30 जून 2026
कल पंजाब में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक खबरों में आकर चली गई, और उस पर अधिक चर्चा नहीं हुई। मामला चूंकि सिर्फ पंजाब तक सीमित था, और भारत के लोग अब अपने प्रदेश से परे के मामलों के बारे में अधिक नहीं सोचते, इसलिए लोगों को खबरों में मिली जानकारी भी अटपटी नहीं लगी। वहां सिक्ख पंथ की सर्वोच्च सत्ता, अकाल तख्त ने पंजाब के सिक्ख मंत्रियों और विधायकों को बुलाया। और उन्हें बिठाकर यह कहा कि पंजाब में लागू बेअदबी विरोधी कानून की ‘आपत्तिजनक’ धाराएं एक महीने के भीतर हटाएं। इस बैठक के पहले 15 जून को अकाल तख्त ने सभी सिक्ख विधायकों और मंत्रियों को इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण के लिए पेशी की तारीख दी थी। पंजाब के बेअदबी विरोधी कानून में गुरू ग्रंथ साहिब से जुड़े कुछ पहलू हैं, जिन पर अकाल तख्त ने यह निर्देश दिया कि इस पर तय करने का अधिकार सरकार या विधानसभा का नहीं है, बल्कि पंथ और अकाल तख्त साहिब का है। कल की अकाल तख्त की पंथक कचहरी में राज्य के 87 मंत्री-विधायक पहुंचे, जो कि अलग-अलग पार्टियों के भी थे।
भारत के किसी भी और राज्य में किसी धर्म की सत्ता ऐसी नहीं है कि वह सरकार में शामिल, या विधानसभा में निर्वाचित अपने धर्म के किसी भी व्यक्ति को पंथक (पंथ के) नोटिस भेजकर पेशी पर बुलवा सके। पंजाब में सिक्ख धर्म का संगठन, सिक्खों की सबसे बड़ी पार्टी अकाली दल, इन दोनों के अंतरसंबंध ऐसे हैं कि राजनीति हमेशा धर्म के मातहत काम करते दिखती है। और अकाली दल से परे भी दूसरी पार्टियों के ऐसे नेताओं का बड़ा लंबा इतिहास है जिन्हें धर्म ने कोई सजा दी, और उन्होंने उस सजा को मंजूर करते हुए उसे भुगता। इसी के चलते आज यह नौबत है कि अकाल तख्त ने सभी पार्टियों के सिक्ख विधायकों-मंत्रियों को बुलाया, और वे तकरीबन सभी वहां पर पहुंचे। मुख्यमंत्री भगवंत मान एक दूसरे नोटिस पर अभी कुछ ही दिन पहले वहां होकर आए ही थे।
पंजाब में बेअदबी के मामले आमतौर पर गुरू ग्रंथ साहिब के किसी तरह से अपमान समझी गई घटनाओं के रहते हैं। सिक्ख भावनाओं के मुताबिक इस मुद्दे पर किसी तरह का कोई समझौता नहीं होता, और इस ग्रंथ को गुरू मानने की भावना इतनी मजबूत है कि इसे कोई किताब नहीं कहा जाता, इसे स्वरूप कहा जाता है, और इसे किसी जीवित गुरू की तरह का सम्मान दिया जाता है। अकाल तख्त और सिक्ख धर्मगुरूओं की ताजा आपत्ति सिक्ख शब्दावली को लेकर है, और अकाल तख्त का कहना है कि पंथिक सहमति के बिना सरकार या विधानसभा कोई शब्द या परिभाषा तय नहीं कर सकते। धर्मगुरूओं का कहना है कि धार्मिक मर्यादा, उपासना पद्धति, और आंतरिक अनुशासन के मामलों में ग्रंथी, गुरूद्वारा प्रबंधक समितियां, और संगत को सरकारी दंडात्मक कानून के अधीन नहीं लाना जाना चाहिए। धर्म के सारे मामलों में अंतिम अधिकार सिर्फ धार्मिक संस्थाओं के पास रहना चाहिए।
इस भावना को इस पूरे मामले को ठीक से न जानने वाले लोग समझ भी नहीं पाएंगे। जब बेअदबी विरोधी कानून बना, तो उसमें गुरू ग्रंथ साहब के प्रत्येक स्वरूप (किताब) का केन्द्रीय रजिस्टर बनाने, और उन्हें अलग-अलग क्रम संख्या देने का प्रावधान रखा गया था, ताकि बेअदबी की कोई भी शिकायत आने पर बारीकी से जांच की जा सके। इस पर सिक्ख संगठनों ने यह विरोध दर्ज कराया था कि पवित्र ग्रंथ को सरकारी रिकॉर्ड के सामान की तरह क्रम संख्या के साथ दर्ज करना धार्मिक भावनाओं के अनुरूप नहीं है। अकाल तख्त शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी की शिकायत है कि यह कानून उनसे पर्याप्त परामर्श के बिना पारित किया गया है। पंथ की इस सोच के आलोचक यह कहते हैं कि लोकतंत्र में विधानसभा में पारित कानूनों में संशोधन का अधिकार केवल निर्वाचित विधायकों, और संवैधानिक संस्थाओं को हो सकता है, जब कोई बाहरी धार्मिक संस्था ऐसे फेरबदल के लिए विधायकों को बुलाकर उन्हें एक समय सीमा का निर्देश दे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। दिलचस्प बात यह है कि पंजाब के कुल 117 विधायकों में से 87 वहां मौजूद थे, जो कि अपने को सिक्ख मानते हैं। बाकी दूसरे धर्मों के विधायकों को वहां बुलाया भी नहीं गया था। लेकिन एक दिलचस्प सवाल खड़ा होता है कि क्या पार्टियों की दलगत निष्ठा से परे विधायकों को, या सांसदों को, उनके सदनों में कुछ करने के लिए क्या उनके धार्मिक संगठन निर्देश दे सकते हैं? क्या इन निर्वाचित सदस्यों को ऐसे निर्देश मानने चाहिए? क्या यह संवैधानिक लोकतंत्र के ऊपर एक धार्मिक सत्ता है? ऐसे कई असुविधा के सवाल लोकतंत्र में उठने चाहिए, लेकिन पंजाब में धर्म का दबदबा कुछ ऐसा है कि धर्म की असुविधा के सवाल न पूछे जाते, न आमतौर पर सोचे जाते। लेकिन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि 80 के दशक में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए स्वर्ण मंदिर में धर्म की सत्ता किस हद तक चली गई थी, और ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद देश में कैसी-कैसी हिंसक घटनाएं हुई थीं। वे बरस सरकार पर धर्म के दबदबे का एक अच्छी तरह दर्ज दौर थे। यह चर्चा बहुत से लोगों के लिए अप्रिय हो सकती है, कई लोगों के लिए असुविधा की हो सकती है, और कुछ लोग इसे आपत्तिजनक भी मान सकते हैं। लेकिन हम लोकतंत्र में संवैधानिक सत्ता, और धर्म के अंतरसंबंधों को चर्चा से परे नहीं मानते। पंजाब देश में अकेला ऐसा राज्य है जहां धर्म पर आधारित पार्टी एक सबसे बड़ी पार्टी रही, जहां किसी भी पार्टी में रहने वाले सिक्ख नेता अकाल तख्त के प्रति जवाबदेह रहे, और देश के कानून में, नियमों में सिक्खों को मिला हुआ विशेष दर्जा, उन्हें मिली हुई विशेष छूट की वजह से यह पूरा मामला हमेशा ही बड़ा संवेदनशील रहा।
हमने अकाल तख्त से बड़े-बड़े सिक्ख नेताओं को मिली सजा का इतिहास देखने की कोशिश की, तो वह 19वीं सदी में महाराजा रणजीत सिंह का भी मिला, जिन्हें अकाल तख्त ने सजा सुनाई थी। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पंजाब के एक पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला, पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल और उनका पूरा मंत्रिमंडल, ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब अकाल तख्त ने सत्तारूढ़ रहे नेताओं को उनके सरकारी कामकाज के लिए सजा सुनाई, और उन्होंने उसे मंजूर किया। लोकतंत्र में निर्वाचित विधानसभा या संसद, और किसी धर्म की सत्ता के बीच रिश्ते कैसे रहने चाहिए, इस पर सोच-विचार का एक मौका पंजाब के इस ताजा मामले से सामने आता है, जिन लोगों में सोच-विचार का हौसला हो, वे यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पूरी कर सकते हैं।










