दीवारों पर लिक्खा है, 30 अप्रैल 2021


 

महामारी में अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप पर मनोबल गिराने की साजिश की एफआईआर दर्ज !

  उत्तर प्रदेश में अभी पुलिस ने एक ऐसे युवक के खिलाफ जुर्म दर्ज किया है जिसने सोशल मीडिया पर अपने परिवार के किसी बुजुर्ग के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की अपील की थी। आज पूरी दुनिया इस बात की गवाह है कि हिंदुस्तान का कोना-कोना ऑक्सीजन की कमी का शिकार है और अस्पतालों तक में बिना ऑक्सीजन मौतें लगातार हो रही हैं। आज अभी जब हम इस बात को लिख रहे हैं उस वक्त दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार से ऑक्सीजन संकट, और बदइंतजामी को लेकर जवाब-तलब जारी है। जब पूरे देश में यह बात साफ है कि ऑक्सीजन की कमी है और किसी परिवार में किसी मरीज के लिए अगर ऑक्सीजन लगनी है तो उसकी सार्वजनिक अपील सरकार को बदनाम करने की कोशिश मानकर जुर्म समझी जा रही है। अभी इसके खिलाफ देशभर के सोशल मीडिया पर और अखबारों में भी लगातार लिखा जा रहा है और इसके फेर में उत्तर प्रदेश सरकार की दूसरी नालायकी और नाकामयाबी सामने आते जा रही हैं। लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि सरकार खुद इंतजाम नहीं कर पा रही है और दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर अपील करने से अगर आज लोग आगे बढक़र दूसरों की मदद कर रहे हैं, तो उस मदद मांगने को भी जुर्म मान लिया जा रहा है। यह मामला अदालत में 2 मिनट भी नहीं टिकेगा  और पुलिस को फटकार लगना तय है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश सरकार तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की फटकार खा-खा कर अब बेशर्म सी हो गई है कि उसे अब इससे अधिक बुरा और कोई क्या कह लेंगे। 

लेकिन अफसरों और पुलिस की ऐसी बददिमागी महज उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में कल पुलिस में कई पत्रकारों के खिलाफ एक जुर्म दर्ज किया है। रायगढ़ जिले के एक एसडीएम और तहसीलदार की ओर से पुलिस को शिकायत की गई कि एक अखबार में अफसरों पर महुआ व्यापारियों से वसूली या उगाही की खबर छपी और फिर बाद में रायगढ़ के पत्रकारों के एक व्हाट्सऐप ग्रुप में उस खबर के संदर्भ में अफसरों के भ्रष्ट होने के बारे में एक सामान्य टिप्पणी की गई। अब अफसरों का हाल देखें कि उन्होंने पुलिस में यह शिकायत की कि वे रात-दिन कोरोना के मोर्चे पर डटे हुए हैं और महामारी से लडऩे की इस कोशिश में उनके मनोबल को तोडऩे के लिए उनके खिलाफ साजिशन ऐसा समाचार छापा गया है। मतलब यह कि जब तक महामारी, तब तक अगर अफसरों का कोई भ्रष्टाचार है, तो उसे अनदेखा करना चाहिए, उसके बारे में पत्रकारों को अपने ग्रुप में बात भी नहीं करनी चाहिए। यह महामारी से लड़ाई को एक अलग ऊंचाई तक ले जाने की कोशिश है मानो कि कोई पतंग को अंतरिक्ष तक ले जा रहे हों। अगर महामारी से अधिकारी और कर्मचारी लड़ रहे हैं तो क्या उनके बाकी कथित भ्रष्टाचार या सचमुच के भ्रष्टाचार को अनदेखा कर दिया जाए जाए? इस तर्क से तो मोदी सरकार भी कह सकती है कि वह कोरोना से लड़ रही है इसलिए उसकी किसी किस्म की आलोचना नहीं होनी चाहिए। मोदी सरकार भी राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी पर जुर्म कायम कर सकती है कि वे सरकार का मनोबल तोडऩे का काम कर रहे हैं। और यह बात किसी भी राज्य के सरकारी कर्मचारी अधिकारी कह सकते हैं, मंत्री-मुख्यमंत्री कह सकते हैं कि उनकी आलोचना जायज नहीं है क्योंकि वह अभी कोरोना के मोर्चे पर डटे हुए हैं। अब अगर इसी तर्क को देखें तो इस हिसाब से तो मीडिया के लोग भी कोरोना के मोर्चे पर डटे हुए हैं और छत्तीसगढ़ में पुलिस के जितने लोग कोरोनाग्रस्त हैं उतने ही लोग मीडिया के भी मारे गए हैं। तो फिर मीडिया के खिलाफ आज इस तरह का जुर्म दर्ज करना क्या कोरोनाग्रस्त मीडिया की लड़ाई को कमजोर करने की साजिश करार दे दिया जाए? 

यह सिलसिला बहुत शर्मनाक है जब सरकारी अधिकारी अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करके किसी आम नागरिक के खिलाफ या मीडिया के किसी तबके के खिलाफ इस तरह की हरकत करते हैं। हिंदुस्तान में यह देखने में आ रहा है कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी, राज्य की सरकार, या कि स्थानीय अफसर जब चाहे तब किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं और फिर वैसी एफआईआर चाहे अदालत में जाकर खड़ी क्यों ना हो सके। छत्तीसगढ़ में पिछले वर्षों में जाने कितनी ही एफआईआर देश के पत्रकारों के खिलाफ, राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के खिलाफ, राज्य के भीतर सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के खिलाफ, अखबार या मीडिया वालों के खिलाफ दर्ज की गई हैं। लेकिन उनमें से कोई एफआईआर कभी अदालत में टिक नहीं पाती क्योंकि वे बदनीयत से दर्ज होती हैं। यह सिलसिला इसलिए अधिक खतरनाक है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी का शासन है और कांग्रेस पार्टी पूरे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ इस किस्म से दर्ज की जाने वाली फर्जी शिकायतों के खिलाफ बार-बार आवाज उठाती है। अब अगर महुआ व्यापारियों से रिश्वत लेने का आरोप लगा है, एक अखबार में ऐसी रिपोर्ट छपी है, और बाकी अखबारनवीस इस  पर चर्चा कर रहे हैं तो इस खबर और चर्चा का प्रशासन का कोरोना मोर्चे का मनोबल तोडऩे से क्या लेना-देना हो सकता है? हम कानून की अपनी बहुत मामूली समझ के आधार पर यह कह सकते हैं कि रायगढ़ पुलिस में वहां के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा दर्ज कराई कराई गई है एफआईआर हाईकोर्ट में आनन-फानन खारिज हो जाएगी जो कि ऐसी एफआईआर के पीछे की बदनीयत को पल भर में देख लेगा। यह सिलसिला अच्छा नहीं है, और यह राज्य की सरकार की साख खराब करता है, यहां पर सत्तारूढ़ पार्टी की साख को भी खराब करता है जो कि भाजपा के 15 वर्ष के कार्यकाल में इसी तरह की दर्ज की गई बहुत सी एफआईआर का विरोध करते  आई है। 

इस सरकार को अपने अफसरों पर इतना काबू रखना चाहिए कि वे मीडिया को परेशान करने के लिए इस तरह की फर्जी शिकायतें न दर्ज कराएं, न पुलिस ऐसी एफआईआर दर्ज करे। यह मामला अधिक से अधिक किसी अधिकारी की मानहानि का साधारण मामला हो सकता था जिसमें वह अधिकारी अदालत में एक केस दायर करने के लिए आजाद थे। लेकिन महामारी से लड़ाई की आड़ लेना एक शर्मनाक हरकत है और महामारी से अगर कोई लड़ रहे हैं तो उसका यह मतलब नहीं है कि उनके तमाम गलत कामों को अनदेखा कर दिया जाए। इस तर्क से तो आज पूरे देश में किसी अस्पताल, किसी सरकार, किसी अफसर, या किसी मंत्री के खिलाफ कुछ भी लिखना जुर्म होगा क्योंकि अधिकतर लोग किसी न किसी तरह से महामारी के खिलाफ लड़ाई में शामिल हैं। इसके पहले कि अदालत ऐसी रद्दी और तर्कहीन एफआईआर खारिज करे, सरकार को खुद होकर इसे खत्म करना चाहिए और अपने अमले को सावधान करना चाहिए कि महामारी की आड़ लेकर इस तरह की हरकतें ना की जाएं । 

आज तो देश भर का मीडिया ऐसी खबरों से भरा हुआ है कि किस प्रदेश में क्या भ्रष्टाचार चल रहा है, और जिस वक्त महामारी से लड़ाई जैसी आपाधापी चलती है उस वक्त तो भ्रष्टाचार और अधिक होता है। हिंदुस्तान के तमाम प्रदेशों का इतिहास गवाह है कि आपदा प्रबंधन सबसे अधिक भ्रष्टाचार से भरा हुआ मामला रहता है। ऐसे में मीडिया या पत्रकारों को कुचलना बहुत समझदारी का काम नहीं होगा। अगर राज्य सरकार इस एक जिले के अपने प्रशासनिक अफसरों पर काबू नहीं करेगी, तो प्रदेश के बहुत सारे जिलों में बहुत सारे दूसरे अफसर पत्रकारों के खिलाफ अपना कोई पुराना हिसाब चुकता करने के लिए उनके खिलाफ कोई ना कोई जुर्म दर्ज करवाते रहेंगे। हमारा तो ख्याल यह है कि भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों वाली खबर को कुचलने के लिए अगर प्रशासनिक अधिकारी महामोरी के मोर्चे की आड़ ले रहे हैं, तो इसे लेकर उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

(Daily chhattisgarh)

काँव-काँव, 29 अप्रैल 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अप्रैल 2021


 

कोरोना मोर्चे की अलग-अलग बातें, राज्य सरकार गौर करे

  छत्तीसगढ़ में एक सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात 8 महीने की गर्भवती एक नर्स की कोरोना से मौत हो गई। उसने विभाग को लिखित अर्जी में अपने गर्भवती होने की सूचना दी थी और छुट्टी मांगी थी। उसे छुट्टी तो नहीं मिली लेकिन उसकी ड्यूटी कोरोना मरीजों के बीच लगा दी गई और कोरोना मरीजों को देखते-देखते वह खुद कोरोना की शिकार हो गई और चल बसी। वह 3 बरस की एक बच्ची की मां भी थी, और बीमार होने पर जिला अस्पताल में उसे दाखिल कराया गया, लेकिन एक चर्चित जीवनरक्षक दवाई उसे नहीं मिल पाई, उसके घरवाले बाजार से 15 गुना दाम देकर ब्लैक में वह दवा खरीद कर लेकर आए, लेकिन फिर भी वह उसके काम नहीं आ सकी। जिला अस्पताल में उसकी हालत बेकाबू होने पर उसे एम्स भेजा गया जहां 2 दिन बाद उसे वेंटिलेटर मिलने की बात खबर में आई है, और उसके कुछ घंटों के भीतर ही वह चल बसी। एक तरफ तो केंद्र सरकार और राज्य सरकार गर्भवती महिलाओं को मातृत्व अवकाश देने का कानून बनाती हैं, उसका दावा करती हैं, दूसरी तरफ 8 महीने की गर्भवती इस नर्स को न छुट्टी मिली और न ही उसके अफसरों ने यह देखा कि उसकी ड्यूटी कहां लगाई गई है। आखिर में कोरोना के बीच ड्यूटी करते  हुए वह कोरोनाग्रस्त होकर चल बसी अपनी छोटी सी बच्ची को छोडक़र। 

यह अकेली घटना नहीं है, अभी कुछ दिन पहले बस्तर में राज्य पुलिस सेवा की एक महिला अधिकारी भी इसी तरह गर्भवती रहते हुए सडक़ पर आकर लॉकडाउन का पालन करवाते हुए, लोगों को रोकते हुए दिख रही थी, और उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी आईं, और अखबारों में भी। हमने पहले भी गर्भवती महिलाओं के नक्सल मोर्चे पर ड्यूटी पर जाने के खिलाफ लिखा था। हो सकता है कि वे महिलाएं खुद होकर ऐसी ड्यूटी करना चाहती हों, लेकिन ऐसा करना उनके दुस्साहस का सबूत तो है, यह उनके अफसरों की लापरवाही का सबूत भी है जो कि एक गर्भवती कर्मचारी या अधिकारी को खतरे की ड्यूटी पर तैनात करते हैं, या कि जाने की इजाजत देते हैं। ऐसी महिलाओं को लोगों की वाहवाही भी मिलने लगती है, लोग उनके त्याग की भावना की तारीफ करने लगते हैं, ऐसे काम को जन सेवा के लिए बलिदान कहने लगते हैं, लेकिन यह सिलसिला एक सामाजिक अन्याय की एक कड़ी है जिसे समझने की जरूरत है। यह समझना जरूरी है कि गर्भवती तो महिला कर्मचारी या महिला अधिकारी ही हो सकती हैं, किसी पुरुष अधिकारी के सामने तो ऐसी नौबत आती नहीं है, इसलिए सरकारी नौकरी में काम करने वाली महिलाओं के सामने यह चुनौती भी रहती है कि वह अपने-आपको पुरुषों से कम नहीं साबित करने के लिए ऐसे मुश्किल काम करें। लेकिन जब कुदरत ने ही महिलाओं को अलग बनाया है, उनकी जरूरतों को अलग बनाया है, तो उनकी गर्भावस्था का सम्मान करना चाहिए उनके अजन्मे बच्चों का सम्मान करना चाहिए, यह अधिकार किसी महिला को भी नहीं है कि वह अपने अजन्मे बच्चे को खतरे में डालने का कोई काम करे। और फिर ऐसे जितने भी मामले सामने आते हैं उनमें से 100 फीसदी मामले ऐसे रहते हैं कि उन महिलाओं के बिना भी वे काम चल सकते थे, एक किसी और नर्स को कोरोना मरीजों के बीच ड्यूटी पर लगाया जा सकता था, एक किसी और महिला अफसर को लॉकडाउन में लगाया जा सकता था, और एक किसी और हथियारबंद महिला अधिकारी को या पुरुष को नक्सल मोर्चे पर जंगल भेजा जा सकता था। लेकिन जब ऐसी कहानियां सामने आती हैं तो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया तक के लोग बावले हो जाते हैं क्योंकि ऐसी खबरें, ऐसी तस्वीरें, लोगों का ध्यान खींचती हैं। बस अपने पाठक, और अपने दर्शक जुटाने के लिए मीडिया ऐसी लापरवाही को त्याग और बलिदान करार देने पर उतारू हो जाता है, और बड़े-बड़े लोग भी ऐसी महिलाओं को बधाई देने लगते हैं, बिना यह देखे हुए कि क्या यह काम उन महिलाओं के अजन्मे बच्चों को खतरे में डाले बिना नहीं चल सकता था? 

यह बात इसलिए भी सोचने की जरूरत है कि अभी छत्तीसगढ़ में सरकार ने सभी कर्मचारियों से कोरोना के लिए 1 दिन का वेतन मांगा है। विभागों ने शायद अपने कर्मचारियों का 1 दिन का वेतन खुद ही काट लिया है, और जहां पर उनसे सहमति मांगी गई है, बहुत से पुलिस कर्मचारियों ने इस पर असहमति जताई है। उनका अपना तर्क है कि वे कोरोना मोर्चे पर रात दिन खतरा झेलते हुए अधिक घंटों की ड्यूटी कर रहे हैं, और ऐसे में उनसे और त्याग की उम्मीद क्यों करनी चाहिए? यह बात इस हिसाब से भी सही है कि बिहार में जहां पर कि पुलिस कर्मचारियों का संगठन है, वहां पर उस संगठन ने मांग की है कि कोरोनाग्रस्त होकर गुजरने पर पुलिस कर्मचारी का 50 लाख रुपए का बीमा करवाया जाए. छत्तीसगढ़ में कुछ बरस पहले पुलिस कर्मचारियों और उनके परिवारों की मांग को लेकर एक सुगबुगाहट हुई थी, बाद में पुलिस परिवारों के नाम पर जो आंदोलन होने जा रहा था उसे बुरी तरह कुचलने के लिए सरकार और पुलिस विभाग टूट पड़े थे। अभी एक पुलिस कर्मचारी ने कोरोना के लिए 1 दिन की तनख्वाह देने से मना कर दिया तो शायद उसका नक्सल इलाके में तबादला कर दिया गया. इसके बाद उसका बताया जा रहा एक वीडियो चारों तरफ फैल रहा है जिसमें वह यह खुलासा कर रहा है कि पुलिस के छोटे कर्मचारियों का किस तरह बेजा इस्तेमाल होता है और किस तरह बड़े अफसर अपने बंगलों पर दर्जन-दर्जनभर गाडिय़ां और दर्जनों कर्मचारी रखते हैं। बड़े अफसरों की तनख्वाह भी लाखों रुपए महीने होती है, और वे उससे भी कई गुना अधिक तनख्वाह के कर्मचारियों को बंगलों पर बंधुआ मजदूरों की तरह रखते हैं, उनसे अपमानजनक और अमानवीय काम करवाते हैं। 

ये दो मामले अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ही मामले राज्य सरकार के हैं, और इनमें राज्य सरकार को तुरंत ही सुधार करना चाहिए। मुख्यमंत्री सहायता कोष या कोई और कोष, किसी कर्मचारी की तनख्वाह जबरदस्ती काटकर उसमें जमा नहीं करनी चाहिए। और अगर कोई ऐसा योगदान देने से मना करें तो उसका नक्सल इलाके में तबादला अगर किया गया है तो यह बहुत ही रद्दी किस्म का फैसला है, और यह नक्सल इलाके के साथ भी बेइंसाफी है कि वहां पर पुलिस को बतौर सजा भेजा जा रहा है। सजायाफ्ता पुलिस कर्मचारी वहां किस नैतिक मनोबल से जनकल्याण का काम कर सकते हैं? जो सरकार अपने प्रदेश के सबसे अधिक चुनौती भरे हुए इलाके में पुलिस को बतौर सजा भेजती हो, वह सरकार उस इलाके की चुनौती के साथ बेइंसाफी भी कर रही है। 

राज्य सरकार को कोरोना के मोर्चे पर अपने कर्मचारियों के साथ एक तो मानवीय रुख रखना चाहिए, दूसरी बात यह कि अगर कोई योगदान सरकारी कर्मचारियों से जुटाना है, तो वह योगदान जबरदस्ती नहीं होना चाहिए। तीसरी बात यह कि ऐसी जबरदस्ती के साथ अगर किसी को सजा दी जा रही है, तो यह मामला अदालत में जाकर सरकार के लिए बड़ी शर्मिंदगी खड़ी कर सकता है, और सार्वजनिक रूप से तो यह शर्मिंदगी की बात है ही कि कोई सरकारी कोष में चंदा देने से मना करें, योगदान देने से मना करें, तो उसे सजा दी जाए। ये कई मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन सारे ही राज्य सरकार से जुड़े हुए हैं, और जिस पुलिस कर्मचारी के बड़े अफसरों पर तोहमत लगाई गई है, तो उनके बारे में प्रदेश में हर कोई जानते हैं कि यह सही तोहमतें हैं। इसलिए सरकार को अगले किसी पुलिस परिवार आंदोलन के पहले यह अमानवीय सिलसिला भी खत्म करना चाहिए और सरकारी बर्बादी का सिलसिला भी खत्म करना चाहिए। जिन अफसरों को लाखों रुपए तनख्वाह मिलती है या लाख रुपए से अधिक पेंशन मिलती है उन अफसरों के, या रिटायर्ड अफसरों के घरों पर गाडिय़ों और सिपाहियों का रेला क्यों लगाया जाता है ? सरकारी खजाने की ऐसी खुली बर्बादी भी खत्म होनी चाहिए। जब पुलिस के छोटे कर्मचारी ऐसी बर्बादी रात-दिन देखते हैं, तब उनके मन में भी एक दिन का वेतन देने में तकलीफ होती है। राज्य सरकार को तुरंत इन बातों पर गौर करना चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 28 अप्रैल 2021


 

वारों पर लिक्खा है, 28 अप्रैल 2021


 

केंद्र ने सिर्फ राज्यों को नहीं, नागरिकों की जिंदगी को भी कोरोना की इस तूफानी लहर के बीच मंझधार में छोड़ दिया

  हिंदुस्तान में लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाने का काम एकदम अधर में टंगा हुआ दिख रहा है, उसके पास पैर टिकाने को जमीन पर नहीं है। भारत सरकार ने आज राज्यों को यह बात दोहरा दी है कि 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को टीका लगाना उनकी अपनी जिम्मेदारी है और उसके लिए वैक्सीन खरीदना भी उसे खुद ही को करना है। इसके पहले से 45 वर्ष से अधिक के लोगों को, और फ्रंटलाइन वर्कर्स कहे जाने वाले, डॉक्टर, अस्पताल-एंबुलेंस कर्मचारी, पुलिस और सफाई कर्मचारियों को वैक्सीन देना भारत सरकार पहले की तरह जारी रखेगी जिनमें से 14 करोड़ से अधिक लोगों को अब तक वैक्सीन लग भी चुका है। यह जाहिर है कि 45 वर्ष से अधिक के, और फ्रंटलाइन वर्कर्स में से बहुत अधिक लोग अब वैक्सीन लगवाने को बचे नहीं हैं। ऐसे में देश की बाकी तमाम बालिग आबादी को टीके लगाना अब राज्यों की जिम्मेदारी हो गई है, यह एक अलग बात है कि राज्यों को ये टीके खरीदने के लिए देश में कुल 2 कंपनियां आज हासिल हैं, जो कि अगले कुछ हफ्तों तक सप्लाई शुरू भी ना करने की बात कर रही हैं। 

हिंदुस्तान की सरकार ने अपने ही देश की प्रदेश-सरकारों को अपने मातहत नौकरों की तरह इस्तेमाल करते हुए वैक्सीन का यह बोझ है जिस तरह उनके सिर पर डाला है वह अकल्पनीय हैं। भारत के संघीय ढांचे में केंद्र और राज्य के बीच संबंधों का अधिकारों और जिम्मेदारियों का एक बंटवारा बनाया गया है। आज महामारी के कानून का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार साल भर से राज्य सरकारों पर कई तरह का काबू रखे हुए है। लेकिन अब जब केंद्र सरकार ने यह तय कर लिया था कि वह 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए वैक्सीन नहीं देगी और राज्यों को खुद उसका इंतजाम करना पड़ेगा, तो यहां पर केंद्र सरकार का नियंत्रण भी खत्म हो जाना चाहिए था, और यह राज्यों के ऊपर छोडऩा चाहिए था कि 18 वर्ष से अधिक के 45 वर्ष तक के लोगों को वह किस रफ्तार से, किन किस्तों में किस तरह वैक्सीन लगाएंगे। केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से यह तारीख तय कर दी कि 1 मई से 18 वर्षों से ऊपर के सभी लोगों को वैक्सीन लगाई जाएगी। आज हालत यह है कि देश की आधी से अधिक आबादी इस आयु वर्ग में आ रही है, और जब 60 करोड़ लोग एक साथ वैक्सीन के हकदार मानकर टीकाकरण केंद्रों पर भीड़ लगाने के लिए छोड़ दिए जाएंगे तो क्या राज्यों के लिए इसका मैनेजमेंट आसान होगा? आज राज्यों को अपने पैसे से वैक्सीन खरीदने को भी कह दिया गया है, और वैक्सीन कंपनियों ने अब तक केंद्र सरकार को दिए जा रहे रेट के मुकाबले कई गुना अधिक रेट राज्य सरकारों के लिए रख दिए हैं। केंद्र सरकार ने, जब तक उसे खर्च करना था, वैक्सीन के दाम काबू में रखवाये, अब जब राज्यों के ऊपर इसका बोझ डाला जा रहा है तो वैक्सीन कंपनियों को अंधाधुंध मुनाफाखोरी करने की छूट दी जा रही है। इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट में कल सुनवाई के दौरान एक जज ने सवाल किया कि केंद्र सरकार पेटेंट कानून के तहत वैक्सीन के दाम काबू में क्यों नहीं कर सकती? यह सवाल आम जनता के मन में भी उठ रहा है कि वैक्सीन निर्माताओं को ऐसी अंधाधुंध रेट बढ़ोतरी की छूट देकर भारत सरकार क्या कर रही है? क्या वह राज्यों को नाकामयाब दिखाना चाहती है या उनकी कमर तोड़ देना चाहती है, या यह दोनों ही काम एक साथ करना चाहती है? आज राज्यों को केंद्र सरकार से उसके फैसले का जिस तरह विरोध करना था वह राज्यों ने नहीं किया, क्योंकि आज ऐसा सैद्धांतिक विरोध शायद कोरोना मोर्चे पर केंद्र सरकार का विरोध गिन लिया जाता। लेकिन हम क्योंकि वोटरों की ऐसी किसी गलतफहमी के खतरे की फिक्र नहीं करते, इसलिए हम बार-बार इस बात को उठा रहे हैं कि केंद्र सरकार को जो टीकाकरण कार्यक्रम न करना है न जिसमें कोई मदद देनी है, उसे इतनी बुरी तरह बारीकी से डिजाइन करके राज्यों के ऊपर क्यों लाद दिया है? केंद्र सरकार ने जब तक खुद टीके दिए तब तक तो पहले 60 वर्ष की उम्र से अधिक के लोगों के लिए दिए, फिर फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए दिए, फिर 45 वर्ष से अधिक के दूसरी बीमारियों से परेशान लोगों के लिए दिए, और आखिर में जाकर तीसरी-चौथी किस्त में 45 वर्ष से ऊपर के सभी लोगों के लिए टीके दिए। यह देना अभी जारी ही है और 16 जनवरी से शुरू हुआ टीकाकरण कार्यक्रम अभी किसी किनारे पहुंचा नहीं है, देश की आबादी को देखें तो आबादी का 10 फीसदी ही अभी टीके पा सका है। ऐसे में एक छोटी आबादी को टीके देने के बाद केंद्र सरकार ने एकदम से करीब आधी आबादी के लिए दरवाजे खोल दिए और उन दरवाजों की चाबी राज्य सरकारों के हाथ थमा दी कि वे उस पर काबू करें वे टीके खरीदें और लगाएं। एक साधारण समझबूझ भी यह सुझाती है कि राज्यों को टीकाकरण के लिए आयु वर्ग तय करने का अधिकार खुद को देना चाहिए था क्योंकि किसी भी राज्य की क्षमता नहीं है कि वह अगले कई महीनों में भी अपनी आधी आबादी को टीका लगा सके। ऐसे में कुंभ की अराजक भीड़ की तरह, और बंगाल की चुनावी रैलियों में अनगिनत लोगों की भीड़ की तरह की भीड़, राज्यों के टीकाकरण केंद्र पर लगवाने का यह काम केंद्र सरकार ने किया है जो कि राज्यों के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकता है। हमें तो यह बात बेहतर लगती अगर राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार के इस बिना वजह लादे हुए फैसले का विरोध करते और याद दिलाते कि जिस कार्यक्रम में केंद्र कोई सहयोग नहीं कर रही है उस कार्यक्रम की बारीक बातों को तय करना राज्यों का अधिकार होना चाहिए था, और केंद्र ने इसमें बिना वजह एक नाजायज दखल दी है।

आज बहुत से जानकार लोग यह मान रहे हैं कि जिस तरह पिछले बरस कोरोना का खतरा दिखते ही अमेरिका, और यूरोप के बहुत से देशों ने, भारत के टीका निर्माताओं से सौदे किए और उनसे करोड़ों टीके खरीदने का रेट तय किया, उन्हें भुगतान किया। उस वक्त भी पूरी दुनिया यह देख रही थी कि कोरोनावायरस की लहर बारी बारी से एक-एक देश में आते जा रही है, और भारत सरकार को भी वह दिख रहा था. लेकिन उसने अपने ही देश की कंपनियों से न सौदे किये, न टीकों की बुकिंग की। और आज तो हालत यह है कि उसने इस सौदेबाजी का बोझ रातों-रात राज्य सरकारों पर डाल दिया है जिनसे कि ये कंपनियां किसी मुनाफाखोर और सूदखोर की तरह मुसीबत के वक्त मनमाना सूद वसूल करने का मोलभाव कर रही हैं। भारत सरकार ने, जिस वक्त पूरे देश के लिए टीकों के जुगाड़ करने का मौका था, उस पर जिम्मेदारी थी, उस मौके को पूरी तरह चले जाने दिया, वक्त पर अपना काम नहीं किया, और आज जब राज्यों के पास कोई विकल्प नहीं है, तब उन्हें बाजारू कारोबारियों के पास भेजा जा रहा है कि वे जाकर खुद मोलभाव करें। यह पूरा सिलसिला मोदी सरकार की भारी गैरजिम्मेदारी का भी है, और यह केंद्र-राज्य संबंधों के मुताबिक बहुत नाजायज भी है। आज राज्य खुद होकर टीके खरीदने की कोशिश कर रहे हैं जो कि उन्हें केंद्र सरकार के मुकाबले कई गुना अधिक दाम पर मिलने का आसार दिख रहा है। दूसरी बात यह कि केंद्र सरकार ने अपनी मर्जी से यह तय किया कि वह किस उम्र से नीचे के लोगों का खर्च नहीं उठाएगी और यह राज्यों का जिम्मा रहेगा। देश में पीएम केयर्स फंड के नाम से जो हजारों करोड़ों रुपए इक_ा हुए हैं उस फंड से ही पूरे देश के लोगों के लिए टीके खरीदने थे। और इस कानून को भी टटोलना था कि किस तरह देश में बनने वाली वैक्सीन के दाम नियंत्रित किए जा सकते हैं। लेकिन जिस दिन प्रधानमंत्री ने टीका बनाने वाली कंपनियों और दवा कंपनियों के साथ बैठक की, उसी दिन यह फैसला ले लिया गया कि अब इस देश के राज्य इन कंपनियों के रहमोंकरम पर जिंदा रहेंगे।

आज जब हिंदुस्तान में कोरोना की लहर उफान पर है, एक सुनामी सा आया हुआ है, उस वक्त टीकों को पूरी रफ्तार से बाजार में रहना था, लोगों की पहुंच में रहना था, राज्य सरकारों के हाथ में रहना था। लेकिन इस नाजुक मौके पर, इस खतरनाक मोड़ पर, केंद्र सरकार ने राज्यों को बेसहारा छोड़ा है और देश की जनता को एक किस्म से मुनाफाखोर वैक्सीन कंपनियों के पास गिरवी रख दिया है। यह पूरा सिलसिला अलोकतांत्रिक है, भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है, और अमानवीय भी है। यह समझ लेने की जरूरत है कि अब अगर कोरोना का यह उफान काबू में नहीं आता है तो इसके पीछे पिछले 10 दिनों से वैक्सीन को लेकर केंद्र सरकार की खड़ी की हुई अनिश्चितता भी एक बड़ी जिम्मेदार वजह रहेगी। इस बात को देश में हर समझदार तबके को उठाना चाहिए कि केंद्र सरकार ने मंझधार में सिर्फ राज्यों को नहीं छोड़ा है, देश के नागरिकों की जिंदगी को भी कोरोना की इस तूफानी लहर के बीच मंझधार में छोड़ दिया है।

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 27 अप्रैल 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अप्रैल 2021


 

देश के बड़े जज अपना देश देखने न्यायमित्र क्यों तैनात नहीं कर लेते?

  बहुत अरसा पहले जब हिंदी फिल्में एक ढर्रे पर बनती थीं तो उनमें कोई गुंडा आकर हीरोइन का बटुआ छीनकर भागता था और हीरो आकर उस गुंडे को पीट-पीटकर वह बटुआ लाकर हीरोइन को देता था और उसका दिल जीत लेता था। फिर फिल्मों में ही इसे एक तरकीब की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा और हीरो भाड़े के ऐसे गुंडे से हीरोइन का पर्स छिनवाता था और उसे लाकर देकर अपने आपको हीरो साबित करता था। इसी किस्म से हिंदी फिल्मों का एक और जमा-जमाया ढर्रा चल रहा था कि फिल्म के आखिर में जब हीरो विलेन को मार-मारकर हीरोइन को छुड़ा चुका रहता है, और विलेन को जमीन पर पटक-पटककर जख्मी कर चुका रहता है तब पुलिस की जीप सायरन बजाते पहुंचती है और महज गिरफ्तार करने का काम करती है। हिंदुस्तान की कई संवैधानिक संस्थाओं का हाल आज कुछ इसी किस्म से चल रहा है। 

पिछले दो दिनों से मद्रास हाईकोर्ट का चुनाव आयोग के खिलाफ एक हमलावर तेवर खबरों में बना हुआ है जिसमें चुनाव प्रचार की वजह से फैले कोरोना संक्रमण को देखते हुए हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि उसकी गैर जिम्मेदारी तो इस दर्जे की है कि उसके खिलाफ हत्या का जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने इतनी कड़ी बातें कही हैं कि हिंदुस्तान की जनता खुश हो गई कि चुनाव आयोग को अच्छी जमकर लताड़ पड़ी। लेकिन अब सवाल यह है कि मद्रास हाईकोर्ट का यह रूप कब देखने में आ रहा है? उस दिन जिस दिन कि वोट डाले हुए 20 दिन हो चुके हैं? चुनाव कार्यक्रम घोषित हुए शायद दो महीने, और चुनाव प्रचार खत्म हुए भी 20 दिन से अधिक हो चुके हैं, तब जाकर अगर हाईकोर्ट को यह दिख रहा है कि पूरा चुनाव जनता की सेहत को खतरे में डालकर करवाया जा रहा है तो यह देखना आज किस काम का रह गया है? सोशल मीडिया पर लोगों ने यह भी कहा है कि क्या हत्या का जुर्म सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भी दर्ज नहीं होना चाहिए जो कि देशभर में चुनाव-प्रचार और कोरोना की मिली-जुली कदमताल देखते हुए भी चुप बैठे हुए थे? और सवाल यह है कि जब असम से लेकर बंगाल तक और केरल से लेकर तमिलनाडु तक चारों तरफ चुनाव चल रहे थे, चारों तरफ यह लिखा जा रहा था कि ऐसा भयानक चुनाव प्रचार, ऐसी भयानक रैलियां, लोगों को खतरे में डालकर छोड़ेंगे और कोरोना इन्हें देखकर बहुत खुश हो रहा है, क्या उस वक्त भी देश के सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं दिखा कि बंधुआ मजदूर की तरह काम करते हुए चुनाव आयोग से परे, देश की सबसे बड़ी अदालत को भी कुछ करना चाहिए? और अगर सुप्रीम कोर्ट ने अपना जिम्मा पूरा नहीं किया, तो फिर आज कागजी और सतही सुनवाई करके सरकार को कोरोना के मोर्चे पर कटघरे में खड़ा करने का क्या मतलब है?

मद्रास हाईकोर्ट का फैसला हिंदी फिल्मों में बीते वक्त में आखिर में सायरन बजाते हुए पहुंची पुलिस जीप की तरह का है, जिससे अब केवल चुनाव की मतगणना की गर्दन हाईकोर्ट के हाथ में आ रही है, और चुनाव आयोग ने अदालत के आदेश के बाद आज यह रोक लगा दी है कि जीतने वाले उम्मीदवार कोई विजय जुलूस नहीं निकालेंगे। हाथी निकल चुका है अब आखिर में बची हुई उसकी दुम पर हाईकोर्ट और चुनाव आयोग दोनों अपना झंडा लगाकर कामयाबी दिखा रहे हैं। यह पूरा सिलसिला हिंदुस्तानी लोकतंत्र की नाकामयाबी का है, जिसमें कई राज्यों में चल रहे चुनावों में एक साथ दखल देने का अधिकार अकेले सुप्रीम कोर्ट का था। और जब देश के बच्चे-बच्चे को दिख रहा था कि चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम तय नहीं कर रहा था, चुनावी आम सभाओं की सहूलियत तय कर रहा था, उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना के बढ़ते हुए खतरे को अनदेखा किया। जज चुपचाप अपने बंगलों में कैद होकर महफूज़ बैठ गए। उस वक्त भी हमने यह बात लिखी थी कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के स्टाफ के कुछ कर्मचारी पॉजिटिव निकलने पर जिस रफ्तार से जजों ने अपने को अपने बंगलों में कैद कर लिया था, उन्हें देश की बाकी हालत नहीं दिखी, उन्हें देश में बाकी जगहों पर जनता को खतरे में डालते हुए राजनीतिक दल, सरकार और चुनाव आयोग नहीं दिखे? 

आज देश में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक और चुनाव आयोग तक ऐसी अनगिनत संवैधानिक संस्थाएं हैं जो कि वक्त निकल जाने पर काम शुरू करती हैं, ठीक उसी तरह जैसे आज केंद्र सरकार वेंटिलेटर के रोक दिए गए आर्डर जिंदा कर रही है, ऑक्सीजन के प्लांट लगाने के लिए देशभर के जिलों को मंजूरी दे रही है। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र की नाकामयाबी का है। जब केंद्र और राज्यों के संबंध इस हद तक तनातनी के चल रहे हैं कि केंद्र सरकार देश के संघीय ढांचे को कुछ गिन ही नहीं रही है, जब वह राज्यों के कोई अधिकार मान ही नहीं रही है, उस वक्त भी अगर सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी का एहसास नहीं हो रहा है, तो यह उसकी नाकामयाबी है। आज पत्ता-पत्ता बूटा -बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है, जैसी हालत हिंदुस्तानी लोकतंत्र की हो चुकी है। आज बेहतर तो यह होगा कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में अपनी मदद के लिए किसी बड़े वकील को न्याय मित्र बनाकर तैनात करता है कि वह जटिल मामलों को समझकर अदालत को उसकी बारीकियां समझाएंगे, सुप्रीम कोर्ट को इस देश में एक से अधिक ऐसे न्याय मित्र तैनात करने चाहिए जो सोशल मीडिया पर देखकर, अब तक ईमानदार रह गए कुछ अखबारों को देखकर, देश की हालत सुप्रीम कोर्ट को बताएं, क्योंकि जजों को खुद होकर अखबारों के पहले पन्ने की बड़ी-बड़ी सुर्खियां भी दिख नहीं रही है। 

तमिलनाडु में 6 अप्रैल को वोट डल चुके और 26 अप्रैल को हाईकोर्ट के जजों को यह दिख रहा है कि चुनाव आयोग पर हत्या का जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। 6 अप्रैल के दो दिन पहले प्रचार बंद हो चुका होगा और तमाम आम सभाएं और रैलियां 4 अप्रैल के पहले खत्म हो चुकी होंगी। अब तक तो चेन्नई के मरीना बीच में से उस दिन के बने हुए पदचिन्ह भी मिट चुके होंगे, और अब जाकर मद्रास हाई कोर्ट को इतनी कड़ी टिप्पणी करना सूझ रहा है जबकि वहां के जज वहां के स्थानीय अखबारों में टीवी चैनलों पर और सोशल मीडिया पर लगातार चुनाव प्रचार का माहौल देख रहे होंगे। कुछ ऐसा ही देखना कोलकाता में वहां के हाईकोर्ट के जजों का हो रहा होगा, केरल हाईकोर्ट के जज भी देख रहे होंगे, गुवाहाटी में असम के हाई कोर्ट के जज भी देख रहे होंगे, और सुप्रीम कोर्ट के जज तो पूरे हिंदुस्तान के मालिक हैं इसलिए वे तो देख ही रहे होंगे। लेकिन देश की किसी अदालत ने समय रहते हुए इस देश के लोगों की जिंदगी की फितख नहीं की। नेताओं ने बंगाल की अपनी आमसभा में जहां तक नजर जाए वहां तक लोगों के सिर ही सिर दिखने पर खुशी जाहिर की, लेकिन किसी जज को इन सिरों पर मंडराते हुए खतरे को देखने की फुर्सत नहीं थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के तमाम जज अदालत के अपने चेंबर से अपने बंगलों के चेंबर जाने में लगे हुए थे। ऐसा लगता है किस देश का मीडिया और सोशल मीडिया जिन नजरों से हिंदुस्तान को देखता है, वह नजर भी जजों को हासिल नहीं है। इसलिए इस बात में कोई बुराई नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के जज अपने लिए कुछ ऐसे न्याय मित्र नियुक्त करें जो कि अखबारों को पढक़र और सोशल मीडिया देखकर जजों को बताएं कि हिंदुस्तान आज किस हाल में है। ऐसा लगता है कि न्याय की देवी की जो आंखों पर पट्टी बंधी हुई प्रतिमा न्याय के प्रतीक के रूप में पूरी दुनिया में प्रचलन में है, कुछ वैसी ही पट्टी हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र के बड़े-बड़े जज अपनी आंखों पर बांधे रखते हैं, और इस पट्टी को उस वक्त खोलते हैं जब उनके करने का कुछ नहीं रह जाता, और अदालती इतिहास में अपनी टिप्पणियों को दर्ज करने के लिए वे बड़ी कड़ी-कड़ी बातें कहते हैं जिनका असल जिंदगी में कोई इस्तेमाल नहीं बचता। 

अखबारों को मद्रास हाई कोर्ट के जजों की कही हुई बातों से एक अच्छी सुर्खी मिल गई, और हिंदुस्तानी लोकतंत्र के बेवकूफ वोटरों को यह तसल्ली मिल गई कि चुनाव आयोग को अच्छी लताड़ पड़ी है, लेकिन इस किस्म की नूरा कुश्ती देखकर आज अगर सबसे अधिक हंसी किसी को आ रही होगी तो वह कोरोना को, जिसे कि बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ मिली जिनमें सैकड़ों मास्क भी नहीं थे। लोकतंत्र ऐसी नूरा कुश्ती या शास्त्रीय संगीत की जुगलबंदी का नाम नहीं है, लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के एक दूसरे पर संतुलित काबू का नाम है, जो कि आज खत्म हो चुका है। इस देश में 20 हज़ार करोड़ की लागत से नए संसद भवन और उसके आसपास के इलाके को आलीशान बनाया जा रहा है। संसद भवन का संसदीय इस्तेमाल शून्य सरीखा हो गया है, उसके लिए 20 हज़ार करोड़ की नई शान शौकत! यह जिसे हक्का-बक्का नहीं करती, उन्हें वोट डालने का भी कोई हक नहीं होना चाहिए। इस देश में आज ऑक्सीजन की कमी से लोग सडक़ों पर मर रहे हैं, योगीराज के रामराज में सरकारी अस्पताल के बाहर एक महिला, ऑक्सीजन के बिना मरते अपने कोरोनाग्रस्त पति को बचाने के लिए मुंह से सांसें देने की कोशिश में विधवा हो जाती है. लेकिन हिंदुस्तान नाम के दम तोड़ते इस लोकतंत्र के मुंह से मुंह लगाकर भला कौन ऑक्सीजन दे सकते हैं ? वोटर तो पहले ही खुद ही मुर्दा हो चुके हैं।   (Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल 2021


 

मीडिया नाम के किरदार के सतह के नीचे के काम भी समझने की बड़ी जरूरत है

 पिछले कुछ दिनों से हिंदुस्तान की खबरों में सतह पर ही इतना कुछ तैर रहा था कि लिखने के लिए कोई मुद्दा ढूंढना मुश्किल नहीं था। लेकिन सतह से नीचे, आंखों से सीधे-सीधे न दिखने वाले भी बहुत से ऐसे मुद्दे रहते हैं जिनको देखना-समझना और उन पर लिखना जरूरी होता है। ऐसा ही एक मुद्दा हिंदुस्तान में आज मीडिया में है, और मीडिया के बारे में भी है। इसे लिखना न महज मीडिया के बारे में लिखना होगा, बल्कि लोकतंत्र के बाकी पहलू भी इससे जुड़े हुए हैं, और उन पर लिखना भी हो जाएगा।

अभी जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ मुख्यमंत्रियों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस की, और उसके बाद टीवी की खबरों में केवल एक खबर लगातार छाई रही कि किस तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वीडियो कॉन्फ्रेंस का अपने सिरे से जीवंत प्रसारण कर दिया था। केंद्र सरकार से लेकर, कुछ मुख्यमंत्रियों तक ने इसकी खूब आलोचना की और दो दिन मीडिया में केजरीवाल की यह नाजायज कहीं जा रही हरकत, प्रोटोकॉल के उल्लंघन के रूप में छाई रही। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो इस बात को लेकर टूट ही पड़ा कि किस तरह केजरीवाल ने प्रधानमंत्री के साथ बैठक के प्रोटोकॉल को तोड़ा है। यह एक अलग बात है कि बैठक के चलते हुए ही केजरीवाल ने इस बात के लिए मोदी से भरपूर माफी मांग ली थी। लेकिन देश में कोरोना मोर्चे पर हालत को लेकर हुई इस बैठक के बाद तमाम खबरें केवल प्रोटोकॉल के इस उल्लंघन को लेकर बनती रहीं,  मानो देश में कोरोना के खतरे से अधिक बड़ा प्रोटोकॉल पर यह खतरा था। 

सतह के नीचे की चीजों को पढऩे या उनका अंदाज लगाने वाले लोगों ने इसे केजरीवाल की पुरानी कई हरकतों और तरकीबों से जोडक़र देखा और अंदाज लगाया कि देश की खतरनाक नौबत पर प्रधानमंत्री की जिस बैठक के बाद आमतौर पर केंद्र सरकार की नाकामी आलोचना के केंद्र में होनी चाहिए थी, वह आलोचना तो कहीं हो ही नहीं पाई क्योंकि केजरीवाल ने प्रोटोकॉल तोड़ दिया था। लोगों का यह अंदाज है कि केजरीवाल ने सोच-समझकर ऐसी हरकत की जिसे कि बाद में सोचे-समझे मीडिया ने सोच-समझकर शाम की सुर्खी बना दिया और केंद्र सरकार की नाकामी की बात तो आई-गई ही हो गई। अब यह बात सच है या नहीं है, यह तो केजरीवाल और मोदी ही बता सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में ऐसे बहुत से मौके आते हैं जब किसी एक खबर को दबाने के लिए उसी वक्त कोई दूसरी खबर ऐसी चटपटी खड़ी कर दी जाती है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो उस पर टूट ही पड़ता है। फिर आज तो देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मोटे तौर पर मोदी सरकार के साथ सिंक्रोनाइज्ड स्विमिंग करते दीखता है। 

प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ऐसे फर्क को लेकर पिछले कुछ महीनों में हमने इसी जगह एक से अधिक बार लिखा है कि किस तरह बीते कल के अखबारों को आज के मीडिया नाम के एक व्यापक शब्द के तहत लाया गया है, और धीरे-धीरे अखबार नाम का शब्द, न्यूजपेपर नाम का शब्द, गायब कर दिया गया और केवल मीडिया शब्द रह गया। आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबार, और एक किस्म से डिजिटल मीडिया भी, इस मीडिया शब्द के तहत आ गए हैं और अखबारों की अपनी एक पेशेवर पहचान गायब हो गई है। आज इस देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हाल को देखें तो लगता है कि बीते कल का प्रिंट मीडिया, यानी अखबार एक बेहतर पत्रकारिता करते थे जिसकी विश्वसनीयता अधिक थी, जिसे लोग अधिक गंभीरता से लेते थे, और जिसे तोडऩा-मरोडऩा इतना आसान नहीं था जितना कि आज टीवी चैनलों के साथ देखने मिलता है. 

टीवी चैनल अपने प्रसारण को लेकर और प्रसारण के बाद सोशल मीडिया पर अपने लोगों की मौजूदगी से अपना जो आक्रामक तेवर दिखाते हैं, उसके भीतर एक बड़ी सधी हुई सोच दिखती है। अभी जब केंद्र सरकार एकदम से आलोचना का शिकार हो रही थी, देश और दुनिया के अखबार कोरोना के बेकाबू होने को लेकर भारत की मोदी सरकार के खिलाफ काफी कुछ लिख रहे थे, उस वक्त यह देखना दिलचस्प था कि किस तरह हिंदुस्तान के अधिकतर समाचार चैनलों ने एक ही दिन एक ही शब्द को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया कि हिंदुस्तान में व्यवस्था नाकामयाब हो गई है, सिस्टम फेल हो गया है। ये शब्द ‘सिस्टम’ और ‘व्यवस्था’ बरसों से कहीं चर्चा में नहीं थे, लेकिन एकाएक जब आलोचना का केंद्र मोदी के इर्द-गिर्द हो चुका था, तब मानो मोदी के विकल्प के रूप में व्यवस्था नाम का शब्द छांटा गया और बहुत सारे चैनलों के संपादकों और चर्चित एंकरों ने लिखना शुरू किया कि किस तरह व्यवस्था फेल हो गई, किस तरह सिस्टम फेल हो गया। नतीजा यह हुआ कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का फोकस प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द से हटकर किसी एक ऐसी अदृश्य ‘व्यवस्था’ पर फोकस हो गया जिसे किसी ने देखा सुना ही नहीं था और जो मानो भारत सरकार से परे की कोई चीज हो। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ऐसी व्यापक सुनियोजित कोशिश उसे प्रिंट मीडिया से बिल्कुल अलग-थलग कर देती है. और यहां पर हमारी पिछले कई महीनों की यह वकालत जायज साबित होती है कि अखबारों को अपने-आपको मीडिया शब्द से बाहर लाकर अखबार या न्यूज़पेपर शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए, जो कि उनकी असली पहचान है, जो कि एक इज्जतदार पहचान भी है।

अभी चार दिन पहले हिंदुस्तान के एक नामी-गिरामी पत्रकार रहे हुए और पिछली यूपीए सरकार के वक्त पद्मश्री हासिल कर चुके, और मौजूदा एनडीए सरकार के तहत राज्यसभा में जाने की कोशिश के लिए चर्चित एक पत्रकार ने जिस तरह देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निलंबित करने की वकालत की है उस पर हम इसी जगह काफी लंबा लिख चुके हैं। लेकिन यह बात समझने की जरूरत है कि देश के किसी रद्दी अखबार के संपादक का भी ऐसा फतवा देने का हौसला नहीं हो सकता था, कागज पर छपने वाले शब्दों की एक अलग इज्जत होती है जो कि अखबारों से अलग होने के बाद महत्व खो देती है। इसलिए देश में अखबारों को अपनी पुरानी इज्जतदार और विश्वसनीय पहचान पाने के लिए अपने को मीडिया नाम की विशाल छतरी के साए से बाहर निकाल लेना चाहिए। आज जिस तरह केंद्र सरकार को आलोचना से बचने के लिए पूरे मीडिया पर सोशल मीडिया के रास्ते दबाव बनाया जा रहा है कि मीडिया सकारात्मक खबरें दिखाए। क्या कोई टीवी के पहले के अखबारों को ऐसी नसीहत दे सकते थे कि सच के बजाय सकारात्मक दिखाएँ? ऐसे वक्त सच की जगह ‘सकारात्मक’ होने की नसीहत, सच की जगह ‘सरकारात्मक’ होने की नसीहत है, और कुछ नहीं

(Daily chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल 2021


 

इन सरकारों को क्यों कोसना? लोगों का खुद का जिम्मा नहीं है क्या अपने-आपको बचाना?

   लगातार इस कॉलम में सरकारों को कोसने के कई दिन निकल चुके हैं कि वे किस तरह कोरोना से जूझने में नाकामयाब रही हैं, और किस तरह सरकार के अफसरों ने पिछले पूरे एक बरस में न तो जरूरत के लायक कल्पनाशीलता दिखाई, न कोई जीवनरक्षक योजना बनाई। लेकिन आज हिंदुस्तान सहित दुनिया के कुछ और देशों में कोरोना का खतरा जिस हद तक मंडरा रहा है और खतरे के इस पैमाने पर हिंदुस्तान जिस तरह से अव्वल (लीडरशिप में नहीं, खतरे और मरने में) बना हुआ है, ऐसे में सरकारों से परे भी कुछ सोचने की जरूरत है। यह जरूरत इसलिए भी है कि लोगों को सरकारों के खिलाफ पढ़कर, लिखकर, भड़ास निकालकर ऐसा लगने लगता है कि मानव कोरोना से बचना उनकी कोई निजी जिम्मेदारी है ही नहीं। और अगर कोरोना से लडऩे को सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी मान लिया जाएगा, तो यह करोना कभी जाने वाला नहीं है। इसलिए सरकार को कई दिनों तक लगातार कोस लेने के बाद आज हम इस मुद्दे पर चर्चा करना चाहते हैं कि लोगों को खुद भी कोरोना से बचने के लिए क्या करना चाहिए था, और चाहिए है ।

दरअसल देश में सरकारी नेताओं ने लोगों के सामने बड़ी बुरी मिसाल पेश की है कि वे खुद तो हर सार्वजनिक मौके पर बिना मास्क लगाए सामने आते हैं, और लोगों को मास्क लगाने की नसीहत देते हैं। लेकिन यह पसंद तो जनता की है कि वह नेताओं की मनमानी की बराबरी करते हुए खुद भी बिना मास्क अपना चेहरा दिखाते हुए घूमे या फिर उन डॉक्टरों की सलाह माने जो कि आज के वक्त में समाज के एक बेहतर नेता हैं, और मास्क लगाएं। नेताओं की लापरवाही और मनमानी का यह जवाब नहीं होना चाहिए कि आम जनता भी बिना मास्क लगाए घूमे, जब शहरों में चारों तरफ कोरोना का संक्रमण फैला हुआ है तब सड़क किनारे ठेलों पर खड़े खाए, तरह-तरह की दूसरी लापरवाही दिखाए, किसी तरह की सावधानी ना बरते।  नेताओं की लापरवाही का ऐसा जवाब ठीक नहीं है। यह जवाब कुछ उसी किस्म का है कि पड़ोसी अपने घर का कचरा सड़क पर डालता है इसलिए हम भी अपना कचरा उसके जवाब में सड़क पर ही डालेंगे। 

कल से छत्तीसगढ़ में एक वीडियो तैर रहा है कि किस तरह राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के, राजधानी के मेयर का भतीजा लॉकडाउन के बीच बिना मास्क स्कूटर पर घूम रहा है, और  रोकने वाले पुलिस सिपाही को सस्पेंड करवाने की धमकी दे रहा है। अब ऐसे नेताओं की बराबरी करते हुए खुद को खतरे में डालने के बजाय बेहतर यह है कि किसी शरीफ डॉक्टर की नसीहत मानकर अपने को बचाया जाये। आम लोगों के पास न तो नेताओं जितना पैसा होता, न ही उनकी तरह आनन-फानन इलाज ही आम लोगों को मिल सकता, इसलिए अपने को बचाकर चलने में ही समझदारी है। आज हिंदुस्तान में राजनीतिक नेता अच्छे रोल मॉडल नहीं रह गए हैं, इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी बचाने के लिए अपने परिवार की जिंदगी बचाने के लिए डॉक्टरों की दी गई सलाह को मानना चाहिए जो कि आज जान जाने का खतरा झेलते हुए भी मरीजों को देख रहे हैं, इलाज कर रहे हैं, रात-दिन अस्पतालों में पड़े हुए हैं, और मर भी रहे हैं। यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार ने पिछले मार्च के महीने में कोरोना से मरने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों का बीमा जारी नहीं करवाया, और उन्हें पिछले बरस तक 50 लाख रुपए का जीवन बीमा हासिल था, जो कि आज नहीं है। इसलिए राजनेताओं को आदर्श मानकर चलना छोड़ देना चाहिए और लोगों को राजनीति में जवाब देने के बजाय दुनिया में डॉक्टरों के प्रति अपनी जवाबदेही रखनी चाहिए जो कि नेताओं की तमाम लापरवाही के बावजूद लोगों की जिंदगी को बचाने में लगे हुए हैं।

यह समझने की जरूरत है कि देश की राजनीति कितनी भी अच्छी या बुरी हो, सरकारें कितनी भी भ्रष्ट हों, कोरोना से लडऩे में कितनी भी लापरवाह क्यों ना हो, जो जिंदगी दांव पर लगी हैं वे आम लोगों की हैं। वे हिंदुस्तान के नागरिक बाद में हैं, सबसे पहले वे खुद का शरीर हैं, लोगों को किसी भी सरकारी नसीहत से परे, किसी भी सरकारी लापरवाही से परे अपने आपको बचाकर रखना चाहिए। किसी निकम्मी सरकार को भी हटाने के लिए अगले चुनाव तक आपका जिंदा रहना जरूरी है। अगर आप सरकार से खुश हैं तो उसे दोबारा मौका देने के लिए, और अगर सरकार से नाखुश हैं तो उसे हटाने के लिए अगले वोटिंग के दिन तक अपने-आपको जिंदा रखना आपकी जिम्मेदारी है। अभी एक महीने के इस वक्त में ही हिंदुस्तान में लोगों ने देख लिया है कि क्या तो केंद्र सरकार, और क्या तो राज्य सरकारें, लोगों की जिंदगी बचाने में इनकी क्षमता बहुत सीमित है, और उनकी जवाबदेही भी बहुत कम है। ऐसे में अपने परिवार को, अपने दफ्तर और कारोबार को, वहां काम करने वाले लोगों को महफूज रखना खुद की जिम्मेदारी है, सरकार की नहीं। सरकार को तो हराने का मौका भी हो सकता है कि कुछ वर्ष बाद आए,  लेकिन मौत तो अगले 2 दिनों में भी आ सकती है, और आज जिस तरह चारों तरफ लोग बिना दवाई के बिना अस्पताल के, बिना ऑक्सीजन के, और बिना वेंटीलेटर के मर रहे हैं, उसके बाद अंतिम संस्कार की बारी पाने के लिए मरने के बाद भी वे लड़ रहे हैं, यह सारी लड़ाई तो खुद ही लडऩी है इसमें सरकार कहीं भी आपका साथ देने वाली नहीं है। 

इसलिए लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह पहाड़ या जंगल पर अकेले जीने वाले इंसान अपने दम पर जीना सीखते हैं, चकमक पत्थर को रगड़ कर आग लगाना सीखते हैं, जानवरों का शिकार करते हैं और कंदमूल ढूंढकर उसे खाकर भी जिंदा रहते हैं, जिस तरह जंगल में रहने वाले लोग बात-बात पर सरकार का चेहरा नहीं देखते और खुद अपनी ताकत पर जिंदा रहना जानते हैं, शहरी या ग्रामीण लोगों को भी इसी तरह खुद अपना बचाव करना सीखना होगा क्योंकि उन्होंने यह देख लिया कि मुसीबत के इस वक्त पर अधिकतर सरकारें जिम्मा छोड़ चुकी हैं, और लोग अपने जिंदा और अपने मुर्दा को ढूंढने के लिए अपनी खुद की ताकत पर निर्भर हो गए हैं. लोगों को यह समझ लेना चाहिए क्यों अपने आपको बीमारी से बचाना है, उससे लडऩे की तैयारी खुद कर रखनी है, अगली किसी बीमारी के पहले अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर रखनी है, साफ-सफाई की अपनी आदतें ऐसी डालनी हैं कि आने वाली कई पीढिय़ां तक सुरक्षित रहें। और इन सबसे बढ़कर यह तो है ही कि अगला मौका मिलने पर यह याद रखा जाए कि किस नेता ने, और किस पार्टी ने मुसीबत के समय आपका कितना साथ दिया था। वही एक तरीका है जिससे आप अपनी मेहनत के बाद भविष्य में सरकारी हिफाजत भी पा सकेंगे। इसलिए आज से ही अपनी और अपने परिवार की, अपने कारोबार आदतों को सेहतमंद बनाना शुरू करना चाहिए क्योंकि सरकारें भरोसे के लायक है नहीं।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल 2021


 

राज्यों को मंझधार में छोड़ गए मोदी अपने कई पुराने फैसलों की तरह...

  भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के फैसलों में एक अजीब सी निरंतरता है। कुछ बरस हुए जब एकाएक नोटबंदी कर दी गई और देश एटीएम की कतारों पर लग गया, लोगों के घर में खाने नहीं बचा, इलाज को पैसे नहीं बचे, और विदेश में हंसते हुए नरेंद्र मोदी के शब्दों में, लोगों के घर में बेटी की शादी थी, लेकिन उनके पास बैंक में रखे अपने पैसों तक पहुँच  नहीं थी। यह सिलसिला महीनों तक चला और बहुत से अर्थशास्त्रियों का, और समाज के लोगों का यह मानना है कि हिंदुस्तान अब तक नोटबंदी के उस फैसले से हुए नुकसान से उबर नहीं पाया है। कुछ अरसा गुजरा और जीएसटी को देश की दूसरी आजादी की तरह, आधी रात को संसद में पेश किया गया और इसके बाद का आने वाला पूरा एक बरस, और बाजार के मुताबिक तो आज तक का वक्त, लगातार तकलीफों से भरा हुआ है। लोग जीएसटी की जटिलताओं से उबर नहीं पाए हैं और खुद सरकार ने बाद के महीनों में सैकड़ों संशोधन जीएसटी में किये हैं। इतनी बार जीएसटी को बदला गया कि व्यापारी और उनके टैक्स सलाहकार, उनके सीए, इन सबका जीना हराम हो गया। फिर वह भी काफी नहीं था। जब कोरोना के बाद देश में लॉकडाउन लगाया गया तो जिस तरह आनन-फानन पूरे देश में लॉकडाउन का वह फैसला लगा तो उससे लोग हक्का-बक्का रह गए। करोड़ों मजदूर हजार-हजार किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव तक पहुंचे, रास्तों में जाने कितने भूखे-प्यासे मर गए। सरकार के पास संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के लिए आंकड़े तक नहीं थे कि कितने लोग मरे, लेकिन उस यात्रा को हिंदुस्तानी भूल नहीं पाए। 

अब जब देश में कोरोना वायरस की लहर आसमान छूते हुए दिख रही है तो पूरी की पूरी मोदी सरकार, महज एक पार्टी संगठन की तरह बंगाल और दूसरे राज्यों के चुनाव में इस तरह समर्पित थी कि मानो इस वक्त का तकाजा महज चुनाव प्रचार था, महज किसी एक राज्य, या कुछ और राज्यों को जीतना था। अब जब पूरे देश में इस चुनाव प्रचार को लेकर इस चुनाव प्रचार के दौरान की सेहत की लापरवाही को लेकर आलोचना होने लगी, चारों तरफ से लोग इसके खिलाफ लिखने लगे तो प्रधानमंत्री ने कल दिन में कई घंटे लोगों से मीटिंग की, और मीटिंग का नतीजा यह निकला कि शाम होने तक टीकाकरण कार्यक्रम में एक भूकंप सरीखा बुनियादी बदलाव कर दिया गया जिसने फिर देश को हक्का-बक्का कर दिया। लोगों को याद रखना चाहिए कि नोटबंदी, जीएसटी, और लॉकडाउन के फैसलों की तरह, यह फैसला भी रहस्य से भरा हुआ है, इसके पीछे की कोई बातें सामने नहीं आई हैं कि किन तथ्यों के आधार पर, किन विश्लेषणों के आधार पर इतना बड़ा यह फैसला लिया गया है जो कि देश को एक बार फिर पिछले तीन फैसलों की तरह बुरी तरह झकझोर सकता है। एक और बात यह कि इस फैसले से देश की राज्य सरकारें ठीक उसी तरह बुरी तरह प्रभावित होने वाली हैं जिस तरह पिछले तीन फैसलों से हुई थीं, और जिनका बोझ कुल मिलाकर राज्यों के ऊपर डाल दिया गया था, कमोबेश उसी तरह की नौबत आज फिर राज्य सरकारों के सामने आ रही है, जब टीकाकरण कार्यक्रम में फेरबदल के नाम का यह अंधकार उनके सिर पर थोप दिया गया है जिसका कोई ओर-छोर नहीं दिख रहा है।

कल के मोदी सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम की जो जानकारी अब तक खबरों में सामने आई है उनके मुताबिक देश में टीका बनाने वाली अब तक की दो कंपनियों के उत्पादन का आधा हिस्सा केंद्र सरकार लेगी और उसे राज्यों को 45 बरस से ऊपर के लोगों को टीका लगाने के लिए देना जारी रखेगी। दूसरी तरफ अब 18 वर्ष से ऊपर के लोगों को टीका लगाने का फैसला केंद्र सरकार ने न केवल ले लिया है बल्कि इस उम्र के तमाम लोगों को अपनी मर्जी से यह टीका लगवाने की छूट दे दी है। इसके लिए देश की दोनों टीका कंपनियां अपना आधा उत्पादन राज्य सरकारों को, या खुले बाजार में अस्पतालों को, अपनी मर्जी के रेट पर बेच सकेंगी, और अस्पताल इन्हें एक मुनाफा लेकर लोगों को लगा  सकेंगे। इन शब्दों और शर्तों से जिन लोगों को ऐसा लग रहा है कि अब 18 बरस से ऊपर के 45 बरस तक के तमाम लोगों को टीके की सुरक्षा हासिल हो रही है, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि इस उम्र के लोग हिंदुस्तान में शायद 40-50 करोड़ से अधिक हैं। और देश में टीकों की मौजूदा उत्पादन क्षमता हर महीने 6-7 करोड़ तक सीमित है। ऐसे में जाहिर है कि जिस उम्र वर्ग के लिए टीके अब खोल दिए जा रहे हैं उनके लिए अगले 6 महीने भी देश में पर्याप्त टीके बनने वाले नहीं हैं। अब एक ऐसी चीज की कल्पना की जाए जो कि बाजार में मौजूद है, लेकिन जरूरत के लोग टीकों की उपलब्धता से 10 गुना, 20 गुना या 30 गुना अधिक हैं, तो उन टीकों को पहले कौन हासिल करेंगे? इन टीकों तक पैसों की पहुंच सबसे पहले रहेगी। और केंद्र सरकार ने राज्यों के ऊपर वैक्सीन कंपनियों से सौदा करने, रेट तय करने, और अपनी आबादी को उसे देने की पूरी ‘आजादी’ दे दी है और यह ‘आजादी’ फिर प्रधानमंत्री के एक फैसले से रातों-रात देश पर, देश की प्रदेश सरकारों पर डाल दी गई ‘आजादी’ है। यह समझने की जरूरत है कि एक पल पहले तक केंद्र सरकार ने महामारी कानून के तहत सारे प्रदेशों के सारे कोरोना-कार्यक्रम की लगाम अपने हाथ में रखी हुई थी, और एक पल में केंद्र सरकार ने 40 या 50 या 60 करोड़ लोगों का पूरा बोझ प्रदेश सरकारों पर डाल दिया है! यह सिलसिला एकदम भयानक है। राज्य सरकारों की क्षमता कितने टीके खरीदने की है, आम जनता की क्षमता अस्पतालों में टीके किस दाम पर खरीदने की है, इसका कोई अंदाज आज लोगों के पास नहीं है, लेकिन यह अंदाज जरूर है कि आज जिसके पास पैसा अधिक है उसके पास वैक्सीन खरीदने की ताकत रहेगी, और जिसके पास पैसा नहीं है उसे अगर उसकी राज्य सरकार वैक्सीन दिला सकेगी तो ही उसे मिल सकेगी। आज तक के सौ फीसदी केंद्र-नियंत्रित वैक्सीन उत्पादन और वैक्सीन वितरण कार्यक्रम को पूरी तरह से खुले बाजार का कार्यक्रम बनाकर राज्य सरकारों पर यह जिम्मा डाल दिया गया है कि वे खुद वैक्सीन कंपनियों से वैक्सीन खरीदें और तय करें कि उसे अपने लोगों को कैसे लगाना है। यह कोरोना की मौजूदा महामारी के बीच राज्यों को एक अभूतपूर्व और अकल्पनीय खतरे में और परेशानी में डालने का काम है, और यह सिलसिला मोदी सरकार के पिछले तीन ऐतिहासिक फैसलों की अगली कड़ी ही है जिसमें केंद्र ने राज्यों को न शामिल किया, न उनका साथ दिया, बल्कि अपने फैसले को पूरी तरह राज्यों पर थोप दिया। राज्य सरकारें यह भी तय नहीं कर सकतीं कि उन्हें किस आयु-वर्ग के लोगों को किस सिलसिले से टीके लगाने हैं। केंद्र ने शर्तें खुद तमाम तय कर दीं, और जिम्मा पूरा राज्यों पर डाल दिया। 

अभी दो दिन पहले ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुली चिट्ठी लिखकर सलाह दी थी कि कोरोना से जूझने में केंद्र सरकार को क्या-क्या करना चाहिए ,और उस चिट्ठी का एक बहुत ही सतही किस्म का राजनीतिक जवाब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की तरफ से दिया गया है जो कि बहुत बदमजा भी है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने पूरी गंभीरता से एक चिट्ठी लिखी, कुछ बिन मांगे ईमानदार सुझाव दिए, और जैसा कि दुनिया में बिन मांगे सुझावों के साथ होता है, मनमोहन सिंह जैसे सज्जन और गंभीर व्यक्ति को भी हिकारत से भरा हुआ जवाब मिला। लेकिन उससे परे, आज देश के सामने यह टीकाकरण कार्यक्रम जिस आक्रामकता के साथ बाजार के हवाले किया हुआ दिखता है, वह भयानक है। जिस देश में केंद्र सरकार एक फ्रिज, या एयरकंडीशनर, कार या मोटरसाइकिल के लिए भी देशभर के सरकारी खरीदी के रेट तय करते आई है उसके बीच यह बात बहुत ही अजीब और भयानक लगती है कि जीवनरक्षक वैक्सीन के रेट तय करने से केंद्र सरकार ने हाथ खींच लिया, उसे मुहैया कराने से हाथ खींच लिया, और यह वैक्सीन निर्माताओं के कारोबारी कार्टेल पर छोड़ दिया कि वह खुले बाजार के साथ-साथ राज्य सरकारों के साथ मोलभाव करे। कहां तो एक तरफ केंद्र सरकार देश के सरकारी खरीदी के हर सामान का रेट तय करके उसका एक वेबसाइट बनाकर राज्य सरकारों के सामने रखती है कि वे उस रेट पर खरीदी कर सकते हैं। और आज केंद्र सरकार ने इस पूरी सबसे जीवनरक्षक खरीदी से पल्ला झाडक़र उसे राज्यों पर थोप दिया है। ढाई दर्जन राज्यों को दो वैक्सीन कारोबारियों के हवाले कर दिया है कि इन्हें जिस रेट पर बेचना है बेचो, उससे केंद्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है। यह पूरे अधिकारों का, और बिना किसी जिम्मेदारी का यह सिलसिला भारत के संघीय ढांचे का सम्मान नहीं है, बल्कि यह तो हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे बड़े खतरे के वक्त राज्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से केंद्र सरकार का मुकर जाना है।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल 2021


 

दूसरों को तौलने की जरूरत नहीं, अपने मन में अपने को ही तौल लें

  दिल्ली से थोड़ी सी दिल दहलाने वाली खबर आई है, अगर अब तक लोगों का दिल दहलना जारी है। एक रिटायर्ड पुलिस अफसर की तीन बेटियां, तीनों की शादी, उनमें से दो दिल्ली में ही बसी हुई हैं, लेकिन अपने बीमार बाप को देखने नहीं पहुंचीं क्योंकि उन्हें डर था कि बाप को कोरोना हो सकता है। बाप ने घर के बाहर पोस्टर लगा रखा था कि मर जाने पर उसकी लाश को पुलिस को दे दिया जाए। एक बेटी ने पुलिस को फोन पर बताया कि वह इस डर से अपने बाप को देखने नहीं जा रही है। ऐसे में पुलिस वहां पहुंची, और मौके पर गए सिपाहियों ने कई घंटे तक बुजुर्ग को समझाया तो वे अस्पताल जाने के लिए तैयार हुए। सिपाही उसे ले जाकर अस्पताल में भर्ती करने के बाद भी उसका ख्याल करते रहे। बस, यह खबर यहीं खत्म है। इधर हिंदुस्तान के दूसरे बहुत से शहरों से दिल को छूने वाली खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह घर के लोग नहीं है इसलिए पड़ोस के दूसरे मजहब के लोग भी ले जाकर किसी का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। ऐसी अनगिनत खबरों के बीच गुजरात की यह खबर भी आई है कि वहां के भाजपा नेताओं ने श्मशान में हिंदू लाशों के अंतिम संस्कार में मदद कर रहे मुस्लिम वालंटियरों का विरोध किया है। खैर इस तबके की क्या बात की जाए जो कि आज भी नफरत पर जिंदा है। बात उन लोगों की करनी है जो आज ऐसे वक्त पर अपनों से भी डरे-सहमे हैं, या दूसरों की मदद में अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं। 

महामारी का यह वक्त रिश्तों की परिभाषाओं को एक बार फिर तय करने का मौका भी है। आज जब कुछ लोग रात-दिन खतरे की फिक्र किए बिना कहीं मरीजों को अस्पताल पहुंचा रहे हैं, तो कहीं सड़कों पर बेघर लोगों को खाना खिला रहे हैं, कहीं लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं, तो कहीं किसी और तरह से मदद। ये आखिर उन अनजानों के हैं कौन? ये रिश्ता क्या कहलाता है? दूसरी तरफ आज जिनके सिर पर कोरोना नाम का यह कहर टूट पड़ा पड़ा है उनके सामने भी रिश्ते बड़ी अजीब सी शक्ल अख्तियार करके खड़े हो गए हैं। आसपास के लोग कहीं जिम्मेदारी से परे जाकर मदद कर रहे हैं, तो कहीं जिम्मेदारी को छोड़कर भाग जा रहे हैं, और लोगों की शिनाख्त हो रही है, अपनों की शिनाख्त हो रही है, और मुसीबत के वक्त नए दोस्त, नए हमदर्द भी बन रहे हैं। लेकिन यह मौका इससे परे की कुछ बातों के बारे में भी सोचने का है। बहुत पहले लोगों ने ऐसी कहानी सुनी होगी कि नाव पर लोग अपने दोस्त और परिवार के चार लोगों के साथ सवार हैं, और नाव पर कुल दो को ले जाया जा सकता है, ऐसे में अलग-अलग लोगों से पूछा जाता है कि वे कौन से दो लोगों को बचाना चाहेंगे? कुछ ऐसी ही कहानी किसी हवाई जहाज को लेकर भी चलती है और लोगों से पूछा जाता है कि पैराशूट अगर केवल दो होंगे, तो वे किन दो लोगों को बचाना चाहेंगे? और यह लोगों के रिश्तों को तय करने की बात भी रहती है कि लोग अपने मन के भीतर ही यह अंदाज लगा सके कि जब जिंदा रहने की संभावना सीमित रहेगी, तो लोग किसे बचाएंगे? अपने बूढ़े मां-बाप को बचाएंगे? अपने हमउम्र जीवनसाथी को बचाएंगे? या अपने बच्चों को बचाएंगे? पल भर के लिए मान लें कि लोग अपनी पीढ़ी के लिए स्वार्थ को छोड़ भी देते हैं, तो भी अपने से एक पीढ़ी ऊपर, और अपने से एक पीढ़ी नीचे में से किसी एक को छांटना बहुत आसान बात तो होगी नहीं! सोचने के लिए जिन्हें किसी मिसाल से मदद मिल सकती है, उन्हें हम एक असली खबर बता सकते हैं। मुंबई के विख्यात टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल ने एक सर्वे किया। वहां जिन बच्चों की जांच में उन्हें कैंसर निकालता था, और उन्हें इलाज के लिए लाने कहा जाता था, उनमें से बहुत ही कम लड़कियों को मां-बाप वापिस लाते थे, बेटों को जरूर इलाज के लिए लेकर आते थे। 

दिल्ली की जिस खबर से आज इस मुद्दे पर लिखना सूझा है, उस खबर में उस बुजुर्ग रिटायर्ड अफसर की तीन बेटियां, तीनों शादीशुदा, और उसकी देखभाल करने कोई भी मौजूद नहीं, कोई भी झाँकने भी तैयार नहीं, और लोग आमतौर पर यह मानते हैं कि बुढ़ापे में बेटे ख्याल रखें या ना रखें, बेटियां तो ख्याल रखती ही हैं। हम इस घटना से बेटियों के बारे में कोई अधिक व्यापक का छवि बनाना नहीं चाहते क्योंकि एक अकेली कहानी किसी तबके का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। लेकिन आज सवाल यह है कि जब अस्पताल में बिस्तर हासिल नहीं है, आईसीयू में ऑक्सीजन या वेंटीलेटर हासिल नहीं है, तब अगर किसी परिवार के दो लोगों को एक ही जरूरत है, तो परिवार में फैसला लेने वाले लोग क्या फैसला लेंगे? यह सवाल कम असुविधा का नहीं है, और अधिकतर लोग यही सोचेंगे कि यह फिजूल का सवाल है, यह बात डॉक्टर पर छोड़ दी जाएगी कि वह किसके लिए वेंटिलेटर अधिक जरूरी समझते हैं, लेकिन सच में ही ऐसी नौबत आ सकती है जब सुविधा किसी एक के लिए हो, और दांव पर एक से अधिक जिंदगियां लगी हों, खर्च की ताकत सीमित हो, तब लोग क्या करेंगे यह सवाल बहुत ही कठिन है, और बहुत से लोगों के लिए कल्पना में भी यह सवाल शायद जिंदगी का सबसे कठिन सवाल होगा। हम महज इस सवाल पर लाकर इस बात को छोड़ देना चाहते हैं, क्योंकि लोगों को ऐसे किसी मौके पर तय तो अपने मन के भीतर करना होगा और जब तक ऐसा मौका आता नहीं है हम क्यों उन्हें उनकी ही नजरों के सामने, उनकी ही भावनाओं के भीतर उन्हें नीचा दिखाएं ?

आज इतने कठिन सवाल से कुछ कम कठिन सवाल भी लोगों के मन में तैर रहे हैं, जरूरी सामान लेने खतरे के बीच बाजार कौन जाए, और कौन ना जाए? बाहर सब्जी खरीदने कौन निकले, और कौन न निकले? अस्पताल की दौड़-भाग का जिम्मा अपने पर कौन ले? और खासकर जब एक से अधिक लोग ऐसे काम के लिए परिवार के भीतर हासिल हों तब यह देखने लायक बात रहती है कि परिवार के भीतर भी किस तरह का स्वार्थ और किस तरह का त्याग सामने आता है । यह कुछ उसी किस्म का रहता है कि जब परिवार में किसी को किडनी देने की बारी आती है, या किसी और किस्म के अंगदान की नौबत आती है, तब कौन खुद होकर सामने आते हैं? ऐसे बहुत से कठिन सवाल आज कई लोगों की जिंदगी में खड़े हुए हैं। दूसरों को तौलने की जरूरत नहीं, अपने मन में अपने को ही तौल लें। 

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अप्रैल 2021


 

हिंदुस्तानी शासन की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले अफसरों की अभूतपूर्व नाकामयाबी

  हिंदुस्तान भी बड़ा अजीब देश है। यहां से आईआईएम से निकले हुए नौजवान दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियां चला रहे हैं, यहां के आईआईटी से निकले हुए इंजीनियर दुनिया भर में तकनीक विकसित कर रहे हैं, लेकिन जब देश के भीतर पिछले एक बरस से छाए हुए कोरोना वायरस के खतरे से जूझने की बात आई, तो ऐसे तमाम मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग के जानकार लोगों का हुनर धरे रह गया क्योंकि भारत सरकार ने शायद ऐसे हुनर को छुआ भी नहीं। नतीजा यह निकला कि आज देश में कोरोना से मौतों का जो सिलसिला चल रहा है, न तो उसे रोका जा सक रहा है, और ना ही मौतों के बाद लोगों को एक इज्जत का अंतिम संस्कार नसीब हो रहा है। 

 कहने के लिए तो इस देश में आपदा प्रबंधन की योजनाएं दिल्ली से निकलकर जिलों तक पहुंचती हैं, और बाढ़ के महीनों में लोगों को बचाने के लिए रबर की बोट तक पहले से खरीदकर रख ली जाती है। लेकिन जिस कोरोना का प्रकोप साल भर पहले शुरू हो चुका है, उस कोरोना से जूझने के लिए इस देश ने इस साल में कोई योजना बनाई हो ऐसा दिख नहीं रहा है। जिस देश में केंद्र सरकार चला रही पार्टी आधा दर्जन प्रदेशों में चुनाव लडऩे की अभूतपूर्व तैयारी कर सकती है, देश के साथ-साथ विदेश तक जाकर प्रचार कर सकती है, तो क्या उस पार्टी की सरकार केंद्र सरकार की सारी ताकत रखते हुए भी हिंदुस्तान के नक्शे को देखकर कोरोना के आज के हाल का अंदाज नहीं लगा सकती थी? क्या वह राज्यों को इस हिसाब से तैयार नहीं कर सकती थी? लेकिन यह सवाल तब अप्रासंगिक हो जाते हैं जब केंद्र सरकार चला रही पार्टी इतनी गैरजिम्मेदारी के साथ चुनावी राज्यों में चुनाव प्रचार करने में लगी है, और करोड़ों लोगों के भीड़ वाले कुंभ को इजाजत दे रही है। यह पूरा सिलसिला इस देश में राजनीतिक मनमानी के सामने सरकारी ढांचे के दंडवत हो जाने का है और ऐसा लगता है कि इस लोकतंत्र में बहुमत से बनी हुई सरकार की राजनीतिक मनमानी सबसे ऊपर है,  और शासकीय तंत्र उसके सामने बेबस रह गया है.

बहुत मामूली समझ रखने वाले नौकरशाह भी यह तैयारी कर सकते थे कि कोरोना की पहली लहर के बाद और दूसरी लहर के पहले, किन-किन राज्यों में तैयारियां कैसी हैं, और जहां पर तैयारियों में कमी है वहां पर क्या किया जाना है। वैसे तो एक तरफ महामारी एक्ट के तहत देश के सारे अधिकार अपने हाथों में लेकर केंद्र सरकार ने राज्यों को पिछले बरस के लॉकडाउन के दौरान घंटे-घंटे में हुक्म भेजे, और क्या खुला रहेगा क्या बंद रहेगा, इन नियमों को राज्यों पर लादा। राज्यों से हर घंटे में जवाब मांगे, जानकारी मांगी, उन्हें नोटिस दिए। लेकिन किस राज्य में कोरोना की दूसरी लहर कहां तक पहुंच सकती है उसमें कितने लोग बीमार हो सकते हैं,  कितने को ऑक्सीजन लग सकती है, और कितने को वेंटिलेटर लगेंगे, इसका कोई अंदाज भी शायद लगाया नहीं गया। ना तो केंद्र सरकार ने यह अंदाज लगाया, और ना ही महाराष्ट्र जैसे संपन्न और विकसित राज्य से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे नए और छोटे राज्य तक किसी भी राज्य में कोरोना की इस दूसरी लहर से निपटने की तैयारी नहीं की। 

नतीजा यह है कि आज बीमार को अस्पताल का बिस्तर नसीब नहीं है, जिसे बिस्तर मिल गया उसे ऑक्सीजन नहीं है, और जिसे ऑक्सीजन के बाद भी बचाया नहीं जा सका उसके अंतिम संस्कार के लिए मरघट में भी जगह नहीं है। ना दवाई है, न ऑक्सीजन है, न वेंटीलेटर हैं, और ना ही एंबुलेंस है। कुल मिलाकर तस्वीर ऐसी है कि कोरोना की पहली लहर के बाद से कोरोना की दूसरी लहर के बीच इस देश और इसके प्रदेशों ने कुछ भी नहीं सीखा। जब कोरोना का दूसरा वार हुआ तो घुटनों पर लगी चोट से बिलबिलाने के अंदाज में सरकारों ने आनन-फानन घटिया, कामचलाऊ इंतजाम किए जो कि नाकाफी तो थे ही, जो जनता के पैसों की बर्बादी भी थे, और इंसानी जिंदगी की बर्बादी तो सबसे ऊपर है ही। आज देश के अधिकतर प्रदेशों का हाल देखें तो केंद्र और राज्य सरकारों ने निजी अस्पतालों को लेकर, कोरोना की जांच से लेकर, वेंटिलेटर तक, किसी इंतजाम को खुद परखा नहीं है। सरकार ने अपने खुद के मरघटों की क्षमता को भी नहीं परखा और अब बदहवास के अंदाज में रातों-रात कहीं भी अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है। यह पूरा सिलसिला बतलाता है कि सरकारों की प्राथमिकताएं महज राजनीतिक रहीं, चुनावी रहीं, आत्मरक्षा की रहीं, जीत की महत्वाकांक्षा की रहीं, लेकिन कोरोना के, सामने खड़े हुए दूसरे दौर से लडऩे की तैयारी की बिल्कुल नहीं रही। आज की यह पूरी नौबत भारत और इसके प्रदेशों की सरकारों की नाकामयाबी की है, और इनसे यह भी पता लगता है कि सरकारों में स्थाई रूप से बसे हुए अफसरों में से अधिक की यह क्षमता नहीं रह गई है कि वह देश-प्रदेश के राजनेताओं की मनमानी को ना कह सके। राष्ट्रीय स्तर पर जो चुने जाने वाले अफसर हैं, उनके बीच 5 बरस के राजनीतिक मुखियाओं की यह दहशत अभूतपूर्व है। किसने यह सोचा था कि अंग्रेजों के वक्त से एक कड़ी शासन व्यवस्था चलाने के लिए नौकरशाही का जो ढांचा खड़ा किया गया था, वह नेताओं के सामने इस तरह दंडवत पड़े रहेगा?

आज हिंदुस्तान के प्रदेशों की शासन की क्षमता को देखें तो यह साफ दिखता है कि क्षमता तो बहुत है, लेकिन उसके इस्तेमाल की कोई तैयारी नहीं थी। जिन अफसरों पर 5 बरस की सरकारों के पहले और बाद भी, सरकार की जिम्मेदारी रहती है, उन्होंने वक्त पर अपना काम नहीं किया, वक्त पर तैयारी नहीं की, ऑक्सीजन की जरूरत का हिसाब नहीं लगाया, अस्पतालों के बिस्तर तैयार नहीं किए, जांच का इंतजाम नहीं किया, टीकों का इंतजाम नहीं किया, और अंतिम संस्कार का इंतजाम भी नहीं किया। राजनीतिक मुखिया तो अपने अच्छे और बुरे कामों से 5 बरस बाद अपनी पार्टी सहित बाहर जा सकते हैं, लेकिन जो अफसर अपनी पूरी कामकाजी जिंदगी के लिए ऊंचे ओहदों पर आते हैं, उन अफसरों ने इस देश में अपने-आपको पूरी तरह नाकामयाब साबित किया है। 

नेताओं से तो बहुत अच्छी नीयत की उम्मीद नहीं की जाती, लेकिन जिन अफसरों पर नेहरू और पटेल के वक्त से जिम्मा डाला गया था, उन अफसरों ने अपने-आपको राजनीतिक मनमानी के सामने रबड़ का बबुआ साबित किया है। ऐसा लगता है कि भारत और उसके प्रदेशों की प्रशासनिक व्यवस्था में अपने ही देश के आईआईएम और आईआईटी की विशेषज्ञता को लेकर न सम्मान हैं और न भरोसा। इन संस्थानों से निकले हुए लोग दुनिया भर में बड़े-बड़े कारोबार चला रहे हैं, बड़ी-बड़ी जगहों पर गैर सरकारी काम भी कर रहे हैं और सरकारी काम भी, लेकिन प्रशासन की ताकत अफसरों को इतना बददिमाग कर देती है कि वे हर मामले में अपने-आपको जानकार और विशेषज्ञ मान लेते हैं, और असल जिंदगी की जो असल विशेषज्ञता रहती है उसके लिए इनके मन में एक आला दर्जे की हिकारत बैठी रहती है। यह नौबत कोरोना से निपट जाने के बाद यह सोचने की है कि इस देश की शासन प्रणाली में बड़े अफसरों की कौन सी भूमिका आगे काम में ली जानी चाहिए।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अप्रैल 2021

 


एक बहुत बड़ी मुसीबत, एक बहुत ताकतवर फण्ड से जुड़े हुए खतरे भी देखें

  जब कोई प्राकृतिक विपदा बहुत लंबी खिंचती है, जैसे कि आज की कोरोना की महामारी चल ही रही है, चलती ही जा रही है, तो ऐसे में जिंदगी के बाकी दायरों के जरूरी काम बहुत बुरी तरह बिछड़ जाते हैं। लोगों की जिंदगी में किसी भी तरह की परेशानी में दूसरों की मदद करने की क्षमता की एक सीमा रहती है, दानदाताओं की सीमा रहती है, बड़ी-बड़ी कंपनियों के भी समाजसेवा के बजट सीमित रहते हैं। जिस बरस ओडिशा में बड़ा तूफान आया, और बड़ी संख्या में मौतें हुईं, उस बरस देश के बाकी बहुत से जरूरी कामों के लिए दान ही नहीं मिला। अब जो लोग समाज से दान मिलने की उम्मीद में अनाथाश्रम या वृद्धाश्रम शुरू कर लेते हैं, उन्हें तो ऐसा अंदाज नहीं रहता कि किसी एक बरस उन्हें मिलने वाला दान तूफानपीड़ितों के लिए चले जाएगा या कि कोरोनाग्रस्त लोगों के लिए बनने वाले अस्थाई अस्पतालों के लिए चले जाएगा। दुनिया में बहुत किस्म के मदद के कार्यक्रम चलते हैं, और जब ऐसी कोई विकराल परेशानी आती है, तो बाकी सबके भूखों मरने की नौबत आ जाती है।

समाज की मदद करने की एक सीमा रहती है, और वह मदद उस वक्त के, या कि उस बरस के, सबसे अधिक मानवीय लगने वाले मुद्दे की तरफ मुड़ जाती है, तो जरूरत के जो बाकी रास्ते रहते हैं उनके किनारे खड़े हुए जरूरतमंद लोग देखते रह जाते हैं, लेकिन मदद किसी एक तरफ जब मुड़ती है तो पूरी तरह मुड़ जाती है। जिन लोगों को उड़ीसा के समुद्री तूफान जैसी प्राकृतिक विपदा का तजुर्बा है वे जानते हैं कि एयरपोर्ट से निकलने के बाद तूफानग्रस्त इलाकों तक पहुंचने के रास्ते में बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन सबसे पहले अपने नाम और निशान वाले तंबू लगाना चाहते थे ताकि वहां पहुंचने वाले मीडिया और बाकी लोगों को सबसे पहले यह दिखे कि वे वहां पर काम कर रहे हैं। यह संगठन बहुत ही ईमानदार नीयत से काम करते हो सकते हैं, लेकिन उनके सामने सबसे पहले अपने खुद के अस्तित्व का सवाल रहता है। अगर उन्हें ही दान नहीं मिलेगा, तो वे आगे किसकी मदद कर पाएंगे? और फिर ऐसे बहुत से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठनों का ऑडिट बताता है कि कई संगठन तो उन्हें मिलने वाले दान का आधा हिस्सा तक अपने पर खर्च कर देते हैं। ऐसे संगठनों के लिए कुछ जानकार लोग तंज कसते हुए यह भी कहते हैं कि दूसरों के दर्द में इनकी दवा है, दूसरों के भूखों मरने में इनका पेट भरता है। यह देखने का एक नजरिया जरूर हो सकता है लेकिन यह बात पूरी तरह सच भी नहीं है।

किसी देश या पूरी दुनिया में जरूरत के जितने प्रोजेक्ट चलते हैं, उनमें से अधिकतर बिना मदद के एक बरस भी नहीं गुजार सकते, और लोगों की हमदर्दी अगर किसी एक तरफ पूरी तरह मुड़ गई, तो बाकी प्रोजेक्ट बंद होने के कगार पर आ जाते हैं। ऐसे में ही अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सरकारों की जरूरत पड़ती है, ऐसे में ही संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था की जरूरत पड़ती है जो कि एक व्यापक नजरिए से ऐसे प्रोजेक्ट बचा सके। ऐसे प्रोजेक्ट बच्चों के हो सकते हैं, बीमारों और बूढ़ों के हो सकते हैं, बेघरों के हो सकते हैं, कुदरत और पशु पक्षियों के हो सकते हैं, और हो सकता है कि किसी लोक कला को या लोक भाषा को बचाए रखने के, संरक्षण वाले ऐसे प्रोजेक्ट हों जो कि कोरोना से हो रही मौतों के बीच में गैरजरूरी लगें लेकिन जब दुनिया की लंबी जिंदगी को देखते हैं, तो ऐसे कई मुद्दे जरूरी लगते हैं जिनका बंद होना एक संभावना के खत्म होने सरीखा हो जाएगा।

देश-प्रदेश की सरकारों को यह भी देखना चाहिए कि उनकी तात्कालिक प्राथमिकता ऐसी ना हो जो कि दूसरे तमाम दीर्घकालीन महत्व के मुद्दों को कुचल कर रख दे। जब शासन से लेकर प्रशासन तक की प्राथमिकता किसी एक जलते हुए मुद्दे से निपटना हो, तो ऐसा कई बार होता है। पिछले बरस कोरोना के बीच जब प्रधानमंत्री राहत कोष से परे एक रहस्य में फंड पीएम केयर्स के नाम से बनाया गया, और उसे किसी भी जवाबदेही से मुक्त रखा गया, और उसे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और साख से जोड़कर पेश किया गया. भारत सरकार की नवरत्न कंपनियों से लेकर देश की बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों तक ने अपने साल भर के अधिकतर सीएसआर फंड इसी एक कोष में दे दिए। नतीजा यह हुआ कि इन कंपनियों से देशभर के दूसरे बहुत से समाजसेवी कामों के लिए जो मदद मिलती थी वह सिमट गई, और आज जब देश भर में मदद की जरूरत है करोना से बचाव के लिए भी पीएम केयर्स के उस फंड का क्या इस्तेमाल हो रहा है, लोगों की जानकारी में नहीं है। कुल मिलाकर देश की मदद करने की सारी निजी और सरकारी क्षमता का ऐसा केंद्रीकरण भी नहीं करना चाहिए जिससे मदद के हकदार दूसरे तमाम दायरे भूखे ही मर जाएं।

(Daily chhatisgarh)

कोरोना के बीच, और कोरोना से परे ऐसी मुसीबत की भी सोचें....

  कोरोना को देखकर यह लगता है कि हिंदुस्तान अभी एक ऐसी मंझधार में फंसा हुआ है जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। बीमारी और बंद का यह दौर जब तक चलेगा, तब तक लोगों का रोजगार खत्म रहेगा, और कोरोना पहले खत्म होगा या लोग पहले खत्म होंगे, इनमें से किसी भी बात का कोई ठिकाना नहीं है। ऐसे में ना तो वैक्सीन के असर का कोई अंदाज लग रहा है, न ही यह समझ पड़ रहा है कि वैक्सीन कब तक हासिल होगी, और फिर उसे रिपीट कब करना होगा। एक अंदाज यह भी है कि यह वैक्सीन हर बरस लगवानी होगी, तब तक, जब तक कि कोरोना वायरस पूरी तरह से चल ना बसे।

लेकिन जिन लोगों को कोरोना के मौजूदा खतरे का अंत दिख रहा है उन्हें यह भी सोचने की जरूरत है कि कोरोना वायरस से अधिक बुरी, अधिक जानलेवा कोई बीमारी भी आ सकती है, और बीमारियों से परे की भी कोई मुसीबत आ सकती है। पिछले बरस जब कोरोनावायरस, और लॉकडाउन की मुसीबत चल रही थी उस वक्त भी हमने इसी जगह पर यह लिखा था कि जैसा वायरस आज इंसानी देह को खत्म करने के लिए आया हुआ है, वैसा ही जानलेवा वायरस कंप्यूटरों के लिए भी आ सकता है। और सच तो यह है कि दुनिया के बहुत से देशों के पास आज ऐसे साइबर अटैक की ताकत है, जिसके मुकाबले हिंदुस्तान जैसे देश अपने को बचाने में शायद बहुत मजबूत साबित नहीं होंगे। वैसे भी आज दुनिया के कुछ सबसे बड़े कंप्यूटर कारोबार पर जिस तरह के साइबर अटैक हो रहे हैं, और एक-एक बार में दसियों लाख लोगों की जानकारियां लूट ली जा रही हैं, उसे देखते हुए भारत जैसे कंप्यूटर मामलों के लापरवाह देश की नाजुक हालत का अंदाज लगाया जा सकता है। अभी कुछ महीने पहले ही यह खबर आई थी कि आंध्र और तेलंगाना के बिजलीघरों की कंप्यूटर प्रणाली पर दूसरे किसी देश से साइबर अटैक की, साइबर घुसपैठ की शिनाख्त हुई है, और उस सिलसिले में चीन का नाम लिया गया था। चीन आज दुनिया की बिरादरी में एक शैतान बच्चे की तरह मान लिया गया है कि कहीं कुछ गलत हो रहा है तो उसमें चीन का हाथ जरूर होगा। 

दूसरी तरफ अमेरिका में अगर चुनाव को प्रभावित करने की विदेशी घुसपैठ हो हो रही है तो उसके रूसी अधिक होने का खतरा है। फिर हॉलीवुड की फिल्मों में परमाणु हथियारों के साथ अगर कोई साजिश होती है तो उसके पीछे कोई महत्वोन्मादी खरबपति कारोबारी होता है जिसे कि पूरी दुनिया पर काबू करने की हसरत रहती है। अगर कोई गिरोह ऐसा करता है तो वह तो वह साइबर घुसपैठ की ताकत भी रख सकता है, परमाणु हथियार भी रख सकता है और किसी देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम तक भी पहुंच रख सकता है। अगर पाकिस्तान की जमीन से ऐसी साजिश की कल्पना की जाती है, तो उसके पीछे वहां के धर्मांध आतंकियों का हाथ माना जाता है। अब सवाल यह है कि जब दुनिया में इतने किस्म की साजिशें हो सकती हैं, हो रही है, और लगातार साइबर घुसपैठ भी बैंकों को लूट रही है, तो ऐसे में हिंदुस्तान कब तक महफूज रहने जा रहा है? 

यह समझने की जरूरत है कि आज कोरोना के बीच इस देश के नेताओं की मेहरबानी से इस देश का जो हाल हुआ है, वही हाल कोई कंप्यूटर वायरस, या हमला, किसी देश की सार्वजनिक व्यवस्थाओं से जुड़े कंप्यूटरों का क्यों नहीं कर सकता? जिस तरह आज इस देश में कोरोनावायरस आया, अमेरिकी राष्ट्रपति के विमान पर चढ़कर आया, और हिंदुस्तान में राजकीय अतिथि बनकर आया, कोई ऐसी नौबत दूर नहीं है कि ऐसा कोई कंप्यूटर वायरस फिर किसी रास्ते से सरकार की बेखबरी से हिंदुस्तान में आ जाए और तबाही मचा दे। एक ऐसी नौबत की कल्पना सबको जरूर करनी चाहिए जिसमें बैंकों के कंप्यूटर ध्वस्त हो जाएं, नतीजतन एटीएम बंद हो जाए, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल बंद हो जाए, ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन खत्म हो जाएं, आधार कार्ड से जुड़ी तमाम जानकारियां खत्म हो जाएं, बिजलीघरों का पूरा इंतजाम चौपट हो जाए, अगर ऐसा कोई दिन आएगा तो क्या होगा? रेलगाड़ियों की आवाजाही, उनके सिग्नल, प्लेन का उड़ना या उतरना, यह सब खत्म हो जाए, मोबाइल फोन और इंटरनेट खत्म हो जाए तो क्या होगा? 

आज कोरोना की वजह से आबादी का एक हिस्सा मौत की कगार पर है, लेकिन बाकी आबादी कुछ या अधिक हद तक कई किस्मों के काम कर पा रही है। अगर कोई कंप्यूटर वायरस, या कंप्यूटर हमला ऊपर लिखी तमाम बातों को खत्म कर दे तो क्या उससे यह देश बरसों तक उबर पाएगा? और यह नौबत फिल्मी नहीं है, यह हकीकत के अधिक करीब है और फिर ऐसे हमलावर ऐसी जानकारियों से आगे भी जा सकते हैं कि वे इस देश को कैसे अधिक तबाह करें। दुनिया में साइबर अटैक से सबसे अधिक सुरक्षित देशों में से एक अमेरिका के एक प्रदेश में अभी कुछ हफ्ते पहले ही एक जानलेवा साइबर अटैक हुआ। वहां लोगों के घरों तक पहुंचने वाले पीने के पानी को साफ करने वाले कारखाने में कंप्यूटरों से छेड़खानी करके कुछ रसायनों को इतनी अधिक मात्रा में पानी में घोल दिया गया कि अगर वह पानी लोग पी लेते, तो बड़ी संख्या में मौतें हो सकती थी। लेकिन वक्त रहते यह साइबर हमला पकड़ा गया। 

आज जो हिंदुस्तान एक दवा ठीक से नहीं बांट पा रहा है, और जैसे जीवनरक्षक इंजेक्शन बांटना एक राजनीतिक शोहरत का मुद्दा बना लिया गया है, वह हिंदुस्तान ऐसे किसी भी साइबर अटैक का सामना करने के लिए बिल्कुल भी तैयार देश नहीं है। ऐसे किसी हमले के बाद कुछ हिंदुस्तानी, चीनी झंडे जलाकर इस हमले का सामना करने लगेंगे, और कुछ हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी झंडे जलाकर। लेकिन हिंदुस्तानी फौज हो सकता है कि ऐसे किसी साइबर हमले के बाद कोई हवाई, या जमीनी हमला करने के लायक बच भी ना जाए। आज जब हम कोरोना के हमले से ही उबरने की ताकत नहीं रख रहे हैं तब ऐसे किसी दूसरे हमले के बारे सोचना कुछ लोगों को महज एक दिमागी शगल लग सकता है, लेकिन दुनिया पर आने वाली मुसीबतों का अंदाज ऐसे शगल से ही लगाया जा सकता है. इसलिए आज जितनी सफाई और सावधानी की जरूरत लग रही है, उतनी ही सावधानी इस देश के कंप्यूटर सिस्टम को लेकर भी बरतनी चाहिए। दुनिया का साइबर जुर्म का इतिहास बताता है कि ऐसे हमलों के लिए किसी देश की सरकारी साइबर फौज जरूरी नहीं रहती, दुनिया में अकेले काम करने वाले कोई नौजवान भी एक लैपटॉप लेकर दुनिया पर ऐसी तबाही लाने की ताकत रखते हैं.

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दीवारों पर लिक्खा है, 16 अप्रैल 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 अप्रैल 2021


 

कोरोना के टीके लगवाएं या नहीं, एक दुविधाभरा सवाल

  जो लोग आज कोरोना के शिकार हो चुके हैं या जो लोग आज कोरोना से बचे हुए हैं, ऐसे तमाम लोगों के सामने एक दुविधा है कि वे टीका लें या ना लें। यह दुविधा भी तब है जब वे अपने देश में मिल रहे टीकों को पाने के हकदार माने जा रहे हैं। हिंदुस्तान में जहां कि आज केंद्र सरकार ही टीके देना तय कर रही है और यह भी तय कर रही है कि किस उम्र के किन लोगों को ये पहले मिलें तो ऐसे में यह पसंद या नापसंद की दुविधा भी इसी उम्र के लोगों के सामने है या ऐसी ही बीमारी वाले लोगों के सामने है। दूसरी तरफ दुनिया के बहुत से देशों में जहां आज लोग अपनी मर्जी से टीके लगवाने की आजादी रख रहे हैं वहां भी उनके सामने यह दुविधा है कि कोरोना से बचाव के टीके के बारे में जितनी खबरें आ रही हैं उन्हें देखते हुए वे टीका लगवाएं या ना लगवाएं?

इस बात को समझने के लिए सबसे पहले तो इस बात पर गौर करना जरूरी है कि कोरोना वायरस करीब एक बरस ही पुराना है। और उसका टीका शायद आधा बरस पुराना ही है। इतिहास गवाह है कि टीकों के विकास में लंबा समय लगता है और क्योंकि यह महामारी बहुत सी जिंदगियां ले रही है इसलिए आधी-अधूरी तैयारी के साथ ही इन टीकों को परीक्षण के तौर पर लगाया जा रहा है। आज जब यह सवाल उठता है कि इन टीकों का असर कितने समय तक रहेगा, तो इसका जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि उतना तो समय ही इन्हें बने हुए नहीं हुआ है, ऐसे में यह टीके परीक्षण ही हैं। और इसीलिए हिंदुस्तान जैसे कड़ाई से नियम लागू करने वाले देश में भी लोगों को यह छूट दी गई है कि वे चाहें तो टीके लगवाएं, और ना चाहें तो ना लगवाएं।
 
हिंदुस्तान के अधिकतर लोग टीका लगाते दिख रहे हैं, जबकि कुछ लोगों के मन में लगातार यह संदेह है कि दुनिया भर में जगह-जगह इस टीके के लगने के बाद, इस टीके के लगने की वजह से बहुत से लोगों की तबियत बिगड़ी है और मौतें भी हुई हैं। कुछ देशों ने कुछ टीकों पर रोक भी लगाई है कि नौजवानों पर ऐसे टीकों का बुरा असर हो रहा है और उनके खून में थक्के जम रहे हैं। लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि टीका लगाने के बाद लोगों को होने वाले कोरोना वायरस में जितनी कमी आई है, और कोरोना होने पर भी उनके लक्षण जितने कम खतरनाक दिखे हैं, टीका लगे हुए लोग जितने दूर तक मौत से बचे हुए हैं, उसे देखते हुए क्या टीका लगवा लेना चाहिए? यह सवाल छोटा नहीं है, यह सवाल बड़ा है, लेकिन इस सवाल से भी अधिक बड़ा एक दूसरा सवाल है कि आज सार्वजनिक जीवन में जिस रफ्तार से कोरोना का संक्रमण फैल रहा है, वैसे में क्या इंसानों को सचमुच ही इस बात का सामाजिक और नैतिक हक है कि वे अपने निजी फैसले से समाज के बाकी लोगों को खतरे में डालें? यह बात छोटी नहीं है क्योंकि दुनिया के तकरीबन तमाम लोकतांत्रिक देशों ने लोगों को छूट दी है कि वे चाहें तो ही टीके लगवाएं। 

हिंदुस्तान भी ऐसे ही देशों में से एक है जो कि आज बढ़ते हुए कोरोना संक्रमण की वजह से दुनिया में सबसे ऊपर पहुंच गया है। ऐसे में चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं के सीमित रहते हुए भी सवाल यह उठता है कि उन सीमाओं के भीतर अगर कोई संभावना दिख रही है तो क्या उन संभावनाओं पर काम करना हमारी सामाजिक जवाबदेही और जिम्मेदारी नहीं है? यह बात निर्विवाद रूप से साबित होते दिख रही है कि कोरोना वायरस से बचाव के टीकों से संक्रमण कम हो रहा है और संक्रमण की मार भी कम हो रही है। आज टीका कितने महीने काम करेगा, कितने महीने बाद उसका असर खत्म हो जाएगा, जैसे कई सवाल लोगों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन विज्ञान की अपनी सीमाएं हैं, वह रातों-रात हर सवाल का जवाब ढूंढकर पेश नहीं कर सकता। आज दवा उद्योग से निकली खबरें यह भी बताती हैं कि हो सकता है कि लोगों को हर बरस यह टीके लगवाने पड़े, और टीकों के जानकार वैज्ञानिक इस बात पर भी मेहनत कर रहे हैं कि क्या किसी एक टीके के दो या अधिक डोज के मुकाबले अलग-अलग टीमों को देना अधिक असरदार हो सकता है?
 
ऐसे बहुत से सवालों के जवाब आते-जाते रहेंगे, लेकिन मौत बहुत रफ्तार से आ रही है, हिंदुस्तान में तो सरकार और म्युनिसिपल की मुर्दों के जलाने की क्षमता से अधिक रफ्तार से मौतें आ रही है। और यह सब हो रहा है जब चारों तरफ तरह-तरह से लॉकडाउन लगाया गया है, रात का कफ्र्यू लगाया गया है। लेकिन यह रोक-टोक पूरी जिंदगी तो चल नहीं सकती, और ऐसे में रोक-टोक उठने के बाद फिर कोरोना अधिक रफ्तार से बढ़ सकता है।  इसलिए लोगों को अपने टीके लगवाने के फैसले के वक्त यह भी सोचना चाहिए कि समाज के प्रति, परिवार और बाकी लोगों के प्रति, उनकी क्या जवाबदेही है, और अगर टीकों का असर कुछ महीनों के लिए भी उनको कोरोना से या उसकी गहरी मार से बचाकर रख सकता है तो क्या वह भी कोई छोटी बात रहेगी? दुनिया में हमेशा ही बहुत से ऐसे लोग रहते हैं जिन्हें हवा में भूत दिखते हैं जो कि शंकाओं से भरे रहते हैं, जिनका मन तरह-तरह की साजिशों की कहानियां पर बहुत भरोसा करता है, ऐसे लोगों को आज भी कोरोना के टीकों में खामियां ही खामियां दिख रही हैं, लेकिन जिनको यह भी लग रहा है कि यह टीके लगवाने में कोई खतरा हो सकता है, उन्हें भी यह समझना चाहिए कि अपने परिवार और समाज के प्रति उनकी क्या जिम्मेदारी है। उनकी जिद, उनका दुराग्रह, उनका आशंकाओं से भरा मन कहीं बाकी तमाम लोगों के लिए खतरा तो नहीं बन रहा है। 

हम तो महज इतना लिख सकते हैं, इसके बाद जब तक लोकतंत्र लोगों को टीके लगवाने या ना लगवाने का फैसला करने की छूट दे रहा है, तब तक वे जितना चाहे समय ले लें, लोगों को जितना चाहे उतना खतरे में डाल दें। दुनिया के इतिहास में बीमारियों से बचाव के टीके लगवाने के वक्त बहुत से लोग पीछे हटते रहे, हिंदुस्तान में अभी कुछ बरस पहले तक पोलियो का टीका अपने बच्चों को लगवाने से मुस्लिम समाज के बहुत से लोग हिचकते रहे कि वह टीका अमेरिका का बनाया हुआ था और उस टीके से उनके बच्चे कुनबे को आगे बढ़ाने की क्षमता खो बैठेंगे। ऐसी क्षमता तो किसी ने नहीं खोई, लेकिन ऐसे मां-बाप के बच्चे पोलियो के शिकार जरूर हुए। इसलिए यह वक्त अपने पूर्वाग्रहों को अलग रखकर समाज के व्यापक भले को समझने का है।

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हर कुछ महीनों में बिखरी चुनावी गंदगी लोकतंत्र का क्या भला कर रही?

  जब जनतंत्र और जिंदगी में से किसी एक को बचाने की प्राथमिकता तय करना हो तो जाहिर तौर पर पहले जिंदगी को छांटना चाहिए क्योंकि जन है तो ही तंत्र है, जनतंत्र तो बाद में बना है, पहले तो जन ही था, और आखिरी तक जन ही रहने चाहिए। अब यह सवाल हम आज इसलिए उठा रहे हैं कि हिंदुस्तान में जनतंत्र जारी और कायम रखने के नाम पर चुनाव नाम का जो ढकोसला चल रहा है, उस ढकोसले को समझने की जरूरत है। अगर यह नहीं होता तो लोगों के मन में बेचैनी रहती कि देश में लोकतंत्र नहीं है अब यह है तो कम से कम एक दिखावा है कि लोगों को वोट डालने मिलता है, और उनके वोटों से चुनी हुई सरकार बनती है। यह एक अलग बात है कि वह बनी हुई सरकार कितने समय में गिर जाती है, यह देख-देखकर भी लोग थक गए हैं। फिर भी पाखंडपसंद हिंदुस्तानी इस बात को बहुत पसंद करते हैं कि चुनाव होते रहना चाहिए। 

अब इस बार जब इन चुनावों को कोरोना के खतरे के साथ मिलाकर देखें तो लगता है कि क्या सचमुच यह चुनाव इस तरह से, इस कीमत पर होते रहना चाहिए? यह साफ-साफ दिख रहा है कि हिंदुस्तान के जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें से अधिकतर में कोरोना के खतरे को कम दिखाने के लिए आबादी के अनुपात में जांच कम हो रही है, आंकड़ों को छुपाया जा रहा है, और एक अविश्वसनीय तस्वीर पेश की जा रही है कि मानो कुछ हुआ ही नहीं है। हिंदुस्तान के कार्टूनिस्टों ने अब तक 100 से अधिक कार्टून इस बात पर बना लिए हैं कि चुनावों के बीच कोरोना वायरस किस तरह खत्म हो जाता है और किस तरह पूरे देश को कोरोना वायरस  से बचाना हो तो पूरे देश में चुनाव की घोषणा कर देनी चाहिए। अभी यह भी समझने की जरूरत है कि कुछ समय पहले से देश के मोदीमय हो जाने पर यह मांग उठने लगी थी कि वन नेशन वन इलेक्शन करवाया जाए। मतलब यह कि पूरे देश में एक साथ चुनाव हो, विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ हों, और हो सके तो स्थानीय संस्थाओं के चुनाव भी साथ-साथ हो जाएं ताकि पंचायत और म्युनिसिपल तक भी मोदी के नाम पर चुनाव लड़े जा सकें, जीते जा सकें । 

हम तकनीकी रूप से ऐसे किसी विकल्प के पक्ष में लिख चुके हैं कि एक साथ होने वाले चुनाव से देश में एक तो चुनाव का खर्च घटेगा, दूसरी तरफ चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दल जिस तरह के समझौते करते हुए सरकारी फिजूलखर्ची करते हैं, जिस तरह से नाजायज वायदे करते हैं, वह सब भी घटेगा।  हम इस हद तक तो वन नेशन वन इलेक्शन के हिमायती रहते आए हैं। अभी दो और वजह से हम इसके बारे में सोच रहे हैं। बंगाल के चुनाव को लेकर वहां राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच जितने किस्म की चुनावी गंदगी हुई है वह भयानक है। केंद्र और राज्य के संबंध जिस हद तक खराब हुए हैं वह भी अभूतपूर्व है। और अभी तो चुनावी नतीजे आना बाकी हैं, जिसके बाद हो सकता है कि तोडफ़ोड़ और खरीदी-बिक्री का एक नया सिलसिला नई ऊंचाइयों तक पहुंचे। फिर जिस तरह मेहरबान चुनाव आयोग ने 8 किस्तों में बंगाल का मतदान बांटकर दिल्ली के बड़े नेताओं को बंगाल की तकरीबन हर विधानसभा सीट तक पहुंचने का एक अभूतपूर्व मौका दिया है, वह भी देखने लायक है। बंगाल का पूरा सिलसिला देखें तो समझ पड़ता है कि क्या इतनी गंदगी देश के अलग-अलग राज्य में घूम-घूमकर हर कुछ महीनों के बाद करना ठीक रहेगा जब वहां विधानसभा चुनाव हो रहे होंगे? यह सिलसिला केंद्र और राज्य के संबंधों को तबाह करने वाला भी है। जब लोगों के बीच आपस में बातचीत के भी रिश्ते ना रह जाएं, और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को यह लगने लगे कि प्रधानमंत्री के उस राज्य में आने पर भी उन्हें लेने जाना, उनके कार्यक्रम में जाना अपनी बेइज्जती करवाना होगा, यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। 

ऐसा लगता है कि वन नेशन वन इलेक्शन चाहे पूरे देश में एक नेता के पक्ष में सुनामी की तरह क्यों ना हो, सच तो यह है कि उससे चुनावी गंदगी कुछ महीनों में निपट जाएगी जो कि आज बारहमासी हो चुकी है। अगली जिस बात पर पर हम सोच रहे हैं वह कोरोना का खतरा है या कि ऐसी आने वाली किसी दूसरी महामारी का। असम से लेकर बंगाल तक और तमिलनाडु से लेकर केरल तक यह देखने में आ रहा है कि राजनीतिक दलों के मन में चुनाव की कीमत पर कोरोना के खतरे के लिए हिकारत के सिवाय कुछ नहीं है। राजनीतिक दलों ने चुनाव के लिए मतदाताओं की लाखों की भीड़ को जिस तरह कोरोना के खतरे में झोंक दिया है, उससे भी लगता है किसी देश में लोकतंत्र को बचाने का पाखंड आखिर किस कीमत पर किया जाए? अगर करोड़ों की आबादी वाले राज्यों को वहां एक-एक सीट पर लाखों वोटरों को इस तरह लापरवाह करके, कोरोना के हवाले करके, चुनाव लड़ा और जीता जाना है, तो देश पर इस खतरे से बेहतर यह है कि जिसे चुनाव जीतना है वह जीत ले, लेकिन बयानों की गंदगी से लेकर कोरोना के खतरे तक इन सबको 5 बरस में एक बार के लिए कर दिया जाए। 

जिस तरह कुंभ मेला 12 बरस में एक बार होता है, और दो कुंभ के बीच 6 बरस के फासले पर अर्धकुंभ होता है, वैसे ही चुनाव भी इस देश में एक फासले पर हो जाने चाहिए ताकि उनके बीच की गंदगी खत्म हो जाए। चुनाव के बीच जिस तरह कुंभ को लेकर नेता और सरकार लापरवाह हैं, धार्मिक नेता इसका मजा ले रहे हैं, देश की अदालतें अपने आपको सुरक्षित कमरों में बंद करके आंखें बंद किए बैठी हैं, उससे भी लगता है कि देश के चुनावों को कुंभ के साथ भी जोड़ देना चाहिए। जिस बरस कुंभ हो, उसके आगे-पीछे चुनाव भी हो जाने चाहिए ताकि सभी किस्म की गंदगी का खतरा, और महामारी का खतरा एक साथ चले जाएं। हर कुछ महीनों में देश में खतरे कहीं ना कहीं खड़े होते रहे वह ठीक नहीं है, तमाम किस्म के खतरे एक साथ आ जाने चाहिए, एक साथ चले जाने चाहिए।  ताकि उससे उबरकर हिंदुस्तानी जनता आगे देख सके, आगे तकरीबन 4 बरस काम कर सके। 

देश में चुनावों के दौर में जिस हद तक नफरत के उन्माद को बढ़ाया जा रहा है, उतनी नफरत और उतना उन्माद हर दो-चार महीने में अलग अलग राज्य चुनाव में सामने आता रहे वह भी ठीक नहीं है। जिस नेता की पार्टी को वन नेशन वन इलेक्शन से सबसे अधिक उम्मीदें हैं, वही जीत जाए, यह देश नफरत से परे रह ले, महामारी के खतरे से बच जाए। लोकतंत्र पर नाजायज चुनावी वायदों का बोझ ना पड़े वह अधिक जरूरी है। यह सिलसिला खतरनाक हो गया है, राज्यों के चुनाव लोकतंत्र के बदन को चकलाघर पर खरीदने बेचने का एक और मौका बनकर आने लगे हैं, ऐसी कमाई से भला किस लोकतंत्र की इज्जत बढ़ रही है? जिन पार्टियों को वन नेशन वन इलेक्शन में हार जाने का खतरा दिखता है, उन पार्टियों की वैसे भी आज के भारतीय लोकतंत्र में क्या गुंजाइश बच गई है? ये तमाम सवाल बहुत तकलीफदेह हैं, लेकिन यही साफ दिख रहा है कि चुनावी गंदगी से लेकर कोरोना की गंदगी तक, मरना तो लोकतंत्र को है लोक को है, और तंत्र तो लोक से वैसे भी कट चुका है।

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