संपादकीय
30 जून 2018

भारत में पिछले दस-बीस बरस की अखबारी कतरनों का विश्लेषण किया जाए तो यह समझ ही नहीं पड़ेगा कि जो नेता अभी कुछ बरस पहले तक विपक्ष में रहने पर कुछ और सोचते थे, कुछ और कहते थे, वे अब उसकी ठीक उल्टी बात क्यों कहने लगे हैं? फर्क महज इतना रहता है कि कल वे सत्ता में थे, और आज विपक्ष में है, या फिर इसके ठीक उल्टे, कल तक वे विपक्ष में थे, और आज सत्ता में है। अखबारी कतरनों में तलाश आसान नहीं होती थी, लेकिन आज इंटरनेट पर जो बात स्थाई रूप से ऑनलाईन बनी रहती है, उस पर तलाश भी पल भर का काम रहता है, और उसके सुबूत भी तुरंत सम्हाले जा सकते हैं। ऐसे हैरानी तब अधिक होती है जब स्विस बैंकों के कालेधन, या डीजल-पेट्रोल की महंगाई, या पाकिस्तान के साथ फौजी टकराव जैसे मुद्दों पर किसी एक नेता या पार्टी के बयानों में कुछ बरसों में आने वाले विरोधाभास के अलावा देश के भीतर बच्चियों या महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार को लेकर भी बयानों में विरोधाभास आ जाता है। इससे ऐसा लगता है कि क्या इंसानियत विपक्ष में रहते हुए रहती है, और सत्ता में आने पर वह कथित हैवानियत में तब्दील हो जाती है? हालांकि इस हैवानियत शब्द को इंसानियत से परे देखने का हमारा कोई इरादा नहीं है क्योंकि यह इंसानियत के भीतर का ही एक हिस्सा है, जिसे इंसान अपने आपको बेहतर बताने के लिए बाहर निकालकर रावण के पुतले की तरह खड़ा कर देते हैं, उसे कोसते हैं, पीटते हैं, और जलाते हैं। इंसानियत के भीतर ही हैवानियत बसी रहती है, और कभी इंसान उस पर काबू कर पाते हैं, और कभी वह बेकाबू होकर बलात्कार करने लगती है, शरीर से, या फिर महज जुबान से भी।
आज जब एक प्रतिष्ठित और गंभीर, थॉमसन फाऊंडेशन की रिपोर्ट हिन्दुस्तान को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश करार दे रहा है, तो उसके विश्लेषण के तरीकों से लेकर उसकी नीयत तक, हर चीज का शक किया जा रहा है, और उसके निष्कर्षों को खारिज किया जा रहा है। हो सकता है कि ये नतीजे एकदम ही सही न हो, क्योंकि किसी भी शोध या सर्वे के नतीजे में कुछ चूक हो सकती है। लेकिन इसे खारिज करने के बजाय क्या हिन्दुस्तान को कुछ आत्ममंथन नहीं करना चाहिए? और इस आत्ममंथन में यह भी जरूरी नहीं है कि लोग अपने और अपने विरोधियों के विचारों के बीच मंथन करके किसी नतीजे तक पहुंचने की कोशिश करें, सच तो यह है कि लोग अपने खुद के भीतर भी आत्ममंथन कर सकते हैं कि अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने महिलाओं पर हो रहे जुल्म के बारे में सत्ता में रहते हुए क्या कहा था, और जब वे विपक्ष में रहे, तब उन्होंने क्या कहा था। यह आत्ममंथन दो विचारधाराओं या दो सोच के बीच करने की जरूरत नहीं है, अधिकतर बड़े नेताओं के सत्ता और विपक्ष के दो वक्तों के वक्त के बयानों के बीच आत्ममंथन हो सकता है।
हिन्दुस्तान में दिक्कत यह है कि किसी विदेशी संस्था ने अगर इस देश को आईना दिखाया है, तो उसके आंकड़ों पर सोचने-विचारने के बजाय लोग तेजी से फर्जी आंकड़े गढ़कर, उसके पोस्टर बनाकर तेजी से सोशल मीडिया में फैलाने में जुट जाते हैं, जैसे कि आज जुटे हुए हैं। ऐसे लोग शायद किसी अंधविश्वास, किसी अंधभक्ति, या ऐसा ही करने के पेशे वाले हैं। और उनको शायद इस बात की जरा भी फिक्र नहीं है कि हकीकत को नकारने से वे उन लड़कियों-महिलाओं की जिंदगी पर भी खतरा बढ़ाते चल रहे हैं, जो कि उनके अपने परिवारों की हो सकती हैं। राजनीति ठीक है, उसके बारे में तो बोलचाल की गंदी जुबान में कहा जाता है कि राजनीति बहुत कुत्ती चीज होती है। ऐसा कहने वाले यह भी नहीं सोचते हैं कि क्या दुनिया की कोई भी कुतिया राजनीति जितनी गंदी हो सकती है कि उसका नाम ऐसी गाली गढऩे के लिए इस्तेमाल किया जाए? फिर भी हम राजनीति को गंदी चीज मानकर भी सोचते हैं, तो लगता है कि क्या यह इतनी गंदी भी हो सकती है कि देश में मासूम बच्चियों के साथ हो रहे बलात्कारों को लेकर राजनीति करे? आज ही सोशल मीडिया पर मध्यप्रदेश के एक भाजपा सांसद की एक तस्वीर तैर रही है जिसमें वे मंदसौर में एक बच्ची के साथ हुए बलात्कार के बाद वहां पहुंचे हैं, और बच्ची के गरीब मां-बाप के साथ, अपने तीन विधायकों के साथ अस्पताल में तस्वीर खिंचवाकर उसे फेसबुक पर पोस्ट भी कर रहे हैं। इस तरह सांसद बलात्कार की शिकार बच्ची के मां-बाप के चेहरे और उनकी शिनाख्त उजागर भी कर रहे हैं। ऐसा कई प्रदेशों में कई पार्टियों के नेता करते हुए दिखते हैं। लेकिन मंदसौर में इस बच्ची के मां-बाप की खबर के साथ एक टीवी चैनल का वीडियो भी दिख रहा है जिसमें भाजपा के स्थानीय विधायक सुदर्शन गुप्ता उस बच्ची के मां-बाप से कह रहे हैं कि उन्हें अस्पताल आने के लिए सांसद साहब का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि वे खासतौर पर उनसे मिलने यहां आए हैं। इस दौरान सांसद-विधायक बच्ची के मां-बाप के साथ तस्वीरें खिंचवाने में लगे हुए थे।
लोग जब कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बलात्कार की रिपोर्ट करने की हिम्मत किसी परिवार में इसलिए नहीं होती कि ऐसी रिपोर्ट के बाद फिर पुलिस जुबान या बदन से बलात्कार करने लगती है, पूरी अदालती कार्रवाई के दौरान अदालती गलियारों में लोग आंखों से बलात्कार करने लगते हैं, समाज बलात्कार की शिकार को बलात्कार के लायक एक फिट मामला मानने लगता है, और नेता ऐसी जख्मी बच्ची या महिला को फोटो खिंचवाने का मौका मान लेते हैं। हम नहीं जानते कि थॉमसन फाऊंडेशन की रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक हिंसक देश बताना सही है या गलत, लेकिन यह देश जिस तरह अपने हाल पर अफसोस के बजाय अपने से अधिक दिखते या लगते देशों की मिसाल गिनाकर अपने को बेहतर साबित करने में जुट जाता है, वह कोशिश अपने आपमें अपनी बच्चियों और महिलाओं के खिलाफ एक बहुत बड़ी हिंसा है। जब लोगों की जुबान बलात्कारी के धर्म और बलात्कार की शिकार लड़की के धर्म को देखकर खुले, या सिल जाए, जब लोगों की जुबान बलात्कार के प्रदेश की सरकार की पार्टी को देखकर खुले, या न खुले, तब ऐसी जुबानों को विदेशियों के किसी सर्वे पर कुछ कहने का हक है? (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार















