(Daily Chhattisgarh)
कैंसर, खुद की गलती से, या दूसरों की गलती से, रोकने की जरूरत..
31 मई 2022
आज दुनिया में तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जा
रहा है। तम्बाकू से सेहत पर होने वाले खतरों के प्रति जागरूकता पैदा करने
की एक सालाना कोशिश इस दिन होती है, और सालाना कोशिशों का कोई असर लोगों पर
होता है, इसका कोई सुबूत तो रहता नहीं, फिर भी इस दिन कुछ लिख लिया जाता
है, या कहीं और कुछ चर्चा हो जाती है। बीबीसी पर आज 75 बरस की एक महिला की
कहानी आई है जिसके पति धूम्रपान करते थे, और इस महिला को यह अहसास नहीं था
कि उस घर की हवा में आसपास रहते हुए भी उस पर इसका असर हो रहा होगा। पति के
मरने के पांच बरस बाद जाकर उन्हें इस पैसिव स्मोकिंग की वजह से कैंसर हुआ,
और अब वे नाक से सांस नहीं ले पातीं, गले में किए गए एक छेद से उन्हें
सांस लेनी पड़ती है। लेकिन यह हादसा अकेला नहीं है। दुनिया भर के विश्व
स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि हर बरस तम्बाकू से 80 लाख मौतें हो
रही हैं, जिनमें 12 लाख लोग खुद तम्बाकू का सेवन नहीं करते थे, यानी
मोटेतौर पर वे पैसिव स्मोकर थे।
हिन्दुस्तान तम्बाकू उगाने और तम्बाकू की खपत करने वाला दुनिया का अव्वल देश है। जाहिर है कि यहां पर मुंह का कैंसर, फेंफड़े का कैंसर, और सांस नली का कैंसर भी बहुत अधिक है। ऐसा भी लगता है कि बहुत से गरीब लोग जांच में कैंसर न निकल जाए इस डर से बुढ़ापे में जांच नहीं करवाते कि परिवार इलाज कराते हुए बर्बाद हो जाएगा। फिर यह भी है कि पैसिव स्मोकिंग से कैंसर के खतरे का अहसास भी कम लोगों को है, इसलिए लोग अपने आसपास के लोगों को बीड़ी-सिगरेट पीने के लिए मना नहीं करते। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने बड़े साहब या नेता की गाड़ी चलाते हुए, मालिक की सिगरेट को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर रहते हुए पैसिव स्मोकिंग झेलते हैं, और बेकसूर मारे जाते हैं। आज भी हिन्दुस्तान में सरकारों के भीतर तमाम लिखित प्रतिबंधों के बावजूद बड़े लोग दफ्तर या गाडिय़ों में सिगरेट पीते हैं, और उनके मातहत उन्हें झेलने के लिए मजबूर होते हैं। कहने के लिए सरकारी दफ्तर में सिगरेट पीने पर हजारों का जुर्माना है, लेकिन यह जुर्माना किसी पर कभी लगा हो, यह सुनाई नहीं पड़ता।
हिन्दुस्तान में तम्बाकू को लेकर एक और बहुत बड़ी दिक्कत है जो कि दुनिया के कई विकसित देशों में यहां के मुकाबले बहुत कम है। यहां तम्बाकू और सुपारी मिलाकर बनाया गया गुटखा गली-गली बिकता है, और उन राज्यों में भी धड़ल्ले से बिकता है जहां पर इस पर कानूनी रोक लगा दी गई है। दरअसल सिगरेट, तम्बाकू, और गुटखा का कारोबार इतना बड़ा और संगठित है कि वह किसी भी राज्य की सरकारी मशीनरी को भ्रष्ट बना देता है, और यह संगठित भ्रष्टाचार गुजरात जैसे ड्राई-स्टेट में एक टेलीफोन कॉल पर पहुंचने वाले शराब के हर देशी-विदेशी ब्रांड से उजागर होता है। इसलिए जहां लोगों की तम्बाकू-गुटखा की खपत रहेगी, वहां पर पुलिस और दूसरे अफसरों की मिलीभगत से इसकी तस्करी नहीं होगी, यह सोचना ही बेकार है। इसलिए जब तक देश के किसी भी प्रदेश में सिगरेट-गुटखा की बिक्री जारी रहेगी, तब तक वह पूरे देश में मिलते रहेंगे।
भारत की सडक़ों पर इन दिनों सिगरेट पीने वाले लोग कुछ कम दिखते हैं क्योंकि उतने ही दाम में वे गुटखा खरीदकर देर तक तम्बाकू का नशा पाते हैं। यह सिलसिला इतना फैला हुआ है कि लोगों को कैंसर से बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है। एक तरीका यही दिखता है कि लोगों में कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए, और उनकी अपनी सेहत को खतरे के साथ-साथ उन्हें यह भी समझाना जरूरी है कि कैंसर होने की हालत में पूरा परिवार किस तरह तबाह होता है, और खाते-पीते घरों से भी कामकाजी लोग बेवक्त छिन जाते हैं, परिवार की जमापूंजी इलाज में खर्च हो जाती है, और जिंदगी के रोज के संघर्ष के बीच लोग इलाज के लिए बड़े शहरों के चक्कर लगाते टूट जाते हैं। ऐसा लगता है कि सरकार और समाज दोनों को मिलकर और अलग-अलग लोगों के बीच तम्बाकू से सेहत को सीधे होने वाले खतरे, परोक्ष धूम्रपान से होने वाले खतरे, और परिवार पर पडऩे वाले आर्थिक बोझ की असल जिंदगी की कहानियां रखनी चाहिए। यह भी किया जा सकता है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों के पहले और बाद में कुछ मिनटों के लिए ऐसे परिवारों के किसी व्यक्ति से उनकी तकलीफ बयान करवाई जाए ताकि बाकी लोगों पर उसका असर पड़ सके। दूसरी तरफ यह भी हो सकता है कि सार्वजनिक जगहों और दफ्तरों पर सिगरेट-तम्बाकू पर रोक को कड़ाई से लागू करवाने के लिए लोग पहल करें, क्योंकि तम्बाकू-प्रदूषण से मुक्त साफ हवा पाना हर किसी का बुनियादी हक है।
भारत चूंकि गरीब देश है, आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो परिवार में कैंसर के एक मरीज को ढो नहीं सकता है। कमाने वाला सदस्य अगर कैंसर का शिकार हो जाए, तो पूरे घर के मरने की नौबत आ जाती है। इसलिए सरकार और समाज को कैंसर के इलाज के साथ-साथ उससे बचाव पर जोर देना चाहिए जिससे कि इलाज के ढांचे पर भी जोर न पड़े, और जिंदगियां बेवक्त खत्म न हो।
कांग्रेस का यह कैसा फैसला? राज्यसभा में छत्तीसगढ़ी नहीं!
30 मई 2022
कांग्रेस पार्टी के लिए राज्यसभा के नाम तय
करना इस बार आसान भी नहीं था क्योंकि कुल दो राज्यों में उसकी सरकार है, और
उसके अनगिनत नेता अपने-अपने राज्यों में हारे बैठे हैं जो कि कांगे्रस
विधायकों वाले राज्यों से राज्यसभा पहुंचना चाहते थे। ऐसे में पार्टी ने
थोड़े बहुत नेताओं को खुश करने की जो कोशिश की है उससे छत्तीसगढ़ जैसे
राज्य को बड़ा सदमा पहुंचा है और उसे एक किस्म से बड़ी बेइज्जती झेलनी पड़ी
है। इसके पहले छत्तीसगढ़ के बीस बरस के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि
किसी पार्टी की दोनों सीटों को प्रदेश के बाहर के लोगों को दे दिया जाए।
इस बार छत्तीसगढ़ पर कांग्रेस पार्टी के एक पुराने नेता राजीव शुक्ला को
थोपा गया है जो कि कांग्रेस से अधिक क्रिकेट संगठन की राजनीति में लगे रहते
हैं, और जिन पर पहले कई तरह के गंदे आरोप लग चुके हैं। अरबपतियों के
कारोबारी खेल आईपीएल के विवाद उनके नाम चढ़े हुए हैं, वे अपनी पारिवारिक
हैसियत में अरबपति मीडिया कारोबारी भी माने जाते हैं, और कई बार राज्यसभा
में रह चुके हैं, और अब छत्तीसगढ़ पर उन्हें लादा गया है। दूसरी तरफ बिहार
के एक बाहुबली नेता पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को भी कांग्रेस ने
छत्तीसगढ़ से उम्मीदवार बनाना तय किया है जो कि बिहार में कई चुनाव जीत और
हार चुकी हैं, और अभी पिछली लोकसभा में वो कांग्रेस की सांसद थीं। अब
कांग्रेस पप्पू यादव के नाम से जानी जाने वाली उनकी पत्नी को छत्तीसगढ़ पर
लादकर क्या साबित करना चाहती है? यह राज्य जिस ओबीसी तबके के मुख्यमंत्री
का है, जहां पर मुख्यमंत्री पद के चार में से तीन दावेदार ओबीसी तबके के
थे, जहां पर पिछले विधानसभा चुनाव में ओबीसी तबके के साहू समाज ने कांग्रेस
को थोक में विधायक दिए थे, वहां पर आज प्रदेश में कई अच्छे ओबीसी नाम
खबरों में तैरते रहे, और पार्टी ने बाहर के दो लोगों को यहां भेज दिया। अभी
दो दिन पहले तक कांग्रेस छत्तीसगढ़ से किसी दलित महिला का नाम तलाश रही
थी, अब एकाएक दो बाहरी लोगों को यहां डाल दिया गया। राजीव शुक्ला की मानो
पूरी जिंदगी ही राज्यसभा में गुजरने के लिए बनी है, और पप्पू यादव का
बाहुबल उन्हें छत्तीसगढ़ तक में ताकतवर बना रहा है। कांग्रेस की ऐसी पसंद
से छत्तीसगढ़ के लोगों में भारी निराशा है, और यहां की कांग्रेस पार्टी में
निराशा होना तो जायज है ही। भारत की राजनीति में बड़ी या छोटी पार्टियां
जिन लोगों को राज्यसभा के लिए मनोनीत करती हैं उनके पीछे देश के किस
उद्योगपति का हाथ रहता है, इसे साबित करना तो नामुमकिन रहता है, लेकिन उसकी
चर्चा होते रहती है, और इस बार भी वह चर्चा हो रही है।
लेकिन इस पार्टी की समझ हैरान करती है कि दो विधायकों वाले यूपी से वह राज्यसभा के तीन उम्मीदवार दूसरे राज्यों पर थोप रही है। और जो छत्तीसगढ़ और राजस्थान डेढ़ बरस बाद एक साथ चुनाव में जाएंगे, जहां पर आज कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां पर एक भी स्थानीय नाम राज्यसभा के लिए सही नहीं समझा गया, और इन दोनों राज्यों पर दूसरे राज्यों के नेताओं को थोपा गया है। राजस्थान से तीन सदस्य राज्यसभा में जाएंगे, जिनमें पंजाब के रणदीप सिंह सुरजेवाला, महाराष्ट्र के मुकुल वासनिक, और राजस्थान के प्रमोद तिवारी के नाम हैं। यह बात भी हैरान करती है कि जिन मुकुल वासनिक की दस्तक से कांग्रेस उम्मीदवारों की लिस्ट जारी हुई उन्हें अपने गृहप्रदेश महाराष्ट्र से जगह नहीं मिली, उन्हें राजस्थान भेजा गया, और उत्तरप्रदेश से इमरान प्रतापगढ़ी को महाराष्ट्र भेजा गया। ऐसा शायद इसलिए किया गया है कि राजस्थान कांग्रेस के कुछ विधायकों ने गुलाम नबी आजाद की नाम की चर्चा होने पर उनका विरोध किया था, और शायद उसे देखते हुए ही इमरान प्रतापगढ़ी को महाराष्ट्र के रास्ते राज्यसभा लाया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को छप्पर फाडक़र सीटें दी थीं, और उसी का नतीजा है कि आज राज्यसभा की दोनों सीटों के लिए कांग्रेस के उम्मीदवारों का जीतना तय है, और भाजपा ने यहां उम्मीदवार खड़े न करना तय किया है। लेकिन अपार जनसमर्थन को अगर कांग्रेस पार्टी अपना हक मानकर इस तरह की मनमानी करती है, तो राज्य के ऐसे अपमान को वोटर अगले चुनाव में अच्छी नजर से नहीं देखेंगे। कल ये नाम आने के बाद से अभी तक सोशल मीडिया पर भी छत्तीसगढ़ कांग्रेस के छत्तीसगढ़ीवाद का मजाक उड़ रहा है कि क्या यही सबसे बढिय़ा छत्तीसगढिय़ा हैं?
हमने इसके पहले भी छत्तीसगढ़ के बाहर के थोपे गए लोगों को देखा है जिनसे इस राज्य को एक धेले का भी कोई फायदा नहीं हुआ था। कांग्रेस पार्टी ने यहां से 2004 और 2010 में मोहसिना किदवई को राज्यसभा भेजा था, जिनका एक भी काम कांग्रेस पार्टी को भी याद नहीं होगा। अभी दो बरस पहले ही दिल्ली के एक बड़े वकील केटीएस तुलसी को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा था, और दो बरस पूरे होने पर भी उनका कोई अस्तित्व छत्तीसगढ़ को नहीं मालूम है। यह नौबत इस प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत खराब है जिसने कि एक बहुत ही अभूतपूर्व ताकत हासिल की हुई है। यह मौका छत्तीसगढ़ के ऐसे लोगों को राज्यसभा में भेजने का था जो कि देश की संसद में इस प्रदेश के मुद्दों को बेहतर तरीके से उठा सकते थे। आज लोकसभा में छत्तीसगढ़ के कुल दो सांसद हैं, और पिछले लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़, राजस्थान, और मध्यप्रदेश में कुल मिलाकर 65 लोकसभा सीटों पर तीन कांग्रेस सांसद चुने गए थे, जिनमें से दो छत्तीसगढ़ से थे। ऐसे छत्तीसगढ़ को कांग्रेस ने ऐसी हिकारत से देखा है कि यहां की दोनों राज्यसभा सीटें बाहर के निहायत गैरजरूरी लोगों को दे दीं। इस बार राज्य में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आसपास ही राज्यसभा के लायक कई अच्छे नाम थे, जिनमें उनके सलाहकारों के नाम भी थे, लेकिन इनमें से किसी को मौका नहीं मिला, और विवादों से जुड़े हुए दो नाम इस राज्य पर डाल दिए गए। छत्तीसगढ़ी वोटर यह भी सोच रहे होंगे कि क्या किसी पार्टी को इतना बहुमत देने का मतलब राष्ट्रीय स्तर पर इतनी उपेक्षा झेलना भी हो सकता है? अब राज्यसभा में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से जो चार लोग रहेंगे उनमें से सिर्फ फूलोदेवी नेताम ही छत्तीसगढ़ी रहेंगी। यह राज्य ऐसे राजनीतिक फैसले का दाम चुकाएगा जब इसके हक की बात करने वाले राज्यसभा में नहीं रहेंगे।
हर मुसीबत लाती है कारोबार और सरकार के लिए विकराल संभावना!
एक तरफ दुनिया आर्थिक संकट, मंदी,
बेरोजगारी, महंगाई, और भुखमरी से गुजर रही है, दूसरी तरफ ऑक्सफेम नाम की
संस्था की नई रिपोर्ट बतलाती है कि कोरोना और लॉकडाउन के इस दौर में दुनिया
में हर तीस घंटे में एक अरबपति बना है, और दस लाख लोग गरीब हो गए हैं।
दुनिया के कामकाज पर खतरा टलने का नाम नहीं ले रहा है, कोरोना ने लोगों का
काम छीना, परिवार पर आर्थिक बोझ डाला, और देश-प्रदेश की सरकारों की कमर टूट
गई। इलाज और टीकाकरण पर अंधाधुंध खर्च हुआ, और टैक्स की कमाई मारी गई।
इससे दुनिया उबर नहीं पाई थी कि रूस यूक्रेन पर टूट पड़ा, और दुनिया की
आर्थिक बदहाली की आग में मानो रूसी पेट्रोल पड़ गया। इसी के समानांतर चीन
में कोरोना-लॉकडाउन इतना भयानक रहा कि करोड़ों की आबादी वाला शंघाई शहर
पूरा का पूरा महीनों से सील किया हुआ है, और इस शहर में दुनिया का सबसे
बड़ा बंदरगाह है, और जहाज लंगर डाले खड़े हैं। चीन से पुर्जे और कच्चा माल न
निकल पाने की वजह से दुनिया भर में सामान बनना धीमा हो गया है, और यह नौबत
कब सुधरेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है।
ऐसे में स्विटजरलैंड में अभी वल्र्ड इकॉनामिक फोरम की बैठक के दौरान बाहर ऑक्सफेम की रिपोर्ट पेश हुई जिसने बताया कि पिछले दो सालों में दुनिया में 573 नए अरबपति बने हैं। मतलब यह कि महामारी हो, या भुखमरी, कुछ लोगों की कमर टूटती है, और कुछ लोगों का बाहुबल बढ़ता है। हर मुसीबत दुनिया के कुछ लोगों के लिए मौका लेकर आती है, और उनको भारी मुनाफा देकर जाती है। हिन्दुस्तान में इन बरसों में करोड़ों लोगों का रोजगार गया, लेकिन सरकार के पसंदीदा समझे जाने वाले देश के दो सबसे बड़े उद्योगपतियों की दौलत एक-दूसरे से मुकाबला करते हुए, जंगली हिरण की तरह छलांग लगाते हुए आगे बढ़ रही है, और वह फीसदी में नहीं, गुना में बढ़ रही है।
किसी भी तरह की मुसीबत दुनिया में गैरबराबरी को बढ़ाने का काम करती है। गरीबी और अमीरी के बीच का फासला बढऩा एक बात रही, दूसरी बात यह भी रही कि दुनिया के जिस देश में मुसीबत जितनी बड़ी रही, वहां पर लोकतंत्र के भीतर भी राजा और प्रजा कहे जाने वाले दो तबकों के बीच फासला उतना ही बढ़ गया। दुनिया के कई देशों में महामारी और लॉकडाउन के इस दौर को देखने पर पता चलता है कि वहां के शासकों के मिजाज और कामकाज में तानाशाही बढ़ गई, और लोगों के बुनियादी अधिकार घट गए। जब महामारी जैसी मुसीबत रहती है, तो फिर लोग अपने से परे किसी और के किसी हक की परवाह भी नहीं करते, फिर चाहे वह बुनियादी लोकतांत्रिक हक हों, या कि समाज के व्यापक मानवाधिकार हों। लोगों को, लोकतांत्रिक देशों के बहुसंख्यक लोगों को मुसीबत के वक्त देश में ऐसे शासक पसंद आते हैं जो कि कड़़े फैसले बिना किसी दुविधा के ले लेते हैं, फिर चाहे वे फैसले गलत, बुरे, और नुकसानदेह ही क्यों न हों। जब देश मुसीबत से गुजरते रहता है, तो लोग मुसीबत अपने दरवाजे तक पहुंचने से रोकने के लिए शासक को और अधिक ताकत देकर उस पर जिम्मा डाल देना चाहते हैं। इसलिए दुनिया के कई देशों में पिछले दो बरसों में शासक अधिक तानाशाह हुए हैं। इस तरह देखें तो परेशानी और मुसीबत के इस दौर में एक तरफ गरीबी और अमीरी का फासला बढ़ा है, दूसरी तरफ लोकतांत्रिक देशों के शासन में तानाशाह तौर-तरीके भी बढ़े हैं।
लोगों को याद होगा कि कारोबार को लेकर हमेशा से एक बात चलन में रही है कि पैसा पैसे को खींचता है। जब किसी नए कारोबार, या मुसीबत से पैदा हुए नए कारोबार की गुंजाइश निकलती है, तो रातोंरात पूंजीनिवेश करने की गुंजाइश रखने वाले कारोबारी को ही शुरूआती फायदा मिलता है। मुकाबले में दूसरे कारोबारी जब तक पूंजी का इंतजाम करते हैं, तब तक धनसंपन्न कारोबारी उस संभावना पर एकाधिकार सा जमा चुके रहते हैं। यह भी एक बड़ी वजह है कि पिछले दो सालों में 573 नए अरबपति पैदा हुए हैं। ये वे लोग रहे होंगे जो पहले से कारोबार में थे, और जिनके पास रातोंरात अपने कारोबार को बढ़ाने की ताकत रही होगी, और वे दो बरस के इस दौर में करोड़पति से अरबपति हो गए।
लेकिन पूंजी की इस अंतरिक्ष यात्रा के बीच यह एक विसंगति दुनिया के सामने है कि आज बहुत से देशों में लोगों के पास खाने को नहीं रह गया है, और अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संस्थाओं के पास उन्हें देने के लिए अनाज नहीं रह गया है। आज दुनिया के कुछ देशों में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपनी मदद को हर किसी को बांटने के बजाय सीमित आबादी को जिंदा रखने के लिए पर्याप्त अनाज दे रही हैं, ताकि तमाम लोगों के मरने के बजाय कम से कम कुछ लोग तो बच जाएं, और बाकी लोगों के बारे में उन्होंने मान लिया है कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने के अलावा और कोई चारा नहीं है। लोगों को याद होगा कि पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त एक अमरीकी फोटोग्राफर ने एक अफ्रीकी बच्चे की फोटो ली थी, जो जमीन पर से कुछ उठाकर खाते हुए जिंदगी के आखिरी दिन या घंटे गुजार रहा था, और उसके ठीक पीछे एक गिद्ध आकर इंतजार करते बैठ गया था। बाद में इस तस्वीर को लेकर बड़ा बवाल हुआ था, और फोटोग्राफर की किसी और वजह से की गई आत्महत्या इसी तस्वीर से उपजे मानसिक अवसाद से जोड़ी गई थी।
आज भी दुनिया में लोगों के बीच अनाज बांटते हुए काम करते अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लोगों के बीच ऐसी ही दिमागी हालत पैदा होते जा रही है क्योंकि उन्हें आबादी के एक हिस्से को अनाज देना बंद कर देना पड़ रहा है, ताकि जिंदा रहने की थोड़ी संभावना वाले दूसरे हिस्से को जिंदा रखा जा सके।
आज जब दुनिया को यह भी समझ नहीं आ रहा है कि उसका सबसे बुरा वक्त अभी आ चुका है, या अगले कई महीनों तक इससे बुरा वक्त आते रहेगा, तब अगर दुनिया की कुछ कंपनियों के शेयरों के दाम लगातार बढ़ते चल रहे हैं, कुछ कारोबारी अरबपति हो रहे हैं, कुछ अरबपति से खरबपति हो रहे हैं, तो इसका श्रेय दुनिया पर आई हुई मुसीबत को जाता है जो कि ऐसी अभूतपूर्व और विकराल संभावनाएं खड़ी कर रही हैं। जलती लाशों के बदन पर रोटी सेंकने के इस कारोबार में बहुत नया कुछ भी नहीं है, सिवाय इस बार के उसके बढ़ते विकराल आकार के!
सात जिंदगियों की सामूहिक आत्महत्या से तो आंखें खुलें!
29 मई 2022
राजस्थान से दिल दहलाने वाली खबर आई है कि
एक ही परिवार की तीन बहनों की शादी एक ही घर में हुई थी, और अब उन्होंने एक
साथ अपने दो बच्चों को लेकर आत्महत्या कर ली है। ये सब बहनें 20-25 बरस के
आसपास की थीं, और दोनों बच्चे बहुत छोटे थे, दो बहनें गर्भवती भी थीं।
लड़कियों के मायके का कहना है कि तीनों को ससुराल में दहेज के लिए बार-बार
पीटा जाता था, और तंग आकर उन्होंने सामूहिक आत्महत्या कर ली। मायके के पास
अपनी जुबानी शिकायत के अलावा एक बहन का वॉट्सऐप स्टेटस है जिसमें उसने लिखा
है- हम अभी जा रहे हैं, खुश रहें, हमारी मौत का कारण हमारे ससुराल वाले
हैं, हर दिन मरने से बेहतर है कि एक बार में ही मर जाएं। तमाम लाशें मिल
जाने के बाद इन तीनों बहनों के पतियों और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज
प्रताडऩा और आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मामला दर्ज किया गया है, और
गिरफ्तार किया गया है।
आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि आत्महत्या की कगार पर पहुंचे हुए लोगों को अगर मन हल्का करने के लिए कोई भरोसेमंद मिल जाए, तो उनकी आत्महत्या की सोच टल भी सकती है, खत्म भी हो सकती है। लेकिन यहां तो एक साथ रहती तीनों बहनें इस तरह प्रताडि़त थीं कि आत्महत्या का फैसला शायद एक-दूसरे से बात करके और पुख्ता ही हो गया। आत्महत्या के विश्लेषकों का यह मानना रहता है कि महिलाएं आत्महत्या करते हुए बच्चों को पहले इसलिए मार देती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके बाद बच्चों की जिंदगी और खराब रहेगी, और उससे अच्छा उनका मर जाना रहेगा। भारत में महिलाओं की आत्महत्या में से बहुत की वजह दहेज प्रताडऩा रहती है जिसके चलते उसके दिमाग में ससुराल के लोग बार-बार यह बात बिठाते हैं कि वह मर जाए तो ससुराल सुखी रहेगा। बहुत सी लड़कियों की जिंदगी में शादी के बाद मायके लौटने का विकल्प नहीं रहता क्योंकि हिन्दुस्तानी समाज में उसके दिमाग में यह बात बार-बार कूट-कूटकर भरी जाती है कि उसकी डोली मायके से उठी है, और उसकी अर्थी उसके ससुराल से उठनी चाहिए। भारत का कानून शादीशुदा लडक़ी को भी अपने माता-पिता की संपत्ति में हक दिलाने की बात करता है, लेकिन असल जिंदगी में यह माहौल बना दिया जाता है कि लडक़ी का हक उसके दहेज की शक्ल में दिया जा चुका है, और बची हुई दौलत भाईयों की होती है। यह सब चलते हुए बहुत सी लड़कियां ससुराल में घुट-घुटकर मर जाती हैं, आत्महत्या कर लेती हैं, या उनकी दहेज-हत्या हो जाती है, लेकिन मां-बाप के घर लौटने की नहीं सोच पातीं।
एक दूसरी बड़ी वजह शादीशुदा लड़कियों की आत्महत्या की यह भी है कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं रहती हैं, उनकी नौकरी या कामकाज ससुराल ही छुड़वा देता है, या मां-बाप लगने ही नहीं देते हैं, और ससुराली प्रताडऩा के बीच भी उसके पास वहां से बाहर निकलकर अपने पैरों पर खड़े होने और जिंदगी गुजारने का विकल्प नहीं रहता है। जो लड़कियां शादी के बाद भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहती हैं, शायद उनकी आत्महत्या की नौबत कम आती होगी। इसलिए ऐसी हत्या या आत्महत्या की खबरें पढ़ते हुए भारतीय समाज में लडक़ी और उसके मां-बाप को चाहिए कि वे उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर ही उसकी शादी करें। जिस राजस्थान से ऐसी सामूहिक आत्महत्या की खबर आई है, वहां पर अभी भी बाल विवाह का चलन है, और एक समाचार बताता है कि इस आत्महत्या में शामिल तीनों बहनों की शादी बचपन में ही तीनों भाईयों से हो गई थी, और कुछ बड़ी होने के बाद वे अपने पतियों के पास रहने आई थीं। बाल विवाह हिन्दुस्तान में एक बड़ी वजह है कि लडक़ी न शादी के पहले आत्मनिर्भर हो पाती, और न शादी के बाद। बाल विवाह के खिलाफ कानून कड़ा है, लेकिन इसका प्रचलन खत्म ही नहीं हो रहा है, और ऐसे बाल विवाह लडक़ी के व्यक्तित्व का कोई विकास नहीं होने देते, उसकी पूरी जिंदगी ससुराल में गुलाम कैदी की तरह बना देते हैं।
यह मामला इतना बड़ा है जिसमें तीन सगी बहनें दो बच्चों के साथ आत्महत्या कर रही हैं, और दो की कोख में अजन्मे बच्चे पल भी रहे थे। इस तरह सात जिंदगियां एक साथ खत्म हुई हैं। इस मामले से भारतीय समाज की आंखें खुलनी चाहिए, और अलग-अलग जात-बिरादरी के भीतर इस मिसाल को लेकर चर्चा होनी चाहिए कि लड़कियों की बदहाली कैसे घटाई जा सकती है, और कैसे उसे आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनाया जा सकता है। एक अकेली आत्महत्या शायद लोगों को जगाने के लिए काफी न होती, लेकिन अभी यह मामला जितना भयानक है उससे समाज की व्यापक सोच में बदलाव आना चाहिए।
ऐसा भी नहीं हो सकता कि इस परिवार के और लोगों को, या पड़ोस के लोगों को इतनी पारिवारिक हिंसा की जानकारी न हुई हो। अब या तो वे सीधी दखल देना नहीं चाहते होंगे, या फिर पुलिस पर उनका भरोसा नहीं होगा कि उससे शिकायत करके उनका नाम गोपनीय रह सकेगा। एक पूरे परिवार की ऐसी नौबत आने के बाद भी उसे बचाने के लिए कुछ न करना, आसपास के लोगों की बेरूखी भी बताता है, और बाकी समाज में इस पर भी चर्चा होनी चाहिए कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी ऐसे में क्या बनती है। आखिर में हम इसी बात को दुहराना चाहेंगे कि देश के कानून के मुताबिक मां-बाप को लडक़ी को उसका हक देना चाहिए, और अगर ऐसा हक मिलने का भरोसा रहेगा, तो बहुत सी लड़कियां आत्महत्या करने के बजाय मायके लौटने की सोच सकेंगी।
बंदूकों पर रोक से क्या सामूहिक हत्याओं को रोक पाएगा अमरीका?
28 मई 2022
अमरीका में नागरिकों के निजी हथियार सदियों
से बहस का सामान रहे हैं। अठारहवीं सदी में अंग्रेजों की गुलामी से आजादी
पाने के लिए नागरिकों ने भी अपने हथियारों सहित लड़ाई में हिस्सा लिया था,
और बाद में जब अमरीका का संविधान बना तो नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की
फेहरिस्त में निजी हथियार रखना दूसरे ही नंबर पर था। तब से बहस भी चल रही
है कि क्या नागरिकों को इतनी आसानी से हथियार खरीदने की छूट रहनी चाहिए,
लेकिन हथियार निर्माताओं की तगड़ी लॉबी कभी इस छूट के खिलाफ कोई कानून बनने
नहीं देती। अभी एक पखवाड़े के भीतर अमरीका में दो बड़ी शूटिंग हुईं, एक
में दस काले लोगों को मार डाला गया, और दूसरी में बीस स्कूली बच्चों की
हत्या कर दी गई। इसके बाद एक बार फिर यह बहस चल रही है कि अमरीका में
हथियारों को लेकर कुछ नए प्रतिबंध लगाए जाएं, और जैसा कि हमेशा से होते आया
है, वहां की रिपब्लिकन पार्टी किसी भी नियंत्रण का विरोध कर रही है
क्योंकि इस पार्टी का हाल यह है कि कोई इसके सांसद बनने के लिए पार्टी का
उम्मीदवार बनना चाहे, तो उस उम्मीदवारी के लिए भी उसे गन लॉबी से अनापत्ति
प्रमाणपत्र लेना पड़ता है। इसलिए देश की एक सबसे बड़ी पार्टी खुलकर
हथियारों की आजादी की हिमायती है, और ऐसे में वहां की संसद से नागरिकों के
बुनियादी अधिकार पर किसी किस्म के संशोधन की कोई गुंजाइश किसी को दिखती
नहीं है।
लेकिन अमरीका के इस घरेलू खतरे की बारीकियों से परे इस मुद्दे पर एक व्यापक नजर डालें तो यह दिखता है कि अमरीका में अभी चालीस करोड़ या उससे अधिक बंदूकें हैं, और इनमें से अधिकतर नागरिकों के पास हैं जिन्हें अठारह बरस का होने पर एक से अधिक हमलावर हथियार खरीदने की आजादी है। 2018 के आंकड़े बताते हैं कि वहां सौ नागरिकों के बीच 120 हथियार हैं, मतलब यह कि बहुत से लोगों के पास एक से अधिक हथियार भी हैं। अभी स्कूल में बच्चों को मार डालने वाले नौजवान ने कुछ समय पहले ही अपने अठारहवें जन्मदिन पर अपने को दो बंदूकें तोहफे में दी थीं, जो कि अमरीका में हमलावरों की सबसे पसंदीदा बंदूक है। अब जब वहां के फिक्रमंद मां-बाप में से कुछ लोग हथियारों पर कुछ रोक की बात कर रहे हैं, तो एक बार फिर हथियार उद्योग लोगों को सुझा रहा है कि वह तो स्कूल के शिक्षकों को हथियार बंद करने की बात बहुत समय से करते आया है। लेकिन कुछ समझदार लोगों का यह मानना है कि ऐसी कोई वजहें नहीं हैं जिनसे यह मान लिया जाए कि शिक्षकों के हथियार बंद होने से स्कूलों में हिंसा घट जाएगी। दूसरी तरफ हथियारों पर किसी भी रोक के खिलाफ जो लोग हैं उनका तर्क यह है कि हत्याएं हथियार नहीं करते हैं, उनके पीछे के दिमाग करते हैं, और सरकार को मानसिक रूप से बीमार या हिंसक ऐसे लोगों को इलाज की जरूरत है, और जब कभी वे कोई धमकी या चेतावनी पोस्ट करते हैं तो उस पर नजर रखने की जरूरत भी है ताकि उन्हें कोई सामूहिक हिंसा करने से रोका जा सके।
आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि क्या अमरीका को सचमुच ही कम हथियारों से अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है? क्या यह तर्क जायज है कि चालीस करोड़ हथियारों वाले देश में पिछले बीस बरस में कुल सौ सामूहिक हत्याएं हुई हैं। इसका एक मतलब यह भी है कि हथियार रखने वाले अधिकतर लोगों ने कोई सामूहिक हत्याएं नहीं की हैं, बल्कि कोई भी हत्याएं नहीं की हैं। लेकिन एक दूसरा आंकड़ा बताता है कि 2020 में ही 45 हजार अमरीकियों की मौत पिस्तौल-बंदूक की गोलियों से हुई हैं, चाहे वे आत्महत्या हुई हों, या हत्याएं। मतलब यह है कि सामूहिक हत्या की घटनाओं को देखें तो ऐसा लगता है कि हथियार के मुकाबले उसके पीछे के दिल-दिमाग की अधिक बड़ी भूमिका हिंसक फैसलों में रही हैं। अगर हथियार रखने से ही लोग हिंसा पर उतारू हो जाते तो चालीस करोड़ हथियारों वाले, या सौ की आबादी पर 120 हथियारों वाले देश में कोई जिंदा ही नहीं बचते। अब अमरीकी बुनियादी अधिकार की बात को अगर अलग रखें, तो हिन्दुस्तान जैसे देश की मिसाल सामने है जहां गिने-चुने नागरिकों के पास ही हथियार रहते हैं क्योंकि एक-एक लायसेंस के लिए लोगों को बरसों तक सरकार में संघर्ष करना पड़ता है। और हिन्दुस्तान में हथियारों की हिंसा में ऐसी कोई कमी भी नहीं है, रोजाना दर्जनों लोग हथियारों की गोलियों से मारे जाते हैं। यह एक अलग बात है कि अमरीका की तरह की सामूहिक हत्याएं यहां पर नहीं होती हैं, और दिलचस्प बात तो यह है कि अमरीका की तरह के जो दूसरे पश्चिमी देश हैं उनमें भी कहीं पर भी ऐसी हत्याएं नहीं होती हैं, सिर्फ अमरीका में ही होती हैं।
ऐसे हत्यारे आमतौर पर किसी नस्ल या धर्म के लोगों के खिलाफ रहते हैं, और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी रहे हैं जिनकी कुछ बुरी यादें अपने स्कूल को लेकर रही हैं, और वे उसका हिसाब चुकता करने के लिए वहां जाकर सामूहिक हत्या कर आए हैं। लोगों के पास बड़ी संख्या में हथियार रहना अच्छी बात नहीं है क्योंकि उससे दूसरे लोग भी मारे जाते हैं, खुद भी मरते हैं, और लंबी-चौड़ी सजा भी होती है। लेकिन सामूहिक हत्या को लेकर अगर हथियारों की कमी की बात की जाए, तो अमरीका में कभी भी ऐसा तो हो नहीं सकता कि निजी हथियारों पर पूरी रोक लग जाए। उनमें अगर कमी या कटौती होगी, हथियार लेने के पहले लोगों का मानसिक परीक्षण होगा, तो चालीस करोड़ लोगों का मानसिक परीक्षण, या उनके सामाजिक बर्ताव पर निगरानी किसी भी सरकार की क्षमता के बाहर का काम होगा। हम निजी हथियारों के खिलाफ हैं, क्योंकि उनका इस्तेमाल आत्मरक्षा के लिए तो बहुत ही कम होता है, अपने आपको या किसी दूसरे बेकसूर को मारने के लिए अधिक होता है। लेकिन अमरीका में आज जिस तर्क के साथ, सामूहिक हत्याओं को रोकने के लिए निजी हथियारों पर किसी किस्म की रोक की बात की जा रही है, वह ऐसी सामूहिक हत्याओं का इलाज नहीं दिख रही है। सामूहिक हत्याओं के पीछे की वजहों को तलाशना भी जरूरी होगा। और इस मुद्दे पर चर्चा का एक मकसद यह भी है कि दुनिया में जहां कहीं जटिल समस्याएं रहती हैं, वहां पर जाहिर तौर पर समस्या की जड़ जो दिखती है, उसकी असली जड़ शायद उससे अलग भी हो सकती है। यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।
कुत्ते के लिए स्टेडियम खाली करवाना घटना नहीं, नौकरशाही की सोच है
27 मई 2022
दिल्ली के एक बड़े अखबार, इंडियन एक्सप्रेस
में छपी एक खबर के बाद दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस जोड़े का तबादला
दिल्ली से दूर लद्दाख और अरूणाचल कर दिया गया है। अखबार की खबर थी कि एक
बड़े सरकारी स्टेडियम, त्यागराज स्टेडियम में ये अफसर शाम को अपना कुत्ता
घुमाने ले जाते थे, और इस वजह से वहां खेल की प्रैक्टिस कर रहे सभी सैकड़ों
खिलाडिय़ों को सात बजे के पहले स्टेडियम से बाहर निकाल दिया जाता था।
नौकरशाही की बददिमागी की यह एक आम मिसाल है, और देश भर में जगह-जगह आईएएस
और आईपीएस अफसरों की ऐसी तरह-तरह की मनमानी चलती रहती है, जिस पर बड़े
वजनदार सत्तारूढ़ राजनेताओं का भी कोई बस नहीं चलता। अखिल भारतीय सेवाओं के
अफसर सत्ता की तमाम ताकत का बुरी तरह इस्तेमाल करने के लिए बदनाम रहते
हैं, और जाहिर तौर पर सरकारी नियमों के खिलाफ होने पर भी वे तकरीबन हर
मामले में बचे ही रहते हैं।
एक वक्त इन नौकरियों को देश की सेवा करने का एक मौका माना जाता था, लेकिन वक्त ने यह साबित किया कि यही स्थाई शासक हैं, और निर्वाचित नेता तो पांच-पांच बरस में आते-जाते रहते हैं। दूसरी बात देश-प्रदेश में यह भी देखने मिलती है कि सरकार चला रहे मंत्रियों में खुद में समझ की इतनी कमी रहती है कि वे अपने मातहत आने वाले बड़े अफसरों के राय-मशविरे के मोहताज रहते हैं, नीतियां बनाने में भी नेताओं को अफसरों की मदद लगती है। इसके अलावा एक बड़ी बात जिसने हिन्दुस्तान में सरकारी कामकाज को तबाह किया है, वह नेताओं की भ्रष्टाचार की चाहत है, जिसके चलते हुए वे अपने अफसरों के साथ गिरोहबंदी में लग जाते हैं, और पार्टनरशिप फर्म की तरह साझा कमाई में हिस्सा बांटा होने लगता है। जब ऐसी नौबत आ जाती है तो अफसरशाही और बेलगाम हो जाती है क्योंकि रिश्वत और कमीशन खाने-कमाने के तरीके उन्हें नेताओं से ज्यादा आते हैं।
हिन्दुस्तान में सत्ता के बेजा इस्तेमाल का हाल इतना खराब है कि देश की राजधानी में बड़े से सरकारी स्टेडियम में अपने-अपने खेल की प्रैक्टिस कर रहे सैकड़ों खिलाडिय़ों को सात बजे के पहले हर हाल में बाहर करके अफसर परिवार अपना कुत्ता घुमाता है, और आधी-अधूरी प्रैक्टिस छोडक़र खिलाडिय़ों को चले जाना पड़ता है। ऐसा राज्यों में भी अधिकतर जगहों पर होता है जहां अफसर पूरी तरह बेलगाम रहते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में जहां गरीब आदिवासी बसते हैं, वहां पर एक आईएफएस ने अपने सरकारी बंगले में सरकारी पैसे से स्वीमिंग पूल बनवा लिया था, जिसका खूब हंगामा हुआ, जांच का भी नाटक किया गया, लेकिन अफसर का कुछ भी नहीं बिगड़ा। प्रदेश के अधिकतर बड़े अफसर एक की जगह आधा-आधा दर्जन तक गाडिय़ां रखते हैं, बड़े बंगलों में दर्जनों सिपाही-कर्मचारी बेगारी करते हैं, और ऐसे हर छोटे कर्मचारी का सरकार पर बहुत बड़ा बोझ रहता है। अधिकतर बड़े अफसर अपनी तनख्वाह से कई गुना अधिक का बोझ सरकार पर डालते हैं, और बंगलों के रख-रखाव के अलावा कहीं सिपाही और कर्मचारी सब्जियां उगाने का काम करते हैं, कहीं कुत्ता घुमाते हैं, और कहीं बच्चों को खिलाते हैं।
केन्द्र सरकार ने दो आईएएस अफसरों की इस तरह सजा वाली पोस्टिंग करके एक अच्छी मिसाल कायम की है, और राज्यों को भी इससे सीखना चाहिए। अखिल भारतीय सेवाओं का पूरा ढांचा पूरे देश में एक जैसी कार्य संस्कृति के लिए भी बना है, और वह बीते दशकों में धीरे-धीरे धराशाही होते रहा। बहुत से जानकार लोगों का यह भी मानना है कि यह प्रशासनिक ढांचा अंग्रेजों के वक्त काले हिन्दुस्तानियों पर राज करने के लिए तो ठीक था, लेकिन अब यह काउंटर प्रोडक्टिव हो गया है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम नौकरशाही की सबसे ताकतवर कुर्सी, जिला कलेक्टरी का नाम बदलने की वकालत करते आए हैं। अब कलेक्टर कुछ कलेक्ट नहीं करते हैं, बल्कि राज्य की और केन्द्र की कमाई को जिलों में खर्च करने का काम करते हैं। इसलिए कलेक्टर या जिलाधीश पदनाम को बदलकर जिला जनसेवक नाम रखना चाहिए ताकि नाम की तख्ती से उनकी सोच पर भी फर्क पड़ सके। आज उनका रूतबा इस नाम और उसके साथ जुड़ी हुई ताकत की वजह से बने रहता है, और इस सामंती ढांचे को तोडऩे की जरूरत है। जब कलेक्टरों का नाम जिला जनसेवक रहेगा, तो वे अस्पताल में बीमारों को देखते हुए उनके पलंग पर अपने जूते वाले पैर रखना भूल जाएंगे। लोगों को यह अहसास लगातार कराने की जरूरत रहती है कि उनका काम क्या है और उनकी जिम्मेदारी क्या है। राज्य सरकारें अपने स्तर पर भी अफसरों के पदनाम बदल सकती हैं, और इसमें देर नहीं करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लगातार गांव-गांव का दौरा कर रहे हैं, और उनके भी देखने में आया होगा कि कई जगहों पर कलेक्टर बहुत बददिमागी से काम करते हैं। इसलिए इस एक कुर्सी के नाम और काम में इतनी सारी ताकत बनाए रखना सही नहीं है। दिल्ली में एक अखबार की रिपोर्टिंग से इस आईएएस जोड़े की बददिमागी सामने आई है, लेकिन देश भर में इस बददिमागी को खत्म करने की जरूरत है।
26 मई 2022 जिम्मेदारी से मुंह चुरातीं संसद और सरकार का काम करती सुप्रीम कोर्ट
26 मई 2022
अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा क्रांतिकारी
आदेश दिया है जिससे हिन्दुस्तान में वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की
लंबे समय से चली आ रही एक सोच को शक्ल मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने देश की
पुलिस को हिदायत दी है कि बालिग और सहमति से यौन संबंध बनाने वाले
सेक्सकर्मियों के काम में दखल न दे। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस को इनके
खिलाफ जुर्म भी दर्ज नहीं करना चाहिए। तीन जजों की एक बेंच ने वेश्यावृत्ति
को एक पेशा मानते हुए कहा कि कानूनन इस पेशे को भी इज्जत और हिफाजत मिलनी
चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के बुनियादी हक का जिक्र करते हुए कहा कि
पेशा चाहे जो हो, देश में हर व्यक्ति को संविधान इज्जत की जिंदगी जीने का
हक देता है, और दूसरे किसी भी नागरिक की तरह यौनकर्मी भी समान रूप से
हिफाजत के हकदार हैं। अदालत ने यह भी साफ किया है कि अगर किसी वेश्यालय पर
छापा मारा जाए तो वेश्याओं को गिरफ्तार या दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
वेश्या नाम से ही नफरत करने वाली आम मर्दाना हिन्दुस्तानी सोच, और हिन्दुस्तान के एक गढ़े हुए फर्जी इतिहास के दावेदारों को सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से भारी सदमा लगेगा। अब तक कोई वेश्या अपना बदन बेचकर जितनी कमाई करती थी, उसका एक बड़ा हिस्सा चकलाघर चलाने वाले लोग, दलाल, और पुलिस के लोग ले जाते थे। उसके बदन पर पलते कई लोग थे, लेकिन गालियां महज उसका बदन पाता था। आज जब लोग देश को बेच रहे हैं, सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए ईमान को बेच रहे हैं, दूसरे पेशों और धंधों में लगे हुए लोग हर नीति-सिद्धांत को बेच रहे हैं, वहां गाली खाने लायक बिक्री महज एक वेश्या की देह मानी जाती है। और इसी का नतीजा है कि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अरसा पहले सेक्सकर्मियों को लेकर सिफारिशें देने के लिए एक पैनल बनाया था, और अभी उस पैनल की सिफारिशें आने पर केन्द्र सरकार की राय लेकर कुछ सिफारिशों पर आदेश जारी किया है, और कुछ दूसरी सिफारिशों पर केन्द्र की असहमति देखते हुए उन पर केन्द्र सरकार से छह हफ्ते में जवाब मांगा है।
यह फैसला हिन्दुस्तान के नागरिकों के बीच समानता को कुचलने वाले बूट को हटाने वाला दिख रहा है। हम इस अखबार में बीते बरसों में कई बार वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की वकालत करते आए हैं, और कल सुप्रीम कोर्ट ने ठीक वही किया है। अभी इस पर आखिरी फैसला नहीं आया है, लेकिन जिन सीमित बातों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ आदेश सभी राज्यों और केन्द्र प्रशासित प्रदेशों को दिया है, वह क्रांतिकारी है। वह समाज के सबसे अधिक कुचले हुए, और सबसे अधिक शोषित तबके को इंसानी हक देने वाला है। सुप्रीम कोर्ट जजों ने यह साफ किया है कि किसी वेश्यालय पर छापा मारा जाए तो भी किसी सेक्स वर्कर को गिरफ्तार, दंडित, परेशान, या पीडि़त नहीं करना चाहिए, क्योंकि सिर्फ वेश्यालय चलाना अवैध है, वेश्यावृत्ति नहीं। इसलिए कार्रवाई सिर्फ वेश्यालय चलाने वाले पर की जाए। अदालत ने इस मामले में दो बड़े सीनियर वकीलों को न्यायमित्र नियुक्त किया था, और उनकी इस सिफारिश को भी अदालत ने माना है कि अधिकारी किसी वेश्या को उसकी मर्जी के खिलाफ लंबे समय तक सुधारगृह में रखते हैं, और यह सिलसिला गलत है। अदालत ने यह सुझाया है कि मजिस्ट्रेट के सामने पेश की गई सेक्स वर्कर अपनी मर्जी से यह काम कर रही है या किसी दबाव में, यह तुरंत ही तय किया जा सकता है, और उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ किसी सुधारगृह में रखना गैरकानूनी है।
जब देश की संसद कड़वे फैसले लेने से कतराती हो, जब राजनीतिक दल देश के झूठे गौरव का गुणगान करके अपनी दुकान चलाते हों, तब संसद के हिस्से के कई काम अदालतों को करने पड़ते हैं। वेश्यावृत्ति को लेकर अदालत का यह आदेश, और उसका रूख इसी बात का सुबूत है। देश के एक इतने खुले हुए सच के अस्तित्व को ही मानने से तमाम सत्तारूढ़ ताकतें जिस हद तक परहेज करती हैं, उसे देखना हक्का-बक्का करता है। इस देश में वेश्या शब्द की मौजूदगी को ही नकार देने का मतलब उन्हें मुजरिमों, दलालों, और पुलिस के हाथों शोषण का शिकार करने के लिए छोड़ देने के अलावा कुछ नहीं है। जिस समाज में कोई महिला अपनी पसंद या बेबसी के चलते अपनी देह बेच रही है, उसे खरीदने को तो पूरी मर्द-जमात खड़ी है, लेकिन फारिग हो जाने के बाद उन्हें इंसान भी मानने से इंकार कर देने की मर्दानी सोच इस देश पर हावी है। इसलिए यह लोकतांत्रिक फैसला लेने का फख्र संसद को हासिल नहीं हो पाया, अदालत को हासिल हुआ है। इस देश की संसद, और उसे हांक रही सरकार अभी कुदाली लेकर डायनासॉर की हड्डियों तक पहुंचने की खुदाई में लगी हुई है, इसलिए 21वीं सदी के 22वें बरस की हकीकत का सामना करने का काम अदालत को करना पड़ रहा है।
इस फैसले से हिन्दुस्तान की पुलिस को एक सदमा लगेगा क्योंकि अभी तक देह के धंधे को जुर्म बनाने का उसका आसान सिलसिला खत्म हो गया है। किसी होटल या किसी घर में साथ रहने वाले दो बालिग लडक़े-लडक़ी या आदमी-औरत को परेशान करने के लिए उन पर कई बार ऐसा जुर्म कायम कर दिया जाता था, और यह आसान हथियार अब उसके हाथ से निकल गया है। हम अदालत के इस आदेश और इस रूख की तारीफ करते हैं, और यह उम्मीद करते हैं कि वेश्याओं के पुनर्वास के लिए, उनके नाबालिग बच्चों की भलाई के लिए जिन मुद्दों पर अभी फैसला आना बाकी है, उन मुद्दों पर देश के इस सबसे बेजुबान तबके को उसका जायज हक मिलेगा। भारतीय लोकतंत्र को यह आत्मविश्लेषण भी करना चाहिए कि क्यों उसकी संसद, और सरकार अपनी जिम्मेदारी से इस हद तक मुंह चुराती हैं कि अदालत को आगे आकर नागरिकों को उनका बुनियादी हक दिलाना पड़ता है?
संसद में जरूरत से अधिक बाहुबल से लोकतंत्र को खतरे
25 मई 2022
हिन्दुस्तान में कभी देश की सरकार तो कभी
किसी प्रदेश की सरकार को लेकर राजनीतिक स्थिरता पर बातचीत होती है। पश्चिम
बंगाल में हिन्दुस्तान की सबसे लंबी वाममोर्चा सरकार तीन दशक से अधिक तक
लगातार चली थी। अभी हाल तक छत्तीसगढ़ में बीजेपी की डॉ. रमन सिंह सरकार
पन्द्रह बरस चली थी, और कुछ दूसरे राज्यों में किसी एक पार्टी या एक
मुख्यमंत्री की सरकार इससे भी अधिक समय तक चली हैं। सरकार की लंबाई एक बात
होती है, और सरकार का संसदीय बाहुबल एक दूसरी बात होती है। इस देश में कुछ
पार्टियों का संसदीय बाहुबल देश या प्रदेश की सरकारों को चलाने के लिए
जरूरत से खासा अधिक था, और वैसे में संसदीय कामकाज पर इस अतिरिक्त बाहुबल
का कैसा असर पड़ता है, यह सोचने की बात है।
जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की सहानुभूति लहर के चलते उन्हें कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा संसदीय बाहुबल मिला था। वह सरकार विशुद्ध कांग्रेस की सरकार थी, किसी साथी दल की कोई जरूरत नहीं थी, और उसी का नतीजा था कि शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए राजीव सरकार ने एक संविधान संशोधन किया था जो कि मुस्लिम कट्टरपंथी मर्दों को तो खुश करने वाला था, लेकिन जिसने मुस्लिम महिला के हक पर लात मारी थी। उस वक्त तो फिर भी संसद में इस मुद्दे पर खासी बहस हो गई थी, और अलग-अलग पार्टियों और विचारधाराओं को बोलने का मौका मिला था। लेकिन अभी की मोदी सरकार में जब तीन कृषि कानून बनाए गए, तो उन पर कोई सार्थक चर्चा नहीं होने दी गई, और एनडीए सरकार के भीतर भी भाजपा ने महज अपने ही बाहुबल से इन विधेयकों को कानून बनवा दिया, और इस मुद्दे पर गठबंधन छोडऩे वाले अपने एक सबसे पुराने साथी, अकाली दल के अलग होने से भी भाजपा की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि गठबंधन सरकार के भीतर भी भाजपा अकेली ही सरकार बनाने की गिनती रखती थी।
समय-समय पर देश की संसद ने, और कभी-कभी राज्यों की विधानसभाओं ने भी ऐसे मौके दर्ज किए हैं जब व्यापक जनहित और महत्व वाले विधेयकों को बिना जरूरी चर्चा के बाहुबल के ध्वनिमत से पारित करा दिया गया। लोकतंत्र में संसद को बनाया इसलिए गया है कि वहां पर सरकार से सवाल पूछे जा सकें, देश-प्रदेश के हालात पर जानकारी मांगी जा सके, सरकार को जहां अपने बजट को सामने रखकर लोगों को सरकारी खर्च की योजना बताई जा सके, और कमाई के तरीके गिनाए जा सकें। इसके अलावा जब कभी कोई नए विधेयक आते हैं, संविधान संशोधन की जरूरत रहती है, तो अलग-अलग प्रदेशों, अलग-अलग पृष्ठभूमि, अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा से आए हुए सांसदों की बात को सुना और समझा जा सके, तब उसके बाद कोई नया कानून बनाया जाए, या पुराने को बदला जाए। देश भर से आए हुए सैकड़ों सांसदों की राय सुनना संसदीय लोकतंत्र की एक बुनियाद है, और इस बुनियाद के बिना जब कोई इमारत खड़ी की जाती है, तो एक आंदोलन की आंधी से वह उसी तरह गिर सकती है जिस तरह कृषि कानून औंधे मुंह गिरे।
संसदीय
बाहुबल की अधिकता का एक बड़ा खतरा यह रहता है कि सत्तारूढ़ पार्टी किसी
संसदीय फैसले के लिए किसी भी असहमति को सुनने को मजबूर नहीं रहती, उसे किसी
को सहमत कराने की जरूरत नहीं रहती, और वह संसद के भीतर ठीक उसी तरह कोई
कानून बना या बिगाड़ सकती है जिस तरह वह अपनी पार्टी की बैठक के भीतर कोई
मनमाना फैसला ले सकती है। यह सिलसिला बहुत तानाशाह और खतरनाक तो है ही,
इससे संसदीय व्यवस्था का एक सीधा-सीधा नुकसान भी होता है। जिन लोगों ने
राजनीति और सामाजिक जीवन में दशकों गुजार दिए हैं, ऐसे लोगों से संसद भरी
रहती है। ये लोग हर दिन सैकड़ों लोगों से मिलते हैं, और अलग-अलग मुद्दों पर
जनता की राय से वाकिफ रहते हैं। वैसे तो भारत के मौजूदा संसदीय कानून के
मुताबिक सभी सांसद या विधायक अपनी पार्टी के फैसलों से बंधे रहते हैं, और
उन्हें किसी भी मुद्दे पर अपनी पार्टी के हुक्म के मुताबिक ही वोट डालना
होता है, वरना उनकी सदस्यता खतरे में रहती है। लेकिन ऐसी सीमाओं के भीतर भी
सांसदों की निजी सोच, उनके निजी तजुर्बे बहस में सामने आते हैं, और एक-एक
सांसद बीस-तीस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उनके मार्फत उनके
इलाकों के लोगों की सोच संसद के रिकॉर्ड में आने की एक संभावना तो रहती ही
है।
सदन में पार्टी व्हिप से बंधे सांसदों का एक नुकसान देश के संसदीय
लोकतंत्र को यह होता है कि वे पार्टी की घोषित सोच से परे शायद ही कुछ बोल
पाते हैं। ऐसे में देश की जनता के बीच से चुनाव की अग्निपरीक्षा से होते
हुए जो सांसद संसद में पहुंचते हैं, वे अपनी मौलिक बातें वहां बहुत कम कर
पाते हैं। उन्हें पार्टी की तरफ से पहले से बता दिया जाता है कि किस मुद्दे
पर क्या कहना है। इस तरह देश के सबसे चुनिंदा दिल-दिमागों का मौलिक योगदान
संसद और लोकतंत्र को बहुत कम मिल पाता है। पार्टी अनुशासन के नाम पर
भारतीय संसदीय व्यवस्था में सांसदों को इस तरह बांध दिया जाता है कि
लोकतंत्र में विचारों की जो विविधता होनी चाहिए, वह महज पार्टियों की
विविधता तक सीमित रह जाती है। एक तो निजी सोच का खुलकर सामने आना बहुत कम
रह गया है, और फिर पार्टियों के बीच किसी मुद्दे पर बहस भी गैरजरूरी मान ली
गई है क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी बिना बहस भी किसी विधेयक को पास कराने का
बाहुबल रखती है।
भारत के ताजा इतिहास के जानकार लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या अपने भीतर जरूरत से अधिक कड़े अनुशासन वाली पार्टी संसदीय विचार-विमर्श में कम योगदान देने वाली पार्टी भी हो जाती है? दूसरी बात यह कि क्या किसी पार्टी या गठबंधन की जरूरत से अधिक मजबूती पूरी संसद में ही किसी विचार-विमर्श को हाशिए पर धकेल देती है? और चूंकि हिन्दुस्तान ऐसे एक से अधिक दौर देख चुका है जहां सांसदों या पार्टियों की बातों को अनसुना करना किसी दिक्कत की बात नहीं रह गई है, इसलिए ऐसे तरीकों के बारे में सोचना चाहिए कि सांसदों की निजी सोच को देश की बहस की मेज पर किस तरह लाया जा सकता है? पार्टियां इस बात को शायद ही पसंद करें, क्योंकि वे सदन के भीतर अपने सदस्यों को निर्वाचित जनप्रतिनिधि की तरह देखना नहीं चाहतीं, बल्कि पार्टी के एक अनुशासित सिपाही की तरह देखना चाहती हैं। इस तरह जनता के प्रति सांसद की जवाबदेही खत्म हो जाती है, और वह पार्टी के प्रति सौ फीसदी अनुशासन की नौबत बन जाती है। ऐसे में क्या संसद के बाहर एक समानांतर बहस के बारे में सोचा जा सकता है? या फिर पार्टियों का अनुशासन ऐसी भी किसी बात को होने नहीं देगा? लोकतंत्र के भीतर हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर सोच की विविधता वाली बहस का जो महत्व होना चाहिए, वह किसी गठबंधन की सरकार में विपक्ष के वोटों की जरूरत के बीच तो कायम रह सकता है, लेकिन अंधाधुंध गैरजरूरी बाहुबल रहने पर उसकी संभावना शून्य हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र इसका क्या रास्ता निकाल सकता है?
बवंडर में फंसी दुनिया के बीच इतिहास में पहुंचकर गौरव में जीते हिन्दुस्तानी!
24 मई 2022
पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक बवंडर में
फंसी हुई दिख रही है। जाहिर तौर पर रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद दोनों के
बीच छिड़ी जंग एक बड़ी वजह है क्योंकि ये दोनों ही देश गेहूं, खाने के
तेल, मक्का, रासायनिक खाद के अलावा भी बहुत सी चीजों के बड़े निर्यातक देश
थे, और आज यूक्रेन के बंदरगाहों पर अनाज फंसा हुआ है, गोदाम भरे हुए हैं,
लेकिन जंग के चलते जहाजों की आवाजाही बंद है। एक अंदाज यह है कि यूक्रेन से
चालीस करोड़ लोगों को अनाज पहुंचता था, जो कि अब बंद है, और यह जंग कब तक
चलेगी इसका कोई ठिकाना भी नहीं है। दुनिया की अर्थव्यवस्था के बवंडर में
फंसने की एक-दो और वजहें भी हैं। कोरोना की महामारी, और उससे जुड़े लॉकडाउन
के चलते दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था चौपट हुई है, और
श्रीलंका-पाकिस्तान सहित सत्तर ऐसे देश हैं जो अपनी किस्त चुकाने की हालत
में नहीं हैं। इसके ऊपर यह मुसीबत भी आ खड़ी हुई है कि चीन ने कोरोना को
लेकर जितने कड़े लॉकडाउन की नीति अपनाई है, उसका सबसे बड़ा कारोबारी शहर,
शंघाई हफ्तों से पूरे लॉकडाउन में चल रहा है, और चीन से कारोबारी संबंधों
वाले देशों पर भी बुरा असर पड़ा है क्योंकि वहां से कच्चा माल और पुर्जे
निकलना बुरी तरह प्रभावित हुआ है, और जाने कब तक यह जारी रहेगा। एक
अर्थशास्त्री के मुताबिक ऐसी ही बाकी सारी मुसीबतों के बीच में
क्रिप्टोकरेंसी का बाजार भी चौपट हो गया है, और उसमें भी बहुत से कारोबारी
डूब सकते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान पूरी दुनिया में बढ़ती हुई महंगाई के
साथ-साथ उसकी मार खा रहा है, और लोगों के लिए रोज की जिंदगी जीना भी
मुश्किल हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े एक अलग बात रहते हैं
क्योंकि वे अम्बानी-अडानी और बेरोजगारों की कमाई को मिलाकर उसका एक औसत पेश
करते हैं, और इन आंकड़ों में हिन्दुस्तान अभी बहुत बुरी हालत में नहीं दिख
रहा है, कम से कम दुनिया के और देशों के मुकाबले वह ठीक-ठाक हालत में दिख
रहा है।
लेकिन इस तस्वीर को समझते हुए यह भी देखने की जरूरत है कि दुनिया के बहुत से देश कुपोषण और भुखमरी के इस बुरी तरह शिकार हैं, कि वे उसी से नहीं उबर पा रहे हैं, इसलिए वैसे देशों के साथ हिन्दुस्तान की तुलना जायज नहीं होगी, जो कि अपने आपको विकासशील देशों से ऊपर मानता है। दूसरी तरफ दुनिया के बहुत से विकसित और संपन्न देशों की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है कि वहां के सबसे गरीब लोग भी हिन्दुस्तान के गरीब लोगों के मुकाबले बिल्कुल ही अलग दर्जे के हैं, और वहां सबसे गरीब और बेरोजगार भी ऐसी दिक्कतें नहीं झेलते हैं जैसी कि हिन्दुस्तान में ऐसे तबकों के लोग झेलते हैं। इसलिए अर्थव्यवस्थाओं और देशों की तुलना आसान नहीं है, और पिछले दो-तीन बरस में उनमें क्या तुलनात्मक फर्क पड़ा है, उसे भी महज आंकड़ों से समझ पाना मुश्किल है। हिन्दुस्तानी गरीब इतने गरीब हैं कि उनकी कमाई में पचीस फीसदी की गिरावट उनका एक वक्त का खाना छीन सकती है। आज हिन्दुस्तान में विदेशी मुद्रा के भंडार में रिकॉर्ड गिरावट आई है, और रूपये की डॉलर के मुकाबले कीमत इतिहास में सबसे कम हो गई है। इन दो बातों से आयात और निर्यात दोनों पर फर्क पड़ रहा है, और यह फर्क नीचे गरीब तक और अधिक पड़ रहा है, अमीरों की रोटी पर तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है।
लेकिन पूरी दुनिया में चल रहे ऐसे बवंडर के बीच हिन्दुस्तान अपने कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर अपने आपमें मस्त है कि जिसे देखकर हैरानी और दहशत दोनों ही होते हैं। जिस देश के पास बिना सरकारी रियायती अनाज के दो वक्त पेट भरने का तरीका नहीं है, उस देश को सरकारी गेहूं-चावल से बांधकर रखा गया है, और उसे सौ-दो सौ बरस पहले ले जाकर बिठा दिया गया है। जिस तरह कम्प्यूटरों के ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर को पहले की किसी तारीख पर भी सेट किया जा सकता है, ताकि उसके बाद के जो फेरबदल नापसंद हैं, उनसे पीछा छूट जाए, कुछ वैसा ही आज हिन्दुस्तान में हो रहा है। सरकारी मुफ्त अनाज नहीं मिलेगा तो कल का खाना कहां से बनेगा, जहां पर ऐसा अनिश्चित भविष्य हो, वहां एक काल्पनिक भूतकाल को प्रमाणिक मानकर बहुसंख्यक आबादी को विज्ञान कथाओं की तरह टाईम-ट्रैवल करवाया जा रहा है। हिन्दुस्तान के इतिहास में एक ऐसा दौर बताया जाता है जब यहां के राजा रास-रंग में डूबे हुए थे, महलों को बनाने और नर्तकियों को नचवाने के शगल से उन्हें फुर्सत नहीं थी, और वैसे में ही विदेशी हमलावर आकर यहां काबिज हो गए थे। हिन्दुस्तान में आज राजकाज इतिहास के चुनिंदा और पसंदीदा गड़े मुर्दों को उखाडक़र एक ऐसे इतिहास को फैलाने के शगल में डूबा हुआ है जिससे न भविष्य का कोई लेना-देना है, न वर्तमान का। एक वक्त कार्ल माक्र्स ने लिखा था कि धर्म अफीम की तरह इस्तेमाल की जाती है, उनकी विचारधारा वाली पार्टियां चाहे आज चुनाव हार रही हों, उनकी यह बात सही साबित हो रही है। जिस तरह किसी बहुत जख्मी या किसी बड़ी बीमारी की तकलीफ से गुजरते हुए इंसान को दर्द भुलाने के लिए नशे के इंजेक्शन लगाए जाते हैं, उसी तरह आज हिन्दुस्तान में लोगों को उनकी मौजूदा तकलीफें भुलाने के लिए, कल की अनिश्चितता का आभास न होने देने के लिए, और आने वाले परसों की प्राथमिकता की तरफ से बेफिक्र रखने के लिए इस अफीम का इस्तेमाल किया जा रहा है। हिन्दुस्तानी बहुसंख्यक आम लोगों को इस अफीम के चलते, इस अफीम से बने हुए एक काल्पनिक इतिहास के चलते तमाम दुख-दर्द से मुक्ति मिल गई है। इस मायने में हिन्दुस्तान दुनिया के बाकी तकलीफजदा देशों से बिल्कुल ही अलग है, क्योंकि धर्म का ऐसा इस्तेमाल तो धर्म आधारित राज वाले हिन्दू या मुस्लिम, या ईसाई देशों में भी नहीं हो रहा है। इतिहास के आटे से बनी रोटी, सदियों पहले ऊगी सब्जी के साथ परोसकर लोगों को तृप्त कर दिया जा रहा है, और बहुसंख्यक जनता का धर्मान्ध हिस्सा डकार भी ले रहा है। ऐसा लगता है कि हकीकत के कुपोषण के शिकार हो जाने तक इस तबके की यह खुशफहमी जारी रहेगी कि वह खा-खाकर अघा रहा है, और उसे अपचन भी हो रहा है, और सोशल मीडिया के मुताबिक उसके लिए हाजमोला लेना प्रतिबंधित भी है क्योंकि उसमें हज भी है, और मौला भी है।
हिन्दुस्तान में एक ऐसे जानवर की बात बहुत से मुस्लिम इलाकों में कही जाती है जो कि कब्र तक सुरंग बनाकर दफनाई हुई लाशों को खाकर अपना काम चलाता है, उसे कबरबिज्जू कहा जाता है। दफनाए हुए इतिहास को खाकर जिंदा रहने वाले जानवरों को पता नहीं कौन सा बिज्जू कहा जाएगा।
नीचे का यह पहला पैरा, और उसके आगे की बात
23 मई 2022
देश में यह बहस चल रही है कि किस तरह
बहुसंख्यक आबादी के मुकाबले अल्पसंख्यक आबादी बढ़ते चल रही है, और कितने
दशक में वह आज की बहुसंख्यक आबादी को पार कर जाएगी। इसे देश के भीतर आज के
अल्पसंख्यकों में अधिक प्रजनन दर से भी जोडक़र देखा जा रहा है, और देश की
सरहद के पार से आकर वैध या अवैध रूप से बसने वाले लोगों की वजह से बढ़ती
हुई आबादी भी माना जा रहा है। इन दोनों ही मिलीजुली वजहों से ऐसा अंदाज
लगाया जा रहा है कि आज की बहुसंख्यक आबादी 2045 तक बहुसंख्यक नहीं रह
जाएगी, वह आधे से कम रह जाएगी, वह सबसे बड़ा तबका तो रहेगी, लेकिन बाकी
तमाम तबके मिलकर उससे अधिक आबादी के हो जाएंगे। आबादी की शक्ल बदलने के इस
अंदाज को एक राजनीतिक साजिश भी करार दिया जा रहा है, और यह व्याख्या फैलाई
जा रही है कि वोटों को पाने के लिए कुछ राजनीतिक ताकतें, पार्टियां
सोच-समझकर एक साजिश की तरह यह काम कर रही हैं, और आज के अल्पसंख्यक
समुदायों को बढ़ावा दे रही हैं, और वैसे ही समुदायों के लोगों को अवैध रूप
से या वैध रूप से देश में घुसा भी रही हैं।
जिन लोगों को यह लग रहा होगा कि आज हम भारत की यह चर्चा क्यों कर रहे हैं, उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि यह हिन्दुस्तान नहीं, अमरीका के बारे में है। वहां पर श्वेत नस्लवादी समूहों के बीच, उनके द्वारा चारों तरफ यह व्याख्या बरसों से फैलाई जा रही है कि वहां के गोरे अमरीकियों के मुकाबले काले और दूसरे अश्वेत तबके बढ़ते जा रहे हैं, और वे आने वाले दशकों में गोरे अमरीकियों को बहुसंख्यक नहीं रहने देंगे। इस प्रोपेगंडा को इतने हिंसक तरीके से फैलाया जा रहा है कि अभी एक अठारह बरस के गोरे नौजवान ने इसी सिद्धांत को मानते हुए, इसी पर लिखी गई अपनी डायरी और अपने बयान को ऑनलाईन पोस्ट करते हुए, बंदूक और कैमरे से लैस होकर, ऑनलाईन लाईव प्रसारण करते हुए दस काले लोगों को मार डाला। अमरीका में इस सोच को रिप्लेसमेंट थ्योरी कहा जाता है, और यह गोरे नस्लवादी लोगों के लिए उनके सबसे बड़े धार्मिक ग्रंथ की तरह है। डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी इसी थ्योरी को बढ़ावा देते हुए गोरे अमरीकियों को एक करने में लगी रहती है, और इसी वजह से गोरे नस्लवादी हिंसक समूहों के बीच रिपब्लिकन पार्टी पसंदीदा तो है ही, इसके अधिक नस्लवादी नेता, डोनल्ड ट्रंप ऐसे हिंसक समूहों के आदर्श नायक भी रहे हैं। यहां यह समझने की जरूरत है कि हिंसक गोरे नस्लवादियों का यह विरोध एक समय काले लोगों के खिलाफ शुरू हुआ था, फिर वह सभी किस्म के गैरगोरों को निशाने पर लेकर चलते रहा, और अब तो उसने अमरीका में बसे हुए यहूदियों को बहुत बड़ा खतरा माना है, और वह उनके भी खिलाफ हिंसक तेवरों के साथ सोशल मीडिया, और सडक़ों पर बराबरी से लगा हुआ है।
अब एक गोरे नस्लवादी जवान ने हर अमरीकी को आसानी से हासिल भारी खतरनाक ऑटोमेटिक हथियार की सहूलियत का इस्तेमाल करके छांट-छांटकर एक काले इलाके में डेढ़ दर्जन लोगों को गोलियां मारी, और उसमें से दस लोग मारे गए, उस खतरे को हिन्दुस्तान जैसी जगह पर भी समझने की जरूरत है जहां पर हथियार इतनी आसानी से हासिल नहीं है। लेकिन लोगों को यहां पर हिंसक सोच को रखने और उससे गौरवान्वित हुए घूमने की आजादी हासिल है। लोगों को याद रखना चाहिए कि आजाद हिन्दुस्तान के पहले आतंकी नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की, तो उसे कई लोगों का साथ और सहयोग हासिल था। उसने भी एक साम्प्रदायिक नफरत की सोच लिए हुए इस देश के सबसे महान इंसान को मारा था। उस वक्त अमरीका में ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी लिखी भी नहीं गई थी, लेकिन वह नस्लवादी नफरत और हिंसा की शक्ल में जर्मनी के हिटलर से हासिल थी, और हिन्दुस्तान के भीतर भी उस सोच की एक मौलिक जगह थी। आज यह समझने की जरूरत है कि अमरीका में अठारह बरस का एक नौजवान दुनिया के सबसे अधिक मौकों वाले देश में नफरत के चलते जिस किस्म का हत्यारा बनने में गौरव हासिल कर रहा है, उस किस्म का हत्यारा बनने का गौरव हिन्दुस्तान में भी जगह-जगह देखने मिल रहा है। लोगों को याद होगा कि राजस्थान में एक मुस्लिम को जिंदा जलाकर मारने वाले ने उसका वीडियो बनाकर खुद ही फैलाया था, उसमें और इस अमरीकी नौजवान में फर्क सिर्फ ऑटोमेटिक रायफल की उपलब्धता का था। अभी दो दिन पहले मध्यप्रदेश में जिस तरह एक भाजपा नेता ने मुस्लिम होने के शक में एक मानसिक विचलित बुजुर्ग जैन को पीट-पीटकर मार डाला, उसकी सोच में अगर अमरीकी हथियार को जोड़ दिया जाए, तो वह भी धर्म के आधार पर दर्जन भर लोगों को मार डालने की मानसिकता तो रखता था।
हम हिन्दुस्तान के सिलसिले में इस बात को इसलिए उठा रहे हैं कि आज देश के करोड़ों नौजवानों को नस्लवादी नफरत से लैस किया जा रहा है। ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी उन्हें पढ़ाई जा रही है, बचपन से ही चुनिंदा स्कूलों में यह बात उनके दिमाग में भरी जा रही है, सोशल मीडिया पर भाड़े के लोगों से या समर्पित लोगों से इस थ्योरी का कीर्तन करवाया जा रहा है, और ढोल-मंजीरे पर झूमते हुए सिर इस थ्योरी से ब्रेनवॉश हुए चल रहे हैं। जिस तरह गोमांस के शक में मुस्लिमों, दलितों, और आदिवासियों को मारा जा रहा है, वह इसी थ्योरी का नतीजा है। अब यह समझने की जरूरत है कि जिन बड़े-बड़े नेताओं ने देश के करोड़ों अनपढ़ या शिक्षित, बेरोजगार या छोटी-मोटी नौकरी करने वाले नौजवानों को इस नस्लवादी हिंसा में झोंक दिया है, उनकी अपनी औलादें दुनिया की सबसे बड़ी या महंगी यूनिवर्सिटी से महंगी तालीम पाकर आती हैं, और हिन्दुस्तान या कहीं और करोड़ों कमाती हैं। झंडे-डंडे और त्रिशूल लेकर सडक़ों पर झोंकने के लिए इन नेताओं की औलादें मौजूद नहीं हैं क्योंकि वे उनके प्रति जिम्मेदार अपने मां-बाप की मेहनत से ऊंची पढ़ाई करके जिंदगी में ऊपर पहुंचने में लग गई हैं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तानी ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी पढ़-पढक़र सडक़ों पर नफरत का सैलाब फैलाने वाले लोग अमरीका के बफेलो में अभी दस काले लोगों को मारने वाले गोरे नौजवान की तरह ढलने के लिए तैयार हो रहे हैं।
हिन्दुस्तान में आज ऐसी हिंसक सोच, और शायद उसकी प्रतिक्रिया में पैदा होने वाली दूसरे तबकों की ऐसी ही हिंसक सोच को महज लाइसेंसी हथियार ही तो हासिल नहीं हैं, बाकी तो भीड़त्या करने के लिए उनके पास लाठियां ही काफी हैं, और काफी लाठियां हर जगह मौजूद हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि इस देश के भीतर और इस देश के बाहर कई किस्म के आतंकी संगठन काम कर रहे हैं, और ऐसे संगठन अमरीका की बंदूकों के मुकाबले अधिक बड़ा खून-खराबा करने के विस्फोटक हथियार लोगों को मुहैया करा सकते हैं, और पूरे देश में आबादी के बीच अगर मरने और मारने का ऐसा मुकाबला चल निकलेगा, धर्म के आधार पर हिंसा का सैलाब धमाकों का साथ पाने लगेगा, तो क्या होगा? आज जिन लोगों को अपने मजबूत मकानों में अपने को महफूज महसूसने की खुशफहमी है, वह खुशफहमी किसी एक धमाके से खत्म हो सकती है। हम अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे अनगिनत देशों में धर्मान्धता के चलते जैसे आत्मघाती विस्फोट देखते हैं जिनमें एक-एक में सौ-पचास लोग मारे जाते हैं, क्या हम इस देश को उस तरफ बढ़ाना चाहते हैं? इस लिखे हुए को कोई धमकी या चेतावनी मानना एक नासमझी होगी क्योंकि हम एक खतरे के अंदेशे के प्रति लोगों को सजग करना अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं। हिन्दुस्तान में यह नस्लवादी हिंसक धर्मान्धता का सिलसिला खत्म होना चाहिए, वरना यहां के कुछ नौजवान अमरीका के बफैलो के नौजवान से प्रेरणा पा सकते हैं, कुछ लोग अफगानिस्तान-पाकिस्तान के आत्मघाती दस्तों से प्रेरणा पा सकते हैं, और उस दिन देश में किसी तबके के कोई लोग सुरक्षित नहीं रह जाएंगे।
धर्मनिरपेक्ष दिखने का मतलब साम्प्रदायिकता बढ़ाना तो नहीं
उत्तरप्रदेश की एक मस्जिद को लेकर यह ऐतिहासिक विवाद चल रहा है कि क्या
एक मंदिर को तोडक़र इसे बनाया गया है? देश की कई अदालतें इस सवाल के अलग-अलग
पहलुओं से जूझ रही हैं, और देश के कुछ अलग-अलग कानून एक-दूसरे के सामने
खड़े किए जा रहे हैं कि किस कानून के मुताबिक क्या होना चाहिए। हिन्दू और
मुस्लिम दो तबके अदालत में एक-दूसरे के सामने खड़े हैं, और अदालत का
सिलसिला कुछ पहलुओं पर शक से घिरा हुआ है, और इसी के चलते अदालत को अपनी
मातहत अदालत का तैनात किया गया एक जांच कमिश्नर हटाना भी पड़ा है। लेकिन यह
एक जटिल मामला है जिस पर यहां लिखने के बजाय किसी लेख में उसके साथ अधिक
इंसाफ हो सकता है। यहां आज इस कानूनी विवाद पर लोगों की लिखी जा रही बातों
पर लिखने की नीयत है।
जब मस्जिद में जांच के दौरान अदालत से तैनात एक हिन्दू जांच कमिश्नर वकील ने अदालत को रिपोर्ट देने के बजाय यह सार्वजनिक बवाल खड़ा करना शुरू किया कि मस्जिद में पानी की एक टंकी में शिवलिंग मिला है, तो इस पर देश भर से लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखना शुरू किया। टीवी समाचार चैनलों को रोजी-रोटी मिली, और वे भी स्टूडियो में एक-दूसरे से पहले साम्प्रदायिक दंगा करवाने के गलाकाट मुकाबले में उतर पड़े। सोशल मीडिया पर लिखने वालों में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के एक प्रोफेसर रतनलाल भी थे, जिनके खिलाफ हिन्दू धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की पुलिस रिपोर्ट की गई, जुर्म दर्ज हुआ, और आनन-फानन उनकी गिरफ्तारी भी हो गई। खबरों से पता लगा कि रतनलाल एक दलित हैं, और उनकी पोस्ट पर विवाद होने के बाद उन्होंने जोर देकर यह कहा कि उन्होंने बहुत जिम्मेदारी के साथ लिखा था।
जैसा कि जाहिर है शिवलिंग से हिन्दू धर्मालुओं की भावनाएं जुड़ी हुई हैं, और शिवलिंग एक प्रतीक के रूप में किसी दूसरे धर्म की भावनाओं को चोट पहुंचाने का काम भी नहीं करता। इसलिए मस्जिद में मिला हुआ पत्थर शिवलिंग है या नहीं, यह अदालत के तय करने की बात है, उस पत्थर को शिवलिंग कहकर किसी दूसरे धर्म पर चोट पहुंचाने का काम नहीं हो रहा था। किसी जगह पर किसी एक धर्म के दावे का झगड़ा था, जो कि अभी निचली अदालत में है, और 25-50 बरस बाद वह हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत से तय हो सकता है, लेकिन तब तक उस पत्थर को लेकर कोई झगड़ा नहीं था। वह पत्थर भी किसी का नुकसान नहीं कर रहा था। वह सैकड़ों बरस से उसी जगह पर पानी में डूबे हुए था, वहां से नमाज पढऩे के पहले लोग हाथ और चेहरा धोने को पानी लेते थे, और अगर बहस के लिए यह मान लें कि वह शिवलिंग ही है, तो भी सैकड़ों बरस के लाखों नमाजियों के हाथ लगते हुए भी उस शिवलिंग को कोई दिक्कत नहीं थी।
ऐसे में सोशल मीडिया पर प्रोफेसर रतनलाल के अलावा भी हजारों लोगों ने साम्प्रदायिकता का विरोध करने के लिए शिवलिंग का विरोध करना शुरू कर दिया, या अधिक बेहतर यह कहना होगा कि उन्होंने उस पत्थर के शिवलिंग न होने के दावे करने शुरू कर दिए, और ऐसा करते हुए लोग तरह-तरह से शिवलिंग के अपमान पर चले गए। यह अपमान उस पत्थर को शिवलिंग मानकर उसकी उत्तेजना फैलाने की साजिश का होता, तो भी ठीक होता। इस मामले में पहली नजर में दिखता है कि अदालत के तैनात जिस जांच कमिश्नर को रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को ही देनी थी, उसने एक घोर हिन्दुत्ववादी की तरह हमलावर अंदाज में एक पत्थर के शिवलिंग होने का दावा करते हुए मीडिया में बयानबाजी शुरू कर दी, और उसके तौर-तरीकों से, और उसके दावों से बिना सुबूत सहमत होते हुए निचली अदालत ने मुस्लिमों के नमाज पढऩे के पहले वुजू करने, हाथ धोने की उस जगह को सील कर दिया। अब यह मौका एक छोटी अदालत के जज, और अदालत के जांच-कमिश्नर वकील को लेकर कुछ लिखने का था, और लोगों ने शिवलिंग का मखौल उड़ाना शुरू कर दिया। अभी तो यह तय भी नहीं हुआ था कि वहां मिला वह पत्थर सचमुच ही शिवलिंग है, लेकिन एक धार्मिक प्रतीक शिवलिंग को लेकर इतनी ओछी और अश्लील बातें लिखी जाने लगीं, कि मानो शिवलिंग खुद ही त्रिशूल लेकर हिंसा कर रहा हो।
यह मौका अदालत के जांच कमिश्नर और जज के पक्षपात या पूर्वाग्रह, उनके न्यायविरोधी रवैये को साबित करने का था, हिन्दुस्तानी मीडिया ने जिस तरह एक हिन्दुत्ववादी वकील के उछाले हुए शिवलिंग शब्द को लपककर पूरे देश में साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता फैलाना शुरू किया, मीडिया के उस रूख के बारे में लोगों को बात करनी थी, लेकिन यह पूरी बहस इस बात पर आकर सिमट गई कि कुछ कथित धर्मनिरपेक्ष लोग किस तरह शिवलिंग का मजाक उड़ा रहे हैं, हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रहे हैं।
मेरी तरह के परले दर्जे के नास्तिक, और धर्मनिरपेक्ष को भी धार्मिक प्रतीक का गंदी जुबान और गंदी मिसाल के साथ मखौल उड़ाना न सिर्फ नाजायज लगा बल्कि यह देश में साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ मजबूत करना भी लगा। जिस वक्त देश की बहस को असल मुद्दों से भटकाकर भावनाओं में उलझाने की राष्ट्रीय स्तर की साजिशें लगातार चल रही हैं, उसी वक्त अगर देश के असली या कथित धर्मनिरपेक्ष लोग भी अनर्गल, अवांछित, और नाजायज बकवास करके देश की बहस को गैरमुद्दों में उलझाने का काम करेंगे, तो यह धर्मनिरपेक्षता नहीं है, यह साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ में उसी तरह खेलना है, जिस तरह देश के कई टीवी स्टूडियो खेल रहे हैं। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अगर पूरी तरह से नाजायज बातों को जायज ठहराने की कोशिश होगी, तो उससे अभिव्यक्ति की जरूरी और जायज स्वतंत्रता की शिकस्त होगी। जब यह देश अपने आजाद इतिहास के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है, जब उसके सामने असली और गंभीर चुनौतियां जानलेवा दर्जे की हो चुकी हैं, तो यह वक्त अपनी गैरजिम्मेदार और फूहड़ बातों से दुश्मन के हाथ मजबूत करने का नहीं है। जिन लोगों को यह लगता है कि वे शिवलिंग का मखौल उड़ाकर मुसलमानों के हाथ मजबूत कर सकते हैं, उनसे अधिक गैरजिम्मेदार आज कोई नहीं होंगे क्योंकि इससे हिन्दू लोगों में से सबसे अधिक हिंसक और साम्प्रदायिक लोगों के हाथ मजबूत होने के अलावा और कुछ नहीं हो रहा। जो लोग हिन्दुस्तान में सभी धर्मों को बराबरी दिलाना चाहते हैं, कुचले जा रहे धर्म को बचाना चाहते हैं, उनमें से कुछ लोग अगर धर्मान्ध-साम्प्रदायिक लोगों के हाथ अपने बयानों के हथियार थमा रहे हैं, तो यह धर्मनिरपेक्षता का काम नहीं है, यह साम्प्रदायिकता का काम है।
किसी व्यक्ति के धर्म, उसकी जाति, उसके वर्ग की वजह से उसकी सार्वजनिक बातों को रियायत नहीं दी जा सकती, खासकर ऐसे व्यक्ति को जिनकी पढ़ाई-लिखाई और समझदारी में कोई कमी नहीं है। ऐसे लोग अगर किसी एक गंभीर और व्यापक सोच के चलते हुए भी किसी धर्म के प्रतीक का मखौल उड़ाना जायज समझते हैं, तो वे लोग हिन्दुस्तान में आज असल मुद्दों पर बहस को बंद करवाने का काम कर रहे हैं, और ऐसे नुकसानदेह लोगों को बढ़ावा देकर देश में साम्प्रदायिक ताकतों को और मजबूत नहीं करना चाहिए।
लोकतांत्रिक लगता औजार, तानाशाही का बना हथियार
21 मई 2022
सोशल मीडिया कुछ ईश्वर की तरह हो गया दिखता
है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी
तिन तैसी। खुद हमें कई बार सोशल मीडिया एक सबसे बड़ा लोकतांत्रिक औजार लगता
है, लेकिन अधिक दिन नहीं गुजरते कि यह साबित होने लगता है कि यह आज का
सबसे बड़ा पूंजीवादी और तानाशाह हथियार है। जब अलग-अलग लोगों को बिना खर्च
किए हुए सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने का मौका मिलता है, तो यह एक
अभूतपूर्व लोकतांत्रिक ताकत लगती है। लेकिन जब हवा के इन झोंकों को एक ताकत
और योजना के साथ एक ऐसी तरफ मोड़ दिया जाता है कि लोकतंत्र को पीछे छोडक़र
तरह-तरह के बाहुबल दुनिया का जनमत अपने हिसाब से हांकने लगें, तब इस
लोकतांत्रिक दिखते औजार का खतरा समझ आता है। आज जब दुनिया में रूस और
यूक्रेन को लेकर जनमत बनने की बात आती है, या दूसरे एक अलग मोर्चे पर
फिलीस्तीनियों पर इजराइली जुल्म जारी हैं, और इस पर अमरीकी जुबानी जमाखर्च
दिख रहा है, तो ऐसे में जनमत को प्रभावित करने वाले औजारों की
लोकतांत्रिकता के बारे में सोचने की जरूरत लगती है। फिर बाहर ही क्यों
देखें, हिन्दुस्तान के भीतर हिन्दू-मुस्लिम से लेकर पप्पू और फेंकू नाम के
खेमों में बंटे हुए लोगों के बीच सोशल मीडिया पर जिस तरह की जंग छिड़ी है,
क्या वह सचमुच ही एक लोकतांत्रिक औजार को लेकर जनमत बनाने की कोशिश है, या
कि इस औजार को लूटकर उसे हथियार बनाकर एक संगठित गिरोह की तरह किया जा रहा
हमला है? इस हथियार के साथ एक दूसरी दिक्कत यह है कि हमलावर जब चाहे अपनी
फौज को और इस हथियार को लोकतांत्रिक औजार बता सकते हैं, और ऐसे औजार से
मानवीय मूल्यों का सामूहिक मानव संहार भी कर सकते हैं। दिखने में जो सडक़
किनारे प्याऊ के पानी की गिलास है, वह एक साजिश के तहत नफरत के जहर का
सैलाब फैलाने के काम में लाई जा रही है, और सोशल मीडिया नाम का यह प्याऊ
जनसेवा की वाहवाही भी पा रहा है।
इसने लोकतंत्रों में एक इतनी भयानक नौबत ला दी है जितनी भयानक नौबत अमरीका में सबसे विनाशकारी बवंडरों से आते दिखती है, जिससे शहर के शहर उजड़ जाते हैं। लोकतंत्र और सभी किस्म के बेहतर मूल्यों और सिद्धांतों को खत्म करने के लिए सोशल मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बनकर सामने आ गया है, और ट्विटर पर जब चाहे तब नफरतजीवी लोग अपनी मर्जी के एजेंडा को ट्रेंड करवा सकते हैं, यानी उस एक पल उनके पसंदीदा शब्दों के साथ नफरत की सुनामी बाकी तमाम मुद्दों के पैर उखाड़ सकती है, उन्हें बहाकर किनारे कर सकती है। दिखने में जो लोकतांत्रिक दिखता है उस पर पूंजीवादी, तानाशाह, और नफरतजीवी ताकतों ने इतने संगठित तरीके से कब्जा कर लिया है और उसके बेजा इस्तेमाल की तकनीक विकसित कर ली है कि अहिंसा की बातें हाशिए पर ही बनी रहती हैं, वे कभी ट्रेंड नहीं हो पातीं।
कहने के लिए यह एक लोकतांत्रिक आजादी है जो कि हर किस्म के लोगों को मिली हुई है, और नफरत के विरोधी भी चाहें तो अपने पसंदीदा मुद्दों को ट्रेंड करवा सकते हैं। लेकिन सच तो यह है कि अमन-चैन की बातों को आगे बढ़ाने के लिए साथ देने वाले आएंगे कहां से? हिन्दुस्तान में हम देखते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव और मोहब्बत की बातें करने वाले लोगों पर नफरतजीवियों का झुंड इस तरह टूट पड़ता है कि जैसे जंगल में कोई अकेला कमजोर प्राणी मांसाहारियों से घिर गया हो। और यह हमलावर झुंड जब अपने धर्म से अधिक, दूसरों से नफरत से भरा हुआ रहता है, तो उसके नाखून और दांत अधिक तेज रहते हैं, उसके पंजों की ताकत अधिक रहती है, और जब ऐसे झुंड को एक संगठित समर्थन भी हासिल रहता है, सत्ता से लेकर न्याय प्रक्रिया तक उसे हिफाजत हासिल रहती है, तो फिर उसके हमले बुलडोजर पर सवार रहते हैं, और वह इतिहास के भी नीचे पुरातत्व तक को खोद डालने पर आमादा रहता है।
अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से लेकर हिन्दुस्तान के राजनीतिक और साम्प्रदायिक एजेंडा को तय करने में सोशल मीडिया जिस भयानक तरीके से एक हथियार की तरह कुछ लोगों को हासिल है, उससे लगता है कि मार्क जुकरबर्ग से लेकर ट्विटर के पंछी तक ने अपने आपको सुपारी लेकर भाड़े के हत्यारे की तरह काम करने के लिए पेश किया हुआ है। चूंकि हिन्दुस्तान में इन चीजों को लेकर कुछ तो लोगों की समझ कम है, और कुछ आज की सत्ता को इनसे सहूलियत हासिल है, इसलिए यहां इनके खतरों पर अधिक चर्चा नहीं हो रही है। दूसरी तरफ अमरीका और पश्चिम के कई देशों में सोशल मीडिया की बेकाबू दिखती, लेकिन पूरी तरह से काबू में काम करती विनाशकारी ताकत पर संसदों में सवाल किए जा रहे हैं। हिन्दुस्तान आज अपने इतिहास की सबसे अधिक हिंसक धमकियां सोशल मीडिया पर ही देख रहा है, लेकिन इस देश का बहुत कड़ा बनाया गया सूचना तकनीक कानून भी सोशल मीडिया पर चुन-चुनकर लोगों का शिकार कर रहा है, और हिंसक खूनी जत्थों को अनदेखा भी कर रहा है।
लोकतंत्र में चुनाव प्रचार के लिए या बाकी वक्त भी जनमत को प्रभावित करने के लिए जो परंपरागत तरीके चले आ रहे थे, वे एकाएक पेनिसिलीन की तरह बेअसर हो गए दिखते हैं। अब लोगों को भडक़ाने के लिए जिस तरह सोशल मीडिया की ताकत का इस्तेमाल हो रहा है, वह लोकतंत्र के नाम पर बाहुबल और नफरत की एक नई इबारत लिख रहा है। और आज जब हिन्दुस्तान जैसे देश में लोगों की निजी और सामूहिक जनचेतना का अधिकतर हिस्सा मिट्टी में मिल चुका है, तब संगठित हिंसा को सोशल मीडिया की लहरों पर सवार करके उसे आसमान तक पहुंचाना आसान हो गया है। लोकतंत्र के लिए यह बहुत फिक्र की बात है कि करीब एक सदी में इस देश में जो लोकतांत्रिक चेतना विकसित हुई थी, वह पिछले एक दशक की सोशल मीडिया की सुनामी में पूरी तरह शिकस्त पा चुकी है। यह सोच कुछ लोगों के लिए थोड़ी सी जटिल लग सकती है, लेकिन इस पर सोचा जाना जरूरी है।
इस मुल्क में लोकतंत्र सबसे नाकामयाब है अदालती मामलों में..
20 मई 2022
देश की दो बड़ी-बड़ी पार्टियों में
बड़े-बड़े ओहदों पर रह चुके, संसद सदस्य रहे हुए, कामयाब क्रिकेटर और
कॉमेडियन नवजोत सिंह सिद्धू ने सुप्रीम कोर्ट से कल मिली एक साल की कैद बा
मुशक्कत पर सरेंडर करने के लिए कुछ हफ्तों का समय मांगा है। सिद्धू के वकील
अभिषेक मनु सिंघवी ने उनकी सेहत का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से यह
रियायत मांगी है। सिद्धू को यह सजा 34 बरस पुराने एक मामले में हुई थी
जिनमें उन्होंने पार्किंग के झगड़े में एक बुजुर्ग की पिटाई की थी जिसके
बाद उसकी मौत हो गई थी। कई अदालतों से सजा पाते और छूटते सिद्धू आखिर में
सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, और वहां भी एक बार बरी हो जाने के बाद जब मृतक के
परिवार ने दुबारा पिटीशन लगाई, तो इस ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक
साल की कैद सुनाई है। कानून के जानकारों का कहना है कि अभी भी इस मामले में
सिद्धू की तरफ से कोई और पिटीशन लगाने की थोड़ी सी संभावना बाकी है, और
अगर ऐसी कोई याचिका अदालत में मंजूर होती है तो यह मामला आगे और कई बरस तक
टल सकता है, और सिद्धू कई पार्टियों में आ-जा सकते हैं, हिन्दुस्तानी संसद
में चाहे न पहुंच पाएं, वे टीवी पर पहुंचकर ठोको ताली कह सकते हैं।
दूसरी तरफ कल की ही एक और खबर है जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 9 बरस से जेल में बंद तीन ऐसे गरीब आदिवासी विचाराधीन कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया है जो गरीबी की वजह से अपनी जमानत नहीं करा पा रहे, और 9 साल से मुकदमा झेलते हुए जेलों में बंद हैं। ये बहुत गरीब हैं, परिवार से संपर्क नहीं है, और जमानत की रकम जमा कराने वाले कोई नहीं हैं, इसलिए 2016 में अदालत से मिली सशर्त जमानत की शर्त पूरी करने की हालत में नहीं हैं, और अब हाईकोर्ट ने इन तीनों को व्यक्तिगत बॉंड पर रिहा करने का आदेश दिया है। बहुत कम ही ऐसे जुर्म रहते हैं जिनकी सजा 9 बरस से अधिक की कैद रहती हो, इसलिए इन गरीब आदिवासियों पर चाहे जिस जुर्म का मुकदमा चल रहा हो, शायद सजा मिलने पर जो कैद हो, उससे अधिक कैद वे गुजार चुके होंगे।
हिन्दुस्तान की जेलों में ऐसे बेबस गरीब बड़ी संख्या में बंद हैं जो मुकदमे झेल रहे हैं लेकिन उनकी जमानत नहीं हो पा रही है। और जो ताकतवर लोग सुबूतों को बर्बाद कर सकते हैं, गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं, उनके लिए लाखों रूपए फीस लेने वाले अरबपति वकील खड़े होते हैं, बड़ी-बड़ी अदालतों के बड़े-बड़े जज आधी रात को भी अपने बंगले में उनके केस सुनते हैं, और उन्हें तुरंत ही जमानत या अग्रिम जमानत मिल जाती है। एक ही किस्म के जुर्म के आरोपों पर अलग-अलग ताकत के लोगों के बीच कानून का फायदा पाने, उससे रियायत पाने में जितना बड़ा फर्क हिन्दुस्तान में दिखता है वह किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत शर्मनाक नौबत है। कोई विकसित लोकतंत्र ऐसा नहीं हो सकता जिसमें कमजोर की पूरी जिंदगी मुकदमे का सामना करते निकल जाए, बिना जमानत जेल में निकल जाए, और ताकतवर और पैसे वाले मुजरिम सजा पाने के बाद भी कानून से लुका-छिपी खेलते रहें। देश की एक बड़ी कंपनी, जो कि देश भर में मुकदमे झेल रही है, उसके चार बड़े डायरेक्टरों को अभी छत्तीसगढ़ पुलिस गिरफ्तार करके लाई, और जेल पहुंचते ही कुछ घंटों के भीतर वे चारों एक साथ अस्पताल पहुंच गए। जेल की जगह अस्पताल में रहने में बहुत सी सहूलियत रहती है, और हर ताकतवर या पैसे वाले कैदी बिजली की रफ्तार से यह सहूलियत पा जाते हैं।
हिन्दुस्तान में आर्थिक असमानता सिर चढक़र बोलती है। लेकिन पढ़ाई, इलाज, नौकरी, या चुनावी जीत की संभावनाओं से भी अधिक बढक़र यह असमानता अदालतों में दिखती है जहां गरीब से जेल में भी अमीर कैदियों की खातिरदारी करवाने के लिए बंधुआ मजदूरों सरीखा काम लिया जाता है। उसे आराम के लिए अस्पताल नसीब होना तो दूर रहा, जरूरी इलाज भी नसीब नहीं होता, उसके मामले की पेशी पर उसे अदालत ले जाने के लिए पुलिस नहीं मिलती, अदालत पहुंचकर भी उसका मामला आगे नहीं खिसकता, क्योंकि गरीब विचाराधीन कैदी भारतीय लोकतंत्र के हाथ गरम करने की ताकत नहीं रखते। हमारा ऐसा मानना है कि भारतीय लोकतंत्र में अगर लोगों की आस्था न्यायपालिका पर से खत्म करवानी है, तो उन्हें किसी मुकदमे में उलझाकर अदालती चक्कर लगवाए जाएं, वहां पर इंसाफ के नाम पर बेइंसाफी दिखाई जाए, वहां पैसों की ताकत का नंगा नाच उसे देखने मिले, और मुकदमा खत्म होने के पहले लोकतंत्र में उसकी आस्था खत्म हो जाए।
अमरीका जैसे देश में काले लोगों पर चल रहे मुकदमों में उनका कानूनी साथ देने के लिए सामाजिक संगठन बने हुए हैं जो कि उनके हक के लिए लड़ते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में जहां पर आमतौर पर दलित, आदिवासी, और मुस्लिम मुकदमों के सबसे अधिक शिकार हैं, वहां पर इन तबकों के हक के लिए लडऩे वाले कोई संगठन सुनाई नहीं पड़ते। सामाजिक बराबरी तो तभी आ सकती है जब लोगों को उन पर लगाए गए आरोपों से निपटने के लिए बराबरी का मौका मिले। भारतीय न्याय व्यवस्था में तो ऐसी किसी बराबरी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस देश में और इसके तमाम प्रदेशों में हर बड़े राजनीतिक दल से जुड़े हुए बहुत से वकील हैं, लेकिन किसी पार्टी ने भी अब तक गरीबों की कानूनी मदद के लिए कोई कार्यक्रम नहीं बनाया है, किसी सत्तारूढ़ पार्टी ने भी नहीं, और न ही किसी विपक्षी पार्टी ने। आमतौर पर किसी भी पार्टी के बड़े नेता के फंसने पर उसे बचाने के लिए अरबपति वकीलों की फौज खड़ी हो जाती है, लेकिन कोई पार्टी अपने प्रभाव के इलाके में सबसे गरीब लोगों की कानूनी मदद की कोई कोशिश नहीं करती।
भारत में आज जाहिर तौर पर कमजोर तबकों, दलित, आदिवासी, मुस्लिम, और महिलाओं की कानूनी हिफाजत के लिए ऐसे मजबूत संगठन बनने और सामने आने चाहिए जो कि उन्हें बराबर का कानूनी हक दिलाने के लिए लड़ाई लड़ें। अमरीका जैसे देश से इस बात की मिसाल ली जा सकती है, और इस देश के जागरूक लोगों में से कुछ का सामने आना जरूरी है, उसके बिना किसी तरह का इंसाफ कमजोर लोगों को नहीं मिल सकेगा, और ताकतवर लोग अदालत से सजा मिलने के बाद भी ताली ठोंकते हॅंसते रहेंगे।
महाराष्ट्र सरकार की एक अच्छी पहल जो पूरे देश, में लागू की जानी चाहिए
19 मई 2022
हिन्दुस्तान में चारों तरफ से लगातार आ रही
बुरी खबरों के बीच कोई एक अच्छी सरकारी खबर भी आ सकती है, इसकी उम्मीद कम
ही रहती है। लेकिन आज महाराष्ट्र से ऐसी ही एक खबर आई है। वहां राज्य सरकार
के ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से प्रदेश की एक ग्राम पंचायत, हेरवाड़,
की मिसाल देते हुए सभी पंचायतों के लिए यह आदेश निकाला गया है कि किसी भी
महिला के पति की मृत्यु होने पर उसकी चूडिय़ां तोडऩे, माथे से सिंदूर
पोंछने, और मंगलसूत्र निकालने की प्रथा खत्म की जाए। एक ग्राम पंचायत ने
ऐसी मिसाल कायम की है, और उसकी चारों तरफ तारीफ भी हो रही है। उसका जिक्र
करते हुए सरकार ने पूरे प्रदेश से इस प्रथा को खत्म करना तय किया है। यह
बात कुछ लोगों को सरकार के दायरे के बाहर की लग सकती है क्योंकि ऐसे लोगों
को यह लगता है कि सामाजिक प्रथाएं सरकार के काबू के बाहर रहनी चाहिए, ठीक
उसी तरह जिस तरह कि हिन्दुस्तान में आज बहुत से लोगों को लगता है कि
बहुसंख्यक तबके की धार्मिक भावनाएं संविधान से ऊपर हैं। हिन्दुस्तान के
बहुसंख्यक मर्दों को यह लगता है कि औरतों को कुचलने के लिए जितने तरह के
रीति-रिवाज बनाए गए हैं वे जायज हैं, और धार्मिक या जातिगत संस्कारों के
अंगने में सरकार का क्या काम है?
इस देश में महिलाओं के बराबरी के कानूनी दर्जे, और उनके लिए बनाए गए तरह-तरह के कानूनों के बावजूद उनकी स्थिति बहुत कमजोर है। परिवार में न सिर्फ गृहिणी को आखिर में खाना नसीब होता है, बल्कि किसी लडक़ी को भी अपने भाई के मुकाबले कम पढ़ाई, कम इलाज, और यहां तक कि कम खाना भी नसीब होता है। मुम्बई के टाटा कैंसर अस्पताल का एक सर्वे है कि वहां पहुंचने वाले कैंसर पीडि़त बच्चों में से लडक़ों को तो अधिकतर मां-बाप इलाज के लिए लेकर आते हैं, लेकिन बहुत ही कम लड़कियों को जांच के नतीजे के बाद इलाज के लिए लाया जाता है। दोनों ही किस्म की संतानें उन्हीं मां-बाप की रहती हैं, लेकिन जन्म के पहले अगर कन्या भ्रूण हत्या करने की सहूलियत नहीं रहती, तो बाद में भेदभाव करके उस गंवाए हुए मौके को दुबारा हासिल कर लिया जाता है। भारतीय समाज में पत्नी खोने वाले किसी आदमी के कपड़े, हुलिए, या उसकी किसी और बात से उसके विधुर होने का पता नहीं लगता है, लेकिन पति खोने वाली महिला को सती बनाना अब मुमकिन नहीं रह गया है, इसलिए उसे विधवाश्रम के लायक बनाकर, खुशी के मौकों पर घर के पीछे के बंद कमरे में धकेलकर, उसके रंगीन कपड़े छीनकर, उसका सिर मुंडाकर, उसके गहने और सिंदूर हटाकर, उसका मांसाहार और प्याज-लहसुन तक छीनकर समाज एक औरत को उसकी औकात दिखा देता है। इसलिए ऐसे समाज में सुधार के लिए महिलाओं के मुद्दे चर्चा में भी बने रहना जरूरी है, और जैसा कि महाराष्ट्र सरकार ने इस ताजा फैसले में किया है, सरकार और समाज को इस सुधार के लिए लगातार कोशिश करना भी जरूरी है।
महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए इस देश में महिला आरक्षण जैसे मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहिए था, लेकिन आज देश में कोई भी राजनीतिक दल इसकी चर्चा भी नहीं करते। और तो और जिस कांग्रेस पार्टी ने उत्तरप्रदेश में अभी प्रियंका गांधी की अगुवाई में 40 फीसदी उम्मीदवार महिलाओं को बनाया था, उसने भी अपने ताजा तीन दिनों के चिंतन शिविर में महिलाओं के बारे में कुछ भी नहीं कहा। इंदिरा गांधी के बाद सोनिया गांधी इस पार्टी की दूसरी महिला मुखिया हैं, और प्रियंका गांधी को अगली मुखिया बनाने की सलाह हवा में तैर ही रही है। लेकिन इस पार्टी के राज वाले गिने-चुने बचे प्रदेशों में भी विधानसभा में महिला आरक्षण लागू करने का कोई प्रस्ताव तक नहीं उठाया जा रहा जिससे कि केन्द्र के पाले में गेंद फेंककर महिला आरक्षण को एक बार फिर चर्चा में लाया जा सकता था। कांग्रेस पार्टी के सामने यह एक ऐतिहासिक मौका था कि उसके पास देश में खोने के लिए कोई सीटें भी नहीं हैं, कुल पचासेक सीटें उसके पास लोकसभा में रह गई हैं, और ऐसे में वह उत्तरप्रदेश वाले महिला उम्मीदवारी के फॉर्मूले को पूरे देश के लिए घोषित कर सकती थी, लेकिन यह जाहिर है कि इस पार्टी के भीतर भी महिलाओं का अनुपात कोई मुद्दा नहीं रह गया है, और उत्तरप्रदेश का चुनाव खोने के बाद पार्टी ने बड़ी सहूलियत से महिलाओं के मुद्दे को भुला दिया है। कम ही लोगों को यह याद होगा कि पिछले आम चुनाव में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, इन तीनों कांग्रेस-प्रदेशों में कुल तीन कांग्रेस सांसद चुने गए थे जिनमें छत्तीसगढ़ की श्रीमती ज्योत्सना महंत भी एक थीं। इसी तरह उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में दो कांग्रेस विधायक चुने गए जिनमें से एक आराधना मिश्रा थीं। गांव-गांव में महिला पंच-सरपंच अलग-अलग जाति आरक्षण के साथ भी उम्मीदवारी के लिए भी मिल जाती हैं और जीतकर भी आती हैं। लेकिन कोई राजनीतिक दल उन्हें आबादी के अनुपात में टिकट देने को तैयार नहीं होते। भारतीय लोकसभा में आज कुल 14 फीसदी महिला सांसद हैं जबकि अफ्रीका में सबसे कम महिला सांसद केन्या में हैं, जो कि 22 फीसदी हैं। इसलिए आज जब महाराष्ट्र सरकार के इस महिला के हक के फैसले की हम तारीफ कर रहे हैं, तब देश की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूख पर अफसोस भी जाहिर कर रहे हैं कि जब इस पार्टी के पास खोने को कुछ नहीं बचा है, तब भी उसने महिलाओं के हक की बात करने का यह मौका खो दिया है।
आज जब इस बारे में हम लिख रहे हैं तब भारत का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण सामने है। केन्द्र सरकार के आंकड़े कहते हैं कि सर्वेक्षण में शामिल हुए 80 फीसदी हिन्दुस्तानी कम से कम एक बेटा होने की चाह रखते हैं। और इस चाहत के चलते दो बेटों के बाद तीसरी बेटी हो या न हो, दो बेटियों के बाद तीसरा बेटा तो हो ही जाता है। बच्चों के जन्म के समय लडक़े और लडक़ी का फर्क समाज में जीवनसाथी खो चुके आदमी और औरत के बीच फर्क तक जारी रहता है, और इसे टुकड़े-टुकड़े में नहीं सुधारा जा सकता। महाराष्ट्र सरकार की यह ताजा पहल देश के बाकी प्रदेशों में भी आगे बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि वृन्दावन के विधवाश्रमों में बेसहारा विधवा महिलाएं तो पूरे देश से ही भेजी जाती हैं।
घर के जलते-सुलगते मुद्दों पर फैसला न लेने में महारथ हासिल करने के नुकसान
18 मई 2022
चिंतन शिविर से कांग्रेस की चिंता कम होते
नहीं दिख रही है। जिस दिन राजस्थान में तीन दिन का यह चिंतन शिविर जारी ही
था, उसी दिन पंजाब कांग्रेस के एक बड़े नेता सुनील जाखड़ ने पार्टी से
इस्तीफा दिया, और कल की खबर यह थी कि जाखड़ के समर्थन में बहुत से और
कांग्रेस नेता आवाज उठा रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष
नवजोत सिंह सिद्धू ने उसी वक्त यह ट्वीट किया था कि कांग्रेस को सुनील
जाखड़ को नहीं खोना चाहिए जो कि अपने वजन जितने सोने के बराबर कीमती हैं,
हर मतभेद को बातचीत से सुलझाना चाहिए। अब आज सुबह की ताजा खबर है कि गुजरात
कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल ने बड़े गंभीर आरोप लगाते हुए
पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपनी उपेक्षा गिनाने के साथ-साथ
कांग्रेस की नीतियों और तौर-तरीकों की कड़ी निंदा की है। उनके इस्तीफे की
भाषा राहुल गांधी पर सीधा हमला करने वाली है, और उन्होंने कहा कि उन्हें
प्रदेश कांग्रेस कमेटी की किसी भी बैठक में नहीं बुलाया जाता, कोई भी
निर्णय लेने से पहले वो मुझसे राय-मशविरा नहीं करते, तब इस पद का क्या मतलब
है? उन्होंने कहा कि हाल ही में पार्टी ने राज्य में 75 नए महासचिव, और 25
नए उपाध्यक्ष घोषित किए हैं, और उनसे एक बार भी कोई राय नहीं ली गई।
कांग्रेस के चिंतन या संकल्प शिविर से लंबे-लंबे भाषण तो निकलकर आए हैं, लेकिन पार्टी अपने सामने अपने घर के जलते-सुलगते मुद्दों पर कोई भी फैसला लेने की हालत में नहीं दिख रही है। आज कांग्रेस पार्टी अपने आपको भाजपा का विकल्प बता रही है, लेकिन वह अपने खुद के ढांचे को अपने पैरों पर खड़ा करने की हालत में नहीं दिख रही है। हार्दिक पटेल जैसे नौजवान आंदोलनकारी को उसकी भारी लोकप्रियता देखकर कांग्रेस बड़ी उम्मीद और बड़े वायदों के साथ उन्हें पार्टी में लाई थी, और गुजरात में कांग्रेस अपने संगठन से इस हद तक निराश थी कि रातों-रात हार्दिक पटेल को पार्टी का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। इसके अलावा ऐसा कोई दूसरा मामला कांग्रेस में याद नहीं पड़ता कि पहली बार सदस्य बने व्यक्ति को एकदम से कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया हो। लेकिन पिछले कई महीनों से हार्दिक पटेल अपनी उपेक्षा की बात कह रहे थे, कुछ दिन पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया पेज से कांग्रेस का नाम हटा दिया था, और उनकी इस्तीफे की बात हैरान करने वाली नहीं है। यह बात भी हैरान करने वाली नहीं है कि जिंदगी के सबसे खराब दौर से गुजर रही कांग्रेस पार्टी ऐसे दौर में भी अपने साथ आने वाले लोगों को सम्हालकर नहीं रख पा रही है, और न ही पुराने लोग अपनी आज की पार्टी से खुश रह गए हैं। इन तमाम लोगों पर किसी सत्तारूढ़ पार्टी से जुडऩे की तोहमत लगाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि बंगाल के बाहर के कई कांग्रेस नेता भी तृणमूल कांग्रेस में गए हैं, और बंगाल के बाहर तो तृणमूल की सत्ता का कोई फायदा उन्हें होते नहीं दिखता है।
कांग्रेस अपने संकल्प शिविर में संगठन के मुद्दों पर कितनी ही बात करे, हकीकत यह है कि उसने मुद्दों को, जलते-सुलगते मुद्दों को ताक पर धर देने की आदत बना रखी है। किसी भी समस्या पर कुछ भी न करके अपने आप उसके खत्म हो जाने या टल जाने की उम्मीद करते हुए कांग्रेस लीडरशिप चीजों को इस नौबत तक ला रही है। हो सकता है कि हार्दिक पटेल संभावनाविहीन दिखती कांग्रेस में अपनी संभावनाविहीनता से थक गए हों, लेकिन अगर उनकी कही यह बात सही है कि उन्हें संगठन की किसी बैठक में नहीं बुलाया जाता, दर्जनों पदाधिकारी नियुक्त करते हुए उनसे पूछा भी नहीं जाता, पार्टी के लीडर उनसे बात करते हुए अपने मोबाइल फोन पर व्यस्त रहते हैं, तो फिर हार्दिक पटेल की उस पार्टी को क्या जरूरत है, और हार्दिक पटेल को उस पार्टी की क्या जरूरत है? यह सिलसिला टूट जाना ही ठीक था।
कांग्रेस पार्टी की दुर्गति पर लिखना आज का मकसद नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की जरूरत पर लिखना जरूरी है, और इसी नाते हम कई बार कांग्रेस पर लिखने को मजबूर हो जाते हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के पिछले एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने औपचारिक इंटरव्यू में यह कहा था कि राहुल गांधी से मिले उन्हें साल भर से अधिक हो चुका था। यह नौबत देश के बहुत से कांग्रेस नेताओं की रहती है जिन्हें पार्टी लीडरशिप से मिलने का वक्त नहीं मिलता। पार्टी की लीडरशिप में राहुल गांधी क्या हैं, यह एक रहस्य बना हुआ है। वे कुछ न होते हुए भी सब कुछ हैं, और सब कुछ होते हुए भी उन पर किसी बात की जिम्मेदारी नहीं है। बिना जिम्मेदारी सिर्फ अधिकार ही अधिकार, यह किसी भी लोकतंत्र में अच्छी नौबत नहीं है, और किसी संगठन के लिए तो यह आत्मघाती से कम नहीं है। नतीजा यही है कि पार्टी को जिन मामलों पर तुरंत फैसला लेना चाहिए, वे मामले बरसों तक पड़े रहते हैं, क्योंकि जिनसे फैसले लेने की उम्मीद की जाती है, उनसे कोई सवाल पूछने की संस्कृति कांग्रेस पार्टी में नहीं है। यह तुलना कुछ लोगों को नाजायज लग सकती है कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कोई ईमानदार सवाल पूछने का हक मीडिया को नहीं है, ठीक उसी तरह कांग्रेस के भीतर सोनिया-परिवार से कोई सवाल पूछने का हक भी किसी नेता का नहीं है। मोदी तो अपनी अपार लोकप्रियता या अपार कामयाबी के चलते सवालों को टाल सकते हैं, लेकिन सोनिया-परिवार देश के चुनावों में पार्टी के हाल को देखते हुए सवालों को कब तक टाल सकता है, कब तक टालते रहेगा?
एक सुनील जाखड़, या एक हार्दिक पटेल मुद्दा नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस अपने बड़े नेताओं को जिस लापरवाह और निस्पृह भाव से चले जाने दे रही है, वह पार्टी के एक खराब भविष्य का आसार है। दो दिन पहले हमने कांग्रेस शिविर में राहुल गांधी के भाषण में क्षेत्रीय पार्टियों के खिलाफ कही गई अवांछित बातों की आलोचना की थी, और उसके तुरंत बाद से देश भर में ऐसी आलोचना जगह-जगह से आ रही है, बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बारे में लिखा है, और तेजस्वी यादव जैसे कांग्रेस के दोस्त ने भी इसके खिलाफ बयान दिया है। कांग्रेस जितने किस्म की गलतियां कर रही है, गलत काम कर रही है, उन सबके नुकसान से उबरने के लिए ऐसे कोई संकल्प काफी नहीं हो सकते, जो कि अभी तीन दिनों के शिविर में लिए गए हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधारने चाहिए, वरना उसका रहा-सहा वर्तमान भी भविष्य में उसका साथ नहीं दे पाएगा।











