22 अगस्त 2011
आजकल
सुनील कुमार
ब्रिटेन में कुछ ही हफ्ते हुए जो दुनिया के सबसे बाजारू मीडिया-मालिक रूपर्ट मर्डोक को अपने मालिकाना हक का ब्रिटेन का सबसे पुराना और दुनिया का सबसे बड़ा इतवारी अखबार बंद कर देना पड़ा क्योंकि उसके पत्रकारों ने कई किस्म के घोर अनैतिक अपराध करके खबरें गढऩे का काम किया था। एक सभ्य समाज ब्रिटेन में अखबारों को अखबारी चर्चा से परे का नहीं माना जाता और वहां एक-दूसरे के बारे में खासा कुछ लिखा जाता है, कोई संपादक या बड़ा पत्रकार जब कोई जगह बदलता है तो वह पूरे मीडिया में एक खबर बनती है। हिन्दुस्तान में ऐसा रिवाज बहुत कम है इसलिए मीडिया द्वारा पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों को बेच खाने के बारे में एक-दूसरे पर कुछ नहीं लिखा जाता।
लेकिन दो दिन पहले ही मैंने ट्विटर पर यह लिखा कि भारत इन दिनों विरोध का इतिहास दर्ज कर रहा है या मीडिया का, समझ नहीं पड़ रहा। कई दशकों के बाद आज यह पहला मौका है जब खबरों के चैनलों पर जाने को ही दिल नहीं कर रहा क्योंकि वहां खबरों से परे का ही लगभग सब कुछ लबालब है। अन्ना हजारे के विरोध प्रदर्शन को लेकर अच्छे खासे समाचार चैनल भी अपनी अक्ल को ताक पर रखकर, पत्रकारिता के बहुत ही बुनियादी सिद्धांतों को दराज में बंद करके मुन्नी और शीला के अंदाज में एक-दूसरे को पीटने में लग गए हैं। यह एक भयानक हालत है और जिस तरह इस पूरे देश को शायद एक साजिश के तहत गणेश प्रतिमाओं पर दूध के लोटों सहित भेज दिया गया था, आज उसी तरह इस देश के टीवी समाचार चैनल लोगों को लोकतंत्र की बुनियादी समझ से परे एक बेदिमाग और बददिमाग, अलोकतांत्रिक जिद की तरफ धकेल रहे हैं। यह फर्क यहां साफ कर देने की बहुत बड़ी जरूरत है कि भारत का लोकतंत्र आज भ्रष्टाचार के एड्स जैसे खतरनाक हाल से गुजर रहा है, और अगर समाचार चैनल लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ झोंकते तो भी वह एक बात होती। भारत के नामी-गिरामी समाचार चैनल लोगों को एक कीर्तन के अंदाज में अन्ना के जगराता की ओर धकेल रहे हैं जहां पर किसी तर्क की, किसी असहमति की, किसी लोकतांत्रिक-संसदीय व्यवस्था की, किसी न्यायपालिका की, किसी वैकल्पिक विचार की कोई जगह नहीं रह गई है। जिस तरह किसी कीर्तन में सिर बहुत से होते हैं लेकिन आस्था के सुर-ताल पर हिलते हुए इन सिरों के भीतर दिमाग कुंद कर दिया जाता है क्योंकि आस्था के दरबार में किसी तर्क का मतलब दुश्मन सरीखा होता है। इसलिए एक वैकल्पिक विचार सामने रखने वाली अरूणा रॉय सरीखी गंभीर सामाजिक कार्यकर्ता को गद्दार बताने वाले बैनर रामलीला मैदान में लग गए हैं क्योंकि उन्होंने अन्नावादी लोकपाल से परे अपना एक विचार सामने रखा है। गाली-गलौज की ऐसी ही जुबान इस लोकतंत्र के बहुत से दूसरे लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे लोगों के लिए इस्तेमाल हो रही है और पूरी की पूरी संसद को भ्रष्ट कहकर खारिज कर देने की जिद को एक गांधीवाद कहा जा रहा है।
लेकिन मैं यहां पर अन्ना के आंदोलन के बारे में अधिक बात करना नहीं चाहता क्योंकि इस बारे में पिछले दिनों मैंने काफी कुछ लिखा है और अपने-आपको भ्रष्ट लोगों का हिमायती कहने का मौका बहुत से दोस्तों को दिया है। आज की बात मीडिया को लेकर है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और हिन्दी के बड़े अखबारों वाला मीडिया जो कि इन दिनों, या पिछले कुछ बरसों से आपस में आगे बढऩे के एक गलाकाट मुकाबले के तहत पाठक को गुदगुदाने के लिए मुन्नी, शीला और शालू की तरह के ठुमके लगा रहा है। ऐसे मीडिया को टीआरपी के तहत एक-दूसरे से अधिक दर्शक और एबीसी के तहत एक-दूसरे से अधिक पाठक पाने की हड़बड़ी है और दुनिया में यह साबित हो चुका है कि धर्म, आध्यात्म या किसी दूसरे किस्म की आस्था से अधिक भीड़ किसी दूसरे तरीके से नहीं जुट सकती। यह आस्था किसी तानाशाही के लिए भी हो सकती है या किसी जाति, प्रांतीयता, राष्ट्रीयता के लिए भी हो सकती है। इनमें अगर एक फर्जी आत्मगौरव और एक राष्ट्रीयता, किसी दूसरे से एक नफरत का तड़का और लग जाए तो यह आस्था आसमान तक पहुंच जाती है।
1992 में आस्था का ऐसा ही सैलाब और ऐसा ही ज्वारभाटा अयोध्या में राममंदिर को बनाने के लिए और बाबरी मजिस्द को गिराने के लिए देखा गया था और उस वक्त के मीडिया का धर्मान्ध कीर्तन मुझे अब तक याद है। देश के सबसे बड़े अखबार होने का दावा करने वाले अखबार की पहले पन्ने की सुर्खी थी-अयोध्या में हजारों कारसेवक मारे गए, सरयू नदी रक्त से लाल हुई।
आज उसी किस्म की धर्मान्धता, कट्टरता और नफरत इस देश में लोकतंत्र के मौजूदा ढांचे के खिलाफ फैलाई जा रही है। इसमें खासकर टीवी चैनलों ने अपने संवाददाताओं और स्टूडियो को संभालने वाले लोगों के हाथों से माइक्रोफोन लेकर उन्हें मंजीरे थमा दिए हैं। किसी समाचार की बुनियादी जरूरत को खत्म कर दिया गया है। तथ्यों को तर्कों के पैमानों पर नाप लेने के बजाय हर किस्म के विशेषणों का इस्तेमाल करके एक तस्वीर पेश की जा रही है। इसका मकसद किसी दूसरे देश के साथ युद्ध के दौरान अपने देश के लोगों को मोर्चे के लिए मदद करने को तैयार करना होता तो भी समझ आता। आज अन्नावादी लोगों के प्रोपेगंडा को हवा देने के लिए टीवी चैनलों और कुछ बड़े अखबारों ने बड़े-बड़े पंखे लगा रखे हैं और लंबे संसदीय-लोकतंत्र के इतिहास वाले इस देश में यह स्थापित करने की कोशिश हो रही है कि लोकतंत्र एक पूरी तरह अवांछित, और एक घटिया जुबान में कहें तो, नाजायज बच्चा हो गया है जिसे उखाड़कर फेंक देने की जरूरत है और अन्नाटोली के लोग एक नया सबेरा लेकर आए हैं, सिर्फ वे ही लोग जनता के हक के मसीहा हैं और सिर्फ उन्हें जनता के हक की लड़ाई लडऩे की अधिकृत डीलरशिप मिली हुई है। इस बात को स्थापित करने में जिस तरह से गलाकाट मुकाबले में लगा हुआ मीडिया का हिस्सा जुटा हुआ है उससे यह लगता है कि वोटों के गलाकाट मुकाबले में लगे नेता चुनाव के दौरान जितने किस्म की अनैतिक हरकतें करते हैं कि एक बार किसी तरह चुनाव जीत जाएं, उसी तरह की हरकत आज मीडिया कर रहा है कि किसी तरह मुकाबले में दूसरे को पछाड़ दिया जाए।
जिस लोकतंत्र में संविधान के तहत एक साधारण नागरिक के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साधारण अधिकार का ही हक भारत के मीडिया को हासिल है, पहले तो वह अपने-आपको इस लोकतंत्र का चौथा पाया कहने लगा, और अब एकाएक अन्ना लहर में अपने लिए मोती ढूंढते हुए वह लोकतंत्र के बाकी तीनों पायों को हिलाने में जुट गया है। टीवी चैनलों के संवाददाता सड़क किनारे खड़े हुए लोकतंत्र की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, अपने मिनट दो मिनट के खबर-खुलासे के नाम पर वे वहां संपादकीय लिख रहे हैं, और अपने दर्शक को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि किस तरह आज इस देश के लोकतंत्र को पूरी तरह उखाड़कर फेंक देने की जरूरत है और संसदीय तंत्र की जगह सड़क तंत्र आज किस तरह बेहतर होगा।
पूरी जिंदगी अखबारों में गुजारने की वजह से मेरे मन में अखबारों के एक बेहतर मीडिया होने का जो पूर्वाग्रह बना हुआ है वह भी बड़े-बड़े अखबारों के कीर्तन देखकर अब टूट चुका है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता पर कभी अधिक आस्था रही नहीं और उसकी तस्वीरों और आवाज वाली पहली सूचना से अधिक कोई कीमत आमतौर पर लगी नहीं। लेकिन लोकतंत्र पर से आस्था को खत्म करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस तरह कुदाली लेकर, सब्बल और घन लेकर जुट गया है, उसे देखकर अब उन लोगों को भी शर्म आ रही होगी जो 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मजिस्द के ढांचे पर चढ़कर उसे गिरा रहे थे।
अगर यह लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ होती तो उस लड़ाई की गुंजाइश लोकतंत्र के भीतर है। अन्ना की सुनामी को घर-घर पहुंचाते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और मेरी नजर में आने वाले कुछ बड़े अखबारों ने इस बात को पूरी तरह भुलाने के लिए जनता की आंखों और कानों में आज के अनशन को थोप दिया है कि पिछले साल भर में भ्रष्टाचार के जितने भी मामले सामने आए और जिन पर कार्रवाई हुई, वे तमाम मामले अदालत के रास्ते आए हैं और यूपीए सरकार द्वारा अपने पिछले कार्यकाल में बनाए गए सूचना के अधिकार के तहत पाई गई जानकारी के तहत आए हैं। ये तमाम मामले इसी भारतीय लोकतंत्र की न्यायपालिका की पहल या दखल से उजागर हुए हैं और इनके पीछे सुब्रमण्यम स्वामी जैसे कुछ ऐसे सोनिया-नफरती लोग रहे हैं जो कि आज अन्ना हजारे के इस आंदोलन से पूरी तरह असहमति रख रहे हैं। हम यहां याद दिलाना चाहेंगे कि देश का सबसे बड़ा दिख रहा 2जी घोटाला जिस सुब्रमण्यम स्वामी के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद उजागर हुआ। उन्होंने चार दिन पहले ट्विटर पर लिखा-अन्ना एक अच्छे इंसान हैं और उनकी सोच भी साफ है लेकिन वे नक्सलियों और पश्चिमी सोच वालों पर निर्भर हैं। उन्हें सही वक्त पर इन लोगों से आजाद करना होगा। उन्होंने यह भी लिखा कि भ्रष्टाचार से छुटकारा पाने के लिए तीन पहलुओं से इलाज करना होगा। पहला, पर्याप्त असरदार कानून, दूसरा, उन पर अमल और तीसरा, लंबे समय तक ऐसा चलने के लिए नीति-सिद्धांत की व्यवस्था। उन्होंने आगे लिखा कि अन्ना पूरी तरह से केवल पहले पहलू पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जबकि मैं दूसरे दो पहलुओं पर काम कर रहा हूं। हम दोनों के रास्तों में यह एक फर्क है।
सुब्रमण्यम स्वामी के निजी विचारों को मैं बहुत गंभीरता से नहीं लेता क्योंकि वे भारत के मुसलमानों के खिलाफ, नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ बहुत ही जहर भरे हुए हैं। लेकिन ऐसे जहर के साथ भी अगर कोई हिंदुस्तानी देश की अदालत तक पहुंचकर किसी भ्रष्टाचार को उजागर करता है तो उस कोशिश को मैं देश के भले की मानता हूं और देश की संसदीय व्यवस्था का इस्तेमाल करके अपराधियों को सजा दिलाने का एक जिम्मेदारी का काम मानता हूं। मैं सुब्रमण्यम स्वामी को अदालत, संसद, इन सबको किनारे छोड़कर अपनी मनमानी से आगे बढऩे वाला नहीं पाता। यहां पर उनका खतरा देश को उन ताकतों के मुकाबले कम दिखता है जो कि पूरी संसदीय व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में लगे हैं और जिन्हें सिर्फ अपने ही तर्क समूचा लोकतंत्र लगते हैं। मैं सुब्रमण्यम स्वामी की इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूं कि अन्ना के साथ के लोग नक्सलियों के हिमायती हैं। लेकिन फिर भी इतनी बात जरूर लगती है कि ये दो तबके देश के लोकतंत्र के लिए हिकारत पैदा करने, उसे गैरजरूरी साबित करने और उसे कम या अधिक दूर तक उखाड़ फेंकने के लिए पूरी ताकत के साथ काम कर रहे हैं। मैं अपने मन के भीतर सोचता हूं तो यह भी लगता है कि भारत से लोकतंत्र को मटियामेट करने के लिए एक तबका बंदूकों के साथ खुलकर उसका विरोध कर रहा है और दूसरा तबका लोकतंत्र से अपने जूतों के तल्ले बनाकर उससे लोकतंत्र को कुचल रहा है। एक ऐसी तस्वीर दिमाग में बनती है कि यह एक ऐसी रिले रेस है जिसमें एक धावक जाकर अपना रूल दूसरे को थमाता है, दूसरा जाकर तीसरे को, तीसरा जाकर चौथे को जो कि उसे आखिरी तक ले जाता है। अब पहला धावक कहने को तो यह कह सकता है कि उसने तो आखिरी तक कोई चीज पहुंचाई ही नहीं, लेकिन हकीकत यह है कि लोकतंत्र पर से, भारत की मौजूदा संसदीय व्यवस्था पर से लोगों की आस्था को पूरी तरह खत्म करने का काम अलग-अलग तबके अलग-अलग दूरी तक करते दिख रहे हैं, और मैं संदेह का लाभ देते हुए इन्हें एक टीम नहीं मान रहा, सुब्रमण्यम स्वामी मान रहे हैं।
लेकिन मैं फिर पटरी से उतर रहा हूं और मीडिया की बात करते-करते मैं फिर अन्ना पर चले आ रहा हूं। मुझे बात आज अपने तबके पर करनी चाहिए। हिंदुस्तान में जब तक अखबारनवीसों की तनख्वाह कम रही और श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के बैनर तले पत्रकार लड़ते रहे, उस वक्त तक भी अखबारों के, पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों पर थोड़ी बहुत बातचीत होती थी, वह सिलसिला पत्रकारों की बेहतर तनख्वाह के साथ-साथ खत्म हो गया। आज बाजार और मीडिया मालिक मिलकर मीडिया के रूख को तय करते हैं। आज बाजार का रूख फुटपाथ पर रामबाण दवा बेचने वाले एक ऐसे फेरीवाले के साथ है जो कि एक दवा को हर मर्ज को दुरूस्त करने वाला कह रहा है और इसी एक दवा को हिंदुस्तान की अकेली दवा भी कह रहा है। इसलिए अपने बाजारू फायदों में डूबा हुआ हिंदुस्तान का अधिकांश बड़ा मीडिया अन्ना हजारे का साथ देने के नाम पर पत्रकारिता की बुनियादी बातों को पूरी तरह खत्म कर चुका है और भारत के लोकतंत्र को, यहां की विविधता को, यहां की असहमति को, संवैधानिक संस्थाओं को सबको खारिज करने के कीर्तन में मंजीरे बजा रहा है।