संपादकीय
31 मार्च 2018

हिन्दुस्तानी बैंकों में घोटालों का भांडाफोड़ इस रफ्तार से हो रहा है कि मानो पत्थरों को उठाते जा रहे हैं, और उनके नीचे से बिलबिलाते हुए कीड़े निकल रहे हैं। हालांकि कीड़ों में इंसानों की तरह साजिश की ताकत नहीं होती है, और उनकी मिसाल मोटे तौर पर गलत है। ताजा मामला आईसीआईसीआई बैंक की मुखिया और देश की एक बहुत ही चर्चित, महत्वपूर्ण महिला चन्दा कोचर का है जिनकी अगुवाई में बैंक ने उनके परिवार के कारोबारी हितों वाले धंधों को सवा दो हजार करोड़ का कर्ज लिया, और जो अब पूरे का पूरा डूब गया दिख रहा है। यह एक निजी क्षेत्र का बैंक है, और ऐसा माना जाता है कि निजी क्षेत्र के बैंक, राष्ट्रीयकृत बैंकों की तरह सरकार की सीधे दबाव में नहीं रहते। ऐसे में जब बैंक की एमडी और सीईओ चन्दा कोचर अपने परिवार के कारोबारी हितों से जुड़े हुए कुछ कारोबार पर कर्ज का फैसला लेती हैं, तो वे अपने आपको इससे अलग भी नहीं करती हैं। हमारे हिसाब से यह एक बहुत साफ-साफ हितों के टकराव का मामला है, और यह कुछ अविश्वसनीय बात है कि कोई भी जिम्मेदार बैंकर ऐसा गलत काम कर सकती है।
भारत के बैंकों के डूबने जैसी नौबत आने के पीछे कुछ मुजरिम किस्म के कारोबारी तो हैं ही, खुद बैंकर भी कम नहीं हैं जिनकी भागीदारी नीरव मोदी जैसे जालसाज-कर्जदार के मामले में दिख रही है। हमारा ख्याल है कि बैंकरों की साजिश अगर साबित हो जाती है, तो उन्हें मुजरिम-कर्जदारों के मुकाबले बहुत अधिक सजा होनी चाहिए क्योंकि कर्जदार तो कारोबारी हैं, और वे तो सही-गलत सभी तरह के काम करने के लिए जाने ही जाते हैं। लेकिन बैंक के अफसर, कर्मचारी, इनकी जवाबदेही बैंकों के लिए बहुत अधिक होती है, और उस विश्वास को तोडऩे पर कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए। आज ऐसा लगता है कि जितने खाते डूब रहे हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसे डूबने का मौका देने के पीछे बैंक भी शामिल न रहा हो।
आज यह भी हैरानी की बात है कि भारत सरकार बैंकों की, और बैंकों से धोखाधड़ी-जालसाजी के मामले में सारी जिम्मेदारी रिजर्व बैंक पर डालकर अपने हाथ झाड़कर खड़ी हो गई है। दूसरी तरफ रिजर्व बैंक सार्वजनिक रूप से यह बयान देता है कि ऐसी जालसाजी रोकने के लिए उसके पास पर्याप्त अधिकार नहीं है। इस पर सरकार आरबीआई के इस बयान को गलत बताती है, और कहती है कि उसके पास पर्याप्त अधिकार हैं। जिम्मेदारी से बचने का यह सिलसिला बैंकों के भीतर भी उनके ढांचे में ऊपर से नीचे तक चले आ रहा है। पंजाब नेशनल बैंक से दसियों हजार करोड़ की धोखाधड़ी बैंक के भीतर खुद बैंक की की हुई जालसाजी से मुमकिन हो पाई, और ऐसा लगता है कि धोखेबाज कारोबारियों ने इस बैंक को अपने पास गिरवी रखा हुआ था।
लेकिन पिछले कई हफ्तों से ये जालसाजी रोजाना ही उजागर हो रही है, इसके बावजूद सरकार, संसद, और सुप्रीम कोर्ट से अब तक जिम्मेदारी की ऐसी कोई आवाज नहीं निकली है कि बैंकों की व्यवस्था को खतरे से दूर रखने के लिए कौन से पुख्ता इंतजाम किए जा सकते हैं, किए जा रहे हैं। आज सांसदों और देश के बैंकिंग विशेषज्ञों की एक सर्वोच्च स्तरीय कमेटी के साथ सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को बैठकर बैंक जालसाजी रोकने के इंतजाम करने चाहिए, लेकिन ऐसी चर्चा तक नहीं हो रही है। यह भी हैरानी की बात है कि भारत के संसदीय इतिहास में बिखरी हुई मिसालों को भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा, और ताजा बैंक घोटालों पर संसद की सर्वदलीय समिति द्वारा जांच की मांग भी नहीं उठ रही है। ये मामले अकेली धोखाधड़ी के नहीं हैं, ये मामले भारत की बैंकिंग में जालसाजी की अपार संभावनाओं के मौजूद होने के हैं, और इनके लिए अल्पकालीन और दीर्घकालीन, दोनों किस्म के इलाज ढूंढने की जरूरत है, न कि सिर्फ इन कुछ गिने-चुने मामलों की जांच करके चुप बैठ जाने के। भारत के बैंक कर्मचारियों के संगठन लंबे समय से बड़े कर्जदारों की धोखाधड़ी के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, इन संगठनों को भी बैंकिंग-सुधार के लिए संसदीय पहल की मांग करनी चाहिए। इन मामलों में गुनहगारों को सजा दिलाना तो ठीक है, लेकिन आगे ऐसी जालसाजी जारी न रहे, उसे रोकना भी जरूरी है। भारत के बैंक बड़े-बड़े कर्ज देकर उनको डुबाकर, घाटे में आकर, छोटे-छोटे लोगों पर बड़े-बड़े जुर्माने लगाकर अपना घाटा पूरा करते दिख रहे हैं। आज जो हाल देश की सरकारी विमान सेवा, एयर इंडिया का हुआ है, वही हाल देश के बैंकों का न हो जाए इसके लिए फिक्र अगर नहीं की गई, तो अमरीका के बड़े-बड़े बैंकों की तरह हिन्दुस्तान के बैंक भी टाइटैनिक जहाज की तरह डूब सकते हैं। (Daily Chhattisgarh)















