17 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार
अमरीका के शेयर बाजार और वित्तीय संस्थानों के प्रतीक वॉल स्ट्रीट में दुनिया की जिंदगी पर गहरी जकड़ बना चुके कारोबारी खूनी शिकंजे के खिलाफ ऐतिहासिक प्रदर्शन चल रहे हैं। इनसे बाजार की सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, दुनिया पर बाजार के एक हत्यारे कब्जे के खिलाफ एक सोच खड़ी हुई है जो कि धीरे-धीरे अमरीका से परे भी बाकी देशों में फैलती जा रही है। अमरीका के बहुत से बड़े शहरों में यह आंदोलन जोर पकड़ चुका है और आज सुबह की एक खबर बताती है कि यह चार महाद्वीपों में चल रहा है। ऑस्ट्रेलिया, इटली, ब्रिटेन, जापान, हांगकांग, कोरिया, ताईवान जैसे देश इस फेहरिस्त में जुड़ते जा रहे हैं। (नीचे की रिपोर्ट भी देखें)।
ओडब्ल्यूएस (ऑकुपाई वॉल स्ट्रीट) वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो नाम का यह आंदोलन दुनिया में आर्थिक शोषण और असमानता के खिलाफ आज एक प्रतीकात्मक आंदोलन है, लेकिन एक वक्त हिंदुस्तान की नक्सलबाड़ी में शुरू हुआ आंदोलन भी माओवादी विचारधारा का एक प्रतीकात्मक आंदोलन था जो आज दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दिया गया है।
न्यूयॉर्क शहर में अमरीका की कारोबार की सड़क से जो जख्मी चली आ रही और आज हमलावर हो गई सोच की आग आगे पता नहीं कितने दूर तक फैलेगी लेकिन इसने इंसानों पर बाजार के लगातार हमलों के खिलाफ एक जागरूकता शुरू की है। इस मुद्दे पर वैसे तो बहुत कुछ छप रहा है लेकिन इस पर आज लिखने के पीछे मेरी नीयत भारत से इसे किसी तरह जोडऩे की है। इस देश में किसानों और आदिवासियों की जमीनों, नदियों, खदानों को लेकर आजादी के पहले से जिस किस्म की लूट और डकैती चल रही थी वह हाल के बरसों में एक संगठित अपराध वाले माफिया के अंदाज में पहुंच गई थी। नेता-अफसर और कारखानेदार मिलकर जिस बेरहमी से जनता के हक की कुदरती दौलत को जेब कर रहे थे, उसके खिलाफ नक्सल आंदोलन ने एक जागरूकता खड़ी की और फिर गैरनक्सल संगठनों ने देश भर की अदालतों तक जाकर इस लूटमार को धीमा किया है।
कमोबेश इसी तरह का हाल भारत के उन शहरी इलाकों में भी चल रहा है जहां पर नक्सलियों की तरह की गुरिल्ला लड़ाई मुमकिन नहीं है और न ही सुविधाभोगी हो गए शहरी लोगों के बीच लडऩे का वैसा माद्दा रहता है जैसा कि जंगल में बसे हुए उन लोगों में रहता है जिनके पास खोने को कुछ नहीं रहता। लेकिन सूचना के अधिकार का एक असर यह हुआ कि शहरी भ्रष्टाचार नाम की लूटमार के खिलाफ भी मामले अदालतों तक पहुंचे और नेता-अफसर जेल गए।
अब सवाल यह उठता है कि न्यूयॉर्क की वॉल स्ट्रीट हो या भारत के छोटे-बड़े शहरों की भीड़, ये किस तरह संगठित रूप से इंसान की हिमायत कर सकते हैं? शहरों में नक्सली तो जंगलों की तरह कामयाब हो नहीं सकते और उनके हिंसा के तरीके से दुनिया के आंदोलनकारियों में से अधिकतर असहमत भी होंगे। लेकिन सवाल यह है कि नक्सलियों के बिना अगर जंगलों में बसे आदिवासियों और गरीबों के शोषण और उन पर सरकारी, राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी जुल्म का मुद्दा ही शहरी लोकतंत्र की नजरों में नहीं आता, तो फिर शहरों में चल रहे ऐसे तमाम जुल्म किस किस्म के नक्सलवाद या किस अहिंसक आंदोलन से लोगों की नजरों में आ सकेंगे?
पिछले कुछ दिनों की खबरों को देखें तो भारत में एक भयानक हालत यह है कि अमर सिंह से लेकर येदियुरप्पा तक बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में आलीशान इलाज पा रहे हैं, और गरीब गर्भवती औरतें सरकारी अस्पतालों में जगह न पाकर आधी रात को अस्पताल के सामने फुटपाथ पर रहमदिल कारों की आड़ में बच्चा पैदा करने और फिर उसकी मौत देखने को बेबस हैं। इन दो बातों को एक साथ मिलाकर देखें तो लगता है कि सिवाय नक्सल हिंसा के कैसे शहरों में इस बेइंसाफी का मुद्दा कोई उठा सकता है? यह बात बहुत साफ है कि जंगल और खदानों वाले राज्यों में अगर नक्सली इस कदर कब्जा न कर चुके होते तो भारत की सरकारें और यहां की राजनीतिक पार्टियां भूमि अधिग्रहण के, खदानों के कानूनों पर खुद होकर इस तरह की चर्चा कभी न करतीं।
इस देश और इसके प्रदेशों में जितने बड़े-बड़े घोटाले हो रहे हैं, मायावती जैसे निर्वाचित लोग जिस कदर तानाशाही, बेशर्मी और हिंसा से जनता के पैसों से आत्मस्तुति कर रहे हैं, उसके खिलाफ एक शहरी सोच खड़ी करने के लिए कौन सा रास्ता हो सकता है?
भारत में हिंदी के रोमांचक और जासूसी उपन्यास लिखने वाले एक जाने-माने लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने बहुत पहले एक किताब लिखी थी-खबरदार शहरी। इसकी कहानी मुझे कुछ धुंधली सी याद है और इसमें भारत के कानून और सरकार की नाकामयाबी से थके हुए शहरी जागरूक लोगों की एक टीम खुद ही अपराधियों को निपटाने में लग जाती है। यह तो एक कहानी की बात है, हकीकत में तो किसी भले इंसान को मारना और किसी अपराधी को मारना, एक सरीखा जुर्म है और लोकतंत्र में ऐसे किसी जुर्म की जगह नहीं हो सकती, लेकिन भारत में बहुत बार बनने वाली ऐसी फिल्में भी लोगों को याद होंगी जिनमें कोई थका हुआ पुलिस अफसर नेताओं को ही मारने पर उतारू हो जाता है।
भारत में भी शहरी और गैरगरीब तबकों के ऐसे लोग हैं जो अपनी खुद की जिंदगी में बहुत अधिक कमी न रहने के बावजूद यह मानते हैं कि हिंसा के बिना सबसे कमजोर तबके को इस देश में कभी कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। हम हिंसा के खिलाफ रहते हुए भी यह समझना चाह रहे हैं कि जेल पहुंचते ही आलीशान अस्पताल तक पहुंच जाने वाले नेताओं को निकालकर फुटपाथ पर किस तरह फेंका जाए और किस तरह फुटपाथ पर बच्चा जनती गरीब औरत को अस्पताल के भीतर जगह दिलवाई जाए? किस तरह रोज कमाने-खाने वाले लोगों की बेदखली को रोका जाए और ईश्वर के नाम पर उन्हीं जगहों के इर्दगिर्द बड़े-बड़े अवैध कब्जे, अवैध निर्माण, सुप्रीम कोर्ट के बहुत साफ आदेश के बाद भी बेदखल न होने के मुद्दे को उठाया जाए?
मीडिया तो अपने कारोबार और अपने टीआरपी, अपनी छपी हुई कॉपियों की गिनती, विज्ञापन के अपने कारोबार, इन सबकी असुविधा न होने पर ही सबसे कमजोर तबके की किसी बात को उठाने के बारे में सोच सकता है, और अन्ना हजारे जैसे आंदोलन अन्याय पर हमले के बजाय कांगे्रस की चुनावी संभावनाओं पर खुलकर केंद्रित हो चुके हैं, भाजपा की भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा कर्नाटक के चलते अपने पहिये की हवा खो चुकी है, ऐसे में वॉल स्ट्रीट का आंदोलन भारत के शहरों में कौन शुरू करेगा?
भारत के लोकतंत्र पर भारत के धनपशु किस कदर बैठ गए हैं यह नीरा राडिया और अमर सिंह के टेलीफोन की कानूनी या गैरकानूनी, जैसी भी, रिकॉर्डिंग से साबित हो चुका है और 2जी घोटाले से लेकर बेल्लारी तक यह भी साबित हो चुका है कि लोकतंत्र के तहत चुनावी जीत को देश लूट लेने का ठेका कैसे मान लिया गया है। ऐसी नौबत में फंसे हुए लोकतंत्र के पश्चिम के देशों से निकलकर बाकी जगहों तक फैलता हुआ आंदोलन यहां कैसे शुरू हो सकता है यह सोचने की जरूरत है, इसलिए ये आंदोलन अभी तक बिना हथियारों के है, और जहां पर जुल्म और ज्यादती के खिलाफ बिना हथियार के आंदोलन शुरू नहीं हो पाते, वहां पर हथियारबंद, हिंसक और जानलेवा हथियारों के लिए जगह बन जाती है। शोषण और असमानता के खिलाफ अगर लोग अपने औजार लेकर खड़े नहीं होने दिए गए तो फिर उन्हें हथियार लेकर खड़े होने से कौन रोक लेगा? पश्चिम से उठे जनचेतना के इस झोंके को हम अभी आंधी तो नहीं मानेंगे लेकिन इसकी तरफ आंखें खुली रखना भी जरूरी है और लोकतंत्र-अहिंसा के दायरे में इसे यहां शुरू करना भी जरूरी है।
वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन दुनियाभर में फैला
कारपोरेट लूट, भ्रष्टाचार और सरकारी कटौतियों के खिलाफ पिछले महीने कुछ लोगों द्वारा न्यूयार्क से शुरू हुआ वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन ने यूरोप से लेकर एशिया तक को अपनी चपेट में लिया है। न्यूयार्क और मैड्रिड की तर्ज पर दुनिया भर में ऐसे प्रदर्शन करने वालों आयोजकों ने 82 देशों में शनिवार, 15 अक्टूबर को लोगों से आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया था। इस आह्वान का असर यह हुआ कि एशिया के भी कई देशों दक्षिण कोरिया, जापान, फिलीपींस, हांगकांग, ताइवान में लोग सड़कों पर उतर आए।
इटली की राजधानी रोम में पर्यटन स्थल कालोसियम के पास भारी भीड़ जमा हुई और उसमें से कुछ छात्रों ने एक बैंक पर हमला कर दिया और गाडिय़ों में आग लगा दी। छात्रों ने वहां की दीवारों को लाल रंग में लिखे नारों से रंग दिया। इसमें प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी के खिलाफ रोष प्रकट करते हुए लिखा गया था-हमारा पैसा हमें वापस करो। अमेरिका में न्यूयार्क और ह्यूस्टन शहरों में प्रदर्शन हुए।
इसी तरह न्यूजीलैंड में ऑकलैंड, वेलिंगटन, काइस्टचर्च, यूरोप में मैड्रिड, लंदन, मिलान, रोम एथेंस, सिसली एवं आस्ट्रेलिया में सिडनी, मेलबोर्न आदि शहरों में लोगों ने प्रदर्शन किया।
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में सैकड़ों की संख्या में लोग सरकार के खिलाफ लामबंद हुए। उन्होंने शहर के सिटी स्कवायर में इक_ा होकर अपना रोष व्यक्त किया। इस दौरान देश की राजधानी वेटिलंगटन से भी प्रदर्शनों की खबर है।
सिडनी में प्रदर्शन के एक आयोजक ने विरोध के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि हम सरकार बदलने की बात नहीं कर रहे हैं, हम व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। उसने कहा कि जिस तरह पैसा राजनीति पर हावी है वह बदलना चाहिए। बड़े-बड़े व्यापारिक घराने, खनन कंपनियां राजनीतिक दलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। उसने कहा कि प्रदर्शनकारी 99 फीसदी लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और वह कारपोरेट और वित्तीय जगत के एक फीसदी लोगों के लोभ और भ्रष्टाचार को खत्म करके ही दम लेंगे।
लंदन में विरोध करने वालों का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य वित्तीय व्यवस्था को निशाना बनाना है इसलिए वह वाल स्ट्रीट घेरो की तर्ज पर लंदन शेयर बाजार पर प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं।
ताइवान में विरोध कर रही एक महिला प्रदर्शनकारी ने कहा कि 2008 में मंदी के समय छंटनी के शिकार हुए लोगों को अब तक रोजगार नहीं मिला है। लोग इस आर्थिक व्यवस्था से तंग आ चुके हैं।
जापान के टोक्यो में भी सैकड़ों लोगों ने सरकार के खिलाफ रैलियां निकालीं। उनकी प्रमुख मांग जापान से परमाणु ऊर्जा की विदाई की रही।
फिलीपींस की राजधानी मनीला स्थित अमेरिकी दूतावास के सामने भी बड़ी संख्या में लोग इक_े हुए और उन्होंने साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और फिलीपींस बिकाऊ नहीं है- जैसे नारे लगाए।