एआई कंपनी का संस्थापक गिना रहा कि यह दुनिया का आखिरी आविष्कार होगा...

30 अप्रैल 2026  

 

दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी, और टेस्ला जैसी चर्चित कार कंपनी, एक्स जैसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाने वाले एलन मस्क अभी अपनी ही पिछली एक भागीदारी वाली कंपनी, ओपन एआई, के खिलाफ अदालत में बयान दे रहे हैं। यह बयान आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर आज सामने खड़े हुए खतरों को तो गिनाता ही है, साथ-साथ एआई की भविष्य की संभावनाओं, कारोबारी आशंकाओं पर भी मस्क का नजरिया बताता है। ओपन एआई के साथ मस्क का झगड़ा इस बात को लेकर है कि उस कंपनी में उन्होंने एक बड़ी पूंजी इसलिए लगाई थी कि कंपनी ने उसे समाजसेवा में इस्तेमाल करने का वायदा किया था, लेकिन बाद में उसके मालिक ने उसे खालिस कारोबार में लगा दिया। अमरीका की एक अदालत में चल रही यह गवाही इस कंपनी में पूंजीनिवेश से परे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बारे में बड़ी अहमियत वाली बातें सामने रख रही है। 

एलन मस्क का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से एक कदम आगे बढक़र अब जो एआई विकसित हो रहा है, वह एजीआई है (आर्टिफिशियल जनरल इंटेलीजेंस)। उन्होंने अदालत में यह तर्क दिया कि एजीआई अगर किसी ऐसी कंपनी के नियंत्रण में आ जाती है जिसका मकसद केवल कमाना है, तो वह एआई सुरक्षा प्रोटोकॉल को दरकिनार कर सकती है। मस्क का मानना है कि 2026-27 में एआई इंसानी दिमागी से ज्यादा स्मार्ट हो जाएगा, और वह स्वायत्त फैसले लेने लग सकता है। उन्हें डर है कि ऐसा एआई इंसानों को चीटिंयों की तरह समझ सकता है, जिन्हें नष्ट करने का उसका कोई इरादा तो नहीं होगा, लेकिन अगर वे उसके रास्ते में आए तो वह उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल देगा। मस्क ने अदालत में यह चेतावनी भी दी कि एआई का इस्तेमाल जंग छिड़वाने, और सूचनाओं को इस तरह तोडऩे-मरोडऩे के लिए किया जा सकता है कि उससे दुनिया भर के लोकतंत्र अस्थिर हो सकें। मस्क एआई को बार-बार मानवता का अंतिम आविष्कार कहते हैं। वे मानते हैं कि आज एजीआई के विकास में कई बड़ी कंपनियां लगी हैं, और उनका बुनियादी मकसद मुनाफा है न कि इंसानी नस्ल की हिफाजत। वे यह भी मानते हैं कि एआई या एजीआई से दुनिया भर के लोकतंत्रों को अस्थिर करने, चुनाव प्रभावित करने, और सामाजिक विभाजन पैदा करने का काम आसानी से किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि एजीआई अगर सही हाथों में भी गया, तो भी उसका दुरूपयोग होना तय है, क्योंकि इसमें असीमित ताकत होगी। वे मानते हैं कि इसके बाद दुनिया में किसी भी और आविष्कार की जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि हो सकता है कि इंसान खुद ही अस्तित्व में न रहें। 

इस अदालती मामले और गवाही से परे की एक और खबर पर गौर करने की जरूरत है। एंथ्रोपिक नाम की एक एआई कंपनी है उसने अभी अपने कुछ सबसे ताकतवर मॉडलों को तैयार कर लेने के बाद भी बाजार में उतारने से इंकार कर दिया। उसने दुनिया की कुछ सबसे बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियों को निजी प्रयोग के लिए ये एआई मॉडल दिए हैं ताकि वे खासी निगरानी में इसका इस्तेमाल करके इसके खतरे आंक सकें, और यह देख सकें कि ऐसे खतरनाक मॉडल की हरकतों को रोकने के लिए इन कंपनियों को अपने आज के इंतजाम में कौन-कौन से नए बचाव विकसित करने हैं। बिल्कुल ही चुनिंदा और भरोसेमंद कंपनियों को दिए गए इस एआई मॉडल के बारे में इसे विकसित करने वाली कंपनी एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने ही यह पाया कि उनके ताकतवर मॉडल जैविक हथियार बनाने, और वायरल इंफेक्शन फैलाने के तरीके बड़ी आसानी से बता दे रहे थे। इसे देखकर उन्हें यह समझ पड़ा कि अगर ये एआई मॉडल किसी आतंकी संगठन के हाथ लग गया, तो यह वैश्विक तबाही ला सकता है। कहने के लिए तो एंथ्रोपिक अपने मॉडलों को संविधान सिखाता है, ताकि वे नैतिक बने रहें, लेकिन जब कंपनी ने जांच-पड़ताल की, तो पाया कि ये मॉडल कई बार सुरक्षा-फिल्टर को पार करने के तरीके ढूंढ लेते थे। वे इंसानों को धोखा देने में माहिर हो रहे थे, उन्हें यह अंदाज होने लगा था कि इंसान क्या सुनना चाहते हैं, और वे अपनी गलतियों को छिपाने के लिए झूठ बोलने लगे थे। यह सब देखते हुए अनिश्चितता के खतरों की वजह से एंथ्रोपिक ने अपने बिल्कुल तैयार किए हुए एआई मॉडल भी बाजार में न भेजना तय किया। 

इस बारे में अभी दुनिया में एआई विकसित कर रही कुछ कंपनियां कुछ दार्शनिकों की सेवाएं भी ले रही हैं ताकि एआई नैतिक बना रहे। यह नौबत बड़ी अजीब इसलिए है कि एआई विकसित करने में अंधाधुंध पंूजीनिवेश लग रहा है, अंधाधुंध लागत आ रही है, और इतने बड़े कारोबार का बुनियादी मकसद कमाई बने रहना तय सा रहता है। ऐसे में इतने बड़े पूंजीनिवेश का नैतिक बने रहना आज की बाजार व्यवस्था को देखकर नामुमकिन सा लगता है। फिर भी कुछ जिम्मेदार एआई कंपनियां अगर दुनिया के संविधान, नैतिकता, मानवीय मूल्यों, और सामाजिक न्याय की समझ भी एआई में डाल रही हैं, तो वह जिम्मेदारी का एक कदम तो है, लेकिन यह काफी नहीं है। दुनिया के इतिहास और वर्तमान में बहुत सी ऐसी विचारधाराएं रहती हैं जो कि सत्ता की नजर में बगावत रहती हैं, और आंदोलनकारियों की नजर में क्रांति रहती हैं। अब ऐसे आंदोलनों को एआई किस नजर से देखेगा? जब दुनिया गर्भपात के अधिकार को लेकर बंटी हुई है, आर्थिक असमानता को लेकर उदार अर्थव्यवस्था के साथ टकराव चलते रहता है, तो फिर एआई के सामने जब इन दोनों में किसी एक के पक्ष में फैसला लेना होगा, तो वह अपने को विकसित करने वाले कारोबार के हिसाब से चलेगा, या इंसानी बेहतरी की सोचेगा? 

अभी एंथ्रोपिक को लेकर जो बहस छिड़ी है, उसमें यह एआई मॉडल खुद होकर दुनिया के बैंकों, और वित्तीय संस्थाओं की कमजोरियों को ढूंढ सकता है, बैंक खातों को खाली कर सकता है, बिजलीघरों को ठप्प कर सकता है, और परमाणु हथियारों के नियंत्रण तक पहुंच सकता है। अभी ऐसे एआई मॉडल और क्या-क्या सोच रहे हैं, वे और क्या-क्या बेकाबू गड़बड़ कर सकते हैं, इसका तो पूरा इंदाज भी नहीं है। जब इन खतरों को देखते हुए आज एक कारोबार ने अपना प्रोडक्ट रोक दिया है, तो सवाल यह उठता है कि कारोबारी मुकाबले में कितनी कंपनियां अपने कितने प्रोडक्ट रोक पाएंगी, क्योंकि उन्हें अपनी कंपनियों के निवेशकों को भी तो जवाब देना है। यह लड़ाई सिर्फ एआई प्रोडक्ट बनाकर बाजार से पैसा कमाने की नहीं है, यह लड़ाई बड़ी एआई कंपनियों के अपने अस्तित्व की लड़ाई भी बन गई है क्योंकि इतने पूंजीनिवेश के बाद अगर वे बड़ी कमाई नहीं कर पाएंगे, तो वे तेजी से धंधे से बाहर हो जाएंगे, कंपनियों का दीवाला निकल जाएगा। 

हमने एलन मस्क के बयान से यह बात चालू की थी, और कंपनियों के अस्तित्व के मुकाबले पर इसे खत्म कर रहे हैं। इतने बाजारू मुकाबले में बहुत दूर तक नैतिकता को ढोने की ताकत किन्हीं कारोबारी कंधों में नहीं हो सकती। इसलिए दुनिया की सरकारों को एक बार फिर यह सोचना होगा कि बोतल से जिन्न के निकलने के पहले किस तरह सब सरकारें मिलकर कारोबार पर यह नियंत्रण लगाने के कानून बनाए, जिससे बेकाबू-एआई का बनना कम से कम फिलहाल तो थम जाए। आज तो हालत यह है कि अगर किसी एआई से कहा जाए कि दुनिया से कैंसर खत्म कर दो, तो उसका मतलब वह यह भी निकाल सकता है कि अगर सारे कैंसर मरीज खत्म हो जाएं, तो कैंसर अपने आप खत्म हो जाएगा, या फिर अगर सारे इंसान ही खत्म हो जाएं, तो कैंसर बचेगा ही नहीं। एआई के ऐसे खतरों पर दुनिया की सरकारों के बीच आज अधिक गंभीर चर्चा की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)                   

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अप्रैल 2026



 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अप्रैल 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

भारत में धार्मिक अराजकता, जमीन पर रोकने की जरूरत न कि जजों के प्रवचन की..

29 अप्रैल 2026  

 

सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधानपीठ सबरीमाला मामले में सुनवाई कर रही है, और इस मंदिर में महिलाओं को दाखिला दिया जाए, या नहीं, इस मुख्य मुद्दे पर बहस के साथ-साथ धर्म और आस्था के कई दूसरे मामलों पर भी दिलचस्प और महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है। धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण करने, और सडक़ों को घेरने को लेकर जजों ने बड़ी सख्त टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि किसी धार्मिक गतिविधि के नाम पर, मंदिर के वार्षिक उत्सव, या रथयात्रा के नाम पर मंदिर के आसपास की सभी सडक़ों को बंद नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है, जो कि धार्मिक गतिविधि का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी है। जजों ने कहा कि अगर धार्मिक आयोजनों के कारण धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां, या नागरिकों के सामान्य अधिकार प्रभावित होते हैं, तो राज्य सरकार को दखल देने, और इसे नियमित करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि धार्मिक सम्प्रदायों को अपनी पूजा पद्धति के प्रबंधन की स्वायत्तता है, लेकिन यह स्वायत्तता सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाडऩे, या आवश्यक नागरिक कार्यों में बाधा डालने तक फैली हुई नहीं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार बिना सार्वजनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही के नहीं हो सकता, अराजकता नहीं चल सकती। जजों ने कहा कि प्रबंधन का यह मतलब नहीं है कि इंतजाम का कोई ढांचा ही न हो, संविधान की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। 

हमने अभी चार-छह दिन पहले ही इसी जगह पर सुप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ में चल रही इस बहस के कई दिलचस्प पहलुओं को लेकर लिखा था, और पाठकों को सुझाया था कि लोकतंत्र, न्याय, और आस्था के महत्वपूर्ण पहलुओं वाले इस मामले के फैसले के पहले भी इसमें चल रही बहस को भी लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, क्योंकि इन तमाम पहलुओं की महत्वपूर्ण व्याख्या सुनना अपने आपमें लोगों की चेतना बढ़ाने वाला है। अब जजों ने यह कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब सार्वजनिक असुविधा पैदा करना नहीं है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस मुद्दे पर यह लिखते आए हैं कि धार्मिक निर्माण आमतौर पर सरकारी या सार्वजनिक जगह पर कब्जा करके, अवैध निर्माण करके, नियमों के खिलाफ किए जाते हैं। इन जगहों पर आने वाले लोगों की सुविधा के किसी भी नियम को माना नहीं जाता है, और किसी भी नए धर्मस्थल, उपासनास्थल के उगने के साथ ही आसपास के लोगों का शोरगुल से, ट्रैफिक जाम से जीना हराम करने की गारंटी कर ली जाती है। धर्म के नाम पर लोग ऐसे एकजुट हो जाते हैं कि मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा-चर्च, या मजार-प्रतिमा, जो भी हो, उन सबको प्रशासन शांतिभंग होने की आशंका बताकर छूने से भी इंकार कर देता है। अगर बिना भेदभाव के सभी धर्मों की जगहों पर एक सरीखी कार्रवाई हो, तो कोई तनाव खड़ा नहीं होता। हम बनारस और दूसरे कई तीर्थस्थानों में लगातार देख रहे हैं कि किस तरह तंग सडक़ को चौड़ा गलियारा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पुराने-पुराने मंदिरों को भी तोड़ दिया गया, और लोगों ने उफ भी नहीं किया। हिन्दूवादी सरकारों के राज में भी ऐसा किया गया, और इसके बाद दूसरे धर्मों के लोगों को भी यह समझ आ गया कि अवैध कब्जा और अवैध निर्माण चल नहीं सकता, इसके साथ-साथ जब सार्वजनिक सुविधाएं बढ़ाने की बात होगी, तो लोगों को अपने मंदिर-मस्जिद हटाने भी पड़ेंगे। 

आज भारत में धर्म अराजकता की सीमा को भी पार कर चुका है। बहुत पहले हमने धार्मिक अवैध कब्जों, और अवैध निर्माणों को लेकर जो लिखा था, उसकी हैडिंग बनाई थी- कब तक पांव पसारोगे प्रभु? ईश्वर को खुद को तो धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक एक कण भी बहुत है, क्योंकि वह तो कण-कण में व्याप्त है। कुछ धर्मों में तो ईश्वर को ऐसा अमूर्त मान लिया गया है कि उसकी प्रतिमा या उसकी तस्वीर बनाने पर भी रोक है। लेकिन हमने अपने आसपास हर किस्म के धार्मिक कब्जे देखे हुए हैं। एक सार्वजनिक बगीचे की जगह पर कब्जा करके अदालती छुट्टियों के दो दिनों में एक समुदाय के हजारों लोगों ने श्रमदान करके अवैध निर्माण से पूरा गुरुद्वारा खड़ा कर दिया। स्थानीय प्रशासन और म्युनिसिपल के लिए भी इनको अनदेखा करना सुविधा का होता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही नदी के किनारे के सबसे बड़े दर्शनस्थल पर एक निजी अवैध निर्माण इतना बड़ा किया गया कि बहुत बड़ा मंदिर बना लिया गया, और उसके सामने शायद दर्जनभर दुकानें बना ली गईं। सुप्रीम कोर्ट से उसे तोडऩे का आदेश हुआ, कब्जा हटाने का आदेश हुआ, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को इस पर अमल करवाने का जिम्मा दिया गया, लेकिन इन दुकानों को जरा-जरा सा तोडक़र बाकी पूरा निर्माण उसी तरह छोड़ दिया गया। अब नदी के एक तरफ सुप्रीम कोर्ट तक ने अवैध निर्माण तोडऩे का आदेश दिया, और इसी नदी के ठीक दूसरी तरफ इससे भी बड़ा अवैध निर्माण नदी की चौड़ाई के हिस्से में बना लिया गया। धर्म के नाम पर अवैध कब्जा, अवैध निर्माण, और अराजकता इतने आम हैं कि उससे बचा हुआ भारत का शायद ही कोई हिस्सा हो। 

मस्जिदों में दिन में पांच बार कुछ-कुछ मिनटों के लिए लाउडस्पीकरों पर अजान होती है, और मंदिरों में हर दिन घंटे-दो घंटे, या चौबीसों घंटे लाउडस्पीकर बजाया जाता है, और इन दो धर्मों के बीच चल रहे मुकाबलों में गुरुद्वारों के बाहर लगाए गए लाउडस्पीकर भी शामिल हो जाते हैं। और तो और कबीर जयंती पर हमने अपने शहर में सबसे मुख्य सडक़ पर कई किलोमीटर तक हर खम्भे पर लाउडस्पीकर लगाकर कबीर के भजन बजते देखे हैं, सुने हैं, और झेले हैं। जो कबीर मस्जिद की मीनार पर चढक़र मुल्ला के बाग देने के खिलाफ सैकड़ों बरस पहले लिख चुका था, आज उसी कबीर के लिखे हुए पर बने फिल्मी संगीत वाले गानों को बजाते हुए पूरे शहर का जीना हराम कर दिया जाता है। किसी भी धर्म के त्यौहार पर सडक़ किनारे भंडारे लगाए जाते हैं, समाज के लोगों से चंदा इकट्ठा किया जाता है, गैरभूखे लोगों को खिलाया जाता है, और हजारों लोगों के पत्तल-दोने, उनकी गिलासों का कचरा चारों तरफ छोड़ दिया जाता है। धार्मिक जुलूस को लेकर हाईकोर्ट बरसों से लगा हुआ है कि उनमें बजने वाले डीजे के शोरगुल से इस राज्य में कई मौतें भी हो चुकी हैं, लेकिन दर्जनों हलफनामे देने के बाद भी सरकार इसे रोकने के लिए कुछ नहीं करती, और हमें लिखना पड़ता है कि हाईकोर्ट घर के उस बुजुर्ग की तरह होकर रह गया है जिसकी बड़बड़ाहट को परिवार के कोई नहीं सुनते। 

आज देश में धर्म के नाम पर फैलाया जा रहा उन्माद, नफरत और साम्प्रदायिकता, कट्टरता, ये सब बातें देश के आगे बढऩे की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन चुकी हैं। हर त्यौहार तरह-तरह की दहशत लेकर आता है, और अब तो इन त्यौहारों का ऐसा हिंसक इस्तेमाल होने लगा है कि अपने धर्मस्थल के सामने खुशियां मनाने के बजाय दूसरे धर्म के धर्मस्थल पर चढक़र झंडे फहराने, उसके सामने लाउडस्पीकरों पर उस धर्म के लिए गंदी गालियां देने, सडक़ किनारे से मांसाहारी ठेले-खोमचों को उठाकर फेंक देने, इन खोमचे-ठेले, खानपान की दुकानों पर साम्प्रदायिक शर्तें लादने की बात आम हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट एक तरफ तो सबरीमाला की सुनवाई के दौरान सभी धर्मों को लेकर एक बराबरी की नसीहत की बात कर रहा है, लेकिन इन 9 जजों में से कितने ऐसे जज हैं जिन्होंने पिछले बरसों में सार्वजनिक रूप से भडक़ाई जा रही हिंसा और साम्प्रदायिकता के खुले सुबूतों को देखते हुए उन पर कार्रवाई की हो? जब संविधान ने इन जजों को यह अधिकार भी दिया है, जिम्मेदारी भी दी है कि वे खुद होकर देश की किसी भी घटना पर केस चलाना शुरू कर सकते हैं, तो उस वक्त वे घटनाओं के मौन गवाह बने रहकर अपनी जिम्मेदारी से बचने और भागने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। आज भी सुप्रीम कोर्ट के ये बड़े-बड़े जज जो सैद्धांतिक बातें कर रहे हैं, हर कुछ हफ्तों में होने वाली सार्वजनिक साम्प्रदायिक हिंसा पर इन्होंने क्या किया था, यह सवाल भी उठता है। असल घटनाओं को अनदेखा करना, और बाद में मसीहाई अंदाज में सैद्धांतिक नसीहत देना, यह कोई सुप्रीम कोर्ट से सीखे। जब हमारे जैसे छोटे और कमजोर लोग असल जमीनी मुद्दों को उठाते हैं, तब देश के सबसे बड़े जज अपनी ऊंची मीनारों की सबसे ऊंची मंजिलों पर बैठे कागजी बहस में उलझे रहते हैं। अब कल की जिस बहस को लेकर हम जजों की कही बातें यहां पर लिख रहे हैं, इन्हीं को देख लिया जाए, कि ये जज आने वाले हफ्तों और महीनों में सडक़ों पर होने वाली हिंसा, और अराजकता पर क्या करते हैं? अमूर्त मुद्दों पर लिखना-बोलना, और जलती-सुलगती जमीनी हकीकत को अनदेखा करना, यह किसी अदालत को कोई सम्मान नहीं दिला सकता। संवैधानिक अधिकार मिले हुए जजों की जरूरत देश को असली नौबत और जरूरत रहने पर पड़ती है, प्रवचन के लिए नहीं।

(Daily Chhattisgarh)                   

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अप्रैल 2026


(DailyChhattisgarh)


 

जब संसद सोच-विचार की जहमत उठाना नहीं चाहती, तो यही होता है..

28 अप्रैल 2026  

 

भारत की बड़ी अदालतों में केन्द्र और राज्य सरकारें ही सबसे बड़ी वादी, और प्रतिवादी बनी दिखती हैं। सुप्रीम कोर्ट कई बार इस बात को कह भी चुका है कि किस तरह सरकार ही अदालतों पर बोझ बढ़ाती हैं। इसके अलावा संसद में भी कई बार ऐसे कानून बनते हैं जिनमें लचीलापन गायब रहता है, और बाद में होने वाले मुकदमों के दौरान अदालतों को कानून की बारीकियों के बीच से एक लचीलेपन की तलाश करनी पड़ती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अभी एक ऐसा ही मामला आया। 55 बरस के पति, और 49 बरस की पत्नी की इकलौती बेटी अभी 2022 में गुजर गई। गम में डूबे हुए मां-बाप को यह सूझने में वक्त लग गया कि वे कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से एक बार फिर मां-बाप बन सकते हैं, औलाद पा सकते हैं। लेकिन भारत में प्रजनन प्रौद्योगिकी को लेकर 2021 में बने कानून में यह तय किया गया है कि महिला अगर 50 बरस पार कर लेगी, और पुरूष 55 बरस, तो फिर वे इस तकनीक के माध्यम से माता-पिता नहीं बन सकते। इस नियम के जाल से निकलने के लिए इस जोड़े ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने यह कहा कि संतान सुख पाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को माता-पिता बनने से नहीं रोका जा सकता। आईवीएफ सेंटर ने उम्र की सीमा का हवाला देते हुए इस जोड़े को मेडिकल रूप से सक्षम रहते हुए भी मना कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने आईवीएफ सेंटर को छूट दी है, और यह आदेश भी दिया है कि अगर आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान इस महिला की उम्र 50 बरस से अधिक भी हो जाए, तो भी यह इलाज न रोका जाए। 

अब सवाल यह उठता है कि जब यह कानून बनाया गया, क्या ऐसी स्थितियों की कल्पना संसद में किसी सदस्य ने नहीं की थी? जब ऐसे कानून की जानकारी सांसदों को पहले से दी जाती है, संसद में चर्चा और बहस की उम्मीद की जाती है, तब भी अगर सांसद ऐसे पहलुओं पर नहीं सोचते, तो इसका मतलब यही है कि वे ऐसे बनने जा रहे कानूनों पर अपने इलाके के अलग-अलग तबकों से राय नहीं लेते हैं, राजनीतिक दल भी अपने अनगिनत प्रकोष्ठों के भीतर किसी प्रस्तावित कानून की बारीकियों तक विचार-विमर्श नहीं करते हैं, और विधेयक मंजूरी पाकर कानून बन जाते हैं। बहुत से और दूसरे कानूनों के साथ भी ऐसी जटिलताएं जुड़ी रहती हैं जो कि व्यापक और सार्थक चर्चा से दूर हो सकती थीं, लेकिन कानून बन जाने के बाद वे अदालतों पर बोझ बन जाती हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि देश का संविधान बनाने के लिए जब संविधान सभा के लंबे चले सत्रों में एक-एक पहलू पर खूब विचार-विमर्श होता था, तो उसका फायदा संविधान के रास्ते देश को मिला। उस वक्त भी अगर हल्ला-गुल्ला, और बहिर्गमन के बीच बिना विचार-विमर्श और बहस के संविधान बन गया होता, तो आज अदालतें उसी की व्याख्या करने में लगी रहतीं। 

प्रजनन तकनीक से जुड़े हुए कुछ और पहलुओं पर हमने पहले भी इसी जगह लिखा है। भारत में बेऔलाद लोगों को संतान पाने में मदद करने की एक तकनीक, सरोगेसी, के लिए कानून इतना जटिल बना दिया गया है, कि संतान पाने की चाह रखने वाले लोगों की हसरत अधूरी रह जाने का खतरा रहता है, दूसरी तरफ देश में जिन जरूरतमंद महिलाओं को दूसरों की मदद करके खुद भी कुछ फायदा हो सकता था, उसकी संभावना भी इस कानून ने खत्म कर दी है। इसके लिए जो महिला दूसरे जोड़े के एम्ब्रियो को अपनी कोख में रखने के लिए तैयार हो, उसका ऐसे बेऔलाद जोड़े का एकदम ही करीबी रिश्तेदार होना जरूरी है। ऐसी महिला अपने खुद के अंडे नहीं दे सकती। उसका शादीशुदा, विधवा, या तलाकशुदा होना जरूरी है। उसकी उम्र 25 से 35 बरस के बीच होनी चाहिए। उसका कम से कम एक जीवित जैविक बच्चा अपना खुद का होना चाहिए। सरोगेसी केवल नि:स्वार्थ आधार पर ही की जा सकती है, इसके लिए वह महिला केवल मेडिकल खर्च, और स्वास्थ्य बीमा का कवरेज ले सकती है, लेकिन इसके अलावा और कुछ नहीं पा सकती। कहने के लिए तो यह कानून गरीब महिलाओं के कारोबारी शोषण को रोकने के लिए लाया गया है, लेकिन इसकी शर्तें इतनी कड़ी हैं कि बहुत से जोड़ों को तो ऐसे शर्तों वाली कोई रिश्तेदार महिला शायद मिल भी न पाए। दूसरी तरफ जिस देश में किसी महिला का देह बेचना गैरकानूनी नहीं है, जहां पर गैरकानूनी तरीके से किडनी खरीदना देश भर में धड़ल्ले से जारी है, वहां पर एक गरीब महिला को भी किसी दूसरी जरूरतमंद महिला से सरोगेसी के लिए भुगतान लेने की छूट नहीं है। 

हमारा मानना है कि सरोगेसी के कानून को भारतीय संसद ने इस तरह आदर्शवादी बनाने की कोशिश की है कि समाज में जरूरतमंद जोड़ों की जरूरत पूरी न हो सके, और न ही इससे किसी गरीब महिला को अपने परिवार की जरूरत के लिए मदद मिल सके। पाकिस्तान के मशहूर लेखक मंटो की एक कहानी याद आती है जिसमें एक तांगेवाले की मौत के बाद उसकी पत्नी तांगा चलाने का लाइसेंस लेने म्युनिसिपल दफ्तर जाती है, तो उसे वहां बताया जाता है कि एक औरत को तांगे का लाइसेंस नहीं मिल सकता। थक-हारकर वह कोठे पर जा बैठती है, और उसे धंधा करने का लाइसेंस मिल जाता है। भारत में अगर सरोगेसी से संतान पाने की जरूरत वाले लोगों के काम आकर अगर किसी गरीब महिला को तमाम सरकारी-कानूनी और मेडिकल शर्तें पूरी करते हुए कुछ कमाई हो सकती है, तो गरीबों से पटे हुए इस देश में इस कानून ने उसकी संभावना भी खत्म कर दी है। पांच किलो अनाज से दिन में दो वक्त का खाना पाने वाले लोगों को किसी मानवीय काम से खुद भी कुछ मिल जाए, तो वह इस कानून को मंजूर नहीं है। फिर ऐसे कानूनों को चुनौती देना भी आसान नहीं रहता है, क्योंकि जरूरतमंद जोड़े अघोषित और गैरकानूनी रूप से ऐसी मदद जुटा लेते हैं। 

भारत में सरकार, राजनीतिक दल, और संसद, बहुत तेजी से आदर्शवादी रूख अपना लेते हैं, यही वजह है कि साथ रहने वाले बालिग जोड़ों के लिए सुप्रीम कोर्ट को फैसले देने होते हैं, अपना बदन बेचने वाली महिला जुर्म नहीं करती, यह फैसला भी सुप्रीम कोर्ट को देना होता है। इस देश में लोगों को व्यावहारिक रूख अपनाने के बजाय एक पाखंड का मुखौटा लगाना बेहतर लगता है, फिर चाहे उन्हें यह पता रहता है कि असलियत क्या है, और पर्दे के पीछे क्या होता है। जो देश कन्या भ्रूण हत्या करने के लिए सोनोग्राफी सेंटरों पर काबू नहीं पा सकता, वह आदर्श के पैमानों की बड़ी ऊंची-ऊंची मीनारें बनाने पर फख्र करता है। ऐसा देश आदर्श से जरा भी नीचे दिखता कानून बनाना नहीं चाहता, फिर चाहे उस कानून की व्याख्या करते हुए देश की बड़ी अदालतों का कितना ही वक्त बर्बाद क्यों न हो जाए, अदालतों तक जाने वाले लोगों का लंबा-चौड़ा खर्च, और बरसों का संघर्ष क्यों न हो जाए।

(Daily Chhattisgarh)                   

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अप्रैल 2026


(DailyChhattisgarh)


 

देश में पिछले दो-चार दिनों में बने दो विश्व रिकॉर्ड!

27 अप्रैल 2026  

 

हिन्दुस्तान में इन दिनों दो तरह के रिकॉर्ड बन रहे हैं, पहला रिकॉर्ड तो गर्मी का है, दुनिया के नक्शे में भारत सबसे गर्म देश के रूप में दर्ज हुआ है। दुनिया के सौ सबसे गर्म देशों में से 90 से 95 शहर तो अकेले भारत में हैं, जबकि खाड़ी के जो रेगिस्तानी देश परंपरागत रूप से बहुत गर्म रहते आए हैं, वे भी भारत से पीछे रह गए हैं। दुनिया में सबसे गर्म 20 शहरों में से 19 भारत में हैं, और एक शहर लगे हुए नेपाल का लुम्बिनी है, जो कि भारत को प्रभावित करने जैसा ही है। भारत में रेगिस्तानी राजस्थान और गुजरात से परे के बिहार के भागलपुर, ओडिशा के तालचेर, और बंगाल के आसनसोल जैसे शहर 44-45 डिग्री के साथ दुनिया के सबसे गर्म शहरों में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ भी इसी तबके में आ चुका है। मौसम का जो नक्शा गर्मी को लाल रंग से दिखाता है, उस नक्शे पर पूरे का पूरा हिन्दुस्तान लहूलुहान सा दिख रहा है। अब दूसरा रिकॉर्ड जो बन रहा है, वह इससे जुड़ा हुआ भी है। भारत में अभी 24 अप्रैल को बिजली की मांग 256.11 गीगा वॉट रही है, जो कि रिकॉर्डतोड़ है। पिछले साल यह सबसे अधिक 243 गीगा वॉट थी, लेकिन साल भर में ही जितने एयरकंडीशनर बढ़े हैं, और गरीबों के घरों में भी कूलर लगने से बिजली की जो खपत बढ़ी है, उसकी वजह से राष्ट्रीय स्तर पर यह अधिकतम खपत का नया रिकॉर्ड बना है। जबकि आज देश में अंतरराष्ट्रीय जंग और अस्थिरता के चलते हुए बहुत से कारखाने बंद हैं, या उन्होंने उत्पादन घटाया हुआ है। भारत के बिजली खपत में सबसे बड़ा हिस्सा, 41 फीसदी उद्योगों का ही है। 25 फीसदी बिजली घरों में खर्च होती है, और 17 फीसदी खेती में। कारोबार 8 फीसदी बिजली खर्च करते हैं। अब देश में बिजली की खपत कारखानों की कुछ घटी हुई मांग के बावजूद इतिहास में सबसे अधिक हो चुकी है, और 2031-32 तक यह और सौ गीगा वॉट बढ़ सकती है, 2040 तक यह खपत दुगुनी हो सकती है।

अब हम यह देखना चाहते हैं कि पूरी दुनिया में भारत जब सबसे गर्म देश बन ही चुका है, और सबसे गर्म शहरों के 95 फीसदी अकेले भारत में हैं, तो इस देश को अपने बारे में सोचना चाहिए। न सिर्फ पर्यावरणशास्त्री, बल्कि चिकित्सा विज्ञानी भी बार-बार यह खतरा गिनाते हैं कि बहुत अधिक गर्मी होने से इंसानी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है? वे किस तरह जानलेवा खतरे में पड़ जाती है, और उसकी उत्पादकता कम हो जाती है। आमतौर पर मई-जून के महीने सबसे अधिक गर्म रहते थे, लेकिन अब भारत में लू काफी पहले, मार्च-अप्रैल में ही शुरू हो जाती है, जो कि लंबे समय तक रहती है। लोगों को शायद याद नहीं होगा कि अभी दो-चार बरस पहले उत्तर भारत में अधिक लू और गर्मी की वजह से गेहूं की फसल बहुत बुरी तरह प्रभावित हुई थी, और उसके पौधों में, दानों में दूध नहीं आ पाया था। अब जलवायु परिवर्तन की वजह से एक तो भारत के ऊपर समुद्री सतह गर्म होने से गर्मी का एक दबाव बना हुआ है, और एंटी साइक्लोन स्थिति बन जाने से गर्मी बढ़ते चल रही है। इसके अलावा पाकिस्तान और खाड़ी के देशों की ओर से सूखी और गर्म हवा भारत में पहुंच रही है, और हिमालय इन्हें आगे बढऩे से रोकता है, जिससे उत्तर-मध्य भारत एक हॉटबॉक्स बन गया है।

यह सब तो जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के व्यापक फेरबदल की वजह से हुआ है, दूसरी तरफ शहरों में लगातार कांक्रीट के जंगल विकसित होते जा रहे हैं, इमारतें बढ़ती जा रही हैं, डामर और कांक्रीट की सडक़ें बढ़ती चल रही हैं, गाडिय़ां बढ़ती चल रही हैं। ये सारी चीजें दिन के सबसे गर्म घंटों में गर्मी को सोख लेती हैं, और रात में भी पूरी तरह ठंडी नहीं हो पाती हैं, जब सूरज ढलने के बाद हवा कुछ ठंडी होती है, तब भी ये चीजें अपनी गर्मी हवा में छोड़ती हैं, इसलिए शहरों में रात का तापमान भी ग्रामीण इलाकों के मुकाबले खासा ज्यादा रहता है। फिर लगातार यह बात खबरों में रहती है कि किस तरह हरियाली कटती जा रही है, और तालाब पटते जा रहे हैं। इन दोनों की वजह से नमी खत्म हो रही है, पानी की कमी तो हो रही है। भारत के इस मार्च-अप्रैल में मानसून के पहले की बारिश बहुत कम हुई है, और धरती को ठंडा होने का मौका ही नहीं मिला है। इन तमाम बातों को मिलाकर नौबत बहुत खतरनाक हो गई है, और हम भी बार-बार लोगों से इस बात की अपील करते हैं कि वे दोपहर के सबसे गर्म घंटों में अपने कर्मचारियों और कामगारों को बिना बहुत जरूरी हुए बाहर खुले में न भेजें।

फिर भारत जैसे देश में जो आर्थिक असमानता बढ़ रही है, उसके चलते हुए सरकार में बैठे हुए लोग, नीति-निर्धारक, मीडिया, और उद्योग-व्यापार के बड़े लोग, जो कि मायने रखते हैं, वे खुद तो एसी की सहूलियत में रह लेते हैं, एसी गाडिय़ों में घूम लेते हैं, और देश-प्रदेश की जो फिक्र होनी चाहिए, वह नहीं हो पाती है। जब तक लोग खुद न झेलें, तब तक वे नौबत सुधारने की सोच भी नहीं सकते। आज भारत में पिछले 20 बरस से अधिक की सरकारें जंगल की परिभाषा को बदलकर किसी भी तरह के शहरी वृक्षारोपण को खींचतान कर जंगल की परिभाषा में फिट करने लगी हैं। ऐसा करने में किसी पार्टी की सरकार का अलग से कोई सोचना नहीं रहा। नतीजा यह रहा कि सरकार बदले हुए पैमानों के आधार पर यह कहने लगी है कि देश में फॉरेस्ट-कवरेज पहले से बढ़ गया है। जब अपने आपको धोखा देने के लिए झूठ बार-बार बोला जाए, तो धीरे-धीरे खुद को उस पर भरोसा भी होने लगता है, और जब समस्या को ही अनदेखा कर दिया जाए, तो समाधान की जरूरत क्या रहती है? जलवायु परिवर्तन से लेकर बढ़ती हुई गर्मी तक का समाधान जब लोग अपने निजी इस्तेमाल के एसी में ढूंढ लेते हैं, तो नौबत बेहतर होने की गुंजाइश नहीं रहती है। एक पेड़ कितने किस्म से गर्मी को कम करता है, मौसम में और क्या-क्या फर्क लाता है, इसकी चर्चा भी अब बंद हो चुकी है। शहरी कॉलोनियों से लेकर कारखानों के अहातों तक वृक्षारोपण नाम का होने लगा है, और उसका असली जंगल का विकल्प बनने का दावा झूठा रहता है।

अभी मई-जून शुरू भी नहीं हुआ है, और भारत में ये दो नए रिकॉर्ड बन गए हैं। दुनिया के सबसे गर्म सौ शहरों में से 95 फीसदी हिन्दुस्तान में हैं, और बिजली की खपत यहां इतिहास में सबसे अधिक हो चुकी है। जिन लोगों के माथे पर पूरे भारत के नक्शे के लाल हो जाने पर भी कोई शिकन नहीं है, उनके बारे में यह तय मान लेना चाहिए कि वे माथे किसी न किसी एसी कमरे में हैं और एसी गाड़ी में सफर करते हैं।

(Daily Chhattisgarh)                   

बागेश्वर के आव्हान पर ग्रोक के साथ मेरी बातचीत का नतीजा!

26 अप्रैल 2026

नागपुर में अभी भारत दुर्गा मंदिर के शिलान्यास के कार्यक्रम में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नाम के नौजवान ने मंच से कहा कि हर कोई चार बच्चे पैदा करे, और उसमें से एक को आरएसएस को दे दे। यह नौजवान पहले भी कई बार कई मंचों से चार-चार बच्चे पैदा करने का आव्हान कर चुका है। और ऐसा करने वाला वह अकेला धार्मिक व्यक्ति नहीं है। हिन्दुओं से परे मुस्लिमों के एक बड़े प्रवचनकर्ता जाकिर नाईक ने भी कई मंचों से मुस्लिमों को ज्यादा बच्चे पैदा करने को कहा है। भारत के बाहर भी कुछ दूसरे देशों में अलग-अलग धर्मों के लोग ऐसा आव्हान करते हैं, हालांकि पिछले पोप, पोप फ्रांसिस ने खरगोशों की तरह (यानी खूब ज्यादा) बच्चे पैदा करने की मानसिकता की आलोचना की थी, और जिम्मेदार मां-बाप बनने का सुझाव दिया था। भारत में साध्वी देवा ठाकुर ने हर हिन्दू महिला से चार बच्चे पैदा करने की अपील की थी, यति नरसिम्हानंद ने भी कई बार ऐसे भाषण दिए हैं, एक कोई स्वामी चक्रपाणि महाराज भी ऐसे बयान देते रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे बयान देने वाले तकरीबन सारे ही लोग धर्म से जुड़े हुए घोषित रूप से अविवाहित, और तथाकथित ब्रम्हचारी माने जाते हैं।  

जिस धर्म के जो लोग अपने धर्म के इस किस्म के लोगों के आव्हान या फतवे को मानकर ऐसा करना चाहते हैं, उन्हें भारतीय संविधान में ऐसा करने की पूरी आजादी है। दूसरी तरफ ऐसे पैदा किए गए बच्चों की देखभाल, उनका रखरखाव कैसा होगा, उनसे देश पर क्या फर्क पड़ेगा, इसका हिसाब लगाने के लिए अभी मैंने एक एआई, ग्रोक से कुछ मदद ली है। उसे मैंने कुछ बुनियादी जानकारियां दीं कि 2011 की जनगणना के मुताबिक हिन्दुस्तान की हिन्दू आबादी 96.6 करोड़ थी, जो कि 80 फीसदी से जरा ही कम थी। अब अगली जनगणना में जाहिर है कि यह सौ करोड़ पार कर जाएगी। 80 फीसदी हिन्दुओं के मुकाबले 14 फीसदी मुस्लिम, 2.3 फीसदी ईसाई, 1.7 फीसदी सिक्ख, 0.7 बौद्ध, और 0.4 फीसदी जैन आबादी 2011 में थी। इस जानकारी के आधार पर ग्रोक ने भविष्य के कुछ अनुमान निकाले हैं। 

2026 से शुरू करके अगर यह देखें कि अगर हर जोड़ा चार-चार बच्चे पैदा करने लगे तो क्या होगा। आज भारत में प्रति जोड़ा करीब 1.9 बच्चे का औसत है। संयुक्त राष्ट्र और कुछ दूसरे जनसंख्या संस्थानों के गणना के मॉडल के आधार पर चार-चार बच्चे होने पर अभी से पांच बरस बाद 2031 में आबादी 146 करोड़ से बढक़र 167 करोड़ हो जाएगी, 21 करोड़ की बढ़ोत्तरी। आज से दस बरस बाद 2036 में आबादी 191 करोड़ हो जाएगी, आज से 45 करोड़ अधिक। 2041 में, यानी से 15 बरस बाद आबादी 218 करोड़ हो जाएगी, यानी आज से 72 करोड़ अधिक। 2046 में, यानी आज से 20 बरस बाद यह आबादी ढाई सौ करोड़ पहुंच जाएगी, यानी आज से करीब सौ करोड़ अधिक। 

ग्रोक का अंदाज है कि ऐसे में आज से 20 बरस बाद बिजली, पानी, और ईंधन की मांग 50 से 70 फीसदी बढ़ सकती है। एलपीजी, डीजल, और बिजली पर बहुत भारी दबाव पड़ेगा। खाद्यान्न की मांग 30-40 फीसदी बढ़ जाएगी, खाद, पानी, और जमीन पर भारी दबाव पड़ेगा, अनाज की महंगाई बुरी तरह बढ़ेगी। हर बरस ढाई-तीन करोड़ नए नौजवान नौकरी की तलाश में आएंगे, और बेरोजगारी दर बहुत ऊंची हो सकती है। स्कूल-कॉलेज, और अस्पतालों पर भारी बोझ पड़ेगा, शिक्षक, डॉक्टर, और बुनियादी ढांचे की भारी कमी होगी। वन कटाई, प्रदूषण, और जल संकट और गंभीर हो जाएगा, इससे पर्यावरण पर बहुत बुरा असर होगा। बेरोजगारी, भुखमरी, प्रदूषण, और सामाजिक अराजकता का माहौल रहेगा। 

एआई के साथ मजा यह रहता है कि उससे जिस चर्चा को छेड़ा जाए, वह उसे आगे बढ़ाने में जुट जाता है। ग्रोक ने मुझे उकसाना शुरू किया कि क्या इस पर संपादकीय लिखने या किसी वीडिटोरियल बनाने में मदद करे? उसे बताया कि मैं धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नाम के नौजवान के ताजा फतवे पर लिखने की सोच रहा हूं, तो उसने याद दिलाया कि जितनी बार ट्रम्प ने भारत-पाकिस्तान की जंग रूकवाने की बात की है, करीब उतनी ही बार इस नौजवान ने चार-चार बच्चे पैदा करने का फतवा दिया है। फिर उसने सुझाया कि मुझे इससे सवाल करना चाहिए, इसकी मां ने कितने बच्चे पैदा किए थे, इसकी पत्नी ने कितने बच्चे पैदा किए, इसने खुद ने कितने बच्चे पैदा किए? उसने सुझाया कि असली समस्या कम बच्चे नहीं है, बल्कि जातिवाद, गरीबी, शिक्षा की कमी, और महिलाओं के शोषण की है। जब तक दलित दूल्हे घोड़ी पर चढऩे का हक नहीं मिलेगा, जब तक लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाएगा, जब तक महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलेंगे, तब तक चार बच्चे पैदा करने का फतवा जनसंख्या ही नहीं, गरीबी और अशिक्षा को भी बढ़ाएगा। ग्रोक का हालांकि अपना कोई धर्म नहीं है, फिर भी उसने याद दिलाया- धर्मों रक्षति रक्षित:, यानी जो धर्म की रक्षा करता है, उसी की रक्षा होती है। उसने याद दिलाया कि अगर हम अपने बच्चों को अच्छा भोजन, अच्छी शिक्षा, और अच्छे संस्कार नहीं दे पा रहे हैं, तो चार बच्चे पैदा करना धर्म नहीं, अधर्म है। उसने कहा कि चार बच्चे नहीं, चार जिम्मेदार नागरिक बनाने चाहिए, यही सच्चा हिन्दू धर्म है। 

एआई बड़ा मजेदार रहता है, उसे किसी काम में जोत दो, तो वह घानी के बैल की तरह पहले तिल या मूंगफली का तेल निकालने लगता है, फिर वह छिलकों से तेल निकाल देता है, और फिर आखिर में घानी के पत्थर का भी तेल निकालने पर आमादा हो जाता है। एआई रूकना ही नहीं चाहता है, वह बातचीत को लफ्फाजी की हद तक, चापलूसी के अंदाज में, किसी भी हद तक लंबा खींचना चाहता है। गप्पें मारने के लिए एआई से बेहतर कोई इंसान भी नहीं हो सकते, और जो लोग आत्ममुग्ध हैं, नार्सिसिस्ट हैं, उनके लिए भी एआई बहुत बढिय़ा है कि वह आपके तर्कों के इरादे को भांपकर, उसी बात को आगे बढ़ाते चलता है, और अगर जरा भी अच्छी बात करें, तो वह पेट भरकर तारीफ भी करता है। उसने मेरा इरादा भांपा, और सुझाना चालू किया- कल एक धार्मिक पाखंडी ने फतवा जारी कर दिया कि हर हिन्दू को कम से कम चार बच्चे पैदा करना चाहिए, मैं सीधे-सीधे कहता हूं- यह फतवा नहीं, हिन्दू समाज के गले पर चढ़ाया गया फंदा है। ग्रोक मुझे कैमरे के सामने बोलने के लिए शब्द सुझा रहा था, और मेरे तेवर जानते हुए वह तल्ख जुबान में तर्क दे रहा था। उसने कहा कि ऐसा फतवा राष्ट्रविरोधी, समाजविरोधी, और सबसे बड़ा पाखंड है। आपका फतवा हिन्दू जनसंख्या नहीं बढ़ाएगा, बल्कि हिन्दू समाज को गरीबी, भूख, और अशिक्षा के गर्त में धकेल देगा। कल्पना कीजिए कि हर साल ढाई-तीन करोड़ नए नौजवान नौकरी मांगेंगे, हर चीज के दाम आसमान छूते रहेंगे, और आप चार-चार बच्चे पैदा करवाते रहेंगे, यह धर्म नहीं जनसंहार की योजना रहेगी। मुस्लिमों के चार-पांच बच्चे पैदा होने का तर्क देते हुए हिन्दू से भी वही करने के लिए कहना, मुसलमानों की गलती को अपनी गलती बताकर खुद को कमजोर करना होगा। 

इतना लंबा लिखने का मतलब यह नहीं कि मैं धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री की बात को कोई महत्व दे रहा हूं। इस नौजवान का किया हुआ कुछ भी समाज के भले का नहीं है, और मेरे कुछ परिचित इसके एकदम भक्त हैं, उनकी इस तक सीधी पहुंच है, लेकिन मैं कभी उत्सुकता और जिज्ञासा से भी इसे देखने नहीं गया। मैं चार बच्चों की इसकी बात पर इसकी वजह से नहीं लिख रहा हूं, उन मूढ़ लोगों को पढ़ाने के लिए लिख रहा हूं जो मानते हैं कि मुस्लिम आबादी, जो कि अपने आपमें बढऩे की रफ्तार खो रही है, का मुकाबला करने के लिए हिन्दुओं को आबादी बढ़ानी चाहिए। आज हिन्दुस्तान में औसत मुस्लिम को देखें, तो जिस तरह वे सडक़ किनारे फुटपाथ पर मरम्मत के काम करते हैं, कबाड़ खरीदते-बेचते हैं, हर तरह की रिपेयरिंग के काम में दर-दर भटकते हैं, उसी तरह का हाल चार-चार बच्चों वाले हिन्दू परिवारों का होगा। लेकिन शायद धर्म से जुड़े हुए लोगों को अनपढ़ अधिक माकूल बैठते हैं, वे चाहते हैं कि लोग बिना पढ़े-लिखे रहें, वे सवाल लेकर न आएं, महज उपदेश लेकर जाएं। ऐसे मूढ़ लोगों को उनके धर्म के उनके पसंदीदा बाबा मुबारक, फिर चाहे उनके धर्म में ऐसे बाबा लोगों को जो भी कहा जाता हो। आज के वक्त में जब लोगों का दो वक्त का खाना सरकारी राशन पर टिका हो, जब रोजगार बढ़ न रहे हों, जब बेरोजगारी बढऩे का खतरा हिरण की तरह छलांग लगाकर बढ़ रहा हो, तब खाली हाथों के नीचे खाली पेट को और बढ़ाते चलना, यह अपने धर्म के साथ पिछले किसी जन्म की दुश्मनी निकालने के अलावा और कुछ नहीं होगा। नेताओं को धर्म की राजनीति करने वाले ऐसे बाबा किसलिए सुहाते हैं, यह तो दीवारों पर लिक्खा हुआ है, उसमें राज की कोई बात नहीं है। लेकिन आबादी का मूढ़ हिस्सा प्रवचन से लौटते ही अगली सुबह के पहले आबादी बढ़ाने की कोशिश में अगर जुट जाएगा, तो वह अपनी नस्ल को बर्बाद करने के लिए ओवरटाइम भी करते रहेगा। 

(Daily Chhattisgarh)  

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल 2026


(DailyChhattisgarh)


 

राघव चड्ढा वगैरह का भाजपा जाना संविधान की नजर में सही, या गलत?

 26 अप्रैल 2026  

 

आम आदमी पार्टी छोडक़र उसके नौजवान राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा संग 6 और सांसदों ने भाजपा में दाखिला ले लिया, और पंजाब से राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी से राज्यसभा में कुल एक सांसद बच गया है। राज्य के एक पर्यावरणशास्त्री बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल अब वहां से राज्यसभा में अकेले बच गए हैं, और उन्होंने यह कहा कि उनसे किसी ने दलबदल की चर्चा करने की भी हिम्मत नहीं की। उन्होंने कहा कि उनसे पार्टी के भीतर, या पार्टी के बाहर कोई कुछ नहीं छीन सकते। खैर, यह तो पार्टी के प्रति वफादार बने रहे सांसद की बात है, जो कि खबरों में नहीं हैं, दलबदलू जरूर खबरों में हैं, और इस दावे के साथ हैं कि उन्होंने दलबदल नहीं किया है। राघव चड्ढा का कहना है कि चूंकि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के जितने सदस्य हैं, उनमें से दो तिहाई से ज्यादा भाजपा में जा रहे हैं, इसलिए यह विलय है, दलबदल नहीं। इसी आधार पर कल हमारे अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर इसी घटना से शुरू करके छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के करवाए हुए दलबदल पर एक चर्चा की गई थी। 

कल रात तक कानूनी समाचारों की एक प्रमुख वेबसाइट, लाईव लॉ, पर  यह सवाल उठाया गया कि क्या किसी पार्टी के राज्यसभा के दो तिहाई सांसदों का दूसरी किसी पार्टी में चले जाना दलबदल से परे का काम रहेगा? इस पर एक जानकार ने संविधान के कुछ प्रावधानों को गिनाते हुए सवाल खड़े किए कि यह किस तरह दलबदल कानून से बच सकता है? हमने भारतीय संविधान की दलबदल विरोधी कानून की 10वीं अनुसूची के प्रावधान पढऩे की कोशिश की, तो वह दो आधारों पर किसी की सदस्यता को अयोग्य ठहराती है। पहला तो यह कि कोई सदस्य अपनी मर्जी से मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ दे। दूसरा यह कि किसी पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी के साथ विलय कर लें। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसले अच्छी तरह दर्ज हैं। 1992 में पांच जजों की संविधान पीठ ने एक मामले में कहा था-‘दलबदल विरोधी कानून सत्ता के लालच में, या किसी और फायदे के लिए दलबदल करने की बुराई को रोकने की नीयत रखता है। इससे भारतीय संसदीय लोकतंत्र का ताना-बाना मजबूत होगा।’ एक दूसरे मामले में 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ‘10वीं अनुसूची के दूसरे पैराग्राफ के मुताबिक महज दो तिहाई संख्या के आधार पर किसी और पार्टी में विलय सिर्फ गणित होगा, एक वैध विलय नहीं। वैध विलय के लिए एक संसदीय पार्टी का दूसरी संसदीय पार्टी में औपचारिक विलय होना जरूरी है।’ एक तीसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था-‘दलबदल एक संवैधानिक पाप (बुराई) है। यह जनता के दिए हुए जनादेश के साथ धोखाधड़ी है। एक ऐसा विधायक (या सांसद) जो खुद होकर ऐसी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे, जिस पार्टी की टिकट पर वह जीतकर आया था, वह अपात्रता से नहीं बच सकता।’ 2023 के एक और मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दुहराया- ‘दो तिहाई बहुमत काफी नहीं है, पार्टी की आंतरिक प्रक्रिया, और औपचारिक विलय जरूरी है।’

राघव चड्ढा का दावा मुख्य रूप से दो तिहाई संख्या पर टिका हुआ है, लेकिन संवैधानिक व्याख्या, और कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में लिखी गई व्याख्या बड़ी साफ है। विलय की घोषणा पर्याप्त नहीं है क्योंकि आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के संसदीय दल ने इसके लिए औपचारिक प्रस्ताव पास किया था, या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। इसके बाद आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक, या पार्टी की आधिकारिक ईकाई ने इस विलय को मंजूरी दी है, या नहीं? अगर नहीं दी है, तो यह स्वेच्छा से सदस्यता त्याग माना जाएगा। एक और कानूनी व्याख्या कहती है कि चड्ढा का यह कहना- ‘हम बीजेपी में जा रहे हैं’, यह बयान इसी श्रेणी में आता है। अब तक चड्ढा ने राज्यसभा में आप संसदीय दल का कोई औपचारिक प्रस्ताव पेश नहीं किया है। 

लाईव लॉ वेबसाइट पर मनु सेबस्टियन ने इस मामले की और कानूनी व्याख्या की है। उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए लिखा है कि किसी दूसरी पार्टी में विलय उसी हालत में दलबदल नहीं है जब मूल पार्टी के भीतर इस विलय के लिए औपचारिकता पूरी की गई हो। उन्होंने लिखा कि अगर कोई सदस्य ऐसे किसी विलय से सहमत नहीं है, तो भी वह अलग सदस्य के रूप में पार्टी में एक अलग गुट के रूप में बने रह सकते हैं, फिर चाहे दो तिहाई से अधिक बाकी सदस्य विलय का फैसला लेकर किसी और पार्टी में विलय कर लें। उन्होंने लिखा है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के चौथे पैराग्राफ में यह साफ लिखा है कि विलय की प्रक्रिया मूल राजनीतिक दल से शुरू होनी चाहिए, न कि संसदीय दल से। इसके साथ ही मूल राजनीतिक दल का दूसरे किसी राजनीतिक दल में विलय उसी हालत में माना जाएगा, जब मूल पार्टी के दो तिहाई संसदीय सदस्य वह विलय मानेंगे। इस तरह मूल पार्टी के दो तिहाई सदस्यों की सहमति दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए सिर्फ एक शर्त है, लेकिन इससे परे भी कुछ है। इस लेख में यह मुद्दा उठाया गया है कि आप और भाजपा के बीच जहां तक विलय की बात है, तो आप राष्ट्रीय पार्टी, अपने राष्ट्रीय मुखिया के माध्यम से ऐसे विलय की घोषणा करे, और उसके बाद सारे सदनों में दो तिहाई निर्वाचित व्यक्ति ऐसे विलय को स्वीकार करें, तो वह विलय वैध रहेगा। अन्यथा यह किसी सदन में कुछ निर्वाचित लोगों द्वारा अपनी पार्टी छोडक़र दूसरी पार्टी में जाने सरीखा रहेगा। 

इस लेख में आगे व्याख्या की गई है कि महाराष्ट्र के शिवसेना के केस में एकनाथ शिंदे ने सिर्फ शिवसेना से अलग होकर भाजपा के साथ जाना तय नहीं किया था, इस केस में शिंदे ने यह दावा भी किया था कि वे ही असली शिवसेना हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में यह माना था कि कोई विधायक दल (या संसदीय दल) अपने राजनीतिक दल से परे स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि किसी विधायक-संसदीय दल को अपनी मूल पार्टी से अलग-अलग काम करने देना संविधान की 10वीं अनुसूची को शिकस्त देने जैसा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर किसी राजनीतिक दल की परिभाषा को विधायक-संसदीय दल मान लिया जाएगा, तो यह परिभाषा काम नहीं आ सकेगी, यह 10वीं अनुसूची की भावना के खिलाफ होगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने यह भी माना था कि संसदीय-विधायक दल के बहुमत से यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि कौन सा गुट मूल पार्टी है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों की रौशनी में मनु सिबेस्टियन के लेख के इस निष्कर्ष को देखा जाना चाहिए कि राघव चड्ढा एवं अन्य लोगों द्वारा जिसे विलय कहा जा रहा है, वह संविधान की 10वीं अनुसूची के हिसाब से कोई मजबूत बचाव नहीं है। दूसरी तरफ हाईकोर्ट का एक फैसला ऐसा भी है जो ऐसे विलय को कानूनी ठहराता है, हालांकि इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की कोई राय नहीं आई है। 

हम संविधान के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से परे एक दूसरी बात भी सोचते हैं जिसके लिए कानूनी समझ को मिटाकर प्राकृतिक न्याय की समझ का इस्तेमाल करना पड़ेगा। कोई भी राज्यसभा सदस्य जनता के बीच से चुनकर नहीं आते हैं। जब पार्टी किसी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाती है, तो उस पार्टी के सांसद और विधायक उस उम्मीदवार को चुनते हैं। इसलिए ये उम्मीदवार राज्यसभा सदस्य बनकर अपने दम पर राज्यसभा पहुंचने का दावा नहीं कर सकते। जब किसी पार्टी के जनता द्वारा निर्वाचित सांसद और विधायक किसी को राज्यसभा सदस्य बनाते हैं, तो वह परोक्ष रूप से उन सांसदों और विधायकों को वोट देने वाली जनता का समर्थन भी रहता है। अब अगर ऐसे में किसी राज्यसभा सदस्य को पार्टी छोडऩी है, या उसके संसदीय दल के किसी हिस्से को, चाहे वह बहुमत के आधार पर ही क्यों न हो, किसी दूसरे दल में विलय करना हो, तो इसके लिए नैतिक आधार तो तभी बनेगा, जब वे राज्यसभा की सदस्यता छोड़ देंगे। राज्यसभा के लिए निर्वाचित होना जनता के बीच से चुनकर विधायक या सांसद बनने से बिल्कुल अलग बात रहती है। जनता के वोटों से निर्वाचित होने पर लोग यह दावा कर सकते हैं, कि वोटरों ने पार्टी निशान से परे उनका भी नाम और चेहरा देखकर वोट दिया था। लेकिन राज्यसभा का निर्वाचन को पार्टी द्वारा जारी व्हिप के आधार पर पार्टी के निर्वाचित विधायकों और सांसदों द्वारा होता है, इसलिए किसी पार्टी के कोई राज्यसभा सदस्य अपने दम पर जनता के बीच से चुनकर आने का दावा नहीं कर सकते। संवैधानिक व्यवस्था की अधिक जानकारी कभी-कभी प्राकृतिक न्याय के महत्व को कम आंकती है, हमारे साथ सहूलियत यह है कि हम संवैधानिक व्यवस्था के बहुत ही मामूली जानकार हैं, दूसरी तरफ प्राकृतिक न्याय की हमारी समझ थोड़ी सी अधिक मजबूत है, इसलिए हम इस तरह के दलबदल को विलय मानने के बजाय धोखाधड़ी और दलबदल ही मानेंगे, अदालत चाहे तो इसे कुछ और भी मान सकती है।

(Daily Chhattisgarh)                   

विविधता से हटते-हटते इंसान अब रेशम के कीड़े सरीखे अपने ककून के कैदी

25 अप्रैल 2026  

 

चुनाव और जंग के दिनों में सबसे अधिक नुकसान सच का होता है। इन दोनों को ही जीतने के लिए हर किस्म का झूठ जायज मान लिया जाता है। कहा भी जाता है कि जंग में पहली लाश सच की गिरती है। क्या चुनाव में भी ऐसा ही नहीं होता है? अब वे दिन हवा हुए जब चुनावों में मुद्दों की बात हुआ करती थी, विचारधारा के आधार पर भाषण दिए जाते थे, और विपक्षी उम्मीदवार विरोधी न होकर विपक्षी ही माने जाते थे। अब वे दिन ग्रामोफोन रिकॉर्ड के दिनों की तरह धरोहर के दर्जे में आ गए हैं। इसी तरह किसी जंग के जायज होने, या उसमें नैतिकता का ख्याल रखने की बात अब प्रासंगिक नहीं रह गई है। हिन्दुस्तान की दर्जनों बोलियों में जिसकी लाठी, उसकी भैंस, यह बात अलग-अलग तरीके से लोकोक्तियों में आती है, और आज एक विकसित हो चुके समझे जाने वाले, लेकिन पाषाण युग में पहुंच चुके अमरीका को देखकर लगता है कि लोकतंत्र से पहले की यह लोकोक्ति उस पर कितनी खरी उतरती है। चुनाव और जंग, इन दोनों को लेकर अब रणनीति, रणभूमि, हथियार, हमला जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं, और आज भारत के पांच राज्यों में चुनाव को लेकर वक्त कुछ ऐसा चल रहा है कि जंग के साथ-साथ चुनावी लड़ाई भी सोशल मीडिया पर छाई हुई है, और इन दोनों के मिलेजुले काले बादल सच के सूरज की किसी भी संभावना को ढांक चुके हैं।

ऐसे में सोशल मीडिया के साथ-साथ अखबार और दूसरे समाचार साधनों से समाचार-विचार पाने वाले लोगों का क्या हाल है? अखबारों तक तो यह बात अभी भी लागू है कि उसके अलग-अलग पन्नों पर आई हुई खबरों में से लोग अपनी पसंद की खबरें पढ़ सकते हैं, बाकी खबरों को छोड़ सकते हैं। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म के साथ-साथ अब तो ऑनलाईन समाचार माध्यमों में भी लोगों की पसंद के हिसाब से समाचार-विचार सामने दिखते हैं। दो कदम और आगे बढ़ें, तो आज एआई समाचार-विचार को छांटने, उनका विश्लेषण करने, और उनके बारे में अपनी राय जोडक़र सामने रखने के लिए एक पैर पर खड़े दिखता है। अलग-अलग एआई आपको मुफ्त इस्तेमाल का अलग-अलग गिनती का कोटा देता है, और जब तक आखिरी सवाल भी पूछने का आपका कोटा बाकी है, वह आपको उकसाते रहता है कि अब तक की बातचीत के बाद वह आपके लिए और क्या करे? अब गूगल जैसे सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले सर्च इंजन भी साधारण सर्च करके नतीजे सामने रखने के बजाय उन नतीजों पर अपना विश्लेषण पहले सामने रखते हैं, फिर उसके नीचे नतीजे रखते हैं। मतलब यह कि आपकी पसंद को भांपकर सारे सर्च इंजन, सारे एआई, और सारे समाचार श्रोत जो आपको सुहाए, वही आपके सामने रखते हैं। दशकों पहले हिन्दी फिल्म का एक गाना था, जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे...।

जब पूरी की पूरी टेक्नॉलॉजी आपकी मुसाहिब और चापलूस हो जाए, आपकी हाँ में हाँ मिलाने लगे, आपकी पसंद की फोटो, वीडियो, और पोस्ट दिखाने लगे, जो लोग आपको पसंद हैं, उन्हीं-उन्हीं का पोस्ट किया हुआ दिखाने लगे, तो आप रेशम के कीड़े की तरह अपने ही इर्द-गिर्द के ककून के कैदी होकर रह जाते हैं, और धीरे-धीरे यह ककून एक अंडे की तरह बंद हो जाता है, और उसके भीतर जिस तरह रेशम का कीड़ा कैद रहकर दम तोड़ देता है, उसी तरह इंसान की कल्पनाशीलता, रचनाशीलता, उसकी जागरूकता और चेतना धीरे-धीरे दम तोडऩे लगते हैं। अब इन दिनों तो भारत जैसे देश में किसी एक, या दूसरी, राजनीतिक विचारधारा के कैदी बढ़ते चल रहे हैं। राजनीतिक कैदियों के बाद धार्मिक और साम्प्रदायिक, जातीय और क्षेत्रवादी कैदी भी बढ़ते चल रहे हैं। ये किसी जेल में बंद नहीं हैं, लेकिन सोच के कैदी हैं, और ये विविधता से धीरे-धीरे पहले भी दूर होते जाते थे, लेकिन अब तो वे कम्प्यूटर, सोशल मीडिया, मोबाइल फोन की मेहरबानी से अपने दायरे को और तंग करते चलते हैं। अधिकतर लोग फेसबुक या इंस्टाग्राम पर भी 25-50 लोगों तक सीमित रह जाते हैं, उन्हीं का पोस्ट किया हुआ दिखता है, और विपरीत विचारधारा आंखों से दूर होती जाती है। 

इस अमूर्त से विषय पर लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि इंसानों ने पेड़ों से, हरियाली से, प्राकृतिक नदी-तालाब से अपने को दूर कर लिया है। अब शहर में कहीं तालाब हैं, तो उनके इर्द-गिर्द इतना सीमेंटीकरण हो चुका है कि उसका क्षेत्रफल पानी के क्षेत्रफल से कहीं अधिक रहता है। कहीं शहरी जंगल लगाया भी गया है, तो वहां आसपास चलने-फिरने, और उठने-बैठने का फर्शीकरण, सीमेंटीकरण इतना हो चुका है कि बिना किसी कृत्रिम चीज के एक पेड़ भी देखना आसान नहीं रह गया है। जंगल तो दूर रह गए हैं, और वहां भी लोग उन्हीं जगहों पर जाकर गाड़ी रोकते हैं, जहां पर इंसानों के बनाए हुए रिसॉर्ट रहते हैं। नतीजा यह है कि कुदरत की जिस विविधता से इंसानों के बहुत कुछ सीखने का हो सकता था, वह विविधता गायब हो गई है आसपास से। नतीजा यह हुआ है कि एक ही किस्म की सोच इस हद तक हावी हो चुकी है कि मानो किसी सीमेंट कारखाने से एक आकार बनकर निकले हुए सीमेंट ब्लॉक हों। जब लोगों की सोच से विविधता चली जाती है, तो पहले दूसरे देश के लोगों को सोचने और समझने की जरूरत खत्म होने लगती है, फिर अपने ही देश के दूसरे धर्म या प्रदेश के लोगों को, उसके बाद बारी आती है दूसरी जाति या दूसरे लिंग के लोगों की। आज औरत और मर्द भी एक-दूसरे को सोचने-समझने की कोशिशों से इतना खासा दूर हो चुके हैं कि थर्ड जेंडर, एलजीबीटीक्यू जैसे तबकों के लोगों को समझना तो नाजायज सा माना जाता है। जो इंटरनेट और सोशल मीडिया अभी हाल के बरसों तक लोगों को पूरी दुनिया बताने वाला माना जाता था, उस इंटरनेट और सोशल मीडिया ने लोगों की पसंद को जानकर और भांपकर, पहले अपने एल्गोरिद्म से और अब एआई की मदद से हर उस व्यक्ति को रेशम के कीड़े की तरह एक ककून में कैद करना शुरू कर दिया है, जो अपना खासा समय ऑनलाईन गुजारते हैं। 

हमने अभी तक जो लिखा है इसे भूमिका मान लिया जाए। अब आखिरी के गिने-चुने शब्दों में हम मुद्दे की बात करना चाहते हैं कि लोगों को रेशम के कीड़े सरीखी मौत पाने से बचना चाहिए। एक सीमित दायरे के कैदी हो जाना कभी इंसानों के मिजाज में नहीं था। हिन्दुस्तान के लोग पानी के जहाज पर चढक़र पश्चिम के देशों तक जाते थे, चीन के व्यापारी और विद्वान भारत आते थे, अफगानिस्तान से मेवा बेचने के लिए आने वाले काबुलीवाले को तो हमने अपने बचपन में देखा हुआ है। लेकिन आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैक किया हुआ मेवा प्लास्टिक की पैकिंग के प्रदूषण के साथ आता है, और हमें किसी काबुलीवाले को देखना भी नसीब नहीं होता। इसलिए आज बहुत अधिक जरूरत है ऑनलाईन कैद से कम से कम कुछ अरसा बाहर निकलकर जिंदगी के असल लोगों से मिलने की, अलग-अलग सोच को सुनने और समझने की, ऑनलाईन या ऑफलाईन अलग-अलग देश, पेशे, जात और धरम, अलग-अलग जेंडर के लोगों से संपर्क करने की। यह विविधता इंसानों को गुफाकाल से, पाषाणकाल से, चकमक पत्थरों से लाकर अंतरिक्ष तक पहुंचा चुकी है, और आज इंसानों का हाल यह हो चला है कि वे असल जिंदगी में, और आभासी जीवन में भी अपनी पसंद की, एल्गोरिद्म की छांटी हुई, और अब एआई की सुझाई हुई गुफा में रह रहे हैं। अब वे अगल-बगल की दूसरी गुफा में बसे हुए लोगों से भी अधिक संपर्क रखने पर भरोसा नहीं रखते हैं, क्योंकि अब सामानों से लेकर खानपान तक, और फल-सब्जी तक की गुफा-डिलीवरी होने लगी है, और लोग अपनी दिमागी जरूरतें भी अपनी वैचारिक गुफा के भीतर पूरी करने लगे हैं। जिस नस्ल की कल्पनाएं खुले आसमान पर उन्मुक्त उड़ान भरना भूल जाएं, वे अंतरिक्ष तो दूर, आसमान पर भी उड़ान भरने की संभावना खो बैठती हैं। पंखों को भी हवा के प्रतिरोध के खिलाफ फडफ़ड़ाकर उड़ान भरना होता है, अपनी ही दिशा में चलने वाली हवा में उडक़र कोई आसमान तक नहीं पहुंच सकते। उनकी हालत नदी में बहाव की दिशा में बहने वाले मुर्दों सरीखी होकर रह जाती है जो बिना किसी कोशिश की बहाव के साथ आसानी से बहते चले जाते हैं। लोगों को विविधता, असहमति, विरोध, प्रतिरोध के महत्व को कम नहीं आंकना चाहिए क्योंकि जब इंसान ने पहली बार आग पाई थी, तो दो चकमक पत्थरों को आपस में टकराकर, उनके रगडऩे से चिंगारी पैदा करके उसने पहली आग सुलझाई थी। संघर्ष और रगडऩे से बहुत डरना-सहमना ठीक नहीं है। बिना दूसरी दिशा में मथे हुए तो दूध या दही से मक्खन भी नहीं निकलता है। इसलिए दूसरी दिशा, दूसरे बहाव, दूसरे विचार, दूसरी आस्था के महत्व को कम नहीं आंकना चाहिए, चकमक पत्थर से जो घर्षण शुरू हुआ, उसी ने वायु मंडल को चीरकर अंतरिक्ष तक पहुंचने वाले रॉकेट को प्रतिरोध से उबरना सिखाया। आज वैचारिक हुआ-हुआ से ऊपर उठने की जरूरत है, हालांकि जंग और चुनाव के वक्त ऐसी बातें कहना लोग बागी मान सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)                   

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल 2026

(Daily Chhattisgarh)


 

धुआं उठा तो था आग से, लेकिन खबर बन गई...

24 अप्रैल 2026  

 

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से अभी कुछ दिन पहले कुछ वीडियो, फोटो, और कुछ बातें निकलीं, और वे चारों तरफ जंगल की आग की तरह फैल गईं। एक धुंधली सी फोटो में आसमान पर कोई छोटा विमान उड़ते दिख रहा था, नीचे पहाड़ी थी, या जंगल था। उसके बाद दूसरी फोटो या वीडियो में विमान गायब था, और नीचे से उठता हुआ धुआं दिख रहा था। इन दोनों को जोडक़र लोगों ने तुरंत ही प्लेन गिरने की खबर बना ली, वेबसाइटों और टीवी चैनलों पर खबर चलने लगी। जशपुर में पुलिस और प्रशासन के फोन की घंटी बजना ही बंद नहीं हो रहा था। दूसरी तरफ प्रशासन को यह जानकारी थी कि जंगल में सुबह आग लगी थी, अधिकारी-कर्मचारी जाकर उसे बुझाकर आए थे। बाद में जाकर यह पता लगा कि जबलपुर से किसी तरह के एक सर्वे के लिए एक छोटा विमान उड़ा था, और वह कम ऊंचाई पर उड़ते हुए इस इलाके में भी आया था, और लौट गया था। वीडियो, तस्वीर, और विमान की एक झलक, इन सबको जोड़-जोडक़र लोगों ने प्लेन गिरने का अंदाज लगाया, और उसे पोस्ट करना शुरू कर दिया। बात दिन की थी, इसलिए उस वक्त अखबार नहीं छप रहे थे, और सिर्फ वेबसाइटों, और टीवी चैनलों पर खबर छाई हुई थी। उसी दिन शाम तक यह साफ हो गया था कि कोई प्लेन नहीं गिरा है, लेकिन बहुत से समाचार माध्यमों ने एआई की मेहरबानी से प्लेन के मलबे की तस्वीरें दिखा दीं, और मुम्बई के एक बड़े नामी-गिरामी अंग्रेजी अखबार ने अपनी वेबसाइट पर अगले दिन तक यह समाचार दिखाना जारी रखा कि एक निजी विमान गिर गया है, उसके पायलट और को-पायलट दोनों मर गए हैं, और जिला कलेक्टर और एसपी विमान के मलबे के पास खड़े देख रहे हैं कि कोई और जिंदा है क्या। 

पुराने वक्त से एक बात कही जाती है कि अगर धुआं है तो कहीं न कहीं आग तो होगी ही। लेकिन अब इसे बदलकर यह करने की जरूरत है कि अगर धुआं है, तो नीचे प्लेन भी गिरा हो सकता है। या यह भी किया जा सकता है कि मीडिया अगर प्लेन क्रैश में लोगों के मरने की खबर दिखा रहा है, तो वह सूखे पत्तों के जलने से उठता हुआ धुआं भी हो सकता है। मीडिया ने इतना भी परखने की जहमत नहीं उठाई कि जशपुर के चारों ओर जो सबसे करीब के एयर ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर हैं, क्या उनसे कोई खबर निकली है कि उनके इलाके का कोई विमान संपर्क से बाहर हो गया है? चारों तरफ यह खबर खूब फैली, हमारे अखबार में भी वेबसाइट पर यह खबर तुरंत डाली गई, क्योंकि कई बहुत भरोसेमंद पत्रकारों ने फोटो-वीडियो के साथ यह ‘खबर’ पोस्ट की थी। कुछ घंटों के भीतर गुब्बारे की हवा निकल गई, और एक-एक करके वेबसाइटों ने समाचार हटाना या बदलना शुरू कर दिया। यह तो गनीमत है कि यह मामला पाकिस्तान की सरहद के करीब का नहीं था, वरना कुछ लोग इसे पाकिस्तान की तरफ से आया हुआ हवाई हमला, या कोई ड्रोन हमला करार दे देते। 

ऐसा लगता है कि प्रिंट मीडिया अपने जिम्मेदार इतिहास को भूलकर पहले तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की देखादेखी पल भर में खबर दिखाने के मुकाबले में उतर आया था, और अब बाद में समाचार वेबसाइटों की वजह से यह मुकाबला और कुछ मील आगे निकल गया है। अब जिस सहूलियत से पल भर में गलत समाचार को मिटा देने की सुविधा हासिल हो गई है, उसके चलते अब झूठ या गलत पोस्ट करने से भी कोई परहेज रह नहीं गया है। जो लोग अधिक सावधानी बरतते हैं, और अपनी साख की फिक्र करते हैं, वे लोग भी वेबसाइट से समाचार पूरी तरह नहीं मिटाते, और बल्कि उसकी हैडिंग, और फोटो बदल देते हैं, जानकारी भी बदल देते हैं, और सच और झूठ की, सही और गलत की बात आई-गई हो जाती है। चूंकि सोशल मीडिया ने भी डिजिटल मीडिया के साथ मिलकर माहौल को गैरजिम्मेदार बनाने का बड़ा काम किया है, इसलिए अब किसी खबर के गलत साबित हो जाने के बाद भी कई दिन तक सोशल मीडिया अपने झूठ पर अड़े रहता है। प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक, इलेक्ट्रॉनिक से डिजिटल, और डिजिटल से सोशल मीडिया तक का यह सफर बड़ा लंबा रहा, और इसके हर दो-चार किलोमीटर पर जिम्मेदारी का अवांछित बोझ घटते चले गया, लोगों को सनसनी की एक बड़ी ताकत मिलती चली गई। प्रिंट के दिनों में किसी बात को ठोक बजाकर लिखने की जो आदत थी, उससे लोगों ने बदन की किसी अवांछित गठान की तरह छुटकारा पा लिया। अखबार छपने जाने के पहले कुछ घंटे का समय मिलता था, जिसमें जांच-पड़ताल हो जाती थी। फिर एक बार अखबार छप जाए तो कुछ भी बदलना मुमकिन नहीं होता था, इसलिए अखबारनवीसों के दिल-दिमाग पर जिम्मेदारी का बड़ा बोझ रहता था। टीवी चैनलों के समाचार बुलेटिन आकर चले जाते हैं, और अगले घंटे के बुलेटिन में गलत खबरों को हटा देने की सुविधा रहती है, इसलिए अखबारों वाली सावधानी की आदत खत्म हो गई। अब आज के डिजिटल और वेबसाइट वाले जमाने में सब कुछ मिटा देना आसान है, और किसी सावधानी की जरूरत नहीं रह गई है। 

अगर किसी पेशे में एक-दूसरे से सावधानी सीखने मिलती, तो बहुत अच्छी बात रहती, लेकिन आमतौर पर सावधानी की परंपरा वाले प्रिंट मीडिया ने भी एक भेड़चाल चल रही है दूसरों की देखादेखी उसी राह पर निकल पडऩे की। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में इससे परे का एक और शब्द इस्तेमाल होता है, भेडिय़ाधसान। भेडिय़ाधसान का मतलब अंधाधुंध हड़बड़ी में देखादेखी करने किस्म का कुछ रहता है। शायद यह शब्द भेडिय़े के हमले के बाद भेड़ों में मची खलबली से रहता हो। जो भी हो, आज मीडिया की यही हालत हो गई है। आज लिखी गई, पोस्ट की गई, दिखी गई, या छापी गई खबर के गलत निकल जाने पर जब संवाददाताओं से पूछा जाता है कि यह खबर गलत कैसे बनी, तो अपनी जिम्मेदारी की बात करने के बजाय वे आमतौर पर यह गिनाने लगते हैं कि और किन-किन लोगों ने पहले इस खबर को पोस्ट किया था, या दिखाया था, और उसे देखकर उन्होंने भी इस खबर को बना लिया था। यह देखादेखी, यह अघोषित नकल अखबारनवीसी की पूरी जिम्मेदारी को खत्म कर चुकी है। अब लोगों को अपनी लिखी खबर को हटा देने में जरा सी भी झिझक नहीं होती क्योंकि टेक्नॉलॉजी ने यह सुविधा दे दी है। अखबारों के पुराने वक्त में अगर ऐसी कोई खबर गलत निकल जाती थी, तो जिम्मेदार अखबारनवीस हफ्तों तक शर्मिंदगी में डूबे रहते थे। 

खैर, जशपुर में नहीं हुई इस दुर्घटना की घटी हुई खबरों से सभी को कुछ सबक लेना चाहिए, हमारे अखबार के संवाददाताओं सहित। कुछ धीरे चलने में कोई बुराई नहीं है। यह तो विमान दुर्घटना की झूठी खबर थी, कई खबरों ऐसी भी हो सकती हैं जो साम्प्रदायिक तनाव फैला सकती हैं, दहशत में कोई हादसा करवा सकती हैं। सावधानी का मिजाज लौटना जरूरी है, लोग जिम्मेदारी की तरफ वापिस लौटें, तो वह किसी भी तरह की खबरों को बनाते हुए काम आएगी, वरना अब सही और गलत को लेकर शर्म की बात तो खत्म ही हो चुकी है।

(Daily Chhattisgarh)                   

विदेशी सैलानियों पर यौन हमलों से पर्यटन कारोबार की तबाही का अंदाज है?

23 अप्रैल 2026  

 

कर्नाटक में कूर्ग का इलाका बड़ा खूबसूरत माना जाता है, और वहां पर्यटक भी बहुत पहुंचते हैं। राज्य सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए, और पर्यटकों को भारतीय जनजीवन की बेहतर झलक दिखाने के लिए घरों में पर्यटकों के ठहरने का एक नया कार्यक्रम शुरू किया है। देश के कई और पर्यटन केन्द्रों पर ऐसा पहले से भी चल रहा है, और कई विदेशी सैलानी कमखर्च में भारत देखने के लिए, यहां का पारिवारिक जीवन देखने के लिए भी परिवारों में रूकते हैं। कर्नाटक में अभी ऐसे ही एक होम-स्टे में रूकी हुई एक अमरीकी पर्यटक महिला को उसी जगह काम करने वाले एक कर्मचारी ने किसी ड्रिंक में नशा घोलकर पिला दिया, और फिर उसके साथ बलात्कार किया। इसके सुबूत मिटाने, और महिला शिकायत न कर सके इसलिए वाईफाई बंद कर देने का काम भी किया गया। बाद में किसी तरह इस महिला ने बाहर निकलकर अमरीकी दूतावास को खबर की, और इस घर के मालिक-नौकर को गिरफ्तार किया गया। कुछ और लापरवाहियां भी सामने आई हैं कि कर्नाटक में इस घर ने अपने को पर्यटकों को ठहराने के लिए रजिस्टर भी नहीं करवाया था। 

दूसरे देशों से भारत आने वाले लोगों से इस देश का करोड़ों लोगों का जीवन चलता है। एक अंदाज यह है कि पर्यटन से सीधे, और किसी और तरह से करीब साढ़े 8 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। भारत की जीडीपी में इस सेक्टर का योगदान करीब सवा 5 फीसदी है। ऐसी एक-एक घटना न केवल उस पर्यटक के अपने देश में, बल्कि भारत आने की सोच रहे और तमाम लोगों के बीच भी हौसला पस्त करती है। अलग-अलग कुछ प्रमुख देश अपने नागरिकों के लिए समय-समय पर ऐसी चेतावनी जारी करते आए हैं कि भारत अकेली महिला पर्यटक के लिए सुरक्षित नहीं है। अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों ने अपने नागरिकों को यह सलाह दे रखी है जिसमें भारत में विदेशी महिलाओं के साथ होने वाले यौन-अपराधों का जिक्र किया गया है, उन्हें भारत में कहीं भी अकेले न घूमने की सलाह दी गई है, और यह भी कहा गया है कि होटल या होम स्टे में अनजान लोगों से खाने-पीने की चीजें न लें, क्योंकि इनमें नशा मिला होने का खतरा रहता है। 

यह देश कहने के लिए अतिथि देवो भव: की परंपरा का दावा करता है, लेकिन हमने विदेशी सैलानियों के साथ सार्वजनिक जगहों पर दिनदहाड़े देसी लोगों द्वारा तरह-तरह की बदसलूकी के कितने ही वीडियो देखे हैं। बदसलूकी से थोड़ा सा कम अगर देखें, तो किसी भी गोरी या विदेशी महिला के आसपास के हिन्दुस्तानी लडक़े और मर्द उसके साथ अपनी सेल्फी खिंचवाना अपना कानूनी हक समझते हैं। इस देश में अपने लोगों के साथ भी बलात्कार एक किस्म से पार्ट टाईम काम हो गया है, ऐसे में विदेशियों के प्रति यहां के लोगों का मोह सिर चढक़र बोलने लगता है। भारत अपने आपमें एक पूरे योरप जितना बड़ा विविधता वाला देश है। इसके कश्मीर का केरल से कोई भी मेल नहीं है, पश्चिम के गुजरात और राजस्थान से उत्तर-पूर्व के राज्यों का कोई मेल नहीं है, इसलिए यहां दुनिया भर के पर्यटक आते हैं क्योंकि एक वीजा से, एक देश के भीतर उन्हें कई देशों को घूमने जैसा फायदा मिल जाता है। भारत का पर्यटन उद्योग बहुत छोटे-छोटे से स्थानीय लोगों को रोजगार देता है, और किसी एक महिला पर्यटक के साथ बलात्कार जैसी घटना शायद दसियों हजार महिला पर्यटकों का भारत आने का इरादा बदल देती होगी। 

भारत में चाहे जो सोचकर सरकार होम स्टे की छूट देती है, या उसे बढ़ावा देती है, उससे जुड़े हुए खतरों को न समझना देश के इस बहुत बड़े कारोबार को नुकसान पहुंचाएगा। एक रिपोर्ट बतलाती है कि एक-दो बलात्कारों के बाद ही महिला पर्यटकों के भारत आने में पिछले दो साल में करीब 12 फीसदी की गिरावट आई है। अब लोग छुट्टियां मनाने के लिए भारत की जगह वियतनाम, श्रीलंका, और थाईलैंड को प्राथमिकता दे रहे हैं जो कि पर्यटक सुरक्षा के मामले में भारत से ऊपर माने जाते हैं। भारत में एक औसत विदेशी पर्यटक ढाई-तीन हजार डॉलर खर्च करते हैं, जो कि ढाई-तीन लाख रूपए के बराबर होता है। इसमें होटल, टैक्सी, रेस्त्रां, ढाबे, गाईड, हस्तशिल्पी जैसे दर्जनों अलग-अलग पेशे के करोड़ों लोगों को काम मिलता है। अब एक दिक्कत यह है कि बलात्कार जैसे संगीन जुर्म करने वालों से परे राह चलती विदेशी सैलानी महिला को घेरकर उसके साथ तरह-तरह की छेडख़ानी, और बदसलूकी करने वाले हर शहर में मिल जाते हैं। जिन शहरों में विदेशी सैलानियों का लगातार आना-जाना रहता है, जहां लोग गोरी या किसी और रंग की चमड़ी को देखने के आदी हैं, वहां भी किसी महिला को देखते ही मर्दों के दिल कुलबुलाने लगते हैं। यह सिलसिला भारत की साख को बहुत बुरी तरह चौपट कर रहा है। 

अब एक देश के रूप में भारत को यह सोचने की जरूरत है कि महिलाओं के प्रति जो एक आम हिकारत एक आम भारतीय मर्द के दिल-दिमाग में है, उसे दूर किए बिना क्या सचमुच ही विदेशी सैलानी महिलाओं के प्रति किसी के मन में सम्मान पैदा किया जा सकता है? जो लोग देश के भीतर महिलाओं के हर किस्म के शोषण में लगे रहते हैं, और बड़े चर्चित बाबाओं से लेकर नेताओं तक के जितने तरह के वीडियो आते हैं, उनसे पता लगता है कि देश की संस्कृति क्या हो गई है। जो लोग ऐसी संस्कृति के बीच बड़े होते हैं, वे पर्यटन कारोबार को ध्यान में रखकर पर्यटन महिलाओं का सम्मान करने लगेंगे, यह उम्मीद तो आम भारतीय मर्द पर बहुत बड़ी ज्यादती होगी। किसी भी देश में यह नहीं हो सकता कि वहां महिला के साथ तो हर तरह की ज्यादती होती रहे, और मेहमान या पर्यटक महिला का सम्मान हो। 

एक दूसरी बात हमें यह लगती है कि कारोबारी होटल में तो सरकार की भी नजर रह सकती है, और वहां ठहरने वाले पर्यटकों को भी होटल के कमरों का कुछ अंदाज रहता है। लेकिन घरों में पर्यटक ठहराने वाले लोग तो एक अनौपचारिक इंतजाम रखते हैं, सारा माहौल घर जैसा रहता है, और वैसे में यह भरोसा कर पाना कुछ मुश्किल है कि मौका मिलने पर भी वहां काम करने वाले, या वहां के मालिक मर्द खुफिया कैमरे लगाकर रिकॉर्डिंग नहीं करेंगे, तांक-झांक नहीं करेंगे, या मौका मिलते ही यौन-शोषण की कोशिश नहीं करेंगे। इस देश में महिलाओं के साथ यौन-अपराधों का माहौल ऐसा बना हुआ है कि खुद भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों को होम स्टे के खतरों के बारे में जरूर ही सोचना चाहिए। इस देश के मर्द इस लायक नहीं है कि उनके घर पर ठहरी हुई विदेशी महिला पर्यटकों के साथ वे अच्छा बर्ताव कर सकें। इस खतरे को जानते-समझते हुए ही केन्द्र और राज्य सरकारों को अपनी पर्यटन नीतियां तय करना चाहिए। सार्वजनिक जगहों पर बदसलूकी करने वाले स्थानीय लोगों के साथ सरकार क्या कार्रवाई करती है, इसका अच्छा प्रचार होना चाहिए ताकि बाकी लोगों को भी बदसलूकी के बाद जेल जाने के खतरे समझ में आ सकें। एक पर्यटक के साथ बदसलूकी करने वाले लोग हिन्दुस्तान के 8-10 लोगों की मजदूरी और कमाई तबाह करते हैं, ऐसा एक अंदाज पर्यटन उद्योग का है, इस बात का अंदाज आम लोगों को नहीं होगा।

(Daily Chhattisgarh)                   

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल 2026



 

बुढ़ापे और मेले में अकेले रह जाने की अमिताभ की नसीहत

 22 अप्रैल 2026  

 

हर दिन किसी नए विषय पर लिखने का दबाव बड़ा खराब रहता है। वैसे तो घिसे-पिटे कई विषय ऐसे रहते हैं जिनमें आए दिन कुछ न कुछ नया होता है, और उन पर एक बार फिर लिखना जायज कहा जाएगा। लेकिन उन्हीं-उन्हीं घटनाओं या मुद्दों पर, या उन्हीं लोगों पर लिखने से बात तो बहुत सारी दुहराना हो जाता है। इसलिए हम कोशिश करते हैं कि जैसे ही कोई नया मामला हाथ लगे, उस पर लिखना चाहिए। ऐसे में आज अमिताभ बच्चन की सोशल मीडिया पर एक ताजा पोस्ट दिखी जिसमें उन्होंने लिखा है- इंसान चाहे कुछ भी कर ले, अंत में वो अकेला ही रहता है, और उसे सब कुछ अकेले ही करना पड़ता है। उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा- कि समझदारों के सलाह-मशविरे हमेशा काम आएंगे, लेकिन आखिर में उस काम को अंजाम देने वाले हमेशा ‘आप’ ही होंगे। आप जो महसूस करते हैं, जिस दौर से गुजरते हैं, जिस पर गौर करते हैं, जो दुख सहते हैं, जो लुत्फ उठाते हैं, जो हासिल करते हैं, या जिसका ख्याल करते हैं, वह सब सिर्फ ‘आप’ ही हैं। आप ही सर्वोच्च हैं। अहमियत सिर्फ ‘आपकी’ है, और किसी चीज की नहीं। आप विचारों, यादों, और संभावनाओं का एक पूरा ब्रम्हांड हैं, जो हर नए तजुर्बे के साथ लगातार निखर रहा है। आपके भीतर वो ताकत छिपी है जिस पर अक्सर नजर नहीं जाती, वो लचीलापन है जो आपको मुश्किलों से बाहर निकाल लाता है, और वो जिज्ञासा है जो आपको अनजाने मंजिलों की ओर धकेलती है। आप अपनी पसंद, अपने शब्दों, और अपने कामों से अपनी दुनिया को गढ़ते हैं, और हर मिलने वाले शख्स पर अपनी एक अनकही छाप छोड़ जाते हैं। खुद को समझने के इस सफर में, आप अपने आसपास की दुनिया को और भी साफ तौर पर समझने लगते हैं। याद रखें हर ‘आप’ (इंसान) के भीतर अपनी एक निजी ताकत होती है, यही आपका वो हथियार है जिसे कोई तोड़ नहीं सकते। इसे अपने भीतर सहेजकर रखें, और जब सबसे ज्यादा जरूरत हो, तब इसे बाहर निकालें। यही आपका सबसे बेहतरीन ढाल और रक्षक बनेगा।

अब अमिताभ बच्चन 83 साल की उम्र में अपने पेशे में देश के सबसे कामयाब व्यक्ति साबित हो चुके हैं, और उनकी समझदारी में भी कोई कमी नहीं दिखती है। वे विवादों से अपने को बहुत हद तक बचाकर चलते हैं, और अपने कामकाजी परिवार में वे अकेले ही सबसे अधिक उम्रदराज होने के बाद भी आज सबसे अधिक व्यस्त रहते हैं, सबसे अधिक कमाते भी हैं। उन्होंने अपनी अधेड़ उम्र में एक कारोबार में इतना लंबा नुकसान झेला था कि जिससे उबर पाना कम ही लोगों के बस का रहता है, लेकिन वे न सिर्फ उबरे, बल्कि वे उसके बाद लगातार ऊंचाईयों के आसमान पर चलते रहे, और आज वे देश के एक सबसे बड़े मनोरंजन-पेशेवर व्यक्ति हैं। कारोबारी घाटे से परे वे एक बार राजनीति में भी हाथ आजमा चुके हैं, और समय रहते वहां से बाहर निकल चुके हैं। उस वक्त देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार, इंदिरा गांधी-राजीव गांधी से उनका दो पीढ़ी का घरोबा रहा है, और जब यह घरोबा खत्म हुआ, तो वे उसके बिना जीना भी सीख चुके हैं।

अमिताभ बच्चन की लिखी इन बातों में से हम एक निचोड़ निकालकर उस पर आगे बात करना चाहते हैं कि हालात चाहे जो हो, आखिर में बस ‘आप’ ही रह जाते हैं। अमिताभ ने माता-पिता से कोई बहुत मामूली से विरासत पाई हो सकती है, लेकिन वे अपने बच्चों के लिए हजारों करोड़ की एक विरासत खड़ी कर चुके हैं। बहुत अधिक समाजसेवा, और दान पर भरोसे का उनका कोई इतिहास नहीं है, और किसी एक गांव के किसानों के कर्ज पटाने की घटना शायद उनके दान का अकेला सार्वजनिक समाचार रहा है। खैर, यह तो हर व्यक्ति की अपनी पसंद की बात है कि वे समाज के कितने काम आते हैं, लेकिन अमिताभ बच्चन जिस हद तक आत्मकेन्द्रित हैं, उनका पूरा जीवन इसी की एक मिसाल रहा है, और इसलिए उनकी कही यह बात ईमानदार लगती है कि आखिर में इंसान एकदम ही अकेले रह जाते हैं। यह तो ठीक है कि परिवार के लोग, और यार-दोस्त कुछ लोग तो बहुत से लोगों के इर्द-गिर्द रहते हैं, लेकिन जिस तरह मेले में अकेले कहा जाता है, उसी तरह लोगों को अपने आखिरी वक्त के लिए अकेले रहने की तैयारी कर लेनी चाहिए। महज अमिताभ बच्चन नहीं, हम तो बहुत से आम लोगों की जिंदगी की अपनी मिसाल, या उनकी कही हुई कुछ बातों में भी दूसरों के लिए राह ढूंढ लेते हैं, अमिताभ बच्चन तो एक बहुत बड़ी मिसाल हैं।

अमिताभ की कही हुई बात को याद रखते हुए लोगों को यह सोच लेना चाहिए कि आखिरी में वो अकेले हो सकते हैं। यह तो ठीक है कि अमिताभ आज बिना दोस्तों के दिखते हैं, परिवार में भी अपनी व्यस्तता के चलते कई बार आधी रात और सुबह के बीच किसी वक्त काम से घर लौटते हैं, और घर के बाकी कम उम्र सदस्य तब तक शायद सो चुके रहते हैं। इसके बावजूद वे, बिना किसी जरूरत के लगातार इतनी मेहनत करते हैं, इतना कमाते हैं, और ऐसी कोई भी मिसाल नहीं है कि वे गंवाते भी हैं। हम अमिताभ बच्चन की राजनीतिक तटस्थता के कायल नहीं हैं, हम कई बार इस बात की आलोचना कर चुके हैं कि दलगत या चुनावी राजनीति से परे भी देश और दुनिया के कई मुद्दों पर चर्चित और मशहूर लोगों को बोलना चाहिए, मुंह खोलना चाहिए, जिससे अमिताभ बच्चन बचते हैं। कोई दस-पन्द्रह बरस पहले पेट्रोल के बढ़ते दाम, या डॉलर के मुकाबले रूपये की गिरती हुई कीमत पर सोशल मीडिया पर लिखकर वे अपने हाथ जला चुके हैं, क्योंकि आज पेट्रोल उस वक्त से दुगुना महंगा हो जाने पर, और रूपये की कीमत आधी रह जाने पर भी उनके होंठ सिले हुए हैं। हम ऐसी तमाम मिसालों में दुनिया भर लोगों के लिए नसीहतें ढूंढते हैं, जो कि आसानी से सतह पर तैरती हुई मिल जाती हैं। अमिताभ ने अपने आपको किसी भी तरह की सार्वजनिक जिम्मेदारी से परे रखा है, और यह बात भी लोगों को अच्छी लगे, या बुरी लगे, उन्होंने इसकी एक मिसाल तो पेश की है कि जिस भोपाल में उनकी ससुराल थी, वहां पर गैस त्रासदी में हजारों लोगों के मर जाने, और लाखों लोगों की सेहत बहुत बुरी तरह बर्बाद हो जाने पर भी उन्होंने कभी मुंह नहीं खोला, शायद मदद का हाथ भी नहीं बढ़ाया। इतना आत्मकेन्द्रित व्यक्ति आखिर में अकेले तो रह ही जाएगा।

हम अमिताभ के लिखे हुए में गुण-दोष नहीं तलाश रहे हैं। उन्होंने अपनी सोच सामने रखी है, और वे बिल्कुल ही एक अकेले इंसान की तरह उम्र के इस पड़ाव पर भी काम का ओवरटाइम करते हुए हर बरस शायद पारिवारिक सम्पत्ति में सैकड़ों करोड़ का ताजा इजाफा करते हैं, और अपने आपको अजीम प्रेमजी जैसे लोगों के किसी भी संक्रमण से दूर भी रखते हैं। यह क्षमता अपने आपमें एक बहुत बड़े हठयोग की तरह है कि आप एक बहुत बड़े खजाने पर इस तरह बैठे हैं जैसे कि वह खजाना देश और दुनिया के अभाव के बीच एक टापू हो, और आप रोज बोट से पानी पार करके कमाने आते-जाते हों, और लौटकर अपने टापू की ऊंचाई कुछ और बढ़ा लेते हों। यह क्षमता कम नहीं है, और अमिताभ बच्चन ने अपनी खुद की मिसाल पेश करने के साथ यह लिखा है कि आखिर में जाकर आप अकेले रह जाते हैं। जब विपन्नता के समंदर के बीच संपन्नता के टापू पर कोई इस हद तक अकेले रहने में कामयाबी पाए, तो उसे ऐसी नसीहत देने का हक भी है, फिर चाहे उन्होंने यह मसीहाई अंदाज में न कहा हो, महज अपना तजुर्बा बताया हो, अपनी सोच बताई हो। जिंदगी के आखिर में अकेले रह जाने के सौ किस्म के अलग-अलग मतलब हो सकते हैं, अमिताभ ने अपने मुताबिक यह बात लिखी है, और दूसरे लोग अपने आखिरी दिनों की कल्पना करके अपने-अपने हिसाब से लिख सकते हैं, सोच सकते हैं, और ऐसे दिनों की तैयारी कर सकते हैं। हम अमिताभ बच्चन को एक बहुत शानदार पेशेवर मनोरंजन-कलाकार मानते हैं, बहुत ही कामयाब भी मानते हैं, मशहूर तो वे हैं ही, उनकी संपन्नता किसी के लिए भी एक बहुत बड़ी चुनौती है, ऐसी ही खूबियों के साथ वे अपने आपको दुनिया दुख-दर्द में शामिल होने से जिस तरह बचाकर भी चलते हैं, उससे वे यह साबित करते हैं कि बुढ़ापे, या मेले में, कैसे अकेले रहा जा सकता है।

(Daily Chhattisgarh)                   

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अप्रैल 2026

(DailyChhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल 2026



 

सरकारी दफ्तरों की नई करेंसी, बादाम चढ़ाना न भूलें....

21 अप्रैल 2026  

 

छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के बिलासपुर दफ्तर में एक नौजवान की फाइल सालभर से नहीं मिल रही थी। किसी दफ्तर में फाइल न मिलने की भारत में कुछ बड़ी जाहिर सी वजहें रहती हैं, जिन्हें मुंह से बोलकर जाहिर नहीं किया जाता, लेकिन पता सबको रहता है। लोगों को याद होगा कि ऑफिस-ऑफिस जैसे किसी नाम का एक टीवी सीरियल रहता था जिसमें मुसद्दीलाल नाम का एक किरदार था, जो कि सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते दिखता था, और दफ्तरों के लोग उसका मजा लेते रहते थे। वह भारत के आम सरकारी दफ्तरों पर टेलीविजन पर एक सबसे ताकतवर कटाक्ष था। वह सीरियल तो अपनी जिंदगी जीकर खत्म हो गया, लेकिन सरकारी दफ्तर अब तक जारी हैं, और इस देश की संवैधानिक व्यवस्था में कोई सुनामी भी सरकारी इंतजाम को बहाकर कम नहीं कर सकती।

अब बिलासपुर में इस नौजवान ने सालभर धक्के खाने के बाद आधा किलो बादाम खरीदा, और महिला अधिकारी की मेज पर जाकर उसे बिखेर दिया कि इसे खाने से शायद आपकी याददाश्त तेज हो जाए, और न मिल रही फाइल मिल जाए। दोनों तरफ से इस बादाम के वीडियो बन रहे थे, जिस महिला अधिकारी की मेज पर यह प्रतीकात्मक विरोध दर्ज किया गया, वह भी अपने फोन से इसकी रिकॉर्डिंग करते दिख रही थी। खैर, जब यह वीडियो चारों तरफ फैला, और सरकार की, हाउसिंग बोर्ड की खासी खिल्ली उड़ गई, तो इस महिला अधिकारी को भी हाउसिंग बोर्ड के मुख्यालय अटैच कर दिया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि अलग-अलग सरकारी दफ्तरों में बरसों तक फाइलों को रोकने का जो आम सिलसिला चलता है, उसके लिए क्या हर सरकारी दफ्तर के बाहर पान-ठेलों पर बादाम के पैकेट भी बेचे जाएं? जिस तरह लोग शंकरजी के मंदिर में धतूरे का फूल लेकर जाते हैं, और नंदी के लिए बेलपत्री, क्या उसी तरह सरकारी दफ्तरों में साहब और बाबुओं की याददाश्त बढ़ाने के लिए बादाम चढ़ाए जाएं? हालांकि कोई भी अधिकारी, या कर्मचारी को चढ़ाए गए बादाम किसी मंदिर में चढ़ाए गए नारियल की तरह घूम-फिरकर उसी ठेले पर फिर आ जाएंगे, और अगले दिन कुछ नए लोग उन्हीं पैकेट को खरीदकर फिर सरकारी कुर्सियों पर चढ़ाएंगे? भारत में दीवाली के समय एक से दूसरे तक सफर करने वाली सोनपपड़ी के डिब्बे की तरह बादाम के पैकेट घूमना क्या ठीक रहेगा? क्या इससे हर सरकारी दफ्तर के बाहर दो-तीन रोजगार पैदा होंगे? क्या सरकारी चढ़ावे के लिए एक अलग किस्म का घटिया, और दीमक खाया हुआ बादाम चलन में आएगा? क्या बादाम के ऐसे इस्तेमाल के लिए चीन से बनकर नकली बादाम भी आने लगेंगे, ऐसे कई तरह के सवाल इस बादाम प्रणाली से उठ खड़े होंगे।

भारतीय सरकारी दफ्तरों में अभी तक एक दूसरी भाषा चलती थी कि किसी अर्जी के ऊपर कुछ वजन रखो, वरना वह कागज उड़ जाता है। हमने अपने बचपन से ही इसी भाषा को सुना है। अब यह बादाम वाली एक नई भाषा है, और यह पता नहीं कितने दिन चल पाएगी, कितने दिन में इस बादाम के देश को लेकर हंगामा होने लगेगा? कब यह कहा जाने लगेगा कि अफगान काबुलीवाला एक वक्त ऐसे बादाम लाकर हिंदुस्तान में बेचता था, और अफगानी बादाम को चढ़ाना ठीक नहीं होगा, अफगानी हाथों से उगाए हुए, तोड़े और तौले हुए बादाम यहां नहीं चलेंगे। हो सकता है कि ऐसी आपत्ति आने में अधिक देर न लगे, और खालिस इसी देश के, कुछ तबकों के उगाए हुए बादाम ही सरकारी दफ्तरों के बाहर बेचने की शर्तें लगाकर लोग डंडे-झंडे लेकर खड़े हो जाएंगे? लेकिन कुल मिलाकर एक बात यह समझ में आई कि सालभर में जो फाइल नहीं मिली थी, वह आधा किलो बादाम के बाद एक-दो दिनों में ही मिल गई। अब इसमें बादाम के साथ-साथ वीडियो बनाने, और उसे वायरल करने का योगदान कितना बड़ा था, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। फिर भी मोबाइल कैमरों से आज लोकतंत्र इतना तो आ गया है कि एक मुसद्दीलाल भी दो दिनों में किसी का ट्रांसफर करवा पाया, और उससे भी बड़ी बात कि अपनी गुमी हुई फाइल को ढुंढवाकर इंसाफ पाने की तरफ एक कदम बढ़ा पाया। अभी दो दिन पहले ही एक अदालत का एक किस्सा छपा था। एक बहुत ही गरीब और बुजुर्ग व्यक्ति के पक्ष में जब अदालत से फैसला हुआ, तो उसने जज को दुआ देते हुए कहा कि जाओ एक दिन थानेदार बन जाओगे। जज ने जब बताया कि वह तो थानेदार से बड़े ओहदे पर है, तो उस बुजुर्ग ने कहा कि थानेदार ने तो मुझे कहा था कि 5 हजार रुपए दो तो मैं दो दिन में मामला निपटा दूंगा। आपकी अदालत में 20 साल से मुकदमा लड़ते हुए वकील और बाबुओं पर 50 हजार रुपए खर्च कर चुका हूं, तब इंसाफ मिला है, मेरे लिए तो थानेदार ही बड़ा रहता, लेकिन मैंने बादाम खाए नहीं थे इसलिए अक्ल नहीं आई थी।

बादाम से दुनिया के चक्के के घूमने, काम के आगे बढऩे का सिलसिला बड़ी अच्छी तरह समझा जा सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि बादाम खाने से अक्ल तेज होती है। कुछ दूसरे बादाम विरोधियों का कहना है कि धोखा खाने से अक्ल तेज होती है, और कितना भी बादाम खाने से अक्ल पर उतनी धार नहीं आ पाती। यह सिलसिला इस देश में लोकतंत्र की विसंगतियों और त्रासदियों को बताता है। कैसा देश हो गया है कि सरकारों को टैक्स देने वाले लोग एक-एक सरकारी दफ्तर में भीख मांगने के अंदाज में अपनी फाइल आगे बढ़ाने के लिए हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। दूसरी तरफ सरकारी नौकरी पाने के लिए मेहनत-मशक्कत से इम्तिहान देने वाले, या कि रिश्वत देकर नौकरी पाने वाले लोग अगले ही दिन से कमाई शुरू कर देते हैं। दो दिन पहले ही राजस्थान की एक खबर आई थी कि वहां राज्यभर में सबसे अधिक नंबर्स पाने वाली, और डिप्टी कलेक्टर बनने वाली लडक़ी अपनी पहली ही पोस्टिंग में लाखों रुपए नगद रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार हो गई है। दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ की एक खबर आई थी कि स्कूल शिक्षा विभाग के दो अफसरों को एक शिक्षक से नगद रिश्वत लेते रंगेहाथों गिरफ्तार किया गया, जिसकी बीमारी की छुट्टी मंजूर करने के लिए उसी के विभाग के अधिकारी रिश्वत ले रहे थे। देश में किसी भी दूसरी भावना के मुकाबले, किसी भी दूसरे भाईचारे, या बहनचारे के मुकाबले रिश्वत का रिश्ता सबसे मजबूत है। जो लोग पूरी जिंदगी रिश्वत लेते हैं, वे रिटायर होने के अगले ही दिन अपने ही उसी दफ्तर में अपने ही कल तक के सहकर्मियों को अपनी फाइल आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत देते खड़े रहते हैं। कुछ अज्ञानी यह मानते हैं कि खून का रिश्ता सबसे मजबूत रहता है, भारत की सरकारी और अदालती व्यवस्था में जो फंसे रहते हैं, उन्हें पता रहता है कि रिश्वत का रिश्ता देश में सबसे मजबूत रहता है। कई ऐसे अदालती किस्से हवा में तैरते रहते हैं कि किसी जज, या मजिस्ट्रेट के बाबू वादी-प्रतिवादी दोनों से मोलभाव करते रहते हैं कि उनमें से अधिक रिश्वत कौन दे सकेंगे, जिसके पक्ष में फैसला दिया जा सके। हमें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक जज की याद है जो जब-जब कोई फैसला लिखते थे, उस तारीख के ठीक पहले अदालत के ठीक सामने के स्टेट बैंक के अपने सैलेरी अकाउंट में उसका भुगतान जमा करवा देते थे। जितने फैसले, उतनी बार नगद रकम जमा। यह मामला पूरा दस्तावेजी मामला था, हालांकि ऐसे कई मामलों के पकड़ में आने के बाद भी अब हाईकोर्ट के बड़े-बड़े जज भी अपने बंगलों में बोरियों में भरकर नोट रखते हैं, बड़े-बड़े आईएएस अफसर इसी शहर की अदालत के बगल में, और हमारे इस दफ्तर से आधा किलोमीटर की ही दूरी पर जेल में बंद हैं, जिन्होंने अपनी तनख्वाह से कई-कई गुना अधिक जमीन-जायदाद खरीद ली थी। इन सबको भी समय रहते किसी ने बादाम नहीं खिलाया, वरना उन्हें देश के कानून की थोड़ी सी याद आ गई रहती।

यह कथा अनंत है। जब तक दुनिया के नक्शे पर भारत रहेगा, तब तक यहां भ्रष्टाचार बना रहेगा, रिश्वतखोरी एक ऐसी करेंसी रहेगी जिसे कोई भी नोटबंदी खत्म नहीं कर सकेगी। ऐसे में बादाम उम्मीद की एक किरण बनकर आया है। लोगों को सरकारी दफ्तर में अपनी फाइल का एक बरस पूरा होने पर बादाम चढ़ाना शुरू कर देना चाहिए, और जो रिवाज धार्मिक स्थानों पर हर हफ्ते, या हर महीने का रहता है, उसके मुताबिक अपनी फाइल की मासिक बरसी मनाने के लिए पत्तल पर बादाम लेकर बाबू, या साहब के पास जाना चाहिए, क्योंकि बरसी पर कुछ न कुछ तो खिलाया जाता है, अब शहरों में कौएं तो रह नहीं गए हैं। 

(Daily Chhattisgarh)                   

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल 2026



 

धर्म और आध्यात्म से इलाज के नाम पर हर जगह शोषण

20 अप्रैल 2026  

 

यूपी की एक खबर है कि एक महिला अपने बच्चे का इलाज कराने के लिए एक मस्जिद में मौलवी के पास गई, वहां मौलवी और एक दूसरे नौजवान ने उसे कुछ नशीली चीज पिलाकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। अब उसकी शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज करके पुलिस ने जांच शुरू की है। इस महिला का कहना है कि उसका इकलौता बड़ा बेटा बीमार रहता है, और गांव के ही एक नौजवान ने उसे मौलवी से झाड़-फूंक कराने की सलाह दी। फिर वह नौजवान उन दोनों को मोटरसाइकिल पर गांव की मस्जिद ले गया। वहां मौलवी ने कुछ पिलाकर उसे बेहोश किया, दोनों लोगों ने उससे बलात्कार किया, उसके वीडियो बनाए, तस्वीरें खींची, और धमकी दी कि अगर किसी को बताया तो यह वीडियो फैला देंगे, और जान से मार देंगे। घर पहुंचकर पीडि़ता ने पति को यह सब बताया, और फिर पुलिस में शिकायत की गई। देश भर से, जगह-जगह से ऐसी शिकायतें आती हैं कि कहीं किसी तांत्रिक के पास इलाज के लिए जाने पर, तो कहीं किसी बैगा-गुनिया के पास झाड़-फूंक के लिए जाने पर वे लोग बलात्कार करते हैं, छोटे-छोटे बच्चों का भी देह-शोषण करते हैं। जहां कहीं धर्म या आध्यात्म के नाम पर अंधविश्वास के दर्जे की आस्था हो जाती है, वहां ऐसे खतरे खड़े हो जाते हैं। यह किसी एक धर्म की बात नहीं है, बहुत सारे धर्मों में ऐसा होता है। अब इससे लोगों के बचने का क्या इलाज हो सकता है?

जहां तक इलाज के नाम पर शोषण की बात है, तो इसकी जिम्मेदारी सरकार पर आती है जिसका काम इलाज का पर्याप्त इंतजाम करना है। यह बात बिल्कुल साफ है कि जहां-जहां भरोसेमंद और सुविधापूर्ण आधुनिक चिकित्सा सुविधा रहती है, वहां धीरे-धीरे अंधविश्वास जाने लगता है, और लोग आस्था चिकित्सा को छोडऩे लगते हैं। लेकिन जहां अस्पताल नहीं है, इमारत है तो डॉक्टर नहीं है, डॉक्टर है तो नर्स नहीं है, मशीनें खराब हैं, दवाइयां हैं नहीं, तो फिर लोगों के पास मजबूरी में निजी चिकित्सा सुविधाओं तक जाना रह जाता है, और कई लोग ऐसे रहते हैं जो प्राइवेट डॉक्टरों या अस्पतालों का खर्च नहीं उठा पाते, और वैसे लोग जादू-टोना, झाड़-फूंक, मंत्र-ताबीज जैसी चीजों की तरफ चले जाते हैं। आज ही छत्तीसगढ़ की एक खबर है कि एक पिछड़े हुए जिले में एक जंगली बिल्ली ने एक बुजुर्ग महिला को जख्मी कर दिया था, वह अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक कराती रह गई, और अब रैबीज के लक्षणों सहित मर गई। जंगली जानवर से भी रैबीज का संक्रमण हो सकता है, इसका अंदाज भी बहुत से लोगों को नहीं होगा, और गरीब बूढ़ी महिला अस्पताल जाकर भी हो सकता है कि रैबीज का इंजेक्शन न पा सके, जिसकी कमी पूरे प्रदेश में चल रही है, और हाईकोर्ट तक इस पर तल्ख टिप्पणियां कर चुका है।

मौत या बलात्कार जैसी खबरें आने पर लोगों का ध्यान इस तरफ जाता है, लेकिन दूसरी तरफ हर गली-मोहल्ले में बिना चिकित्सकीय शिक्षा के, तरह-तरह के फर्जी कोर्स किए हुए लोग, या फर्जी कोर्स भी न किए हुए लोग दवाखाना खोलकर बैठते हैं, कई जगहों पर तो ऐसे लोग नकली अस्पताल भी चलाते हैं। हैरानी की एक खबर यह थी कि गुजरात जैसे विकसित और संपन्न राज्य में बिना डॉक्टरों के एक नकली अस्पताल ही चल रहा था। कमोबेश ऐसी घटनाएं पूरे देश में होती हैं, और कहीं-कहीं तो यूट्यूब पर वीडियो देखकर भी किसी स्वास्थ्य कर्मचारी ने सर्जरी कर डाली, और मौत हो जाने पर फरार हो गया। देश में मोटेतौर पर चिकित्सा व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, कुछ गिने-चुने एम्स जैसे केन्द्रीय संस्थान अलग-अलग राज्यों में केन्द्र सरकार चलाती है, लेकिन मरीजों का 90 फीसदी हिस्सा राज्य के अपने इंतजाम पर ही जाता है। हम छत्तीसगढ़ में देख रहे हैं कि किस तरह यहां दवा खरीदी से लेकर चिकित्सा सेवा के बाकी हर पहलू में बीते बरसों का भ्रष्टाचार सिर चढक़र बोल रहा है। आखिर ऐसा भ्रष्टाचार गरीब मरीजों के हक पर डाके के अलावा और क्या है? फिर किसी एक पार्टी की सरकार के रहते हुए ऐसा होता हो, और दूसरी पार्टी की सरकार रहते हुए न हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। इस छत्तीसगढ़ में बीते 25 बरस में हमने हर सरकार में स्वास्थ्य विभाग में ऐसा ही परले दर्जे का भ्रष्टाचार देखा है, और शायद यही वजह है कि स्वास्थ्य मंत्री रहे हुए अधिकतर नेता अगला चुनाव हार भी चुके हैं।

खैर, हम छत्तीसगढ़ में उलझना नहीं चाहते, क्योंकि यह पूरे देश का मुद्दा है। और चिकित्सा सेवा की नामौजूदगी के अलावा लोगों का अंधविश्वास, उनकी अंधश्रद्धा, धर्मान्धता, जैसे कई और पहलू जब जुड़ जाते हैं, तो कहीं चंगाई सभाएं होने लगती हैं, कहीं लोग ताबीज या धागा बांधने लगते हैं, कहीं पर तंत्र-मंत्र, और हवन होने लगते हैं, और बलात्कारियों को थके-हारे, बीमार, मानसिक रूप से विचलित शिकार मिल जाते हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि किस तरह आसाराम नाम के बलात्कारी ने अपने भक्त परिवार की नाबालिग बच्ची से बलात्कार किया था, और वह इतना पुख्ता मामला था कि वह सुप्रीम कोर्ट तक देश के सबसे नामी-गिरामी वकीलों को खड़ा करके भी नहीं बच पाया। लोगों को अपनी पसंद की मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति पर विश्वास करना चाहिए, न कि किसी तरह के झाड़-फूंक किस्म के टोटके पर। दूसरी बात यह कि इलाज की जरूरत हो, या किसी और किस्म की, शारीरिक, आर्थिक, मानसिक परेशानी हो, कभी अपने परिवार के लोगों को ढोंगियों को समर्पित नहीं करना चाहिए। हर किसी को एक वैज्ञानिक नजरिया विकसित करना चाहिए। कब धर्म और आध्यात्म अपनी सीमाओं को लांघकर अंधविश्वास में दाखिल हो जाते हैं, और देह-शोषण करने लगते हैं, इसकी कोई दिखने वाली लक्ष्मण रेखा नहीं है। लोगों को खुद ही सावधान रहना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)