलग-अलग भी तरक्की करके संयुक्त कारोबार से आगे निकल जाते हैं। इसलिए अगर दस भी और नए राज्य बनाए जाते हैं, तो इस देश में अभी उसकी जरूरत है। देश में आत्मनिर्भर छोटे-छोटे राज्य रहें, राज्यों के भीतर जरूरत के मुताबिक छोटे-छोटे जिले रहें, तो सरकार का जो बहुत बड़ा बजट दिल्ली से निकलकर गांव तक जाता है, उसका बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा।




















