सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक और क्रांतिकारी फैसला, पैड लड़कियों का बुनियादी हक!
31 जनवरी 2026
सुप्रीम कोर्ट ने कल एक ऐतिहासिक फैसला दिया है जिसमें लड़कियों और महिलाओं की माहवारी से जुड़ी सेहत की जरूरतों को जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित किया। जस्टिस जे.बी.परदीवाला, और जस्टिस आर.महादेवन की बेंच का यह फैसला स्कूल जाने वाली लड़कियों की माहवारी की जरूरतों को लेकर था। अदालत ने देश की हर सरकारी और निजी स्कूलों में 6वीं से 12वीं तक की छात्राओं को मुफ्त का सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। यह आदेश एक जनहित याचिका पर आया है जिसमें स्कूलों में माहवारी से जुड़ी सुविधाओं की कमी का जिक्र था, और अदालत से मदद मांगी गई थी। इस फैसले में जजों ने कल कहा है कि माहवारी के दौरान लड़कियां सामाजिक और सार्वजनिक अपमान का सामना करती हैं जिसका उनकी शिक्षा और सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए शहरी हो, या ग्रामीण, हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय, पानी, साबुन, और जरूरत पडऩे पर अतिरिक्त यूनिफॉर्म का इंतजाम अनिवार्य किया गया है। अदालत का यह फैसला इन सरकारी आंकड़ों के आधार पर भी आया है जिनके मुताबिक भारत में हर बरस सवा दो करोड़ लड़कियां माहवारी की दिक्कतों की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। अब अदालत ने यह कहा है कि राज्यों को इन निर्देशों पर पूरे अमल के लिए निगरानीतंत्र बनाना होगा। कुछ और बारीक बातें भी इस फैसले में लिखी गई हैं, लेकिन हम आज यहां पर मोटी-मोटी बातों पर ही चर्चा आगे बढ़ा रहे हैं।
भारत की इस बात के लिए भी बड़ी आलोचना होती थी कि सेनेटरी नैपकिंस पर टैक्स भारत में 2018 तक जारी था। लंबी जन आलोचना के बाद जीएसटी कमेटी ने इसे हटाया है। कुछ दूसरे देशों का हाल देखें, जहां पर भारत के मुकाबले गरीबी खासी अधिक है, तो उनमें भी कई जगहों पर स्कूलों में सेनेटरी पैड्स मुफ्त मुहैया कराने का इंतजाम पहले से है। अफ्रीका के देश केन्या में 2018 से स्कूली लड़कियों को ये मुफ्त हासिल हैं। बोत्सवाना में 2017 से, जाम्बिया में हर स्कूल में, नेपाल में 2019-20 से, और एक सबसे गरीब देश इथियोपिया में भी कुछ स्कूल कार्यक्रमों में सेनेटरी पैड मुफ्त मुहैया कराए जाते हैं। ऐसे सारे ही देशों का यह तजुर्बा रहा है कि स्कूली लड़कियों को इस मुफ्त सहूलियत के बाद लड़कियों का स्कूल छोडऩा कम होता है। भारत में करीब एक चौथाई लड़कियां माहवारी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। वे स्कूल में पढ़ते हुए भी महीने में तीन से पांच दिन तक गैरहाजिर रहती हैं। मामूली गंदे कपड़े के इस्तेमाल से वे तरह-तरह के संक्रमण से गुजरती हैं, स्कूलों में ऐसे पैड डालने के लिए कचरे के डिब्बे नहीं रहते, भारत की गांवों के स्कूलों में ऐसे डिब्बों का इंतजाम और कम है। लेकिन जिस-जिस देश में स्कूली लड़कियों को पैड मुफ्त दिए गए, वहां-वहां स्कूल छोडऩा घट गया है, और ये आंकड़े एकदम ही चौंकाने वाले हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हम इसलिए भी ऐतिहासिक मान रहे हैं कि माहवारी को भारत में जिस तरह सामाजिक छुआछूत माना जाता है, माहवारी से गुजर रही लडक़ी या महिला को अधिकतर जगहों पर शुभ कार्य में शामिल नहीं होने दिया जाता है, पूजा-पाठ से दूर रखा जाता है, रसोईघर में घुसने नहीं दिया जाता, वहां पर अगर माहवारी की दिक्कतों के समाधान को बुनियादी अधिकार में शामिल कर लिया गया है, तो यह लड़कियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का काम है। थोड़ी हैरानी इस बात पर होती है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को तो कुछ बरस में वोटर बनने वाली इस उम्र की लड़कियों की इतनी फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं थी, और चुनावों पर जिंदा रहने वाले, और सत्ता पाने वाले नेताओं का कारोबार तो वोटर, और जल्द वोटर बनने वाले लोगों पर टिका रहता है। संसद और सरकार, विधानसभाओं, और नेताओं ने जो नहीं किया, उसे एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने किया है, यह भारत की सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं, और उन पर काबिज लोगों के देखने लायक आईना भी है। सुप्रीम कोर्ट की नीयत चाहे आईना दिखाने की न हो, लेकिन आईना पेश तो हो ही चुका है, और हर स्कूली लडक़ी हर महीने के चार-पांच दिन जजों को दुआ देगी, न कि नेताओं को। यह बड़ी लोकतांत्रिक विसंगति की बात है कि सुप्रीम कोर्ट के जज लड़कियों की जिस जरूरत को मौलिक अधिकार में शामिल करने लायक मान रहे हैं, कर रहे हैं, वह जरूरत देश की सरकारों को दिखी भी नहीं!
क्या इसके पीछे भारत के समाज, और यहां की राजनीति पर हावी पुरूषप्रधान सोच है, जो कि लड़कियों को, महिलाओं को बराबरी के हक के लायक समझती नहीं है, या फिर मतलबपरस्त चुनावी राजनीति है जिसकी नजर में लड़कियां 12वीं पास करने के बाद ही वोटर बनती हैं। जब तक कोई वोटर न बने, उसकी फिक्र क्यों करना? हम कई बार इस बात को लिखते, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बोलते हैं कि अभी कुछ बरस पहले तक भारतीय स्कूली किताबें पढ़ाती थीं कि कमल घर चल, कमला नल पर जल भर। इन्हें पढक़र बड़े हुए कमल कमला की माहवारी की फिक्र भला कर भी कैसे सकते थे? इसीलिए किसी देश और समाज में, किसी संस्कृति में लड़कियों और महिलाओं के प्रति सम्मान किस्तों में नहीं आता, वह मिजाज में पूरी तरह आ सकता है, या बिल्कुल नदारद रह सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अमल में आने में कई राज्यों के लिए कुछ दिक्कतें ला सकता है। वैसे तो किसी सामान की सप्लाई शुरू करने में सरकार में बैठे लोगों का उत्साह देखते ही बनता है, लेकिन सेनेटरी पैड खरीदने, लड़कियों के लिए साबुन और पानी वाले अलग शौचालय बनाने, कचरे के डिब्बे रखने, और इनके निपटारे के काम को कुछ सरकारें अदालत की मनमानी से लद गया फिजूलखर्च मान सकती है। लेकिन अदालत को अपनी इस नई परिभाषा पर कड़ाई से टिके रहना होगा, और सरकारों के लिए भी यह राजनीतिक रूप से मुमकिन नहीं होगा कि वे अदालत को अपना फैसला बदलने या सुधारने को कहें। लड़कियों के हक की यह एक लंबी छलांग है, और यह देश के दीर्घकालीन हित में भी है क्योंकि लड़कियों की पढ़ाई जारी रहेगी, वे बीमारियों से दूर रहेंगी, और आत्मविश्वास से भरी रहेंगी, तो देश की तस्वीर ही बदल जाएगी। लड़कियों के इस मौलिक अधिकार को कानूनी दर्जा मिलने में चाहे जितना भी वक्त लगा हो, जब जागे तभी सबेरा, अब कम से कम सरकारों को अपनी बाकी फिजूलखर्चियां घटाकर आधी आबादी के इस मौलिक अधिकार का सम्मान करना चाहिए। जो सरकार ऐसा न करे, उसे स्कूली छात्राएं याद भी रखें, आखिर जल्द ही वे भी वोटर तो बनेंगी ही।
असाधारण इच्छाशक्ति की असल जिंदगी की कहानियों से बेहतर मिसाल और क्या?
30 जनवरी 2026
इस बार गणतंत्र दिवस पर देश के जिन लोगों को पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान हुआ है, उनमें एक नाम कर्नाटक के मांडया जिले के हरलाहल्ली गांव के अनके गौड़ा का है। वे पहले बस कंडक्टर थे, फिर एक शक्कर कारखाने में काम करते थे। उन्होंने अपना मकान बेचकर आधा एकड़ जमीन पर एक किताबघर बनाया, और पिछले पचास बरस में उन्होंने तनख्वाह का करीब 80 फीसदी किताबों पर खर्च करके यहां 20 लाख से अधिक किताबें इकट्ठा की हैं। वे खुद एक कोने में फर्श पर सोते हैं क्योंकि सारी जगह किताबों से भरी हुई है। बिना किसी फीस के, लोग यहां आकर किताबें पढ़ सकते हैं, और अब तो दूर-दूर से यहां शोधकर्ता आने लगे हैं। बिना किसी सरकारी मदद के एक जिद्दी इंसान की मेहनत किस तरह एक असाधारण तस्वीर गढ़ सकती है, उसकी यह एक मिसाल है। भारत में अलग-अलग जगहों में अलग-अलग लोगों ने कुछ इस तरह का ही करिश्मा कर दिखाया है।
ऐसी कुछ और मिसालें ढूंढें, तो दशरथ मांझी का नाम आता है जो बिहार के एक गांव के रहने वाले थे, और गांव से अस्पताल पहुंचने में पहाड़ी का चक्कर काटकर 55 किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता था। अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल पहुंचाने के लिए उनके पास कोई आसान रास्ता नहीं था, पत्नी के गुजरने के बाद 22 बरस तक वे लगे रहे, और पहाड़ काटकर 9 किलोमीटर लंबी सडक़ बनाई जिससे अस्पताल का 55 किलोमीटर का रास्ता घटकर अब 15 किलोमीटर रह गया। उन पर माउंटेन मैन नाम की फिल्म भी बनी थी। ऐसी एक दूसरी मिसाल फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया कहे जाने वाले जादव पायेंगे की है। असम के जादव ने 1979 में बाढ़ से प्रभावित होने के बाद अकेले ही साढ़े 5 सौ हेक्टेयर जंगल लगाया, जो मोलाई फॉरेस्ट के नाम से जाना जाता है। बीते कई बरस से इसमें हाथी और बाघ जैसे जानवर भी आ बसे हैं। पर्यावरण बचाने की उनकी जिद ने 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करवाया। एक अलग मिसाल बिहार के आनंद कुमार की है जो गरीब बच्चों का आईआईटी में दाखिला कराने के लिए सुपर-30 नाम से प्रशिक्षण देते हैं। 2002 से अब तक उनके केन्द्र से निकले हुए पांच सौ से अधिक छात्र-छात्राओं को आईआईटी में दाखिला मिल चुका है। उन पर एक फिल्म, सुपर-30 बनी है। एक और मिसाल महाराष्ट्र की एक दलित महिला कल्पना सरोज की है, जो अपने बचपन में गरीबी के साथ-साथ बालविवाह की शिकार भी हो गई थी। उन्होंने अपनी कोशिशों से एक बड़ी कंपनी खड़ी की, और उसमें महिलाओं और वंचित तबके के लोगों को जोड़ा, उनके लिए दरवाजे खोले, उन्हें भी पद्मश्री मिला है। महाराष्ट्र की ही सिंधु ताई सपकाल जो खुद बेघर हो गई थीं, उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए 6 आश्रम बनाए, 15 सौ से अधिक बच्चों को गोद लिया, उनकी जिंदगियां बदलीं। 2021 में उन्हें भी पद्मश्री दिया गया। कर्नाटक की एक आदिवासी तुलसी गौड़ा ने 30 हजार से ज्यादा पेड़ लगाए, उनके इस असाधारण काम के लिए 2021 में उन्हें पद्मश्री मिला।
हालांकि ऐसी कहानियां और भी हैं, लेकिन मिसाल के तौर पर इतनी काफी हैं। इनमें से कोई भी व्यक्ति ऐसे नहीं थे, जो पारिवारिक संपन्नता, ओहदे या किसी और तरह की ताकत से वे कोई बड़ा काम कर पाए। बिल्कुल ही अभाव की पृष्ठभूमि से उठकर सिर्फ अपनी जिद, लगन, और मेहनत से उन्होंने आसमान छू लिया। इतनी मेहनत से इनमें से हर कोई अपने लिए बहुत आराम की जिंदगी जुटा सकते थे। आईआईटी में दाखिले के लिए माँ-बाप कोचिंग सेंटरों को दसियों लाख रूपए का भुगतान करने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन आनंद कुमार ऐसे जीवट व्यक्ति हैं जो कि फक्कड़ की जिंदगी जीते हैं, और गरीब बच्चों के लिए काम करते हैं। गिनाने के लिए अच्छा काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कुछ लोगों के पास कुछ तर्क या तथ्य हो सकते हैं, लेकिन हम यहां इनमें से किसी भी सामाजिक योगदान वाले व्यक्ति के वकील की तरह उनकी तारीफ नहीं कर रहे हैं, सिर्फ कुछ मिसालें सामने रख रहे हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि लोग 30 हजार पेड़ लगाएं, साढ़े पांच सौ हेक्टेयर पर जंगल लगाएं, तो ही धरती पर उनका योगदान रहेगा। डेढ़ हजार अनाथ बच्चों से बहुत कम, दस-पन्द्रह, या पच्चीस-पचास अनाथ बच्चों की जिंदगी भी बदल देना बहुत बड़ा काम होगा। इसलिए लोगों को ऐसी बड़ी कामयाबी, और ऐसे बड़े योगदान को देखकर दहशत में नहीं आना चाहिए, बल्कि यह मानना चाहिए कि जब इन लोगों ने काम शुरू किया होगा, तो पहली बार इनके कोई छात्र-छात्रा आईआईटी पहुंचे होंगे, पहली बार कोई पेड़ लगा होगा, पहली बार किसी पहाड़ी सडक़ के लिए कुदाली चली होगी। हजार मील का सफर भी पहले कदम से ही शुरू होता है, और ऐसे पहले कदम को यह पता नहीं होता है कि उसका सफर हजार मील का रहेगा।
हर माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों को अपने देश, और दूसरे देशों की ऐसी कहानियां सुनाएं, और बच्चे चाहें तो इनके कुछ वीडियो ढूंढकर भी उन्हें दिखाएं। यही काम स्कूलों में भी होना चाहिए, और हो सके तो हर मोहल्ले कोई उत्साही व्यक्ति किसी सार्वजनिक जगह पर बच्चों को इकट्ठा करके ऐसे विषय पर चर्चा भी कर सकते हैं। आज इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सभी तरह की जानकारी भरपूर मौजूद है, माँ-बाप और शिक्षक, या मोहल्ले के वरिष्ठ लोग उनमें से सकारात्मक जानकारी को ठोक-बजाकर हर हफ्ते योगदान की ऐसी कहानियां सामने रख सकते हैं। आज जिस तरह की अवैज्ञानिक बातों में बच्चों को उलझाया जा रहा है, उससे भी बच्चों को आजादी मिलेगी, और उन्हें समझ आएगा कि इंसानों की शक्ल में असली ईश्वर कैसे होते हैं। उन्हें यह भी समझ आएगा कि जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा अगर किसी काम में लगाना है, तो वह इस तरह के सकारात्मक सामाजिक योगदान के काम होने चाहिए। समाज के प्रमुख लोगों को चाहिए कि वे बच्चों के सामने उनके अपने इलाके की जरूरतों और संभावनाओं की चर्चा करें, और उनके सामने नेक काम करने की चुनौती रखें। हिन्दुस्तान में भला कौन सा ऐसा मोहल्ला हो सकता है जहां मैदान या बगीचे, तालाब के किनारे या दूसरी सार्वजनिक जगहें साफ करने की जरूरत न हो, चारों तरफ गंदगी बिखरी रहती है, और आसपास के बच्चों को इकट्ठा करके सुरक्षित तरीके से सफाई करने का अभियान चलाया जा सकता है। जो बच्चे सफाई करेंगे, वे गंदगी फैलाने से भी कतराएंगे, जो बच्चे पेड़ लगाएँगे, वे पेड़ों को नुकसान पहुंचाने का काम कभी नहीं करेंगे, इस तरह के दर्जनों ऐसे काम हैं जिनमें बच्चों को बचपन से ही जोड़ा जाए, तो वे बड़े होकर सचमुच ही सामाजिक सकारात्मकता के मामले में बड़े उत्पादक साबित होंगे।
गणतंत्र दिवस पर ऐसे कुछ सम्मान के साथ ही ये कहानियां खत्म हो जाएं, यह ठीक नहीं है। देश की तमाम सरकारों को भी चाहिए कि वे स्कूलों के पाठ्यक्रम से परे कुछ ऐसी बुकलेट तैयार करें जिनमें देश भर के ऐसे चर्चित महान समाजसेवकों, पर्यावरणवादियों, और दूसरे मौलिक योगदान देने वालों की कहानियां रहें। बच्चों के सामने असल जिंदगी की ठोस अच्छी मिसालें रखने से बेहतर नसीहत देने का और कोई तरीका नहीं होता। इस काम से स्कूली पाठ्यक्रम को बोझिल बनाए बिना भी आकर्षक तरीके से बच्चों के सामने ऐसी ऑडियो-विजुअल कहानियां रखी जा सकती हैं, और बच्चों का तो महज नाम हम ले रहे हैं, ऐसी मिसालें तो बड़ों के काम की भी रहेंगी।
देश की राजधानी दिल्ली मोटर न्यूरॉन बीमारी का वितरण केन्द्र भी बन गई
29 जनवरी 2026
कुछ लोगों को लग सकता है कि पर्यावरण की बातें फैशन की अधिक रहती हैं, असल जिंदगी में पर्यावरण के कोई खतरे नहीं रहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में दिल्ली और आसपास के इलाकों में जिनको रहना पड़ता है, वे जानते हैं कि कुछ पुराणों में, या दूसरी धार्मिक किताबों में लिखे गए कुम्भीपाक नर्क किस तरह के होते होंगे। आज दिल्ली में बहुत से बुजुर्ग और बीमार लोगों को, सांस और फेंफड़े की बीमारी वालों को दिल्ली छोडक़र चले जाने की डॉक्टरी सलाह मिल रही है। प्रदूषण किसी शहर को किस तरह न रहने लायक बना देता है, दिल्ली इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल है। आज से दस बरस पहले अगर किसी कल्पनाशील व्यक्ति ने यह सोचा होता कि दिल्ली कैसी बर्बाद होती चल रही है, और यहां का वायु प्रदूषण किस खतरनाक दर्जे तक पहुंच जाएगा, तो हो सकता है कि वे नई संसद को दिल्ली के बाहर किसी और शहर ले जाते, किसी और शहर को उपराजधानी बना देते। आज दिल्ली में आम फेंफड़ों की जो भी बर्बादी होती हो, दसियों लाख आबादी के चुने हुए सांसदों के फेंफड़ों की बर्बादी भी करीब-करीब उतनी ही हो रही है, और देश के वोटरों के चुने हुए लोकसभा सदस्य, और सांसद-विधायकों के चुने हुए राज्यसभा सदस्य भी अपने फेंफड़ों के लिए दिल्ली में बर्बादी पा रहे हैं। और तो और देश के सबसे बड़े जज, देश के तमाम केन्द्रीय मंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, दुनिया भर के देशों से आए हुए राजनयिक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में काम कर रहे लोग एक ऐसे शहर में फंस गए हैं जहां वे खुली हवा में घूमने भी नहीं निकल सकते। दिल्ली एक ऐसा शहर हो गया है जहां किसी खेल मुकाबले में आने से भी अब अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ओलंपिक संघ, और खेल संघों को लिखकर मना कर दे रहे हैं। आज हालत यह है कि देश भर के वे बीमार लोग जो कि दिल्ली इलाज के लिए जाना चाहते हैं, वे साल के कुछ महीने दिल्ली जाने का सपना नहीं देख सकते, और किसी दूसरे शहर में इलाज के लिए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र, एनसीआर का एक दर्जा होना चाहिए था, उसे देश के एक शोकेस की तरह दुनिया के सामने रहना चाहिए था, अब साल के कई महीने यह राजधानी मास्क लगाए घूमती है। अभी कुछ साल पहले तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में आने वाले विदेशी सैलानियों में से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो कि दिल्ली, आगरा, और जयपुर के त्रिकोण में घूमकर लौट जाते हैं। लेकिन अब बहुत से लोग बताते हैं कि साल के आधे से अधिक महीने तो सैलानी दिल्ली आना ही नहीं चाहते। इसका मतलब यह है कि दिल्ली में, और दिल्ली से होते हुए भारत के पर्यटन केन्द्रों का जो ढांचा है, वह लगातार खतरे में पड़ता जा रहा है, इंसानों के फेंफड़ों के साथ-साथ पर्यटन-कारोबार के फेफड़े भी खराब होते चल रहे हैं। ऐसे में आज जब यह खबर आती है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से इंसानों को मोटर न्यूरॉन बीमारियों का खतरा रहता है, तो सबसे पहले दिल्ली पर मंडराता खतरा सूझता है। फेंफड़ों की बीमारियों से परे, अगर दिमाग के लिए गंभीर खतरा ऐसे प्रदूषण से हो रहा है, तो उसके इलाज की लागत देश पर, सरकार पर, और इंसानों पर कितनी पड़ेगी, यह सोचना भी भयानक है। स्वीडन के एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान का यह अध्ययन भारत के, दुनिया के सबसे प्रदूषित कई शहरों के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि वहां रहने वाले बाशिंदे मौत की तरफ बड़ी तेज रफ्तार से बढ़ रहे हैं, और बाकी की जिंदगी फेंफड़ों से लेकर दिमाग तक की बड़ी-बड़ी बीमारियों का खतरा भी झेल रहे हैं। यह सिलसिला भी अगर किसी देश की राजनीति को नहीं चौंकाता है, तो उस देश के बारे में क्या कहा जाए? धिक्कार कहा जाए, या लानत है कहा जाए?
दिल्ली एक शहर का प्रदेश है, लेकिन वह निर्वाचित राज्य सरकार के सीमित अधिकारों पर केन्द्र सरकार के बहुत सारे अधिकारोंतले दबा-कुचला प्रदेश भी है। इसकी जिम्मेदारी इन दोनों पर है, और केन्द्र सरकार पर कुछ अधिक है। ऐसे में दिल्ली की म्युनिसिपलों से लेकर राज्य सरकार तक हांकने वाले लोग, संसद और न्यायपालिका के तमाम लोग अगर खुद अपने सुरक्षित लगते बंगलों में एयर प्यूरीफायर जैसे उपकरणों के भरोसे, और एयरकंडीशंड कारों में चलते हुए अपने को बचा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि वे शहर की बाकी 90 फीसदी गरीब जनता को इन सामानों के बिना मरने के लिए छोड़ चुके हैं। नैतिकता की बात तो यह होती कि दिल्ली में बसे हुए देश की किस्मत तय करने का हक रखने वाले कार्यपालिका, न्यायपालिका, और विधायिका के कुछ हजार लोग खुद भी किसी एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल नहीं करते, कारों के शीशे उतारकर चलते, और आम जनता की तरह भुगतकर देखते। हमारा पक्का भरोसा है कि जिस दिन लोकतंत्र की इन तीनों संस्थाओं के दिल्ली में बसे हुए दस-बीस हजार लोग खुली खिड़कियों वाले घरों में, और खुली खिड़कियों वाली कारों में बसने और चलने लगेंगे, दिल्ली का प्रदूषण खत्म हो जाएगा। आज इस भयानक प्रदूषण की एक वजह यही है कि इसके बीच भी सबसे ताकतवर तबका अपने आपको बचाकर चलने की ताकत रखता है, और उसका इस्तेमाल करता है। अगर ये सारे महत्वपूर्ण फेंफड़े भी आम इंसानों की तरह खतरा झेलने लगेंगे, तो हो सकता है कि किसी सर्वदलीय सम्मेलन की तरह दिल्ली में लोकतंत्र के सारे स्तंभों का एक मिलाजुला सम्मेलन हो जाए, पूरा सुप्रीम कोर्ट, पूरी संसद, पूरी केन्द्र सरकार राष्ट्रपति के साथ एक साथ बैठ जाए, और यह तय करे कि उन सबको अपने फेंफड़े कैसे बचाने हैं। हम कोई बहुत क्रांतिकारी सोच सामने नहीं रख रहे हैं, जिस देश-प्रदेश में आम जनता को पीने का साफ पानी नसीब न हो, वहां देश चलाने वाले लोगों को बोतलबंद पानी पीने का हक क्यों होना चाहिए? और पानी के साथ-साथ साफ की गई हवा पाने का हक क्यों होना चाहिए? ऐसे कई असुविधाजनक सवाल खड़े होते हैं, और इनके जवाब में ही दिल्ली के आम इंसानों के फेंफड़ों का हक लिखा हुआ है।
दिल्ली का प्रदूषण अधिक फिक्र की बात नहीं है, उससे अधिक फिक्र की बात यह है कि हमने इस प्रदूषण को नियति मान लिया है। हमने आम जनता को ऐसी ही हवा का हकदार मान लिया है, हमने खास लोगों को फिल्टर की हुई हवा का हकदार मान लिया है। लोकतंत्र के लिए यह नौबत प्रदूषण के खतरे के मुकाबले कई गुना अधिक खतरनाक है। एक गैस चेंबर में धीमी मौत पाने वाली पीढ़ी की तरह, दिल्ली के आम लोग मौत की तरफ फास्ट-फॉरवर्ड होकर बढ़ रहे हैं। जिस तरह कोई रिकॉर्डिंग तेजी से आगे बढ़ाई जा सकती है, उसी तरह दिल्ली के आम लोगों की बाकी जिंदगी फास्ट-फॉरवर्ड हो रही है। इस गैस चेंबर में 20 हजार करोड़ रूपए का संसद भवन, और बाकी दूसरी इमारतें बनाना क्या सचमुच की समझदारी थी? या फिर यह मौका एक ऐसे फैसले का था कि इससे बहुत कम लागत में देश के किसी दूसरे हिस्से में एक उपराजधानी की बुनियाद रखी जा सकती थी जिससे कि दिल्ली को कुछ छरहरा करके जीने लायक बनाया जा सकता था। क्या इस बारे में अभी सोचना शुरू नहीं करना चाहिए? क्या देश के सभी प्रदेशों से उपराजधानी, या विकेन्द्रीकृत राजधानी को बसाने के प्रस्ताव बुलाने चाहिए कि वे इसके लिए कितनी जमीन, और कौन सी सहूलियतें देंगे? दिल्ली को अपने वजन को कम करना होगा, तभी वहां पर गरीबों के जिंदा रहने की कोई संभावना हो सकेगी, आज दिल्ली में सबसे रईस भी दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले बड़े गरीब हैं क्योंकि वे सुबह-शाम खुली हवा में सांस भी नहीं ले सकते। यह जीना भी कोई जीना है लल्लू!
यूजीसी पर सवर्ण-बवाल, नफे की राजनीति, या...
28 जनवरी 2026
भारतीय राजनीति को लेकर कई जानकार लोगों का समय-समय पर कहना रहता है कि जनता के बीच मुद्दे कब बदल जाते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। आज देश में कुछ ऐसा ही अजब माहौल बन गया है। यह किसने सोचा था कि देश का सवर्ण तबका जो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी का निष्ठावान समर्थक माना जाता है, आज एकदम से उनके खिलाफ उबल पड़ेगा? और फिर यह भी कि यह बात आरक्षण जैसे किसी बड़े मुद्दे को लेकर नहीं खड़ी हुई है, बल्कि विश्वविद्यालयों, और उच्च शिक्षा के संस्थानों में समानता के एक वातावरण को बनाने के लिए शिकायतों की व्यवस्था, और उनकी जांच के नियमों में हुए फेरबदल की वजह से खड़ी हुई है। यूजीसी नाम से जो अधिसूचना आज देश में बवाल की वजह बन गई है, और इससे विचलित सवर्ण लोग सडक़ों पर उतर रहे हैं, इक्का-दुक्का मामले सवर्णों के नौकरी छोड़ देने के भी सामने आए हैं, यह देश में एक अधिसूचना से बदल गया माहौल है। इसे समझना जरूरी है क्योंकि इसे सामाजिक तनाव की एक वजह भी बताया जा रहा है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अभी एक पखवाड़े पहले उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्धन के नए नियम जारी किए। सुप्रीम कोर्ट में ऐसे कुछ मामले चल रहे थे जो कि उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित, आदिवासी, और ओबीसी छात्र-छात्राओं के साथ चलने वाले व्यापक भेदभाव की तरफ कानून का ध्यान खींचना चाहते थे। आईआईटी, और आईआईएम जैसे अंतरराष्ट्रीय शोहरत वाले संस्थानों से लेकर दूसरे केन्द्रीय विश्वविद्यालयों तक भी आरक्षित वर्ग से आने वाले बच्चों के साथ बड़ा भेदभाव होता था। उनके लिए ऐसे मानसिक उत्पीडऩ की स्थितियां पैदा कर दी जाती थीं कि उनमें से कुछ या कई छात्र-छात्राओं की खुदकुशी भी सामने आती थी। आमतौर पर शिक्षण संस्थान भेदभाव और प्रताडऩा का उसी तरह खंडन करते थे जिस तरह पुलिस या सरकार के कोई छोटे अफसर उन पर लगने वाले आरोपों का करते हैं। लेकिन इससे यह हकीकत नहीं बदलती थी कि आरक्षित वर्ग से ऐसी जगहों पर पहुंचे हुए बच्चों को बहुत ही मानसिक और सामाजिक प्रताडऩा झेलनी पड़ती थी। इसलिए अभी यूजीसी ने नियमों में फेरबदल की जो अधिसूचना जारी की है, उसमें पुराने चले आ रहे कुछ प्रावधान बदले गए हैं, और इन नियमों को कड़ाई से लागू करने पर असली भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई हो सकेगी, और समाज के अलग-अलग तबकों से आने वाले बच्चों को एक समावेशी वातावरण मिल सकेगा।
अब इस नए फेरबदल का विरोध करने वाले लोगों का यह कहना है कि इनकी बुनियाद इस सामाजिक पूर्वाग्रह पर टिकी हुई है कि अनारक्षित वर्ग के लोग ही भेदभाव के लिए जिम्मेदार रहते हैं। ऐसे में इन आलोचकों का कहना है कि नियमों से अधिक हिफाजत तो किसी को नहीं मिल सकेगी, बल्कि अनारक्षित वर्ग के लोग अधिक खतरे में पड़ेंगे, और इनसे शैक्षणिक संस्थाओं में असमानता खड़ी हो जाएगी। एक फेरबदल जिस पर अधिक विरोध हो रहा है, वह किसी शिकायत के झूठे मिलने पर शिकायतकर्ता पर कार्रवाई के प्रावधान को अब खत्म कर देने का है। अभी तक झूठी शिकायतों पर संस्थान कार्रवाई कर सकते थे, लेकिन उसे हटा दिया गया है। यह भी है कि शिकायतों के निपटारे के लिए बनने वाली कमेटियों में एसटी-एससी, ओबीसी, दिव्यांग, और महिला प्रतिनिधित्व को तो अनिवार्य किया गया है, लेकिन अनारक्षित वर्गों से किसी को लेने की शर्त नहीं रखी गई है।
दरअसल यह विवाद इस सामाजिक पूर्वाग्रह पर टिका हुआ है कि भारत में सामाजिक समानता है, और आरक्षित वर्गों को किसी और अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि आरक्षण का फायदा पाने वाले लोग ही नहीं, उनके पूरे तबके अनारक्षित वर्गों की गालियां खाते हैं, उनसे भेदभाव पाते हैं। जब कई बरस की पढ़ाई संस्थागत जगहों पर रहने-खाने के साथ की जाती है, तो वहां पर भेदभाव जानलेवा या आत्मघाती भी बन जाता है। देश में ऐसे कई चर्चित मामले हुए हैं जिनमें जाति के आधार पर हुई प्रताडऩा के बाद छात्र-छात्राओं को खुदकुशी एक आसान रास्ता लगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख को देखते हुए केन्द्र सरकार के तहत आने वाली एक कुछ हद तक स्वायत्त संस्था, यूजीसी ने नियमों में यह फेरबदल किया है, और शायद केन्द्र सरकार और यूजीसी को भी यह अंदाज नहीं रहा होगा कि इससे अनारक्षित, खासकर सवर्ण तबकों के बीच इतना विरोध होने लगेगा। देश में हाल के बरसों में हिन्दुत्व के मुद्दों को लेकर, धर्म का दखल बढऩे से, और साम्प्रदायीकरण बढऩे से सवर्ण तबके में एक अलग किस्म का ध्रुवीकरण हुआ है। हालांकि इस ध्रुवीकरण में सवर्णों के साथ-साथ ओबीसी बड़े पैमाने पर लागू हैं, लेकिन अब जब उच्च शिक्षा संस्थानों ने ओबीसी तबके को एसटी-एससी के साथ जोडक़र खास हिफाजत दी गई है, तो हिन्दुत्व की धार्मिक भीड़ में कम से कम यूजीसी के मुद्दे पर दो अलग-अलग खेमे बन गए हैं, ओबीसी यूजीसी के साथ हैं, और सवर्ण अलग हो गए हैं।
जिस बात से हमने आज की यह चर्चा शुरू की थी, किस तरह एक दिन में देश का नरेटिव बदलता है, चर्चा के मुद्दे कहीं से कहीं पहुंच जाते हैं, यह देखना लोकतंत्र में बड़ा दिलचस्प रहता है, और यह भी समझने की जरूरत रहती है कि यह फेरबदल कुछ दूसरी घटनाओं को अखबारों के भीतर के पन्नों पर धकेलने के लिए तो इस वक्त नहीं लाए गए हैं? 12 जनवरी की यह अधिसूचना देश-विदेश की घटनाओं, और खबरों के परिप्रेक्ष्य में देखे बिना तो जारी नहीं की गई होगी। लेकिन हम वक्त से परे गुण-दोष के आधार पर इसे देखना चाहते हैं, और देश की सवर्ण बेचैनी के संदर्भ में भी इसका आंकलन करना चाहते हैं। फिलहाल सवर्ण-हिन्दुत्व के सबसे चहेते चेहरे नरेन्द्र मोदी से यह तबका कुछ नाराज हो गया है, कुछ लोग यह भी कहेंगे कि खासा नाराज हो गया है, देखना है कि यह सवर्ण-नाराजगी किस कीमत पर है? क्या यह एसटी-एससी-ओबीसी तबकों की हमदर्दी और समर्थन की कीमत पर है? अगर ऐसा है तो चुनावी राजनीति करने वाले किसी नेता या किसी पार्टी को इससे बड़े और किसी तबके के समर्थन का तो सपना भी नहीं आ सकता।
सरकारें खातों में सीधे रकम भेजना पसंद करेंगी बजाय नौकरी देने के...
27 जनवरी 2026
भारत में देश के स्तर पर, और प्रदेशों के स्तर पर सरकारी नौकरियां एक बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं। हर राजनीतिक दल चुनाव के समय हजारों या दसियों हजार नौकरियों का वायदा करते हैं, और उम्मीद करते हैं कि इससे सत्ता पर उनकी वापिसी हो सकेगी। लेकिन धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि यह हथियार धार खोते जा रहा है, अब एक-एक करके अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग राजनीतिक दल गरीबों या जरूरतमंद लोगों के खातों में सीधे कैश ट्रांसफर के हथियार का इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसा लगता है कि एक सरकारी नौकरी पाने के लिए जो हजारों बेरोजगार कतार में लगते हैं, उनमें से नौकरी न पाने वालों की नाराजगी चुनाव में नुकसान अधिक करती हैं, बजाय नौकरी पाने वाले लोगों के अहसानमंद होने के। इसलिए राजनीतिक दल हर महीने किस्तों में जाने वाले अहसान पर कुछ अधिक निर्भर होते दिख रहे हैं। फिर यह भी है कि 25-50 हजार रूपए महीने की नौकरी किसी को देने के बजाय उस रकम से 25-50 लोगों को हर महीने हजार रूपए देना चुनावी फायदे के हिसाब से अधिक कारगर होता है। इसलिए सरकारी नौकरियों की तरफ लोगों को अब उम्मीद की नजरों से नहीं देखना चाहिए। सच तो यह है कि अधिकतर सरकारों की खाली होने वाली अधिकतर कुर्सियों को दुबारा भरने के काम में इतनी लेट-लतीफी की जाती है कि लोग उन खाली कुर्सियों के साथ जीने के आदी हो जाएं। सरकारों के पास एक दूसरी तरकीब यह रहती है कि वे शिक्षक की जगह शिक्षाकर्मी, और सैनिक की जगह अग्निरक्षक बड़े सस्ते में रखकर काम चला लें। लेकिन इसके साथ-साथ इन दिनों दुनिया पर छा चुके एक और खतरे को देखने की जरूरत है।
एआई ने दुनिया में करोड़ों इंसानों के काम को बेकार का साबित कर दिया है। उसने यह दिखा दिया कि बिना किसी लागत के, बिना किसी खर्च के एआई किस तरह कई किस्म के काम इंसानों से बेहतर कर सकता है, और करने भी लगा है। यह संपादकीय खुद लिखने की हमारी जिद अगर न होती, तो हो सकता है कि काफी हद तक इसी दर्जे का, या शायद कुछ मायनों में इससे बेहतर संपादकीय एआई एक-दो मिनट के भीतर लिख देता, और फिर अगले दो-चार मिनटों में हम उसमें अपनी विचारधारा, तर्क, तथ्य जोडक़र एआई से दुबारा भी लिखवा लेते। जब कभी हम एआई से कोई जानकारी मांगते हैं, तथ्य पूछते हैं, तो उसका प्रस्ताव भी साथ-साथ आ जाता है कि क्या इस पर एक संपादकीय लिख दूं, या इसे यूट्यूब की स्क्रिप्ट की तरह ढाल दूं? अब कल्पना कीजिए ऐसे मीडिया संस्थान की जहां मैनेजमेंट संपादक की जगह एआई से काम चला ले, लोग टायपिस्ट की जगह बोलकर टाईप कर ले, एआई से ग्रामर और हिज्जे सुधरवा लें, उससे मुफ्त में फैक्ट चेक करवा लें, और ये सारे काम इंसानों से लगभग बेहतर, और बिल्कुल ही मुफ्त में होने लगें, तो कौन सा मीडिया-मैनेजमेंट तेवर वाले लोगों को रखना चाहेगा?
लेकिन हम दो कदम और पीछे चलें, और एआई के पहले के बहुत ही साधारण कम्प्यूटरों के दौर में आ जाएं, तो आज भारत सरकार के बनाए हुए एक सॉफ्टवेयर के आधार पर एक-एक करके कई प्रदेशों में ई-फाइलिंग का काम चल रहा है। छत्तीसगढ़ में जब कुछ अफसरों के कम्प्यूटरों पर हमने इसे देखा, तो यह ऐसा सुखद आश्चर्य था कि किसी एक जिले से कलेक्टर की भेजी गई ई-फाईल कुछ सेकेंड में मंत्रालय में सचिव के पास भी चली गई, उस सचिव ने फाईल कुछ सेकेंड में अपने सीनियर को भेज दी, वहां से फाईल मंत्री या मुख्यमंत्री को चली गई, और इनमें से हर कोई अगर कम्प्यूटर पर बैठकर काम निपटा रहे हैं, तो हो सकता है कि पांच-दस मिनट में फाईल निपटकर जिले में वापिस पहुंच जाए। आज हालत यह है कि जिलों से फाईलें लेकर अलग-अलग विभागों के बाबू राजधानी आते हैं, और यहां एक-दो दिन रूककर उन फाईलों को देकर वापिस जाते हैं। बिना एआई के, सिर्फ पुराने कम्प्यूटरों पर एक नए प्रोग्राम के इस्तेमाल से सरकारी फाईलों की रफ्तार तकनीकी रूप से तो हजारों गुना अधिक हो गई है, अब अगर कम्प्यूटरों के सामने बैठने वाले इंसान काम न करने पर आमादा होंगे, तो अलग बात है। लेकिन जब हम एआई के इस्तेमाल को जोडक़र देखते हैं, तो लगता है कि सरकारी कामकाज में गड़बड़ी पकडऩा, टेंडरों की खामियां निकालना, सप्लाई में घटिया चीजों को पकडऩा, नकली बिल पकडऩा, एआई चुटकी बजाते कर सकता है। इन सबसे इंसानों की जरूरत तेजी से घटने जा रही है, और जिन लोगों को सरकारी नौकरियों की चाह है, उन्हें जिंदा रहना है, तो उन्हें गैरसरकारी राह देखनी चाहिए।
विश्व आर्थिक मंच (वल्र्ड इकॉनॉमिक फोरम) की रिपोर्ट कहती हैं कि 2030 तक दुनिया में 8-9 करोड़ नौकरियां एआई की वजह से खत्म हो सकती है। लेकिन करीब इतनी ही संख्या में नई नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन वे अलग हुनर की जरूरत वाली होंगी। आईएमएफ का अनुमान है कि विकसित देशों में 60 फीसदी तक नौकरियां किसी न किसी रूप में एआई से प्रभावित होंगी। भारत विकसित देश बनने से दूर है, और ऐसे विकासशील देश में कुछ दूसरे किस्म की नौकरियां प्रभावित होना शुरू हो चुका है, जिनमें कॉल सेंटर, डेटा एंट्री, अकाउंटिंग, अनुवाद, डिजिटल डिजाइनिंग, प्लानिंग जैसे बहुत से काम हैं। हमारा अंदाज यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का काम भी तनख्वाह पाने वाले शिक्षकों की जगह कुछ या अधिक हद तक स्मार्ट क्लासरूम की बड़ी-बड़ी टीवी स्क्रीन पर किसी एक शहर में बैठे शिक्षक बेहतर तरीके से कर सकेंगे, और फिर बाद में हर स्कूल के स्थानीय शिक्षक-शिक्षिका बच्चों से उस बारे में सवाल-जवाब कर सकेंगे, उनके सवालों के जवाब दे सकेंगे। लेकिन एक जगह बैठे उत्कृष्ट शिक्षक-शिक्षिका पूरे प्रदेश में कोई पाठ्यक्रम पढ़ा सकेंगे, और यह काम भी मौजूदा कम्प्यूटरों की बड़ी मामूली तकनीक से होने जा रहा है, इसमें अभी तक एआई की कोई जरूरत नहीं पड़ी है।
लेकिन सरकारी नौकरियां चाहने वालों के लिए हमारे पास सिर्फ बुरी खबर है कि केन्द्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2014 के बाद से हर विभाग में स्वीकृत पदों की गिनती घटी है, रेलवे, डाक, बीएसएनएल, और दूसरे सार्वजनिक उपक्रमों में खाली पद भरे नहीं गए हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों के बहुत सारे काम निजी एजेंसियों को दे दिए गए हैं। खुद सरकारी स्कूल, अस्पताल, और पंचायत में कुर्सियां खाली रखी गई हैं, या भर्ती इतनी धीमी की जाती है कि कई बरस तक तनख्वाह बचती रहे। ऐसे में एआई का इस्तेमाल सरकारों का इंसानों पर आश्रित रहना बहुत बुरी तरह घटा देगा। कई लोगों को यह लग सकता है कि एआई न झाड़ू लगा सकता, न ही वह पानी पिला सकता। लेकिन एआई क्या-क्या कर सकता है, वैसे हुनर की फिक्र करने की जरूरत है, और यह बात तय मान लेना चाहिए कि सरकार एक नौकरी देने के बजाय उतने खर्च के एवज में 25-50 लोगों को किसी जनकल्याणकारी योजना का फायदा देना अधिक पसंद करेगी। लोगों को घटते हुए शासन को भी ध्यान में रखना चाहिए, और घटती हुई नौकरियों के बीच सरकार से परे ऐसे हुनर के बारे में सोचना चाहिए जिस पर एआई का हमला आसान नहीं होगा।
जुर्म और अराजकता के पीछे की वजहें जाने बिना इनका इलाज नामुमकिन
25 जनवरी 2026
छत्तीसगढ़ की दो अलग-अलग घटनाएं प्रदेश में कानून की स्थिति बताने वाली है। पेंड्रा में एक विधवा महिला का एक शादीशुदा व्यक्ति से प्रेमप्रसंग था। दोनों ही हमउम्र अधेड़ थे। कुछ अरसा पहले दोनों घर छोडक़र चले गए थे, और मध्यप्रदेश में रह रहे थे। अभी लौटे तो प्रेमी के परिवार ने इस महिला को घर से निकालकर उसके कपड़े फाड़े, उसके बदन पर गोबर पोता, और उसे पीटते हुए गांव की गलियों में घुमाया। अब इसके फोटो-वीडियो सामने आने पर पुलिस ने इस प्रेमी की पत्नी सहित परिवार के कुछ और लोगों के खिलाफ जुर्म दर्ज किया है। एक दूसरा मामला इससे बिल्कुल ही अलग है, जिसमें छत्तीसगढ़ के बसना में ओडिशा से गांजा लेकर आ रहे तस्करों की कार ने पुलिस की गाड़ी को टक्कर मारी, और फिर अपनी कार आगे-पीछे करके उसे और ठोका। पांच पुलिसवालों ने कूदकर जान बचाई, और इसके बाद पुलिस गाड़ी में आग लग गई। लाखों के गांजे सहित छोड़ी गई इस कार को पुलिस ने जब्त किया है। ये दोनों मामले एकदम अलग किस्म के हैं, लेकिन इन दोनों में एक बात एक सरीखी है कि लोगों के मन में कानून का सम्मान बहुत बुरी तरह कमजोर हो चुका है। हर दिन जगह-जगह होने वाली चाकूबाजी भी यही बताती है कि लोग अपने झगड़े इतने बेफिक्र होकर सडक़ों पर जुर्म की हिंसा करके निपटा रहे हैं कि न तो उन्हें अदालत से कोई उम्मीद है, और न ही अदालत जाना उन्हें जरूरी लगता है। लोग पूरी तरह बेफिक्र होकर अपना हिसाब खुद ही चुकता कर रहे हैं, पहले तो यह कहा जाता था कि लोग कानून हाथ में लेते हैं, लेकिन अब यह समझ पड़ता है कि लोग कानून हाथ में लेकर जमीन पर डालकर उसे अपने पैरों से कुचलते भी हैं। यह सिलसिला अधिक खतरनाक इसलिए है कि ऐसा करने वाले तमाम लोग पेशेवर मुजरिम नहीं रहते, कई लोग परिवार के भीतर भी हिंसा करते हैं, पड़ोसियों को मार डालते हैं, नाबालिगों से बलात्कार करते हैं, और देश में एक मजबूत कानून होने के बावजूद किसी को सजा का डर नहीं लगता है। जुर्म करने वाले अगर सिर्फ पेशेवर मुजरिम होते, तो वे गिनते के रहते, और उन पर काबू पाना, उन्हें सजा दिलाना आसान भी रहता। आज जब आम घरेलू लोग भी किसी तनातनी की हालत में, ठगने और लूटपाट करने के लिए, क्षणिक देहसुख पाने के लिए संगीन जुर्म करने पर उतारू हो जा रहे हैं, तो यह समाज के लिए अधिक खतरनाक है, और कानून लागू करने की जिम्मेदार संस्थाओं के लिए अधिक बड़ी चुनौती।
यह भी सोचने की जरूरत है कि लोगों के मन से सजा का खौफ क्यों निकल गया है? इसलिए कि निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट पहुंचने तक लोगों को जमानत पर घूमने-फिरने, और सजा पाने पर भी अपील पर फिर छूट जाने का इतना मौका मिलता है, कि सजा का डर उन्हें डराता नहीं है। यह भी एक वजह हो सकती है कि पुलिस जैसी प्राथमिक जांच एजेंसी से लेकर न्याय व्यवस्था तक में जहां जो भ्रष्टाचार है, उसका अंदाज लोगों को है, और वे उस भ्रष्टाचार के भरोसे डरना-सहमना छोड़ चुके हैं। एक तीसरी वजह यह हो सकती है कि जिनको सजा के असल खतरे का अंदाज भी है, उन्हें भी जेल के बाहर की जिंदगी, और जेल के भीतर की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं दिखता है, उनका बहुत अधिक सुख का वर्तमान नहीं है, और महत्वाकांक्षाओं का कोई भविष्य नहीं है, इसलिए वे लापरवाही से जुर्म कर बैठते हैं। आज सरकारों ने किसी जुर्म के हो जाने के बाद उसके आरोपी को पकडऩे, और उसे सजा दिलाने को ही अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी और कामयाबी मान लिया है। होना तो यह चाहिए था कि जुर्म की वजहों का अध्ययन करके सरकारें समाज में ऐसी स्थितियां लातीं कि जुर्म होना ही घटता, लेकिन पांच बरस या उससे कम की दूरदर्शिता वाली सरकारें ऐसा नहीं कर पा रही हैं।
अदालतों में चलने वाले मामलों में जब 25-50 बरस तक फैसले नहीं होते, तो भी लोगों का कानून और न्याय व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाता है, और लोग खुद होकर सडक़ों पर त्वरित हिंसक न्याय करने लगते हैं। इंसाफ की धीमी रफ्तार की वजह से बढऩे वाले ऐसे जुर्म लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था में गंभीर कमजोरी का एक सुबूत भी रहते हैं, और इसका आसान इलाज नहीं हो सकता। देश में आज पुलिस और अदालतों का जितना राजनीतिकरण हो चुका है, इन दोनों ही संस्थाओं में सरकारी और राजनीतिक दखल जितनी अधिक हो चुकी है, उसे देखते हुए आने वाले वक्त में बहुत उम्मीद रखने की भी कोई वजह नहीं बनती। लोकतंत्र में बदलाव बहुत धीमी रफ्तार से आते हैं, खासकर सकारात्मक बदलाव। नकारात्मक बदलाव बड़ी तेजी से आते हैं, और समाज को जकड़ भी लेते हैं।
आए दिन होने वाले तरह-तरह के जुर्म, तरह-तरह की अराजकता को आंकड़ों में देखना, और अलग-अलग बरसों के आंकड़ों की तुलना कर लेना काफी नहीं होना चाहिए। समाज में बदअमनी और अराजकता का सामाजिक अध्ययन लगातार चलना चाहिए, और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ऐसे अध्ययन के नतीजों पर अनिवार्य रूप से विचार होना चाहिए। सरकारों को आंकड़ों में बदलाव को तौलना अधिक आसान लगता है, बजट के आंकड़े बताना भी आकर्षक और लुभावना लगता है, लेकिन आंकड़ों से परे की हकीकत को बयां करना किसी चार्ज या ग्राफ की तरह आसान नहीं होता। सरकारें पुलिस बढ़ाती चलें, कहीं-कहीं पर अदालतें भी बढ़ा लें, लेकिन उससे समस्या की जड़ पर वार नहीं होगा। जुर्म और हिंसा की, अराजकता और गुंडागर्दी की समस्याओं को खत्म करने के लिए उनके पीछे की वजहों को देखना होगा, और समाज में कानून के राज को हर मोर्चे पर कायम करना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि किसी एक राजनीतिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक मुद्दे पर सरकारें अराजकता को छूट दें, और बाकी मोर्चों पर अराजकता को कुचलें। लोकतंत्र में व्यक्तियों का मिजाज जब कानून के लिए हिकारत का हो जाता है, तो वह हर किस्म के कानून के खिलाफ रहता है, किसी एक खास कानून को उस हिकारत से बचाया नहीं जा सकता। सरकारों को देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के समाज वैज्ञानिकों को शामिल करके ऐसे सामाजिक अध्ययन को पाठ्यक्रम में जोडऩा भी चाहिए जिससे निकले हुए लोग समाज में हो रहे हिंसा और जुर्म का अध्ययन करके सरकार को हकीकत बता सकें।
गणतंत्र दिवस धार्मिक त्यौहार तो नहीं है जो मांस-मछली बंद हो!
25 जनवरी 2026
ओडिशा के कोरापुट का एक सरकारी आदेश सामने आया है जिसमें कलेक्टर ने गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में 26 जनवरी को पूरे जिले में मांस-मछली, मुर्गी-अंडा, और बाकी किस्म के गैरशाकाहारी सामान बेचने पर रोक लगाई है। कलेक्टर का यह आदेश सोशल मीडिया पर लोगों की आलोचना झेल रहा है कि गणतंत्र दिवस का खानपान से क्या लेना-देना हो सकता है? और जो खानपान त्यौहारों से परे के बाकी आम दिनों पर कानूनी है, वह गणतंत्र दिवस के दिन आपत्तिजनक कैसे हो सकता है? क्या देश का कानून, या ऐसे राष्ट्रीय दिवस मांसाहारी लोगों के लिए नहीं हैं? क्या जो लोग छुट्टियों के दिन मांसाहार पकाने-खाने की सहूलियत पाते हैं, उनके अधिकार शाकाहारी लोगों के मुकाबले कम होने चाहिए?
कई बार जिले की कमान पाने वाले अफसर अतिउत्साह में, या सत्ता के राजनीतिक रूझान, और उसकी रीति-नीति को देख-समझकर, खुद ही उसका अंदाज लगाकर राजा के प्रति, राजा से अधिक निष्ठावान हो जाते हैं। यह मामला अधिक अटपटा इसलिए भी लगता है कि देश में शाकाहारी और मांसाहारी लोगों का जो नक्शा है, उनमें राष्ट्रीय औसत 29 फीसदी शाकाहारियों के मुकाबले, ओडिशा में कुल 2.6 फीसदी लोग ही शाकाहारी हैं। ओडिशा से लेकर बंगाल, और दक्षिण भारत के समुद्रतटीय राज्यों तक शाकाहारियों की संख्या सबसे कम है, और दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण के कुछ राज्यों में तो अरूणाचल और नागालैंड जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों से भी कम शाकाहारी हैं। देश में भारत सरकार के सर्वे के मुकाबिक ही 70 फीसदी महिलाएं, और 78 फीसदी पुरूष मांसाहार करते हैं। तेलंगाना, आंध्र, बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा, और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहां पर मांसाहारियों की संख्या 97 फीसदी से अधिक है। ओडिशा हर मायने में मांसाहार के पैमाने पर सबसे ऊपर के गिने-चुने राज्यों में से है, और ऐसे में वहां पर संविधान लागू होने के गणतंत्र दिवस पर बिना किसी संवैधानिक प्रावधान के सिर्फ जिला दंडाधिकारी के अधिकार इस्तेमाल करके मांसाहार और अंडे तक पर रोक लगा देना एक धर्म के भीतर की एक तबके की सोच के प्रति निष्ठा दिखाना है। कोरापुट कलेक्टर के इस आदेश में अंडे तक पर रोक लगा दी गई है, जो कि देशभर में बहुत से राज्यों में स्कूलों के भोजन में शामिल सामान है।
अलग-अलग जगहों पर ऐसा अतिउत्साही प्रशासन कई तरह के काम करता है जिनमें से कुछ सत्ता को खुश करने वाले हो सकते हैं, लेकिन ऐसे अधिकतर काम सत्ता की लोकतांत्रिक और संवैधानिक पकड़ को कमजोर साबित करने वाले रहते हैं। अधिक वफादारी दिखाने के लिए अभी छत्तीसगढ़ में एक अफसर ने एक अल्पसंख्यक समुदाय के कारोबारी के तीन कारखाने एक साथ बंद करवा दिए, जबकि उसी दर्जे का प्रदूषण प्रदेश में हजारों और कारखानों में उसी तरह जारी है। यह काम तो बुनियादी रूप से गलत है, लेकिन अगर सरकारें इस तरह के कोई फैसले अघोषित रूप से भी लागू करने की नीयत रखती हैं, तो कम से कम अफसरों के स्तर पर ऐसा हिसाब चुकता नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे नियमों से कुछ या अधिक हद तक अनजान नेताओं को भी यह लगने लगता है कि उनके राजनीतिक या साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह के फैसले सही हैं। यह सिलसिला अनजान सत्तारूढ़ नेताओं को भी इस खुशफहमी से भर देता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं।
आज देशभर में अधिकतर प्रदेशों में हालत यह है कि कमाऊ कुर्सियों की हवस वाले अफसर बैठने को कहने पर लेट जाते हैं। सत्ता अगर उन्हें किसी की लाठी तोडऩे कहे, तो वे उसका सिर भी तोडऩे पर उतारू हो जाते हैं। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि भारत में कदम-कदम पर यह साबित हो रहा है कि शासन-प्रशासन अपनी दुर्भावना से जिन लोगों पर कार्रवाई करते हैं, उन्हें उससे बचने और उबरने के कानूनी विकल्प पाने में ही बरसों लग जाते हैं। अभी कई मामलों में मुकदमा झेल रहे लोग पांच, दस, या बीस बरस बाद जाकर बेकसूर रिहा हुए हैं। मतलब यही है कि उन्हें कोई सरकार अपनी बदनीयत से लंबे वक्त तक बंद रख सकती है। जब कार्रवाई करने वाले अफसर सत्ता को खुश करने पर इतने आमादा रहते हैं, तो वे 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व को भी किसी शाकाहारी, या शाकाहारी माने जाने वाले धर्म के धार्मिक त्यौहार की तरह मांसरहित बना सकते हैं। खासे पढ़े-लिखे, प्रशिक्षित, लोकतांत्रिक और संवैधानिक मुद्दों पर जानकार अफसर भी जब धर्मान्धता के आदेश जारी करने लगते हैं, तो उससे निपटने के अदालती रास्ते न तो आसान रहते हैं, न ही छोटे। जिस ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक आबादी मांसाहारी है, वहां पर सरकारी छुट्टी वाले गणतंत्र दिवस पर मांस पर रोक लगाना पूरी तरह बेवकूफी का फैसला है। 2011 की जनगणना के मुताबिक ओडिशा मेंं 93.63 फीसदी आबादी हिन्दू है। खानपान के केन्द्र सरकार के एक दूसरे सर्वे के मुताबिक ओडिशा में 97 फीसदी से अधिक लोग मांसाहारी हैं। ऐसी आबादी पर ऐसा बेतुका फैसला क्यों थोपना, जिसे अदालती चुनौती देने में भी हफ्तों या महीनों का वक्त लग जाएगा।
अगर देश में लोगों को एक करने के दिए जा रहे कई किस्म के आव्हान ईमानदार हैं, तो ऐसे शाकाहारी आव्हान को मांसाहारी आबादी पर थोपकर समाज को बांटने का ही काम हो रहा है, उसे जोडऩे का काम नहीं हो रहा। फिर धीरे-धीरे ऐसी सोच पोशाक पर आती है, एक धर्म के त्यौहार के समय सडक़ किनारे दूसरे धर्म के लोगों के फुटपाथी कारोबार के खिलाफ आती है, और फिर यह सिलसिला हर बरस अधिक हिंसक, अधिक हमलावर भी होते चलता है। ओडिशा के एक जिले का यह नाजायज दिखता आदेश नौकरशाही के गैरकानूनी, या बेहतर यह कहना होगा, कानूनविरोधी उत्साह का एक सुबूत है, और अफसरों को मांसाहार का गैरकानूनी विरोध करने से दूर रखना चाहिए। इससे परे भी एक दूसरी बात यह सोचनी चाहिए कि इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर जब तीन चौथाई आबादी मांसाहारी है तो शाकाहार को राष्ट्रीय आहार का दर्जा देना कहां तक जायज है? जिन धर्मों के लिए, या जिस धर्म के लिए ऐसा आक्रामक रूख दिखाया जा रहा है, उस धर्म के भी अपने पुराने इतिहास में पशुओं की बलि, और उनके मांस को खाने का लंबा इतिहास दर्ज है। जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी धर्मों के लोगों को जोडऩे की बात होनी चाहिए, तो भारत के बहुसंख्यक हिन्दू धर्म के भीतर ही तकरीबन तीन चौथाई मांसाहारी आबादी की खानपान की पसंद को नाजायज करार दिया जा रहा है, यह सिलसिला एक राजनीतिक फतवे के रूप में भी नुकसान का है, और ओडिशा की सत्तारूढ़ भाजपा को यह समझना चाहिए। एक चौथाई से कम शाकाहारी हिन्दुओं के खानपान-दुराग्रही बड़े छोटे से तबके को खुश करके कोरापुट कलेक्टर तो सत्ता की कुछ मेहरबानी पा सकते हैं, लेकिन क्या उससे देश-प्रदेश का कोई भला भी होगा?
सोशल मीडिया और मैसेंजरों पर झूठे-नफरती सैलाब पर..
24 जनवरी 2026
तमिलनाडु की एक खबर है कि किसी यूट्यूब चैनल पर वजन कम करने की तरकीब देखकर एक कॉलेज छात्रा ने बोरेक्स खा लिया, और उसकी मौत हो गई। इसे कुछ भारतीय पारंपरिक दवाओं में बहुत ही कम मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा लेने का मतलब जहरीला कीटनाशक खाने जैसा होता है। इस छात्रा के पिता का कहना है कि उन्होंने यूट्यूब चैनलों पर होने वाले मेडिकल-दावों को लेकर अपनी बेटी को भरोसा न करने की सलाह दी थी। यह मामला सोशल मीडिया पर तैरने वाली बहुत सी दूसरी झूठी जानकारियों जैसा है जिन्हें अच्छे-भले जिम्मेदार दिखने और माने जाने वाले लोग भी अंधाधुंध रफ्तार से चारों तरफ फैलाते हैं। वॉट्सऐप जैसी मुफ्त की सहूलियत के चलते लोग सुबह उठने के बाद न मुंह धोते हैं, न फारिग होते हैं, बल्कि रात भर में उनके फोन पर आए हुए कचरे, झूठ, और अफवाह को चारों तरफ फैलाने में लग जाते हैं। इस बारे में कोई डॉक्टरी रिसर्च तो नहीं हुई है, लेकिन मुंहअंधेरे ही कई लोग जिस रफ्तार से तरह-तरह की नफरत, झूठ, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, और सीधे नुकसान पहुंचाने वाली झूठी मेडिकल जानकारियों को फैलाते हैं, उनका वह समर्पण देखने लायक रहता है, और ऐसा लगता है कि इसके बिना उनका पेट साफ नहीं होता।
टेक्नॉलॉजी ने जो मुफ्त के औजार लोगों को दे दिए हैं, लोग उनका इतना गैरजिम्मेदार इस्तेमाल करते हैं कि वे समाज को बर्बाद करने के हथियार में तब्दील हो जाते हैं। टेक्नॉलॉजी ने लोगों को फल-सब्जी काटने के लिए चाकू दिया, और लोग हैं कि उससे दूसरों की अतडिय़ां काटने लगे। अभी हम यह तो अंदाज नहीं लगा पा रहे कि बेबुनियाद मेडिकल-दावे फैलाना अधिक खतरनाक है, या नफरत फैलाना, खतरनाक तो दोनों ही हैं, लेकिन नफरत की शिनाख्त उसे पाने वाले लोग कुछ आसानी से पकड़ सकते हैं, मेडिकल-दावों की, खानपान की झूठी सलाह बढ़ाने वाले लोग उतनी आसानी से झूठे साबित नहीं हो पाते। अब बहुत से लोग ऐसी जानकारियों के नीचे किसी डॉक्टर का नाम, किसी बड़े अस्पताल का नाम देखकर दूसरों को भी कुछ खिलाना-पिलाना शुरू कर देते हैं, और नतीजा खतरनाक निकलता है। इंसानों को कई ऐसी बीमारियां होती हैं जिन्हें चिकित्सा विज्ञान या तो आसानी से ठीक नहीं कर सकता, या पूरी तरह से दूर नहीं कर सकता। खास ऐसी बीमारियों को ठीक और दूर करने के दावे वाले कई वीडियो कुछ डॉक्टरी पढ़े-लिखे लोग भी बनाकर पोस्ट करते हैं, और डायबिटीज जैसी बीमारी को दूर करने के दावे वाले उनके वीडियो के खिलाफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन जैसी डॉक्टरी संस्था भी सार्वजनिक रूप से भांडाफोड़ करती रहती है, लेकिन सनसनी फैलाने के मामले में अतिउत्साही सोशल मीडिया वाले लोग किसी वैज्ञानिक बात को अपने गले उतरने नहीं देते, बल्कि एक ऐसा मानसिक फिल्टर गले में लगा लेते हैं कि कोई वैज्ञानिक बात गले उतर न जाए।
झूठ को फैलाने में गैरजिम्मेदार लोगों की क्षमता का विज्ञान कोई मुकाबला नहीं कर सकता। कोरोना के पूरे दौर में यह देखा हुआ है कि अपनी दवाइयों से कोरोना को ठीक करने के झूठे दावे करने वाले रामदेव सरीखे लोग भी केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ मंच से झूठ फैलाते रहे, और डॉक्टरों के राष्ट्रीय संगठन भी आसानी से उसका मुकाबला नहीं कर सके। उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा, तब जाकर बाबा का झूठ कुछ थम पाया। इस तरह धर्म, आध्यात्म, योग, और देश की पुरानी परंपराओं के नाम का बेजा इस्तेमाल करके विज्ञान विरोधी बातें, और झूठ फैलाना चलते रहता है। इन बातों में जनता के जिन तबकों का भरोसा रहता है, वे इनके झंडेतले फैलाए जा रहे झूठ पर भी भरोसा करने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं, कि ऐसा न हो कि झूठ आए, और वे लपकने से चूक जाएं।
सनसनीखेज झूठ पर भरोसा करने का पढ़ाई-लिखाई से बहुत कम लेना-देना होता है। न सिर्फ भारत, बल्कि विकसित, और अधिक पढ़े-लिखे पश्चिमी देशों को देखें, तो वहां भी धर्म पर अंधविश्वास रखने वाले लोग हर किस्म के झूठ को अधिक तेजी और उत्साह से लपकते हैं। दुनिया में धर्म पर विश्वास करने वाले कम संख्या में ऐसे जिम्मेदार लोग भी रहते हैं जो सच और झूठ के फर्क को समझते हैं। आमतौर पर धर्म लोगों में अंधविश्वास भरने की, और उन्हें विज्ञान से दूर करने की ताकत अधिक रखता है। धर्म के नाम पर पाखंड करने वाले लोग नाबालिग लड़कियों से बलात्कार करते हैं, और दूसरी तरफ वेलेंटाइन डे जैसे मासूम प्रेम-दिवस को मनाने से मना करते हैं, और उसे मातृ-पितृ पूजन दिवस बनवा देते हैं। हमारी यह बात कुछ अधिक बिखरी हुई लग सकती है, जो कि मेडिकल-अफवाहों से शुरू होकर धर्म के कुछ बुरे असर तक पहुंच गई है, लेकिन आस्था कब अंधविश्वास में बदल जाती है, कब वह अवैज्ञानिक झूठ को अपना लेती है, इसके बीच कोई सीमा रेखाएं नहीं हैं। इसलिए अगर लोगों को तरह-तरह के झूठ, अफवाह, और नफरत से बचना है, तो उन्हें अपनी खुद की समझ को बहुत मजबूती से विज्ञान, लोकतंत्र, और मानवीय मूल्यों की मजबूत बुनियाद पर टिकाकर रखना पड़ेगा, और इन तमाम पैमानों पर किसी बात के खरे उतरने के बाद ही उस पर भरोसा करना होगा। आज दुनिया में सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों की मेहरबानी से नकारात्मक बातें, नफरत, झूठ, अंधविश्वास, साम्प्रदायिकता, और चिकित्सा-फरेब जैसी चीजें लगातार फैल रही हैं। लोगों को किसी भी बात को अभी ऊपर लिखे गए पैमानों पर परखे बिना आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि किसी गैरजिम्मेदार ने उन्हें कुछ भेज दिया है, तो उसे आगे भेजना किसी भी तरह उनकी जिम्मेदारी नहीं है। लोगों को एक तस्वीर याद होगी जो सोशल मीडिया पर कई तरह से पोस्ट होती है, उसमें कुछ दीवारों के पार बसे हुए लोग एक-दूसरे के अहाते में घमेला भर-भरकर गंदगी डाल रहे हैं, सब अपने अहाते में आई हुई गंदगी को तुरंत आगे बढ़ा रहे हैं। आज असल जिंदगी में हालत कुछ इसी तरह की हो गई है। हमारी सलाह यही है कि पूरी जांच-पड़ताल करके जब कोई जानकारी पूरी तरह से पुख्ता साबित हो जाए, उसके बाद भी यह जरूर सोचें कि क्या इसे आगे बढ़ाना आपकी कोई जिम्मेदारी है? आज लोग सूचना और सामग्री के ओवरलोड से थके हुए हैं, और कई लोग ऐसे लोगों को ब्लॉक करते चलते हैं, जो बिना किसी मतलब के गुडमॉर्निंग मैसेज, धार्मिक संदेश हर दिन अपने संपर्क के सारे लोगों को भेजते हैं। आज किसी के पास इतना वक्त नहीं है कि ऐसे मासूम संदेश भी रोज देख सकें। और झूठ या अफवाह, नफरत या साम्प्रदायिकता को झेलने का वक्त तो किसी के भी पास नहीं होना चाहिए, जिन लोगों को ऐसी बातें पसंद आती हैं, उन्हें दिमाग के रोगों के मानसिक चिकित्सकों से अपनी जांच करवानी चाहिए, इलाज भी।
सबसे गरीब के सबसे करीब रहने की जरूरत
23 जनवरी 2026
छत्तीसगढ़ में अभी एक छोटी सी बच्ची के साथ उसी इलाके के एक बड़े बुजुर्ग दुकानदार ने कई दिनों तक बलात्कार किया। बाद में शिकायत होने पर गिरफ्तारी हुई, और उस बुजुर्ग के कब्जे वाले किसी निर्माण को अवैध कब्जा होने की वजह से बुलडोजर से गिरा भी दिया गया। इस गरीब बच्ची की देखरेख का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है, और समाज तो ऐसा है ही कि उसके भीतर कोई भी बच्ची सुरक्षित नहीं रह सकती। इस एक मामले से परे बहुत सी दूसरी विक्षिप्त या विचलित लड़कियां या महिलाएं ऐसी हैं जिनके साथ बलात्कार होता है, और अक्सर तो उसकी खबर तब होती है जब उनका गर्भ दिखने लगता है। अब ऐसे मामलों की सजा किसे दी जाए? कई लड़कियां मूकबधिर रहती हैं, नेत्रहीन रहती हैं, किसी और विकलांगता की शिकार रहती हैं, और गरीब तो रहती ही हैं क्योंकि ऊपर वाला भी मुसीबतों को कमजोर लोगों को ही अधिक देता है। ऐसे में इन सारे लोगों को जिन्हें समाज असहाय, या बेबस, या जरूरतमंद कहता है, उनके लिए क्या किया जाना चाहिए?
हम पहले भी कुछ मौकों पर इस बात को लिख चुके हैं कि जनकल्याणकारी शासन में सरकार की पहली जिम्मेदारी सबसे बेबस लोगों के प्रति होनी चाहिए। इसमें बेघर लोग हैं, विचलित या बेसुध किस्म के लोग हैं, फुटपाथों पर जीने वाले कमजोर और गरीब लोग हैं, बीमार हैं, घर छोड़े हुए और नशे में पड़े हुए बच्चे हैं। इन किस्मों के लोग बच्चों भी हैं, बड़े भी हैं, आदमी भी हैं, और औरतें भी। इन सबको ऊंचे दर्जे की जरूरत रहती है क्योंकि इनके सिर पर छत नहीं होती, रहने-सोने, खाने या इलाज का इंतजाम नहीं होता। इन्हें मानसिक परामर्श, या मानसिक चिकित्सा की जरूरत भी रहती है। किसी भी राज्य सरकार को यह संकल्प लेना चाहिए कि उसके राज्य में इस तरह के कोई लोग बेसहारा नहीं छोड़े जाएंगे। आज कुछ भिक्षुक गृह कहीं-कहीं पर हैं, कहीं-कहीं इक्का-दुक्का वृद्धाश्रम हैं, कहीं पर बाल सुधार गृह हैं, लेकिन इन सबके लिए अनिवार्य इंतजाम कुछ भी नहीं है।
यह सिलसिला बहुत खतरनाक है। धीरे-धीरे समाज सार्वजनिक जगहों पर बिखरी हुई ऐसी जिंदगियों को देखने का ऐसा आदी हो जाता है कि उसे इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता। ठीक उसी तरह, जिस तरह कि किसी ईश्वर के दर्शन के लिए धर्मस्थल जाने पर लोग वहां बाहर दूर तक कतारों में बैठे हुए भिखारियों को देखने के आदी हो जाते हैं, इस हद तक आदी हो जाते हैं कि उन्हें ये लोग दिखते भी नहीं हैं। आज शहरों में समाज की हालत यही हो गई है कि फुटपाथों पर, रेलवे स्टेशनों, और बस अड्डों पर बिखरे और जीते हुए ऐसे लोग हमें दिखना बंद से हो गए हैं। यह संवेदनशून्यता अधिक खतरनाक है क्योंकि इसके बाद फिर सरकार पर जनमत का कोई दबाव भी नहीं रह जाता। लेकिन हमें ऐसा लगता है कि सरकार चलाने वाले नेता और अफसर, दोनों ही अब तक तो बिना एआई के, इंसान ही हैं, और यह बात उन्हें भी छूनी चाहिए कि समाज में हर कुछ किलोमीटर पर ऐसी कोई जिंदगी बिखरी हुई है, और यह अपने आपमें जनकल्याणकारी शासन की एक बड़ी असफलता है।
सरकार को अलग-अलग विभागों, या संवैधानिक संस्थाओं, निगम मंडल में बिखरी हुई जिम्मेदारियों को समेटकर एक साथ रखना चाहिए, और शहर, कस्बे, गांव तक यह इंतजाम करना चाहिए कि हर किस्म के निराश्रित लोगों के लिए एक साथ किस तरह का इंतजाम किया जा सकता है। हो सकता है कि एक ही कैम्पस में अलग-अलग तबकों के लोगों के लिए अलग-अलग इंतजाम हों, लेकिन इन सबका इलाज, इन सबका खानपान, इन सबका परामर्श तो एक साथ हो सकता है। इसके लिए सरकार को एक बेहतर शब्द भी सोचना चाहिए जिससे निराश्रित गृह, अनाथाश्रम, महिला उद्धार गृह, नारी निकेतन, वृद्धाश्रम जैसे शब्दों के बजाय एक अधिक सकारात्मक शब्द ढूंढा जाए जो कि वहां के रहवासियों के लिए आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का भी हो। जरूरी नहीं है कि सरकारें अपने भ्रष्ट सरकारी कामकाज के तहत ही ऐसी जगहों को बर्बाद होने दें, सरकारें यह भी कर सकती हैं कि समाज के लोगों को शामिल करके जनसंगठनों, या सामाजिक संगठनों को जमीन और इमारत जैसी ढांचागत सुविधा देकर उनसे भी सहयोग की अपील करे। आज भी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक समाजसेवी अपने परिचित लोगों को जोडक़र सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पास मरीजों के परिजनों के रहने-खाने का ऐसा अतिरियायती इंतजाम बरसों से चला रहे हैं जो कि सरकार खुद कभी नहीं चला पाई। इसलिए कंपनियों के सीएसआर मद को जोडक़र, जिले की डीएमएफ जैसी राशि की मदद से, सरकार को जिला मुख्यालयों के लिए तो तुरंत ही ऐसी योजना बनानी चाहिए कि कोई भी जरूरतमंद बेघर, बीमार, या विचलित व्यक्ति बिना मदद के न रहे। हम जो सुझा रहे हैं इसमें कोई परमाणु तकनीक शामिल नहीं हैं, अनंतकाल से समाज के कई लोग तरह-तरह की सेवा के काम करते आए हैं, आज जरूरत बस यही है कि जिस तरह कोई काम शुरू करने से पहले धार्मिक आराधना की जाती है, वैसे ही कोई भी सरकार योजना सोचने से पहले समाज के इस सबसे कमजोर तबकों को एक मानवीय जीवन देने की बात सोचनी चाहिए।
बात बलात्कार की शिकार एक बच्ची से शुरू हुई थी, और समय-समय पर हाईकोर्ट तक यह मामला जाता है कि कानूनी रूप से सरकारों को बलात्कार की शिकार लड़कियों या महिलाओं को जो आर्थिक मदद देनी चाहिए, वह भी बरसों तक नहीं दी जाती है। इतनी संवेदनशून्यता ठीक नहीं है। लोग अगर सरकार के राजसी तौर-तरीकों के साथ में अगर जिंदगी की इन विसंगतियों को साथ रखकर पेश करेंगे, तो सरकार चला रहे लोगों को बड़ी ही असुविधा होगी। इसलिए हमारी सलाह यही है कि सरकार को सबसे जरूरतमंद लोगों को अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। इसे ही किसी काम का श्रीगणेश मानना चाहिए, या जैसा कि कहीं-कहीं ट्रक-बस के ड्राइवर वाले दरवाजे पर लिखा रहता है- पहले अल्लाह बोल, फिर दरवाजा खोल। मतलब यही है कि सबसे पहले अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए, उसके बाद ही पूरी की गई दूसरी जिम्मेदारियों की कोई अहमियत होनी चाहिए।
हिन्दुस्तान में सार्वजनिक जीवन, और जगहों पर राष्ट्रीय भावना
22 जनवरी 2026
छत्तीसगढ़ के अधिकतर शहरों में खेल मैदान या उद्यान में कसरत की मशीनें लगाई गई हैं। कई जगहों पर ये मशीनें शानदार हालत में हैं, और काम कर रही हैं, कई जगहों पर लोगों ने इस बात को अपना राष्ट्रीय अपमान माना कि कोई सार्वजनिक सहूलियत बर्बाद हुए बिना खड़ी है, और वे खाली बैठे हैं। हिन्दुस्तानियों का आत्मसम्मान, उनका स्वाभिमान, और उनकी सांस्कृतिक पहचान को कई बातों से तुरंत चोट लगती है। इनमें किसी जगह का साफ-सुथरा रहना सबसे ऊपर है जो कि उन्हें राष्ट्रीयता के लिए एक बड़ी चुनौती लगती है। जिस तरह मन में राष्ट्रीयध्वज के लिए सम्मान होना चाहिए, बाकी तमाम राष्ट्रीय प्रतीकों पर मान होना चाहिए, उसी तरह सार्वजनिक जगहों का गंदा होना भी राष्ट्रीयता की भावना का एक हिस्सा है, और इसके लिए लोग खूब मेहनत करते दिखते हैं। पेशाबघरों में पखाना कर देना, पखानों में नल को तोड़ देना, और दस बरस के बच्चों तक के लिए बनाए गए झूलों पर मोटे-तगड़े अधेड़ लोगों का झूलना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। फिर चौराहों पर लालबत्ती का विरोध मन में इतना होता है कि लोग तुरंत ही गाडिय़ों के दरवाजे खोलकर सडक़ों पर खूब सारी पीक उगलना शुरू कर देते हैं, और जाहिर है कि इतनी पीक के लिए मुंह में तम्बाकू तो भरकर रखना ही होता है। आखिर ट्रैफिक पुलिस की यह मजाल कैसे हो गई कि वह लालबत्ती दिखाकर हिन्दुस्तानियों को रोके, पुलिस के इस दुस्साहस पर खासी मात्रा में पीक उगल देना भारतीयों की बगावत की राष्ट्रीय भावना का एक हिस्सा है।
सार्वजनिक जगहों पर अगर लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां लगी हैं, तो एक पर खुद बैठकर बाकी दोनों तरफ अपने सामान रख देना सार्वजनिक सम्पत्ति को अपना मानने के आत्मविश्वास का एक हिस्सा रहता है। जिन्हें सिर्फ एक कुर्सी नसीब हो, उनका आत्मविश्वास डोलने लगता है, और मन में हीनभावना घर करने लगती है। फिर जब बस स्टैंड, स्टेशन, या एयरपोर्ट पर ऐसी भरी हुई कुर्सियों के बीच किसी आकर्षक व्यक्तित्व का पहुंचना होता है, तो लोग अपने बगल की कुर्सी से सामान बिजली की रफ्तार से उठाने लगते हैं, मानो वह आकर्षक व्यक्तित्व को न्यौता दिया जा रहा हो। बाकी अनाकर्षक लोग कहीं फर्श पर अपनी जगह ढूंढ सकते हैं। यह सिलसिला देश की सरहदों तक ही कायम रहता है, जब भारतीय संस्कृति से लबालब लोग दूसरे देशों को जाते हैं, तो वहां गोरी और अंग्रेजी हिकारत की दहशत में राष्ट्रीयता की ये हरकतें छूट जाती हैं। कहीं अंग्रेजी में गोरी डांट न पड़ जाए, यह डर अंग्रेजों की गुलामी खत्म होने की पौन सदी बाद भी दूसरे देश पहुंचने पर लौट आता है।
सार्वजनिक जगहों पर लगी कसरत की मशीनों पर लोग जोड़ों में बैठ जाते हैं, और उनका बेंच की तरह इस्तेमाल करते हैं कि बाद में आने वाले कोई लोग कहीं उन पर कसरत न कर लें। उन लोगों की चर्बी पर रहम करते हुए मशीनों पर यह कब्जा करने के लिए अगर एक से अधिक लोग नहीं हैं, तो अकेले लोग भी किसी दूसरी मशीन की सीट पर अपनी जैकेट रख देते हैं, पानी की बोतल, मोबाइल फोन, या चाबियां रख देते हैं कि लोग कहीं अधिक कसरत न कर लें। कुछ लोग सार्वजनिक जगहों पर अंधाधुंध ऊंची आवाज में मोबाइल फोन पर बात करते रहते हैं कि आसपास के दूसरे लोगों की बोरियत खत्म होती रहे, और वे लोग भी यह सुनते रहें कि एक शहर से बात करते हुए वे अपने आपको कैसे किसी और शहर में बताते रहते हैं। ऐसे सार्वजनिक झूठ की नुमाइश के बिना लोगों को लगता है कि वे अपनी संस्कृति भूल रहे हैं। लोग और चाहे कोई भी गलती करें, गलत काम करें, वे संस्कृति को भूलने का जुर्म नहीं करते, संस्कृति है तो सब है। देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों की नकल करके न तो साफ-सफाई रखने जैसी गुलाम मानसिकता दिखानी चाहिए, और न ही वक्त के पाबंद रहकर अपने को अंग्रेजों का पिछलग्गू साबित करने की गलती हिन्दुस्तानी नहीं करते।
एक बार फिर कसरत की मशीनों पर चलें, तो उन्हें किसी कील से, किसी और औजार से नुकसान पहुंचाकर लोग एक बार फिर यह भरोसा कर लेते हैं कि यह सारा सामान उन्हीं की सहूलियत के लिए लगाया गया है, महज चर्बी को भगाने के लिए नहीं। विश्वविद्यालय कैम्पस में पढ़े-लिखे समझे जाने वाले छात्रों की बेंच पर हिटलर की तारीफ कुरेद दी जाती है, और ऐसा करके लोग यह भरोसा पाते हैं कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अभी कायम है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत मायने रखती है, लोग रात-बिरात अपने घर लौटते हैं तो दरवाजा या गेट खुलवाने के लिए अपने दुपहियों या चौपहियों की अभिव्यक्ति को जोर-जोर से बजाते हैं ताकि घरवाले आकर खोलें, और साथ-साथ आसपास के पूरे इलाके को यह पता लग जाए कि अभिव्यक्ति की आजादी देश में बाकी है।
सुबह-शाम घूमने वाले लोग, या किसी सडक़-चौराहे पर अनायास ही मिल जाने वाले लोग इतनी जोर-जोर से अपनी विचारधारा का प्रदर्शन करते हैं कि असहमत विचारधारा दुबककर निकल जाए। लोग अपने घरों में बैठे हुए भी आसपास के लोगों की निपट-बेवकूफी की नुमाइश को कानों से देख सकते हैं, और अगले दिन उसी वक्त ऐसी मोबाइल नुमाइश चलते हुए उसी जगह पर आकर फिर मुफ्त का शो करने लगती है। लोग अपने घरों से दूर किसी जगह जाकर कुत्तों, गाय, और सांड को खिलाते हैं, अपने घर पर ऐसा जमघट नहीं लगने देते। इसी तरह बेवकूफी की बातें करने वाले लोग छोटे-छोटे समूह बनाकर दूसरों के घरों के सामने, या किसी मोड़ पर, किसी पेड़ के साये में, या किसी चबूतरे पर बैठकर दिव्य ज्ञान को बघार लगाते हैं, ताकि आसपास के जिन लोगों को मूर्खता से वास्ता कम पड़ा हो, वे भी फायदा पा सकें।
हिन्दुस्तान के लोग अपने सार्वजनिक बर्ताव को लेकर एकदम साफ रहते हैं, पारदर्शी, कमर कसे हुए, और बेझिझक। वे अपने नाजायज अधिकारों की नुमाइश करते हुए कभी भी दूसरों के जायज अधिकारों पर नजर डालने की जहमत नहीं उठाते। ऐसी चूक करने से अपना मकसद धरा रह जाता है, अपनी संस्कृति की उपेक्षा हो जाती है, और आत्मकेन्द्रित-आत्ममुग्धता बुरा मानती है। इसलिए लोग सार्वजनिक जगहों पर तमाम किस्म के नाजायज हक का इस्तेमाल करते हुए एक बार फिर अपने को यह भरोसा दिलाते हैं कि सार्वजनिक सम्पत्ति उनकी अपनी है, सार्वजनिक जगहें उनके बाप के बाप की हैं। अब जिन लोगों को यह बात मंजूर न हों, उन्हें सार्वजनिक जगहों से दूर रहना चाहिए।
हमने एआई से पूछा कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारतीयों में सबसे बड़ी सांस्कृतिक एकता क्या है, कौन सी बात है जो क्षेत्र, भाषा, धर्म, जाति, और रंग से परे एक सरीखी है? एआई ने काफी सोच-विचारकर बताया कि गंदगी अकेली ऐसी चीज है जिस पर पूरा देश एक साथ खड़े रहता है, गंदा रहना, गंदगी फैलाना, और गंदगी के बीच जीने की आदत डाल लेना पूरे देश में एक समान है। अभी देश में राष्ट्रीय सामानों की कोई फेहरिस्त नहीं बनी है, वरना गंदगी को राष्ट्रीय पदार्थ घोषित किया जा सकता है, जो कि तमाम जगहों पर मौजूद और उपलब्ध है। लोगों को हमारी लिखी हुई कुछ गिनी-चुनी बातों से परे भी यह देखना चाहिए कि भारत में सार्वजनिक जगहों पर, सार्वजनिक जीवन में लोगों के बर्ताव में राष्ट्रीयता की और कौन-कौन सी बातें दिखाई पड़ती हैं। भारत के सामाजिक जीवन का ऐसा अध्ययन लोगों को अपने देश को समझने में, और उस पर गर्व करने में मदद करेगा।
यह बिफरा जानवर जितनी जल्द पिंजरे या ताबूत में...
21 जनवरी 2026
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के इस कार्यकाल के पहले से ही, उनके चुनाव प्रचार के मुद्दों को लेकर हम उनके खिलाफ बड़ी तल्ख जुबान का इस्तेमाल करते आ रहे थे, कुछ लोगों को हमारी संपादकीय भाषा अटपटी भी लग रही थी, लेकिन हमने इस कॉलम में, या अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर ट्रम्प के लिए उन्हीं विशेषणों को जारी रखा था। कल जब ब्रिटिश संसद में एक सांसद एड डेवी ने ट्रम्प को इंटरनेशनल गैंगस्टर कहा, तो हमें कुछ राहत मिली कि हम अमरीका से दूर बैठे हुए वहां के राष्ट्रपति को गालियां देने का काम गैरजिम्मेदारी से नहीं कर रहे थे, बल्कि अमरीका के सबसे करीबी पश्चिमी सहयोगी देश ब्रिटेन की पार्लियामेंट ने भी ट्रम्प को असाधारण और ऐतिहासिक गालियां दी गई, और इंटरनेशनल गैंगस्टर कहा गया। इससे परे भी पिछले दो-चार दिनों में ही ट्रम्प के बारे में बिना गालियों के भी विश्व नेताओं ने जो कहा है, वह आज तक किसी अमरीकी राष्ट्रपति के लिए नहीं कहा गया था।
ट्रम्प ने जिस अंदाज में अपने दोस्त और दुश्मन देशों के बीच की सीमा रेखा को खत्म कर दिया है, उससे अमरीका की वैश्विक साख टके की रह गई है। अभी ट्रम्प के कार्यकाल के पूरे तीन साल बाकी हैं, और इन तीन बरसों में ऐसा कमीना अमरीकी राष्ट्रपति अपने देश के साथ-साथ पूरी दुनिया को बर्बाद करते दिख रहा है। जिस तरह से उसने डेनमार्क के अल्प स्वायत्तशासी इलाके ग्रीनलैंड को फौजी कार्रवाई से कब्जा करने की धमकी दी है, और एक नाटो सदस्य होने के कारण डेनमार्क के साथ खड़े रहने की बात करने वाले यूरोपीय देशों को टैरिफ की धमकी दी है, वह योरप को हक्का-बक्का कर चुकी है, और पश्चिम की इस बर्बादी के जश्न में पुतिन बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह डाँस कर रहा है, ट्रम्प की तारीफ कर रहा है, और योरप को कोस रहा है। अभी ठीक एक साल पहले तक योरप और अमरीका एक ही सैनिक गठबंधन नाटो के सदस्य थे, और आज ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रम्प और बाकी योरप एक-दूसरे के सामने खड़े हैं। जंग टैरिफ से शुरू हुई है, लेकिन अगर हथियारों से हमला होता है, तो योरप की यह नीतिगत मजबूरी होगी कि वह डेनमार्क के साथ एकमुश्त खड़ा रहे।
ट्रम्प की बददिमाग मनमानी, और सनक की वजह से, विस्तारवादी जंगखोर नीयत की वजह से आज पूरी दुनिया के बाजार अस्थिर हो गए हैं। बाजारों के अस्थिर होने का एक सबसे बड़ा संकेत सोने-चांदी का रेट होता है, जो कि आज आसमान को चीरकर अंतरिक्ष में पहुंच चुका है, लोगों को यह भरोसा नहीं है कि किसी भी तरह का पूंजी बाजार ट्रम्प के रहते सुरक्षित है, और इसलिए लोग आसमान चीर चुके दाम पर भी सोना-चांदी खरीदकर अपनी पूंजी को सुरक्षित कर रहे हैं। दुनिया भर के पूंजी बाजार जिस तरह से ट्रम्प की गुंडागर्दी के असर से औंधेमुंह पड़े हुए हैं, वह बताता है कि जब तक बाकी दुनिया मिलकर ट्रम्प नाम के इस दैत्य के मुकाबले खड़ी नहीं होगी, तब तक इस इंटरनेशनल गैंगस्टर की लूटमार जारी रहेगी, और दुनिया कमजोर, अस्थिर, और असुरक्षित बनी रहेगी।
यही वजह है कि यूरोपीय समुदाय की मुखिया उर्सुला फॉन ने यह साफ किया है कि ट्रम्प की टैरिफ धमकियों के आगे योरप नहीं झुकेगा, और एक होकर लड़ेगा। इस तरह की बातें एक-एक करके फ्रांस के राष्ट्रपति, और दूसरे कई नेताओं ने भी की है, और ऐसा लगता है कि योरप का बर्दाश्त जवाब दे गया है, और अब उसे यह बात समझ आ गई है कि वह जितना दबता रहेगा, ट्रम्प उतना ही दबाता रहेगा, और ऐसे में वह दिन अधिक दूर नहीं है, जब दबा-कुचला योरप ट्रम्प का बंधुआ मजदूर होकर रह जाएगा। ऐसा वक्त इसलिए भी खतरनाक होगा कि योरप का परंपरागत फौजी दुश्मन, रूस किसी भी पल ट्रम्प की गोद में बैठे चहेते बच्चे की तरह हो सकता है, और वैसे में योरप अमरीकी फौजी साथ के बिना खराब मौसम में खुले आसमान के नीचे नंगे बदन साबित हो सकता है। इसलिए अब योरप के देश ट्रम्प के टैरिफ-बाहुबल का मुकाबला करने के लिए खड़े होते दिख रहे हैं। किसी गुंडे को एक सीमा से अधिक नंगा नाचने की इजाजत देना समाज के लिए ठीक नहीं होता है, इसलिए ट्रम्प नाम के इस मवाली को अमरीका तक सीमित रखना चाहिए, जहां के लोगों ने इसे चुना है, अपनी बर्बादी के लिए।
जिस अंदाज में ट्रम्प ने दुनिया में शांति स्थापित करने के नाम पर एक बोर्ड ऑफ पीस बनाया है, और जिस तरह वह उसमें 9 हजार करोड़ रूपए की फीस देने वाले देशों को स्थाई सदस्य बनाने की बात कर रहा है, वह अपने आपमें एक भयानक तानाशाह सोच है। पिछले दशकों में दुनिया के बहुत से मामलों में संयुक्त राष्ट्र संघ में जो अमरीका बहुमत के खिलाफ वीटो का इस्तेमाल करते आया है, वह आज अमरीकी तानाशाह के मातहत एक समानांतर संयुक्त राष्ट्र संघ खड़ा कर रहा है, उसे खारिज तो वह पहले ही कर चुका है, जब-जब इजराइल का मुद्दा आया, तो अमरीका और इजराइल का गिरोह संयुक्त राष्ट्र के खिलाफ जुर्म करते रहा है।
किसी एक देश के लोगों का चुनावी फैसला किस तरह पूरी दुनिया को बर्बाद कर सकता है, यह बात इतिहास में आज पहली बार इस तरह, इस हद तक साबित हो रही है। जर्मनी में वोटरों ने हिटलर को चुना था, लेकिन उसका प्रकोप योरप तक सीमित था। ट्रम्प की टैरिफ मार, उसके यूएसएड जैसे हर अमरीकी सरोकार को बंद करने के फैसले, ऐसे दर्जनों फैसले पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहे हैं। यह सिलसिला अगले तीन बरस तक और जारी रह सकता है, अगर अमरीकी राष्ट्रपति भवन से किसी कानूनी या गैरकानूनी तरीके से ट्रम्प की बिदाई नहीं होती है। आज इस अकेले आदमी ने दुनिया में सैकड़ों करोड़ लोगों का जीना हराम कर दिया है। दुनिया की अर्थव्यवस्था अस्थिर और चौपट कर दी है, करोड़ों लोगों को इलाज और टीकाकरण के लिए, मेडिकल जांच और पढ़ाई के लिए मिलने वाली अमरीकी मदद को बंद कर दिया है, पर्यावरण बचाने की कोशिशों से अमरीकी हिस्सेदारी को खत्म कर दिया है। योरप एक अकेला ऐसा समुदाय है जो कि इस बिफरे हुए जानवर को सींग से पकड़ सकता है, और इसे चुनौती दे सकता है। एक बरस के भीतर दुनिया का नक्शा किस तरह बदल गया है कि चीन और यूरोपीय समुदाय पास आ रहे हैं, भारत और चीन पास आ रहे हैं, अमरीका और रूस एक जुबान बोल रहे हैं, और दुनिया को ट्रम्प एक क्लब की तरह चला रहा है, 9-9 हजार करोड़ रूपए देकर मेम्बर बनने वाले देशों का क्लब!
यह बिफरा हुआ जानवर जितनी जल्द किसी पिंजरे या ताबूत में जाए, उतनी जल्दी दुनिया की बर्बादी थम सकेगी। हम लोकतंत्र और अहिंसा के हिमायती हैं, लेकिन लोगों की बद्दुआ से कई जिंदगियां खत्म हो सकती हैं, और आज की तारीख में धरती पर ट्रम्प से अधिक बद्दुआ झेलने वाला कोई और इंसान नहीं है।
लड़कियों और महिलाओं के शोषण का नुकसान सिर्फ उन्हें नहीं, बाकियों को भी..
20 जनवरी 2026
अभी इसी महीने राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप के दौरान दिल्ली के करीब फरीदाबाद की होटल में 17 साल की एक नाबालिग राष्ट्रीय स्तर की शूटर ने अपने कोच अंकुश भारद्वाज पर प्रदर्शन-मूल्यांकन के बहाने होटल के कमरे में बुलाकर यौन शोषण का आरोप लगाया। इसके बाद नेशनल रायफल एसोसिएशन ने इस कोच को निलंबित किया, और पाक्सो के तहत एफआईआर दर्ज हुई। लोगों को 2023-24 में भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर कई महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोप और सुप्रीम कोर्ट की दखल से लिखी जा सकी उनकी एफआईआर याद होगी। उस वक्त के इस सांसद पर अंतरराष्ट्रीय कैम्पों में नाबालिग पहलवान लड़कियों के यौन शोषण के आरोप लगे थे, और 2024 में सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद हुई जांच अदालत पहुंची थी। हरियाणा के रिवाड़ी में इसी बरस 2026 में एक हॉकी कोच को कोचिंग के दौरान 12वीं की छात्रा से बलात्कार करके उसे गर्भवती करने में गिरफ्तार किया गया। ऐसे मामले भारत में हर कुछ महीनों में सामने आते ही हैं। मध्यप्रदेश में उज्जैन और रीवां में प्रशिक्षकों ने नाबालिग एथलीट का देह शोषण किया, राजस्थान में भी जिम्नास्ट कोच पर ऐसा ही आरोप लगा।
2023 में संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था और यूनेस्को ने खेलों में लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें यह तथ्य लिखा गया था कि भारत में करीब एक तिहाई महिला खिलाडिय़ों ने पुरूष कोच से यौन शोषण, उत्पीडऩ, या गलत बर्ताव का सामा किया। यह आंकड़ा कई अध्ययन, सर्वेक्षण, और रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी पर आधारित था। जो भारत में राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के खेल संस्थानों में महिला खिलाडिय़ों की स्थिति बताता है। इस रिपोर्ट में कहा गया कि यह इतना बड़ा अनुपात पुरूष प्रशिक्षकों के दबदबे और उन्हें मिली हुई अनुपातहीन ताकत से जुड़ा है जहां प्रशिक्षक के अंधाधुंध अधिकारों के सामने नौजवान या नाबालिग खिलाड़ी लड़कियां अक्सर चुप रहती हैं क्योंकि उनका खेल जीवन खतरे में पड़ सकता है। भारत में यह समस्या अधिक गंभीर इसलिए है कि अधिकतर प्रशिक्षक पुरूष हैं, और महिला प्रशिक्षकों के अलावा भी महिला सहयोगी कर्मचारियों की कमी रहती है।
अभी 2026 में फरीदाबाद और हरियाणा के इन दो मामलों के सामने आने पर हमें इस मुद्दे पर लिखना जरूरी लग रहा है, और यह बात खेल से परे भी दूसरे कई दायरों पर भी लागू हो सकती है। हम खेल के संदर्भ में ही बात करें, तो जितने तरह का शोषण होता है, उसके लिए किसी न किसी अकेली जगह का इस्तेमाल होता है। कहीं मैदान या स्टेडियम के आसपास की इमारत का कोई कमरा, या खासकर किसी मुकाबले के दौरान होटल में खेल संघ के पदाधिकारियों, अधिकारियों, या प्रशिक्षकों के कमरों में ऐसा शोषण होता है। लगातार ऐसी शिकायतें बने रहने पर भी एक बहुत सहज और साधारण समाधान क्यों नहीं निकाला गया, यह हमारी समझ से परे है। किसी भी प्रशिक्षक या पदाधिकारी पर यह पूरी रोक रहनी चाहिए कि वे किसी भी खिलाड़ी से किसी बंद कमरे में न मिलें, और बेहतर तो यह हो कि वे अकेले में भी किसी जगह न मिलें। किसी महिला खिलाड़ी से किसी पुरूष प्रशिक्षक-पदाधिकारी मिलना हो तो आसपास या साथ में कोई दूसरी महिला खिलाड़ी, या महिला कर्मचारी अनिवार्य रूप से मौजूद रहे। किसी संघ का पदाधिकारी बनने, या टीम का प्रशिक्षक या फिजियोथेरेपिस्ट बनने के साथ ही इस तरह के घोषणापत्र पर दस्तखत करवाए जाने चाहिए, और हर खेल आयोजन, स्टेडियम, या दूसरी जगहों पर ऐसा नोटिस लगाया भी जाना चाहिए। बात सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं है, एक सबसे विकसित और कानूनी रूप से सबसे अधिक जागरूक देशों में से एक अमरीका में 2016 से 2018 के बीच अमरीकी जिम्नास्ट खिलाडिय़ों के बीच काम करने वाले लैरी नासर नाम के एक डॉक्टर ने इलाज के बहाने सैकड़ों लड़कियों का शोषण किया था। यह सिलसिला 1990 से उसने चला रखा था, जो कि 2016-18 के बीच सामने आया। 2015 में अमरीकी जिम्नास्टिक्स संघ को इसकी शिकायत मिली थी, लेकिन उसने इसे दबा लिया था। इस डॉक्टर ने अपने जुर्म का रिकॉर्ड भी रखा था, और चाइल्ड पोर्नोग्राफी के 30 हजार से ज्यादा सुबूत उसके कम्प्यूटर से पकड़ाए। उसकी शिकार पांच सौ से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं में ओलंपिक गोल्ड मैडलिस्ट लड़कियां तक शामिल थीं, और इनमें से एक ऐसी दिमागी हालत में पहुंच गई थी कि उसने ओलंपिक मुकाबले के बीच से हट जाना तय किया था। इस डॉक्टर को अलग-अलग मामलों में 60, 175, और 125 साल की कैद सुनाई गई। अमरीकी सरकार के न्याय विभाग ने इस मामले में अपने डॉक्टर की शिकार लड़कियों को कुल मिलाकर करीब 1150 करोड़ का मुआवजा दिया। इसके अलावा अमरीकी जिम्नास्ट संघ और ओलंपिक कमेटी पर भी मुकदमे चले, और वहां से भी करीब सवा चार सौ करोड़ का मुआवजा इन लड़कियों को मिला।
भारत में हमें खिलाडिय़ों के शोषण पर ऐसे किसी मुआवजे का इंतजाम नहीं मालूम है। लेकिन यह बात चर्चा में आम रहती है कि प्रशिक्षकों, और खेल संघों के कई पदाधिकारी खिलाडिय़ों का शोषण करते हैं, उन्हें खुश किए बिना लड़कियों को न तो प्रशिक्षण-शिविरों में जाने मिलता, न ही किसी टीम में। यह पूरा सिलसिला भयानक दर्जे का अमानवीय मामला है, और खेल संघों पर जैसे ताकतवर लोगों का दबदबा रहता है, सत्ता से जुड़े हुए लोग हर तरह के खेल संघ पर देश से लेकर प्रदेशों तक काबिज रहते हैं, तो उनके खिलाफ किसी अदना सी खिलाड़ी की कोई शिकायत कहीं टिक भी नहीं पाती है। फिर बरसों की मेहनत से कोई खिलाड़ी लडक़ी जहां तक पहुंचती है, वहां किसी के खिलाफ शिकायत करने का एक मतलब यह भी निकलता है कि उसका आगे बढऩा बंद, और जहां है वहां से भी बाकी लोग मिलकर उसे हटा ही देते हैं।
स्कूल-कॉलेज, खेलकूद, दूसरे तरह के प्रशिक्षण और कार्यक्रम, तरह-तरह के आयोजन, एनसीसी या दूसरे सांस्कृतिक शिविरों को लेकर पूरे देश में एक साथ यह इंतजाम लागू होना चाहिए कि कोई भी पुरूष किसी लडक़ी या महिला से अकेले में न मिले। मिलना जरूरी हो तो सार्वजनिक और खुली जगह पर दूसरी लड़कियों और महिलाओं की मौजूदगी में ही बात करे। ऐसी हिफाजत इसलिए भी जरूरी है कि भारत में लड़कियों के हक सदियों से कुचले जाते रहे हैं, आज भी उन्हें बराबरी के मौके नहीं मिलते, और एक लडक़ी का शोषण हो जाने पर लाखों दूसरी लड़कियों के मां-बाप उन्हें बाहर भेजने से हिचकने लगते हैं। इसलिए सरकार या अदालत को दखल देकर एक बहुत साफ-साफ सुरक्षा निर्देश लागू करना चाहिए, जिसमें से एक बात हमने सुझाई है, लेकिन ऐसी और भी कई बातें जोड़ी जा सकती है, जोड़ी जानी चाहिए।
सोशल मीडिया पोस्ट पर एफआईआर, कैसे बचें?
19 जनवरी 2026
यूपी की पुलिस ने आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, और कांग्रेस के एक चर्चित नेता पप्पू यादव समेत कई लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है कि उन्होंने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर चल रहे निर्माण कार्य के बारे में झूठी और मनगढ़ंत सामग्री सोशल मीडिया पर फैलाई है। इन लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र में मंदिरों को तोड़ा गया, काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराने वाली माता अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा को भी तोड़ा गया। संजय सिंह ने कहा कि इस पर लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजनजी ने भी विरोध दर्ज कराया था, लेकिन एफआईआर मेरे खिलाफ हुई है। सोशल मीडिया पर आनन-फानन कुछ पोस्ट करने की हड़बड़ी लोगों को ऐसी रहती है कि वे बिना जांचे-परखे भी कई चीजों को पोस्ट कर देते हैं। आज कम्प्यूटर और इंटरनेट से अधिकतर चीजों की सच्चाई परखी जा सकती है, इसके बाद भी लोग अगर किसी झूठ को आगे बढ़ाते हैं तो वे भारत के बहुत ही कड़े आईटी कानून के लपेटे में आ सकते हैं। दूसरी बात यह कि अधिकतर धाराओं में जुर्म दर्ज करने का अधिकार राज्य की पुलिस के पास रहता है, और गिने-चुने कानून ही केन्द्र सरकार की एजेंसियों को अधिकार देते हैं। हाल के बरसों में राज्यों की पुलिस ने सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीतिक पसंद और नापसंद के आधार पर कुछ लोगों के खिलाफ मामले दर्ज करना, और कई लोगों के खिलाफ न करना, इसे बहुत ही फूहड़ और अश्लील तरीके से किया है। ऐसे में सार्वजनिक जीवन के जिन लोगों को कुछ न कुछ लिखने या पोस्ट करने की हड़बड़ी रहती है, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि आज का वक्त राजनीतिक सहनशीलता का नहीं रह गया है, आज तो सत्तारूढ़ पार्टी की प्राथमिकताएं, राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा तय करती हैं, और शुरूआती एफआईआर तो तकरीबन ऐसे तमाम मामलों में राजनीतिक आधार पर होती हैं।
हम अलग-अलग नेताओं, या सोशल मीडिया एक्टिविस्ट लोगों को पहले भी यह सुझाते आए हैं कि देश का कानून राजनीतिक रूझान के आधार पर कार्रवाई शुरू करता है, और अदालत तक जाकर अपने आपको बेकसूर साबित करने में बरसों लग जाते हैं। इसलिए लोगों को अपनी खुद की साख को बचाने के लिए सावधान रहना चाहिए। किसी बात को पोस्ट करने के पहले, या उस पर लिखने के पहले यह पुख्ता कर लेना चाहिए कि सच क्या है, और झूठ क्या है। हम यह बात संजय सिंह और पप्पू यादव के प्रसंग में नहीं कह रहे हैं, हम एक बुनियादी बात कर रहे हैं कि आज जब टेक्नॉलॉजी और सोशल मीडिया लोगों को बिजली की रफ्तार से लिखने और बोलने का मौका देते हैं, तो लोगों को रबर के बिजली से बचाने वाले दस्ताने पहनने जैसी सावधानी भी बरतनी चाहिए।
कछुओं का बुरा मानना कुछ नाजायज तो नहीं
19 जनवरी 2026
न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया भर में न्यायपालिका के बारे में आंखों पर पट्टी बंधी होने की प्रतीकात्मक प्रतिमा प्रचलन में रहती है। भारत की न्यायपालिका के बारे में एक और बात चलन में है कि वह कछुआ चाल से चलती है। हालांकि कुछ जानकार लोगों ने बताया है कि कछुओं को इस बात पर बड़ी आपत्ति रहती है कि रोजाना ही हिलने-डुलने, और आगे बढऩे वाले कछुओं को भारतीय अदालतों की रफ्तार के लिए क्यों इस्तेमाल किया जाता है। अभी मुंबई की एक जिला अदालत ने 7 रूपए 65 पैसे की चोरी का एक मामला 50 साल बाद बंद किया है, जो कि 1977 से चले आ रहा था। इसमें जिन दो अज्ञात लोगों के खिलाफ चोरी का आरोप था, वे कभी मिले ही नहीं, और शिकायतकर्ता भी इस मामले की सुनवाई में बरसों से गायब था, आ ही नहीं रहा था। ऐसे में यह मामला दूसरे मामलों के तले दबा हुआ था, लेकिन जिंदा था। कई बार गिरफ्तारी वारंट जारी हुए, लेकिन अज्ञात आरोपी मिले ही नहीं। अब जाकर जज ने लिखा कि इस मामले को पर्याप्त से अधिक समय दिया जा चुका है, इसे और लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं है। दरअसल भारतीय कानून में दो हजार रूपए से कम की चोरी जैसे छोटे अपराधों के लिए त्वरित सुनवाई का प्रावधान है, लेकिन यह मामला 50 साल लटके रहा। मुंबई की इसी जिला अदालत ने हाल ही में पासपोर्ट से जुड़े एक मामले को बंद किया जो 30 साल से चल रहा था, और जिसमें 1995 के आरोपपत्र के बाद से आरोपी लापता था। अदालत ने यह माना कि इतने बरसों बाद आरोपी को ढूंढ पाने की कोई असल संभावना नहीं बची है। ऐसा ही एक मामला 2003 का लापरवाह ड्राइविंग का था, जिसे बंद किया गया, इसमें पुलिस ने बताया कि न सिर्फ आरोपी, बल्कि शिकायतकर्ता, और सारे गवाह अब लापता हैं, कोई नहीं मिल रहे हैं। अदालत ने लिखा कि केस को हमेशा के लिए खुला रखना न्यायसंगत नहीं है।
अब ऐसे मामले गिनती में कम हो सकते हैं, लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठाने के लिए ऐसी असल कहानियां काफी रहती हैं। एक-एक खबर लोगों को यह सोचने और बोलने का मौका देती है कि अदालत से शायद उनके जीते-जी इंसाफ न मिल सके। 1984 के भोपाल गैसकांड में आखिरी सजा 2010 में हुई, तब तक अधिकांश आरोपी मौत के करीब पहुंच चुके थे, और गैस त्रासदी के सैकड़ों शिकार मर चुके थे। ऐसा ही मामला केरल का 1996 का एक नाबालिग लडक़ी के यौन शोषण का था, जिसे निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट पहुंचने, और फैसला पाने तक दो दशक से ज्यादा लग गए, मामले से जुड़े लोगों का सामाजिक जीवन बिखर गया था। दिल्ली के उपहार सिनेमा अग्निकांड में मुआवजे की कानूनी लड़ाई 20 साल से अधिक चली, जिसमें करीब 60 लोगों की मौत हुई थी, और ये दो दशक पीडि़त परिवार अदालत के चक्कर काटते रहे। उत्तरप्रदेश का हाशिमपुरा हत्याकांड 1987 में हुआ था, जिसमें हथियारबंद पुलिस पर अल्पसंख्यकों की हत्या का आरोप था, वे निचली अदालत से बरी हो गई थे, और हाईकोर्ट में उन्हें सजा होते हुए 31 साल लग गए थे।
अभी 2024 में भारत में जो तीन नए आपराधिक कानून लागू हुए हैं, उनमें ऐसी देरी से निपटने के कुछ इंतजाम किए गए हैं। ऐसा अंदाज है कि इससे अदालतों का बोझ घटेगा, क्योंकि मामलों की तेज रफ्तार सुनवाई होगी। अदालतों के लिए समय सीमा भी तय की गई है, और छोटे-मोटे मामलों में अदालत की निगरानी में वादी-प्रतिवादी के बीच समझौते का प्रावधान भी जोड़ा गया है। नई टेक्नॉलॉजी के कई तरह के इस्तेमाल को भी इस कानून में जगह दी गई है, और सरकार उम्मीद करती है कि उससे भी सुबूत और दीगर चीजें तेज रफ्तार से आगे बढ़ेंगी। लेकिन ये नया कानून पहले से दर्ज और चल रहे मामलों पर लागू नहीं होगा, इसलिए आज अदालतों पर जो बोझ है, उस पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भारत के कानून में किसी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत सजा नहीं दी जा सकती जो जुर्म होने के समय अस्तित्व में नहीं था। कानून पिछली तारीख से लागू नहीं होता। भारत का नया अपराध-कानून भविष्य को सुधार सकता है, भूतकाल को नहीं। अब अलग-अलग अदालतों के जज पहले से चले आ रहे कानूनों के तहत उन्हें जो अधिकार हासिल हैं, उनका इस्तेमाल करके छोटे-मोटे मामलों का तेज रफ्तार निपटारा कर सकते हैं, वर्ना मौजूदा कानून अगले दस-बीस बरस तक अपना असर नहीं दिखा पाएगा, क्योंकि अदालतें मौजूदा मामलों के बोझ से अगले दस-बीस बरस आजाद नहीं हो पाएंगी। अब यही हो सकता है कि पहले से चले आ रहे मामलों को किस तरह जल्द से जल्द निपटाया जा सकता है, उसका रास्ता निकाला जाए। ऐसा लगता है कि भारत को अपना कानून सुधारने में बहुत ही गैरजरूरी लंबा वक्त लगा, और कई सरकारें आई-गईं, संसद कई कानूनों पर बहस करते रही, लेकिन सुधार हो नहीं पाया। भारत में लोक अदालतों का भी एक प्रावधान है जहां कई तरह के मामलों को तेजी से निपटाया जाता है, उनका इस्तेमाल करके भी मौजूदा बोझ घटाया जाना चाहिए।












