धर्मसत्ता का हुक्म मानने जुटे सर्वदलीय विधायक!

30 जून 2026  

 

कल पंजाब में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक खबरों में आकर चली गई, और उस पर अधिक चर्चा नहीं हुई। मामला चूंकि सिर्फ पंजाब तक सीमित था, और भारत के लोग अब अपने प्रदेश से परे के मामलों के बारे में अधिक नहीं सोचते, इसलिए लोगों को खबरों में मिली जानकारी भी अटपटी नहीं लगी। वहां सिक्ख पंथ की सर्वोच्च सत्ता, अकाल तख्त ने पंजाब के सिक्ख मंत्रियों और विधायकों को बुलाया। और उन्हें बिठाकर यह कहा कि पंजाब में लागू बेअदबी विरोधी कानून की ‘आपत्तिजनक’ धाराएं एक महीने के भीतर हटाएं। इस बैठक के पहले 15 जून को अकाल तख्त ने सभी सिक्ख विधायकों और मंत्रियों को इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण के लिए पेशी की तारीख दी थी। पंजाब के बेअदबी विरोधी कानून में गुरू ग्रंथ साहिब से जुड़े कुछ पहलू हैं, जिन पर अकाल तख्त ने यह निर्देश दिया कि इस पर तय करने का अधिकार सरकार या विधानसभा का नहीं है, बल्कि पंथ और अकाल तख्त साहिब का है। कल की अकाल तख्त की पंथक कचहरी में राज्य के 87 मंत्री-विधायक पहुंचे, जो कि अलग-अलग पार्टियों के भी थे।

भारत के किसी भी और राज्य में किसी धर्म की सत्ता ऐसी नहीं है कि वह सरकार में शामिल, या विधानसभा में निर्वाचित अपने धर्म के किसी भी व्यक्ति को पंथक (पंथ के) नोटिस भेजकर पेशी पर बुलवा सके। पंजाब में सिक्ख धर्म का संगठन, सिक्खों की सबसे बड़ी पार्टी अकाली दल, इन दोनों के अंतरसंबंध ऐसे हैं कि राजनीति हमेशा धर्म के मातहत काम करते दिखती है। और अकाली दल से परे भी दूसरी पार्टियों के ऐसे नेताओं का बड़ा लंबा इतिहास है जिन्हें धर्म ने कोई सजा दी, और उन्होंने उस सजा को मंजूर करते हुए उसे भुगता। इसी के चलते आज यह नौबत है कि अकाल तख्त ने सभी पार्टियों के सिक्ख विधायकों-मंत्रियों को बुलाया, और वे तकरीबन सभी वहां पर पहुंचे। मुख्यमंत्री भगवंत मान एक दूसरे नोटिस पर अभी कुछ ही दिन पहले वहां होकर आए ही थे।

पंजाब में बेअदबी के मामले आमतौर पर गुरू ग्रंथ साहिब के किसी तरह से अपमान समझी गई घटनाओं के रहते हैं। सिक्ख भावनाओं के मुताबिक इस मुद्दे पर किसी तरह का कोई समझौता नहीं होता, और इस ग्रंथ को गुरू मानने की भावना इतनी मजबूत है कि इसे कोई किताब नहीं कहा जाता, इसे स्वरूप कहा जाता है, और इसे किसी जीवित गुरू की तरह का सम्मान दिया जाता है। अकाल तख्त और सिक्ख धर्मगुरूओं की ताजा आपत्ति सिक्ख शब्दावली को लेकर है, और अकाल तख्त का कहना है कि पंथिक सहमति के बिना सरकार या विधानसभा कोई शब्द या परिभाषा तय नहीं कर सकते। धर्मगुरूओं का कहना है कि धार्मिक मर्यादा, उपासना पद्धति, और आंतरिक अनुशासन के मामलों में ग्रंथी, गुरूद्वारा प्रबंधक समितियां, और संगत को सरकारी दंडात्मक कानून के अधीन नहीं लाना जाना चाहिए। धर्म के सारे मामलों में अंतिम अधिकार सिर्फ धार्मिक संस्थाओं के पास रहना चाहिए।

इस भावना को इस पूरे मामले को ठीक से न जानने वाले लोग समझ भी नहीं पाएंगे। जब बेअदबी विरोधी कानून बना, तो उसमें गुरू ग्रंथ साहब के प्रत्येक स्वरूप (किताब) का केन्द्रीय रजिस्टर बनाने, और उन्हें अलग-अलग क्रम संख्या देने का प्रावधान रखा गया था, ताकि बेअदबी की कोई भी शिकायत आने पर बारीकी से जांच की जा सके। इस पर सिक्ख संगठनों ने यह विरोध दर्ज कराया था कि पवित्र ग्रंथ को सरकारी रिकॉर्ड के सामान की तरह क्रम संख्या के साथ दर्ज करना धार्मिक भावनाओं के अनुरूप नहीं है। अकाल तख्त शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी की शिकायत है कि यह कानून उनसे पर्याप्त परामर्श के बिना पारित किया गया है। पंथ की इस सोच के आलोचक यह कहते हैं कि लोकतंत्र में विधानसभा में पारित कानूनों में संशोधन का अधिकार केवल निर्वाचित विधायकों, और संवैधानिक संस्थाओं को हो सकता है, जब कोई बाहरी धार्मिक संस्था ऐसे फेरबदल के लिए विधायकों को बुलाकर उन्हें एक समय सीमा का निर्देश दे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। दिलचस्प बात यह है कि पंजाब के कुल 117 विधायकों में से 87 वहां मौजूद थे, जो कि अपने को सिक्ख मानते हैं। बाकी दूसरे धर्मों के विधायकों को वहां बुलाया भी नहीं गया था। लेकिन एक दिलचस्प सवाल खड़ा होता है कि क्या पार्टियों की दलगत निष्ठा से परे विधायकों को, या सांसदों को, उनके सदनों में कुछ करने के लिए क्या उनके धार्मिक संगठन निर्देश दे सकते हैं? क्या इन निर्वाचित सदस्यों को ऐसे निर्देश मानने चाहिए? क्या यह संवैधानिक लोकतंत्र के ऊपर एक धार्मिक सत्ता है? ऐसे कई असुविधा के सवाल लोकतंत्र में उठने चाहिए, लेकिन पंजाब में धर्म का दबदबा कुछ ऐसा है कि धर्म की असुविधा के सवाल न पूछे जाते, न आमतौर पर सोचे जाते। लेकिन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि 80 के दशक में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए स्वर्ण मंदिर में धर्म की सत्ता किस हद तक चली गई थी, और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद देश में कैसी-कैसी हिंसक घटनाएं हुई थीं। वे बरस सरकार पर धर्म के दबदबे का एक अच्छी तरह दर्ज दौर थे। यह चर्चा बहुत से लोगों के लिए अप्रिय हो सकती है, कई लोगों के लिए असुविधा की हो सकती है, और कुछ लोग इसे आपत्तिजनक भी मान सकते हैं। लेकिन हम लोकतंत्र में संवैधानिक सत्ता, और धर्म के अंतरसंबंधों को चर्चा से परे नहीं मानते। पंजाब देश में अकेला ऐसा राज्य है जहां धर्म पर आधारित पार्टी एक सबसे बड़ी पार्टी रही, जहां किसी भी पार्टी में रहने वाले सिक्ख नेता अकाल तख्त के प्रति जवाबदेह रहे, और देश के कानून में, नियमों में सिक्खों को मिला हुआ विशेष दर्जा, उन्हें मिली हुई विशेष छूट की वजह से यह पूरा मामला हमेशा ही बड़ा संवेदनशील रहा।

हमने अकाल तख्त से बड़े-बड़े सिक्ख नेताओं को मिली सजा का इतिहास देखने की कोशिश की, तो वह 19वीं सदी में महाराजा रणजीत सिंह का भी मिला, जिन्हें अकाल तख्त ने सजा सुनाई थी। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पंजाब के एक पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला, पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल और उनका पूरा मंत्रिमंडल, ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब अकाल तख्त ने सत्तारूढ़ रहे नेताओं को उनके सरकारी कामकाज के लिए सजा सुनाई, और उन्होंने उसे मंजूर किया। लोकतंत्र में निर्वाचित विधानसभा या संसद, और किसी धर्म की सत्ता के बीच रिश्ते कैसे रहने चाहिए, इस पर सोच-विचार का एक मौका पंजाब के इस ताजा मामले से सामने आता है, जिन लोगों में सोच-विचार का हौसला हो, वे यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पूरी कर सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

एलन मस्क का कहा न सुनें, तो भी भारत सरकार के कैबिनेट सेक्रेटरी को तो सुनें!

29 जून 2026  

 

भारत सरकार के सबसे बड़े अफसर, कैबिनेट सेक्रेटरी ने अभी देश के सभी मंत्रालयों के सचिवों और दूसरे नौकरशाहों को एक पत्र भेजा है जिसमें उन्होंने सरकारी बैठकों को असरदार बनाने के बारे में लिखा है, और गैरजरूरी बैठकों को घटाने के बारे में भी। इस पत्र के मुताबिक उनका मानना है कि सरकारी दफ्तरों में होने वाली अंतहीन और लंबी बैठकें अफसरों के कामकाज को घटा रही हैं, और उनका मानसिक तनाव बढ़ा रही हैं, इसलिए बैठकें छोटी, असरदार, और नतीजा-केन्द्रित बनाने को कहा गया है। उन्होंने लिखा है कि बैठक बुलाने के पहले संबंधित अधिकारी के दिमाग में उसका मकसद, और उससे अपेक्षित परिणाम एकदम साफ रहना चाहिए। लंबी और थकाऊ बैठकों, उसमें स्क्रीन पर दिखाए जाने वाले पावर पॉइंट प्रजेंटेशन को घटाने के लिए कहा गया है ताकि वक्त बर्बाद न हो। उन्होंने लिखा है कि बैठकों को इतना सीमित रखा जाए कि उसमें शामिल सभी लोगों को अपना नियमित काम करने के लिए पर्याप्त वक्त मिले। 

अभी चार दिन पहले ही हम बैठकों के बारे में दुनिया के सबसे संपन्न व्यक्ति, एलन मस्क की बातंह पढ़ रहे थे। वे इतनी बड़ी-बड़ी, और कामयाब कंपनियों के मुखिया हैं, कंपनियों में इतनी विविधता है कि वे चाहें तो चौबीसों घंटे बैठकों में गुजार सकते हैं। लेकिन वे कंपनियों की लंबी-लंबी बैठकों के भयानक खिलाफ हैं। वे जरूरत से ज्यादा, और लंबी बैठकों को एक किस्म का अभिशाप या रोग कहते हैं। उनका कहना है कि बैठकें कर्मचारियों की कार्यक्षमता को निचोड़ देती हैं, उनका मनोबल गिराती हैं, और कीमती वक्त को बेरहमी से बर्बाद करती हैं। उन्होंने 2018 में अपनी सबसे प्रमुख कंपनी टेस्ला के कर्मचारियों को एक ईमेल भेजा था, जो बाहर आ गया। इसके मुताबिक मस्क का सबसे मशहूर और क्रांतिकारी नियम है कि सिर्फ शराफत, सम्मान, या औपचारिकता दिखाने के लिए मीटिंग में बैठे रहना सबसे बड़ी बेवकूफी है। वे अपने कर्मचारियों को यह छूट देते हैं कि जैसे ही लोगों को यह समझ आ जाए कि वे किसी मीटिंग, या टेलीफोन कॉल में कोई सकारात्मक योगदान नहीं दे पा रहे हैं, उन्हें तुरंत उससे बाहर हो जाना चाहिए। उनका मानना है कि मीटिंग छोडक़र जाना अशिष्टता नहीं है, बल्कि किसी को जबर्दस्ती वहां रोककर उसका समय बर्बाद करना असली अशिष्टता है। मस्क ने बड़ी-बड़ी बैठकों के खिलाफ खूब जमकर कहा है कि अधिक लोगों की मौजूदगी वाली बैठकें दिखावे की रह जाती हैं, और उनमें काम की बात कम हो पाती है। उन्होंने कहा कि जब तक यह बिल्कुल पक्का न लगे कि वहां मौजूद हर व्यक्ति के लिए मीटिंग में रहना जरूरी है, तब तक वैसी कोई बैठक न रखें, उनका कहना है कि किसी कंपनी को बार-बार बैठकें करनी पड़ रही है तो इसका सीधा मतलब है कि कंपनी का अंदरुनी ढांचा, या आपस में बातचीत का तरीका पूरी तरह बिगड़ा हुआ है। उनका कहना है कि एक ही कमरे में छह समझदार लोगों का बैठकर किसी मामूली, या बेकार सी चीज पर चर्चा करना इंसानी क्षमता का सबसे खराब इस्तेमाल है। 

अब ये दो बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं, एक तो दुनिया के एक सबसे बड़े देश की केन्द्र सरकार के सबसे बड़े अफसर की सोच है, और एक धरती के दूसरे तरफ एक पूंजीवादी कारोबारी मुखिया की सोच है। भारत सरकार के सबसे बड़े अफसर के सामने देश भर की चुनौतियां अलग तरह की रहती हैं, और अमरीका के सबसे बड़े कारोबारी के सामने अलग तरह की। लेकिन हमने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारों की बैठकों को बीती करीब आधी सदी से देखा और सुना है, और यह हमेशा लगते रहा है कि अधिकतर बैठकें औपचारिकता के लिए होती हैं, या गैरजरूरी भीड़ इकट्ठा करके होती हैं, या जरूरत से अधिक लंबी चलती हैं। कई ऐसी बैठकें होती हैं जिनमें सबसे सीनियर व्यक्ति कई मुद्दों पर अपनी निजी यादों पर उतर आते हैं, और उनमें बैठकों का बहुत सारा वक्त चले जाता है। चूंकि बैठक की अध्यक्षता, या अगुवाई कर रहे व्यक्ति अपने संस्मरण बताने लगते हैं, तो उनके मातहत लोग तो अपने मोबाइल फोन भी नहीं देख सकते। सरकारी हो, निजी कंपनी की हो, या किसी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन की, किसी भी तरह की बैठक में एक बड़ा हिस्सा अनर्गल बातों पर खर्च होता है। फिर यह भी होता है कि बैठक के मुखिया का मूड अगर किसी से उखड़ जाता है, तो फिर उसे सबके सामने बुरी तरह बेइज्जत करके उसका मनोबल तोड़ दिया जाता है। कई बार यह भी होता है कि किसी जूनियर से पहले से नाराजगी रहती है, और उसे बेइज्जत करने के लिए बैठकों की राह देखी जाती है। निजी कंपनियों में भी कई ऐसी बैठकें होती हैं जिनमें खर्च को काबू करने वाले लोग, और कारोबार की बढ़ोत्तरी के लिए निवेश करने वाले लोग एक साथ बिठा दिए जाते हैं, और दो बिल्कुल अलग-अलग प्राथमिकताओं और नजरियों की वजह से बैठक चौपट हो जाती है। यह कुछ वैसा ही होता है जैसा कि सरकार में शराब कारोबार से आय बढ़ाने की बैठक में नशा उन्मूलन विभाग के लोगों को भी बिठा दिया जाए, और वे एक-दूसरे का वक्त बर्बाद करते रहें। बैठकों को बहुत सीमित, बहुत केन्द्रित, सिर्फ जरूरत के लोगों सहित, और निजी संस्मरणों से रहित रखना आसान नहीं है। फिर अभी बैठकों से परे भी जो ज्ञान-विज्ञान की चर्चाएं होती हैं, उनमें भी विशेषज्ञ और जानकार लोग कम्प्यूटर पर पहले से तैयार पड़े हुए पावर पॉइंट प्रजेंटेशन को खपाते रहते हैं। वे अपनी विशेषज्ञता के हिसाब से पहले से जो स्लाइड्स बनाकर रखते हैं, उन्हें ही स्क्रीन पर पेश करते जाते हैं, और उनकी प्राथमिकता अपने हुनर और अपने ज्ञान की नुमाइश रहती है। जिस तरह शादी की किसी बड़ी दावत में आर्केस्ट्रा पार्टी जरूरत से कई गुना ऊंची आवाज में स्पीकर रखती है, क्योंकि वह चाहती है कि सब लोग उसका संगीत ही सुनें, उसी तरह किसी बैठक में पीपीपी दिखाने वाले लोग बैठक की जरूरतों से परे भी अपनी मेहनत को दिखाते जाते हैं। बैठक जितनी ही गैरजरूरी रहती है, वह उतनी ही जल्दी पटरी से उतर जाती है, और बैठक में मौजूद हर किसी को सीमित समय में अपनी जरूरी बातें कहने की ट्रेनिंग भी नहीं मिली रहती है। बैठक में बहुत सारे लोगों को अपनी जरूरत की बातों से परे भी अपने ज्ञान को बघारने का शौक रहता है, उसमें वहां मौजूद सारे लोगों का वक्त बर्बाद होते जाता है। 

अब चूंकि भारत सरकार के सबसे बड़े नौकरशाह ने यह बात उठाई है, तो हम मानते हैं कि केन्द्र सरकार की सेवाओं के सारे अफसर इस पर गौर करेंगे। आईएएस, आईपीएस, और आईएफएस, इन तीन सेवाओं के अधिकारी ही देश में शायद तीन चौथाई सरकारी बैठकों के लिए जिम्मेदार होते हैं। इन सबके लिए कैबिनेट सचिव का कहा हुआ महत्वपूर्ण रहता है। इसलिए देश यह उम्मीद कर सकता है कि कम से कम कुछ फीसदी आला अफसर तो मीटिंग-मीटिंग खेलना छोडक़र सीमित संवाद से, रूबरू बातचीत से, या छोटी बैठक से काम चलना सीखने की कोशिश करेंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

बेवफाई और हिंसा घटाने, एआई के साथ मिलकर मैंने बनाया मैच-मेकिंग मॉडल..

28 जून 2026

किसी नए काम की सोच, कल्पना, और तैयारी एक नए उत्साह से भर देती हैं। मारूति के एक पुराने इश्तहार की तरह पेट्रोल खत्म ही नहीं होता है। अभी दो दिन पहले पड़ोस के एक जिले की दो खबरंप आईं कि किस तरह एक नाबालिग लडक़े ने अपनी कुछ घंटे पहले बालिग हुई प्रेमिका को इसलिए मार डाला कि वह बालिग होते ही शादी की जिद कर रही थी। मारते-मारते भी उसने एक बार और सेक्स तो कर ही लिया था, जो कि बहुत सारे लडक़ों और आदमियों का खास मकसद होता है। उसके बाद फिर मार डालने से दोनों काम एक साथ हो लिए, मजा भी पा लिया, और छुटकारा भी पा लिया। थोड़ी सी अक्ल होती तो कैद पा लेने की भी कल्पना कर ली होती। इसी जिले में एक बाप-चाचा ने लडक़ी को एक दलित से शादी करने के एवज में मार डाला। इन दो खबरों से, और इस तरह की हर दिन आने वाली दूसरे प्रदेशों की दर्जनों खबरों से बार-बार यह सोचने को मजबूर हो रहा था कि क्या शादी के पहले कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता कि बाद में न नीले ड्रम में बंद करना पड़े, न ही पहाड़ी से धकेलना पड़े? 

ऐसा सोचते-सोचते लगा कि शादी के पहले लडक़े-लडक़ी, और उनके परिवारों की सारी उम्मीदों और उनके तौर-तरीकों पर खुलकर अगर एक बात हो जाती, तो हो सकता है कि कई रिश्ते बनने से ही रह जाते, और बाद में खून फैलने से बच जाता। ऐसा लगा कि कुछ बुनियादी सवालों पर दोनों पक्षों की बात पहले हो जानी चाहिए, लडक़े-लड़कियों की आपस में अलग बातचीत, और दोनों परिवारों के साथ बैठकर फिर अलग से बातचीत। इससे वे मामले तो सामने आ जाते जो बाद में एक बड़े टकराव का मुद्दा बन सकते हैं। सवालों की एक ऐसी लंबी फेहरिस्त मैं सोच रहा था जिसे लोगों को सुझा सकूं, और जो हिंसा की आशंका और उसके खतरे को कम कर सके। यह सोचते-सोचते मैंने चैटजीपीटी के सामने यह बात रखी कि मैं ऐसा एक कॉलम लिखना चाहता हूं, और इसके लिए मुझे कुछ ऐसे सवाल सुझाइए जिसकी लिस्ट मैं छाप सकूं। मैंने अपने मन की बातें इस एआई को बताईं, और कहा कि सौ से अधिक सवाल बताएं जिन्हें दोनों पक्षों से पूछा जा सके। मैंने यह भी कहा कि कुछ सवाल सिर्फ लडक़े से पूछने लायक हो सकते हैं, और कुछ सिर्फ लडक़ी से पूछने के लायक क्योंकि भारतीय समाज व्यवस्था में इन दोनों की कई किस्म की भूमिकाएं अलग-अलग हैं, उनसे उम्मीदें अलग-अलग रहती हैं। 

इस पर करीब दो घंटे तक चैटजीपीटी से बात होती रही। मेरे सुझाए हुए अलग-अलग पहलुओं पर उसने करीब 110 सवालों की पहली लिस्ट दी, जिसमें पुराने प्रेमसंबंधों के बारे में भी सवाल थे। हमने यह तय किया था कि ये सवाल दोनों से अलग-अलग किए जाएंगे, और बाद में जवाबों को मिलाकर देखा जाएगा कि ये दोनों एक जोड़ा बनने लायक हैं या नहीं। एआई समझदार तो होता है, उसने तुरंत यह मान लिया कि भारत में कुंडली मिलाने से अधिक जरूरी जिंदगी को लेकर नजरिए का मिलान है। उसने कहा कि इन 110 में से 25-30 सवाल ऐसे हैं जिनमें गहरा मतभेद होने पर भविष्य में गंभीर संकट आ सकता है, विवाहेत्तर संबंध हो सकते हैं, अलगाव हो सकता है, या बात हिंसा तक जा सकती है। 

फिर हमने आगे बात बढ़ाई, और चर्चा की कि ये सवाल इन दोनों का एक-दूसरे से पूछना इसलिए ठीक नहीं होगा कि पहले के जवाब सुनकर दूसरे के जवाब प्रभावित होने का खतरा रहेगा। इसलिए इन दोनों से अलग-अलग कोई और पूछे, तो ही ठीक रहेगा, और इस सवाल-जवाब के दौरान परिवार के कोई लोग मौजूद भी न रहें। हमने यह सोचा कि परिवार से परे के किसी गंभीर, परिपक्व, शुभचिंतक को यह जिम्मा दिया जा सकता है। अगला आधा-पौन घंटा हमने सवालों को और बढ़ाने, उनका क्रम तय करने पर लगाया। चैटजीपीटी ने बड़े नाजुक पहलुओं के सवाल शुरू में रख दिए थे, और मेरे सुझाने पर उसने तुरंत ही सुधार मान लिया, और हल्के सवालों से शुरूआत करके सबसे आखिर में सबसे गंभीर सवाल रखे। फिर हमने यह तय किया कि इन सवालों में से हर किसी पर एक जैसे नंबर रखना ठीक नहीं है। कई सवाल ऐसे रहेंगे जो दूसरे सवालों के मुकाबले अधिक नाजुक और अधिक महत्वपूर्ण रहेंगे। लेकिन एक सवाल काफी देर तक हम दोनों के बीच बने रहा कि ये इंटरव्यू कौन करें? चूंकि पिछली प्रेम या सेक्स लाईफ को लेकर भी सवाल थे, बच्चों को लेकर क्या सोच है, शादीशुदा सेक्स लाईफ को लेकर दोनों की क्या उम्मीदें हैं, ऐसे भी सवाल थे, इसलिए यह खतरनाक लग रहा था कि इनके जवाबों को बाद में कोई मजे की अफवाह में इस्तेमाल न करे। बहुत देर तक सवालों, उनके अलग-अलग वजन पर चर्चा करने के बाद जब मुझे इस पूरे सिलसिले का खतरा समझ आया, तो मैंने चैटजीपीटी से कहा कि डॉक्टर और मनोचिकित्सक तो सैद्धांतिक शपथ से बंधे रहते हैं, वकीलों को भी अपने मुवक्किल की गोपनीयता बनाए रखने की शर्त रहती है, लेकिन जो लोग इस तरह के सवाल संभावित जोड़े से करेंगे, उन पर तो नैतिकता का कोई बोझ भी नहीं रहेगा। इसलिए गोपनीयता बनाए रखने की कोई उम्मीद इनसे नहीं की जा सकती। हमारी बातचीत में सवाल बढक़र दो सौ पार कर चुके थे, और इनमें कई ऐसे सवाल थे जिनके ईमानदार जवाब उस लडक़े या लडक़ी को बदनाम करने का सामान जुटाकर दे सकते थे। 

यहां पर आकर मैंने हथियार डाल दिए, चैटजीपीटी से कहा कि मैं इंसानों पर इतनी नाजुक बातचीत का भरोसा नहीं कर सकता। इसके लिए क्या एआई कोई मदद कर सकता है? क्या एआई सवाल पूछे, उसी को जवाब दे दिया जाए, और वह जोड़े की सोच का मिलान करके अपनी राय दे दे? चैटजीपीटी इसके लिए तैयार तो हुआ, लेकिन सवाल-जवाब के कुछ ऐसे पहलू उसने गिनाए जिनमें मशीन से परे इंसानी सामाजिक समझ से भी काम लेने की जरूरत पड़ेगी। लेकिन हमने इंसानों से पूरी तरह परे रखने के भी खतरे सोचे, तो एआई का कहना था कि इंटरनेट पर जो भी जवाब दिया जाएगा, वह कहीं न कहीं तो दर्ज होगा ही, और बाद में वैसी जानकारी जवाब देने वालों के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है। इस पर हमने एक ऐसी तरकीब निकाली, हम कहना नाजायज होगा, चैटजीपीटी ने ही यह तरकीब सुझाई कि एक ऑफलाईन प्रोग्राम ऐसा बनाया जा सकता है जिसमें बिना इंटरनेट और वाईफाई से जुड़े हुए किसी कम्प्यूटर पर पहले से डले हुए एक प्रोग्राम में दोनों पक्ष अलग-अलग अपने जवाब दाखिल कर दें, और उसी कम्प्यूटर पर वह प्रोग्राम मिलान करके नतीजा दे दे, और इस विश्लेषण को तैयार करते ही दोनों पक्षों के भरे हुए सारे जवाब अपने-आप मिट जाएं, उनका कोई भी रिकॉर्ड न रह जाए। 

अब सवाल यह उठा कि एक बार पूरे जवाब आ जाने के बाद जिंदगी के जिन पहलुओं पर दोनों पक्षों के बीच गहरी असहमति है, क्या इन दोनों को अलग-अलग उन पहलुओं पर दुबारा विचार करने का मौका देना चाहिए कि क्या वे उन्हें लेकर कुछ लचीले हो सकते हैं, या उन मुद्दों पर वे बिल्कुल भी समझौता नहीं कर पाएंगे? इसके लिए फिर यह रास्ता निकालना पड़ा कि यह कम्प्यूटर प्रोग्राम ही गंभीर और वजनदार असहमति के मुद्दों को अलग करके उन्हें फिर से दोनों पक्षों को अलग-अलग बता सकेगा कि क्या वे इन पर दुबारा गौर करना चाहेंगे? 

इस तरह मेरे जैसे एक इंसान ने दो लोगों के बीच रिश्तों की संभावना तौलने की जो बात एआई के साथ शुरू की, वह बढ़ते-बढ़ते यहां तक आई कि मुझे इंसानों को उससे अलग कर देना पड़ा, क्योंकि इंसान मुझे खतरनाक लग रहे थे, एआई ने इस सिलसिले को इंटरनेट से अलग कर दिया क्योंकि उसे इंटरनेट पर भरी गई कोई भी जानकारी गोपनीयता के लिहाज से खतरनाक लग रही थी, और हम लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए किसी एक कम्प्यूटर पर आकर टिके कि उसमें डला हुआ प्रोग्राम, दोनों पक्षों को एक-दूसरे के जवाब बताए बिना, उनके बीच की सहमति और असहमति की शिनाख्त कर सकेगा, उन्हें टटोल भी सकेगा कि वे कितनी असहमति के साथ जीने के लिए तैयार होंगे। फिलहाल ऐसे किसी जोड़े की मैचमेकिंग का जिम्मा मेरे सामने नहीं है, लेकिन चैटजीपीटी के साथ मिलकर मैंने सवालों की ऐसी लंबी लिस्ट, दो सौ से अधिक, तैयार की है, उनके वजन तैयार किए हैं, दो लोगों के जवाबों को जोडक़र कैसे देखा जाए, यह तय किया है। अब सरकार और समाज को चाहिए कि वे ऐसी कोई तरकीब लोगों को मुहैया कराए जो कि लोगों की निजता और गोपनीयता बनाए रखकर भी उनकी पसंद की तुलना कर सके। हिंसा और बेवफाई की खबरों को पढ़-पढक़र थके हुए दिमाग ने एक एआई के साथ यहां तक की योजना बनाई है, जो कि बिना किसी लागत के, मामूली कम्प्यूटर-जानकार भी पूरी कर सकते हैं। यह बात हर कुछ दिनों में मेरे भीतर उबलने वाली किसी नई कल्पना में से एक है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं रहता, और अगर मैं नशा करता होता, तो यह चंडूखाने की गप्प कहलाती, बिना नशे अभी जो कह रहा हूं वह सच्ची और खरी बातचीत है। आज यह कॉलम वैसे भी लंबा हो गया है, इसलिए इसमें दो सौ सवालों को और जोडऩा मुमकिन नहीं है। वह कहानी, फिर कभी।

(Daily Chhattisgarh)  

सलवा जुड़ूम, मिजोरम से मैक्सिको के बैटमैन तक, खबरदार-नागरिकों के किस्से

28 जून 2026  

 

मैक्सिको की एक दिलचस्प खबर है कि वहां एक शहर में रात में कोई अनजान व्यक्ति मोटरसाइकिल चोरों का पीछा करता है, उन्हें पकड़ता है, और फिर उन्हें किसी खंभे के साथ टेप से बांध देता है, बगल में चोरी की मोटरसाइकिल छोड़ देता है, और चले जाता है। एक ही शहर में पिछले दस दिनों में पांच लोग ऐसे मिले हैं, जिन्हें बांध दिया गया था, कुछ के मुंह पर भी टेप लगा दिया गया था, थोड़ी-बहुत पिटाई-ठोकाई भी हुई थी, और उनके पास चोरी की गई मोटरसाइकिलें भी रखी थीं। जनता के बीच इस अनजान व्यक्ति को मैक्सिकन-बैटमैन कहा जा रहा है। बैटमैन के बारे में कॉमिक्स पढऩे वाले लोगों को पता होगा कि यह नकाब लगाया हुआ, लबादा ओढ़ा हुआ एक ऐसा चित्रकथा-किरदार रहता है जो कि दिन में बहुत अमीर कारोबारी और समाजसेवक रहता है, और रात में अपराधों से लड़ता है। उसके माता-पिता की हत्या बचपन में उसकी आंखों के सामने हो गई थी, इसलिए वह जिंदगी भर जुर्म से लडऩे की कसम खाया हुआ रहता है। बैटमैन करीब एक सदी पहले का किरदार है, उसकी शुरूआत कॉमिक्स से हुई थी, बाद में उस पर फिल्में, टीवी सीरियल, कार्टून, वीडियोगेम, और उपन्यास भी बने। 

अब मैक्सिको के इस ताजा ‘बैटमैन’ को देखें, तो यह लगता है कि इस तरह के सुपरमैन, स्पाइडरमैन जैसे कई और किरदार भी कॉमिक बुक्स से लेकर फिल्मों तक आ, और छा चुके हैं, जो कि मुजरिमों से लड़ते हैं। हिन्दुस्तानी बच्चों ने हिन्दी में महाबलि वेताल, और जादूगर मैनड्रेक को पढ़ा है, जो पुलिस और कानूनी एजेंसियों से परे रहकर अपने अंदाज में जुर्म से लड़ते हैं, अपराधियों को पकडक़र कानून के हवाले करते हैं। ऐसे किरदार आमतौर पर मुजरिमों को सजा नहीं देते हैं, लेकिन उन्हें रोकने का काम जरूर करते हैं। मैक्सिको में भी इस बैटमैन ने लोगों को बांधकर यही किया है, यह एक अलग बात है कि पुलिस अभी बंधे मिले इन लोगों को मुजरिम तो नहीं मान रही है, उन्हें इस तरह बांधने के जुर्म का शिकार मान रही है। एक तरफ पुलिस अज्ञात बैटमैन को ढूंढ रही है, और दूसरी तरफ यह भी देख रही है कि क्या ये मोटरसाइकिलें चोरी की हैं? 

इस बारे में सोचते हुए हमें कुछ दशक पहले मिजोरम के एक मुख्यमंत्री की वहां देश भर से पहुंचे संपादकों से कही हुई एक बात याद पड़ती है कि वहां के यंग मिजो एसोसिएशन ने प्रदेश में नशा रोकने को अपनी जिम्मेदारी मान लिया है, और कोई नशे का धंधा करते मिलते हैं, नशा लेकर चलते मिलते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक खम्भों से बांधकर पीटा जाता है। इस कार्रवाई के चलते मिजोरम नशे से बचा हुआ है, ऐसा उन्होंने दो-ढाई दशक पहले बताया था। मैक्सिको का यह नया सिलसिला उसी किस्म का है जिसमें लोगों के बीच से कुछ लोग कानून को लागू करने की जिम्मेदारी खुद उठा लेते हैं, वे छोटी-मोटी जबर्दस्ती, ज्यादती करते हुए भी अधिक बड़े जुर्म रोकते हैं। अलग-अलग देश, काल, और परिस्थितियों में कानून हाथ में लेने का यह सिलसिला नैतिक, अनैतिक, जायज या नाजायज, कानूनी या जुर्म, कुछ भी हो सकता है। ऐसे हर मामले में विश्लेषण अलग-अलग होगा, और सरकारें ऐसी कोशिशों को आमतौर पर अपनी सत्ता को एक चुनौती मानेंगी। लेकिन कई मामलों में जहां सरकारें ऐसी संविधानेत्तर ताकतों को मंजूरी दे देती हैं, वहां बात कुछ अलग हो जाती है। 

लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर में कुछ दशक पहले भारी हिंसा के बीच कांग्रेस के एक सबसे बड़े बस्तरिया नेता महेन्द्र कर्मा ने उस वक्त की राज्य की डॉ.रमन सिंह की भाजपा सरकार के साथ मिलकर जनता को हथियारबंद करके एक नक्सल विरोधी आंदोलन छेड़ा था, सलवा जुड़ूम। इस आंदोलन को शुरू में हमारे सहित बहुत से लोगों ने नक्सलियों का स्वस्फूर्त आंदोलन माना था, जो कि हिंसा के खिलाफ था। बाद में यह दिखा कि यह आंदोलन अपने आपमें बस्तर के आदिवासियों के खिलाफ ही इतना हिंसक हो गया कि नक्सल-समर्थक होने की तोहमत लगाकर सलवा जुड़ूम ने बड़े पैमाने पर कत्ल किए, गांव के गांव जला दिए, और शायद लाखों लोग प्रदेश छोडक़र पड़ोस के प्रदेश में जाने को मजबूर हो गए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर सलवा जुड़़ूम को गैरकानूनी करार देना पड़ा, और जनता को हथियारबंद करके किसी मोर्चे पर उतारने की कांग्रेस पार्टी और भाजपा सरकार की इस मिलीजुली योजना को खत्म करना पड़ा। 

आज भी अगर देखें तो गायों को बचाने के नाम पर देश में अधिकतर भाजपा-प्रदेशों में सरकार और पुलिस ने कथित गौ-तस्करों को रोकने का अघोषित जिम्मा, स्वघोषित गौरक्षकों को दे रखा है। ऐसे गौरक्षक पुलिस की खुली छूट से सडक़ों पर हिंसा करते हैं, पूरी तरह से कानूनी पशु व्यापार करने वाले व्यापारियों को भी मार डालते हैं। कुछ ऐसा ही सिलसिला कई प्रदेशों में अल्पसंख्यकों की उपासना सभाओं को लेकर चल रहा है, प्रार्थना सभाओं पर धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए, या सडक़ों पर नमाज पढऩे को गैरकानूनी करार देते हुए अल्पसंख्यकों पर पुलिस मौजूदगी में, या पुलिस के साथ मिलकर भी हमले होते हैं, और यह सिलसिला सत्ता की कानूनी ताकत के गैरकानूनी विस्तार का है। मानो कानून लागू करने की सरकार की जिम्मेदारी को आऊटसोर्स कर दिया गया है। 

एक-दो अपराधकथाओं में ऐसे ही गैरसरकारी समूह द्वारा जुर्म को रोकने की अपने स्तर की कोशिशों को खबरदार-शहरी का नाम दिया गया था, जिसमें जुर्म को समझने वाले, उसे रोकने के लिए कुछ करने की क्षमता रखने वाले जिम्मेदार और ईमानदार नागरिकों का एक समूह हो चुके जुर्म के मुजरिम तलाशता है, या न हुए जुर्म को रोकने की कोशिश करता है। यह भी जरूरी नहीं है कि जिन देश-प्रदेशों में ऐसे खबरदार-शहरी, जागरूक नागरिक, या समाजरक्षक किस्म के लोग सक्रिय रहते हों, वहां पर सरकारें कमजोर रहती हों। कई बार सत्ता अपने राजनीतिक, धार्मिक, या साम्प्रदायिक रूझान के चलते भी ऐसे संविधानेत्तर समूहों को ढील और छूट देती है। मिजोरम तकरीबन सौ फीसदी ईसाई राज्य है, और वहां चर्च से जुड़े हुए नौजवानों के संगठन यंग मिजो एसोसिएशन को नशे के खिलाफ सीधी कार्रवाई करने की छूट सरकार और चर्च दोनों की तरफ से दी गई थी, जो कि आज देश के कई दूसरे प्रदेशों में स्वघोषित गौरक्षकों को दी गई छूट सरीखी है। अब मैक्सिको में भी यह कहा जा सकता था कि बैटमैन चाहे जो हो, वह कुल मिलाकर तो मुजरिमों को पकड़ रहा है, इसलिए उसे क्यों पकड़ा जाए? एक वक्त जब मुम्बई पर अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का राज चलता था, उस वक्त अगर अंडरवल्र्ड के मुजरिमों को ऐसा ही कोई खबरदार-शहरी गोली मारने लगता, तो हो सकता है कि पुलिस भी ऐसी हत्याओं को अनदेखा कर देती कि काम तो कुल मिलाकर पुलिस का ही हो रहा है, और मारे जा रहे लोग तो निर्विवाद रूप से मुजरिम और गुंडे हैं ही। अपना काम हल्का करने के लिए सरकारों को जनता के बीच के ऐसे, कानून हाथ में लेने वाले समूह सुहा भी सकते हैं, लेकिन उनके साथ सलवा जुड़ूम जैसा खतरा भी जुड़ा रहता है, यह नहीं भूलना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीमक की खोखली की हुई सोच, अब ढांचा बड़ी तेजी से चरमरा और ढह रहा है

27 जून 2026  

 

भारत में आज चारों तरफ जिस भयानक दर्जे की अवैज्ञानिक बातें फैली हुई हैं, उनका नतीजा है कि धर्म और जाति की नफरत तो बढ़ी हुई है ही, तंत्र-मंत्र का झांसा देकर लोगों से उनकी जिंदगी भर की बचत भी ठग ली जा रही है। कहीं गड़ा खजाना दिलवाने का झांसा देकर, तो कहीं नोटों की बारिश करवाने के नाम पर लोग दसियों लाख ठग रहे हैं। दूसरी तरफ नौजवान, अधेड़, और बूढ़े मर्द नाबालिग, 5-7 बरस की, और तीन महीने तक की बच्ची से बलात्कार कर रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई के बजाय लोगों को यह सिखाया जा रहा है कि किस तरह का एक मामूली सा धार्मिक रिवाज करने से बिना पढ़ाई भी बच्चे पास हो जाएंगे, और उन्हें कोई भी फेल नहीं कर पाएंगे। जातिवाद का हाल यह है कि अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के महासमुंद में एक गैरदलित परिवार ने अपनी बेटी का कत्ल कर दिया क्योंकि उसने एक दलित से शादी कर ली थी। दूसरे धर्म के किसी कमजोर बूढ़े को अकेले घेरकर दर्जनों लोग मार-मारकर उसे अपने ईश्वर के नाम के नारे लगवा रहे हैं, और इसे गर्व समझ रहे हैं। यह पूरा सिलसिला बताता है कि लोगों की सोच किस दर्जे की अवैज्ञानिक हो चुकी है, और जब अंधविश्वास घर कर जाता है, तो लोकतांत्रिक सोच भी उसका शिकार हो जाती है, और लोग अपने ही घर की महिलाओं को, अपनी बहू-बेटी को दूसरे दर्जे की नागरिक मानने लगते हैं। जिस तरह कोरोना जैसा वायरस हवा में तैरते हुए एक मरीज से दूसरे स्वस्थ लोगों तक पहुंचकर संक्रमण फैलाता है, वैसे ही अवैज्ञानिक बातें दूर-दूर तक जाकर लोगों की वैज्ञानिक चेतना को खत्म करती है। 

भारत में आजादी के खासे बाद तक, अभी हाल के बरसों तक धर्म और पुराण के नाम पर गीता प्रेस जैसे प्रकाशन ने जितनी अवैज्ञानिक बातें फैलाई हैं, उसका भी भारतीय सोच को कुंद और मंद करने में बड़ा योगदान रहा है। गीता प्रेस को हिन्दू धर्म की किताबों को घर-घर तक पहुंचाने के लिए देश की कई सरकारों ने तरह-तरह से सम्मानित किया है, और दूसरी तरफ जो वैज्ञानिक चेतनासंपन्न लोग हैं, उन्होंने गीता प्रेस की लिखी गई नफरती और अंधविश्वासी बातों को खूब धिक्कारा भी है। आज जब भारतीय मानसिकता में अंधविश्वास और अवैज्ञानिक सोच लोगों की जिंदगी तबाह कर रही है, तब उन तमाम बातों पर एक नजर डालने की जरूरत है जिससे इस देश में लोगों की सोच बर्बाद हुई है। गीता प्रेस का 1953 का एक बालक अंक बहुत लंबा-चौड़ा है, और उसमें उस वक्त के हिसाब से भी कई बातें नफरती और जहरीली सिखाई गई थीं। उसमें बच्चों के लिए कहा गया था कि स्नान के बाद तहमद (लुंगी) बांधना पाप है, शास्त्र में लिखा है कि बिना लांग की धोती बांधकर चलना बड़ा पाप है, निक्कर (हाफपैंट), पतलून, या पाजामा भी नहीं पहनना चाहिए। इस वक्त भारत में आरएसएस की स्थापना के 25 से अधिक बरस हो चुके थे, और उसकी पोशाक में ही हाफपैंट था। आरएसएस और गीता प्रेस दोनों ही एक ही हिन्दू सोच को आगे बढ़ाने वाले थे, और गीता प्रेस का बालक अंक बच्चों को निक्कर और पतलून पहनने से मना कर रहा था। यह अंक बच्चों को सिखा रहा था कि सूर्य भगवान को जल दिए बिना जल पीना मूत्रपान के बराबर है। यह कहता है कि प्याज, लहसुन, शलजम, अंडे, मांस-मछली भूलकर भी नहीं खाने चाहिए, इनसे घोर पाप लगता है। होटल का बना भोजन भी नहीं करना चाहिए। चमार-भंगी, ईसाई, मुसलमानों के हाथ का कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। भूलकर भी बिस्कुट, डबलरोटी, चाय नहीं खाना-पीना चाहिए, चाय पीने से ब्रम्हचर्य नष्ट हो जाता है, धन, धर्म, शरीर सब कुछ स्वाहा हो जाता है, और मनुष्य सबकी चाय की झूठी प्यालियां चाटने वाला चटोकरा कुत्ता जैसा बन जाता है, और सब कुछ खोकर नरक की सैर करता है। भूलकर भी बर्फ इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, इसे हर जाति के लोग हर अपवित्र हालत में बनाते हंै, इसके पीने से धर्म नष्ट होता है, पाप लगता है। इसमें बच्चों के लिए कहा गया था कि यदि भूल से भी शराब में उंगली लग जाए, तो उंगली काट फेंकनी चाहिए। हर जाति के लडक़ों के साथ मत खेलो, अंग्रेजी खेल मत खेलो। 

मानो इतनी अवैज्ञानिक बातें, इतनी नफरत, और इतना जहर काफी न हो, गीता प्रेस के बच्चों के लिए कुछ दूसरे प्रकाशन बताते हैं कि ब्रम्हचर्य कितना महत्वपूर्ण होता है। इसके अंक कहते हैं कि 40 बूंद रक्त से एक बूंद वीर्य बनता है, और वीर्य का एक बूंद नष्ट होने पर 40 बूंद रक्त की हानि होती है। इसमें लिखा गया है कि वीर्य नष्ट करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे सूख जाता है, उसकी तेजस्वीता और आयु कम हो जाती है। इसने एक वक्त बच्चों के लिए वीर्य रक्षा पर एक छोटी सी बुकलेट भी निकाली थी। अब इसे अगर गुप्त रोग विशेषज्ञों के दीवारों पर लिखे गए इश्तहारों के साथ जोडक़र देखें, तो बचपन से पैदा की गई इस दहशत को ऐसे डॉक्टर भुनाते हैं, और वे लिखते हैं कि बचपन की बुरी आदतों के कारण...। मतलब यह कि धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, चिकित्सा विज्ञान के किसी भी शोध निष्कर्ष के ठीक खिलाफ जाकर अंधविश्वास फैलाने का काम धार्मिक लबादा पहनकर गीता प्रेस जैसे संस्थान जाने आधी-पौन सदी कबसे करते आ रहे हैं। जिस तरह लकड़ी के बने हुए किसी ढांचे की बुनियाद को जब दीमक खोखला कर देती है, तो फिर उसे गिर जाने में अधिक वक्त नहीं लगता, उसे गिराने में अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। आज हिन्दुस्तान में धर्म से आध्यात्म, आध्यात्म से एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति, उससे योग की चमत्कारिक कल्पनाएं, विज्ञान के काल्पनिक इतिहास के किस्से, ऐसी बहुत सारी बातें जुड़ती चली गई हैं। धर्म और जाति की नफरत से लेकर तंत्र-मंत्र पर अंधविश्वास तक बहुत सी बातों के लिए ऐसी उपजाऊ हो चुकी जमीन बहुत काम आती है, और राह चलते लोग ईश्वर देखने के नाम पर लोगों को अपने पूरे गहने उतारकर भी दे देते हैं, और पति को भूतप्रेत से बचाने के नाम पर अभी चार दिन पहले ही एक महिला ने पौन करोड़ रूपए से अधिक तांत्रिक पर गंवा दिए हैं। आज जब दुनिया के बहुत से देश वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, एक तकरीबन पूरी तरह मांसाहारी प्रदेश, पश्चिम बंगाल की स्कूलों में दोपहर के भोजन में लंबे समय से बच्चों को दिया जा रहा अंडा बंद कर दिया गया है क्योंकि भाजपा सरकार ने यह खाना सप्लाई करने का काम इस्कॉन नाम के हिन्दू संगठन को दे दिया है, जो कि अंडे के साथ-साथ प्याज-लहसुन से भी परहेज करता है। बंगाल की अधिकतर आबादी के लिए ये खान-पान का अनिवार्य हिस्सा है, और अब एक हिन्दूवादी सोच ने बच्चों से खान-पान की उनकी सदियों की संस्कृति को छीन लिया है। आज चिकित्सा विज्ञान तो प्रोटीन की जरूरत के लिए अंडे खाने की सिफारिश करता है, और अब तो अंडे ऐसे आने लगे हैं जिनसे आगे चूजे पैदा नहीं होते। फिर भी प्रोटीन की इस जरूरत को जानते हुए भी हिन्दू धर्म के एक बड़े अल्पसंख्यक हिस्से की खान-पान की सोच को सारे धर्मों के मांसाहारी परिवारों के बच्चों पर भी लागू कर दिया जा रहा है। भारत सरकार का सर्वे, एनएफएचएस-5 (2019 से 21) बताता है कि बंगाल में मांस-मछली और अंडे खाने वाली आबादी 88 से 90 फीसदी है। यह भारत के सबसे अधिक मांसाहारी राज्यों में से एक है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा सत्ता में आने के पहले तक बंगाली मतदाताओं की आशंकाओं को हटाने के लिए हाथ में मछली लेकर प्रचार कर रही थी, उसके नेता बंगाल में मटन-मछली खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे। अब चूंकि चुनाव जीत लिया है, तो अब खान-पान तय करने का काम इस्कॉन को दे दिया गया है। 

किसी देश को वक्त की जरूरत के मुताबिक आगे बढऩे के लिए हजारों बरस पुरानी काल्पनिक कहानियों, और सैकड़ों बरस पुरानी रूढिय़ों से उबरने की जरूरत रहती है। आज भारत बीते दशकों के मुकाबले इनमें बहुत अधिक, और बहुत बुरी तरह उलझ गया है। इससे लोगों की तर्कशक्ति, न्यायशक्ति खत्म हो चली है। सभ्यता का विकास रिवर्स गियर लगा चुका है, देखते हैं टंकी का पेट्रोल खत्म होने तक यह कितना वापिस जा पाता है।

(Daily Chhattisgarh)   

पटवारी से एसडीएम तक जनता से लूट-खसोट करने की अघोषित व्यवस्था...

26 जून 2026  

 

कल फिर छत्तीसगढ़ में जमीन के राजस्व नक्शे में किसी रकबे के कई मालिकों में से एक का बटांकन करने के लिए रिश्वत लेते हुए एक पटवारी गिरफ्तार किया गया है। एसीबी की टीम ने हर कुछ हफ्तों में किसी न किसी पटवारी को लोगों की शिकायत पर गिरफ्तार किया है। फिर भी सरकार के इस सबसे छोटे दफ्तर में भ्रष्टाचार उसी तरह चलते रहता है। ऐसा भी नहीं कि किसी सरकार को इसका पता न हो, ऐसा भी नहीं कि सरकार ने यह इंतजाम किया हो कि पटवारी ईमानदार रहकर भी काम कर सके। पटवारी की व्यवस्था को ही इस तरह बनाया गया है कि वे भ्रष्ट तो होंगे ही, और उन्हें काम के लिए जरूरी सरकारी सुविधा देने की जरूरत नहीं है, वे अपना इंतजाम खुद कर लेंगे। जिस तरह मीडिया के बहुत से संस्थानों में शहर या कस्बे के रिपोर्टरों को तनख्वाह नहीं दी जाती, कि वे अपना इंतजाम खुद कर लेंगे, ठीक उसी तरह पटवारी का दफ्तर चलाने के लिए कुछ भी स्वीकृत नहीं रहता। नतीजा यह होता है कि हर पटवारी दफ्तर किराए से लेते हैं, कई कर्मचारी नियुक्त करते हैं, कम्प्यूटर लगाते हैं, और अपने इलाके में सर्वे के लिए, किसी सरकारी दफ्तर में जाने के लिए, बड़े अफसरों के जमीनों के शौक के लिए जो भाग-दौड़ करते हैं, उसके लिए गाड़ी-पेट्रोल, यह सब इंतजाम भी खुद ही करते हैं। नतीजा यह होता है कि यह पूरा खर्च उठाने के नाम पर हर काम के लिए वे जो वसूली करते हैं, उसे अघोषित रूप से जायज ठहराते रहते हैं। उनके ऊपर के बड़े से बड़े अफसर भी यह जानते हैं कि सरकार ने तो पटवारियों के ढांचे के लिए कुछ मंजूर किया नहीं है, उन्हें अपना इंतजाम किसी न किसी तरह तो करना ही है। नतीजा यह होता है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर और इसके आसपास लंबे समय तक बने रहने वाले पटवारियों से कोई काम पडऩे पर हमें खुद उनके करोड़ों के फॉर्महाउस देखने मिले, उनकी बड़ी-बड़ी गाडिय़ां देखने मिलीं, और बहुत बड़ी-बड़ी करोड़ों की जमीन उनकी होने का पता चला। 

लेकिन महज पटवारी को कोसना ठीक नहीं है, नायब तहसीलदार या तहसीलदार के दफ्तर देखें, तो वहां भी बहुत से निजी कर्मचारी रखे जाते हैं, और अमूमन सारा काम फाइलों पर भी ये निजी कर्मचारी करते हैं। कभी-कभी इस निजी इंतजाम से कुछ लोग नाखुश होते हैं, तो वे इनका भांडाफोड़ करते हैं, कुछ दिनों के लिए इन कर्मचारियों को किसी और कमरे में बिठा दिया जाता है, लेकिन जल्द ही सामंजस्य स्थापित हो जाता है, और फिर से ये लोग सारा काम करने लगते हैं। इसी तरह आरटीओ दफ्तर में अगर निजी कर्मचारी न रहें, तो सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के भरोसे काम नहीं चल सकता। और यह विभाग अधिक कर्मचारी मांगता भी नहीं है, क्योंकि ऐसे अघोषित टकसाल के पास अपना इंतजाम खुद करने की ताकत रहती है। सरकार के बहुत सारे दफ्तर जहां पर नियमित मोटी कमाई रहती है, वहां नियमित कर्मचारियों के कोई मोहताज नहीं रहते, अघोषित कर्मचारियों से काम आसानी से चलता है। 

अब अगर पटवारियों पर लौटें, तो इनकी बड़ी दिलचस्प ताकत अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्य सचिव रहे, आर.पी.नरोन्हा ने अपनी मशहूर आत्मकथा, अ टेल टोल्ड बाई एन इडियट, में खुलासे से लिखी है। उन्होंने लिखा था- भारत में सिर्फ तीन ही ताकतें हैं जो राज करती हैं, ऊपर भगवान, नीचे पटवारी, और बीच में जो थोड़ा-बहुत बच जाता है वह मुख्यमंत्री। उनका मानना था कि एक आम ग्रामीण या किसान के लिए मंत्री, कमिश्नर तो दूर, कलेक्टर भी बहुत दूर की कौड़ी होते हैं। उनका सीधा वास्ता सिर्फ पटवारी से पड़ता है, और उसके एक दस्तखत पर लोगों की जिंदगी टिकी रहती है। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाज में उसका प्रभाव असीमित होता है। नरोन्हा ने बड़े अफसरों की आलोचना भी की थी कि वे सचिवालय की फाइलों में खोए रहते हैं, और सरकार के असली पहिए पटवारी, सिपाही, और बाबू कैसे जमीनी स्तर पर लोगों को घुमाते रहते हैं। वे खुद लंबे समय तक मध्यप्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में काम कर चुके थे, इसलिए वे जानते थे कि किसी प्राकृतिक विपदा के समय पटवारी की दी गई रिपोर्ट को ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है। उन्होंने लिखा था कि रिटायर होने के बाद जब वे मध्यप्रदेश में ही अपने फॉर्महाऊस पर खेती करने लगे, तो उन्हें समझ आया कि जमीन के रिकॉर्ड दुरूस्त रखने, और रोजमर्रा के सरकारी काम के लिए पटवारी की कितनी अहमियत होती है। उन्होंने इस व्यावहारिक हकीकत को मंजूर करते हुए लिखा था कि वे अपनी खेतों में होने वाली फसल, अनाज, और सब्जियों का एक हिस्सा खुशी-खुशी पटवारी को भी भेजते थे। उन्होंने इसे पारंपरिक रिश्वत या भ्रष्टाचार नहीं माना था, बल्कि भारत की पारस्परिक सामाजिक व्यवस्था माना था ताकि आपके काम बिना किसी अड़चन के चलते रहें। उन्होंने लिखा था कि जब एक भूतपूर्व मुख्य सचिव को भी अपनी जमीन और फसल के लिए पटवारी के साथ इस तरह का व्यावहारिक तालमेल बिठाना पड़ा, तो इससे यह साफ होता है कि भारत की जमीनी व्यवस्था सचिवालय के नियमों से कितनी अलग है। 

हमने बड़े-बड़े कई अफसरों को देखा हुआ है जो जमीन के विवादों में लोगों को रास्ता सुझाते हुए भी पटवारी से मिलकर चलने की बात कहते हैं। पटवारी, नायब तहसीलदार, और तहसीलदार से लेकर राजस्व विभाग के एसडीएम तक के दफ्तर किसी भी चुनाव को सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ मोडऩे की ताकत रखते हैं। आबादी के एक बड़े हिस्से को इनमें से किसी न किसी दफ्तर तक जाना होता है, सिर्फ जमीनों के लिए नहीं, आय प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र, ऐसे दर्जनों दस्तावेजों के लिए इन दफ्तरों के चक्कर लगाते लोग दिखते हैं। राजस्व विभाग के नियम-कायदों का जाल सबसे शातिर मकड़ी के जाल से भी अधिक घना और मजबूत रहता है, अगर इनमें से किसी कुर्सी की फरमाइश, हसरत, और हवस पूरी नहीं होती है, तो लोगों के कागज बरसों तक धक्के खा सकते हैं। पटवारी नक्शे में खींची गई एक लकीर करोड़ों की जमीन इधर से उधर कर सकती है। यही दोनों-तीनों दफ्तर सरकारी जमीन निजी नामों पर कर देते हैं, भारतमाला जैसे प्रोजेक्ट के घपले इन्हीं दफ्तरों की मदद से हो पाते हैं, और अधिक अफसर नरोन्हा की तरह खुलकर लिख तो नहीं पाते, लेकिन अपने नीचे के इस अमले की ताकत को जरूर जानते हैं। पटवारियों का इलाका बदलना कई बार जिला स्तर का न होकर राज्य स्तर का फैसला हो जाता है, अगर उनके हल्के में जमीनों के दाम बहुत अधिक हैं, विवाद बहुत अधिक हैं, या वहां पर कोई नई योजना-परियोजना आने वाली है। ऐसे इलाकों के पटवारी दफ्तर जाने पर वहां बड़े-बड़े बिल्डरों और कॉलोनाइजरों के कर्मचारी बैठे रहते हैं जो पटवारियों को पटवारी नक्शे सहित अपने मालिकों के दफ्तर ले जाने के लिए आए रहते हैं, और उसके बाद इन नक्शों का खेल शुरू होता है। किसी सत्तारूढ़ पार्टी को अपने पर मंडराते हुए खतरे को अगर कुछ कम करना है, तो उसके लिए पटवारी से लेकर राजस्व-एसडीएम तक के तीन-चार दफ्तर सबसे नाजुक जगह रहते हैं, जहां से सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ती है, या घट भी सकती है। सरकार का बहुत सारा काम इन्हीं तीन-चार दफ्तरों में होता है, और छोटे और गरीब लोगों को तो इनसे ऊपर कहीं जाने की नौबत नहीं आती। कुल मिलाकर हम कहना इतना ही चाहते हैं कि सरकारों को चाहिए कि वे अपने नए अफसरों को अनिवार्य रूप से नरोन्हा की आत्मकथा पढ़वाएं। हो सकता है कि इस अघोषित और असंवैधानिक ताकत से जूझने का कोई रास्ता कोई अफसर निकाल सके।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

ट्रम्प के बारे में राहुल के बयान, और उनकी पार्टी की सरकार का नामकरण!

25 जून 2026  

 

अविभाजित आन्ध्रप्रदेश के समय से ही उस वक्त के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने बड़ी कोशिशें करके माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनी का भारत का मुख्यालय हैदराबाद लाने में कामयाबी पाई थी, और उसके बाद अटल सरकार चन्द्राबाबू की फरमाइशों को विविध भारती के फरमाइशी कार्यक्रम की तरह पूरा करती थी। हैदराबाद को अंतरराष्ट्रीय विमानतल बनाने से लेकर उसके विशाल शहरीकरण तक बहुत से काम नायडू ने अपने उस कार्यकाल में करवा लिए थे। आन्ध्र की राजधानी हैदराबाद को साइबराबाद भी कहा जाता था, और एक-एक करके प्रमुख अमरीकी टेक-कंपनियों के दफ्तर हैदराबाद आते रहे। बाद में चन्द्राबाबू की सत्ता गई, तेलंगाना राज्य बनने से राजधानी हैदराबाद भी आन्ध्र के हाथ से चले गया, और अब यह शहर तेलंगाना की राजधानी है। यहां अभी दो दिन पहले अमरीका की 250वीं सालगिरह के सम्मान में अमरीकी वाणिज्य दूतावास से लगी हुई एक प्रमुख सडक़ का नाम डॉनल्ड ट्रम्प एवेन्यू किया गया है। इसी सडक़ पर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, और अमेजान जैसी प्रमुख अमरीकी कंपनियों के दफ्तर हैं। इस नामकरण के लिए वाणिज्य दूतावास में एक कार्यक्रम किया गया जिसमें राज्य के उपमुख्यमंत्री भी मौजूद थे। दिलचस्प बात यह है कि तेलंगाना में कांग्रेस सरकार है, और बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने एक सोशल पोस्ट में लिखा है कि एक तरफ तो राहुल गांधी कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रम्प भारतीय हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, तो फिर तेलंगाना में उनकी सरकार सडक़ का नामकरण ट्रम्प के नाम पर क्यों कर रही है? सीपीएम ने भी कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना की है। 

देश और प्रदेश के हित कैसे अलग-अलग हो सकते हैं, कैसे इनके बीच आपस में टकराव हो सकते हैं, यह इसकी एक बड़ी शानदार मिसाल है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी लगातार राष्ट्रपति ट्रम्प की आलोचना कर रही है, और उसके सबसे मुखर नेता, राहुल गांधी हर हफ्ते ट्रम्प को कोसने का काम करते ही हैं। राहुल अकेले नेता नहीं हैं, देश के बहुत सारे और दलों के नेता भी ईरान को लेकर, इजराइल को लेकर ट्रम्प के खिलाफ हैं, और अब तो भारत में ट्रम्प की सबसे पसंदीदा पार्टी, भाजपा के नेताओं में भी ट्रम्प के पक्ष में बोलने लायक कुछ नहीं रह गया है। भारत सरकार भी ट्रम्प को लेकर एक असाधारण चुप्पी जारी रखे हुए है। ऐसे में ट्रम्प के नाम पर इस देश में अगर हवन-पूजन से परे कोई सरकारी नामकरण हो रहा है, तो वह कांग्रेस के राज वाले तेलंगाना में हुआ है। 

आज जब ट्रम्प दुनिया में लाखों मौतों के लिए जिम्मेदार स्थापित हो चुका है, तब उसके नाम पर किसी प्रदेश की सरकार एक सडक़ का नाम रखे, यह शर्मनाक है। लेकिन हम तो तेलंगाना के बाहर बैठे हैं, और एक वैश्विक नजरिए की बात कर रहे हैं। एक राज्य के रूप में तेलंगाना के मुख्यमंत्री की पहली प्राथमिकता अपने राज्य का विकास है, जहां पर अमरीका की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने भारतीय मुख्यालय लेकर बैठी हैं। तेलंगाना अमरीका में कम्प्यूटर से जुड़े हुए अच्छे-खासे पेशेवर भेजने वाला भारत का एक प्रमुख राज्य है। आन्ध्र-तेलंगाना की संस्कृति, और इन दोनों राज्यों का रिकॉर्ड एक जैसा रहा है, इसलिए यह याद रखने की जरूरत है कि अविभाजित आन्ध्र के समय से ही अमरीका जाकर काम करने वाले लोगों की गिनती इतनी बड़ी थी कि बीते एक-दो बरस में आन्ध्र के सीएम चन्द्राबाबू नायडू ने बार-बार लोगों से अपील की है कि उन्हें तीसरे और चौथे बच्चे भी पैदा करने चाहिए क्योंकि एक-दो बच्चे तो काम करने बाहर (मतलब अमरीका) चले जाते हैं। जिस राज्य की अर्थव्यवस्था, रोजगार अमरीका से इतने गहरे से जुड़े हुए हैं, यह जायज है कि वह ट्रम्प जैसे अहंकारी के अहंकार को सहलाने का काम करे क्योंकि यहां से गए हुए लाखों लोगों के वर्तमान और भविष्य ट्रम्प की सनक से जुड़े हुए हैं। एक सनकी के अहंकार को सहला देने में ही समझदारी है। और फिर यह दुनिया के इतिहास में चाहे एक सबसे बड़े मुजरिम की तरह दर्ज क्यों न होने वाला हो, भारत में तो केन्द्र सरकार ही ट्रम्प के दबदबे में दबी-सहमी चल रही है, ऐसे में तेलंगाना जैसे एक छोटे और नए राज्य ने कुछ चापलूसी कर दी, तो कौन सी ज्यादती कर दी? 

लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों की बात कुछ अलग रहती है, किसी देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था को देखते हुए लोगों को कई तरह के गम खाने पड़ते हैं। जब सवाल रोजी-रोटी पर खतरे का रहता है, तो बहुत से लोगों को कम खाना पड़ता है, बहुत से लोगों को गम खाना पड़ता है। आज भारत के दूसरे प्रदेशों के मुकाबले तेलंगाना को अगर अमरीका का पसंदीदा प्रदेश बने रहना जारी रखना है, तो उसे ट्रम्प के खून सने हाथों को भी करकमल कहना होगा। हमें यह एक राष्ट्रीय शर्मिंदगी की बात लगती है कि दुनिया के एक सबसे बड़े युद्ध अपराधी के नाम पर भारत की एक सडक़ रहे, लेकिन अमरीका की आर्थिक गुंडागर्दी, मनमानी, तानाशाही, और ट्रम्पियापे की सनक के बीच कोई राज्य अगर अपने पापी पेट के लिए ऐसा अनैतिक काम भी कर रहा है, तो उससे सैद्धांतिक रूप से असहमत होते हुए भी हम उस मजबूरी को समझ सकते हैं। 

अंतरराष्ट्रीय संबंध, कूटनीति, और विश्व व्यापार में नैतिकता बहुत दूर तक निभ नहीं पाती है। जिस इजराइल के हाथ लाखों बेकसूर फिलीस्तीनियों के लहू से सने हैं, उससे भारत न सिर्फ आज, बल्कि मनमोहन सिंह सरकार के समय से बड़े मनमोहक रिश्ते रखते आया है। दुनिया के सबसे बड़े जुल्मी देश का भारत सबसे बड़ा इम्पोर्टर है। ऐसे बहुत से अनैतिक काम अलग-अलग देश अलग-अलग समय पर करते हैं, और हर किसी में इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी जितना नैतिक साहस नहीं रहता कि जो ट्रम्प को सार्वजनिक रूप से कोस सके। भारत के अलग-अलग प्रदेशों से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति निभाने की उम्मीद कुछ ज्यादती होगी। पश्चिम बंगाल के बांग्लादेश से अच्छे या बुरे रिश्ते किसी समय भारत सरकार के नजरिए से कुछ अलग भी हो सकते हैं, श्रीलंका के तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडु भारत की श्रीलंका-नीति से कुछ परे भी चल सकता है। ऐसा ही हाल तेलंगाना का है जहां की सरकार ने खुद अपनी ही पार्टी की नीतियों से परे जाकर राजधानी की एक सडक़ का नाम दुनिया के एक सबसे घटिया इंसान, डॉनल्ड ट्रम्प के नाम पर रखा है। 

देश और प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय हितों में नैतिकता एक सीमा से अधिक नहीं निभ पाती है। इसी एक चापलूसी से खुश होकर अगर ट्रम्प वहां काम कर रहे हिन्दुस्तानी लोगों के लिए वीजा और दूसरे नियमों में कुछ रियायत कर दे, तो तेलंगाना जैसे राज्य का सबसे अधिक भला होगा। और फिर हैदराबाद में बसे हुए ट्रम्प विरोधी कम तो हैं नहीं, उनके घरों में रखे कालिख के डिब्बों को इस्तेमाल करने का एक मौका भी मिलेगा, और डॉनल्ड ट्रम्प एवेन्यू की तख्तियों पर कालिख पोतने का एक लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन हैदराबाद में चलते ही रहना चाहिए। अमरीका चाहे तो इन तख्तियों की हिफाजत के लिए अपने कुछ फौजियों को तैनात कर सकता है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जून 2026

 


(Daily Chhattisgarh)


दीवारों पर लिक्खा है, 24 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

बारह बरस की पढ़ाई, और 3 घंटे की नीट का मुकाबला!

 24 जून 2026  

 

तमाम सावधानियों के बावजूद चिकित्सा दाखिले के लिए होने वाले नीट इम्तिहान का जो तोड़ बिहार के नकल गिरोह ने निकाला है, उससे पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है। अगर ये पकड़ में नहीं आए होते, तो नकल गिरोह के शायद दो सौ लोग तो अकेले बिहार में ही असली परीक्षार्थियों की जगह इम्तिहान दे रहे थे। जो नौजवान मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे हैं, उनमें से होशियार लोगों को छांटकर, उन्हें नीट में बैठे कम उम्र अनुभवहीन बच्चों की जगह बिठाने की बायोमैट्रिक जालसाजी से नीट की पूरी सुरक्षा ही खत्म हो गई है। अब कहां-कहां पर, किस-किस प्रदेश में बिहार मॉडल खप गया है, कहां पकड़ में आ गया है, यह समझना आसान नहीं है। जहां यह जालसाजी खप गई, वहां इम्तिहान में कामयाबी पाने वाले बच्चों का क्या पता लगेगा? कुल मिलाकर यह कि नीट के बाद हुई यह री-नीट भी एक अलग किस्म से कमजोर निकली है। 

देश के किसी भी चिकित्सा शिक्षा दाखिले के लिए होने वाली यह इम्तिहान पहली और आखिरी रहती है। इसे बार-बार दिया जा सकता है, लेकिन उसके लिए पूरे साल भर इंतजार करना पड़ता है। और संपन्न परिवारों के बच्चे कई बरस तक ऐसा बार-बार इंतजार करते हुए महंगे कोचिंग सेंटरों में तैयारी कर सकते हैं, और गांव-देहात से आए हुए, या कमजोर परिवारों के बच्चे भला क्या खाकर इनका मुकाबला कर सकते हैं? यह इम्तिहान राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी दाखिला परीक्षा है जो भारत की आर्थिक और सामाजिक असमानता की बहुत बुरी तरह शिकार है। पिछली बार नीट के पर्चे आऊट होने, और इस बार उसमें बायोमैट्रिक जालसाजी की वजह से नकली परीक्षार्थियों के बैठने से यह सवाल भी उठता है कि क्या इस परीक्षा को एक अकेली परीक्षा रखना चाहिए, या यूपीएससी की तरह इसे दो चरणों की लिखित परीक्षा रखना चाहिए, जिसमें सबसे कमजोर बच्चे पहले इम्तिहान में ही बाहर हो जाएं, और बचे हुए बच्चों में दूसरे इम्तिहान में मुकाबला हो। आदर्श तो यह भी हो सकता था कि यूपीएससी की तरह इंटरव्यू भी किए जाते, लेकिन जब दसियों लाख बच्चे इस इम्तिहान में बैठते हैं, तो उनके इंटरव्यू संभव भी नहीं हैं, दूसरी तरफ इंटरव्यू लेने वालों के भ्रष्ट न होने की क्या गारंटी हो सकती है? वह एक अलग स्कैंडल होने लगेगा। 

फिर एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि बच्चे 12 बरस की स्कूली पढ़ाई करते हैं। इसके बाद वे दाखिला इम्तिहान देते हैं। स्कूली पढ़ाई में उन्हें किसी भी तरह खींचतान कर पास भर होना पड़ता है, उनका असली मुकाबला तो दाखिला-परीक्षा रहती है। अब ऐसे में पढ़ाई का महत्व क्या है? 12 बरस साल में शायद सवा सौ या डेढ़ सौ दिन, हर दिन चार-छह घंटे की पढ़ाई धरी रह जाती है। स्कूल के आखिरी एक-दो बरसों में दाखिला इम्तिहान के लिए कोचिंग ही सब कुछ रह जाती है। तो फिर देश में स्कूली पाठ्यक्रम, किताबें, किसी विषय को रखना, किसी को निकालना, इतिहास के किसी खास संस्करण को हटाना, किसी को छांटकर लाना, इतनी जहमत क्यों उठाई जाए? ऐसी पढ़ाई क्यों करवाई जाए जिस पढ़ाई का आगे के बड़े कॉलेज में दाखिले से कुछ भी लेना-देना न हो? क्यों न पहली क्लास से ही कोचिंग सेंटरों की ही स्टाइल शुरू कर दी जाए, और हर बरस पढ़ाई पर आधारित परीक्षा के बजाय मुकाबला-कोचिंग पर आधारित मुकाबला-इम्तिहान लिया जाए!  

एक तो स्कूली पढ़ाई का पूरा सिलसिला इस देश में रटने पर केन्द्रित हो चुका है। बच्चों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता का कोई काम स्कूली पढ़ाई में नहीं रह गया है, बल्कि अधिकतर स्कूलों में तो बच्चों के लिए किताबी पढ़ाई से परे दूसरी गतिविधियों की कोई संभावना भी नहीं रहती। जबकि आज हम देखें कि पूरी दुनिया में सुंदर पिचाई, या इस किस्म के दूसरे जो भी लोग अलग-अलग कंपनियों में, अलग-अलग पेशों में आसमान पर पहुंचे हुए हैं, जो बहुत कामयाब कारोबारी हैं, वे सारे के सारे अपनी कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता की वजह से वहां तक पहुंचते हैं, रटने से नहीं पहुंचते। आज छोटे-छोटे से नौजवान लडक़े, नई कंपनी खड़ी करके इतना मौलिक काम करते हैं, कि कुछ बरस के भीतर ही उनमें से हर कोई कंपनी बेचकर हजारों करोड़ रूपए पाते हैं। इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए रटना कोई सीढ़ी नहीं होती, और न ही किसी तरह का दाखिला इम्तिहान लोगों को कल्पनाशीलता दे सकता है। 

भारत की शिक्षा व्यवस्था के साथ कई दिक्कतें हैं। उनका जो भी समाधान सोचा जाए, उसके साथ कुछ अलग किस्म की दिक्कतें दिखती हैं। अब सिर्फ दाखिला इम्तिहान, और उसके लिए भारी लोकप्रिय कोचिंग-प्रणाली से परे का कोई रास्ता देखें, तो ऐसा लगता है कि स्कूलों की कम से कम बोर्ड इम्तिहानों के नंबरों का भी कुछ वजन आगे के ऐसे दाखिले में होना चाहिए। क्या 5वीं, 8वीं, 10वीं, और 12वीं में मिले नंबरों का भी कुछ महत्व दाखिला इम्तिहान में मिले नंबरों के साथ-साथ होना चाहिए? क्या दाखिला इम्तिहान अपने आपमें एक से अधिक हिस्सों में होना चाहिए? क्या ऐसा करने से आज जो दाखिला-माफिया भारत में सक्रिय है, उसका महत्व घटेगा, प्रश्नपत्रों के दाम घटेंगे, और जालसाजी कम होगी? इसकी कोई गारंटी तो है नहीं क्योंकि इस देश में लोग सौ रूपए का भी नकली नोट बनाते हैं, हो सकता है कि दोनों दाखिला इम्तिहानों के पर्चे अलग-अलग आऊट होने लगें, अलग-अलग बिकने लगें, और यह भी हो सकता है कि फर्जी परीक्षार्थी भी दोनों इम्तिहानों के लिए जुटा लिए जाएं। जब लोग जुर्म पर आमादा रहेंगे, तो वे रास्ते कई तरह के निकाल लेंगे। फिर भी नीट जैसी इम्तिहान का विकेन्द्रीकरण होना जरूरी है। एक दूसरा तरीका यह हो सकता है कि साल में एक बार के बजाय दो या तीन बार यह इम्तिहान करवाई जाए, और इसमें बैठने वाले बच्चे हर बार बैठ सकें, और अपने सबसे अच्छे नंबरों वाले इम्तिहान को मुकाबले के लिए छांट सकें। 

भारत दोहरी चुनौती झेल रहा है। पहली तो यह कि स्कूली शिक्षा का महत्व एकदम ही अप्रासंगिक हो चुका है, और कोचिंग-दाखिला इम्तिहान का महत्व ही सब कुछ रह गया है। इससे पढ़ाई के 12 बरस अधिक काम के नहीं रह गए। बहुत से कोचिंग सेंटर तो फर्जी स्कूल भी चलाते हैं, और लाखों रूपए फीस देने वाले अपने बच्चों को स्कूलों में फर्जी हाजिरी दे देते हैं, और उन्हें खींचतान कर पास भी करवा देते हैं। बच्चों की जिंदगी के पहले 12 बरस की पढ़ाई इतनी महत्वहीन हो जाना इस देश के सामने एक बहुत बड़ा खतरा है। दूसरी बात यह कि एक अकेला दाखिला इम्तिहान पूरा भविष्य तय करे, यह भी गड़बड़ बात है। तीसरी चुनौती यह है कि सरकार चाहे एयरफोर्स का इस्तेमाल कर ले, चाहे आर्मी का, जालसाजी-धोखाधड़ी करने वाले लोग सरकार से चार कदम आगे चल रहे हैं। हमारे पास इस खराब नौबत का कोई समाधान नहीं है, लेकिन अगर सरकार और समाज को जिंदगी के असल मुद्दों पर बात करने का साहस हो, तो इस पर भी बात करनी चाहिए कि पढ़ाई, कोचिंग, और दाखिला इम्तिहान में क्या-क्या सुधार और फेरबदल हो सकता है। यह भी हो सकता है कि सरकार कोई सार्वजनिक चर्चा न चाहे, तो जनसंगठन, सामाजिक संगठन, या कोई शिक्षा संस्थान भी ऐसी बहस छेड़ सकते हैं। कुल मिलाकर इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान में नौजवान पीढ़ी का अनुपात आबादी में दुनिया में सबसे ज्यादा है, यह बात तसल्ली की नहीं है। अगर यह नौजवान पीढ़ी देश और दुनिया में काम करने के मुकाबले के लायक नहीं हैं, तो यह देश की संपत्ति न होकर देश पर बोझ है। इसलिए नीट के बहाने, इन सारे पहलुओं पर और भी चर्चा होनी चाहिए। क्या प्री-नीट इम्तिहान में सबसे कमजोर साबित होने वाले बच्चों को नीट में बैठने से रोका जा सकता है, ताकि वे किसी और कोर्स की तरफ ध्यान दें? इस सबके लिए शिक्षा विशेषज्ञों की जरूरत होगी, जो कि इसके अलग-अलग पहलुओं को जनता की जुबान में समझा सकें।

(Daily Chhattisgarh)   

यूनीपोल-पार्टियां इस आंधी में गिरती चली जा रही हैं..

 23 जून 2026  

 

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने जिस अंदाज में सत्ता खोई है, वह तो छोटी हार थी। चुनावी नतीजे निपट जाने के बाद जिस तरह इस पार्टी की संस्थापक, और सुप्रीमो ममता बैनर्जी अपने ही लोगों से हारती चली जा रही है, वह चुनावी हार से अधिक बड़ी है। और इसमें तो चुनाव आयोग का भी कोई योगदान नहीं है। ममता के विधायक, सांसद, पार्टी के पदाधिकारी, और तो और महापौर, और शायद नीचे के पंच-पार्षद भी, जिस तरह उन्हें छोडक़र जा रहे हैं, उससे एक कार्टून सूझता है कि बंगाल की शेरनी किस तरह अब भीगी बिल्ली ही रह गई है। किसी हारते हुए पर कार्टून बनाना तो नहीं चाहिए, लेकिन ममता बैनर्जी ने अपने तानाशाह राज में जिस अंदाज में विपक्षियों, विरोधियों, और आलोचकों के खिलाफ कार्रवाई की थी, कार्टूनिस्टों को जेल डाला था, एक-एक सोशल मीडिया पोस्ट पर गिरफ्तारी करवाई थी, तो अब उन पर कार्टून न बनाने, या तंज न कसने जैसी दरियादिली बरतने की जरूरत नहीं है। आज सुबह की खबर है कि ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायकों ने कल की बैठक में ममता को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया है, और उनके मंत्रिमंडल में रहे एक नेता को नया अध्यक्ष चुन लिया है। संगठन के बाकी पदाधिकारी भी इस बैठक में तय कर दिए गए हैं, और विधायक दल के नेता ने कहा है कि सब कुछ चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक कानूनी तरीके से किया गया है। ये बागी विधायक अपने को ही असली तृणमूल कांग्रेस कह रहे हैं, और ममता के साथ अब गिनती के सांसद-विधायक रह गए हैं ऐसा लगता है। 

हम अभी तृणमूल कांग्रेस की घरेलू नौबत की बारीकियों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन भारत में क्षेत्रीय दलों की दुर्गति क्यों हुई है, उस बारे में सोचने के लिए आज का ममता का बुरा हाल एक मौका देता है। बंगाल के साथ-साथ ही महाराष्ट्र में एक वक्त की असली शिवसेना, और आज की उद्धव सेना के सांसद भी उन्हें उजाडक़र शिंदे-सेना में जा रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना छोडक़र, तोडक़र, भाजपा के साथ सरकार बनाने वाले एकनाथ शिंदे अब तक शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे को अपना नेता मानते हैं, और अपने को उनका वारिस। लेकिन बंगाल में तृणमूल के बागी विधायक और सांसद ममता के अस्तित्व को ही नहीं मानते। इन दो पार्टियों को देखें, तो दोनों ही बाकी तमाम क्षेत्रीय पार्टियों की तरह घरेलू और एक कुनबे की पार्टियां रही हैं। ममता के बाद उनकी पार्टी पर उनका भतीजा काबिज दिखता है, और बाल ठाकरे की शिवसेना पर उनके बाद बेटा उद्धव, और फिर उद्धव का बेटा दिखता है। लेकिन देश में बाकी क्षेत्रीय पार्टियों का हाल बहुत अलग नहीं है। तमिलनाडु में भी एक-एक कुनबे की पार्टियां घर के भीतर से चलती हैं, और एक पार्टी तो ऐसी भी रही जो कि अपने संस्थापक नेता के बाद पत्नी के बजाय प्रेमिका के पास चली गई। उधर कर्नाटक देखें तो वहां देवेगौड़ा की पार्टी उनके साथ-साथ बेटे की, और फिर बलात्कारी पोते की पार्टी होकर रह गई। आंध्र आएं, तो यहां भी एनटीआर के दामाद चन्द्राबाबू टीडीपी पर काबिज हुए, और चन्द्राबाबू का बेटा, नारा लोकेश भी अब उनका वारिस होने के साथ-साथ बाप के मंत्रिमंडल में मंत्री भी है। आंध्र-तेलंगाना में इस तरह की और भी पार्टियां रहीं, हैं, जो कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रही हैं। लेकिन सिर्फ दक्षिण को कोसना काफी नहीं होगा। 

उत्तर भारत में सबसे बड़ी समाजवादी पार्टी बाप के बाद बेटे के कब्जे में है, और चाचा ने कोशिश कर देखी, वे किसी किनारे नहीं पहुंचे। यूपी जैसे राज्य में सपा भी अब हाशिए की पार्टी हो गई है, सबसे बड़ी पार्टी चाहे बनी हुई है। मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव, और अखिलेश के बाद चाचा, पत्नी, कितने लोग राज्य विधानसभा, या संसद में हैं, यह याद रखना बड़ी चुनौती का काम है। ठीक इसी तरह बगल के बिहार में लालू यादव की आरजेडी है, जो कि लालू, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, दोनों बेटों, और बेटियों के बीच कई किस्म से चर्चा में रहती है, लेकिन मुलायम-लालू का सारा समाजवाद कुनबापरस्ती तक सीमित रह गया, और इन्होंने साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर अपने परिवार की मिनी बस को राज्य और देश की राजधानी तक दौड़ाने के अलावा किसी और नेता को आगे नहीं बढऩे दिया। कांग्रेस पर कुनबापरस्ती की तोहमत लगाने वाले समाजवादी नेताओं का यह हाल रहा कि आज नीतीश कुमार को पटना से हटाए जाने, और दिल्ली ले जाने पर विरासत के लिए अपना बेटा ही सूझा, जो कि दिखने में किसी जिम्मेदारी के काम के लिए सक्षम भी नहीं दिख रहा है। अब उत्तर भारत से थोड़ा बाहर चलें, तो कश्मीर की दोनों पार्टियां कुनबों के भीतर दूसरी-तीसरी पीढ़ी की लीडरशिप में हैं। पंजाब में देखें, तो बादल कुनबा केन्द्र और राज्य दोनों जगह परिवार के जाने किन-किन लोगों की सत्ता देखते आया है, और बाप-बेटे, बहू, शायद दामाद भी सत्ता को हांकते रहे। पंजाब के बगल के हरियाणा को देखें, तो राज्य की शायद हर पार्टी एक-एक कुनबे की पार्टी है, और राष्ट्रीय पार्टियां भी इस प्रदेश में आकर कुनबे तक सीमित रह जाती हैं। 

यह सिलसिला राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में सबसे मजबूत दिखता है, और नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, राहुल, प्रियंका तक कांग्रेस की लीडरशिप एक ही घर में रहती आई है। पूरे देश में कांग्रेस की हालत पिछले तीन चुनावों में जैसी दुर्गति झेल चुकी है, कमोबेश उसी तरह की दुर्गति अलग-अलग प्रदेशों में क्षेत्रीय पार्टियों ने झेली है, और इन सबके बीच एक सरीखी तो एक ही बात दिखती है कि इन सब पार्टियों पर एक-एक कुनबे के राज कायम हैं। तो क्या एक परिवार या एक व्यक्ति की लीडरशिप की पार्टियों के दिन लद गए? बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु के चुनाव हुए, और इन दोनों ही जगहों पर सत्तारूढ़ कुनबा खारिज कर दिया गया। कांग्रेस ने तो बीते एक-डेढ़ दशक में जितने चुनाव हारे हैं, उसके बाद हैरानी होती है कि उसके मौजूदा नेता राहुल गांधी किस हौसले के साथ देश का सामना करते हैं। 

एक कुनबे का राज राजनीतिक पार्टियों पर कामयाब नहीं दिख रहा है। कोई ऐसा वक्त रहा होगा जब जनता के बीच ऐसे कुनबे की किसी करिश्माई लीडरशिप की कामयाबी बार-बार हो जाती रही होगी, लेकिन आज देश में चुनावों में जो सबसे कामयाब पार्टी है, उस भाजपा में एक-दो नेताओं का राज जरूर दिख रहा है, लेकिन पूरे संगठन पर किसी एक कुनबे का राज नहीं दिख रहा। मोदी और शाह संगठन पर अपने संपूर्ण एकाधिकार के बावजूद अपने परिवार के किसी और को स्थापित करने जैसी कमजोरी से मुक्त हैं। जहां तक भाजपा की राजनीति है, इन दोनों के किसी दूर के रिश्तेदार के भी संगठन में किसी छोटी सी जगह पर भी होने की खबर नहीं है। क्या इसलिए भाजपा आज देश में बाकी पार्टियों को कुनबापरस्त कहने का कुछ अधिक हक रखती है? क्या आज देश की जनता अपने बाद सिर्फ अपने भतीजे को देखने वाली मायावती को देखना भी नहीं चाहती? क्या आज क्षेत्रीय दल अपने-अपने इलाकों में लंबे दबदबे के बाद हाशिए पर चले जा रहे हैं? 

जिस तरह कोई बहुत तेज आंधी आती है, तो उसमें जो होर्डिंग सबसे पहले मुड़ते या गिरते हैं, वे यूनीपोल रहते हैं, यानी एक खंभे पर खड़े हुए। भारतीय चुनावी राजनीति में जो पार्टियां एक कुनबे पर खड़ी हुई यूनीपोल कही जाने वाली होर्डिंग जैसी हैं, वे भाजपा की आंधी के सामने सबसे जल्दी ध्वस्त हो रही हैं। क्षेत्रीय पार्टियां एक-एक करके मटियामेट होती जा रही हैं, और राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस किसी किनारे नहीं पहुंच पा रही है। आज यह समझने की जरूरत है कि वे पार्टियां चौपट हो रही हैं, विभाजन का जख्म झेल रही हैं, जिन्होंने कुनबे से परे कोई लीडरशिप पनपने नहीं दी है। ऐसी पार्टियां सत्ता के भी बाहर हो चली हैं, और उनके ढांचे में भी दरारें पड़ चुकी हैं। राजनीति सिर्फ सत्ता के लिए हो यह तो जरूरी नहीं है, लेकिन अपनी विचारधारा को जमीन पर उतारने के लिए सत्ता की जरूरत भी होती है, और राहुल गांधी की कन्याकुमारी से कश्मीर तक की लोकप्रिय पदयात्रा चुनाव जीतने का विकल्प नहीं हो सकती। भारतीय राजनीति के विश्लेषकों को यह सोचना चाहिए कि क्या इस सदी के इस हिस्से में अब कुनबों के राज के सूरज डूब रहे हैं?

चलते-चलते यह बात सूझ रही है कि जिस तरह एक ही समुदाय के भीतर होने वाली शादियों और जन्म की वजह से वर्णसंकर होने का खतरा हो जाता है, खून से जुड़ी बीमारियों से अगली पीढिय़ां कमजोर हो सकती हैं, कुछ उसी तरह का खतरा भारत के ये राजनीतिक दल भी झेल रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

सडक़ों पर अनगिनत मौतें, और सरकार है कि बेफिक्र

22 जून 2026  

 

छत्तीसगढ़ में बाकी हिन्दुस्तान के मुकाबले सडक़ हादसे काफी अधिक सुनाई देते हैं। अभी सरगुजा में आधी रात एक दुपहिया जाकर किनारे खड़ी एक ट्रक में घुस गया, उस पर सवार चार लडक़ों में से तीन की मौत हो गई। जब पुलिस की गाड़ी इन्हें अस्पताल ले जाने के लिए पहुंची, तो वहां मौजूद भीड़ ने पुलिस सिपाही को ही गाड़ी से निकालकर बहुत बुरी तरह पीटा, उसकी वर्दी फाड़ दी, और भीड़ के लात-घूंसों से सिपाही बेहोश हो गया, और इसका वीडियो भी चारों तरफ फैल रहा है। इस एक घटना से कई सवाल खड़े होते हैं। क्या सडक़ किनारे रात में रूकी हुई ट्रक की कोई लाईट जल रही थी, जैसा कि कानून भी है? क्या मोटरसाइकिल पर चार लडक़ों को जाते हुए यह अंदाज नहीं था कि दुपहिए पर चार जवान लोगों का एक साथ चढक़र जाना खतरनाक होता है? क्या ऐसे हादसे के बाद मदद के लिए पहुंची पुलिस ऐसे हादसे के लिए जिम्मेदार है जिसमें कि कोई टक्कर भी नहीं हुई है, और सिर्फ दुपहिया जाकर खड़ी ट्रक में घुस गया है। भीड़ का इतना हौसला कैसे होता है कि मदद के लिए पहुंची पुलिस को इस तरह मारे, उसका वीडियो भी बनाए, और उसे फैलाए भी! 

छत्तीसगढ़ की सडक़ों पर हर बरस सैकड़ों मौतें हो रही हैं, मरने वाले अधिकतर लोग दुपहिया सवार रहते हैं, और उनमें से शायद ही कोई हेलमेट लगाए हुए रहते हैं। हम दूर सरगुजा, या जंगल-गांव की बात नहीं करते, जिस राजधानी रायपुर में अब पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था लागू हो चुकी है, उसमें आज क्या हाल है? आधा दर्जन से ज्यादा आईपीएस तैनात हो गए हैं, अनगिनत पुलिसवाले हैं, लेकिन हर दूसरा दुपहिया चालक एक हाथ में मोबाइल थामे हुए बात करते हुए जाता है, और उसे रोकने वाला कोई नहीं है। दुपहियों पर तीन-चार लोगों का जाना आम बात है, उन्हें भी रोकने वाले कोई नहीं है। ऑटोरिक्शा चलते हैं, तो बैटरी वाली गाडिय़ां रात में भी लाईट नहीं जलातीं, शायद इंजन चलाने के लिए बैटरी बचाती हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं। हर ऑटोरिक्शा चालक अपने साथ बगल में दो-दो लोगों को बिठाकर चलते हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं। और दुपहिया चालकों में पांच फीसदी भी ऐसे नहीं हैं जो कि हेलमेट लगाए रहते हों, न लगाने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं है। जिस सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति अपनी पहली पुलिस कमिश्नरी वाली राजधानी में भी ट्रैफिक सुधारने की नहीं है, वह सरकार बाकी प्रदेश में मौतों को नहीं रोक सकती। ट्रैफिक का कोई भी नियम इस राजधानी में सख्ती से लागू नहीं होता। यह तो कैमरों की मेहरबानी से रिकॉर्डिंग देख-देखकर कंट्रोल रूम में बैठे हुए लोग हर दिन कुछ हजार चालान कर लेते हैं, लेकिन उससे सडक़ों पर कोई अनुशासन नहीं दिखता। 

ट्रैफिक के नियम तो पूरे देश में एक सरीखे हैं, देश के बहुत सारे ऐसे प्रदेश और शहर हैं जहां हेलमेट को कड़ाई से लागू किए हुए चौथाई सदी से अधिक से तो हम ही देख रहे हैं। लेकिन यह प्रदेश ऐसी सस्ती राजनीति का अड्डा है कि आज अगर सरकार इसे कड़ाई से लागू करे, तो कल के दिन विपक्ष इस अंदाज में आंदोलन छेड़ देगा कि मानो सिर की आजादी खत्म हो रही है। वह सिर चकनाचूर हो जाए, इससे राजनेताओं का लेना-देना नहीं रहता, लेकिन वोटरों के सिर सरकार से नाराज नहीं होने चाहिए, यह फिक्र ट्रैफिक नियमों से ऊपर लागू रहती है। ऐसे में मौतों के अलावा और भला क्या होगा? सच तो यह है कि जिस प्रदेश में राजधानी जितनी अराजक है, उससे कम अराजक तो बाकी प्रदेश हो नहीं सकता, बाकी प्रदेश में तो नियम तोडऩा इससे अधिक होगा, जुर्म इससे अधिक होंगे, और गुंडागर्दी भी इससे अधिक होगी। इसलिए यह तो सरकार को तय करना है कि उसे लोगों की जिंदगी बचाना है या नहीं। किसी भी सुधार या बेहतरी की शुरूआत राजधानी से अधिक आसानी से हो सकती है। हालांकि इस प्रदेश में दुर्ग में एक ऐसे एसपी थे जिन्होंने अपने दम पर दुर्ग-भिलाई के शहरी इलाकों में बड़ी कामयाबी से हेलमेट अनिवार्य कर दिया था। उस अफसर की कार्रवाई सरकार के किसी अतिरिक्त आदेश से नहीं हुई थी, लेकिन उसे सरकार ने रोका भी नहीं था। इससे यह भी लगता है कि क्या कोई अफसर चाहे तो आज भी कड़ाई से नियम लागू कर सकते हैं? 

प्रदेश में सडक़ हादसों का रिकॉर्ड निकालकर देखें, तो एक-एक मालवाहक गाड़ी के एक्सीडेंट में दो-दो दर्जन मौतें भी हुई हैं, उसके बाद दिखावे के लिए सरकारी अमले ने एक-दो दिन ऐसी गाडिय़ों का चालान किया, लेकिन बाद में तो हर निजी और सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए मालवाहक गाडिय़ों में लोगों को ढोना चलता ही रहता है। कुछ महीने पहले तो बस्तर में स्कूली बच्चों के एक सरकारी टूर्नामेंट में खिलाड़ी बच्चों को मालवाहक गाड़ी पर ही ढोकर ले जाया गया था, उसके बाद सरकार ने सुधार की कोई कोशिश की हो, ऐसा सामने नहीं आया। यह सिलसिला बहुत ही भयानक है, जहां पर सरकार सडक़ हादसों में मौतों को एक नियति ही मान ले, और मौतों की तरफ से बेफिक्र हो जाए, तो मौतों के घटने की गुंजाइश खत्म ही हो जाती है। संसद से पास किए हुए कानून के तहत, केन्द्र सरकार के बनाए हुए ट्रैफिक नियम भारत सरकार के ही हैं, पाकिस्तान सरकार के नहीं हैं, कि जिन्हें लागू करना भारतीय राज्यों की हेठी होगी। 

सरगुजा में अभी सडक़ हादसे में तीन नौजवानों की मौत के बाद भीड़ जितनी हिंसक हुई, पुलिस पर जैसा हमला किया, उसमें पुलिस सिपाही की मौत भी हो सकती थी। कम से कम इस एक घटना से राज्य सरकार को सबक लेना चाहिए, और प्रदेश में सडक़ों को सुरक्षित बनाना चाहिए। आज पूरा प्रदेश सडक़ों पर बेकाबू दिखता है। जानवर हर सडक़ पर छाए रहते हैं, और बहुत से एक्सीडेंट उन्हीं के कारण होते हैं। कल की ही एक खबर है कि एक गाय को बचाते हुए एक दुपहिया चालक मर गया। छत्तीसगढ़ का हाईकोर्ट सडक़ों को सुरक्षित बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर लगे रहता है। इसके बावजूद सरकार की कार्रवाई बिल्कुल ही नाकाफी है। अभी इस तरह दुपहिया पर सवार चार में से तीन नौजवानों के मौके पर ही मर जाने, चौथे के बुरी तरह जख्मी हो जाने, और भीड़ के हिंसक होकर पुलिस पर हमला करने की घटना से सरकार को जागना चाहिए, वरना जिंदा लोग मौत की नींद सो ही रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

सेक्स के लिए दर्जनों लोगों को अपनी पत्नी पेश करने वाले, और दूसरे लोग

21 जून 2026

योरप के एक बड़े विकसित देश स्वीडन की खबर ऐसी दिल दहलाने वाली है कि मनोवैज्ञानिक भी इस मामले को पढक़र दहल जाएं। यहां एक  आदमी ने अपनी पत्नी को तरह-तरह की हिंसा की धमकियां देते हुए मजबूर किया कि वह अलग-अलग मर्दों से सेक्स करे, और उनसे उगाही भी करे। 61 साल के इस आदमी को करीब साढ़े चार साल की कैद सुनाई गई है, और उसने जिन 120 मर्दों के साथ सेक्स के लिए अपनी बीवी को धमका-धमकाकर मजबूर किया था, उनमें से 28 लोगों को अदालत ने कुसूरवार ठहराया है। अदालत ने पाया कि इस आदमी ने अपनी पत्नी का बेरहमी से शोषण किया, और उसने पत्नी को हिंसा की धमकियां दे-देकर जान-पहचान के लोगों और पड़ोसियों से भी सेक्स करने और वसूली करने, जगह-जगह कैमरे लगाकर इसकी रिकॉर्डिंग करने, और उसे ऑनलाईन प्रसारित करने के लिए भी मजबूर किया। अदालत ने इस जोड़े के नाम उजागर नहीं किए हैं। 

इस मामले से कुछ बरस पहले फ्रांस में सामने आए एक दूसरे मामले की याद ताजा होती है। उसमें भी डोमिनिक पेलिको नाम के यह आदमी अपनी पत्नी गिजेल पेलिको को करीब एक दशक तक नशीली दवाएं देकर बेहोश  करते रहा, और लोगों को ऑनलाईन छांटकर, ढूंढकर, उनसे संपर्क करके उन्हें बुलाते रहा, और अपनी पत्नी की बेहोशी की हालत उन लोगों से अपनी पत्नी से सेक्स करवाया, और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी यह शादीशुदा आदमी बेटियों वाला भी था, और उसके नाती-नातिन भी थे। जब पुलिस ने अश्लील फिल्मों के मामले में इस आदमी पर छापा मारा, और उसके डिजिटल उपकरणों से हजारों फिल्में मिलीं, तो पुलिस से पता लगने पर पत्नी को भी भरोसा नहीं हुआ कि उसके साथ इतने बरसों से ऐसा हो रहा है। 

अब मनोवैज्ञानिक इन दोनों मामलों का तरह-तरह से अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि इंसानी सोच के कई पहलू इनमें सामने आए हैं, जो कि एक जटिल नौबत है, और विश्लेषण आसान नहीं है। ये दोनों ही मामले लंबी शादीशुदा जिंदगी के बाद के हैं, इन दोनों में कई किस्म के फर्क भी हैं, लेकिन कई किस्म की बातें एक सरीखी भी हैं। फर्क यह है कि फ्रांस के मामले में पति ने दस बरस तक पत्नी को नशा दे-देकर सुलाया, और उसकी बेहोशी की हालत में ही पहले से छांटकर रखे गए मर्दों को बुलाकर उनसे सेक्स करवाया। इनमें से कुछ मर्दों ने अदालत को यह भी कहा कि उन्हें पति ने यह कहकर बुलाया था कि पत्नी की इच्छा है कि वह बेहोश होने का नाटक करे, और वैसी हालत में कोई अनजान व्यक्ति उससे सेक्स करे। लेकिन स्वीडन की इस ताजा घटना में पति ने पत्नी को बेहोश करने की जहमत नहीं उठाई, हिंसा की धमकी दे-देकर, उंगलियां काट देने की बात कहकर, पूरे घर में जगह-जगह कैमरे लगाकर उसे एक मानसिक कैद में रखा था, और उसे अलग-अलग लोगों से सेक्स करने पर मजबूर करता था। 

इन दोनों ही मामलों में मनोवैज्ञानिकों का प्रारंभिक निष्कर्ष यह है कि ये इन पतियों की किसी यौन इच्छा का नतीजा नहीं है। उनका कहना है कि दोनों ही मामले पत्नी के शरीर पर, उसकी जिंदगी पर एक परले दर्जे का मालिकाना हक रखने की भावना के हैं, जिनमें पति को यह संतुष्टि मिलती है कि वे अपनी पत्नी की जिंदगी से, और उसकी देह से कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी करवा सकते हैं। दूसरे व्यक्ति पर पूर्ण अधिकार स्थापित करने की इच्छा। मनोविज्ञान में इसे ‘कोएर्सिव कंट्रोल’ यानी दमनकारी नियंत्रण कहते हैं। यह काबू शारीरिक हिंसा से भी अधिक खतरनाक होता है, और इसमें मुजरिम पीडि़त की स्वतंत्रता को धीरे-धीरे कम करता है, फिर निगरानी और धमकी का इस्तेमाल होता है, और आखिर में ऐसे हिंसक नियंत्रण के शिकार लगातार भय और असुरक्षा में जीने लगते हैं, और पूरी तरह समर्पण कर देते हैं। यह बात स्वीडन वाले मामले पर लागू होती है, लेकिन फ्रांस का मामला बेहोशी में करवाए गए बलात्कारों का था, और उस मामले में पति की इस हिंसा, और जुर्म की शिकार महिला ने अदालत में अपनी पहचान उजागर करने का फैसला खुद लिया। 

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यह कहते हैं कि इन दोनों ही मामलों में एक बात एक सरीखी है कि इस हिंसा और जुर्म की शिकार दोनों महिलाओं को इंसान की तरह मानना बंद कर दिया गया था। उनके पतियों ने उन्हें एक सामान की तरह देखना और इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, और बरसों तक, पकड़े जाने तक जारी रखा। मनोविज्ञान के कुछ दूसरे मामलों के विश्लेषण बताते हैं कि गुलामी के दौर से लेकर युद्ध अपराधों तक, हर जगह मुजरिम पहले अपने शिकार को इंसान मानना बंद कर देते हैं, और फिर सामान की तरह या साधन की तरह उनका इस्तेमाल करते हैं। 

इन दोनों ही मामलों का एक और पहलू दोनों ही देशों की अदालतों को परेशान करते रहा। वह यह कि इनके पति तो अपनी हिंसक सोच के चलते हुए इन्हें सामान की तरह इस्तेमाल करते रहे, लेकिन पतियों की जुटाए हुए दूसरे मर्द भी किसी दूसरे की पत्नी को उसी अमानवीय तरीके से इस्तेमाल करते रहे। इस सोच को समाज इंसानियत की इज्जत बचाने के लिए चाहे हैवानियत कह ले, चाहे कुछ और कह ले। सच तो यह है कि एक बेहोश या बेबस कैदी के साथ सेक्स के मौके को किसी ने नहीं छोड़ा। किसी को यह नैतिक रूप से गलत नहीं लगा, किसी की चेतना ने उसकी उत्तेजना को कम नहीं किया। पतियों की उत्तेजना पत्नियों पर पूरे काबू करने, और उनका सामान सरीखा इस्तेमाल करने से बढ़ रही थी, और पत्नियों के बेहोश या बेबस हाल में उनके साथ सेक्स करने वालों की उत्तेजना पर कोई नैतिक रोड़ा नहीं था। 

लोगों को याद होगा कि भारत के जम्मू में कठुआ नाम की जगह पर एक मंदिर के पुजारी को आठ बरस की एक खानाबदोश मुस्लिम लडक़ी हाथ लग गई, तो उसने खुद भी उससे बलात्कार किया, और अपने भतीजे सहित आधा दर्जन और लोगों से भी उससे बलात्कार करवाया। अदालत में यह साबित हुआ कि बच्ची का अपहरण किया गया, उसके साथ रेप हुआ, और उसका कत्ल कर दिया गया। आठ बरस की गरीब बच्ची के साथ बलात्कार, और हत्या करने वाले पुजारी सहित तीन लोगों को उम्रकैद हुई, और सुबूत मिटाने, और साजिश में भाग लेने के लिए तीन लोगों को पांच-पांच साल की कैद हुई जिसमें दो पुलिसवाले थे। मतलब यह कि किसी की नैतिकता देह-सुख में आड़े नहीं आती। हिन्दू पुजारी को मुस्लिम बच्ची से बलात्कार करते हुए जात-धरम का परहेज नहीं था, ईश्वर का नाम लेकर रोजी-रोटी कमाने वाले को इतनी कमउम्र बच्ची से सिलसिलेवार बलात्कार करवाने से परहेज नहीं था, और बाद में कत्ल करने से भी। देह-सुख तो पता नहीं आठ बरस की बच्ची से इन मर्दों को कितना मिला होगा, एक दूसरे इंसानी बदन पर इस हद तक अपना नियंत्रण करने की हवस शायद इसमें अधिक रही होगी, और यह भी कि ऐसे बदन को वे दूसरों में भी बांट सकते हैं। 

योरप जैसे विकसित इलाके के उच्च शिक्षित और संपन्न, बड़े लोकतांत्रिक समाजों में भी ये घटनाएं हुईं, और भारत जैसे सांप्रदायिकता से गुजरते देश में भी। लोगों को याद रखना चाहिए कि कठुआ के बलात्कारियों को बचाने के लिए जम्मू में राष्ट्रीय ध्वज के साथ रैलियां निकली थीं, और इस बच्ची की तरफ से मुकदमा लडऩे वाली एक हिन्दू महिला वकील का सामाजिक बहिष्कार सा हो गया था। आंदोलनकारियों का मुद्दा यह था कि एक खानाबदोश गरीब, बेचेहरा-बेनाम जैसी महत्वहीन लडक़ी से बलात्कार और उसकी हत्या जैसे महत्वहीन मामले में हिन्दू समाज के आधा दर्जन लोगों को फांसी के तख्ते तक क्यों ले जाया जाए? शायद उस वक्त आंदोलन में कोई हिन्दू मंत्री भी शामिल थे। 

लोगों को अपने आसपास के पड़ोसियों और परिवारों के इस तरह के जटिल, और हिंसक हालात की तरफ से आंखें खुली रखनी चाहिए। अगर लगे कि कोई जुर्म हो रहा है, तो पुलिस को खबर करनी चाहिए। फ्रांस और स्वीडन इन दोनों ही जगहों पर इन मामलों में जैसी हलचल चली होगी, किसी न किसी की नजरों में वह पहले आ जानी चाहिए थी, मामले के पुलिस तक पहुंचने के। लेकिन जिस तरह किसी भी तरह के मुफ्त या आसानी से हासिल सेक्स के लिए मर्द बिना किसी नैतिक बोझ के आनन-फानन तैयार हो जाते हैं, उसी तरह आसपास के लोग सामूहिक, सामुदायिक, या सामाजिक बचाव की जिम्मेदारी से मुक्त रहते हैं, फिर चाहे वह पड़ोस में किसी बंधुआ बाल मजदूर का मामला ही क्यों न हो। अभी चार दिन पहले ही मध्यप्रदेश में पति द्वारा गले में जंजीर-ताला डालकर बांधकर रखी गई एक महिला किसी तरह छूटकर थाने पहुंची थी। ऐसा तो हो नहीं सकता था कि परिवार या पड़ोस में किसी ने यह कैद पहले देखी न हो। 

(Daily Chhattisgarh)  

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

झूठे-बेशर्म ट्रम्प के मुंह पर मेलोनी ने ठीक मारा सैंडल

 21 जून 2026  

 

कुछ महीने पहले तक इटली की प्रधानमंत्री जिऑर्जिया मेलोनी को योरप में डॉनल्ड ट्रम्प के सबसे करीबी सहयोगियों में गिना जाता था, लेकिन अभी इन दोनों के बीच जो बयानबाजी चल रही है, वह ट्रम्प की कमीनगी और बदचलनी दोनों का एक नया सुबूत पेश करती है। अभी-अभी फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के बाद ट्रम्प ने एक इंटरव्यू में, और सोशल मीडिया पर दावा किया कि मेलोनी ने उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए मिन्नतें कीं, भीख मांगीं। उन्होंने कहा कि मेलोनी अपनी घरेलू लोकप्रियता बढ़ाने के लिए उनके साथ तस्वीर चाहती थीं, और यह भी कहा कि अब वह फिर से उनसे दोस्ती करना चाहती हैं। इस पर मेलोनी ने एक वीडियो जारी करके कहा कि ट्रम्प की बात पूरी तरह गढ़ी हुई है। उन्होंने कहा कि न तो मैं, न ही इटली कभी किसी से भीख मांगते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि ट्रम्प अपने पुराने सहयोगियों के प्रति ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, जबकि पश्चिम के विरोधियों के प्रति वे अधिक नरमी दिखाते हैं। इस कड़वी बयानबाजी के पहले दौर के बाद ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर फिर दोहराया कि मेलोनी ने उनसे कई बार साथ में फोटो खिंचाने की मांग की थी। यह मामला इतना बढ़ गया कि इटली के विदेश मंत्री ने इसके तुरंत बाद होने वाली अमरीका की अपनी घोषित यात्रा रद्द कर दी। पीएम मेलोनी ने और भी कड़ा जवाब पोस्ट किया, और कहा कि ट्रम्प की मेरी लोकप्रियता की फिक्र छोडक़र अपनी लोकप्रियता की फिक्र करनी चाहिए। 

यह बात हैरान करती है कि ईरान युद्ध को लेकर अमरीका का फौजी साथ न देने वाले देशों के साथ बदसलूकी करने में ट्रम्प किस हद तक जा सकता है। एक महिला प्रधानमंत्री के बारे में झूठी और गढ़ी हुई बातें फैलाने में ट्रम्प को कोई परहेज नहीं है, और उसकी आदतन झूठ बोलने की आदत सब भारत-पाकिस्तान के बारे में देख चुके हैं, कि वह किस तरह 60-70 बार इन दो देशों के बीच जंग रूकवाने की बात कह चुका है। लोगों ने यह भी देखा है कि किस तरह वह शायद 38 बार ईरान के साथ जंग खत्म हो जाने की घोषणा कर चुका है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विश्व इतिहास बताता है कि ट्रम्प ने सदियों से चले आ रहे कूटनीतिक शिष्टाचार को कूड़े के ढेर में फेंक दिया है, और वह अपनी सनक से, पसंद और नापसंद से, और इनसे भी ऊपर अपनी नफरत से यह तय करने लगा है कि उस दिन कौन सा देश उसका दोस्त होगा, और कौन सा देश उसका दुश्मन। वह अचानक पुतिन का हमदर्द हो गया, और दशकों पुराने अपने नाटो सहयोगियों का दुश्मन। अस्थिर पारे जैसा उसका यह मिजाज दुनिया ने कभी देखा नहीं था, तानाशाहों में भी मिजाज कुछ हद तक तो टिकाऊ रहता था, लेकिन ट्रम्प ने अपने कारोबारी हितों, और अपने अहंकार के लिए रिश्तों को पूरी तरह बिकाऊ करके रख दिया है। 

आज पूरी दुनिया पर फौजी और आर्थिक मनमानी लागने की बेतहाशा तानाशाह ताकत के चलते हुए दुनिया ट्रम्प को झेल रही है, लेकिन मित्रदेशों पर कब्जे की, फौजी कब्जे की उसकी धमकियों के चलते कनाडा, योरप, और नाटो उससे दूर होते चले गए हैं। दुनिया के इतिहास में अब तक इजराइल सबसे अछूत देश रहते आया है, लेकिन अमरीका ने एक किस्म से उसे भी पीछे छोड़ दिया है, और आज ईरान पर ट्रम्प के हमले के बीच परंपरागत रूप से अमरीका के दोस्त देशों ने भी, एक-एक कर हर किसी ने साथ देने के लिए ट्रम्प को मना कर दिया। अमरीकी की इतनी बेइज्जती ढाई सौ बरस के उसके इतिहास में सारे राष्ट्रपतियों की गलतियों, और गलत कामों ने मिलकर भी नहीं करवाई होगी जो कि ट्रम्प अपने इस कार्यकाल के एक तिहाई हिस्से में करवा चुका है। देश के भीतर भी उसकी पार्टी के बेबस बंधुआ मजदूरों सरीखे सांसदों को छोड़ दें, तो देश के बहुत सारे नामी-गिरामी कलाकारों ने आजादी के ढाई सौ बरस के जलसे में ट्रम्प के न्यौते पर गाने-बजाने से मना कर दिया। राजनीतिक चेतना से संपन्न लोग इतने कमीने इंसान के साथ किसी मंच पर आने से अब मना कर रहे हैं! यह नौबत अमरीका के इतिहास में इसके पहले कभी नहीं आई थी। 

अमरीका की जनता ने जिस घटिया इंसान को अपना राष्ट्रपति चुना है, उसे तो अपनी पसंद के दाम चुकाने ही होंगे, लेकिन आज पूरी दुनिया इस तानाशाह की सनक की कीमत चुका रही है। आज अगर हिन्दुस्तान के पेट्रोप पम्पों पर अधिक दाम चुकाते हुए गरीब लोगों का खून सूख जाता है, तो उसकी कुछ हद तक जिम्मेदारी इस ट्रम्प की भी है, जिसके लिए हिन्दुस्तानी हवन करते थक नहीं रहे थे! जब किसी एक आदमी के हाथ में ऐसी असीमित, और बिना जवाबदेही की ताकत जुट जाती है, तो उसका नतीजा इतना खराब हो सकता है, यह अमरीका और बाकी दुनिया पहली बार भुगत रहे हैं। अपने घटिया कामों की, अपने पारिवारिक कारोबार को लेकर भ्रष्टाचार की मिसालों की जैसी लंबी फेहरिस्त ट्रम्प अब तक बना चुका है, उतनी लंबी तो उसकी घुटने छूती लाल टाई भी नहीं है। एक दिन ऐसा आएगा जब यह सत्ता पर नहीं रहेगा, और आने वाली कोई दूसरी अमरीकी सरकार इसके जुर्म की जांच करवाएगी, तो यह दुनिया के सामने आएगा कि अपने आपको एक बहुत बड़ा लोकतंत्र कहने वाला अमरीका किस तरह तानाशाही की संभावनाओं वाला देश भी है। 

एक बार फिर इतालवी प्रधानमंत्री जिऑर्जिया मेलोनी की बात पर लौटें, तो यह बात अच्छी लगती है कि उसी पश्चिमी दुनिया में, उसी नाटो के तहत रहते हुए मेलोनी ने ट्रम्प की झूठी बकवास का जवाब देने का इतना हौसला है। ऐसा नहीं है कि इटली के आर्थिक और फौजी हित अमरीका के साथ जुड़े हुए न हो, लेकिन किसी अंतरराष्ट्रीय सहयोगी को नीचा दिखाने के लिए, और अपने आपको ऊंचा और मशहूर साबित करने के लिए महत्वोन्मादी ट्रम्प की हरकत पर मेलोनी ने एकदम सही जवाब दिया है। दो स्वतंत्र देशों को एक-दूसरे के साथ परस्पर सम्मान के संबंध रखने चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक देश लगातार दूसरे देश को लतियाता रहे, और वह दूसरा देश गुलाम की तरह पैरों पर पड़ा रहे। ट्रम्प की गुंडागर्दी, और उसकी बकवास का जवाब देने वाले नाटो के भीतर ही अब आधा-एक दर्जन देश हो चले हैं। उसको उसकी औकात समझ आ गई है, और इसीलिए उसने ईरान के पैरों पर गिरकर किसी तरह इज्जत बचाने वाला यह समझौता किया है। ऐसा लगता है कि अपनी मदद के मोहताज पाकिस्तान का भरपूर इस्तेमाल ट्रम्प ने ईरानी मोर्चे की शर्म से उबरने के लिए किया है, और जिस कीमत पर यह समझौता हुआ है, उसे देखकर अमरीका में ट्रम्प की पार्टी के नेता भी हैरान हैं। लेकिन इस आदमी की शोहरत की हसरत इस हिंसक हद तक इस पर हावी है कि ऐसी मुसीबत के बीच भी वह मधुमक्खी के छत्ते में हाथ घुसाने की तरह मेलोनी को लेकर एक झूठी बकवास कर रहा है, और जूता खा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संबंध और कूटनीति का ऐसा दीवाला पहले कभी नहीं निकला था, और ट्रम्प कोई विरासत छोडक़र जाने वाला नहीं है, अपनी मिसालों से नसीहतें ही छोडक़र जाने वाला है कि दुनिया के नेता को क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

चीन में 12 हजार कोर्स बंद, 10 हजार नए कोर्स शुरू!

20 जून 2026  

 

चीन की एक दिलचस्प खबर है कि वह अपने नौजवानों में बेरोजगारी से निपटने के लिए पिछले चार बरस में 12 हजार से अधिक स्नातक पाठ्यक्रमों को बंद कर चुका है। वहां के विश्वविद्यालयों में ऐसे सारे पाठ्यक्रम बंद किए जा रहे हैं, जिन्हें पढक़र निकलने वाले लोगों को चीन या बाहर कोई काम न मिल सके। 12200 कोर्स बंद करने के साथ-साथ उसने 10200 नए कोर्स भी शुरू किए हैं, जो कि देश भर में बिखरे सभी चीनी विश्वविद्यालयों का आंकड़ा है। यह देश अब मानकर चल रहा है कि जो डिग्री कोई काम न दिला सके, वह कंधों पर लदे मुर्दों सरीखे बोझ ही हैं। कला, समाज विज्ञान, विदेशी भाषा, और मैनेजमेंट के कोर्स बड़े पैमाने पर ऐसी कार्रवाई का शिकार हुए हैं। ये सारे आंकड़े चीनी विश्वविद्यालयों के हैं, और वहां के सरकारी मीडिया ने इन्हें प्रकाशित किया है। आज वहां 16 फीसदी नौजवान बेरोजगार हैं, और इन्हीं महीनों में वहां सवा करोड़ से अधिक नए ग्रेजुएट बनने वाले हैं। चीनी सरकार और विश्वविद्यालय लगातार छात्रों को अनुत्पादक पाठ्यक्रमों से दूर कर रहे हैं, और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए ही पढ़ाई करवा रहे हैं। यह सिलसिला सिर्फ एआई की वजह से नहीं है, बल्कि कुछ दूसरी वजहें भी इसके पीछे हैं, यह एक अलग बात है कि एआई और रोबोटिक्स के बढ़ते हुए इस्तेमाल की वजह से अब कई तरह की पढ़ाई की कोई जरूरत नहीं रह गई है।

इस बारे में कुछ और शोध करने पर पता लगता है कि चीन के सामने मौजूदा बेरोजगारी से जूझने के साथ-साथ एक दूसरी चुनौती भी है, एआई, रोबोटिक्स, चिप निर्माण, डेटा विज्ञान जैसे क्षेत्रों में हुनरमंद लोगों की बड़ी जरूरत है, और वहां पर ऐसे कुशल लोग पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं है। इसलिए अब जो नए कोर्स शुरू किए गए हैं, वैसे दस हजार से अधिक पाठ्यक्रमों में एआई, डेटा साईंस, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, ब्रेन-कम्प्यूटर संबंध, भविष्य की इंजीनियरिंग, और मानव जैसी क्षमताओं वाले रोबोट, इनसे जुड़े हुए पाठ्यक्रम हैं। चीन भविष्य की दुनिया की जरूरतों को, और अपनी क्षमताओं-संभावनाओं को देखते हुए अपनी पूरी अर्थव्यवस्था को उच्च तकनीक वाले उद्योगों की तरफ मोड़ रहा है, और इसी के मुताबिक शिक्षण-प्रशिक्षण से वह कामगार तैयार कर रहा है। विश्वविद्यालयों के नए कोर्स बेरोजगार पैदा करने के बजाय जरूरत के कामगार खड़े करने जा रहे हैं। 

विश्लेषक यह कहते हैं कि सरकारें आमतौर पर यह मानकर चलती हैं कि उन्हें दस-पन्द्रह साल बाद की बाजार की जरूरतों का अंदाज रहता है, लेकिन कई बार ऐसा अंदाज गलत निकलता है। 1990 के दशक में कई देशों को लगा था कि इंजीनियरों की भारी कमी होगी, लेकिन बाद में बहुत से देशों में इंजीनियरों की भरमार हो गई, और फिर देशों का ढर्रा एमबीए की तरफ मुड़ गया, धीरे-धीरे एमबीए इतने हो गए कि उनके लिए रोजगार नहीं रह गए। और अब तो एआई ऐसे बहुत सारे काम पलक झपकते कर लेता है जो एमबीए डिग्रीधारी लोगों के लायक माने जाते थे। यहीं पर भारत पर भी एक नजर डालने की जरूरत है। यहां के विश्वविद्यालय और कॉलेजों में बड़ी संख्या में ऐसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं जिनके ग्रेजुएट का पूरी जिंदगी बेरोजगार रहना तय सरीखा है। बहुत से ऐसे लोग हो सकते हैं जो किसी विषय में अपनी दिलचस्पी के चलते बिना रोजगार-संभावनाओं वाले कोर्स भी करना चाहें, लेकिन इनमें पढऩे वाले लोग क्या सचमुच बिना रोजगार के जिंदा रह सकते हैं? क्या भारत के विश्वविद्यालयों को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के स्तर पर पाठ्यक्रमों की छंटनी जैसा कोई काम सुनाई या दिखाई पड़ता है कि चल बसी संभावनाओं वाले कोर्स बंद किए जाएं? अगर खेत में जाकर किसान को ही कुछ देर सरकारें और विश्वविद्यालयों के कुलपति देखते बैठें, तो भी उन्हें यह दिख जाएगा कि नई फसल बोने के पहले किस तरह जंगली घास-फूस निकाल दिया जाता है ताकि काम की फसल के लिए डाला जा रहा खाद-पानी उन पर बर्बाद न हो। और तो और शहरों में जहां पर घास के लॉन लगाए जाते हैं, वहां भी लॉन की घास से परे की जंगली घास को निकाल दिया जाता है। इसी तरह जिन पाठ्यक्रमों से जिंदा रहना मुमकिन न हों, उन्हें सिर्फ अकादमिक दिलचस्पी से बनाए रखना विषय की विविधता के लिए तो ठीक है, लेकिन नौजवानों की संभावनाएं इस पर खत्म करना जायज नहीं है। 

कहने के लिए भारत में राष्ट्रीय स्तर पर यूजीसी है, जो कि देश के सभी विश्वविद्यालयों से समन्वय के लिए एक संस्था है। दूसरी तरफ राज्यों के स्तर पर राज्यपालों की अगुवाई में विश्वविद्यालय समन्वय समिति रहती हैं। फिर देश भर में ऐसे उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान हैं जिन्हें डीम्ड विश्वविद्यालयों का दर्जा मिला हुआ है, या निजी विश्वविद्यालयों का एक महंगा तबका और है। इन सबके बीच राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई कमेटी हो जो कि उद्योग-व्यापार की भविष्य की जरूरतों का अंदाज लगाकर यह बता सके कि कौन से कोर्स अब अजायब घरों में रख देने के लायक हो गए हैं। किसी भी जिम्मेदार देश को अपनी अगली पीढ़ी को भविष्य की संभावनाओं का विशेषज्ञों का अंदाज बता देना चाहिए। हम इसी कॉलम में कई बार यह लिखते हैं कि दुनिया भर के देशों में भारत सरीखे देशों से कामगारों के जाकर काम करने की अपार संभावनाएं हैं, जो कि बढ़ती चली जाएंगी। इसी सिलसिले में स्विटजरलैंड में अभी पिछले हफ्ते हुए एक जनमत संग्रह की चर्चा करनी चाहिए, जो कि वहां कि प्रवासियों की विरोधी एक पार्टी की पहल पर करवाया गया था। इसमें नागरिकों से राय ली गई थी कि क्या 95 लाख की वर्तमान आबादी के बढऩे पर एक करोड़ पर स्थाई रोक लगा दी जाए ताकि दूसरे देशों से लोगों का आना रूके। लेकिन इस सोच के विरोधी लोगों का यह मानना था कि अगर दूसरे देशों के लोग नहीं आएंगे, तो स्विटजरलैंड की बुजुर्ग आबादी की जरूरतों के काम कौन करेंगे, और देश की अर्थव्यवस्था में बड़ी रूकावट भी आएगी। बड़े स्पष्ट बहुमत से जनता ने आबादी पर सीलिंग लगाने के खिलाफ वोट दिया। मतलब यह है कि काबिल कामगारों की जरूरत दुनिया में सब जगह रहेगी, और हो सकता है कि उनके लायक काम हिन्दुस्तान के भीतर भी निकल जाएं। ऐसे में भारत सरकार को, या देश के जिम्मेदार प्रदेशों को विशेषज्ञों के मार्फत अगले कुछ दशकों के प्रोजेक्शन तैयार करवाने चाहिए कि किस-किस तरह की पढ़ाई, या ट्रेनिंग के लोगों की दुनिया में जरूरत रहेगी। ऐसा न करना अपनी अगली पीढ़ी के साथ बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी की बात होगी।

(Daily Chhattisgarh)