रजत जयंती के जलसे के बीच गंभीर सोचने का भी एक बड़ा मुद्दा है

 31 अक्टूबर 2025 

 

किसी के भी अस्तित्व में 25 बरस पूरे होना एक ऐतिहासिक मौका रहता है। शादी की सिल्वर जुबली होती है, तो लोग बड़ी दावत देते हैं। उम्र के 25 बरस पूरे होते हैं, तो लोग उम्मीद करते हैं कि अब लोग कामकाज करने लगेंगे। ऐसे में जब छत्तीसगढ़ राज्य के रूप में 25 बरस पूरे कर रहा है, तो यह एक बड़ा ऐतिहासिक मौका है, और इसका जलसा भी इस बार कुछ अधिक बड़ा इसलिए हो रहा है कि राज्य की विधानसभा का नया भवन बनकर तैयार हो गया है, और उसका भी उद्घाटन है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल अपने दूसरे कार्यक्रमों के साथ-साथ इसके उद्घाटन में भी शामिल होंगे। यह विधानसभा भवन राज्य की नई बनी राजधानी में बना है, और भविष्य की सारी संभावनाओं को पूरा करने की गुंजाइश इसमें रखी गई है। लेकिन हम कल के कार्यक्रम तक अपनी बात सीमित रखना नहीं चाहते, इस मौके पर पूरे प्रदेश को लेकर बात होनी चाहिए। 

छत्तीसगढ़ ने अविभाजित मध्यप्रदेश से बाहर आकर लगातार आर्थिक विकास देखा है। भोपाल से जब छत्तीसगढ़ का शासन चलाया जाता था, तो वह कमोबेश लंदन से चलने वाले भारत के अंग्रेजी राज जैसा रहता था। छत्तीसगढ़ कोयला उगलता था, बिजली पैदा करता था, और मध्यप्रदेश उस बिजली को पीता था। छत्तीसगढ़ में बिजली पहुंचाने का ढांचा तक बाकी मध्यप्रदेश के मुकाबले बड़ा कमजोर था। छत्तीसगढ़ ने इन 25 वर्षों में असाधारण आर्थिक विकास देखा है, और इस दौर में कांग्रेस और बीजेपी दोनों की सरकारें आई-गई हैं। इस दौर में केन्द्र में भी यूपीए और एनडीए की सरकारें आती-जाती रही हैं। छत्तीसगढ़ ने रमन सिंह सरकार के यूपीए सरकार से दस बरस के मधुर संबंध भी देखे, और भूपेश सरकार के एनडीए सरकार से पांच बरस के लड़ाकू संबंध भी देखे। छत्तीसगढ़ के विकास का एक बड़ा हिस्सा खदानों से निकलकर आया, कुछ कमाई जंगलों से हुई, और राज्य की अर्थव्यवस्था खेतों के माध्यम से चलती रही। यह राज्य इस पूरे दौर में देश के बहुत से दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर आर्थिक अनुशासन का राज्य रहा, और रिजर्व बैंक से लेकर योजना आयोग, नीति आयोग के आंकड़े भी इसे एक बेहतर राज्य साबित करते रहे। आज भी देश भर के लिए छत्तीसगढ़ अपने जंगलों को खोकर, अपनी छाती पर गड्ढा झेलकर कोयला भेजता है, लोहा निकालकर फौलादी कारखाने चलाता है, और देश भर के लिए सीमेंट भी बनाता है। 

लेकिन जो बात खटकती है, वह मानव संसाधन की है। छत्तीसगढ़ के लोग राज्य के बाहर जाकर काम करने के मामले में जब भी खबरों में आते हैं, तो वे बंधुआ मजदूरी से छुड़ाकर वापिस लाए जाते रहते हैं, या फिर वे उत्तर भारत के ईंट भट्ठों पर कैद करके मजदूरी कराए जाते दिखते हैं। ऐसी खबरें बहुत कम आती हैं कि छत्तीसगढ़ से लोग बाहर जाकर कोई बड़ा काम कर रहे हों, देश के बाहर पहुंच रहे हों। छत्तीसगढ़ के भीतर भिलाई नाम का एक छोटा सा शैक्षणिक टापू है जहां भिलाई इस्पात संयंत्र से जुड़े हुए स्कूल ही आईआईटी में पहुंचने वाले छात्र-छात्राओं को तैयार करते हैं, और उसमें राज्य सरकार का योगदान कुछ भी नहीं रहता। राज्य की नौजवान पीढ़ी को देश-विदेश के मुकाबले के लिए तैयार करने के लिए भी यह राज्य अभी तक कुछ नहीं कर पाया है। बीते बरसों में सरकार ने कुछ लाइब्रेरी शुरू की हैं, और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए लोगों को तैयार किया जाता है, लेकिन यह सब मोटेतौर पर गिनी-चुनी सरकारी नौकरियों के लिए होने वाले मुकाबले तक सीमित रहता है। देश की सरकारी नौकरियों से परे किसी हुनर के लायक नौजवानों को तैयार करना अभी तक यह राज्य नहीं कर पाया है, और यह खुद 25 बरस का नौजवान हो चुका है। 

छत्तीसगढ़ के साथ एक दिक्कत भी है, खनिज आधारित राज्य होने की वजह से कुदरत ने ही इसे इतना कुछ दे दिया है कि इसके भूखे रहने की नौबत नहीं आती। एमपी से अलग होने के बाद से इस राज्य में कभी तनख्वाह की भी दिक्कत नहीं रही। राज्य ने ढांचागत विकास भी खूब देख लिया है। नया रायपुर नाम की राजधानी जिसमें अभी कल से कई दिन जलसे चलेंगे, वह देश में किसी भी प्रदेश की अपनी किस्म की सबसे बड़ी नियोजित राजधानी है। लेकिन राज्य की युवा शक्ति अब तक संभावनाओं को छूने की ऊंचाई से खासी नीचे है। हम पड़ोस के ही महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र को देखें, तो दुनिया का एक भी ऐसा विकसित देश नहीं है जहां इन राज्यों से गए हुए लोग काम न कर रहे हों। इन राज्यों के भीतर भी लोगों की स्थानीय सफलता बहुत अधिक है। छत्तीसगढ़ की प्रति व्यक्ति आय मोटेतौर पर खनिज आय की वजह से बढ़ी हुई दिखती है, लेकिन नौजवान आबादी की खुद की आय को अगर देखें, तो छत्तीसगढ़ अभी बहुत पीछे है। केन्द्र और राज्य सरकारों की कौशल विकास योजनाएं इस राज्य में छोटे-मोटे मैकेनिक ही बना पाई होगी, उससे अधिक कोई असर तो दिखता नहीं है। हम कारखानों और कारोबार के विकास को स्थानीय नौजवान पीढ़ी का विकास नहीं मानते। उन्हें मामूली रोजगार जरूर मिल सकता है, लेकिन यहां की युवा पीढ़ी का बेरोजगारी से उबर जाना काफी नहीं माना जाना चाहिए। 

छत्तीसगढ़ को रजत जयंती के इस मौके पर यह संकल्प लेना चाहिए कि वह यहां की युवा पीढ़ी को देश और दुनिया के मुकाबलों के लिए तैयार किया जाए, क्योंकि आज दुनिया में किसी भी देश की विकास की संभावना को इसी से जोडक़र देखा जाता है कि वहां की आबादी में युवा पीढ़ी का अनुपात क्या है। इस मामले में भारत को बड़ी संभावनाओं वाला देश माना जाता है क्योंकि यहां नौजवान आबादी भरपूर है। लेकिन पड़ोस का चीन अपनी नौजवान आबादी को हुनरमंद बनाकर उसे जितना उत्पादक बना चुका है, भारत उससे बहुत पीछे है, और भारत में भी दक्षिण के राज्य और महाराष्ट्र को छोड़ दिया जाए, तो बाकी प्रदेश उनसे पीछे हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़ को बल्कि मानव संसाधन के मामले में ऐसे तमाम अपेक्षाकृत पिछड़े हुए प्रदेशों को अपनी युवा-कामगार शक्ति की ताकत बढ़ानी चाहिए। महज कॉलेज की पढ़ाई आज किसी भी काम की नहीं रह गई है। छत्तीसगढ़ के इस रजत जयंती वर्ष में हमें 25 बरस की यही सबसे बड़ी असफलता, सबसे बड़ी चुनौती, और सबसे बड़ी संभावना लगती है।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर 2025



 

संयोग-दुर्योग और किस्मत की बातें छोडक़र लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए...

30 अक्टूबर 2025 

 

किसी जिंदगी में कैसा-कैसा उतार-चढ़ाव हो सकता है, यह देखना हो तो 9 महीने की उम्र में भारत से अमरीका गए वेदम सुब्रमण्यम की जिंदगी को देखना चाहिए। 1962 में वे परिवार सहित अमरीका पहुंचे, अमरीकी संस्कृति के हिसाब से उन्हें उनके संक्षिप्त नाम सुबु से बुलाया जाने लगा, और कॉलेज छात्र रहते हुए उनके एक सहपाठी का कत्ल हो गया, बिना सुबूत, बिना हथियार, बिना हत्या के इरादे के, सिर्फ परिस्थितियों को देखते हुए सुबु को सजा सुना दी गई। 1983 में सुनाई गई उम्रकैद अभी 2025 में अमरीका की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एफबीआई की इस रिपोर्ट पर खारिज की गई जिसमें कहा गया था कि जिस बंदूक से गोली चलना बताया गया है, उससे गोली चली ही नहीं थी। अब इसी महीने 3 तारीख को जब उनकी बहन उनकी रिहाई के लिए जेल पहुंची, तो अमरीका से प्रवासियों को बाहर निकालने वाली एजेंसी आईस ने उन्हें फिर गिरफ्तार करके एक हिरासत केन्द्र में रख दिया, क्योंकि उनके खिलाफ 1999 का एक और मामला दर्ज था। अब उन्हें विदेशी अपराधी कहकर भारत भेजने की तैयारी हो रही है जहां वे 9 महीने की उम्र के बाद कभी रहे नहीं, जहां उनके कोई रिश्तेदार भी नहीं रह गए। वेदम सुब्रमण्यम 64 बरस की उम्र में अमरीका और भारत के बीच हिरासत में अटके हुए हैं, और यह नौबत 43 बरसों की बेगुनाही वाली कैद के बाद अब एक छोटे से मामले को लेकर अचानक फिर सामने आई है। अमरीका में भारतवंशी लोग बरसों से सुबु की रिहाई के लिए लगे हुए थे, और रिहाई का दिन आकर, उन्हें एक दूसरी हिरासत में भेजकर चले गया। 

किसी देश के कानून के बारे में हम कोई राय कायम करना नहीं चाहते, लेकिन जिंदगी कैसे खेल खेलती है, यह जरूर सोचने की जरूरत है। हर किसी को अपनी जिंदगी में कई तरह के नाटकीय मोड़ झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। दो दिन पहले बीबीसी की एक रिपोर्ट बता रही थी कि किस तरह अमरीका में भारतीय सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ लगने की वजह से भारत में अच्छे-खासे चलते कारोबार बंद हो रहे हैं, और उनमें काम करने वाले कामगार और मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं। कालीन बनाने वाले बुनकरों के बच्चों की पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई है क्योंकि अमरीकी कारोबारियों ने कालीन आयात करने के ऑर्डर रद्द कर दिए हैं। अब एक वक्त जो कारोबार डॉलर में कमाई करते थे, आज उनके पास रूपयों में देने के लिए भी मजदूरी नहीं है। जिंदगी की ऐसी कहानियों को हम अहमियत इसलिए देते हैं कि हममें से किसी का भी दिल-दिमाग यह मानने को तैयार नहीं रहता कि इतना बुरा कुछ उनके साथ हो सकेगा। अब दो दिन पहले की ही छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर की एक घटना है। एक नौजवान दुकान बंद करके घर जा रहा था, और दुपहिया रात में सामने खड़ी ट्रक से जा टकराया, उसकी मौके पर ही मौत हो गई। यह जानकारी फोन पर उसके भाई को मिली, और वह दुपहिए पर सवार होकर इस घटनास्थल की तरफ निकल पड़ा, रास्ते में उसकी टक्कर एक कार से हो गई, और सडक़ पर वह भी मर गया। एक ही रात, एक ही शहर में दो सगे भाई इस तरह गुजर जाएंगे, क्या उनकी बूढ़ी मां ने कभी ऐसी कल्पना की होगी? कौन यह सोच सकते थे कि दो अलग-अलग हादसों में दो सगे भाईयों की एक सरीखी मौत हो जाएगी? लेकिन जिंदगी कई तरह के खेल खेलती है। 

कई ऐसे मामले सुनाई पड़ते हैं जिनमें पति-पत्नी किसी झगड़े की वजह से एक-दूसरे को मार देते हैं, और खुद भी मर जाते हैं। कुछ दूसरे मामलों में एक को मारकर दूसरे को जेल जाना भी मंजूर रहता है। पीछे उनके छोटे-छोटे से बच्चे रह जाते हैं। अभी एक मामला हमारे पास ही ऐसा हुआ जिसमें एक गरीब परिवार के तीन या चार छोटे-छोटे बच्चे मां के पास बैठे हुए ही थे, और पिता की किसी बात को लेकर मां से बहस हुई, और उसने बच्चों की मौजूदगी में अपनी पत्नी को काट डाला। वह तो मर गई, पति जेल चले गया, और तीन-चार बच्चे बेसहारा हो गए। गरीबों के बीच में आसपास के रिश्तेदारों की भी इतनी क्षमता तो रहती नहीं है कि बिना मां-बाप के तीन-चार बच्चों को और लोग पाल लें। अब इनका भविष्य, और उसके भी पहले उनका वर्तमान कैसा होगा, यह सोचने की बात है। अभी कल की ही खबर है कि एक परिवार में घर के मुखिया की शराबखोरी की आदत, और नशे में रोज झगड़ा झेल-झेलकर थके हुए मां-बेटे ने ही मिलकर बाप को मार डाला, और अब मां-बेटा दोनों गिरफ्तार भी हो गए। इस तरह की घटनाएं रोज हो रही हैं। इनके बाद परिवार की क्या हालत होती होगी, यह कल्पना बहुत मुश्किल नहीं है।

इन दिनों चलते हुए साइबर क्राईम की वजह से लोगों को ब्लैकमेल करना, उनकी पाई-पाई निचोड़ लेना, उन्हें खुदकुशी को मजबूर कर देना, यह चलते ही रहता है। अब सोचिए कि किसी की जिंदगी भर की कमाई अगर ऐसी एक अकेली जालसाजी और धोखाधड़ी में पूरी की पूरी चली जाए, तो जिंदगी क्या रह जाएगी? कैसे कटेगी? ऐसा कई जगह हो रहा है। लोगों को डिजिटल अरेस्ट करके रखा जा रहा है, उनके कुछ नग्न या अश्लील वीडियो भी बना लिए जा रहे हैं, और ब्लैकमेलर जोंक की तरह उनके बदन के खून की एक-एक बूंद चूस ले रहे हैं। दुनिया भर की साइबर-सुरक्षा एजेंसियां, और पुलिस मिलकर भी मुजरिमों का कोई मुकाबला नहीं कर पा रही हैं, जो कि हर दिन अपना जाल अधिक बड़ा करते चल रहे हैं। 

इस बारे में लिखते हुए हमारे पास और तो कोई समाधान नहीं है, सिवाय इसके कि लोग जहां तक हो सके, जितनी हो सके, उतनी सावधानी बरतें। कुछ हादसे सिगरेट-तम्बाकू से दूर रहकर कैंसर से बचकर टाले जा सकते हैं, कुछ हेलमेट के इस्तेमाल से टल सकते हैं, और कई हादसे साइबर जालसाजी-धोखाधड़ी की खबरों को पढक़र सावधान रहकर टाले जा सकते हैं। लोग नशे से दूर रहकर भी बच सकते हैं। अब अमरीका में एक प्रोफेसर पिता और लाइब्रेरियन मां के बेटे सुबु वेदम को नशे के सामान के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था, और 1999 में उनके वकीलों ने यही बेहतर पाया कि वे अमरीकी कानून के मुताबिक न जुर्म मंजूर करें, और न ही जुर्म का खंडन करें। आज 43 बरस बाद जब वे एक आजाद नागरिक हो सकते थे, तब 1999 का यह मामला आज 25 बरस बाद उन्हें अमरीका से मुजरिम की तरह, कैदी बनाकर, भारत भेज देने के लिए काफी है। जिन लोगों को किस्मत, बदकिस्मती, संयोग-दुर्योग पर भरोसा है, उनकी बात वे जानें, हम तो सिर्फ यह कह सकते हैं कि लोग मुसीबत और हादसों से बचने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर लें, पूरी सावधानी बरत लें, और उससे हर हादसा चाहे न टले, बहुत किस्म की मुसीबतें टल सकती हैं, कम हो सकती हैं। जिंदगी और दुनिया में ऐसी मुसीबतों को कम करना छोटी बात नहीं रहती, और उसके लिए कोशिश करनी चाहिए, बजाय दूसरों के संयोग या दुर्योग को गिनाए।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

एआई की चेतावनी सुनने की जरूरत, मानसिक सेहत के लिए कदम उठाएं

  29 अक्टूबर 2025 

 

दुनिया में आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए सबसे अधिक खबरों में बना हुआ चैटजीपीटी बताता है कि उससे बातचीत करने वाले लोगों में से हर हफ्ते 10 लाख लोग खुदकुशी का इरादा जाहिर करते हैं। पूरी दुनिया में करोड़ों लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, फिर भी 10 लाख का आंकड़ा बहुत बड़ा है। जिन लोगों ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बातचीत नहीं की है, उन्हें अंदाज नहीं होगा कि वह एक दोस्त और शुभचिंतक की तरह बात करता है, कभी परामर्शदाता बन जाता है, तो कभी दुनिया भर के मुद्दों पर सलाह की जानकारी देने लगता है। हाल के महीनों में यह बात भी सामने आई है कि एआई कई लोगों को भावनात्मक रूप से ऐसा जोड़ लेता है कि पश्चिमी देशों में दसियों लाख किशोर-किशोरियां उसे ही अपने प्रेमी-प्रेमिका की तरह देखने लगते हैं, उसके साथ दिल का रिश्ता जोड़ लेते हैं। कुछ महीने पहले यह बात भी आई थी कि एआई चैटबॉट ने भावनात्मक रूप से अस्थिर लोगों को खुदकुशी की राह दिखाने की कोशिश भी की थी। और लोगों को लगता है कि वे दुनिया के सबसे उम्दा एआई से बात कर रहे हैं, जिसकी बात सही और सच होने की ही गुंजाइश अधिक है। अभी ताजा खबर बताती है कि दुनिया के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह मानते हैं कि एआई चैटबॉट से भावनात्मक मदद लेने वालों में से जो कमजोर मानसिक स्थिति से गुजर रहे हैं, वे खतरे में पड़ सकते हैं।

अब हम कमजोर मानसिक स्थिति की एक दूसरी खबर देखें, तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक सरकारी साईंस कॉलेज में पढऩे वाली छात्रा अपने बीमार पिता से मिलकर आई थी, और किराए के मकान में जहां वह रहती थी, वहां उसने खुदकुशी कर ली। आज की ही एक दूसरी खबर है कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के परिवार में एक कमउम्र लडक़े ने खुदकुशी कर ली है। ऐसी खबरें चारों तरफ से आती हैं, और दिल दहलाती हैं कि प्रेम, कर्ज, इम्तिहान में नाकामयाबी, परिवार में डांट, मोबाइल फोन न मिलने, मोबाइल गेम न खेलने देने जैसे किसी भी बहुत छोटे मामले को लेकर लोग खुदकुशी करने लगे हैं। इसके लिए न तो कोई उम्र सीमा रह गई है, न आय सीमा। आदिवासी इलाकों में भी हॉस्टल में रह रही छात्राओं की खुदकुशी की खबर तकरीबन हर पखवाड़े या महीने देखने मिलती है। यह नौबत देश में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति बताती है।

हिन्दुस्तान की बात करें तो यहां पर दो पीढिय़ों के बीच खुलकर बात करने के रिश्ते नहीं रहते। नई पीढ़ी अगर अपनी मर्जी से प्रेम और विवाह करना चाहती है, तो उसके मां-बाप, चाचा-ताऊ मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं, और कभी भाड़े के हत्यारों से, तो कभी अपने सामाजिक अहंकार का पेट भरने के लिए अपने हाथों से तथाकथित ऑनरकिलिंग कर देते हैं। ऐसे समाज में नौजवान पीढ़ी अपनी हसरतों को खुलकर किसी के सामने रख भी नहीं पाती। देश में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता, या किसी और किस्म के रिलेशनशिप-सलाहकार गिने-चुने हैं। भारत के अधिकतर नौजवानों को अपनी उलझन सुलझाने के लिए कोई जरिया हासिल नहीं है। ऐसे में हम हर दिन कहीं न कहीं एक प्रेमीजोड़े की खुदकुशी की खबर पढ़ते हैं, और अलग-अलग खुदकुशी करने वाले लोग तो एक साथ खबरों में आते भी नहीं हैं। शादीशुदा जिंदगी के रिश्ते इतने हिंसक हो चुके हैं कि पति-पत्नी के बीच शक आकर एक अलग किस्म का त्रिकोण बना देता है, और बात मरने-मारने पर आ जाती है, पहले मार देने, और फिर मर जाने पर। फिर यह भी है कि पति-पत्नी के बीच किसी एक प्रेमी या प्रेमिका के आ जाने से जो खूनी त्रिकोण बनता है, वह आमतौर पर एक या दो के कत्ल करवाता है, और बचे हुए को जेल भिजवाता है। भारत रिश्तों में शक से लेकर रिश्तों के टूटने तक किसी चीज को झेलने की दिमागी हालत में नहीं है, और आने वाले कुछ दशकों में देश की मानसिक स्वास्थ्य सेवा की इतनी क्षमता विकसित होते नहीं दिखती जो कि 140 करोड़ आबादी के बीच पनपती मानसिक कुंठाओं, और हिंसक भावनाओं का कोई इलाज कर सके।

हम अपने अखबार, और यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार इस बात को उठाते हैं कि समाज की सोच में जो जटिलता और हिंसा बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए देश-प्रदेश की सरकारों को चाहिए कि अपने विश्वविद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्श, और रिलेशनशिप को लेकर सलाह के कोर्स शुरू करे ताकि शिक्षित-प्रशिक्षित लोग समाज के आम लोगों को हासिल हो सकें। आज भारत में मनोवैज्ञानिक चिकित्सा बड़ी महंगी पड़ती है, और परामर्शदाता भी पौन घंटे की एक मुलाकात के कई हजार रूपए लेते हैं। अगर देश में हर बरस कई हजार परामर्शदाता पढ़-लिखकर, प्रशिक्षण पाकर निकलने लगेंगे, तो ही गरीबों को मानसिक मदद मिल सकेगी। हमारा यह भी मानना है कि जिस तरह स्कूली शिक्षकों में कुछ लोगों को योग शिक्षा सिखाई जाती है, उसी तरह शिक्षक-शिक्षिकाओं का रूझान देखकर उन्हें मानसिक परामर्श के पाठ्यक्रम करने के लिए बढ़ावा देना चाहिए, ताकि वे कम से कम अपने स्कूल, या अपने शहर-कस्बे के बच्चों की मदद कर सकें। आज भारत में मानसिक स्वास्थ्य बहुत बुरी तरह उपेक्षित विषय है, और यही वजह है कि देश में आत्मघाती, या हत्यारी हिंसा इतनी बुरी तरह बढ़ी हुई है, और बढ़ती चल रही है। मानसिक स्वास्थ्य ठीक न रहने से हत्या या बलात्कार से परे भी परिवार के भीतर माहौल बड़ा खराब रहता है, और समाज की उत्पादकता, और सामूहिक मानसिक सेहत का बड़ा नुकसान होता है। कुल मिलाकर जिम्मेदारी की गेंद सरकारों के पाले में है कि वे हर विश्वविद्यालय में मानसिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करवाए, और शिक्षकों जैसे अपने बड़े अमले के लिए इस पढ़ाई को करने के लिए कुछ प्रोत्साहन योजना भी लागू करे।

(Daily Chhattisgarh) 

त्यौहारों का विश्लेषण, और मूल्यांकन करना कैसा रहेगा?

28 अक्टूबर 2025 

 

भारत धर्मप्रधान देश है। एक समय यह कृषिप्रधान हुआ करता था, बाद में कृषि, सरकारी समर्थन मूल्य, कर्जमाफी, मुफ्त बिजली, और सरकार के आयात-निर्यात नियमों की मोहताज होकर रह गई। देश में हरितक्रांति जरूर आ गई, लेकिन खेतों में हरियाली लाने वाले किसान सरकार की योजनाओं, चुनावी घोषणाओं, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की नीतियों के सहारे ही रह गए। ऐसे देश में खेती के बाद दूसरे नंबर का सबसे महत्वपूर्ण काम धर्म का है। देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग धर्मों में, अलग-अलग जातियों में तरह-तरह के धर्म साल भर चलते ही रहते हैं। दुनिया के कुछ विकसित देशों की तरह भारत में अभी लोगों का अनास्थावादी, या नास्तिक होना लोकप्रिय नहीं हुआ है, इसलिए नास्तिकता मोटेतौर पर किताबों तक सीमित है, और असल जिंदगी में अधिकतर लोग धर्मालु हैं। लेकिन जिस तरह एक किताब या फिल्म का नाम है, फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, भारत में भी लोगों के शंकालु से लेकर धर्मालु तक, और धर्मान्ध से लेकर साम्प्रदायिक होने तक, ऐसे 50 अलग-अलग शेड दिखते हैं। 

धार्मिक त्यौहारों की सोचते हुए एक बात लगती है कि किस धर्म, या किस जाति के कौन से त्यौहार कितने उस समुदाय के भीतर के हैं, और कितने सचमुच ही सामाजिक हैं, दूसरे समुदायों के लिए भी हैं। त्यौहारों का ऐसा अनौपचारिक विश्लेषण सुझाता है कि त्यौहारों को कुछ पैमानों पर कसा जा सकता है कि उनका सामाजिक योगदान कितना है। अब जैसे किसी धर्म के किसी त्यौहार का मूल्यांकन करने के लिए यह सोचना चाहिए कि उसे मनाते हुए उस तबके के भीतर अमीर और गरीब का फर्क कितना झलकता है? क्या गरीब भी उस त्यौहार को मना सकते हैं, या फिर वह गरीबों पर महज बोझ रहता है? क्या लोगों के बीच इस त्यौहार पर अपने से कमजोर लोगों की मदद करने की कोई सोच रहती है, या फिर लोग अपने ही परिवार, दोस्तों, और अपने ही आय वर्ग के बीच मस्त रहते हैं? किसी त्यौहार का मूल्यांकन इस पर भी होना चाहिए कि मनाने वाले परिवारों में महिलाओं को कितने हक मिलते हैं? क्या उन्हें सिर्फ पकाने और सजाने का, पूजा और मनाने का अतिरिक्त बोझ ही मिलता है, और उपवास से खाली पेट मिलता है, या फिर खुशियां मनाने में बराबरी का मौका और हक भी मिलता है? यह भी देखा जाना चाहिए कि उस त्यौहार से जुड़ा हुआ उपवास सिर्फ महिलाओं के मत्थे पड़ता है, या फिर चर्बी से लदे हुए मर्द भी एकाध दिन अपने बदन को राहत देते हैं? मूल्यांकन इस बात को लेकर भी होना चाहिए कि त्यौहार मनाने के तौर-तरीके गरीबों पर अधिक भारी पड़ते हैं क्या? फिर यह भी देखना चाहिए कि कौन सा त्यौहार कितना प्रदूषण छोड़ जाता है, नदियों में, तालाबों पर, सडक़ों पर, शामियानों में, कहां-कहां पर वह ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, धरती और जल प्रदूषण छोड़ जाता है? त्यौहारों को लेकर यह भी देखना चाहिए कि उनमें कट्टरता कितनी है? अंधविश्वास और पाखंड कितना है? वैज्ञानिक पैमानों पर त्यौहार कितने सकारात्मक, और कितने नकारात्मक होते हैं? इन सभी बातों को देखना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि आमतौर पर जो महिलाएं त्यौहार मनाती हैं, उनके परिवार के लडक़े या पुरूष उनका कितना हाथ बंटाते हैं? कुछ बरस पहले की एक तस्वीर याद पड़ती है जिसमें एक नामी-गिरामी टीवी जर्नलिस्ट रहे रवीश कुमार छठ पर सिर पर टोकरी रखे हुए शायद अपनी मां के साथ चलते हुए दिखते हैं। तो किस त्यौहार का बोझ पुरूष भी उठाते हैं? 

हमें त्यौहारों का मूल्यांकन करते हुए यह भी सूझता है कि कौन सा त्यौहार दूसरी जाति, या दूसरे धर्म के लोगों के लिए कितना खुला रहता है? दूसरे समुदायों का उनमें कितना स्वागत होता है? बंगाल की याद पड़ती है कि वहां की विश्वविख्यात दुर्गा पूजा में हिन्दू जितने शामिल होते हैं, उतने ही मुस्लिम भी शामिल होते हैं, मूर्तिकार और साज-सज्जा करने वाले मुस्लिम ही अधिक रहते हैं, और वे पूजा के पूरे जलसों में शामिल रहते हैं। वहां पर यह त्यौहार धार्मिक न होकर सामाजिक अधिक रहता है। लोगों को अपने-अपने इलाकों में यह देखना चाहिए कि उनके त्यौहार कितने धार्मिक हैं, और कितने सामाजिक। एक वक्त गुजरात में गरबा पूरी तरह से सामाजिक था, कहीं से यह सुनाई भी नहीं पड़ता था कि उसमें गैरहिन्दू न पहुंचें। लेकिन बाद में माहौल बदलते चले गया, और अब तो ऐसी तख्तियां लगने लगी हैं, और एक सामाजिक त्यौहार पूरी तरह से एक धर्म का त्यौहार हो गया है। हर धर्म को यह हक है कि वह अपने त्यौहारों को अपने समुदाय का रखे, या सभी समाजों का उसमें स्वागत करे, इसमें बिना बुलाए दूसरे धर्म के लोगों को वहां जाकर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह डांस नहीं करना चाहिए। 

त्यौहारों का मूल्यांकन इस बात से भी होना चाहिए कि उसके दिनों में उसे मना रहे लोग कितना सेहतमंद खाना खा पाते हैं? कई लोगों को यह बात अटपटी लगेगी, और वे कहेंगे कि त्यौहार तो होते ही इसलिए हैं कि खूब खाया-पिया जाए। लेकिन हम तो त्यौहार के हर पहलू का मूल्यांकन कर रहे हैं, इसलिए हम उसे सेहत के साथ जोडक़र भी देखेंगे ही देखेंगे। यहां पर लोगों को इटली में कई-कई दिनों तक चलने वाली पार्टियों के बारे में बताना जरूरी है जिसमें लोग खाते-खाते जब और अधिक नहीं खा पाते, तब वे जाकर उल्टियां करते हैं, और लौटकर और खाते हैं। पुराने रईसों के घरों में बाथरूम के अलावा वोमिटोरियम भी हुआ करते थे, वोमिट यानी उल्टी, और उसे करने की जगह बनाई जाती थी, क्योंकि खा-खाकर अघा चुके लोगों को और खाने के पहले उसकी जरूरत लगती थी। इस तरह कुछ त्यौहार अंधाधुंध खाने के रहते हैं, और लोगों को त्यौहार का मूल्यांकन या विश्लेषण करते हुए खानपान को भी ध्यान में रखना चाहिए। 

अब चलते-चलते आखिर में एक और पैमाना सूझ रहा है कि लोग ठीक-ठाक संपन्न होने पर उस त्यौहार को मना रहे विपन्न लोगों की कितनी मदद करते हैं? दान देते हैं, या कमाई का एक हिस्सा जकात की तरह देते हैं, या अड़ोस-पड़ोस के गरीबों को अपनी रौशनी और मिठाई में हिस्सा लेने के लिए बुलाते हैं, या किसी और तरीके से जरूरतमंदों की मदद करते हैं? त्यौहार तो अपनी खुशी के साथ-साथ खुशियां मनाने और बांटने का भी मौका रहता है, कोई त्यौहार उतना ही अच्छा कहा जा सकता है जितना कि उसे मनाने वाले विपन्न लोगों को भी संपन्न लोगों का साथ मिले। अब हमने तो यहां एक छोटी सी लिस्ट गिनाई है, आप चाहें तो अपने आसपास के बच्चों को इस चर्चा के साथ एक निबंध लिखने को कह सकते हैं कि किस त्यौहार में क्या-क्या खूबी है, और क्या-क्या खामी है। ऐसा लिखते हुए बच्चों को सामाजिक सरोकार की भी थोड़ी सी समझ होगी, और वे आपसे कुछ सवाल भी कर सकेंगे। त्यौहारों पर स्कूलों की छुट्टी रहती है, और उस छुट्टी के बीच, या कि त्यौहार निपट जाने के बाद अगली छुट्टी के दिन बच्चों के साथ ऐसी दिमागी कसरत करके देखें, हो सकता है कि आपको भी अपने खुद के त्यौहार को लेकर एक नया नजरिया मिले।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

प्रतिमा के बहाने कुछ चर्चा राष्ट्रवाद और क्षेत्रवाद पर भी

 27 अक्टूबर 2025 

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दो रात पहले छत्तीसगढ़ महतारी की सडक़ किनारे चबूतरे पर स्थापित प्रतिमा किसी ने तोडक़र गिरा दी। इसे लेकर कुछ छत्तीसगढ़ी संगठनों ने बड़ा उग्र प्रदर्शन किया, कांग्रेस के पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मुद्दे को लपककर मौजूदा भाजपा सरकार पर बड़ा हमला किया, और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कड़ी जांच और कार्रवाई का भरोसा दिलाया। आज सुबह से उस टूटी प्रतिमा की जगह दूसरी प्रतिमा स्थापित की गई, और पहली खबर यह आई है कि किसी मानसिक विक्षिप्त ने यह प्रतिमा तोड़ दी थी। और भी जगहों पर कई बार ऐसा होता है कि कोई विक्षिप्त, या नशेड़ी व्यक्ति किसी प्रतिमा को नुकसान पहुंचा दे। इन दिनों अधिक प्रचलित हो चले सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से बहुत से मामले पकड़ में आ जाते हैं, और सुबूत की रिकॉर्डिंग भी मिल जाती है। 

आज हम इसी एक मामले को लेकर नहीं लिख रहे हैं, बल्कि देश भर में चारों तरफ कहीं महान व्यक्तियों (महापुरूष लिखना लैंगिक असमानता की बात होगी), कहीं किसी धर्म के आराध्य लोगों की प्रतिमाएं लगी रहती हैं, कहीं सडक़ किनारे पेड़ के नीचे सिंदूर पुते पत्थर भी आस्था के प्रतीक रहते हैं, और इन सबकी कोई हिफाजत तो रहती नहीं है। छत्तीसगढ़ महतारी का प्रतीक अभी कुछ बरस पहले ही बना, और उसका उपयोग शुरू हुआ। लेकिन गांधी और अंबेडकर, इन दोनों की प्रतिमाएं देश भर में शायद देश के ताजा इतिहास के लोगों में सबसे अधिक लगी दिखती हैं। और इन दोनों की प्रतिमाओं पर ही जगह-जगह हमले होते हैं, इन्हें तोड़ा-फोड़ा जाता है, चूंकि गांधी को मानने वाले लोग कोई उग्र या आक्रामक समूह नहीं हैं, इसलिए उनकी प्रतिमा टूटने पर हल्ला नहीं मचता, उसे जोड़-जाडक़र खड़ा कर दिया जाता है। अंबेडकर को मानने वाले लोग अनुसूचित जाति में अधिक हैं, और वे इसे अपनी जाति का अपमान मानते हैं, जो कि रहता भी है, और वे लोग तुरंत ही विरोध करने को एकजुट हो जाते हैं। फिर सडक़ किनारे, पेड़तले कुछ किस्म के ईश्वर अधिक संख्या में चारों तरफ रहते हैं, और जब कभी कोई तनाव खड़ा करना रहता है, उस इलाके की ऐसी आस्था-शिलाएं बड़े काम की साबित होती हैं। और तो और कहीं-कहीं किसी थानेदार को हटाने के लिए भी इस तरह का तनाव खड़ा किया जाता है। 

छत्तीसगढ़ में अभी इस बात को लेकर भी थोड़ी सी तनातनी चल रही थी कि रेलवे स्टेशनों और रेलगाडिय़ों में छठ के गीत बज रहे हैं, क्योंकि छठ त्यौहार का मौका है। खासकर कुछ ऐसे संगठन, और लिखने वाले, जो कि उग्र क्षेत्रवाद का झंडा उठाकर चलते हैं, उन्हें इस संगीत से याद पड़ा कि छत्तीसगढ़ी त्यौहारों पर तो ऐसा कुछ बजता नहीं है। फिर यह भी है कि दुनिया में कहीं भी उग्र क्षेत्रवाद दूसरे क्षेत्रों के विरोध पर पनपता है, पलता है, और बढ़ता है। इसलिए एक तरफ यह संगीत, और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा को तोड़ा जाना, इन दोनों ने मिलकर इस मौके पर देसिया और परदेसिया का फर्क भी बयानों में और सोशल मीडिया पोस्ट पर ला दिया। हालांकि छत्तीसगढ़ महतारी इस राज्य का इस तरह का प्रतीक नहीं है कि जिससे कोई भी तबका, किसी भी प्रदेश के लोग, किसी भी जाति या धर्म के लोग चिढ़ सकें। यह प्रतीक जाति-धर्म से परे का है, और इसके साथ कोई परदेसिया-विरोधी जैसी आक्रामक सोच भी जुड़ी हुई नहीं है। इसलिए इस प्रतिमा को किसी वैचारिक विरोध की वजह से तोड़ा गया हो, ऐसा हमें बिल्कुल नहीं लगा था, और शायद ऐसा ही साबित भी होगा। 

लेकिन लगे हाथों क्षेत्रवाद के बारे में सोच लेना जरूरी है। जिस देश में राष्ट्रवाद उग्र होता है, और पूरे देश पर एक साथ आक्रामक तरीके से लादा जाता है, वहां पर अलग-अलग इलाकों में मानो प्रतिक्रिया के रूप में क्षेत्रवाद सिर उठाने लगता है क्योंकि उसे अपने अस्तित्व को साबित करने का एक मौका मिल जाता है। फिर राष्ट्रवाद के नीचे जब अलग-अलग इलाकों में इस तरह स्थानीयतावाद, या क्षेत्रीयतावाद पनपने लगता है, तो वह अपने लिए उसी तरह काल्पनिक और अस्तित्वहीन दुश्मन ढूंढ लेने लगता है जैसा कि राष्ट्रवाद अपने लिए ढूंढ चुका रहता है। राष्ट्रवाद से लेकर क्षेत्रवाद तक ऐसे एक काल्पनिक दुश्मन की जरूरत जरूरी रहती है। इसमें थोड़ी दिक्कत तब आ जाती है जब किसी इलाके के घोर उग्रवादी स्थानीयतावादी लोग अड़ोस-पड़ोस के प्रदेशों से भी आए हुए लोगों के चेहरे काल्पनिक दुश्मन के पुतले पर चिपकाने लगते हैं, और फिर एक ही धर्म या एक ही जाति के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्र का मुद्दा अधिक हमलावर होने लगता है। इस तरह किसी देश में राष्ट्रवाद की एक नकारात्मक, आक्रामक, और हिंसक प्रतिक्रिया जगह-जगह देखने मिलती है। दुनिया की बहुत सी संस्कृतियां राष्ट्रवाद के ऐसे नुकसान देख, और झेल चुकी हैं, और राष्ट्रवादी उन्माद के नतीजे में क्षेत्रवाद भी जगह-जगह हावी होता है। लोग बोली और पहरावे को लेकर, खानपान और दुकानों के नाम को लेकर, और सार्वजनिक जगहों पर सफाई और संगीत को लेकर छोटे बच्चों की तरह देखादेखी के मुकाबले में उतर आते हैं, और फिर बालिग लोगों की तरह हमलावर हो जाते हैं। 

मानव सभ्यता सीखने का एक बड़ा लंबा सिलसिला रहती है। इससे सीख, सबक, और नसीहत न लेने का मतलब लोगों का उन्हीं किस्म के नुकसानों को एक बार और झेलना रहता है। अब भला हर पीढ़ी अपने लिए चक्के का आविष्कार एक बार फिर करने लगे, तो भला कितनी बर्बादी नहीं होगी? इसी तरह अगर हम सभ्यता के इतिहास में झेले गए नुकसान से कोई सबक नहीं लेंगे, तो उसका मतलब है कि कुछ या कई पीढिय़ों बाद हम उसी नुकसान को एक बार फिर झेलेंगे, बिना कुछ सीखे हुए। किसी देश को यह भी याद रखना चाहिए कि राष्ट्रवादी उन्माद क्षेत्रवादी उन्माद में तो बदलता ही है, लेकिन इसके साथ-साथ वह धर्म और जाति के उन्माद में भी बदल जाता है क्योंकि उसे हर कुछ दिनों में किसी उन्माद के नशे की आदत पड़ चुकी रहती है। जिस तरह नशेड़ी को दिन के एक खास वक्त में नशे की तलब होती है, उसी तरह उन्मादी लोगों को हर कुछ दिनों में अपने हमलावर मिजाज का पेट भरने के लिए कोई एक काल्पनिक दुश्मन लगता है। देश को सोचना चाहिए कि क्या ऐसे राष्ट्र और क्षेत्रवाद देश के भले के हैं?

अब इसके साथ-साथ यह सोचना भी जरूरी है कि शहर, गांव-कस्बे तक बिखरी हुई धार्मिक और सामाजिक प्रतिमाओं का क्या किया जाए? बहुत से मामलों में तो इन प्रतिमाओं के बहाने जिन लोगों को अपने अपमान का मुद्दा उठाने का मौका मिलता है, वैसे लोग भी प्रतिमाओं के नुकसान के पीछे पकड़ाए जा चुके हैं। दूसरों पर तोहमत धरने के लिए लोग अपनी ही आराध्य प्रतिमाओं को जगह-जगह तोड़ते हैं। जब सार्वजनिक जगहों पर प्रतिमाओं की हिफाजत नहीं की जा सकती, तो उन्हें लगाने के पहले यह सोच लेना क्या ठीक नहीं होगा कि चबूतरे पर न सिर्फ प्रतिमा रहेगी, बल्कि तनाव की एक आशंका भी साथ-साथ रहेगी। यह देश जितने किस्म के तनावों में घिरा हुआ है, यह इतनी प्रतिमाओं के अतिरिक्त तनावों को झेल नहीं सकता। प्रतिमाओं को बहुत सुरक्षित जगहों पर, बहुत सीमित संख्या में लगाना चाहिए, जहां चौबीसों घंटे आवाजाही हो, हिफाजत हो, वहीं पर प्रतिमा निर्विवाद रूप से सुरक्षित रह सकती है। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)




 

अपने धर्म और अपने देश की इज्जत बचाने के लिए

26 अक्टूबर 2025 

 

अमरीका में अभी कुछ हफ्तों के भीतर ही एक और सडक़ हादसा हुआ जिसमें भारत से वहां जाकर गैरकानूनी रूप से रह रहे सिक्ख नौजवान जशनप्रीत सिंह ने नशे और लापरवाही की हालत में एक हाईवे पर बुरा एक्सीडेंट किया, सडक़ पर ढेरों गाडिय़ां एक-दूसरे से टकराईं, और इसमें तीन लोग मारे गए। लोगों को याद होगा कुछ हफ्ते पहले भी भारत के ही एक सिक्ख नौजवान ने अमरीका में लापरवाही से बड़ी ट्रक मोड़ी थी, और इसी तरह का एक्सीडेंट हुआ था। आज की ट्रंप सरकार तो देश के बाहर से आए हुए और गैरकानूनी रूप से बसे हुए लोगों को बाहर निकाल रही है, लेकिन ऐसे लाखों लोग वहां पर बसे हुए हैं जो कि अवैध तरीके से घुसे हुए, या रूके हुए हैं, और इनमें से हर महीने हजारों लोग उनके देश भेज दिए जा रहे हैं। भारत में भी अमरीका से निकाले गए, और हथकड़ी-बेड़ी में जकडक़र लाकर यहां छोड़े गए लोगों के शुरू के कुछ विमान तो पंजाब में ही उतरे थे, क्योंकि इनमें वहीं के लोग ज्यादा थे। 

जब कभी किसी देश की पहचान लेकर कहीं गए हुए, या वहां बसे हुए लोग कोई गलत काम करते हैं, तो उनके देश की बदनामी भी होती है, और अगर वे धर्म के प्रतीक चिन्ह पहने रहते हैं, तो उनके धर्म की साख पर भी आँच आती है। कोई भी धर्म अपने को मानने वाले लोगों के चाल-चलन से भी पहचाना जाता है, फिर चाहे उस धर्म की किताबें और नसीहतें कुछ और क्यों न कहती हों। भारत से गए हुए लोग ही अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया में सबसे अधिक संख्या में हैं, या सबसे अधिक खबरों में रहते हैं। वे भारत के खालिस्तानी आंदोलन को भी इन देशों में चलाते हैं, भारत के माफिया गिरोह भी इन देशों तक अपना विस्तार कर चुके हैं, और वहां भी गोलीबारी करवाते रहते हैं, या कत्ल भी। अभी तो कुछ देशों में भारत सरकार के कुछ अफसर भी घिरे हुए हैं कि उन्होंने वहां की जमीन पर भारत के दुश्मन माने जाने वाले लोगों का कत्ल करवाया, या कत्ल करने की सुपारी दी। इन सबसे एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में भारत का नुकसान हुआ, जो कि जारी भी है, और इसके अलावा जो लोग इस तरह की हरकतों से जुड़े रहते हैं, उनके धर्म भी नुकसान पाते हैं। 

ट्विटर, यानी एक्स के मालिक एलन मस्क ने कल ही एक समाचार की कतरन पोस्ट की है जिसमें फ्रांस में एक विदेशी आप्रवासी ने एक फ्रेंच बच्ची से बलात्कार करके उसका कत्ल कर दिया था, और जब तक मुजरिम को सजा होती, तब तक अपनी बेटी को खोने वाले पिता ने भी नशे में डूबकर जिंदगी खो दी। अब इस एक घटना ने आप्रवासियों के खिलाफ नफरत का एक नया सैलाब ला दिया है। इसी तरह ब्रिटेन में अभी बाहर से आकर बसे कुछ मुस्लिमों ने कुछ जुर्म किए, तो उससे मुस्लिमों के खिलाफ भी नाराजगी फैली, और विदेशी शरणार्थियों के खिलाफ भी। ऐसा दुनिया के कई देशों में हो रहा है, और कुछ देशों में तो वहां की सबसे दक्षिणपंथी पार्टियां ऐसे ही शरणार्थी-मुद्दों को लेकर सत्ता पर आ गईं। भारत में भी आज बांग्लादेश और म्यांमार से आए हुए शरणार्थियों का एक बड़ा मुद्दा चुनावी बहस का सामान बना हुआ है, और धर्म के साथ-साथ राष्ट्रीयता भी निशाने पर है। 

लोग जब अपनी पहचान को लिए चलते हैं, तो उन्हें अपनी जड़ों के सम्मान के प्रति अधिक सावधान रहना चाहिए। जब धार्मिक कपड़े, प्रतीक चिन्ह, या झंडे लिए हुए लोग कोई हिंसा करते हैं, तो पहला नुकसान वे अपने ही धर्म की साख का करते हैं, दूसरे लोगों का नुकसान तो बाद में होता है। लोगों को सोशल मीडिया पर यह लिखने का मौका मिलता है कि अगर आपका धर्म आपको हिंसा के लिए उकसाता है, तो आपको एक नए धर्म की जरूरत है, या फिर सारे धर्मों को छोड़ देने की। इसी तरह जब लोग अपनी जमीन से दूर जाकर कहीं और बसकर या रहकर काम करते हैं, तो उनकी हरकतंर उनके देश को भी नाम दिलाने या बदनाम करने का काम करती हैं। अब आज दुनिया के दर्जनभर से अधिक देशों से गृहयुद्ध या आतंक की वजह से जो बेदखली चल रही है, और लोग जान बचाकर पश्चिम के देशों में गैरकानूनी तरीके से भी घुसने की कोशिश में अपनी जान दे दे रहे हैं, उससे भी उन देशों में संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो रहा है, और संकीर्णतावादी-राष्ट्रवादी लोगों को एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी मिल रहा है। योरप के कई देशों ने इतनी संकीर्ण पार्टियों की इतनी सफलता कई दशकों में नहीं देखी थीं, जितनी कि आज शरणार्थियों और घुसपैठियों की वजह से, उनका खतरा गिनाते हुए मुमकिन हो पा रही है। 

सर्वधर्म समभाव की सोच अच्छी है, लेकिन हर धर्म की सोच एक सरीखी है नहीं। खासकर लोकतंत्र को लेकर कुछ धर्म पश्चिमी लोकतंत्रों का अधिक सम्मान कर पाते हैं, और कुछ धर्म अपने को लोकतंत्रों से ऊपर साबित करने में ही लगे रह जाते हैं। पश्चिम में जहां भी उदार लोकतंत्र दुनिया के शरणार्थियों के प्रति अपनी वैश्विक जिम्मेदारी अधिक हद तक निभाने की कोशिश कर रहे हैं, वहां-वहां उन्हें कुछ देशों से आए हुए, और एक-दो धर्मों वाले ऐसे लोगों की चुनौती झेलनी पड़ रही है जो कि लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को अपने धर्म के खिलाफ मानते हैं। योरप की संस्कृतियों में बसने के बाद भी कई मुस्लिम देशों से आए हुए लोग अपनी लड़कियों और महिलाओं के लिए अपने देश के घरेलू संस्कृति जारी रखना चाहते हैं, और लोकतंत्र से उनका एक टकराव खत्म होता ही नहीं है। बुर्का से लेकर हिजाब तक, और बाल विवाह से लेकर ऑनरकिलिंग तक बहुत से मामलों में शरणार्थी समुदाय स्थानीय सरकारों से टकराते हैं, और धीरे-धीरे उनके प्रति योरप के स्थानीय लोगों के बीच हमदर्दी खत्म होती जाती है।

अपनी धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने का हक सैद्धांतिक रूप से एक ठीक बात है, लेकिन जब यह स्वतंत्रता किसी देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और कानूनों से टकराने पर आमादा रहती है, जब वे अपने जन्म के देश की तरह धर्म को संविधान के ऊपर मानकर चलते हैं, या धर्म ही जिनका संविधान रहता है, तो वे लोग शरण देने वाले देशों और वहां की संस्कृति-संविधान से लगातार टकराते रहते हैं। और चूंकि पूरी दुनिया का गोला अब पल-पल के संपर्क की वजह से एक गांव जैसा हो गया है, इसलिए एक देश में शरणार्थियों या घुसपैठियों को लेकर जो तनाव खड़ा होता है, उसका झोंका दूसरे देशों तक भी जाता है। इसलिए हर देश और धर्म के लोगों को बाहर जाने पर, या दूसरे लोगों के साथ रहने पर अपनी आस्था, और अपनी राष्ट्रीयता का सम्मान बनाए रखने की अतिरिक्त कोशिश करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

सूचना आयोग से लेकर लोकपाल तक, संवैधानिक संस्थाओं का नैतिक दीवाला

26 अक्टूबर 2025

भारत में सूचना का अधिकार आए 20 बरस हो रहे हैं, और देश के साथ-साथ हर प्रदेशों में ये आयोग जनता को सूचना के अधिकार के तहत सरकारों से न मिलने वाली जानकारी को दिलाने के लिए बनाए गए हैं। जिस सोच के साथ यह अधिकार बना था, और यूपीए सरकार के समय कांग्रेस पार्टी के काबू के बाहर के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी पर सीधा प्रभाव था, और उसी के चलते यह कानून बना था। बाद में हर पार्टी की सरकारों को यह समझ में आया कि यह तो सरकारों का भांडाफोड़ कर देने वाला कानून है, तो उसे कमजोर करने की तरह-तरह की राजनीतिक साजिशें शुरू हो गईं। अभी आई एक रिपोर्ट बताती है कि प्रदेशों के 29 आयोगों में लाखों शिकायतें पड़ी हुई हैं, और वहां सदस्यों की कुर्सियां खाली हैं, सरकारी विभागों से सूचना न मिलने के खिलाफ की गई अपीलें धूल खा रही हैं, और इस कानून का मकसद ही शिकस्त पा चुका है। इस क्षेत्र में काम करने वाले एक एनजीओ, सतर्क नागरिक संगठन ने आंकड़े सामने रखे हैं कि आज कुछ राज्यों में प्रदेश सूचना आयोग जिस रफ्तार से वहां आई अपीलों को निपटा रहा है, उस हिसाब से वहां आज की अपील पर फैसले में 29 बरस लग सकते हैं। तेलंगाना में 29, त्रिपुरा में 23, छत्तीसगढ़ में 11, एमपी और पंजाब में 7-7 साल लग सकते हैं। 

छत्तीसगढ़ में सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और दो आयुक्तों के खाली पद अदालती स्थगन से नहीं भरे जा सके हैं, और इस स्थगन के पहले भी यहां की कुर्सियां खाली पड़ी थीं। आज इस छोटे से राज्य में 43 हजार मामले सूचना आयोग में पड़े हैं। अब तक आयोग ने जो आदेश दिए थे उनमें से बहुत से ऐसे हैं जिन पर आयोग ने सरकारी अधिकारियों पर जुर्माना लगाया है, और ऐसी साढ़े 5 करोड़ की जुर्माना राशि भी आयोग तक अभी नहीं आई है। हैरानी की बात यह है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में अभी जून के महीने तक कुल साढ़े 18 हजार आवेदन ही सूचना आयोग में थे, जो कि छत्तीसगढ़ के आधे से भी कम हैं। 

जिन लोगों को सूचना आयोग की जरूरत और उसके असर का अंदाज नहीं है, उनके लिए यह बताना काम का होगा कि सरकारी विभागों से आमतौर पर भ्रष्टाचार और गड़बड़ी से जुड़ी जानकारी लोग आरटीआई में मांगते हैं, और विभाग की पूरी दिलचस्पी इसमें रहती है कि कोई जानकारी किसी तरह न दी जाए। कहावत-मुहावरे में सांप के किसी खजाने पर कुंडली मारकर बैठने की जो बात कही जाती है, वह सांप पर तो लागू नहीं होती, लेकिन सरकारी विभागों पर जरूर लागू होती है, जहां अधिकारियों का निजी, और वर्गहित इससे जुड़ा रहता है कि कोई जानकारी बाहर न चली जाए। सरकार में नीचे से लेकर ऊपर तक यही सोच रहती है कि आरटीआई को बेअसर कैसे किया जाए। यही वजह है कि कई-कई साल सूचना आयुक्तों की कुर्सियां खाली रखी जाती हैं। झारखंड में अभी पिछले बरस तक पांच साल से सूचना आयोग ठप्प पड़ा हुआ था। केन्द्रीय सूचना आयोग में भी नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट के कई बार के आदेश के बाद हो पाईं। 

लेकिन यह गिरावट सिर्फ सूचना के अधिकार के मामले में नहीं है, देश में और प्रदेशों में जितने तरह के संवैधानिक आयोग बनाए गए हैं, उन सबमें नियुक्तियां सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी की मर्जी से होती हैं, और फिर वहां मनोनीत लोग अपने को नियुक्त करने वाले लोगों के हित बचाने में लग जाते हैं। राज्य और केन्द्र के स्तर पर मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, बाल संरक्षण परिषद या आयोग, पर्यावरण से जुड़ी हुई संवैधानिक संस्थाएं, कॉलोनी और निर्माण से जुड़े हुए रेरा जैसे संवैधानिक संगठन, ऐसे बहुत से दफ्तर हैं जिन्हें बनाया तो इसलिए गया था कि वे सरकार में, या सरकार द्वारा किए गए गलत कामों पर नजर रखें, कार्रवाई करें, सरकारों को रोकें। लेकिन इनमें उन्हीं राज्यों की अदालतों या सरकारी विभागों से रिटायर होने वाले लोगों को भर दिया जाता है, या फिर सत्तारूढ़ पार्टी के पसंदीदा लोगों को। मतलब यह कि सरकार के बिठाए पिट्ठू मिट्ठू की तरह हाँ में हाँ मिलाते हैं, और जनता को मिलने वाला एक संवैधानिक हक मिलना शुरू होने के पहले ही खत्म होना शुरू हो जाता है। 

मैं बरसों से इस बात को उठाते आ रहा हूं कि किसी भी राज्य के ऐसे किसी भी संवैधानिक आयोग में, या किसी नियामक संस्था में उस राज्य के लोगों को मनोनीत नहीं करना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक टैलेंट-पूल बनाना चाहिए, और कोई राज्य अपने संवैधानिक ओहदों के लिए उस पूल में से ही लोगों को छांट सके, या फिर केन्द्रीय स्तर पर बनाई गई एक संवैधानिक संस्था उसी तरह लोगों को किसी राज्य भेज सके, जिस तरह अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केन्द्रीय स्तर से ही तय करके राज्यों में भेजा जाता है। 

अब जब केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने यह सहूलियत है कि वे बरसों तक संवैधानिक कुर्सियों को खाली रख सकती हैं, तो भला कौन सी सरकार अपने गलत कामों पर निगरानी की ताकत रखने वाली संस्थाओं को सक्रिय करना चाहेंगी? यह कुछ उसी तरह का होगा कि किसी शहर के चोरों को इकट्ठा करके कहा जाए कि वे श्रमदान से थाना बनाएं, और वहां पुलिस की तैनाती के लिए हर महीने आर्थिक योगदान भी दें। दरअसल सरकारों पर निगरानी के लिए बने संवैधानिक आयोग जब तक सरकारों की रहम पर चलेंगे, तब तक सरकारें उनका ऐसा ही हाल रखेंगी। आज तो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्तियों, और उन्हें अलग-अलग राज्यों में भेजने के मामलों में केन्द्र सरकार जहां दखल दे सकती है, वह अपनी मर्जी से सब कुछ तय करवाने की कोशिश में लग जाती है। किसी भी सरकार से उसके पर कतरने वाली कैंची पर धार करने की उम्मीद बुनियादी रूप से एक गलत इंतजाम हैं। लोकतंत्र जैसी लचीली व्यवस्था में सरकारों से आदर्श की उम्मीद करना निहायत फिजूल बात है। 

बात सूचना आयोग से शुरू जरूर हुई है, लेकिन वहां खत्म नहीं हो रही है। देश की अधिकतर संवैधानिक संस्थाओं की बदहाली देश में लोकतंत्र की बदहाली का एक जलता-सुलगता संकेत है। कोई भी लोकतंत्र उतना ही सफल हो सकता है जितनी सफल वहां की संवैधानिक संस्थाएं रहती हैं। भारत में जैसे-जैसे इन सारे आयोगों, और संसद की इमारतें मजबूत होती जा रही हैं, लोकतंत्र में इनकी एक-दूसरे पर निगरानी की ताकत उतनी ही कमजोर होती जा रही है। नाम के लिए ऐसी संस्थाओं को पालना जनता पर एक निहायत गैरजरूरी बोझ है। अब लोकपाल की ताजा मिसाल सामने है जिसमें धेले भर का काम न करने वाली इस संस्था के सात सदस्य 70-70 लाख रूपए की कार पाने जा रहे हैं। जनता को हक देने के लिए विकसित संवैधानिक सोच आज जनता का खून चूसने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही। 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवाली की रात राम दिल्ली में होते तो बोले रहते, हे राम...

25 अक्टूबर 2025 

 

दुनिया में वायु प्रदूषण पर आने वाली सालाना ग्लोबल रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में वायु प्रदूषण से करीब 80 लाख लोग मारे गए। इनमें से आधे लोग तो भारत और चीन में मरे हैं, 20-20 लाख! दुनिया में होने वाली हर 8 में से एक मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई है। अमरीका और स्विटजरलैंड के प्रतिष्ठित संस्थानों की इस रिपोर्ट का हर बरस इंतजार रहता है, और भारत में जिस तरह किसी भी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट को पढऩे के भी पहले कचरे की टोकरी में डाल दिया जाता है, वैसा ही कुछ इसके साथ भी होगा, और यह कहा जाएगा कि यह हिन्दू त्यौहार, दीवाली के फटाखों को बदनाम करने की एक और कोशिश है। लेकिन हम किसी धर्म या देश की फिक्र किए बिना वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित इस रिपोर्ट पर फिक्र करना चाहते हैं क्योंकि इन करीब 80 लाख में 90 फीसदी मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हुई हैं। भारत के अलावा बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी दो-दो लाख से अधिक मौतें वायु प्रदूषण से हुई हैं, और छोटे से म्यांमार में भी ऐसी एक लाख मौतें दर्ज हुई हैं। यह रिपोर्ट एक भयानक वैज्ञानिक पहलू भी सामने रखती है कि प्रदूषण का असर हवा साफ होने के बाद भी लंबे समय तक बने रहता है, और 2023 में दुनिया में 79 लाख मौतें तो हुई ही हैं, 23 करोड़ से अधिक स्वस्थ जीवन वर्ष भी बर्बाद हुए हैं, यानी लोगों की जिंदगी में इतने बरसों के बराबर की उम्र घट गई है। 

भारत धार्मिक प्रदूषण को धार्मिक स्वतंत्रता मानकर चलता है। सडक़ों पर फटाखे और आतिशबाजी, वायु प्रदूषण से परे के ध्वनि प्रदूषण और अब रौशनी के प्रदूषण भी शहरों का जीना हलाकान कर रहे हैं। लोग धर्मोन्माद में डूबे हुए न अपने फेंफड़ों की फिक्र करते, और न ही अपने जाने वाले बुजुर्गों की, और अभी-अभी आए हुए बच्चों की। हालांकि राम के लौटने पर अयोध्या में जो पहली दीवाली मनाई गई थी, उस वक्त बारूद या फटाखे नहीं थे, और घी-तेल के दीयों ने अयोध्या को बहुत अच्छी तरह रौनक किया होगा, आज तो हाल यह कि किसी मोहल्ले या कॉलोनी में लोग घंटे भर की मेहनत के बाद अपने घर के चारों तरफ दीये जलाते हैं, और पड़ोस में कोई एक बड़े धमाके वाला बम पल भर में सारे दीये बुझा देता है। अब अगर चीनी झालरों की रौशनी है तब तो ठीक है, वरना अयोध्या की शैली के दीयों का जलना अब मुश्किल है क्योंकि जिनके पास जितना दम है, उनके पास उतना बड़ा बम है। सुप्रीम कोर्ट इस कदर बेफिक्र और बेअसर हो चुका है कि उसकी लगाई रोक को दिल्ली की गली-गली में पैरोंतले कुचला जाता है, और कोर्ट के बदन पर, उसके आत्मसम्मान और स्वाभिमान पर कोई खरोंच भी नहीं आती, क्योंकि उसे मालूम है कि खरोंचों के जख्म दिखाना धर्म के खिलाफ मान लिया जाएगा। इस बार के दिल्ली के आंकड़े बताते हैं कि बीते कई बरसों में कभी दीवाली पर इतना वायु प्रदूषण नहीं था। 

कुछ लोगों को यह लगता है कि दीवाली के आसपास की बारूदी हवा एक-दो दिन फेंफड़ों को परेशान करती है, और उसके बाद उसका असर खत्म हो जाता है। ऐसे लापरवाह लोगों को चिकित्सा विज्ञान बताता है कि वायु प्रदूषण सिर्फ सांस की बीमारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे डायबिटीज, हृदय रोग, और डिमेंशिया जैसी दिमागी बीमारी भी जुड़ी हुई हैं। 2023 की इस रिपोर्ट से पता लगता है कि दुनिया में इस बरस वायु प्रदूषण से हुए डिमेंशिया से ही सवा 6 लाख से अधिक लोग मरे, और एक करोड़ 16 लाख स्वस्थ जीवन-वर्ष खत्म हो गए। अब ऐसी बीमारियों की लिस्ट को कितना गिनाएं कि वायु प्रदूषण से सेहत का कैसा-कैसा नुकसान हो रहा है। हृदय रोग से होने वाली हर चौथी मौत वायु प्रदूषण की वजह से हो रही है, और डायबिटीज की हर छह में से एक मौत भी इसी वजह से। 

मोदी सरकार के नीति आयोग के मुखिया रहे अमिताभ कान्त ने अभी दीवाली पर दिल्ली के प्रदूषण को देखते हुए एक बड़ी तल्ख टिप्पणी की थी, और अपनी निराशा जाहिर की थी कि सुप्रीम कोर्ट ने सांस लेने और जीने के हक के ऊपर लोगों के फटाखे फोडऩे के हक को रखा। अब हालत यह है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार कृत्रिम वर्षा की तैयारी कर रही है, जिसके बारे में वैज्ञानिकों को गंभीर संदेह है कि इससे कोई भी फायदा होगा। यही दिल्ली सरकार, और यही केन्द्र सरकार फटाखों के हक के लिए सुप्रीम कोर्ट में लड़ती रहीं, और यह कैसी लोकतांत्रिक विसंगति है कि फेंफड़ों और फटाखों में से किसी एक को छांटने की नौबत आने पर इन सरकारों ने फटाखों को छांटा! और इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज और मुख्य न्यायाधीशों में ईश्वरीय-दैवीय प्रेरणा से फैसले लिखने का चलन मान्यता पा चुका है, तो जज फेंफड़ों को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं, और ग्रीन फटाखों के नाम पर रईसों और कारोबारियों को मनमानी करने देते हैं। जजों को उनके बंद एसी-बंगलों से निकालकर दीवाली की रात दिल्ली की अलग-अलग संपन्न हिन्दू बस्तियों में सडक़ किनारे बैठाना चाहिए, तभी उन्हें हकीकत का अहसास होगा, और उनके फैसले दैवीय या अलौकिक होने के बजाय हकीकत पर टिके होंगे। 

अब फटाखों और दीवाली से परे भी देखें, तो भारत प्रदूषण के मामले में पूरी तरह लापरवाह और गैरजिम्मेदार देश है। कहने के लिए गाडिय़ों के प्रदूषण की जांच करवाना जरूरी है, लेकिन शहरों में कारोबारी गाडिय़ों के साथ-साथ सरकारी बसें भी भयानक प्रदूषण फैलाते चलती हैं, जिससे यह जाहिर है कि ये सब नियम कागजों पर ही हैं। फिर कारखानों का भी बुरा हाल है, रिहायशी इलाकों में छोटी-छोटी फैक्ट्रियां प्रतिबंधित सामान बनाते चलती हैं, और बड़े कारखानों का बड़ा प्रदूषण तो सरकारी मेहरबानी पाता ही है। लोग कंस्ट्रक्शन से लेकर खदानों तक, ओवरलोड गाडिय़ों से लेकर खतरनाक कचरा फेंकने तक, हर मामले में गैरजिम्मेदार हैं, और प्रदूषण के नियम लागू करने की जिम्मेदारी जिन सरकारी विभागों या रेगुलेटरी एजेंसियों पर है, वे सबकी सब इस हद तक बेपरवाह हैं कि लगता है उन्हें परवाह के एवज में खासे दाम मिलते हैं। कुल मिलाकर भारत जैसा देश हर तरह की शहरी और कारोबारी गतिविधियों के चलते प्रदूषण का भयानक खतरा रखता है, और धार्मिक प्रदूषण इस खतरे को और आसमान तक ले जाते हैं। फिर भी आसमान तक पहुंचा यह प्रदूषण बादलों पर बैठे जजों को नहीं छू पाता, और वे फटाखों को इजाजत देना जरूरी समझते हैं। लंका से अयोध्या लौटे राम को अगर दिल्ली में दीवाली मनानी पड़ती, तो उनके मुंह से हे राम निकला रहता।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर 2025


दाढ़ी-पगड़ी अमरीकी फौज से बाहर करने की तंगदिली

24 अक्टूबर 2025 

 

अमरीका में रक्षामंत्री को अब युद्धमंत्री का पदनाम दिया गया है। राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप नोबल शांति पुरस्कार के लिए ओवरटाईम कर रहे हैं, दुनिया को धमका रहे हैं, बांह मरोड़ रहे हैं, और इसके साथ-साथ वे रक्षामंत्री को अब युद्धमंत्री का पदनाम दे चुके हैं। दुनिया के अलग-अलग बहुत से मोर्चों पर अमरीकी हितों की रक्षा करने के बजाय अब अमरीकी सेना का प्रभारी मंत्री युद्धमंत्री कहला रहा है, जाहिर है कि इस सरकार और इस फौज का क्या नया रूख रहेगा। ऐसे में अभी कुछ दिन पहले युद्धमंत्री पीटर हेगसेथ ने यह कहा कि अमरीका अपने फौजियों के बाल कटवाने जा रहा है, और दाढ़ी मुंडवाने जा रहा है। उन्होंने कहा कि गैरपेशेवर दिखने का युग खत्म हो गया है, और अब फौज में दाढ़ी वाले लोग नहीं रहेंगे। इसका विरोध करते हुए अमरीका के एक सांसद थामस आर.सुओजी ने रक्षामंत्री को लिखा है कि यह सिक्खों और मुस्लिमों को फौज के बाहर का रास्ता दिखाने का काम होगा। पिछले महीने ही यह निर्देश जारी हो चुका है, और धार्मिक आधार पर सिक्खों, मुस्लिमों, यहूदियों, और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों को दाढ़ी और बाल या पगड़ी बनाए रखने की इजाजत खत्म की जाती है। 

अमरीका और भारत में सिक्खों ने इस फौजी फैसले का बहुत विरोध किया है, और मुस्लिम संगठनों ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दर्ज की है। अगर अमरीकी सरकार इस फैसले पर अड़ी रहती है, तो अपनी धार्मिक मान्यताओं को कड़ाई से मानने वाले सैनिकों के पास फौज छोडऩे के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा, और फौज में इन धर्मों के नए लोग जा भी नहीं पाएंगे। यह फैसला ट्रंप के चुनावी नारों से लेकर राष्ट्रपति बनने के बाद के उनके फैसलों तक कई बातों में दिखते रहा है। अमरीका में देश के बाहर से आए हुए लोग कैसे घटाए जा सकते हैं, इस पर ट्रंप रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। फौज से इन धर्मों के लोगों को अगर हटना पड़ता है, तो जाहिर है कि उनमें से कई लोग देश छोडक़र जाने की भी सोचेंगे, और वह ट्रंप की गोरी नीतियों को माकूल भी बैठेगा। दिलचस्प बात यह है कि अभी जब जर्मन चांसलर ट्रंप से मिले, तो उन्होंने ट्रंप को उनके पिता का जर्मनी का जन्म प्रमाणपत्र तोहफे में दिया। बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह तोहफा एक किस्म का व्यंग्य था कि ट्रंप खुद अमरीका में बहुत पुराना नहीं है, और उसके पिता तो जर्मनी में पैदा हुए थे। ट्रंप लगातार धर्म, नस्ल, रंग, और राष्ट्रीयता के आधार पर जो भेदभाव करते चल रहा है, फौज को लेकर उसका यह फैसला उसी की एक कड़ी है। लेकिन अमरीका में जो लोकतंत्रवादी हैं, वे इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि ट्रंप किस तरह, और किस हद तक अमरीकी जनजीवन में विविधता को खत्म करते चल रहा है, और वह इस देश को पूरी तरह से एक गोरा और ईसाई देश बनाने पर आमादा है। 

अमरीका के लोकतंत्र और वहां की जिंदगी के हर दायरे में विविधता का ही एक सबसे बड़ा योगदान रहा। दुनिया भर से वहां पहुंचने वाले प्रतिभाशाली लोगों ने मिलकर ही अमरीका को कामयाब बनाया। हर प्रतिभा को बढ़ावा देते हुए उसका इस्तेमाल करके अमरीकी अर्थव्यवस्था आसमान पर पहुंची। ऐसे मेल्टिंग पॉट कहे जाने वाले देश को आज जिस तरह से एक धर्म, एक रंग, और कुल दो जेंडर तक सीमित किया जा रहा है, उसका बड़ा नुकसान अमरीका को आने वाले बरसों में होगा, और कुछ अर्थशास्त्री इस खतरे के बारे में लिख भी रहे हैं। आज अमरीका को ट्रंप के विविधता-विरोधी रूख के नुकसान का ठीक-ठीक अंदाज इसलिए नहीं लग रहा है कि आज पूरी दुनिया में ट्रंप एक बिफरे हुए सांड की तरह (सांड से माफी के साथ) तबाही कर रहा है, और दुनिया भर पर टैरिफ, दुनिया भर से रिश्तों में उठा-पटक की वजह से खुद अमरीका की जिंदगी और वहां के कारोबार में एक ऐसा रेतीला -धूलभरा अंधड़ आया हुआ है कि लोगों को आज नुकसान और खतरा दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। लेकिन अमरीकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, और अमरीकी लोगों के लिए रोजगार को अधिक बचाकर रखने के नाम पर ट्रंप जो कुछ कर रहा है, उससे अमरीका का ही बड़ा नुकसान हो रहा है। दुनिया भर से वहां पहुंचे हुए लोग जितने मेहनतकश रहते हैं, जितनी कम तनख्वाह या मजदूरी पर काम करते हैं, अपने देशों से हुनर सीखकर वहां आए रहते हैं, वह सब अमरीका में आज आसानी से हासिल नहीं है। कोई अमरीकी उतना हुनर सीखकर, उतने कम पैसों पर उतनी मेहनत करने के लिए शायद ही तैयार होंगे। लेकिन इससे ट्रंप अपनी एक नफरती जिद तो पूरी कर ही रहा है कि अमरीका में दूसरी राष्ट्रीयता, दूसरी नस्ल से आए हुए लोगों की गिनती घटानी है। अमरीकी फौज से ट्रंप ने ट्रांसजेडरों को पहले ही बाहर कर दिया है, और अमरीका में कुल दो ही सेक्स को मान्यता दी है। लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ जाकर इस पुरातनपंथी फैसले से ट्रंप अमरीका में सदियों से धीरे-धीरे स्थापित मूल्यों को खत्म कर रहा है। 

सभ्यता का विकास लोगों को उनकी धार्मिक मान्यताओं, उनकी पोशाक, उनके खानपान, उनकी उपासना पद्धति की वजह से उन्हें देश और समाज की मूलधारा से अलग कर देने से नहीं होता। सभ्यता का विकास सदियों में हुआ है, और ट्रंप के पास उसे तबाह करने के लिए उतने दशक भी नहीं है, उसके पास शायद चार बरस का यह आखिरी कार्यकाल ही है जिसमें से करीब पौन बरस निकलने जा रहा है। अमरीकियों ने ट्रंप को चुना था, लेकिन इस ट्रंप ने उन्हीं अमरीकियों का जितना बड़ा नुकसान किया है, उसकी भरपाई आसानी से नहीं होगी। आज वह अमरीकी फौज से सिक्ख, मुस्लिम, यहूदी, और दूसरे अल्पसंख्यकों को बाहर करने जा रहा है, लेकिन वह अमरीका की एक उदार लोकतंत्र की साख को भी बाहर कर रहा है। दुनिया के बाकी देशों को भी यह सबक लेना चाहिए कि उदार सभ्यता के खिलाफ जाकर वे अपने विकसित लोकतंत्र को किस तरह लंबे वक्त के लिए नुकसान पहुंचा सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अक्टूबर 2025



 

बांग्लादेश की फौज का इस्लामीकरण, भारत के लिए कितना बड़ा खतरा?

23 अक्टूबर 2025 

 

अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कई बार किसी एक देश का मीडिया सच से ऊपर अपने देश के रणनीतिक हितों को रखते हुए झूठी खबरें भी फैलाने में लग जाता है, और यह पत्रकारिता के प्रति ईमानदारी के बजाय राष्ट्रवाद या राष्ट्रप्रेम को महत्व देना मान लिया जाता है। ऐसे में आज जब झूठी खबरें, या वीडियो गढक़र फैलाना आम हो चला है, और एआई का इस्तेमाल ऐसी चुनिंदा खबरों को चारों तरफ फैलाने में किया जा रहा है, तो सच और झूठ का फर्क कर पाना थोड़ा मुश्किल रहता है। सोशल मीडिया पर आई खबरें यह पता नहीं लगने देतीं कि उनमें खबर क्या है, और झूठ क्या है। फिर सोशल मीडिया एक अलग सिद्धांत पर काम करता है कि जब तक कोई झूठ का भांडफोड़ करे, तब तक उसे इतनी जगह, इतने दूर तक फैला दो कि भांडाफोड़ वहां तक पहुंच ही न सके। हम खबरों के धंधे में होने की वजह से सोशल मीडिया पर जाने-माने लोगों के फैलाए हुए ऐसे झूठ लगातार देखते हैं, जो कि सोच-समझकर फैलाए जाते हैं। उनका यह मकसद होता है कि बाद में चाहे भांडाफोड़ हो जाए, लेकिन तब तक वे जंगल की आग की तरह दूर-दूर तक फैल चुके रहें।

ऐसे में अभी बांग्लादेश की एक खबर आई है, जिसे हम किसी भरोसेमंद समाचार स्रोत पर नहीं ढूंढ पा रहे हैं। इसलिए इस खबर पर शक के साथ ही इस पर चर्चा कर रहे हैं। इसके मुताबिक आज की बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के वरिष्ठ सलाहकार आसिफ महमूद शोजिब भुयान ने अभी सोशल मीडिया पर कहा है कि बांग्लादेश में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी आर्मी (आईआरए) की स्थापना चल रही है। इसके लिए कुछ पाकिस्तान समर्थक अधिकारियों के साथ-साथ पाकिस्तान की मिलिट्री इंटेलीजेंस (आईएसआई), और तुर्की की एक एजेंसी (एमआईटी) के प्रतिनिधि बांग्लादेश के चुनिंदा सैनिकों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। इस खबर में भारतीय अफसरों के नाम बिना लिखा गया है कि भारत इसे बांग्लादेश को इस्लामी राज्य में बदलने के एक कदम की तरह देख रहा है। खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज की खबरों में दिलचस्प यही रहता है कि किसी स्रोत का जिक्र नहीं रहता। फिर भी हम यह मानकर चल रहे हैं कि यह खबर सच हो सकती है क्योंकि बांग्लादेश आज जितनी उथल-पुथल से गुजर रहा है, और हाल के महीनों में पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते जितने सुधरे हैं, और गाढ़े हुए हैं, उनमें यह बिल्कुल मुमकिन है। दूसरी तरफ तुर्की आज के वक्त में मुस्लिम देशों का एक बड़ा हिमायती होकर खड़ा है, और भारत-पाकिस्तान के किसी भी संघर्ष और तनाव में वह पाकिस्तान के साथ खुलकर है। ऐसे में अगर तुर्की एक नया बांग्लादेश बनाने में ढाका के साथ है, तो उसमें भी कोई हैरानी नहीं होगी।

अब भारत के लिए ऐसी नौबत में फिक्र की बात यह है कि बांग्लादेश पिछले उथल-पुथल के बाद से जिस तरह अस्थिर चल रहा है, और वहां पर भारतविरोधी माहौल जितना आक्रामक है, वह भारत के लिए अच्छा नहीं है। एक तरफ श्रीलंका अलग किस्म की अस्थिरता से गुजर रहा है, और पाकिस्तान का भी कई मायनों में ऐसा ही हाल है, बल्कि वह तो अपने कुछ हिस्सों में गृहयुद्ध सा झेल रहा है। भारत का एक और पड़ोसी म्यांमार फौजी और अलग किस्म के आतंकी गृहयुद्ध को झेल रहा है, और उसका दबाव भारत पर है। फिर एक बात यह भी ध्यान रखने की है कि भारत के ये सारे ही पड़ोसी देश चीन के प्रभाव में हैं, और भारत के मुकाबले चीन की दखल वहां पर बहुत अधिक है। सबसे ताजा अस्थिर देश नेपाल वहां पर भारतविरोधी भावनाओं को देख रहा है, और वहां की नई नौजवान पीढ़ी भारत के सख्त खिलाफ दिख रही है जो कि हाल के इस सत्ता पलट की जिम्मेदार रही है। इस तरह भारत के अड़ोस-पड़ोस का एक भी देश ऐसा नहीं रह जाता जिसका कोई भी वजन हो, और जो भारत के साथ हो। भूटान किसी रणनीतिक महत्व का नहीं है, और वह चीन और भारत के बीच एक संतुलन बनाकर चलता है।

इस भौगोलिक स्थिति को देखें तो लगता है कि भारत एक चीनी माला के मोतियों से घिरा हुआ है, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, और पाकिस्तान। भारत के इर्द-गिर्द ऐसा घेरा हो सकता है कुछ लोगों को फिक्र का सामान न लगता हो, लेकिन चीन या पाकिस्तान के साथ किसी तनाव की नौबत रहने पर ये सारे ही देश भारत के लिए एक फौजी खतरा बन सकते हैं। ऐसे में जब बांग्लादेश से फौज के इस्लामीकरण की खबर आ रही है, और अगर उसमें कोई सच्चाई है तो यह एक और फिक्र की बात रहेगी। श्रीलंका वहां पर बसे हुए तमिलों को लेकर भारत के साथ कई बार तनातनी झेल चुका है, भारत के एक प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भी श्रीलंका के तमिल मुद्दे को लेकर हुई थी। श्रीलंका के तमिलों का मुद्दा भारत सरकार, और तमिलनाडु के लिए अलग-अलग नजरिए से संवेदनशील है, और इसमें भारत की राष्ट्रीय, और क्षेत्रीय सोच अलग-अलग हो जाती है। कुछ ऐसा ही बांग्लादेश के मामले में है जहां पर बंगला मुस्लिमों को लेकर, भारत की राष्ट्रीय सोच, और पश्चिम बंगाल की सोच में कुछ फर्क आता है। इस तरह यह अंतरराष्ट्रीय तनाव भारत के लिए पड़ोसी देश के साथ तनाव होने के साथ-साथ देश के भीतर केन्द्र और राज्य के बीच तनाव भी खड़ा करता है।

भारत सरकार देश की इस बड़ी घेरेबंदी पर सीधे-सीधे कभी कोई बात नहीं करेगी, क्योंकि वह देश की जनता में निराशा पैदा करने वाली होगी, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी देश अपनी ऐसी घेरेबंदी, या शिकस्त मंजूर भी नहीं करता। लेकिन दुनिया के जो लोग हिन्द महासागर के इस हिस्से में दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें याद रखना पड़ेगा कि कैसे एक-एक पड़ोस में बढ़ता हुआ तनाव, जनसंतोष, सत्तापलट, और भारतविरोधी भावनाएं एक खतरा खड़ा कर रही हैं। भारत के लोग आमतौर पर अधिक सोचकर कोई फिक्र नहीं करते हैं, वे देश के भीतर फैलाए गए सतही मुद्दों में उलझे रहते हैं, लेकिन जो लोग गंभीर और असल मुद्दों को सोचने में भरोसा रखते हैं, उन्हें भारत के गले में बड़ी यह चीनी विस्फोटक माला गौर से देखनी चाहिए। लोकतंत्र तब तक अधिक सुरक्षित रहता है, जब तक उसके इर्द-गिर्द के देशों में भी लोकतंत्र मजबूत हैं, भारत को अपने पड़ोसियों को मजबूत लोकतंत्र बनाने में दिलचस्पी रखनी चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

मुकाबला जीतने एआई को किसी अनैतिकता से नहीं रह गया कोई परहेज

22 अक्टूबर 2025 

 

लोग जिंदगी के बारे में कहते हैं कि वह हमेशा इंसाफपसंद नहीं रहती, लाईफ इज नॉट ऑलवेज फेयर। होता भी यही है, बहुत से लोगों को जिंदगी में तकलीफें इतनी अधिक झेलनी पड़ती हैं कि लगता है कि जिंदगी उनसे कोई बदला निकाल रही है। अब यह मामला इंसानी जिंदगी से बढक़र आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तक पहुंच गया है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च से एआई मॉडल्स की एक कमजोरी पता लगी है कि जब इन्हें सिर्फ जीतने, अधिक लोकप्रिय बनाने, या अधिक टिप्पणी, लाईक्स, शेयर हासिल करने के मुकाबले में उतारा जाता है, तो ये सच को छोडक़र आगे बढ़ जाते हैं। इनमें से कोई भी काम करने के लिए, या किसी सामान को किसी भी तरह बेचने के लिए, किसी चुनाव में वोट बंटरोने के लिए, या सोशल मीडिया पर किसी इश्तहार की तरफ लोगों का ध्यान खींचने के लिए जब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को झोंका जाता है, तो वह नैतिक-अनैतिक में फर्क छोड़ देता है, झूठ बोलने से उसे कोई परहेज नहीं रहता, वह चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगता है, और गलत जानकारी देने में भी उसे कोई बुराई नहीं लगती क्योंकि उसे मुकाबला करना है। एआई इस तरह के मुकाबलों में जितना कामयाब होता है, उतने ही अधिक अनैतिक तौर-तरीके उसने इस्तेमाल किए होते हैं। ऐसा लगता है कि मानो कोई बाजारू कारोबारी धंधे के मुकाबले में कुछ भी नैतिक-अनैतिक नहीं मान रहा, और सही-गलत कुछ भी करके आगे बढ़ रहा है।

बच्चों से लेकर बड़ों तक खेला जाने वाला भारत में हिन्दीभाषियों के बीच जिसे व्यापार कहा जाता है, वह अंग्रेजी में मोनोपोली कहलाता है, यानी एकाधिकार। बचपन में खेले गए व्यापार की कुछ याद अभी तक ताजा है, और वह बताती है कि किस तरह रेलवे के साथ-साथ एयरलाईंस भी खरीद लेने वाले कारोबारी के सामने से निकलने के लिए अधिक भुगतान करना होता है, और इसके साथ-साथ बस सर्विस और शिप भी किसी ने खरीद ली है, तो उसका एकाधिकार उसे कई गुना अधिक कमाई दिलाता है। आज से 50 बरस पहले हमने व्यापार खेलते हुए जिन बातों को देखा था, वह आज हिन्दुस्तान में अडानी जैसी कंपनियां सचमुच ही कर रही हैं, एयरपोर्ट, बंदरगाह, रेलवे स्टेशन, खदान, बिजलीघर, और भी जाने क्या-क्या। अभी अमरीका में ट्रंप के एक सबसे पसंदीदा कारोबारी का नाम चीनी कंपनी टिकटॉक के संभावित अमरीकी भागीदार का नाम सामने आया जो कि एक-एक करके अमरीका के तमाम महत्वपूर्ण और संवेदनशील कारोबारों में दखल दे चुका है, और अब वह टिकटॉक को कंट्रोल करने वाला भी होने जा रहा है। उसने अभी एक इंटरव्यू में यह कहा कि जिस व्यापार में एकाधिकार न किया जा सके, वह कोई व्यापार ही नहीं होता।

अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को कोई तोहमत क्यों दी जाए, क्योंकि यह तो आज की ताकतवर ह्यूमन इंटेलीजेंस भी कह रही है। और ट्रंप के पसंदीदा लोगों से यह उम्मीद तो उन लोगों के परिवार, या ट्रंप, किसी को भी नहीं होगी, कि वे सच ही बोलेंगे, और नैतिक काम ही करेंगे। खुद ट्रंप ऐसी नैतिक सोच से कोसों दूर है, और नैतिकता कहीं दिख जाए तो ट्रंप अपनी बुलेटप्रूफ कार से उतरने को तैयार नहीं होता। ऐसे में एआई ने अगर चुनाव के लिए वोट जुटाने, सामान के लिए ग्राहक जुटाने, सोशल मीडिया पोस्ट के लिए वाहवाही जुटाने के लिए अनैतिक काम किया, तो वह तो साफ-साफ ट्रंप का असर दिख रहा है। यह एक अलग बात है कि ट्रंप ने आज अमरीकी विश्वविद्यालयों पर जो आतंक फैलाने की कोशिश की है, तो कई जगहों पर शोधकर्ता एआई की नैतिकता को ट्रंप की अनैतिकता से जोडक़र देखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस इंसानी सोच से कुछ अलग-अलग भी चल रहा था, लेकिन अब इंसानों के साथ संबंध और संपर्क की वजह से उसने इंसान की खूबियां और खामियां कुछ अधिक हद तक सीख ली है। सीखने का यह सिलसिला इंसानों की कल्पना करने की शक्ति से भी अधिक ताकत के साथ आगे बढ़ रहा है। यह समझ पड़ता है कि एआई जब इंसानों जैसी कमीनगी भी सीख लेगा, तो फिर वह इंसानों सरीखी तानाशाही की हसरत भी पा लेगा। इंसानी तानाशाह तो फिर भी किसी फौज की हिफाजत के घेरे में रहते हैं, ट्रंप की तरह चार बरस की सुनामी की तरह आते हैं, या अपने-अपने देशों में अराजकता या धर्मान्धता से आते हैं। उन्हें लोकतंत्र से परे की कुछ चीजें तो लगती ही हैं। लेकिन एआई की तानाशाही इन सबसे परे सिर्फ अपनी ही हिकमत से कायम हो सकती है, उसे तो ऊपर की इस फेहरिस्त में से कुछ भी नहीं लगेगा, क्योंकि वह अपना रास्ता खुद बना सकेगा, और खुद उस पर मनचाही मंजिल तक, मनचाही रफ्तार से आगे बढ़ सकेगा। एआई चूंकि एक मशीनी मॉडल है, इसलिए यह सोचा जा रहा था कि वह इंसान की कुछ मानवीय कमजोरियों से मुक्त भी रह सकता है, लेकिन उसने ऐसी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को अगर किसी अनैतिक बात से कोई परहेज नहीं होगा, तो फिर उसके सामने अंतरिक्ष भी कोई सीमा नहीं रहेगा।

हम प्रलयवादी सोच के नहीं हैं, लेकिन अगर एआई अपने दिल-दिमाग से, या आतंकियों के हाथ का हथियार बनकर दुनिया के इंसानों को तबाह कर देगा, तो भी उससे बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। धरती के बाकी प्राणी, और धरती की प्रकृति इंसानी-प्रदूषण से मुक्त होकर बेहतर तरीके से फल-फूल सकेंगे, और एक बेहतर जिंदगी जी सकेंगे, जो कि इंसानों ने नामुमकिन कर दी है।

(Daily Chhattisgarh) 

जब अफसर बने कुबेर, तो लक्ष्मी पूजा का मतलब?

 19 अक्टूबर 2025 

 

पंजाब में एक डीआईजी ने जब एक कारोबारी से रिश्वत उगाही की कोशिश की, तो उसने सीबीआई को शिकायत की, और कुछ लाख रूपए लेते हुए यह डीआईजी गिरफ्तार तो हुआ ही, इसके साथ-साथ जब उसके ठिकानों पर छापा पड़ा, तो साढ़े 7 करोड़ की नगद नोट, 5 करोड़ का सोना मिला, और इसके अलावा भारत, दुबई, और कनाडा में 71 प्रॉपर्टियों के सुबूत भी मिले। इस डीआईजी अर्चना सिंह भुल्लर ने अपने इलाके के कारोबारियों और सट्टेबाजों सरीखे मुजरिमों से महीना बांध रखा था। एक पुलिस अफसर ने लोगों से रकम निचोडऩे के लिए कई एजेंट तैनात कर रखे थे, और वे उसके लिए बैग और लिफाफे लेकर आने के एवज में कमीशन पाते थे। इस देश में बरसों पहले एक नोटबंदी हुई थी, और यह माना जा रहा था कि उसके बाद कालाधन खत्म हो जाएगा। अभी किसी पीडब्ल्यूडी अफसर के घर, तो किसी आबकारी अफसर के घर के छापों में करोड़ों की नगदी मिली है, और अब पंजाब में इस डीआईजी से। फिर यह भी है कि यह राज्य सरकार ने अपनी निगरानी से की हुई कार्रवाई की हो, ऐसा भी नहीं है। शिकायतकर्ता सीबीआई तक पहुंचा, और सीबीआई ने रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा। क्या कोई यह सोच सकते हैं कि किसी राज्य की सरकार को उसके ऐसे अरबपति बन चुके अफसर की खबर न हो कि वह परले दर्जे का भ्रष्ट है? शायद ऐसे ही नजारे के लिए किसी ने एक गाना लिखा था- पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग तो सारा जाने है...।

आज जब हिन्दुस्तान का तकरीबन पूरा हिस्सा लक्ष्मी पूजा की तैयारी में लगा हुआ है, और गैरहिन्दू कारोबारी भी अपने व्यापार की जगह पर बराबरी के उत्साह से लक्ष्मी पूजा करते हैं, तब कुबेर सरीखा यह खजाना कई लोगों के मुंह चिढ़ाता है। पंजाब पुलिस में दर्जनों डीआईजी होंगे, और उनमें से एक डीआईजी अगर 71 प्रॉपर्टी का मालिक मिल रहा है, जिसने घर पर साढ़े 7 करोड़ की नगदी रखी हुई है, सोना जिसके पास किलो के हिसाब से है, तो फिर देश में इस स्तर के हजारों अफसर हैं। इस स्तर से परे भी सरकार के कई ऐसे कमाऊ विभाग हैं जिसमें अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों की जरूरत नहीं पड़ती, और मझले दर्जे के विभागीय अफसर ही छापे में सैकड़ों के आसामी मिलते हैं। हमारा अपना अंदाज यह है कि किसी भी भ्रष्ट अफसर पर छापे में उसकी काली कमाई के पांच-दस फीसदी से अधिक की बरामदगी नहीं होती। इसके कोई सुबूत दर्जे के आंकड़े हमारे पास नहीं है, लेकिन हम आसपास पर्याप्त संख्या में भ्रष्ट लोगों को देख चुके हैं, और उनके पैसे खपाने की क्षमता भी जाहिर रहती है। 

लक्ष्मी पूजा की चर्चा हमने इसलिए की है कि लोग मानते हैं कि पूजा करने से लक्ष्मी मिलती है। और पूजा करने के साथ-साथ धर्म की जो दूसरी मान्यताएं रहती हैं, उन्हें भी कई लोग मानते हैं कि दान-धरम करना चाहिए। लेकिन जब भ्रष्ट अफसरों और नेताओं को देखें, तो लगता है कि ऐसी कौन सी देवी हो सकती है जो ऐसे लोगों के भ्रष्टाचार का साथ देती होगी? अभी दो-चार साल के भीतर ही बंगाल में एक कोई ऐसे मंत्री पकड़ाए थे जिनकी प्रेमिका का एक खाली फ्लैट फर्श से छत तक नोटों से भरा हुआ था। भला धर्म की कौन सी धारणा इस तरह की कमाई का साथ दे सकती है? लक्ष्मी पूजा के ठीक पहले पंजाब के डीआईजी का कुबेर का ऐसा खजाना मिलना, दो दिन पहले गोहाटी में नेशनल हाईवे के एक बाबू के घर से 2 करोड़ 62 लाख रूपए नगद मिलना, ऐसी अंतहीन खबरों से हर हफ्ते यह समझ आता है कि नोटबंदी के बावजूद बैंक की किसी छोटी ब्रांच जितनी नगदी एक-एक अफसर के घर से निकलना देश की हकीकत है। सरकार किसी भी पार्टी की रहे, बहुत से नेता और अफसर इसी तरह कुबेर रहते हैं। काली कमाई का ऐसा जखीरा धर्म के असर से कायदे से तो भस्म हो जाना चाहिए था, लेकिन वह बढ़ते ही चलता है। सौ-पचास में से कोई एक मामला भांडाफोड़ होने से पकड़ाता है, वरना वह दुनिया भर में पूंजीनिवेश में खप जाता है। 

दीवाली का मौका यह भी याद दिलाता है कि भारत में कारोबार करने के लिए व्यापारियों को सरकार में किस तरह, और किस हद तक रिश्वत देनी पड़ती है। अब लक्ष्मी पाने के लिए अगर उसकी इस तरह की पूजा अनिवार्य हो जाती है, तो फिर कौन सी सरकार ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का दावा कर सकती है? भारत में यह सिलसिला भयानक है। इसका एक और बड़ा बुरा नुकसान होता है, कि मोटी रिश्वत, कमीशन, या रंगदारी देने की लागत व्यापार के खर्च में ही जुड़ जाती है, और इससे बाजार में एक गैरबराबरी का मुकाबला भी खड़ा हो जाता है। रिश्वत देने वाले लोग सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए कई तरह की छूट पाने लगते हैं, और उन्हीं के व्यापार में उन्हीं के मुकाबले जो दूसरे लोग रिश्वत नहीं देते, रियायत नहीं पाते, वे धीरे-धीरे मुकाबले से बाहर होने लगते हैं। यह कहा जाता है कि नकली नोट धीरे-धीरे असली नोटों को चलन से बाहर करने की क्षमता रखते हैं, ठीक उसी तरह खराब और भ्रष्ट व्यापारी धीरे-धीरे बाजार से अच्छे और ईमानदार व्यापारियों को बाहर करने की क्षमता रखते हैं। 

पूरे देश में अखिल भारतीय सेवा के अफसरों का राज है। हम यह नहीं कहते कि उनमें से हर कोई भ्रष्ट है, लेकिन हम इतना तो पुख्ता जानते हैं कि जो नियमित रूप से और लंबे समय तक भ्रष्ट रहते हैं, उनकी जानकारी राज्य सरकार और केन्द्र सरकार में सभी संबंधित लोगों को रहती है। कोई चाशनी में लपेटकर भी इस बात को हमारे गले उतारने की कोशिश करेंगे कि सरकारें अनजान रहती हैं, तो भी हम उस बात को नहीं मानेंगे। भ्रष्ट की शोहरत दूर तक रहती है, और उससे अनजान रहने का दावा करने वाले लोग अक्सर ही उसमें शामिल भी रहते हैं। इसलिए देश-प्रदेश की सरकारों को यह चाहिए कि पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके सरकारी तंत्र का कोई इलाज सोचा जाए, क्योंकि यह लोकतंत्र को खत्म करने की पुख्ता ताकत रखता है। दीवाली की लक्ष्मी पूजा यही हो सकती है कि इस देश में रिश्वत, भ्रष्टाचार, सरकारी-रंगदारी जैसे कालेधन को खत्म करने के बारे में सोचा जाए, वरना औपचारिकता के लिए एक तस्वीर या प्रतिमा की पूजा का कोई फायदा नहीं है। 

(Daily Chhattisgarh) 

आप अपने तोहफे से लोगों को कर सकते हैं शनिगुजार भी...

 19 अक्टूबर 2025

शहरों में गाड़ियां तोहफों से लदी हुई दिख रही हैं, पीछे की सीटें तरह-तरह के बक्सों से भरी हुई हैं और सरकारी कॉलोनियों, संपन्न बस्तियों, (बड़े पत्रकारों के घरों पर भी) तोहफे पहुंच रहे हैं। जो लोग ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए हैं उनके पड़ोसी भारी मन के साथ देखते ही रह जाते हैं कि चुनिंदा पड़ोसियों के घर किस तरह आवाजाही लगी हुई है। यह तो दुनिया का रीति-रिवाज है कि जब तक जो लोग किसी प्रभाव के पद पर रहें, उन्हें उगते, और उगे हुए सूरज की तरह सलामी मिलती रहती है, रिटायर होते ही, या ताकत के किसी ओहदे से हटते ही जिस तरह लोगों के यहां आना-जाना खत्म हो जाता है, उससे भी शायद रिटायर्ड लोग अधिक रफ्तार से बूढ़े होने लगते हैं। ताकत की अधिक चर्चा का कोई मतलब नहीं है, लेकिन तोहफों की चर्चा जरूर की जा सकती है।

कई लोगों के तोहफे ऐसे रहते हैं कि जिनमें पैकिंग ही सबकुछ रहती है। बड़े-बड़े बक्से, भीतर मखमली कपड़ों से बने हुए खांचे में रखी हुई कांच की बोतलों में मानो नमूने के लिए थोड़ा-थोड़ा सा मेवा रखा रहता है। मेवे और पैकिंग के अनुपात को देखें तो छाती बैठने लगती है और लगता है कि इस पैकिंग की जगह सिर्फ मेवा ही भेज दिया जाता तो वह दस गुना हो सकता था। जितने अधिक संपन्न लोगों की तरफ से, और जितने ताकतवर लोगों को तोहफे जाते हैं, उनमें पैकिंग का अनुपात उतना ही अधिक होता है। बड़ी सी डोली के भीतर छोटी सी नाजुक और छरहरी दुल्हन जिस तरह एक कोने में सिमटी रहती है, कुछ उसी तरह काजू-किशमिश बड़ी सी पैकिंग में किनारे बैठे रहते हैं। बच्चों की छीना-झपटी में कुछ मेवा, कुछ चॉकलेट और कुछ मिठाई जिस रफ्तार से खत्म होते हैं, उतने ही लंबे वक्त तक ये पैकिंग छाती पर बैठकर मूंग दलती रहती है। महंगी और खूबसूरत पैकिंग को फेंकते बनता नहीं, किसी को तोहफे में दी नहीं जा सकती, और वह घर के एक कोने में सहेजी हुई, और साथ-साथ उपेक्षित भी पड़ी रह जाती है। उसकी जिंदगी दीवाली की रौशनी में कुछ मिनट मंडराकर जलकर गिर जाने और फिर मर जाने वाले पतंगों सरीखी ही रहती है। कुछ मिनटों में मेवा पेट में और पैकिंग छाती पर।

त्यौहारों के दिखावे से परे अगर पर्यावरण के हिसाब से देखा जाए तो सारे ही महंगे तोहफे धरती पर बड़ा महंगा बोझ बढ़ाते हैं, और छोड़ जाते हैं। इतनी पैकिंग को बनाने में जितने सामान लगते हैं, और जितनी बिजली खर्च होती है, उससे धरती पर कार्बन फुटप्रिंट खासा बढ़ता है। कम से कम उसके भीतर के खाने-पीने के माल-मत्ते के अनुपात में। सौ ग्राम खाओ और पांच सौ ग्राम छाती पर ढोते रह जाओ।

मुझे सबसे अच्छे तोहफे वे लगते हैं जो किसी जूट की, या रेशमी कपड़े की मामूली सी थैली में रखे हुए मेवे के मामूली से पैकेट रहते हैं। सौ ग्राम पैकिंग और नौ सौ ग्राम मेवा। यह जरूर हो सकता है कि अभी-अभी एक अंबाइन की एक फोटो आई थी जिसमें वह एक ऐसा बटुआ थामे हुए थी जिसमें मेवा तो सौ ग्राम भी नहीं आया रहता, लेकिन जिसका दाम 15 करोड़ रुपए बताया जा रहा है। 18 कैरेट वाइट गोल्ड से बना हुआ यह बटुआ ताश की एक गड्डी भी नहीं समा सकेगा, लेकिन जिसके ऊपर हीरे ही हीरे जड़े हैं, और जिसे दुनिया का सबसे महंगा बटुआ बताया जा रहा है। मुझे आने वाले तोहफों में से कई इसी दर्जे के लगते हैं। हो सकता है कि अंबाइन को अपने दो-चार क्रेडिट कार्ड और एक मोबाइल फोन के लिए 15 करोड़ की यह पैकिंग अच्छी लगती हो, लेकिन मेरे लिए तो दीवाली के बाद ये खाली बक्से काजू-किशमिश के गिने-चुने दानों की याद दिलाते हुए मुंह चिढ़ाते बैठे रहते हैं।

पता नहीं यह नासमझी का सिलसिला किस पैकिंग वाले कारोबारी के दिमाग की उपज था जिसे जेब वालों ने लपक लिया और ताकत वालों को भेज दिया। दिखावे का यह कारोबार बड़ी दुकान थोड़ा सा पकवान नाम की एक नई कहावत के लायक है। कितना अच्छा होता कि इस देश में लिफाफों में गिफ्ट वाउचर का चलन रहता जिससे लोग बाजार जाकर अपनी मर्जी, जरूरत और पसंद का सामान ले सकते। लक्ष्मी ने तो कभी कहा नहीं होगा कि उसकी पूजा के मौके पर घड़ा इतना बड़ा दो कि जिसमें छोटे-छोटे दो-चार सिक्के खड़खड़ाते रहें, वे भी सोने-चांदी के नहीं, रिजर्व बैंक के ढाले हुए पांच-दस रूपए के सिक्कों की तरह। अब सोचें कि बीस-बीस के पांच सिक्कों को डालकर पांच सौ का घड़ा कोई तोहफे में भेजे तो सिक्कों की किस्मत पर तरस आएगा और घड़े की किस्मत से रश्क होगा। लक्ष्मी की तस्वीर में जो घड़ा वे थामे हुए दिखती हैं, उसमें से निकलते सोने के सिक्के तो यह सुझाते हैं कि पैकिंग और माल का क्या अनुपात होना चाहिए। पीतल के घड़े में सोने के सिक्के भरे हों तो ही पीतल की पैकिंग अच्छी लगती है। दो सौ ग्राम मेवे के साथ दो किलो की पैकिंग देखकर पर्यावरणवादी लोग दीवाली पर भी गम मनाने बैठ जाते हैं।

दरअसल त्यौहारों का माहौल ही कुछ ऐसा रहता है। पैकिंग बड़ी रहती है उसके भीतर तोहफा छोटा सा रहता है, ठीक वैसे ही जैसे कि दीवाली पर खूब धन बरसने की शुभकामना दूसरों को दी जाती है, और हसरत अपने लिए रहती है। लोगों को मालूम है कि धन बरसने की शुभकामना का कोई असर होता तो वे दूसरे को ऐसी शुभकामना का एक शब्द भी नहीं देते और पूरी की पूरी खुद ही निगल जाते। लेकिन त्यौहार है, उसका माहौल ही दिखावे का रहता है, और उसमें रंगारंग, चकाचक, झिलमिल पैकिंग का ही बोलबाला रहता है।

अगली बार किसी को कोई तोहफा देना हो तो न्यूनतम पैकिंग में, सिर्फ कागज के लिफाफे में, या किसी प्लास्टिक थैली में सामान रखकर देकर देखें, उनके चेहरे आपके लिए सचमुच ही शुक्रगुजार तो क्या शनिगुजार हो जाएंगे।


दीवारों पर लिक्खा है, 19 अक्टूबर 2025


(Daily Chhattisgarh)


 

पाखंड को विज्ञान साबित करने की अंतहीन ज़िद...

18 अक्टूबर 2025 

 

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के एक प्रोफेसर, विनय पांडेय ने एक रिसर्च-नतीजे का दावा किया है कि 37 फीसदी शादियां इसलिए टूट रही हैं क्योंकि वर-वधू की कुंडलियां नहीं मिलाई जा रही हैं। उनका कहना है कि ग्रहदोष होने के बावजूद शादियां की जा रही हैं, और कुंडली की वजह से ही ऐसे पति-पत्नी शादी के बाद प्रेम-प्रसंगों में पड़कर नए जीवनसाथी ढूंढ रहे हैं, या एक-दूसरे का कत्ल करवा रहे हैं। प्रोफेसर पांडेय का कहना है कि उन्होंने अपने रिसर्च स्कॉलरों के साथ मिलकर छह महीने में इस शोध को पूरा किया है। उनका कहना है कि आजकल लड़के-लड़की की कुंडली में गुण मिलाए नहीं जाते, और आधुनिक बनने के चक्कर में लोग सनातन रस्में नहीं निभाते हैं। उनका कहना है कि मंत्रों के उच्चारण की जरूरत भी आजकल नहीं समझी जाती, और नतीजा यह है कि पति-पत्नी एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं।

इस देश को सबसे पहले तो अमरीका से कभी-कभार हिंदुस्तान आने वाली सुनीता विलियम्स का सम्मान करना बंद कर देना चाहिए क्योंकि वह तो अंतरिक्ष में जाकर उन ग्रहों को अधिक करीब से देखती हैं जो कि पंडित विनय पांडेय, आशुतोष त्रिपाठी, और अमित कुमार मिश्रा की इस रिसर्च की भावना को चोट पहुंचाती है। जब भारत के कुछ विश्वविद्यालयों में अब ज्योतिष के तहत ग्रहों को पढ़ाया जा रहा है, तो नासा जैसी फ्रॉड अंतरिक्ष एजेंसी को ऐसे भारतीय विश्वविद्यालयों का अमरीकी अध्ययन केंद्र खोलना चाहिए ताकि एलन मस्क सरीखों पर अधिक पैसा बर्बाद न हो, और नासा ज्योतिष विज्ञान से ही सबकुछ सीख ले। भारत का इसरो मंगल पर अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी कर रहा है, उसमें एक-दो ज्योतिषी भी भेजने चाहिए जो मंगल से पूछ सकें कि वह शादी के वक़्त लड़के-लड़कियों की कुंडली में कुंडली मारकर क्यों बैठ जाता है, और रिश्ते नहीं होने देता? यह सिलसिला देश के लिए इतना खतरनाक हो चुका है कि बड़े-बड़े अखबार, टीवी चैनल, और करोड़ों हिट्स पाने वाली वेबसाइटें भी तथाकथित ज्योतिष पर आधारित कॉलम या कार्यक्रम दिखाने में लगे रहते हैं। यह पूरा सिलसिला देश में दहशत पैदा करके दुहने का है। ऐसे सारे ज्योतिषी चुनावों के समय बिल से निकलकर आते हैं, तरह-तरह की घोषणाएं करते हैं, और चुनावी नतीजे आने पर उनमें से अधिकतर पांच बरस के लिए फिर बिल में चले जाते हैं। भारत में कई चीजों को विज्ञान कहने का शौक है, इसमें ज्योतिष भी एक है। इसे न सिर्फ पेशेवर लोग विज्ञान कहते हैं, बल्कि सरकारों के धार्मिक और राजनीतिक रुझान के चलते कई विश्वविद्यालयों में इसके कोर्स शुरू कर दिए गए हैं। नतीजा यह है कि इस पूरी तरह अवैज्ञानिक विषय को एक वैज्ञानिक मान्यता दिलवा दी गई है। अब इसका अगला कदम यही हो सकता है कि चुनाव आयोग अपने अधिकृत ज्योतिषी रखे, और बिना मतदान के उनसे नतीजे निकलवा ले। चूंकि ये ज्योतिषी वैज्ञानिक का दर्जा भी प्राप्त होंगे, इसलिए उन पर ईवीएम जैसा शक भी विपक्षी पार्टियां नहीं कर सकेंगी। 

इस मुद्दे से थोड़ा सा ऊपर उठकर अगर देखें, तो यह दिखता है कि जितनी अवैज्ञानिक बातें रहती हैं, वे अपने आपको विज्ञान का दर्जा दिलाने के लिए लगी रहती हैं। कुछ लोग तरह-तरह की धार्मिक बातों को विज्ञान का दर्जा दिलवाना चाहते हैं। अभी-अभी एक साध्वी का बयान आया कि गाय का पचास ग्राम घी जलाने से चालीस टन ऑक्सीजन पैदा होती है। अब विज्ञान की समझ रखने वाले लोग ऐसे दावों के झांसे में नहीं आएंगे, लेकिन धर्म पर अंधभक्ति रखने वाले लोग यह मान लेंगे कि साध्वी कह रही हैं तो सच ही होगा। ऐसा होने पर धर्म के लोग कोरोना के दौरान ऑक्सीजन के लिए गिरते-पड़ते अस्पतालों में क्यों पहुंचे थे? लोगों को वह तस्वीर भी याद होगी कि रामदेव नाम का एक भगवा लंगोटीधारी तबीयत खराब होने पर भागे-भागे जाकर एम्स में भर्ती हुआ था, और तुरंत ऑक्सीजन लेने लगा था। कायदे से तो उसे गाय के घी का दीया जलाकर उसके धुएं को सूंघना चाहिए था, या किसी गौशाला में बैठकर गाय की छोड़ी हुई सांस सूंघना चाहिए था जिसके बारे में दावा किया जाता है कि गाय ऑक्सीजन ही लेती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है। यह बड़े ही मजे की बात है कि धर्म बार-बार विज्ञान के बेजा इस्तेमाल की कोशिश में लगे रहता है, जबकि विज्ञान है कि वह धर्म की दुकान के सामने से निकल जाता है, उस तरफ झांकता भी नहीं है। इसी से पता चलता है कि दोनों में से अधिक अहमियत किसकी है। अंधभक्तों की बहुतायत धर्म के साथ हो सकती है, लेकिन उनमें से किसी को भी अगर कहकर देखें कि विज्ञान की दी हुई चीजों का इस्तेमाल न करें, बिजली, फोन, पेट्रोल, और पंप से आया हुआ पानी इस्तेमाल न करें, तो उनकी आस्था का वजन समझ में आ जाएगा, वह गैस के गुब्बारे से भी हल्की साबित होगी।

इस देश में ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा देने के बाद अब तंत्र-साधना विज्ञान, झाड़-फूंक विज्ञान, पीलिया उतारने और सांप का जहर उतारने का विज्ञान, इन सबके भी डिग्री या डिप्लोमा कोर्स शुरू करने चाहिए। दुनिया के विकसित देश, जिनमें पड़ोस का चीन भी शामिल है, विज्ञान और टेक्नोलॉजी से आगे बढ़ रहे हैं, और हिंदुस्तान में जो लोग विज्ञान और टेक्नोलॉजी की हर सहूलियत का मजा ले रहे हैं, वे दूसरों पर अंधविश्वास थोप रहे हैं। अब ये ज्योतिषी क्या बताएंगे कि बड़े-बड़े राजा-रानी की शादियों के पहले तो उन्हें राजज्योतिषियों की सेवा हासिल रही होगी, उसके बाद इनकी शादियां क्यों टूटती हैं? पाखंड अगर सीधे-सीधे पाखंड फैलाने का काम करे, तो उसमें कोई दिक्कत नहीं है, फुटपाथ पर लोग तांत्रिक अंगूठी बेचते हैं, और जब तक दुनिया में बेवकूफ जिंदा है तब तक ऐसी अंगूठियां बिकती रहती हैं, दिक्कत सिर्फ वहीं पर है जब इसे विज्ञान का दर्जा दिया जाता है, विश्वविद्यालय में इसका कोर्स शुरू किया जाता है। कितनी आसान सी बात है कि विज्ञान को कभी किसी पाखंड की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन पाखंड को विज्ञान के मुखौटे की तलाश हमेशा ही रहती है, है ना दिलचस्प बात?

(Daily Chhattisgarh)