राज्यों में कांग्रेस को छोड़ें, पहले पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर ही सम्हालने की जरूरत

    30 सितम्बर 2021

  कांग्रेस पार्टी ने हो सकता है कि अपने इतिहास में इससे अधिक चुनौतियों वाले दिन देखे हों जब उसे इमरजेंसी लगानी पड़ी, जब वह इमरजेंसी के बाद हार गई। लेकिन इन मौकों पर इंदिरा गांधी मौजूद थीं। आज कांग्रेस अपने सबसे बुरे दिनों को देख रही है, और लोग यह देख रहे हैं कि कांग्रेस को अभी और क्या-क्या देखना बाकी है। इस बात की चर्चा पंजाब को लेकर करनी पड़ रही है जहां कांग्रेस ने हटाने लायक मुख्यमंत्री को हटाने में बरसों लगा दिए, और अध्यक्ष न बनाने लायक नवजोत सिंह सिद्धू को पल भर में अध्यक्ष बना दिया, जो कि कुछ महीनों में ही उस कुर्सी को लात मारकर पूरी कांग्रेस पार्टी के लिए एक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। इस बीच राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से जो 23 असंतुष्ट नेता सवाल लेकर खड़े हुए हैं, उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह सवाल किया है कि आज जब पार्टी के पास कोई अध्यक्ष नहीं है, तो इन सब फैसलों को कर कौन रहे हैं? बात सही भी है सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं, लेकिन तमाम फैसले लेते राहुल गांधी दिख रहे हैं जो कि पार्टी के अध्यक्ष नहीं रह गए हैं, और जिन्होंने पार्टी का अध्यक्ष न बनने की खुली मुनादी की हुई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पार्टी में अधिकार किसके पास हैं, और जवाबदेही किस पर है? अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी मुद्दे पर कुछ बातों को लिखा था लेकिन अब पंजाब की ताजा घटनाओं को देखते हुए और असंतुष्ट नेताओं के ताजा बयान देखते हुए यह लगता है कि कांग्रेस की बची-खुची सरकारों के बजाय कांग्रेस संगठन के बारे में बात करना चाहिए, कांग्रेस के उस तथाकथित हाईकमान के बारे में बात करना चाहिए जो कि दिखता नहीं है, लेकिन एक अदृश्य ताकत की तरह पार्टी पर अपनी फौलादी जकड़ बनाए हुए है।

बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी वक्त रहते कोई फैसले नहीं ले पा रहे हैं और जब पानी सिर से गुजर चुका रहता है तब वे पंजाब जैसे फैसले लेते हैं, जिनमें चुनाव के कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री को बदल रहे हैं, और उसके कुछ महीने पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदल रहे हैं और अब वह अध्यक्ष भी पार्टी की कुर्सी पर नहीं रहा। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि नया मुख्यमंत्री तय करते हुए कांग्रेस ने किसी गैरसिक्ख को मुख्यमंत्री बनाना तय किया जिससे सिखों के बीच कुछ नाराजगी होना जायज है। इसके बाद उन्होंने एक दलित को मुख्यमंत्री बनाया तो गैर दलितों के बीच नाराजगी जायज है। कांग्रेस की एक नेता अम्बिका सोनी आग में घी डालते हुए यह बताती हैं कि उन्हें सीएम बनने कहा गया था, लेकिन वे तो नहीं बनेंगी, किसी सिख को ही सीएम बनाना चाहिए। कांग्रेस के पंजाब प्रभारी हरीश रावत एक दलित के सीएम घोषित हो जाने के बाद कहते हैं कि अगला चुनाव सिद्धू के चेहरे पर लड़ा जायेगा। एक दलित का सम्मान कुछ घंटे भी नहीं रहने दिया कांग्रेस ने। चुनाव में अधिक से अधिक तबकों के अधिक से अधिक वोटों की जरूरत रहती है तो कांग्रेस पार्टी, एक-एक करके हर तबके तो नाराज कर रही है, चुकी है।  कुछ बदनाम अफसरों और मंत्रियों को पंजाब की सरकार में स्थापित कर रही है, कर चुकी है, और अपने करिश्मेबाज होने का दावा करने वाले नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर और गवा कर बैठी है। नतीजा यह है कि आज किसी को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि चुनाव तो बाद में लड़ा जाएगा आज कांग्रेस पार्टी के भीतर कौन किससे लड़ेंगे ? यह उस वक्त हो रहा है जब कैप्टन अमरिंदर सिंह दिल्ली में घूम घूम कर अमित शाह से मिल रहे हैं, और अजीत दोवाल से मिल रहे हैं।

कांग्रेस को प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों या दूसरे नेताओं को सुधारने के बजाय अपने-आपको सुधारने के बारे में पहले सोचना चाहिए। इस किस्म की अदृश्य, अनौपचारिक, और सर्वशक्तिमान हाईकमान पार्टी में किसके भीतर भरोसा पैदा कर सकती है? पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के वक्त कैप्टन अमरिंदर सिंह ने औपचारिक रूप से यह कहा कि उनकी राहुल गांधी से 2 बरस से मुलाकात नहीं हुई है। यह किसी पार्टी की किस तरह की नौबत है कि उसके बचे-खुचे 3-4 मुख्यमंत्रियों में से किसी एक से, पार्टी के सर्वेसर्वा राहुल गांधी की 2 बरस तक मुलाकात ही ना हो? यह पूरा सिलसिला बड़ा ही अजीब सा है, बहुत अटपटा है और इसके चलते हुए कोई राजनीतिक दल किसी भविष्य की उम्मीद नहीं कर सकता। यह इंदिरा गांधी के करिश्मे वाले दौर की कांग्रेस पार्टी नहीं है। यह तो आज मोदी के करिश्मे वाले वाली भाजपा के मुकाबले हाशिये के भी एक किनारे पर पहुंच चुकी कांग्रेस है, जिस पर रात-दिन मेहनत करने की जरूरत है। कांग्रेस पार्टी पर किसी जागीरदार की तरह काबिज सोनिया गांधी का परिवार आज अपने ही संगठन के लिए एक बहुत ही कमजोर मिसाल बन चुके हैं कि ऐसी लीडरशिप से कोई पार्टी कैसे चल सकती है। जिन दो दर्जन बड़े नेताओं ने हाईकमान के ऐसे हाल पर सवाल उठाए हैं, उन्हें पार्टी का गद्दार करार देना, उन्हें भाजपा का दलाल बतलाना, यह सब कुछ हो चुका है। लेकिन इन दो दर्जन बड़े नेताओं में से कोई एक भी तो बीजेपी में नहीं गया! तो इसका मतलब है कि कांग्रेस में चापलूस जिस अंदाज में अपने नेता को खुश करने के लिए, सवाल उठाने वालों पर टूट पड़े थे, उनके सारे हमले नाजायज थे।

वक्त आ गया है कि कांग्रेस पार्टी बिना देर किए चुनाव करवाए और जैसा कि राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इस परिवार से परे कांग्रेस अपना अध्यक्ष देखे। यह मानकर चलना कि इस परिवार के बिना कांग्रेस टूट जाएगी, यह मानकर चलना कि सिर्फ यही परिवार कांग्रेस को बांधकर रख सकता है, यह इस परिवार के साथ भी पार्टी के चापलूस नेताओं की नाइंसाफी है। इस परिवार को भी सांस लेने का मौका देना चाहिए, और पार्टी को कोई नया नेता तय करके आगे बढऩा चाहिए। पार्टी के चुनाव करवाने का रास्ता निकालना चाहिए क्योंकि अब तो कोरोना भी खत्म हो चुका है, और तकरीबन तमाम राज्यों में सारी राजनीतिक गतिविधियां भी शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में चुनाव न करवाने का केवल एक ही मतलब निकाला जा सकता है कि पार्टी की लीडरशिप को छोडऩे की नीयत नहीं है। ऐसा तस्वीर को मिटाने के लिए चुनाव से कम किसी में काम नहीं चलेगा, और 2-3 राज्य कांग्रेस के पास बचे हैं, उनके और डूब जाने के पहले अगर यह चुनाव हो जाए, तो हो सकता है किसी काम भी आए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 सितम्बर 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 सितम्बर 2021


 

मौसम की मार से इंसानों को बचाने के मोर्चे पर आप हैं?

   29 सितम्बर 2021

    इटली के मिलान शहर में अभी क्लाइमेट चेंज पर नौजवान पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने एक सम्मेलन रखा जिसमें स्वीडन की चर्चित पर्यावरण आंदोलनकारी युवती ग्रेटा थनबर्ग भी पहुंची। उसने एक जबरदस्त भाषण में दुनिया के देशों की जुबानी जमाखर्च को लताड़ा, और उसका भाषण चारों तरफ तैर रहा है। दुनिया के 190 देशों से करीब 400 जवान इस शहर में इकट्ठा हुए हैं, और उन्होंने दुनिया के राष्ट्रीय प्रमुख शासन प्रमुखों की धोखाधड़ी को उजागर करने का काम किया है। नौजवानों का यह विरोध उस वक्त सामने आया है जब महीने भर बाद ही  ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले एक बड़ा पर्यावरण सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें इन नौजवानों के उठाए हुए मुद्दे छाए रहना तय है।

दूसरी तरफ वैज्ञानिकों ने मौसम के बदलाव को लेकर जो हिसाब लगाया है वह भी बहुत डरावना है। एक बड़ी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस’ जर्नल में जलवायु परिवर्तन के बारे में छपा है कि आज के जो बच्चे हैं वे अपने जीवन में अपने दादा-दादी, या नाना-नानी के मुकाबले मौसम के सबसे बुरे मामलों (एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स) दो-तीन गुना अधिक देखेंगे। इसमें भी एक बात यह है कि जो संपन्न या विकसित देश हैं, वहां के बच्चों को ऐसे हालात अपनी दो पीढ़ी पहले के मुकाबले 2 गुना अधिक देखने होंगे, लेकिन गरीब देशों के बच्चों को ऐसे हालात 3 गुना अधिक देखने होंगे। मतलब यह कि आने वाली पीढिय़ों की किस्मत में तकलीफ तो पिछली पीढिय़ों के मुकाबले बहुत अधिक लिखी हुई है ही, उसमें भी जो गरीब हैं उनके हिस्से ज्यादा तकलीफ लिखी हुई है, चाहे वह गरीब देश हों, चाहे वह गरीब बच्चे हों।

मौसम की मार और तरह-तरह की प्राकृतिक विपदाओं ने इस बुरी तरह लोगों पर वार किया है कि गरीब लोगों के लिए तो खाना जुटाना मुश्किल हो गया है। अगर देखें कि मौसम का यह बदलाव, यह जलवायु परिवर्तन किनकी वजह से हो रहा है तो बड़ा साफ समझ में आता है कि संपन्न और विकसित देशों के लोग सामानों की जितनी खपत कर रहे हैं, और जितना प्रदूषण पैदा कर रहे हैं, सुविधाओं को जितना भोग रहे हैं, उनकी वजह से यह परिवर्तन अधिक हो रहा है. दूसरी तरफ उनसे कई गुना अधिक आबादी वाले जो गरीब देश हैं वे ऐसे जलवायु परिवर्तन के लिए बहुत थोड़े हद तक जिम्मेदार हैं। मतलब यह कि जलवायु परिवर्तन की औसत जिम्मेदारी अगर डाली जाए तो दुनिया की 20 फीसदी रईस आबादी पर उसकी 80 फीसदी जिम्मेदारी आ सकती है, और दुनिया की 80 फीसदी गरीब आबादी पर कुल मिलाकर भी पर्यावरण बर्बादी की 20 फीसदी से अधिक जिम्मेदारी नहीं आती। फिर यह भी है कि पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे लोगों की वजह से संपन्न और विकसित, और प्रदूषण फैलाने वाले धरती पर बोझ बने हुए देशों ने गरीब देशों में पर्यावरण के बचाव के लिए जिस मदद का वायदा किया था उसे उन्होंने पूरा नहीं किया है। नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने जरूर अपने देश के योगदान के वायदे को अब बढ़ाकर दोगुना किया है, लेकिन फिर भी गरीब देशों की पर्यावरण बचाने की जरूरत  पूरी होने के करीब कहीं भी नहीं पहुंच पा रही हैं, क्योंकि संपन्न देश पर्यावरण बिगाडऩे की अपनी जिम्मेदारी के एवज में कोई हर्जाना देना नहीं चाहते हैं।

यह सिलसिला धरती पर देशों के बीच, और देश के भीतर लोगों के बीच, एक बहुत बड़े भेदभाव का मामला है। दुनिया में बहुत से लोग अधिक आबादी को पर्यावरण पर या धरती पर एक बोझ बोझ मानकर चलते हैं। हकीकत यह है कि गरीब आबादी धरती को जितना इस्तेमाल करती है, उससे ज्यादा दुनिया के लिए पैदा करके देती है। गरीबों की उत्पादकता उनकी खपत के मुकाबले बहुत अधिक है। दूसरी तरफ हर अमीर इंसान की खपत गरीब के मुकाबले आसमान छूती हुई है। ऐसे बहुत से भेदभाव लगातार खबरों में रहते हैं, बहसों में रहते हैं, लेकिन जब दुनिया के देश किसी एक मंच पर जुटते हैं तो सबसे विकसित, सबसे ताकतवर, और सबसे संपन्न देश अपनी जिम्मेदारी से कतराने की कोशिश करते हैं। इस बारे में अधिक से अधिक चर्चा होनी चाहिए, हर प्रदेश में, और हर देश में चर्चा होनी चाहिए, और दुनिया के छात्र-छात्राओं, नौजवानों ने जिस तरह पर्यावरण के लिए आंदोलन करने का एक मोर्चा खोला है, उससे बाकी दुनिया के बाकी नौजवानों को भी कुछ सीखना चाहिए, और धरती के प्रति, अपनी आने वाली जिंदगी के प्रति एक फिक्र करनी चाहिए। सबको सोचना चाहिए कि मौसम की मार से इंसानों को बचाने के मोर्चे पर आप कहीं खड़े हैं?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितम्बर 2021


 

ऐतिहासिक जुल्म और जुर्म की जिम्मेदार सरकारों में माफी मांगने की हिम्मत होनी चाहिए

  28 सितम्बर 2021

  अभी दो दिन पहले कनाडा के कैथोलिक बिशप ने एक बयान जारी करके देश के आदिवासी मूल निवासियों से उन जुल्मों के लिए माफी मांगी है जिन्हें चर्च के चलाए जा रहे आश्रम स्कूलों में एक सदी से अधिक समय तक किया गया था। यह बयान कनाडा में दो ईसाई स्कूलों के अहातों में हजार से अधिक बच्चों की कब्र मिलने के बाद चल रहे हंगामे को लेकर सामने आया है। हालांकि बिशप ने सीधे-सीधे इन कब्रों का जिक्र नहीं किया है, लेकिन कुछ महीने पहले कनाडा की सरकार ने चर्च से इन कब्रों को मिलने के बाद माफी मांगने की अपील की थी। ऐसे रिहायशी स्कूलों को कनाडा में एक जांच आयोग ने कुछ बरस पहले एक सांस्कृतिक जनसंहार कहा था। आने वाले दिसंबर के महीने में पोप फ्रांसिस कनाडा के आदिवासियों के प्रतिनिधिमंडल से मिलने वाले हैं।

लोगों को याद होगा कि पहले ऑस्ट्रेलिया में भी मूल निवासियों को उनके गांवों से, उनके परिवार और संस्कृति से छीनकर शहरों में लाकर, चर्च की स्कूलों में पढ़ाकर, और शहरी गोरे परिवारों के साथ रखकर, उन्हें सांस्कृतिक रूप से तथाकथित आधुनिक बनाने का काम होते आया है। इसके लिए आस्ट्रेलिया ने अपनी संसद के बीच आदिवासी समुदाय को आमंत्रित करके, तमाम सांसदों ने खड़े होकर उनसे माफी मांगी थी। हम इस बात को हिंदुस्तान से भी जोडक़र देख चुके हैं, लिख चुके हैं कि किस तरह यहां कुछ हिंदू संगठन उत्तर पूर्वी राज्यों से आदिवासी परिवारों की लड़कियों को लाकर, उन्हें हिंदी भाषी इलाकों में शबरी आश्रम बनाकर वहां रखते आए हैं, जिसमें वे अपनी आदिवासी संस्कृति से कट जाती हैं, अपनी भाषा से, अपने परिवार, अपनी जमीन से कट जाती हैं। किसी दिन हिंदुस्तान भी सभ्य देश बनेगा तो यहाँ की संसद भी इन आदिवासी बच्चियों के समुदायों से माफी मांगेगा।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कोरिया की लाखों महिलाओं को सेक्स-गुलाम बनाकर रखने वाले जापान ने तय किया था कि अपने इस ऐतिहासिक अपराध के लिए वह कोरिया से माफी मांगेगा। युद्ध के दौरान सैनिकों के सुख के लिए न सिर्फ जापान में, बल्कि दुनिया के कुछ और देशों ने भी ऐसे जुर्म सरकारी फैसलों के तहत किए हुए हैं। अब अगर ऐसी माफी मांगी जाती है, तो उससे इतिहास में दर्ज एक जख्म का दर्द कुछ हल्का हो सकता है। हिटलर ने जो यहूदियों के साथ किया, अमरीका ने जो जापान पर बम गिराकर किया, वियतनाम में पूरी एक पीढ़ी को खत्म करके किया, और अफगानिस्तान से लेकर इराक तक जो किया, अमरीका के माफीनामे की लिस्ट दुनिया की सबसे लंबी हो सकती है। लेकिन बात सिर्फ एक देश की दूसरे देश पर हिंसा की नहीं है। देश के भीतर भी ऐतिहासिक जुर्म होते हैं, और उनके लिए लोगों को, पार्टियों को, संगठनों को, जातियों और धर्मों को माफी मांगने की दरियादिली दिखानी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया की एक मिसाल सामने है जहां पर शहरी गोरे ईसाइयों ने वहां के जंगलों के मूल निवासियों के बच्चों को सभ्य और शिक्षित बनाने के नाम पर उनसे छीनकर शहरों में लाकर रखा था, और अभी कुछ बरस पहले आदिवासियों के प्रतिनिधियों को संसद में बुलाकर पूरी संसद में उनसे ऐसी चुराई-हुई-पीढ़ी के लिए माफी मांगी।

अब हम भारत के भीतर अगर देखें, तो गांधी की हत्या के लिए कुछ संगठनों को माफी मांगनी चाहिए, जिनके लोग जाहिर तौर पर हत्यारे थे, और हत्या के समर्थक थे। इसके बाद आपातकाल के लिए कांग्रेस को खुलकर माफी मांगनी चाहिए, 1984 के दंगों के लिए फिर कांग्रेस को माफी मांगनी चाहिए, इंदिरा गांधी की हत्या के लिए खालिस्तान-समर्थक संगठनों को बढ़ावा देने वाले लोगों को माफी मांगनी चाहिए, बाबरी मस्जिद गिराने के लिए भाजपा को और संघ परिवार के बाकी संगठनों को माफी मांगनी चाहिए, गोधरा में ट्रेन जलाने के लिए मुस्लिम समाज को माफी मांगनी चाहिए, और उसके बाद के दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी और विश्व हिन्दू परिषद जैसे लोगों और संगठनों को माफी मांगनी चाहिए। इस देश के दलितों से सवर्ण जातियों को माफी मांगनी चाहिए कि हजारों बरस से वे किस तरह एक जाति व्यवस्था को लादकर हिंसा करते चले आ रहे हैं। और मुस्लिम समाज के मर्दों को औरतों से माफी मांगनी चाहिए कि किस तरह एक शाहबानो के हक छीनने का काम उन्होंने किया। इसी तरह शाहबानो को कुचलने के लिए कांग्रेस पार्टी को भी माफी मांगनी चाहिए जिसने कि संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा।

दरअसल सभ्य लोग ही माफी मांग सकते हैं। माफी मंागना अपनी बेइज्जती नहीं होती है, बल्कि अपने अपराधबोध से उबरकर, दूसरों के जख्मों पर मरहम रखने का काम होता है। दुनिया के कई धर्मों में क्षमायाचना करने, या जुर्म करने वालों को माफ करने की सोच होती है, लेकिन ऐसे धर्मों को मानने वाले लोग भी रीति-रिवाज तक तो इसमें भरोसा रखते हैं, असल जिंदगी में इससे परे रहते हैं। इसमें आज की हमारी यह चर्चा भी जुड़ सकती है क्योंकि बीती जिंदगी की गलतियों और गलत कामों से अगर उबरना है, एक बेहतर इंसान बनना है, तो उन गलत कामों को मानकर, उनके लिए माफी मांगे बिना दूसरा कोई रास्ता नहीं है। आने वाला वक़्त छत्तीसगढ़ के नक्सलग्रस्त इलाकों में दशकों से चली आ रही पुलिस ज्यादती के लिए भी माफी मांगने का रहेगा। देखेंगे कि इस राज्य की विधानसभा के भीतर आदिवासियों से माफी मांगने की नैतिक हिम्मत राजनीतिक दलों में जुट पाती है या नहीं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 सितम्बर 2021


 

उम्र सवा सौ बरस हो भी जाये, तो क्या-क्या होगा, यह भी सोचें

 27 सितम्बर 2021

  ब्रिटेन में एक भारतवंशी वैज्ञानिक सर शंकर बालासुब्रमण्यम ने इंसानों के जींस से जुड़ी हुई एक नई खोज की है जिससे उनकी बीमारियों को शुरुआती दौर में ही पकड़ा जा सकेगा और उनके लिए अलग से दवाइयां बनाकर उनका इलाज भी किया जा सकेगा। ऐसा माना जा रहा है कि बीमारियों की ऐसी शिनाख्त और उसके इलाज से औसत उम्र भी काफी बढ़ सकती है और 120 बरस तक उम्र बढऩे की एक अटकल लगाई जा रही है। यूनिवर्सिटी आफ कैंब्रिज के विशेषज्ञ सुब्रमण्यम ने अपनी इस कामयाबी का खुलासा किया है और दिलचस्प बात यह भी है कि अब इंसानी जींस कि यह जांच बहुत मामूली खर्च से हो सकती है, जबकि कई बरस पहले जब पहली बार इस किस्म की एक जांच शुरू हुई थी तो उस पर सैकड़ों करोड़ों रुपए खर्च हुए थे।

यह अकेला विश्वविद्यालय या अकेली प्रयोगशाला नहीं है जहां पर इस तरह की खोज चल रही थी, या अभी चल रही है। इंसान की जिंदगी को कैसे बढ़ाया जाए यह एक बड़ी चुनौती है और इसका एक बड़ा बाजार भी है. जिस तरह लोग अमर हो जाना चाहते हैं, जिस तरह लोग अपने हमशक्ल और अपने किस्म के क्लोन बनवाना चाहते हैं, लोग उम्र को अधिक से अधिक लंबा और सेहतमंद भी करवाना चाहते हैं, तो उन सबको देखते हुए इस किस्म की तमाम रिसर्च पर खासा खर्च भी हो रहा है क्योंकि अतिसंपन्न लोगों के बीच ऐसी खोज का एक बड़ा महंगा बाजार भी रहेगा। लेकिन चिकित्सा विज्ञान की कामयाबी और लोगों की बढ़ी हुई उम्र से परे कुछ और चीजों पर भी सोचने की जरूरत है कि अगर इंसान की उम्र 25-50 बरस बढ़ जाती है, तो उसके क्या-क्या असर होंगे? यह महज चिकित्सा विज्ञान के सामने बड़ी चुनौती नहीं रहेगी कि वह इतनी अधिक उम्र के लोगों की सेहत की दिक्कतों के बारे में अंदाज लगाए और उनका इलाज ढूंढ कर रखे बल्कि यह दुनिया के लिए बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी रहेगी।

सामाजिक चुनौती से हिसाब से संपन्न तबकों के लोग जिनके अस्सी-सौ बरस होकर गुजर जाने का अब तक सिलसिला चल रहा है, वे अगर अपनी अगली पीढ़ी की छाती पर सवा सौ बरस की उम्र तक मूंग दलते बैठे रहेंगे, तो उनकी औलाद कब काम संभाल सकेगी, और कब परिवार और कारोबार की मुखिया हो सकेगी? फिर यह भी रहेगा कि सामाजिक लीडरशिप, राजनीतिक लीडरशिप, इन सब में लोगों का रहना और 20-25 वर्ष बढ़ जाएगा, और फिर नई सोच के ऊपर छाए हुए ऐसे वटवृक्ष किसी को पनपने का मौका भी नहीं देंगे। आज जिस तरह भारतीय जनता पार्टी में 75 बरस की उम्र के बाद लोगों को मार्गदर्शक मंडल में भेजने की एक घोषित या अघोषित नीति चली आ रही है, वह मान लें कि सौ बरस की उम्र तक बढ़ा दी जाएगी, तो नई लीडरशिप को तो आने का मौका ही नहीं मिलेगा। और ऐसा ही हाल उन पार्टियों में भी होगा जिन पार्टियों में एक कुनबे की लीडरशिप चलती है, वहां की औसत लीडरशिप और 25-30 बरस लंबी खिंच जाएगी।

फिर यह भी होगा कि सरकारी नौकरी से जो 58 या 60 बरस में रिटायर होते हैं, उनके सामने अगले 58 या 60 बरस और बचे रहेंगे, और पता नहीं वे उसे कैसे गुजारेंगे। उनकी यह भी उम्मीद हो सकती है कि रिटायरमेंट की उम्र को बढ़ाकर 70 वर्ष या 75 वर्ष कर दिया जाए, और उस हालत में आज की बेरोजगार भीड़ कहां जाएगी? परिवार के भीतर आज तो दादा-दादी ही नजर आते हैं, लेकिन उनके भी ऊपर एक पीढ़ी और बढ़ जाएगी, तो फिर परिवार के अंदरूनी सांस्कृतिक टकराव का क्या होगा? चार या पांच पीढिय़ों के बीच पोशाक का फर्क, खानपान का फर्क, रहन-सहन का फर्क, क्या सचमुच ही परिवार को खुशहाल रख सकेगा या फिर टकराव बढ़ते चलेगा? या फिर ऐसे में नई पीढ़ी यह चाहेगी कि पुरानी पीढ़ी के लिए वृद्धाश्रम बढ़ते चलें और वृद्धाश्रम में लोगों का रहना 25-50 बरस तक का होने लगेगा!

दरअसल चिकित्सा विज्ञान की अपनी सोच रहती है जो वैज्ञानिक कामयाबी तक सीमित रहती है। उसे इस बात से लेना-देना नहीं रहता कि इससे समाज पर क्या फर्क पड़ेगा, मानवीय रिश्तों पर क्या फर्क पड़ेगा। एक अंधाधुंध सीमा तक जीने वाली बूढ़ी आबादी, हो सकता है कि चिकित्सा सुविधाओं के ढांचे पर इतना बड़ा बोझ बन जाए कि दूसरे जरूरी और गरीब मरीजों को इलाज मिलना मुश्किल हो जाए। लेकिन एक दूसरी संभावना भी हो सकती है कि इतना लंबा जीने वाली एक आबादी दुनिया का बड़ा ग्राहक भी बन सकती है जिसे इलाज की जरूरत हो, सहायक कर्मचारियों की जरूरत हो, जिसके लिए एक पूरे बुजुर्ग-केंद्रित कारोबार का ढांचा खड़ा करने की जरूरत हो. इसलिए यह सोचना भी कुछ तंग नजरिए की बात होगी कि यह दुनिया के लिए अनिवार्य रूप से एक समस्या ही रहेगी। हो सकता है कि संपन्नता के साथ अगर आबादी के एक हिस्से की उम्र ऐसी बढ़ती है, तो हो सकता है उससे बहुत लोगों को रोजगार और बहुत लोगों को कारोबार भी मिले।

लेकिन खुद चिकित्सा विज्ञान के नजरिए से देखें तो उम्र के लंबे होने का मतलब उस लंबी उम्र के सेहतमंद होने जैसा नहीं है। हो सकता है कि इंसानी जिस्म के बहुत से ऐसे हिस्से रहें जिन्हें जवान रखने का कोई तरीका ढूंढा न जा सके। वैज्ञानिक एक जेलीफिश की मिसाल को बड़ा महत्वपूर्ण मान रहे हैं जिसमें वह जब चाहे अपने पुराने हो रहे अंगों को छोडक़र अपने पूरे बदन को अपने कम उम्र की हालत में ले जा सकती है.  इसे इस तरह समझा जाए, कि 60 बरस के इंसान जब चाहें वे फिर से 16 बरस के हो जाएं। जेलीफिश में उसकी एक प्रजाति ऐसी क्षमता रखती है, और ऐसा करती भी रहती है। अब वैज्ञानिकों को उसकी इस खूबी से बड़ी उम्मीदें हैं, और उन्हें लगता है कि जीव विज्ञान के हिसाब से ऐसा होना अगर उसमें मुमकिन है, तो हो सकता है कि कुछ हद तक दूसरे जीवों में भी यह हो सके। अब देखना होगा कि इंसानों के लिए क्या क्या खोजा जा सकता है।

हम जेनेटिक्स की ऐसी खोज की किसी भी किस्म से आलोचना करना नहीं चाहते क्योंकि यह हो सकता है कि जींस में फेरबदल करने की एक वैज्ञानिक क्षमता से आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कई किस्म की ऐसी बीमारियों से छुटकारा पा जाए, जिनके साथ पूरी जिंदगी गुजारना उसकी मजबूरी रहती है। अस्थमा हो या डायबिटीज, या फिर कैंसर हो, ऐसी बहुत सी बीमारियां रहती हैं जिनसे पूरी जिंदगी लदी हुई रहती है, और अगर इनसे छुटकारा मिल सके तो हो सकता है कि अस्पतालों के मौजूदा ढांचे पर से बोझ कम भी हो जाए। फिलहाल अमर बनने की चाह रखने वाले लोग ऐसी किसी भी खोजे से बड़ी उम्मीद पाल लेते हैं जो कि बहुत गलत भी नहीं है। लेकिन बढ़ी हुई उम्र के साथ-साथ दुनिया का नक्शा कैसा होगा, समाज और अर्थव्यवस्था पर, परिवार के ढांचे पर इसका क्या फर्क पड़ेगा, इस बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए। यह पूरा सिलसिला रातों-रात में हो जाने वाला नहीं है, ऐसी कोई कामयाबी मिलने पर भी उसका असर दिखने में दो-चार पीढिय़ां निकल सकती हैं, लेकिन जब भविष्य की कल्पना करके किसी योजना को बनाया जाए तो अगले सौ-पचास बरस की बात भी सोच लेना बेहतर होता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितम्बर 2021


 

सात बरस की उम्र से बच्चों को कांग्रेसी बनाने की यह कवायद

26 सितम्बर 2021

  कांग्रेस पार्टी ने उसके कुछ नेताओं के मातहत चलने वाले जवाहर बाल मंच को कल पार्टी के एक विभाग की मान्यता दी है। और इसके लिए दक्षिण भारत के एक पार्टी नेता डॉ जीबी हरि को पहला राष्ट्रीय चेयरमैन नियुक्त किया है, जो कि केरल में इस मंच को कई बरस से चलाते आ रहे थे। कांग्रेस की खबर के मुताबिक यह संगठन 7 से 17 वर्ष के बच्चों के बीच काम करेगा और जाहिर है कि यह कांग्रेस की विचारधारा को फैलाने का भी काम करेगा। इस पार्टी का वर्तमान बड़ा खराब चल रहा है, भविष्य अनिश्चित है, लेकिन इसके पास इतिहास सबसे बुलंद है। हिंदुस्तान में अगर किसी पार्टी के पास सबसे गौरवशाली इतिहास है तो वह कांग्रेस पार्टी ही है जो कि गांधी के वक्त से चली आ रही है। जो गांधी की निगरानी में चलती रही, और गांधी के पसंदीदा नेहरू ने जिसे आजादी के आंदोलन से जोडक़र देश के इतिहास की सबसे अधिक शहादत देने वाली पार्टी बनाकर रखा। ऐसे में देश के छोटे बच्चों को अगर सांप्रदायिकता से परे, और धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक सद्भाव, और समानता की नसीहत देनी है तो उसके लिए कांग्रेस के पास अपना सबसे संपन्न इतिहास है। और शायद आज उसे जिंदा रहने के लिए अपने इतिहास के नगदीकरण की जरूरत भी है क्योंकि इसके अलावा उसके पास और बहुत कुछ बचा नहीं है।

लेकिन जैसा कि कांग्रेस के बहुत से दूसरे संगठनों या मोर्चों के साथ हो होता है, उनमें राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य तक ऐसे लोगों को मनोनीत किया जाता है जिनका उस दायरे से बहुत कम लेना-देना रहता है। कांग्रेस के मजदूर संगठनों के मुखिया की जगह करोड़पति, अरबपति संपन्न कांग्रेसी काबिज हो जाते हैं। मजदूरों के बाच ऐसे संगठनों का काम धरा रह जाता है, और लोगों के बीच कांग्रेस पार्टी की विश्वसनीयता भी खत्म होती है। दूसरी तरफ पिछले बरस कोरोना और लॉकडाउन से जूझने में कांग्रेस के नौजवान संगठन युवक कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के मातहत दिल्ली में जितना काम किया था, उससे पार्टी को बड़ी वाहवाही भी मिली थी। अब देखने की बात यह है कि कल बनाया गया यह नया विभाग बच्चों के बीच कितना काम कर सकता है।

बच्चों का मामला कुछ अधिक नाजुक इसलिए है कि जब कांग्रेस पार्टी के बैनर तले बच्चों के लिए कोई काम संगठित रूप से करने की नीयत पार्टी की है तो उसे पूरी की पूरी पार्टी को एक आदर्श के रूप में भी बच्चों के सामने रखना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि पार्टी के बहुत से नेता आज गंदी जुबान में बात करें, बहुत से नेता सार्वजनिक रूप से सरकारी कर्मचारियों को पीटें और उसके बाद पार्टी बच्चों को शहादत और महानता का इतिहास पढ़ाए। बच्चों को पढ़ाने के लिए इतिहास तो ठीक है लेकिन बच्चों को आज की मिसाल भी देनी होगी और अगर वह अखबारों के पन्नों पर, या अपने परिवार के लोगों से, या टीवी की खबरों पर कांग्रेस के लोगों की गुंडागर्दी पढ़ते रहेंगे, तो गांधी और नेहरू कहां से आकर कांग्रेस को बचा पाएंगे? इसलिए हम कांग्रेस के मजदूर संगठन, या उसके महिला मोर्चा, या युवक कांग्रेस इन सबसे परे बच्चों के लिए बनाए गए इस विभाग को लेकर उलझन में हैं कि क्या कांग्रेस सचमुच बच्चों के बीच काम करने लायक, और बच्चों को प्रभावित करने लायक पार्टी अपने आपको बना पाएगी?

इतने छोटे बच्चों के लिए काम करने वाले संगठनों को देखें तो सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ याद पड़ता है जो मुहल्लों के मैदानों पर या स्कूलों के अहातों में कहीं-कहीं पर सुबह से शाखा लगाता है, बच्चों और बड़ों को राष्ट्रप्रेम की बात सुनाता है, और कहीं पर परेड करवाता है, कहीं उन्हें खेल खेल पाता है। दूसरी तरफ बस्तर जैसे इलाकों में नक्सल संगठन भी छोटे-छोटे बच्चों के बीच काम करते हुए दिखते हैं। इस तरह कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करना कोई नई बात नहीं है और दुनिया के इतिहास में कई जगहों पर राजनीतिक संगठन या दूसरे अपने-आपको सांस्कृतिक कहने वाले संगठन ऐसा करते ही आए हैं। इनका मोटा मकसद अपने बड़े संगठन की तरफ बच्चों को मोडऩे का रहता है, और क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने पिछले 10-15 बरस से चले आ रहे इस संगठन को अब कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन के एक विभाग की तरह दर्जा दिया है, तो जाहिर है कि अब यह एक राजनीतिक पार्टी का एक मोर्चा है, जो कि सबसे कम उम्र के लोगों के लिए है। ऐसे संगठन का काम करना बड़ा नाजुक हो सकता है क्योंकि पार्टी संगठन यह उम्मीद कर सकता है कि इसमें उसके नेताओं को प्रमुखता से पेश किया जाए, और बच्चों के बीच उन्हें लोकप्रियता मिले। दूसरी तरफ ऐसे संगठन को एक व्यापक लोकतांत्रिक के हित में काम करना चाहिए और किसी व्यक्ति को बढ़ावा देने के बजाय लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय मूल्यों की समझ बच्चों के बीच मजबूत करनी चाहिए। कांग्रेस के भीतर रहते हुए यह संगठन पता नहीं कितना कुछ कर पाएगा, लेकिन बच्चों के बीच इसे अगर पार्टी की प्रोपेगेंडा मशीन का एक हिस्सा ही बनाकर रखा जाएगा तो इससे लोग शायद ही जुड़ेंगे। इसे पार्टी के चुनावी मकसद से परे रखा जाएगा तो हो सकता है कि यह बच्चों के भी अधिक काम आए और खुद कांग्रेस के भी। 

      (Daily Chhattisgarh)

असल जिंदगी और आभासी जिंदगी के बीच चलते टकराव में कहाँ थमें ?

  26 सितम्बर 2021

  हिमाचल के शिमला की एक खबर है कि वहां एक आदमी अपनी बीवी को व्हाट्सएप पर चैटिंग से रोकता था, और इस बात को लेकर उसकी बीवी खासी खफा थी, झगड़ा बढ़ा तो पत्नी ने डंडा लेकर पति की जमकर पिटाई की और उसके तीन दांत भी तोड़ दिए। पति ने जाकर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई और पत्नी के खिलाफ केस दर्ज हो गया है। यह मामला पिटाई और दांत तोडऩे तक पहुंचने की वजह से खबरों में आ गया है, लेकिन सोशल मीडिया पर जीवनसाथी की सक्रियता को लेकर शादीशुदा जिंदगी के तनाव का यह अकेला मामला नहीं है। आज मोबाइल फोन और कंप्यूटर की मेहरबानी से सोशल मीडिया पर लोग कई किस्म से दुनिया भर के दूसरे लोगों से जुड़ रहे हैं, और उसका नतीजा कई किस्म के जुर्म में भी तब्दील हो रहा है, और कई किस्म के पारिवारिक या सामाजिक तनाव में भी।

हिंदुस्तान में हर दिन किसी न किसी प्रदेश से खबर आती है कि वहां किसी हिंदुस्तानी ने विदेशी बनकर, या किसी एक धर्म के व्यक्ति ने दूसरे धर्म का प्रोफाइल बनाकर किस तरह किसी शादीशुदा महिला को, या किसी महिला ने किसी बुजुर्ग आदमी को फंसाया, शादी का, सेक्स का, प्यार का, या साथ रहने का झांसा दिया, और बात आगे बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ी कि लोग घर के गहने चोरी करके देने लगे, अपनी जमीन-जायदाद बेचकर मांग पूरी करने लगे, और बहुत से मामलों में अपने नाजुक पलों की तस्वीरें या वीडियो एक दूसरे को भेजने लगे, जिन्हें लेकर आगे ब्लैकमलिंग का सिलसिला शुरू हो गया।

दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के मुकाबले हिंदुस्तान में यह नौबत कुछ अधिक इसलिए आ रही है कि यहां का समाज सदियों से औरत और मर्द को दूर रखते आया है, लडक़े लड़कियों को मिलने से रोकते आया है, और अब जब सोशल मीडिया ने या कंप्यूटर और मोबाइल फोन की मैसेंजर सर्विस ने दुनिया भर के लोगों को एक दूसरे से जोड़ दिया है, तो लोग अपने पारिवारिक संबंधों से परे भी एक खुशी ढूंढने लगे हैं, और बहुत से मामलों में पाने भी लगे हैं। यह मान लेना गलत होगा कि सोशल मीडिया और मैसेंजर से बने हुए ऐसे नए रास्तों ने लोगों का महज नुकसान किया है। आज बहुत से लोग ऐसे बाहरी रिश्तों की वजह से एक आत्मसंतुष्टि में जीने लगे हैं, उन्हें यह बाहरी चाह खुश रखने लगी है, निराशा से दूर कामयाबी की तरफ बढ़ा भी रही है। अब फर्क केवल यह पड़ रहा है कि शादीशुदा जिंदगी में भागीदारों की एक दूसरे से जो उम्मीदें रहती हैं, और वफादारी की जो परंपरागत सोच है, उसे परे जाकर ऐसे ऑनलाइन संबंध विकसित हो जाते हैं जो कि शादीशुदा जिंदगी की घुटन से तो लोगों को उबार लेते हैं, लेकिन उनके लिए कुछ दूसरे नए खतरे भी खड़े कर देते हैं।

दुनिया के अधिक विकसित देशों में औरत-मर्द का पहले से बाहर साथ-साथ काम करना चले आ रहा था, वहां पर यह समस्या उतनी बड़ी नहीं है, लेकिन भारत जैसा समाज जिसमें महिलाओं का एक बड़ा तबका घर पर ही रह जाता है, और देश के कुल कामकाजी लोगों में महिलाएं सिर्फ 15 फीसदी हैं. ऐसे में हिंदुस्तान में अधिकतर महिलाएं घर पर रहती हैं जिन्हें अभी कुछ बरस पहले तक बाहर किसी से संपर्क का जरिया कम ही रहता था, लेकिन अब मोबाइल फोन, दुपहिया गाडिय़ों, थोड़ी बहुत बाहर आवाजाही के चलते हुए लोगों को दूसरों से मिलने का मौका भी मिलता है, और सोशल मीडिया की वजह से लोगों की दोस्ती भी होती है। चूँकि हिंदुस्तान में संचार तकनीक के ये सामान और सोशल मीडिया इन दोनों का इतिहास बहुत लंबा नहीं है, और कम से कम विकसित देशों के मुकाबले तो बहुत ही नया है, इसलिए यहां पर लोग अभी सोशल मीडिया को जरूरत से अधिक महत्व भी देते हैं, और वहां पर मिले हुए नए लोगों से बड़ी तेजी से करीब भी आ जाते हैं।

शिमला की है ताजा घटना एक नए किस्म का सामाजिक माहौल भी बताती है। अगर पति की शिकायत पूरी तरह सच है, और जैसा कि पुलिस ने तुरंत जुर्म कायम किया है, तो उसकी पत्नी एक नए किस्म का अधिकार भी इस्तेमाल कर रही है। हिंदुस्तान में महिलाएं आमतौर पर पिटते आई हैं, और इस मामले में इस महिला ने पति को पीटकर उसके दांत तोड़ दिए हैं। तो यह समानता का माहौल एक नई बात है, और सोशल मीडिया या मैसेंजर पर चैटिंग, फोटो या वीडियो का लेना-देना एक नए सामाजिक तनाव की बात है।

मनोवैज्ञानिक हिसाब से देखें तो यह पूरा सिलसिला इसलिए परिवार के आपसी संबंधों के मुकाबले अधिक महत्व पा जाता है कि परिवार के ढांचे में आने के बाद लोगों के आपसी संबंध परिवार की दिक्कतों से लद जाते हैं, और जब तक लोग महज सोशल मीडिया या मैसेंजर पर एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं, वे अपना सबसे अच्छा रुख सामने रखते हैं जो कि कई बार झूठा भी रहता है, कई बार बनावटी या दिखावटी रहता है। लेकिन फिर भी इंसान का मन है जो उसे सुहाने वाली चीजों को सुनहला सच भी मान लेता है। इसलिए लोग सोशल मीडिया पर बने हुए संबंधों में एक दूसरे को मुखौटों के पीछे से मिलते हैं, और वहां दोनों अपनी अपनी पारिवारिक दिक्कतों से लदे हुए नहीं रहते हैं। यही वजह रहती है कि सोशल मीडिया के रिश्ते बहुत से लोगों को असल जिंदगी के लदे हुए, बोझ बने हुए रिश्तों के मुकाबले अधिक आकर्षक लगते हैं, और अपने-आपको दिया जा रहा है यह धोखा, दूसरे लोगों से धोखा खाने का खतरा भी दे जाता है।

इस मुद्दे पर हमारे पास तुरंत ही कोई राय नहीं है क्योंकि जीवन शैली धीरे-धीरे बदलती है, और धीरे-धीरे बदली जा सकती है। लेकिन जब टेक्नोलॉजी की आंधी आकर जिंदगी की भावनाओं को तहस-नहस कर देती है, तब लोग उस आंधी की रफ्तार से संभल नहीं पाते हैं। लोग शुरुआती वर्षों में एक ऑनलाइन खुशी के दौर में डूब जाते हैं, और अपने परिवार के लोगों के मुकाबले उन्हें बाहर के लोगों का मुखौटा कभी-कभी बेहतर भी लगने लगता है। ऐसे में उन परिवारों में असर अधिक होता है जो पहले से तनाव झेल रहे हैं, जहां जिंदगी पहले से बोझ बनी हुई है। वहां सोशल मीडिया या मैसेंजर पर मिलने वाली राहत एक मरहम की तरह काम करती है, और लोगों को जिंदा रहने का या जीने का एक नया मकसद मिल जाता है।

बहुत से लोग ऐसे भी रहते हैं जिनको सोशल मीडिया पर मिलने वाले महत्व की वजह से उन्हें एक नया आत्मगौरव हासिल होता है जो कि घर में चली आ रही जिंदगी में मिलना बंद हो चुका रहता है। घर के लोगों के लिए घर की मुर्गी दाल बराबर रहती है, और सोशल मीडिया के मुखौटे के पीछे से एक-दूसरे से मिलने वाले लोगों को दाल भी मुर्गी जैसी लगती है, क्योंकि वहां लोग अपना सबसे अच्छा सजाया हुआ चेहरा सामने रखते हैं, और किसी तरह का बोझ है एक दूसरे के लिए नहीं रहता है। असल जिंदगी में तो होता है यह है कि जीवन साथी एक साथ, एक कमरे में रहते हुए, एक-दूसरे के बदन से निकलने वाली तमाम किस्म की आवाज, और तमाम किस्म की गंध को झेलने के लिए मजबूर रहते हैं। दूसरी तरफ ऑनलाइन बने हुए संबंधों में लोग एक-दूसरे को अपना मेहनत से गढ़ा हुआ एक ऐसा चेहरा दिखाते हैं जिसमें सब कुछ अच्छा ही अच्छा रहता है, न वहां डकार की आवाज आती है, और न पसीने की बदबू।

इस मुद्दे पर लिखना अंतहीन हो सकता है, लेकिन आज लिखने का मकसद यह है कि लोगों को ऑनलाइन या सोशल मीडिया के संबंध को एक हिफाजत की दूरी के साथ ही बनाना चाहिए, ताकि वे तबाही का सामान ना बन जाए। लोगों को ऑनलाइन होने वाले धोखे की खबरों को पढऩा चाहिए, और किस तरह लोग ऑनलाइन रिश्तों के बाद ब्लैकमेलिंग के शिकार होते हैं, दूसरे किस्म के जुर्म के शिकार होते हैं इस बारे में भी पढऩा चाहिए। जुर्म की कहानियां हमेशा ही जुर्म के लिए उकसाने वाली नहीं होती हैं, कई बार वे लोगों को सावधानी सिखाने वाली भी होती हैं। इसलिए लोगों को ऐसे मामलों की चर्चा अपने आसपास के दायरे में जरूर करनी चाहिए, ताकि उनके करीबी लोगों में से कोई अगर ऐसे किसी जुर्म का शिकार होने के करीब पहुंचे हुए हों, तो कम से कम वे तो बच जाएं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 सितम्बर 2021


 

ऐसे प्रदेश को भी धिक्कार है

  25 सितम्बर 2021

   छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिले जशपुर में एक दिव्यांग छात्रावास और प्रशिक्षण केंद्र में तीन दिन पहले वहीं के दो कर्मचारियों ने शराब के नशे में एक मूक-बधिर बच्ची से बलात्कार किया और आधा दर्जन दूसरी लड़कियों के कपड़े फाड़े, उनका सेक्स शोषण किया, और बहुत से दूसरे बच्चों से मारपीट की। यह पूरा सिलसिला भयानक है। वहां की महिला सफाई कर्मचारी को कमरे में बंद करने के बाद इन दो पुरुष कर्मचारियों ने जिस तरह बच्चियों के कपड़े फाड़े, उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारा, उनका देह शोषण किया, और एक बच्ची से बलात्कार किया, उनकी आवाजें सुनते हुए यह सफाई कर्मचारी दरवाजा तोडऩे की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे नहीं तोड़ पाई। मूक बधिर बच्चों की बिना शब्दों की चीख पुकार उस रात वहां गूंजती रही, और जब सफाई कर्मचारी ने इस प्रशिक्षण केंद्र के प्रभारी अफसर को फोन पर बताया तो उन्होंने वहां पहुंचकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। बाद में मीडिया के रास्ते यह मामला खुला और अब नाबालिग बच्ची से बलात्कार के अलावा, बाकी लड़कियों का सेक्स शोषण करने का मामला दर्ज हुआ है, और ये दोनों कर्मचारी गिरफ्तार हुए हैं, जिनमें से एक को इस प्रशिक्षण केंद्र, छात्रावास का केयरटेकर बनाया गया था। सरकार के नियम यह कहते हैं कि जहां लड़कियों को रखा जाता है वहां पर किसी पुरुष को केयरटेकर न रखा जाए, लेकिन नियमों से परे साधारण समझबूझ की भी इस बात को भी अनदेखा करते हुए ऐसी बेबस बच्चियों और उन्हीं के जैसे मूकबधिर लडक़ों के इस छात्रावास को चलाया जा रहा था। जानकार लोगों का कहना है कि यह बात भी नियमों के खिलाफ है कि लडक़े और लड़कियों को एक ही साथ रखा जाए।

जिन्हें ईश्वर या कुदरत ने बोलने और सुनने की ताकत नहीं दी है ऐसी बच्चियों के साथ सरकार भी क्यों मेहरबान रहे? इसलिए सरकार ने इन लडक़े-लड़कियों के लिए ऐसा भयानक इंतजाम करके रखा है। दिक्कत यह है कि इस प्रदेश में एक मानवाधिकार आयोग और एक राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग बैठे हुए हैं, और इस घटना के बाद इनमें से किसी ने कोई नोटिस जारी किया हो ऐसा सुनाई नहीं पड़ता है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष पद पर राज्य सरकार ने एक ऐसी महिला को मनोनीत किया है जिसकी शैक्षणिक योग्यता, उम्र, और उसका तजुर्बा उस उस पद के लायक नहीं बताया जा रहा है, और इस नियुक्ति के खिलाफ हाईकोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई चल रही है, सरकार को नोटिस जारी हो चुका है। जब राजनीतिक संतुष्टि के लिए या मेहरबानी करने के लिए अपात्र लोगों को ऐसे नाजुक पदों पर बिठा दिया जाता है तो उसका यही नतीजा होता है। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के लिए सरकार की वेबसाइट पर जो शर्ते रखी गई है, उनमें ग्रेजुएट होना जरूरी है, और यह शर्त रखी गई है कि आवेदक को बाल कल्याण, बाल सुरक्षा, किशोर न्याय, निशक्त बच्चों, बाल मनोविज्ञान, या समाजशास्त्र में कम से कम 5 वर्ष का अनुभव होना चाहिए। यह भी शर्त रखी गई है कि आवेदक की आयु 65 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा भी कई शर्ते हैं। इस पद पर राज्य सरकार ने कुछ महीने पहले भूतपूर्व विधायक तेजकुंवर नेताम को नियुक्त किया है जिसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए वहां कहा गया है कि वह केवल आठवीं पास हैं और उनकी उम्र 65 वर्ष हो चुकी है। यह सरकार की तय की गई शर्तों के पूरी तरह खिलाफ है।

सरकार की राजनीतिक पसंद से होने वाली नियुक्तियों से लेकर सरकारी विभागों के आम कामकाज तक एक ही किस्म का संवेदनाशून्य माहौल रहता है। जिस छात्रावास में बच्चियों से बलात्कार और सेक्स शोषण कि यह भयानक हरकत हुई है, उसमें काम करने वाले कर्मचारियों को हाथ के इशारों से बात करने की भाषा का भी कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। खबर की जानकारी यह भी है एक पुरुष को वहां का अधीक्षक बना दिया गया था, जो खुद वहां कभी रहता नहीं है। जांच में और बातें भी सामने आएंगी लेकिन नीचे से ऊपर तक सरकार का जो हाल दिख रहा है वह सबसे कमजोर तबके की सबसे अधिक उपेक्षा का है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को चाहिए कि आज ही वे अपने अफसरों को आदेश दें कि प्रदेश भर में जहां-जहां बच्चों के ऐसे छात्रावास हैं या दूसरे किस्म के आश्रम या प्रशिक्षण केंद्र हैं उन सबमें उनकी सुरक्षा के इंतजाम को तुरंत परखा जाए, और जहां कहीं नियमों के तहत काम नहीं हो रहा है वहां कड़ी कार्यवाही की जाए।

मूक-बधिर बच्चियों से सरकारी संस्थान में इस किस्म का सामूहिक बलात्कार को, और उस पर भी प्रदेश विचलित न हो, तो ऐसे प्रदेश को भी धिक्कार है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 सितम्बर 2021


 

मोदी अमरीका में, लेकिन टीवी की ख़बरों पर कुछ और काबिज !

 24 सितम्बर 2021

   देश की राजधानी दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में पेशी पर लाए गए एक गैंगस्टर को दो हमलावरों ने वकील की पोशाक में आकर जज के सामने ही गोलियां मार दीं, उस गैंगस्टर को लेकर आने वाले हथियारबंद पुलिस वालों ने गोलियां चलाईं, और दोनों हमलावर वहीं मारे गए। बाद में आने वाली खबरें बतलाती हैं कि जब भी इस बड़े गैंगस्टर को पेशी पर लाया जाता था तो उस पर हमले की आशंका रहती थी और पुलिस को पहले से इत्तला की जाती थी कि अतिरिक्त सुरक्षा का इंतजाम किया जाए। इसके बाद भी ये दो हमलावर अदालत के भीतर आकर बैठे थे, और उन्होंने जज के सामने ही, जज के कुछ फीट दूर ही खड़े रहकर इसे गोलियां मार दीं। ऐसी घटनाएं उत्तर प्रदेश और बिहार में समय-समय पर सुनाई पड़ती रही हैं जहां मुजरिमों के गिरोह एक-दूसरे को निपटाने के लिए अदालत में पेशी के दिन और वक्त जानकारी रखते हैं और वहां हिसाब चुकता करते हैं। लेकिन जैसा कि जाहिर है दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है, और राज्य सरकार का उससे कुछ भी लेना देना नहीं है, ऐसे में केंद्र सरकार की ही जवाबदेही इस वारदात पर बनती है। पर आज महज इसी एक वारदात को लेकर हम यहां पर नहीं लिख रहे हैं, दिल्ली पुलिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कुछ और मामले हाल के महीनों में सामने आए हैं, जिन पर बात की जानी चाहिए, और एक बात दिल्ली से बहुत दूर असम की भी है।

अभी दिल्ली के दंगों को लेकर और कुछ दूसरे मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने यह पाया है कि पुलिस ने बेबुनियाद मामले दर्ज किए, बेकसूर लोगों को पकडक़र जेलों में ठूंस दिया, शायद इसलिए कि वे मुस्लिम थे और देश की राजनीतिक ताकतों को पसंद नहीं थे। कुछ मामलों में तो अदालत ने पाया कि दिल्ली पुलिस को यह भी नहीं मालूम था कि वह किस मामले की जांच कर रही है। अदालत ने बड़ी सख्ती और तल्खी से पुलिस की ऐसी नालायकी, निकम्मेपन और उसकी बदनीयत इन सब पर काफी नाराजगी जाहिर करते हुए खिंचाई की है। यह बात नई नहीं है और केजरीवाल की सरकार आने के पहले से दिल्ली की सरकारें यह मांग करते आई हैं कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए और दिल्ली पुलिस राज्य शासन के अधीन की जाए। सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला जाने के बाद भी वहां से दिल्ली सरकार को कोई अधिकार नहीं मिले और दिल्ली के उपराज्यपाल के मार्फत दिल्ली सरकार के गैर पुलिसिया कामकाज पर भी केंद्र सरकार की पकड़ बनी हुई है। ऐसे में क्योंकि सारे अधिकार केंद्र सरकार के पास हैं इसलिए जिम्मेदारी भी उसी की बनती है। यह एक बड़ा बुरा मौका है जब आज-कल में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में लोगों से मिल रहे हैं, और उसी वक्त भाजपा के शासन वाले असम में गरीब मुस्लिम परिवारों को पुलिस सरकारी जमीन से बेदखल कर रही है, और पुलिस गोलियों से लोग मारे गए हैं, और वैसे में पुलिस के साथ गया हुआ एक फोटोग्राफर दम तोड़ते हुए एक लहूलुहान आदमी के सीने पर कूद-कूद कर खुशी मना रहा है। ऐसे वीडियो भारतीय मीडिया के उस हिस्से में भी छाए रहे जो मोटे तौर पर केंद्र सरकार या भाजपा की राज्य सरकारों के बारे में कोई आलोचना करते दिखता नहीं है। असम का वह वीडियो अभी तक टीवी की खबरों से हटा नहीं था, और आज दिल्ली की एक अदालत में इस किस्म की गोलीबारी खबरों पर छा गई है। जिस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में लोगों से मेल-मुलाकात को हिंदुस्तानी टीवी पर एकाधिकार करते देखना चाहते होंगे, उस मौके को असम की भाजपा सरकार की पुलिस ने, और दिल्ली की केंद्र सरकार की पुलिस ने तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब टीवी दर्शकों की बात तो छोड़ ही दें, टीवी समाचार चैनलों की दिलचस्पी भी इन दो गोलीबारी में अधिक हो गई है।

लेकिन हम दिल्ली की अदालत में जज के सामने किए गए इस कत्ल को ही आज का मुद्दा बनाना नहीं चाहते, असम में जो हुआ है उस पर पूरे देश में चर्चा की जरूरत है क्योंकि वहां पर बहुत ही गरीब मुस्लिम लोगों का जिस तरह पुलिस के हाथों मरना हुआ है, और उस पर जिस तरह पुलिस के साथ जड़े हुए फोटोग्राफर ने जख्मी पर कूद-कूद कर खुशी मनाई है, लाठी लिए हुए एक अकेले बेदखल हो रहे गरीब पर जिस तरह दर्जनों पुलिस टूट पड़ी और जाने कितनी ही गोलियां उसे मारी गईं, और मरते हुए या मर चुके कुछ इंसान पर और हमला किया गया, वह सब कुछ वीडियो में बड़ा साफ-साफ दिखता है। देश के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इसे आदिवासी नस्ल को खत्म करने की एक साजिश करार दिया है। हालांकि असम सरकार ने इस मामले की न्यायिक जांच की घोषणा जरूर की है, लेकिन वह वीडियो लोगों का दिल दहला रहा है कि किस तरह पुलिस के ही साथ घूमने वाला, और शायद पुलिस के लिए ही काम करने वाला फोटोग्राफर, एक जख्मी या मुर्दा गरीब के बदन पर चढक़र कूदता है, हो सकता है कि उसमें उस वक़्त जान बाकी रही हो, और उस पर कूदने से उसकी मौत हुई हो। असम का यह मामला दिल्ली के रोहिणी कोर्ट के मामले के मुकाबले अधिक अमानवीय है, अधिक हिंसक है, और दिल्ली की गोलीबारी की आवाज में असम के गरीबों की आवाज दब नहीं जानी चाहिए। इन दोनों मामलों पर आगे बात तो होगी, लेकिन असम में मुस्लिमों के साथ, आदिवासियों के साथ भेदभाव का सिलसिला पिछले कुछ वर्षों से लगातार चले आ रहा है, और इस ताजा वीडियो के बाद उस भेदभाव की तरफ भी दुनिया का ध्यान जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितम्बर 2021

 

पेगासस पर सुप्रीम कोर्ट की विशेषज्ञ तकनीकी कमेटी की साख सरकार से अधिक होगी

23 सितम्बर 2021

 भारत की मोदी सरकार द्वारा पेगासस खुफिया हैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल देश के कुछ प्रमुख और प्रतिष्ठित नागरिकों, पत्रकारों, और नेताओं के खिलाफ किया गया है या नहीं, इसकी जांच अब शुरू होते दिख रही है। राहुल गांधी से लेकर कुछ दूसरे नेताओं तक, चुनाव आयोग के भूतपूर्व सदस्य अशोक लवासा, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के अलावा केंद्र सरकार की बहुत सी नीतियों से असहमत प्रमुख पत्रकारों के फोन पर पेगासस की घुसपैठ की खबरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया की एक जांच में सामने आई हैं। इस बारे में संसद के पिछले सत्र में भी दिल्ली में लगातार विपक्ष ने मांग की थी कि सरकार इस बात पर जवाब दें कि उसने पेगासस का इस्तेमाल किया है या नहीं, लेकिन सरकार ने इस बारे में कोई साफ जवाब नहीं दिया, और वह सीधे शब्दों में जवाब देने से कतराती रही। इसके बाद बहुत से प्रमुख पत्रकार और पत्रकारों के संगठन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जहां उन्होंने अदालत से यह मांग की कि ऐसी घुसपैठ भारत के कानून के भी खिलाफ है, और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के भी खिलाफ है, इसलिए इसकी जांच करवाई जाए। इस पर सरकार सुप्रीम कोर्ट में भी साफ-साफ कुछ कहने से बचती रही, और कई बार टालने के बाद आखिर में जाकर उसने कहा कि क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ मामला है इसलिए वह इस बारे में कोई हलफनामा भी दायर करना नहीं चाहती। हलफनामा अदालत में एक किस्म से पुख्ता बयान देने जैसा हो जाता और उससे बचकर केंद्र सरकार ने बिना कहे हुए ऐसा माहौल बना दिया है कि उसने यह इजराइली घुसपैठिया सॉफ्टवेयर इस्तेमाल किया है।


भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख वकील पी चिदंबरम ने सरकार के अदालत में दिए गए कुछ बयानों को लेकर उनका एक मतलब निकालकर सामने रखा है कि सरकार यह मान चुकी है कि उसने पेगासस का इस्तेमाल किया है। अब सुप्रीम कोर्ट ने आज इस मामले में पिटीशन दायर करने वाले वकीलों में से एक ने कहा है कि अदालत अगले हफ्ते इस मामले की जांच के लिए एक विशेषज्ञ तकनीकी कमेटी बना देगी। इस बारे में सरकार के खिलाफ वकील कहते आये थे कि केंद्र सरकार यह कह जरूर रही है कि वह इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाएगी लेकिन केंद्र सरकार की बनाई कमेटी पर किसी का भरोसा नहीं रहेगा। शायद इसलिए अदालत अब खुद यह कमेटी बनाने जा रही है।


दुनिया भर के प्रमुख प्रकाशनों और उनके पत्रकारों की एक मिली-जुली टीम ने पेगासस की घुसपैठ की जांच की, और उनकी जांच रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में 300 से अधिक लोगों के नाम एक ऐसी संदिग्ध लिस्ट में मिले थे जिनके बारे में ऐसा अंदाज है कि उन्हें जांच के निशाने पर रखा गया, घुसपैठ के निशाने पर रखा गया था। इस बात का जिक्र जरूरी है कि एक फौजी हथियार माने जा रहे इस घुसपैठिया सॉफ्टवेयर को बनाने वाली इजराइली कंपनी ने बार-बार यह साफ कहा है कि वह इसे सिर्फ देशों की सरकारों और उनकी जांच एजेंसियों को बेचती है, वह भी इजराइल की सरकार से इजाजत मिलने के बाद। इस कंपनी ने बार-बार यह कहा है कि वह सरकारी एजेंसियों के अलावा किसी को यह सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है और इसे बेचते हुए इन शर्तों पर दस्तखत करवाए जाते हैं कि इनका इस्तेमाल केवल आतंकवाद और गंभीर अपराधों की रोकथाम के लिए ही किया जाएगा। इस कंपनी के दावे चाहे जो भी हो, दुनिया भर में जगह-जगह जांच के नतीजे यह बताते हैं कि इस हैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल पत्रकारों के खिलाफ, वकीलों के खिलाफ, और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ, कहीं-कहीं किसी देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के खिलाफ भी किया गया है। खरीददार देशों की लिस्ट में भारत का नाम भी बताया जा रहा है, लेकिन न कंपनी ने इसकी पुष्टि की है, और न भारत सरकार।


इस मामले ने खासा वक्त ले लिया। एक तो संसद में सरकार जवाब देने से साफ-साफ कतराते रही, जबकि जब देश के लोगों के मौलिक अधिकारों को कुचलने का आरोप लग रहा था, जब विपक्ष के एक सबसे बड़े नेता राहुल गांधी के फोन में घुसपैठ करने का आरोप लग रहा था, और यह घुसपैठ सरकार के पास पहले से मौजूद टेलीफोन टैप और निगरानी करने के मौजूदा कानूनों से परे, गैरकानूनी तरीकों से करने का आरोप लग रहा था, तब तो सरकार को साफ होकर सामने आने की कोशिश करनी थी, अगर वह सचमुच साफ है तो। ऐसे में चिदंबरम का यह निष्कर्ष सही लगता है कि बार-बार सरकार इस बात का खंडन करने से बचती रही कि उसने इस हैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है या नहीं, जिससे यही साबित होता है कि उसने इसका इस्तेमाल किया है। और जहां तक टेलीफोन को हैक करने की बात है तो देश का संचार निगरानी वाला कानून इसकी इजाजत नहीं देता है, और इसे एक जुर्म करार देता है। ऐसे में यह बात केंद्र सरकार के लिए एक परेशानी की हो सकती है, अगर यह साबित होता है कि उसने कानून के खिलाफ जाकर देश के गैरमुजरिम लोगों के खिलाफ ऐसी घुसपैठ की है, जो कि उनकी निजी जिंदगी में सबसे बड़ी घुसपैठ थी। इस पूरे सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के भी मुख्य न्यायाधीश रहे एक व्यक्ति का नाम आया था कि उसके फोन भी हैक किए गए थे, और उस पर जिस मातहत कर्मचारी ने सेक्स शोषण का आरोप लगाया था, उसके परिवार के कई फोन हैक किए गए थे। यह सारे आरोप बताते हैं कि सांसदों से लेकर जजों तक, और पत्रकारों से लेकर दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों तक के फोन हैक करने का एक शक है। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी हो सकता है कि इस मामले में किसी किनारे तक पहुंच सके।


 आज सुप्रीम कोर्ट से जो खबर आई है, और यह मुख्य न्यायाधीश की जुबानी टिप्पणी से बनी हुई खबर है कि अदालत इस मामले में एक तकनीकी विशेषज्ञ कमेटी बना रही है। लेकिन यह कमेटी किस हद तक जांच करेगी, जांच करेगी या नहीं करेगी, और सरकार कहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ लेकर इस कमेटी से बचने की कोशिश कर सकेगी, ऐसी कई चीजें अभी साफ नहीं हैं। फिर भी सुप्रीम कोर्ट का रुख आज सकारात्मक है, और वह सरकार लुकाछिपी को और अधिक जारी नहीं रहने दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट से जनता के बुनियादी हक के लिए जैसी उम्मीद की जानी चाहिए थी, वह उसे पूरी कर रहा है। अगला हफ्ता बहुत दूर नहीं है, और इस कमेटी के बनने के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि कुछ महीनों के भीतर यह साफ हो जाएगा कि केंद्र सरकार ने अपने नागरिकों के खिलाफ पेगासस का इस्तेमाल किया था या नहीं। वैसे अभी केंद्र सरकार के पास इस मामले को अदालत में और लंबा खींचने के कुछ तरीके शायद ढूंढे जा रहे होंगे और अदालत की बनाई हुई कमेटी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक खतरा साबित करने की कोशिश भी हो सकता है कि की जाए। लेकिन जब संसद में सरकार किसी जवाबदेही से बचती है, जब सुप्रीम कोर्ट को भी जवाब देना नहीं चाहती है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट की बनाई जांच कमेटी ही अकेला जरिया हो सकता था। यह कमेटी केंद्र सरकार की बनाई जा रही किसी जांच कमेटी के मुकाबले तो अधिक विश्वसनीय रहेगी ही।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितम्बर 2021


 

हाथों के काम के लिए दौड़ते पैरों की बात

 22 सितम्बर 2021

  इस मुद्दे पर लिखने को इसलिए सूझता है कि जब-जब सेना की भर्ती की तस्वीरें सामने आती हैं, खुले बदन दौड़ते हुए नौजवान, सीना नपवाते हुए नौजवान दिखते हैं और लगता है कि इनमें से पता नहीं कितने सेना तक पहुंच पाएंगे। उनका अपना भला तो इस नौकरी के मिलने से जितना भी हो, इस प्रदेश या इलाके का भला भी होता है क्योंकि ऐसे एक-एक सैनिक अपने आसपास के लोगों के लिए एक मिसाल भी बनते हैं और सेना को लेकर इलाके में जागरूकता भी आती है। हमारा मोटे तौर पर यह भी मानना रहता है कि सैनिक, बाकी लोगों के मुकाबले नियम-कायदों को कुछ अधिक मानने वाले भी रहते हैं और इनसे उनके आसपास की दुनिया में थोड़ा सा अनुशासन भी आता है। इस बात को गलत करार देने के लिए कुछ लोग सेना के भ्रष्टाचार को गिना सकते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार सभी जगह है और सेना में बाकी जगहों से अधिक है ऐसा हम नहीं मानते।

लेकिन आगे की बात सेना तक सीमित रखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, हम छत्तीसगढ़ के बेरोजगार नौजवानों की बात करना चाहते हैं जो कि हर कुछ महीनों में सेना की भर्ती में दौड़ते दिखते हैं और दौड़ से परे भी उनके कई किस्म के इम्तिहान होते होंगे। यह हमारा एक पसंदीदा मुद्दा है कि किसी भी प्रदेश को अपनी युवा पीढ़ी को किस तरह नौकरी के लिए, आगे की पढ़ाई के मुकाबले के लिए, रोजगार की संभावनाओं के लिए और पेट की जरूरतों से परे भी समाज के बाकी मुकाबलों के लिए कैसे तैयार करना चाहिए। सेना भर्ती की तस्वीरें हमें इस मुद्दे पर कुछ हफ्तों के भीतर एक बार फिर लिखने की बात सुझा रही है। ऐसी दौड़ की तैयारी कितने नौजवान कर पाते होंगे? कितने नौजवान सामान्य ज्ञान, या अंगे्रजी, या कम्प्यूटर, इंटरनेट, व्यक्तित्व जैसी बातों को लेकर मुकाबले के लिए तैयार रहते होंगे? और फिर मुकाबलों से परे भी अपनी-अपनी जिंदगी में पिछले दिन के खुद के मुकाबले आज कितने लोग बेहतर होते होंगे? यह बात बार-बार कचोटती है। हमें लगता है कि जिस तरह छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कुदरत की दी हुई खदानों, जमीनों और यहां के जल-जंगल से कमाई करने की एक दौड़ लगी हुई है, उसी तरह की दौड़ इस प्रदेश के नौजवान इंसानों की ताकत और उनकी संभावनाओं को लेकर क्यों नहीं लगती? इस प्रदेश को प्रकृति ने जितना कुछ दिया है वह तो है ही, लेकिन धरती की संतानें अगर अपनी पूरी क्षमता से धरती की दी गई दौलत में कुछ जोड़ न सकें तो इसे कामयाबी कैसे कहेंगे?

छत्तीसगढ़ बहुत से मोर्चों पर तरक्की कर-करके देश भर में चर्चा में आया हुआ है। लेकिन हमें इस राज्य में ऐसी कोई बात भी सुनाई नहीं देती कि देश और दुनिया के अलग-अलग मुकाबलों के लिए यहां के लोगों को कैसे तैयार किया जाए और उसके लिए मुकाबले की नौबत आने के पहले, किसी मुकाबले को ध्यान में रखे बिना, लोगों में उत्कृष्टता को कैसे बढ़ाया जाए? हम पहले कई बार यहां पर सलाह दे चुके हैं कि राज्य में सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की इमारतों में सुबह-शाम या रात के खाली वक्त में उस इलाके के स्कूल-कॉलेज के बच्चों और बेरोजगार नौजवानों के लिए तरह-तरह का शिक्षण-प्रशिक्षण चलाना चाहिए और इसके लिए सरकार पहल करके, कुछ मदद करके बाकी का काम उस इलाके के लोगों के जनसहयोग से भी कर सकती है। छत्तीसगढ़ की मौजूदा संपन्नता से संतुष्ट होकर सरकार या जनता अगर मोटे तौर पर चुप बैठे रहेंगे, तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संभावनाओं के लिए निरंतर चलने वाले मुकाबलों में छत्तिसगढिय़ा सबसे बढिय़ा साबित नहीं हो पाएंगे। एक पहल बिना देर किए शुरू करने की जरूरत है और अंग्रेजी भाषा से लेकर बोलचाल के सलीके तक, सामान्य ज्ञान से लेकर कम्प्यूटर-इंटरनेट तक, इंटरव्यू का सामना करने से लेकर आवेदन लिखने तक, अनगिनत ऐसी बातें हैं जो छत्तीसगढ़ के दसियों लाख लोगों को सिखाने की जरूरत है। जब ज्ञान फैलता है तो वह इसे पाने वाले लोगों तक सीमित नहीं रहता, वह उनसे उनके इर्द-गिर्द के दूसरे लोगों तक भी पहुंचता है और पूरा का पूरा समाज धीरे-धीरे बेहतर होने लगता है, अधिक काबिल और अधिक कामयाब होने लगता है।

आज छत्तीसगढ़ में बहुत छोटी-छोटी सी, बहुत छोटी तनख्वाह वाली नौकरियों के लिए गलाकाट मुकाबला होता है। लेकिन राज्य के बाहर या देश के बाहर जाकर काम करने वाले लोगों को देखें तो इस राज्य से गिने-चुने लोग ही नजर आते हैं। देश के केरल या पंजाब जैसे राज्यों को देखें तो वहां से बाहर जाकर काम करने वाले और अपने घर-शहर कमाई लाने वाले लोगों के मुकाबले छत्तीसगढ़ कहीं भी नहीं टिकता और जो लोग यहां से बाहर जाकर कमाते हैं वे लगभग सारे के सारे मजदूर दर्जे के लोग हैं। इसलिए सरकार और समाज दोनों को हमारी सलाह है कि इस तस्वीर को बदलने के लिए कोशिश करनी चाहिए, इसके बिना यह राज्य सिर्फ धरती के दिए हुए को ही खाते रह जाएगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 सितम्बर 2021


 

गांवों की छुआ-छूत, महानगरों में अब आर्थिक आधार पर भी

  21 सितम्बर 2021

 हिंदुस्तान के सोशल मीडिया पर अभी किसी इमारत में लिफ्ट के बगल में लगाए गए एक नोटिस की तस्वीर घूम रही है जो कि जाहिर तौर पर किसी हिंदी इलाके का है। अगर वह गैर हिंदी इलाके का होता तो अंग्रेजी के साथ किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखा हुआ होता, लेकिन इसमें हिंदी में लिखा हुआ है कि खाना पहुंचाने के लिए आने वाले लोग लिफ्ट से ऊपर नहीं जा सकते उन्हें सीढिय़ों से जाना है। अब आज भारत के महानगरों में रिहायशी इमारतें भी 25-50 मंजिला होने लगी हैं। यह इमारत कितने मंजिल की है यह तो साफ नहीं है लेकिन बंधुआ मजदूर की तरह काम करने वाले, खाना पहुंचाने वाले लोग क्या खाने का बैग टांगकर हर जगह कई मंजिल पैदल चढक़र जा सकते हैं? और फिर एक सवाल यह भी है कि यह किस किस्म का सामंती मिजाज है जो उसी इमारत में लोगों के लिए खाना लेकर आने वाले लोगों को लिफ्ट की बुनियादी सहूलियत देने से मना कर रहा है? यह ठीक वैसा ही हो गया जैसे बड़ी कारों के पार्किंग के अहाते में किसी कोने में भी मोटरसाइकिल को जाने से रोक दिया जाए, या जैसा कि हिंदुस्तान के बहुत से पांच सितारा होटलों में होता है, ऑटो रिक्शा में पहुंचने वाले लोगों को सडक़ पर उतरना पड़ता है, क्योंकि होटल के दरबान ऑटो रिक्शा को होटल के भीतर पोर्च तक जाने नहीं देते।

जिंदगी में बुनियादी सहूलियत क्या है और ऐशो-आराम की चीजें क्या हैं, इनमें फर्क करना हिंदुस्तान का संपन्न तबका कई बार नहीं कर पाता, या शायद अक्सर नहीं करता। अगर किसी इमारत में वहां बसे हुए लोगों के लिए कोई स्विमिंग पूल बना है, तब तो यह बात हो सकती है कि इमारत में काम करने वाले कर्मचारी उसका इस्तेमाल ना करें। लेकिन वे कर्मचारी लिफ्ट का इस्तेमाल ना करें, कई महानगरों में कई रिहायशी इमारतों में ऐसे नोटिस भी लगे रहते हैं कि काम करने वाले लोग लिफ्ट से ना आए-जाएं। यह सिलसिला समाज के भीतर कमाई के आधार पर एक बहुत ही घटिया किस्म के भेदभाव का है जिसमें इंसानों को इंसान नहीं माना जाता, और जिन लोगों को चर्बी हटाने की जरूरत है वे लोग सीढ़ी से आने-जाने के बजाय लिफ्ट से आते जाते हैं, और जो गरीब मजदूर काम करके वैसे भी थके हुए रहते हैं, उन्हें लिफ्ट में चढऩे को मना कर दिया जाता है। यह बात बताती है कि हिंदुस्तान में किसी छोटे तबके में अतिसंपन्नता तो आ गई है, लेकिन सभ्यता उन्हें छू भी नहीं गई है। दुनिया में जो सभ्य समाज हैं वहां पर इस किस्म का कोई भेदभाव नहीं रहता। कुछ बरस पहले जब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, तो उनकी एक तस्वीर आई थी जिसमें वे राष्ट्रपति भवन के गलियारे में चलते हुए एक सफाई कर्मचारी से हाथ टकराते हुए और उसका अभिवादन करते हुए दिखते हैं। हिंदुस्तान में राष्ट्रपति अगर निकलने को हों तो सफाई कर्मचारी उनके सामने भी शायद नहीं पड़ सकेंगे। कई जगहों पर तो कम तनख्वाह वाले कर्मचारियों को दीवार की तरफ मुंह करके खड़ा रहने के लिए कह दिया जाता है, जब उनके मालिक या कोई ताकतवर व्यक्ति गलियारे से निकलते हैं।

हिंदुस्तान में मुगल खत्म हो गए, अंग्रेज आकर चले गए, देश में लोकतंत्र आए पौन सदी का वक्त हो गया, लेकिन लोगों का मिजाज अभी तक सामंती बना हुआ है। हर हफ्ते-पखवाड़े में देश में कहीं ना कहीं से किसी नेता की बिगड़ैल औलाद का या खुद नेता का ऐसा वीडियो सामने आता है जिसमें वे कहीं टोल टैक्स कर्मचारी को पीट रहे हैं तो कहीं पेट्रोल पंप कर्मचारी को कहीं ट्रैफिक पुलिस से मारपीट कर रहे हैं तो कहीं किसी और सरकारी कर्मचारी को धमका रहे हैं कि जानते नहीं हो कि मैं कौन हूँ? देश तो आजाद हो गया है लेकिन लोगों के दिमाग में अपनी ताकत और दूसरों की गुलामी की बात इतने गहरे बैठी हुई है कि वह निकलने को तैयार नहीं है। फिर इस देश में जो प्रचलित धर्म है उनमें से अधिकतर में लोगों की बराबरी की कोई गुंजाइश नहीं है। जाति व्यवस्था कायम रहती है, धर्म का अपना ढांचा हावी रहता है। और मजे की बात यह है कि अभी पंजाब में एक दलित सिख को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया है, उस पंजाब में दलित आबादी 30 फ़ीसदी है, इस तरफ भी लोगों का ध्यान नहीं था, उस पंजाब में यह पहला दलित मुख्यमंत्री बना है, यह बात भी लोगों को हैरान कर रही है। यह पूरा सिलसिला लोगों को पहली बार यह जानकारी दे रहा है कि सिखों के बीच भी एक जाति व्यवस्था कायम है वरना गुरुद्वारे में एक साथ बैठकर खाने की परंपरा को देखते हुए पंजाब के बाहर के गैर सिख लोग यह मान बैठे थे कि सिखों में कोई जाति व्यवस्था है ही नहीं।

भारत में अब जाति व्यवस्था बड़े शहरों में कुछ हद तक घट रही है, तो वहां पर गरीब कामगार और अमीर मालिक के बीच की एक नई व्यवस्था कायम हो रही है जिसमें कुछ लोग खाना पहुंचाने वाले लोगों से मारपीट भी करते दिखते हैं, और जैसा कि यह नोटिस कई इमारतों में लगा हुआ है, उससे भी जाहिर है कि उनकी सेवा करने वाले लोगों को भी लोग इंसान का दर्जा देने से इनकार करते हैं। अगर सफाई कर्मचारी कूड़े का या गंदगी का कोई डिब्बा लेकर लिफ्ट में साथ में जाए, तो भी हो सकता है कि एक बार लोगों को वह खटके, लेकिन बैग में बंद खाना लेकर अगर कोई कर्मचारी लिफ्ट से जा रहा है, तो उसमें भी लोगों को आपत्ति है, जो कि जाहिर तौर पर उस व्यक्ति के गरीब होने को लेकर है कि इतना गरीब कामगार कैसे उसी लिफ्ट में सवार होकर जा सकता है, जिसमें कि महंगे फ्लैट के मालिक ऊपर-नीचे आते-जाते हैं। हमारा ख्याल है कि चाहे ये रिहायशी इमारतें निजी क्यों न हों, ऐसे नोटिस के खिलाफ उन प्रदेशों के मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी करना चाहिए, और ऐसे प्रतिबंध को गैरकानूनी करार देना चाहिए क्योंकि किसी से ऐसी मेहनत करवाना जिसकी कि कोई जरूरत नहीं है, और जो बिल्डिंग में कानूनी रूप से लगाई जाने वाली अनिवार्य सहूलियत हैं, उनके इस्तेमाल से लोगों को रोकने के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 सितम्बर 2021


 

...दुनिया आगे कहाँ जा रही है, और हिंदुस्तान कई सदी पीछे

 20 सितम्बर 2021

 अभी एक ब्रिटिश टेनिस खिलाड़ी एमा राडुकानू ने यूएस ओपन टूर्नामेंट जीता तो वह लंबे अरसे के बाद दुनिया का कोई ग्रैंड स्लैम टाइटल जीतने वाली ब्रिटिश महिला खिलाड़ी बनी। इसके पहले ग्रैंड स्लैम सिंगल्स टाइटल 1977 में ब्रिटेन की वर्जीनिया वेड ने विंबलडन जीतकर हासिल किया था और उसके बाद का यह लंबा फासला ब्रिटेन की महिला टेनिस खिलाडिय़ों के लिए बड़े इंतजार का था। लेकिन एमा की जीत की खुशी कई जगह मनाई जा सकती है, वह टोरंटो में पैदा हुई थी तो वह जन्म से कनाडा की नागरिक है। उसके पिता रोमानिया से आकर कनाडा में बसे थे, और उसकी मां चीन से आकर वहां बसी थी, और वहीं उसके पिता से मिली थी। वह जन्म के बाद जल्द ही ब्रिटेन आकर बस गई थी और उसकी पढ़ाई-लिखाई यहीं पर हुई। इस तरह उसके पास इन दोनों देशों की नागरिकता है। वह अपनी मां के जन्म के देश चीन की मंडारिन भाषा बखूबी बोलती है। अब कोई अगर यह सोचे कि वह कहां की है, तो यह सोचना मुश्किल है। उसकी इस जीत के बाद वह जिस तरह खबरों में आई, तो उससे कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी लिखा कि उसे लाखों चीनी अपना आदर्श मान रहे हैं, और रोमानिया में भी उसकी जीत की खुशियां मनाई जा रही हैं, कनाडा और ब्रिटेन तो खुश हैं ही।

लेकिन इस एक खिलाड़ी की जीत से यूरोप के कई लोगों के बीच में यह चर्चा शुरू हो रही है कि देशों की सरहदें किसके काम आती हैं, और किसका आगे बढऩा उससे रुकता है? मां किसी देश की, बाप किसी देश का, पैदा किसी देश में हुए, और पढ़े किसी और देश में। आज दुनिया के जिन देशों में लोग धर्म को लेकर, जाति को लेकर लड़े पड़े हैं, जहां पर नफरत का बोलबाला है, ऐसे हिंदुस्तान जैसे देश क्या अगली सदी में भी इस किस्म की उदारता के बारे में सोच पाएंगे? आज एक धर्म की लडक़ी दूसरे धर्म के लडक़े से किसी रेस्तरां में मिल रही है तो उसे उत्तर प्रदेश में खुलेआम पीटा जा रहा है, अगर लडक़ी ने दूसरी जाति में शादी कर ली तो लडक़ी के घरवाले जाकर लडक़े को मार डाल रहे हैं, और जरूरत रहे तो अपनी लडक़ी को भी मार रहे हैं। कहीं लडक़ी के प्रेमी को घर पर बुलाकर उसे पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया जा रहा है और छत से नीचे फेंक दिया जा रहा है। आज दुनिया के दो अलग-अलग हिस्से दो अलग-अलग युगों में जी रहे हैं। यह फर्क महज एक सदी का हो ऐसा भी नहीं है, कई सदियों का फर्क है, और एक जगह नफरत का बोलबाला है, और दूसरी जगह कामयाबी का।

आज जिन देशों में लोगों के सिर पर धर्म की नफरत, राष्ट्रीयता की नफरत, रंग की नफरत नहीं रहती, उन देशों में लोग अपनी पूरी क्षमता के आसमान पर पहुंच सकते हैं और अपनी संभावनाओं का पूरा फायदा उस देश को दे सकते हैं। अमेरिका इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल है क्योंकि वहां नौजवान पीढ़ी को तकरीबन तमाम बातों में एक बराबरी का मौका मिलता है, और हिंदुस्तान में जिन बातों को लेकर वैलेंटाइन डे पर लोगों को मारा जाता है, जबरदस्ती राखी बंधवाई जाती है, ऐसे कोई सामाजिक तनाव वहां की नौजवान पीढ़ी पर नहीं रहते, और वह अपनी पूरी संभावनाओं का इस्तेमाल कर पाती है। जब समाज में एक समानता और सद्भावना का माहौल रहता है तो वहां आगे बढ़ते हुए लोग अलग दिखते हैं। शायद कई दूसरी वजहों के साथ-साथ हिंदुस्तान के खेल में पिछडऩे की, कारोबार या दूसरी प्रतिभाओं में पिछडऩे की एक बड़ी वजह यह भी है कि यहां नौजवान पीढ़ी के दिमाग से तनाव कम नहीं होता, और कुंठा बढ़ती चली जाती है। वे न अपनी मर्जी से शादी कर सकते, न अपनी अपनी मर्जी से किसी के साथ उठ बैठ सकते, न मर्जी का खा सकते, न मर्जी का पहन सकते। ऐसे में तनाव और कुंठा से भरी हुई नौजवान पीढ़ी के आगे बढऩे की संभावनाएं बड़ी सीमित रहती हैं। और अब तो इस देश में विज्ञान के नाम पर जो ‘वैदिक’ अवैज्ञानिक बातें पढ़ाई जा रही हैं, बढ़ाई जा रही हैं, वे सब नौजवान पीढ़ी को एक ऐसी अंधेरी सुरंग में धकेल रही हैं, जहां से बाहर निकलने का रास्ता जल्द मिलने वाला नहीं है।

जो हिंदुस्तानी नौजवान दुनिया के दूसरे देशों में जाते हैं और अपनी क्षमताओं को साबित करते हैं, दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के मुखिया हो जाते हैं और कामयाब रहते हैं, उनकी कामयाबी का हिंदुस्तान से लेना-देना कम रहता है, यहां के पढ़े-लिखे से लेना-देना कम रहता है, उसका अधिक लेना-देना उन देशों में काम करने की परिस्थितियों और रहने-जीने की परिस्थितियों से अधिक रहता है। वहां पर जिस तरह भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखल के बिना वे कारोबार कर सकते हैं, वहां वे जिस तरह बिना किसी डर के अपनी राजनीतिक पसंद के पक्ष में काम कर सकते हैं, हिंदुस्तान में वैसा करने का सोच भी नहीं सकते। इसलिए जब लोगों की राजनीतिक और लोकतांत्रिक भावनाओं को डरा कर रखा जाता है, दहशत में रखा जाता है, तो उससे उनका व्यक्तित्व भी प्रभावित होता है और वे अपनी संभावनाओं को कहीं छू नहीं पाते। दुनिया में राष्ट्रीयता, रंग, नस्ल, सेक्स, इन सबसे परे जिस तरह लोग आगे बढ़ते हैं, हिंदुस्तान शायद अगली सदी में भी उस तरह की कामयाबी नहीं पा सकेगा क्योंकि हमारी सोच बड़ी तेजी से कुछ सदी पीछे ले जाई जा रही है। आज के मुद्दों से, आज की दिक्कतों से निपटने और कल की संभावनाओं के लिए ठोस काम करना एक बड़ा मुश्किल काम है, एक नामौजूद काल्पनिक इतिहास को लेकर कीर्तन करना एक अधिक आसान काम है, और वैसे कीर्तन में हिलने के लिए हिंदुस्तान में सिरों की कोई कमी तो है नहीं।

(Daily Chhattisgarh)

अमरीका का एक छोटा जज सैकड़ों टीवी चैनलों पर, करोड़ों दर्शक! क्या भारत के लिए एक मिसाल है ?

  19 सितम्बर 2021

 भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने कर्नाटक के एक जज को श्रद्धांजलि देने के कार्यक्रम में देश की न्याय व्यवस्था को लेकर फिक्र जाहिर की और कहा कि यह अंग्रेजों के दौर से चली आ रही व्यवस्था है, जिसके भारतीयकरण की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की समस्याओं पर अदालतों की वर्तमान कार्यशैली कहीं से भी फिट नहीं बैठती है। उन्होंने कहा कि गुलामी के समय की न्याय व्यवस्था चली आ रही है और अदालतों में अंग्रेजी में कानूनी कार्रवाई चलती है जिसे ग्रामीण या और लोग नहीं समझ पाते, इसलिए भी किसी केस पर उनके अधिक पैसे खर्च होते हैं। उनका कहना है कि न्यायपालिका का काम ऐसा होना चाहिए कि आम आदमी को कोर्ट और जज से किसी भी तरह का डर नहीं लगे।

जस्टिस एनवी रमना लगातार कई किस्म की सकारात्मक बातें कर रहे हैं, और अदालत में भी उनका रुख सरकार के हिमायती किसी जज का न होकर जनता के हित का दिखता है, और ऐसा साफ नजर आता है कि वह सरकार का चेहरा देखकर ठकुरसुहाती के अंदाज में बातें नहीं करते हैं। वे सरकार से कड़े सवाल करके जवाब-तलब करने में नहीं हिचकते हैं। इसलिए उनकी बातों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए क्योंकि पिछले कई वर्षों में सुप्रीम कोर्ट में ऐसा कम ही हुआ है कि मुख्य न्यायाधीश जनता के हितों के पक्षधर दिखे हैं, और सरकार को खुश करने की कोई नीयत उनकी नहीं दिखी है। लेकिन जिस जज को श्रद्धांजलि देने के लिए वे पहुंचे थे उस जज की कई खूबियों को भी उन्होंने गिनाया और हम उस बारे में भी आज इस कॉलम में लिखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर एक ऐसे असाधारण जज थे, जो बहुत काबिल भी थे लेकिन वे दयालु थे और उदार थे। जस्टिस रमना ने बताया कि किस तरह उन दोनों ने किसी बेंच पर एक साथ रहते हुए कई महत्वपूर्ण मामलों में फैसले लिए थे, जिनमें मौत की सजा पाए हुए दोषियों के मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी शामिल रहा।

जस्टिस रमना की कही हुई इन बातों से परे भी भारत की न्यायपालिका में बहुत सारी चीजें हैं जिनमें सुधार की जरूरत है, और हो सकता है कि देश के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए वे इस मामले में दखल दे सकें, और चीजों को बेहतर बना सकें। चूँकि उन्होंने अंग्रेजों के समय की छोड़ी गई गुलामी के दिनों की परंपराओं को लेकर यह चर्चा की है, इसलिए यह याद रखना जरूरी है कि हिंदुस्तान के अधिकतर हिस्सों में साल के अधिकतर महीनों में गर्मी रहती है, और अदालतों के कमरे, खासकर छोटी अदालतों के, जिला अदालतों के कमरे, वकीलों के चैम्बर, अदालतों गलियारे,  एयर कंडीशंड नहीं रहते हैं। ऐसे में वकीलों और जजों को काले कोट कर पहनकर काम करने के लिए कहना एक बड़ी ज्यादती रहती है। बहुत से गरीब वकील जिनके पास सिर्फ एक कोट रहता है वे अपने काले कोट पर पसीने के दाग लिए हुए काम करते हैं, क्योंकि वे रोज उसे धुलवा भी नहीं सकते।

इससे परे एक दूसरी चीज यह है कि निचली अदालतों में तो हमारे देखने की यह आम बात है कि जजों के ठीक सामने बैठे हुए उनके बाबू किसी तारीख को बढ़ाने के लिए या कोई भी रियायत ना चाहने वाले गवाह या वादी, प्रतिवादी किसी के भी आने पर वहां उसकी हाजिरी भी लगाने के लिए नगद रिश्वत लेते हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन जजों की नजर में यह न आता हो। ऐसे में यह मानने की कोई वजह नहीं है कि ऐसी रिश्वत में उन जजों का हिस्सा नहीं रहता। देश के मुख्य न्यायाधीश गरीब और ग्रामीण लोगों को अदालतों में होने वाली तकलीफ की बात करते हैं तो यह तो एक बहुत बड़ी तकलीफ है जो कि अधिकतर प्रदेशों की निचली अदालतों में खुलकर सामने दिखती है। ऐसा नगद रिश्वत का लेन-देन भी अगर कोई जज अपनी आंखों के सामने नहीं रोक पाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट को, और मुख्य न्यायाधीश को इस बारे में सोचना चाहिए।

अदालतों से दहशत की एक बड़ी वजह यह भी है कि कई वकील वादी, प्रतिवादी को बुरी तरह निचोड़ लेते हैं और अदालतों के बाबू तो उनकी हालत खराब कर ही देते हैं। निचली या ऊपर की हर किस्म की अदालतों में जजों के भ्रष्ट होने की आशंका बहुत से लोग समय-समय पर जाहिर करते आए हैं और लोगों को याद होगा कि किस तरह देश के कानून मंत्री रहे हुए शांति भूषण और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण ने एक वक्त सुप्रीम कोर्ट के आधा दर्जन से अधिक जजों के भ्रष्ट होने का आरोप लगाया था। अदालत ने उन पर अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाया था, उन पर कई तरह से दबाव डाला गया था कि वे माफी मांगें, ताकि इस मामले को खत्म किया जा सके, और बाप-बेटे ने किसी भी माफी मांगने से इंकार कर दिया था। लेकिन उनकी बात का नैतिक दबाव इतना था कि शायद अदालत ने आज तक उस मामले का निपटारा ही नहीं किया है, और ऐसा सच आरोप लगाने वाले शांति भूषण और प्रशांत भूषण को सजा देने की हिम्मत शायद अदालत की नहीं पड़ी, और वह मामला अभी तक खड़ा हुआ है। अगर अदालतों में वकीलों से चर्चा की जाए, और अलग-अलग किस्म के अलग-अलग दर्जे के बहुत से वकीलों से चर्चा की जाए, तो यह साफ पता लग जाता है कि कितने जज रिश्वत नहीं लेते हैं। कुछ मौके ऐसे भी आए हैं जब किसी एक हाईकोर्ट के कई वकीलों से चर्चा करने पर यह भी सुनने मिला कि वहां एक भी जज के ईमानदार होने की उन्हें कोई खबर नहीं है। अब अगर देश के मुख्य न्यायाधीश अदालतों को जनता के प्रति दोस्ताना बनाना चाहते हैं, अदालतों की दहशत खत्म करना चाहते हैं, तो भ्रष्टाचार तो एक बहुत ही ठोस मुद्दा है जो कि एक जुर्म भी है, और सजा के लायक जुर्म है। इसलिए उन्हें सबसे पहले न्यायपालिका से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक अभियान चलाना चाहिए। हमारा ऐसा मानना है कि इसके लिए एक मौलिक सूझबूझ की जरूरत भी पड़ेगी क्योंकि यह इतना संगठित काम हो चुका है, इसकी जड़ें इतनी गहरी बैठ चुकी हैं, कि कोई एक मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल में इसे पूरी तरह से खत्म तो नहीं कर सकते, लेकिन किसी भी बात का समाधान उस दिन शुरू होता है जिस दिन उस समस्या के अस्तित्व को मान लिया जाए। इसलिए हम चाहते हैं कि देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में और अधिक खुलकर बोलें, और अधिक खुलकर चर्चा करें। न्यायपालिका और वकीलों के बीच में इस बात को लेकर एक विचार विमर्श शुरू हो कि भ्रष्टाचार को कैसे खत्म, या कम किया जा सकता है। उनकी इस बात से हम सहमत हैं कि अदालत के नाम से ही आम लोगों के मन में दहशत आ जाती है। जो मुजरिम हैं वहीं अदालत में सबसे अधिक आत्मविश्वास से और सबसे अधिक बेफिक्री से घूमते हैं।

भारत की न्यायपालिका को लेकर एक बात जिसे सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बिना किसी नीतिगत फैसले के एक मामूली आदेश से ही सुधार सकते हैं। आज भारत की बड़ी अदालतों में जजों के लिए योर ऑनर, या मी लॉर्ड जैसे सामंती शब्दों का इस्तेमाल चल रहा है जो कि अंग्रेजों के समय से शुरू हुआ है। या सिलसिला पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और एक इंसान और दूसरे इंसान के बीच में दर्जे का इतना बड़ा फासला खड़ा कर देता है कि नीचे खड़े हुए लोग दहशत में आ ही जाते हैं। इसलिए अदालत की भाषा से ये अलोकतांत्रिक शब्द पूरी तरह से खत्म करना चाहिए। देश के मुख्य न्यायाधीश को यह भी देखना चाहिए कि अभी कुछ बरस पहले प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने पर राष्ट्रपति के लिए संबोधन में महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवा दिया था, जो कि पूरी तरह से अंग्रेजी राज के सामंतवाद का एक प्रतीक था। इसके बाद देश के बहुत से राज भवनों में भी राज्यपाल के लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल बंद हुआ, और अगर कहीं चल रहा होगा तो उसकी जानकारी अभी हमको नहीं है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जजों के काले लबादे, जजों के लिए अलग किस्म के राजसी पोशाक वाले चपरासी, इन सब का सिलसिला खत्म करना चाहिए। जजों को अधिक से अधिक इंसान की तरह रहना चाहिए ताकि बाकी इंसान उनसे दहशत ना खाएं।

इस सिलसिले में हमको एक शानदार मिसाल याद पड़ती है जो कि हिंदुस्तान के जजों को थोड़ा सा आहत भी कर सकती है। लेकिन जब कभी हम सुधार की बात करेंगे तो कुछ ना कुछ लोग तो आहत होंगे ही। अमेरिका के एक राज्य रोड आइलैंड में प्रोविडेंस नाम की जगह पर एक म्युनिसिपल कोर्ट के एक जज हैं जिनका नाम फ्रैंक कैप्रियो है। दिलचस्प बात यह है यह स्थानीय अदालत मोटे तौर पर ट्रैफिक के चालान का निपटारा करती है, और यहां तक वही लोग आते हैं जो लोग ट्रैफिक पुलिस, या स्थानीय पार्किंग अधिकारियों के किए गए चालान का जुर्माना जमा नहीं करते हैं, और इस अदालत तक पहुंचते हैं। अब इस छोटी सी अदालत के बारे में हमको जानकारी ऐसे मिली कि इस अदालत की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण अमेरिका में होता है और भारत के लोगों के लिए यह बात अकल्पनीय हो सकती है कि एक स्थानीय म्युनिसिपल कोर्ट के ट्रैफिक मामलों के निपटारे को देखने के लिए अमेरिका में करोड़ों लोग अलग-अलग टीवी चैनलों पर इसका प्रसारण देखते हैं। अमेरिका के सैकड़ों टीवी चैनल अपने-अपने इलाके में इस अदालत की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण करते हैं और वहां के किसी भी दूसरे लोकप्रिय टीवी प्रोग्राम के मुकाबले फ्रैंक कैप्रियो के निपटारे को देखने वाले दर्शक कम नहीं हैं।

अब इस जज की कार्रवाई देखें तो वे सबसे पहले वहां पहुंचने वाले, चालान पाए हुए लोगों की बेचैनी, घबराहट, और उनके डर को खत्म करते हैं। उनसे दोस्ताना लहजे में बात करते हैं, उनका नाम पूछते हैं, उनका काम पूछते हैं, उनके साथ आए हुए बच्चों या बड़ों से उनका रिश्ता समझते हैं, और अक्सर ही साथ आए हुए बच्चों को ऊपर जज के स्टेज पर बुलाकर उनसे दोस्ती करते हैं, उनको पूरा मामला समझाकर उनसे राय लेते कि उनके परिवार के व्यक्ति से कितना जुर्माना लिया जाए या जुर्माना न लेकर क्या उसे छोड़ दिया जाए? वे उन हालात को समझते हैं जिनमें किसी से ट्रैफिक नियमों के खिलाफ गाड़ी चलाना हो गया है, या गलत जगह पर गाड़ी पार्क करना हो गया है। उनकी वजह को समझकर, उनके काम को समझकर समाज में उनके योगदान को समझकर, या उन पर परिवार के असाधारण बोझ को जानकर वे कई मामलों में जुर्माने से माफी दे देते हैं, और लोगों को हंसी-खुशी वापस रवाना कर देते हैं। कई मामलों में जहां उनको जुर्माना जरूरी लगता है लेकिन यह समझ आता है कि चालान पाने वाले लोग जुर्माना पटाने की हालत में ही नहीं है, वे बेरोजगार हैं, या उन पर बच्चों का और बीमारों का बहुत बोझ है, तो वे दुनिया भर से उनके पास पहुंचने वाले मदद के दान का इस्तेमाल करते हैं, और दानदाता का नाम पढ़ कर उनके भेजे गए चेक से वह जुर्माना जमा करवाते हुए, गरीब या बेबस लोगों को जुर्माने से बरी कर देते हैं, और भेज देते हैं।

जज फ्रैंक कैप्रियो के अदालती वीडियो 2017 में डेढ़ करोड़ लोगों ने देखे थे 2020 में वह बढक़र तीन करोड़ हो गए और यूट्यूब पर उनके वीडियो 4।30 करोड़ से ज्यादा लोग देख चुके हैं, और आगे बढ़ा चुके हैं। उनकी हंसमुख शक्ल में जज की कुर्सी पर बैठा हुआ एक ऐसा इंसान लोगों को दिखता है, जो किसी के किए हुए मामूली ट्रैफिक गलत काम को देखने के साथ-साथ उनकी स्थितियों को समझता है, परिस्थितियों को समझता है, उनकी बेबसी-मजबूरी को समझते हुए उसका बहुत ही मानवीय आधार पर निपटारा करता है। मैंने खुद ने पिछले कुछ महीनों में उनके सैकड़ों ऐसे प्रसारण देखे हैं जो कि फेसबुक पर भी मौजूद हैं, और यूट्यूब पर भी। इनको देख कर लगता है कि एक अदालत में भी कितनी इंसानियत हो सकती है, और अदालत में कटघरे में खड़े किए गए लोगों को भी किस तरह से इंसान समझा जा सकता है, और उनके दुख-दर्द में हाथ बंटाया जा सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश या भारत के दूसरे जजों को इस प्रसारण को देखने की सलाह उन्हें अपना अपमान भी लग सकता है, लेकिन हर जज दिन में कुछ मिनट तो कम से कम टीवी पर कुछ ना कुछ देखते होंगे, तो इसे एक फिल्मी कहानी मानकर ही देख लें, इसे हमारी नसीहत मानकर ना देखें, इसे अपने ऊपर कोई नैतिक दबाव मानकर न देखें, और इसे देखने के बाद अगर उन्हें ठीक लगे तो वे सोचें कि जिस बात को आज भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा है, क्या उस बात के साथ अमेरिका की छोटी सी म्युनिसिपल अदालत का कोई तालमेल उन्हें दिखता है?

पिछले कई महीनों से मैं इस कॉलम में इस अदालत के बारे में लिखना चाह रहा था, और इसे भारत की न्यायपालिका के लिए एक मिसाल बनाकर भी सामने रखना चाह रहा था। वह लिखना हो नहीं पाया था लेकिन अभी जिस तरह से भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अपनी भावना सामने रखी है, और हमारा ऐसा मानना है कि देश के मुख्य न्यायाधीश की भावना अदालत के फैसलों को काफी दूर तक प्रभावित भी कर सकती है, इसलिए देखें कि क्या अमेरिका की एक म्युनिसिपल कोर्ट का एक जज जो कि अमेरिका से बाहर भी करोड़ों लोगों का दिल जीत चुका है, क्या वह भारत की न्यायपालिका को भी सोचने का कुछ सामान दे सकता है?

दीवारों पर लिक्खा है, 19 सितम्बर 2021


 

यह अमरिंदर की नहीं कांग्रेस हाईकमान की बुरी शिकस्त है

    19 सितम्बर 2021

  पूरे हिंदुस्तान में कल से कांग्रेस पार्टी एक नए मखौल का सामान बन गई है। पंजाब में मुख्यमंत्री को जिस अंदाज में, अपमान के साथ हटाया गया है, और अभी कल ही भाजपा से आए हुए नवजोत सिंह सिद्धू को पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया, और फिर जिस तरह उनके हमलावर बयान आए कि उनके मर्जी से सब कुछ नहीं किया जाएगा तो वह सब कुछ तबाह कर देंगे, और मानो उनकी ही मर्जी से कांग्रेस के एक सबसे सीनियर नेता और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को अपमानित करके कुर्सी से हटने के लिए मजबूर किया गया, उसने कांग्रेस पार्टी की पूरे देश में थू थू कर दी। खासकर तब, जब पिछले कुछ महीनों में एक के बाद दूसरे भाजपा मुख्यमंत्री बिना किसी हंगामे के, बिना किसी विरोध के हटा दिए गए, और मनचाहे मुख्यमंत्री बना दिए गए, पार्टी के बाहर किसी को कानों-कान कोई खबर नहीं हुई, ऐसे माहौल में कांग्रेस की यह हालत उसकी रही-सही साख को चौपट करने वाली है। यह बात इसलिए भी कांग्रेस के लिए अधिक फिक्र की है कि देश में उसके पास गिने-चुने राज्य रह गए हैं, और पंजाब के अलावा कम से कम दो और ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस में मुख्यमंत्री को लेकर एक गंभीर स्थानीय चुनौती खड़ी हुई है। राजस्थान में पिछले एक दो बरस से सचिन पायलट की अगुवाई में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ एक अभियान चल ही रहा है। बीच में तो ऐसी नौबत थी कि राजस्थान के कांग्रेस विधायकों का एक हिस्सा कई दिन तक हरियाणा के किसी रिसॉर्ट में पड़े रहा, देश में ऐसी भी अफवाह रही कि कांग्रेस खुद ही अपने विधायकों को खरीदकर वापस ले गई और किसी तरह सरकार को बचाया। अब पंजाब की इस उथल-पुथल को देखें तो छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उन्हें बेदखल करके मुख्यमंत्री बनने का दावा करने वाले टीएस सिंहदेव के बीच चले आ रहे तनाव को पंजाब के इस हालात से बढ़ावा ही मिलेगा। कांग्रेस के पास इन राज्यों को अगले चुनाव में खोने के बाद देश में कुछ भी नहीं बचेगा और उसके बाद हो सकता है कि यह पार्टी बिना किसी अध्यक्ष के भी जिंदा रह सके।

कांग्रेस की दिक्कतें कम नहीं है। पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ा और जिस तरह वे एक सार्वजनिक जिद पर अड़े रहे कि अगला अध्यक्ष सोनिया परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को बनाया जाए, उन्होंने अपने-आपको अध्यक्ष पद से अलग कर दिया, लेकिन हालत यह है कि पार्टी के सारे मामले घूम-फिर कर उनके पास ही पहुंचते हैं। वे बंद कमरों में पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण मामलों पर बैठक करते हैं। उनके बिना पार्टी का गुजारा नहीं है, लेकिन वे किसी ओहदे पर नहीं है और वे पार्टी संगठन के भीतर एक संविधानेतर सत्ता बने हुए हैं। जिम्मेदारी कुछ नहीं, अधिकार पूरे के पूरे। कांग्रेस और भाजपा के साथ यह एक बात दिलचस्प है कि भाजपा के फैसलों को लेकर कई बार यह चर्चा होती है कि यह संघ परिवार ने तय किया, और संघ परिवार ने करवाया, और संघ प्रमुख की मर्जी से ऐसा हुआ। जबकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने आप को एक गैरराजनीतिक संगठन कहता है, और यह भी कहता है कि उसका भाजपा से कोई लेना देना नहीं है। ठीक वैसे ही राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन कांग्रेस में जो कुछ और होता है वह उनकी मर्जी से होता है। अब इन दो संस्थाओं की संविधानेतर सत्ता की और तो कोई तुलना नहीं है सिवाय इसके कि ये दो पार्टियां मोटे तौर पर इनके फैसलों के मुताबिक ही चलती हैं, वरना एक सांस्कृतिक संगठन से एक राजनीतिक संगठन के संगठन मंत्री अनिवार्य रूप से क्यों इंपोर्ट किए जाते हैं?

कांग्रेस पार्टी के दिक्कत महज पंजाब को लेकर या राजस्थान और छत्तीसगढ़ को लेकर नहीं है, यह दिक्कत एक पार्टी संगठन की दिक्कत है जिसमें जो अध्यक्ष बनना नहीं चाहते उन्हीं को पार्टी के अधिकतर लोग अध्यक्ष बनाने पर आमादा हैं, ऐसे में पार्टी में जिम्मेदारी किसकी है, और अधिकार किसके पास हैं, इस पर धुंध छाई हुई है। कल पंजाब के मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि राहुल गांधी से पिछले 2 साल में उनकी मुलाकात नहीं हुई। अब सवाल यह है कि जिसकी मर्जी के बिना कांग्रेस में पत्ता नहीं हिल सकता, वह अपने पिता के वक्त से कांग्रेस का एक बड़ा नेता रहे हुए एक बुजुर्ग कांग्रेस मुख्यमंत्री से दो 2 बरस तक मिलना न चाहे, तो ऐसे में पार्टी का क्या हाल होगा? हमारा किसी प्रदेश के किसी एक नेता से कोई लेना देना नहीं है लेकिन अगर उनके प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार है, तो यह तो होना चाहिए कि वहां के जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर कांग्रेस पार्टी वक्त पर सोच-विचार कर ले और वक्त रहते फैसला कर ले।

कल हिंदुस्तान के राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात पर कांग्रेस की समझ पर बड़ा अफसोस जाहिर किया कि अब जब पंजाब में चुनाव को कुछ ही महीने बाकी रह गए हैं, तब जाकर मुख्यमंत्री को हटाया गया है। अगर हटाना ही था तो पहले हटा देना था। दूसरी बात जो कैप्टन अमरिंदर सिंह के मामले में तो सामने नहीं आई, लेकिन भाजपा के कुछ मुख्यमंत्रियों को हटाने के मामले में जरूर सामने आई कि वे अपने-अपने प्रदेशों में कुछ अधिक ताकतवर हो रहे थे, इसलिए भाजपा हाईकमान ने उन्हें हटाकर ऐसे लोगों को बिठाया जो कि हाईकमान के कहे, बनाए ही नेता बने हैं, जिनका अपना जनाधार कम है। कांग्रेस पार्टी दशकों से इस बात के लिए बदनाम रहते आई है कि वह अपने किसी क्षेत्रीय नेता को कभी इतना मजबूत नहीं होने देती कि वह हाईकमान के सामने रीढ़ की हड्डी सीधी करके खड़े हो सकें। कमोबेश वैसा ही हाल अब भाजपा में हो चला है क्योंकि भाजपा के ढेर सारे नेता कांग्रेस से वहां पहुंचे हैं और भाजपा को यह समझ आ गया है कि कांग्रेस को हराने के लिए कांग्रेस की संस्कृति को अपनाना, और कांग्रेस के लोगों को अपनाना, दोनों ही जरूरी है। इसलिए एक वक्त के नरेंद्र मोदी सरीखे मजबूत मुख्यमंत्री आज भाजपा में नहीं रहने दिए जा रहे हैं, क्योंकि पार्टी की केंद्रीय सत्ता ऐसे मजबूत मुख्यमंत्रियों को राजधर्म  नहीं सिखा पाएगी। अब लोगों का अंदाज भी है कि भाजपा का निशाना उसके अपने किस अगले मुख्यमंत्री पर होगा।

कांग्रेस की बात पर लौटें, पार्टी अपनी बुनियाद होते जा रही है और नेहरू-गांधी की विरासत का नाम लेकर वह अब किसी वार्ड का चुनाव भी नहीं जीत सकती। देश में नरेंद्र मोदी ने एक नए दर्जे की राजनीति, और राजनीति में नई ऊंचाई की मेहनत को पेश कर दिया है। एक ओवरटाइम करने वाले प्रधानमंत्री के मुकाबले एक पार्ट टाइम पार्टी अध्यक्ष की कोई गुंजाइश भारत की चुनावी राजनीति में नहीं है। कांग्रेस जब अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्तर का विवाद नहीं सुलझा पा रही है, राज्यों के मुख्यमंत्रियों का विवाद क्या सुलझा सकेगी। इसलिए कांग्रेस की यह शर्मनाक नौबत उसके केंद्रीय नेतृत्व की घोर असफलता से उपजी हुई है, उसके लिए तसल्ली की यही बात हो सकती है कि अब खोने को कुल दो-तीन प्रदेश ही बचे हैं। कांग्रेस के लोगों को यही राहत हो सकती है कि पार्टी लीडरशिप का यही हाल जारी रहा तो भी उसे दो तीन राज्यों से अधिक का नुकसान नहीं होगा। अब कांग्रेस का जो भी बदहाल हो वह भाजपा के राज्य तो खो नहीं सकती, और अपने राज्य उसके घरेलू कलह और हाईकमान की अनदेखी के शिकार हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 सितम्बर 2021


 

बदनसीब की स्मृतियों को ही महज संतानों का कन्धा!

    18 सितम्बर 2021

  बिहार से बड़ी दिलचस्प खबर आ रही है कि रामविलास पासवान की पहली बरसी निपटते ही उनके बेटे चिराग पासवान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चि_ी लिखकर अनुरोध किया है कि वे केंद्र सरकार से सिफारिश करें कि रामविलास पासवान को भारत रत्न दिया जाए। इसके अलावा उन्होंने यह भी अपील की है कि रामविलास पासवान की जयंती को राजकीय अवकाश घोषित किया जाए। जैसा कि होता है, चिराग पासवान ने अपने पिता को महिमामंडित करते हुए बहुत सी बातें लिखी हैं, और साथ-साथ बहुत सी मांगें भी रखी हैं कि पटना में और हर जिला मुख्यालय में रामविलास पासवान की प्रतिमा स्थापित की जाए। इसके पहले दिल्ली में रामविलास पासवान के जीते जी जो सरकारी बंगला उनके पास था, उसमें चिराग पासवान ने उनकी एक प्रतिमा स्थापित कर ही दी है, और उसके साथ ही उनकी यह हसरत भी दिखती है कि वह बंगला रामविलास पासवान की स्मृति में चिराग पासवान के पास रहने दिया जाए।

यह एक बड़ी ही तकलीफदेह नौबत है जब रामविलास पासवान के गुजरने के बाद उनके नाम का झंडा लेकर अकेले उनके बेटे चल रहे हैं। जिंदगी भर जिसने राजनीति में समय लगाया, उसने अपने जीते-जी अपनी पार्टी की अपनी सारी विरासत अपने बेटे को ही देकर जाना तय किया, और शायद उसी वजह से भी यह नौबत आई है कि किसी और को यह नहीं लग रहा कि उन्हें भी पासवान की स्मृति में कुछ करना चाहिए। ऐसी नौबत किसी की जिंदगी में ना आए वही बेहतर है, कि उनकी स्मृतियों को लेकर उनकी संतानें ही कार्यक्रम करें, उनके नाम पर स्मृति ग्रंथ निकालें, परिवार ही उनकी स्मृति में व्याख्यानमाला रखें, पुरस्कार और सम्मान स्थापित करे। और यह तो एक अलग दर्जे का मामला है जिसमें रामविलास पासवान का बेटा उनके लिए भारत रत्न की मांग कर रहा है। जिंदगी में जो व्यक्ति सचमुच महान होते हैं या कोई महत्वपूर्ण काम छोड़ कर जाते हैं, वे कम से कम अपने समर्थकों, प्रशंसकों, अनुयायियों, और भक्तों का इतना तबका तो छोडक़र जाते हैं कि उनके जाने के बाद परिवार से परे बाहर के कुछ लोग उनके नाम को जप सकें। लेकिन वे लोग सहानुभूति के हकदार रहते हैं, हमदर्दी के हकदार रहते हैं, जिनके नामलेवा उनके कुनबे के लोग ही रह जाते हैं उसके बाहर कोई नहीं रह जाते।

वैसे भी हम तो राजकीय सम्मानों के खिलाफ लिखते आए हैं, और किसी को भी सरकार सम्मानित करे, उसके खिलाफ हम लोगों को समझाते हैं। फिर भारत रत्न जैसी उपाधि तो हमेशा विवादों से घिरी रही है क्योंकि रात-दिन कारोबारी इश्तहार करने वाले सचिन तेंदुलकर जैसे कम उम्र को भारत रत्न मिल गया है, और हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ओलिंपिक मेडल लेकर आने वाले ध्यानचंद के नाम पर यह सोचा भी नहीं गया। इसलिए जिन लोगों को भारत रत्न सम्मान की बात लगती है, वे अपने मन में किसी हीन भावना के शिकार रहने वाले लोग हैं ताकि उन्हें सरकारी सम्मान अच्छा लगता है। वोटों को पाकर सरकार में आने वाले, और सरकार में रहते हुए आगे वोट पाने की कोशिश करने वाले लोग भला किस तरह से किसी सम्मान का ईमानदार फैसला कर सकते हैं? दुनिया में सम्मान देने का हक सरकारों से परे, राजनीतिक दलों से परे, ऐसे निर्विवाद संगठनों और संस्थाओं का काम होना चाहिए, जो बहुत ही भरोसेमंद निर्णायक मंडल के साथ, बहुत ही पारदर्शी तरीके से इसका फैसला कर सकें। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो नोबेल पुरस्कार को ऐसा ही सम्मानजनक माना जा सकता है जिसे कोई किसी दबाव से हासिल कर ले ऐसा सुना नहीं गया है। फिर एक बात यह भी है कि जब-जब रामविलास पासवान को अधिक महान साबित करने की कोशिश होगी, लोगों को यह भी याद आते रहेगा कि उनको मजाक में भारतीय राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था, जो कि यह अंदाज लगा लेते थे कि अगली सरकार कौन सी आने वाली है और वे विचारधाराविहीन अंदाज में किसी भी सत्तारूढ़ हो संगठन का हिस्सा बनने के लिए तैयार रहते थे, और तकरीबन तमाम सरकारें उनके साथ ही बनती थीं। किसी के बारे में अगर अप्रिय बातों को शुरू करवाना हो, तो उसके सम्मान की चर्चा छेड़ देनी चाहिए ,और लोग तुरंत इस बात को उधेडऩे लगते हैं कि कौन-कौन सी बातों की वजह से वे व्यक्ति ऐसे सम्मान के हकदार नहीं हैं।

हमारा ख्याल है कि चिराग पासवान, रामविलास पासवान की रही-सही स्मृतियों को बर्बाद कर रहे हैं। वे जिस बिहार के एक सबसे बड़े नेता रहे हैं, उस बिहार में जिला मुख्यालयों में पासवान की प्रतिमा स्थापित करने के लिए अगर सरकार से अपील करने की नौबत आ गई है तो इसका मतलब है कि पासवान ने अपनी कोई विरासत नहीं छोड़ी है, उनके कोई समर्थक नहीं हैं,  और उनके अपने गृह राज्य में भी उनकी कोई जमीन नहीं है। इसी तरह सरकारी बंगले में कब्जा करने की नीयत से पासवान की प्रतिमा स्थापित करना एक खराब नीयत की बात है और चिराग पासवान इससे अपनी भी इज्जत खराब कर रहे हैं। यह भी है कि पिछले चुनाव में जिस नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग पासवान ने बहुत ही निचले दर्जे की आग उगली थी। उसी नीतीश कुमार से आज अपने पिता की स्मृति को आगे बढ़ाने की अपील करना राजनीतिक रूप से एक नाजायज बात है। कम से कम इतना तो सोचना चाहिए था कि अभी-अभी रामविलास पासवान की बरसी पर नीतीश कुमार को बुलाने के लिए जब चिराग पासवान कोशिश करते रहे तो उनको मुख्यमंत्री से मिलने का समय भी नहीं दिया गया और मुख्यमंत्री इस बरसी पर आए भी नहीं। ऐसे रुख के बाद ऐसी अपील, चिराग पासवान की नासमझी साबित करती है, और यह पूरा सिलसिला बहुत ही बदमजा है।

 किसी व्यक्ति के गुजरने पर उसका परिवार ही उसकी महानता साबित करने में लगा रहे यह शर्मनाक नौबत है, इससे और चाहे कुछ भी साबित हो जाए, कम से कम यह तो साबित तो हो ही जाता है कि गुजरने वाले व्यक्ति महान नहीं थे, इसीलिए उनकी स्मृतियों को चार कंधा देने के लिए घर के चार लोगों के अलावा और कोई नहीं मिल रहे हैं। ऐसी नौबत से सभी इज्जतदार लोगों को बचना चाहिए लेकिन इज्जतदार हैं कौन यह तो लोग खुद ही साबित करते हैं। (Daily Chhattisgarh)