ईश्वर के प्रति आस्था के लिए लाउडस्पीकर पर शोर क्यों जरूरी?
30 अप्रैल 2022
उत्तरप्रदेश से आ रही खबरें बताती हैं कि
वहां अभी तक करीब 50 हजार लाउडस्पीकर धर्मस्थानों से हटाए गए हैं, और करीब
60 हजार धर्मस्थानों के लाउडस्पीकरों की आवाज घटाई गई है। शायद उत्तरप्रदेश
को लेकर ये कार्टूनिस्ट ने कार्टून बनाया है जिसमें बादलों के ऊपर आसमान
में अल्लाह और भगवान दोनों राहत की सांस लेते हुए आपस में बात कर रहे हैं
कि अब जरा चैन पड़ा है। दूसरी तरफ एक खबर यह है कि उत्तरप्रदेश के बगल के
बिहार में भाजपा नेता लाउडस्पीकर पर रोक के हिमायती हैं, और सत्तारूढ़
गठबंधन की उनकी मुखिया पार्टी जेडीयू कह रही है कि बिहार में ऐसी किसी रोक
की जरूरत नहीं है। यह पूरा सिलसिला मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों के खिलाफ
देश में जगह-जगह शुरू हुआ, और महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के
पारिवारिक भाई राज ठाकरे ने मस्जिदों पर लाउडस्पीकर बंद करने का खुला
अल्टीमेटम दिया हुआ है। लेकिन अल्पसंख्यक या मुस्लिम विरोधी दिखती इस मुहिम
से परे देश की बड़ी अदालतों के अनगिनत फैसले हैं जो कि लाउडस्पीकर के
इस्तेमाल को रोकते हैं, और राज्य सरकारें ऐसे आदेशों पर कोई अमल नहीं करती
हैं क्योंकि धर्म के मामले को छूना सरकारों को मधुमक्खी के छत्ते में हाथ
डालने सरीखा लगता है। लेकिन आज का वक्त ऐसा है कि इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा
होनी चाहिए।
जिन हिन्दू और मुस्लिम धर्मालुओं और कट्टर साम्प्रदायिक लोगों के बीच लाउडस्पीकर का यह शक्ति प्रदर्शन चल रहा है, उनसे परे क्या किसी धर्म के ईश्वर को, या आस्थावान को लाउडस्पीकर की जरूरत है? जब धर्म बने तो हजारों बरस तक कोई लाउडस्पीकर नहीं थे, गांव भी चैन की नींद सोते थे, और लोगों के ईश्वर भी बिना शोरगुल, चढ़ाया हुआ ढेर सारा प्रसाद खाकर खूब देर तक सोते थे। पिछले डेढ़-दो सौ बरस की टेक्नालॉजी ने लाउडस्पीकर मुहैया कराए तो इनका मंदिर-मस्जिद पर इस्तेमाल भी शुरू हुआ। चूंकि नमाज का वक्त तय रहता है, इसलिए दिन में पांच बार मस्जिदों से लाउडस्पीकर पर अजान की आवाज जाती है ताकि पांच वक्त के नमाजी लोग मस्जिद पहुंच सकें, या आसपास बसे हों तो वे आवाज सुनकर जहां हो वहां नमाज पढ़ सकें। मंदिर और गुरुद्वारों में वक्त की ऐसी पाबंदी नहीं रहती, इसलिए वहां आरती और शबद कीर्तन के वक्त लचीले रहते हैं, और लोग अपनी मर्जी से आते-जाते हैं, और अब तो ढोल-मंजीरा बजाने वाली भी मशीनें आ गई हैं जो कि आरती के वक्त शुरू कर दी जाती हैं, और एक अकेला पुजारी भी भक्तों की भीड़ होने का अहसास करा सकता है। आज हिन्दुस्तान में शायद ही कोई मंदिर बिना लाउडस्पीकर होगा। मस्जिद के लाउडस्पीकर तो दिन में पांच बार कुछ-कुछ मिनटों के लिए चलते हैं, लेकिन मंदिरों के लाउडस्पीकर तो एक-एक बार में घंटों भी चलते हैं, और साल में कई बार तो पूरे-पूरे दिन चलते हैं। इसलिए लाउडस्पीकर के शोरगुल को खत्म करना सिर्फ मुस्लिमों पर हमला मानना गलत होगा, यह इंसानों, जानवरों, और पंछियों, सभी को राहत देने का काम अधिक होगा।
आज उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार ने लाउडस्पीकर उतरवाने की जो पहल की है, वह अगर धर्म देखे बिना हो रही है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। शोरगुल करना किसी एक धर्म का बुनियादी हक मानना बेवकूफी की बात होगी। आज के वक्त जब हर जेब में मोबाइल फोन है, तब हर शहर की एक सम्प्रदाय की मस्जिदें अपना एक मोबाइल ऐप बना सकती हैं, जिससे सभी नमाजियों को तय समय पर अलार्म चला जाए। लाउडस्पीकर को किसी धर्म के बाहुबल की तरह इस्तेमाल करना 21वीं सदी की शहरी दुनिया में बाकी शोरगुल के साथ कुछ और जुल्म लोगों पर ढहाने सरीखा है। यह काम करना किसी धर्म का सम्मान बढ़ाना नहीं है। राज्य सरकारों को चाहिए कि सभी किस्म के लाउडस्पीकर तुरंत ही खत्म करवाए, और सारे धर्मस्थानों के बाहर लगे हुए स्पीकर खत्म करके उन्हें उनके भीतर इस्तेमाल के लायक छोटे स्पीकरों की इजाजत दी जाए जिसकी आवाज अहाते के बाहर न आए। आज देश में आसमान पर पहुंचा हुआ साम्प्रदायिक तनाव घटाने के लिए धार्मिक ताकत का प्रदर्शन भी घटाना जरूरी है। लाउडस्पीकर खत्म करना उसका एक कदम हो सकता है। अभी किसी एक नेता ने यह भी मांग की थी कि तमाम किस्म के धार्मिक जुलूसों पर रोक लगाई जाए। इस सोच में भी कोई बुराई नहीं है, और इसके लिए राज्य सरकार में दमखम होना चाहिए कि वह सभी धर्मों को बराबरी से देखते हुए एक सरीखी रोक लगाए। फिलहाल लाउडस्पीकर पर रोक लोगों में इंसानियत की वापिसी का पहला कदम हो सकता है, और इसकी पहल की जानी चाहिए।
अभी कुछ ही दिन पहले हमने लिखा था- कांकड़ पाथर जोडक़र मस्जिद लेई बनाए, तां चढ़ मुल्ला बांग दे बहरा हुआ खुदाय। मतलब यह कि कंकड़-पत्थर जोडक़र मस्जिद बना ली, और उस पर चढक़र मुल्ला इस तरह से अजान देता है कि मानो खुदा को कम सुनाई देता है।
अयोध्या के गुनहगार न पकड़ाते, और दंगा हो जाता, तो क्या होता?
29 अप्रैल 2022
रमजान के धार्मिक मौके पर उत्तरप्रदेश के अयोध्या में एक बड़ा साम्प्रदायिक
तनाव होने का खतरा अभी टल गया दिख रहा है। लेकिन उत्तरप्रदेश के
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस के अयोध्या के अफसरों ने साम्प्रदायिक
दंगा फैलाने की कोशिश में सात स्थानीय नौजवानों को गिरफ्तार किया है, और
कुछ फरार हैं, सबके-सब हिन्दू हैं। इन्होंने अयोध्या की तीन मस्जिदों और एक
मजार पर मुस्लिमों के लिए आपत्तिजनक और अपमानजनक पोस्टर, मांस के टुकड़े,
और एक धार्मिक ग्रंथ के फाड़े हुए पन्ने फेंके। ये सारे के सारे लोग
सोच-समझकर साजिश और तैयारी से साम्प्रदायिक आग लगा रहे थे, और ऐसा करते हुए
इन सबने मुस्लिमों में प्रचलित जालीदार टोपी पहन रखी थी जो कि वीडियो
रिकॉर्डिंग में साफ दिख रही है। इन नौजवानों का सरगना एक ऐसा ब्राम्हण है
जिसके ऊपर पहले भी साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाडऩे के मुकदमे दर्ज हैं।
अयोध्या की पुलिस ने न सिर्फ आनन-फानन इन लोगों को गिरफ्तार किया, सुबूत और
रिकॉर्डिंग जुटाई, बल्कि कामयाबी से धरपकड़ करने वाली पुलिस को एक लाख
रूपये का ईनाम भी दिया गया है।
इन नौजवानों ने पुलिस को बतलाया कि
वे दिल्ली की जहांगीरपुरी में रामनवमी जुलूस पर पथराव को लेकर नाराज थे, और
उसका बदला निकालना चाहते थे। अब अगर हिन्दुस्तान के किसी शहर में
निम्न-मध्यम वर्ग परिवारों के बेरोजगार लडक़े इकट्ठा होकर कुछ हजार रूपये से
तबाही का इंतजाम कर सकते हैं, तो यह नौबत देश के लिए इसलिए खतरनाक है कि
आज करोड़ों नौजवान बेरोजगार हैं, इनमें सभी धर्मों के लोग हैं, और इन्हें
दूसरे धर्म के लोगों से, सरकार से, समाज से, अदालत से, पुलिस से, एक या कई
तबकों से शिकायतें हो सकती है। और ऐसे में अगर वे किसी दूसरे धर्म से हिसाब
चुकता करने या दंगा फैलाने का इंतजाम कर सकते हैं, और उसकी तोहमत किसी
दूसरे धर्म पर डालने के लिए ऐसी टोपी पहन सकते हैं जिसे कि हिन्दुस्तान में
पहनावे से पहचान कहा जाता है, तो यह पूरा देश ही सुलगाया जा सकता है, आग
में झोंका जा सकता है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही पंजाब
में एक से अधिक गुरुद्वारों में विचलित दिखते हुए कमजोर लोगों को पीट-पीटकर
मार डाला गया, उन पर ऐसा शक किया जा रहा था कि वे वहां सिक्ख पंथ के
प्रतीकों का अपमान करने के लिए पहुंचे थे। महज शक के आधार पर उन्हें भक्तों
की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। इसके पहले के कुछ दूसरे मामले वहां
बरसों से चले आ रहे हैं जिनमें धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी की तोहमत है, और वह
पिछले चुनाव में एक बड़ा चुनावी मुद्दा भी था।
यह देश कृषि प्रधान
देश नहीं है, यह धर्म प्रधान देश है। यहां पर आस्था का प्रदर्शन देश का
सबसे बड़ा उत्पादन है। और ऐसे में जिसको जिससे हिसाब चुकता करना हो, उन्हें
धर्म नाम का एक हथियार सबसे पहले सूझता है जिससे किसी को मारा जा सकता हो।
जब धर्म काम का नहीं रहता, तभी कोई दूसरा हथियार तलाशना पड़ता है। आज देश
में धार्मिक आस्था के एक सबसे बड़े प्रतीक, अयोध्या में रमजान के मौके पर
इतना बड़ा बवाल करवाने की तैयारी की गई थी जिससे अयोध्या के बाहर भी देश भर
में तनाव हो सकता था। देश भर में कुछ जानवरों के मांस, कुछ धार्मिक
ग्रंथों के पन्ने लेकर कहीं भी साम्प्रदायिक हिंसा और दंगे करवाए जा सकते
हैं। किसी देश को बारूद के ढेर पर इस तरह बिठाकर रखना जायज नहीं है।
समझदारी तो यह होती कि इस देश में धर्म की जगह तय की गई होती, धर्म का
सार्वजनिक और हिंसक प्रदर्शन बंद किया गया होता, और राजनीति में धर्म, और
खासकर साम्प्रदायिकता को घटाया गया होता। लेकिन यह लगातार बढ़ते चल रहा है,
इसका कोई अंत भी नहीं दिख रहा है। देश के दो सौ रिटायर्ड नौकरशाहों ने
प्रधानमंत्री को एक खुली चिट्ठी लिखकर देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता और उस
पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर निराशा जाहिर की है। देश की अदालतें भी देश
में फैल रहे धार्मिक सैलाब के सामने कड़ाई से पेश आने की हिम्मत शायद नहीं
जुटा पा रही हैं। राजनीतिक दलों में से कुछ ऐसे हैं जो कि परजीवी प्राणियों
की तरह धर्म और साम्प्रदायिकता पर ही पलते और बढ़ते हैं। यह पूरी नौबत इस
देश के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए बहुत ही खतरनाक है। हिन्दुस्तान एक
विकसित और सभ्य लोकतंत्र बनने की संभावना रख रहा था, लेकिन अब ऐसी
संभावनाएं कम से कम कुछ दशक तो पीछे जा चुकी हैं। आज देश की आबादी के एक
बड़े हिस्से की सोच इस हद तक नफरतजीवी, हिंसक, और साम्प्रदायिक हो चुकी है
कि वह अपनी बेरोजगारी, पेट्रोल के रेट, बढ़ती महंगाई, सबको भूलकर सिर्फ
नफरत खा-पीकर काम चला रहा है, और इसी में उसे आत्मगौरव हासिल है। किसी भी
लोकतंत्र के लिए यह नौबत भयानक है जहां पर पूरी की पूरी पीढिय़ां जिंदगी के
तमाम असल मुद्दों को छोडक़र सिर्फ भडक़ाऊ साम्प्रदायिकता और राष्ट्रीयता के
झूठे गौरव पर अपनी जिंदगी समर्पित कर देने पर आमादा हैं। पता नहीं यह
सिलसिला कभी जाकर थमेगा भी, या फिर धर्मराज होने के नाम पर यह देश खत्म ही
हो जाएगा।
लोकतंत्र में व्यंग्य की भाषा क्या अब हाईकोर्ट तय करेंगे?
28 अप्रैल 2022
दिल्ली दंगों से जुड़े हुए मामलों में एक
आरोपी छात्रनेता उमर खालिद को पुलिस ने 583 दिनों से जेल में रखा हुआ है,
और पूरे दमखम से उसकी जमानत अर्जियों का विरोध किया गया है। एक जमानत अर्जी
अभी दिल्ली हाईकोर्ट में सुनी जा रही है, और वहां पर कल इस पर बहस के
दौरान हाईकोर्ट जजों ने उमर खालिद के वकील से जिस तरह के सवाल-जवाब किए
हैं, वे हक्का-बक्का करते हैं। उमर खालिद पर यह आरोप लगाया गया है कि
उन्होंने सार्वजनिक मंच से भाषण के दौरान लोगों को हिंसा के लिए भडक़ाया, और
इसे लेकर उन पर देश के एक सबसे कड़े कानून यूएपीए के तहत जुर्म दर्ज किया
गया, और लगातार जेल में रखा गया। उमर खालिद के इस भाषण की रिकॉर्डिंग अदालत
में सुनी गई, और जजों ने इस बात पर आपत्ति की कि इस छात्रनेता ने
प्रधानमंत्री के बयान के लिए ‘जुमला’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। जजों ने
कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों की आलोचना करते समय लक्ष्मण रेखा
का ध्यान रखना जरूरी है, यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि संवैधानिक पदों पर
बैठे लोगों के लिए कैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। अदालत ने उमर
खालिद के भाषण में प्रधानमंत्री के लिए व्यंग्य से कहे गए एक और शब्द
‘चंगा’ (सब चंगा सी, यानी सब ठीक है) पर भी आपत्ति की तो उमर खालिद के वकील
ने कहा कि चंगा शब्द तो प्रधानमंत्री ने ही अपने भाषण में कहा था।
दिल्ली हाईकोर्ट के जज, सिद्धार्थ मृदुल, और रजनीश भटनागर के उठाए गए सवाल देश के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक बड़ा सवाल उठाते हैं जो कि उमर खालिद के मौजूदा केस से परे भी लागू होते हैं। न तो जुमला शब्द आपत्तिजनक या अपमानजनक है, और न ही चंगा शब्द का व्यंग्यात्मक इस्तेमाल कोई जुर्म कहा जा सकता। लोकतंत्र में भाषा का लचीला इस्तेमाल तब तक जायज है जब तक वह हिंसा का फतवा नहीं है, हिंसा की धमकी नहीं है, जब तक वह किसी के चरित्र पर कोई लांछन नहीं है। एक छात्रनेता ने अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कही हुई बातों को जुमला कहा है, तो आज देश के करोड़ों लोग मोदी की कही बातों को सोशल मीडिया पर जुमला ही लिख रहे हैं। ऐसा लिखने वालों के विरोधी भी एक टोली की शक्ल में उन पर हमले करते हैं, और उसे भी लोकतंत्र किसी भी सीमा तक बर्दाश्त कर ही रहा है। चंगा शब्द पंजाबी और हिन्दुस्तानी में अक्सर इस्तेमाल होने वाला शब्द है, और इसका बड़ा साधारण मतलब बीमारी से उबरकर ठीक हो जाना, सेहतमंद रहना जैसा कई किस्म का रहता है, न तो यह गाली है, और न ही इसमें आपत्तिजनक कुछ है। अगर उमर खालिद ने प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए यह कहा था कि देश में इतना कुछ हो रहा है, फिर भी प्रधानमंत्री ऐसे बने हुए हैं कि सब कुछ ठीक है, तो भी उमर खालिद की बातों में एक लोकतांत्रिक व्यंग्य से परे कोई भी बात आपत्तिजनक नहीं है। हमें अदालत की इस बात पर भी हैरानी हो रही है कि उसने संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के लिए शब्दों का ध्यान रखने के लिए कहा है। हमारी बहुत मामूली जानकारी और सामान्य समझ यह नहीं बता पा रही है कि संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग देश के आम नागरिक के मुकाबले अधिक सम्मानजनक या अधिक अधिकारसंपन्न कैसे हो सकते हैं? यह एक अलग बात है कि अंग्रेजों के वक्त से चली आ रही गुलाम-परंपरा के ही एक सिलसिले की तरह हिन्दुस्तानी अदालतों ने, और जजों ने अपने आपको कई किस्म के बनावटी और आडंबरी सम्मानों से घेर रखा है, और उन्हें संबोधित करते हुए जाने किस-किस तरह की भाषा का इस्तेमाल जरूरी कर दिया गया है। आजादी की पौन सदी सामने आ खड़ी हुई है, और हिन्दुस्तान के संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग अपने आपको सामंती परंपरा के सम्मान का हकदार बनाए हुए अपने को मानो एक बेहतर दर्जे का नागरिक साबित करने में लगे हुए हैं। एक चपरासी का ओहदा हो, या एक राष्ट्रपति का, जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले लोगों के सम्मान में फर्क कैसे किया जा सकता है? कुछ बरस पहले इस देश के एक राष्ट्रपति ने अपने ओहदे के साथ जुड़े हुए महामहिम नाम के सामंती आडंबरी शब्द को खारिज कर दिया था, और उसके बाद मानो मजबूरी में देश के राज्यपालों ने भी जगह-जगह इस शब्द का इस्तेमाल अपने लिए बंद करवाया। इस देश में एक आम नागरिक को जो सम्मान हासिल है, उससे अधिक सम्मान किसी संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी व्यक्ति को नहीं चाहना चाहिए, यह एक बहुत ही अलोकतांत्रिक सोच होगी।
अब हम अदालत की इस बात पर आते हैं कि उमर खालिद ने प्रधानमंत्री के बारे में व्यंग्यात्मक शब्द कहकर कोई गलत काम किया है। खुद प्रधानमंत्री के भाषणों को देखें तो वे हर कुछ महीनों में देश की किसी न किसी चुनावी सभा में बहुत ही आक्रामक लहजे में कभी किसी तबके के खिलाफ, तो कभी किसी नेता के खिलाफ बोलते हैं। कहीं वे लोगों की शिनाख्त उनके कपड़ों से करने की बात कहते हैं, तो कहीं वे किसी नेता की सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसी बात कहते हैं। और वे अकेले नहीं हैं, बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेता इस तरह की बातें कहते हैं जो कि सचमुच ही भडक़ाने वाली रहती हैं, साम्प्रदायिक रहती हैं, आपत्तिजनक रहती हैं, हिंसक रहती हैं, लेकिन लोकतंत्र उन सबको भी बर्दाश्त कर लेता है। इस देश की कुछ अदालतें तो यह मानकर चल रही हैं कि मंच और माइक से दी गई धमकी अगर मुस्कुराते हुए दी जाती है तो उसे जुर्म नहीं माना जा सकता। तब से हाल के कुछ महीनों में ऐसे सैकड़ों कार्टून बने हैं, और हजारों ट्वीट किए गए हैं जिनमें मुजरिम को मुस्कुराते हुए जुर्म करने की सलाह दी गई है। दिल्ली हाईकोर्ट की इस ताजा सुनवाई में जिस तरह इन्कलाब और क्रांतिकारी शब्दों को लेकर जजों ने आपत्ति की है वह भी बहुत हैरान करने वाली है। ये दोनों शब्द हिन्दुस्तान के इतिहास के सबसे गौरवशाली शब्दों में से रहे हैं, और आजादी मिल जाने के बाद इन शब्दों की अहमियत कम नहीं हो गई है। आज भी तरह-तरह से क्रांतिकारी सोच की जरूरत लगती है, और इन्कलाब के नारों के बिना तो देश का कोई भी मजदूर आंदोलन एक दिन भी नहीं गुजारता है। लोकतंत्र में इन दो शब्दों का बहुत ही सम्मानजनक काम है, और इनके इस्तेमाल को आपत्तिजनक मानना लोकतंत्र के हाथ-पांव बांध देने जैसा है। उमर खालिद के वकील ने अदालत में यह सही तर्क दिया है कि सरकार की आलोचना करना कोई जुर्म नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि सरकार के खिलाफ बोलने के लिए किसी को यूएपीए जैसे कानून के तहत 583 दिन जेल में रखने का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन हैरानी यह है कि जजों को उमर खालिद के शब्द आपत्तिजनक और अप्रिय लगे हैं, इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि किसी के शब्द किसी दूसरे को ऐसे लग सकते हैं, लेकिन इसके बीच में कानून की जगह कहां बन जाती है? अदालत भाषा को लेकर यह कैसे कह सकती है कि आखिर शब्दों के प्रयोग की कोई मर्यादा तय की जाए। शब्दों के प्रयोग को लोकतंत्र में सीमाओं में कैसे बांधा जा सकता है?
यह अदालत लोकतंत्र में भाषा और व्यंग्य के इस्तेमाल को लेकर एक तंग नजरिया रखते दिख रही है। दुनिया के जो सभ्य और विकसित लोकतंत्र होते हैं वे असहमति और आलोचना की अपार गुंजाइश रखते हंै, और उसकी आजादी देते हैं। किसी नौजवान को उसके सार्वजनिक भाषण की लोकतांत्रिक जुबान के लिए बरसों तक बिना सुनवाई जेल में कैद रखने वाले कानून को अपना लोकतांत्रिक मूल्यांकन जरूर करना चाहिए कि उसमें ऐसी कौन सी बुनियादी खामी घर बना चुकी है कि जिसमें बिना फैसले महज जेल में बंद रखकर इंसाफ के नाम पर बेइंसाफी की जा रही है।
हैरानी यह है कि उमर खालिद की वकील ने अदालत को यह क्यों नहीं बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में जुमला शब्द का पहला इस्तेमाल अमित शाह ने 4 फरवरी 2015 को किया था जब उन्होंने कहा था कि नरेन्द्र मोदी के काला धन वापस लाने के बाद हर परिवार के खाते में 15-15 लाख रूपए जमा करने की बात बस एक जुमला है। उन्होंने कहा कि यह चुनावी भाषण में वजन डालने के लिए बोली गई बात है क्योंकि किसी के अकाऊंट में 15 लाख रूपए कभी नहीं जाते, ये बात जनता को भी मालूम है। अमित शाह ने यह बात एक न्यूज चैनल पर इंटरव्यू में कही थी जो रिकॉर्ड में दर्ज है।
प्रशांत किशोर और कांग्रेस में शादी के बिना ही ऐसा तलाक!
27 अप्रैल 2022
कांग्रेस और प्रशांत किशोर का एक-दूसरे से
मोहभंग होना भारतीय चुनावी राजनीति की एक नाटकीय घटना है जिसमें आम जनता से
लेकर बड़े नेताओं तक को 2024 के आम चुनावों में प्रशांत किशोर के कंधों पर
सवार होकर कांग्रेस के एक बड़े सफर कर लेने की उम्मीद थी, और वह उम्मीद
दिन की रौशनी भी नहीं देख पाई। जिस तामझाम से और धूमधाम से कांग्रेस
अध्यक्ष सोनिया गांधी के घर पर प्रशांत किशोर का चुनावी-राजनीतिक
प्रस्तुतिकरण हुआ था, और सोनिया दरबार के कई घंटे पार्टी के कई बड़े नेताओं
के साथ प्रशांत किशोर को दिए गए थे, वह कांग्रेस के इतिहास में एक बिल्कुल
अलग किस्म की बात थी। उसके बाद कांग्रेस ने औपचारिक रूप से यह घोषणा की थी
कि कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रशांत किशोर के प्रस्तुतिकरण पर रिपोर्ट देने के
लिए मौजूद प्रमुख नेताओं की एक कमेटी बनाई है, फिर इस कमेटी ने हफ्ते भर
के भीतर अपनी रिपोर्ट दे दी, और चारों तरफ यह हल्ला होने लगा कि प्रशांत
किशोर कांग्रेस के बड़े पदाधिकारी होने जा रहे हैं, और वे एक किस्म के
कांग्रेस के भविष्य निर्माता रहेंगे। लेकिन यह बड़ा सा रंगीन और चमकता हुआ
बुलबुला चार दिन भी नहीं टिका, और कल कांग्रेस और प्रशांत किशोर दोनों ने
एक-दूसरे का साथ न लेने-देने की औपचारिक घोषणा की। लोगों को याद होगा कि
कुछ महीने पहले भी प्रशांत किशोर ने सोनिया-कुनबे के साथ ऐसी बैठकें की
थीं, और उस वक्त यह लग रहा था कि वे मोदी के खिलाफ ममता बैनर्जी की अगुवाई
में एक विपक्षी मोर्चा बनाने की संभावनाओं को टटोलते हुए वहां पहुंचे थे।
इस बार तो उनके औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा थी, और
पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने उनके शामिल होने के बारे में ही अपनी
जानकारी या अपने विचार सामने रखे थे।
यह नौबत कांग्रेस के उन तमाम लोगों के लिए बड़ी निराशा की हो सकती है जिन्होंने बाहर से जादूगर मैनड्रैक लाने के अंदाज में प्रशांत किशोर को इम्पोर्ट करके अपनी पार्टी की संभावनाओं को आसमान पर ले जाने के सपने देख लिए थे। वह सपना इतनी जल्दी इतनी बुरी तरह टूट जाएगा, यह लग नहीं रहा था। दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर जी-23 नाम का जो एक तबका बना है, और जो पार्टी में लोकतांत्रिक तौर-तरीकों, जवाबदेही, और संगठन चुनावों की मांग कर रहा है, उस तबके को भी यह हैरानी थी कि सोनिया गांधी ने उनके साथ बातचीत करने और उनकी मांगों-सिफारिशों पर विचार करने का जो वायदा किया था, उसे तो साल भर बाद भी आज भी छुआ भी नहीं गया है, और प्रशांत किशोर को एक उद्धारक के रूप में कांग्रेस अपने बीच बिठा रही है। अभी यह साफ नहीं है कि कांग्रेस के किन लोगों को प्रशांत किशोर से क्या शिकायतें थीं, या वे कौन सी उम्मीदें कर रहे थे जो कि पूरी नहीं हुईं। अभी यह साफ नहीं है कि कांग्रेस और प्रशांत किशोर में बातचीत किन वजहों से टूटी, लेकिन एक पार्टी के रूप में यह बात कांग्रेस के लिए बहुत ही शर्मिंदगी और फिक्र की है कि किसी एक बाहरी व्यक्ति पर सवा सौ साल पुरानी यह पार्टी इस हद तक मोहताज हो गई है कि सोनिया के घर उसे सुनने के लिए ऐसी बैठक हुई जैसी कि कांग्रेस के इतिहास में कभी नहीं हुई थी। आज जब एक पेशेवर रणनीतिकार से बातचीत में कांग्रेस इस हद तक आगे बढऩे के बाद किसी किनारे नहीं पहुंच पाई, तो 2024 के आम चुनाव में वह मोदीविरोधी मोर्चा बनाने में किसके साथ कहां पहुंच पाएगी? लोगों को याद होगा कि पिछली बार भी प्रशांत किशोर की सोनिया-परिवार से बातचीत के बाद सार्वजनिक मंचों पर प्रशांत किशोर और कुछ कांग्रेस नेताओं के बीच कड़वी जुबान में हमले हुए थे। इसके कुछ महीनों के भीतर ही दुबारा बात इस हद तक आगे बढऩा, और फिर पंक्चर गुब्बारे की तरह औंधे मुंह जमीन पर गिर जाना राजनीतिक परिपक्वता का संकेत नहीं है। इससे कांग्रेस पार्टी की संभावनाएं जितनी चौपट हुई हों, वह तो हुई हों, उसकी राजनीतिक साख भी गड़बड़ाई है, और पार्टी के बाहर के दूसरे लोगों से तालमेल की कमी की कमजोरी उजागर हुई है।
राजनीति में कोई स्थायी दोस्त नहीं होते, और न ही कोई स्थायी दुश्मन होते हैं। लेकिन आज हिन्दुस्तान की चुनावी राजनीति मोदी-शाह की मेहरबानी से जितना ऊंचा खेल बन चुकी है, उसमें कांग्रेस कहीं टिकी हुई नहीं दिखती है। इसलिए कांग्रेस की संभावनाओं की कोई भी संभावना कांग्रेस के लोगों में एक उत्साह पैदा करती है, और प्रशांत किशोर ने एक किस्म की उम्मीद जगाई थी, जो कि रफ्तार से नाउम्मीदी में तब्दील हो गई है। ऐसे में परंपरागत तरीके से सोनिया-कुनबे के मातहत ही चल रही इस पार्टी का अब क्या भविष्य हो सकता है, यह साफ नहीं है। लेकिन अपनी ही पार्टी के घोषित असंतुष्ट नेताओं को सुनने के बजाय, पार्टी में लोकतांत्रिक सिलसिला शुरू करने के बजाय पार्टी जिस तरह का इम्पोर्टेड इलाज ढूंढ रही थी, उससे पार्टी लीडरशिप की साख पार्टी के भीतर भी कमजोर हुई है। आज किस आत्मविश्वास से सोनिया गांधी जी-23 के नेताओं से बात कर सकती हैं? और अगर अपने ही संगठन के लोगों से वे बात नहीं कर सकतीं, तो फिर दूसरी पार्टियों के नेताओं से एक व्यापक गठबंधन पर किस तरह बात कर पाएंगी? कांग्रेस के भीतर जब उनकी लीडरशिप को दर्जनों बड़े नेताओं की तरफ से एक अघोषित चुनौती दिख रही है, तब वैसे में दूसरी पार्टियों से बातचीत का भी वजन नहीं रह जाता है। हम कभी भी प्रशांत किशोर जैसे आयातित और पेशेवर जादुई करिश्मे के हिमायती नहीं रहे हैं। कांग्रेस में अगर समझदारी होती, तो प्रशांत किशोर के साथ उसके इस प्रयोग का हल्ला नहीं होता, और कांग्रेस उसे बिना अधिक बड़ा मुद्दा बनाए हुए एक हफ्ते का विचार-विमर्श निपटा चुकी होती। लेकिन इस एक हफ्ते का शिगूफा कांग्रेस की साख पर गहरी चोट कर गया है, और इस पार्टी के निराश लोगों को अधिक निराश भी कर गया है। इससे कांग्रेस कैसे उबरेगी, और अपने दम पर कोई रास्ता कैसे निकाल सकेगी, यह अभी एक बड़ी पहेली बना हुआ है।
ट्विटर का पंछी सोने के एक नए पिंजरे में कैद, अब चहचहाहट का क्या?
26 अप्रैल 2022
यूक्रेन पर रूस के हमले के तुरंत बाद का
दुनिया का सबसे बड़ा हमला भारतीय समय के मुताबिक आज सुबह से खबरों में हैं।
पिछले दस दिनों से चले आ रहा असमंजस आज खत्म हुआ, और दुनिया के सबसे अमीर
कारोबारी एलन मस्क ने करीब 33 सौ अरब रूपये जितनी रकम से ट्विटर को खरीद
लिया है। एक पंछी के मार्के वाला ट्विटर दुनिया में खबरों का पहला जरिया हो
गया था, और यह ऐसा सोशल मीडिया था जिस पर दुनिया के तमाम बड़े नेता,
कारोबारी, सरकारें, और चर्चित लोग अपनी पहली घोषणा करते थे। करीब सोलह बरस
पहले यह कंपनी बनी थी, और गिने-चुने शब्दों में अपनी बात पोस्ट करने की
मुफ्त सहूलियत देने वाले इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का हाल यह है कि अब
सरकारों को अपने बड़े फैसले मीडिया को अलग से नहीं देने पड़ते,
प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री उन्हें ट्वीट करते हैं, और परंपरागत मीडिया
उन्हें वहां से उठाकर खबर बनाते हैं। लेकिन जैसा कि किसी भी बड़े सोशल
मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ हो रहा है, ट्विटर पर भी अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता की आजादी और उसकी सीमाओं के बीच एक बहस चलती रहती है कि आजादी
किसे माना जाए? कितनी आजादी दी जाए, और कितनी बंदिश लगाई जाए? ऐसी बहस के
बीच ही दुनिया के एक सबसे बड़े कारोबारी, बैटरी से चलने वाली कारों के सबसे
बड़े निर्माता, कारोबारी अंतरिक्ष यात्रा शुरू करने वाले, एलन मस्क ने
पिछले कुछ हफ्तों में लगातार ट्विटर के बारे में अपनी राय सामने रखी थी, और
यह भी लिखा था कि वे विचारों की स्वतंत्रता के बड़े हिमायती हैं। अब अपने
बारे में कही गई इस बात के कई मतलब निकलते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना
है कि एलन मस्क के मालिक बनने के बाद अब ट्विटर पर से पिछले अमरीकी
राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प पर लगाई गई बंदिश हट जाएगी क्योंकि एलन मस्क ऐसी
बंदिशों के खिलाफ हैं। लेकिन ट्रम्प पर झूठ फैलाने और नफरत फैलाने की वजह
से बंदिश लगाई गई थी, और अगर ऐसे सुबूतों के बाद भी नया मालिक अगर ट्रम्प
को ट्विटर पर फिर आने देता है, तो विचारों की यह आजादी दुनिया भर के
नफरतजीवी लोगों के लिए जश्न का मौका रहेगा। आज वैसे भी ट्विटर और फेसबुक
जैसे सोशल मीडिया पर नफरत और हिंसा का सैलाब है जिसे रोकने की या तो इनके
मालिकान की नीयत नहीं है, या कूबत नहीं है। अब अगर ट्विटर एक कंपनी के
बजाय, उसके संचालक मंडल के बजाय अगर सीधे-सीधे एक ऐसे मालिक के मातहत आ रहा
है जो कि अपने सनकमिजाजी फैसलों के लिए जाना जाता है, तो यह सबसे ताकतवर
सोशल मीडिया आज सचमुच खतरे में है।
एलन मस्क खुद के बनाए हुए कारोबारी साम्राज्य के मालिक हैं, और चूंकि पश्चिमी देशों के कारोबार में हिन्दुस्तान की तरह का दो नंबर के पैसों का अंबार नहीं होता है, इसलिए वहां के आंकड़े सही भी रहते हैं कि कौन सबसे रईस है, किसका कारोबार सबसे बड़ा है। एलन मस्क दुनिया के सबसे रईस तो हैं ही, उनका कारोबार भी भविष्य को देखते हुए खड़ा किया गया है, और बैटरी कारों से लेकर अंतरिक्ष पर्यटन तक का उनका कारोबार बढ़ते ही चले जाते दिख रहा है। ऐसे में एक बिल्कुल ही अलग किस्म के धंधे में, उसे मनमानी कीमत पर खरीदने की जिद पूरी करते हुए एलन मस्क ने दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोगों को असमंजस में डाल दिया है कि ट्विटर का भविष्य क्या होगा? क्या यह ट्रम्प जैसों के लिए लाल कालीन बिछाएगा, या ट्विटर पर से प्रमुख लोगों और संस्थानों को मिलने वाले ब्ल्यू टिक का आभिजात्य सिलसिला खत्म करेगा? नए मालिक, अकेले मालिक, और तानाशाह मिजाज के मालिक अगर जनकल्याणकारी हों, आजादी के हिमायती हों, तो भी उनके मनमाने फैसलों का खतरा तो बने ही रहता है।
खुद अमरीका में एक सवाल यह खड़ा हो गया है कि सोशल मीडिया जैसे कारोबार पर एकाधिकार किस हद तक होने देना चाहिए। एक वक्त अमरीका में अखबारों और टीवी स्टेशनों पर एकाधिकार को लेकर भी यह बात उठती भी, और अब सोशल मीडिया का हाल तो यह हो गया है कि फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग से पूछताछ के लिए संसदीय कमेटी की सुनवाई होती है, और संसद की तरफ से इस कारोबारी से कई दिनों तक सवाल-जवाब किए जाते हैं। दुनिया के दूसरे देशों में भी सोशल मीडिया की पहुंच को लेकर, और उसके बेजा इस्तेमाल के खतरों को लेकर फिक्र बनी हुई है। हिन्दुस्तान में अभी हाल ही में खोजी पत्रकारों की एक रिपोर्ट में यह स्थापित किया गया है कि इस देश के पिछले आम चुनावों में फेसबुक ने किस तरह भाजपा की मदद की, और दूसरी पार्टियों को बराबरी का हक नहीं दिया। खुद अमरीका के राष्ट्रपति चुनावों में यह बात सामने आ रही थी कि फेसबुक ने वहां के जनमत को मोडऩे के लिए सोच-समझकर कुछ साजिशें की थीं। खैर, अमरीका में कारोबारियों को भी आजादी है, और अदालतों को भी आजादी है, इसलिए वहां लोकतंत्र इतने बड़े खतरे में नहीं रहता, जितने बड़े खतरे में हिन्दुस्तान में दिखता है।
खैर, आज का यह मौका ट्विटर पर चर्चा का है कि नए मालिक की तरह यह विश्व जनमत का एक औजार बने रहेगा, या विश्व जनमत को कुचलने के लिए एक हथियार बन जाएगा। आने वाले हफ्ते या महीने यह बताएंगे कि अथाह दौलत रहने पर कोई रातोंरात जिस तरह दुनिया के सबसे बड़े सूचनातंत्र का मालिक बन सकता है, उसे बदल सकता है, तो यह विचारों की आजादी का सुबूत है या कारोबार की आजादी का? फिलहाल एलन मस्क की इस एक सनकी खरीददारी ने दुनिया के सोशल मीडिया कारोबार को हिलाकर रख दिया है कि उन पर क्या इससे भी बड़ा एकाधिकार हो सकता है? और क्या इनके मालिक दुनिया के लोकतंत्रों को कठपुतली की तरह हिला-डुला सकते हैं?
फ्रांस के चुनावी नतीजे बड़ी राहत लाए, और बाकी लोगों के भी सोचने की जरूरत...
25 अप्रैल 2022
फ्रांस में मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल
मैक्रों फिर से राष्ट्रपति बन गए हैं, और उन्होंने उग्र दक्षिणपंथी
उम्मीदवार मारीन ले पेन को हरा दिया है। ये चुनाव एक बहुत अलग किस्म के
अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच हुए थे जिनमें फ्रांस पर रूस-यूक्रेन संघर्ष का
दबाव भी था, और यूरोपीय समुदाय की एक सबसे बड़ी ताकत होने के नाते फ्रांस
पर एक बड़ी जिम्मेदारी भी थी, और है। ऐसे में उग्र दक्षिणपंथी उम्मीदवार
महिला के इर्द-गिर्द वोटर बहुत जुटे, पिछले चुनाव के मुकाबले मैक्रों के
वोट आठ फीसदी गिर गए, मारीन ले पेन को पिछले चुनाव से बहुत अधिक वोट मिले,
लेकिन राहत की बात यह है कि उग्र दक्षिणपंथ परास्त हुआ। मारीन ले पेन
यूरोपीय समुदाय की धारणा के खिलाफ है, फ्रांस के भीतर बसे हुए दसियों लाख
मुस्लिमों के हिजाब के हक के खिलाफ है, बाहर से आए प्रवासियों और
शरणार्थियों के खिलाफ है, अल्पसंख्यकों के और काले लोगों के खिलाफ है।
इसलिए न सिर्फ फ्रांस के उदारवादी लोगों को, बल्कि यूरोपीय समुदाय के लोगों
को भी यह डर लगा हुआ था कि कहीं ऐसी कट्टरपंथी और दकियानूसी महिला फ्रांस
की राष्ट्रपति न बन जाए। उसके राष्ट्रपति बनने से फ्रांस के यूरोपीय समुदाय
से हटने का भी खतरा खड़ा हो सकता था जैसा कि ब्रिटेन उससे हट चुका है।
जैसे कि किसी भी देश में घोर कट्टरपंथी लोग होते हैं जो कि अल्पसंख्यकों के
खिलाफ होते हैं, लोगों की धार्मिक आजादी के खिलाफ होते हैं, शरणार्थियों
के खिलाफ होते हैं, गरीबों की मदद के खिलाफ होते हैं, वैसा ही हाल फ्रांस
में होने का खतरा था, जो कि टल गया। दरअसल लोग इस खतरे को इस बात से जोडक़र
देख रहे थे कि इन्हीं सारी खतरनाक बातों के लिए जाने जाने वाले डोनल्ड
ट्रंप को अमरीकी मतदाताओं ने जिता ही दिया था, और वैसी ही कोई चूक
फ्रांसीसी मतदाता न कर बैठें। मैक्रों न सिर्फ दुबारा जीते हैं बल्कि वे
पिछले डेढ़ दशक में दुबारा जीतकर आने वाले पहले राष्ट्रपति भी रहे हैं।
उन्होंने खुलकर इस बात को मंजूर किया कि उन्हें यह पता है कि बहुत से
फ्रांसीसियों ने उन्हें इसलिए वोट दिया कि वे लोग उग्र दक्षिणपंथ के विचार
को रोकना चाहते थे, न कि वे मेरा समर्थन कर रहे थे। उन्होंने कहा- इसलिए
मुझे पता है कि उनका वोट मुझे आने वाले बरसों के लिए मेरी जिम्मेदारी बताता
है।
दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग वक्त पर विचारधाराएं जोर पकड़ती हैं, या कमजोर होती हैं। डोनल्ड ट्रंप की शक्ल में अमरीका को हाल के दशकों का सबसे नस्लवादी और सबसे नफरतजीवी नेता मिला था। और भी कुछ-कुछ देशों में समय-समय पर साम्प्रदायिक और दकियानूसी दक्षिणपंथी काबिज हो जाते हैं। ऐसे में फ्रांस ऐसी ही एक नफरतजीवी सरकार पाने के मुहाने पर आ गया था। चुनाव हारने के बाद भी मारीन ले पेन उन्हें मिले हुए भारी वोटों को अपनी जीत बता रही है, और फ्रांस में आज मैक्रों के जीत के जश्न के बीच भी बहुत से लोग दक्षिणपंथियों को मिले इतने वोटों को अगले चुनाव के लिए भी खतरनाक मानते हुए फिक्र जाहिर कर रहे हैं। जिम्मेदार लोकतंत्र वही होते हैं जो खतरे की तरफ से बरसों पहले आगाह हो जाते हैं, और नफरत से बचने की कोशिश करते हैं। फ्रांस एक अलग किस्म की खतरनाक शुद्धतावादी, नस्लभेदी, अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों से मुक्त सरकार पाने की कगार पर पहुंच गया था, लेकिन मैक्रों की जीत ने सबको राहत की एक सांस लेने का मौका दिया है।
दुनिया के देश अब एक-दूसरे से इतने कटे हुए भी नहीं हैं कि एक देश के मुद्दे दूसरे देश को प्रभावित न करें। बहुत से देशों के चुनाव अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित होते हैं, और हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, या चीन की सरकारें अपने घरेलू मोर्चे पर लोगों को संतुष्ट रखने के लिए, या दुश्मन की उनकी एक धारणा को संतुष्ट रखने के लिए बहुत सा जुबानी जमाखर्च भी करती हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रति जवाबदेही रखने वाले बड़े और ताकतवर देश अगर जिम्मेदार पार्टियों के हाथ में रहते हैं, तो उसका बड़ा असर पड़ता है। आज जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर दुनिया खेमों में बंट गई है, उसमें भी देशों में अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी समझने वाली और नैतिकता निभाने वाली सरकारों की जरूरत है, और जहां तक योरप का सवाल है, वहां पर आज के दिन फ्रांस में मैक्रों का लौटकर आना बहुत महत्वपूर्ण है, वरना न सिर्फ रूस के हाथ मजबूत हुए होते, बल्कि यूरोपीय समुदाय और अमरीका से भी फ्रांस के संबंध खराब हुए रहते।
आज टेक्नालॉजी और संचार-सहूलियतों के चलते दुनिया भर के लोग एक-दूसरे से जुड़े हुए तो अधिक हैं, लेकिन एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदार कम रह गए हैं। एक वक्त था जब आम हिन्दुस्तानी भी दुनिया के दूसरे देशों के मुद्दों को लेकर चर्चा करते थे, और बहस करते थे। आज के हिन्दुस्तानी बाकी दुनिया के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बहुत हद तक अछूते हो गए हैं। आज रूस-यूक्रेन की लड़ाई में दुनिया भर के देशों में अनाज की किल्लत हो गई है, और कई देश तो ऐसे हैं जहां पर अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों ने भी भूखी मरती आबादी के पूरे हिस्से को बहुत सीमित खाना देने के बजाय एक हिस्से को जिंदा रहने जितना खाना देना तय किया है, और एक हिस्से को खाना देना बंद ही कर दिया है। ऐसी भयानक नौबत इसी धरती पर चल रही है, लेकिन हिन्दुस्तानी लोगों के बीच मंदिर और मस्जिद के बीच पथराव सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इंसानों और धरती के प्रति इतनी बड़ी गैरजिम्मेदार सोच इतिहास में जरूर ही दर्ज होगी। आज दुनिया के तमाम देशों को न सिर्फ अपने चुनावों में जिम्मेदारी दिखाने की जरूरत है, बल्कि दुनिया भर के मुद्दों में अपनी मानवीय जिम्मेदारी पूरी करने की भी जरूरत है। फ्रांस के चुनावी नतीजों को लेकर जो पहलू सामने आ रहे हैं, उन पर बाकी देश भी सोच-विचार कर सकते हैं।
वर्दियों के भीतर खुदकुशी की सोच अधिक क्यों?
24 अप्रैल 2022
देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार द हिन्दू के
एक पॉडकास्ट ने अभी सेना और सुरक्षाबलों के लोगों की आत्मघाती हिंसा के
आंकड़ों को लेकर चर्चा की जा रही थी। फौज से अधिक आत्महत्याएं सीआरपीएफ
जैसे पैरामिलिट्री सुरक्षाबलों के लोग करते हैं, लेकिन मीडिया और जनता
इन्हें एक साथ गिन लेती हैं। इन दोनों में एक बुनियादी फर्क यह है कि फौज
को अपने देश के दुश्मन देशों के साथ मोर्चों पर कभी-कभार जूझना पड़ता है,
और उनका अधिकतर समय ऐसे कभी-कभार की तैयारी में ही गुजरता है, असल कभी-कभार
के मौके हिन्दुस्तान जैसे देश में तो बहुत कम फौजियों की जिंदगी में एक-दो
बार ही आते हैं। दूसरी तरफ पैरामिलिट्री सुरक्षाबल देश के भीतर अपने ही
नागरिकों के मुकाबले तैनात किए जाते हैं जो कि नक्सल मोर्चों से लेकर कई और
किस्म की जगहों पर अपने ही लोगों से जूझते हैं, और इसका एक अलग तनाव उन पर
रहता है। फिर एक दूसरा बड़ा तथ्य यह भी है कि पैरामिलिट्री के मुकाबले
मिलिट्री में सहूलियतें और रियायतें इतनी अधिक रहती हैं, उनके अपने अस्पताल
और परामर्शदाता रहते हैं कि फौजियों को हर किस्म की मेडिकल और मानसिक मदद
आसानी से मिलती है। दूसरी तरफ पैरामिलिट्री के लोग अधिक तनावपूर्ण मोर्चों
पर तैनात रहते हैं लेकिन इन संगठनों के अपने खुद के अस्पताल या खुद के
मनोचिकित्सा क्लिनिक नहीं रहते, और इनके लोग तैनाती के राज्यों में वहां के
सरकारी इंतजाम के मोहताज रहते हैं।
लेकिन इन सबसे परे एक दूसरी चीज जो इन दोनों ही किस्म के सुरक्षा कर्मचारियों को खाती है, वह समाज में फैली हुई अराजकता, और सरकारों के भ्रष्टाचार का सामना। जब कोई फौजी या पैरामिलिट्री जवान छुट्टियों पर घर लौटते हैं तो उन्हें दिखता है कि देश के जिस लोकतंत्र के लिए वे बंदूक थामे हुए मुश्किल मोर्चों पर खड़े रहते हैं, वह लोकतंत्र हर गली-मोहल्ले में बिक रहा है। सरकारी दफ्तरों में बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता, जमीन-जायदाद पर उनका कब्जा रहता है जिनके साथ अधिक लठैत रहते हैं, और तरह-तरह की सामाजिक बेइंसाफी उस लोकतंत्र के हाथ-पांव में हथकड़ी-बेड़ी बनकर पड़ी हुई है जिस लोकतंत्र को बचाने के लिए वे वर्दी पहनकर देश की सरहद पर तैनात हंै, या देश के भीतर गोलियां और गालियां झेल रहे हैं। ऐसे तनाव वर्दी के लोगों को हिंसक और आत्मघाती दोनों ही बना सकते हैं। बहुत से मामलों में सुरक्षाबलों की आत्महत्या इसलिए होती है कि परिवार की मुसीबत के वक्त उन्हें छुट्टी नहीं मिलती, और उन्हें यह मालूम रहता है कि बिना उनके गए उनके परिवार को कोई इंसाफ नहीं मिल सकता।
अब अभी आज ही उत्तरप्रदेश के बुलंद शहर की एक खबर है कि सीआरपीएफ में तैनात एक दलित जवान पुलिस के पास हिफाजत मांगने पहुंचा है कि वह जम्मू-कश्मीर में तैनात है, और अपनी शादी के लिए गांव आया है, लेकिन कुछ महीने पहले एक दलित की शादी में संगीत बजाने को लेकर एक ठाकुर ने एक दलित को मार डाला था, और उसे देखते हुए यह जवान अपनी शादी में घोड़ी पर चढक़र जाने के लिए पुलिस की हिफाजत चाहता है। अब जिस देश में एक दलित को अपनी शादी में घोड़ी पर चढऩे के लिए पुलिस हिफाजत जरूरी लगती हो, उस दलित को देश या लोकतंत्र को बचाने के लिए गोलियों या पत्थरों के मुकाबले तैनात किया जाता है, तो ऐसे लोकतंत्र पर उसकी कितनी आस्था हो सकती है? जिस जम्मू-कश्मीर में हर दो-चार दिनों में सुरक्षाबलों के जवान मारे जा रहे हैं, वहां तैनात एक जवान को अपने गांव अपने घर में ऐसी सामाजिक बेइंसाफी का भी सामना करना पड़ रहा है, तो ऐसे लोकतंत्र की हिफाजत के लिए उसके मन में कितना उत्साह रहेगा?
चूंकि फौज और सुरक्षाबल के लोग देश के बाकी सरकारी कर्मचारियों के मुकाबले जान का खतरा अधिक झेलते हैं, इसलिए उन्हें लोकतंत्र को खोखला कर रही कई किस्म की ताकतों से तकलीफ अधिक होती होगी। उनमें से कुछ को अपने धर्म और अपनी जाति पर हो रहे हमले खटकते होंगे, कुछ को ये खबरें मिलती होंगी कि उनके समाज में प्रचलित खानपान पर कुछ दूसरे लोग किस तरह के हमले कर रहे हैं। ऐसी तमाम बातें भी उनके तनाव को बढ़ाती होंगी, और वर्दी का अनुशासन उन्हें कुछ भी कहने से पूरी तरह रोकने वाला भी रहता है। जिन लोगों के पास बोलने या सोशल मीडिया पर लिखने की आजादी रहती है, उनकी भड़ास तो फिर भी निकल जाती है, लेकिन जिन लोगों के दिल का गुबार निकल नहीं पाता, वह गुबार बढ़ते-बढ़ते खुद पर या दूसरों पर बंदूक की नाल से निकली गोली की शक्ल में भी निकलता है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर के नक्सल मोर्चे पर भी सीआरपीएफ के जवानों में बड़ी संख्या में आत्महत्याएं होती हैं, और कभी-कभी अपने साथियों को मारकर भी जवान खुदकुशी कर लेते हैं। आमतौर पर ऐसी आत्महत्याओं के पीछे तात्कालिक कारण ढूंढे जाते हैं। यह नहीं देखा जाता कि लोग वर्दी के नियम-कायदों से बंधी हुई जुबान, बंधी हुई उंगलियों के चलते किस तरह के तनाव के और किस तरह की भड़ास के शिकार रहते हैं, और कोई तात्कालिक कारण ऊंट की कमर तोडऩे वाला आखिरी तिनका साबित होता है, अकेले जिम्मेदार नहीं रहता। सुरक्षाबलों में आत्महत्या का विश्लेषण उन्हीं के भरोसे छोडऩा ठीक नहीं होगा क्योंकि वे पारिवारिक और सामाजिक हकीकत पर जाने की क्षमता नहीं रखते। ऐसे में किसी बाहरी संस्था को ऐसे मामलों का विश्लेषण करना चाहिए ताकि खुदकुशी की वजहें घटाई जा सकें।
जुमलों का मोहताज मीडिया
24 अप्रैल 2022
जब अमिताभ बच्चन की शुरुआती कुछ फिल्में आईं
तो उनमें अमिताभ के किरदार देखकर मीडिया ने उन्हें एंग्री यंग मैन का लेबल
लगा दिया, और फिर वह उनके साथ लंबे समय तक चलते रहा। किसी को स्वप्नसुंदरी
कहा गया, किसी को चॉकलेटी हीरो, और किसी को कुछ और। मानो बिना लेबल लगाए
काम नहीं चलता। ऐसा राजनीति में भी बहुत होता है, जैसे ही कोई मजबूत सत्ता
पर काबिज हो जाते हैं, वे युवा हृदय सम्राट हो जाते हैं। ऐसे सम्राट
शहर-शहर देखने-सुनने मिलते हैं, फिर इनमें से कोई हमलावर हिन्दुत्व का झंडा
बरदार हो, तो उसे हिन्दू युवा हृदय सम्राट का खिताब मिल जाता है। और भी
नेता तरह-तरह से ऐसे जुमले खुद उछालते हैं, या मीडिया उनके बारे में उनका
इस्तेमाल करने लगता है। अभी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल खुद अपने
बारे में स्टेज से एक जुमला कहने लगे हैं- कका अभी जिंदा हे...। अब इसे
सुनकर राजधानी रायपुर में एक बड़ी सी कार ने अपने पिछले शीशे पर प्रेस के
साथ-साथ कका अभी जिंदा हे भी लिखवा लिया है। अब प्रेस और मुख्यमंत्री के
नारे का भला क्या जोड़ हो सकता है?
खैर, मीडिया का खुद का काम जुमलों का मोहताज हो गया है। हिन्दुस्तान के हिन्दी समाचार चैनल देखें तो ऐसा लगता है कि उत्तर कोरिया के तानाशाह से लेकर मंगल ग्रह के अंतरिक्ष निवासियों तक हर कोई मोदी से कांपते हैं, और पुतिन से लेकर बाइडन तक मोदी से फोन पर सलाह करके ही कोई फैसले लेते हैं। पाकिस्तान हर दो-चार दिन में मोदी के नाम से कांपने लगता है, और चीन के छक्के छूटते ही रहते हैं, फिर भले ही वह हिन्दुस्तानी जमीन पर काबिज भी हो, और इस बारे में मोदी ने आज तक उसका नाम भी न लिया हो। जब मीडिया के पास तथ्य नहीं रह जाते, तब विशेषणों से काम चलाना एक बड़ा आसान जरिया रहता है, और इसी के चलते हुए मीडिया तरह-तरह के जुमले गढ़ लेता है, और फिर बच्चों की ड्राइंग की किताब की तरह उन जुमलों में रंग भरते रहता है।
सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी की तो यह जिम्मेदारी रहती है कि सरकार किसी इलाके में किसी योजना की मंजूरी दे, तो उसे उस इलाके के लिए सौगात लिखा जाए ताकि सत्तारूढ़ नेता और पार्टी को वाहवाही मिले। लेकिन जब मीडिया इसी पर उतारू हो जाता है, और आम सरकारी योजनाओं की मंजूरी को किसी इलाके को मुख्यमंत्री की दी गई सौगात की तरह पेश किया जाता है, तो ऐसे मीडिया को पढऩे और देखने वाले लोग भी धीरे-धीरे ऐसी सामंती सोच का शिकार हो जाते हैं, और वे भी अपना हक मिलने के बजाय अपने को सौगात मिलने की जुबान में सोचने लगते हैं। धीरे-धीरे यह सौगाती सोच और आगे बढ़ते चलती है, और फिर सत्ता और जनता के बीच खैराती रिश्ता होने लगता है, मानो जनता के पैसों से उसे हक मिलना कोई खैरात है।
लेकिन मीडिया के जुमले गढऩे और उन्हें रात-दिन दुहराने का कोई अंत नहीं रहता। और कोई जुमले सामंती सोच बतलाते हैं, कोई बताते हैं कि मीडिया की सामाजिक समझ शून्य है, या उसके भी नीचे गिरकर नकारात्मक है। बलात्कार की खबर में पूरे ही वक्त छपते रहता है कि किसी लडक़ी की आबरू लूट ली गई, किसी महिला की इज्जत लुट गई। अब सवाल यह है कि बलात्कार जैसा जुर्म करने वाला इंसान अपनी इज्जत नहीं खोता, और उसके जुर्म की शिकार लडक़ी या महिला अपनी इज्जत खो बैठती है! यह सोच एक सामाजिक इंसाफ की समझ से पूरी तरह आजाद है, और जो धीरे-धीरे लोगों को यह बताने लगती है कि बलात्कार की शिकार महिला इज्जत खो चुकी है, और अब वह किसी इज्जत के लायक नहीं है, अब उसकी कोई इज्जत नहीं है। किसी बलात्कारी के बारे में लोग इस भाषा में बात नहीं करते कि इस जुर्म को करके वह अपनी इज्जत खो चुका है, अपने परिवार की इज्जत खो चुका है।
रोजाना ही कई खबरों में छपता है कि बेरहमी से हत्या कर दी गई। हत्या की खबर अपने आपमें सब कुछ बतला देती है। किसने, किसे, किस तरह, कहां पर, और क्यों मारा, आमतौर पर ये बातें हत्या के तुरंत बाद की खबर में, या मुजरिम की शिनाख्त होने पर आ जाती हैं। लेकिन इतने किस्म के विशेषण मीडिया ऐसी खबर में जोड़ देता है कि यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि अगर यह हत्या बेरहम थी, अमानवीय तरीके से थी, तो क्या रहमदिली और मानवीय तरीके से भी कोई हत्या हो सकती है?
भाषा से परे मीडिया की लोकतांत्रिक सोच भी कमजोर रहती है, और सत्ता के लगातार करीब रहते हुए मीडिया आदतन सत्ता के चारण और भाट की तरह काम करने लगती है। नेताओं और अफसरों की छोटी-छोटी सी फूहड़ बातों को महान जानकारी की तरह पेश करके मीडिया का कम से कम एक हिस्सा ताकतवर कुर्सियों पर बैठे ऐसे लोगों की बददिमागी बढ़ाते चलता है, और इसके लिए भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल होता है जिससे लोगों की लोकतांत्रिक चेतना कमजोर होती चले। किसी बड़े नेता या बड़े अफसर ने खुद उठकर एक गिलास पानी ले लिया हो तो उसे विनम्रता की प्रतिमूर्ति करार देते हुए मीडिया उनके पैर आसमान पर ही रखता है। ऐसे में कोई हैरानी की बात नहीं रहती कि चापलूस मीडिया के चढ़ाए हुए ताकतवर ओहदों के लोग लगातार चने के झाड़ पर चढ़े रहते हैं, और वहां से उन्हें नीचे की धरती के लोग बड़े छोटे-छोटे दिखते हैं। नेताओं को खुद लगे या न लगे, चापलूस मीडिया उन्हें यह अहसास कराते रहता है कि वे कितने महत्वपूर्ण हैं, उनकी मामूली और गैरजरूरी जानकारी को मिनट-टू-मिनट कार्यक्रम की जुबान में पेश किया जाता है, मानो उनके कार्यक्रम न हों, बल्कि इसरो का रॉकेट छूटने वाला हो। उनकी सुरक्षा में थोड़ी सी कमी रहे तो चापलूस मीडिया बवाल खड़ा कर देता है कि वीआईपी सुरक्षा में बड़ी सेंध लगी, प्रोटोकॉल टूटा।
मीडिया में जिनके पास न जानकारी रहती, न तथ्य रहते, न किसी विश्लेषण की समझ रहती, उनके लिए यह बड़ा आसान रहता है कि वे जुमलों की आड़ में अपने अज्ञान को छुपा लें, और तरह-तरह की चापलूसी से सत्ता का घरोबा पा लें। इस चक्कर में जिला स्तर के पत्रकार किसी कलेक्टर के आने पर उसके इंटरव्यू को टूट पड़ते हैं, और उसके बाद सुर्खी लगती है- नये कलेक्टर ने अपनी प्राथमिकताएं गिनाईं।
क्या सचमुच ही कोई अफसर अपनी प्राथमिकताएं तय करने का हक रखते हैं? प्राथमिकताएं तय करना तो निर्वाचित सरकार का काम होता है, जो लोग चुनकर आते हैं, और बहुमत से सत्ता पर पहुंचते हैं, वे प्राथमिकताएं तय करते हैं। अफसरों का काम तो सिर्फ उन पर अमल करना और करवाना रहता है। लेकिन मीडिया चापलूसी की अपनी आदत के चलते हुए थानेदार तक की प्राथमिकताएं पूछने लगता है, और फिर उनके भी पांव जमीन पर पडऩा बंद हो जाता है।
सत्ता से परे भी मीडिया के जुमले खत्म नहीं होते हैं। दो बालिग युवक-युवती अगर शादी करने बाहर चले जाते हैं ताकि उनके परिवार अड़ंगा न डाल सकें, तो ऐसी खबरों में आमतौर पर लिखा जाता है कि लडक़ी घर छोडक़र भागी। घर छोडक़र जाने का फैसला दोनों अलग-अलग लेते हैं, और युवती भी अपना घर छोडक़र जाती है, लेकिन उसके जाने को भागना कहा जाता है, और युवक के जाने को जाना। मीडिया में काम करने वाले अधिकतर लोगों की औरत-मर्द की समानता की समझ कहावत और मुहावरे गढ़े जाने के युग की रहती है जिसमें औरत के लिए हजार किस्म की गालियां गढ़ी जाती हैं, दलितों को दुत्कार के लायक माना जाता है, दूसरे धर्मों के लोग म्लेच्छ गिने जाते हैं, और मनुवादी जाति व्यवस्था राज करती है। ऐसी सोच जब जुमलेबाजी के साथ मिलकर काम करती है, तो मीडिया की जुबान लोकतंत्र शुरू होने के भी पहले के दौर में चली जाती है। अपनी-अपनी जिंदगी में रोज अखबार पलटते, या पलटे न जा सकने वाले टीवी न्यूज बुलेटिन देखते हुए सोचें कि उनमें समाचारों के नाम पर कौन सा सामाजिक अन्याय परोसा जा रहा है।
‘ऊंचे’ लोगों और ‘नीचे’ लोगों की जिंदगी में इतना फासला !
23 अप्रैल 2022
भारत सरकार के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के
आंकड़ों का विश्लेषण एक दिलचस्प लेकिन भयानक सामाजिक तथ्य सामने रखता है।
इसके मुताबिक केन्द्र सरकार के पिछले बरसों के ये आंकड़े बताते हैं कि भारत
में ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोग दलित और आदिवासी लोगों से औसतन
चार से छह साल अधिक जीते हैं। इसी तरह ऊंची समझी जाने वाली हिन्दू जाति और
मुसलमानों के बीच भी ढाई बरस का औसत फर्क है। यह नतीजा किसी एक इलाके, किसी
एक वक्त, या कमाई से जुड़ा हुआ नहीं है, और औरत-मर्द में यह बराबरी से नजर
आता है।
भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक जाति, धर्म के आधार पर पुरूषों की औसत उम्र के मामले में हिन्दू ‘ऊंची जाति’ के पुरूष 1997-2000 के बीच 62.9 साल जी रहे थे, मुस्लिम पुरूष 62.6, ओबीसी 60.2, दलित 58.3, और आदिवासी 54.5 साल जी रहे थे। इसके बाद 2013-16 के सर्वे के मुताबिक हिन्दू ‘ऊंची जाति’ के पुरूष 69.4 साल जी रहे थे, मुस्लिम पुरूष 66.8, ओबीसी 66, दलित 63.3, और आदिवासी 62.4 साल जी रहे थे।
भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक जाति, धर्म के आधार पर महिलाओं की औसत उम्र के मामले में हिन्दू ‘ऊंची जाति’ की महिलाएं 1997-2000 के बीच 64.3 साल जी रही थीं, मुस्लिम महिलाएं 62.2, ओबीसी 60.7, दलित 58, और आदिवासी 57 साल जी रही थीं। इसके बाद 2013-16 के सर्वे के मुताबिक हिन्दू ‘ऊंची जाति’ की महिलाएं 72.2 साल जी रही थीं, मुस्लिम महिलाएं 69.4, ओबीसी 69.4, दलित 67.8, और आदिवासी महिलाएं 68 साल जी रही थीं।
इन आंकड़ों का मतलब यह है कि ऊंची कही जाने वाली जातियों और दलितों के बीच औसत उम्र का फर्क पहले 4.6 साल था, जो अब बढक़र 6.1 साल हो गया है। आज हिन्दुस्तान में दलितों को जगह-जगह कूटा जा रहा है। वे अपने परंपरागत पेशों को लेकर वैसे भी हिकारत से देखे जाते हैं, और अब उनमें से जो लोग मरे हुए जानवर की खाल निकालने का काम करते हैं, उन लोगों को जगह-जगह गाय का हत्यारा कहकर मारा जा रहा है। फिर बढ़ते हुए शहरीकरण की वजह से नालियों और गटरों में उतरकर काम करने के लिए दलितों की जरूरत बढ़ती चल रही है, और यह काम सेहत के लिए खतरनाक, और सैकड़ों मामलों में जानलेवा भी होता है। नतीजा यह होता है कि गंदगी करने वाले ऊंचे लोग, सफाई करने वाले नीचे लोगों की मौत की वजह बनते हैं क्योंकि वे नालियों को कचरे से पाट देते हैं, और उन्हें साफ करने की जिम्मेदारी दलितों की ही रहती है। औसत उम्र के इस बड़े फासले को देखें तो एक बात यह भी दिखती है कि ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग दलितों के मुकाबले संपन्न होते हैं, और उनका खानपान बेहतर होता है, जीवन स्तर अधिक साफ-सुथरा और बेहतर होता है, वे अधिक पढ़े-लिखे होते हैं, और इलाज तक उनकी अधिक पहुंच होती है। दूसरी तरफ दलित बस्तियों में रहने वाले लोग गंदे कहे जाने वाले पेशे से जुड़े रहते हैं, और उनकी जिंदगी नालियों, पखानों, और मरे हुए जानवरों के बीच अधिक कटती है, नतीजा यह होता है कि उनकी सेहत हमेशा ही खतरे में रहती है, और बीमारियों का सामना करने के लिए उनके पास इलाज तक पहुंच कम रहती है। इस तबके में पढ़ाई भी कम रहती है, और सामाजिक जागरूकता कम होने से, समाज के बीच उनसे छुआछूत का भेदभाव होने से उनकी पहुंच बेहतर खाने तक भी कम रहती है, उनकी बस्तियां हर गांव की गंदगी बहने के ढलान पर आखिरी की बस्ती होती है, और साफ पानी तक भी दलितों की आसान पहुंच नहीं रहती है। इन सबका मिलाजुला नतीजा यह होता है कि लगातार गंदगी के बीच काम, लगातार संक्रमण का खतरा, गंदी बस्तियों में जीना, कमजोर खाना, और कम इलाज पाना। इन सबका नतीजा है कि ऊंची कही जाने वाली जातियों के मुकाबले दलितों की औसत उम्र इतनी कम है। चूंकि यह तबका आर्थिक रूप से कमजोर रहता है, इसकी महिलाएं भी कुपोषण का शिकार रहती हैं, भूखी रहती हैं, और साफ जिंदगी नहीं पाती हैं, नतीजा यह होता है कि वे गर्भावस्था में, और जन्म देने के बाद पर्याप्त पोषण आहार नहीं पाती हैं, और खानपान की यह कमजोरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले चलती है।
आज जब हिन्दुस्तान में देश और प्रदेश की सरकारें न सिर्फ जाति के आधार पर सबकी बराबरी की बात करती हैं, और गरीबों के लिए कई किस्म की रियायती योजनाएं भी चलाती हैं, तब भी अगर सामाजिक हकीकत में उसकी झलक नहीं दिखती है, तो उससे यह बात साफ है कि समाज में बराबरी का ऐसा माहौल नहीं है कि दलित तबका अपने पूरे हक पा सके। किसी ग्रामीण इलाके में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि एक सरकारी अस्पताल में जांच और इलाज में किसी दलित को उसकी बारी पर मौका मिल जाए, जब उसके बाद की बारी किसी सवर्ण की हो। श्रीलाल शुक्ल के लिखे हुए ‘राग दरबारी’ की सामाजिक हकीकत गांवों के स्तर पर आज आधी सदी बाद भी वैसी ही बनी हुई है, प्रेमचंद की लिखी हुई जमीनी हकीकत में गांवों में कोई फर्क नहीं आया है, शहरों में जरूर जातियां बेचेहरा हो गई हैं, और तमाम लोग गुमनाम होने से कहीं-कहीं दलितों को भी बराबरी का हक मिल जाता है।
दलितों की फिक्र करने वाले जो तबके हैं उन्हें भारत सरकार के इन आंकड़ों के इस विश्लेषण को देखना चाहिए, और सोचना चाहिए कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा और कितनी सदियों तक इसी तरह कुचला जाता रहेगा? यह सवाल छोटा नहीं है, लेकिन आज हिन्दुस्तानी समाज में सवाल करने का हक जिन लोगों को है, उन लोगों में दलित नहीं हैं। दलितों के पास नंगी पीठ है, और ऊंची कही जाने वाली जातियों के कुछ हमलावर लोगों के हाथ में अपनी पतलून से निकाला हुआ चमड़े का बेल्ट है। गुजरात के उना में सडक़ों पर जिस तरह दलितों को पीटा गया था, वह सबका देखा हुआ है, और वैसा हर दिन देश भर में जगह-जगह होता है, जहां की तस्वीरें सामने नहीं आती हैं। ऐसे देश में एक तबके को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना पेट भर खाने, बिना इंसान जैसी बुनियादी जिंदगी पाने, और बिना हक के जीने से कब तक कुचला जाता रहेगा, इस सवाल पर चर्चा होनी चाहिए। भारत सरकार के आंकड़ों पर शक करने की कोई वजह नहीं है, यह एक अलग बात है कि अगर खुद सरकार को अगर यह अहसास होता कि उसके आंकड़े इतनी भयानक सामाजिक हकीकत को इस हद तक नंगा करके खड़ा कर देंगे, तो शायद वह इन आंकड़ों को भी जारी नहीं करती। फिलहाल जिम्मेदार तबके को इस हकीकत पर चर्चा करनी चाहिए।
अमरीका और नाटो क्या यूक्रेन का भला कर रहे?
22 अप्रैल 2022
फरवरी के आखिरी हफ्ते में यूक्रेन पर हुए
रूसी हमले को दो महीने होने जा रहे हैं, और अब तक हजारों यूक्रेनी नागरिक
भी रूसी सैनिकों के हाथों और रूसी बमबारी से, टैंक के हमलों से मारे गए
हैं। दसियों लाख लोग यूक्रेन छोडक़र जाने मजबूर हुए हैं जिन्हें अड़ोस-पड़ोस
के देशों से लेकर अमरीका तक में शरण दी जा रही है। यूक्रेन का ढांचा बहुत
बुरी तबाह हो चुका है, वहां की कलादीर्घाएं, संग्रहालय, वहां की इमारतें,
विश्वविद्यालय तबाह हो चुके हैं। और दुबारा यह देश कैसे खड़ा हो सकेगा,
इसकी कल्पना भी आसान नहीं है। जो लोग वहां बच गए हैं, उनमें अधिकतर बुजुर्ग
लोग हैं जो कि लंबा सफर करके किसी दूसरे देश जाने की हालत में भी नहीं
हैं, और जिन्हें अब बाकी जिंदगी अपने पुराने घर से परे रहने की हिम्मत भी
नहीं है। ऐसी नौबत में योरप के देश और अमरीका रूस के खिलाफ यूक्रेन की मदद
करने में कम या अधिक हद तक लगे हुए हैं, और इस मदद का अधिकतर हिस्सा
हथियारों की शक्ल में है ताकि यूक्रेन रूसी हमले का सामना कर सके। अधिक
बारीक जुबान में अगर बात करें तो ये देश यूक्रेन को ऐसे हथियार अधिक दे रहे
हैं जिनसे वह अपने को बचा सके, वह रूस पर हमला कर सके ऐसे हथियार देने से
योरप के नाटो-सदस्य देश भी कतरा रहे हैं, और अमरीका भी। ये मददगार देश इस
तोहमत से बचना चाहते हैं कि उन्होंने रूस-यूक्रेन की जंग को बढ़ाने का काम
किया, और वह जंग बढक़र तीसरे विश्वयुद्ध तक, या कि परमाणु युद्ध तक पहुंच
गई।
हम इसी जगह पर पहले भी लिख चुके हैं कि अंतरराष्ट्रीय सैनिक संगठन, नाटो के सदस्य देशों के सामने रूस का फौजी खतरा हमेशा ही खड़ा रहता है। और अमरीका तो रूस का परंपरागत प्रतिद्वंद्वी देश है ही, जो कि कुछ मायनों में एक दुश्मन देश सरीखा भी है। अब ऐसे में योरप के देशों, या नाटो-सदस्यों, और अमरीका का मिलाजुला निजी हित इसमें है कि रूस का अधिक से अधिक फौजी और कारोबारी नुकसान हो सके। अगर रूस कमजोर होता है, तो पश्चिमी ताकतें अधिक मजबूत होती हैं। ऐसे समीकरण के बीच यूक्रेन की शक्ल में अमरीका और नाटो-सदस्यों को एक ऐसा लड़ाकू देश मिल गया है जो कि किसी भी कीमत पर रूसी हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार है। दुनिया के इतिहास में शायद ही ऐसा कोई दूसरा राष्ट्रपति रहा हो जो कि एक टी-शर्ट में महीनों गुजार रहा है, बंकरों में जी रहा है, और रूसी हमले से निपटने की जिसकी हसरत अपार बनी हुई है। अपने देश के नागरिकों और फौजियों की अनगिनत मौतों की कीमत पर भी यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की रूस का मुकाबला करने को तैयार है, और हर दिन वह वीडियो कांफ्रेंस पर दुनिया के किसी न किसी देश की संसद से अपील करता है कि यूक्रेन को फौजी साज-सामान की मदद करें। यह मदद आ रही है, इसकी वजह से रूस का फौजी नुकसान भी हो रहा है, लेकिन इस मदद का इस्तेमाल करते हुए खुद यूक्रेन के फौजी मारे जा रहे हैं, या फिर वे रूस के युद्धबंदी होकर एक अनिश्चित और खतरनाक भविष्य की तरफ बढ़ रहे हैं। यूक्रेन में रूसी हमले, और बाद की चल रही जंग के दौरान दसियों हजार नागरिकों की मौत तय है, पूरे देश की तबाही तो हो ही चुकी है, दसियों लाख नागरिक शरणार्थी होकर दूसरे देशों में चले गए हैं।
अब रूसी हमले को पूरी तरह नाजायज और गुंडागर्दी मानते हुए भी हम आज की इस नौबत पर जब सोचते हैं तो लगता है कि अमरीका और नाटो-सदस्य देश किस कीमत पर इस लड़ाई को जारी रखे हुए हैं? इन तमाम देशों से अरबों डॉलर की फौजी मदद तो यूक्रेन जा रही है, लेकिन इनमें से किसी का भी एक सैनिक भी वहां लडऩे नहीं गया है। किसी देश के लिए सबसे खतरनाक नौबत यही रहती है कि किसी दूसरे और तीसरे देश की लड़ाई में उसके अपने सैनिकों के ताबूत घर लौटें। इराक और अफगानिस्तान के भी पहले वियतनाम में अमरीका यह भुगत चुका है, और अभी-अभी अफगानिस्तान से मुंह काला कराकर लौटा हुआ अमरीका दुनिया के किसी मोर्चे पर अपनी फौज को झोंकना नहीं चाहता है, शायद उसकी औकात और हिम्मत भी नहीं रह गई है। ऐसी नौबत में रूस को नुकसान पहुंचाने की पश्चिमी नीयत पश्चिम के पैसों से तो पूरी हो रही है, लेकिन उसमें जिंदगियां यूक्रेन की जा रही है। वहां के सैनिक भी मारे जा रहे हैं, वहां के नागरिक भी मारे जा रहे हैं, और वह पूरे का पूरा देश दुनिया का सबसे बड़ा खंडहर बनने जा रहा है। रूस की संपन्नता तो इतनी है कि वह अपने तेल, गैस, और खनिज बेचकर आने वाले बरसों में किसी तरह खड़ा रहेगा, लेकिन यूक्रेन रहेगा भी या नहीं, इसी का कोई ठिकाना नहीं है। रूस के खिलाफ उसे उकसाकर मोर्चे पर डटाए रखने वाले देश शायद ही इस युद्ध को तीसरे विश्वयुद्ध में बदलने की नौबत खड़ी करेंगे। जिस जंग को किसी तर्कसंगत अंत तक ले जाना पश्चिमी देशों के हाथ में नहीं हैं, उसे इस तरह जारी रखवाना एक खतरनाक खेल है। अपने निजी स्वार्थों के चलते इन देशों को यूक्रेन को जंग में खड़े रखना अच्छा लग रहा है, लेकिन यह एक ऐसी मदद है जिसमें यूक्रेन की जिंदगी और उस देश को बचाने की कोई योजना नहीं है। यह मदद तब तक जारी है जब तक यूक्रेन रूस के खिलाफ डटा हुआ है, और रूस को कोई नुकसान पहुंचा पा रहा है। इसके बाद अगर यूक्रेन नाम का देश बचता है, तो उसके पुनर्निर्माण के लिए इनमेें से कौन से देश कितनी मदद करेंगे, और उससे कितनी जरूरतें पूरी होगी यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल तो यूक्रेन को घोड़े पर सवार करके पश्चिम के देश एक खेल खेलते दिख रहे हैं।
लोगों को याद होगा कि 1971 में पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच एक तनाव और संघर्ष चल रहा था, और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने पश्चिम में बसी हुई राजधानी और सरकार के खिलाफ एक मोर्चा खोल रखा था। उस वक्त भारत ने पूर्वी पाकिस्तान का साथ दिया था, और पाकिस्तान की फौज को भारत के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था, बांग्लादेश बना था, और पाकिस्तान के हाथ से पूरब का अपना पूरा हिस्सा चले ही गया। लेकिन उस नौबत में अगर आत्मसमर्पण नहीं हुआ रहता, तो बहुत खून-खराबा होता। अब अगर उस वक्त अमरीका पाकिस्तान की फौजी मदद को उतरा रहता, और पाकिस्तान की फौज उस झांसे में आकर उस जंग को जारी रखती, तो क्या पाकिस्तान का सचमुच कोई भला हुआ रहता? इतिहास को लेकर कल्पना ठीक नहीं है, लेकिन बिना किसी विदेशी मदद के पाकिस्तान ने उस वक्त हिन्दुस्तान के सामने आत्मसमर्पण किया, और अपने देश का विभाजन होने दिया। अब आज अगर यूक्रेन बिना पश्चिमी मदद के अब तक आत्मसमर्पण करने के बारे में सोच भी पाया होता, तो आज पश्चिमी देशों ने वह संभावना उसके सामने से छीन ली है। आज उसे इतना फौजी सामान भेजा जा रहा है कि वह कहीं रूस के सामने आत्मसमर्पण न करे दे, और रूस योरप के और भीतर तक अपने टैंक न पहुंचा दे। दुनिया के फौजी ताकत वाले देश न तो यूक्रेन को अपनी फौजी-औकात में जीने दे रहे, और न ही इस लड़ाई को खत्म होने दे रहे। जिस जंग में शामिल होने के लिए ये देश तैयार नहीं हैं, क्या उस जंग को बड़ी मौतों और बड़ी तबाही की कीमत पर भी जारी रखवाना एक नैतिक काम है? कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि यूक्रेन में अमरीका और नाटो रूस के खिलाफ एक प्रॉक्सी युद्ध लड़ रहे हैं। यानी दूसरे के कंधे पर रखकर बंदूक चला रहे हैं, और यूक्रेन ने लड़ाई की अपनी क्षमता के बाहर जाकर भी अपना कंधा मुहैया कराया है। अब सोचने की बात यह है कि यूक्रेन को चने के झाड़ पर चढ़ाकर क्या उसका साथ दिया जा रहा है, या उसका इस्तेमाल किया जा रहा है? यह सवाल छोटा नहीं है, और यूक्रेनी लोगों के भले के लिए इस सवाल का जवाब ढूंढना जरूरी है।
बैटरी-गाडिय़ों में आगजनी, खतरे, और बचाव के तरीके
21 अप्रैल 2022
हिन्दुस्तान में पेट्रोल और डीजल के
अंधाधुंध बढ़ते हुए दामों के चलते हुए, और सरकारी रियायतों की वजह से भी
बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। बिजली से चार्ज
होने वाली बैटरियों पर ईंधन की लागत पेट्रोल-डीजल के मुकाबले बहुत कम आ रही
है, और यही वजह है कि लोगों को इन्हीं गाडिय़ों का भविष्य दिख रहा है, और
है भी। इसके साथ-साथ बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों में डीजल-पेट्रोल को ऊर्जा
में बदलने वाले इंजन का कोई काम नहीं रहता, इसलिए उसमें पुर्जे बहुत कम
लगते हैं, उसकी आवाज नहीं के बराबर होती है, और उससे कोई धुआं नहीं निकलता।
लेकिन दुनिया में कोई भी चीज एक हसीन सपने की तरह खूबसूरत नहीं हो सकती,
इसलिए पिछले कुछ महीनों में हर हफ्ते हिन्दुस्तान में एक से अधिक बैटरी
वाहनों में आग लग रही है, चलते-चलते सडक़ पर भी लग रही है, और घर में
चार्जिंग के दौरान भी बैटरी-गाडिय़ां जल रही हैं। ऐसी एक आगजनी में उसी कमरे
में सोए बाप-बेटी भी जल मरे हैं।
एक तरफ तो जिन शहरों में बैटरी से चलने वाले ऑटोरिक्शा बढ़ते जा रहे हैं वहां सडक़ों पर शोर घट गया है, और चौराहों पर धुआं। लोग राहत की सांस ले रहे हैं, और बैटरी से चलने वाले ऑटोरिक्शा इतने आसान भी हैं कि छत्तीसगढ़ में हजारों महिलाएं मुसाफिर-ऑटोरिक्शा चलाने लगी हैं। भारत में सरकार ने भी आने वाले बरसों में बहुत तेजी से बैटरी-गाडिय़ों का अनुपात बढ़ाने की घोषणा की है, और इसी अनुपात में डीजल-पेट्रोल की खपत में कमी भी आते जाएगी। यह सब कुछ पर्यावरण के हिसाब से भी बेहतर तस्वीर लग रही है, लेकिन इसमें एक दिक्कत भी आ रही है। उस दिक्कत पर चर्चा जरूरी है।
जानकार लोगों का कहना है कि बैटरी वाली गाडिय़ों में आग लगने के पीछे उनकी बैटरी घटिया होना एक बड़ी वजह हो सकती है। आज हिन्दुस्तान में कोई बैटरियां इन गाडिय़ों के लिए शायद बन नहीं रही हैं, और चीन बाकी बहुत से सामानों की तरह इस चीज का भी सबसे बड़े निर्माता है। तकनीकी जानकारी रखने वालों का कहना है कि बैटरी चार्ज करते हुए, और फिर उस चार्जिंग से गाड़ी चलाते हुए बैटरी के भीतर कई किस्म की रासायनिक क्रिया होती है, और अगर बैटरी के भीतर रसायनों में किसी तरह की मिलावट होती है, तो उसकी नतीजा भी आग की शक्ल में सामने आ सकता है। फिर बिजली के कनेक्शन से जब बैटरी को चार्ज किया जाता है, तब भी हिन्दुस्तान में बिजली के ऐसे कनेक्शन कई बार स्तरहीन होते हैं, उनकी अर्थिंग सही नहीं होती है, और वैसे में चार्जिंग से मोबाइल फोन तक में आग लगने की खबरें आते ही रहती हैं, वैसी ही खबरें अब बैटरी-गाडिय़ों में चार्जिंग के दौरान आग लगने की आने लगी हैं। इसलिए बिजली से बैटरी चार्जिंग की तकनीक तो सही है, लेकिन बिजली का कनेक्शन सही और सुरक्षित होना भी उतना ही जरूरी होता है।
अभी भारत में इस तकनीक के कुछ जानकार लोगों से मीडिया की बातचीत में यह सामने आया है कि बहुत से नए-नए वाहन निर्माता रातोंरात पैदा हो गए हैं जिनके पास कुछ चीजों को जोडक़र एक दुपहिया खड़ा कर लेने और उसे बैटरी से दौड़ाने के सामान तो हैं, लेकिन उनके पास न तो देश भर में मरम्मत का ढांचा है, और न ही उन्हें अपने ब्रांड की किसी साख को निभाना है। ऐसे नए-नए खिलाड़ी इस नई तकनीक के साथ बाजार में हैं, और दिक्कत यह भी है कि भारत में सरकार का कोई ढांचा बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों की तकनीक के बारीक पैमाने तय करने वाला नहीं है, और बैटरियों की पुख्ता जांच का भी कोई तरीका आज भारत में प्रचलन में नहीं है। चूंकि बैटरी से चलने वाली गाडिय़ों की बैटरियों का भरपूर इस्तेमाल होता है, उनकी रोजाना पूरी चार्जिंग होती है, फिर उससे गाड़ी चलती है, तो यह अब तक कारों में महज हॉर्न और लाईट के लिए रहने वाली मामूली बैटरी से बिल्कुल अलग तकनीक है, और गाडिय़ों के इतने बड़े ईंधन-स्रोत की पुख्ता जांच के लिए यह देश अभी तैयार नहीं है।
सरकार के सामने कई किस्म की चुनौतियां हैं। उसे देश के प्रदूषण को कम करने के अपने अंतरराष्ट्रीय वायदे को भी पूरा करना है, देश में पेट्रोल-डीजल गाडिय़ों के चलन को घटाना है, और बैटरी गाडिय़ों को बहुत तेजी से बढ़ाना भी है। इसलिए टेक्नालॉजी और मरम्मत के ढांचे का पुख्ता इंतजाम हुए बिना भी सरकार ने इन गाडिय़ों को बाजार में आने की इजाजत दे दी है। जैसा कि किसी भी तकनीक के पहले-पहल इस्तेमाल में होता है, हिन्दुस्तान में भी इन गाडिय़ों के साथ हादसे हो रहे हैं, और शायद ऐसे हर हादसे के बाद सरकार, कारोबार, और ग्राहक, इन सभी को काफी कुछ सीखने मिलेगा। लेकिन इनमें सबसे महंगा ग्राहक का सीखना होगा क्योंकि उसने बरसों की बचत को डालकर ऐसी गाड़ी खरीदी होगी, और उसके साथ हादसा होने पर वह ईंधन में बचत पाना तो दूर रहा, गाड़ी से भी हाथ धो बैठेगा।
देश और प्रदेशों की सरकारों को चाहिए कि बैटरी-गाडिय़ों की चार्जिंग और मरम्मत के इंतजाम में अपने नियमों और अधिकारों का इस्तेमाल करके इन्हें ग्राहकों के लिए आसान बनाएं। एक बेहतर कल के लिए कम कलपुर्जे वाली ऐसी गाडिय़ां जो बिना धुएं के चलती हैं, जो शोर नहीं करती हैं, वे जरूरी हैं। और ऐसी जरूरी सामान के साथ आज अगर कुछ खतरे हैं, तो उन खतरों को कम करना सरकार की जिम्मेदारी है। राज्यों को भी बैटरी गाडिय़ों की चार्जिंग वाली जगहों के बिजली कनेक्शनों की कड़ी जांच लागू करना चाहिए ताकि चार्जिंग के दौरान गाडिय़ां और इंसान जलने के हादसे न हों। बैटरी की टेक्नालॉजी ही भविष्य इसलिए है कि धीरे-धीरे बिजली से चार्जिंग के बजाय सोलर पैनल से चार्जिंग का भी तरीका इस्तेमाल होने लगेगा, और धरती एक बेहतर जगह बन सकेगी।
आदिवासियों पर सौ से अधिक शोधपत्र, लेकिन उनके जख्मों की हकीकत पर कितने?
20 अप्रैल 2022
छत्तीसगढ़ में अभी राष्ट्रीय जनजातीय
साहित्य महोत्सव चल रहा है। यह एक बड़ा कार्यक्रम है, और सरकार इसकी
मेजबानी कर रही है। तीन दिनों तक लगातार लोग अपने शोधपत्र पढ़ेंगे, और
सरकारी समाचार के आंकड़े बतलाते हैं कि सौ से अधिक शोधपत्र पढ़े जाएंगे।
इसके अलावा मेजबान छत्तीसगढ़ अपने स्तर पर जनजातीय नृत्य महोत्सव और
जनजातीय कला प्रतियोगिता भी आयोजित कर रहा है। जिन लोगों को जनजातीय से
ठीक-ठीक अहसास नहीं हो पा रहा है, उन्हें यह बता देना ठीक होगा कि आम
बोलचाल में जिन्हें आदिवासी कहा जाता है, यह उन्हीं पर केन्द्रित कार्यक्रम
है। जो विभाग इसे करवा रहा है वह भी आदिम जाति कल्याण विभाग है, इस आयोजन
को पता नहीं क्यों आदिवासी की जगह जनजातीय कहा गया है। खैर, किस तबके को
किस नाम से बुलाया जाए यह एक अलग बहस हो सकती है, लेकिन जहां सौ से अधिक
शोधपत्र पढ़े जाने हैं, वहां हम आज आदिवासियों के एक खास पहलू पर चर्चा
करना चाहते हैं, जो कि इस आयोजन की सरकारी खबर में तो कम से कम नजर नहीं आ
रहा है।
आज न सिर्फ हिन्दुस्तान के, बल्कि पूरी दुनिया के आदिवासी एक अभूतपूर्व तनाव से गुजर रहे हैं। उनके इलाके कहीं हथियारबंद नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष की जगह बने हुए हैं, कहीं उन्हें बेदखल करके खदान खोदकर खनिज निकालने की तैयारी चल रही है, कहीं उनके जंगल काटे जा रहे हैं, और बेदखल तो उन्हें तमाम जगहों से किया ही जा रहा है। छत्तीसगढ़ में पिछली भाजपा सरकार के वक्त एक लाख या अधिक आदिवासियों को बस्तर में सरकारी सलवा-जुडूम के चलते प्रदेश छोडक़र बगल के आन्ध्र जाना पड़ा था, उनकी घरवापिसी अभी तक हो नहीं पाई है, और कुछ दिनों पहले की ताजा पहल बताती है कि उनमें से सौ परिवारों को वापिस लाकर बसाने पर सरकार सहमत हुई है। कश्मीर से कश्मीरी पंडितों की बेदखली पर तो कश्मीर फाइल्स नाम की एक फिल्म को एक रणनीति के तहत बनाया गया, लेकिन भाजपा शासन काल में बस्तर से बेदखल आदिवासियों पर कोई फिल्म भी नहीं बनी है। खैर, हम एक ही मुद्दे पर बात को खत्म करना नहीं चाहते, इसलिए आदिवासियों से जुड़े हुए दूसरे बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जो कि अभी छत्तीसगढ़ में चल रहे इस राष्ट्रीय आयोजन में उठने चाहिए थे। लेकिन शायद सरकार मेजबान है, इसलिए आयोजन में आए लोग सत्ता पर मेहरबान हैं, और आदिवासियों के मुद्दे किनारे धरकर किताबी बातचीत ही चल रही है।
ऐसा भी नहीं है कि आदिवासियों के मुद्दों को लेकर दुनिया में कहीं लिखा नहीं जा रहा है। उनके बीच के लोग जो साहित्य लिख रहे हैं, या आदिवासियों पर जो साहित्य लिखा जा रहा है, वह भारी राजनीतिक चेतना का है, और कई असुविधाजनक बुनियादी सवाल भी उठाता है। आज जंगलों से बेदखली आदिवासी जनजीवन का सबसे बड़ा मुद्दा है। आदिवासी जीवनशैली का परंपरागत खानपान आज हमले का शिकार है। सरकारी पढ़ाई और नौकरी की गिनती घटती जा रही है, और आदिवासी की संभावनाएं भी। इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए क्योंकि आज सरकारी संस्थाओं का निजीकरण, और सरकारी पढ़ाई की जगह निजी संस्थान बढ़ते चलने से आरक्षित तबके की संभावनाएं घटती जा रही हैं। ऐसे में आदिवासी बोली या दूसरे किस्म के आदिवासी साहित्य के बजाय आदिवासियों के जलते-सुलगते मुद्दों पर अधिक बात होनी चाहिए थी, और ऐसा भी नहीं है कि इन मुद्दों पर लिखने वाले साहित्यकार कम हैं।
और यह बात सिर्फ आदिवासी साहित्य के साथ हो ऐसा भी नहीं है, आज तमाम वही साहित्य महत्व पाता है जो कि जिंदगी की जलती-सुलगती हकीकत को अनदेखा करते चलता है। फिर देश भर में जहां-जहां सत्ता के संरक्षण में साहित्या या संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशिश होती है वहां जलते-सुलगते मुद्दों का भला क्या काम? इसलिए आज जब छत्तीसगढ़ में तीन दिनों का इतना बड़ा आयोजन आदिवासी साहित्य और उनसे जुड़े हुए कुछ मुद्दों पर हो रहा है, तो बस्तर जैसे इलाके में बेकसूर आदिवासियों को नक्सल बताकर उनकी हत्या पर कोई बात नहीं है, उनकी महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों के बलात्कार पर कोई बात नहीं है, पिछली भाजपा सरकार के दौरान कुख्यात पुलिस अफसरों ने जिस तरह गांव के गांव जलाए, थोक में बेकसूरों को मारा, उन पर कोई बात नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि क्या इन मुद्दों पर कोई आदिवासी-साहित्य लेखन हो ही नहीं रहा है, या वैसे साहित्य पर चर्चा की कोई असुविधा झेलना ही नहीं चाहते? पूरे देश में खदानों के लिए, कारखानों के लिए आदिवासियों के जंगलों की कटाई और उन पर कब्जा हॉलीवुड की फिल्म अवतार के अंदाज में चल रहा है। सरकार और कारोबार का मिलाजुला बाहुबल इस काम में लगा है, और आदिवासियों की तकलीफ को जगह देने के लिए भारत के शहरी लोकतंत्र में कोई मंच भी नहीं बचा है। नतीजा यह है कि नक्सली बंदूकों की नाल से ही आदिवासी की आह निकल पा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ के तीन दिनों के इस आयोजन में सत्ता की आलोचना वाला देश भर में कई जगह आदिवासियों पर लिखा गया साहित्य किसी चर्चा मेें नहीं है। इसमें अटपटा कुछ नहीं है, सत्ता कभी अपने आयोजनों पर खर्च करते हुए उनमें अपनी आलोचना को न्यौता नहीं देती है। लेकिन इस आयोजन में जुटे सैकड़ों लोगों में से किसी ने भी यह आवाज नहीं उठाई है कि इतने बड़े आयोजन में आदिवासियों के दर्द की कोई आवाज नहीं है।
छत्तीसगढ़ सरकार चाहती तो कार्यक्रम के सरकारी होने पर भी उसमेें हकीकत को जगह दे सकती थी, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर तकरीबन तमाम जुल्म पिछले पन्द्रह बरस की भाजपा सरकार के दौरान दर्ज हुए थे, लेकिन सत्ता शायद सत्ता होती है, और वह ऐसी असुविधा खड़ी करना नहीं चाहती जो कि उसके आज के कामकाज पर भी लागू हो, और भारी पड़े। लेकिन जैसा कि बहुत से अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में होता है, इस आयोजन के समानांतर भी एक स्वतंत्र आयोजन हो सकता था जिसमें आदिवासियों की तकलीफों, और उनके जख्मों पर चर्चा हो सकती थी, लेकिन शायद इस देश में अब असल मुद्दों पर आंदोलन चला पाना भी आसान नहीं रह गया है, कहीं उन्हें नक्सली करार दे दिया जाएगा, कहीं टुकड़े-टुकड़े गैंग, और कहीं देशद्रोही। फिर भी आदिवासी जिंदगी को लेकर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को ऐसे मौके पर जलते-सुलगते पहलुओं की नामौजूदगी की बात तो उठानी ही चाहिए। अब तक तो ऐसी कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ रही है।
देश के बाकी सारे राज्य भी योगी के फैसले पर गौर करें
19 अप्रैल 2022
सुप्रीम कोर्ट और बहुत से हाईकोर्ट के शोरगुल रोकने, धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों के लिए सडक़ों पर म्यूजिक सिस्टम बजाकर किए जाने वाले शोरगुल को रोकने के लिए अलग-अलग समय पर आए हुए आदेशों को राज्य सरकारों और पुलिस-प्रशासन ने मोटेतौर पर कचरे की टोकरी में डाल रखा है क्योंकि अराजक जनता को नाराज करने की जहमत उठाना कोई नहीं चाहते। अभी छत्तीसगढ़ में जिले के अफसरों ने हाईकोर्ट में हलफनामा दिया है कि वे शोरगुल को रोकेंगे, और उस दिन से आज तक हर दिन राजधानी रायपुर सडक़ों पर लाऊडस्पीकरों से घिरी हुई है, अदालती हुक्म और अदालत में अपने खुद के हलफनामे का भी कोई वजन नहीं रह गया है। ऐसे में राज्य सरकारों को पूरे राज्य के स्तर पर धार्मिक और साम्प्रदायिक टकराव को भी रोकना चाहिए, और धर्म के शोरगुल से लोगों को बचाने का काम भी करना चाहिए। धार्मिक टकराव बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ चुका है कि कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हनुमान जयंती मना रहे दो अलग-अलग समूहों के बीच आपस में झगड़ा हुआ, पथराव हुआ, और कई गिरफ्तारियां हुईं। अब अगर इन दो समूहों में से कोई एक किसी अलग धर्म का होता, तो साम्प्रदायिक तनाव की एक नौबत आ खड़ी होती।
जब धर्म शुरू हुए उस वक्त कोई लाऊडस्पीकर नहीं थे। ईश्वर अगर कहीं था, तो वह बिना लाऊडस्पीकर के भी संतुष्ट था। यह तो बाद के बरसों में टेक्नालॉजी ने लाऊडस्पीकर मुहैया कराए, और हमलावर मिजाज वाले तमाम धर्मों ने अपना बाहुबल दिखाने के लिए अधिक से अधिक लाऊडस्पीकर लगाना शुरू किया। कुछ धर्मों में उपासना के खास समय के लिए भी लाऊडस्पीकर लगाए गए, ताकि उनके आसपास बसे हुए उसी धर्म के लोगों को खबर हो जाए, और वे नमाज या किसी और किस्म की उपासना के लिए पहुंच जाएं। लेकिन टेक्नालॉजी ने ही लाऊडस्पीकर के बाद घडिय़ां हर कलाई पर पहुंचा दीं, दीवारों पर पहुंचा दीं, अलार्म घडिय़ां आ गईं, और अब तो हर किसी की जेब में अलार्म वाले मोबाइल फोन हो गए हैं। इसलिए अजान या भजन का वक्त बताने के लिए लाऊडस्पीकर की कोई जरूरत नहीं रह गई है। वैसे भी सैकड़ों बरस पहले ऐसी आवाज लगाने की खिल्ली उड़ाते हुए इतिहास के सबसे हौसलामंद और सुधारवादी संत-कवि कबीर ने लिखा था- कांकड़ पाथर जोडक़र मस्जिद लेई बनाए, तां चढ़ मुल्ला बांग दे बहरा हुआ खुदाय। मतलब यह कि कंकड़-पत्थर जोडक़र मस्जिद बना ली, और उस पर चढक़र मुल्ला इस तरह से अजान देता है कि मानो खुदा को कम सुनाई देता है।
जिन लोगों को यह लगता है कि लाऊडस्पीकरों पर रोक मुस्लिम समाज पर हमला है, उन्हें तमाम धर्मस्थलों से लाऊडस्पीकरों को हटाने को एक अलग नजरिये से देखना चाहिए। नमाज की अजान तो दिन में पांच बार एक-दो मिनटों की होती है, लेकिन दूसरे धर्मस्थलों से तो रात-रात भर लाऊडस्पीकर बजाकर आसपास के लोगों का जीना ही हराम कर दिया जाता है। अब अगर उत्तरप्रदेश में योगी के ताजा हुक्म से सभी धर्मस्थलों का धार्मिक शोर उनके अहाते के भीतर तक सीमित रख दिया जाएगा, तो इससे लोग एक बेहतर जिंदगी जी सकेंगे, और यह सिर्फ मुस्लिम समाज पर कोई हमला नहीं रहेगा। देश की हर प्रदेश सरकार को ऐसा ही हुक्म देना चाहिए और उसे पूरी कड़ाई से लागू करना चाहिए। हम इसी जगह पर यह बात लिखते आ रहे हैं कि धर्म को निजी आस्था या धार्मिक परिसर के भीतर का काम रखना चाहिए, और सडक़ों पर धर्म के बाहुबल का प्रदर्शन बंद करना चाहिए। उत्तरप्रदेश में कल मुख्यमंत्री ने बिना इजाजत धार्मिक जुलूस पर रोक लगाने की बात भी कही है। धार्मिक जुलूस की इजाजत ही नहीं देनी चाहिए क्योंकि यह देश बारूद के ढेर पर बैठा हुआ देश हो गया है, और किसी भी दिन किसी एक जगह का दंगा देश में दूसरे शहरों तक भी फैल सकता है। धर्मस्थलों का शोरगुल, और सडक़ों की आवाजाही तबाह करते धार्मिक जुलूस, दोनों ही पूरी तरह गैरजरूरी हैं, और दोनों से ढेर तनाव खड़े हो रहे हैं। समझदार राज्यों को इन दोनों पर तुरंत रोक लगानी चाहिए।
आज एक छोटा नेता ही बड़ी बात कह सकता है
18 अप्रैल 2022
किसी नई सोच के लिए कई बार नए किस्म के
लोगों की जरूरत पड़ती है। अब देश की नई राजनीतिक पार्टियों के बड़े नेताओं
को धर्म के बारे में कुछ कहते हुए संसद और विधानसभाओं में अपनी सीटों का
खतरा अधिक दिखता होगा, इसलिए किसी छोटी पार्टी के नेता की ऐसी बात कह सकते
थे कि देश में धार्मिक जुलूसों पर रोक लगाई जाए। बिहार के एक पूर्व
मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने यह ट्वीट किया है कि अब वक्त आ गया है जब
देश में हर तरह के धार्मिक जुलूस पर रोक लगा दी जाए, धार्मिक जुलूसों के
कारण देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है, इन्हें तुरंत
रोकना होगा।
जीतन राम मांझी दलित समुदाय के हैं, और शायद अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि भी उन्हें धर्म के खतरे को समझने में मदद कर रही है। दलित समुदाय धर्म की मार को हमेशा ही झेलते आया है, और जीतन राम मांझी उत्तर भारत के बिहार की राजनीति में हैं, तो यह जाहिर है कि उन्होंने दलितों के साथ धर्म के सुलूक को अच्छी तरह देखा होगा। और आज हिन्दुस्तान में जिन लोगों को रोजी-रोटी और परिवार की फिक्र है, उनमें से बहुत से लोगों की मन की बात मांझी ने की है। इंसान और समाज दोनों की जिंदगी में धर्म की एक सीमित भूमिका ही रहनी चाहिए। धर्म या तो लोगों के मन और घरों में रहे, या फिर एक सीमित दायरे में रहे। जब धर्म हमलावर तेवरों के साथ हर बरस कई-कई बार एक-एक धर्म के हथियारबंद जुलूसों की शक्ल में सडक़ों पर आतंक फैलाता है, और टकराव का सामान बनता है, तो वह एक राष्ट्रीय खतरा भी बन जाता है। हिन्दुस्तान में आज कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं की मेहरबानी से धर्म से बड़ा कोई आंतरिक खतरा नहीं रह गया है। और जिस अंदाज में इस देश में एक अल्पसंख्यक तबके को घेरकर मारा जा रहा है, तो उससे यह सिर्फ देश का आंतरिक खतरा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय खतरा भी बन गया है क्योंकि हिन्दुस्तानी लोग दुनिया के जितने किस्म के देशों में बसे हुए हैं, और रोजी-रोटी कमा रहे हैं, उन पर भी खतरा है। भारत के दूसरे कई देशों के साथ संबंधों में भी भारत के भीतर की धार्मिक असहिष्णुता का तनाव पड़ रहा है, और सडक़ों पर झंडा-डंडा लेकर नंगा नाच करने वाले लोगों को यह अंदाज भी नहीं होता कि उनकी हरकतों का देश बाहर क्या दाम चुकाता है। दरअसल जब देश में चुनावों को धार्मिक जनमत संग्रह में बदलने की कोशिश लगातार चल रही हो, तब देश को दुनिया में क्या नुकसान हो रहा है इसकी बहुत अधिक फिक्र भी नहीं की जाती है।
आज जिन लोगों को अमन-चैन से जीना पसंद है, उनके लिए यह बहुत तकलीफ का मौका है कि आए दिन सडक़ों पर साम्प्रदायिक और धर्मान्ध टकराव खड़ा किया जा रहा है। बहुत से समझदार लोग सोशल मीडिया पर बरसों से यह सवाल उठाते हैं कि सडक़ों पर साम्प्रदायिकता की आग मेें नौजवानों की जिस भीड़ को झोंका जा रहा है, क्या उनमें से कोई भी नौजवान किसी बड़े नेता की औलाद है? बड़े नेता तो अपने बच्चों को बड़े-बड़े कारोबार में लगाते हैं, वे बड़े-बड़े पेशेवर काम करते हैं, दुनिया भर में जाकर प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से विदेशी डिग्रियां लेकर अंतरराष्ट्रीय काम करते हैं। दंगे भडक़ाने वाले नेताओं में से किसी की भी औलाद झंडा-डंडा लेकर चलने वाली नहीं रहती। और आज जिन लोगों को इस आग में झोंका जा रहा है, उन्हें अगर धर्म और जाति के नाम पर, साम्प्रदायिकता के नाम पर उलझाकर नहीं रखा जाएगा, तो उन्हें इस बात का अहसास हो जाएगा कि वे बेरोजगार हैं, उनके आगे पढऩे की गुंजाइश नहीं है, आगे बढऩे की गुंजाइश नहीं है। उन्हें हकीकत का यह अहसास न हो जाए इसलिए उन्हें किसी न किसी बवाल का हिस्सा बनाकर रखा जाता है, और फिर उनके मन में भक्तिभाव और राष्ट्रवाद को भरकर उन्हें हिंसक प्रदर्शनकारी बनाने से अधिक असरदार उलझाव और क्या हो सकता है? धर्म और देश के नाम पर वे दो सौ रूपए लीटर पेट्रोल खरीदने पर आमादा हैं, और इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता हो गई है।
ऐसे जहरीले माहौल में बहुसंख्यक तबके की साम्प्रदायिकता के मुकाबले अल्पसंख्यक तबके की साम्प्रदायिकता खड़ी होना तय है, और फिर मानो एक तबके में दूसरे तबके के दलाल भी बैठे हुए हैं जो कि पत्थर चलवाना शुरू करते हैं। ऐसे में समझदारी की बात तो यही होगी कि हिन्दुस्तान के तमाम धर्मस्थलों पर से लाउडस्पीकर हटा दिए जाएं, तमाम धार्मिक जुलूसों पर सौ फीसदी रोक लगा दी जाए। लेकिन किसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के नेता इस तरह की बात कहकर लोगों को नाराज करना नहीं चाहेंगे। जीतन राम मांझी उतने बड़े नेता नहीं हैं, और उनका राजनीतिक भविष्य इतने बड़े दांव पर नहीं लगा हुआ है कि वे खरी बात कहने से हिचकें। नतीजा यह है कि उन्होंने एक ऐसी बात कही है जिससे देश की साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ से एक बड़ा हथियार निकल जाएगा। यह बात हिन्दुस्तान की राजनीतिक व्यवस्था के तहत मुमकिन है या नहीं, आज के कानून के तहत मुमकिन है या नहीं, इसमें गए बिना हम एक सोच के रूप में इस बात की तारीफ करते हैं, और अगर इस देश को बचाना है तो साम्प्रदायिकता के ऐसे प्रदर्शन रोकने होंगे, जिन्हें देख-देखकर अलग-अलग धर्मों के ईश्वर भी थके हुए होंगे। आज दिक्कत यह भी है कि हिन्दुस्तान की न्यायपालिका देश के दर्जनों प्रदेशों में सरकारों की साम्प्रदायिकता पर भी कुछ नहीं कर पा रही हैं, और केन्द्र सरकार के जाहिर तौर पर साम्प्रदायिक दिखते फैसलों पर भी कुछ नहीं कर पा रही हैं। यह लोकतंत्र एक बड़ा ढकोसला साबित हो रहा है जिसमें संसद गिरोहबंदी के बाहुबल से काम कर रही है, अदालतें अपनी अवमानना की फिक्र से अधिक और कुछ करना नहीं चाहतीं, और देश की बहुसंख्यक आबादी साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, और हमलावर राष्ट्रवाद के सामूहिक सम्मोहन की शिकार हो चुकी है। कोई अगर यह सोचें कि देश के ताने-बाने को हुआ इतना नुकसान अगले दस-बीस बरस में सुधर सकता है, तो ऐसे लोग हकीकत के अहसास बिना जीने वाले लोग ही हो सकते हैं।
प्रशांत किशोर रणनीतिकार नहीं, पार्टियों और नेताओं के लिए एक आईना हैं...
17 अप्रैल 2022
कांग्रेस के लिए कल का दिन एक बड़ा नाटकीय
दिन था जब देश के एक बड़े चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर न सिर्फ अचानक
सोनिया गांधी के घर पहुंचे, बल्कि वहां आधा-एक दर्जन प्रमुख कांग्रेस
नेताओं के सामने उन्होंने 2024 की चुनावी संभावनाओं पर चार घंटे तक अपनी
राय और अपना अंदाज सामने रखा। यह राजनीतिक अटकल की बात नहीं है क्योंकि
कांग्रेस के एक सबसे बड़े नेता ने इसके बाद औपचारिक रूप से मीडिया से कहा
कि प्रशांत किशोर के प्रस्तुतिकरण पर फैसला लेने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष
ने एक कमेटी बनाई है जो कि एक हफ्ते में अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष को
देगी। ऐसा लगता है कि जिन नेताओं को कल प्रशांत किशोर के साथ की इस बैठक
में बुलाया गया था, शायद उन्हीं से यह कमेटी बनी होगी, और इतने बड़े
राजनीतिक कदम की घोषणा करने के पहले यह स्वाभाविक ही लगता है कि कांग्रेस
और प्रशांत किशोर किसी आपसी सहमति और तालमेल पर पहुंच चुके होंगे, और अब
उसकी औपचारिक घोषणा ही बाकी रह गई दिखती है।
जो लोग भारतीय राजनीति को लगातार देखते हैं उन्हें याद होगा कि कई महीने पहले भी प्रशांत किशोर ने ममता बैनर्जी के रणनीतिकार रहते हुए सोनिया, राहुल, और प्रियंका गांधी के साथ बैठक की थी, और भाजपा-एनडीए के मुकाबले देश में एक विपक्षी मोर्चे की वकालत की थी, लेकिन वह बात किसी किनारे पहुंच नहीं पाई थी। प्रशांत किशोर ने नाकामयाब होने के बाद कांग्रेस लीडरशिप के अहंकार को लेकर एक ट्वीट भी किया था, और कांग्रेस लीडरशिप के बचाव में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक ट्वीट से प्रशांत किशोर पर हमला भी किया था। खैर, उस दौरान प्रशांत किशोर शरद पवार जैसे कुछ और ताकतवर नेताओं से मिले थे, और कल की कांग्रेस के साथ उनकी बैठक हो सकता है कि कांग्रेस के रणनीतिकार बनने के बारे में न हो, और यह बैठक एनडीए के मुकाबले एक अधिक व्यापक विपक्षी गठबंधन बनाने की एक कोशिश की तरह हो। इन दोनों में से जो कुछ भी हो, ऐसा लगता है कि प्रशांत किशोर देश में मोदी के मातहत चल रही राजनीति की विकराल ताकत का खतरा देख रहे हैं, और उसका विकल्प बनाना चाहते हैं। लोकतंत्र में ऐसी कोई पहल जो कि विपक्ष को मजबूत बना सके, वह कुल मिलाकर लोकतंत्र को भी मजबूत बनाती है। लेकिन प्रशांत किशोर की भूमिका को लेकर हमारे मन में कुछ और बातें सामने आती हैं जिन पर हम पहले लिख भी चुके हैं।
आज देश में सवा सदी से पुरानी कांग्रेस पार्टी किनारे होते-होते हाशिए पर जा चुकी है। अभी सात बरस पहले तक जो सोनिया गांधी दस बरस सरकार चलाने वाली यूपीए की मुखिया थीं, उनके पास आज चलाने के लिए अपनी खुद की पार्टी का भी कोई ढंग का ढांचा नहीं बचा है, और कांग्रेस आज लोगों के मजाक का सामान बन चुकी है, लोगों की हमदर्दी की हकदार दिख रही है। जिस यूपीए ने दस बरस तक देश पर एक मजबूत सरकार चलाई, वह बड़ा गठबंधन कायम नहीं रह पाया, और उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी खुद भी लगातार चुनावी हार के सिवा कुछ हासिल नहीं कर पाई। यह बात कांग्रेस और बाकी विपक्ष के लिए सोचने की है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र में आज ऐसे कोई किरदार नहीं दिख रहे हैं जो कि चार पार्टियों को साथ बिठाकर देश के लोकतंत्र को बचाने की उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी याद दिला सकें, उन्हें साथ ला सकें। लोगों को याद पड़ता है कि किस तरह सत्ता के मोह से परे रहते हुए जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में देश की तमाम गैरकांग्रेस पार्टियों की एकजुटता हुई थी। लेकिन जेपी कोई पेशेवर रणनीतिकार नहीं थे, वे बंद कमरे से काम नहीं करते थे, वे एक जननेता थे, और अपने गांधीवादी मूल्यों को लेकर लोगों के बीच जाने की हिम्मत रखते थे, और उन्होंने 1977 के चुनाव में इमरजेंसी की सरकार को उखाड़ फेंका था। आज लोगों को केन्द्र की मोदी सरकार से लोकतंत्र को खतरे तो बहुत दिखते हैं, लेकिन इस खतरे को घटाने के लिए विपक्ष को जोडऩे का काम करने की ताकत और क्षमता किसी एक नेता में नहीं दिख रही है। नतीजा यह है कि प्रशांत किशोर जैसा एक पेशेवर, और खुद राजनीति से परे रहने वाला इंसान विपक्षी एकता की पहल कर रहा है, ममता बैनर्जी से परे ऐसी पहल कर रहा है। क्या इसका हम यह मतलब निकालें कि किस तरह राजनीति के पुराने जानकार और मंजे हुए लोग विवेकशून्य हो गए हैं, इतने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं कि अपनी पार्टी के सबसे बड़े स्वार्थों से परे कुछ भी नहीं सोच पा रहे हैं? ये सारे सवाल जो कि प्रशांत किशोर को इतनी बड़ी भूमिका निभाते देखकर खड़े होते हैं, वे भारत के राजनीतिक दलों में आपसी तालमेल बनाने की ताकत न रखने वाले नेताओं को देखकर हैरान रह जाते हैं। क्या इस विशाल लोकतंत्र में, और आजादी की 75वीं सालगिरह के इस मौके पर अब यही देखना रह गया है कि प्रशांत किशोर नाम का एक आदमी अपनी उम्र जितने बरस से राजनीति कर रहे लोगों को राजनीति सिखाने के लिए रखा जा रहा है? हम किसी भी उम्र में किसी से भी कुछ सीखने के खिलाफ नहीं हैं। अगर हिन्दुस्तान का विपक्ष प्रशांत किशोर की सेवाओं को लेकर मजबूत हो सकता है, तो वही सही। हर किसी को अपने आपको मजबूत करने के लिए सभी कानूनी तरीकों के इस्तेमाल की छूट रहती है, इसलिए प्रशांत किशोर से रणनीति बनवाकर अगर ममता बैनर्जी सत्ता पर लौटती हैं, या नीतीश कुमार सत्ता पर लौटते हैं तो इसमें अलोकतांत्रिक कुछ नहीं है। हैरानी की बात यही है कि क्या पूरी जिंदगी राजनीति में लगाने वाले लोग उसमें अपनी जिंदगी लगा नहीं रहे थे, और गंवा रहे थे? ये सब सवाल प्रशांत किशोर की काबिलीयत और उनकी जरूरत को कम नहीं आंकते हैं, बल्कि नेताओं को आईना दिखाते हैं कि एक अकेले पेशेवर रणनीतिकार के मुकाबले उन सबकी मिलीजुली औकात कितनी रह गई है!











