19 सितंबर 2011
सुनील कुमार
भारत के अमरीका में सबसे करीबी दोस्त समझे जाने वाले, नेहरू के वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की पत्नी जैकलीन ने अपने एक लंबे इंटरव्यू में देश और दुनिया की बहुत सी बातों पर अपनी राय रखी थी और अपने गुजर जाने के बाद इसे उजागर करने की शर्त रखी थी। कैनेडी की हत्या के बाद जैकी ने दुनिया के एक सबसे रईस जहाज मालिक ओनासिस से शादी की थी और अपने वक्त की एक सबसे खूबसूरत और आकर्षक मानी जाने वाली इस महिला की तस्वीरें पश्चिम दुनिया को हमेशा ही खींचती रहीं।
भारत में सबसे बड़ी खबर इस इंटरव्यू को लेकर तब बनी जब उसके ऐसे हिस्से सामने आए जिनमें जैकी ने इंदिरा गांधी के खिलाफ बहुत सी कड़वी बातें कहीं। जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री निवास में मेजबान की तरह इंदिरा सभी देशी-विदेशी मेहमानों से मिलती थीं, और नेहरू के पसंदीदा दोस्त कैनेडी के परिवार से उनका अच्छा मिलना-जुलना हुआ था।
जैकलीन कैनेडी: लाइफ विद जॉन एफ कैनेडी शीर्षक से इस बातचीत में जैकलीन कैनेडी उस समय भारत की प्रधानमंत्री बनने वाली इंदिरा गांधी के बारे में कहती हैं, 'भारत की होने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक सूखी, कड़वी, बहुत महत्वाकांक्षी और भयंकर महिला थीं।Ó
जहां तक याद पड़ता है, जैकलीन राष्ट्रपति की पत्नी भर थीं और उनका अपना कोई काम नहीं था। इसलिए उनकी समझ और उनकी बातों का वजन इन दोनों की एक सीमा रही होगी। लेकिन अभी जब यह बात निकली है तो कई दूसरी बातें भी इस किस्म की याद पड़ती हैं। बहुत बरस हुए जब आजादी के पहले के एक बड़े भारतीय नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद का लिखा हुआ खबरों में आया। उन पर लिखी गई एक किताब को अपनी सहमति देते हुए भी उसके करीब तीस पेजों को रोकने की शर्त लगाई थी जो कि कुछ घटनाओं के बारे में थे और कुछ निजी बातों और विचारों के थे। उन्होंने यह कहा था कि ये पन्ने भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में सीलबंद रख दिए जाएं और उनकी मौत के तीस बरस बाद उन्हें खोला जाए। यह किताब प्रोफेसर हुमायूं कबीर ने लिखी थी जो कि अपने वक्त के जाने-माने शिक्षाविद् थे। इसके बाद की कहानी बहुत लंबी है जिसे यहां पर लिखने से बात एक दूसरी तरफ मुड़ जाएगी, लेकिन इस चर्चा का मकसद यह है कि अपने वक्त के इतिहास को अपनी नजर से लिखना एक बहुत गंभीर काम होना चाहिए न कि लापरवाही से कही गई बातों का पुलिंदा।
मैं इस बात का हिमायती रहा हूं कि महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तमाम लोगों को देश और दुनिया के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए अपने काम और अपने दायरे में होने वाले घटनाओं को दर्ज करके जाना चाहिए। इस बात को पहले कई बार मैंने अपने कॉलम में लिखा है, लेकिन जैकलीन कैनेडी या ओनासिस, ने इंदिरा गांधी के बारे में जो कड़वी बातें कही हैं उनके पीछे के तर्क इस इंटरव्यू में नहीं हैं। मतलब यह कि किसी की तारीफ या आलोचना के विशेषण बिना किसी संदर्भ के, बिना किसी आधार के इस्तेमाल कर लिए गए। इनसे अखबारों की सुर्खियां तो बनती हैं, लेकिन इनसे इतिहास नहीं बन पाता।
और इतिहास से परे एक दूसरी बात भी। एक-दूसरे के बारे में जो अच्छी या बुरी बातें लोग अपने मन में पालकर रखते हैं, उनमें से कितनी बातों को जानने, और जानते हुए उनके साथ जीने की ताकत लोगों में रहती है? आज जब विकीलीक्स से रिस-रिसकर लाखों दस्तावेज हर कुछ महीनों में सामने आ रहे हैं, जिनमें अमरीकी सरकार के लोगों की दुनिया भर के देशों और लोगों के बारे में, घटनाओं के बारे में राय सामने आ रही है तो बहुत से देश और लोग बेचैन हो रहे हैं। अमरीकी अफसरों की लिखी बातों को चरित्र प्रमाणपत्र की तरह लोग और सरकारें अपने प्रचार के लिए और विरोधियों पर हमला करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
जिस तरह से भूकंप में जमीन के नीचे धरती की प्लेट्स खिसकती हैं, उसी तरह ऐसी पुरानी बातों के, गोपनीय या खुफिया बातों के सामने आने से लोगों का एक-दूसरे पर भरोसा डांवाडोल होता है, और मेरे जैसे एक साधारण अखबारनवीस को यह लगता है कि अगली बार जब अमरीकी दूतावास से लोग मिलने के लिए आएंगे तो उनसे किस भरोसे से भरोसे की कोई बात की जा सकेगी?
यह समझने की जरूरत है कि इंसान और दुनिया का सारा मिजाज, और उसके काम के तौर-तरीके कुछ बातों को जानकर करने और कुछ बातों को न जानते हुए करने के हिसाब से बने हुए हैं। और यह इंतजाम कुदरत ने किया हुआ है, मिजाज से परे, तौर-तरीकों से परे इंसान के बदन का हिसाब-किताब भी कुदरत ने ऐसा ही बनाया है।
बदन के बारे में जरा ध्यान से सोचें तो इसके जिस-जिस हिस्से की हमें जरूरत होती है, दिमाग उसी हिस्से का, जरूरत की हद तक उस पल इस्तेमाल करता है। पूरा शरीर एक साथ हजारों चीजों को देख, सुन, सूंघ, छू सकता है और अगर यह पूरी की पूरी जानकारी दिमाग तक बेरोक-टोक जाती रहे तो दुनिया का यह सबसे तेज कम्प्यूटर भी जवाब दे जाएगा। इसलिए इंतजाम यह है कि जिस वक्त तन और मन को जिस बात की जरूरत रहती है सिर्फ उसी से जुड़ी बातें शरीर के बाकी हिस्से से दिमाग तक जाती हैं। बाकी तमाम संवेदनाएं दिमाग के नीचे ही कहीं थम जाती हैं।
इसलिए किसके बारे में कौन क्या कह रहा है यह पूरे समय अगर लोग जानते रहेंगे तो जीना मुश्किल हो जाएगा। जिन लोगों के आपस में बहुत अच्छे रिश्ते रहते हैं उन्हें भी अगर एक-दूसरे की कही बातें मालूम होती रहें, तो वे रिश्ते पल भर में हवा हो जाएंगे। इसकी ताजा मिसाल सब कुछ बहुत आसानी से बता देती है क्योंकि अच्छे पारिवारिक रिश्तों के बाद भी अगर कोई इतनी कड़वी बात कहती है तो आलोचना के शिकार इंसान के परिवार को आज भी वह बात खटक सकती है। क्या कोई यह सोच सकता है कि राहुल गांधी के खिलाफ बातें लिखने वाले अमरीकी अफसरों की राय उजागर हो जाने के बाद भी कांगे्रस की सरकार अमरीका की सरकार से बिना किसी कड़वाहट के बात कर पाएगी?
इसलिए अखबारी या साधारण इंटरव्यू में कई बार लापरवाही और गैरजिम्मेदारी से कही गई बातों को हम इतिहास लेखन का दर्जा नहीं दे सकते और न ही बेबुनियाद बातों को अधिक महत्व दिया जा सकता है। अपनी जिंदगी, अपने काम और अपने दायरे के बारे में लोगों की लिखी गई बातें, उनके इंटरव्यू के मुकाबले आमतौर पर अधिक गंभीर रहने की उम्मीद की जाती है और वैसी बातें समकालीन इतिहास लेखन की तरह होती हैं जिनमें लिखने वाले के अपने अनुभव इतिहास के एक पहलू के एक व्यक्ति के अनुभवों की तरह ही दर्ज होते हैं।
मैं भविष्यवाणियों के भी खिलाफ हूं क्योंकि उनसे लोगों के मन में उनके आने वाले दिनों के बारे में एक ऐसा पूर्वाग्रह बैठ जाता है जो कि उनके आज के फैसलों को कम या अधिक हद तक प्रभावित करता है। इसी तरह लोगों की गैरजरूरी राय भी दूसरे लोगों के दिल-दिमाग को नुकसान पहुंचा सकती है। और यह बात सिर्फ बड़े-बड़े चर्चित लोगों के बारे में नहीं रहती, बहुत साधारण लोगों पर भी उसी हद तक लागू होती है और पूरे का पूरा सच न तो बर्दाश्त के लायक होता और न ही पूरे के पूरे सच की जिंदगी में जरूरत होती। फौज में एक नियम सब जगह लागू होता है, नीड टू नो, नीड टू टेल। जितनी जरूरत हो उतना ही जानों और जितनी जरूरत हो उतना ही बताओ। विकीलीक्स से दुनिया का कितना भला हो रहा है या कितना बुरा इसके बारे में मैं इतने महीनों में भी अपनी राय नहीं बना पाया हूं, और फिर ऐसे पुराने-पुराने इंटरव्यू कफन चीरकर सामने आ रहे हैं।