सरकार के एक सबसे बड़े औजार को उसके अमले ने बना लिया जुर्म का हथियार!

 31 अगस्त 2024

 यूपीए सरकार ने देश में जब आधार कार्ड शुरू किया, तो विपक्ष ने उसका जमकर विरोध किया था। लेकिन जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने, और उन्होंने आधार कार्ड के फायदों को सरकार में बैठकर देखा, तो हाल यह हो गया कि मोदी सरकार ने हर किस्म के सार्वजनिक और सरकारी काम में आधार कार्ड को अनिवार्य करने का ऐसा विस्तार किया कि सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर उसे बहुत से दायरों में रोकना पड़ा। अदालत ने कई ऐसे काम गिनाए जहां आधार कार्ड की अनिवार्यता की जरूरत नहीं थी, और सरकार उसके बावजूद लोगों को प्रोत्साहित करती रही, और ऐसा माहौल बनाती रही कि आधार कार्ड अनिवार्य है। इस बीच बैंक खातों को लेकर, किसी भी तरह के सरकारी कामकाज को लेकर कहीं आधार कार्ड, कहीं आयकर विभाग का जारी किया गया पैनकार्ड, और कहीं इन दोनों को एक-दूसरे से जोडऩा जरूरी किया जाता रहा, और अब हाल यह है कि इनके बिना मोबाइल का सिमकार्ड खरीदना भी मुमकिन नहीं है, या ट्रेन-प्लेन के रिजर्वेशन में भी जो जरूरी दस्तावेज लगते हैं, वे एक-दूसरे से इस तरह जोड़ दिए गए हैं कि सरकार पल भर में पांच-दस किसी भी तरह के पहचान पत्र में से किसी एक से भी किसी नागरिक के बाकी पहचान पत्र निकाल सकती है, और एक किस्म से पूरा देश सरकार की स्थाई निगरानी में आ चुका है। हम इसे फिलहाल सरकार द्वारा खुफिया निगरानी न मानकर इन पहचान पत्रों के इस्तेमाल से होने वाले फायदों को देख रहे हैं। इनकी वजह से यह जरूर है कि लोगों की नीजता खत्म होती है, लेकिन अगर लोग किसी जुर्म में शामिल नहीं हैं तो 99 फीसदी लोगों के लिए निजी कामकाज का इन दस्तावेजों से उजागर होना नुकसानदेह नहीं होता।

अब आज एक रिपोर्ट है कि किस तरह राजस्थान के एक जिले की 15 ग्राम पंचायतों के 6-7 सौ लोग अपने आधार कार्ड में फर्जीवाड़ा करके जवानी में ही उम्र को बुजुर्ग जितना दर्ज करवा चुके हैं, और हर महीने वृद्धावस्था पेंशन ले रहे हैं। कुल 15 ग्राम पंचायतों में पांच साल में करीब साढ़े 4 करोड़ की बुजुर्ग पेंशन इन नौजवानों ने पाई है। और शुरूआती जांच में यह पता लगा है कि जवानी में बूढ़े बनकर पेंशन पाने की यह जालसाजी राजस्थान में 15 साल से चल रही है। इसमें नीचे से ऊपर तक के अफसर-कर्मचारी शामिल हैं। हर पांच बरस में सत्ता पलटने वाले राजस्थान के इन 15 बरसों को देखें तो यह बात साफ है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों की सरकारें इस दौरान रही हैं, और ऐसा लगता है कि मंत्री-मुख्यमंत्री के आने-जाने से भ्रष्ट सरकारी मशीनरी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा, और इस तरह के हरामखोर नौजवान जनता के खजाने का पैसा धोखाधड़ी और जालसाजी से खाते रहे। जिस आधार कार्ड में उम्र की छेडख़ानी करके यह गबन किया गया, उसी आधार कार्ड की जांच से यह बड़ा व्यापक जुर्म पकड़ाया भी है। इसलिए ऐसा लगता है कि भारत में जहां पर सरकार को धोखा देना, नाजायज फायदे उठाना आम राष्ट्रीय संस्कृति है, वहां पर सभी तरह के दस्तावेजों की जांच से जुर्म पकड़े जाने चाहिए।

अभी मोदी सरकार देश भर में हर जमीन या संपत्ति का भी एक आधार कार्ड या ऐसा कोई परिचय पत्र बनाने की तरफ बढ़ रही है। आज भी जमीन-जायदाद की खरीदी-बिक्री में, कई दूसरे किस्म के सरकारी कामकाज में आधार कार्ड को शिनाख्त का मुखिया जरिया बनाया गया है, और इसकी वजह से कई किस्म की परंपरागत जालसाजी रूकी है, और लोगों ने जालसाजी की नई किस्मों को ढूंढा है। ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर आधार कार्ड, पैनकार्ड, ड्राइविंग लाईसेंस, मतदाता कार्ड, राशन कार्ड, क्रेडिट और डेबिट कार्ड, मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन इन सबको जोडऩे से सरकार किसी के बारे में कोई भी जानकारी पल भर में निकाल सकेगी। किस व्यक्ति ने किस जगह, किस होटल में ठहरकर, वहां के वाई-फाई का इस्तेमाल करते हुए, किस शॉपिंग वेबसाइट से, कौन से सामान खरीदे, और किस खाते से उनका भुगतान किया, ऐसी बहुत सी बातें चुटकी बजाते ही सरकारी एजेंसियों को मिल सकती हैं। हमारा ख्याल है कि लोगों के गैरसरकारी कामकाज की जानकारी निकालना सरकारी एजेंसियों के हाथ में तभी होना चाहिए, जब लोग किसी जुर्म में शामिल हों। आम लोगों की आम जिंदगी की जानकारी निकालने के खिलाफ सरकार को कड़े नियम बनाने चाहिए। देश में वैसे तो डाटा-सुरक्षा कानून बड़ा कड़ा बनाया गया है, लेकिन उसमें लोगों की निजी जिंदगी से संबंधित जानकारी को आपराधिक जांच के अलावा सुरक्षित रखने के स्पष्ट प्रावधान रहने चाहिए। आज लोगों की सेहत, उनके इलाज, उनकी खरीददारी, उनके किसी भी किस्म के भुगतान, या लेन-देन की जानकारी, इतनी सारी जगहों पर दर्ज होती है कि उनका बेजा इस्तेमाल करके न सिर्फ सरकार, बल्कि साइबर-घुसपैठिए भी लोगों को लूट सकते हैं, या ब्लैकमेल कर सकते हैं। अभी आए दिन अखबारों में रहता है कि किस तरह लोगों की बहुत सारी निजी जानकारी, जिनमें उनके आधार-पैनकार्ड के नंबर भी रहते हैं, उन्हें जुटाकर लोगों को किस तरह डिजिटल-बंधक बना दिया जा रहा है, और धोखा देकर लूटा जा रहा है। राजस्थान का यह मामला इससे ठीक उल्टा है जहां आम ग्रामीण नौजवानों ने एक ही मुजरिम-तरीका इस्तेमाल करके सरकार को लूटा है।

यह पूरी नौबत बताती है कि न सिर्फ आम जनता, बल्कि सरकार भी किस तरह डिजिटल-नाजुक बन चुकी हैं, और इससे पैदा होने वाले नुकसान के खतरों को भांपना सरकार के खुफिया और निगरानी तंत्र की एक बड़ी चुनौती है। सरकार को मुजरिमों के नजरिए से देखकर यह समझना होगा कि वे सरकारी इंतजाम को धोखा देकर किस तरह जनता को जुर्म का शिकार बना सकते हैं। राजस्थान की इस ताजा धोखेबाजी में शामिल सरकारी अमले को बड़ी कड़ी सजा देनी चाहिए, और यह मामला सरकार को इतने संगठित तरीके से धोखा देने का है, आम जनता को मुजरिम बना देने का है कि इसके लिए सरकारी अमले पर तो कम से कम उम्रकैद जैसा प्रावधान करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अगस्त 2024



 

रेप से मां बनती नाबालिग, अदालत से सरकार तक...

30 अगस्त 2024

 देश में जगह-जगह बीच-बीच में ऐसी खबरें आती हैं कि किसी नाबालिग लडक़ी, या बलात्कार की किसी बालिग शिकार को भी गर्भपात करवाने की जरूरत लगती हो, लेकिन गर्भ में भ्रूण की उम्र अधिक हो जाने से उसे भी जीवित माना जाता है, और इतने लंबे गर्भ के बाद गर्भपात को लडक़ी या महिला के लिए जान का खतरा भी मान लिया जाता है। ऐसे कई मामले अदालत, अस्पताल, और संबंधित लडक़ी या महिला के परिवार के बीच घूमते रहते हैं, और बलात्कार की शिकार को अनचाही संतान को जन्म देना होता है। ऐसा जन्म कोई छोटी जिम्मेदारी नहीं रहता है, वह उस बच्चे की पूरी परवरिश और उसके बालिग हो जाने के बाद तक की जिम्मेदारी रहता है, और बलात्कार की शिकार अमूमन गरीब परिवार की लडक़ी की क्षमता से परे के भी ऐसे मामले रहते हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अभी एक नाबालिग रेप-पीडि़ता का ऐसा ही मामला तय किया गया है जिसमें अदालत ने गर्भपात की इजाजत नहीं दी, और कहा कि बच्चे के जन्म के बाद परिवार चाहे तो सरकार को उसे गोद दे सकता है, और सरकार सभी किस्म के इंतजाम करेगी। 

भारत में बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला के लिए वैसे भी सरकार की तरफ से एक सहायता राशि का कानूनी इंतजाम है, और कुछ वक्त की देर से सही, वह रकम उन्हें मिलती है। लेकिन ऐसी कोई भी रकम एक अनचाही संतान की गुजर-बसर और उसकी जिंदगी के लिए काफी नहीं हो सकती। इसके कुछ अलग-अलग समाधान हो सकते हैं। एक तो समाधान छत्तीसगढ़ के ही एक दूसरे इलाके से आज ही सामने आया है, वहां पर सरकारी कानूनों की औपचारिकता पूरी करते हुए अमरीका से आए एक परिवार ने एक बच्चे को गोद लिया है, और उसे अच्छी जिंदगी मुहैया कराने के वायदे के साथ वे यहां से लौट रहे हैं। ऐसा समाधान नालियों और नालों में फेंके गए नवजात बच्चों की जिंदगी भी बचा सकता है, और सरकार की संस्थाएं अलग-अलग शहरों में ऐसे केन्द्र चला सकती हैं जहां पर लोग लगाए गए झूले पर बच्चे को छोडक़र और घंटी बजाकर चले जाएं ताकि वे सुरक्षित तरीके से भीतर ले जाए जा सकें। ऐसे केन्द्रों तक बच्चों को पहुंचाने वालों से उनकी शिनाख्त के सवाल भी नहीं होने चाहिए क्योंकि भारत में बच्चे गोद लेने वालों की इतनी लंबी कतार है कि बिना संतान वाले जोड़ों को बरसों तक इंतजार करना पड़ता है। और अब तो नियम कुछ अधिक सरल कर दिए गए हैं जिनमें अकेली महिलाएं भी बच्चे गोद ले सकती हैं, और इससे भी बच्चे पाने के पात्र लोगों की संख्या एकदम से बढ़ सकती है। इसलिए इतने दिलचस्प लोगों के रहते हुए किसी भी तरह से एक नवजात की जिंदगी को खत्म करना ठीक नहीं है। अब बलात्कार की शिकार लडक़ी तो एक शारीरिक और मानसिक यातना से गुजरी हुई रहती ही है, और ऐसे में उसकी संतान बिना किसी पहचान के सरकार अगर किसी सक्षम परिवार को गोद दे सके, तो इससे सभी पक्षों को मदद मिलती है। 

एक दूसरा इलाज हम बरसों से सुझाते आ रहे हैं। हमारा मानना है कि बलात्कारी को सिर्फ कैद मिल जाने से इंसाफ नहीं होता। जब बलात्कार पूरी तरह से साबित हो जाता है तो बलात्कारी की संपत्ति का एक हिस्सा उसके हिंसक सेक्स-हमले की शिकार लडक़ी या महिला को मिलना चाहिए। यह हिस्सा बलात्कारी की अपनी संतानों, या उसकी पत्नी के हिस्से आने वाली संपत्ति जितना होना चाहिए। अगर बलात्कारी शादीशुदा नहीं है, तो उसे अपने परिवार से मिलने वाली संपत्ति में से एक हिस्सा अदालत में जमा करवाने की शर्त रहनी चाहिए। यह तो बलात्कार की शिकार लडक़ी का मुआवजा हुआ, अगर इससे कोई संतान होती है, तो बलात्कारी पर यह कानूनी जिम्मेदारी भी आनी चाहिए कि वह अपने खुद के हो चुके, या होने वाले बच्चों के कानूनी हक के बराबर का हक उस संतान के लिए दे। यह होने पर बलात्कारी की संपत्ति के एक हिस्से का इस्तेमाल कानूनी जरिए से बलात्कार की शिकार के लिए हो सकेगा, वरना सिर्फ कैद तो कोई सजा होती नहीं। हम इस बारे में इसी कॉलम में पहले भी कई बार कह चुके हैं कि बलात्कार की सजा के कानून में संपत्ति के बंटवारे का प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए। जब तक बलात्कारी को आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचेगा, और उसकी हिंसा के शिकार को यह मिल नहीं सकेगा, तब तक इंसाफ पूरा नहीं हो सकेगा। ऐसा ही प्रावधान हत्या और कुछ दूसरे अपराधों में भी जोड़ा जाना चाहिए, ताकि अगर कातिल सक्षम रहे, तो मृतक परिवार को उसकी संपत्ति का एक हिस्सा मिल सके। भारत के कानून में यह मानवीय सोच जोडऩी होगी कि कैद से मुजरिम को तो सजा मिल जाती है, जुर्म के शिकार परिवार को कोई मुआवजा नहीं मिलता। 

एक वक्त अनचाहे बच्चों को छोडऩे के लिए कुछ तरह के आश्रम चलते थे, और मदर टेरेसा की संस्था का भी एक ऐसा आश्रम देश के कई शहरों में था। लेकिन अभी सीसीटीवी कैमरों की निगरानी से लोग सहमे रहते हैं, और सरकार को कानून बनाकर यह गारंटी देनी चाहिए कि अनचाहे बच्चों को किसी सुरक्षित केन्द्र तक पहुंचाने वाले लोगों की न तो किसी तरह की रिकॉर्डिंग की जाए, न शिनाख्त पूछी जाएगी, और न ही इसे किसी तरह की कानूनी कार्रवाई में लिया जाएगा। इसे पूरी तरह एक नवजात जिंदगी को बचाने का काम माना जाएगा, और इस पर सजा नहीं, किसी पुरस्कार का प्रावधान हो सकता है। नवजात बच्चों की मां भी अगर उन्हें ऐसे केन्द्र पर ले जाकर छोड़े, तो उसके लिए भी एक सहायता राशि का प्रावधान करना चाहिए जो कि कानूनी रूप से शिनाख्त छुपाए रखने वाला हो, जैसे कि बलात्कार की शिकार महिलाओं के नाम उजागर नहीं हो सकते, कानून तोडऩे वाले नाबालिगों के नाम उजागर नहीं हो सकते। देश की नवजात संतानें नालों और घूरों पर जिंदा या मुर्दा मिलें, यह देश के लिए बड़ी शर्मिंदगी की बात है। दूसरी तरफ देश में बच्चे चाहने वाले लोगों की प्रतीक्षा सूची बहुत ही लंबी है। पिछले बरस के कुछ आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर बरस साढ़े 3-4 हजार बच्चे गोद जाने के लिए उपलब्ध रहते हैं, और करीब 30 हजार दंपत्तियां गोद लेने की कतार में हैं। इस तरह बच्चा पाने का औसत इंतजार तीन साल से ज्यादा का है। इस पर पिछले बरस देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ ने सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी से पूछा था कि वह बच्चों के गोद लेने में इतने अड़ंगे क्यों लगाती है। अदालत इस बात पर हैरान थी कि इस कानूनी संस्था ने पूरी दत्तक प्रक्रिया को नियमों में उलझाकर रखा है, और दूसरी तरफ अनाथाश्रमों में बच्चे बिना परिवारों के पड़े हैं। 

बलात्कार से गर्भवती होने, बच्चे पैदा होने की समस्या के कई पहलुओं में बच्चों को गोद देने की समस्या, या उसे समाधान कहें, भी शामिल है इसलिए हमने इस पूरे मामले से जुड़े हुए तमाम पहलुओं पर यहां बात की है। देखें अदालतें, और सरकारें, संसद, और जनता क्या करते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अगस्त 2024



 

रेप पर द्रौपदी मुर्मू का दर्द बहुत जायज, पर सवा साल देर से...

  29 अगस्त 2024

 राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कोलकाता में एक महिला चिकित्सा छात्रा के साथ बलात्कार और उसकी हत्या पर एक लेख में कहा है कि एक डॉक्टर के साथ बलात्कार, और उसकी हत्या ने देश को सकते में डाल दिया है। ‘जब मैंने यह खबर सुनी, तो मैं बुरी तरह स्तब्ध और व्यथित हो गई। सबसे अधिक हताश करने वाली बात यह है कि ये केवल एक अकेला मामला नहीं है, यह महिलाओं के खिलाफ अपराधों की कड़ी का एक हिस्सा है।’ इसके बाद द्रौपदी मुर्मू ने देश की राजधानी में निर्भया के साथ हुई त्रासदी का भी जिक्र किया है, और देश में जगह-जगह महिलाओं और छोटी-छोटी बच्चियों पर हो रहे बलात्कार के बारे में भी लिखा है। राष्ट्रपति बार-बार किसी मुद्दे पर लिखते हों ऐसा भी याद नहीं पड़ता है, और द्रौपदी मुर्मू ने इस खास लेख में देश में महिलाओं की खतरनाक हालत के बारे में बहुत कुछ लिखा है। राष्ट्रपति एक महिला होने के अलावा आदिवासी भी हैं, और ये दोनों ही तबके आज देश में खासे खतरे में हैं, इसलिए हम उनकी फिक्र को जायज समझते हैं, और जरूरी भी। हम उनके लिखे हुए से सहमत भी हैं। लेकिन मन में एक सवाल और उठ खड़ा होता है। 

मणिपुर में 4 मई 2023 को भडक़े दंगों के बाद वहां आदिवासियों पर जुल्म की भयानक तस्वीरें सामने आई थीं। आदिवासियों और वहां के सवर्ण मैतेई समुदाय के बीच भयानक हिंसा हुई थी जिसमें शायद 60 हजार कुकी और दूसरे आदिवासियों को अपना घर-बार, गांव-कस्बा छोडक़र चले जाना पड़ा था। डेढ़-दो सौ लोगों की मौत हुई थी, बड़ी संख्या में आगजनी हुई थी, लेकिन जिस घटना ने पूरी दुनिया को हिला दिया था, वह दो आदिवासी महिलाओं को सारे कपड़े उतारकर एक जुलूस में नंगे बदन, बदन से खिलवाड़ करते हुए, और बाद में शायद उनसे गैंगरेप करना, और उनको मार डालना जैसी घटनाएं हुई थीं। जब इसका वीडियो सामने आया, और सुप्रीम कोर्ट ने खुद होकर उसका नोटिस लिया, तब जिस दिन सुप्रीम कोर्ट से इस पर आदेश होना था उसी सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार इस पर मुंह खोला था, और इसे पूरे देश की शर्मिंदगी का मौका बताया था। अब बाकी देश तो मणिपुर के हालात के लिए जवाबदेह नहीं था क्योंकि यह लड़ाई दूसरे प्रदेश के लोगों से नहीं थी, और सिर्फ वहां के भाजपा-मुख्यमंत्री बीरेन सिंह, और केन्द्र की भाजपा अगुवाई वाली मोदी सरकार ही मणिपुर के लिए जिम्मेदार थे। इसलिए बाकी देश की शर्मिंदगी की बात भी कुछ तर्कसंगत और न्यायसंगत नहीं थी। लेकिन उस वक्त तक भी ऐसी कोई खबर नहीं आई कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मणिपुर में महिलाओं के साथ ऐसे सुलूक और वहां के बाकी हालात को लेकर प्रधानमंत्री को बुलाकर कोई चर्चा किए हों, जो कि न सिर्फ अधिकार था, बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी थी। इसी मणिपुर में अपने बुरी तरह से जख्मी बच्चे को लेकर अस्पताल जा रही महिला को मैतेई भीड़ ने एम्बुलेंस सहित जलाकर मार डाला था। इस पर भी राष्ट्रपति का कोई लेख हमें याद नहीं पड़ता, और न ही अफसोस का कोई बयान उन्होंने दिया हो ऐसा दिखता है। मणिपुर साल भर जलते रहा, देश के तमाम संविधान विशेषज्ञ यह कहते रहे कि वहां की सरकार भंग करने का मौका है, और उसकी जरूरत है, लेकिन एक आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का मुंह भी नहीं खुला था, और अभी जब उन्होंने कोलकाता के एक बलात्कार और कत्ल को संदर्भ बनाकर यह असाधारण लेख लिखा है, तो भी इसमें मणिपुर का दर्द नहीं छलक रहा है। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने मणिपुर पर लिखते हुए, और अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल, पर बोलते हुए कई बार मोदी और द्रौपदी मुर्मू के मौन पर कई बार कहा था। अब ऐसे में यह लगता है कि मणिपुर जैसे जलते हुए मुद्दे पर, जहां पर दो समुदायों के बीच व्यापक हिंसा चल रही थी, जहां पर आदिवासी समुदाय पर ऐतिहासिक जुल्म हो रहा था, जहां पर आदिवासी महिलाओं की रेप-परेड निकाली जा रही थी, वहां पर द्रौपदी मुर्मू को निर्भयाकांड के दस-ग्यारह बरस हो जाने के बाद ऐसा कोई लेख लिखना नहीं सूझा। अब हम मणिपुर की व्यापक हिंसा के साथ अगर पश्चिम बंगाल की इस ताजा दर्दनाक और अमानवीय घटना की तुलना करें, तो कोलकाता के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक चिकित्सा छात्रा के साथ एक या उससे अधिक कुछ लोगों ने बंद कमरे में बलात्कार किया, और उसे मार डाला। यह घटना भयानक थी, लेकिन क्या यह घटना मणिपुर से अधिक भयानक थी? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि हम एक बलात्कार की दूसरे बलात्कार से तुलना नहीं कर रहे, बल्कि हम देश के व्यापक हालात पर देश की राष्ट्रपति, एक महिला, एक आदिवासी की व्यापक फिक्र की जरूरत, और उसके वक्त का अंदाज लगाने की कोशिश कर रहे हैं। बंगाल की ममता सरकार इस ताजा रेप-हत्या पर बहुत बुरी तरह घिरी हुई है, और सरकार की अनदेखी, सत्ता की गिरोहबंदी, सरकार की लापरवाही, और नालायकी सबको लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश खुद सवाल कर रहे हैं। यह सब कुछ कोलकाता की घटना के दो हफ्ते के भीतर हो चुका है, और तीन हफ्ते पूरे होने के पहले द्रौपदी मुर्मू का यह लेख भी सामने आ चुका है। हम सिर्फ यह याद करने की कोशिश कर रहे हैं कि मणिपुर की व्यापक हिंसा, वहां पर संवैधानिक असफलता, वहां निर्वाचित सरकार पर तोहमतें और जनता का अविश्वास सब देखते हुए क्या राष्ट्रपति की उस वक्त यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वे प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृहमंत्री, मणिपुर के मुख्यमंत्री को बुलाकर जवाब-तलब करतीं, जो कि उनका न सिर्फ अधिकार था, बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी थी। इस पर लिखते हुए हमें याद पड़ता है कि उस वक्त मणिपुर की राज्यपाल रहीं अनुसुइया उइके ने राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के रूख को लेकर अपनी गहरी निराशा औपचारिक रूप से जाहिर की थी, और यह भी जाहिर है कि उसके बाद उनका राज्यपाल का कार्यकाल बढ़ाया नहीं गया। 

हमें यह समझने में दिक्कत हो रही है कि मणिपुर में असाधारण और ऐतिहासिक हिंसा के उस दौर के सवा साल बाद आज द्रौपदी मुर्मू को अचानक बंगाल के इस बलात्कार-हत्या मामले को लेकर लेख लिखने की कैसे सूझी, और इतने वक्त तक मणिपुर की उन महिलाओं के वीडियो देखते हुए उन्हें क्या लगा था? हमने पहले भी कई बार इस पर लिखा था कि जिस समुदाय से निकलकर लोग ऊपर पहुंचते हैं, उस समुदाय के हितों को वे भूल जाते हैं। कोलकाता के मामले को तो पूरा देश और पूरी दुनिया सभी उठा रहे हैं, कोलकाता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने कितनी बार इसकी सुनवाई कर चुके हैं, लेकिन मणिपुर शायद भारतीय लोकतंत्र की मूलधारा से उसी तरह किनारे पड़े रहा, जिस तरह बाकी हिन्दुस्तान उत्तर-पूर्वी राज्यों को इस अंदाज में नार्थ-ईस्ट कहता है कि मानो वह कोई दूसरा देश हो। 

हिन्दुस्तान के लोकतंत्र का इतिहास द्रौपदी मुर्मू के इस ताजा दर्द को अच्छी तरह दर्ज कर रहा है, लेकिन मणिपुर पर उनकी चुप्पी इतिहास के पन्नों से हमेशा ही चीख-चीखकर बोलती रहेगी। ऐसे में लगता है कि क्या द्रौपदी मुर्मू अपने को राष्ट्रपति बनाने वाली मोदी सरकार को नापसंद ममता सरकार को घेरने के लिए इस वक्त पर ऐसा लेख लिख रही हैं? यह सवाल किसी बुलबुले की तरह आसानी से बैठने वाला नहीं है, यह सीना तानकर खड़े रहेगा, और जब द्रौपदी मुर्मू का मुंह खुलेगा, उनकी कलम चलेगी, तब-तब वह उनकी चुप्पी के बारे में पूछेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अगस्त 2024


 

असम में उग्र क्षेत्रवाद भडक़ाना तो आसान है, काबू बड़ा मुश्किल होगा

  28 अगस्त 2024

 असम में बलात्कार की कुछ अलग-अलग घटनाओं में गैरअसमी मुसलमान या हिन्दीभाषी गैरअसमी कोई बाहरी व्यक्ति आरोपों से घिरे मिले हैं, और नतीजा यह है कि प्रदेश में जगह-जगह क्षेत्रवाद पर काम करने वाले संगठन बाहरी मुस्लिमों और हिन्दीभाषी दोनों के खिलाफ बड़ी मुहिम छेड़े हुए हैं कि उन्हें बाहर निकाला जाए। कई जिलों में उन्हें दो-चार दिनों का समय दिया गया है कि छोडक़र निकल जाएं। इनमें असम के स्थानीय मुस्लिम संगठन भी सक्रिय हो गए हैं। राज्य सरकार ऐसा सामुदायिक तनाव फैलाने वाले दो दर्जन से अधिक संगठनों को पहचान कर उन्हें नोटिस भेज रही है, लेकिन कुल मिलाकर प्रदेश एक नए तनाव का केन्द्र बन रहा है। यह समझने की जरूरत है कि यहां भाजपा के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के कुछ बयानों के बाद यह ताजा तनाव खड़ा हुआ है। सरमा ने हाल ही में कहा था कि लोकसभा चुनाव में जहां-जहां कांग्रेस के वोट बढ़े, वहां एक विशेष समुदाय का हौसला इतना बढ़ गया है कि वो अपना दबदबा बढ़ाने के चक्कर में हैं, और हिन्दू महिलाओं पर अत्याचार इसी का नतीजा है। वे पहले भी कह चुके हैं कि असम को मियांभूमि नहीं बनने देंगे। असम में गैरअसमी मुसलमानों को मियां कहा जाता है, और भाजपा में आने के बाद से सीएम सरमा का इतिहास इसी तरह के बहुत ही भडक़ाऊ बयानों से भरा हुआ है। 

अब हम असम की स्थानीय बारीकियों में गए बिना अगर यह देखें कि ऐसे तनाव का क्या नतीजा होगा, तो एक भयानक तस्वीर बनती है। अगर असम से हिन्दीभाषी लोगों को, जिनमें बहुतायत हिन्दुओं की है, उन्हें अगर भगाया जाता है, उनके खिलाफ सामाजिक तनाव खड़ा किया जाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया तो बाकी देश में भी होगी। आज वहां पर मारवाड़ी समुदाय के एक-दो लोगों पर लड़कियों को छेडऩे का आरोप लगा तो कुछ जगहों पर इस समुदाय को बाहरी करार देते हुए पूरे मारवाड़ी समाज को घुटनों पर खड़ा करके माफी मंगवाई गई थी। उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में उग्र स्थानीय क्षेत्रवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन बाहर से पहुंचकर असम में कारोबार करने वाले, या दूसरे काम करने वाले हिन्दीभाषी लोगों को अगर वहां से इस तरह बाहर निकाला जाएगा, तो ये जिन प्रदेशों के लोग हैं, वहां के गिने-चुने असमिया लोगों को कैसी प्रतिक्रिया झेलनी पड़ेगी? 

हमने पिछले बरसों में मुम्बई में यूपी और बिहार के लोगों के खिलाफ शिवसेना और राज ठाकरे के आक्रामक तेवर देखे थे, और उनके हमले देखे थे। बाद में जब शिवसेना की राजनीतिक और चुनावी भागीदारी कांग्रेस और एनसीपी से हुई, तो शिवसेना का नजरिया व्यापक हुआ, और उसने संकीर्णता छोड़ी। अब शिवसेना के किसी आव्हान में यूपी-बिहार के खिलाफ हमलावर बात नहीं होती है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले कर्नाटक में भाजपा का शासन रहते हुए वहां से उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों के खिलाफ इतना तनाव खड़ा किया गया था, कि पूरी ट्रेनें भर-भरकर उत्तर-पूर्व के लोग लौट गए थे। एक प्रदेश के लोगों के खिलाफ दूसरे प्रदेश में, या किसी एक धर्म या भाषा के लोगों के खिलाफ किसी प्रदेश में ऐसी आक्रामकता भारतीय संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है। जब देश में राष्ट्रवादी उन्माद की हवा फैलाई जाती है, तो वह लोगों की दिमागी हालत ऐसी कर देती है कि वे राष्ट्रवाद के साथ-साथ क्षेत्रवाद के उन्माद से भी भर जाते हैं। असम में आज ऐसा ही नजारा देखने मिल रहा है। 

लेकिन क्षेत्रवाद के खतरे किस तरह के होते हैं इसकी एक भयानक मिसाल असम के इस चुनाव के साथ-साथ ही इन्हीं दिनों में पाकिस्तान में देखने मिल रही है, जहां पर बलूचिस्तान के इलाके में पहले तो वहां के स्थानीय लोगों ने बसों, और दूसरी गाडिय़ों को रोककर दूसरे प्रांत पंजाब के लोगों को नीचे उतारकर, उनके पहचान पत्र देख-देखकर, गोली मारी, और एक दिन में दर्जनों लोगों को मार डाला। इसके खिलाफ जब पाकिस्तान सरकार ने सैनिक कार्रवाई चालू की, तो बलूचिस्तान के हथियारबंद संगठनों ने बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों को भी मार डाला। अगर आंकड़े सही हैं, तो पिछले बीस घंटों में 130 सैनिकों को मारने का दावा भी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने किया है। बलूचिस्तान का यह पूरा का पूरा आंदोलन पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों के भीतर अपने क्षेत्रीय हित को अलग से ढूंढने का है, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि आज की तारीख में बलूचिस्तान का इलाका एक किस्म से पाकिस्तान की सरकार के काबू के बाहर हो चुका है। 

कुछ लोगों को इन दो स्थितियों की हमारी तुलना अटपटी लग सकती है, लेकिन यह बात समझने की जरूरत है कि जब सामाजिक और राजनीतिक तनाव और टकराव बढ़ाया जाता है, तो उसे बाद में हर बार रोक पाना मुमकिन नहीं रहता है। असम में मुख्यमंत्री सरमा के बयान राज्य के भीतर एक बड़ा विभाजन करने वाले हैं। हो सकता है कि उन्हें और उनकी पार्टी बीजेपी को इसमें चुनावी फायदा दिखता हो, लेकिन समाज में इतनी गहरी खाई खोद देना ठीक नहीं है। भारत एक बड़ा देश है जिसमें विविधताओं का ताना-बाना देश को बांधकर रखता है। किसी एक धर्म, एक जाति, एक प्रादेशिकता के भरोसे यह ताना-बाना नहीं चल सकता। असम के आज के खतरे जल्द से जल्द काबू में लाए जाएं वही ठीक है, वरना अभी उत्तर-पूर्व का मणिपुर भारत के लिए एक बड़ी शर्मिंदगी की जगह बना हुआ है, और वहां पर साल भर से अधिक हो चुका है कि किसी भी तरह से लोकतंत्र दुबारा कायम करना मुमकिन नहीं हो पाया है। हमारे कम लिखे अधिक समझा जाए, और असम या किसी भी दूसरे राज्य में ऐसा नफरती विभाजन खड़ा न किया जाए। पता नहीं संविधान की शपथ लेने वाला एक मुख्यमंत्री ऐसा कर कैसे सकता है। या तो फिर इस देश में संविधान की शपथ बंद ही कर देना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)


मेटा और टेलीग्राम की मिसालें, और भारत...

     27 अगस्त 2024

 अमरीकी पार्लियामेंट की एक न्यायिक कमेटी फेसबुक के बहुत से मामलों की जांच कर रही है, इसमें यह भी शामिल है कि क्या यह कंपनी अपने कम्प्यूटरों से फेसबुक पर किसी सामग्री की पहुंच को कम या ज्यादा करती है। इस कमेटी को अभी फेसबुक, इंस्टाग्राम, और वॉट्सऐप की कंपनी, मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने एक चिट्ठी लिखी है जिसमें उन्होंने अपनी कंपनी पर राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार की तरफ से आए हुए कुछ दबावों का जिक्र किया है, और कहा है कि उन्हें इस बात का अफसोस है कि इन दबावों के खिलाफ उन्हें जितना मुखर होना था, वे नहीं हो पाए थे। मार्क जुकरबर्ग ने यह खुलासा किया है कि 2021 में अमरीकी राष्ट्रपति भवन के अफसरों ने महीनों तक कोविड-19 से संबंधित सामग्री को सेंसर करने के लिए दबाव डाला जिसमें कटाक्ष और व्यंग्य से संबंधित सामग्री भी शामिल थी। चिट्ठी में लिखा गया है कि जब मेटा इस सेंसर पर सहमत नहीं हुई, तो अफसरों ने मेटा के रूख पर अफसोस जाहिर किया था। मार्क जुकरबर्ग ने लिखा कि ये फैसला उनकी कंपनी का ही था कि सामग्री को हटाना है या नहीं, हटाने का यह काम सरकार नहीं कर सकती थी, लेकिन कोरोना से संबंधित पोस्ट हटाने को लेकर कंपनी पर बार-बार दबाव आया। लेकिन मार्क जुकरबर्ग का यह भी कहना है कि कोरोना जैसी महामारी से संबंधित सेंसर या सुझाव से परे राष्ट्रपति बाइडन के बेटे के भ्रष्टाचार के एक मामले को लेकर भी अमरीका की केन्द्रीय जांच एजेंसी, एफबीआई ने 2020 के चुनाव के पहले मेटा को आगाह किया था। न्यूयॉर्क पोस्ट ने बाइडन के बेटे के भ्रष्टाचार के आरोपों पर एक रिपोर्ट तैयार की थी, और एफबीआई ने इसे रूसी दुष्प्रचार बताते हुए फेसबुक से कहा था कि इस समाचार पर फैक्ट चेक की नोटिस लगाई जानी चाहिए। चिट्ठी में आगे लिखा गया है कि इस समाचार को फेसबुक पर डिमोट कर दिया गया, और यह बहुत से लोगों तक नहीं पहुंच पाया था, जबकि यह रूसी दुष्प्रचार नहीं था। यह बात मार्क जुकरबर्ग 2022 में भी एक बार मान चुके हैं कि मेटा ने बाइडन से जुड़ी कुछ सामग्री फेसबुक पर दबा दी थी, और फेसबुक के कम्प्यूटर-प्रोग्राम के जरिए हंटर बाइडन की खबर को एक हफ्ते के लिए सेंसर कर दिया था। अब अमरीका की प्रमुख विपक्षी पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ने मार्क जुकरबर्ग की इस चिट्ठी को लेकर राष्ट्रपति बाइडन को घेरा है, और कहा है कि राष्ट्रपति के परिवार के लिए एक सोशल मीडिया कंपनी पर दबाव डालकर खबरों को सेंसर करवाया गया। 

अब हम इससे बिल्कुल अलग एक दूसरी खबर पर चलते हैं। दुनिया में एक सबसे लोकप्रिय मैसेंजर सर्विस, टेलीग्राम के संस्थापक और मुखिया पावेल डुरोव को दो दिन पहले फ्रांस में गिरफ्तार कर लिया गया, उन पर यह आरोप है कि टेलीग्राम पर लगातार नशे के कारोबारियों, और दूसरे किस्म के संगठित अपराध करने वाले गिरोहों को काम करने की छूट दी गई, और उनके संदेशों और पोस्ट पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई गई। टेलीग्राम पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि उस पर नफरत फैलाने वाले समूहों का कारोबार चलते रहता है, बच्चों की पोर्नोग्राफी की सामग्री पोस्ट की जाती है, और कंपनी इन सबको रोकने के लिए कोई कोशिश नहीं करती है। टेलीग्राम का कहना है कि उसकी नीति है कि लोगों को अधिक से अधिक आजादी मिलनी चाहिए, और इसलिए वे अपनी मैसेंजर सर्विस पर संदेशों पर अधिक रोक-टोक नहीं लगाते। 

अब ये दोनों मामले अलग-अलग कंपनियों के हैं, लेकिन इन दोनों में एक बात एक सरीखी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा इन दोनों में उठा है। मेटा का पूरा कारोबार अमरीका से चलता है, इसलिए उसे अमरीकी सरकार के कुछ सुझाव मानना ठीक लगा होगा। वैसे भी कोरोना से संबंधित मामलों को लेकर दुनिया भर की सरकारों ने यह सावधानी बरती थी कि लोगों तक अवैज्ञानिक बातें न पहुंचे। ऐसी महामारी के मामले में कोई भी सरकार यह सोच सकती है कि व्यंग्य या कटाक्ष भी लोगों में गलतफहमी फैला सकते हैं, भारत में हमने ऐसा देखा हुआ भी है। इसलिए अगर अमरीकी सरकार ने कोरोना से संबंधित कुछ सामग्री को सेंसर करने के लिए मार्क जुकरबर्ग पर दबाव डाला था, तो उसे समझा जा सकता है। लेकिन कंपनी ने खुद ही साफ किया है कि इस दबाव पर क्या फैसला लेना है, यह कंपनी के हाथ में था। ऐसा भी नहीं है कि सरकार की बात न सुनने पर कंपनी पर छापे पड़ गए हों, टैक्स एजेंसियां कंपनी में घुस गई हों, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मार्क जुकरबर्ग की चिट्ठी का सबसे गंभीर हिस्सा यही है कि उसे कुछ खबरों को सेंसर करने की सलाह दी गई। 2020 के चुनाव में जो बाइडन राष्ट्रपति बने नहीं थे, और अगर उनके बेटे से जुड़ी कुछ खबरों को वहां की जांच एजेंसी एफबीआई ने रूसी प्रचार तंत्र का काम माना था, तो वह एफबीआई बाइडन के तहत काम नहीं कर रही थी, वह उस वक्त के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के तहत काम कर रही थी, और उस वक्त यह बड़ा मुद्दा उठा था कि रूसी दिलचस्पी बाइडन को हराने में थी, और अमरीकी चुनाव प्रचार में रूसी ताकतें ट्रंप के लिए काम कर रही थीं। इस तरह यह बात साफ है कि बाइडन सरकार के जिस दबाव की चर्चा मेटा कर रहा है, वह सिर्फ कोरोना से जुड़ी हुई बातें थीं। 

फ्रांस ने अगर टेलीग्राम के संस्थापक को गिरफ्तार किया है, तो उसका यह आरोप है कि इस प्लेटफॉर्म पर लगातार संगठित अपराध का कारोबार चल रहा था, और कंपनी उसे रोकने के लिए लगभग कुछ भी नहीं कर रही थी। लेकिन अब हिन्दुस्तान में भी यह खलबली मची है कि क्या टेलीग्राम पर भारत में भी रोक लगाई जानी चाहिए? मेटा की मैसेंजर सर्विस वॉट्सऐप, और टेलीग्राम दोनों पर ही जो संदेश आते-जाते हैं, ग्रुप में जो बातें पोस्ट होती हैं, उन पर सरकार की कोई पहुंच नहीं रहती। मेटा ने तो कुछ अरसा पहले यह भी खुलासा कर दिया है कि अगर भारत सरकार वॉट्सऐप पर अपनी दखल चाहेगी, तो कंपनी भारत में काम ही बंद कर देगी। इसलिए फ्रांस और अमरीका की मिसालें भारत में टेलीग्राम पर रोक का आधार तो बता सकती हैं, लेकिन साथ-साथ फेसबुक, वॉट्सऐप, और इंस्टाग्राम पर भारत में रोक की कोई वजह अब तक नहीं बता रहीं। भारत में संगठित अपराध की ऐसी कोई तोहमत इन दोनों ही कंपनियों पर नहीं लगाई है, और सिर्फ समाचार-विचार की सेंसरशिप के लिए ऐसा करना एक अलग बवाल खड़ा करेगा। यहां इस बात को समझने की जरूरत है कि अमरीका में बसी हुई कंपनी जब राष्ट्रपति-कार्यालय के दखल के खिलाफ संसदीय कमेटी को चिट्ठी लिखकर सब बता सकती है, तो भारत में भी अगर सरकार की तरफ से कोई दबाव पड़ेगा, तो उसकी जानकारी भी आगे-पीछे यह कंपनी सार्वजनिक कर सकती है। 

किसी देश में जनहित में, या राष्ट्र के हित में क्या सेंसर किया जा सकता है, क्या रोका जा सकता है, यह उस देश के कानून, और वहां की लोकतांत्रिक परंपराओं पर निर्भर करता है। भारत में आपातकाल में सेंसरशिप लगाना कांग्रेस को कितना भारी पड़ा था, यह भी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। आज के भारत में सरकार का ऐसा करना आसान भी नहीं होगा, और वह शायद अदालत में आसानी से खड़ा भी नहीं हो पाएगा। लेकिन फ्रांस और अमरीका की इन मिसालों को भारत में सरकार के लोग गौर से देख जरूर रहे होंगे, देखें आगे-आगे होता है क्या...

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2024


 

नशे के कारोबार के कई पहलू, तुरंत कार्रवाई हो

    26 अगस्त 2024

 छत्तीसगढ़ में नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के जोनल ऑफिस का उद्घाटन करते हुए कल केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि इस राज्य में नशीली दवाओं की खपत राष्ट्रीय औसत से अधिक है, और गांजे की खपत भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि इसे पूरी तरह रोकने की जरूरत है, और यह हिन्दुस्तान से परे एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है। छत्तीसगढ़ में हर दिन कई जिलों से खबरें आती हैं कि वहां की पुलिस ने कितना गांजा पकड़ा, गाडिय़ां जब्त कीं, और कितने लोगों को गिरफ्तार किया। ओडिशा और आन्ध्र से हिन्दुस्तान के बहुत बड़े हिस्से के लिए गांजा छत्तीसगढ़ से होकर गुजरता है, और इन राज्यों की सरहद पर छत्तीसगढ़ के जो जिले हैं, वहां की पुलिस के लिए यह रोज की बात रहती है। नशे के मामले में गांजे की जगह देश में शराब के तुरंत बाद है क्योंकि मंदिरों और मठों में, तीर्थों और चौपालों में गांजा पीना सामाजिक मान्यताप्राप्त है। इसे बहुत से लोग हिन्दू धर्म से जुड़ा हुआ एक संस्कार भी मान लेते हैं, और इसे शराब के मुकाबले कम खतरनाक नशा भी माना जाता है। इस तरह छत्तीसगढ़ देश के आधा दर्जन राज्यों के बीच गांजे के कॉरीडोर की तरह भी काम करता है, और दवा कारखानों में बनने वाली नशे की गोलियों, और तरह-तरह से नशा देने वाले कफसिरप की अवैध बिक्री का रास्ता भी छत्तीसगढ़ से होकर है। इसलिए एनसीबी का जोनल ऑफिस यहां खुलने से हो सकता है कि कार्रवाई कुछ तेज हो सके।

अब हम दूसरी कुछ खबरों को इस खबर से जोडक़र देखना चाहते हैं। अभी-अभी यह रिपोर्ट भी सामने आई है कि देश के किस प्रदेश में शराब की कितनी खपत है। एक प्रमुख सर्वे संस्था सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में प्रति व्यक्ति शराब की खपत देश में चौथे नंबर पर है। और इससे ऊपर तीन संपन्न राज्य हैं, आन्ध्र, तेलंगाना, और पंजाब। इनके तुरंत बाद छत्तीसगढ़ जैसा राज्य आता है जहां से ऊपर के इन तीनों राज्यों में लोग मजदूरी करने जाते हैं, और बेहतर मजदूरी पाते हैं। इसलिए यह कम फिक्र की बात नहीं है कि मजदूरों वाले छत्तीसगढ़ में शराब की खपत देश में चौथे नंबर पर है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि इस राज्य की एक तिहाई आबादी आदिवासियों की है, और आदिवासियों को उनके अपने इलाकों में अपनी खपत के लिए घर पर शराब बनाने की छूट है। फिर जब कोई आदिवासी अपने लिए शराब बनाते हैं तो अपने साथ-साथ कुछ और लोगों को भी बेचने के लिए बना लेते हैं, और राज्य के आदिवासी इलाकों में पुलिस तकरीबन रोजाना ही घर पर बनाकर बेची जा रही अवैध शराब भी पकड़ती है। इसके आंकड़े प्रदेश में शराब की खपत में शामिल नहीं है, क्योंकि इनकी कहीं गिनती नहीं होती है। साथ-साथ यह भी है कि छत्तीसगढ़ में अपने शराब कारखानों और अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के शराब कारखानों से बनकर आती हुई दो नंबर की शराब का एक बड़ा बाजार है, और पुलिस की कार्रवाई में कई बार दूसरे प्रदेशों की शराब भी बड़ी-बड़ी, और महंगी गाडिय़ों में लाई जाती जब्त होती है।

अब हम छत्तीसगढ़ के हर शहर-कस्बे, और गांवों से हर दिन दर्जनों की संख्या में आती हुई उन खबरों को देखना चाहते हैं जिनमें शराब और दूसरे नशे की वजह से बड़ी हिंसा होती है। कई बार तो यह हिंसा पूरी तरह अविश्वसनीय लगती है, और कहीं मां-बाप मिलकर नशेड़ी औलाद को मार डाल रहे हैं, तो कहीं बीवी-बच्चे मिलकर नशेड़ी पति/बाप को खत्म कर दे रहे हैं। कई मामलों में पत्नियों ने नशेड़ी पति को खुद भी मारा है, और कहीं-कहीं प्रेमी के साथ मिलकर, तो कहीं भाड़े के हत्यारे को तैनात करके भी कत्ल करवाया है। परिवार के भीतर नशे में हिंसा की अंधाधुंध वारदातें हो रही हैं, और जब यह हिंसा पुलिस तक पहुंचती है, तो ही बात सामने आती है। परिवारों के भीतर बलात्कार और सेक्स-शोषण के अनगिनत मामले नशे की हालत में होते हैं, और नशा एक किस्म से छत्तीसगढ़ में जुर्म की एक सबसे बड़ी वजह बन गया है। हालत इतनी खराब है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक और हेडमास्टर, या सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर दारू पिए हुए नशे में पहुंचते हैं, और उन्हें वीडियो बनने की भी कोई फिक्र नहीं रहती है।

अब हम नशे की इतनी खपत के पीछे की एक वजह यह भी देखते हैं कि पांच बरस पहले प्रदेश में भूपेश सरकार बनने पर किसानों की कर्जमाफी हुई थी, और उन्हें धान का काफी अधिक दाम भी मिला था। इस बार के विधानसभा चुनाव में आई भाजपा सरकार ने धान के दाम और अधिक बढ़ाकर 31 सौ रूपए प्रति क्विंटल देना शुरू किया है, और किसानों के हाथ खूब पैसा आया है। धान की अर्थव्यवस्था इस प्रदेश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला अकेला कारोबार है, और किसान की संपन्नता खेतिहर मजदूरों तक भी बढ़ती है, और ग्रामीण-शहरी, सभी अर्थव्यवस्था तरक्की करती है। जब पैसा इतना रहता है तो बहुत से लोग नशा करने लगते हैं, या पहले से नशा करने वाले उस पर खर्च कुछ और बढ़ा देते हैं। अभी हम जितने आंकड़े और अनुमान बता रहे हैं, इनमें दवा कारखानों में बनने वाले रासायनिक नशे के कोई भी आंकड़े नहीं हैं, और हमारे यूट्यूब चैनल ‘इंडिया-आजकल’ पर दो-तीन दिन पहले छत्तीसगढ़ के एक सबसे प्रमुख चिकित्सक डॉ.संदीप दवे ने इस सूखे नशे के भयानक रफ्तार से, और बड़े पैमाने पर हो रहे इस्तेमाल को एक खतरनाक नौबत बताया था। उनका कहना था कि इससे बदबू भी नहीं आती है, यह शराब से सस्ता भी होता है, और घरवालों को भी इस नशे का अंदाज नहीं लगता है।

अब इस पूरे नक्शे का एक आखिरी टुकड़ा हम यहां पर और रख रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह जिस-जिस जिले में रहे, वहां पर उन्होंने नशे के खिलाफ बड़ी कड़ी मुहिम छेड़ी। उन्होंने जागरूकता अभियान भी चलाए, और नशे के सौदागरों को बड़ी संख्या में पकड़ा। उन्होंने नशाविरोधी अभियान की वजह से, ऐसे अभियान के दौर में जिले में जुर्म के आंकड़ों में उल्लेखनीय गिरावट पाई है, और तरह-तरह के टेबल, ग्राफ, चार्ट में दिखाई भी है। यह बात समझ लेने की जरूरत है कि नशे का सबसे बड़ा अकेला कारोबार, शराब चूंकि सरकारी है, इसलिए वह इस अभियान के बाहर है। हमारा भी अंदाज है कि नशे की वजह से निजी जुर्म बड़ी संख्या में बढ़ रहे हैं, और बड़ी हिंसा हो रही है। इन तमाम बातों को देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलकर तमाम राज्यों में नशे के खिलाफ एक बड़ा अभियान लगातार जारी रखने की जरूरत है, और जैसा कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है, नशे के सौदागरों की संपत्ति जब्त की जानी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2024


 

कांग्रेस की नार्को टेस्ट की चुनौती एक साहसी कदम, इसे आगे बढ़ाया जाए...

   25 अगस्त 2024

 छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार में कुछ हफ्ते पहले सतनामी समाज के एक बड़े प्रदर्शन के बाद वहां कलेक्टर और एसपी के दफ्तर जला दिए गए थे जो कि हिन्दुस्तान के इतिहास में अपने किस्म का पहला ही मौका था। उस मामले में डेढ़-दो सौ लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं, लेकिन सबसे बड़े गिरफ्तारी कांग्रेस के विधायक देवेन्द्र यादव की है जो कि उस प्रदर्शन के मंच पर कुछ देर के लिए शामिल थे। उन पर राज्य की भाजपा सरकार की पुलिस ने यह आरोप लगाया है कि उन्होंने हिंसा भडक़ाई। इसे लेकर कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में प्रदर्शन किया है, और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, भूतपूर्व सांसद दीपक बैज ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि इस मामले में कांग्रेस के तमाम नेताओं का नार्को टेस्ट करवा लिया जाए, पार्टी तैयार है, और इसके साथ-साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री का भी नार्को टेस्ट करवाया जाए। यह चुनौती आज उस वक्त आई है जब कोलकाता में चिकित्सा छात्रा की रेप-हत्या के मामले में सीबीआई ने सात लोगों का पॉलीग्राफ टेस्ट कराया है, जो कि झूठ पकडऩे के लिए किया जाता है। इसे बोलचाल की भाषा में लाईडिटेक्टर टेस्ट भी कहते हैं, जिसमें लोगों से सवाल करते हुए उनके दिल-दिमाग में होने वाले उतार-चढ़ाव को दर्ज किया जाता है, और उससे अंदाज लगाया जाता है कि वे सच बोल रहे हैं, या झूठ बोल रहे हैं।

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने अभी कुछ दिन पहले ही राजनीति, सार्वजनिक जीवन, और सरकारी कामकाज में एक-दूसरे पर लगने-लगाने वाली तोहमतों को लेकर यह सलाह दी थी कि जो लोग संवैधानिक पदों की शपथ लेकर जनता के बीच कोई ओहदे संभालते हैं, उन्हें काम संभालते हुए ही इस बात की सहमति दे देनी चाहिए कि अगर उन पर कोई तोहमत लगेगी, तो वे नार्को टेस्ट, या लाईडिटेक्टर टेस्ट पर सहमत रहेंगे। हमने कहा था कि जनता के पैसों पर बड़े ओहदे पाने वाले लोगों को जनता के प्रति इतनी जवाबदेही दिखानी चाहिए। अब जैसे छत्तीसगढ़ में ही दस बरस से अधिक हो गए, जब बस्तर की झीरम घाटी में एक बड़े नक्सल हमले में छत्तीसगढ़ कांग्रेस के बहुत से बड़े नेताओं को छांट-छांटकर नाम पूछकर गोली मारी गई थी, लेकिन कांग्रेस विधायक कवासी लखमा को नक्सलियों ने जाने दिया था। तब से लेकर अब तक यह विवाद चलते ही रहता है कि क्या कवासी लखमा नक्सलियों से मिले हुए थे? ये आरोप भी लगते रहते हैं कि क्या झीरम हमला कोई राजनीतिक साजिश थी जिसमें नक्सलियों को भाड़े के हत्यारों की तरह इस्तेमाल किया गया था? जब ऐसे मामले बयानबाजी की वजह से सुर्खियों में बने रहते हैं, तो फिर लोग केवल खबरें पढ़ते रह जाते हैं, उनके सामने सच नहीं आ पाता। अब जिस तरह अभी कोलकाता के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चिकित्सा छात्रा के रेप-हत्या मामले में पॉलीग्राफ जांच हो रही है, वैसी जांच हर राज्य में बहुत से मामलों में होना चाहिए जिससे तरह-तरह की तोहमतें खत्म हो सकेंगी।

हम छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो करीब छह बरस पहले जब विधानसभा के चुनावों की तैयारियां चल रही थीं, तब विपक्षी कांग्रेस ने कई अफसरों पर आरोप लगाने के पांच बरस पूरे कर लिए थे। फिर कांग्रेस की सरकार बनते ही उन अफसरों को बचाने, और उन्हें सत्ता का बाप बनाकर बिठाने के पांच बरस कांग्रेस ने पूरे किए। ऐसे कुछ अफसरों को कभी सबसे बड़ा बेईमान, और कभी सबसे काबिल शासक बना दिया गया, और अब वे एक बार फिर खलनायक की तरह कटघरे और जेल में हैं। दूसरी तरफ इनके ठीक खिलाफ के कुछ अफसर ऐसे भी हैं, जो कि पहले नायक थे, भूपेश सरकार के पांच बरस में खलनायक थे, और फिर नायक हो गए हैं। मतलब यह कि ऐसे अफसरों के खिलाफ अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग तोहमतों में से कोई एक तो सही होगी, और कोई एक तो गलत होगी? इसलिए क्या ऐसे तमाम विवादास्पद लोगों का नार्को टेस्ट या पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं होना चाहिए जिससे जनता के पैसों पर राज करने वाले इन लोगों की असलियत सामने आ सके? इनमें मंत्री भी हो सकते हैं, राज्यपाल या जज भी हो सकते हैं, अफसर तो हैं ही, और गंभीर आरोप लगाने वाले नेता भी हो सकते हैं। पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लगातार यह कहते रहे कि झीरम घाटी के नक्सल हमले की साजिश के सुबूत उनकी जेब में हैं। अब प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए पांच बरस में भी अगर उन्होंने अपनी जेब में रखे सुबूतों का इस्तेमाल नहीं किया, तो यह बात तो संविधान की ली गई शपथ के खिलाफ रही कि इतनी बड़ी हत्यारी साजिश के सुबूत जेब में रखे वे संविधान की शपथ लेकर पांच साल सरकार चलाते रहे, लेकिन सुबूत उन्होंने न अपनी किसी एजेंसी में इस्तेमाल किए, न ही मामले की जांच कर रही एनआईए को दिए।

प्रदेश इस तरह के अनगिनत विवादों से घिरा हुआ है जो जनता की नजरों में कभी सुलझ ही नहीं पाए। अंतागढ़ में विधायक-उम्मीदवार खरीदी कांड से लेकर, प्रदेश के कई हत्याकांड, यहां का कोयला और शराब कांड, यहां का महादेव सट्टा कांड, इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक का घोटाला, और बहुत किस्म के राजनीतिक और आपराधिक जुर्म ऐसे हैं जो कि किसी किनारे पहुंच ही नहीं पाए। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने यह बात कही तो है कि बलौदाबाजार हिंसा के संदर्भ में, उनकी यह चुनौती नैतिक रूप से तो हर आरोप पर लागू होनी चाहिए, और जग्गी हत्याकांड से लेकर नान घोटाले तक, और पिछले पांच बरस के अनगिनत घोटालों और जुर्मों तक छत्तीसगढ़ की अदालतों से सुप्रीम कोर्ट तक का अंतहीन समय बर्बाद हो रहा है, और केन्द्र और राज्य की जांच एजेंसियों पर भी जनता का पैसा जाया हो रहा है। इन सबसे बचने के लिए सार्वजनिक जीवन का तकाजा यह है कि दोनों पार्टियों के तमाम संबंधित नेताओं, और आरोपों से घिरे हुए तमाम अफसरों से कहा जाए कि वे नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफी टेस्ट, वगैरह करवाने पर सहमति दें, ताकि जनता के बीच सच उजागर हो सके, और आरोपों का कीचड़ एक-दूसरे पर फेंकना बंद हो सके। दीपक बैज ने बहुत अच्छा प्रस्ताव रखा है, और उनकी पार्टी को इसमें पहल करना चाहिए। बलौदाबाजार की हिंसा तो एक मामला है, बहुत से दूसरे मामले अदालतों में अलग-अलग जगह तक पहुंचे हुए हैं, और दीपक बैज को अपनी पार्टी की पिछली सरकार के जिम्मेदार लोगों की भी सहमति जुटाकर सरकार और जांच एजेंसियां को देनी चाहिए, और फिर इसके साथ-साथ यह मांग भी रखनी चाहिए कि भाजपा के नेता, मंत्री, और संबंधित अफसर भी सच का सामना करने के लिए तैयार हों।

(Daily Chhattisgarh)

जिन्हें विज्ञान की जरूरत है, उन्हें धर्मान्धता का तोहफा!

  25 अगस्त 2024

 छत्तीसगढ़ के एक नए बने जिले, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई के एक स्कूल का एक वीडियो अभी सामने आया है जिसमें साल्हेवारा नाम की जगह पर स्वामी आत्मानंद शासकीय उत्कृष्ट अंग्रेजी-हिन्दी स्कूल में स्वतंत्रता दिवस का समारोह चल रहा है, और 8 छात्राएँ स्कूल की पोशाक में ही मंच पर एक किसी धार्मिक गाने पर पूरे बाल खोलकर इस अंदाज में झूम रही हैं कि उन पर कोई देवी आई हो। काफी देर तक स्टेज पर वे इसी तरह झूमती दिखती हैं, और सोशल मीडिया पर यह वीडियो देखने वाले लोग हैरान हैं। उनमें से कई लोग तो मामले की गंभीरता समझे बिना उस पर जोरों से हँसने के निशान पोस्ट कर रहे हैं, कुछ लोग यह भी लिख रहे हैं कि सरकारी स्कूल में यह हो क्या रहा है? यह नौबत बहुत ही भयानक है। देश का संविधान नागरिकों में वैज्ञानिक चेतना के विकास की जिम्मेदारी देश के तमाम तबकों पर डालता है। अब अगर इस तरह के धार्मिक अंधविश्वास अगर सरकारी स्कूलों में लड़कियों के बीच पनपाए जा रहे हैं, तो उनका असर बहुत दूर तक होगा।

हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार देश में वैज्ञानिक चेतना में गिरावट पर फिक्र जाहिर करते आए हैं। आज दिक्कत यह हो गई है कि कहने में जिस धर्म को मासूम करार दिया जाता है, वह धर्म एक पैर धर्मान्धता पर रखे हुए खड़े रहता है। फिर भारत की लोकतांत्रिक राजनीति की बदनीयत है कि वह तुरंत ही धर्म का राजनीतिकरण करने पर उतारू हो जाती है। अगला कदम साम्प्रदायिकता और अंधविश्वास की तरफ रहता है। इसके साथ-साथ धर्म के आक्रामक तेवर उसे लोकतंत्र की सीमाओं के एकदम बाहर ले जाते हैं। फिर कहने के लिए तो भारत की औपचारिक शिक्षा विज्ञान पढ़ाती है, लेकिन जिस तरह से स्कूली बच्चों से लेकर जिंदगी के दूसरे दायरों में भी जिस हद तक धर्मान्धता भरी जा रही है, उससे जाहिर है कि बच्चों की वैज्ञानिक सोच खत्म हो रही है। दिक्कत यह है कि आज भारत विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के तमाम फायदों का इस्तेमाल करते हुए भी जिस तरह राजनीतिक नारेबाजी में विज्ञान को खारिज करता है, इतिहास-पूर्व के जाने किस विज्ञान को सब कुछ मानता है, उससे विज्ञान की पढ़ाई पता नहीं कहां जाकर गिरेगी।

जब समाज और परिवार, सार्वजनिक जीवन, ये सब एक बहुत हाईवोल्टेज धार्मिक गतिविधियों से भरे रहेंगे, और उन धार्मिक गतिविधियों को ही इतिहास पर आधारित बता दिया जाएगा, पौराणिक कहानियों को इतिहास करार दे दिया जाएगा, तो ऐसी सोच और समझ के भरोसे बच्चों की कल्पनाओं का पुष्पक विमान 21वीं सदी के चांद और मंगल तक कैसे पहुंच पाएगा?

सरकारी स्कूलों में छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्वामी आत्मानंद स्कूलों को माना गया है, और उन्हें उसी महत्व के साथ ढाला जाता है। अब इन स्कूलों में भी आजादी की सालगिरह के मंच का कार्यक्रम छात्राओं पर धार्मिक गाने पर नाचते हुए सामूहिक रूप से देवी आने का हो रहा है, तो इससे यह समझ पड़ता है कि बच्चियों से परे भी स्कूल के शिक्षक और प्राचार्य तक किस सोच के होते जा रहे हैं। यह किसी धर्म का धर्म पढ़ाने वाला स्कूल होता, तो भी बात समझ में आती, लेकिन यह तो प्रदेश में सबसे अधिक सुविधाओं वाला आत्मानंद स्कूल है जिसमें दाखिले के लिए बच्चों के बीच कड़ा मुकाबला होता है, जहां अनुपातहीन अधिक खर्च करके चुनिंदा बच्चों को अधिकतम सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं।

दुनिया के किसी भी समझदार देश में धर्म निजी आस्था का सामान रहना चाहिए। लोग अपने घरों में अपनी धार्मिक मान्यताओं पर अमल करें, अपने आस्था केन्द्रों पर जाकर वहां भी अपने रीति-रिवाज से जो करना है कर लें, लेकिन जब धर्म का विस्तार सरकारों तक हो रहा है, सरकारी स्कूल-कॉलेज तक हो रहा है, सार्वजनिक जीवन को तहस-नहस करने की हद तक सडक़ों पर हो रहा है, लाउडस्पीकरों से बाहर निकलकर नवजात बच्चों को मार डाल रहा है, तो ऐसे धर्म के बारे में लोगों को सोचना चाहिए। यह बात किसी एक धर्म के बारे में नहीं है, बल्कि अलग-अलग कई धर्मों, अधिकतर या सभी धर्मों को लेकर है।

हमने कुछ दिन पहले ही मदरसों में धर्म की पढ़ाई के बारे में लिखा था कि उससे, और दूसरी जगहों पर बाकी धर्मों की पढ़ाई से, बच्चे धर्म पर पलने वाले परजीवियों की तरह बनकर रह जाते हैं, और वे आज की आधुनिक दुनिया की जरूरतों से इतने दूर चले जाते हैं कि धर्म के रहमोकरम के बिना उनकी कोई जिंदगी नहीं रह जाती। अब अगर किसी भी धर्म के ‘मदरसों’ तक जो हाल सीमित रहना चाहिए था, वह अगर सबसे महंगी, और सबसे अच्छी कही जाने वाली सरकारी स्कूलों तक बिखर जा रहा है, तो इस बारे में समाज को सोचना चाहिए। जिन लोगों को यह लगता है कि आज धर्म खतरे में है, तो धर्म पर तो हमें किसी तरह का खतरा नहीं दिखता, और जनता की वैज्ञानिक सोच जरूर पूरी तरह खतरे में है, और ऐसे समाज का भविष्य भी खतरे में है। आज देश के भीतर कामयाब जगहों पर पहुंचने वाले लोग, इस देश से निकलकर बाकी दुनिया में सफल होने वाले लोग किसी धार्मिक अंधविश्वास से सफल नहीं होते, वे असली और ईमानदार ज्ञान पाकर कामयाब होते हैं, या विज्ञान और टेक्नॉलॉजी पर और आगे की रिसर्च करके कामयाब होते हैं।

मैंने आज एक छोटी सी घटना को लेकर यह बड़ी सी फिक्र बताई है, और अगर इस घटना का ऐसा ही सिलसिला आगे बढ़ते रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब संपन्न और ताकतवर तबके अपने बच्चों को तो धर्मान्धता से दूर रखकर देश-विदेश में सबसे उम्दा पढ़ाई मुहैया करा देंगे, और देश की बाकी जनता इसी तरह सिर धुनती रह जाएगी।

(Daily Chhattisgarh)

जनगणना की संभावनाओं को सुप्रीम कोर्ट फैसले संग जोडक़र देखने की जरूरत

   24 अगस्त 2024

हर दस बरस में होने वाली भारत की जनगणना 2011 के बाद से नहीं हो पाई थी क्योंकि 2021 की जनगणना के पहले कोरोना का बड़ा प्रकोप था, देश में लॉकडाउन लगा था, और करोड़ों लोग घर-बार से दूर थे। ऐसे में जनगणना मुमकिन नहीं थी। लेकिन 2020 के बीच में लगे इस लॉकडाउन के बाद चार बरस हो चुके हैं, और अब तक मोदी सरकार ने जनगणना नहीं करवाई। अब ऐसी सुगबुगाहट है कि अगले महीने इसे शुरू करवाया जा सकता है, और करीब डेढ़ बरस की मेहनत से जनगणना पूरी होगी। 2021 की जनगणना 2025, मार्च 2026 तक पूरी होने से हो सकता है कि आगे की तमाम जनगणना का साल ही बदल जाए। सरकार के भीतर, और सरकार के बाहर के देश के बहुत से अर्थशास्त्रियों का यह मानना है कि जनगणना न होने से, और आबादी की गिनती से परे जनता की बहुत सारी जानकारी भी इस रिपोर्ट के न आने से उपलब्ध नहीं रहती है, और देश के विश्लेषण का काम मुमकिन नहीं हो पाता है। सरकार की नीतियों, और उसके कार्यक्रमों को बनाने में ये तमाम आंकड़े औजार और कच्चे माल की तरह रहते हैं, और अर्थशास्त्री इनके बिना न निष्कर्ष निकाल पा रहे थे, न योजना बना पा रहे थे। हर एक दशक में होने वाली जनगणना और इसके साथ के बाकी आंकड़े अब डेढ़ दशक के बाद आएंगे, और योजनाशास्त्रियों को अपने बहुत से पैमाने बदलने पड़ेंगे।

जनगणना की खबर आते ही विपक्ष ने इसमें अपना एक मुद्दा जोड़ा है, और कहा है कि इसके साथ-साथ जाति गणना भी करवाई जाए। कांग्रेस ने औपचारिक रूप से यह मांग की है कि इंडिया-गठबंधन पूरी तरह एकजुट होकर इसकी मांग कर रहा है, और जनगणना के प्रश्नावली में ही ओबीसी वर्ग की पहचान का एक कॉलम जोड़ा जाना चाहिए। लोगों को याद होगा कि लोकसभा चुनाव के और पहले से, बल्कि बिहार में जाति जनगणना होने के बाद से कांग्रेस ने पूरे देश में जाति जनगणना की वकालत शुरू की थी, संसद से सडक़ तक उसकी मांग की थी, और लोकसभा के चुनावी घोषणापत्र के साथ-साथ विधानसभा चुनावों के घोषणापत्र में भी कांग्रेस और इंडिया-गठबंधन की तरफ से सरकार बनने पर इसका वायदा किया गया था। राज्य के स्तर पर बिहार की जाति जनगणना का फैसला सुप्रीम कोर्ट तक खड़े रहा, और इससे अब किसी प्रदेश सरकार द्वारा या केन्द्र सरकार द्वारा जाति जनगणना का रास्ता खुला हुआ है। कांग्रेस ने यह मांग एकदम सही समय पर की है, और इंडिया-गठबंधन की बाकी पार्टियां मोदी सरकार के सामने एक दुविधा खड़ी कर सकती हैं कि वह ओबीसी जनगणना न करवाकर इस सबसे बड़े तबके की उपेक्षा कर रही है।

हमारा सोचना इससे भी थोड़ा अलग है। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद एसटी और एससी समुदायों के भीतर भी उपजातियों के आधार पर आरक्षण में आरक्षण का रास्ता खुल गया है। भारत सरकार की जनगणना में जाति का कॉलम सिर्फ ओबीसी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, जनगणना में एसटी-एससी तबकों की उपजातियां भी दर्ज होनी चाहिए ताकि कोई राज्य अगर इन आरक्षित तबकों के भीतर किसी एक जाति की स्थिति देखना चाहे, और उसके लिए अलग से कोई आर्थिक कार्यक्रम बनाना चाहे, कोटे के भीतर कोटा देना चाहे, तो उसे अलग से जनगणना की जरूरत न पड़े। जनगणना में हर किसी की जाति की जानकारी भी लिखी जाती है, यह एक अलग बात है कि अब तक जनगणना उपजातियों की, या ओबीसी की जानकारी का अलग से विश्लेषण नहीं करती। जिन जानकार लोगों से हमने पूछा है, उनका कहना है कि कम्प्यूटरों से यह जानकारी पल भर में निकाली जा सकती है कि किस उपजाति के कितने लोग हैं। अभी भी भारत सरकार की जनगणना एक विश्वसनीय कार्यक्रम रहते आया है, और राज्यों के स्तर की जनगणना, जाति जनगणना, और दूसरे आर्थिक-सामाजिक पैमानों की जानकारी भी जनगणना के साथ जुटाई जानी चाहिए। इससे एक ऐसा व्यापक डाटा-बेस तैयार होगा जो आरक्षण के किसी नए समीकरण को बनाने में भी काम आएगा, और अदालत में उसे बचाने में भी काम आएगा। देश में आरक्षण, ओबीसी, उपजातियां, क्रीमीलेयर इन सबका मामला इतना उजागर हो चुका है, और हर संबंधित तबका अपने हकों के लिए जागरूक हो चुका है कि अब जनगणना और जातियों की जानकारी को छुपाए रखने का कोई मतलब नहीं है। जाति जनगणना और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उपजी जानकारी की जरूरत को ध्यान में रखकर अगली जनगणना को उसी हिसाब से ढालना चाहिए, या अगर वह पहले से इसके लिए तैयार है, तो जाति और उपजाति की जानकारी के आंकड़े खुलकर जनता के सामने रखना चाहिए। अब इन जानकारियों के सामने आने से किसी नए आरक्षण का बवाल खड़ा नहीं होना है, और जातियों और जनगणना की, आर्थिक, सामाजिक, और शैक्षणिक स्तर की जो देश की हकीकत है, उसे छुपाकर रखने से किसका भला होने जा रहा है? अब तो मोदी सरकार ने देश मेें अनारक्षित तबकों के लिए भी कमजोर आर्थिक स्थिति के आधार पर दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की है, जो कि अभूतपूर्व फैसला था, और यह एक अलग बात है कि इस नए कोटे के भीतर सचमुच के आर्थिक कमजोरों के लिए कोई गुंजाइश इसलिए नहीं है कि देश में आय प्रमाणपत्र बनवाने की सबसे भ्रष्ट व्यवस्था के चलते अधिकतर अनारक्षित लोग अपने को क्रीमीलेयर के नीचे का, और इस आरक्षण का हकदार साबित कर सकते हैं, शायद कर रहे हैं।

डेढ़ दशक बाद की यह जनगणना इसके बाद के दो और मामलों से जुड़ी हुई है। लोकसभा और विधानसभा सीटों का डी-लिमिटेशन इस जनगणना के आधार पर होगा, और उसके बाद महिला आरक्षण लागू होगा। इन दो बातों की वजह से यह जनगणना ऐतिहासिक महत्व की रहेगी। आज का वक्त एक ऐसी पारदर्शिता का है कि लोगों के नाम सहित उनकी निजी जानकारियां उजागर न करते हुए भी जनगणना की अधिक से अधिक आम जानकारी जनता के बीच रख देनी चाहिए। जनगणना के केवल निजी और व्यक्तिगत हिस्सों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए, और बाकी हिस्से वोटरलिस्ट की तरह ही सामने रहने चाहिए। मोदी सरकार के सामने यह एक मौका है जब वह जाति जनगणना की मांग जोर पकडऩे के पहले ही उसे मंजूर कर सकती है। अभी अगर सरकार खुद ऐसा फैसला लेती है, तो उसे वाहवाही का एक हिस्सा मिल सकता है, लेकिन लेटरल एंट्री और कुछ दूसरे फैसलों की तरह अगर केन्द्र सरकार विपक्ष के आंदोलन के बाद इस मांग को मानेगी, तो इससे उसकी ताकत नहीं, कमजोरी दिखेगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त 2024


 

रवानगी के तीन महीने पहले अगले तीस बरस की योजना की घोषणा का क्या मतलब?

  23 अगस्त 2024

 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मेयर एजाज ढेबर ने एक गजब का काम किया है। अभी रूस की राजधानी मास्को में उन्होंने वहां के परिवहन मंत्री के साथ एक एमओयू किया जिसके तहत रायपुर से दुर्ग के बीच लाईट मेट्रो ट्रेन शुरू की जाएगी। उन्होंने वहां से अखबारों को जानकारी दी है कि जल्द ही मास्को से एक विशेषज्ञ दल यहां आएगा, और यह भी देखेगा कि इस रास्ते पर लाईट मेट्रो का ढांचा बनाने के लिए छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार के वक्त रायपुर में बनाए गए स्काईवॉक के कॉलम का क्या इस्तेमाल किया जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि मेयर एजाज ढेबर का कार्यकाल तीन महीने ही बचा है, और पांच सौ करोड़ की ऐसी योजना को लेकर उन्होंने एक एमओयू पर विदेशी सरकार के साथ दस्तखत किए हैं जो कि न तो राज्य सरकार, और न ही केन्द्र सरकार की इजाजत के बिना किए जा सकते। दूसरी बात यह कि छत्तीसगढ़ में पूरे पांच बरस ढेबर की पार्टी, कांग्रेस का राज रहा, और भूपेश बघेल सरकार के पूरे कार्यकाल में ढेबर परिवार ही सरकार के कई हिस्सों को चलाते भी रहा। उन पांच बरसों में जो काम रायपुर के महापौर नहीं कर पाए, अब जाते-जाते एक ऐसी इमारत की नींव वे रख रहे हैं, जिसकी जमीन पर भी रायपुर म्युनिसिपल का कोई हक नहीं है। 

यह बहुत ही हैरानी की बात है कि दुर्ग से रायपुर तक लाईट मेट्रो चलाने के लिए जिस सडक़ का इस्तेमाल हो सकता है, वह पूरी की पूरी राष्ट्रीय राजमार्ग में आती है, और उसमें कोई भी फेरबदल केन्द्र सरकार की सहमति और अनुमति के बिना नहीं हो सकता। रायपुर नगर निगम सीमा के बाहर किसी चीज पर एमओयू करना यहां के मेयर के अधिकार क्षेत्र का नहीं है। छत्तीसगढ़ की मौजूदा भाजपा सरकार की ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि ढेबर की फरमाइश पर वह रमन सिंह सरकार के वक्त बनते हुए स्काईवॉक को आगे बढ़ाना रोक दे, और ढेबर के एमओयू को माने। यह पूरा सिलसिला बचकाना, अधकचरा, और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर किया गया काम है। जब चलाचली की बेला आ चुकी है, तो आखिरी के तीन महीनों में पांच सौ करोड़ की एक योजना कई नगर निगमों और नगर पालिकाओं की तरफ से अकेले रायपुर मेयर का तय करना हास्यास्पद भी है, और एक राजनीतिक नौटंकी भी है। इससे यह भी पता लगता है कि अपने अत्यंत करीबी भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री रहते हुए एजाज ढेबर ने खुद महापौर रहते हुए ऐसा कुछ भी नहीं किया, और अब जाते-जाते भाजपा सरकार के अधिकार क्षेत्र के, केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र के ऐसे काम वे खुद करके जा रहे हैं। उनके इस एमओयू की कीमत उस कागज के वजन जितनी ही होगी जिस पर यह टाईप हुआ है, और जिस पर दस्तखत हुए हैं। 

लेकिन एजाज ढेबर के किए हुए इस काम से परे छत्तीसगढ़ सरकार अगर चाहे, तो वह सोच सकती है कि क्या दुर्ग से रायपुर तक किसी लाईट मेट्रो की गुंजाइश है? रमन सरकार के समय का अधूरा स्काईवॉक पूरा करने का फैसला आज की भाजपा सरकार ने ले लिया है, और उस पर काम भी शायद जल्द शुरू हो जाएगा, लेकिन जिस तरह से आज की विष्णुदेव साय सरकार दुर्ग-भिलाई और रायपुर को मिलाकर एक प्रदेश राजधानी क्षेत्र बनाने की सोच रही है, उसके लिए ट्रांसपोर्ट के ऐसे ढांचे के बारे में सोचना चाहिए जो कि रायपुर शहर के एक-दो किलोमीटर की स्थानीय सहूलियत से ऊपर हो। अगर किसी लाईट मेट्रो को बनाने में स्काईवॉक आड़े आता हो, और उससे मेट्रो की सारी संभावनाएं पूरी तरह खत्म हो जाती हों, तो प्रादेशिक राजधानी क्षेत्र के व्यापक हित को देखते हुए प्रदेश सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए कि क्या उस कीमत पर भी वह स्काईवॉक को पूरा करना चाहेगी? हम स्काईवॉक के गुण-दोष पर नहीं जा रहे, उसे तो भूपेश सरकार भी पांच बरस में तय नहीं कर पाई। लेकिन अगर दुर्ग-भिलाई से रायपुर होते हुए नया रायपुर तक किसी किस्म की मेट्रो का बनना, रायपुर शहर से उसका गुजरना अगर स्काईवॉक बनने के बाद मुमकिन नहीं रहेगा, तो फिर राजधानी क्षेत्र विकास की योजना के साथ जोडक़र ही स्काईवॉक का भविष्य तय करना चाहिए। इसे किसी प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाना, किसी चुनावी घोषणा से जोडक़र देखना राज्य के व्यापक हितों के खिलाफ रहेगा। 

रायपुर के कांग्रेसी मेयर एजाज ढेबर हो सकता है कि दुबारा मेयर चुनाव लडऩा चाहें, या रायपुर-दक्षिण विधानसभा सीट पर वे उम्मीदवार बनना चाहें, और इसी नीयत से वे इस शहर के लोगों को मुंगेरीलाल के हसीन सपने दिखा रहे हों, और अच्छी तरह जानते-बूझते हुए भी केन्द्र और राज्य सरकारों के हिस्से के फैसले ले रहे हैं। उनका अधिकार क्षेत्र, उनकी नीयत, उनकी घोषणा की संभावनाएं, इन सब पर लोगों को चर्चा करना चाहिए। यह शिगूफा कांग्रेस पार्टी का कुछ भी भला नहीं करेगा, क्योंकि म्युनिसिपल से रवानगी के तीन महीने पहले अगले तीस बरस की किसी योजना की घोषणा करना कोई भरोसेमंद काम तो है नहीं। ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी अभी भी एक बेकाबू जंतु की तरह चल रही है, या उस पर काबू संगठन से परे से जारी है। वरना कोई भी पार्टी म्युनिसिपल चुनावों के ठीक पहले इस किस्म की घोषणा करके अपने आपको मखौल का सामान तो बनाती नहीं। 

छत्तीसगढ़ की राजधानी बाकी प्रदेश की तरह कुछ महीनों में म्युनिसिपल चुनाव देखने वाली है, और रायपुर दक्षिण विधानसभा सीट पर उपचुनाव भी होने जा रहा है। इन दोनों चुनावों को देखते हुए पार्टियां, नेता, या सरकारें भी जिस तरह की घोषणाएं करेंगी, उनका मूल्यांकन करने का काम किसी जनसंगठन को भी करना चाहिए, और जानकार-विशेषज्ञ नागरिकों को भी। हम जनता के पैसों से जनता की जगहों पर किसी तरह के अहंकार को लोकतांत्रिक नहीं पाते हैं। हमारा साफ मानना है कि हर सार्वजनिक योजना में विशेषज्ञों की भूमिका रहनी चाहिए, फैसले विशेषज्ञों के लिए हुए होने चाहिए। चुनाव जीतने वाले लोग हर बात में विशेषज्ञ नहीं बन जाते। इस देश में दिल्ली मेट्रो सहित, अमूल वाले आणंद से लेकर इसरो तक, विशेषज्ञों की वजह से सफल हुए हैं। इसलिए नेताओं को धरती के हर मामले का विशेषज्ञ बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ राज्य के बेहतर हित में राज्य सरकार को देश के अच्छे योजनाशास्त्रियों से सलाह-मशविरा करना चाहिए, तभी राज्य स्तर की अच्छी योजनाएं बन सकेंगी। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त 2024


 

किसी कारोबार और उसके नौकर की इतनी अकड़ बर्दाश्त नहीं करनी चाहिए..

 21 अगस्त 2024

 दुनिया भर में कॉफी-कैफे चलाने वाली एक कामयाब कंपनी स्टारबक्स के नए मुखिया के बारे में आई नई खबर पर्यावरण की फिक्र करने वाले लोगों को सदमे में डालने वाली है। इस कंपनी में उसकी काम की शर्तों में यह भी शामिल है कि वे कैलिफोर्निया के अपने घर से स्टारबक्स मुख्यालय, सिएटल आने-जाने के लिए निजी विमान का इस्तेमाल करेंगे, और हर दिन करीब 16 सौ किलोमीटर की उड़ान भरेंगे। एक व्यक्ति अपने घर और दफ्तर के बीच आवाजाही के लिए धरती के पर्यावरण को किस हद तक तबाह करने की बेशर्मी रखता है, यह देखने लायक है। निजी विमानों की उड़ान प्रति मुसाफिर इतना अधिक ईंधन खर्च करती हैं, और धरती पर कार्बन का बोझ बढ़ाती हैं कि पश्चिमी दुनिया की बहुत सी खेल टीमों को कहा जा रहा है कि वे विमान के बजाय ट्रेन से आएं-जाएं। ऐसे में एक कंपनी चाहे वह कितना ही मुनाफा क्यों न कमा रही हो, उसका एक अफसर अगर धरती की इतनी बेशर्म बर्बादी कर रहा है तो हमारे ख्याल से पर्यावरण की फिक्र रखने वाले लोगों को इस ब्रांड का ही बहिष्कार कर देना चाहिए। चूंकि यह गैरजिम्मेदार आदमी धरती की इतनी हेठी कर रहा है, इसलिए उसका नाम बता देना भी बेहतर होगा। ब्रायन निकोल नाम का यह आदमी हर साल करीब 948 करोड़ रूपए के बराबर तनख्वाह पाएगा, और इसके अलावा उसे करोड़ों का बोनस अलग से मिलेगा। इसके मेहनताने और कमाई का पूरा हिसाब करना हमारे सरीखे गणित के कमजोर व्यक्ति के लिए आसान नहीं है, लेकिन पहली नजर में ही यह दिख रहा है कि यह साल के हर दिन तीन करोड़ रूपए करीब तो कमाएगा ही। 

इस खबर के कई पहलू हैं। एक पहलू तो यह है कि इतनी बड़ी और इतना मुनाफा कमाने वाली इस कंपनी में अब तक एक भारतवंशी लक्ष्मण नरसिम्हन सीईओ था, लेकिन काम से संतुष्ट न होने पर कंपनी ने उन्हें हटा दिया था। अब ब्रायन निकोल को कंपनी की तरफ से मिले नौकरी के प्रस्ताव में कहा गया है कि उन्हें कंपनी के मुख्यालय के शहर में आकर नहीं रखना पड़ेगा, बल्कि वे जहां रहते हैं, वहां से कंपनी के विशेष विमान में दफ्तर आना-जाना करते रहेंगे। यह हर दिन 16 सौ किलोमीटर का फेरा रहेगा। और कंपनी की यह नीति भी है कि उसके हर कर्मचारी को हफ्ते में कम से कम तीन दिन ऑफिस आना है, इसलिए यह नया सीईओ भी हफ्ते में तीन दिन तो पर्यावरण की ऐसी बर्बादी का हकदार रहेगा। ब्रायन निकोल पहले एक मैक्सिकन फास्ट फूड चेन को डूबने से बचाने, और उबारने की शोहरत रखता है, और उसने उस कंपनी के शेयर सात डॉलर से बढ़ाकर पचास डॉलर तक पहुंचा दिए थे। 

पर्यावरण के हिसाब से देखें तो अमरीका के नागरिक, वहां की जीवनशैली, और वहां का सरकारी ढांचा, धरती को बर्बाद करने के लिए दुनिया में सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। जो लोग अमरीका गए नहीं है, उनको इस बात का अहसास नहीं हो सकता कि अमरीकी हर चीज बहुत बड़ी-बड़ी इस्तेमाल करने के शौकीन हैं। उनकी निजी कारें भयानक आकार की रहती हैं, उनके घर बहुत बड़े रहते हैं, उनके खाने-पीने के सामान बहुत बड़ी मात्रा के रहते हैं जिनमें बर्बादी तय रहती है, और तो और वे कोल्डड्रिंक भी इतनी बड़ी गिलासों में पीते हैं कि उन्हीं की सेहत बर्बाद होती है। हिन्दुस्तान जैसे देश से पहली बार अमरीका जाने वाले लोग अगर किसी रेस्त्रां में खाने-पीने का ऑर्डर करते हैं, तो एक खतरा यह रहता है कि वे जरूरत से बहुत अधिक बुला लेते हैं, और वह जूठा जाता है। प्रति अमरीकी ईंधन, खानपान, पैकिंग, बिजली, इन सबकी खपत इतनी अधिक है कि पर्यावरण की वहां की बर्बादी जलवायु परिवर्तन बनकर कहीं अफ्रीका को बर्बाद कर रही है, तो कहीं पाकिस्तान को बाढ़ में डुबा दे रही है। ऐसे में स्टारबक्स और उसका नया मुखिया कारोबार का एक बहुत ही हिंसक चेहरा पेश कर रहे हैं, और पूरी दुनिया को चाहिए कि इस हिंसा के खिलाफ इस ब्रांड का बहिष्कार करें। 

हम इसमें यह भी देख रहे हैं कि अमरीका से निकले हुए खाने-पीने के सामानों के बहुत से ऐसे ब्रांड हैं जो अंधाधुंध पैकिंग इस्तेमाल करते हैं, और प्रति खानपान न खाने वाली चीजों की बर्बादी भी बहुत होती है। फिर आज दुनिया में जीवनशैली के लिए लोग संपन्नता आते ही अमरीकी तौर-तरीकों की तरफ देखने लगते हैं, इसलिए जहां-जहां अमरीकी ब्रांड जाते हैं, वे दूसरे लोकल ब्रांड को भी वैसे ही बर्बादी के तौर-तरीके अपनाने पर मजबूर करते हैं। खुद अमरीकी सरकार तो अपने देश की जीवनशैली के मुताबिक बर्बादी के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकती, लेकिन जो देश अभी तक अमरीकी पैमानों की बर्बादी नहीं करते हैं, उन्हें तो सोचना चाहिए कि वे अपने देश में पैकिंग और दूसरे सामानों की ऐसी बर्बादी को कैसे रोकें। 

हम हिन्दुस्तान में टाटा कंपनी के मुखिया रतन टाटा को देखते हैं, जो कि हर बरस हजारों करोड़ रूपए तो समाजसेवा पर खर्च करते हैं, इसी तरह का खर्च नारायण मूर्ति या अजीम प्रेमजी जैसे कुछ दूसरे कारोबारी भी करते हैं। लेकिन इनका निजी जीवन सादगी से भरा रहता है, और अपने ऊपर ये कोई बड़ा खर्च नहीं करते। नारायण मूर्ति और अजीम प्रेमजी की तो ढेर सारी ऐसी तस्वीरें दिखती हैं जिनमें वे विमान में साधारण दर्जे की सीटों पर सफर करते हैं। वे भी चाहते तो सैकड़ों करोड़ की समाजसेवा और दान को घटाकर खुद के लिए विशेष विमान का इस्तेमाल कर सकते थे, लेकिन उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और जवाबदेही उन्हें सादगीपसंद बनाए रखती हैं। 

आज दुनिया में जागरूक लोगों के ऐसे समूह हैं जो कि बहिष्कार नाम के अहिंसक आंदोलन का इस्तेमाल करके किसी ब्रांड को अपनी हरकतों पर सोचने के लिए मजबूर कर सकते हैं। आज दुनिया को इजराइली कंपनियों का बहिष्कार करना चाहिए, और आज की दुनिया के सबसे बड़े जनसंहार में भागीदार अमरीका का भी बहिष्कार करना चाहिए। जिन चीजों में अमरीका का एकाधिकार है, वहां तो बहिष्कार आसान नहीं है, लेकिन खानपान के अमरीकी ब्रांड किसी की भी मजबूरी नहीं है, इसलिए इजराइल के साथ-साथ अमरीका का भी बहिष्कार दुनिया की जनता को करना चाहिए। पर्यावरण को इस बड़े पैमाने पर बर्बाद करने का काम जो कंपनियां कर रही हैं, उनसे भी आम जनता को हिसाब चुकता करना चाहिए। इस हिटलिस्ट में इस नए सीईओ के साथ स्टारबक्स सबसे ऊपर और सबसे आगे आ गई है, और इसे उनका अपना कारोबारी फैसला मानकर उसे छोड़ देना ठीक नहीं है। जो जनता के बीच कारोबार करके उन्हीं से कमाई करते हैं, उनकी सामाजिक जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। इस कंपनी को ऐसा तगड़ा झटका लगना चाहिए कि उसके पास अपने प्लेन को ऑफिस-कार की तरह रोज 16 सौ किलोमीटर चलाने के लिए पेट्रोल भी न रहे। यह एक अच्छा मामला है जिसमें दुनिया की जनता एक कारोबार की कमर तोडक़र उसकी अकड़ी हुई गर्दन को झुका सकती है। 

(Daily Chhattisgarh)

राहुल के लगातार हमले का असर, लेटरल एंट्री नाम की बेइंसाफी टली..

   21 अगस्त 2024

 मोदी सरकार को अपने एक और फैसले का पेटी-बिस्तरा बांधकर लौट जाना पड़ा है। देश की नौकरशाही में, जहां पर कि लोग कुछ अपवादों को छोडक़र यूपीएससी से चुनकर आते हैं, आईएएस का इम्तिहान देकर भारत सरकार और राज्यों में सरकारी सचिवों के ओहदों तक पहुंचते हैं, वहां पर मोदी सरकार ने लोगों को थोक में सीधे बाहर से उठाकर केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव तक बनाना शुरू कर दिया था। यह अपने आपमें देश के नौजवानों के समानता के अधिकार के खिलाफ था, और यूपीएससी जैसी संस्था का पूरा काम ही मानो गैरजरूरी करार दे दिया गया था क्योंकि भारत सरकार नाम छांटकर यूपीएससी को दे देती थी, और वह इन लोगों को बिना किसी आरक्षण के छांट लेती थी। संविधान में आरक्षण की जो व्यवस्था की गई है, यह व्यवस्था उसके भी खिलाफ थी। इस लेटरल एंट्री के तहत मोदी सरकार ने अभी 45 लोगों को सीधे डायरेक्टर या संयुक्त सचिव बनाना तय किया था, और राहुल गांधी ने इसके खिलाफ एक बड़ा हल्ला बोला था। 

आरक्षण को लेकर, दलित और आदिवासियों के हक को लेकर, ओबीसी समुदाय को नौकरशाही में जगह न मिलने को लेकर राहुल गांधी पिछले साल भर से लगातार देश में एक राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। इसी के तहत जब बिहार के पल्टूराम के साथ कांग्रेस की सरकार थी, तो वहां जातीय जनगणना करवाई गई थी। राहुल गांधी ने लगातार यह अभियान वैसे भी चलाया हुआ था कि नौकरशाही में, भारत सरकार के सचिवों के स्तर पर ओबीसी समुदाय से आने वाले अफसरों की कितनी कमी है। यह बात भी समझने की जरूरत है कि जब यूपीएससी के इम्तिहानों में एसटी, एससी, और ओबीसी का आरक्षण होता है, तो फिर भारत सरकार के सचिव स्तर पर पहुंचते हुए इन आरक्षित वर्गों के अफसरों का अनुपात एकदम से कैसे गिर जाता है? बहुत से लोगों का यह मानना है कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट, और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में पिछले जजों के कुनबे जगह पाते रहते हैं, उसी तरह भारत सरकार के तमाम ताकतवर ओहदों पर आमतौर पर सवर्ण कही जाने वाली जातियों का ही बोलबाला रहता है। राहुल गांधी तरह-तरह के मौजूदा आरक्षण, संभावित आरक्षण, और आरक्षण में धोखाधड़ी के कई आरोप लगाते हुए इसे लगातार सामाजिक मोर्चे पर एक आंदोलन की शक्ल देते आए हैं। अब जब केन्द्र सरकार एक साथ करीब 45 पदों पर बाहरी लोगों को बिना किसी आरक्षण के लेटरल एंट्री से नियुक्त करने जा रही थी, तो राहुल गांधी ने इस पर बड़ा हल्ला बोला, और कहा कि यह आरक्षित वर्गों के लोगों के हक मारना है। उन्होंने यह राजनीतिक तोहमत भी लगाई कि मोदी सरकार आरएसएस के विचारधारा के लोगों को सरकार में घुसाने के लिए उस प्रावधान की आड़ ले रही है जिसके तहत पिछली सरकारों ने मनमोहन सिंह जैसे विख्यात अर्थशास्त्री को नियुक्त किया था, कुछ अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को नियुक्त किया था, या आधार कार्ड बनाने वाले नंदन निलेकेणि को नियुक्त किया था। यह बड़ी हँसी की बात है कि मोदी सरकार एक साथ 45 लोगों को ऐसे विशेषज्ञ लोगों की मिसाल गिनाते हुए सरकार में लेटरल एंट्री दे रही है। अगर सचमुच ही कोई सरकार 45 ऐसे महान जानकार ढूंढ सकती है, तो देश तो फिर कामयाबी के अंतरिक्ष में ही पहुंचकर थमेगा। लेकिन देश के एसटी-एससी तबके, ओबीसी समुदाय राहुल की इस बात पर सहमत दिख रहे हैं कि लेटरल एंट्री आरक्षित तबकों के हक मारकर ही की जा रही है। उसमें कैसे लोग और क्यों लिए जा रहे हैं, यह एक अलग विवाद का मुद्दा है जो कि सिर्फ आरक्षण से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि देश की सबसे बड़ी सर्विस में संदिग्ध और कथित विशेषज्ञता वाले लोगों को भरने की एक हरकत अधिक दिखती है। यह हैरानी की बात है 45 लोगों को बिना आरक्षण लेटरल एंट्री देने का मतलब आरक्षित तबकों के दो दर्जन लोगों के हक मारना है,                              और वह भी कई बरस की वरिष्ठता वाले आईएएस अफसरों से भरे जाने वाले   संयुक्त सचिव जैसे वरिष्ठ पद के मामले में! यूपीएससी से मुकाबले में चुनकर आने वाले लोगों को भी इन ओहदों तक पहुंचने में एक जिंदगी लग जाती है, और सारा रिकॉर्ड ठीक रहने पर ही वे वहां पहुंचते हैं। इसलिए जब तक कोई वैज्ञानिक, विशेषज्ञ ऐसे न हों कि इनके बिना सरकार का कोई एक काम आगे ही न बढ़ सके, तब तो लेटरल एंट्री की बात समझ में आती है। एकमुश्त 45 ऐसे विशेषज्ञ ढूंढ पाने के लिए सरकार का जादूगर रहना भी जरूरी है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुछ बड़े शुभचिंतक राजनीतिक विश्लेषकों ने अभी लिखा है कि एशिया के इस हिस्से में भी लगातार जनआंदोलनों को अनदेखा करना मोदी के लिए ठीक नहीं होगा। पाकिस्तान में फौजी हुकूमत और शरीफ सरकार के तमाम जुल्म के बावजूद इमरान खान की पार्टी और उनके समर्थक बड़े हौसले के साथ डटे हुए हैं, जो कि सरकार और फौज के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। दूसरी तरफ श्रीलंका ने भयानक जनआंदोलन देखा है जिसमें लोगों ने राष्ट्रपति भवन पर भी कब्जा कर लिया था क्योंकि सरकार ने मनमाने फैसले लिए थे। बांग्लादेश का मामला सबसे ताजा है जिसमें आरक्षण को लेकर सरकार जनभावनाओं को समझ ही नहीं पाई, और पिछली प्रधानमंत्री शेख हसीना आंदोलनकारी जनता को देश का गद्दार करार देते रह गई, और उन्हें पता ही नहीं चला कि उनके पांवों के नीचे से जमीन कब खिसक गई। भारत में जाति और आरक्षण, धर्म, साम्प्रदायिकता, ये इतने बड़े मुद्दे बन चुके हैं कि इन्हें अनदेखा करना किसी भी सरकार के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है। बिहार में नीतीश कुमार के दलबदल की वजह से भाजपा को जातीय जनगणना के मुद्दे से अगले दलबदल तक तो राहत मिली हुई है लेकिन इसे स्थाई और राष्ट्रीय राहत मानना गलत होगा। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला एसटी-एससी समुदायों के भीतर जिस तरह उपजातीय आरक्षण का हक दे रहा है उसके असर को भी समझने की जरूरत है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने अपने सबसे ताकतवर दिनों में जिस अंदाज में नोटबंदी से लेकर किसान कानून तक दर्जन भर बड़े फैसले लिए थे, उसी अंदाज में लगातार काम करना सरकार के लिए भारी पड़ रहा है। लेटरल एंट्री के नाम पर देश के सबसे बड़े ओहदों पर पसंदीदा लोगों को छांट-छांटकर बिना आरक्षण इतनी बड़ी संख्या में कुर्सियों को भर देना लोगों को हक्का-बक्का कर गया है, और इसीलिए जो जनविरोध सतह पर आया उसे देखकर केन्द्र सरकार को मजबूर होकर लेटरल एंट्री को फिलहाल रोक देना पड़ा है, और संविधान और बाबा साहब जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करते हुए, आरक्षण के लिए मोदी की हमदर्दी का हवाला देते हुए यूपीएससी को लिखना पड़ा कि वह फिलहाल लेटरल एंट्री रोक दे। 

जानकारों का कहना है कि यह बिना विचार-विमर्श, संसद में बहस बिना लिया गया एक फैसला था जिसमें विपक्ष को तो भरोसे में लेना दूर रहा, आरक्षित तबकों के सामने भी तर्क नहीं रखे गए, जिनके कि इतने बड़े हक मारे जा रहे हैं। ऐसे में सरकार को अपने कुछ पुराने और फैसलों को वापिस लेने की तरह इस फैसले को भी वापिस लेना पड़ा है क्योंकि देश में आज जातियों और आरक्षण का मुद्दा राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने एक अभूतपूर्व ताकत के साथ जिंदा कर दिया है, और सुप्रीम कोर्ट मानो आरक्षण को बिना बढ़ाए हुए उसे और अधिक असरदार बनाते हुए आरक्षण की बहस बढ़ा रहा है। ऐसे माहौल में मोदी सरकार के लिए अपने लिए यह ठीक है कि वह चाहे संविधान का हवाला देकर, चाहे बाबा साहब का नाम लेकर लेटरल एंट्री बंद करे। पूरे लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन ने संविधान कुचलने की साजिश का जो आरोप मोदी सरकार पर लगाया था, शायद आरक्षित वर्गों के बीच उनकी बात असर कर रही है। मोदी सरकार को अगर करीब चार दर्जन लोग एकदम से इतने काबिल मिले हैं कि उनके बिना इस देश का काम नहीं चल सकता था, तो ऐसे लोगों को बड़े निजी कारोबारों में जगह दिलवानी चाहिए, जिससे देश की अर्थव्यवस्था का फायदा हो सके।

(Daily Chhattisgarh)


दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अगस्त 2024


 

किस प्रदेश का नैतिक हक है दूसर प्रदेश में होते बलात्कार पर सवाल उठाने का?

  20 अगस्त 2024

 देश में जब महिलाओं और लड़कियों की हिफाजत की गारंटी देने वाले उनके भाईयों का राखी-त्यौहार चल रहा था, तब तमिलनाडु की एक खबर आई कि वहां कृष्णागिरी नाम की जगह पर एक निजी स्कूल के प्रिंसिपल ने एक फर्जी एनसीसी कैम्प लगाया, उसमें 13 साल की एक छात्रा के साथ रेप हुआ, और 12 अन्य छात्राओं का यौन-शोषण हुआ। स्कूल में एनसीसी की ईकाई नहीं थी, और प्रिंसिपल ने कुछ बाहरी लोगों के साथ मिलकर एक फर्जी एनसीसी कैम्प लगाया जिसमें 41 छात्र-छात्राओं को शामिल किया गया। इसमें 17 लड़कियां थीं, जिनमें से 13 का यौन-शोषण हुआ। अभी कोलकाता में मेडिकल छात्रा के साथ हुए बलात्कार और उसकी हत्या पर देश विचलित है ही, इस बीच यूपी और बिहार में दलित नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार हो रहा है, अभी हमारे सामने यूपी के प्रयागराज का एक वीडियो है जिसमें बंदूक की नोंक पर एक महिला को बाल पकडक़र घसीटकर ले जाया जा रहा है, यूपी की ही एक दूसरी खबर है कि भाई को राखी बांधने जा रही महिला को रास्ते में रोककर उसे लूटा गया, और विरोध करने पर उसके साथ जा रहे उसके जेठ को गोली मार दी गई। महिलाओं के खिलाफ सेक्स-जुर्म की खबरों से मीडिया पटा हुआ है, और दो-चार दिन के भीतर ही छत्तीसगढ़ में बलात्कार और सेक्स-शोषण, और अश्लील संदेश भेजने वाले कई प्रिंसिपल, हेडमास्टर, शिक्षक गिरफ्तार किए गए हैं। सवाल यह है कि जिन देशों में असली या मुंहबोले भाई-बहनों के संबंधों को प्रचारित करने वाला राखी जैसा कोई त्यौहार नहीं है, वहां लड़कियों और महिलाओं के साथ इस तरह के जुर्म नहीं होते हैं। यह मामला कुछ उसी तरह का लगता है कि उत्तर भारत की जिन नदियों को मां मानकर उनकी पूजा होती है, वहां पर उनका पानी प्रदूषण से सड़ गया है, और उसमें नहाना भी महफूज नहीं है। दूसरी तरफ उत्तर भारत में जहां पर नदियों को लेकर किसी तरह की मां-बहन की भावना नहीं है, वहां पर पानी ऐसा साफ दिखता है कि नदी या झील की तलहटी की रेत के कण भी गिन लें। 

तमिलनाडु जैसे पढ़े-लिखे और विकसित राज्य में स्कूल-कॉलेज बाकी भारत से बेहतर माने जाते हैं, और वहां पर अगर फर्जी एनसीसी कैम्प लगाकर लड़कियों का ऐसा शोषण किया गया है, तो यह बहुत अधिक हैरान और हक्का-बक्का करने वाली घटना है। अधिक सदमा इस बात से भी पहुंचता है कि जब एक छात्रा ने कैम्प आयोजक शिवरामन द्वारा अपने यौन-शोषण की शिकायत प्रिंसिपल से की, तो प्रिंसिपल ने उसे अनसुना कर दिया, और घटना को छिपाने की कोशिश की। इसके बाद लडक़ी ने अपने मां-बाप को बताया तो वे पुलिस के पास गए, और तब इस मामले का भांडाफोड़ हुआ। इसमें 11 लोग गिरफ्तार हुए हैं जिसमें फर्जी एनसीसी कैम्प आयोजक, प्रिंसिपल, दो टीचर, और एक पत्रकार भी शामिल हैं। शुरू में मामले को दबाने में लगे स्कूल के लोगों पर अब नाबालिग छात्राओं की मेडिकल कॉलेज के बाद पॉक्सो एक्ट के तहत भी कार्रवाई हुई है। 

बंगाल की घटना को लेकर देश भर में भूचाल आया हुआ है, और कई दूसरे प्रदेशों में सत्तारूढ़ पार्टियां बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार पर हमले कर रही हैं। कोलकाता के मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में जितना भयानक रेप-मर्डर हुआ है, उसके चलते देश में यह भूचाल स्वाभाविक है। लेकिन इसे सिर्फ  बंगाल की घटना मानकर छोड़ देना ठीक नहीं होगा। देश भर में तकरीबन हर प्रदेश में महिलाओं की हालत एक जैसे खतरे में हैं। लोगों को याद होगा कि मणिपुर में आदिवासी महिलाओं के साथ जो सामूहिक और सार्वजनिक यौन-शोषण हुआ था, उस पर वहां के भाजपा मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के टेलीफोन कॉल की बातचीत की जो रिकॉर्डिंग जांच आयोग को दी गई है, उसमें ऐसे सेक्स-जुर्म के लिए उनका बर्दाश्त साफ-साफ दिखाई पड़ता है। सीएम ने एक बैठक में आदिवासी महिलाओं को बिना कपड़े उनके बदन के साथ खेलते हुए हिंसक भीड़ जिस तरह का बर्ताव कर रही थी, सीएम उसे न्यायोचित ठहराते सुनाई देते हैं। सत्तारूढ़ और दूसरे राजनीतिक दलों का इस तरह का हाल बहुत से प्रदेशों में दिखाई पड़ता है, कहीं कम, कहीं ज्यादा। कुल मिलाकर हालत यह है कि महिलाओं पर होने वाले रेप से अगर कोई राजनीति न सधे, तो फिर ऐसी शिकार महिलाओं के साथ कोई नेता और पार्टियां खड़े भी न हों। यह तो पार्टियों को एक-दूसरे पर हमला करने का मौका मिलता है, बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला के तबके से हमदर्दी दिखाते हुए, दरअसल उसे भडक़ाने का मौका मिलता है, इसलिए कहीं जुलूस निकलते हैं, तो कहीं मोमबत्तियां जलती हैं। बहुत से नेता, और सामाजिक आंदोलनकारी सच्ची हमदर्दी के साथ भी महिलाओं के साथ खड़े रहते हैं। यह पूरा सिलसिला देश में स्थाई रूप से पैर जमा चुका एक परले दर्जे का पाखंड साबित करता है, और इससे यह देश कैसे उबर पाएगा, यह सोच पाना भी मुश्किल है। अलग-अलग राज्यों और देश की संवैधानिक संस्थाओं का रूख भी अलग-अलग पार्टियों के राज वाले प्रदेशों के एक सरीखे बलात्कार को लेकर इतना अलग-अलग रहता है कि लगता है कि देश के कुछ राज्य विदेश हैं। देश में जिस वक्त महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, और अनुसूचित जनजाति आयोग, अल्पसंख्यक आयोग की धारणा शुरू हुई, उस वक्त किसी को यह अंदाज भी नहीं था कि ये संस्थाएं उनमें मनोनीत करने वाले नेताओं की पार्टियों के प्रकोष्ठ सरीखी होकर रह जाएंगी। अब जब देश भर में यही हाल चल रहा है, तो किस सरकार को अधिक बुरा कहा जाए? सच तो यह है कि जब तक संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक मनोनयनों से बाहर नहीं किया जाएगा, तब तक सरकारों से सवाल करना बड़ा मुश्किल होगा। हम पिछले कई बरस से यह बात उठाते आ रहे हैं, और देश में हर कुछ हफ्तों में ऐसी घटना होती है जो कि इसकी अधिक जरूरत साबित करती है। फिलहाल किसी प्रदेश में हुई घटना पर वहां की सत्तारूढ़ पार्टी के विरोधी नेताओं का देश भर से जाकर गिद्धों की तरह मंडराना, उनकी अपनी पार्टी के राज वाले प्रदेशों की घटनाओं पर भी सवाल उठाता है। भारतीय राजनीति को देखने वाले लोगों को नीयत की ऐसी बेईमानी जरूर समझनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)


दीवारों पर लिक्खा है, 19 अगस्त 2024


 

सीखने के लिए तो जामताड़ा सरीखे मुजरिम शहर से भी कामयाबी सीखी जा सकती है

   19 अगस्त 2024

 जिस बांग्लादेश को लेकर आज हिंसा और उपद्रव की खबरें चारों तरफ छाई हुई हैं, अभी कुछ अरसा पहले तक ही वही बांग्लादेश जीडीपी में भी भारत से भी आगे हो गया था क्योंकि वहां पर अब हट चुकी हसीना सरकार ने अपने बेहतर दिनों में लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय रोजगार जुटाए थे। दुनिया भर की चारों तरफ की कंपनियां अपने महंगे कपड़े बांग्लादेश में सिलवाती थीं, जूते और खेल के सामान वहां बनते थे, और बिना किसी अधिक पढ़ाई-लिखाई के लोगों को मामूली ट्रेनिंग देकर बांग्लादेश ने आम लोगों के लिए अभूतपूर्व रोजगार जुटा दिए थे। भारत में भी कई जगह इस तरह की कहानियां सामने आती हैं। और जरूरी नहीं कि कामयाबी की कहानियां सिर्फ अच्छी बात की हों, झारखंड के जामताड़ा नाम के गांव-कस्बे में हजारों या दसियों हजार लोग टेलीफोन पर जालसाजी के धंधे में ऐसे लगे कि बात की बात में गांव से बेरोजगारी खत्म हो गई, और हर कोई साइबर-मुजरिम बन गए। अब हरियाणा के मेवात इलाके के कुछ गांवों का नाम आ रहा है कि उन्होंने जामताड़ा को भी पीछे छोड़ दिया है। अभी पिछले पखवाड़े ही पश्चिम भारत के एक किसी कस्बे की रिपोर्ट आई थी कि किस तरह वहां एक पूरा का पूरा कस्बा शादी के उद्योग में तब्दील हो गया है, और देश भर से लोग वहां शादी के लिए पहुंचते हैं, वहां विवाह मंदिर पंडित से लेकर वकील तक, फोटोग्राफर से लेकर वीडियोग्राफर तक सबका इंतजाम रखते हैं, और कानूनी रूप से जांच के बाद शादी के सुबूत देने वाले संस्कार करवाए जाते हैं, और कम खर्च में शादी के सभी विधि-विधान वैधानिक जरूरतों के साथ-साथ पूरे हो जाते हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि किस तरह वह कस्बा एक-एक दिन में सैकड़ों शादियां करवाता है। अभी मध्यप्रदेश के चंबल इलाके की एक रिपोर्ट एक अखबार भास्कर में आई है कि किस तरह डकैतों के आतंक वाले इस इलाके में अब बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इतनी फैक्ट्रियां लगा ली हैं कि रात की शिफ्ट में भी अब वहां महिलाएं पूरी हिफाजत के साथ काम करती हैं, और सबकी अच्छी खासी कमाई हो रही है। कई फैक्ट्रियों में पुरूषों से ज्यादा महिला कर्मचारी हो गई हैं। यह मामला करीब-करीब बांग्लादेश जैसा दिख रहा है, और इस इलाके में अगर मामूली टेक्नॉलॉजी ट्रेनिंग के साथ काम करने की संस्कृति इसी तरह बढ़ गई तो कोई हैरानी की बात नहीं है कि यहां के कारखानों को सिलाई या दूसरे कामों के अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर भी मिलने लगें। भारत में मजदूरी अभी भी दुनिया के कई देशों के मुकाबले सस्ती है, बिजली भी भरपूर है, और सौर ऊर्जा का भविष्य दुनिया में सबसे अच्छा यहीं पर रहने वाला है।

देश के अलग-अलग प्रदेशों को जगह-जगह बिखरे ऐसे गांवों की कामयाबी का अध्ययन करना चाहिए। देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान, आईआईएम, और आईआईटी भी इनका अध्ययन कर सकते हैं कि इन गांव-कस्बों में ऐसा क्या था कि कोई कारोबार यहां उस ऊंचाई पर पहुंच गया जहां देश की बाकी जगहों को वैसी कामयाबी नहीं मिली। हमें याद है कि जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तब एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाते हुए इस संपादक ने राजधानी रायपुर के जिले के ही कुछ गांवों में जाकर शूटिंग की थी, और उनमें से एक गांव ऐसा था जिसमें करीब साढ़े चार सौ घरों में हाथकरघे लगे थे, उन्हें ओडिशा के व्यापारी आकर धागा, रंग, और डिजाइनें दे जाते थे, और विश्वविख्यात संबलपुरी साडिय़ां छत्तीसगढ़ के इस गांव में भी बनती थीं। राज्य बन ही रहा था, और उस वक्त यहां बिजली की भारी कमी थी, और छोटे-छोटे घरों में लगे हुए हाथकरघे पर काम करने के लिए एक ट्यूबलाईट की भी बिजली नहीं मिलती थी। उस गांव के जितने लोगों से बात हुई थी, उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार से या यहां के किसी बैंक से कोई भी मदद नहीं मिली थी, लेकिन गांव इतना आत्मनिर्भर था कि कैसा भी अकाल पड़े, वहां के लोग काम करने बाहर नहीं जाते थे।

किसी गांव या इलाके की तस्वीर बदलने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं लगती। एक अकेले वर्गीज कुरियन ने गुजरात के आनंद में देश की सबसे बड़ी सहकारी डेयरी खड़ी कर दी, और इसके साथ-साथ उन्होंने दुग्ध उत्पादनों का सबसे ब्रांड, अमूल भी खड़ा कर दिया। उन्हें देश में श्वेत क्रांति का जनक कहा जाता है, और 1949 में डेयरी टेक्नॉलॉजी के इंजीनियर कुरियन को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गुजरात में दुग्ध उत्पादकों के सहकारी आंदोलन का प्रयोग करने के लिए भेजा था। उसके बाद से इस एक अकेले आदमी ने भारत सरकार से मिले अधिकारों की बदौलत हिन्दुस्तान में दूध के कारोबार का नक्शा ही बदल दिया। केरल का यह आदमी गुजरात के रास्ते देश के हर घर में पहुंच गया। आज देश का शायद ही कोई ऐसा घर हो जो अमूल दूध से लेकर चॉकलेट और आइस्क्रीम तक किसी न किसी चीज का इस्तेमाल न करता हो। दूध उत्पादकों के सहकारी आंदोलन की अंतरराष्ट्रीय मिसाल कायम करने वाले कुरियन को मैग्सेसे पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण सहित खाद्यान्न और किसानी के जाने कितने ही अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले।

हमारा मानना है कि अगर कोई सचमुच के कल्पनाशील व्यक्ति हों, तो वे सरकार या समाज से मिले सहयोग और प्रोत्साहन से किसी इलाके की संभावनाओं को आंककर वहां के लोगों को बढ़ावा देकर उसे आसमान तक पहुंचा सकते हैं। हर प्रदेश में ऐसी संभावनाएं रहती हैं, और यह जरूरी नहीं है कि ये कल्पनाशील लोग सरकार के भीतर के ही हों। आज अमरीका अगर दुनिया का सबसे कामयाब और ताकतवर देश बना हुआ है, तो वह इसलिए नहीं है कि वहां की सरकार खुद तमाम काम करने में भरोसा रखती है। अमरीकी सरकार ने दुनिया भर से वहां पहुंचे हुए लोगों का हौसला जितना बढ़ाया है, उन्हें काम करने का मौका बिना सरकारी दखल और बिना सरकारी उगाही के जिस हद तक दिया है, उससे ऐसे तमाम लोग खुद भी आगे बढ़े, और उनकी कामयाबी में टैक्स के रास्ते सरकार का अपना हिस्सा तो रहता ही है। इसलिए अमरीकी सरकार ने खुद अधिक काम करने के एकाधिकार के बजाय लोगों को खुली छूट दी कि वे अपनी कल्पनाओं को आसमान तक पहुंचाएं। और इसके लिए अमरीका ने दुनिया भर से वहां पहुंचे हुए तमाम लोगों को बराबरी से बढ़ावा दिया, तब जाकर ऐसी बेमिसाल कामयाबी हासिल हो सकी।

भारत के अलग-अलग प्रदेश भी यह सोच सकते हैं कि क्या उनके यहां राजस्थान के कोटा जैसा कोई ट्रेनिंग कारोबार खड़ा हो सकता है, या हस्तशिल्प और हाथकरघा का कोई नया केन्द्र बन सकता है, या अंतरराष्ट्रीय रोजगार के लायक लोगों के शिक्षण-प्रशिक्षण का केन्द्र खड़ा किया जा सकता है? सरकार का अपना ढांचा अगर इतना कल्पनाशील न भी हो पा रहा है, तो भी उसे चाहिए कि वह निजी क्षेत्र को, सहकारी क्षेत्र को, या देश-विदेश के पूंजीनिवेशकों को लाकर अपने प्रदेश में कुछ ऐसा अनोखा काम करवाए कि जिससे इलाके की तस्वीर बदल जाए। अब अगर कोई कस्बा सिर्फ शादी उद्योग चलाकर अरबों रूपए सालाना कमा सकता है, तो फिर ऐसी कई दूसरी कल्पनाएं भी शक्ल ले सकती हैं।

(Daily Chhattisgarh)