आग कहीं और लगी हुई है, लेकिन बाकी लोग भी अपने घर सम्हाल लें
31मार्च 2022
रूस और यूक्रेन के बीच जो जंग चल रही है
उसके चलते योरप के बाकी देश और अमरीका कई तरह से और कई वजहों से फिक्रमंद
हैं। एक तो उन्हें गैस और तेल की सप्लाई मुश्किल में पड़ते दिख रही है
जिसकी वजह से इन देशों को उस सऊदी अरब से बात करनी पड़ रही है जिससे वे
अनबोला रखना चाहते थे क्योंकि उसने अपने एक पत्रकार का कत्ल करवाया था, और
मानवाधिकारों का हनन कर रहा है। दूसरी तरफ उन्हें ईरान के साथ नरमी बरतनी
पड़ रही है क्योंकि वे रूस के मुकाबले ईरान का तेल बाजार में चाहते हैं, और
इसके लिए उन्हें कई आर्थिक प्रतिबंध हटाने पड़ सकते हैं। लेकिन यूक्रेन से
निकलने वाले दसियों लाख शरणार्थियों के लिए भी पड़ोस के देशों को जगह
बनानी पड़ रही है जो कि आसान नहीं है। अमरीका ने भी एक लाख यूक्रेनी
शरणार्थियों को जगह देने की घोषणा की है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच
पश्चिम के देशों को यूक्रेन का साथ सीमित हद तक देने के बावजूद रूस से एक
असीमित खतरा है, और इसकी तरफ से हर रूस विरोधी देश चौकन्ना रहना चाहता है,
लेकिन यह उतना आसान भी नहीं है।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि आने वाले वक्त की जंग सरहदों पर हथियारों से लडऩे के बजाय एक साइबर जंग भी हो सकती है जिससे कि कुछ कम्प्यूटरों पर बैठे हुए लोग दुनिया के किसी भी देश के तमाम सरकारी और सार्वजनिक इंतजाम तबाह कर सकते हैं। इस तरह की तबाही के कुछ नमूने हॉलीवुड की फिल्मों में दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उससे परे असल जिंदगी में भी ऐसे साइबर हमले होते आए हैं, और कोई वजह नहीं है कि रूस और चीन जैसी काबिल साइबर ताकतें वक्त आने पर अपने विरोधी और दुश्मन देशों को साइबर अटैक से तबाह करने की कोशिश न करें। आज यह माना जा रहा है कि चूंकि अमरीका और योरप के देशों ने रूस पर बहुत से आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं तो रूस के घोषित और अघोषित साइबर हैकर इन देशों में तबाही ला सकते हैं। रूस के हैकर पहले भी यूक्रेन पर ऐसे हमले करते आए हैं, और कभी वहां पर बिजली का इंतजाम चौपट कर देते हैं, तो कभी कुछ और। यूक्रेन पर किए गए ऐसे ही एक और रूसी हमले से एक तबाही वाला सॉफ्टवेयर दुनिया भर में फैल गया था, और उससे लाखों कम्प्यूटरों को नुकसान हुआ था, कामकाज और कारोबार चौपट हुआ था। ऐसे ही एक साइबर हमले की वजह से अमरीका में तेल की पाईप लाईन बंद करनी पड़ी थी, और अमरीका के कई राज्यों में इमरजेंसी घोषित करनी पड़ी थी, पेट्रोल पंपों पर अफरा-तफरी मच गई थी। दुनिया भर में कई तरह के साइबर जुर्म करने वाले मुजरिम रूस में बसे हुए हैं, और वे सरकार के साथ मिलकर, या फिर सरकार की अनदेखी से वहां काम करते हैं, और दुनिया भर से वसूली करते हैं। अब पश्चिम की सरकारों को यह आशंका है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन रूस के साइबर मुजरिमों को पश्चिमी सरकारों और सुविधाओं पर हमला करने को कह सकते हैं।
हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि सरहद पर हथियारों से एक हद तक ही नुकसान पहुंचाया जा सकता है, और अगर कम्प्यूटर हैकरों में काबिलीयत है तो वे अपने घर बैठे दुनिया भर में जहां चाहें वहां सार्वजनिक सुविधाओं को खत्म कर सकते हैं, सरकारी कामकाज ठप्प कर सकते हैं। हमारी तरह की साधारण समझबूझ रखने वाले लोगों को भी यह दिखता है कि अगर इंटरनेट और संचार कंपनियों के कम्प्यूटरों को कोई ठप्प कर दे, तो हिन्दुस्तान जैसे देश के हजारों काम ठप्प हो जाएंगे। ट्रेन और प्लेन की बुकिंग और आवाजाही खत्म हो जाएगी, बैंक, एटीएम और क्रेडिट कार्ड काम करना बंद कर देंगे, बिजलीघर ठप्प हो जाएंगे, और वित्तीय संस्थान, मेडिकल जांच, और कई किस्म के इलाज खत्म हो जाएंगे। अब तक दुनिया के सामने इतनी बड़ी तबाही करने की कोई वजह थी नहीं, लेकिन आज जब रूस और पश्चिमी देशों के टकराव को तीसरे विश्व युद्ध की आशंका लाने वाला माना जा रहा है, तब ऐसे साइबर युद्ध की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। अमरीका ने अभी एक-दो बरस के भीतर ही ऐसा साइबर हमला देखा था कि उसके पानी साफ करने के कारखानों में मिलाया जाने वाला केमिकल साइबर अटैक से बढ़ा दिया गया था, और वह जानलेवा साबित हो सकता था। अभी से 13-14 महीने पहले फ्लोरिडा में हुए ऐसे एक हमले में एक साइबर घुसपैठिये ने अमरीकी जल संयंत्र पर कब्जा कर लिया था, और रसायन की मात्रा बदल दी थी।
पश्चिम के देश भारत के भी मुकाबले कम्प्यूटर और इंटरनेट के अधिक मोहताज हैं, और उनका रोज का कामकाज इन्हीं से चलता है। हॉलीवुड की एक एक्शन फिल्म में साइबर हैकरों का एक गिरोह एकाएक शहरी ट्रैफिक सिग्नलों को चारों तरफ हरा कर देता है, और पल भर में चारों तरफ गाडिय़ां एक पर एक चढ़ जाती हैं, और आवाजाही पूरी तरह बंद हो जाती है। इसी तरह कहीं बांध के गेट खोल दिए जा सकते हैं, या बिजली की सप्लाई बढ़ाई जा सकती है जिससे कि पूरी ग्रिड ठप्प पड़ जाए। अमरीका और योरप के देशों का साइबर सुरक्षा इंतजाम भारत के मुकाबले बहुत बेहतर है, लेकिन आज पश्चिम की आशंका को देखते हुए भारत जैसे देश को यह समझना चाहिए कि चीन की तरह की साइबर आर्मी के रहते हुए वह अपने कमजोर इंतजामात पर कितने चैन से सो सकता है? आग कहीं और लगी हुई है, लेकिन बाकी लोगों को भी अपने घर सम्हाल लेने चाहिए।
सबसे साफ दिखते शहरों का राज उतना साफ नहीं
30 मार्च 2022
हिन्दुस्तान में शहरों की सफाई एक बड़ा
मुद्दा है, और किसी शहर के विकसित होने का एक बड़ा पैमाना भी है। केन्द्र
सरकार देश भर के शहरों के बीच मुकाबला करवाती है, और पिछले बरसों में
मध्यप्रदेश का इंदौर ऐसे कई मुकाबले जीत चुका है। छत्तीसगढ़ की राजधानी
रायपुर जैसे शहर को देखें तो शहर के भीतर ही उसके अलग-अलग हिस्से अलग-अलग
साफ या गंदे दिखते हैं। मोटेतौर पर तो पूरा शहर एक ही म्युनिसिपल के तहत
आता है, लेकिन अलग-अलग वार्ड के निर्वाचित पार्षद अपनी अधिक और असाधारण
कोशिशों से अपने इलाके को अधिक साफ रख पाते हैं। इसमें संपन्न इलाकों में
जनभागीदारी से भी खर्च जुटा लिया जाता है, और दिन भर सफाई चलती रहती है,
गाडिय़ां दौड़ती रहती हैं। शहरों में ऐसे कुछ सक्रिय पार्षदों वाले इलाकों
में इतने अधिक सफाई कर्मचारी काम करते दिखते हैं कि इन इलाकों में रहने
वाले लोग अपने घर-दुकान के सामने मनचाहा कचरा फेंक सकते हैं, वह साफ होते
रहता है। इसके साथ-साथ अगर सुबह की सैर पर निकलने वाले लोग कचरे और सफाई के
इस सिलसिले को ध्यान से देखें तो समझ पड़ता है कि घरों से निकलने वाला
कचरा छांटकर अलग नहीं किया जाता, और हर तरह के कचरे को एक साथ मिलाकर फेंक
दिया जाता है, या कचरा गाड़ी के लिए रख दिया जाता है। आम लोग इस कचरे को
नाली में भी फेंक देते हैं, जहां से इसे निकालना सफाई कर्मचारियों के लिए
भी बड़ी मशक्कत का काम रहता है, और वे बड़ी नालियों या गटर में डूब-डूबकर
भी ऐसा कचरा निकालते हैं, और इसमें कई बार कई कर्मचारियों की मौत भी होती
है।
यह सिलसिला सिरे से गलत है कि वोट देने वाली जनता की इतनी चापलूसी की जाए कि वह मनचाही गंदगी मनचाहे तरीके से फैलाती रहे, और वार्ड का पार्षद या म्युनिसिपल उसे साफ करते रहें। वोट पाने के लिए लोगों की आदत इतनी बिगाडक़र उनके तलुए सहलाने का सिलसिला ठीक नहीं है। पार्षद तो आते-जाते रहते हैं लेकिन जनता की आदत पीढ़ी-दर-पीढ़ी खराब होते चलती है जो कि धरती के सीने पर बोझ बढ़ाते रहती है। हिन्दुस्तान की अधिकतर म्युनिसिपल अपने रहवासियों की आदत सुधारने की जहमत उठाना नहीं चाहती क्योंकि वह अलोकप्रिय काम हो जाएगा, उसके बजाय सफाई कर्मचारियों और गाडिय़ों को बढ़ाकर कचरा उठाना उन्हें ज्यादा आसान लगता है। लेकिन यह बात वैज्ञानिक तथ्य है कि अगर घर, दुकान, हॉस्टल, अस्पताल जैसी जगहों से निकलने वाला कचरा अगर उसी जगह पर छांटकर अलग कर दिया जाता है, तो उसे ढोना भी आसान है, उसका निपटारा भी आसान है, और उसका तरह-तरह का उत्पादक इस्तेमाल भी हो सकता है। यह कचरा उसी शहर की कमाई बढ़ाने में इस्तेमाल हो सकता है, बजाय इसे महंगे खर्च से उठाने, और निपटाने के। दक्षिण भारत के कुछ म्युनिसिपलों ने कचरे को अलग करके सार्वजनिक जगह पर अलग-अलग डालना अपने नागरिकों की ही जिम्मेदारी बना दी है। शुरुआती प्रतिरोध के बाद लोग इसके आदी हो गए हैं, और म्युनिसिपल कचरे से कमाई कर रहे हैं, सफाई पर कोई खर्च नहीं कर रहे। देश में अव्वल आने वाले इंदौर जैसे शहर में सफाई पर बड़ी रकम खर्च होती है, और चूंकि कामयाब कारोबार वाले शहरों की कमाई खूब होती है, इसलिए वहां कचरे और सफाई पर अनुपातहीन खर्च भी लोगों को खटकता नहीं है।
लेकिन यह पूरा सिलसिला इस बात पर टिका हुआ है कि स्थानीय संस्थाओं के पास कचरे के निपटारे के लिए अंधाधुंध पैसा हमेशा ही बने रहेगा, और इससे भी बड़ी बात समाज का यह भरोसा है कि सफाई कर्मचारी हमेशा ही गंदगी ढोने के लिए, नालियों में उतरने के लिए, और घर-घर जाकर कचरा लाने के लिए तैयार रहेंगे, हासिल रहेंगे। क्या कोई यह सोच सकते हैं कि आमतौर पर दलित दबके से आने वाले सफाई कर्मचारियों ने अगर यह काम करना बंद कर दिया, तो हिन्दुस्तान जैसा देश अपने कचरे को लेकर क्या करेगा? हफ्ते भर के भीतर हर शहर की हर नाली बंद हो चुकी रहेगी, और हर मोड़ कचरे से पट जाएगी। फिर हफ्ते भर के बाद क्या होगा? कोई महामारी फैलना शुरू होगी, और जिस तरह गुजरात के सूरत में एक वक्त प्लेग फैला था, उस तरह की कई बीमारियां लोगों को मारना शुरू कर देंगी। आज लोग जिन सफाई कर्मचारियों को देखना भी पसंद नहीं करते हैं, उन्हीं की वजह से आज हिन्दुस्तान जैसा देश रोजाना देखने लायक बचा हुआ है। लेकिन सामाजिक बेइंसाफी के इस सिलसिले पर टिकी हुई शहरी व्यवस्था जायज नहीं है। सफाई कर्मचारियों का तबका गुलाम नहीं है कि उसकी मर्जी के खिलाफ उससे काम लिया जा सके। और अगर यह तबका सफाई करना बंद कर देगा, कचरा ले जाना और नाली-गटर साफ करना बंद कर देगा, तो देश में इस काम के लिए और तो कोई तबका है नहीं।
सामाजिक न्याय के हिसाब से तो यह बात बेहतर होगी अगर पूरे देश के सफाई कर्मचारी एक हफ्ते की हड़ताल कर दें। लोगों को उनकी जरूरत भी समझ आ जाएगी, और अपने इर्द-गिर्द कचरा देखने के बाद जब उन्हें कचरे को छांटने और निपटारे में भागीदारी सिखाई जाएगी, तो शायद उनके लिए सीखना आसान होगा। आज जहां कचरा पैदा हो रहा है वहीं पर उसे छांटने का सबसे सस्ता और सबसे आसान काम वोटरों की चापलूसी करने के लिए अनदेखा किया जा रहा है, और लोगों की आदतें बिगाडक़र रखी जा रही हैं। यह सिलसिला तुरंत बंद करना चाहिए। लोग महज एक छोटा सा सफाई-शुल्क देकर धरती पर मिलेजुले कचरे का बोझ इस तरह बढ़ाते रहें यह ठीक नहीं है। शहरी सफाई अपने नागरिकों को जागरूक बनाए बिना महज खर्च करके करना ठीक नहीं है। यह जागरूकता न लाकर स्थानीय नेता अपनी महानता और कामयाबी साबित करते हैं, यह बुनियादी तौर पर एक गलत बात है, और नागरिकों को गैरजिम्मेदार बनाना पूरे भविष्य को खराब करना है।
एक बारीक फर्क जिसकी समझ न होने से ऑस्कर का स्वाद कड़वा हो गया..
29 मार्च 2022
कल अमरीका के सबसे बड़े फिल्म अवार्ड
समारोह, ऑस्कर, में एक अभूतपूर्व घटना हुई जब मंच संचालन कर रहे एक
कॉमेडियन क्रिस रॉक ने सामने बैठी एक अभिनेत्री जेडा पिंकेट स्मिथ के बालों
को लेकर एक मजाक किया, जो कि एक गंभीर बीमारी से गुजर रही है, और उस
बीमारी की वजह से उसे अपना सिर मुंडाना पड़ा है, और यह बात उसने सोशल
मीडिया पर खुलासे से लिखी हुई भी है। जैसा कि किसी कॉमेडियन की कही अधिकतर
जायज और नाजायज बातों के साथ होता है, इस बात पर भी जेडा के अभिनेता पति
विल स्मिथ सहित तमाम लोग हॅंस पड़े, सिवाय जेडा के। और इसके बाद पत्नी का
चेहरा देखने पर शायद विल स्मिथ को भी कॉमेडियन की, और खुद की चूक समझ आई,
और फिर उसने गुस्से में मंच पर पहुंचकर क्रिस रॉक को जोरों से एक थप्पड़
मारा, और वापिस आकर बैठ गया। इसके बाद भी वह वहां बैठकर क्रिस रॉक के लिए
गालियां कहते रहा। यह एक बड़ा अजीब संयोग था कि इसके तुरंत बाद विल स्मिथ
को अपने लंबे अभिनय जीवन का पहला ऑस्कर पुरस्कार मिला, और उसे लेते हुए
उसने तमाम लोगों से एक आम माफी मांगते हुए जिंदगी में परिवार के महत्व के
बारे में बहुत सी बातें कहीं। दरअसल टेनिस खिलाड़ी बहनों वीनस और सेरेना
विलियम्स की जिंदगी पर बनी इस फिल्म में विल स्मिथ ने इनके पिता का किरदार
किया है, और वह किरदार भी परिवार को महत्व देने वाला है। नतीजतन इस अभिनय
के लिए ऑस्कर लेते हुए विल स्मिथ ने न सिर्फ विलियम्स परिवार के संदर्भ में
महत्व की बात कही, बल्कि अपनी बीमारी से गुजर रही पत्नी के मजबूरी में हटे
बालों की तकलीफ की तरफ भी इशारा किया।
खैर, यह बात तो उस वक्त आई-गई हो गई, लेकिन जैसा कि दुनिया में समझदार लोगों को करना चाहिए, कल ही विल स्मिथ और क्रिस रॉक दोनों ने सोशल मीडिया पर अपनी गलतियां मानीं, एक-दूसरे परिवार से भी माफी मांगी, और बाकी तमाम लोगों से भी। क्रिस रॉक ने अपनी इस दुविधा का भी बखान किया कि किस तरह एक कॉमेडियन के लिए कई बार सीमा तय करना मुश्किल हो जाता है, और किस तरह उन्होंने यह सीमा लांघी जिससे कि उनके दोस्तों को तकलीफ हुई और उनकी अपनी साख भी चौपट हुई। उन्होंने यह भी मंजूर किया कि जो लोग अपनी जिंदगी में तकलीफ से गुजर रहे हैं, उन पर कोई मजाक बनाना कॉमेडी नहीं होता। इसी तरह विल स्मिथ ने भी अपने सार्वजनिक बयान में यह कहा कि जब उनकी पत्नी की बीमारी की दिक्कत का मजाक उड़ाया गया तो वे बर्दाश्त नहीं कर पाए, और भावनाओं में उन्होंने ऐसा काम किया। उन्होंने क्रिस और बाकी तमाम लोगों से अपनी गलती मानते हुए माफी मांगी है।
इस मुद्दे पर अधिक लिखने की जरूरत इसलिए नहीं रह गई थी कि इन दोनों के बयान आज खबरों में वैसे भी आ जाएंगे, और तमाम लोगों को कुछ सबक मिल जाएगा। लेकिन हम इस पर एक दूसरी वजह से लिखना चाहते हैं कि हिन्दुस्तान में कॉमेडी के नाम पर जिस तरह की सामाजिक बेइंसाफी होती है, उस बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए। हिन्दुस्तान में ऐतिहासिक कामयाबी वाला कॉमेडी शो, कपिल शर्मा देखकर तमाम लोग हॅंसते हैं, लेकिन उसमें जिस तरह की बेइंसाफी होती है, उस बारे में शायद ही किसी का ध्यान जाता है। अपने शो के अपने से कम कामयाब या मशहूर हास्य कलाकारों के बारे में कपिल शर्मा का हिकारत भरा बर्ताव देखा जाए, तो वह एक स्थायी शैली है। दूसरी तरफ कार्यक्रम में आमंत्रित बड़े सितारों की चापलूसी भी उतनी ही स्थायी शैली है। आधे लोगों की चापलूसी और आधे लोगों को दुत्कारना, यह बताता है कि ताकतवर और कमजोर के साथ बर्ताव में कैसा फर्क किया जाता है। इससे परे भी देखा जाए कि भिखारियों के लिए, गरीब, बेघर और भूखों के लिए जिस तरह की जुबान कपिल शर्मा और उनका शो इस्तेमाल करते हैं, तो वह किसी भी चेतना संपन्न और संवेदनशील व्यक्ति को सदमा पहुंचा सकता है, पहुंचाता होगा, यह एक और बात है कि सार्वजनिक रूप से कोई मशहूर कामयाबी के खिलाफ लिखते नहीं हैं, बोलते नहीं हैं। बहुत पुरानी बात चली आ रही है कि कामयाबी से बहस नहीं होती, इसलिए कपिल शर्मा जब अपने शो में कई बार भिखारियों की नकल करते हुए अपनी उंगलियां मोडक़र ऐसा दिखाते हैं कि मानो किसी कुष्ठ रोगी की गली हुई उंगलियां हों, तो आम हिन्दुस्तानी को इससे कोई तकलीफ नहीं होती, और किसी कुष्ठ रोगी की तो कोई जुबान हो नहीं सकती। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में सत्ता और ताकत का मजाक उड़ाने वाले कॉमेडियन को जगह-जगह पुलिस रिपोर्ट का सामना करना पड़ता है, उनके कार्यक्रम लगातार रद्द होते हैं, और लोकतंत्र उन्हें कैमरे के सामने से और मंच पर से अलग ही कर देता है।
यहां यह भी समझने की जरूरत है कि हास्य और व्यंग्य में एक बुनियादी फर्क होता है। हास्य तो बिना किसी सामाजिक जिम्मेदारी के, बिना किसी सामाजिक सरोकार के किया जा सकता है, लेकिन व्यंग्य के लिए जिम्मेदारी और सामाजिक सरोकार दोनों जरूरी होते हैं। लोकप्रिय मंचों पर हर कॉमेडियन को व्यंग्यकार मान लेना भी ज्यादती होगी क्योंकि बहुत से कॉमेडियन सिर्फ हास्य के लिए पहुंचते हैं, बहुत से हास्य कवियों की तरह। उनसे व्यंग्य की तरह की जिम्मेदारी की उम्मीद कुछ अधिक ही बड़ी हो जाएगी। ऑस्कर समारोह में कल एक गैरजिम्मेदार हास्य ने सबके मुंह का स्वाद कड़वा कर दिया, ऐसे हास्य की जगह अगर जिम्मेदार व्यंग्य होता, तो वह किसी की बीमारी की खिल्ली नहीं उड़ाता। इस बारीक फर्क को हिन्दुस्तान में भी लोगों को समझना चाहिए, और फूहड़ हास्य कलाकार, फूहड़ हास्य कवि को व्यंग्य का दर्जा देना बंद करना चाहिए।
भुतहा-उड़ानों से पुरानी साड़ी से बने झोलों तक
28 मार्च 2022
धरती की बात करें तो कारोबार से अधिक हिंसक
कोई और तबका नहीं हो सकता। महज आज के मुनाफे के लिए कारोबार सारे सरोकार
अनदेखे करके धरती का कितना भी नुकसान कर सकता है। इसके बाद कारोबार से होने
वाली टैक्स और रिश्वत, दोनों किस्म की कमाई के चलते सरकार का हाल भी
कारोबार जैसा ही हो जाता है, और वह भी पूरी तरह बेफिक्र हो जाती है,
सामाजिक सरोकारों के प्रति। इसकी एक बड़ी मिसाल अभी सामने आई जब ब्रिटिश
अखबार गार्डियन ने यह रिपोर्ट छापी कि किस तरह कोरोना और लॉकडाऊन के इस
पूरे दौर में ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों से भुतहा-उड़ानें
आती-जाती रहीं। भुतहा उड़ानों का मतलब जिनमें कोई असल मुसाफिर नहीं चलते,
विमान या तो सिर्फ पायलट और सेवक-दल के गिने-चुने लोगों को लेकर आते-जाते
हैं, या मजबूरी में दस फीसदी से कम मुसाफिर होने पर भी उड़ान भरते हैं।
सरकार ने अखबार की मांगी जानकारी देने से आखिर तक मना किया, इसके बाद चतुर
संवाददाता ने एक ब्रिटिश सांसद को पकडक़र उससे संसद में सरकार से जानकारी
मंगवाई, संसद के नियमों के मुताबिक सरकार मना नहीं कर सकती थी, और वहां उसे
बताना पड़ा कि किस तरह लॉकडाऊन के दौर में ब्रिटिश हवाई अड्डों से 15 हजार
से अधिक अंतरराष्ट्रीय भुतहा-उड़ानें आई-गईं। अब हवाई कंपनियों को ऐसा
इसलिए करना पड़ा क्योंकि हवाई अड्डों पर विमानों के उडऩे और उतरने के लिए
जो समय तय रहता है, उस वक्त का अगर 80 फीसदी से ज्यादा इस्तेमाल नहीं होता
है तो उनके लिए तय किया गया वह समय खारिज हो जाता है। अपने टाईम स्लॉट को
बचाने के लिए विमान कंपनियों को वहां से विमान उड़ाने पड़ते हैं और वहां
उतारने पड़ते हैं, फिर चाहे वे पूरी तरह से खाली ही क्यों न हों। लोगों को
याद होगा कि ऐसी ही कुछ उड़ानों की तस्वीरें लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट करते
हैं कि वे दो देशों के बीच की उड़ान में अकेले मुसाफिर थे।
अब
दिक्कत यह है कि ऐसी भुतहा-उड़ानों से एयरलाईंस को जो नुकसान होना है उसे
एयरलाईंस जानें, उनसे अधिक नुकसान धरती का होता है जो कि हवाई जहाजों से
होने वाले प्रदूषण से आज वैसे ही लदी हुई है। दुनिया में आज सफर का सबसे
नुकसानदेह तरीका हवाई जहाज हैं जिनसे धरती पर कार्बन का बोझ बहुत बढ़ रहा
है। पर्यावरण की फिक्र करने वाले वैज्ञानिक और आंदोलनकारी वैसे भी हवाई सफर
के दूसरे विकल्प तलाशने और सुझाने में लगे हुए हैं ताकि कम प्रदूषण के साथ
सफर हो सके। योरप जैसे अधिक हवाई यातायात वाले इलाके में खूब रेलगाडिय़ां
भी हैं, लेकिन वे हवाई सफर से महंगी हैं, और सस्ते सफर की वजह से लोग प्लेन
में ही अधिक चलते हैं। ऐसे में व्यस्त हवाई अड्डों पर टाईम स्लॉट की खूब
मारमारी रहती है, और एयरलाईंस के बीच अधिक लोकप्रिय समय पर उडऩे और उतरने
का टाईम पाने के लिए गलाकाट मुकाबला चलता है। यह बात सरकारी या निजी सभी
किस्म के एयरपोर्ट के लिए भी एक कारोबारी मजबूरी की हो सकती है कि विमान
उडऩे और उतरने से उन्हें एयरलाईंस से जो फीस मिलती है, उसे पाने के लिए
विमानों की आवाजाही जरूरी है। लेकिन ब्रिटेन जैसा एक विकसित और पुराना
लोकतंत्र भी, जहां पर कि मजबूत सरकारी व्यवस्था है, वह भी सरकारी और
कारोबारी नियमों की ऐसी कोई काट क्यों नहीं ढूंढ पाया कि बिना भुतहा
उड़ानों के कारोबार चल सकता। यह बात तो जाहिर है कि एयरलाईंस जितना पैसा
एयरपोर्ट को देती होगी, उससे सैकड़ों गुना अधिक खर्च उसका उड़ान पर होता
होगा, और इन तीनों पहलुओं ने मिलकर पता नहीं क्यों इस बर्बादी को रोकने का
रास्ता क्यों नहीं ढूंढा।
दुनिया में आज गैरजरूरी हवाई सफर को घटाने के लिए कई किस्म की सोच चल रही है। लेकिन यह आसान बात नहीं है क्योंकि दुनिया के बहुत से देशों की अर्थव्यवस्था पर्यटकों पर टिकी रहती है, बहुत से देश एयरलाईंस की कमाई के मोहताज रहते हैं, और विमान बनाने वाली कंपनियां हर बरस आसमान में उसी तरह विमान जोड़ती जा रही हैं जिस तरह कार बनाने वाली कंपनियां हिन्दुस्तान जैसे देश की सडक़ों पर हर बरस लाखों कारें जोड़ देती हैं। इसलिए हवाई सफर को घटाना तो आसान नहीं दिख रहा है, लेकिन जहां-जहां ईंधन की बर्बादी हो रही है, उसे एक जुर्म करार देना जरूरी है। और इस जुर्म के लिए बड़ा जुर्माना लगाना भी जरूरी है। इसे महज किसी देश की सरकार, एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनी, और एयरलाईंस का आपसी मामला नहीं माना जा सकता। धरती का वातावरण, आसमान और हवा, ये सार्वजनिक संपत्ति हैं, और उसे बर्बाद करने का हक इन तीन लोगों के ऐसे गिरोह को नहीं दिया जा सकता जो कि गैरजिम्मेदार है। हम यहां मिसाल के तौर पर ही इस मामले की बात कर रहे हैं, इस तरह की दूसरी मिसालें दुनिया के अधिकतर देशों में मिलेंगी जहां सरकार और कारोबार लापरवाही से या सोच-समझकर धरती को बर्बाद कर रहे हैं, और इन देशों का कोई कानून ऐसी बर्बादी को रोकने के लिए बना नहीं है।
पहले भी कुछ बार हमने इसी जगह पर यह मुद्दा उठाया था कि देश-प्रदेश की सरकारों को फैशनेबुल सामानों की अंधाधुंध पैकिंग पर एक टैक्स लगाना चाहिए ताकि मार्केटिंग के लिए धरती पर कचरे का बोझ बढ़ाना रोका जा सके। आज 50 मिलीलीटर इत्र की शीशी और उसके ऊपर की पैकिंग कई बार तीन-चार सौ ग्राम तक की हो सकती है। धरती के सामानों की ऐसी फिजूलखर्ची और बर्बादी पर एक टैक्स लगाने की जरूरत है, और इसे राज्य भी अपने स्तर पर लागू कर सकते हैं कि खपत होने वाले सामान को छोडक़र बाकी तमाम पैकिंग पर एक टैक्स लगाया जाए। हो सकता है कि इससे कमाई कम हो, लेकिन इससे जागरूकता अधिक आए। राज्यों को अपने स्तर पर कुछ और कोशिशें भी करनी चाहिए जिनमें पॉलीथीन बैग के विकल्प खड़े करना एक बड़ा काम होना चाहिए। राजस्थान के बहुत से शहरों में पुरानी साडिय़ों के कपड़े से सिले हुए बैग दुकानों में सामान भरकर दे दिए जाते हैं। इस मामूली सिलाई के काम में ऐसी कोई चीज नहीं है जो कि हिन्दुस्तान के किसी प्रदेश में न हो, महज सोच और पहल की कमी है जो कि इन प्रदेशों के पर्यावरण को तबाह कर रही हैं। बात शुरू तो हुई थी ब्रिटेन और योरप की भुतहा उड़ानों से, लेकिन वह राजस्थान के पुराने कपड़ों के झोलों तक पहुंच गई। यह हर किसी की जिम्मेदारी है कि वे अपने आसपास पर्यावरण को बचाने के रास्ते ढूंढें, और पर्यावरण को तबाह करने वाले तरीकों की शिनाख्त करके उसे रोकने की बात भी करें। चुनावों के धंधे में लगे राजनीतिक दलों से अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि पेड़ों का वोट नहीं होता, मछली, कछुओं, और पंछियों का वोट नहीं होता। ऐसे में लोगों को ही आवाज उठाना चाहिए, सोशल मीडिया पर जमकर बहस छेडऩी चाहिए, और जरूरत हो तो अदालतों तक जाकर जनहित याचिका भी लगानी चाहिए।
जिस समाज में धार्मिक कट्टरता जितनी अधिक, वहां औरत के हक उतने ही कम
27 मार्च 2022
अफगानिस्तान में अभी लड़कियों का मिडिल
स्कूल खोला गया, और बच्चियां खुशी-खुशी वहां पहुंचीं, लेकिन कुछ घंटों के
भीतर ही तालिबान ने स्कूल बंद करने की घोषणा कर दी, और वे ही बच्चियां
रोते-रोते घर लौटीं। तालिबान सरकार ने इस फैसले पलटने को लेकर को वजह नहीं
बताई है, और कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है। लेकिन यह बात अपनी जगह सच है
कि अमरीकी फौजों की वापिसी के बाद से जब से तालिबान राज कायम हुआ है,
महिलाओं के हक अफगानिस्तान में खत्म हो गए हैं, उनका काम का दायरा सीमित हो
गया है, और महज कुछ किस्म के कामों में उन्हें इजाजत है। लेकिन घर के बाहर
किसी दूर जगह जाने के लिए उन्हें परिवार के किसी मर्द का साथ होना जरूरी
है, उनके अकेले चलने पर बंदिश है। और प्राइमरी स्कूल से ऊपर लड़कियों की
पढ़ाई अब तक बंद ही है।
कोई देश या समाज जब अपनी लड़कियों और महिलाओं पर इस किस्म की बंदिशें लगाते हैं तो उनके आगे बढऩे की संभावनाएं भी सीमित हो जाती हैं। दुनिया के जिन देशों में महिलाओं के कोई भी काम करने पर रोक नहीं है, वे देश अपनी आम संभावनाओं से आगे निकल जाते हैं। रूस जैसे देश में महिलाएं दशकों से क्रेन और बुलडोजर जैसी मशीनें भी चलाती आई हैं, और कोई भी काम ऐसा नहीं है जिसमें उन पर रोक हो। नतीजा यह होता है कि ऐसी महिलाएं और उनके परिवार खुद भी आगे बढ़ते हैं, और देश को भी आगे ले जाते हैं। दूसरी तरफ दुनिया के जिन देशों में इस्लामिक व्यवस्था है वहां पर जिस हद तक इस्लामिक कानून को लागू किया जाता है, उसी हद तक महिलाओं की आत्मनिर्भरता घट जाती है। ईरान या अफगानिस्तान में अगर बंदिशें अधिक हैं, तो वहां संभावनाएं कम हैं। दरअसल यह बात खुलकर इसलिए सामने नहीं आ पाती कि इस्लामिक देशों में कुछ देश सउदी अरब किस्म के तेल के कुओं वाले देश हैं जिनमें धरती ही सारी कमाई दे देती है, और महिलाओं के तो क्या, आदमियों के भी काम करने की जरूरत नहीं रहती है। फिर दूसरी तरफ कुछ ऐसे बहुत ही गरीब और फटेहाल मुस्लिम देश हैं जहां पर मजहब ही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत रहती है, और वे ईश्वर के नाम पर सभी किस्म की गरीबी और अभाव को बर्दाश्त कर जाते हैं। यमन जैसे देश में कुपोषण से बड़ी संख्या में मौतें होती हैं लेकिन कट्टरपंथी आतंकी समूह वहां मजहब के नाम पर जान लेने और देने पर उतारू रहते हैं। अतिसंपन्न और अतिविपन्न, दोनों ही किस्म की अर्थव्यवस्थाओं में यह अंदाज लगाना मुश्किल रहता है कि वहां महिलाओं की भागीदारी की कमी की वजह से अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा है, या कि समाज पर क्या असर हुआ है।
अफगानिस्तान और उस किस्म के कुछ और देशों में धार्मिक कट्टरता से लोकतंत्र और इंसानियत का जो बड़ा नुकसान हुआ है उससे बाकी दुनिया को भी सबक लेने की जरूरत है। आज जब इंसान पिछले कई सौ बरसों से लगातार विज्ञान और टेक्नालॉजी की मेहरबानी से अपनी सहूलियतें बढ़ा रहे हैं, दुनिया को बेहतर जगह बना रहे हैं, तो कई देशों में धर्म लोगों को विज्ञान और टेक्नालॉजी के पहले के वक्त पर ले जाने पर उतारू है, और उसे कहीं कम तो कहीं अधिक कामयाबी भी मिल रही है। लेकिन दुनिया का इतिहास एक बात बताता है कि अगर प्राकृतिक साधन एक बराबरी के हों, तो वे देश ही तरक्की करते हैं जो कि महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते हैं, उन्हें बराबरी का हक और बराबरी की संभावनाएं देते हैं। किसी जानकार विद्वान ने जरूर ही ऐसा तुलनात्मक अध्ययन किया होगा कि किसी देश की प्राकृतिक और ऐतिहासिक क्षमता के मुकाबले उस देश के आगे बढऩे में वहां की महिलाओं की भागीदारी का कितना हाथ रहा है। लोगों को अपने आसपास के प्रदेश, शहर, समाज और परिवार, इन सबको देखना चाहिए कि महिलाओं को दबाकर रखने वाले समाज किस तरह पीछे रह जाते हैं। आज न सिर्फ तालिबान को, बल्कि दुनिया के बाकी समाजों को भी यह देखने की जरूरत है कि वे लड़कियों को विकसित होने के बराबरी के, और हिफाजत वाले मौके मुहैया कराने में कितनी दिलचस्पी ले रहे हैं। आधी दुनिया, और बेहतर आधी दुनिया को कुचलकर बाकी आधी दुनिया किसी तरह से भी एक बेहतर जगह नहीं बन सकती। चूंकि कुदरत ने महिलाओं को गर्भधारण और बच्चों को बड़ा करने जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां दी हैं, जिन्हें पुरूषवादी समाज ने औरत की कमजोरी बनाकर रख दिया है, इसलिए देश के कानून को महिलाओं को खास हक और खास हिफाजत दिलवाने का काम करना चाहिए। तालिबान की जो सोच है, वह उनसे कुछ कम कट्टरता के साथ और उनसे कुछ कम हिंसा के साथ दुनिया में जगह-जगह फैली हुई है। तालिबान को कोसना आसान है, अपने आपको आईने में देखना कुछ मुश्किल है। फिर भी लोगों को अगर एक सभ्य समाज बनना है, दुनिया के बेहतर लोकतंत्रों की तरह आगे बढऩा है, तो उन्हें अपनी सोच के अलग-अलग कोनों में छुपी बैठी तालिबानी सोच से छुटकारा पाना होगा। हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में भी कई प्रदेशों में ऐसे मुख्यमंत्री बैठे हैं जो औरत को एक सामान से अधिक नहीं देखते हैं, और जिनकी बातों में तालिबानी डीएनए झलकता है। उनका तालिबानी सोच से कुछ पीढिय़ों पहले का रिश्ता दिखता है, और इस सोच से भी हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को छुटकारा पाना चाहिए। जहां धार्मिक कट्टरता जितनी अधिक है, वहां औरत के हक उतने ही कम पाए जाते हैं।तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...
27 मार्च 2022
इंसान की मुस्कुराहट के क्या मायने हो सकते
हैं, इसका एक नया नजरिया दिल्ली के हाईकोर्ट के एक जज ने अभी एक बहुत ही
संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान सामने रखा है। दिल्ली दंगों से जुड़े
हुए एक मामले की सुनवाई जस्टिस चंद्रधारी सिंह की अदालत में चल रही है, और
इसमें सीपीएम सांसद रहीं बृंदा करात ने मोदी सरकार के एक मंत्री अनुराग
ठाकुर के एक बयान पर यह मुकदमा किया है। अनुराग ठाकुर ने दिल्ली विधानसभा
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा प्रत्याशी के वोट मांगते हुए मंच से नारा
लगाया था- देश के गद्दारों को..., और इसके बाद उन्होंने आम सभा की भीड़ को
इसे पूरा करने का मौका दिया था जिसने आवाज लगाई थी-गोली मारो सालों को।
यह वीडियो चारों तरफ खूब फैला था, और इसे लेकर बीते दो बरसों में यह मामला अदालत में चल रहा है और उसकी सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रधारी सिंह ने कहा कि अगर मुस्कुराते हुए कोई बात कही जाए तो उसके पीछे आपराधिक भावना नहीं रहती, लेकिन अगर कोई बात तल्ख लहजे में कही जाए तो उसके पीछे की मंशा आपराधिक हो सकती है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि चुनाव के समय दी गई स्पीच को आम समय में कही बात से नहीं जोड़ा जा सकता। चुनाव के समय अगर कोई बात ही है तो वह माहौल बनाने के लिए होती है, लेकिन आम समय में यह चीच नहीं होती, उस दौरान माना जा सकता है कि आपत्तिजनक टिप्पणी माहौल को भडक़ाने के लिए कही गई थी।
जस्टिस चंद्रधारी सिंह ने एक मुस्कुराहट को जिस तरह की रियायत दी है वह हैरान करने वाली है, और भयानक है। लोगों को याद होगा कि हिन्दी फिल्मों के बहुत से खलनायकों के नामी किरदार हत्या से लेकर बलात्कार तक हँसते-हँसते करते आए हैं। दुनिया की सबसे हिंसक फिल्मों में भी कई ऐसी रही हैं जिनमें ऐतिहासिक हिंसक पात्र दिल हिला देने वाली हिंसा हँसते-मुस्कुराते करते दिखे हैं। एक अमरीकी फिल्म में एक मानवभक्षी आदमी पुलिस हिरासत में रहते हुए भी पुलिस की जरा सी चूक से एक पुलिस वाले पर कब्जा कर लेता है और उसे मारकर खा लेता है। वह भी फिल्म के कई हिस्सों में मुस्कुराते हुए दिखता है। इसलिए देश में घोर साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वाली, हिंसा फैलाने वाली बातें अगर चुनावी भाषणों में की जाती हैं, और जिनके असर से इस देश में कमजोर मुस्लिमों के कत्ल का माहौल बनता है, उन्हें देश का गद्दार करार दिया जाता है, तो ऐसे फतवों को भी एक मुस्कुराहट की वजह से मंजूरी देने वाली जज की यह बात बहुत ही भयानक है, और उनकी कमजोर समझ, और बेइंसाफ सोच को उजागर करती है। इंटरनेट पर उनका परिचय बताता है कि वे छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के वक्त सरकार द्वारा मनोनीत अतिरिक्त महाधिवक्ता बनाए गए थे।
दो दिन पहले बृंदा करात के दायर किए गए मुकदमे में जस्टिस चंद्रधारी सिंह ने फैसला सुरक्षित रखा है और यह सवाल किया है कि इस भाषण में साम्प्रदायिक नीयत कहां है? जज के खड़े किए हुए कई और सवाल भी लोकतंत्र पर भरोसा करने वालों को विचलित करने वाले हैं क्योंकि वे देश की बुनियादी धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को खारिज करने वाली बातों को एक मुस्कुराहट का फायदा दे रहे हैं। अगर उनकी यह बात उनके लिखित फैसले में किसी तरह आती है, और अगर उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, तो इंसाफ की हमारी सीमित बुनियादी समझ यह कहती है कि जस्टिस चंद्रधारी सिंह की इस व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट नहीं मुस्कुराएगा। पता नहीं जस्टिस सिंह ने फिल्म शोले देखी थी या नहीं जिसमें गब्बर अपने आधे जुर्म हँसते हुए करता है, अपने साथियों को गोली मारने सहित। अब अगर वह फिल्म न होती और मामला आज का होता तो गब्बर अपनी हँसी और मुस्कुराहट को लेकर आज संदेह का लाभ पाने का हकदार रहता।
जब देश की बड़ी अदालतों के जज कानून की ऐसी व्याख्या करने लगें, तो हिंदुस्तानी लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ी फिक्र खड़ी हो जाती है। इस मामले में और कुछ न सही, जस्टिस चंद्रधारी सिंह को कम से कम यह तो देखना था कि इस चुनावी भाषण को लेकर जनवरी 2020 में चुनाव आयोग ने अनुराग ठाकुर को देश के गद्दारों को वाले नारे के लिए नोटिस जारी किया था और आयोग ने नोटिस में यह लिखा था कि पहली नजर में यह टिप्पणी साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाडऩे का खतरा रखने वाली दिखती है और भाजपा सांसद ने आदर्श चुनाव संहिता और चुनाव कानून का उल्लंघन किया है। जस्टिस चंद्रधारी सिंह को कम से कम यह तो सोचना था कि चुनाव प्रचार के दौरान का भडक़ाऊ भाषण न सिर्फ साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाडऩे का खतरा रखता है, बल्कि वह लोकतंत्र के फैसले को भी गलत तरीके से मोडऩे का खतरा रखता है।
हिंदुस्तान की न्यायपालिका का हाल के कुछ बरसों का रूख दिल बैठा देने वाला रहा है। बहुत से ऐसे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जज रहे हैं जिनके फैसले, आदेश, या जिनकी टिप्पणियां लोकतंत्र को कुचलने वालों को संदेह का लाभ देने वाली रही हैं, और लोकतंत्र का हौसला पस्त करने वाली रही हैं।
यह भी एक दिलचस्प बात है कि आज जब हिंदुस्तान में दिल्ली हाईकोर्ट के ये जज इस मामले में फैसला सुरक्षित रखकर बैठे हैं, उस वक्त अमरीका में सुप्रीम कोर्ट की जज बनाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत एक काली महिला की संसदीय समिति के सामने सुनवाई चल रही है। अमरीका में किसी के सुप्रीम कोर्ट जज बनने के पहले सभी पार्टियों के सदस्यों को मिलाकर बनाई गई कमेटी इस संभावित जज से कई-कई दिनों तक खुली सुनवाई में उसकी पूरी जिंदगी, सोच, विचार, उसके फैसले, सभी के बारे में सैकड़ों सवाल करती है और यह माना जाता है कि यह दुनिया की सबसे कड़ी पूछताछ में से एक रहती है। अमरीका में देश और समाज के जो जलते-सुलगते मुद्दे रहते हैं, उन पर भी ऐसे संभावित जजों की सोच पूछी जाती है, धर्म, राजनीति, समाज से लेकर गर्भपात पर तक उनके पिछले बयानों को लेकर उनसे खूब पूछताछ होती है।
हिंदुस्तान में जब-जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज अपनी ऐसी असाधारण सोच सामने रखते हैं, तो लगता है कि क्या इस देश में भी किसी को बड़ा जज बनाने के पहले उससे उसकी जिंदगी, उसकी सोच, उसके पिछले कामकाज के बारे में सार्वजनिक पूछताछ नहीं होनी चाहिए? आज अमरीका में इस काली महिला से चल रही पूछताछ का जीवंत प्रसारण चल रहा है, और हर अमरीकी को यह जानने का हक है कि उनके राष्ट्रपति ने देश की बड़ी अदालत में जज बनाने के लिए किस तरह के व्यक्ति को मनोनीत किया है, और ऐसी खुली सुनवाई में कौन से सांसद कौन से सवाल कर रहे हैं? लोकतंत्र इसी तरह की खुली पारदर्शिता का नाम है।
हिंदुस्तान में अब बड़े जज रिटायर होने के बाद कोई किसी राजभवन चले जाते हैं, तो कोई राज्यसभा। रिटायर होने के ठीक पहले के सूरजमुखी फैसलों के बाद इस तरह का वृद्धावस्था-पुनर्वास न्यायपालिका की साख को वैसे भी चौपट कर चुका है। आज हिंदुस्तान में भी जरूरत है कि किसी के हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जज बनाने जाने के पहले उनकी ऐसी ही खुली सुनवाई हो, जैसी कि अमरीका में हर जज की होती ही है।
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्रधारी सिंह की टिप्पणी पर देश के एक चर्चित मुस्लिम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने तंज कसा है-तेरा मुस्कुराना गजब हो गया...।
गरीब बाप कंधे पर बेटी की लाश ढोकर ले जाते दिख रहा है, पर वह लोकतंत्र की लाश है
26 मार्च 2022
छत्तीसगढ़ का एक वीडियो कल से सोशल मीडिया
पर तैर रहा था, और उसने देखने वालों को बड़ा विचलित भी कर दिया। स्वास्थ्य
मंत्री टी.एस. सिंहदेव के अपने इलाके सरगुजा में एक सरकारी अस्पताल में सात
साल की एक गरीब बच्ची गुजर गई। उसके शव को घर ले जाने के लिए जब कोई
सरकारी गाड़ी नहीं मिल पाई तो उसका पिता उसे कंधे पर लेकर ही 8-10 किलोमीटर
पैदल गया। इस वीडियो ने उन अच्छे-अच्छे शहरी लोगों को भी हिलाकर रख दिया
जिनके मन में आमतौर पर सबसे गरीब तबके के लिए कोई हमदर्दी नहीं होती है, और
उन्हें मिलने वाली कुछ छोटी-मोटी सरकारी रियायतें जिन्हें खटकती ही रहती
हैं। फिलहाल स्वास्थ्य मंत्री ने ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी को हटा दिया है,
जांच के आदेश दिए हैं, और स्वास्थ्य विभाग के अमले को अधिक संवेदनशीलता से
काम करने के लिए कहा है।
चूंकि यह मामला एक गरीब बाप के कंधे पर उसकी बेटी की लाश का था, इसलिए यह तुरंत खबरों में आ गया, और उसने लोगों को विचलित भी कर दिया। लेकिन यह बर्ताव सिर्फ अस्पताल के कर्मचारियों का हो, ऐसा भी नहीं है। यही बर्ताव तहसील के कर्मचारियों का होता है, पुलिस का होता है, जंगल विभाग के कर्मचारियों का होता है, और बिना किसी अपवाद के सरकार के हर विभाग का ऐसा ही बर्ताव होता है। यह तो मौत और लाश की बात है जो कि सरकारी अस्पताल में ही अधिक दिखती है, वरना पटवारी के दफ्तर में भी हक का कागज पाने के लिए भी सबसे गरीब और बेबस को भी जिस तरह हजारों रूपये देने पड़ते हैं, महीनों तक चक्कर खाने पड़ते हैं, वह भी लोगों को जिंदा लाश बनाकर छोडऩे वाली बात रहती है। जिन लोगों ने सरकारी ऑफिसों के संवेदनाशून्य बर्ताव के एक हिन्दी सीरियल को देखा होगा, उन्हें यह बात मालूम होगी कि छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से प्रदेश हैं जहां पर हर नागरिक का हाल मुसद्दीलाल सरीखा है।
अभी दो ही दिन पहले की ही बात है इसी छत्तीसगढ़ में एक जिले मुंगेली में सिटी कोतवाली के थानेदार का एक ऑडियो सामने आया जिसमें वह बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करवाने वाली महिला को पैसे लेकर समझौता करने के लिए दबाव डाल रहा है, और यह धमकी भी दे रहा है कि शिकायत वापिस नहीं लेने पर अदालत में कैसे बर्ताव का सामना करना पड़ेगा। इस मामले में चूंकि समझाने के नाम पर धमकाने की ऑडियो रिकॉर्डिंग चारों तरफ फैल गई थी, एसपी को मजबूरी में कार्रवाई करनी पड़ी, वरना बलात्कार के आरोपी को बार-बार फरार बताकर गिरफ्तारी से बचाया जा रहा था। ऐसा ही हाल प्रदेश में हर उस गरीब और कमजोर का है जो कि सत्ता के किसी ताकतवर तक पहुंच नहीं रखते, उन पर दबाव नहीं डाल सकते। गरीबी, लोगों के बुनियादी हक खत्म करने की एक पर्याप्त वजह है, और आये दिन उसकी मिसालें सामने आते रहती हैं। आज प्रदेश में आदिवासी सरकार के बर्ताव के कुछ मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। भाजपा शासन के पन्द्रह बरसों में आदिवासी हक के लिए लडऩे वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार आने के बाद बस्तर के आदिवासियों के लिए मानो कुछ भी नहीं बदला है। अभी भी बेकसूर आदिवासियों को नक्सली बताकर मारना जारी है, उनकी गिरफ्तारी जारी है, उनके खिलाफ मुकदमे जारी हैं। ऐसी बहुत सी वजहों को लेकर प्रदेश के आदिवासी बहुत बेचैन हैं, लेकिन आदिवासी इलाकों पर राज करने वाले वन विभाग को आज भी प्रदेश का सबसे भ्रष्ट विभाग माना और जाना जाता है। पुलिस विभाग का भी कमोबेश ऐसा ही हाल है, और ऐसे विभागों में जिस तरह के पूंजीनिवेश के बाद अफसर मैदानी पोस्टिंग पाते हैं, उसकी भरपाई के लिए वे संवेदनाशून्य तरीके से काम करते हैं, और ऐसे में लोगों के हक सबसे पहले बेचे जाते हैं। सरकार के किसी एक विभाग, या कुछ चुनिंदा विभागों की ही बात नहीं है, यह बात पूरे के पूरे सरकारी अमले में संवेदनशीलता गायब होने की है, और बेकाबू भ्रष्टाचार की भी है। गांव-गांव से गरीबों की शिकायतें आना थमता ही नहीं है कि सरकारी दफ्तरों से वास्ता पडऩे पर, अदालतों से वास्ता पडऩे पर उनका कैसा बुरा हाल होता है। ऐसी नौबत जब नहीं सुधरती है, तो जनता सरकारों को सुधार देती है।
परिवारों के भीतर हिंसा और अश्लीलता के बढ़ते खतरे...
25 मार्च 2022
छत्तीसगढ़ के एक जिले जीपीएम में 45 साल की
एक महिला की रिपोर्ट पर उसके पति और बेटे को गिरफ्तार किया गया है। उसने
शिकायत की थी कि उसका एक न्यूड वीडियो फैलाया जा रहा है, और यह काम उसका
पति और बेटा कर रहे हैं। महिला का अपने पति से झगड़ा चल रहा था, और वह
मायके चली जाती थी। अभी वह ससुराल लौटी तो 19 बरस के बेटे ने उससे उसका
मोबाइल मांगा, और उसमें से उसके कुछ वीडियो निकालकर रिश्तेदारों के बीच
फैला दिए। इस महिला के मुताबिक ये वीडियो उसके पति ने ही बनाए थे, और अब
उसका चरित्र खराब बताने के लिए पति और बेटा मिलकर उसके वीडियो फैला रहे
हैं। इस तरह के दर्जनों मामले हिन्दुस्तान के अलग-अलग हिस्सों से रोज आते
हैं जिनमें परिवार के लोग ही बच्चों से बलात्कार करते हैं, एक-दूसरे की
हत्या करते हैं या करवाते हैं, या बच्चों को सेक्स के लिए दूसरों को बेच
देते हैं, पत्नी को जुए के दांव पर लगा देते हैं। बहुत से ऐसे मामले आते
हैं जिनमें कोई महिला अपने प्रेमी की पत्नी को मारने की सुपारी देती है, या
कोई नौजवान दोस्तों के साथ मिलकर प्रेमिका के पति को मार डालता है। परिवार
के भीतर जितने किस्म की हिंसा और वर्जित माने जाने वाले काम होते हैं, वे
हैरान करते हैं। हैरानी दो बातों से होती है, एक तो यह कि इंसानी मिजाज में
इतनी हिंसा आती कैसे है, और दूसरी बात यह कि क्या वर्जित और अनैतिक मानी
जाने वाली बातों के पैमाने समाज में आज एकदम से खत्म हो चुके हैं?
परिवार के भीतर बच्चों के सेक्स-शोषण के मामले जितने सामने आते हैं उससे शायद सैकड़ों गुना अधिक वे होते हैं लेकिन परिवार अपनी इज्जत की दुहाई देकर और परिवार के लोगों से संबंध जारी रखने के लिए ऐसी बातों को छुपा देते हैं। नतीजा यह होता है कि बलात्कारी परिजन या रिश्तेदार, या पारिवारिक परिचित बेधडक़ हो जाते हैं, और उनका सेक्स-शोषण करने का सिलसिला जारी रहता है, बढ़ते चलता है। परिवार की इज्जत बची रहे इस नाम से घर की महिला भी बाप के बेटी के साथ बलात्कार को भी अनदेखा करती चलती है, और इज्जत से परे रोटी का भी एक मुद्दा रहता है कि अगर आदमी ही परिवार का अकेला कमाऊ सदस्य है, तो उसके बलात्कार को भी अनदेखा करना मजबूरी हो जाती है। बच्चों के यौन शोषण के अधिकतर मामले ऐसे ही होते हैं जिनमें परिवार अपने बच्चों की बात पर भरोसा नहीं करते, या उसे सोच-समझकर अनसुना कर देते हैं। यह सामाजिक निष्कर्ष है कि ऐसे बच्चे आगे चलकर समाज के लिए खतरा बनने की अधिक आशंका रखते हैं।
आज परिवार के भीतर वर्जित संबंधों के पैमाने कमजोर होते चल रहे हैं। एक वक्त परिवार के दो पीढ़ी के लोग, या भाई-बहन साथ बैठकर कोई अश्लील या वयस्क फिल्म या टीवी कार्यक्रम नहीं देखते थे। लेकिन अब यह बात खत्म सी हो गई है, और सभी किस्म के संबंधी साथ बैठकर किसी भी किस्म का कार्यक्रम देख लेते हैं। नतीजा यह होता है कि जिन रिश्तों में एक लिहाज रहना चाहिए था उन रिश्तों के बीच अब नजरों की कोई ओट नहीं रह गई है, और यह नौबत बढ़ते-बढ़ते पारिवारिक संबंधों को कई किस्म से प्रभावित कर रही है। ऐसे में परिवारों के भीतर अनैतिक कहे जाने वाले संबंध भी बढ़ रहे हैं, और परिवार के बाहर के लोगों से भी विवाहेतर संबंधों के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में परिवार के लोगों को ही यह सावधानी बरतनी चाहिए कि रिश्तों में खतरे की नौबत ही कम आए। यह बात कहना आसान है लेकिन आज जिस तरह से शहरीकरण बढ़ते चल रहा है, परिवार छोटे और अकेले होते जा रहे हैं, परिवार के हर सदस्य बाहर काम करने लगे हैं, लोगों से मिलना-जुलना बढ़ रहा है, टेक्नालॉजी की मेहरबानी से जिंदगी में वयस्क मनोरंजन अश्लीलता और हिंसा की हद तक बढ़ रहा है, तो ऐसे में आग और पेट्रोल मिलकर खतरा तो बनते ही जा रहे हैं। अब मोबाइल फोन पर वीडियो कैमरा शुरू होने के पहले तक यह खतरा तो नहीं था कि मां के फोन पर बेटा उसका नग्न वीडियो देख लेगा। टेक्नालॉजी ने परिवार के लोगों को एक-दूसरे के सामने उघाडक़र भी रख दिया है, और खतरे में भी डाल दिया है।
कुछेक और मामले दिल दहलाने वाले आए हैं जिनमें कहीं मां अपनी बेटी को लोगों के सामने बेच रही है, तो कहीं बाप और भाई मिलकर बेटी के लिए ग्राहक ढूंढ रहे हैं। कुछ लोग इन्हें विचलित और अप्राकृतिक सोच का बतला सकते हैं, लेकिन ये सारे लोग सोच-समझकर ऐसा करने वाले रहते हैं। इसलिए इन्हें मानसिक रोगी होने के संदेह का लाभ देना ठीक नहीं होगा, और इन्हें समाज का एक हिस्सा मानकर चलना ठीक रहेगा, और इनके अस्तित्व को मंजूर करने के बाद ही इनसे बचाव के तरीके सोचे जा सकेंगे। फिलहाल तो इस मुद्दे पर हमारा यहां पर लिखने का मकसद यह है कि आज परिवार और समाज के तमाम लोगों को अपने बारे में भी सावधान रहना चाहिए, और अपने अड़ोस-पड़ोस का भी ध्यान रखना चाहिए कि वहां किसी हिंसा या जुर्म की नौबत तो नहीं आ रही है। लोगों को अपने बच्चों के शिक्षक-प्रशिक्षक के बारे में भी सावधान रहना चाहिए, घर-परिवार में काम करने वाले लोगों के प्रति भी आंखें खुली रखनी चाहिए, और अपने-आप पर भी काबू रखना चाहिए। ऐसे जुर्म बढ़ते चले जा रहे हैं, और उनके मुकाबले सावधानी और अधिक बढऩी चाहिए।
सबसे अधिक राजनीतिक हिंसा वाला प्रदेश चलाती ममता देश कैसे चलाएगी?
24 मार्च 2022
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में एक
अभूतपूर्व दर्जे की हिंसा ने पूरे देश में फिक्र खड़ी कर दी है। बिना किसी
बाहरी या विदेशी आतंकी, बिना किसी नक्सल सरीखे घरेलू हथियारबंद संगठन की
हिंसा के, जिस तरह बंगाल के एक गांव में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता की
हत्या के बाद जवाबी दिखती हिंसा में एक दर्जन घर जला दिए गए जिनमें से एक
मकान में एक कमरे में ही छिपे सात लोग जलकर मर गए, और इससे परे एक और मौत
जलने से हुई है। बंगाल में पहले तो वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं और ममता
बैनर्जी की टीएमसी के लोगों के बीच ऐसे हिंसक संघर्ष होते थे, लेकिन बाद
में वामपंथी कमजोर होते चले गए और विपक्ष की जगह भाजपा ने ले ली, तब से
भाजपा और टीएमसी के बीच यह खूनी संघर्ष चलते रहता है। जब जिसके हाथ लगता
है, वे दूसरी पार्टी के लोगों को मार डालते हैं, और बंगाल में विधानसभा
चुनावों के बाद जिस परले दर्जे की हिंसा वहां हुई थी उसकी अदालत की निगरानी
में जांच भी अब तक पूरी नहीं हुई है, और इस ताजा हिंसा पर कोलकाता
हाईकोर्ट ने खुद होकर रिपोर्ट मांगी है।
भारत
की राजनीति में यह बात थोड़ी सी अटपटी है कि पश्चिम बंगाल के अलावा केरल
में भी सत्ता और विपक्ष के बीच इसी किस्म की हिंसक झड़प चलती रहती है, और
गाहे-बगाहे लाशें गिरती रहती हैं। अभी कुछ अरसा पहले ही वहां आरएसएस का एक
कार्यकर्ता बम बनाते अपने ही हाथ की उंगलियों को उड़ा बैठा था, और वहां
संघ-भाजपा और वामपंथियों के बीच बहुत सी हत्याएं होते आई हैं। यह बात बड़ी
अजीब है कि ये दो राज्य अलग-अलग बसे हुए हैं, दोनों गैरहिन्दी भाषी हैं, और
दोनों पर समय-समय पर वामपंथियों ने राज किया है, आज भी वहां उनकी राजनीतिक
मौजूदगी है। लेकिन बंगाल में अब वामपंथी अपनी खोई हुई ताकत के बाद हिंसा
के मामलों से परे हैं, और वहां सत्ता और विपक्ष चलाने वाले टीएमसी और
बीजेपी ने यह जिम्मा ले लिया है।
इस बात का कोई राजनीतिक विश्लेषण
अभी तक हमारे देखने में नहीं आया है कि बाकी देश से परे इन दो राज्यों में
इतनी राजनीतिक हत्याएं आखिर क्यों होती हैं? लेकिन यह तो एक गंभीर
राजनीतिक-सामाजिक अध्ययन का मुद्दा है, और उससे इस नौबत को अनदेखा नहीं
किया जा सकता कि बंगाल लगातार बड़े पैमाने पर हिंसा को देख रहा है, वहां
लाशें गिर रही हैं। ममता बैनर्जी केन्द्र की मोदी सरकार से लगातार टकराव
मोल लेते हुए अगले आम चुनावों में मोदी के एनडीए का विकल्प बनने और पेश
करने में लगी हुई हैं, लेकिन इस ताजा घटना ने बंगाल को ही उनके काबू के
बाहर का साबित किया है। कहने के लिए तो यह कहा जा सकता है कि यह मामला ममता
के एक कार्यकर्ता की हत्या से शुरू हुआ, और जवाबी हिंसा की एक अकेली घटना
में आगजनी में एक घर के लोग मारे गए, और उनकी हत्या नहीं की गई, वे जलकर मर
गए। लेकिन विधानसभा चुनावों के बाद की हिंसा अभी सबकी यादों में ताजा है,
और उस पर कोई कार्रवाई भी होना अभी बाकी है। इस हिंसा को लेकर मुख्यमंत्री
ममता बैनर्जी और एनडीए के मनोनीत राज्यपाल के बीच सार्वजनिक टकराव चलते ही
रहता है। चुनाव बाद की हिंसा में बंगाल में दर्जन भर हत्याएं हुई थीं, और
जगह-जगह विपक्षी पार्टियों के दफ्तर भी जला दिए गए थे। हिंसा की वह
संस्कृति ममता के राज में अब भी जारी है, और इस बार जिन्हें जलाकर मार डाला
गया है, उनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं।
ममता बैनर्जी ने अपनी आदत के मुताबिक अपनी सरकार की इस नाकामी का बचाव करते हुए देश के दूसरे प्रदेशों की कुछ हिंसक घटनाओं को गिनाया है, जहां पर भाजपा की सरकारें हैं। लेकिन दूसरे राज्यों की खामियां गिनाने से ममता खुद कामयाब नहीं हो जातीं, और खासकर जब वे देश के विपक्षी गठबंधन की अगुवा होने के लिए ओवरटाइम मेहनत कर रही हैं, जब वे दूर-दूर के प्रदेशों में जाकर अपनी पार्टी की बैनरतले चुनाव लड़ रही हैं, तब उन्हें सरकार चलाने की एक बेहतर मिसाल भी पेश करनी होगी। राजनीतिक हिंसा का ऐसा इतिहास बाकी भारत में ममता को सम्मान नहीं दिला पाएगा क्योंकि इस दर्जे की राजनीतिक हिंसा देश के किसी भी और प्रदेश में नहीं हो रही हैं, नहीं होती हैं। ममता बैनर्जी के तेवर सत्ता को चलाने के लिए कुछ अधिक ही बगावती दिखते हैं। उन्हें सत्ता की जवाबदेही समझनी चाहिए, और विपक्ष की तरह का बर्ताव अपने ही राज में करना ठीक नहीं है।
अब आज बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी दलों की कोई जमीन नहीं बच गई है, विधानसभा में ये घुस भी नहीं पाए हैं, इसलिए वहां के लोकतांत्रिक नजारे में इनकी बात का अधिक वजन भी नहीं रह गया है। ऐसे में भाजपा और टीएमसी के बीच का कातिल-टकराव केन्द्र और राज्य के संवैधानिक टकराव में बार-बार बदलता है, और इस दर्जे की हिंसा एक नया टकराव तो खड़ा कर ही चुकी है। कोलकाता हाईकोर्ट के अलावा केन्द्र सरकार, भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी, राष्ट्रीय महिला आयोग, सभी बंगाल पहुंच रहे हैं, और राजनीतिक मतभेदों के चलते राज्य में इस दर्जे की हिंसा ममता को निश्चित ही भारी पड़ेगी।
फैसलों में भागीदारी से बचा जा सकता है बहुत बड़ी ऐतिहासिक चूक से
23 मार्च 2022
आज कांग्रेस पार्टी के भीतर चुनावी शिकस्त
को लेकर दिख रही बेचैनी कोई नई बात नहीं है। दो बरस पहले जब पार्टी को
लोकसभा चुनावों में उम्मीदों के खिलाफ जाकर बड़ी बुरी हार मिली थी तब भी यह
बेचैनी शुरू हुई थी, और तब से अब तक जारी ही थी। लेकिन इसे पार्टी के
खिलाफ गद्दारी भी कहा गया, लोगों की भाजपा में जाने की कोशिश भी करार दिया
गया। लोगों को बार-बार यह नसीहत दी गई कि घर की बात घर के भीतर रखनी चाहिए,
हालांकि यह बात किसी ने नहीं कही कि घर की बात घर के भीतर रखने के लिए उस
घर तक आखिर पहुंचा कैसे जाए जहां पार्टी के नेताओं को भी महीनों और बरसों
तक वक्त नहीं मिलता? खैर, कांग्रेस पार्टी की आज की बदहाली के बारे में
अधिक चर्चा करना आज का मकसद नहीं है, बल्कि यह एक शुरुआत के लिए दिख रहा
मुद्दा है जिस पर बात की जानी चाहिए।
किसी भी सरकार या संगठन के भीतर, या किसी कारोबार के भीतर भी अगर लोगों का आपस में सोचना-विचारना कम हो जाता है, बंद हो जाता है, तो उनका आगे बढऩा भी बंद हो जाता है। जिस संगठन या कारोबार में ऊपर से फतवे आते हैं, और फिर वे नीचे के लोगों के लिए हुक्म बन जाते हैं, तो वहां पर गलतियों की सबसे अधिक गुंजाइश रहती है। गिनाने के लिए कई ऐसी मिसालें गिनाई जा सकती हैं कि फलां पार्टी तो एक व्यक्ति के हांके चलती आ रही है, और वह आगे भी बढ़ते जा रही है। लेकिन इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या वह सचमुच अपनी सभी संभावनाओं को पा सकी है? या फिर उन संभावनाओं से बहुत पीछे रह गई है, क्योंकि उसमें न तो कोई आत्ममंथन था, और न ही उसमें नई सोच, सोच की विविधता की कोई जगह रह गई थी। एक बंद टंकी के पानी की तरह उसकी सोच पर काई जमती चली गई, और ऐसी अधिकतर पार्टियां अपार संभावनाओं के रहते हुए भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पातीं या कांग्रेस की मिसाल अगर देखें तो आसमान की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद यह पार्टी नीचे मिट्टी में मिल गई है क्योंकि न इसमें सोच की विविधता की जगह रही, न सामूहिक नेतृत्व नाम की कोई बात रही। ऐसे में उसका यह हाल होना ही था। लेकिन राजनीतिक दलों से परे की भी बात करें तो सोच की विविधता, प्रतिभा का सम्मान, और खुला दिमाग रखना, इन सबकी वजह से कोई भी संगठन या कोई देश बहुत आगे बढ़ सकते हैं।
अब आज हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी, और अच्छी-खासी साख वाली कंपनी टाटा को अगर देखें तो पारसी परिवार की शुरू की हुई कंपनी जिसके अधिकतर शेयर पारसी परिवारों के बीच थे, उसके अलग-अलग अफसर बदलते हुए आज एक दक्षिण भारतीय मुखिया इस कंपनी को चला रहा है। इसका न तो टाटा परिवार से कोई लेना-देना था, और न ही शेयर होल्डरों से। ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जिनमें पेशेवर सीईओ काम करते हैं, और उसे आसमान तक ले जाते हैं। अमरीका में आज बड़ी-बड़ी कंपनियां चलाने वाले सुंदर पिचाई, सत्या नडेला, इन्द्रा नूरी जैसे लोगों का उन कंपनियों से कोई लेना-देना नहीं था, वे केवल पेशेवर कर्मचारी थे, और कंपनियों के मुखिया बने। ऐसी कामयाब कंपनियों के भीतर यह बात रही कि लोगों के बीच साथ बैठकर सोचने-विचारने की आजादी रही। हिन्दुस्तान में आज कारोबार से लेकर सरकार तक, और राजनीतिक पार्टियों तक इसी बात की कमी है। जयललिता और मायावती जैसे लोगों के सामने दंडवत होना ही उनकी पार्टियों में विचार-विमर्श का पैमाना था। इनका अंत आगे-पीछे होना ही था। कुछ वैसा ही अंत अकाली दल का हुआ, समाजवादी पार्टी अपनी संभावनाओं तक नहीं पहुंच पाई, और लालू की पार्टी उनके कुनबे की गुलाम होकर खत्म हो गई। शरद पवार लंबे समय तक महाराष्ट्र के मुखिया रहने के बाद आज वहां के सत्तारूढ़ गठबंधन के तीन भागीदारों में से एक रह गए हैं, और केन्द्र की सत्ता में उनकी कोई भागीदारी नहीं रह गई है। इसलिए बदहाली हासिल करने वाली कांग्रेस अकेली पार्टी नहीं है।
दरअसल कामयाबी तक पहुंचने के लिए अपने घर के भीतर, संगठन के भीतर जिस तरह की आंतरिक असहमति का स्वागत होना चाहिए, वह जहां बिल्कुल नहीं रह जाता, वहां गलतियां ही गलतियां होने लगती हैं, और संभावनाएं धरी रह जाती हैं। संगठन या कारोबार के भीतर जहां असहमति का सम्मान होता है, वहां बहुत से दिमाग मिलकर काम करते हैं, वहां विविधता का फायदा मिलता है। लेकिन जहां असहमति को गद्दारी मान लिया जाता है, और विचार-विमर्श को बगावती तेवर करार दिया जाता है, वहां आगे बढऩा खत्म हो जाता है। हिन्दुस्तान में आज भाजपा जिस आसमान पर पहुंची हुई है उसके पीछे पिछले कुछ दशकों को देखें तो नेताओं की एक विविधता भी रही है। हर दो-चार बरस में पार्टी अध्यक्ष बदलते रहे, पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बदलते रहे, और वक्त आने पर लालकृष्ण अडवानी जैसे लोगों को हाशिए पर करके नई लीडरशिप आई, और उसने नई कामयाबी भी पाई। लोगों की आवाजाही जहां लगी नहीं रहती, वहां संगठन खत्म होने लगते हैं, आगे-पीछे यह खतरा ममता बैनर्जी की पार्टी के साथ भी रहेगा जहां वे अकेली ही सब कुछ हैं, और अगर उनके अलावा जरा सी गुंजाइश किसी और के लिए है, तो वह उनके भतीजे के लिए ही है।
सरकारों के भीतर भी यह देखने में आता है कि जहां प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपने फैसलों को लेकर किसी से सलाह-मशविरा करने के मोहताज नहीं रहते, वहां पर उनसे नोटबंदी जैसी ऐतिहासिक गलतियां होती हैं, और जिनसे उबरने की गुंजाइश हर किसी के पास नहीं होती, नरेन्द्र मोदी के पास तो फिर भी थी। इसके बजाय जिन सरकारों में सलाह-मशविरे की भागीदारी अधिक रहती है, उनमें कामयाब होने की संभावना भी अधिक होती है। सार्वजनिक जिंदगी से परे निजी जिंदगी में भी जो व्यक्ति या परिवार अपने बड़े फैसले अपने छोटे से दिमाग से अकेले लेते हैं, वे बड़ी गलतियां करने का खतरा अधिक उठाते हैं। इसलिए अपने आसपास के लोग, अपने संगठन या सरकार, या कारोबार के लोग न सिर्फ विचार-विमर्श के लिए साथ रखने चाहिए, बल्कि उन्हें उनकी असहमति को भी सामने रखने के लिए बढ़ावा देना चाहिए।
हिजाब पर कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला बहुत ही कमजोर
22 मार्च 2022
भाजपा सरकार वाले कर्नाटक में सरकार द्वारा
मुस्लिम स्कूली छात्राओं के हिजाब पर लगाई गई रोक को कर्नाटक हाईकोर्ट ने
सही ठहराया है, और कहा है कि हिजाब इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं
है। इस बारे में मुस्लिम छात्राओं ने याचिका लगाई थी जिसे खारिज करते हुए
हाईकोर्ट ने कहा कि स्कूल-कॉलेज में छात्र-छात्राएं यूनिफॉर्म पहनने से मना
नहीं कर सकते हैं। वहां जब से सरकारी स्कूलों में यूनिफॉर्म से हिजाब पर
बंदिश लगाई गई थी, बहुत से परंपरागत मुस्लिम परिवारों ने अपनी लड़कियों को
स्कूल भेजना बंद कर दिया था। अब समाज में इस प्रचलित व्यवस्था के चलते हुए
इन लड़कियों की पढ़ाई का क्या होगा यह एक बड़ा सवाल इस अदालती फैसले के बाद
खड़ा हुआ है, और सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल रहेगा कि जब तक सुप्रीम
कोर्ट की संवैधानिक बेंच के 9 जज इससे जुड़े हुए कुछ बुनियादी सवालों पर
आखिरी फैसला नहीं लेते हैं, तब तक मुस्लिम लड़कियों को स्कूली पोशाक के
साथ-साथ हिजाब की छूट दी जाए या नहीं। अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई
शुरू नहीं की है लेकिन हमारा यह मानना है कि हाईकोर्ट के फैसले के इस
हिस्से पर तुरंत ही स्थगन देने की जरूरत है क्योंकि इससे मुस्लिम छात्राओं
की पढ़ाई पर एक ऐसा नुकसान पडऩे वाला है जिसकी भरपाई नहीं हो सकेगी। अगर
परंपरागत समाज इस मुद्दे पर लड़कियों को स्कूल-कॉलेज भेजना बंद कर देता है
तो वह भारत में लड़कियों की आत्मनिर्भरता के खिलाफ भी जाएगा।
अब कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले को अगर देखें तो इसमें संविधान की कुछ बुनियादी बातों को अनदेखा किया गया है। बहुत सी बातें संविधान की मूल धाराओं में लिखी हुई है जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बातें हैं जिनमें पोशाक की पसंद भी शामिल है। यह फैसला ऐसी बातों का कोई न्यायसंगत निपटारा नहीं कर रहा है कि पोशाक की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक परंपरा का स्कूली पोशाक के साथ एक सहअस्तित्व भी हो सकता है। संविधान के जानकार लोगों ने इस फैसले को बहुत ही निराशाजनक और खामियों वाला माना है, और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस पर अमल तुरंत रोकने की उम्मीद भी की है। हम कानूनी बारीकियों के जानकार नहीं हैं, लेकिन प्राकृतिक न्याय की हमारी साधारण समझ यह सुझाती है कि धर्म के कट्टर प्रतीकों से परे भी धर्म के ऐसे प्रतीक हो सकते हैं जो लोग अपनी साधारण मान्यताओं के तहत मानना चाहते हैं, और इनमें हिजाब भी एक हो सकता है जो कि इस्लाम के तहत अनिवार्य चाहे न हो, वह इस्लाम को मानने वाले लोगों में एक धार्मिक परंपरा की तरह है। अब हिजाब या ऐसा कोई भी दूसरा प्रतीक किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा है, या उन धर्मावलंबियों के लिए वह एक प्रचलित परंपरा है, ऐसे महीन फर्क के बीच जब कर्नाटक हाईकोर्ट के जज फर्क करने बैठे हैं, तो उससे लोगों के बुनियादी हक खत्म हो रहे हैं। बाकी बहुत से धर्मों के बहुत से ऐसे प्रतीक हैं जिनका इस्तेमाल स्कूली पोशाक के साथ टकराव नहीं माना जाता। हिन्दू, सिक्ख, ईसाई धर्मों के कई प्रतीकों का इस्तेमाल छात्र-छात्राएं करते हैं, और उन पर एक हमलावर अंदाज में रोक अगर लगाई जाएगी, तो उससे इस देश में विविधता की बुनियादी खूबी खत्म होगी, और बहुत से तबके के लोगों को यह लगेगा कि देश में उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जा रहा है।
कर्नाटक की भाजपा सरकार का शुरू किया गया यह बखेड़ा उसकी राजनीतिक ध्रुवीकरण की बदनीयत की एक हिंसक मिसाल है। उत्तरप्रदेश चुनाव के वक्त इसे शुरू किया गया था, और अब चुनाव के बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी अपने बहुत ही तंगनजरिए की व्याख्या से सरकार और राजनीतिक ताकतों की इस कोशिश की आग में घी डालने का काम किया है। दिल्ली नेशनल लॉ स्कूल में संविधान पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर ने सुप्रीम कोर्ट के बहुत से ऐसे फैसलों को गिनाया है जिनको कर्नाटक हाईकोर्ट की इस बेंच ने अनदेखा किया है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले तब तक कानून रहते हैं जब तक संसद कोई नया कानून बनाकर उन्हें पलट न दे। ऐसे में हाईकोर्ट ने यह बहुत ही खराब और सामाजिक अन्याय का फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट के बहुत से फैसलों को अनदेखा किया है।
अभी दरअसल सुप्रीम कोर्ट में धर्म के रीति-रिवाज को लेकर एक मामला चल रहा है, और संविधानपीठ उसकी सुनवाई कर रही है। इस मामले के बहुत से पहलू हैं, और उनमें से कुछ का अंतिम निपटारा होने तक कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले की अमल पर रोक लगानी चाहिए, और हिजाब की छूट दी जानी चाहिए। भारत के संविधान की बुनियादी समझ रखने वाले आम लोग भी यह बतला सकते हैं कि स्कूल-कॉलेज में यूनिफॉर्म का नियम साधारण धार्मिक परंपराओं को कुचले बिना लागू करने का एक आसान रास्ता जब है, तब एक अल्पसंख्यक तबके पर हमला करने की यह सरकारी सोच लोकतंत्र से बहुत परे की है। आज यह हमला सोच-समझकर मुस्लिम समुदाय पर हो रहा है, लेकिन बाकी धार्मिक अल्पसंख्यकों को यह समझ लेना चाहिए कि अगली बारी उनकी हो सकती है।
इस मुद्दे से जुड़ा हुआ एक दूसरा सामाजिक सवाल यह भी है कि क्या इस्लाम के तहत मुस्लिम समुदाय में पोशाक की हर तरह की बंदिश लड़कियों और महिलाओं पर ही लादने के इस सिलसिले को खत्म करना सारे देश की जिम्मेदारी नहीं है? आज जब किसी एक समाज को कुचलने की नीयत से कर्नाटक में यह सरकारी फैसला लागू किया गया है, तो उसे देखते हुए इस फैसले के समाज सुधारक होने का संदेह का लाभ देने की कोई गुंजाइश नहीं बचती है। फिर भी हम इस पहलू की चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसे लादने वाले लोग इसे मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों का हिमायती फैसला बताने का तर्क भी दे सकते हैं, और वे कितने बड़े हिमायती हैं, यह बात उनके बाकी दर्जन भर फैसलों से और उनके हिंसक बर्ताव से आए दिन साबित होते रहती है। कुल मिलाकर कर्नाटक हाईकोर्ट का यह बहुत ही कमजोर और बेइंसाफ फैसला सुप्रीम कोर्ट में खड़े होते नहीं दिखता, लेकिन इस पर फैसला जल्द होना चाहिए क्योंकि जब तक इसे खारिज नहीं किया जाएगा तब तक एक तबके के बुनियादी अधिकार छिने रहेंगे।
आबादी में छोटा सा छत्तीसगढ़ खुदकुशी में इतना आगे क्यों?
20 मार्च 2022
होली के रंगों के बाद आज कामकाज शुरू होने
को था कि पहली खबर ही बहुत खराब मिली। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के एक
गांव में पेड़ पर एक नाबालिग जोड़े ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। लोगों
का कहना है कि दोनों एक ही समुदाय के थे, और आपस में प्रेम करते थे, शादी
करना चाहते थे, घरवालों की ओर से शादी की मंजूरी भी मिल चुकी थी, और इस बीच
दोनों ने फांसी लगा ली। दोनों ही स्कूल में पढ़ते थे। इस मामले में फांसी
कुछ अटपटी बात इसलिए लग रही है कि दोनों एक ही जाति के थे, और परिवार की
तरफ से शादी की मंजूरी मिली हुई थी। आमतौर पर अलग-अलग जाति या धर्म के
लडक़े-लड़कियों के बीच प्रेम होने पर परिवार और जात बिरादरी दुश्मन बन जाते
हैं, और मोहब्बत की किस्मत दीवार में चुुन दी जाती है। ऐसे भी प्रेमीजोड़े
की आत्महत्या हर कुछ दिनों में कहीं न कहीं होती है। हिन्दुस्तान में धर्म
और जाति का, आर्थिक ताकत की अहंकार का, ओहदे के घमंड का हाल यह है कि
मां-बाप अपने बच्चों की मौत बनकर सामने आते हैं, या बच्चे उनके हुक्म को
अनसुना करें, तो वे अपनी तथाकथित इज्जत के लिए अपने हाथों अपनी औलादों को
मार डालते हैं।
इस मामले के दो बिल्कुल अलग-अलग पहलू हैं, एक तो भारतीय समाज में प्रेम की संभावनाओं का, और दूसरा किसी भी तरह की वजह से आत्महत्या का। इन दोनों पर अलग-अलग गौर करना जरूरी है। जिस राजनांदगांव जिले से ऊपर की यह खबर आई है उसी जिले के एक दूसरे गांव में होली के दिन गर्भवती नवविवाहिता अपने मायके जाना चाहती थी, और पति को यह आपत्ति थी कि कुछ दिन पहले ही वह मायके से लौटी थी, इस पर बहस हुई, और पत्नी ने मिट्टी तेल छिडक़कर आग लगा ली, वह मर गई, और बचाते हुए पति झुलस गया। इस किस्म के घरेलू तनाव से आत्महत्या के भी बहुत से मामले सामने आते हैं। छत्तीसगढ़ में ही कल ही आत्महत्या की कुछ और खबरें भी आई हैं।
शहरीकरण के साथ-साथ जब अपने परिवारों से परे लोगों का आर्थिक सशक्तिकरण हो रहा है, तो लोग अपनी मर्जी से शादी का हौसला भी जुटा पा रहे हैं। शादी के बिना भी प्रेम की संभावनाएं बढ़ती चल रही हैं क्योंकि पढ़ाई, खेलकूद, दूसरे तरह की गतिविधियों के चलते हुए लडक़े-लड़कियों को बाहर मिलने के मौके बहुत मिल रहे हैं, और उससे दोस्ती, प्रेम, और शादी की गुंजाइश भी बढ़ते चल रही है। इससे जाति व्यवस्था भी टूट रही है, और दकियानूसी समाजों में गोत्र को लेकर जो हिंसक जिद चली आती है, वह भी खत्म हो रही है। धर्मों के बीच भी अलगाव शहरीकरण की वजह से कम हो रहा है, और अंतरजातीय और अंतरधर्मीय शादियों से सामाजिक विभाजन भी घट रहा है। इसकी रफ्तार बहुत धीमी है, लेकिन यह सिलसिला शहरीकरण और आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ आगे बढ़ रहा है। आज दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा शहरों में नहीं है, और जो हिस्सा शहरों में है वह हिस्सा भी मां-बाप के काबू वाले समाज का अधिक है, इसलिए प्रेम विवाह के पहले हिंसा अधिक होने लगती है। ऐसे में निराश प्रेमी-प्रेमिका खुदकुशी पर उतारू हो जाते हैं क्योंकि पुलिस या समाज के बाकी लोग भी जाति व्यवस्था को कायम रखने पर आमादा रहते हैं।
प्रेम-संबंधों से परे भी हिन्दुस्तान में आत्महत्याओं के आंकड़े बढ़ते चले जा रहे हैं। नेशनल क्राईम रिकॉडर््स ब्यूरो की 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ देश में आत्महत्याओं के मामले में तीसरे नंबर पर है, यहां पर हर बरस एक लाख आबादी पर 26.4 लोग खुदकुशी करते हैं, जो कि राष्ट्रीय आत्महत्या-औसत 11.3 प्रति लाख से ढाई गुना है। 2018 में छत्तीसगढ़ देश में पांचवें नंबर पर था, 2019 में चौथे नंबर पर आ गया, और 2020 में तीसरे नंबर पर। छत्तीसगढ़ के दुर्ग-भिलाई, और रायपुर देश में आत्महत्याओं के मामले में देश में तीसरे और चौथे नंबर वाले शहर हैं। जिस प्रदेश में सरकार ने किसानों को इतनी सहूलियत दी हुई है वहां पर इतने लोग क्यों जान देते हैं, यह एक सामाजिक अध्ययन का विषय होना चाहिए। यहां पर इस वैज्ञानिक तथ्य को भी समझना जरूरी है कि कुछ आत्महत्याओं का कारण अनुवांशिकी भी होता है, अगर परिवार में पहले किसी ने खुद की जान ली है, तो इसका खतरा अधिक रहता है कि बाद में भी परिवार में कोई ऐसा करे।
आत्महत्याओं की रोकथाम की सामाजिक जागरूकता में लगे हुए लोगों ने यह पाया है कि इसकी बहुत सी बिल्कुल अलग-अलग वजहें हो सकती हैं। असफल प्रेम से लेकर इंटरनेट गेम्स से प्रोत्साहित होकर भी लोग खुदकुशी करते हैं। छत्तीसगढ़ से लेकर पंजाब तक अलग-अलग बहुत से किसानी वाले राज्यों में किसानों की आत्महत्या हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है, और देश में हरित क्रांति में सबसे अधिक योगदान देने वाले पंजाब में भी किसानों की आत्महत्या हर बरस सैकड़ों की संख्या में होती है, और इस आंकड़े को किसान आंदोलनकारी पूरी तरह फर्जी करार देते हैं। फिर भी देश के सरकारी आंकड़े पिछले कई बरसों से हर बरस दस हजार से अधिक किसानों की आत्महत्या दिखा रहे हैं। हिन्दुस्तान में असफल प्रेम या अवैध कहे जाने वाले संबंधों के तुरंत बाद किसानों की आत्महत्या के आंकड़े आते हैं। लेकिन समाज और परिवार को अपने बीच के लोगों की फिक्र करनी चाहिए जो कि तनाव से गुजर रहे हैं।
जानकार लोगों का यह मानना है कि आत्महत्या करने वाले लोग काफी सोचने-विचारने के बाद ऐसा करते हैं, और उनके व्यवहार से कई बार ऐसे संकेत मिलते हैं कि वे तनाव से गुजर रहे हैं, और उनका तनाव बढ़ते चल रहा है। कई बार उनके मुंह से निकलता है कि जिंदगी में क्या रखा है, कभी उनके बर्ताव में फर्क आ जाता है, कभी वे अपने चहेते सामान लोगों में बांट देते हैं, कभी किसी के सामने अपनी जिंदगी को बोझिल बताते हैं, कभी उनकी भूख गायब हो जाती है, या नींद खत्म हो जाती है, कभी वे अनजानी आवाजें सुनाई पडऩे की शिकायत करते हैं। ऐसी तमाम बातों पर आसपास के लोगों को नजर रखनी चाहिए, और उनका मानसिक उपचार करवाना चाहिए। इसके साथ-साथ परिवार और समाज के लोग, निराश लोगों के दायरे के लोग भी उनका हौसला बंधाने का काम कर सकते हैं। आज एक दिक्कत यह भी है हिन्दुस्तान में मानसिक इलाज की बात करने पर, या परामर्श के लिए ले जाने पर लोग उनके लिए लापरवाही और हिंसा से पागल जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं।
आज हमारे इस अखबार सहित हर किस्म के मीडिया में आत्महत्या की खबरें रोज छपती हैं, और दुनिया भर के रिसर्च में यह पाया गया है कि आत्महत्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर छापना या दिखाना, कई और लोगों को ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करता है। यही वजह है कि एक आत्महत्या की खबर कगार पर खड़े हुए कई दूसरे लोगों को भी वैसा करने के लिए प्रेरित करती हैं, या उन्हें उसका हौसला देती हैं। इसे नकल करते हुए की गई आत्महत्या कहते हैं। इसके ठीक उल्टे यह है कि अगर मीडिया में सकारात्मक खबरें आती हैं, ऐसी सच्ची कहानियां आती हैं कि कैसे लोग आत्महत्या की कगार पर पहुंचकर वापिस लौटे, और फिर जिंदगी में कामयाब हुए, तो उसके असर से कई संभावित आत्महत्याएं रूकती भी हैं।
इसलिए परिवार और समाज से लेकर मीडिया तक, सबको अपने-अपने किरदार को बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है ताकि वे आत्महत्या को बढ़ावा देने के जिम्मेदार न बनें, और उसकी रोकथाम में मदद कर सकें।
हिन्दुस्तान में इतना धर्म, इतना राष्ट्रवाद, फिर भी खुशी के पैमाने पर 136वां...!
20 मार्च 2022
दुनिया में खुशी की सालाना रिपोर्ट का यह
दसवां साल है। हर बरस यह रिपोर्ट बनती है कि किस देश के लोग सबसे अधिक खुश
हैं। पिछले कई बरसों से लगातार यह देखने में आता है कि योरप के
स्कैंडेनेवियाई कहे जाने वाले देश सबसे अधिक खुशहाल देश हैं। और यह बात महज
संपन्नता से जुड़ी हुई नहीं है, यह संपन्नता के साथ-साथ वहां के लोगों की
मानसिक स्थिति और सामाजिक वातावरण जैसे कई पैमानों को भी बताती है। लिस्ट
में सबसे ऊपर योरप के देशों का ही बोलबाला है, फिनलैंड सबसे ऊपर है, फिर
डेनमार्क, आइसलैंड, स्विटजरलैंड, और नीदरलैंड्स हैं। लेकिन इस लिस्ट में
भारत का हाल देखें तो वह दुनिया के देशों में 139वें नंबर पर है। 2018 में
वह एक 133वें नंबर पर था, अब वह 139वें पर आ गया है। यह देखना भी दिलचस्प
होगा कि 2013 में जब यूपीए सरकार थी तब लोगों की खुशी के पैमाने पर भारत
दुनिया में 111वें नंबर पर था, और अब वह फिसलकर 139वें पर पहुंचा है, मतलब
यह कि लोग अब खुश नहीं हैं।
दूसरी तरफ यह भी देखने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान किन देशों के आसपास खड़ा हुआ है। हिन्दुस्तान के आसपास की लिस्ट देखें तो उसके तुरंत बाद के देशों में तमाम देश अफ्रीका के हैं, यमन और अफगानिस्तान जैसे बदहाल देश हैं जो कि भुखमरी की कगार पर हैं। हिन्दुस्तान के पड़ोस के सारे ही देश हिन्दुस्तान से अधिक खुशहाल जिंदगी जीने वाले पाए गए हैं, कम से कम वहां की आबादी हिन्दुस्तान के मुकाबले अधिक खुश है। इस लिस्ट में पाकिस्तान 103 नंबर पर है, नेपाल उसके भी ऊपर 85 नंबर पर है, चीन 82 नंबर पर है, और हिन्दुस्तान के दूसरे पड़ोसी बांग्लादेश 99 नंबर पर है, इराक 109 नंबर पर है, इरान 116 नंबर पर है, म्यांमार 123 नंबर पर है, श्रीलंका 126 पर है। इतने तमाम देश के लोग अपने आपको हिन्दुस्तानियों के मुकाबले अधिक खुश पाते और बताते हैं।
इस रिपोर्ट को दुनिया में लोगों की खुशी और खुशहाली को आंकने का एक सबसे अच्छा औजार माना जा रहा है, इसमें किसी देश का दर्जा तय करते हुए प्रति व्यक्ति, सामाजिक सुरक्षा, औसत उम्र, जिंदगी में पसंद की आजादी, उदारता, और भ्रष्टाचार के प्रति नजरिया जैसी बातों पर आंकलन किया जाता है। इस लिस्ट में भारत की भारी गिरावट की कई वजहें पाई गई हैं। यह देश दुनिया के दवा-उद्योग की राजधानी माना जाता है, यहां दुनिया भर से चिकित्सा-पर्यटन पर लोग आते हैं, लेकिन यह अपने नागरिकों को इलाज मुहैया कराने में, औसत उम्र के मामले में दुनिया में 104 नंबर पर है। इस लिस्ट में सबसे आखिरी 146वें नंबर पर अफगानिस्तान हैं, और बदहाली की इस लिस्ट में हिन्दुस्तान उससे बस 10 सीढ़ी बेहतर है।
अब इन आंकड़ों का क्या मतलब निकाला जाए? 2013 में जब यूपीए सरकार थी, उस वक्त अगर हिन्दुस्तान दुनिया के 110 देशों से बदहाल था, तो आज वह 136 देशों से अधिक बुरी हालत में है। लोग खुश क्यों नहीं है? लोगों को तो आज एक उग्र राष्ट्रवाद मिला हुआ है, जिसकी वजह से एक साकार या निराकार दुश्मन को देखते हुए उनका कलेजा अधिक ठंडा होना चाहिए था, लेकिन वैसा दिख नहीं रहा है। आज हिन्दुस्तानियों की जिंदगी में धर्म जिस तरह घोल-घोलकर पिला दिया गया है, उससे भी लोगों को भारी खुश रहना चाहिए था, लेकिन वे वैसे खुश दिख नहीं रहे हैं। यह भी एक अजीब बात है कि योरप के जो देश इस लिस्ट में सबसे अधिक खुश दिख रहे हैं, उन देशों में धर्म का महत्व घटते चले जा रहा है, चर्च के भूखों मरने की नौबत आ गई है, और लोग धर्म से परे की जिंदगी में बहुत खुश हैं। तो क्या हिन्दुस्तान में आज का धार्मिक उन्माद लोगों की जिंदगी की खुशियों को बढ़ाने के बजाय घटा रहा है?
इस रिपोर्ट को भी और बहुत सी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट की तरह खारिज किया जा सकता है कि यह भारत को बदनाम करने की साजिश है। लेकिन क्या यह हकीकत नहीं है कि धार्मिक उन्माद में लगे हुए आबादी के एक छोटे हिस्से की वजह से बाकी तमाम आबादी एक नाजायज तनाव और खतरे से गुजर रही है, और उसकी जिंदगी की खुशियां कम हो गई हैं? यह बात समझने के लिए तो किसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट की जरूरत भी नहीं है, और भारतीय समाज के अमन-पसंद लोगों की बहुतायत से बात करके ही इसको समझा जा सकता है। एक तरफ धार्मिक उन्माद, धर्मान्धता, नफरत, और उसके साथ-साथ बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई। कोई हैरानी नहीं है कि हिन्दुस्तान में पहले से अधिक लोगों में खुशी पहले से कम है।
आज जब धर्म के नाम पर इस देश को बांटा जा रहा है, लोगों को नफरत सिखाई जा रही है, और आबादी का एक छोटा लेकिन नारेबाज हिस्सा लगातार भडक़ाऊ और हिंसक बातें पोस्ट कर रहा है, तब यह उन्माद किसी में खुशी नहीं भर सकता। किसी तबके, धर्म या जाति से नफरत का मतलब खुशी नहीं हो सकता, उन्माद और हिंसा का मतलब खुशी नहीं हो सकता। हाल के बरसों में हिन्दुस्तान ने अभूतपूर्व धर्मोन्माद देखा है, असाधारण साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण देखा है, ऐसा उग्र राष्ट्रवाद हिन्दुस्तान ने कभी देखा नहीं था, लेकिन ऐसा लगता है कि इन सबने मिलकर भी इस देश को खुशी नहीं दिला पाई है। यह देश तमाम सामाजिक और आर्थिक पैमानों पर, लोकतांत्रिक और मानवाधिकार के पैमानों पर दुनिया के कम से कम सौ देशों के काफी नीचे है।
आदिवासियों के कत्ल पर सरकार किसी भी पार्टी की रहे, रूख एक सा
15 मार्च 2022
छत्तीसगढ़ के बस्तर में बेकसूर और निहत्थे
आदिवासियों की सुरक्षा बलों के हाथों मौत एक आम बात है। हर बरस कई ऐसे कत्ल
होते हैं लेकिन चूंकि कातिल सरकारी वर्दीधारी रहते हैं, और वे लोकतंत्र को
बचाने के नाम पर लोगों का कत्ल करते हैं इसलिए उस कत्ल को हत्या न कहकर
नक्सल-संदेह में हुई मौत कह दिया जाता है, या कभी यह कह दिया जाता है कि
सुरक्षा बलों ने आत्मरक्षा में गोलियां चलाईं जिनमें ये मौतें हो गईं, या
नक्सलियों के साथ क्रॉस फायरिंग में ये ग्रामीण मारे गए। सबसे अधिक तो यही
होता है कि पुलिस और सुरक्षा बल इस बात पर अड़े रहते हैं कि मारे गए लोग
नक्सली थे, उनके पास कुछ हथियार भी रखकर जब्ती दिखा दी जाती है। लेकिन बहुत
से मामले ऐसे रहते हैं जिनमें शक की गुंजाइश नहीं रहती है, जिनमें सरकार
भी भारी जन-दबाव में किसी जांच के लिए मजबूर होती है। जब-जब ऐसी जांच होती
है तब-तब यह सामने आता है कि सुरक्षा बलों ने बिना किसी खतरे के, बिना किसी
उकसावे और भडक़ावे के निहत्थे और बेकसूर ग्रामीण आदिवासियों को मार डाला
था।
ऐसी ही एक वारदात 2013 में बीजापुर जिले के जगरगुंडा थाना-इलाके के एडसमेटा गांव में हुई थी जिसमें 8 बेकसूर आदिवासियों को सुरक्षा बलों ने मार डाला था, जिनमें तीन बच्चे भी थे। इस मामले की न्यायिक जांच एमपी हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज, जस्टिस वी.के. अग्रवाल ने की थी, और कल यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ विधानसभा में पेश की गई है। इस रिपोर्ट का नतीजा यह है कि समारोह मनाते आदिवासियों की जिस भीड़ पर सीआरपीएफ ने गोलियां चलाई थीं, उन सुरक्षा-जवानों को इन आदिवासियों से कोई खतरा नहीं था। न इन्होंने सुरक्षा बलों पर गोलियां चलाई थीं, न हमला किया था। इसलिए सीआरपीएफ ने ये गोलियां आत्मरक्षा में नहीं चलाईं बल्कि आदिवासियों को पहचानने में हुई गलती और घबराहट के कारण चलाईं।
जैसा कि आमतौर पर इस किस्म के जांच आयोग आदिवासी जिंदगी से नावाकिफ शहरी जजों वाले होते हैं, इसलिए इनमें आदिवासी जिंदगियों के लिए वह दर्द नहीं होता जो कि आदिवासियों के जानकार किसी हमदर्द का हो सकता है। थोक में किए गए ऐसे कत्ल भी सजा नहीं पाते हैं क्योंकि सरकारें इस बात से डरती हैं कि बेकसूरों के कत्ल के जुर्म में अगर सुरक्षा बलों को सजा होने लगे, तो ऐसे हथियारबंद मोर्चों पर उनका मनोबल टूटेगा। यह सोच निहायत ही अलोकतांत्रिक और शहरी सोच है जिसमें निहत्थे और बेकसूर आदिवासियों के कत्ल की कीमत पर भी वर्दी का मनोबल बनाए रखने को जरूरी समझा जाता है। और बस्तर के मामले में हमने बार-बार ऐसी सोच देखी है, कोई भी पार्टी सरकार चलाए, सत्ता की सोच तकरीबन एक सरीखी दिखती है। सत्तारूढ़ पार्टी और सुरक्षा बलों के हित मानो एक हो जाते हैं, और नक्सल-संदेह में कितने ही बेकसूर आदिवासियों का कत्ल माफ कर दिया जाता है। जांच के नाम पर, जांच आयोग के नाम पर ऐसी लीपापोती की जाती है कि किसी कातिल को कोई सजा मिल ही नहीं पाती। अब 2013 के इस हत्याकांड की जांच रिपोर्ट का कवर पेज ही कहता है- एडसमेटा में मुठभेड़ की घटना के मामले में न्यायिक जांच आयोग का प्रतिवेदन। जबकि यह रिपोर्ट खुद ही लिख रही है कि यह साबित नहीं हुआ है कि उक्त मुठभेड़ नक्सलियों के साथ हुई, और आगे यह साफ होता है कि घटना सुरक्षा बलों द्वारा आग के आसपास इक_े लोगों को देखकर उन्हें संभवत: गलती से नक्सल समझकर घबराहट की प्रतिक्रिया के कारण गोलियां चलाने के कारण हुई।
अब सवाल यह उठता है कि वर्दीधारी सुरक्षा बलों का पूरा जत्था पूरी तैयारी से जंगल गया हुआ है, और वहां पर निहत्थे आदिवासियों को देखकर वह इतना हड़बड़ा रहा है कि वह उन पर गोलियां चलाकर 8 लोगों को मार डाल रहा है जिनमें नाबालिग भी थे। तो यह सुरक्षा बलों की कैसी तैयारी है, और यह कैसी घबराहट है जिसके चलते बेकसूरों को भून दिया गया? यह पूरा सिलसिला बताता है कि आदिवासी जिंदगी इतनी सस्ती है कि नक्सलियों को मारने के नाम पर जंगल में बसे हुए मासूम और सीधे-साधे, निहत्थे आदिवासियों को भी महज अपने संदेह के आधार पर मार डाला जा सकता है। अगर सुरक्षा बल किसी के नक्सली होने की आशंका में इतने घबरा सकते हैं कि वे उन्हें गोलियों से भून सकते हैं, तो फिर ऐसी हालत में सरकार को यह नीतिगत फैसला लेना चाहिए कि ऐसे डरे-सहमे सुरक्षा बल को ग्रामीण इलाकों में भेजा ही क्यों जाए? खुद जांच रिपोर्ट की भाषा और उसके निष्कर्ष न छुपने लायक तथ्यों को तो मानो मजबूरी में सामने रख रहे हैं, लेकिन किंतु-परंतु जैसे शब्दों के साथ संदेह का इतना लाभ सुरक्षा बलों को दे रहे हैं कि मानो वह किसी चुनाव के पहले किसी सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा दिया गया चुनावी तोहफा हो। सुरक्षा बलों द्वारा घबराहट में गोली चलाना इस रिपोर्ट में इतनी बार इतने तरह से लिखा गया है कि ऐसा लगता है कि बेकसूर आदिवासियों की लाशों से भी अधिक ठोस सुबूत इस घबराहट का है। बार-बार इस घबराहट का हवाला देना एक किस्म से कातिल सिपाहियों को बचने के लिए एक रास्ता देना है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के आधार पर इसकी जांच 2019 में सीबीआई को दे दी गई थी, और वह जांच चल रही है। उस जांच, और उसके नतीजे के बारे में अभी कुछ कहना ठीक नहीं है, लेकिन यह अकेला मामला नहीं है जिसने बस्तर में बेकसूर आदिवासियों को थोक में मारा है। इससे पहले भी राज्य की पुलिस द्वारा आदिवासी गांवों को जलाने और लोगों को मारने के मामले सामने आ चुके हैं, महिलाओं से बलात्कार के मामले भी सामने आ चुके हैं, और विपक्ष में रहते हुए जो कांग्रेस आदिवासियों की हमदर्द थी, वह सत्ता में आने के बाद अपने कार्यकाल के ऐसे जुर्म जायज ठहराने में लगी दिखती है। यह मौका जनसंगठनों द्वारा नक्सल कहलाने का खतरा उठाते हुए भी ऐसी सरकारी हिंसा को उजागर करने का है जिसके बिना आदिवासियों के बचने की और कोई गुंजाइश नहीं है। बस्तर को लेकर यह सरकारी फैशन है कि आदिवासियों की हमदर्द कोई भी बात, उनका कोई भी आंदोलन, नक्सलियों का करवाया हुआ मान लिया जाता है। सत्ता का चरित्र एक ही होता है, प्रदेश में भाजपा की सरकार गई, और कांग्रेस की सरकार आई, ये दोनों ही सरकारी सुरक्षा बलों की हिमायती रहीं, और बेकसूर आदिवासियों के कत्ल पर इनकी हमदर्दी की कमी एक बराबर रही। इसलिए जांच आयोग के इस प्रतिवेदन से सरकारी सुरक्षा बलों के चाल-चलन पर कोई फर्क पड़ेगा, ऐसी उम्मीद गलत होगी। सीबीआई जांच के बाद कुछ लोगों को सजा मिल सके, तो उसमें अभी से कई बरस लगना बाकी है। आदिवासियों की मौत इसी तरह जारी रहेगी, और शहरी लोकतंत्र के पास उनके लिए गोलियां ही हैं।
पंजाब में जीतना तो आप के लिए छोटी चुनौती थी, बड़ी चुनौती पंजाब को चलाना है...
14 मार्च 2022
पंजाब में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत और जनता द्वारा कांग्रेस सरकार की बुरी तरह बर्खास्तगी लोगों को हैरान कर गई है। इसके साथ-साथ जिस तरह वहां अकाली दल और भाजपा किनारे कर दिए गए हैं, इन तीनों पार्टियों के सारे के सारे बड़े नेता जनता ने हरा दिए हैं, वह भी चौंकाने वाली नौबत है। बहुत से लोगों को आम आदमी पार्टी की सरकार आते दिख रही थी, लेकिन वह ऐसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत के साथ आएगी इसका अंदाज कई लोगों को नहीं था, या बेहतर यह कहना होगा कि शायद किसी को नहीं था। वहां पर लोग पांच कोने का संघर्ष देख रहे थे जिनमें ऊपर लिखी गई चारों पार्टियों के अलावा किसान उम्मीदवार भी एक ताकत माने जा रहे थे, लेकिन जनता ने खुलकर दो बातें साफ कीं, एक तो यह कि उसने कांग्रेस, भाजपा और अकाली, पंजाब में सत्तारूढ़ रही इन तमाम पार्टियों को पूरी तरह खारिज कर दिया, और आम आदमी पार्टी के नारे के मुताबिक एक मौका केजरीवाल को दिया है।
अब आप की सरकार पंजाब में चुनौतियों के एक टोकरे के साथ काम शुरू कर रही है। पंजाब की अर्थव्यवस्था खराब हालत में है, बेरोजगारी आसमान छू रही है, नौजवानों में नशा पंजाब के हर दूसरे-चौथे घर को बर्बाद कर चुका है, उद्योग लग नहीं रहे हैं, और किसान कानून वापिस होने के बावजूद पंजाब में किसानों की यह हकीकत तो दर्ज है ही कि वहां देश में सबसे अधिक किसान आत्महत्याएं हो रही हैं। इसके साथ-साथ पंजाब के बारे में यह बात भी कही जाती है कि वहां के लोग अपनी सरकार पर दिल्ली से राज पसंद नहीं करते। ऐसे में दिल्ली से चल रही आम आदमी पार्टी का जीता हुआ पंजाब राज्य से कितना चलेगा और दिल्ली से कितना, इसे लेकर भी लोगों में कुछ हैरानी बनी हुई है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि दिल्ली में स्कूल और अस्पताल नाम की जिन दो सहूलियतों को लेकर आम आदमी पार्टी अपनी पीठ थपथपाती है, वे दोनों चीजें तो कायदे से म्युनिसिपल के करने की रहती हैं, और राज्य सरकार पंजाब में इन बातों को अपनी पूरी कामयाबी नहीं बता पाएगी, दिल्ली में बात कुछ और थी।
दिल्ली को कुछ समझे बिना आम आदमी पार्टी के कामकाज को समझना मुमकिन नहीं है। दिल्ली की सरकार को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है। उसके पास न पुलिस है, और न जमीनों का हक। दिल्ली के सारे बड़े प्रोजेक्ट केन्द्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय के अधीन आते हैं, और दिल्ली की अधिकतर दूसरी दिक्कतों और संभावनाओं के लिए राज्य सरकार न जिम्मेदार है, न अधिकारसंपन्न। इसके अलावा दिल्ली में स्थानीय म्युनिसिपल और दिल्ली विकास प्राधिकरण, राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण जैसे दूसरे संगठन भी हैं जो कि राज्य सरकार से परे काम करते हैं, और वहां राज्य सरकार की संभावनाएं, उसकी स्वायत्तता, सब लेफ्टिनेंट गवर्नर के मातहत रहती हैं, और केजरीवाल सरकार किसी आईएएस का तबादला भी करने का हक नहीं रखती है। बात-बात में उसे एलजी की इजाजत लेनी पड़ती है। इसलिए केजरीवाल सरकार दिल्ली को एक बड़े म्युनिसिपल की तरह चला रही थी, और केजरीवाल एक म्युनिसिपल कमिश्नर अफसर की तरह काम कर रहे थे। पंजाब एक अलग मामला है, और दिल्ली का प्रयोग पंजाब में बहुत ही सीमित उपयोग का है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री बन रहे भगवंत मान का सरकार चलाने का कोई तजुर्बा नहीं है, और उन्हें विरासत में एक भयानक भ्रष्ट और घाघ नौकरशाही मिल रही है, जिससे काम लेना एक बड़ी चुनौती रहेगी। केजरीवाल के साथ म्युनिसिपल जैसी दिल्ली चलाते भी यह सहूलियत थी कि वे आईआईटी से पढक़र निकले हुए इंजीनियर थे, और भारत सरकार में एक बड़ी नौकरी करते हुए पहले सामाजिक आंदोलन, और फिर राजनीति में आए थे। उनकी पत्नी भी इसी बड़ी सरकारी नौकरी में थीं। यानी उनके पास सरकार के कामकाज का कुछ तजुर्बा था, और वह सहूलियत भगवंत मान को हासिल नहीं है। दिल्ली और पंजाब की कई दिक्कतों पर एक-दूसरे से टकराव की नौबत भी है। पंजाब में किसानों को फसल के ठूंठ, पराली, जलाने की मजबूरी है, और दिल्ली लगातार इसका विरोध करते आई है कि इससे दिल्ली की हवा दमघोंटू और जहरीली हो जाती है। अब दोनों जगह आम आदमी पार्टी की सरकार रहने से इसका क्या होगा, यह भी सोचने की बात है। पंजाब की शक्ल में आम आदमी पार्टी को अपने इतिहास में पहली बार एक पूर्ण राज्य चलाने का मौका मिल रहा है, और उसकी दिल्ली की कामयाबी का पैमाना इस राज्य में काम नहीं आने वाला है। पंजाब की चुनौतियां भी अलग हैं, और संभावनाएं भी। हो सकता है कि आप सरकार पंजाब में दिल्ली से अधिक कामयाब भी हो जाए, या बहुत हद तक फ्लॉप भी हो जाए। पंजाब में सरहद पाकिस्तान से लगी हुई है, और वहां से नशे की तस्करी के अलावा आतंक का खतरा भी लगातार बने रहता है। पहली बार पुलिस सम्हालने जा रही आम आदमी पार्टी के सामने यह सरहद भी चुनौती रहेगी क्योंकि इसके किनारे की बहुत चौड़ी पट्टी राज्य की पुलिस के अधिकार क्षेत्र से परे बीएसएफ के हाथ रहती है, और यह राज्य और केन्द्र के बीच टकराव का एक मुद्दा रह सकती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि केजरीवाल सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट तक जाकर दिल्ली सरकार से टकराव के कई प्रयोग किए थे, और उन सबमें उसकी हार हुई थी। दिल्ली में चुनौतियां भी सीमित थीं, और संभावनाएं भी, पंजाब में ये दोनों असीमित हैं, और विरासत में एक बदहाल राज्य मिला है।
पंजाब को आम आदमी पार्टी की दिल्ली की पहली जीत के बाद का सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे इस पार्टी की देश भर की संभावनाएं भी खुलती हैं, और वह कांग्रेस और भाजपा के एक विकल्प के रूप में भी कहीं-कहीं कोशिश कर सकती है, यह एक और बात है कि बहुत से राजनीतिक विश्लेषक भी इस पार्टी को संघ परिवार का एक मुखौटाधारी संगठन मानते हैं, और यह मानते हैं कि आखिर में जाकर यह किसी चुनौती की नौबत रहने पर भाजपा के ही हाथ मजबूत करने का काम करेगी। भाजपा को आप की पंजाब जीत इस हिसाब से भी बुरी नहीं लग रही होगी कि उसने कांग्रेस की सरकार को बेदखल किया है, और भाजपा से अलग हुए अकालियों को भी मटियामेट कर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के साथ आम आदमी पार्टी का किस तरह का तालमेल रहेगा, इस पर भी लोगों की निगाह रहेगी, हो सकता है कि यह तालमेल तुरंत शुरू न हो, और भाजपा के किसी नाजुक मौके के लिए बचाकर रखा जाए। फिलहाल आम आदमी पार्टी के सामने पंजाब दिल्ली के मुकाबले कई गुना अधिक बड़ी चुनौती है, और उसे केजरीवाल जैसा सरकारी कामकाज का जानकार भी हासिल नहीं है। आगे-आगे देखें होता है क्या?
अमीरों की अर्थव्यवस्था से गरीबों का हाल आंकने का सिलसिला और पैमाना गलत
यूपीए सरकार के वक्त भारतीय रिजर्व बैंक के
गवर्नर रहे और मशहूर अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने अभी एक इंटरव्यू में कहा
है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण महंगाई बढ़ेगी, और यह लंबे समय तक रहेगी,
इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि कई चीजों के
दामों में इस युद्ध से बढ़ोत्तरी हो चुकी है, और कई देशों में पहले से ही
महंगाई अधिक थी, अब इन दोनों के मिले-जुले असर को देखें तो यह महंगाई और
मंदी लंबी चलेंगी। उन्होंने कहा कि रूस ऊर्जा सहित दूसरे कई सामानों का एक
बड़ा एक्सपोटर है और रूस पर पश्चिमी देशों के लगाए हुए आर्थिक और कारोबारी
प्रतिबंध से अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
आज दुनिया में दिक्कत यह है कि अर्थव्यवस्था के पैमाने आम इंसानों की जिंदगी से काटकर अलग कर दिए गए हैं। जब किसी देश में बेरोजगार आसमान पर पहुंच रही है, महंगाई चरम पर है, लोग सरकारी रियायती अनाज के बिना भुखमरी की हालत में हैं, तब अगर उस देश का शेयर बाजार आसमान पर पहुंचता है, तो क्या उसे सचमुच ही देश की अच्छी और मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत मान लिया जाए? हिन्दुस्तान इसकी एक बड़ी मिसाल है कि यहां पर जनता जब से बदहाल है, तब शेयर बाजार सबसे खुशहाल है। इसलिए अर्थव्यवस्था के पैमानों को अलग-अलग देखने की जरूरत है कि शेयर बाजार का रूझान और जनता की हकीकत के बीच क्या फर्क है? ऐसा न होने पर अंबानी-अडानी की कमाई को आम जनता की कमाई से जोडक़र औसत निकालकर आम जनता को खुशहाल साबित किया जा सकता है। इसलिए आज अगर हिन्दुस्तान में 20 लाख की कार के लिए 50 हजार लोग कतार में लगे हैं, तो इसे आम जनता की खुशहाली मान लेने की गलती नहीं करनी चाहिए।
रघुराम
राजन की बातों से परे भी यह समझने की जरूरत है कि दुनिया की एक बड़ी जंग
हो, या कि मौसम की सबसे बुरी मार हो, सबसे अधिक जख्म सबसे कमजोर तबकों को
आते हैं। बाढ़ हो या तूफान, उसमें सबसे अधिक तबाही सबसे गरीब आबादी की होती
है क्योंकि वे ही लोग सबसे नाजुक और खतरनाक जगहों पर बसे होते हैं। जब
सूखा पड़ता है और उसकी वजह से लोगों को अपना इलाका छोडक़र, घर-बार छोडक़र
बाहर जाना पड़ता है, तो सूखे की सबसे बुरी मार सुखी तबके पर नहीं पड़ती,
गरीबी से दुखी तबके पर पड़ती है जो कि एक मौसम का सूखा झेलने की हालत में
भी नहीं रहता। आज अगर हिन्दुस्तान में आधी आबादी रियायती सरकारी अनाज की
वजह से जिंदा है, तो यह जिंदा रहना भी क्या जिंदगी है? जिस संसद को इस
गरीबी पर सोच-विचार करना था, लोगों को इससे उबारने की कोशिश करनी थी, वह
संसद अपने आप पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करने जा रही है, इसके मुखिया
मुल्क के प्रधानमंत्री अपने लिए 8 हजार करोड़ रूपए का विमान खरीद रहे हैं।
ऐसे में अदम गोंडवी की लिखी एक गजल याद पड़ती है-
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं,
दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है?
दुनिया या किसी देश की अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय आंकड़ों से आंकने का सिलसिला ही नाजायज है। गरीबों की आर्थिक स्थिति को अलग से आंकने के पैमाने बिल्कुल साफ रहने चाहिए, और दुनिया या किसी भी देश में गरीब आधी आबादी के हाल पर अलग से रिपोर्ट बननी चाहिए। हिन्दुस्तान में आज जीडीपी या सकल राष्ट्रीय उत्पादन की शक्ल में देश के हाल को आंका जाता है, लेकिन अडानी और अंबानी की दौलत दो या तीन गुना हो जाने से देश की नीचे की आधी आबादी की जिंदगी पर कोई फर्क पड़ सकता है क्या? क्या बाजार में एक करोड़ रूपए से अधिक दाम वाली कारों की बिक्री दोगुना हो जाने से मोपेड चलाने वाले गरीब की पेट्रोल खरीदने की ताकत को भी दोगुना आंकना ठीक होगा? यह पूरा सिलसिला आंकड़ों का फरेब है, और अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को लेकर जनसंगठनों को यह मांग करनी चाहिए कि गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों की अर्थव्यवस्था, उनकी आर्थिक हालत पर अलग से रिपोर्ट जारी की जानी चाहिए जिस तरह कि एक वक्त अलग से रेल बजट आता था। आज केन्द्र और प्रदेश सरकार को आर्थिक विकास के तमाम आंकड़ों में से बीपीएल समुदाय के आंकड़े अलग से सामने रखने चाहिए, लोगों को बीपीएल से जुड़े आंकड़े अलग से पूछने चाहिए। जब तक गरीबों के हिमायती पैमाने अलग से लागू नहीं होंगे, तब तक हिन्दुस्तान जैसे देश में दो सबसे अमीर लोगों की तिजोरियों को गरीबी की रेखा के नीचे की हंडियों को भरा दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहेगा।









