31 मई 2013
संपादकीय
बच्चों के लिए काम करती एक संस्था की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले दस सालों में भारत को कुपोषण के कारण कोई 26 खरब रुपयों का नुकसान हो सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि कुपोषण के कारण भारत के 20 फीसदी बच्चे कम साक्षर हो पा रहे हैं, कुपोषित बच्चों की कमाई 20 फीसदी तक कम हो सकती है। यही नहीं, इस रिपोर्ट के मुताबिक कुपोषित बच्चों को पढऩे-लिखने में दिक्कत होती है, स्कूलों में उनका प्रदर्शन स्तरीय नहीं रह पाता। तकरीबन आधे कुपोषित बच्चों वाले भारत में पिछले दिनों बाल कुपोषण की स्थिति पर बहुत कुछ लिखा बोला गया है, लेकिन सेव द चिल्ड्रन की इस 'फूड फॉर थॉटÓ कही जा रही इस रिपोर्ट में भारत के लिए अहम बात यह है कि इस रिपोर्ट में हजारों बच्चों में कुपोषण की स्थिति का अध्ययन इथियोपिया जैसे भुखमरी से पीडि़त देश, वियतनाम जैसे युद्ध और संघर्षग्रस्त देश, पेरू जैसे पिछड़े देश के साथ भारत में भी किया गया। देश के योजनाकारों के लिए शायद यह कोई चौंकने वाली बात हो सके।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में कुपोषण के ऊंचे स्तर को राष्ट्रीय शर्म करार दिया था। ऐसे दौर में जब भारत आर्थिक ताकत बनकर उभरा है, उसकी भावी पीढ़ी के पैंतालीस फीसदी का कुपोषित होना आर्थिक तरक्की के तमाम दावों के ऊपर एक सवाल तो है ही। बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता वैश्वीकरण और उदारवादी नीतियों से गरीबी बढऩे की बात करते हैं। बहुतों का यह भी मानना है कि विकास से सब कुछ ठीक हो जाता है, और यह गरीबी और कुपोषण कुछ वक्त की बात है, लेकिन भारत जैसे सामाजिक विविधता और परंपराओं वाले देश में कुपोषण के नतीजों के गहरे सामाजिक असर हो सकते हंै, जिनका इलाज शायद केवल विकास से न हो सके। देश में लिंग, जाति, और संप्रदाय के भेदभाव अभी भी कायम हैं। ऐसे में कुपोषण जैसी स्थिति का सबसे बुरा असर उन पर पड़ता है, जो कमजोर हैं। परिवार के भीतर बच्चियों, महिलाओं पर, और समाज में पिछड़े और दलित लोगों पर।
सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट में भारत में कुपोषण के कारण अर्थव्यवस्था को हो रहे नुकसान का अंदाजा लगाया गया है, लेकिन इस रिपोर्ट से परे अगर देखें तो तरक्की की दौड़ में पिछड़ जाने वाले वर्ग में जो असंतोष पनपता है, वह धीमे-धीमे गरीब अमीर के आपसी तनाव का रूप ले लेता है, यह असंतोष तब और बढ़ जाता है, जब देश की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ जाए, और उसमें सामान्य लोगों के लिए भी मौके सिकुड़ जाएं। ऐसे में कमजोर कुपोषित बच्चों और उनके माता-पिता, सामान्य और सम्पन्न बच्चों और उनके माता-पिता की तरह विकास के मौके नहीं हासिल कर पाते। पिछले तीस सालों के दौरान लगातार बढ़ी सम्पन्न और गरीब वर्ग के बीच की खाई, ऐसी हालत में और चौड़ी नजर आती है। दो साल पहले दुनिया भर में चले 'ऑकुपाईÓ आंदोलन के मूल में भी यही निन्यानबे फीसदी गरीब बनाम एक फीसदी अमीर का संघर्ष था। यह आंदोलन दौलतमंदों की अमीरी से गरीबों की जलन के कारण नहीं, बल्कि समाज में गहरे पैठी नाइंसाफी के अहसास के कारण इतना कामयाब हुआ, हालांकि इसका कुछ हद तक श्रेय मर्सिडीज जैसे गाडिय़ों का प्रचार करने वाली जन संपर्क फर्म 'वर्क हाऊसÓ को भी था, लेकिन वर्क हाऊस अपने काम में वाहवाही इसलिए बटोर सकी कि लोगों के दिलों में नाइंसाफी का अहसास, और उससे नाराजगी थी। कभी-कभार ऐसे सामाजिक असंतोष कितने गंभीर राजनीतिक और सामरिक मोड़ ले लेते हंै, इसकी मिसाल यह खुलासा था कि, इस शांतिपूर्ण आंदोलन पर निगरानी के लिए एफबीआई ने अमरीका की आंतरिक सुरक्षा देखने वाले होमलैन्ड डिपार्टमेंट के साथ मिलकर आतंकवादियों से निपटने वाली टुकड़ी का इस्तेमाल किया। यह नाइंसाफी का एक अलग दौर शुरू करने के लिए काफी था।
हमारा मकसद यहां कुपोषण के बुरे नतीजों को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर डरावना मंजर खड़ा करना नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि कुपोषण के इस ऊंचे स्तर से देश में एक बहुत बड़ा ऐसा वर्ग तैयार हो रहा है, जो कई सारी मुश्किलों के कारण देश में असंतोष को बढ़ावा देगा। यह कल्पना ही की जा सकती है कि ऐसा असंतोष अगर पहले से ही अभावग्रस्त चल रहे इलाकों, लेकिन अब तक नक्सल हिंसा से बचे इलाकों में फैले, तो कौन-कौन सी समस्याएं सरकार और समाज के सामने और खड़ी हो सकती हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म करार देते हुए कहा था कि यह इस बात का सुबूत है कि इस समस्या से उबरने के लिए सरकार केवल एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के भरोसे नहीं रह सकती, लेकिन क्या खाने की जगह परिवार के मुखिया को नकद थमा देने से इस समस्या में कोई मदद मिल सकेगी? क्या समाज इसके लिए तैयार है या नहीं, इस पर कोई गंभीर अध्ययन किया गया है? और सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही तय करने का है। खाद्य सुरक्षा योजनाओं, एकीकृत बाल विकास योजना, पूरक आहार योजनाओं, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था सबमें भारी लूट और अनियमितताओं का ठोस इलाज किए बिना कुपोषण से लड़ाई, इसके शुरू होने के पहले ही सरकार हार चुकी होती है। ऐसा नहीं है कि यह कोई नामुमकिन काम है। छत्तीसगढ़ ने सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में चोरी पर काबू करके बताया है, लेकिन सवाल राजनीतिक इच्छाशक्ति का है।















