आज की दुनिया के जलते-सुलगते मुद्दे, अपने धर्मगुरूओं की फिक्र को जरा तौलें!
31 मई 2026
पिछले कुछ महीनों से लगातार अलग-अलग धर्मगुरूओं की कुछ-कुछ बातों को देखते-सुनते हुए एक खिचड़ी दिमाग मेें पक रही थी। फिर आज सुबह जब खबरों में यह सुना कि अफ्रीका के देशों में एक-एक करके अलग-अलग जगह पर किस तरह समलैंगिकों, और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ बहुत कड़े कानून बनते चले जा रहे हैं, तो उसके साथ-साथ यह भी सुनने मिला कि इन देशों में ईसाई धर्म, और इस्लाम, इन दोनों का खूब बोलबाला है, और ये सारे धर्मगुरू समलैंगिकता के खिलाफ इसलिए हैं कि ये उसे अनैतिक मानते हैं क्योंकि इससे अगली पीढ़ी पैदा नहीं होती।
एक तरफ तो काफी बड़ी दुनिया अब एलजीबीटीक्यूआई की परिभाषा में आने वाले हर तरह के यौन पहचान वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों को अधिक से अधिक मान्यता दे रही है, तब ईसाई और मुस्लिम धर्मगुरू समलैंगिकों को और अधिक कड़ी कैद देने वाली सरकारों के हिमायती हैं। यह देखकर लगा कि धर्म क्या अधिकतर दुनिया में पहले की तरह कट्टर, पहले से अधिक कट्टर बना हुआ नहीं है? और क्या अलग-अलग धर्मों की सोच कुछ अलग-अलग है? क्या कुछ धर्मगुरू अपने ही धर्म में प्रचलित सोच से अलग-अलग ऊपर भी कुछ सोच सकते हैं? क्या धर्मगुरुओं में अपने अस्तित्व को खतरे में डालकर भी अलोकप्रिय सच को कहने का हौसला हो सकता है?
ऐसे कई सवालों को पिछले महीनों में सोचते हुए यह देखने मिला कि कौन-कौन से ऐसे धर्म हैं जिनके धर्मगुरू लगातार हजारों बरस पहले जीने में अपने को सुरक्षित पाते हैं? भारत में ही कई हिन्दू धर्मगुरू अपने प्रवचनों में हाल के सैकड़ों बरसों में आना ही नहीं चाहते, क्योंकि इन सैकड़ों बरसों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने, लोकतंत्र और संविधानों ने, नए राजनीतिक दर्शन और सिद्धांतों ने धर्म की हजारों बरस पुरानी सोच और व्यवस्था को गहरी चुनौती दी है। इसलिए अधिकतर धर्मगुरू उस युग के बाद, हाल के सैकड़ों बरस में आना ही नहीं चाहते, अपने भक्तों को लाना ही नहीं चाहते, जहां अप्रिय सवाल सिर उठाने लगे हैं। जिस तरह कहा जाता है कि रैबीज कुत्ते के काटे हुए इंसान को हाइड्रोफोबिया हो जाता है, और वे पानी देखते ही करने लगते हैं, उसी तरह का हाल धर्म का लगता है, वह सवालिया निशान, प्रश्नवाचक चिन्ह, और क्वेश्चन मार्क को देखकर डरने लगता है।
अभी हाल के महीनों में रोमन कैथोलिक समुदाय के सबसे बड़े मुखिया बने पोप लियो ने आज के मुद्दों को लेकर जिस तरह की बातें कही हैं, उन्हें पश्चिमी दुनिया में भी अभूतपूर्व और असाधारण माना जा रहा है। वे किसी भी देश में प्रवासियों के अधिकार, दुनिया के देशों की छेड़ी गई जंग, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, और दुनिया के ऐतिहासिक अपराधों पर चर्च की चुप्पी के इतिहास जैसे मुद्दों पर लगातार बोल रहे हैं। और वे किसी समारोह के लंबे भाषण के बीच में दबी-छुपी गोलमोल भाषा में यह सब नहीं बोल रहे, वे सीधे-सीधे अमरीकी सरकार से टकराव लेने का खतरा उठाते हुए भी इस तरह की बात कर रहे हैं। पोप लियो ने एआई के बारे में कहा कि इसे सिर्फ तकनीकी उपलब्धि की तरह नहीं देखा जा सकता, यह सत्ता, निगरानी, और असमानता को खतरनाक रूप से बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा कि इसे युद्ध में मानवता के खिलाफ भयावह तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने एआई को लेकर कुछ वैसी ही चेतावनी दी, जैसी चेतावनी कभी परमाणु हथियारों को लेकर दी जाती थी। उन्होंने एआई उद्योग के लिए दुर्लभ खनिज निकालने के लिए खतरनाक परिस्थितियों में काम करने वाले बच्चों का जिक्र भी किया है। उन्होंने खुलकर यह माना कि एआई की मदद से जंग में मशीनों को इंसानों के कत्ल का अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि एआई का नियंत्रण लोकतांत्रिक संस्थाओं के बजाय कुछ निजी कंपनियों के हाथ में जा रहा है, और इससे सत्य, लोकतंत्र, और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने ट्रम्प की नाराजगी और दुश्मनी मोल लेते हुए भी यह कहा कि प्रवासियों के भी मानवीय अधिकारों का सम्मान होना चाहिए, देशों की सरहदों पर होने वाली अमानवीयता खत्म होनी चाहिए, और विस्थापित लोगों के प्रति दया दिखानी चाहिए। उन्होंने आधुनिक गुलामी के खतरे, बाजार व्यवस्था की तानाशाही के खतरे तो गिनाए ही हैं, आज की अमरीकी सरकारी सोच के खिलाफ भी उन्होंने ढेर सारी बातें कही हैं।
भारत में शरण लिए हुए एक बौद्ध गुरू दलाईलामा ने गैरईसाई दुनिया में जमीनी मुद्दों को लेकर कुछ बातें जरूर की हैं। उन्होंने परमाणु हथियारों के खिलाफ कुछ कहा है, जलवायु संकट पर कुछ बोले हैं, और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कुछ कहा है। दक्षिण अफ्रीका में एक पादरी डेसमंड टूटू ने दशकों पहले वहां के रंगभेद के खिलाफ बड़ा संघर्ष किया था, और धर्मगुरू होने के साथ-साथ वे वहां की एक सबसे बड़ी लोकतांत्रिक और राजनीतिक आवाज भी बन गए थे। उन्होंने गोरे अल्पसंख्यक रंगभेदी शासन का विरोध किया था, और लोकतंत्र और मानवाधिकारों की वकालत की थी। उनकी कही बातों में इतना नैतिक और राजनैतिक वजन था कि अफ्रीका के बाहर भी दुनिया भर में उन्हें माना जाने लगा था, और 1984 में उन्हें नोबल शांति पुरस्कार भी दिया गया था।
अब दुनिया भर में अलग-अलग धर्मों के लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनके कौन से धर्मगुरू उन्हें कौन से युग में बनाए रखना चाहते हैं? उनमें से कौन से धर्मगुरू हाल के दशकों की बेइंसाफी की बात करते हैं? उनमें से कौन से हैं जो आज समाज की असमानता के खिलाफ सोचते और बोलते हैं, और लोगों को ऐसे संघर्ष के लिए तैयार करते हैं? मैं यहां पर दूसरे धर्म के गुरूओं का नाम और उनकी कही हुई सदियों पुरानी जंग लगी, काई जमी बातों को गिनाना नहीं चाहता। यह तो लोगों को खुद ही देखना होगा कि उनके धर्मगुरू उन्हें कितनी सदी पीछे धकेलकर वहीं पर बनाए रखना चाहते हैं, ताकि आज की वैज्ञानिक-लोकतांत्रिक, और संवैधानिक हवा में कहीं वे सांस न ले लें। अपने-अपने धर्म को अच्छी तरह आंक लेने के बाद वे 21वीं सदी के 25वें बरस में जीने वाले, इसी दशक और बरस, और हाल के हफ्तों की बात करने वाले धर्मगुरूओं को भी देख सकते हैं। यह भी देखने की जरूरत है कि आज कौन से ऐसे धर्मगुरू हैं जिनकी बातें अपने धर्म के अनुयायियों से परे के लोगों के भले की भी हैं, उन्हें भी बचाने के लिए हैं। लोगों को अपनी आस्था-उपासना के बीते मौके के बाद, और अगले मौके के पहले दूसरे धर्मों के लोगों की कही हुई बातों के बारे में भी सोचना चाहिए।
जो धर्म हजारों बरस पहले की लिखी गई, कहीं गई, या सिरे से काल्पनिक किताबों पर आधारित हैं, उनके धर्मगुरूओं का आज की हवा में सांस लेना आसान नहीं रहता है, और न ही वे भक्तजनों को आज की हवा की आदत लगने देना चाहते। फिर भी इतिहास उन्हीं धर्मगुरूओं को बेहतर दर्ज करेगा, जिन्होंने अपने धर्म के उन हमलावरों का विरोध किया जिन्होंने दूसरे धर्म के बेकसूर लोगों पर हमले किए। धर्म का कारोबार चलाते-चलाते इतनी बातें खुलकर कहना भी कोई आसान बात तो रहती नहीं।
दलबदलुओं से दुनिया के देशों को खास परहेज नहीं
31 मई 2026
भारत में हाल के दशकों में ऐसे नेताओं की गिनती बढ़ती चल रही है जो एक चुनाव एक पार्टी से लड़ते हैं, और ठीक अगला चुनाव किसी दूसरी पार्टी से। कुछ नेता तो ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने दूसरी पार्टी में जाते हुए अपनी निर्वाचित सीट से इस्तीफा दे दिया, और उसी उपचुनाव में दूसरी पार्टी की टिकट पर लडक़र फिर जीत गए। पंजाब में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के सदस्य थोक में भाजपा में चले गए, जबकि उन्हें चुनने वाले आम आदमी पार्टी के विधायक और सांसद थे। दलबदल की ऐसी अलग-अलग कई किस्म की कहानियां हैं, और हर बार कुछ लोग यह नैतिक सवाल उठाते हैं कि क्या दलबदल करने वालों को सदन की सदस्यता से इस्तीफा भी देना चाहिए क्योंकि वे दूसरी पार्टी के समर्थक मतदाताओं के वोटों से भी जीतकर आए रहते हैं। भारत में पहले किसी पार्टी को छोडऩे वाले सांसद या विधायक सदन में एक तिहाई से अधिक रहने पर उसे दलबदल नहीं माना जाता था, और उसे विभाजन माना जाता था। एक तिहाई से कम के दलबदल पर सदन की सदस्यता भी चली जाती थी। लेकिन जब एक तिहाई का दलबदल करवाना धन-बल से आसान काम हो गया, तो कानून बदलकर इस सीमा को दो तिहाई किया गया। लेकिन जैसा कि अभी पंजाब के राज्यसभा के मामले में हुआ है दो तिहाई सदस्यों का दलबदल करवाना भी मुश्किल काम नहीं रह गया। इसके पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन के वक्त भी दलबदल के कई संवैधानिक पहलू सामने आए थे।
नेताओं के वैचारिक रूप से बिल्कुल ही विपरीत पार्टियों में भी जाकर वहां भी पार्टी टिकट पाकर निर्वाचित हो जाने को देख-देखकर जनता थकी हुई है। कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह भी लिख रहे हैं कि ऐसे लोगों पर 20 बरस के लिए चुनाव लडऩे पर रोक लगा देनी चाहिए। हम भी अपने अखबार में बीते दशकों में बार-बार यह बात लिखते आए हैं कि एक पार्टी टिकट पर चुनाव जीतने वाले लोग अगर उस कार्यकाल के बीच में ही किसी दूसरी पार्टी में चले जाते हैं, तो वे अपने मतदाताओं को भी धोखा देते हैं, और उनके अगले चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए। हमारी यह सोच कुछ उसी तरह की है जो कि रिटायर्ड जज, फौजी अफसर, या बड़े सरकारी अफसर के रिटायर होने के तुरंत बाद किसी निजी कंपनी में काम करने पर रोक की है। लोगों को सांस लेने का वक्त मिलना चाहिए। मछली अगर पेड़ पर जीना तय करे, तो उसे रातोंरात पेड़-प्राणियों का मुखिया बनाना ठीक नहीं होगा। इसी तरह पेड़ पर पीढिय़ों से जीने वाले पंछी अगर पानी के भीतर जाकर जीना तय करें, तो उन्हें कुछ मौका देना चाहिए, और जलचर संघ का मुखिया तुरंत नहीं बनाना चाहिए। लोग वैचारिक आधार पर दूसरे दल में जाएं इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन प्राकृतिक न्याय के नजरिए से भी देखें तो दशकों से किसी पार्टी में दरी उठाने और पानी पिलाने वाले पुराने कार्यकर्ताओं को छोडक़र नए-नवेले, बीती रात ही पार्टी में आए नेताओं को उम्मीदवार बनाना तो नैतिकता के हिसाब से भी गलत है। और राजनीति में सिर्फ चुनावी नजरिए से संभावनाओं को लचीला रखने के लिए नैतिकता की ऐसी अनदेखी भी ठीक नहीं है। हम वकालत करते आए थे कि दलबदलुओं को दूसरी पार्टी से अगला चुनाव लडऩे न मिले, वे अगर चाहें तो उस दूसरी पार्टी के संगठन में काम करने के लिए अपनी क्षमताओं को दे सकते हैं।
लेकिन अभी जब हम इस बारे में दुनिया के अलग-अलग देशों की व्यवस्था देख रहे हैं, तो जिन्हें हम बड़ा परिपक्व लोकतंत्र मानते हैं, उनमें भी दलबदलुओं को लेकर कोई कड़े कानून नहीं हैं। शायद इसलिए भी ऐसा हो सकता है कि उन देशों में भारत की तरह बड़े पैमाने पर दलबदल नहीं होता होगा। ब्रिटेन, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान, न्यूजीलैंड इनमें से किसी देश में दलबदल करने वालों पर अगला चुनाव लडऩे की रोक नहीं है। बल्कि हैरानी की बात यह है कि जिन्हें विकासशील देश माना जाता है, ऐसे देशों, पाकिस्तान, बांग्लादेश, और कुछ अफ्रीकी देशों में दलबदल करने वालों के अगला चुनाव लडऩे पर कुछ-कुछ रोक है। और वहां पर इसे ठीक उसी तरह का कूलिंग-ऑफ पीरियड कहा गया है, जिस तरह की बात ऊपर हमने अफसरों, जजों, और फौजियों के बारे में लिखी है। जब इस बारे में हमने अलग-अलग देशों के राजनीतिक विचारकों की सोच ढूंढने की कोशिश की, तो 18वीं सदी के एक पश्चिमी राजनीतिक विचारक, एडमंड बर्के ने एक भाषण में कहा था कि सांसद पार्टी के गुलाम नहीं होते, बल्कि वे अपने विवेक से फैसले लेते हैं। इस एक बात को दलबदल के पक्ष में एक मजबूत तर्क मान लिया जाता है। बाद के दशकों में, या बाद की सदियों में अलग-अलग देशों ने संसद के भीतर किसी पार्टी के लिए मतदान में उसके सदस्यों के साथ देने को अनिवार्य भी बनाया, जैसा कि भारत ने। और इससे विवेक की बात जाती रही। कुछ दूसरे विचारकों ने सांसदों के दलबदल को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मा की आवाज के आधार पर छूट देने की वकालत की। एक अन्य विचारक का कहना था कि बहुत सख्त पार्टी अनुशासन लोकतंत्र को कमजोर करता है। भारत की संविधान सभा में डॉ.बी.आर. अंबेडकर ने दलबदल विरोधी कानून के विचार का विरोध किया था, और उनका मानना था कि इससे असहमति खत्म हो जाएगी। एडमंड बर्के की बात से हमने यह चर्चा शुरू की, और उनका मानना था कि सांसद को पार्टी व्हिप, या पार्टी के दबाव में नहीं आना चाहिए। अगर उसे ईमानदारी से यह लगे कि उसकी पार्टी गलत है, तो उसे पार्टी के खिलाफ वोट देना चाहिए।
इस तरह हम देखते हैं कि संसदीय व्यवस्थाओं में हमारे अखबार की सोच की कोई मिसाल दिखती नहीं है। हमें दलबदलू के अगले चुनाव लडऩे पर रोक की जो बात सूझती है, उसे किसी दूसरे लोकतंत्र में अमल में नहीं लाया गया। शायद ही कोई परिपक्व लोकतंत्र भारत की तरह दलबदल का शिकार रहा हो, या 18वीं सदी से अब तक के जिन विचारकों की बात हम अभी पढ़ ही रहे हैं, उन्हें दलबदल की इस जंगल की आग का अंदाज भी नहीं रहा होगा। जो भी हो, राजनीतिक विचारधाराएं कई बार इतिहास के पन्ने पलटकर देखती हैं कि उन्हें किसी मिसाल से कुछ सीखने के लायक मिलता है, या उनके सामने खुद एक नई मिसाल बनने की चुनौती है। ऐसे में दुनिया की अधिकतर संसदीय व्यवस्थाओं में उनके स्तर के दलबदल पर तो वही सोच हावी दिखती है कि सांसदों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता ऊपर रहनी चाहिए, और फिर वे अगर दलबदल करते हैं, तो उन्हें जनता पर छोड़ देना चाहिए जो कि अगले चुनाव में चाहे तो दलबदलू को हरा भी सकती है। अब चुनाव लडऩा अपने आपमें भारत में जितनी भ्रष्ट व्यवस्था हो चुकी है, उसमें क्या सचमुच ही जनता को अपनी स्वतंत्र और निष्पक्ष राय देने का कोई माहौल रह गया है? पता नहीं अलग-अलग देशों का राजनीतिक माहौल बिल्कुल अलग-अलग रहते हुए उनकी राजनीतिक और चुनावी व्यवस्थाओं की दूसरे देशों से तुलना ठीक है, या नहीं है। जो भी हो, जब हमें अपनी सोच के खिलाफ इतने सारे देशों से इतने सारे तर्क मिले, तो उन्हें भी पाठकों के सामने रख देना ठीक है कि हम अपनी अधिक नैतिकता की उम्मीदों के साथ शायद अकेले ही है।
भारतीय अदालतों पर बोझ, सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से कितना घट पाएगा?
30 मई 2026
सुप्रीम कोर्ट ने कल एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए देश के तमाम हाईकोर्ट को मामले समय पर निपटाने के लिए कहा है। उसने कहा है कि जिन मामलों की सुनवाई पूरी करके हाईकोर्ट जज फैसला सुरक्षित रख लेते हैं, उन पर अधिकतम तीन महीने के अंदर फैसला सुनाना जरूरी होगा। ऐसा न होने पर संबंधित पक्ष चार महीना हो जाने पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास जा सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि तीन महीने में अगर फैसले नहीं आते हैं, तो हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार मामले को खुद होकर मुख्य न्यायाधीश के सामने रखें, और मुख्य न्यायाधीश दो हफ्ते का समय दे सकते हैं, लेकिन तब भी अगर फैसला नहीं सुनाया जाएगा, तो मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर किया जा सकेगा। जमानतों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाएं, अगर किसी वजह से फैसला सुरक्षित रखना पड़े, तो अगले दिन वह फैसला सुना दिया जाए, और वेबसाइट पर अपलोड किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत अर्जी मंजूर होने पर आदेश उसी दिन जेल अधिकारियों को भेजा जाए, ताकि कैदी की रिहाई में देर न हो। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की वजहें ढूंढने पर यह पता लगा कि कुछ हाईकोर्ट में जज साल-साल भर तक फैसले सुरक्षित रखते आए हैं, और उन पर फैसला घोषित नहीं करते। कुछ मामले तो ऐसे भी हुए हैं जिनमें दो-तीन साल तक फैसले नहीं लिखे गए।
मुख्य न्यायाधीश एवं एक अन्य जज की बेंच का दिया गया यह आदेश पूरे देश के हाईकोर्ट के लिए अनिवार्य रूप से मानने का है। संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मिले अधिकारों के तहत यह समय सीमा तय की गई है। लेकिन हम ऐसे बहुत सारे मामलों को न जानते हुए भी इस बात पर कुछ हैरान हो रहे हैं कि सुनवाई पूरी हो जाने के बाद किसी मामले पर फैसला लिखने में साल भर का वक्त क्यों लगना चाहिए? अदालत के लिखित रिकॉर्ड के साथ-साथ अदालत में जो बातें बहस के दौरान जज सुनते हैं, वे बातें भी साल भर में किसी की भी याददाश्त से धुंधली हो जाना तय है। जब महीनों के बाद कोई जज अदालती रिकॉर्ड देखकर सुबूत, गवाही, और वकीलों के तर्क को पढक़र फैसला लिखते होंगे, तो वे एआई की मदद से तो ऐसा करते नहीं हैं, और इंसानी याददाश्त की एक सीमा रहती है। रिकॉर्ड पर लिखी गई बातों से परे भी कई बातें जजों के दिमाग पर दर्ज रहती हैं, और वे तो धुंधली होते चले जाना तय रहता है। फिर किसी फैसले से जिसका भी नफा होना हो, या जिसे भी नुकसान होना हो, उन पर भी महीनों, और बरस-दर-बरस की देरी से नुकसान या नफा होता है, जो कि पूरी तरह नाजायज रहता है। आज जब हम देश भर में कई मुजरिमों को बार-बार जुर्म करते देखते हैं, तो भी हमें लगता है कि इनके पुराने जुर्मों के पुलिस रिकॉर्ड के बाद भी इन्हें बाद में इतने जुर्म और करने की छूट कैसे मिल जाती है?
कल के ही सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश को देखें, तो इसमें एक तरफ तो शिकायतकर्ता की शिकायत पर समय पर फैसला देना जरूरी किया गया है, और इसके लिए किसी हड़बड़ी या गलती का दबाव भी नहीं डाला गया है। जब सुनवाई पूरी हो जाती है, उसका मतलब यही रहता है कि अब जज को न आगे कोई सुबूत देखना है, न गवाहों को सुनना है, और न ही किसी वकील के तर्क सुनने हैं। इसलिए उसके बाद अगर फैसला लिखने के लिए तीन महीने का वक्त तय किया गया है, तो यह इसलिए भी जरूरी है कि जिसके खिलाफ मामला है, वह अगर मुजरिम है, तो वह जेल जाए, कैद काटे, और अगर मुजरिम नहीं है, तो वह छूट जाए, उसके खिलाफ केस खत्म हो जाए। कल के ही इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नजरिए से जमानत की सुनवाई और उस पर फैसले को भी उसी दिन तय करने की शर्त लगाई है। यह इसलिए भी जरूरी है कि ताकतवर विचाराधीन कैदी तो अपने लिए बहुत महंगे वकील लाकर अदालत पर एक किस्म का अघोषित दबाव बनवा लेते हैं, दूसरी तरफ गरीबों की जमानत अर्जी पर सुनवाई का कोई ठिकाना नहीं रहता। अब कल के आदेश से आम जनता के लिए एक तो यह अच्छी बात हो रही है कि जुर्म के मामलों में फैसले में अंधाधुंध देरी के बजाय तीन महीनों में फैसला आ जाएगा, और जुर्म साबित होने पर अभियुक्त को सजा हो जाएगी, समाज कुछ समय के लिए ऐसे मुजरिम से मुक्त हो जाएगा। दूसरी तरफ समाज में एक परेशानी बढऩे भी जा रही है कि अगर किसी अभियुक्त को जमानत, अर्जी के दिन ही मिल जाती है, तो फिर ऐसे लोग बाहर आकर दुबारा उसी तरह के जुर्म कर सकते हैं। समाज के सामने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की वजह से जमानत अर्जी पर जल्द आदेश एक परेशानी और खतरा भी लेकर आ सकते हैं, लेकिन यह परेशानी अदालत की फिक्र की नहीं रहती, या कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार सरकार की जिम्मेदारी रहती है।
देश में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में मामलों का बोझ तो कम है, निचली अदालतों मंत यह बोझ और अधिक ज्यादा है। हाईकोर्ट तक पहुंचने के पहले हर मामले में निचली अदालत में सुनवाई, आदेश, फैसला, इनमें से कुछ न कुछ हो चुका रहता है। जिला अदालतों के ऐसे बोझ को भी कम करने के बारे में कुछ सोचना चाहिए। आज ही हमने गांधी पर एक लेख देखा है कि किस तरह वे अदालत में जिरह करने के मामले में तो कमजोर वकील थे, लेकिन मध्यस्थता से मामलों को निपटाने के मामले में वे बड़़े कामयाब रहे, दक्षिण अफ्रीका में भी उन्होंने कई लोगों के बीच चल रही मुकदमेबाजी को आपस में बैठाकर सुलझाया। आज यह बात कम दिखाई पड़ती है। लेकिन भारत की न्याय व्यवस्था से परे अगर हम अमरीकी न्याय व्यवस्था देखें, तो उसमें अदालत के बाहर मामलों के निपटाए जाने की परंपरा और व्यवस्था बड़ी मजबूत है। वहां पर तो सरकार के किसी के खिलाफ चलाए जा रहे मुकदमों में भी आरोपी के, और सरकारी वकील के बीच सजा या जुर्माने को लेकर खुले मोलभाव की व्यवस्था है, और बहुत से मामलों में संभावित सजा घटाने की शर्त पर आरोपी अपना जुर्म मान भी लेते हैं। सरकारी वकील कम सजा दिलवाने पर तैयार भी हो जाते हैं, और अदालतों पर से बहुत से मामलों का बोझ घटता है। हमारा मानना है कि जुर्म मानकर रियायत पाने की व्यवस्था को भारतीय कानून में किस तरह जोड़ा जा सकता है, इस पर विचार करना चाहिए। एक दूसरा मामला अभी खाड़ी के एक देश से सामने आया है, वहां एक भारतीय को मौत की सजा हुई थी, लेकिन वहां के कानून के मुताबिक दसियों करोड़ रूपए का जुर्माना देने पर सजा से माफी का भी इंतजाम है, और यह पैसा जुर्म के शिकार परिवार को जाता है, ब्लडमनी कहलाता है। अभी-अभी सोशल मीडिया पर एक अपील के माध्यम से भारत के एक ड्राइवर को रियाद से बरी करवाया गया है, जिसे 2011 में मौत की सजा सुनाई गई थी, और बाद में मृतक के परिवार ने 34 करोड़ रूपए के बराबर रकम लेकर इस आरोपी को माफी देने का समझौता किया था। अभी यह ड्राइवर लौटकर हिन्दुस्तान आया है।
हमें यह भी लगता है कि भारत में अगर किसी के जुर्म के शिकार बहुत गरीब परिवार रहते हैं, तो क्या उसे आर्थिक हर्जाना दिलवाने के एवज में आरोपी-मुजरिम की सजा में कुछ कटौती करवाई जा सकती है? इससे आज के लिखित कानूनों से परे भी एक किस्म का सामाजिक न्याय हो सकेगा। आज भारतीय न्याय व्यवस्था ने सजा-माफी, या सजा-कटौती को खरीदने का कोई इंतजाम नहीं है। लेकिन अगर इससे किसी गरीब परिवार का भला होता है, तो इस बारे में भी सोचना चाहिए। अदालत के बाहर कानूनी मोलभाव से अगर कुछ मामले घट सकते हैं, कुछ मामले हर्जाना चुकाकर निपट सकते हैं, तो ऐसी नई संभावनाओं के नफे-नुकसान पर भी विचार करना चाहिए।
नीट-लीक और सीबीएसई, 40 लाख बच्चों का वर्तमान निराशा और संदेह से घिरा
29 मई 2026
एक केन्द्रीय शिक्षा बोर्ड, सीबीएसई, के 12वीं के इम्तिहान के मूल्यांकन को लेकर जिस तरह की गड़बडिय़ां सामने आई हैं, उनसे पूरी परीक्षा प्रणाली और व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बहुत बुरी आंच आई है। भारत में एक के बाद एक, दाखिला या नौकरी इम्तिहान को लेकर विवाद चलते ही रहता है, चाहे वह केन्द्र सरकार का जिम्मा हो, चाहे राज्य सरकारों का। बेरोजगारों का मानना रहता है कि नौकरी रिश्वत से मिलती है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पीएससी के पुराने घोटाले अभी दशकों बाद भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर पड़े हुए हैं, जिनका दावा सरकारी नौकरियों पर बनता है, वे अब तक इंसाफ के इंतजार में खड़े हैं, और जिन्हें गलत किस्म से नौकरी मिलने की तोहमत लगी है, वे फैसला आने तक शायद रिटायर भी हो जाएं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, एक के बाद एक कई प्रदेशों में तरह-तरह के इम्तिहानों का भ्रष्टाचार, पेपर आऊट, सामूहिक नकल से बुरा हाल रहा है। अभी देश की किसी भी किस्म की चिकित्सा शिक्षा के लिए होने वाले दाखिला इम्तिहान, नीट, के पेपर बड़े पैमाने पर पूरी तरह लीक हो जाने की बात पहली नजर में ही साबित हो जाने के बाद उसे रद्द कर दिया गया, और कल की खबर है कि देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के बंगले पर हुई बैठक में यह तय किया गया कि उनकी अगुवाई में अगले महीने की नीट परीक्षा के पर्चे वायुसेना अलग-अलग जगहों पर पहुंचाएगी, सेना की मदद ली जाएगी, और ऐसा सोचा जा रहा है कि इम्तिहान के प्रश्नपत्रों को बैंकों में रखने के बजाय फौजी ठिकानों पर रखा जाए। यह दुनिया के इतिहास में शायद पहला मौका होगा, जब शांतिकाल में, बिना किसी आपातकाल के, बिना किसी मेडिकल इमरजेंसी के, सिर्फ पेपर लीक रोकने के लिए वायुसेना, और फौज का इस्तेमाल किया जाएगा। भला कौन यह सोच सकते थे कि मेडिकल दाखिला इम्तिहान की तैयारी बैठक प्रतिरक्षा मंत्री के घर पर होगी, और सरकारी समाचार बताएगा कि प्रधानमंत्री इस तैयारी पर नजर रख रहे हैं!
22 लाख बच्चों वाली नीट इम्तिहान तबाह हो जाने के बाद कई बच्चे खुदकुशी कर चुके हैं, और इन बच्चों के परिवार में जो बेचैनी आई है, इम्तिहान अगले महीने दुबारा होने की वजह से परिवारों की गर्मियों की छुट्टियां जिस तरह तबाह हुई हैं, उनसे लगता है कि करीब एक करोड़ या उससे अधिक लोग ही नीट की असफलता से प्रभावित हुए हैं। अब इसके बाद करीब 18 लाख बच्चों वाली सीबीएसई के बोर्ड इम्तिहान की उत्तरपुस्तिकाएं ऑनलाईन जांचने में जो गड़बडिय़ां हुई हैं, वे देश के करोड़ों छात्र-छात्राओं, और उनके परिवारों को सदमा पहुंचाने वाली हैं। अब जब सरकार ने यह माना है कि कुछ मामलों में गड़बडिय़ां हुई हैं, और ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें उत्तरपुस्तिकाएं ऑनलाईन डाली गईं, तो वे इतनी धुंधली थी कि जांचने वाले शिक्षक उन्हें पढ़ नहीं पा रहे थे, जिन छात्र-छात्राओं ने अपनी उत्तरपुस्तिकाएं मांगीं वे यह देखकर सदमे में आ गए कि कई प्रश्नों के उत्तर जांचे नहीं गए, या नंबर जोड़े नहीं गए। अब केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने यह माना है कि सीबीएसई इम्तिहान में परीक्षार्थियों के लिखे गए 40 करोड़ पन्नों की जांच में बड़ी चूक हुई है। करीब 4 लाख छात्र-छात्राओं ने दुबारा जांच के लिए आवेदन किया है। जब तकनीकी सिस्टम इस हद तक खराब साबित हो चुका है, कि किसी की कॉपियां किसी और नंबर पर चढ़ा दी गई हैं, किसी की कॉपियों के पन्ने गायब हैं, तो इन 4 लाख के आवेदनों से परे भी विश्वसनीयता खत्म है। केन्द्रीय शिक्षा मंत्री की कल की बैठक में आईआईटी के प्रोफेसरों को भी बिठाया गया था, और सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की कि उसका तकनीकी सिस्टम एकदम ठीक है। दूसरी तरफ 19 साल के एक छात्र निसर्ग अधिकारी का दावा है कि सीबीएसई की वेबसाइट को उसने बड़ी आसानी से हैक कर लिया, और इसकी सुरक्षा एकदम कमजोर होने के बारे में उसने भारत सरकार को फरवरी में ही अलर्ट कर दिया था। उसने अपने सार्वजनिक ब्लॉग में लिखा है कि सीबीएसई पोर्टल में दाखिला और छेडख़ानी आसानी से हो सकते हैं।
इस बीच यह भी देखने की जरूरत है कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अभी कुछ दिन पहले जब सीबीएसई इम्तिहान में गड़बड़ी का बयान दिया, तो केन्द्र सरकार और सीबीएसई बोर्ड दोनों ने जमकर उनकी बात का खंडन किया था। सरकार में तो राजनीतिक लोग रहते हैं, उनका तो राजनीतिक जवाब देना समझ में आता है, लेकिन बोर्ड ने भी राहुल के आरोपों का आनन-फानन खंडन किया था, और उन्हें गुमराह करने वाला बताया था। अब शिक्षा मंत्री ने इन सब खामियों, और गड़बडिय़ों की जिम्मेदारी खुद ली है। सीबीएसई को लेकर राहुल से परे भी, जब एक परीक्षार्थी लडक़े ने सोशल मीडिया पर उसकी उत्तरपुस्तिकाओं को लेकर हुई धांधली के बारे में लिखा, तो दसियों हजार लोगों ने उसे धिक्कारना शुरू कर दिया, और कुछ जाने-माने लोगों ने उसे देशद्रोही और पाकिस्तानी करार देना भी शुरू कर दिया था, बाद में बोर्ड ने खुद माना कि उसकी उत्तरपुस्तिकाओं में गड़बड़ी हुई थी। एक छोटे से स्कूली बच्चे, वह भी हिन्दू बच्चे की शिकायत सही साबित होने के पहले ही उसे गद्दार साबित करके पाकिस्तान भेजने के फतवे दिए जाने लगे थे।
सरकारों को अपनी खामियों और नाकामियों को मंजूर करना आना चाहिए। चाहे प्रभावित लोग हों, चाहे सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया, या विपक्ष, जिस किसी से मिली जानकारी से सरकारें अपनी गड़बड़ी ठीक कर सकती हैं, उनकी बात का सम्मान किया जाना चाहिए। परिपक्व लोकतंत्रों में सावधान करने वाले, विसल ब्लोअर का सम्मान किया जाता है, उसे देश से निकालने का फतवा नहीं दिया जाता। नीट के 22 लाख बच्चों और सीबीएसई के 18 लाख बच्चों की दिमागी हालत देखें, तो आज सरकार की असफलता से इन 40 लाख बच्चों का वर्तमान बिगड़ गया है। ये संदेह के बीच कई हफ्ते या महीने गुजारेंगे, और दुबारा इम्तिहान, पुनर्मूल्यांकन के बाद भी उनका पूरा भरोसा नहीं लौट पाएगा। इस नौबत की गंभीरता को भी अगर सरकार नहीं समझेगी, तो ऐसी और गलतियां भी होती रहेंगी। सरकारों को आरोपों का राजनीतिक जवाब देने के पहले अपने घर को भी जांच-परख लेना चाहिए, वरना जैसी शर्मिंदगी की नौबत आज है, वह आती रहेगी।
विधायक की गुंडागर्दी पर तिलचट्टों की जिम्मेदारी
28 मई 2026
छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा के एक विधायक ने अपने समर्थकों के साथ सार्वजनिक जगह पर, सार्वजनिक रूप से एक नायब तहसीलदार को मारा। इस मौके पर इस छोटे अफसर के साथ उसके एक बड़े अफसर भी थे, जिन्होंने विधायक को रोकने की कोशिश की, लेकिन विधायक ने अपनी ही सरकार के अधिकारी को पीटने से परहेज नहीं किया। सत्तारूढ़ विधायक के लिए बेहतर और आसान तरीका अफसर को हटवा देने का हो सकता था, लेकिन उन्होंने सडक़ पर अपनी मर्जी का ‘इंसाफ’ कर दिया। न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, और न सिर्फ भाजपा राज में, बहुत सारे प्रदेशों में अलग-अलग सत्तारूढ़ पार्टियों के नेता सरकारी अमले से, या सार्वजनिक जगहों पर गुंंडागर्दी करते दिखते हैं, और हाल के बरसों में मोबाइल-कैमरों की मेहरबानी से वे सुबूत भी छोड़ जाते हैं। कई नेता अफसरों से टेलीफोन पर गंदी गालियों, और धमकियों से बात करते हैं, और ऐसी कॉल रिकॉर्डिंग से सोशल मीडिया पटा हुआ है। सांसद, विधायक, या उनसे छोटे दर्जे के नेताओं के पांव भी जमीन पर पडऩा बंद हो जाते हैं, और दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा हुआ रहता है।
विपक्षी पार्टी तो अपनी भड़ास निकालने के लिए सरकारी अमले के साथ बदसलूकी कर सकती है, और उसके खिलाफ कड़ी पुलिस कार्रवाई भी हो सकती है, होती भी है, लेकिन जब सत्तारूढ़ पार्टी के नेता ऐसी हरकतें करते हुए रिकॉर्ड होते हैं, तो सरकार के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात रहती है। पड़ोस के मध्यप्रदेश में एक किसी जिले के कलेक्टर के बंगले पर पहुंचकर धमकी देने वाले सत्तारूढ़ भाजपाई विधायक को पार्टी ने ही फटकार लगाई थी, लेकिन इससे विधायकों को कोई सबक मिला हो ऐसा नहीं है। अगली घटना एक दूसरे विधायक के साथ हुई जिसके बेटे ने सडक़ पर बददिमागी से लोगों को कुचला था, और विधायक ने इसके बाद अफसरों को खुली धमकी का वीडियो जारी किया था। सत्तारूढ़ नेताओं को यह रियायत जरूर मिल जाती है कि उनके खिलाफ पुलिस आसानी से कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करती, और सरकार भी उनके पीछे नहीं पड़ती। मध्यप्रदेश में ही एक मंत्री ने भारतीय फौज की एक बड़ी महिला अधिकारी को मुस्लिम होने की वजह से आतंकियों की बहन कहा था, और इसके बारे में अदालत के बार-बार के निर्देशों पर भी सरकार ने उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की थी। फिर मानो अपनी ही तौहीन और बेइज्जती से थककर अदालत ने ही एक और जांच का आदेश दे दिया, ताकि मंत्री कुर्सी पर बना रहे, और सत्ता का कोई राजनीतिक असुविधा न हो। भारत सरकार की हाल के बरसों की सबसे बड़ी फौजी कार्रवाई, ऑपरेशन सिंदूर का ब्यौरा हर दिन मीडिया को देने वाली कर्नल सोफिया ही खुली बेइज्जती करने वाले मंत्री पर आज तक न अदालती आंच आई है, और न ही राजनीतिक या सरकारी आंच। जाहिर है कि अपनी पार्टी, और पार्टी की सरकार की ऐसी मेहरबानी से पार्टी के दूसरे नेताओं में भी बददिमागी आती है, और वे भी बदसलूकी और गुंडागर्दी करने लगते हैं।
लेकिन हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में यह सिलसिला किसी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए उस वक्त तक तो नुकसानदेह साबित नहीं होता, जब तक उस पार्टी के पक्ष में लहर चल रही हो। लेकिन जिस दिन चुनावी मुकाबला कड़ी टक्कर का हो जाएगा, उस दिन सत्तारूढ़ नेताओं की गुंडागर्दी के वीडियो आखिरी दिन, आखिरी पल मतदाताओं का संतुलन इतना बदल सकते हैं कि दो-चार हजार वोट की होने वाली जीत हार में बदल जाए। सत्ता की बददिमागी की ताकत इतनी रहती है कि सत्तासंपन्न नेता की बड़ी गाड़ी का हॉर्सपावर भी उसका मुकाबला नहीं कर पाता। और जब ये दोनों जुड़ जाते हैं, तो ऐसी गाड़ी मध्यप्रदेश में राह चलते पैदल लोगों को कुचलती है, या यूपी में किसान आंदोलन के लोगों को कुचलकर मार डालती है। यह बददिमागी जगह-जगह सामने आती है। छत्तीसगढ़ में ही कुछ ऐसे बड़े नेता हुए हैं जिनकी सार्वजनिक रूप से गंदी गालियों के वीडियो अगर फोन या कम्प्यूटर पर अचानक बजने लगें, तो लोगों को आसपास के लोगों के बीच भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। अभी जिस तरह सत्तारूढ़ विधायक ने छत्तीसगढ़ में अफसर को सार्वजनिक रूप से मारा है, ऐसा ही बहुत साल पहले बिलासपुर में हुआ था, जब सर्किट हाऊस में बिना वजह नाराज हुए एक मंत्री ने एक डिप्टी कलेक्टर को थप्पड़ मार दी थी। ऐसे कई मामलों में सरकारी अधिकारी-कर्मचारी को खून का घूंट पीकर रह जाना पड़ता है क्योंकि पानी में रहकर मछली मगरमच्छ से बैर भला कैसे पाल और निभा सकती है? आमतौर पर ऐसी रिपोर्ट हो जाने के बाद, और जुर्म दर्ज हो जाने के बाद भी शिकायतकर्ता कर्मचारी-अधिकारी पर इतना राजनीतिक और सरकारी दबाव पड़ता है कि वे खुद अपनी शिकायत को कमजोर करते हैं, और किसी तरह इस नौबत से निकलना चाहते हैं। लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश के इंदौर में वहां के सबसे ताकतवर नेता के विधायक बेटे ने क्रिकेट की बैट से दिनदहाड़े खुली सडक़ पर म्युनिसिपल अफसर को पीटा था, और बाद में उसी पार्टी की सत्ता के रहते हुए उस अफसर ने अदालत में पीटने वाले को पहचानने से इंकार कर दिया था। उस दिन भी इस पिटाई और हिंसा के अनगिनत वीडियो इंटरनेट पर मौजूद थे, आज भी हैं, लेकिन अगर सरकारी नौकरी करना है, तो सरकारी अमले को अपमान झेलते हुए यह बर्दाश्त करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के कहे हुए देश के हर प्रदेश में एमपी-एमएलए के किए हुए जुर्म पर तेजी से सुनवाई के लिए अलग से अदालतें बनी हुई हैं, लेकिन वहां पर मामलों का क्या नतीजा होता है, यह अभी इस पल हमारे सामने नहीं है। हम इतना ही कह सकते हैं कि नेताओं की बदजुबानी, बदसलूकी, और उनकी हिंसा के सारे ऑडियो-वीडियो लोगों को संभालकर रखने चाहिए, और अगली बार जब ये नेता किसी चुनाव प्रचार के लिए आएं, तो उनसे इस बारे में सवाल करने चाहिए। यह काम आसान इसलिए नहीं रहेगा कि राजनीतिक गुंडागर्दी की ताकत से लैस नेता और उनके आसपास के गुंडे ऐसे दिक्कत के सवाल उठाने वाले लोगों को फिर पीट सकते हैं, लेकिन ऐसे सवालों के मौके पर लोगों को कई-कई मोबाइल कैमरे पर वीडियो रिकॉर्डिंग जारी रखना चाहिए, ताकि अगर कोई ताजा गुंडागर्दी होती है, तो वह भी अलग-अलग कई एंगल से रिकॉर्ड हो जाए। शायद बड़े राजनीतिक दलों की ऐसी ही गुंडागर्दी पर नजर रखने के लिए, उस पर सवाल उठाने के लिए तिलचट्टों की जरूरत पड़ती है, जिन्हें खुद बर्बाद हो जाने का बहुत अधिक डर नहीं रहता। हम तिलचट्टों की किसी सरकार की कल्पना जितने दूर नहीं जाते, लेकिन हम सवाल पूछने वाले तिलचट्टों की कल्पना जरूर करते हैं। आज जो गुंडागर्दी रिकॉर्ड हो रही है, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो, या फिर किसी सरकारी अमले की हो, ऐसी हर गुंडागर्दी की रिकॉर्डिंग लेकर तिलचट्टों को आगे बढऩा चाहिए। जिन लोगों को तिलचट्टों की खूबियां नहीं मालूम हैं, वे जान लें कि ये सीमेंट खाकर भी जिंदा रह लेते हैं, और परमाणु युद्ध होने पर उसके बाद अगर कोई एक प्राणी धरती पर जिंदा रहेंगे, तो वे तिलचट्टे ही होंगे। इसलिए तिलचट्टा-पार्टी को, या ऐसी सोच रखने वाले लोगों को राजनीतिक गुंडागर्दी पर सवाल खड़े करते ही रहना चाहिए।
डिजिटल-इंडिया में आसान है धोखाधड़ी घटाना, सरकार पड़ताल ऐप मुहैया कराए...
27 मई 2026
मध्यप्रदेश के देवास में अभी इतवार को 42 नौजवान अपने परिवारों सहित एक मंदिर में शादी का इंतजार कर रहे थे। दूल्हे थे, तो जाहिर है कि सजे-धजे थे, रिश्तेदारों को लेकर आए थे। सुबह से रात हो गई, लेकिन न कोई दुल्हन पहुंची, न कोई शादी हुई। बाद में इन निराश और ठगे गए लोगों की शिकायत पर 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिन्होंने इंदौर के एक अनाथाश्रम की लड़कियों से इनकी शादी करवाने का वायदा किया था, और इसके लिए रजिस्ट्रेशन के नाम पर वसूली की थी। धोखा देने के लिए सोशल मीडिया पर से किन्हीं भी लड़कियों की तस्वीरें निकाल ली गई थीं, और यह भी कहा गया था कि सामूहिक विवाह में सीएम खुद आएंगे, और 51-51 हजार के चेक सबको देंगे। यह भी कहा गया था कि पहले दिन लड़कियों को मिलवाया जाएगा, शादी में दहेज का सामान भी मिलेगा। बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि इनमें से अधिकतर दूल्हों की उम्र 40 साल के आसपास थी, और कुछ दूल्हे 60 साल के भी थे।
भारत में शादी का वायदा करके बालिग या नाबालिग से देहसंबंध बनाना, शादी का झांसा देकर किसी नकली दुल्हन से शादी करा देना जो कि शादी के तुरंत बाद गहने लेकर भाग जाए, ऐसे मामले भारत में आते ही रहते हैं। कुछेक तो ऐसी लुटेरी दुल्हनों की खबरें आती हैं जो कि पेशेवर अंदाज में दर्जन-दर्जनभर लोगों से शादी कर चुकी हैं, और भाग चुकी हैं। कई ऐसी शिकायतें पुलिस तक पहुंचती हैं कि किसी व्यक्ति ने अपना नाम-धरम कुछ और बताया, और शादी के बाद लडक़ी को पता लगा कि वह तो किसी दूसरे धरम का है, और उसका नाम भी कुछ और है। ऐसे कई मामलों में बाद में यह भी निकलता है कि यह ताजी शादी करने वाला दूल्हा असल में बासी है, और पहले से उसके बीवी-बच्चे भी हैं। ऐसे बहुत से धोखे भारत की लड़कियों के साथ देश के बाहर भी होते आए हैं, और अब ऐसे रिश्तों के मामले में भारत सरकार जांच-पड़ताल में मदद भी करती है, किसी दूसरे देश में जाकर गलत रिश्ते में फंस गई, धोखा खा चुकी लडक़ी की मदद तो करती ही है। अधिक जायज यह कहना होगा कि दूसरे देशों में भी वहां बसी हुई लड़कियां या महिलाएं भी भारत के मर्दों को ऐसा ही धोखा देती हैं, जैसा कि वहां से कुछ भारतवंशी मर्द देते हैं।
अब जब भारत में सरकार ने जिंदगी की बहुत सारी चीजों को डिजिटल कर दिया है, और हर नागरिक के पास यह अधिकार है कि वह भारत सरकार के मुफ्त के एप्लीकेशन, डिजिलॉकर पर अपना दस्तावेज रख सकते हैं, तो सरकार को रिश्तों की धोखाधड़ी रोकने के लिए कुछ और पहल भी करनी चाहिए। यह हिफाजत इसलिए जरूरी है कि जिंदगियां तबाह न हों, और फिर यह भी तो है कि किसी भी जुर्म की जांच और मुजरिम को सजा दिलवाने की जिम्मेदारी घूम-फिरकर सरकार पर ही तो आती है। इसलिए सरकारों को यह कोशिश करनी चाहिए कि ऐसी धोखाधड़ी की रोकथाम का तरीका निकाला जाए, ताकि बाद में जुर्म की नौबत ही न आए, न ही जांच और मुकदमे की, और न ही जेल की। यह सब कुछ सरकार और समाज पर बोझ रहता है।
आज जब हिन्दुस्तान में एक सिमकार्ड भी बिना आधार कार्ड के नहीं खरीदा जा सकता, इस किस्म के आधा-एक दर्जन पहचानपत्र में से किसी के बिना न राशन कार्ड बन सकता, न पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हो सकती, और न ही ड्राइविंग लाइसेंस बन सकता। ऐसे में सरकार को यह चाहिए कि किसी भी तरह की मैच मेकिंग के लिए आधार कार्ड या किसी दूसरे पहचानपत्र के आधार पर शिनाख्त का एक तरीका मुहैया कराए। हमारी नजर में यह एक बड़ा आसान तरीका रहेगा जिसमें लोगों को डिजिलॉकर में अपने सारे पहचानपत्र, और जरूरी दस्तावेज डालने के लिए बढ़ावा दिया जाए। इसके बाद किसी को काम पर कर्मचारी या कामगार को रखना है, किसी को रिश्ता करना है, किसी को ट्यूशन के लिए शिक्षक तय करना है, तो ऐसे सब मौकों पर लोग एक-दूसरे को अपना आधार कार्ड, या अपना दूसरा पहचानपत्र चाहें तो दे सकते हैं, और आगे की जांच के लिए लोग भारत सरकार के किसी मोबाइल ऐप पर जाकर उन नंबरों को डालकर देख सकते हैं कि जानकारी सही या नहीं। ऐसी सहूलियत का बेजा इस्तेमाल न हो, इसलिए आज भी आधार-ओटीपी की व्यवस्था रहती है, और जब तक लोग अपने फोन पर आया हुआ ओटीपी नहीं देते हैं, उनके आधार कार्ड का कोई ऑनलाईन इस्तेमाल नहीं हो सकता। आज अगर कोई अपने को किसी एक जात-धरम का बता रहे हैं, अपनी कुछ उम्र बता रहे हैं, अपना कोई पता बता रहे हैं, तो उनसे कोई भी संपर्क या संबंध रखना चाहने वाले लोग उनसे आधार-पड़ताल की मांग कर सकते हैं। आज किसी के ड्राइविंग लाइसेंस को देखकर उसे काम पर रखना पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहता। ड्राइविंग लाइसेंस के नंबर से कुछ साबित नहीं होता। ऐसे हर मामले में लोगों को आधार कार्ड की मांग करके कार्डवाले व्यक्ति की इजाजत से ऑनलाईन यह देख लेना चाहिए कि उनकी बताई गई जानकारी सही है या नहीं।
इसमें कहीं भी निजता प्रभावित नहीं होती है, क्योंकि जो लोग चाहेंगे, वे ही अपना आधार कार्ड दिखाएंगे, और उसकी जांच की इजाजत के लिए आया हुआ ओटीपी बताने पर ही उनकी जानकारी उजागर हो सकेगी। यह एक ऐसी सहूलियत हो सकती है, जो लोगों की अनुमति से ही इस्तेमाल की जा सके। ऐसा होने पर लोगों का धोखा खाना कम होने लगेगा। यह भी हो सकेगा कि लोग आगे शक होने पर अपनी शिनाख्त साबित करने के लिए डिजिलॉकर पर अपने डाले हुए बाकी दस्तावेज भी देखने की इजाजत दे सकेंगे। लोग जब किसी से शादी करना चाहते हैं, तो अपने बारे में ऐसी बुनियादी जानकारी दिखाकर अपनी पुख्ता शिनाख्त साबित कर सकते हैं। चूंकि यह पूरा सिलसिला शुरू से आखिर तक वैकल्पिक रहेगा, इसमें कुछ भी जबर्दस्ती या अनिवार्य नहीं होगा, इसलिए किसी की जिंदगी की गोपनीयता खत्म नहीं होगी। आज भी किसी निजी कंपनी में भी नौकरी पाने के लिए जब अर्जी भेजी जाती है, तो उसके साथ कुछ लोगों का हवाला भी देना पड़ता है, जिन्हें फोन करके कंपनी आवेदक के बारे में दरयाफ्त कर सके।
भारत सरकार को पड़ताल, या ऐसे किसी और नाम वाला एक मोबाइल ऐप बनाकर देश का आधार-डाटा, डिजिलॉकर का डाटा, और बाकी किस्म की शिनाख्त-जानकारी ऑनलाईन रखने का एक इंतजाम करना चाहिए। जो शरीफ लोग होंगे, उन्हें जरूरत के समय अपनी पहचान साबित करने से कोई परहेज नहीं होना चाहिए। जो लोग अपनी पहचान उजागर करने के साथ उसकी आगे जांच-पड़ताल के लिए आधार-ओटीपी देंगे, उनके ऑनलाईन रिकॉर्ड से यह भी दिख जाना चाहिए कि उनके नाम पर कोई जुर्म दर्ज हैं क्या। जिन लोगों को अपने जुर्म छुपाने की जरूरत हो, वे लोग अपने आधार कार्ड, और उसके इस्तेमाल के लिए आने वाले ओटीपी देने से मना कर सकते हैं। अगर केन्द्र सरकार ऐसा इंतजाम करेगी, तो देश में हर दिन धोखाधड़ी के दसियों हजार मामले कम हो जाएंगे। जिन लोगों को शिनाख्त उजागर न करनी हो, या जिन लोगों को बिना शिनाख्त की पड़ताल के लोगों को काम पर रखना हो, शादियां करनी हो, उनका हिसाब-किताब वे लोग जानें, उनके लिए बाद में थाना और कोर्ट-कचहरी तो खुले रहेंगे ही। डिजिटल-इंडिया का जो नारा है, उसका एक तर्कसंगत विस्तार करने की जरूरत है, जब बहुत सारी चीजें डिजिटल हैं, तो उनका इस्तेमाल रोजाना की धोखाधड़ी को घटाने का एक विकल्प जनता को देने में किया जाना चाहिए। जो इस विकल्प का इस्तेमाल करना नहीं चाहते, उनके लिए सब कुछ आज की तरह जारी रह सकता है, उन्हें इस सावधानी के इस्तेमाल के लिए मजबूर करने की कोई जरूरत नहीं है।
गाय दूध दे तब तक ही माँ, उसके बाद काटने लायक!
26 मई 2026
बंगाल में भाजपा की सरकार आने के बाद दुबारा जारी किया गया एक सरकारी आदेश बड़ा बवाल खड़ा कर रहा है। इसमें नया कुछ नहीं है, पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 को ही कड़ाई से लागू करने के लिए कहा गया है। इसे चुनौती देते हुए कुछ राजनीतिक दल, और कई पशु कारोबारी संगठन हाईकोर्ट तक पहुंचे, लेकिन हाईकोर्ट ने इसमें कोई दखल देने से मना कर दिया। यह आदेश गौवंशीय पशुओं को काटने को लेकर 1950 के एक कानून को दुहराता है जिसमें कहा गया है कि गाय, बैल, बछड़े, भैंस, आदि गौवंशीय पशुओं का वध तभी किया जा सकेगा जब उसके लिए सरकारी डॉक्टर की तरफ से सर्टिफिकेट जारी होगा। यह इजाजत तभी मिलेगी जब ऐसे पशु की उम्र 14 वर्ष से अधिक हो, वह कोई काम करने के लायक न हो, आगे बच्चे पैदा करने में अयोग्य हो, या स्थाई रूप से विकलांग या रोगग्रस्त हो। डॉक्टर के सर्टिफिकेट के बाद भी ऐसे पशुओं को म्युनिसिपल द्वारा निर्धारित बूचडख़ानों में ही काटा जा सकेगा। यह कानून 1950 का है, आज की भाजपा सरकार का बनाया हुआ नहीं है। इस पौन सदी में किस सरकार ने इसका कितनी कड़ाई से इस्तेमाल किया, वह इतिहास तो अब न कहीं दर्ज होगा, और न ही अब किया जा सकता। फिर भी भाजपा सरकार ने इसे सख्ती से लागू करने भर का काम किया है।
बकरीद एक ऐसा मुस्लिम त्यौहार है जिसमें बड़ी संख्या में अलग-अलग जानवरों की कुर्बानी देने की परंपरा है, और इस कड़ाई के कारण इस बार की बकरीद पर गौवंश के पशुओं की कुर्बानी सरकारी डॉक्टर की इजाजत से ही दी जा सकेगी, वह भी किसी बूचडख़ाने में। मतलब यह कि धार्मिक रूप से, कई जगहों पर सार्वजनिक स्तर पर जो कुर्बानी दी जाती थी, वह अब गौवंश के साथ तो इस बकरीद नहीं हो सकती। इससे गौवंश, और भैंसवंश के पशुओं की खरीद-बिक्री एकदम ठप्प हो गई है, और पशु कारोबारियों में बड़ी संख्या ऐसे गैरमुस्लिम लोगों की है जिन्होंने इस मौके के कारोबार के लिए खासा पूंजीनिवेश कर रखा था, और पशु इकट्ठा कर रखे थे। लेकिन अब जब सरकार ने पिछले कानून को सख्ती से लागू करना तय कर लिया है, हाईकोर्ट ने तमाम याचिकाओं का तेजी से निपटारा करते हुए यह तय कर लिया है कि गाय की कुर्बानी इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। मुस्लिम समाज के बहुत से नेताओं ने यह सार्वजनिक अपील की है कि गौवंश की कुर्बानी न दी जाए। मुस्लिम नेताओं ने केंद्र सरकार से यह भी मांग की है कि पूरे देश में गौवंश को मारने पर कानूनी रोक लगाई जाए। ऐसे में अब कुछ राजनीतिक दल, कुछ मुस्लिम संगठन, और कुछ पशु कारोबारी हाईकोर्ट में कुर्बानी की ऐसी प्रथा को जारी रखने की याचिकाओं को खारिज पा चुके हैं, और धंधा मंदा जरूर रहेगा, लेकिन गौवंश की कुर्बानी अब सजा की हकदार रहेगी।
बकरीद के निपट जाने के बाद भी बंगाल में बूचडख़ानों में जानवरों को काटने के लिए 1950 के नियम को देखें, तो राज्य में गौवंश को काटने पर कोई अलग से रोक नहीं है। यह बात सत्तारूढ़ भाजपा की देश भर की रीति-नीति के साथ कुछ विरोधाभास वाली है, और इसे कानून के साथ-साथ जानवरों की जिंदगी से जोडक़र भी देखने की जरूरत है। हमने जब भारत में गौवंशीय पशुओं, गाय और भैंस की उम्र और उत्पादकता का रिश्ता देखा, तो आंकड़े बताते हैं कि देसी गाय की उत्पादक उम्र 8 से 12 साल रहती है, क्रॉस ब्रीड गाय की उत्पादक उम्र 6 से 9 साल, और भैंस की उत्पादक उम्र 10 से 14 साल। इन जानवरों की उत्पादक उम्र का मतलब इनके दूध देने से है। अब इसके बाद इन जानवरों की औसत और अधिकतम संभावित उम्र अगर देखें, तो देसी गाय की औसत उम्र 15-20 साल रहती है, अधिकतम उम्र 22-25 साल। क्रॉस ब्रीड गाय की औसत उम्र 12 से 16 साल, और अधिकतम आयु 18-20 साल। भैंस की औसत उम्र 18-22 साल, और अधिकतम उम्र 25-28 साल। जानवरों के जानकार तथ्य बताते हैं कि बोलचाल में गाय-भैंस की औसत उम्र 15-20 साल कही जाती है। हमने यह पता लगाने की कोशिश की कि औसत उत्पादक उम्र के बाद ये जानवर औसत और कितना जी सकते हैं। देसी गाय दूध देना बंद करने के बाद औसत 4-8 साल रह सकती है, और अधिकतम उम्र 8 से 10 साल भी। क्रॉस ब्रीड गाय दूध देना बंद करने के बाद 4 से 7 साल औसतन जीती है, लेकिन वह अधिकतम 7 से 9 साल भी जी सकती है। भैंस उत्पादक उम्र के बाद 6 से 10 साल औसतन जी सकती है, लेकिन उसकी अधिकतम उम्र 10-12 साल भी हो सकती है।
अब इन पशुओं के जो मालिक हैं, उनके लिए उत्पादकता खत्म होने के बाद 8-10 साल इन्हें पालना बड़ा भारी पड़ेगा, यह समझा जा सकता है। चूंकि सरकार का कानून अभी अपनी पहली बकरीद के पहले खुलासे से सामने आया है, और उसने गोवध पर कोई पूरी पाबंदी नहीं लगाई है, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि गाय-भैंस को काटने की इजाजत कुछ शर्तों के साथ जारी रहेगी, और इन शर्तों को हम ऊपर गिना चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि 8 से 12 बरस तक जो गाय गऊमाता रहेगी, वह बाद के बरसों में किस तरह काटी जा सकेगी, क्या उत्पादकता खत्म होने से गऊमाता का उसका दर्जा खत्म हो जाएगा? और क्या भैंसी-मौसी के साथ भी दूध बंद होने के साथ-साथ लगाव खत्म हो जाएगा, और सरकारी इजाजत से उसे काटा जा सकेगा? सरकार का ताजा आदेश चूंकि हाईकोर्ट में काफी सख्त जांच और आंच झेल चुका है, इसलिए हम उसमें कोई कमजोरी नहीं देख रहे हैं। उस आदेश के तहत यह इजाजत है कि उत्पादकता खत्म होने, या 14 बरस की उम्र हो जाने, या स्थाई विकलांगता या बीमारी की वजह से इन पशुओं को बूचडख़ाने में काटा जा सकेगा।
अब एक बुनियादी सवाल हमारे मन में यह उठता है कि गाय से माँ जैसा रिश्ता, उससे एक धार्मिक और भावनात्मक लगाव, यह सब क्या उसकी उत्पादकता से जुड़ा हुआ है? क्या जब तक दूध मिले, तभी तक वह माँ रहेगी? आज देश में ऐसे इंसानों को सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पर कोसा जाता है, जो अपने बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। तो क्या बंगाल में अब भाजपा की सरकार आने के बाद भी गऊमाता दूध देने तक माता रहेगी, और उसके बाद बूढ़ी हो जाने, सूख जाने, बीमार या विकलांग हो जाने पर वह काट दी जाएगी? बात सुनने में कुछ दिक्कत की लग सकती है, लेकिन जब कभी किसी सैद्धांतिक ईमानदारी का कोई सवाल उठाया जाएगा, तो वह नुकीले कांटों की तरह कुछ असुविधा का तो रहेगा ही। विनायक दामोदर सावरकर ने गाय को एक आम पशु लिखा था, और उसकी उत्पादकता खत्म हो जाने के बाद उसे काट देने की खुली सार्वजनिक वकालत की थी। उनके लिखे हुए लेख निर्विवाद रूप से मौजूद हैं, और उन्होंने गाय को पशु से अधिक कुछ मानने को मूर्खतापूर्ण कहा था। आज बंगाल में नई सरकार के लागू किए जा रहे पुराने कानून से सावरकर की सोच मजबूती से लागू हो रही है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा के सामने इससे कुछ नैतिक सवाल भी उठ खड़े होते हैं कि दूध देना बंद हो जाने पर गऊमाता का माता रहना भी जिस तरह खत्म कर दिया जा रहा है, उससे क्या ऐसा नहीं लग रहा कि इंसान गऊमाता के लिए भी उतना ही अहसानफरामोश हो रहा है, जितना कि वह अपने इंसानी माँ-बाप के लिए फायदा पूरा निचोड़ लेने के बाद हो जाता है?
यह एक अलग बात है कि भारत अपने आपमें एक योरप की तरह बहुत सी अलग-अलग संस्कृतियों वाले प्रदेशों का देश है। भाजपा के ही केन्द्रीय मंत्री, और कुछ मुख्यमंत्री अरूणाचल, गोवा, या केरल जैसे राज्यों में गोमांस के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन गौवंश के साथ जिस तरह की भावनाएं बाकी राज्यों में जुड़ गई हैं, उनसे यह असुविधाजनक सवाल खड़ा ही रहेगा कि गाय कहां-कहां माँ है, किस उम्र तक माँ है, किस मकसद से माँ है, और कब उसे माँ की कुर्सी से रिटायर करके पशु बना दिया जाएगा। सोचकर देखिए!
ताकत ही कानून है, ट्रम्प हो, या रायपुर का मॉल..
25 मई 2026
भारत के अलग-अलग राज्यों में सार्वजनिक नियमों पर अमल का अलग-अलग हाल रहता है, देश के कई प्रदेशों में बिना हेलमेट दुपहिया चलाने वाले, या दुपहियों पर बैठने वाले का तुरंत चालान होता है, लेकिन कई दूसरे प्रदेश या शहर देश भर में लागू इस नियम पर अमल पर कोई दिलचस्पी नहीं रखते। इसी तरह शहरी विकास के नियम कोई प्रदेश मानते हैं, कोई प्रदेश नहीं मानते हैं। कहने के लिए हर प्रदेश बड़े कड़े नियम बनाकर चलते हैं, और नियम जितने कड़े रहते हैं, वसूली-उगाही की गुंजाइश उतनी ही अधिक हो जाती है। मतलब यह कि दिखावे के लिए हाथी दांत बहुत बड़े-बड़े बनाए जाते हैं, और फिर हाथी दांत जैसे कीमती दाम वसूलने के लिए दिखावे के ऐसे नियमों का इस्तेमाल होता है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही हम देखते हैं कि ताकतवर लोग अपने पेट्रोल पंप, रेस्त्रां, या मॉल के सामने डिवाइडर काटकर आने-जाने का रास्ता बना लेते हैं, उन पर कोई नियम लागू नहीं होता। राजधानी रायपुर में ही एक एक्सप्रेस हाईवे है, जिसके किनारे बसे हुए छोटे-छोटे बहुत गरीब घरवालों को भी उस सडक़ पर आने की छूट नहीं रहती, क्योंकि तेज रफ्तार ट्रैफिक में वे कुचल न जाएं। सरकार ने इसके लिए नियम भी घोषित किया हुआ है, लेकिन अभी एक मॉल के लिए इस एक्सप्रेस हाईवे पर रास्ता खोल दिया गया। इसके पहले शहर का, या प्रदेश का एक बड़ा कुख्यात बिल्डर अपनी एक महंगी कॉलोनी का रास्ता सरकारी नियमों के खिलाफ इस सडक़ पर खोल चुका था, उसके खिलाफ भारी शिकायत हुई, लोग अस्पताल तक पहुंचे, और तब जाकर वह रास्ता अभी रोका गया है, यह अलग बात है कि दसियों लाख से बनाए गए अवैध गेट का ढांचा अब तक खड़ा है। प्रदेश का कोई भी शहर हो, ताकतवर नेताओं के पेट्रोल पंपों के सामने सारे नियम-कायदे तोडक़र डिवाइडर काट दिए जाते हैं, ताकि नेताजी के धंधे में कोई कमी न रहे। रायपुर के ही कपड़ा बाजार में कारोबारियों ने नियमों के खिलाफ जाकर पार्किंग की जगह पर दुकानों के दरवाजे खोल दिए थे, उसके खिलाफ म्युनिसिपल और प्रशासन ने सख्त कार्रवाई की, लेकिन बाजार की ताकत नेताओं तक इतनी थी, कि इस अवैध धंधे को फिर खोल दिया गया।
लोगों की अगर ताकत रहे, तो वे सरकार के नियमों को चुइंगम की तरह चबाकर जनता के मुंह पर थूक सकते हैं। इसके लिए सिर्फ नेता होना जरूरी नहीं रहता, परिवार के किसी दूसरे के नाम से कारोबार करने वाले अफसर भी खेत की जमीन पर शराब कारोबार कर सकते हैं, कोटवार की जमीन पर कब्जा कर सकते हैं, और हाईकोर्ट के हुक्म को कूड़ेदान में फेंक सकते हैं। राजनीति या पैसों की ताकत से बड़ा कोई संविधान नहीं होता। अवैध कब्जे और अवैध निर्माण, अवैध इस्तेमाल के इतने किस्म के मामले दस-दस, बीस-बीस बरस से अदालती आदेशों का मुंह चिढ़ाते हुए खड़े रहते हैं, कि अगर दस्तखत करने वाले जज उन्हें देख लें, तो हीनभावना से ग्रस्त होकर खुदकुशी ही कर लें।
आज जिस तरह की गुंडागर्दी पूरी दुनिया में ट्रम्प दिखा रहा है, जिससे यह साबित हो रहा है कि ताकत ही संविधान रहता है, अगर बेहिसाब ताकत रहे, तो एक अकेला व्यक्ति ही संयुक्त राष्ट्र रहता है। कुछ उसी तरह का हाल भारत के प्रदेशों में रहता है जहां पर शहरीकरण के, जमीन के इस्तेमाल के, निर्माण के नियम ताकतवर लोगों की जेब में रहते हैं। आम जनता की जिंदगी चाहे कितनी ही बर्बाद क्यों न होती हो, ताकतवर का कारोबार कभी बंद नहीं होता। शायद इसीलिए जो सबसे बड़े भू-माफिया रहते हैं, वे सरकार और राजनीति के सबसे बड़े लोगों को अपनी कॉलोनियों में सबसे पहले मिट्टी के मोल जमीनें देकर उसी तरह का प्रोटेक्शन खरीदते हैं, जिस तरह का प्रोटेक्शन पेशेवर माफिया पुलिस से खरीदता है। अब इसके साथ-साथ एक बात और जुड़ गई है कि धर्म के नाम पर प्रवचन करने वाले, या चमत्कारी पाखंडी लोगों के बड़े-बड़े आयोजन करवाकर भी अलग-अलग किस्म के माफिया प्रोटेक्शन खरीदते हैं। वैसे इसमें बहुत नया कुछ नहीं है क्योंकि धर्म को जुर्म से कोई अधिक परहेज तो कभी रहा भी नहीं। माफिया पर बनी हुई सबसे बड़ी फिल्म, गॉडफादर देखें तो समझ पड़ता है कि दुनिया के सबसे बड़े माफिया सरगना भी किस तरह धर्मालु रहते थे, आज भी रहते हैं। धर्म और धर्मगुरू, प्रवचनकर्ता, और आध्यात्मिक गुरू जैसे मुखौटों की आड़ में बड़े पैमाने पर अवैध कारोबार चलते हैं, और हमने तो कई ऐसे अतिधार्मिक अफसर देखे हैं, जिनके घर-दफ्तर में एक स्पीकर पर धार्मिक आवाज गूंजती ही रहती थी, बाद में वे दफ्तर में ही नगद रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ाए, अपनी धार्मिक पकड़ के चलते जमानत के बाद उसी कमाऊ कुर्सी पर जमे रहे, रिटायर हो जाने के बाद फिर से उसी कुर्सी पर नियुक्त हो गए। अपनी धार्मिक पकड़ की वजह से वे सरकार के लिए ऐसे जरूरी हो गए दिखते थे कि वे नहीं रहेंगे, तो अगली सुबह का सूरज नहीं निकलेगा।
ऐसी अलग-अलग कई किस्म की ताकतों के चलते नियम-कायदे तोडक़र जमीनों पर कब्जा, नाजायज इस्तेमाल, अवैध निर्माण, और फिर अवैध कारोबार, सभी कुछ चलता है। ऐसी ताकतों के चलते शहरी मास्टर प्लान बदलते हैं, और नक्शे पर ही रंग बदलने से पीले रंग का 20 रूपए का नोट हरे रंग का पांच सौ का हो जाता है। जहां आम जनता, गरीब जनता के ठेले-गुमटी भी शासन-प्रशासन की आंखों में चुभते हैं, वहां पर करोड़ों के अवैध निर्माण ताकत के झंडे की तरह लहराते रहते हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज जनता को कॉकरोच कहने में कुछ भी गलत नहीं समझते, जब रोजगार खो देने वाली ऐसी जनता उठ खड़ी होगी, तो सरकार और अदालत, दोनों को दिक्कत होगी। हवा का रूख तो दिखना शुरू हो ही चुका है।
हर आधे घंटे में दहेज प्रताडऩा, हर डेढ़ घंटे में एक दहेज हत्या
24 मई 2026
अभी लगातार भोपाल सहित दूसरे कुछ शहरों में दहेज हत्या के इतने चर्चित मामले सामने आए कि एक बार फिर दहेज प्रताडऩा पर नजर डालना जरूरी लगने लगा। भारत सरकार के दर्ज जुर्म के आंकड़े बताते हैं कि देश में दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण हर 30 मिनट में एक जुर्म दर्ज होता है। अब मानो यह काफी न हो, तो दूसरा और भयानक आंकड़ा यह है कि हर दिन 16 महिलाओं की दहेज हत्या होती है, यानी हर 90 मिनट पर एक दहेज हत्या! इससे भयानक और क्या हो सकता है? यह भी समझने की जरूरत है कि दहेज हत्या तो आमतौर पर छुपने लायक बात नहीं रहती है, लेकिन दहेज प्रताडऩा और दहेज हिंसा की शिकायतें तब तक पुलिस तक नहीं पहुंचतीं, जब तक पानी सिर के ऊपर नहीं निकल जाता। जब शादीशुदा लड़कियों के माँ-बाप को यह पक्का भरोसा हो जाता है कि लडक़ी की शादी बचने का अब कोई जरिया नहीं है, और यह भी कि प्रताडऩा झेलते-झेलते वह मर भी सकती है, तभी जाकर दहेज प्रताडऩा की पुलिस रिपोर्ट होती है। यह एक अलग बात है कि जैसा कि हर कड़े कानून के साथ होता है, कुछ फीसदी मामलों में ऐसी झूठी रिपोर्ट भी होती है, लेकिन उस झूठ को देश की बड़ी अदालतें अब साफ-साफ देखने लगी हैं, और ऐसे कई मामलों में झूठी रिपोर्ट लिखाने वालों के खिलाफ ही अदालती आदेश भी हुए हैं।
अब अगर पुलिस में दर्ज मामलों को देखें, तो इतनी बड़ी संख्या में दहेज प्रताडऩा या दहेज हत्या के मामले जारी रहने, दर्ज होने, और अदालत तक पहुंचने की एक बड़ी वजह यह लगती है कि अब अधिकतर लड़कियों और महिलाओं के हाथ में ऐसे मोबाइल फोन रहते हैं जिनमें हिंसा या प्रताडऩा के सुबूत संदेशों के रूप में दर्ज हो जाते हैं, या मामूली समझ रखने वाली नवविवाहिताएं भी प्रताडऩा की किसी न किसी तरह की रिकॉर्डिंग करना सीख जाती हैं, और इन्हें संदेशों के रूप में अपने फोन से सहेलियों, और मायके को भेज देती हैं। पहले ये सुबूत इतने आसान नहीं थे, और कोई खबर भिजवाना भी मुश्किल रहता था। अब आसान संदेश पुख्ता सुबूत बन जाते हैं। अदालतों का काम भी डिजिटल और साइबर सुबूत के बाद कुछ आसान हो जाता है, जांच एजेंसियों का काम तो आसान हो ही जाता है। हम बिना किसी तंज के यह कहना चाहते हैं कि समाज में बदलती हुई स्थिति के मुताबिक अब लड़कियों और महिलाओं का जो एक नया सशक्तिकरण हुआ है, उससे भी अब दहेज प्रताडऩा का उजागर होना बढ़ गया है। आज जब कुछ गिनी-चुनी महिलाएं शादी तोडक़र बाहर निकलने की हिम्मत रखती हैं, जब वे शादीशुदा रहते हुए भी अपने किसी पुराने या नए प्रेमी के साथ मिलकर पति का कत्ल करने की हिम्मत रखती हैं, तो यह जाहिर है कि वे प्रताडऩा के सुबूत भी अधिक चतुराई से जुटा सकती हैं।
लेकिन भारतीय समाज में दहेज प्रताडऩा का विस्तार संतानमोह, और पुत्रमोह तक हो जाता है। ससुराल में प्रताडऩा के जो मामले दहेज से जुड़े हुए नहीं भी रहते, उनमें भी बहू से संतान की उम्मीद, और संतान में भी बेटा लाकर देने की उम्मीद हिंसा तक पहुंच जाती है। जहां पर उसके साथ रियायत होती है, और शारीरिक हिंसा नहीं होती, वहां भी मानसिक प्रताडऩा और हिंसा तो आम बात रहती है। ससुराल के लोग अपनी अगली पीढ़ी की चाह में मरे पड़े रहते हैं, और यह चाह कन्या शिशु से पूरी नहीं होती, क्योंकि भारत के अधिकतर तबकों में वंश कन्याओं से आगे नहीं बढ़ता, बेटों से आगे बढ़ता है। लड़कियों को तो यह मान लिया जाता है कि वे पराए घर की रहती हैं, और उनकी शादी करने तक उनकी देखभाल करना ही मायके का जिम्मा रहता है। बहनों को बराबरी का हक न देना पड़ जाए, इसलिए डरे-सहमे भाई लोग भी बहन से सीमित रिश्ता ही रखते हैं, और वे भी आखिरी दम तक इस परंपरा को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं कि डोली माँ-बाप के घर से उठती है, अर्थी तो पति के घर से ही उठनी चाहिए। भाईयों की संपत्ति पर एकाधिकार की चाह लड़कियों को मायके से भावनात्मक रूप से भी बेदखल कर देती है। ऐसे में जिस लडक़ी को मायके का भावनात्मक और रोजमर्रा का साथ कम रहता है, उसे ससुराल भी बेसहारा और बेबस मानकर उसके साथ मनचाही बदसलूकी करता है। जिस लडक़ी को मायके का साथ अधिक रहता है, उससे अधिकतर ससुराल वाले यह उम्मीद करते हैं कि किसी सुख में न सही, किसी दुख की नौबत में तो बहू के मायके वालों को आकर साथ देना ही चाहिए। यह कही या अनकही सामाजिक उम्मीद देश की संस्कृति सी बन गई है, और लोग जुबानी जमा-खर्च के लिए उन्हें कोई दहेज नहीं चाहिए, कहते हुए भी साथ में कॉमा के बाद यह जोड़ देते हैं, अपनी बेटी को जो देना हो, वो दें। कुल मिलाकर लेने से परहेज बहुत कम लोगों का रहता है, कुछ चाकू-पिस्तौल की नोंक पर लेते हैं, कोई कुछ सामाजिक और मानसिक प्रताडऩा खड़ी करके लेते हैं, और कुछ लोग मासूम बने हुए हमें कुछ नहीं चाहिए के अंदाज में सब कुछ पाने की उम्मीद रखते हैं। जुर्म के सरकारी आंकड़ों के जानकार विश्लेषक भी यह कहते हैं कि दहेज प्रताडऩा, या बहू की दूसरे किस्म की प्रताडऩा के मामले इससे बहुत अधिक हो सकते हैं, और सामाजिक अपमान की आशंका से शिकायत दर्ज नहीं कराई जाती है। कई परिवार इसलिए भी शिकायत दर्ज करवाने से कतराते हैं कि घर में बची हुई और छोटी लड़कियों का रिश्ता तय होना इससे मुश्किल हो जाएगा।
हम जब सिर्फ आंकड़ों के आधार पर कोई नतीजा निकालने की कोशिश करते हैं, तो वह कई वजहों से नाजायज लगती है। बीते बरसों में दहेज हत्या के दर्ज मामलों में कुछ गिरावट आई है, लेकिन जब हम इन्हीं बीते बरसों में तलाक के आंकड़ों को देखते हैं, तो यह समझ पड़ता है कि शहरों, पढ़े-लिखे तबकों, और मध्य वर्ग में तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। महानगरों में तलाक के अदालती मामलों में 30-40 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है, और बीते पांच बरसों में कुछ शहरों में 25 फीसदी तक अधिक मामले फैमिली कोर्ट में पहुंचे हैं। अब हम जब ससुराली हिंसा के आंकड़ों में कुछ गिरावट देखते हैं, तो उसी के साथ-साथ तलाक के मामलों में बढ़ोत्तरी को जोडक़र देखना इसलिए जरूरी है कि बहुत से मामलों में हिंसा की रिपोर्ट लिखाने के पहले ही अब लड़कियां तलाक की तरफ आगे बढ़ जाती हैं। अब वे अबला की तरह हिंसा बर्दाश्त करने से परे एक दूसरे विकल्प का इस्तेमाल करके सबला की तरह अदालत चली जाती हैं। इसलिए ससुराली हिंसा में गिरावट की एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि अब जुल्म एक सीमा से अधिक सहने के बजाय बहू निकलकर अदालत चली जाती है।
इन दोनों ही मामलों को देखें, तो समझ पड़ता है कि भारत में लड़कियों, और महिलाओं की हालत अड़ोस-पड़ोस और रिश्तेदारी में बचपन से बलात्कार झेलने के पहले से खराब है। अब तक जगह-जगह सोनोग्राफी से डॉक्टर अजन्मी संतान का सेक्स बता रहे हैं, और कड़े कानून, कड़ी कैद के बावजूद किसी मोटे लालच में ही ऐसा किया जा रहा होगा। बाद में स्कूल-कॉलेज में लड़कियों का शोषण तो जारी रहता ही है, कामकाज की जगहों से लेकर ससुराल तक उनका कई तरह का शोषण चलता है। इनमें जिन मामलों में जुर्म दर्ज होता है, उनको लेकर ही अगर विश्लेषण किया जाए, तो भी समाज और सरकार को महिलाओं की हिफाजत के लिए बहुत कुछ करना बाकी है। देखते हैं कि देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण लागू होने के बाद आम महिलाओं की स्थिति में भी किसी तरह का बदलाव आ सकता है, या उसके बावजूद नहीं आएगा?
दुनिया में भाड़ फोडऩे वाले अकेले चनों की कहानियां..
24 मई 2026
अभी जब देश की एक सबसे बड़ी इम्तिहान, नीट-यूजी 2026 का पेपर लीक सामने आया, और सरकार को यह इम्तिहान ही रद्द कर देना पड़ा, तो राजस्थान के सीकर जिले का एक नौजवान शिक्षक शशिकांत सुथार एकदम से खबरों में आया। नीट पेपर लीक को लेकर इस शिक्षक ने राज्य पुलिस में काफी माथा फोड़ा, लेकिन आखिर में कई दिन इंतजार करने के बाद जब उसने नीट को ईमेल किया, सीबीआई और पीएमओ को लिखा, तो उसके बाद सरकारी सिस्टम की चर्बी कुछ हिली, और जांच एजेंसियां इस शिक्षक के पास पहुंचीं। कैसा विचित्र संयोग रहा कि इस पेपर लीक करने वाले सबसे बड़े लोग महाराष्ट्र में कोचिंग सेंटर चलाने वाले लोग ही थे, और लीक को उजागर करने का काम राजस्थान के एक कोचिंग सेंटर के इस शिक्षक, शशिकांत सुथार ने किया।
इस शिक्षक के लिए भी यह आसान रहता कि बहुत से दूसरे कोचिंग सेंटरों ने जिस तरह पेपर आऊट करवाने, उसे बेचने, और अपने कोचिंग सेंटर के बच्चों को पास करने की गारंटी करवाने की तरह यह शिक्षक भी लीक की जानकारी रहने पर चुप रह जाता। लेकिन जैसे ही उसे यह दिखा कि नीट में आया पर्चा तो तकरीबन पूरे का पूरा इम्तिहान की तारीख के कई दिन पहले से उसी क्रम में, और कॉमा-फुलस्टॉप सहित टेलीग्राम जैसी मैसेंजर सर्विसों में पहले से घूम रहा था, उसने किसी निजी खतरे की परवाह किए बिना भांडाफोड़ किया, और फिर देश की यह छात्रों के साथ कीएक सबसे बड़ी बेईमानी खारिज करनी पड़ी। इससे एक बात साबित होती है कि एक अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।
अब हिन्दी की इस पुरानी कहावत को इस तरह की कुछ और घटनाओं से भी जोडक़र देखें, तो यह साबित होता है चना फोडऩे वाली भाड़ के भीतर का कोई अकेला चना भी पूरी भाड़ को फोड़ सकता है। एक अकेले व्यक्ति के किए हुए से क्या-क्या हो सकता है, इसकी भारत से अधिक बड़ी मिसाल दुनिया में और कहां हो सकती है? गांधी को आज इस देश में राष्ट्रपिता या महात्मा कहने से कुछ लोगों को परहेज हो सकता है, लेकिन गांधी के गुजर जाने के पौन सदी बाद भी आज तक दुनिया में गांधी से अधिक प्रतिमाएं तो किसी की नहीं लग पाईं! और आने वाला वक्त गवाह रहेगा कि गांधी की किसी कोशिश के बिना दुनिया का कायम किया हुआ यह रिकॉर्ड तोड़ा भी नहीं जा सकेगा। एक अकेले चने ने अंग्रेजी शासन का भाड़ फोडक़र रख दिया था, जिसकी लाठी महज अपने बदन के सहारे के लिए थी, उस लाठी से तो गांधी ने गोडसे तक को नहीं मारा था, खुद मर गए थे। इसलिए अकेला चना भाड़ तो फोड़ सकता है, लेकिन उस चने को अपनी परवाह छोडक़र काम करना होता है।
अभी जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने देश के बेरोजगार नौजवानों को कॉकरोच करार दिया, उन्हें परजीवी (पैरासाइट) कहा, तो उसके खिलाफ अमरीका के बॉस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ रहे भारतीय मूल के एक नौजवान अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम का एक समूह बनाया, हफ्ते भर के भीतर इंस्टाग्राम पर उसे दो करोड़ से अधिक लोग फॉलो करने लगे, और भारत में तो कांग्रेस और भाजपा, इन दोनों पार्टियों के मिलकर भी फॉलोअर कॉकरोच से कम ही हैं। भारत के नौजवानों को उनके अपमान का अहसास करवाना, और सोशल मीडिया पर उन्हें एक साथ जोडऩा, यह काम एक भारतवंशी नौजवान ने इस हद तक कर दिखाया कि उसका ट्विटर पेज एक्स से हटा दिया गया है, उसके इंस्टाग्राम पेज को हैक कर लिया गया, और उसकी वेबसाइट को भी शायद रोक दिया गया है। अब यह रोकने के पीछे सरकार है, या हड़बड़ाए हुए चीफ जस्टिस हैं, यह अभी रहस्य की बात है, लेकिन देश के बेरोजगारों को एक जेन-जी आंदोलन की तरह ऑनलाईन जोड़ देने का जो काम इस नौजवान ने किया है, वह असाधारण और अभूतपूर्व है। एक अकेले चने ने भाड़ को ऐसे फोड़ दिया कि दुनिया की कुछ सबसे बड़ी ताकतों को उसके पेज ब्लॉक करवाने पड़ रहे हैं, उसने नौजवान बेचैनी को एक ऐसी आवाज दे दी कि उस गूंजती हुई आवाज के साए में चीफ जस्टिस के लिए सोना मुश्किल हो गया होगा, वैसे भी जब कॉकरोच पूरे बदन पर रेंगने लगें, तो भला सो कौन सकते हैं!
लोगों को याद होगा कि बीते कई बरस से इंटरनेट पर विकीलीक्स नाम की एक वेबसाइट पर दुनिया भर की ताकतवर सरकारों, फौजों, और खुफिया एजेंसियों को जितनी बड़ी चुनौती दी गई, वैसी इतिहास में कभी नहीं ली गई थी। इसके संस्थापक जूलियन असांज ने अकेले ही सरकारों के गंदे और खूनी रहस्य का भांडाफोड़ शुरू किया, एक-एक बार में लाखों दस्तावेज जनता के बीच डाल दिए, जिसमें देशों की सरकारों, फौजों, और विदेश विभागों के गोपनीय दस्तावेज भी थे। जंग के पीछे के रहस्य, और आम नागरिकों की मौतों की जानकारियां भी थीं। इसने भी साबित किया कि एक बहुत छोटी सी टीम के साथ, या बिल्कुल अकेले ही जूलियन असांज ने किस तरह पूरी दुनिया की सरकारों को नंगा करके दिखा दिया। यह अलग बात है कि 2010 से शुरू हुए इस अभियान के चलते 2012 से उन्हें अपनी आजादी छोडऩी पड़ी, और बरसों तक जेल में रहकर अब वे बाहर आए हैं, और अपने देश ऑस्ट्रेलिया चले गए हैं। इस एक अकेले चने ने दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के सबसे गोपनीय भाड़ को फोड़ डाला। इसलिए एक व्यक्ति की ताकत को कम आंकना अच्छा नहीं होगा।
हाल के बरसों में ग्रेटा थुनबर्ग नाम की एक किशोरी ने अपने देश, स्वीडन की संसद के बाहर जलवायु बचाने के लिए जो आंदोलन शुरू किया, उसने पर्यावरण को लेकर इतना बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा खड़ा कर दिया कि दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के मुखिया भी उसे अनदेखा नहीं कर सके। 16 बरस की उम्र में टाईम पत्रिका ने उसे वर्ष का व्यक्तित्व करार दिया। 2019-20 और 21 में उसका नाम नोबल शांति पुरस्कार के लिए अलग-अलग लोगों ने भेजा। उसने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सरकारों की जिम्मेदारी के मुद्दे को इतने वजनदार तरीके से उठाया कि दुनिया देखती रह गई। लेकिन जलवायु से बिल्कुल अलग मानवाधिकार के मुद्दे पर वह फिलीस्तीनियों के लिए राहत लेकर गाजा तक पहुंच रही थी कि इजराइली फौजों ने उसे गिरफ्तार कर लिया। कम उम्र में, बिना किसी संगठन के, अकेले भी किस तरह जागरूकता और चेतना को बढ़ाने का काम किया जा सकता है, यह इस किशोरी ने कर दिखाया। उसके हौसलामंद बयानों की गूंज दुनिया भर की नौजवान पीढ़ी में हुई, और जिन देशों में यह पीढ़ी जागरूक है, वहां के लोग भी अपनी सरकारों के सामने खड़े होकर सवाल करने लगे। एक अकेले चने ने एक बार फिर भाड़ फोडक़र दिखा दी!
दुनिया में संगठन एक किस्म की ताकत भी होते हैं, और वे पांवों की बेडिय़ां भी बन जाते हैं। संगठनों पर मोहताज लोग उन संगठनों के हित-अहित की फिक्र को ढोने के लिए भी मजबूर हो जाते हैं। इसलिए कई लोग बिना किसी संगठन के ही जागरूकता का अभियान अधिक दूरी तक ले जा सकते हैं। आज के वक्त में किसी भी तरह के संगठन की विश्वसनीयता बड़ी सीमित रहती है। ऐसे में किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता असीमित हो सकती है, कम से कम कुछ सीमित के समय के लिए तो असीमित हो ही सकती है। इसलिए अपने स्तर पर अपनी वैश्विक जिम्मेदारी को कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए। ऐसा करने के लिए अपनी ताकत को तौलने की जरूरत भी नहीं रहती। लोगों को खुद को हासिल आजादी का पूरा इस्तेमाल करना पड़ता है, और नाजायज प्रतिबंधों के खिलाफ जायज हक की आवाज उठानी पड़ती है। इन दो बातों से लोग किसी मुद्दे को बहुत दूर तक ले जा सकते हैं, और गांधी की शहादत से यह भी साबित हो चुका है कि खून-खराबे के बीच अमन की बात करने वाला एक निहत्था आदमी अकेले ही कितना लंबा सफर तय कर सकता है, कितने लोगों को राह दिखा सकता है। इसके लिए खुद का बहुत ऊंचे दर्जे का साफ-सुथरा होना जरूरी रहता है, ऐसा अगर हो तो एक अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है, इतिहास तो यह कई बार साबित कर चुका है।
बेहोश-जख्मी को लूट लेने वाली संस्कृति पर चर्चा?
23 मई 2026
आज की एक खबर है कि सडक़ पर कुत्ते से टकराकर एक बाइक सवार सडक़ पर गिरा, और रात 11 बजे के करीब की इस घटना में किसी ने उसकी मदद नहीं की। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के भीतर यह व्यक्ति बेहोश पड़े रहा, और कोई उसकी बाइक, मोबाइल फोन और 800 रुपए का पर्स लेकर भाग गया। यही समाचार बताता है कि कुछ दिन पहले शहर के एक दूसरे हिस्से में ऐसा ही हुआ था, और कार से टकराकर दुपहिया सवार नौजवान बेहोश हो गया था, और उसकी दुपहिया भी गायब हो गई थी। बीच-बीच में अखबारों में ऐसी सुर्खियां देने का रिवाज है कि इंसानियत अभी जिंदा है। ऐसा उन खबरों के साथ होता है जिनमें किसी के खोए हुए सामान को लोग वापिस पहुंचा देते हैं, या ऐसी ही कोई दूसरी मदद कर देते हैं जो कि आज की इंसानियत के हिसाब से कुछ चौंकाने वाली रहती है। इंसानियत शब्द भी बड़ा अजीब है, हर उस व्यक्ति के लिए यह आसानी से इस्तेमाल हो जाता है जिनके भीतर इसका एक कतरा भी न बचा हो। एक तरफ तो सरकार यह कहती है कि सडक़ हादसे में जख्मी किसी को अस्पताल में पहुंचाने पर उन्हें 25 हजार जैसी कोई रकम ईनाम में मिलती है, यह भरोसा दिलाया जाता है कि उनसे कोई पूछताछ तक नहीं होगी। अस्पतालों को कहा जाता है कि सडक़ हादसे में जख्मी होकर अगर कोई पहुंचे तो बिना भुगतान की परवाह किए तुरंत उनका इलाज शुरू किया जाए। ऐसे में भी राजधानी के भीतर अगर लोग किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाना तो दूर रहा, उसे लूट लेने का मौका नहीं छोड़ रहे हैं, तो उन्हें चोर कहना, चोर की बेइज्जती होगी, उन्हें मामूली लुटेरा कहना, लुटेरों की बेइज्जती होगी, यह एकदम खास दर्जे के जल्लाद किस्म के मुजरिम हैं जिनके लिए सजा में एकदम अलग इंतजाम होना चाहिए। वैसे हिंदुस्तान में इसकी लंबी परंपरा है, और हमारी गौरवशाली संस्कृति ऐसी घटनाओं से भरी-पूरी है। देश में कई ऐसी बड़ी ट्रेन दुर्घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें आसपास के गांवों के पहुंचे हुए लोग घायलों को डिब्बों से निकालने के बजाय उनके कहने और उनकी घडिय़ां उतार रहे थे, उनके सामान लूट रहे थे। जिस वक्त इस गौरवशाली देश की संस्कृति को लोगों को यह सुझाना था कि वे घायलों को बचाते, डिब्बों में फंसे हुए लोगों को निकालते, वे गहने नोच रहे थे। अभी हाल के महीनों में ही छत्तीसगढ़ में एक से ज्यादा ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें मुर्गियां ले जाते हुए कोई गाड़ी पलट गई, और उसके जख्मी ड्राइवर-कंडक्टर उसमें फंसे रहे, और लोग गाड़ी के ऊपर चढक़र मुर्गियां लूटकर भागते रहे, और गांव-कस्बे में दावत हो गई। किसी भी सामान से भरी हुई गाड़ी हिंदुस्तान की सडक़ों पर पलटे, तो लोग ड्राइवर कंडक्टर को बचाने से अधिक सामान लूटने में जुट जाते हैं। यही गौरवशाली संस्कृति पिछले हफ्तेभर में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की सडक़ों पर देखने मिली, जब घायल पड़े रहे, बेहोश रहे, और राह चलते लोग उनकी गाड़ी ले भागे, मोबाइल और बटुआ भी ले गए। हमारा अनुभव यह कहता है कि ऐसा लूटकर भागने वाले लोग जरूरी नहीं है कि पेशेवर लुटेरे रहे हों, ऐसे लोग घरेलू और आम लोग भी हो सकते हैं जो कि मौका मिलने पर कुछ देर के लिए फायदा पाने के लिए लुटेरे बन गए हों।
इस देश में लोग बड़ी-बड़ी बीमारियों की नकली दवाइयां बनाने के बहुत ही संगठित कारोबार को चलाते हैं, कोरोना के दौरान उसके इलाज में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन थोक में नकली बनाए गए और लाख-लाख रुपए में बेचे गए, दूसरी तरफ अभी और खबरें आईं हैं कि किस तरह कैंसर की दवाई नकली बनाकर बाजार में सप्लाई की जा रही है।
हर देश और समाज को अपनी संस्कृति पर गर्व करने का पूरा अधिकार रहता है। जिस देश की संस्कृति में छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार तक समाज का मुख्य पार्टटाइम शगल बना हुआ है, उसे भी हक रहता है कि अपनी नामौजूद संस्कृति की कल्पना करके उस पर गर्व कर सके। आज वही हो रहा है। आज की जमीनी हकीकत पर चर्चा करने के बजाय लोग पौराणिक कथाओं को चर्चा, और उसके मार्फत गर्व करने का सामान बनाकर चल रहे हैं। आज देश की संस्कृति क्या हो गई है, उस पर चर्चा तकलीफदेह रहती है, उस पर कई कड़वी और अप्रिय बातों पर चर्चा करने की मजबूरी आ जाती है। ऐसे में लोग इतिहास और पुराण के ऐसे पन्ने निकालकर लाते हैं जिनमें मनपसंद, कर्णप्रिय, और मधुर लगने वाली कहानियां रहती हैं, और वे कहानियां बहुत सारा गर्व भी जुटा देती हैं, क्योंकि वे उसी हिसाब से ढाली गई रहती है। आज कबीर को पढक़र इस देश की संस्कृति पर गर्व करना मुमकिन नहीं हो सकता, इसलिए उतना कड़वा और खरा सच बोलने वाला किनारे कर दिया गया है। आज संस्कृति के सुहाने पन्ने, जो कि सुनहरे हर्फों में लिखे जा सकते हैं, उन्हीं का चलन चल रहा है।
जब देश की सरकार घायलों की मदद के लिए बहुत ही असरदार और मददगार कानून बना चुकी है, उस वक्त भी यह आम हिंदुस्तानी संस्कृति है कि घायलों को अनदेखा करके सडक़ पर आगे बढ़ लिया जाए। ये लोग इससे भी सौ कदम आगे के हैं कि घायल का बचना तो तय है नहीं, उसके बिना उसके सामान और उसके पैसे अनाथ न हो जाएं, इसलिए उनको उठाकर ले जाया जाए। ऐसी सोच और ऐसी घटनाओं को लेकर समाज में चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इससे बड़ी शर्मिंदगी सामने आएगी। लोगों को यह मानना पड़ेगा कि उनके बीच परले दर्जे के नीच और कमीने लोग भी हैं। ऐसे वर्तमान को कालिख से लिखने के बजाय काल्पनिक इतिहास को सुनहरे अक्षरों में लिखना लोगों को अधिक माकूल बैठता है। यह नौबत इस देश को सुधरने, और बेहतर काम करने का मौका ही नहीं देगी। लोग अपने-आपमें इतने मशगूल हैं कि उन्हें सच की जरूरत नहीं रह गई है। जब इस तरह की कोई घटिया हरकत होती है, तो क्या भारत के या छत्तीसगढ़ के समाज में सार्वजनिक रूप से इस नौबत पर कोई चर्चा होती है कि ये कहां आ गए हम?
औलाद के टुकड़े-टुकड़े, यह ऑनरकिलिंग किस किस्म का आडंबरी अहंकार?
22 मई 2026
हिन्दुस्तान बड़ा ही अजीब देश है। यहां के लोग अलग-अलग कई सदियों में जीते हैं। कुछ लोग तो हजारों बरस पहले की गुफाओं में जीने वालों सरीखे हैं, कुछ लोग आज की पीढ़ी के बेधडक़ और बेझिझक लोग हैं जिनकी लिव-इन-रिलेशनशिप सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों से आसान हो गई है, हालांकि उत्तराखंड जैसी सरकार ने उसे मुश्किल और नामुमकिन बनाने के कानून बना दिए हैं। अभी-अभी कल-परसों ही उत्तर भारत के किसी एक राज्य में गर्भवती महिला की सोनोग्राफी करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताने वाला डॉक्टर गिरफ्तार हुआ है, और इसी देश के बहुत से बच्चे अंतरिक्ष में जाने का भी सपना देखते हैं। एक तरफ तो केन्द्र सरकार अलग-अलग जातियों के बीच विवाह होने पर दलित और आदिवासी से शादी करने वाले गैरदलित या आदिवासी को एक ठीक-ठाक रकम प्रोत्साहन के रूप में देती है, और हर साल हिन्दुस्तान में दूसरी जाति या धर्म में शादी करने वाले लोगों को उनके परिवार के लोग ही मार डालते हैं। खानदानी इज्जत के लिए की जाने वाली ऐसी हत्याओं को समाज ऑनर-किलिंग कहता है।
ऐसी एक घटना अभी उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले से आई है जो दिल दहला देती है। वहां पर एक मुस्लिम ऑटोरिक्शा चालक ने अपनी बहन और बहनोई के साथ मिलकर अपनी नाबालिग बेटी का गला काटकर उसका कत्ल कर दिया, और पहचान छिपाने के लिए लाश के 6 टुकड़े करके अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने बताया कि यह आदमी 15 बरस की अपनी बेटी के किसी दूसरे समुदाय के युवक से बात करने से खफा था। उसे डर था कि यह लडक़ी भी अपनी दो बड़ी बहनों की तरह दूसरे समुदाय के युवकों से शादी कर लेगी। इस आशंका में इस पिता ने पत्नी और बेटे को घर के बाहर भेजा, बहन-बहनोई के साथ मिलकर बेटी को इतने वीभत्स तरीके से मारा, और बदन के हिस्से अलग-अलग जगहों पर ठिकाने लगा दिए।
एक तरफ तो देश के बड़े-बड़े हिन्दू नेताओं की लड़कियों की शादी मुस्लिमों से हो जाती है, और कोई हल्ला नहीं होता। बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, या खिलाड़ी, करोड़पति-अरबपति कारोबारी किस जात-धरम में शादी करते हैं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे राजाओं के पुराने दिन याद पड़ते हैं कि राजा जो करते हैं, वही सामाजिक नियम रहते हैं, वे किसी भी तरह के नियमों से ऊपर रहते हैं। आज के राजा बड़े-बड़े नेता, कारोबारी, या शोहरत हासिल कामयाब लोग हैं, और उनके किसी जात-धरम में शादी पर कोई विरोध नहीं होता। समाज के आम लोगों में से कोई ऐसा करें, तो उनके खिलाफ समाज के लोग झंडा-डंडा लेकर खड़े हो जाते हैं। दूसरे धरम की शादी तो दूर की बात रही, हिन्दू धर्म के भीतर ही, ओबीसी के भीतर ही, एक जाति से किसी ने दूसरी जाति में शादी कर ली, तो इस पर भी जातबाहर कर दिया जाता है, और ऐसे कई मामले छत्तीसगढ़ में ही अदालतों में चल रहे हैं। इन मामलों की बहुतायत जिस जाति में है, उस जाति के लोग बड़ी संख्या में हिन्दू धर्म छोडक़र ईसाई बन रहे हैं, और ऐसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे अपने ही लोगों को अंतरजातीय विवाह पर जातबाहर करके दूसरे धर्म की तरफ नहीं धकेल रहे हैं?
अब उत्तरप्रदेश के इस मुस्लिम पिता ने अपनी ही बच्ची का कत्ल कैसे किया होगा, यह हमारे सरीखे साधारण इंसान के लिए समझना भी मुश्किल है। यही देश एक औलाद के लिए हर किस्म के डॉक्टर के पास, मंदिर-मस्जिद, और दरगाह तक जाते हुए लोगों को देखते रहता है। सरकार के सामने बच्चों की चाह रखने वाले लोग कमेटियों में अर्जी लगाए हुए बरसों तक इंतजार करते हैं कि उन्हें कोई बच्चे मिल जाएं। संपन्न लोग आज के आईवीएफ सेंटरों से लेकर दूसरे कई किस्म के अस्पतालों तक लाखों रूपए खर्च करते हैं, और सरोगेसी के लिए दसियों लाख रूपए भी लगा देते हैं। ऐसे में अपनी ही औलाद के टुकड़े-टुकड़े कर देना, इतनी ताकत कोई धर्म ही दे सकता है, या किसी जाति का कोई पाखंडी अहंकार। शादी पर अपने बच्चों को, या उनके प्रेमी-प्रेमिका को मार डालना, शादी हो चुकी है तो अपनी औलाद के पति, या उसकी पत्नी को मार डालना एक पारिवारिक अहंकार से बढक़र सामाजिक अहंकार के लिए किया जाने वाला जुर्म है क्योंकि लोगों को लगता है कि परिवार में ऐसा होने के बाद वे समाज को क्या मुंह दिखाएंगे।
भारत में पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की वजह से पुरूषवादी सोच इस हद तक हावी है कि परिवार की इज्जत लडक़े से जोडक़र नहीं देखी जाती, लडक़ी से ही जोडक़र देखी जाती है। परिवार के लडक़े दूसरे जात-धरम की लडक़ी को लेकर आएं, तो उस पर कोई कत्ल नहीं होते, लडक़ों के परिवार वाले नहीं करते। लेकिन अगर लडक़ी के परिवार का, जात का, धरम का, समाज का अहंकार आहत होता है, तो पूरा का पूरा कुनबा जेल चले जाने की कीमत पर भी मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। ऑनरकिलिंग अगर देखें, तो मानो लड़कियों के परिवार का ही ऑनर अपमानित होता है, और पहले उन्हीं को मारा जाता है, फिर अगर हत्या का विस्तार करना हो तो बेटी के आशिक या उसके पति को भी साथ-साथ निपटा दिया जाता है। यह सोच हिन्दुस्तान के बाहर भी ब्रिटेन तक में कई मामलों में दिखती है, और वहां भी बहुत से हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी माँ-बाप ऐसी ऑनरकिलिंग में गिरफ्तार हुए हैं।
दुनिया 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में दाखिल हो चुकी है, लेकिन सामाजिक नियमों और रीति-रिवाजों का दबदबा इतना है कि जन्म देने वाले माँ-बाप ही अपनी औलादों का कत्ल कर देते हैं। यह सिलसिला कम होते भी नहीं दिखता है, और यह सिलसिला पूरी तरह से साम्प्रदायिक हो ऐसा भी नहीं है। यह सिलसिला माँ-बाप, परिवार, समाज, और जात-धरम के आडंबरी अहंकार से जुड़ा हुआ सिलसिला है। यह सिलसिला संपन्नता से दूर ही चलता है, आमतौर पर मध्यमवर्गीय, या उससे नीचे के आय वर्ग के लोगों को ऐसे अहंकार की फिक्र अधिक रहती है। पटौदी परिवार को देखें, तो लगातार दो पीढिय़ों ने दो चर्चित हिन्दू अभिनेत्रियों से शादी की, और किसी बात का कोई हल्ला नहीं हुआ। संपन्नता आडंबरी अहंकार को हावी नहीं होने देती। आमतौर पर संपन्नता से कुछ दूरी पर रह गए, या बहुत दूर रह गए लोग ही इस किस्म की हिंसा करते हैं। लोग फैशन के लिए, खर्च और शान-शौकत के लिए जिन बड़े लोगों के देखकर उनके नक्शेकदम पर चलना और जीना चाहते हैं, उन लोगों के बीच जात-धरम बेमायने रहने से वे कुछ नहीं सीखते। अगर देश के चर्चित जोड़ों को देखकर नीचे के आम लोग बर्दाश्त करना सीख लेते, तो वह किसी चर्चित के फैशन की नकल करने के मुकाबले बेहतर बात होती।
चुनौतियां नहीं, बस्तर को लेकर अमित शाह ने उठाया एक और बीड़ा..
21 मई 2026
अमरीकी संसद के उच्च सदन ने एक स्पष्ट बहुमत से उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है जिसका मकसद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की युद्ध शक्तियों को सीमित करना है, और ईरान में अमरीकी फौजी कार्रवाई को बिना संसदीय मंजूरी के रोकना है। ट्रम्प ने जब इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया, तो अमरीका की संसदीय-संवैधानिक भाषा के बीच से एक चोर दरवाजा ढूंढ निकाला था कि वह जंग नहीं थी, वह सिर्फ फौजी कार्रवाई थी। राष्ट्रपति अपने देश की हिफाजत के लिए, देश को बचाने के लिए फौजी कार्रवाई करने का अधिकार रखता है, लेकिन अगर उसे जंग में तब्दील करना हो, तो उसकी इजाजत, और उसके लिए बजट, दोनों ही संसद पास कर सकती है। ट्रम्प ने संसदीय अग्निपरीक्षा से गुजरे बिना यह जंग शुरू कर दी थी, और किसी पेशेवर मुजरिम की तरह अदालत में जिरह के दौरान बच निकलने की भाषा का इस्तेमाल कर रहा था कि यह जंग नहीं है, सिर्फ फौजी कार्रवाई है। लेकिन अभी अमरीकी उच्च सदन, सीनेट ने 50-47 के बहुमत के मतदान से युद्ध-अधिकार प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है, जो कि ट्रम्प के इरादों के खिलाफ है, उस पर रोक लगाने की तरफ एक बड़ा कदम है। अमरीकी संसद के इस सदन में ट्रम्प की पार्टी का बहुमत है, लेकिन उसकी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने बगावत करके विपक्षी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। सदन के बाहर भी ट्रम्प की पार्टी के कई सांसद इस जंग, और अमरीका पर इसके असर को लेकर फिक्र जाहिर कर चुके थे, इसकी आलोचना कर चुके थे। लेकिन सदन के भीतर एक औपचारिक मतदान में ट्रम्प के इरादों को इस तरह खारिज करने के लिए अगर उसकी पार्टी के सांसदों ने बगावत की है, कुछ सांसद गैरमौजूद रहे, तो यह ट्रम्प के लिए एक बड़ा झटका है।
हमने अमरीकी संवैधानिक व्यवस्था को पढक़र इस नौबत को समझने की कोशिश की। वॉर पावर्स एक्ट ऑफ 1973 को वियतनाम युद्ध के दौरान अमरीकी राष्ट्रपतियों की मनमानी को रोकने के लिए बनाया गया था। इसके तहत बिना संसदीय मंजूरी या जंग की घोषणा के अमरीकी सेना 60 दिनों से अधिक समय तक किसी विदेशी शत्रुता में शामिल नहीं हो सकती। ऐसी समय सीमा पूरी हो जाने पर सेना को वापिस बुलाने के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय राष्ट्रपति को मिलता है। अब ईरान युद्ध को 80 दिन से अधिक हो चुके हैं, इसलिए संसद का तर्क है कि ट्रम्प की यह जंग अब अमरीकी कानून और संविधान के तहत पूरी तरह गैरकानूनी हो चुकी है। अभी भी ट्रम्प के पास कुछ तानाशाह अधिकार बचे हुए हैं, और वह इस मौजूदा प्रस्ताव के पास हो जाने के बाद भी राष्ट्रपति का वीटो का इस्तेमाल कर सकता है, और इस वीटो को पलटने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। ट्रम्प के खिलाफ इतना बड़ा बहुमत चाहे न जुट सके, उसकी रिपब्लिकन पार्टी के किले की दीवारों में दरारें तो आ ही गई हैं। अमरीकी विश्लेषक कहते हैं कि जिस तानाशाही के साथ ट्रम्प अपनी पार्टी पर काबिज चले आ रहा है, और देश को हांक रहा है, उसके प्रति वह अंधी वफादारी अब धसक रही है। जंग की वजह से अमरीकी जनता जिस महंगाई से त्रस्त है, हर अमरीकी नागरिक पर जिस तरह इस जंग का बोझ पड़ रहा है, उसे देखते हुए रिपब्लिकन सांसदों और पार्टी को यह डर है कि अगर यह जंग लंबी खिंची, तो नवंबर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में पार्टी को इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
जैसे पेशेवर मुजरिम अदालत में बचाव के तर्क ढूंढते हैं, ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि चूंकि ईरान के साथ एक युद्धविराम चल रहा है, इसलिए संसदीय अनुमति देना युद्ध की सीमा अब लागू नहीं हो रही, क्योंकि अभी युद्ध चल ही नहीं रहा है। लेकिन संसद में इस तर्क को खारिज कर दिया है, और उसका कहना है कि युद्धविराम के साए में जो फौजी तैयारियां चल रही हैं, जो फौजी प्रतिबंध लगे हुए हैं, वे युद्ध का ही हिस्सा हैं। आज अमरीका के भीतर के लोकतंत्रवादी लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि आंतरिक लोकतंत्र पर इतना अधिक जोर देने वाला यह देश किस तरह एक तानाशाह राष्ट्रपति की अकेले की सनक का शिकार हो गया है, और वह जहां चाहे वहां जंग छेड़ रहा है, हमले कर रहा है, हमलों की धमकी दे रहा है। ट्रम्प की ही पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने यह कहा है कि यह लड़ाई डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों के बीच की नहीं है, यह लड़ाई संसद की सर्वोच्चता-सम्प्रभुता, और राष्ट्रपति की तानाशाही के बीच की लड़ाई है। अमरीकी लोकतंत्र में आज की नौबत चेक एंड बैलेंस की मानी जा रही है कि जब राष्ट्रपति बेलगाम होने लगे, तो संसद को अपनी आवाज बुलंद करनी पड़ती है।
अमरीका में निर्वाचित राष्ट्रपति की इस तानाशाह-मनमानी को लेकर अब संसद में जो चल रहा है, वह बहुत दिलचस्प है। दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में ऐसी घटनाएं, और ऐसे मामले बाकी देशों के लिए भी एक सबक बनते हैं। अमरीकी संसद में अलग-अलग सांसदों ने इस नौबत पर काफी कुछ कहा, और डेमोक्रेटिक पार्टी के एक सांसद ने कहा कि ट्रम्प द्वारा अपनी मर्जी से शुरू किए गए इस बेहद अलोकप्रिय युद्ध ने अमरीकी जनता पर बहुत भारी बोझ डाला है। संसद के पास इस नासमझीभरे संघर्ष पर ब्रेक लगाने की ताकत है, और आज इस उच्च सदन को राष्ट्रपति से साफ कहना चाहिए कि वह इस विनाशकारी युद्ध को तुरंत रोके। एक दूसरे सांसद ने कहा-डेमोक्रेट्स अब ट्रम्प के अवैध युद्ध पर रिपब्लिकन की चुप्पी की दीवार को तोड़ रहे हैं। पिछले 80 से अधिक दिनों से ट्रम्प ने बिना किसी योजना, बिना किसी साफ मकसद, और बिना किसी कानूनी अधिकार के अमरीका को इस महंगे और अराजक संघर्ष में झोंक रखा है। आज के वोट ने साबित कर दिया है कि हमारा दबाव काम कर रहा है, और रिपब्लिकन का किला अब धसक रहा है।
अमरीकी संविधान के मुताबिक बजट जारी करने का अधिकार केवल संसद के पास है, और अगर उच्च सदन के बाद यह वॉर पावर्स रिजोल्यूशन निचले सदन से भी पास हो जाता है, तो यह राष्ट्रपति के लिए ईरान में फंड इस्तेमाल करने को कानूनी रूप से रोक देगा। लेकिन अमरीकी संविधान में राष्ट्रपति का वीटो इसके बाद भी काम आ सकेगा, और उस नौबत में संसद के भीतर किस तरह दोतिहाई बहुमत ट्रम्प के खिलाफ जुटेगा, इसकी अभी कल्पना नहीं की जा सकती। संसद के इस कड़े रूख का असर दिखने लगा है, और ट्रम्प ने संसद में वोटिंग के ठीक पहले ईरान पर हमले की तय की जा चुकी घोषणाओं को टाल दिया है। यह पूरी नौबत राजनीति शास्त्र, शासन व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय संबंध, और संसदीय व्यवस्था में दिलचस्पी रखने वालों के लिए बड़ी बारीकी से देखने का मौका है। हम तो अपने आम पाठकों के लिए बहुत मामूली जुबान में इस पूरे मुद्दे की एक सरल व्याख्या ही यहां पर कर रहे हैं, इतना जरूर है कि यह करते हुए हम किसी चूक से बचने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में अमरीका के भीतर का माहौल किस तरह ट्रम्प की नाक में नकेल डालेगा, यह देखना होगा।










