30 नवंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस एक बार फिर पूरी बेदिमागी और बददिमागी से काम कर रही है, और जिले की पुलिस के ऊपर मानो न कोई अफसर बचा है, न कोई निर्वाचित और सत्ता पर काबिज नेता बचा है, और न ही मानो कोई संवैधानिक संस्था या अदालत बची हैं। कुछ महीनों के भीतर दूसरी बार राजधानी की जिला पुलिस दुपहिया गाडिय़ों पर चलने वाले लोगों के चेहरों से कपड़े हटवा रही है, यह कहकर कि कई अपराधी चेहरा ढांककर निकल जाते हैं। लोग राज्य बनने के बाद, तेरह बरस पूरे होने के बाद, और इस शहर पर सैकड़ों करोड़, या शायद हजार करोड़, खर्च हो जाने के बाद भी यहां की धूल, यहां के धुएं से बचने के लिए चेहरों पर कपड़े बांधकर चलने को बेबस हैं। इसके अलावा साल में दस महीने इस इलाके में जो धूप पड़ती है, वह सड़कों पर लोगों को झुलसा सकती है। इस इलाके में चेहरों पर कपड़े बांधकर चलना एक बेबसी है, अपनी सेहत का बचाव है।
पुलिस अपनी इस बददिमाग हरकत को हेलमेट की तरफ लोगों को मोडऩे की एक कोशिश भी बता रही है। अगर हेलमेट लागू करना है, तो उसके लिए नियम पहले से बने हुए हैं। उनको लागू करने का हौसला न अफसरों में है, और न ही नेताओं में। जनता सड़क हादसों में थोक के हिसाब से मारी जा रही है, लेकिन वोटों की फिक्र में पड़े नेता जनता की जान बचाने के लिए भी उसके सिर पर कोई बोझ रखना नहीं चाहते। और जब ऐसे नेता और अफसर जनता के पैसों की एयरकंडीशंड गाडिय़ों में चलते हैं, तो उनको दुपहिया चलाने वालों की दिक्कत और तकलीफ समझ आने में मुश्किल रहता है।
पुलिस को इतनी भी समझ नहीं है कि अपने चेहरे को ढंककर चलना किसी का भी बुनियादी हक है। आज अगर कोई मुस्लिम लड़की अपने चेहरे को ढंककर चलना चाहती है, तो उससे उसकी धार्मिक और सामाजिक संस्कृति पुलिस कितने चौराहों पर छीनेगी? तेज हवा, शहरी सड़कों पर धुआं, खुदी पड़ी सड़कों की धूल और गंदगी, इसके साथ-साथ तेज धूप और दूसरी गाडिय़ों को चलाते हुए थूकने वाले लोगों के थूक से बचने के लिए अगर कोई अपने चेहरे को ढंककर चल रहे हैं, तो ऐसे लोगों को परेशान करने का कोई हक पुलिस को नहीं है। लेकिन जिला पुलिस किसी राज्य में बहुत छोटी सी हस्ती रखती है। इस फैसले के ऊपर इस राज्य में नियंत्रण के कम से कम दस दर्जे और हैं। और जब नीचे का कोई अफसर ऐसी मनमानी लागू करता है, और ऊपर के लोग अखबारों में इसे देखते अपनी एयरकंडीशंड दुनिया में मस्त रहते हैं, तो वे भी इस बददिमागी में हिस्सेदार हो जाते हैं।
हमारे हिसाब से इस प्रदेश का महिला आयोग, इस प्रदेश का मानवाधिकार आयोग, इस प्रदेश की अदालतें, और यहां के राज्यपाल भी, खुद होकर भी इस निहायत गैरजरूरी और बेदिमाग फैसले के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों में यह दूसरा मौका ऐसा है, और जनता के हकों के नाम पर सुविधाएं भोगते संवैधानिक लोग आंख उठाकर इधर देख भी नहीं रहे हैं। यह निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए धिक्कार की बात है कि यहां पर अफसर मनमानी नीतियां बनाते हैं, और जनता पर उनको थोपते हैं। आज प्रदूषण से बचने के लिए नाक-मुंह को ढांककर चलना एक न्यूनतम जरूरत हो गई है, लेकिन पुलिस की नजरों में यह गलत काम करने का एक रास्ता है। लोगों को चाहिए कि इस मनमानी के खिलाफ वे महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, और अदालत तक जाएं, क्योंकि एक मनमानी को बर्दाश्त करने का मतलब दूसरी मनमानी को बढ़ावा देना होता है।
अभी कुछ दिन पहले ही एक सड़क दुर्घटना में दर्जन भर लोगों के मारे जाने के बाद हमने बड़ी कड़ी जुबान में आरटीओ और टै्रफिक पुलिस के भ्रष्टाचार को इसके लिए जिम्मेदार बताया था। हमारा यह लंबा अनुभव है कि जब-जब इन विभागों के संगठित भ्रष्टाचार की वजह से ऐसे बड़े हादसे होते हैं, तब-तब ये विभाग शायद लोगों का ध्यान बंटाने के लिए इस तरह का कोई सतही काम करने लगते हैं, जिससे खबरें ऐसा दिखाने लगें कि दुर्घटनाओं के लिए जनता जिम्मेदार रहती है, और वह हेलमेट नहीं लगाती है। चेहरों पर बांधे गए कपड़ों का हेलमेट से कोई लेना-देना नहीं है। हेलमेट को लागू करना एक अलग जिम्मेदारी है, जिसका हौसला इस राज्य के नेताओं और अफसरों में नहीं है। दूसरी तरफ हेलमेट के बाद भी लोगों को चेहरों पर कपड़ा बांधने की जरूरत बनी ही रहेगी। अगर रायपुर की जिला पुलिस के ऊपर इस प्रदेश में कोई जिम्मेदार है, तो उनको इस बारे में सोचना चाहिए। प्रदूषण से जो लोग अपनी सेहत बचाना चाहते हैं उनको अगर पुलिस इस तरह कुचलती है, तो ऐसी ही पुलिस आगे जाकर इससे अधिक बड़ी मनमानी करती है। हमारा साफ मानना है कि पुलिस की यह कार्रवाई अदालत में पल भर भी नहीं टिकेगी, किसी को वहां जाकर ऐसी पुलिस के खिलाफ कार्रवाई मांगनी चाहिए।
























