दीवारों पर लिक्खा है, 31 जनवरी 2024


 

जागरूकता और सरोकार बस डिक्शनरी के शब्द हैं, असल दुनिया में कहीं नहीं

 31  जनवरी 2024  

  

पाकिस्तान के एक मशहूर गायक राहत फतेह अली खां का एक वीडियो अभी चारों ओर फैल रहा है जिसमें वे अपनी एक बोतल को लेकर एक घरेलू कामगार को बुरी तरह पीट रहे हैं, अपने जूते-चप्पल से उसे मारे जा रहे हैं कि उसने उसकी बोतल कहां रख दी? सोशल मीडिया पर उनके घर के भीतर के इस वीडियो के साथ लोगों ने लिखा है कि वे नशे में धुत्त भी दिख रहे थे, और शराब की बोतल मांग रहे थे जो कि नौकर से कहीं इधर-उधर हो गई थी। इस पर इस गायक ने यह सफाई दी है कि वह बोतल किसी पीर साहब का पानी था, और वे उसके न मिलने पर अपने ही एक शागिर्द को पीट रहे थे। उन्होंने उस शागिर्द और उसके पिता से माफी मांगने का वीडियो भी पोस्ट किया है, और जिसे वो शागिर्द कह रहे हैं वह उनकी बात में हामी भर रहा है। लोगों का कहना है कि यह सफाई पूरी तरह फर्जी और झूठी है, और वे राहत फतेह अली खां के एक पुराने वीडियो को भी पोस्ट किया है जिसमें वे नशे में टुन्न बकवास करते दिख रहे हैं। 

उनका घरेलू नौकर या शागिर्द, जो भी हो, उसकी ऐसी बेरहमी से हिंसक पिटाई किसी धार्मिक पानी के लिए तो होते नहीं दिख रही है, बाकी मालिक या गुरू की बात में हामी भरना गरीब और कमजोर की मजबूरी सभी जगह रहती है। इसे देखकर सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा है कि इस मशहूर गायक की गायकी के लिए मन में इज्जत अब खत्म हो गई है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले भारतीय फिल्मों के एक गायक और संगीतकार अनु मलिक का एक वीडियो सामने आया था जिसमें वे दुबई में दाऊद इब्राहिम की एक दावत में दाऊद की तारीफ में गाने गाते दिख रहे थे। यह वीडियो उस वक्त का था जब दाऊद भारत में मुम्बई बम विस्फोट में सैकड़ों लोगों की जान लेने के बाद भारत छोडक़र बाहर जा बसा था, और उसके बाद जिस अंदाज में वह वहां ऑलीशान दावतें करता था, उसमें मुम्बई फिल्म इंडस्ट्री के लोग जाते थे, वह बात हिन्दुस्तानी जनता को समझकर ऐसे कलाकारों का बहिष्कार करना था, लेकिन अनु मलिक नाम का यह आदमी आज भी टीवी रियलिटी शो में जज बना दिखता है, और लोग कोई बहिष्कार नहीं करते। दरअसल सामूहिक जनचेतना एक किस्म की मृगतृष्णा है जो असल में होती नहीं है, उसकी बस चर्चा होती है, उसकी बस कल्पना होती है। लोग यह मानकर चलते हैं कि जनता के बीच कोई जागरूकता आ सकती है। अब अभी राहत फतेह अली खां के बहिष्कार की बातें चार लोग लिख रहे हैं, लेकिन चार हजार लोग उनके नाम की चर्चा होने पर उनके पुराने गाने ढूंढकर देखने-सुनने लगेंगे। शायद इसीलिए मनोरंजन की दुनिया, और सार्वजनिक किस्म के कारोबार के बारे में कहा जाता है कि बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ? 

लोगों ने देखा हुआ है कि सलमान खान की गाड़ी ने मुम्बई मेें रात फुटपाथ पर सोने वाले लोगों को कुचला था, और फिर जैसा कि बड़े लोगों के हर मामले में साबित हो जाता है कि गाड़ी वे खुद नहीं चला रहे थे। इसी तरह बरसों गुजर गए हैं सलमान पर काले हिरण के शिकार का मुकदमा चल रहा है, लेकिन इससे फिल्म दर्शकों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मशहूर लोग कुछ भी कर सकते हैं, और उनकी शोहरत की चकाचौंध में लोग बंधे रह जाते हैं। बहुत से सांसद और विधायक, मंत्री और दूसरे नेता सार्वजनिक हिंसा करते दिखते हैं, हिंसक फतवे देते दिखते हैं, बलात्कार जैसे जुर्म में फंसते हैं, लेकिन उनके इलाके के वोटर हैं जो कि उन्हें बार-बार चुनते चले जाते हैं। देश में कई ऐसे दबंग और मवाली नेता हैं जो कि पार्टी के भीतर और मतदाताओं के बीच बराबरी से महत्व पाते हैं, और अतिआत्मविश्वास से भरे हुए जुर्म भी किए चले जाते हैं।

पूरी दुनिया का यही हाल है, पश्चिम के अमरीका और ब्रिटेन जैसे देश बहुत से बेकसूर देशों पर बमबारी करते हैं, हजारों लोगों को मार डालते हैं, लेकिन उनके सामानों के बहिष्कार की कोई बात नहीं हो पाती। और तो और इन देशों से आने वाले कोका कोला जैसे गैरजरूरी सामान की बिक्री पर भी किसी मुस्लिम देश में भी फर्क नहीं पड़ता, जबकि ये देश इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, और न जाने कितने दूसरे मुस्लिम देशों पर हमला करते रहते हैं, और वहां के मुस्लिम हैं कि इनका कोका कोला तक पीते रहते हैं, जो कि कम्प्यूटर या मोबाइल फोन सरीखी टेक्नॉलॉजी नहीं है, जिंदा रहने के लिए जरूरी नहीं है। तकरीबन तमाम दुनिया में लोग इतने आत्मकेन्द्रित और मतलबपरस्त रहते हैं कि किसी का मुजरिम होना उन्हें बहिष्कार के लायक नहीं बनाता। दुनिया के बड़े-बड़े जंगखोर मुल्क भी घुटनों पर आ जाएं अगर बाकी दुनिया उनका आर्थिक बहिष्कार करने लगे, लेकिन ऐसा होता नहीं है। और तो और जिस हिटलर की फौज के लिए फौजीवर्दियां सिलने वाला उसका कारोबारी दोस्त ह्यूगो बॉस नाजी सेना का काम करते हुए संपन्नता के आसमान पर पहुंचा, आज भी उसका फैशन ब्रांड पूरी दुनिया में चलता है, और किसी को इससे फर्क नहीं पड़ता कि यह कंपनी हिटलर की सेवा करती थी। हिन्दुस्तान के गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ के दुर्ग तक हिटलर नाम की दुकानें खुली हुई हैं, और इनसे बात करके भी हमने देखी, इनकी सेहत पर इसका फर्क नहीं पड़ता कि हिटलर ने दुनिया में लाखों बेकसूरों का नस्लवादी कत्ल किया था। उन्हें एक चर्चित नाम से अपनी दुकान मशहूर करने की संभावना अधिक प्यारी है, और वे हिटलर जैसे मुजरिम के नाम से भी परहेज नहीं करते। 

दुनिया में अच्छे और बुरे के बीच फर्क करने के लिए जिस राजनीतिक चेतना और सामाजिक सरोकार की जरूरत रहती है, वह गिने-चुने लोगों में ही दिखते हैं। आबादी का बाकी तकरीबन तमाम हिस्सा जिम्मेदारी के ऐसे बोझ से आजाद रहता है, और उसे न कातिलों से परहेज रहता, न बलात्कारियों से। दहेज हत्या की तोहमत जिन परिवारों पर लगती है, उनके साथ भी जात-पात के रिश्ते तोडऩे को लोग तैयार नहीं होते, और उनके घर भी रोटी-बेटी के रिश्ते कायम रखते हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया में इंसानियत नाम का जो शब्द है, उसकी काल्पनिक खूबियों पर गर्व करते हुए लोग उसकी इज्जत जरूरत से हजार गुना अधिक करते हैं, जबकि इसी इंसानियत के भीतर हिंसानियत भी छुपी रहती है, जिसकी तोहमत लोग इंसान से परे हैवान नाम के किसी काल्पनिक पिशाच पर मढ़ते रहते हैं। अगर कोई राहत फतेह अली खां के गानों के दर्शकों की गिनती में फर्क ढूंढ पाए, तो यही दिखेगा कि बदनाम हुए तो क्या नाम नहीं हुआ? उनके दर्शक हिंसक वीडियो सामने आने के बाद बढ़े ही होंगे, घटे नहीं होंगे। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जनवरी 2024


 

जानलेवा कोचिंग इंडस्ट्री में एक मौत और, कब तक?

30  जनवरी 2024  

   

देश में स्कूल-कॉलेज के इम्तिहान शुरू होने के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें इम्तिहान के तनाव से बचाने के लिए टीवी प्रसारण में मां-बाप को सुझाया कि वे अपने बच्चों के रिपोर्ट कार्ड को अपना विजिटिंग कार्ड न बनाएं। उनका कहना था कि जो मां-बाप अपनी जिंदगी में बहुत सफल नहीं हो पाते, वे अपने बच्चों को कामयाबी की मिसाल बनाना चाहते हैं ताकि वे औरों के बीच उसकी चर्चा कर सकें। उन्होंने यह बात ठीक कही कि मां-बाप बच्चों पर एक गैरजरूरी तनाव खड़ा कर देते हैं। हम भी बरसों से यह लिखते आए हैं कि मां-बाप अपने अपूरित सपनों और हसरतों को बच्चों में पूरे होते देखना चाहते हैं, और इससे बच्चों के अपने रूझान के खिलाफ जाकर भी किसी विषय को पढऩे, या किसी कॉलेज में दाखिला पाने का एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज दबाव पैदा होता है। कल जब प्रधानमंत्री देश भर के चुनिंदा बच्चों से टीवी पर बात भी कर रहे थे, और अपने सुझाव भी रख रहे थे, ऐन उसी समय राजस्थान में कोचिंग इंडस्ट्री कहे जाने वाले कोटा में एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली, और मां-बाप के लिए यह लिखकर छोड़ा कि वह जेईई नहीं कर सकतीं, इसलिए वह खुदकुशी कर रही है, वह असफल है, और उसके लिए यही आखिरी विकल्प है। अब इस कोचिंग इंडस्ट्री में हफ्ते भर में यह दूसरी खुदकुशी है, और पिछले एक बरस में यहां दो दर्जन से अधिक छात्र-छात्राओं ने खुदकुशी की थी। पिछली अशोक गहलोत सरकार ऐसी मौतों पर हड़बड़ा गई थी, और सरकारें आमतौर पर दिखावे के लिए जो करती हैं, वैसा ही गहलोत सरकार ने भी किया था, कोचिंग इंडस्ट्री चलाने वाले लोगों के साथ बैठकें की थीं, और बच्चों का तनाव कम करने का रास्ता ढूंढने का नाटक भी किया था। यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि कोटा में तनाव का हाल यह है कि वहां छात्र-छात्राओं की रहने की जगहों पर छत के पंखे नहीं लगाए जाते क्योंकि बच्चे उनसे लटककर आसानी से जान दे सकते हैं। अभी कल जिस लडक़ी ने खुदकुशी की है, वह तीन बहनों में सबसे बड़ी थी, उसके पिता बैंक में गार्ड हैं, और मां घरेलू महिला है, ऐसे परिवार ने इंजीनियरिंग दाखिले की कोशिश और तनाव में अपनी एक बच्ची खो दी।  लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले भी हमने जब ऐसी ही आत्महत्याओं के मुद्दे पर इसी जगह लिखा था, तो उसमें देश में एक जगह खुदकुशी करने वाले छात्र के पिता ने भी अंतिम संस्कार के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली थी। 

हिन्दुस्तान में सरकारी और निजी, बड़े-बड़े कॉलेज तो खुल गए हैं, बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान भी फैक्ट्रियों की तरह चल रहे हैं, लेकिन किसी विषय को पढऩे, या किसी दाखिला इम्तिहान की तैयारी करने की बच्चों की क्षमता का अंदाज लगाना हिन्दुस्तान में चलन में नहीं है। मां-बाप अपने सपने पूरे करने के लिए बच्चों पर नाजायज बोझ डाल देते हैं, और जितने बच्चे खुदकुशी करते हैं, उससे हजारों गुना बच्चे हीनभावना का शिकार भी होते ही होंगे कि वे मां-बाप के कर्ज से कोचिंग लेते हुए, पढ़ते हुए भी उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। देश की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसी भेड़ चाल में फंसी हुई दिखती है कि गिने-चुने कुछ प्रचलित, लोकप्रिय, और महत्वाकांक्षी कोर्स में जाने के लिए कुछ बच्चे खुद भी आमादा रहते हैं, और अधिकतर के मां-बाप उस पर जिद पर अड़े रहते हैं। नतीजा यह होता है कि बच्चों की पसंद, उनका रूझान, और उनकी क्षमता कहीं प्राथमिकता नहीं रखतीं। हमारा तो यह मानना है कि स्कूल के दौरान ही इन बातों का लगातार आंकलन होते रहना चाहिए, और ऊंची पढ़ाई के लिए उन्हीं बच्चों की बारी आनी चाहिए जो कि वैसे पाठ्यक्रम पढऩे के लायक हैं। दरअसल किताबी पढ़ाई को ही इस देश में सब कुछ मान लिया गया है, और स्कूल-कॉलेज की कम पढ़ाई के बाद कमाई का कोई रोजगार करने वाले लोगों का भी सम्मान नहीं रहता है, बल्कि पढ़े-लिखे बेरोजगार जो कि मां-बाप की छाती पर मूंग दलते रहते हैं, उन्हें बेहतर समझा जाता है। समाज की इस सोच को भी बदलना होगा क्योंकि औसत दर्जे की पढ़ाई करके लोग कोई उत्पादक काम नहीं पा सकते, और ऐसे शिक्षित-बेरोजगार देश की उत्पादकता में कुछ जोड़ नहीं सकते। 

केन्द्र और राज्य सरकारें अलग-अलग किस्म की अधकचरी कोशिशें करती रहती हैं, जिनमें कोचिंग को लेकर भी पिछले दिनों कुछ नियम खबरों में आए थे। सरकारों को स्कूल-कॉलेज, पढ़ाई, और इम्तिहान खिलवाड़ के सबसे ही आसान सामान लगते हैं, और जब जिस सरकार को जैसा ठीक लगे, वैसा फेरबदल इनमें होते चलता है। आज दुनिया, और इस देश में भी, बदलती जरूरतों के मुताबिक न शिक्षा नीति बदल रही है, और न परीक्षा नीति। फिर देश में संपन्न और विपन्न तबकों के बीच साधनों का जो बहुत बड़ा फर्क खड़ा हो गया है, वह भी आगे की जिंदगी के मौकों पर असर डालता है। जो लोग महंगी कोचिंग से तैयारी करते हैं, वे कई बड़े दाखिला इम्तिहानोंं में कामयाबी की अधिक गुंजाइश रखते हैं। आज इन्हीं सब वजहों से देश में समान अवसर की बात कागजों पर भी नहीं रह गई है, असल जिंदगी में तो यह दूर-दूर तक कहीं नहीं हैं। ऐसे में गरीब तबके से निकलकर आए हुए इक्का-दुक्का कामयाब लोगों की मिसालें देकर लोग साबित करने की कोशिश करते हैं कि संपन्नता ही सब कुछ नहीं होती, लेकिन जब व्यापक नतीजों को देखें, तो यह समझ आता है कि संपन्नता ही बहुत मायने रखती है।

लेकिन बाकी तमाम बातों से परे सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चों पर उनकी मर्जी और उनके रूझान के खिलाफ कोई दबाव नहीं डालना चाहिए क्योंकि आत्महत्या की एक-एक खबर तनाव के कगार पर खड़े बहुत से और बच्चों के लिए एक असर लेकर आती है। यह नौबत किसी भी कीमत पर टालनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जनवरी 2024


 

चारों तरफ नकारात्मक खबरों का ऐसा असर..

 29 जनवरी 2024  

  

ऐसा लगता है कि आम जिंदगी में चारों तरफ से आने वाली खबरों से लोगों ने सबक न लेना तय कर लिया है। इसीलिए लगातार खबरें छपती हैं, हाईकोर्ट नाराजगी दिखाते रहता है, लेकिन न लोग लाउडस्पीकर की चीख-चिल्लाहट कम करते, और न ही अफसर उस पर कोई कार्रवाई करते दिखते। यहां तक कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट शोरगुल पर काबू पाने में पूरी तरह निराश होने के बाद यह तक कह चुका है कि ऐसा लगता है कि अफसर यह करना ही नहीं चाहते, इसके बाद भी हालत नहीं सुधर रही। अधिकतर इलाकों में सुबह से रात तक लाउडस्पीकर चलते रहते हैं, प्रशासन इम्तिहान चलने का हवाला देकर रोक लगाने के लिए टीम बनाता है, लेकिन होता कुछ नहीं है। इसी तरह यातायात सुधार सप्ताह के नाम पर कुछ गाडिय़ों का चालान हो जाता है, कुछ महंगी मोटरसाइकिलों में शौक में लगाए गए शोर करने वाले साइलेंसर जब्त कर लिए जाते हैं, और उन्हीं तमाम जगहों पर दुबारा यही सब होने लगता है। आम जिंदगी में बदअमनी और अराजकता फैलाने को लोगों ने लोकतांत्रिक स्वतंत्रता मान लिया है, और इसका इस्तेमाल करते रहते हैं।

अभी एक सरकारी स्कूल में हेडमास्टर ने बच्चों को बौद्ध धर्म अपनाने की शपथ दिलाई, और बौद्ध शपथ के मुताबिक उन्हें हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा न करने की कसम भी दिलाई। अब सरकारी स्कूल के हेडमास्टर को देश के कानून की इतनी आम समझ न हो, यह कल्पना से परे की बात है, लेकिन ऐसा जगह-जगह हो रहा है। स्कूलों में खासकर बहुत से शिक्षक शराब के नशे में पहुंच रहे हैं, और ऐसी खबरें तभी बाहर आती हैं जब मास्टर फर्श पर पड़े दिखते हैं, या कोई उनके वीडियो बनाते हैं। यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि हमारा अंदाज है कि सामने आने वाली ऐसी हर खबर के मुकाबले सौ-सौ गुना खबरें दबी रह जाती होंगी, और बच्चों का उन पर कैसा असर पड़ता होगा यह अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं है। 

देश भर में स्कूली बच्चों का जो सर्वे हुआ है, वह बताता है कि ऊंची कक्षाओं में पहुंच चुके बच्चे भी नीची कक्षाओं के बच्चों जितनी भी पढ़ाई नहीं कर पाते, न किताब पढ़ सकते, न ठीक से जोड़-घटाना कर सकते। देश का यह हाल न सिर्फ स्कूलों में हैं, बल्कि हर किस्म की सरकारी और सार्वजनिक जगह पर से उत्कृष्टता गायब है। अदालतों में कामकाज की रफ्तार नहीं है, जज और मजिस्ट्रेट के सामने बैठे बाबू खुलेआम हर वकील और मुवक्किल से रिश्वत लेते हैं, और अदालत पहुंचकर हर किसी को सबसे पहले यही लगता है कि वे एक सबसे भ्रष्ट जगह पर आ गए हैं, जहां पर वे मुजरिम रहें, या शिकायतकर्ता, हर पेशी पर रिश्वत देनी ही है। सरकारी अस्पतालों में इसी तरह का हाल दिखता है, मशीनें हैं तो चलाने वाले डॉक्टर और टेक्नीशियन नहीं हैं, कहीं पर ये लोग हैं, तो मशीनें नहीं हैं, दोनों हैं तो मशीनों में लगने वाले केमिकल की किट नहीं हैं, दूसरे सामान नहीं हैं, सर्जन हैं तो बेहोश करने वाले डॉक्टर नहीं हैं, बेहोश करने वाले डॉक्टर हैं तो सर्जन नहीं हैं। और इन विभागों में इतना संगठित भ्रष्टाचार चलता है कि वहां लोगों की जान कैसे बचती है इस पर सोचें तो ईश्वर पर भरोसा होने लगता है। 

हर नए अफसर और नेता कहीं बगीचों में फौव्वारे लगवाते हैं, तो कहीं तालाबों में बोट चलवाते हैं, और जब से स्मार्ट सिटी की योजना आई है, तब से तो हर स्मार्ट सिटी में सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना की बर्बादी की गारंटी सी हो गई है। अफसर स्मार्ट सिटी में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बिना अपनी मर्जी से अंधाधुंध खर्च करते हैं, और ऐसा लगता है कि अधिक से अधिक भ्रष्ट खर्च करना ही उन्हें काम करने की ताकत देता है। दूसरी तरफ जिलों में कलेक्टरों के हाथ में जिला खनिज न्यास के दर्जनों या सैकड़ों करोड़ रूपए रहते हैं, और उनमें नेता, अफसर, और सप्लायर मिलकर अधिक से अधिक बर्बादी करने का सामान जुटाते रहते हैं। सत्ता के सभी भागीदार स्मार्ट सिटी और डीएमएफ को कमाई का एक जरिया बनाकर चलते हैं। अभी छत्तीसगढ़ में कई मामलों की जांच कर रही ईडी ने जिला खनिज न्यास, डीएमएफ, के घोटाले के खिलाफ राज्य की एसीबी-ईओडब्ल्यू में एफआईआर की है, और जब केन्द्र सरकार की इन जांच एजेंसी राज्य के बड़े-बड़े अफसरों के खिलाफ ऐसी रिपोर्ट कर रही है, जो कि केन्द्रीय सेवाओं के अफसर हैं, तो फिर इसकी गंभीरता को समझना चाहिए। 

रोज के अखबार उठाकर देखें तो उनका खबरों का तकरीबन हर पन्ना जनता और सरकार दोनों की अराजकता और भ्रष्टाचार की खबरों से भरा रहता है। ऐसे में यह लगता है कि लोगों के लिए सकारात्मक प्रेरणा की कोई खबर कैसे मिल सकती है? यह हैरानी होती है कि खबरों को पढऩे वाले लोग अगर सिर्फ यही देख पाएंगे कि देश में कितना भ्रष्टाचार है, लोग कितने अराजक हैं, चारों तरफ थूक और मूत रहे हैं, सडक़ पर चाकूबाजी कर रहे हैं, दारू के लिए पैसा मांगने पर न मिले तो राह चलते को भी चाकू भोंक रहे हैं, तो लगता है कि कानून व्यवस्था से लेकर जनता की सोच तक ऐसी भयानक गिरावट आई है कि इस देश के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है। हम ऐसी खबरों का व्यापक असर देखते हैं, और आज देश भर में धर्म और जाति का तनाव, क्षेत्र और भाषा का तनाव हिंसक होते जा रहा है, और इनका भी असर लोगों पर होता ही है। 

आज ही की एक दूसरी खबर दिख रही है कि प्रेमसंबंध में असफल एक नाबालिग ने दूसरे नाबालिग का कत्ल कर दिया! एक तरफ नाबालिग बच्चों के किए जुर्म बढ़ते चले जा रहे हैं, तो दूसरी ओर नाबालिग बच्चों के अश्लील वीडियो पोस्ट करने वाले लोग आए दिन गिरफ्तार होते दिखते हैं, और आज की ही एक दूसरी खबर है कि भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 6 बरसों में बच्चों के देहशोषण के मामले बढक़र दो गुना हो गए हैं। हर जुर्म की खबर दूसरे कुछ संभावित मुजरिमों को रास्ता दिखाती है, और फिल्में और टीवी के कई किस्म के सीरियल हिंसा को अंधाधुंध बढ़ा भी रहे हैं। हमारा यह भी मानना है कि हिंसा की सीमा तक पहुंचने वाले नाबालिग और बालिग लोगों के दिमाग में यह भी रहता है कि देश में आज प्रेरणा की खबरें कहीं से नहीं आती हैं, और हिंसा की खबर हर तरफ से आती हैं। कल ही इस अखबार के संपादक ने अपने साप्ताहिक कॉलम, ‘आजकल’ में रोहन बोपन्ना के इतनी उम्र में पहुंचकर, इतने दर्जन बार कोशिश करने के बाद ग्रैंड स्लैम टाइटिल पाने पर लिखा, तो उस पर दर्जनों लोगों ने संदेश भेजे कि कम से कम एक सकारात्मक बात पढऩे मिली जिससे दिल-दिमाग को राहत मिली, और हौसला मिला। चारों तरफ से अगर हिंसा, नफरत, धर्मान्धता, और जुर्म की खबरें आएंगी, मारने या मर जाने की खबरें रहेंगी, तो उससे ऐसी घटनाएं और बढ़ती चली जाएंगी। इसलिए दुनिया को लगातार कुछ बेहतर बनाने की कोशिश होती रहनी चाहिए, ताकि बेहतर मामलों की खबरें लोगों की सोच को बेहतर बना सकें।

(Daily Chhattisgarh)

रोहन बोपन्ना के बहाने जिंदगी के बाकी दायरे..

28 जनवरी, 2024 

 

भारत के टेनिस खिलाड़ी रोहन बोपन्ना लॉन टेनिस ओपन एरा के इतिहास के सबसे उम्रदराज ग्रैंड स्लैम चैंपियन हो गए हैं। उनकी खुशी देखते ही बन रही थी। वे दो दशक से इस खिताब की कोशिश में लगे हुए थे, और किसी भी खेल के मैदान पर इतना लंबा जीवन असाधारण होता है। वे तकरीबन 44 बरस के हो रहे हैं, और यह उम्र अधिकतर खिलाडिय़ों के लिए खेल से बाहर होने की होती है। यह मेंस डबल टूर्नामेंट उनके लिए बाद में खिताब लेकर आया, और वे इसके पहले 2017 में मिक्स्ड डबल्स का ग्रैंड स्लैम खिताब जीत चुके थे। आधी सफेद हो रही दाढ़ी के साथ जब वे ऑस्ट्रेलियन ओपन की यह ट्रॉफी लेकर अपने जोड़ीदार मैथ्यू एब्डेन के साथ खड़े हुए, तो वे संघर्ष और सब्र की एक बड़ी मिसाल दिख रहे थे। 

मुझे खेलों की अधिक समझ नहीं है, और मैं ऐसे खिताबों को भी अधिक नहीं समझता, लेकिन मैं ऐसे संघर्ष को समझता हूं जो कि रोहन बोपन्ना ने इस खिताब के पहले दिखाया है। टेनिस की खबरों के आंकड़े बताते हैं कि 19 अलग-अलग जोड़ीदारों के साथ इतने बरसों में मैच खेलते हुए रोहन ने 61 कोशिशों के बाद यह खिताब पाया है। अब जब उन्होंने यह खिताब जीता है, तो वे इसे जीतने वाले सबसे उम्रदराज, सबसे अधिक कोशिशों वाले खिलाड़ी बने हैं। 

अब खेलों से परे की बात करें तो जिंदगी के बाकी दायरों में भी यह बात लागू होती है कि आप अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए कितनी मेहनत करते हैं, इरादा कितना पक्का रखते हैं, और कितने अलग-अलग रास्ते ढूंढते हैं। इसे इंसानों से परे भी समझने के लिए चींटियों को देखा जा सकता है, जो किसी चीज को ढोते हुए सामूहिक मेहनत करती हैं, तरह-तरह के मुश्किल रास्तों से होकर गुजरती हैं, मंजिल तक पहुंचने के लिए कल्पनाशील होकर रास्ते निकालती हैं, और कामयाब होती हैं। दुनिया का सबसे बड़ा खेल मुकाबला आसान नहीं होता है, दुनिया की तमाम आबादी में से निकलकर आए चुनिंदा और शानदार खिलाड़ी वहां तक पहुंचते हैं, और उनके बीच मुकाबला सबसे ही मुश्किल होता है। अपने आपमें अच्छा खिलाड़ी होना काफी नहीं होता, बल्कि उस मुकाबले के हर मैच में दूसरे खिलाडिय़ों से बेहतर होना भी जरूरी होता है। 

हम इस मिसाल पर आज इसलिए भी लिख रहे हैं कि लोग अपनी आसान जिंदगी में छोटी-छोटी मुश्किलों के आने पर भी हौसला छोडऩे लगते हैं। कहीं किसी कोचिंग संस्थान में इम्तिहान की तैयारी कर रहे बच्चे खुदकुशी कर लेते हैं, तो कहीं प्रेमसंबंधों या शादीशुदा जिंदगी में तनाव और नाकामयाबी मिलने पर लोग जान दे देते हैं। कुछ लोग बीमारी से तंग आकर खत्म हो जाते हैं, तो कुछ लोग आर्थिक तंगी का सामना नहीं कर पाते। इस एक आखिरी बात के लिए अमिताभ बच्चन की मिसाल देखनी चाहिए कि कुछ दशक पहले वे दसियों करोड़ के कर्जतले आ गए थे, और आज 80 बरस से अधिक की उम्र में वे हजारों करोड़ का ब्रांड बन चुके हैं। उनकी जिंदगी में जाने कितनी बार ऐसे हादसे हुए कि अस्पताल में उनके बचने की उम्मीद भी कम रह गई थी, लेकिन वे निकलकर आकर आसमान चीरकर शोहरत के अंतरिक्ष तक पहुंच गए। उनकी जिंदगी में शुरूआती बरसों में काम के लिए संघर्ष भी कम नहीं रहा, वे अपने वक्त के नायकों की बंधी-बंधाई छवि से भी बिल्कुल अलग थे, और उनकी भावनात्मक जिंदगी भी कहा जाता है कि कई किस्म के उतार-चढ़ाव से गुजरी है। लेकिन किसी भी पल जिंदगी के किसी भी मोर्चे पर उन्हें हिम्मत छोड़ते नहीं देखा गया, और यही वजह है कि आज वे हिन्दुस्तान की मनोरंजन की दुनिया में, इश्तहारों और मॉडलिंग में, ब्रांड प्रमोशन में बेताज बादशाह हैं। 

बीच-बीच में केरल की कुछ खबरें आती हैं कि किस तरह वहां 80 या 85 बरस की किसी बुजुर्ग महिला ने 5वीं का इम्तिहान पास किया, और कहीं से ऐसी खबर आती है कि कुदाली-फावड़ा लेकर किसी एक आदमी ने पहाड़ के आर-पार अकेले ही एक सडक़ बना दी। कुछ ऐसी खबरें भी आती हैं कि कहीं किसी पति-पत्नी ने मिलकर 25-30 बरस में एक बंजर पहाड़ को पूरे का पूरा हरियाली से भर दिया, और हौसले की कई ऐसी खबरें हैं कि किस तरह कोई नेत्रहीन एवरेस्ट पर पहुंच चुके हैं, और किस तरह दोनों नकली पैरों के साथ कुछ दूसरे लोग एवरेस्ट जीत चुके हैं। फौलादी नकली अंग लगे हुए ऐसे लोग सर्द-बर्फीली हवाओं के बीच कई बार अपने कटे हुए अंगों को और जख्मी कर लेते हैं, लौटकर ऑपरेशन के बाद उनके अधूरे अंग और कुछ इंच छोटे हो जाते हैं, लेकिन वे हौसला नहीं छोड़ते। शायद ऐसे ही लोगों को देख-देखकर चींटियां कोशिश करना सीखती हैं। 

जिंदगी में हमेशा अच्छा ही होता रहे यह जरूरी नहीं रहता, अगर खुद की जिंदगी में सब कुछ अच्छा है, तो भी आसपास के लोगों की जिंदगी में कुछ न कुछ गड़बड़ हो सकता है। और ऐसे में लोगों को चाहिए कि संघर्ष, हौसले, जीत की कहानियां जहां से मिल सकें, वहां से लेकर आसपास लोगों तक पहुंचाएं ताकि लोग अपनी निराशा में डूब रहे हों, तो भी वे उससे उबर सकें। इस बात की अहमियत को समझना चाहिए कि आज अगर आप किसी और के काम आते हैं, तो कल आपके डूब रहे हौसले को उबारने के लिए कुछ दूसरे भी काम आ सकते हैं। दुनिया एक-दूसरे के सहारे से तैर सकती है, और एक-दूसरे से मिली बोझिल निराशा से डूब भी सकती है।

रोहन बोपन्ना की इस खबर से आज मुझे ही न सिर्फ लिखने के लिए एक विषय मिला है, बल्कि अपनी असल जिंदगी की कोशिशों से न थकने की एक मिसाल भी मिली है। लोगों को जिस मंजिल को पाने की हसरत हो, उसके लिए खूब तैयारी करनी चाहिए, जमकर कोशिश करनी चाहिए, और फिर उसकी उम्मीद छोडऩी नहीं चाहिए। साथ-साथ यह भी समझना जरूरी है कि जिंदगी में जो पाने की संभावना बिल्कुल भी न हो, खुद की तैयारी वहां तक न पहुंचा सके, उनके लिए अंतहीन कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। रोहन बोपन्ना की मिसाल तर्क और समझ से परे किसी अंधविश्वास के लिए नहीं है, बल्कि एक असल संभावना के लिए है, जिसे तौल लेना हर समझदार इंसान के लिए बेहतर बात होती है। 

(Daily Chhattisgarh)

नीतीश ने याद दिला दी सब्जी पसंद न आने पर मां के कातिल बेटे की

 28 जनवरी 2024  

  

दो खबरें जिनका आपस में एक-दूसरे से कोई लेना-देना न हो, उनका किस तरह एक-दूसरे से लेना-देना हो सकता है, इसकी एक मिसाल अभी इसी पल सूझी है। दो अलग-अलग मामलों पर आज इस जगह लिखने की एक संभावना बन रही थी, इनमें से एक तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक अदालती खबर है जिसमें एक नौजवान को उम्रकैद हुई है। इसने साल भर पहले घर पहुंचकर मां से पूछा था कि क्या सब्जी बनी है, और जब उसे पता लगा कि उसे नापसंद सब्जी बनी है, तो इस पर उसने फावड़ा उठाकर मां को मार डाला था। मां-बाप के साथ रहने वाला नौजवान किस तरह मां का कातिल हो सकता है, कितनी सी बात पर हो सकता है, इसकी यह एक भयानक मिसाल है, और बहुत से लोगों को अपने कलेजे के टुकड़ों से रिश्ते तय करते हुए, रखते हुए, निभाते हुए ऐसी कुछ मिसालों को याद रखना चाहिए। अभी कुछ ही दिन हुए हैं कि पास की ही एक खबर थी कि एक नौजवान ने शराब पीने को पैसे मांगे, और न मिलने पर बाप को मार डाला। रिश्ते किस तरह खराब हो सकते हैं, बिना बात के भी खराब हो सकते हैं, इसकी मिसाल हम कुछ पारिवारिक मामलों से शुरू भर कर रहे हैं, इसके बाद यह मिसाल आज की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना तक चली जाती है जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुछ दिनों से चली आ रही खबरों के मुताबिक राजभवन से इस्तीफा देकर निकले, और उन्होंने कहा कि गठबंधन की सरकार खत्म हो गई है, और एक पिछला गठबंधन था, उसके लोग मिलकर अगर कुछ तय करते हैं, तो उस बारे में सोचा जाएगा। लोगों को याद होना चाहिए कि बिहार का पिछला विधानसभा चुनाव नीतीश ने भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था, और फिर लालू और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली थी। अब ऐसा जाहिर है कि वे लालू और कांग्रेस का साथ छोडक़र एक बार फिर भाजपा के साथ मिलकर या तो आज सरकार बना लेंगे, या हो सकता है कि नया गठबंधन विधानसभा को भंग करके आने वाले लोकसभा चुनाव के साथ बिहार के विधानसभा चुनाव की सिफारिश भी कर दे। अभी हम ऐसी संभावनाओं पर कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन जिस तरह से नीतीश ने बिना किसी जाहिर या ठोस वजह के इस गठबंधन को तोड़ा, अपनी ही सरकार गिराई, और पहले की अपनी ऐसी ही कुछ बार की हरकत को दोहराया, उससे हमें लगा कि क्या इसकी तुलना किसी तरह मां के कत्ल की घटना से की जा सकती है? 

नीतीश ने 2020 में पिछला विधानसभा चुनाव एनडीए के साथ मिलकर लड़ा था, जिसकी अगुवाई भाजपा करती है। और बाद में उन्होंने 2022 में एनडीए की सरकार गिराकर भाजपा से रिश्ता तोड़ दिया, और बिहार का महागठबंधन नाम के एक गठबंधन में शामिल हो गए, जिसमें लालू यादव की आरजेडी, और कांग्रेस पार्टी शामिल थे। अब डेढ़ बरस बाद इस गठबंधन की सरकार गिराकर नीतीश ने अब से कुछ घंटे बाद भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के एक समीकरण को जन्म दिया है। इस तरह परस्पर विरोधी खेमों में जाकर, उनकी मदद से मुख्यमंत्री बने रहकर नीतीश अब बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता हो गए हैं। उन्होंने डेढ़ बरस पहले जब भाजपा-एनडीए वाले गठबंधन की पीठ में छुरा भोंका था, तब बहुत से लोगों को नीतीश बहुत अच्छे लगे थे। अब उन्होंने आज सुबह तक के गठबंधन की पीठ में छुरा भोंका है तो वे लालू और कांग्रेस के विरोधियों को अच्छे लग रहे होंगे। लेकिन जिस तरह बिना किसी मुद्दे के, वे अपने साथियों को धोखा देते हैं, उनकी पीठ में छुरा भोंकते हैं, तो लगता है कि कोई बेटा मां की पीठ में इस तर्क के साथ छुरा भोंक दे रहा है कि मां ने बेटे की पसंद की सब्जी नहीं बनाई है। नीतीश की खूबी यही है कि वह बिना पिए, बिना नशे के भी अपने मातृ-गठबंधन की पीठ में छुरा भोंक सकते हैं, और पसंद की सब्जी की चाहत और संभावना में नई मां बना सकते हैं। यह बात हम आज उनके लालू छोडक़र भाजपा के साथ जाने की संभावना पर नहीं कह रहे हैं, पिछले कुछ बार जिस तरह से उन्होंने बार-बार सब्जी नापसंद होने की आड़ लेकर, उसके बहाने से अपनी उस वक्त की मां की पीठ में छुरा भोंका है, वह भारतीय लोकतंत्र में गजब की मिसाल है। कुछ और पार्टियों के कुछ नेताओं ने अलग-अलग प्रदेशों में कुछ हद तक ऐसा किया है, लेकिन नीतीश उन सबसे भी ऊपर एक अनोखी मिसाल हैं, और इस बार उन्होंने ऐसा लगता है कि बिहार के महागठबंधन के साथ-साथ इंडिया नाम के राष्ट्रीय गठबंधन की पीठ में भी सब्जी नापसंद होने की वजह से छुरा भोंक दिया है। 

हम पहले भी बहुत बार यह बात लिखते आए हैं कि लोगों को अपनी अगली पीढ़ी के साथ अपने रिश्ते और लेन-देन तय करते हुए, उन्हें वारिस बनाते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आज उनकी आंखों के तारे कल मां-बाप को अपनी आंखों की किरकिरी भी महसूस कर सकते हैं, और उस वक्त मां-बाप कहीं के नहीं रह जाते। इसलिए अपना सब कुछ अपनी अगली पीढ़ी को देने के पहले मां-बाप को इतना कुछ अपने लिए बचाकर रख लेना चाहिए कि बकाया लंबी जिंदगी लोगों के सामने हाथ न फैलाना पड़े, भूखों न मरना पड़े, किसी वृद्धाश्रम के रहमोकरम पर न रहना पड़े। नीतीश कुमार ने भारत की राजनीति को कुछ इसी तरह का साबित किया है कि साल-दो साल किसी मातृ-गठबंधन को चूसकर वे सीएम बने रहें, और फिर आगे की बेहतर संभावनाओं को देखते हुए वे मां की पीठ में किसी बहाने से छुरा भोंककर नई मां बना लें, और फिर उस नई मां से बकाया तमाम जिंदगी निभाने के बारे में ऐसी जुबान में दावे करें जो कि लोगों को ईमानदार और सरलता की मिसाल लगे, और जिसका कि इन दोनों से कुछ भी लेना-देना न रहे। 

राजनीति में किसी नैतिकता की हमें उम्मीद नहीं रहती, और नीतीश तो लोकतंत्र की एक ऐसी औलाद है जो कि कई बार अनैतिक हो चुके हैं। अब ऐसा लगता है कि वे अगले कुछ बरस नई मां के साथ रह भी सकते हैं, क्योंकि वहां पर पसंदीदा सब्जियों के बनने की संभावना अधिक दिखती है, वहां पर अगले चुनाव में जीतकर आने की संभावना अधिक दिखती है, वहां पर फायदे अधिक दिखते हैं। अगले कुछ घंटों में ऐसी उम्मीद की जा रही है कि बिहार में एक बार फिर एनडीए की सरकार बन जाएगी, और वह इंडिया नाम के गठबंधन की संभावनाओं का एक बड़ा नुकसान रहेगा। लेकिन नीतीश जैसे बेटे के लिए सब्जी बनाने के पहले हर मां को अपनी पीठ पर तवा बांधकर रखना चाहिए, उसे कब कौन सी सब्जी नापसंद हो जाए, और कब उसे किसी दूसरे चूल्हे पर बनी सब्जी अच्छी लगने लगे। 

बड़ी अजीब सी बात है कि एक कत्ल और एक सत्तापलट के बीच ऐसी मिसाल सूझ रही है, लेकिन जिंदगी ऐसी ही है, जहां कहीं के निजी रिश्ते, कहीं की राजनीति से मिलते-जुलते दिखते हैं! 


(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जनवरी 2024



 

इतनी संगठित डिजिटल ठगी रोकने का जिम्मा किस पर?

 27 जनवरी 2024  

  

छत्तीसगढ़ में ऑनलाईन शेयर खरीद-बिक्री पर रोजाना पांच-दस फीसदी मुनाफे का झांसा देकर एक पति-पत्नी से एक मोबाइल ऐप के माध्यम से 68 लाख रूपए की ठगी हो गई। और एक दूसरी खबर इसी प्रदेश में सेना के एक अफसर से कुछ इसी किस्म का शेयर कारोबार का झांसा देकर 89 लाख रूपए ठग लिए। कल ही के अखबारों में ये दोनों खबरें हैं, और हमारे सरीखे कुछ अखबारनवीसों के वॉट्सऐप नंबर हर हफ्ते ऐसे किसी न किसी शेयर खरीदी-बिक्री के ग्रुप में जोड़े जाते हैं, या क्रिप्टोकरेंसी कारोबार के एक नए झांसे में। इन पर होने वाली अलग-अलग लोगों की चर्चा के पोस्ट देखें तो वे ग्रुप के मुखिया की सलाह पर हर दिन लाखों या दसियों लाख रूपए कमाने की खुशी जाहिर करते रहते हैं, और ऐसा लगता है कि उनके झांसे में आकर और बहुत से लोग पैसा इस तरह लुटा बैठते हैं। ऐसे जालसाज और ठग कई फर्जी वेबसाईटें भी बना लेते हैं, और वहां से भी लोगों को फांसते हैं। 

यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन कल ही एक दूसरी खबर यह है कि साइबर-मुजरिमों ने मोबाइल फोन की एक मैसेंजर सर्विस पर यह पोस्ट किया है कि उनके पास भारत के 75 करोड़ लोगों के आधार कार्ड, और उससे जुड़ी हुई तमाम जानकारियां बिक्री के लिए मौजूद हैं। इंटरनेट का जो हिस्सा सिर्फ मुजरिमों के बीच लोकप्रिय है, वहां भी ऐसी जानकारी पोस्ट की गई है। दुनिया की जिस साइबर-सुरक्षा फर्म ने यह जानकारी सामने रखी है, उसने अभी तक इन बेचने वालों की जानकारी को परखा तो नहीं है, लेकिन इस तरह की जानकारी दुनिया के कई देशों में कई कंपनियों या सरकारी सेवाओं से चुराकर बिक्री के लिए सामने रखी जाती हैं। 

अब हम भारत में इन दो चीजों को मिलाकर देखें तो अधिकतर लोग धोखा खाने के लिए एक पैर पर खड़े दिखते हैं, उन्हें बस कोई फायदे का सौदा दिख जाए। हमारे सरीखे लोग भी फेसबुक पर दो-तीन सौ रूपए में शानदार शर्ट का इश्तहार देखकर पैसा गंवा चुके हैं। लेकिन जब लोग शेयर कारोबार में अंधाधुंध मोटी कमाई के झांसे में आ जाते हैं, या दुनिया में अभी पूरी तरह अविश्वसनीय क्रिप्टोकरेंसी से फायदा पाने के फेर में ठगे जाते हैं, तो कुछ हैरानी होती है। अगर दुनिया में इतनी कमाई मुमकिन होती, तो लोग कारोबार ही क्यों करते? लेकिन यहां पर एक दूसरा सवाल परेशान करता है कि सरकार की इतनी सारी निगरानी एजेंसियां, और जांच एजेंसियां मिलकर भी ऐसी जालसाजी को पकड़ क्यों नहीं पाती हैं? इनके तौर-तरीके मिलते-जुलते रहते हैं, और इंटरनेट पर उन्हें पकड़ पाना इतना मुश्किल भी नहीं होना चाहिए। अभी ब्रिटेन से स्पेन के लिए रवाना हुए एक नौजवान ने लंदन के एयरपोर्ट पर अपने दोस्तों को मजाक में एक संदेश भेजा था कि वह तालिबान है, और वह विमान को विस्फोट से उड़ाने जा रहा है, तो उसके शब्दों को ही एयरपोर्ट के वाईफाई पर निगरानी एजेंसियों ने पकड़ लिया था, और एक खतरे की आशंका को टाल दिया था। हिन्दुस्तान जैसे काबिल देश में जहां से निकलकर आईआईटी और आईआईएम के लोग दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियां चला रहे हैं, उन संस्थानों से निकले हुए हजारों दूसरे लोग देश के भीतर साइबर-ठगी को रोकने की तरकीबें क्यों नहीं निकाल सकते? आज हिन्दुस्तान के कम्प्यूटर विशेषज्ञ बनने वाले नौजवान दुनिया भर में जाकर कामयाबी पा रहे हैं, लेकिन अगर उनकी खूबियों से इस देश में ही साइबर-जुर्म नहीं रूक पा रहे, तो सरकार और जानकार के बीच एक फासले की वजह से ऐसा दिखता है। 

दूसरी तरफ भारत में सेक्स के भूखे बहुत से लोगों को जब किसी लडक़ी का संदेश मिलता है कि बाथरूम में पहुंचकर कपड़े उतारो, तो वे लार टपकाते हुए अपने कपड़े उतार देते हैं, और मोबाइल फोन पर कैमरे पर अपने को दिखाते हुए, और सामने किसी पेशेवर ठग लडक़ी को देखते हुए ब्लैकमेल होने का सामान बन जाते हैं। ऐसी ठगी के शिकार देश में हर दिन दसियों हजार लोग हो रहे हैं, और ब्लैकमेल की शिकायत करने वे पुलिस तक भी नहीं जाते क्योंकि उससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा खतरे में पड़ सकती है। यह तरीका इतना आम हो चुका है, और इतनी अधिक घटनाएं छप चुकी हैं कि कोई बहुत ही मूढ़ और मूर्ख समाज ही ऐसे झांसे में आ सकता है, लेकिन हिन्दुस्तानी मर्द के दिल-दिमाग में सेक्स की भूख इतनी बैठी रहती है कि महिला का बदन देखते ही वे मानो सम्मोहन का शिकार होकर उसके आदेश पर कपड़े उतार फेंकते हैं। लेकिन अधिक हैरानी इसलिए नहीं होती है कि जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने कहा है कि 90 फीसदी हिन्दुस्तानी बेवकूफ होते हैं, और अब वे 90 फीसदी लोग यह साबित करने में लगे हुए हैं कि वे वेबकूफ भी हैं।

ठगी के कुछ ऐसे बहुत प्रचलित और बहुत छप चुके तरीके भी जब रोके नहीं जा सक रहे हैं, तो हैरानी होती है कि सरकार की इंटरनेट और साइबर सुरक्षा क्या बिल्कुल ही बेअसर है? होना तो यह चाहिए कि कुछ शब्दों को लेकर भारत में सरकारी एजेंसियां निगरानी करती रहें, और आतंक की धमकी या किसी तरह के आर्थिक फ्रॉड का रूख दिखते ही और बारीक जांच की जाए, और मुजरिमों को पकड़ा जाए। कुछ अरसा पहले टेलीफोन फ्रॉड के एक मामले में जब सरकारी एजेंसियों ने जांच की थी, तो बंगाल में एक व्यक्ति के पास 25 हजार सिमकार्ड मिले थे। जब एक-एक सिमकार्ड के लिए कई तरह के पहचान पत्र लगते हैं, आधार कार्ड लगता है, अंगूठे का निशान लिया जाता है, तो फिर इतने सिमकार्ड कैसे बन जाते हैं? लेकिन ठगों के जाल को तोडऩे के लिए सरकारी एजेंसियां समय रहते कुछ नहीं कर पाती हैं, और जब लोगों के खाते खाली हो चुके रहते हैं, उनकी अश्लील फिल्में बन चुकी रहती हैं, तब जाकर सरकार कुछ मुजरिमों तक पहुंचती है। भारत में सरकार ने खुद ही जितने तरह के काम को डिजिटल करवाया है, उसे देखते हुए सरकार को ही सारे डिजिटल ट्रैफिक पर जुर्म रोकने के तरीके निकालने चाहिए, जो कि लोगों को उनकी निजता भंग किए बिना भी बचा सके। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जनवरी 2024



 

कुछ उन्मादी शब्द दिला सकते हैं कई बरस कैद

 25 जनवरी 2024  

  

सोशल मीडिया पर धर्म से जुड़ी हुई कुछ आपत्तिजनक, भडक़ाऊ, या किसी धर्म के प्रति अपमानजनक पोस्ट का एक नया सैलाब सामने आया है। इसमें कई धर्मों के लोग शामिल दिख रहे हैं, और बहुत सी जगहों पर बड़ा सार्वजनिक तनाव भी इनको लेकर हुआ है, कुछ लोगों की गिरफ्तारियां भी हुई हैं, और कम से कम एक मामले में एक नाबालिग को भी पकड़ा गया है। दरअसल हिन्दुस्तान में जब कभी धार्मिक भावनाओं का सैलाब आता है, या कोई धार्मिक उन्माद आता है, तो उसकी लहरें लोगों को बहाकर किसी दूसरे धर्म के खिलाफ भी ले जाती हैं, और फिर क्रिया की प्रतिक्रिया होने लगती है, और कई समुदायों के सबसे हिंसक और साम्प्रदायिक लोग अधिक सक्रिय हो जाते हैं, जाहिर तौर पर उनको यह अहसास रहता है कि ऐसे मौके उनके अपने अस्तित्व के लिए जरूरी रहते हैं, अस्तित्व को बनाने के लिए, और फिर उसकी मौजूदगी को साबित करने के लिए। ऐसे माहौल में किसी संदेश वाले ग्रुप में कुछ डाल देना, या किसी सोशल मीडिया पेज पर कुछ पोस्ट कर देना बड़ा तनाव खड़ा कर रहा है।

लेकिन हम इससे जुड़ी हुई कुछ दूसरी चीजों को मिलाकर ही आज इस पर चर्चा करना चाहते हैं। आज दुनिया में कोई भी बड़ी कंपनी, या सरकार के किसी संवेदनशील ओहदे पर अगर किसी की नियुक्ति होनी है, तो बड़ी कंपनियां, या कि सरकारी एजेंसियां सबसे पहले ऐसे उम्मीदवारों के सोशल मीडिया अकाऊंट खंगालती हैं कि इस व्यक्ति की सोच क्या है, वह साम्प्रदायिकता, अश्लीलता, और नैतिकता के पैमानों पर कहां खड़ा होता है, या कहां खड़ी होती हैं। अब मिसाल के तौर पर दो दिन पहले की ही एक खबर है कि ब्रिटेन के नागरिक एक भारतवंशी नौजवान, आदित्य वर्मा को स्पेन की पुलिस ने गिरफ्तार करके एक अदालत में पेश किया है। यह नौजवान 2022 में अपने दोस्तों के साथ लंदन से छुट्टियां मनाने निकला था, और उसने दोस्तों के समूह में यह संदेश पोस्ट किया था कि वह तालिबान का एक सदस्य है, और वह इस उड़ान के दौरान विमान को विस्फोट से उड़ा देगा। लंदन एयरपोर्ट पर वाई-फाई नेटवर्क ने इस संदेश को पकड़ा, और इस विमान के उड़ते हुए इसके साथ स्पेन की वायुसेना के दो लड़ाकू जेट विमान भी पहुंच गए जो कि इसके सुरक्षित उतरने तक साथ रहे। यह नौजवान उस वक्त 18 बरस का था, और गिरफ्तारी के बाद उसने इसे एक मजाक बताया, और अदालत ने उसे जमानत पर रिहा किया। बाद में ब्रिटेन लौटने पर वहां की खुफिया एजेंसियों ने उससे पूछताछ की, और अब वह विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए भी स्पेन के मुकदमे और ब्रिटेन की जांच का सामना कर रहा है। ब्रिटिश एजेंसियों ने जब उसके फोन की जांच की, तो पाया कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाईयों के बारे में सर्च करते रहता है, और इस इलाके में इस्लामिक स्टेट के हमले की संभावनाओं के बारे में भी सर्च और रिसर्च करता है। दोस्तों को भेजे गए एक संदेश से अब हालत यह है कि स्पेन इस नौजवान से करीब एक करोड़ हर्जाना मांग रहा है, जो कि उसके विमानों पर खर्च हुआ था। इस मामले में अभी फैसला आने वाला है। अब यह सोचें कि ऐसे मामले में फंसा हुआ यह नौजवान ब्रिटेन से डिग्री लेकर भी निकलेगा, तो यह बात किसी भी कंपनी या सरकार में नौकरी पाते हुए आड़े आएगी।

देश या दुनिया में जहां कहीं भी लोग नफरत या मजाक में इस तरह की बातें लिखते हैं, भेजते हैं, या पोस्ट करते हैं, वे आत्मघाती काम करने के अलावा कुछ नहीं करते। इससे उनकी जिंदगी का एक स्थाई नुकसान हो जाता है, और जब यह मामला सार्वजनिक साम्प्रदायिक तनाव का सामान बनता है, तो ऐसे लोगों का अपने खुद के इलाके में रहना भी मुश्किल हो जाता है, न उन्हें लोग काम पर रखना चाहते, और न ही उनके साथ कारोबार करना चाहते। दुनिया के बहुत से देशों में इन बरसों में कट्टरपंथी ताकतों की सत्ता पर वापिसी हो रही है, और वे अपनी विचारधारा के मुताबिक कानूनों और उन पर अमल को अधिक कड़ा बनाते चल रहे हैं। पश्चिम के कई देश मतदाताओं का इस तरह का रूझान देख रहे हैं, और आज की तारीख में फिलीस्तीन पर इजराइल का जो हमला चल रहा है, उसके पीछे इजराइली सरकार की नई सोच भी कुछ हद तक जिम्मेदार है, और इजराइल के इतिहास की यह अब तक की सबसे कट्टरपंथी सरकार है। ऐसे में दुनिया के किसी एक देश में एक भडक़ाऊ सोच को आगे बढ़ाने वाले लोग दुनिया के दूसरे देशों में भी अछूत हो सकते हैं। किसी देश के वीजा के लिए, कहीं पर पढ़ाई में दाखिले के लिए, या नौकरी और कारोबार के लिए अर्जी देने पर तमाम चौकन्ने देश लोगों को सोशल मीडिया पर खंगाल डालते हैं, और इंटरनेट पर यह ढूंढ लेते हैं कि उनके बारे में कौन-कौन सी नकारात्मक खबरें मौजूद हैं। 

इसलिए हिंसक, भडक़ाऊ, साम्प्रदायिक, सोशल मीडिया पोस्ट या संदेश देश के कानून के शिकंजे में भी आ सकते हैं, और बाकी दुनिया भी ऐसे लोगों को हमेशा के लिए अछूत मान सकती है। जो पढ़े-लिखे, या समझदार, या शातिर लोग खुद अपने हाथों को साफ रखते हुए अपने समर्थकों, या भाड़े की भीड़ को नफरत और धर्मान्धता, या हिंसक धमकियां फैलाने के काम में झोंककर रखते हैं, वे अपने खुद के बच्चों को इस काम से दूर सुरक्षित रखते हैं। इसलिए आम लोगों को यह समझना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन और सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की गैरजिम्मेदारी दिखाते ही वे अपने भविष्य को भी बर्बाद करते हैं, उनका वर्तमान तो किसी पुलिस या जांच एजेंसी के हाथों अदालत तक पहुंचकर बर्बाद हो ही जाता है। अब यह सोचें कि साम्प्रदायिकता फैलाने वाले लोग अगर विदेशों में बसे हुए अपने बच्चों के पास जाना चाहें, और उन्हें वहां की सरकारें साम्प्रदायिकता की वजह से वीजा देने से मना कर दें, तो क्या वे ऐसे भविष्य की कीमत पर भी हिंसा और साम्प्रदायिकता फैलाना चाहते हैं? फिर लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि किसी देश-प्रदेश की सरकारें अगर उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं भी कर रही हैं, तो भी हो सकता है कि देश-प्रदेश की कोई अदालत किसी दिन अपनी जिम्मेदारी का अहसास करे, और सरकारी अनदेखी से परे जाकर सीधे इनके खिलाफ जुर्म दर्ज करवाए। इसलिए लोगों को तात्कालिक धार्मिक उन्माद पर सवार होकर हिंसक और नफरती बातें नहीं करना चाहिए। कुछ नेता तो ऐसा करके बच भी निकलते हैं क्योंकि उनके पास अदालत को गुमराह करने के लिए देश के सबसे महंगे वकील रहते हैं, लेकिन आम लोग कुछ लापरवाह शब्दों को पोस्ट करके, या किसी वीडियो पर कहकर अपनी जिंदगी के कई बरस जेल में गुजारने का खतरा मोल ले लेते हैं। लोगों को अपने बच्चों को भी ऐसे खतरों से आगाह करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जनवरी 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जनवरी 2024


 

टूटी चप्पलें, फटा कुर्ता, यह है अगला भारतरत्न

 24 जनवरी 2024  

  

बिहार के एक महान जनकल्याणकारी नेता कर्पूरी ठाकुर को उनकी 100वीं जयंती के मौके पर भारतरत्न देने की घोषणा ने मोदी सरकार को देश के पिछड़ों और अतिपिछड़ों के बीच एक वाहवाही तो दिलवा ही दी है, एक और बात उभरकर सामने आई है कि भारतीय राजनीति में ईमानदारी की एक अनोखी मिसाल का भी ऐसा सम्मान हो रहा है। बिहार में दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर वहां दशकों तक विधायक भी थे, और नाई समाज से आकर वे इतने बड़े नेता बने थे कि वैसी महानता बिहार की राजनीति में किसी और को हासिल नहीं हो पाई। जातिवाद से लदी हुई बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर की जाति की आबादी दो फीसदी से भी कम है, और ऐसे में वे बिहार के एक सर्वाधिक मान्य, और सर्वाधिक सम्मानित मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने सबसे कमजोर तबकों और गरीबों के लिए जनकल्याण की ऐसी योजनाएं शुरू कीं, जो कि न उनके पहले सुनाई पड़ी थी, न उनके बाद। मोदी सरकार का यह फैसला चुनावी नफे-नुकसान से परे उसे खुद एक सम्मान दिलाने वाला फैसला है क्योंकि 1988 में उनके गुजरने के बाद से आज तक इन 35 बरसों में किसी केन्द्र सरकार ने यह जहमत नहीं उठाई थी। इसके पीछे मोदी सरकार की चाहे जो राजनीतिक और चुनावी नीयत हो, इस फैसले से शायद ही कोई असहमति जाहिर कर सके। 

कर्पूरी ठाकुर के पिता बाल काटने का काम करते थे, और वे खुद मैट्रिक के बाद से स्वतंत्रता संग्राम में उतरे, 26 महीने जेल भुगती, और 1948 से वे राजनीति में आए, और 1970 में मुख्यमंत्री बने। सबसे कमजोर और सबसे गरीब लोगों की भलाई की उनकी सोच अद्भुत थी। उनका एक नारा अक्सर लिखा जाता है- सौ में नब्बे शोषित हैं, शोषितों ने ललकारा है, धन, धरती, और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है। उन्होंने बिहार में पिछड़ों और अतिपिछड़ों को आरक्षण दिया, सरकारी कामकाज में हिन्दी को बढ़ावा दिया, और यह मिसाल सामने रखी कि बिना कुनबापरस्ती के ईमानदार राजनीति कैसे की जा सकती है। उनके करीबी बताते हैं कि जब वे सीएम थे, और उनके रिश्ते के बहनोई जाकर किसी नौकरी की मांग करने लगे तो कर्पूरी ठाकुर ने जेब से 50 रूपए निकालकर उन्हें दिए, कहा कि उस्तरा वगैरह खरीद लीजिए, और अपना पुश्तैनी धंधा शुरू कीजिए। उनके सीएम रहते कुछ जमींदारों ने उनके पिता को सेवा के लिए बुलाया, और बीमार होने की वजह से वे नहीं जा पाए तो जमींदार के लठैतों ने जाकर उनके पिता को प्रताडि़त किया, लेकिन जब उन लठैतों को पकड़ा गया, तो कर्पूरी ठाकुर ने उन्हें यह कहकर छुड़वा दिया कि यह तो पूरे प्रदेश में कमजोर तबकों के साथ हो रहा है, और सभी जगह ऐसी ज्यादती के खिलाफ अभियान चलाना चाहिए, सिर्फ सीएम के पिता के खिलाफ जुर्म रोकने से क्या होगा। बिहार के लोग बताते हैं कि दो बार सीएम रहने के बाद भी कर्पूरी ठाकुर रिक्शे से चलते थे क्योंकि कार खरीदने, और चलाने का खर्च उनकी सीमा के बाहर था। वे शायद देश के गिने-चुने ऐसे नेताओं में से होंगे जिन्होंने दशकों की विधायकी, और प्रदेश के मुखिया रहने के बाद भी मरते वक्त अपने परिवार के लिए न एक घर छोड़ा था, न पिता के घर में एक इंच जमीन जोड़ी थी। 

समता और सामाजिक न्याय की सोच के उनके बहुत से उदाहरण बिहार में याद रखे जाते हैं, और देश के राजनीतिक इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। शायद यही वजह रही कि 1952 में पहली बार विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद वे कभी चुनाव नहीं हारे। उनकी पहल से बिहार में मिशनरी स्कूलों ने हिन्दी में पढ़ाना शुरू किया, और उन्होंने राज्य में मैट्रिक तक मुफ्त पढ़ाई का इंतजाम किया। बीबीसी की एक रिपोर्ट जानकारी देती है कि उन्होंने बिना मुनाफे वाली जमीन पर किसानों से मालगुजारी लेना बंद करवाया। और मुख्यमंत्री सचिवालय की लिफ्ट में चतुर्थ वर्ग कर्मचारियों को चढऩे की मनाही थी, कर्पूरी ठाकुर ने उसे शुरू करवाया। वे एक सच्चे समाजवादी की तरह अंतरजातीय विवाह के हिमायती थे, और जहां खबर लगती थी उसमें शामिल होते थे। राज्य कर्मचारियों के लिए समान वेतन आयोग को उन्होंने लागू किया था, और जनकल्याण के, सबसे कमजोर तबके की भलाई के बहुत से कार्यक्रम उन्होंने लागू किए, या उसके लिए विपक्ष से आंदोलन करते रहे। 

उनकी सादगी और गरीबी का हाल यह था कि एक प्रतिनिधि मंडल ने उन्हें ऑस्ट्रिया जाना था तो उनके पास कोट ही नहीं था, एक दोस्त से लिया तो वह फटा हुआ था। यह किताबों में दर्ज है कि वहां से भारतीय दल यूगोस्लाविया गया तो मार्शल टीटो ने देखा कि उनका कोट फटा है, तो उन्हें एक कोट भेंट किया। एक दूसरा लेख यह भी बताता है कि कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद हेमवंती नंदन बहुगुणा उनके गांव गए थे, तो उनकी पुश्तैनी झोपड़ी देखकर रो पड़े थे। दशकों की सत्ता और विधायकी के बाद भी उन्होंने एक घर तक नहीं बनवाया था, जब सरकार ने विधायकों और पूर्व विधायकों को रियायती जमीन दी, तो भी उन्होंने इसे लेने से इंकार कर दिया। बेटी की शादी में उन्होंने किसी मंत्री को नहीं बुलाया था, और आने से सबको मना भी कर दिया था। उनके बारे में एक घटना लिखने लायक है कि 1977 में वे जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन पर अपनी आम टूटी चप्पल, और फटे कुर्ते में ही पहुंच गए थे, तो चन्द्रशेखर ने अपना कुर्ता फैलाकर सभी नेताओं से कर्पूरी ठाकुर के कुर्ते के लिए दान मांगा, उसे देते हुए चन्द्रशेखर ने सीएम को कहा कि इससे धोती-कुर्ता खरीद लीजिए, तो उन्होंने वह रकम मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कर दी। 

हम अपने विचारों वाले इस कॉलम, संपादकीय में अपनी किसी राय के बिना सिर्फ कर्पूरी ठाकुर की जीवनगाथा के कुछ हिस्से सामने रखकर उसे ही अपने विचार मान रहे हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम अपने आसपास भी सरकार के नेताओं और अफसरों से जिस तरह की सादगी और किफायत की अपील बार-बार करते हैं, उसकी एक बहुत बड़ी मिसाल कर्पूरी ठाकुर की जिंदगी की कहानी में दिख रही है। उनके लिए भारतरत्न की घोषणा के इस मौके पर उनकी जिंदगी को याद करना चाहिए, और जो लोग भी उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, उन्हें सादगी, किफायत, और ईमानदारी की उनकी मिसाल पर भी सोचना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जनवरी 2024


 

किसी कार्यक्रम की भीड़ बढ़ाने स्कूली बच्चों को झोंकना गलत

 23 जनवरी 2024  

   

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज शहर के बीच जयस्तंभ चौक पर सरकारी स्कूलों के छात्र-छात्राओं को सुबह 8 बजे पहुंचने का आदेश दिया गया था, और वहां पहुंचे सैकड़ों ऐसे बच्चों को बताया गया था कि नेताजी सुभाष जयंती का आयोजन होने जा रहा है। लेकिन आज की भीगी हुई सुबह में ठंड में जब बच्चे यहां पहुंचे, तो आयोजक संस्था छत्तीसगढ़ युवा संगठन, और नगर निगम के कोई लोग वहां नहीं थे। बच्चे चौराहे पर खड़े हुए थे, और उनके साथ के शिक्षकों ने घंटे भर बाद जब आयोजकों को फोन लगाया तो उन्होंने कुछ देर में आने की बात कही। अब यहां आए हुए बच्चे कई किलोमीटर दूर से पहुंचे थे, और जिला शिक्षा अधिकारी के लिखित आदेश की वजह से स्कूलों के प्राचार्य ने गंभीरता से समय पर बच्चों के वहां पहुंचने की ड्यूटी शिक्षक-शिक्षिकाओं की लगाई थी। घंटे भर बाद जब यह कार्यक्रम शुरू हुआ तो बच्चों को रेलवे स्टेशन की सुभाष प्रतिमा पर ले जाया गया। 

पहले स्कूली बच्चों को मंत्रियों के स्वागत में कतार बनाकर खड़ा कर दिया जाता था, और देश भर से खबरें आती थीं कि धूप में या खड़े-खड़े थकान में बच्चे चक्कर खाकर गिर जाते थे। बाद में बड़ी अदालतों के हुक्म से यह सिलसिला तकरीबन थम गया है, लेकिन अभी भी कहीं-कहीं घोषित और अघोषित रूप से बच्चों का ऐसा इस्तेमाल कर लिया जाता है। एक तरफ स्कूलों के शिक्षकों से जनगणना से लेकर चुनावी काम तक, दर्जनों किस्म के सरकारी काम करवाए जाते हैं, और सरकार के आयोजनों में चाहे मंत्री के स्वागत के लिए न सही, लेकिन इस किस्म की किसी रैली के लिए, किसी आयोजन के लिए स्कूली बच्चों की भीड़ इसी तरह की चिट्ठी से भेज दी जाती है कि हर स्कूल से सौ बच्चों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए, फिर चाहे आयोजक खुद ही गायब रहें। 

यह मामला बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन राज्य शासन और नगर निगम दोनों को अपने संबंधित विभागों के कामकाज को परखने का एक मौका इससे मिल रहा है। कैसे किसी सामाजिक संगठन के साथ मिलकर नगर निगम ऐसा कार्यक्रम कर रहा है जिसमें सैकड़ों बच्चों को सुबह-सुबह जुटा लिया गया है, और आयोजक ही नदारद हैं। राज्य शासन के शिक्षा विभाग को भी देखना चाहिए कि उसके अफसरों ने ऐसे गैरजिम्मेदार आयोजकों के कार्यक्रम में बच्चों को क्यों भेजा? अगर नेताजी सुभाष जयंती ही मनानी थी, तो स्कूली बच्चे अपने स्कूल में मना सकते थे, सडक़ों पर उन्हें रैली में भेजना, घंटों इंतजार करवाना, कई किलोमीटर पैदल चलवाना, और घर से आने-जाने का निजी इंतजाम करना, यह सब मध्यमवर्गीय या गरीब छात्र-छात्राओं पर भारी पडऩे वाला काम है। हमारा ख्याल है कि स्कूली बच्चों को सिर्फ ऐसे आयोजन में शामिल करना चाहिए जो कि किसी सुरक्षित और सुविधाजनक मैदान में पर्याप्त इंतजाम के साथ हो रहे हों, या किसी सभागृह या स्कूल के अहाते में। इस बात की कल्पना आसान है कि कई घंटों के इस इंतजार और कार्यक्रम में, और कई किलोमीटर आने-जाने, और पैदल चलने में स्कूली छात्राओं को अगर किसी शौचालय की जरूरत पड़ेगी, तो उसका तो कोई इंतजाम इस शहर में नहीं है। अभी दो दिन पहले ही एक अखबार ने यह रिपोर्ट छापी है कि किस तरह शहर के सार्वजनिक शौचालय बंद या खराब पड़े हैं, या बहुत बुरी तरह गंदे पड़े हैं। ऐसे में छात्राओं को चौराहे पर जुटाना, और सडक़ों पर घुमाना ठीक बात नहीं है। 

प्रदेश के शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अभी-अभी इन्हीं स्कूलों में से एक स्कूल की छात्राओं के आने-जाने का बंद किया हुआ एक रास्ता खुलवाया है, और वे खुद इसी शहर की आम स्कूलों में पढ़े हुए हैं। उन्हें व्यक्तिगत दिलचस्पी लेकर बच्चों का ऐसा इस्तेमाल बंद करना चाहिए जो कि किसी प्रतिमा पर होने वाले समारोह में भीड़ बढ़ाने की नीयत से किया गया है। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के बारे में किसी भी स्कूल के शिक्षक और बच्चे अपने स्कूल में ही आधे-एक घंटे में पर्याप्त बोल-सुन सकते थे, उन्हें अगर महापुरूषों की प्रतिमाओं पर इस तरह ले जाना चलते रहा, तो साल में उनके दस-बीस दिन इसी में निकल जाएंगे। किसी महान व्यक्ति के सम्मान का यह तरीका ठीक नहीं है कि भीड़ बढ़ाने के लिए बच्चों के घंटों बर्बाद किए जाएं, और उनकी असुविधा के बारे में सोचा भी नहीं जाए। दिखने में छोटी लगने वाली यह बात अफसरों का बच्चों के प्रति रूख बताती है, और यह बात तो सार्वजनिक रूप से दिखने पर हमारे ध्यान में आई है, लेकिन अफसरों की सोच अगर ऐसी ही है, तो वह बच्चों से जुड़े हुए दूसरे मामलों में भी सामने आती होगी। स्कूल शिक्षा मंत्री को पूरे प्रदेश के स्कूलों, खासकर कन्या विद्यालयों की जांच करवानी चाहिए कि वहां लड़कियों के लिए शौचालय का पर्याप्त और ठीक-ठाक इंतजाम है या नहीं, लड़कियों की खास जरूरतों के लिए पानी का इंतजाम है या नहीं। 

राजधानी के नगर निगम को भी अपने अफसरों के फैसले और कामकाज को जांचना चाहिए कि जब स्कूली बच्चों को कई किलोमीटर दूर से सुबह-सुबह बुला लिया गया, तो उस वक्त के पहले वहां पर म्युनिसिपल के अफसर, और आयोजक संस्था के लोग मौजूद क्यों नहीं थे, और खासकर छात्राओं के लिए जरूरत के क्या इंतजाम इन लोगों ने किए थे? स्कूली बच्चों को किसी भी कार्यक्रम में झोंकने के पहले यह देखने की जरूरत है कि इससे उनके पढ़ाई के कितने घंटे खराब होने जा रहे हैं, और ऐसे आयोजन में शामिल होना उन बच्चों के हित में है, या महज आयोजकों को भीड़ बढ़ाकर दी जा रही है? राज्य में बच्चों के कल्याण के लिए प्रदेश स्तर की एक परिषद बनी हुई है, और उसे भी न सिर्फ इस घटना को लेकर, बल्कि ऐसे तमाम कार्यक्रमों को लेकर एक अध्ययन करना चाहिए कि कौन से आयोजन स्कूली बच्चों के हित में हैं, और बाकी तमाम किस्म के कार्यक्रमों का विरोध करना चाहिए। वैसे भी इस प्रदेश में छुट्टियां बहुत हैं, पढ़ाई कम होती है, पूरे देश में ही स्कूल शिक्षा का स्तर बहुत ही खराब है, अभी चार-छह दिन पहले की इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बतलाती है कि किस तरह बड़े-बड़े हो चुके स्कूली बच्चे भी बुनियादी बातें भी नहीं पढ़ पा रहे हैं। स्कूली बच्चों को सिर्फ संख्या की तरह गिनना और इस्तेमाल करना ठीक नहीं है, और देश-प्रदेश की सरकारों को इन बच्चों के समय का इस्तेमाल करते हुए बहुत ही सावधान रहना चाहिए, और विशेषज्ञों से सलाह-मशविरे के बिना बच्चों पर कुछ भी नहीं लादना चाहिए। एक अफसर जिस तरह चिट्ठी लिखकर सरकारी स्कूलों के प्राचार्यों से सौ-सौ बच्चों को तय समय पर किसी जगह भेजने को सुनिश्चित करने को कह रहा है, वह अपने आपमें फिक्र की बात है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जनवरी 2024


 

धार्मिक एकजुटता और ताकत की सामाजिक उपयोगिता भी जरूरी है

  22 जनवरी 2024  

  

अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के मौके पर पिछले कई दिनों से देश के बहुत से हिस्सों में जो अभूतपूर्व और असाधारण उत्साह बहुसंख्यक हिन्दू तबके में देखने मिल रहा है, उससे एक यह संभावना भी बनती है कि धर्म के नाम पर इतने लोग एकजुट हो सकते हैं। अब सवाल यह है कि धार्मिक आस्था को आस्थावान लोगों का खुद का भला कर सकती है, लेकिन उससे देश और समाज का भी कुछ भला किया जा सकता है? आज भारत से बहुत से धर्मों के लोग अपने त्यौहारों के मौकों पर सडक़ किनारे भंडारे लगा लेते हैं, जिन पर आते-जाते लोग रूककर छककर खा लेते हैं। कई त्यौहार ऐसे भी रहते हैं जिन पर इतने अधिक भंडारे लगते हैं कि लोगों को कई जगहों पर रूककर खाना पड़ता है। लेकिन क्या उससे सचमुच ही किसी गरीब का कुछ भला होता है? जो भूख मिटती है, क्या वह किसी गरीब की भूख रहती है, या फिर मोटरसाइकिलों को रोक-रोककर लोग खाने में जुट जाते हैं। धर्म में लोगों को जोडऩे की, और दान-धर्म के नाम पर लोगों की जेब से पैसे निकलवाने की भी अपार ताकत है, लेकिन इस ताकत का इस्तेमाल किस काम में किया जाता है, यह देखने की बात है। 

आज सडक़ों पर हो रहे आयोजनों से लेकर अखबारों के इश्तहारों तक लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा है। चारों तरफ राम जन्म भूमि और रामलला के पोस्टर लगे हैं, झंडे फहरा रहे हैं, और लोग अपनी गाडिय़ों पर ऐसे झंडे लगाकर चारों तरफ घूम रहे हैं। लेकिन उत्सव से परे इसकी कोई उपयोगिता समाज के लिए नहीं है। लेकिन ऐसी संभावना तो है ही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के मंदिरों की साफ-सफाई का आव्हान किया, तो चारों तरफ मंदिर साफ होते दिखने लगे। लेकिन जब किसी ईश्वर की पूजा-आराधना की बात उठती है, तो महज मंदिर-मस्जिद जैसी जगहें ही ईश्वर से जुड़ी नहीं रहतीं, जिन लोगों को ईश्वर पर आस्था है, वे तो यही मानते हैं कि पूरी दुनिया ईश्वर की बनाई हुई है, और ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। ऐसे में सिर्फ पूजास्थल की सफाई क्यों हो? और दूसरी सार्वजनिक जगहों की भी सफाई हो सकती है, और होनी चाहिए। आज जितने लोग धार्मिक उत्सव के लिए समय निकालकर उस पर समर्पित हैं, उनके पास ऐसा वक्त निकलने की गुंजाइश तो है ही। अब सवाल यह है कि मोदी सरीखे असर वाले कोई नेता, या दूसरे धार्मिक लोग भक्तों के ऐसे रेले को समाजसेवा के जरूरी काम की तरफ किस तरह मोड़ सकते हैं? 

हमने कई धर्मों के लोगों को धर्म के नाम पर एकजुट होते, और फिर नेक काम करते भी देखा है। सिक्खों के संगठन दुनिया में कहीं भी कोई मुसीबत आने पर लोगों की मदद को सबसे आगे रहते हैं, और इसमें बहुत कम ऐसे मौके रहते हैं जब सिक्ख खतरे में पड़े हों, आमतौर पर सिक्ख संगठनों की मदद दूसरे धर्मों के लोगों को ही पहुंचती है। दक्षिण भारत में तिरुपति जैसे मंदिर है जहां पर भक्तों को दर्शन तेजी से करने के लिए कुछ अधिक भुगतान करना पड़ता है, लेकिन मंदिर ट्रस्ट ऐसी कमाई का इस्तेमाल अस्पताल और कॉलेज बनाने और चलाने में करता है। कुछ और धर्मों में भी लोग दान करते हैं, लेकिन उनका दान अपने ही धर्म के लोगों तक सीमित रहता है। हम रामभक्तों की अपार भीड़ की ताकत को समाज की व्यापक जरूरत के लिए इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर देखना चाहते हैं। भारत जैसे लोकतंत्र में धर्म एक हकीकत है, और उसके नाम पर होने वाली एकजुटता में बड़ी ताकत हो सकती है। कभी यह ताकत किसी दूसरे धर्म के खिलाफ होती है, तो कभी अपने ही लोगों के बीच कट्टरता को बढ़ाने में काम आती है। ऐसी खामियों से परे कई धार्मिक संगठनों को क्षेत्रीय विकास में बड़ी भागीदारी भी करते देखा गया है। दक्षिण में सत्य सांई बाबा का संगठन कई इलाकों में ग्रामीण विकास और पानी की सप्लाई जैसा काम करता था, और पूरी तरह मुफ्त में बच्चों की हार्ट सर्जरी के अस्पताल भी यह धार्मिक-आध्यात्मिक संगठन चलाता है।

हमारा ख्याल है कि हिन्दुओं के बीच जिन लोगों का असर है, उन्हें देश के दसियों करोड़ आस्थावान लोगों को साथ लेकर समाज की कुछ जरूरतों को पूरा करने का बीड़ा उठाना चाहिए। किसी भी धर्म का सम्मान उसके ईश्वर से नहीं बढ़ता, बल्कि इससे बढ़ता है कि उसे मानने वाले लोग कैसे हैं, और वे क्या करते हैं। धार्मिक ग्रंथ तो अपनी जगह रखे रह जाते हैं, लेकिन उनके नाम पर लोग कैसा काम करते हैं इससे उस धर्म और उसके ईश्वर का सम्मान तय होता है। इसलिए भी हर धर्म के लोगों को यह देखना चाहिए कि वे धर्मों की आम नसीहत के तहत जरूरतमंद लोगों का क्या भला कर सकते हैं? बहुत से धर्म लोगों को त्याग सिखाते हैं, जरूरतमंदों के लिए दान देना सिखाते हैं, लेकिन अधिकतर धर्मों के अतिसंपन्न लोग त्याग की यह सोच गरीबों में तो भरते हैं, खुद उस पर अमल नहीं करते। इसलिए जिस धर्म के लोगों पर जिन लोगों का असर हो, उन्हें ऐसे आस्थावानों को समाजसेवा के काम में जोडऩा चाहिए, क्योंकि आस्था और उपासना तो साथ-साथ चल ही सकते हैं। 

हम जानते हैं कि इस बात को कहना आसान है, और करना मुश्किल है, लेकिन इसकी छोटी सी मिसाल का जिक्र हम पहले भी कभी कर चुके हैं कि श्रीलंका में बौद्ध धर्म के असर से लोगों के बीच त्याग की जो भावना आई है, उसके चलते श्रीलंका नेत्रदान के मामले में दुनिया में सबसे आगे है, और वहां घरेलू जरूरतों के पूरा होने के बाद दुनिया के बाकी देशों को भी श्रीलंका से निकली आंखें काम आती हैं। भारत में भी धर्म के सामाजिक योगदान की कोशिश करनी चाहिए। इस देश में बहुत से मोर्चों पर त्यागियों और दानदाताओं की जरूरत है, और शायद धर्म के नाम पर उनकी जेब से आसानी से कुछ निकाला जा सके। 

(Daily Chhattisgarh)

लोकतंत्र में धर्म और राजनीति का अद्‌भुत मेल, राम मंदिर..

 21 जनवरी, 2024 

 

अयोध्या में कल रामलला के नए बने हुए मंदिर में रामलला की नई प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा होने जा रही है। देश के बहुत बड़े हिस्से में एक अभूतपूर्व और असाधारण हिन्दू धार्मिक आस्था का नजारा हो रहा है, और चूंकि अधिकतर हिन्दू संगठन भाजपा के साथ जुड़े हुए हैं, और अभी-अभी तीन राज्यों में भाजपा ने शानदार चुनावी कामयाबी हासिल की है, इसलिए भी उत्साह सामान्य से बहुत अधिक है। इसके अलावा कुछ महीनों के भीतर लोकसभा के चुनाव होने हैं, और उनमें सबसे अधिक चर्चित, कामयाब, और संभावनाओं वाले नेता नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद पर दस बरस भी पूरे होने को होंगे, इसलिए उनकी पार्टी की केन्द्र और राज्य सरकारों का भी बड़ा उत्साह 22 जनवरी की रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर है। एक किस्म से यह भी माना जा सकता है कि कल मोदी के लोकसभा चुनाव प्रचार की शुरूआत होने जा रही है, और इसके बाद से वह लगातार अयोध्या से जुड़ी हुई बहुत से प्रतीकों को लेकर देश भर में फैलते चले जाएगा। चुनाव के पहले भाजपा और एनडीए के मुकाबले इंडिया नाम का जो गठबंधन खड़ा हुआ है, वह अपनी आंतरिक विसंगतियों से तो अनिश्चय और अनिश्चित भविष्य दोनों का शिकार है ही, अयोध्या के इस मौके पर इस गठबंधन में पार्टियों के बीच गहरी दरारें देखने मिली हैं, और इस मौके पर इंडिया-गठबंधन की पार्टियों में एक राय होना तो दूर रहा, इसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी के भीतर भी इस पर एक राय नहीं है। पार्टी ने औपचारिक रूप से जिस तरह अयोध्या ट्रस्ट के भेजे हुए न्यौते को नामंजूर किया है, उससे पार्टी के ही बहुत से नेता हक्का-बक्का हैं कि कांग्रेस क्या सचमुच इस प्राण-प्रतिष्ठा के बाद, इसके न्यौते को नामंजूर करके चुनाव मैदान में बने रहने की उम्मीद करती है? 

अयोध्या के राम मंदिर का मामला कभी भी विशुद्ध धार्मिक मामला नहीं रहा, और जब से लालकृष्ण अडवानी ने इसके लिए 90 के दशक में रथयात्रा निकाली थी, तब से लेकर अब तक यह धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक, और इन सबके भी ऊपर अदालती मामला बने रहा। जाने कितने दशक की कानूनी लड़ाई के बाद हिन्दू समाज के अलग-अलग बहुत से लोगों और संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट से एक सर्वसम्मत फैसला पाया, और उसी के नतीजे की शक्ल में यह मंदिर पूरा होने जा रहा है। चूंकि देश की सबसे बड़ी अदालत इस पर सर्वसम्मत फैसला दे चुकी है, इसलिए हम उसके पहले जाना नहीं चाहते, और कांग्रेस जैसी कई पार्टियां इस हकीकत तक पहुंचना नहीं चाहतीं कि हिन्दू संगठनों ने भाजपा के साथ मिलकर ही राम मंदिर की लड़ाई लड़ी थी, और अब जब मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हो रही है, तो जाहिर तौर पर भाजपा ही मंदिर ट्रस्ट के दिल के करीब रहेगी। ऐसे में भाजपा के आज के सबसे बड़े नेता नरेन्द्र मोदी को अगर इस प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया है, और वे अपनी सहज शैली के मुताबिक इस मौके को कई दिनों के समारोह में तब्दील कर चुके हैं, प्राण-प्रतिष्ठा के पहले दक्षिण के कई मंदिरों में जाकर रामकथा में दर्ज इतिहास की जगहों पर घूम रहे हैं, तो इसमें न कुछ अनैतिक है, और न ही यह किसी कानून का बेजा इस्तेमाल है। लोकतंत्र में हर किसी पार्टी या संगठन को इस बात की आजादी है कि वे कानून के दायरे में अपनी पसंद के लोगों को जोड़ें, और चुनाव आचार संहिता से परे आयोजन करें। राम मंदिर ट्रस्ट ने देश की बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेताओं को भी न्यौता भेजा है, और देश के बड़े-बड़े कामयाब और मशहूर लोगों को भी। अब यह इनका निजी फैसला रहेगा कि ये इस आयोजन में पहुंचते हैं या नहीं। कांग्रेस ने जब इस न्यौते को नामंजूर किया था, उस दिन भी हमने उसके इस रूख के खिलाफ कहा था। आज कई दिन गुजर जाने के बाद भी हमारी यही सोच कायम है कि जिस पार्टी को जनता के बीच जाकर वोट मांगने होते हैं, वह पार्टी एक सैद्धांतिक कट्टरता पर अड़ी नहीं रह सकती, सिद्धांत अपनी जगह बने रह सकते हैं, और देश की संस्कृति के हिसाब से व्यवहार में एक लचीलापन भी रह सकता है। कांग्रेस पार्टी ने बिना किसी वजह के वह लचीलापन खो दिया है, और एक गैरराजनीतिक ट्रस्ट को अदालत से मिले फैसले के बाद हो रहे इस आयोजन का न्यौता नामंजूर करके पार्टी ने जो अडिय़ल रूख दिखाया है, वह भला किसी का नहीं कर रहा, इस पार्टी का बुरा जरूर करने जा रहा है। 

अयोध्या के इस राम मंदिर की बुनियाद में बड़ा लंबा इतिहास दफन है, उसमें आजादी के पहले का सैकड़ों बरस का इतिहास भी है, और आजादी के बाद का बाबरी मस्जिद गिराने से लेकर अदालती फैसले से राम मंदिर बनाने तक का ताजा इतिहास भी सामने है। इन 30 बरसों में देश, और अयोध्या वाले उत्तरप्रदेश में कई तरह की सोच की सरकारें रहीं, अयोध्या का मामला अदालतों में चलते हुए कई जज भी बदले, और जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस पर जितनी लंबी सुनवाई हुई है, उससे अधिक कुछ भी एक लोकतंत्र की न्यायपालिका में मुमकिन नहीं था। इसलिए अब जब अदालती फैसले और जनता के पैसों से राम मंदिर बना है, तो उसे राजनीतिक मानना सही नहीं है। यूं तो लोकतंत्र के हर काम से राजनीति जुड़ी रहती है, लेकिन जहां इतनी लंबी अदालती प्रक्रिया ने, और दानदाताओं ने इस मंदिर को हकीकत बनाया है, तो फिर इसे महज राजनीति कह देना लोकतंत्र के बाकी दायरों और पहलुओं की अनदेखी करना है। अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा का समारोह कोई मनाए या न मनाए, यह उनका अपना फैसला है, और प्रधानमंत्री की हैसियत से अगर नरेन्द्र मोदी को मंदिर ट्रस्ट ने मुख्य अतिथि बनाया है, तो यह ट्रस्ट और पीएम का आपसी फैसला है। इससे जिसको जो चुनावी नफा-नुकसान होना है, वे खुद उसके लिए जिम्मेदार हैं। जिन पार्टियों को चुनावी नुकसान झेलकर भी प्राण-प्रतिष्ठा के इस समारोह से परे रहना है, यह उनकी अपनी सोच, और उनकी अपनी आजादी है। भारतीय लोकतंत्र में यह बहुसंख्यक हिन्दू जनता के धार्मिक पुनर्जागरण का ऐतिहासिक मौका है, इसे इससे कम आंकना गलत होगा। देश के चारों शंकराचार्यों ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का अलग-अलग कारणों से विरोध किया है, लेकिन सबके विरोध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक निशाना हैं। इसे देखते हुए सोशल मीडिया पर किसी ने एक मजेदार बात लिखी है कि भारत में धर्म और राजनीति का मेल इतना गहरा हो गया है कि आज प्रधानमंत्री देश के सबसे बड़े धर्मगुरू दिख रहे हैं, और चारों सबसे बड़े धर्मगुरू विपक्षी नेता दिख रहे हैं! 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जनवरी 2024



 

कहानी फिल्मी तो है, लेकिन ऐसे कत्ल को समझना जरूरी

 21 जनवरी 2024  

  

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक ऐसा गजब का हत्याकांड सामने आया है जिसमें एक महिला ने अपने पति की बीमारी और नशे की लत से तंग आकर एक फिल्मी कहानी की तरह उसका कत्ल कर दिया। इसके लिए उसने पति के इलाज के दौरान अस्पताल में दोस्त बने एक कर्मचारी को साथ लिया, और अपने कुछ दूसरे दोस्त, सहेली, पड़ोसी को भी। इसके बाद इन लोगों ने अस्पताल से चुराई गई बेहोश करने की दवा नशे में सोए पति के बदन में इंजेक्शन से डाली, और उसे मार डाला। बदन पर कई जगह इंजेक्शनों के निशानों से शक खड़ा हुआ, और पुलिस ने इस हत्या का भांडाफोड़ किया। खबर के मुताबिक यह पत्नी कुल 22 बरस की है, और उसकी शादी 15 साल की उम्र में हो गई थी, और लगातार पति के नशे से वह परेशान थी। 

हत्या के तरीके से परे भी इसके जो दूसरे पहलू हैं उस पर हम लिखना चाह रहे हैं कि किस तरह कम उम्र में समय के पहले कर दी गई शादी का नतीजा इतना बुरा हो सकता है कि वह मरने-मारने तक पहुंच जाए। 15 बरस की लडक़ी भारतीय समाज में शादी के बाद पति के नशे पर काबू कर सके, इसकी कोई गुंजाइश नहीं रहती। कम उम्र में ही बच्चे हो जाने पर महिला उन बच्चों के बोझ से भी लदी रहती है, और पति की लत से भी। ऐसे में परिवार को चलाना ही एक चुनौती रहती है, और आम हिन्दुस्तानी लडक़ी या महिला इसी में दबी रह जाती हैं। साथ-साथ तब नौबत और अधिक खराब हो जाती है जब ऐसी शादीशुदा युवती आर्थिक आत्मनिर्भर नहीं रहती, और परिवार का पेट भरना नशे के आदी पति का मोहताज रहता है। आज जिस तरह भारतीय समाज में लडक़ी और महिलाओं को घर से बाहर निकलने का मौका मिल रहा है, मोबाइल और सोशल मीडिया की मेहरबानी से उसके भी संपर्क बाहर हो पा रहे हैं, इसलिए वह ऐसी नर्क सरीखी जिंदगी से उबरने के कुछ कानूनी और कुछ गैरकानूनी रास्ते भी देखने लगी है। कहीं पर वह तलाक लेकर, या बिना तलाक लिए अलग रहने का हौसला जुटा पाती है, तो कहीं वह हिंसा पर उतरकर अकेले या कुछ लोगों की मदद से ऐसे गैरजिम्मेदार, या किसी किस्म के हिंसक पति को निपटा भी देती है। पाठकों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले हमने ऐसे कुछ दूसरे मामलों को लेकर अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर उज्जैन में एक महिला के हाथों पति और जेठ के मारे जाने पर एक वीडिटोरियल भी पोस्ट किया था। 

लेकिन इस बार कत्ल करने का जो तरीका छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की इस महिला ने अपने अस्पताल-कर्मचारी दोस्त के साथ मिलकर इस्तेमाल किया है, वह बिना खून बहाए मौत को प्राकृतिक और स्वाभाविक दिखाने की एक बिल्कुल अनोखी साजिश थी, और यह एक भयानक सिलसिला है क्योंकि बेहोशी की ऐसी दवा जुटा लेना कोई दुर्लभ काम नहीं है। किसी फिल्म या अपराधकथा की तरह यह कत्ल अपने इस तरीके से परे भी एक और बात की तरफ ध्यान खींचता है। अस्पताल कर्मचारी तो इस महिला का दोस्त या प्रेमी था, लेकिन इसके एक सहेली, इसका एक पड़ोसी, ऐसे कई और लोग हत्या के इस जुर्म में भागीदार बन गए थे, और इन सबने कहीं न कहीं तो यह पढ़ा होगा कि हत्यारों को आखिर जेल जाना पड़ता है, कैद काटनी पड़ती है। लोग किसी की मदद करते हुए अपने आपकी बाकी जिंदगी को इस तरह और इस कदर खतरे में कैसे डाल लेते हैं, यह हमारी समझ से परे है। हो सके तो सरकार या समाज के कुछ संगठनों को कत्ल जैसे जुर्म के मददगार लोगों का अध्ययन करके समाज के सामने रखना चाहिए कि ये लोग ऐसे गलत काम में पड़े कैसे, और इसका नतीजा कितना खतरनाक भुगतना पड़ा है। 

हम बहुत से हादसों और बहुत से ऐसे जुर्म को लेकर यही सोच रखते हैं कि इनका विश्लेषण करके लोगों के सामने रखना चाहिए ताकि बाकी लोग कमअक्ली में, या अतिउत्साह में ऐसे जुर्म में न फंसें। फिर आज जैसी खबरें आती हैं, उन्हें देखकर यह भी समझ नहीं पड़ता कि क्या शराबबंदी करने से इस किस्म के जुर्म घटेंगे? छत्तीसगढ़ में ही एक आईपीएस अफसर, संतोष सिंह अपने खुद के निजी उत्साह से जिस-जिस जिले में रहते हैं, वहां पर नशे के खिलाफ एक बड़ा अभियान, निजात-अभियान छेड़ते हैं। और उनका यह निष्कर्ष है कि नशा जहां पर कम होता है, वहां पर हर किस्म के जुर्म भी कम होने लगते हैं, सडक़ हादसे भी कम होने लगते हैं। उन्होंने इसका विश्लेषण करके जो आंकड़े सामने रखे हैं वे चौंकाते हैं कि एक बरस तक नशे के खिलाफ अभियान चलाने से बलात्कार की घटनाओं में 35 फीसदी कमी आई, हत्याओं में 47 फीसदी की कमी आई, हत्या की कोशिशें 64 फीसदी घटीं, चाकूबाजी आधे से भी कम रह गई, और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं में भी 40 फीसदी की कमी आई। अब छत्तीसगढ़ में चूंकि शराब तो सरकार ही बेचती है, इसलिए कोई पुलिस अफसर बाकी किस्म के नशों के खिलाफ ही कार्रवाई कर सकता है, या अवैध शराब के खिलाफ। आज प्रदेश में चारों तरफ से खबरें आती हैं कि तरह-तरह की प्रतिबंधित दवाएं नशे के लिए बाजार में बेची जा रही हैं, और रोजाना ही गांजे से भरी गाडिय़ां पकड़ा रही हैं। ऐसे ही प्रतिबंधित नशे और अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई से अगर किसी जिले में बड़े-बड़े किस्म के जुर्म आधे रह जाते हैं, या एक तिहाई घट जाते हैं, तो वह नशे से होने वाले अपराध का एक बड़ा संकेत और सुबूत है। 

रायगढ़ में अभी हुई इस ताजा हत्या का मामला पति के नशे से थकी हुई पत्नी का है, और कानूनी या गैरकानूनी नशा किस तरह परिवारों को खत्म करता है, उसका यह बड़ा सुबूत है। अब ऐसे जोड़ों में एक मर जाए, दूसरे को जेल हो जाए, तो जाहिर है कि उनके बच्चों की जिंदगी भी खत्म हो जाती है। हम पारिवारिक हिंसा के पीछे की कई वजहों में से नशे को एक बड़ी वजह पाते हैं, और इस पहलू से भी समाजशास्त्रीय अध्ययन होना चाहिए। महज जुर्म, जांच, मुकदमा, और सजा, इससे समाज में कोई सुधार नहीं आ सकता, ऐसे जुर्म और ऐसी हिंसा की वजहों को समझना और उन्हें दूर करना जरूरी है। ऐसे पहलू बहुत से हैं, लेकिन हमने उनमें से कुछ की चर्चा आज यहां की है, लोग अपने आसपास इस तरह के तनाव से गुजर रहे परिवारों की मदद करने की कोशिश भी कर सकते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)