31 अगस्त 2014
संपादकीय
पिछले दिनों यह खबर आई कि केरल में शराबबंदी धीरे-धीरे लागू होने वाली है, क्योंकि वहां पर प्रति व्यक्ति शराब की खपत खासी अधिक है। इसी तरह देश के दूसरे राज्यों में प्रति व्यक्ति शराब या सिगरेट की माहवारी खपत के आंकड़े आते हैं। आज के अंगे्रजी अखबार द हिंदू में नशे के आंकड़ों के विश्लेषण पर एक रिपोर्ट छपी है कि किस तरह ये आंकड़े एक गलत तस्वीर भी पेश करते हैं। और यह बात सिर्फ नशे के आंकड़ों को लेकर नहीं है, दुनिया भर में कहीं भी किसी भी मामले से जुड़े आंकड़े इस तरह पेश किया जा सकते हैं कि उनसे गलत तस्वीर सामने आए। इसीलिए एक विख्यात पश्चिमी राजनेता के नाम के साथ यह लाईन जुड़ी चली आ रही है कि दुनिया में तीन तरह के झूठ होते हैं, झूठ, सफेद झूठ, और आंकड़े।
आंकड़ों को देखें तो आबादी और खपत से औसत प्रति व्यक्ति खपत को निकाला जाता है। लेकिन यह बात अनदेखी रह जाती है कि किसी इलाके के लोगों में नशा न करने वाले लोग कितने हैं? और ऐसे लोगों की वजह से नशा करने वाले लोगों की औसत खपत गिरकर कम दिख सकती है। मिसाल के तौर पर उत्तर-पूर्वी राज्य मिजोरम को लें, जहां पर कि तकरीबन सौ फीसदी आबादी मांसाहारी है। अब इसके साथ-साथ गुजरात जैसे राज्य को लें, जहां पर कि शाकाहारी लोगों की आबादी खासी अधिक है। अब इन दोनों राज्यों में प्रति व्यक्ति मांसाहार का अंदाज निकाला जाए, तो वह खासी गलत तस्वीर बताएगा। हो सकता है कि गुजरात के मांसाहारी लोग भी मिजोरम के मांसाहारी लोगों जितना ही मांस हर बरस खाते हों, लेकिन गुजरात के शाकाहारी लोगों की वजह से वह आंकड़ा कुछ की कुछ तस्वीर बताएगा।
अब जैसे छत्तीसगढ़ के आदिवासी बस्तर को देखें, तो वहां पर राष्ट्रीय खनिज विकास निगम की खदानों से हजारों करोड़ रुपये साल का लोहा निकलता है। अब उस जिले में यह कमाई दर्ज होने की वजह से उस जिले के गरीब और फटेहाल आदिवासी की प्रति व्यक्ति आय अगर पूरे प्रदेश में सबसे अधिक दिखाई देती है, और उसकी वजह से गरीबों के लिए बनाई गई सरकार की योजनाएं वहां लागू नहीं होती हैं, तो यह आंकड़ों के झांसे में आना होगा, और बेइंसाफी करना होगा।
गणित के आंकड़ों को लेकर कई तरह के ऐसे लतीफे चलते हैं कि एक कपड़ा अगर एक घंटे में सूखता है, तो चार कपड़े कितनी देर में सूखेंगे? और जिंदगी में भी कई लोग आंकड़ों को अंतिम सत्य मान लेते हैं जो कि नासमझ आंकड़ों पर अंधविश्वास होता है, और इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए। पिछले बरसों में भारत में लगातार गरीबी के आंकड़ों पर बहस चल रही है। रोज छब्बीस रुपये खर्च करने वाले हिंदुस्तानी को गरीबी की रेखा के ऊपर मानने के योजना आयोग के आंकड़ों को इंसानियत से परे का बताया जा रहा है। यह बात सही है कि जब इतने बड़े देश में किसी बड़ी आर्थिक नीति और योजना को बनाना है तो आंकड़ों के बिना तो काम नहीं चल सकता, लेकिन आंकड़ों के बीच की हकीकत को अनदेखा करके सिर्फ अंकों को अंतिम सत्य मानने की चूक नहीं करनी चाहिए। यह भी हो सकता है कि हिंदुस्तान में शराब न पीने वाले लोग बहुत हों, और उनकी शून्य खपत के चलते, बाकी लोगों के बीच शराब की औसत खपत घटकर दिखती हो। गुजरात में पूरी शराबबंदी है, इसलिए वहां सिर्फ डॉक्टरी पर्चे पर कुछ लोगों को शराब मिलती है, और वहां इसकी औसत खपत के आंकड़े बिल्कुल जमीन पर हैं। लेकिन दूसरी तरफ गुजरात से ही लगा हुआ दमन और दीव है, और दादरा-नगर हवेली है। इन दोनों केंद्र प्रशासित राज्यों का आकार एक-एक शहर जितना है, और इनमें शराब की औसत खपत हिंदुस्तानी के किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले कई गुना अधिक है। जाहिर है कि यहां पहुंचकर पीनेवाले गुजरातियों, या यहां से खरीदकर गुजरात शराब ले जाने वाले लोगों के आंकड़े इन्हीं दो शहरों में जुड़ जाते हैं। दूसरी तरफ पूरे गुजरात में तस्करी की अवैध शराब की घर पहुंच सेवा है, लेकिन चूंकि सरकारी रिकॉर्ड में वह दर्ज नहीं है, इसलिए उसके आंकड़े खपत में नहीं जुड़ते।
औसत शब्द दिखने में ही औसत जैसा साधारण लगता है, लेकिन वह कई मामलों में एक बड़े नाटकीय मुखौटे जैसा रहता है। इसलिए कोई नतीजा निकालने के पहले गिनती, अंक, संख्या, और जोड़-घटाने पर से अंधविश्वास को अलग रखकर समझ का इस्तेमाल भी करना चाहिए। जिंदगी के नतीजे सिर्फ कैलकुलेटर पर नहीं निकाले जा सकते, उनके लिए अंकों के साथ-साथ अक्षरों वाले की-बोर्ड भी लगते हैं।
संपादकीय
पिछले दिनों यह खबर आई कि केरल में शराबबंदी धीरे-धीरे लागू होने वाली है, क्योंकि वहां पर प्रति व्यक्ति शराब की खपत खासी अधिक है। इसी तरह देश के दूसरे राज्यों में प्रति व्यक्ति शराब या सिगरेट की माहवारी खपत के आंकड़े आते हैं। आज के अंगे्रजी अखबार द हिंदू में नशे के आंकड़ों के विश्लेषण पर एक रिपोर्ट छपी है कि किस तरह ये आंकड़े एक गलत तस्वीर भी पेश करते हैं। और यह बात सिर्फ नशे के आंकड़ों को लेकर नहीं है, दुनिया भर में कहीं भी किसी भी मामले से जुड़े आंकड़े इस तरह पेश किया जा सकते हैं कि उनसे गलत तस्वीर सामने आए। इसीलिए एक विख्यात पश्चिमी राजनेता के नाम के साथ यह लाईन जुड़ी चली आ रही है कि दुनिया में तीन तरह के झूठ होते हैं, झूठ, सफेद झूठ, और आंकड़े।
आंकड़ों को देखें तो आबादी और खपत से औसत प्रति व्यक्ति खपत को निकाला जाता है। लेकिन यह बात अनदेखी रह जाती है कि किसी इलाके के लोगों में नशा न करने वाले लोग कितने हैं? और ऐसे लोगों की वजह से नशा करने वाले लोगों की औसत खपत गिरकर कम दिख सकती है। मिसाल के तौर पर उत्तर-पूर्वी राज्य मिजोरम को लें, जहां पर कि तकरीबन सौ फीसदी आबादी मांसाहारी है। अब इसके साथ-साथ गुजरात जैसे राज्य को लें, जहां पर कि शाकाहारी लोगों की आबादी खासी अधिक है। अब इन दोनों राज्यों में प्रति व्यक्ति मांसाहार का अंदाज निकाला जाए, तो वह खासी गलत तस्वीर बताएगा। हो सकता है कि गुजरात के मांसाहारी लोग भी मिजोरम के मांसाहारी लोगों जितना ही मांस हर बरस खाते हों, लेकिन गुजरात के शाकाहारी लोगों की वजह से वह आंकड़ा कुछ की कुछ तस्वीर बताएगा।
अब जैसे छत्तीसगढ़ के आदिवासी बस्तर को देखें, तो वहां पर राष्ट्रीय खनिज विकास निगम की खदानों से हजारों करोड़ रुपये साल का लोहा निकलता है। अब उस जिले में यह कमाई दर्ज होने की वजह से उस जिले के गरीब और फटेहाल आदिवासी की प्रति व्यक्ति आय अगर पूरे प्रदेश में सबसे अधिक दिखाई देती है, और उसकी वजह से गरीबों के लिए बनाई गई सरकार की योजनाएं वहां लागू नहीं होती हैं, तो यह आंकड़ों के झांसे में आना होगा, और बेइंसाफी करना होगा।
गणित के आंकड़ों को लेकर कई तरह के ऐसे लतीफे चलते हैं कि एक कपड़ा अगर एक घंटे में सूखता है, तो चार कपड़े कितनी देर में सूखेंगे? और जिंदगी में भी कई लोग आंकड़ों को अंतिम सत्य मान लेते हैं जो कि नासमझ आंकड़ों पर अंधविश्वास होता है, और इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए। पिछले बरसों में भारत में लगातार गरीबी के आंकड़ों पर बहस चल रही है। रोज छब्बीस रुपये खर्च करने वाले हिंदुस्तानी को गरीबी की रेखा के ऊपर मानने के योजना आयोग के आंकड़ों को इंसानियत से परे का बताया जा रहा है। यह बात सही है कि जब इतने बड़े देश में किसी बड़ी आर्थिक नीति और योजना को बनाना है तो आंकड़ों के बिना तो काम नहीं चल सकता, लेकिन आंकड़ों के बीच की हकीकत को अनदेखा करके सिर्फ अंकों को अंतिम सत्य मानने की चूक नहीं करनी चाहिए। यह भी हो सकता है कि हिंदुस्तान में शराब न पीने वाले लोग बहुत हों, और उनकी शून्य खपत के चलते, बाकी लोगों के बीच शराब की औसत खपत घटकर दिखती हो। गुजरात में पूरी शराबबंदी है, इसलिए वहां सिर्फ डॉक्टरी पर्चे पर कुछ लोगों को शराब मिलती है, और वहां इसकी औसत खपत के आंकड़े बिल्कुल जमीन पर हैं। लेकिन दूसरी तरफ गुजरात से ही लगा हुआ दमन और दीव है, और दादरा-नगर हवेली है। इन दोनों केंद्र प्रशासित राज्यों का आकार एक-एक शहर जितना है, और इनमें शराब की औसत खपत हिंदुस्तानी के किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले कई गुना अधिक है। जाहिर है कि यहां पहुंचकर पीनेवाले गुजरातियों, या यहां से खरीदकर गुजरात शराब ले जाने वाले लोगों के आंकड़े इन्हीं दो शहरों में जुड़ जाते हैं। दूसरी तरफ पूरे गुजरात में तस्करी की अवैध शराब की घर पहुंच सेवा है, लेकिन चूंकि सरकारी रिकॉर्ड में वह दर्ज नहीं है, इसलिए उसके आंकड़े खपत में नहीं जुड़ते।
औसत शब्द दिखने में ही औसत जैसा साधारण लगता है, लेकिन वह कई मामलों में एक बड़े नाटकीय मुखौटे जैसा रहता है। इसलिए कोई नतीजा निकालने के पहले गिनती, अंक, संख्या, और जोड़-घटाने पर से अंधविश्वास को अलग रखकर समझ का इस्तेमाल भी करना चाहिए। जिंदगी के नतीजे सिर्फ कैलकुलेटर पर नहीं निकाले जा सकते, उनके लिए अंकों के साथ-साथ अक्षरों वाले की-बोर्ड भी लगते हैं।





