राखी बंधवाने का हकदार बनने के लिए क्या करें?

 31 अगस्त 2023  

  

सोशल मीडिया राखी के मौके पर भाई-बहनों की फोटो से भरा हुआ है। छोटे-छोटे बच्चों की तस्वीरें देखना तो अच्छा लगता है, लेकिन बड़े लोगों की तस्वीरें देखते हुए कुछ हैरानी होती है कि क्या बालिग हो चुके भाई जिन सगी बहनों से राखी बंधवा रहे हैं, क्या उन्हें बाप की जायदाद में बराबरी का हक दे रहे होंगे? और राखी का तो पारंपरिक मतलब ही यही है कि बहन की रक्षा करना। बहन-भाई को राखी बांधती है ताकि वह हर हालत में उसकी रक्षा करे। अभी हम कुछ देर के लिए इस परंपरागत मतलब की लैंगिक असमानता को किनारे रख रहे हैं, और यह मान रहे हैं कि भारतीय समाज में हिफाजत की जरूरत एक लडक़ी और महिला को ही अधिक है, और इसके लिए राखी की यह परंपरा शुरू हुई होगी, जो अब तक चल रही है। एक छोटा हिस्सा ऐसे भाई-बहन का भी हो सकता है जिसमें भाई कमजोर हालत में हो, और बहन उसकी मददगार हो, वैसे मामलों में यह भी कहा जा सकता है कि उस भाई को अपनी बहन को राखी बांधनी चाहिए ताकि वह भाई की रक्षा कर सके। अभी दो दिन पहले राखी के मौके पर एक खबर आई थी कि किस तरह दोनों खराब किडनी वाले एक आदमी को उसकी बहन अपनी किडनी दे रही है। हमारे पास इसके कोई आंकड़े तो नहीं हैं, लेकिन ऐसा अंदाज जरूर है कि अंगदान करने वाले लोगों में महिलाएं ही अधिक रहती होंगी, फिर वे चाहे पति, भाई, पिता, या पुत्र को अंग देती हों। जाहिर तौर पर भाई-बहनों के बीच बहन ही अधिक काम आती होगी, और भाई की जिंदगी बचाने की सोच और जिम्मेदारी उसी पर रहती होगी। 

लेकिन आमतौर पर बिना मेडिकल-जरूरत के जिन परिवारों में भाई-बहन के बीच रिश्ते तभी तक बहुत अच्छे रहते हैं जब तक बहन बाप की दौलत में अपना हक नहीं मांगती। भारत के कानून में लडक़ी को बराबरी का हक दिया गया है, और आमतौर पर लड़कियां भाई, और उसके पास रहने वाले बूढ़े माता-पिता के दिमागी सुख-चैन के लिए अपने हक को छोडक़र चुप रहती हैं, और संपत्ति पर दावा नहीं करती हैं। भारतीय, कम से कम हिन्दू समाज में उससे यही उम्मीद भी की जाती है, और समाज खुद होकर यह मान लेता है कि चूंकि लडक़ी की शादी में खर्च किया गया था, दहेज दिया गया था, इसलिए उसे अब आगे और कुछ देने की जरूरत नहीं है। यह बात पूरी तरह फर्जी रहती है क्योंकि शादी का खर्च और दहेज इन दोनों को परिवार अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए करते हैं, न कि लडक़ी के हक की तरह। कानून और अदालतों ने बार-बार यह साफ किया है कि इन चीजों को लडक़ी का हक मानकर आगे हाथ खींच लेना कानूनी नहीं है। लेकिन हिन्दू समाज ने इसका एक तोड़ निकाल लिया है, और पैसे वाले परिवारों की बेटियां जब शादी होकर बाहर जाती हैं, तो उनसे यह लिखवा लिया जाता है कि उसे पिता की संपत्ति में से कुछ नहीं चाहिए। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए, और लडक़ी को ऐसे हित त्याग करने का कोई हक नहीं रहना चाहिए क्योंकि उस लडक़ी की शादी के बाद भी उसे मां-बाप की दौलत में से जो मिलना है उस पर उसके बच्चों का भी हक रहता है, और उन बच्चों के हक त्याग करने का उसे कोई हक नहीं है। 

राखी के मौके पर हम इसकी चर्चा इसलिए करना चाहते हैं कि साड़ी, लिफाफा, घड़ी, मोबाइल फोन, या कोई छोटा-मोटा गहना देकर भाई-भाभी इस बात की गारंटी चाहते हैं कि बहन बाप की दौलत में हक का बखेड़ा खड़ा न करे। आज राखी की प्रथा या परंपरा का कोई भी मतलब अगर है, तो वह यही है कि भाई बहन की हर तरह की हिफाजत करे। यह हिफाजत बाहर के गुंडों से बहन को बचाने तक सीमित नहीं है, यह उसके कानूनी हक पर डाका डालने वाले भाई पर भी लागू होती है, जिससे बहन को बचाने की जिम्मेदारी उसी डकैत भाई पर आती है। आज हालत यह है कि हिन्दू समाज में कोई भी लडक़ी अगर कानूनी हक की बात करेगी, तो भाई-भाभी तो दूर की बात रहे, मां-बाप भी उसके भावनात्मक शोषण में जुट जाएंगे, और उसे मरने-मारने की धमकी देने लगेंगे। मां-बाप जान देने पर उतारू दिखें, तो तमाम लड़कियां अपने हक छोडऩे के लिए तैयार हो जाएंगी। इसलिए इस बारे में कानून को ही कुछ करना होगा। 

हमारा यह मानना है कि देश में ऐसा कानून बनना चाहिए कि कम से कम आयकरदाता परिवार के लिए यह बंदिश हो जाए कि लडक़ी की शादी के साथ ही अगले बरस के इंकम टैक्स रिटर्न, या किसी और टैक्स कागजात में उस परिवार को लडक़ी के हक देने की जानकारी देना जरूरी हो जाए, जमीन-जायदाद का ट्रांसफर एक या दो बरस के भीतर हो जाए, और ऐसे तमाम कागजात सरकार के किसी विभाग में दाखिल करने की मजबूरी हर परिवार पर लाद दी जाए। समाज में कई किस्म के सुधार बिना कड़े कानूनों के लागू नहीं हो सकते। समाज और परिवार तो बाल विवाह करवाने पर उतारू रहते थे, और हिन्दू समाज कन्या भ्रूण हत्या के लिए भी कुख्यात रहा है। जब तक पूरे के पूरे ससुराल को जेल भेजने के कानून पर कड़ाई से अमल नहीं होने लगा, तब तक दहेज-हत्याएं आए दिन की बात थीं, और कड़े कानून के साथ-साथ उस पर कड़े अमल की कानूनी बंदिश की वजह से परिवारों ने बहू को जलाकर मारना, या प्रताडि़त करके आत्महत्या को मजबूर करना बंद किया है। ऐसा ही कड़ा कानून लडक़ी के हक को लेकर बनाने की जरूरत है। 

आज सोशल मीडिया पर जितने लोग रक्त संबंध वाली सगी बहन से राखी बंधवाते हुए तस्वीरें पोस्ट करते हैं, उनसे यह भी पूछना चाहिए कि बालिग और शादीशुदा बहन के हक तो उन्होंने जरूर ही दे दिए होंगे, और अगर नहीं दिए होंगे तो राखी की जिम्मेदारी का यह तकाजा है कि वे जल्द से जल्द बहन को यह हक दिलवाएं, मां-बाप न भी चाहें, तो भी वे उनसे लडक़र बहन को जायदाद में बराबरी का हक दिलवाएं। भारत की अदालतों का जो हाल है, उसमें यह साफ है कि लडक़ी मां-बाप और भाई के खिलाफ अदालत पहुंचकर इंसाफ पाने की लड़ाई आसानी से नहीं लड़ सकती। उस पर सामाजिक दबाव भी रहेगा। इसलिए कानून के साथ-साथ सामाजिक दबाव की नौबत भी बदलनी होगी, और जिस समाज में जो सुधार की बात करने वाले लोग हैं, उन्हें लड़कियों के कानूनी हक की बात भी उठानी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

आज नरसिम्हाराव को जैसे कोसा जाता है, 25 बरस बाद उस तरह किसे कोसा जाएगा?

30 अगस्त 2023  

  

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने एक बार फिर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाला है। उन्होंने अपनी आत्मकथा के पहले हिस्से के विमोचन समारोह में यह कहकर खलबली मचा दी कि अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के पहले प्रधानमंत्री नहीं थे, उन्होंने कहा कि भाजपा के पहले पीएम पी.वी.नरसिम्हाराव थे। अब इतिहास तो नरसिम्हाराव को कांग्रेस पीएम के रूप में दर्ज करता है, लेकिन मणिशंकर अय्यर का मंच और माईक से यह कहना लोगों को हैरान कर गया। उन्होंने कहा कि यह बात वे पहले अपनी एक दूसरी किताब में लिख चुके हैं, और इस ताजा किताब में उन्होंने यह नहीं लिखा है, लेकिन वे उस बात पर आज भी अटल हैं कि नरसिम्हाराव भाजपा के पहले प्रधानमंत्री थे। अपनी बात के पीछे का तर्क बताते हुए उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद गिराने के वक्त पीएम नरसिम्हाराव जिस शांति से अपने कमरे में पूजा कर रहे थे, उससे जाहिर था कि वे भाजपा के पीएम थे। उन्होंने याद किया कि कैसे जब वे (मणिशंकर) राम-रहीम यात्रा निकाल रहे थे तो नरसिम्हाराव ने उन्हें फोन किया था और कहा था कि उन्हें इस यात्रा पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वे धर्मनिरपेक्षता की मणिशंकर की परिभाषा से असहमत थे। राव का यह कहना था कि मणिशंकर इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि यह हिन्दू देश है। मणिशंकर अय्यर ने इस घटना के बारे में विमोचन समारोह में कहा कि भाजपा बिल्कुल यही कहती है (कि यह हिन्दू देश है), इसलिए भाजपा के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी नहीं नरसिम्हाराव थे। 

मणिशंकर अय्यर लिखने-पढऩे वाले हैं, और राजनीति के हिसाब से कुछ असुविधाजनक और तीखी जुबान बोलते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते हुए उन्होंने कई मौकों पर इतने तीखे विशेषणों का इस्तेमाल किया कि कांग्रेस पार्टी ने उनसे पल्ला झाड़ लिया, और उनके खिलाफ कार्रवाई भी की। अभी भी नरसिम्हाराव के बारे में मणिशंकर अय्यर के बयान के खिलाफ भाजपा ने उन्हें गांधी परिवार का चापलूस करार दिया है कि वे इस परिवार को खुश करने के लिए नरसिम्हाराव की आलोचना कर रहे हैं। यह बात पहले भी चर्चा में रही है कि नरसिम्हाराव के गुजरने पर किस तरह उस वक्त कांग्रेस पार्टी ने उनके शव को श्रद्धांजलि और दिल्ली में अंतिम संस्कार से परिवार को रोका था। ऐसा भी माना जाता है कि सोनिया गांधी नरसिम्हाराव को अधिक पसंद नहीं करती थीं, और नरसिम्हाराव ने विद्याचरण शुक्ल के मार्फत बोफोर्स के मामले को कुरेदने का काम किया था ताकि वह मीडिया में बने रहे, और सोनिया गांधी को शर्मिंदग झेलती रहनी पड़े। खैर, वह बात पार्टी के भीतर की थी जिस पर नरसिम्हराव के परिवार का कोई औपचारिक बयान अभी याद नहीं पड़ रहा है, लेकिन मणिशंकर अय्यर जो बात कहते हैं वह बात तो कांग्रेस पार्टी के भीतर बहुत से दूसरे नेता भी मानते हैं कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने को प्रधानमंत्री की मौन सहमति थी जिन्होंने तथाकथित साधू-संतों और यूपी के उस वक्त कट्टर हिन्दू सीएम कल्याण सिंह के तथाकथित वायदों पर भरोसा किया। उस वक्त भी अर्जुन सिंह सरीखे भाजपा-संघ के विरोधी, और कुछ वामपंथी रूझान वाले नेताओं ने नरसिम्हाराव को आगाह किया था कि वे गलत लोगों पर भरोसा कर रहे हैं, और ऐसे लोग खतरा बन सकते हैं। फिर भी नरसिम्हाराव ने हिन्दू संगठनों और ताकतों की बात सुनी थी जिसका नतीजा बाबरी विध्वंस की शक्ल में सामने आया था। अब उस दौर का कांग्रेस पार्टी और केन्द्र सरकार का इतिहास देखा जाए, तो कुछ लोगों ने भीतर से भी नरसिम्हाराव का विरोध किया था, लेकिन वह बहुत दूर तक जा नहीं पाया था। खुद अर्जुन सिंह बाबरी मस्जिद गिराए जाने में नरसिम्हाराव की संदिग्ध भूमिका के खिलाफ इस्तीफा देने का हौसला नहीं जुटा पाए थे। 

लेकिन अब ऐसा लगता है कि मणिशंकर अय्यर जो बात नरसिम्हाराव के बारे में बोल रहे हैं, वह आज भी कांग्रेस के बहुत से नेताओं पर लागू हो रही है। वैसे भी कांग्रेस का इतिहास बताता है कि उसके भीतर हिन्दूवादी ताकतों का एक बड़ा जमावड़ा सर्वोच्च स्तर पर था, और मदन मोहन मालवीय से लेकर राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद तक बहुत से लोग नेहरू की असहमति के बावजूद हिन्दू रीति-रिवाजों को औपचारिक बढ़ावा देते रहते थे। आजादी के तुरंत बाद का वह दौर कुछ अलग इसलिए था कि उस वक्त नए भारत के निर्माण की चुनौती थी, और लोग तरह-तरह की विचारधाराओं के साथ भी तालमेल बिठाने के आदी थे। गांधी और नेहरू कांग्रेस के भीतर भी कई किस्म की असहमति और विरोध झेलते थे, जिसमें कट्टर हिन्दूवादी नेता भी थे। 

1992 में प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हाराव पर यह तोहमत लगी थी कि उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराने को मौन सहमति दी थी। आज भारत के कई प्रदेशों में कांग्रेस के नेता जिस हद तक हिन्दुत्ववादी हो गए हैं, आज अगर 6 दिसंबर 1992 का दिन आए, तो कांग्रेस नेता घर नहीं बैठे रहेंगे, उनमें से बहुत से अयोध्या में सब्बल-कुदाली लिए हुए दिखेंगे। देश की राजनीति में भाजपा जिस फौलादी पकड़ से हिन्दुत्व को जकडक़र रखना चाहती हैं, वैसे ही फौलादी हाथों से बहुत से कांग्रेस नेता धर्मनिरपेक्षता को दूर धकेल भी रहे हैं। देश के कई बड़े कांग्रेस नेता इस बात में भी कामयाब हो गए हैं कि वे प्रियंका गांधी सरीखी प्रमुख कांग्रेस नेता को पूरी तरह से हिन्दुत्व की छत्रछाया में ले जा चुके हैं। अब भाजपा से चुनावी मुकाबले की यह हिन्दूवादी रणनीति कितनी कामयाब होती है, यह आने वाले चुनावों के नतीजों के विश्लेषण से पता चलेगा, लेकिन आज मणिशंकर अय्यर कांग्रेस के भीतर गिने-चुने नेताओं में से रह गए हैं जो कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ खुलकर बात करने से परहेज नहीं करते। हो सकता है कि भाजपा के लिए वे कांग्रेसी कैम्प में एक पसंदीदा काम कर रहे हों, लेकिन हमारा यह भी मानना है कि चुनावी जीत-हार से परे बुनियादी मुद्दों पर नेताओं और पार्टियों की सोच सार्वजनिक रहनी चाहिए, और पारदर्शी रहनी चाहिए। अगर वोट पाने के लिए झूठ बोलना और सच को छुपाना जरूरी हो, तो हम उसके हिमायती नहीं हैं। मणिशंकर अय्यर आज 1992 के कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के बारे में जो बोल रहे हैं, वो आज के किन कांग्रेस नेताओं के बारे में 25 बरस बाद बोला जाएगा, यह सोचने की बात है। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अगस्त, 2023



 

कोई मूर्ख और मूढ़ देश ही ऐसी कोचिंग जारी रखेगा..

 29 अगस्त 2023  

  

राजस्थान के कोटा में बड़े कॉलेजों में दाखिले की तैयारी करते बच्चों में से इस बरस अब तक रिकॉर्ड संख्या में बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं। राजस्थान सरकार पिछले कुछ वक्त से इस खतरे को देखते आ रही थी, और अभी हफ्ते-दस दिन पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कोचिंग सेंटरों को चेतावनी भी दी थी कि वे इतना तनाव खड़ा न करें कि बच्चे थककर जिंदगी दे दें। उन्होंने यह भी कहा था कि कोचिंग सेंटर खुद ही फर्जी किस्म की स्कूलें चलाते हैं जहां बिना पढ़ाई के बच्चों को हाजिरी दे दी जाती है ताकि वे स्कूली इम्तिहान किसी तरह से पास कर लें, और पूरा ध्यान आईआईटी या नीट जैसी  दाखिला-इम्तिहान को पास करने में लगाएं। पिछले चौबीस घंटे में कोटा में दो और आत्महत्याएं हो गईं, और साल की शुरुआत से अभी तक ये बीस हो चुकी हैं। देश का कोचिंग अड्डा कहा जाने वाला राजस्थान का कोटा एक भयानक जगह हो गया है जहां पर आत्महत्याएं तो खबरों में आ जाती हैं लेकिन डिप्रेशन के शिकार होने वाले और बच्चों की गिनती किसी पैमाने पर नहीं हो पाती है। मां-बाप अपनी महत्वाकांक्षा के चलते, या बच्चों के कहे हुए भी उन्हें कोटा भेज देते हैं जहां कोचिंग का ऐसा कारखाना चलता है जिसकी शोहरत बच्चों को मेडिकल या इंजीनियरिंग में पहुंचा देने की है, और इसके लिए बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर जितने किस्म के जुल्म ढाने रहते हैं, उनमें से किसी से भी परहेज नहीं किया जाता। राजस्थान के कोटा नाम के कोचिंग-उद्योग का डरावना सच यह है कि पिछले दस बरस में 160 से अधिक बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं, पिछले एक साल में 29 बच्चे जो कि 10 बरस के औसत से बहुत ज्यादा है, और पिछले 8 महीने में 22 बच्चे, और पिछले 11 दिनों में 4 बच्चे खुदकुशी कर चुके हैं। इस तरह कोटा कोचिंग सेंटर नहीं, सुसाइड केपिटल बन गया है। 

अभी हमने कुछ अरसा पहले ही, तमिलनाडु के एक ऐसे पिता-पुत्र की आत्महत्या पर इसी जगह पर लिखा था जिसमें बेटे को नीट की लिस्ट में जगह नहीं मिल पाई थी, बाप ने एक और कोचिंग सेंटर में उसकी फीस जमा कर दी थी, लेकिन लडक़े ने खुदकुशी कर ली, और उसके अँतिम संस्कार के बाद बाप ने भी खुदकुशी कर ली। हिन्दुस्तान में स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई किनारे धर दी जाती है क्योंकि उसके नंबरों से कहीं दाखिला नहीं मिलता। अब तो इंजीनियरिंग और मेडिकल, कानून और मैनेजमेंट हर बड़े कोर्स के लिए अलग से दाखिला-इम्तिहान होते हैं, और स्कूल-कॉलेज की नियमित पढ़ाई सिर्फ वहां की परीक्षा पास करने के लिए है जिससे आगे कुछ नहीं मिलता। नतीजा यह हुआ है कि पढ़ाई खत्म हो गई है, और दाखिले के मुकाबले की तैयारी ही सब कुछ रह गई है। अभी कोटा में इन दो आत्महत्याओं के तुरंत बाद राजस्थान के कुछ मंत्रियों ने भी कोचिंग के खिलाफ बयान दिए हैं। एक मंत्री ने तो कहा है कि पूरे देश में कोचिंग बैन होनी चाहिए, और प्रधानमंत्री को ऐसी एक नीति लागू करनी चाहिए कि देश में कोई कोचिंग न हों। कुछ दूसरे मंत्रियों ने जोर डाला है कि राज्य सरकार ने जैसा कहा है उसके मुताबिक कोटा में अगले दो महीने कोई टेस्ट नहीं होने चाहिए। मुख्यमंत्री ने कोचिंग सेंटरों से कहा था कि वे 9वीं और 10वीं के बच्चों की भी कोचिंग शुरू कर देते हैं जिसकी वजह से उनके ऊपर अंधाधुंध अतिरिक्त दबाव पड़ता है। उन्हें बोर्ड की परीक्षा भी देनी होती है, और कोचिंग की तैयारी भी। उन्होंने कहा कि कोचिंग में आते ही छात्रों का फर्जी स्कूलों में दाखिला दिया जाता है, और तैयारी ऐसी करवाई जाती है कि मानो आईआईटी कोई ईश्वर हो। राजस्थान प्रशासन ने कोटा में रहने वाले बच्चों के कमरों में लगे हुए छत के पंखों में ऐसे स्प्रिंग लगवाए हैं कि कोई उस पर फांसी लगाने की कोशिश करे तो पंखा ही नीचे आ जाए, वहां ऊंची इमारतों में जहां बच्चे रहते हैं, वहां बाल्कनी में जालियां लगवाई जा रही हैं। 

वह देश बहुत मूढ़ और मूर्ख है जो कि किसी दाखिला-इम्तिहान के मुकाबले को बुनियादी पढ़ाई से अधिक महत्व देता है। भारत में स्कूल-कॉलेज में बच्चों को अपने विषय की पढ़ाई की फिक्र नहीं रहती, आगे की एंट्रेंस-एग्जाम की तैयारी में उन्हें झोंक दिया जाता है। बचपन से ही मां-बाप गिने-चुने चार-छह किस्म के कोर्स अपने दिमाग में बिठाकर रखते हैं, और बच्चों के दिमाग पर यह दबाव बनाकर चलते हैं कि उन्हें आगे चलकर क्या बनना है। नतीजा यह होता है कि मां-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए, या कुछ मामलों में बच्चे अपनी हसरत से भी ऐसे कोर्स में जाने की कोशिश करते हैं, या पहुंच जाते हैं, जो कि न तो उनके मिजाज का होता, न ही उनकी क्षमता का। ऐसे में दाखिला-इम्तिहान की तैयारी में, या पढ़ाई के दौरान वे खुदकुशी करने लगते हैं। यह भी मानकर चलना चाहिए कि खुदकुशी करने वाले एक बच्चे के मुकाबले ऐसे हजारों बच्चे और रहते होंगे जो कि बहुत बुरी तरह के डिप्रेशन के शिकार हो जाते होंगे या हीनभावना के शिकार हो जाते होंगे। ऐसा होने पर उनकी जो स्वाभाविक क्षमता है, वह भी धरी रह जाती होगी, और वे समाज के लिए, परिवार के लिए उतने उत्पादक भी नहीं रह जाते होंगे। 

अभी कुछ दिन पहले ही इसी विषय पर लिखते हुए यह सुझाया था कि देश में शिक्षा नीति ऐसी रहनी चाहिए जो कि स्कूल की न्यूनतम जरूरी पढ़ाई के बाद बच्चों का रूझान और उनकी क्षमता देखकर उन्हें ऐसे प्रशिक्षण मुहैया कराए जो कि उन्हें जिंदगी में उत्पादक काम करने का हुनर दें। हर किसी को किताबी पढ़ाई देना भी उनकी जिंदगी के लिए एक बोझ हो जाता है क्योंकि उसके बाद वे मेहनत-मजदूरी के, या मशीन-औजार के कोई काम करने लायक नहीं रह जाते। इसलिए इस देश में हर किसी को किताबी पढ़ाई देना जरूरी नहीं है। स्कूल के बाद बहुत से लोगों को सीधे कामकाज के प्रशिक्षण में ले जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि पूरे देश से कोचिंग की व्यवस्था ही खत्म करनी चाहिए क्योंकि यह समाज में गैरबराबरी पैदा करती है, और इससे गरीब बच्चों के आगे बढऩे की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं, और महंगी कोचिंग पा सकने वाले बच्चे बड़े संस्थानों में दाखिला पाने की अधिक संभावना पा जाते हैं। कोटा की ताजा आत्महत्याएं देश को सोचने का एक मौका दे रही हैं कि वह एक सभ्य और समझदार देश की तरह अपने बच्चों को कोचिंग के कारखानों में भेजना बंद करे, और स्कूल-कॉलेज को मुकाबले की जगह बनाने के बजाय ज्ञान और समझ की जगह बनाएं।  

(Daily Chhattisgarh)

 

पुतिन और वाग्नर ग्रुप से लोकतंत्रों को गैरकानूनी काम से बचने की नसीहत

 28 अगस्त 2023  

  

यूक्रेन पर हमला करने के बाद अब रूस बड़ी अजीब नौबतों से गुजर रहा है। यूक्रेन पर फतह कुछ हफ्तों का मामला लग रही थी, लेकिन अब उसे सवा साल हो चुका है, और रूसी सेना ने बहुत जख्म खाए हैं, और बड़ी शिकस्त भी झेली है। दुनिया की एक महाशक्ति पड़ोस के छोटे से देश को निपटा नहीं पाई, और रूस के खिलाफ यूक्रेन के साथ सैनिक गठबंधन नाटो के देश जिस हद तक एक हो गए हैं, उसने रूस के साथ-साथ खुद नाटो देशों को भी चौंका दिया है। लोगों को यह लग रहा है कि यूक्रेन के बाद अगली बारी किसी भी नाटो देश की हो सकती है, और उस हालत में गठबंधन के संविधान के मुताबिक तमाम देशों को रूस के खिलाफ टूट पडऩा होगा। इसलिए आज लोग यूक्रेन का साथ देकर रूस के खिलाफ एक प्रॉक्सी लड़ाई भी लड़ रहे हैं, ताकि रूस खोखला होते चले, और नाटो देशों में ताबूत न लौटें। ऐसी नौबत के बीच अभी कुछ अरसा पहले जब रूस के लिए यूक्रेन में जंग लड़ता भाड़े पर सैनिक तैनात करने वाला एक संगठन वाग्नर ग्रुप रूसी फौजी जनरलों के रवैये के खिलाफ बगावत पर उतर आया, और उसने एक रूसी शहर पर कब्जा कर लिया, और राजधानी मास्को की तरफ फौजी कूच कर दिया, तो यह रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के लिए बड़ी शर्मिंदगी की बात थी। कुछ रहस्यमय वजहों से वाग्नर की बगावत एक दिन से ज्यादा नहीं चली, और उसी दिन से यह माना जाने लगा था कि अब इस मिलिट्री ग्रुप का मुखिया येवेगनी प्रिगोझिन एक चलती-फिरती लाश है। वह जिंदा जरूर था, लेकिन पुतिन के विरोधियों की तरह उसकी जिंदगी के दिन भी बहुत गिने-चुने माने जा रहे थे। और हुआ भी वही, अभी वह एक निजी विमान में अपने फौजी गिरोह के और लीडरों के साथ मास्को आ रहा था, और पहुंचने के ठीक पहले एक विस्फोट में विमान के तमाम दस लोग खत्म हो गए। रूस और बाकी दुनिया में जानकार लोग इसे पुतिन स्टाइल की सजा करार दे रहे हैं। लेकिन अभी एक सवाल उठ खड़ा हुआ है कि वाग्नर ग्रुप के सैनिक न सिर्फ यूक्रेन के मोर्चे पर हैं, बल्कि वे अफ्रीका के कई देशों में वहां की सरकारों की फौज को मदद करने के लिए और बागियों के खिलाफ लडऩे के लिए भाड़े पर चल रहे हैं, और खदानों का कारोबार भी कर रहे हैं। अब खबर है कि पुतिन ने वाग्नर ग्रुप के सभी सैनिकों को रूस के प्रति वफादारी के हलफनामे पर दस्तखत करने कहा है, क्योंकि इनमें से बहुत से लोग अपने मुखिया प्रिगोझिन की संदिग्ध मौत का बदला लेने की धमकी दे रहे थे। 

हमारी रूस के घरेलू मामलों में इतनी दिलचस्पी नहीं हैं कि हम उस पर यहां लिखते, लेकिन हमारा हमेशा यह मानना रहता है कि दुनिया के देशों को एक-दूसरे से सीखना चाहिए। हर देश के हालात अलग हो सकते हैं, लेकिन बहुत से देशों के सबक दूसरों के लिए काम आ सकते हैं। ऐसा ही कुछ रूसी राष्ट्रपति और भाड़े की इस फौज के बीच की खतरनाक नौबत को लेकर है। पुतिन ने अपने करीबी समझे जाने वाले प्रिगोझिन को रूसी सरकार के इतने कारोबार दिए थे कि उसे पुतिन का एक सबसे करीबी व्यक्ति माना जा रहा था। लेकिन रूस की जमीन पर काम करते हुए, रूस की जमीन से परे दूसरे देशों में फौजी और मवाली सर्विस देते हुए वाग्नर अपने आपमें एक अलग किस्म का कानून बन गया था, और वह पुतिन के काबू से परे भी बहुत सी चीजों में शामिल था। ऐसे में यूक्रेन के मोर्चे पर जब उसका रूसी फौजी जनरलों से जंग की रसद और सामानों को लेकर झगड़ा हुआ, तो वह रूसी सरकार पर ही चढ़ बैठा था। यह बात लोगों को याद रखनी चाहिए कि संविधान से परे जब लोग गैरकानूनी संगठन खड़े करते हैं, तो वे संगठन किसी दिन बनाने वाले के लिए आत्मघाती भी साबित हो सकते हैं। ऐसे संगठन चाहे फौजी हों, चाहे साम्प्रदायिक हों, चाहे एक वक्त के उत्तर भारत के जातिवादी संगठन हों जो कि अलग-अलग वर्गों की सेनाओं की तरह काम करते थे, और परले दर्जे का खूनखराबा करते थे। जो लोग कानून से परे जाकर ऐसी ताकतें खड़ी करते हैं, वे ऐसी ताकतों के हाथ मरने का खतरा भी उठाते हैं।  हमने बगल के पाकिस्तान में भी देखा है कि वहां जिस तरह से हिन्दुस्तान के खिलाफ खड़ा करने के लिए फौज को अरातकता की हद तक बढ़ावा दिया गया, उससे पाकिस्तान में कई बार फौजी तानाशाही आई, और आज भी माना जाता है कि वहां की निर्वाचित नागरिक सरकार फौज की पसंद-नापसंद पर आती-जाती है। दुनिया के अलग-अलग देशों में संविधान से परे के ऐसे हथियारबंद संगठन कब अपने ही बनाने वाले लोगों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, इसका अंदाज भी नहीं लगता। अमरीका का तजुर्बा यह है कि जिस सीआईए को अमरीका ने दुनिया के दूसरे देशों में गैरकानूनी तरीके से सरकारें पलटने के लिए खड़ा किया, और इस्तेमाल किया, उस सीआईए ने घरेलू राजनीति में भी दखल देना शुरू कर दिया था। हमने भारत में, और यहां के कई राज्यों में देखा है कि जब किसी एजेंसी को, या कुछ अफसरों को संविधान से परे के अघोषित हक देकर इस्तेमाल करना शुरू किया जाता है, तो ये संगठन और अफसर अराजक होने लगते हैं, और अपने को ताकत देने वाले हाथों को ही कैद करने की हद तक चले जाते हैं। इसलिए संविधान के तहत काम करने वाली संस्थाएं, और कानूनी दायरे में रखे गए अफसर हमेशा ही अधिक महफूज होते हैं क्योंकि वे जवाबदेह होते हैं। 

आज हिन्दुस्तान में जिस तरह हिंसक साम्प्रदायिक संगठनों को सत्ता की राजनीति में गैरकानूनी हद तक बढ़ावा दिया जा रहा है, उससे लोकतंत्र तो खतरे में आ ही चुका है, उनके आज के आका भी कब उनके निशाने पर आ जाएंगे, यह साफ नहीं है। हिन्दुस्तान में ही मिजोरम एक ऐसा राज्य था जहां तकरीबन तमाम आबादी ईसाई है, और वहां पर यंग मिजो एसोसिएशन नाम का एक संगठन धार्मिक आधार पर बना था, और वह राज्य में नशाबंदी लागू करने जैसे कई कामों में सरकार की मदद करता था। लेकिन वह कानून के प्रति जवाबदेह नहीं था क्योंकि उसका कोई कानूनी दर्जा नहीं था, नतीजा यह हुआ था कि वह चर्च के मातहत काम करते हुए पूरी तरह अराजक हो गया था, और सार्वजनिक हिंसा के काम करने लगा था, नैतिकता के पैमाने लागू करने लगा था, और चौराहों के खम्भों पर लोगों को बांधकर पीटने भी लगा था। उससे सरकार खुश थी कि उसकी वजह से राज्य में नशाबंदी कामयाबी से लागू हो रही है, लेकिन ऐसे अराजक संगठन खुद अपनी सरकार के लिए सरदर्द और खतरा बन जाते हैं। 

पुतिन और वाग्नर ग्रुप का यह तजुर्बा यह साफ करता है कि सरकारों को अराजक और असंवैधानिक तौर-तरीकों से बचना चाहिए, चाहे यह रूस की तरह की तानाशाही वाली व्यवस्था हो, या फिर पश्चिमी लोकतंत्र हों, या फिर एक धर्मराज की तरफ बढ़ता हुआ हिन्दुस्तान हो। 

(Daily Chhattisgarh) 

...चौथाई सदी पहले दूध पीने वाले गणेश का नया अवतार फेसबुक पर

 27 अगस्त 2023

 

फेसबुक पर समझदार लोगों के लिए इन दिनों थकाने वाला सिलसिला चल रहा है। अनगिनत लोग लगातार यह पोस्ट कर रहे हैं कि उन्होंने फेसबुक को अपनी तस्वीरों या अपनी पोस्ट के इस्तेमाल का कोई हक नहीं दिया है। एक बना-बनाया ड्राफ्ट है जिसे सारे लोग एक-दूसरे के पेज से लेकर पोस्ट किए चले जा रहे हैं, और बहुत से जानकार और समझदार लोग इसे बता रहे हैं कि यह सिर्फ अफवाह है, इससे फेसबुक के साथ उनका कानूनी संबंध नहीं बदलता। लेकिन लोग हैं कि ऐसा एक नोटिस पोस्ट करके वे मान ले रहे हैं कि फेसबुक उनकी नीजता में कोई दखल नहीं दे सकता। इस पोस्ट में फेसबुक को लोगों के फोटो, वीडियो, नाम, और मोबाइल नंबर से इस्तेमाल करने से रोका जा रहा है। हड़बड़ी की एक वजह यह भी है कि झूठ फैलाने वाले ने यह भी लिखा है कि कल से फेसबुक का एक नया नियम चालू हो रहा है, इसलिए तुरंत ही ऐसा नोटिस पोस्ट करना जरूरी है। 

यह सिलसिला कई साल पहले भी चला था, और उस वक्त भी लोगों ने यह बताया था कि यह झूठ है, इससे फेसबुक के कोई भी नियम नहीं बदलते।  कई साल पहले भी ऐसे नोटिस फेसबुक पर आते रहे हैं, और 2012 से ही यह सिलसिला चल रहा है। फेसबुक का मालिकाना हक अब एक बड़ी कंपनी मेटा के तहत आ गया है, लेकिन उससे भी उसके नियम नहीं बदले हैं। दस बरस से चले आ रहे इस फर्जी नोटिस को हिन्दुस्तान के लोग हिन्दी और अंग्रेजी में लगातार पोस्ट किए जा रहे हैं, और बाकी भाषाओं में भी अगर यही हो रहा होगा तो हम उन्हें पढ़ नहीं सकते हैं। 

यह सिलसिला लोगों के धोखा खाने की क्षमता को साबित करता है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि 1995 में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की अफवाह उड़ी थी, और हिन्दुस्तान के कम से कम हिन्दीभाषी इलाकों में 21 सितंबर 1995 को तमाम हिन्दू लोग लोटा-गिलास में दूध लेकर गणेश प्रतिमाओं तक पहुंचने लगे थे, और चम्मच से उन्हें दूध पिला रहे थे। कुछ दिनों के भीतर सबको यह समझ में आ गया था कि गणेश दूध नहीं पी रहे थे। लेकिन देश के लोगों की धोखा खाने की अपार क्षमता का वह एक टेस्ट था, और जनता उस पर सौ फीसदी खरी उतरी थी। हालत यह हो गई थी कि उस दिन दोपहर-शाम तक विश्व हिन्दू परिषद ने भी इस करिश्मे की घोषणा कर दी थी, और नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ब्रिटेन, जहां-जहां हिन्दू बसे हुए थे, वे सब गणेश प्रतिमा को दूध पिलाने पर आमादा हो गए थे। कई शहरों में मंदिरों के सामने ट्रैफिक जाम हो गया था, और देश की दुकानों से दूध खत्म हो गया था। ऐसे में यह सोच पाना आसान हो गया था कि धर्म के करिश्मे के नाम पर देश को किस तरह झोंका जा सकता है। अब अगर इसे किसी साजिश में इस्तेमाल किया जाए, तो हिन्दुस्तान के बहुत बड़े हिस्से की हिन्दू आबादी मंदिरों में पहुंची हुई थीं, और वहां से कोई अफवाह उड़ाना भी आसान हो जाता, या किसी किस्म की बीमारी का वायरस भी फैलाया जा सकता था। 

अब अगर किसी अपराधकथा के नजरिए से इस नौबत को देखा जाए तो गणेश को दूध पिलाने पर अड़े हुए लोगों की अंधविश्वासी भीड़ को जाति या धर्म की किसी दूसरी अवैज्ञानिक बात में भी उलझाया जा सकता था। कोई साम्प्रदायिक अफवाह फैलाई जा सकती थी, इतनी भीड़ के बीच कोई आतंकी हमला भी किया जा सकता था। हिन्दुस्तान में होली के मौके पर बहुत से लोग केंवाच नाम के एक पौधे की फल्लियों को कहीं बिखरा देते हैं, और उनके संपर्क में आने वाले लोगों के बदन में अंधाधुंध खुजली होने लगती है जो कि आसानी से खत्म नहीं होती। अब यह कल्पना की जाए कि दूध पिलाने वाली भीड़ पर ऐसा कोई हमला करवा दिया जाए, और उसकी तोहमत किसी दूसरे धर्म के लोगों पर जड़ दी जाए तो क्या होगा? 

फेसबुक पर ऐसे झूठ को आगे बढ़ाने वाले लोग भी हो सकता है कि किसी ऑनलाईन सर्वे का सामान बन गए हों, जिनसे कोई अंतरराष्ट्रीय एजेंसी यह नतीजा निकाल रही हो कि अफवाहों पर आसानी से कौन भरोसा करते हैं, कौन लोग अपनी तर्कशक्ति का इस्तेमाल नहीं करते हैं, और फिर ऐसे लोगों को ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से अलग-अलग तबकों मेें बांटकर उसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
 
इसे इस तरह समझने की जरूरत है कि जो लोग फेसबुक के नाम पर फैलाए गए एक झूठ को आसानी से मान रहे हैं, वे लोग किसी राजनीतिक या साम्प्रदायिक झूठ पर भी जल्दी भरोसा कर सकते हैं। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस उनकी पोस्ट देखकर उन्हें, जाति, धर्म, संस्कृति, राजनीति जैसे कई तबकों में बांट सकता है, और फिर जब कोई नफरत फैलानी हो, लोगों को किसी साजिश में झोंकना हो, तो फिर सीधे ऐसे ही लोगों को एक झूठ भेजकर उन्हें सीधे जोड़ा जा सकता है क्योंकि यह बात तो दिख चुकी है कि ऐसे लोग झूठ पर भरोसा भी कर लेते हैं, और सोचे-समझे उसे आगे भी बढ़ा देते हैं।
 
आज पूरी दुनिया में ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है, क्योंकि यह सोशल मीडिया पर लोगों की सोच का अध्ययन करके उनके अलग-अलग समूह बना सकता है, और उनकी राजनीतिक सोच को प्रभावित कर सकता है, चुनाव में किसी पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में लोगों को बड़ी संख्या में मोड़ सकता है। कई देशों में इतने असर से चुनावी जीत-हार में जमीन-आसमान का फर्क पड़ सकता है। यह लिखते हुए हमारी जानकारी इस बारे में नहीं है, लेकिन यह बिल्कुल मुमकिन हो सकता है कि अमरीका और भारत जैसे बड़े देश जहां पर दसियों करोड़ लोग सोशल मीडिया पर हैं, वहां पर जनमत प्रभावित करने की ऐसी साजिशें तैयार हो चुकी हों, और उन पर अमल भी हो रहा हो। और हो सकता है कि फेसबुक को लेकर यह ताजा अफवाह वेबकूफों की शिनाख्त करने के लिए गढ़ी गई हो, और अब ऐसे लोग आगे जनमत प्रभावित करने की साजिशों में इस्तेमाल किए जाएंगे। 

ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और सोशल मीडिया के अकल्पनीय असर के इस दौर में लोगों को सावधान रहना अगर मुमकिन न भी हो तो भी उन्हें ऐसी साजिशों के बारे में मालूम होना चाहिए। इसके बिना वे एक ऐसी सरकार पा सकते हैं जो कि वे सामान्य रूप से न चाहते रहे हों। 

(Daily Chhattisgarh)

शिक्षिका की साम्प्रदायिकता किसी समझौते लायक नहीं, सख्त कानूनी कार्रवाई जरूरी

 27 अगस्त 2023  

  

बहुत से काम अच्छी नीयत से किए जाते हैं, या कम से कम वे अच्छी नीयत से किए हुए कहे जा सकते हैं, बताए जा सकते हैं। लेकिन इनमें से कुछ काम अपने मकसद से ठीक उल्टा भी कर सकते हैं। अब कल जैसे मुजफ्फरनगर में स्कूल में मुस्लिम बच्चे को टीचर के कहे हुए पीटने वाले हिन्दू बच्चों को किसान नेता नरेश टिकैत ने वहां जाकर पीटने वाले के गले लगवाया, और यह कहा कि बच्चों के मन में एक-दूसरे के लिए नफरत नहीं रहनी चाहिए। पहली नजर में उनका यह काम बड़ा सद्भावना का लगता है कि दोनों समुदायों में कोई नफरत न फैले। लेकिन दूसरी तरफ इसे एक अलग नजरिए से भी देखने की जरूरत है। देश में मुस्लिम राजनीति करने वाले सबसे चर्चित सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कल से ही मुजफ्फरनगर की क्लासरूम हिंसा को लेकर बयान देना शुरू किया था, अब उन्होंने टिकैत पर भी निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि नरेश टिकैत तो इस प्रिंसिपल के खिलाफ एफआईआर खत्म करने की बात कर रहे हैं, वह नरेश टिकैत की क्या लगती है, बहन, या कोई करीबी दोस्त? उन्होंने पूछा कि अगर टिकैत के बेटे या पोते को स्कूल में इस तरह पीटा जाता तो वह क्या करते? उन्होंने टिकैत से पूछा- अगर आप किसानों की लड़ाई लड़ते हैं, तो क्या इंसानियत की लड़ाई नहीं लड़ेंगे? भारत के संविधान में गरिमा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। इसके पहले ओवैसी ने कल ही लिखा था कि भारतीय मुसलमानों को उसी उत्पीडऩ और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है जैसा कि 1930 के दशक में जर्मनी में हिटलर के हाथों यहूदियों को झेलना पड़ा था। ओवैसी ने मोदी से भी यह सवाल किया था कि इस मुस्लिम बच्चे के पिता को मालूम है कि योगीराज में इंसाफ नहीं मिलेगा, इसलिए वह रिपोर्ट नहीं लिखा रहा था। उन्होंने सीएम योगी आदित्यनाथ से सवाल किया था कि अब उनकी बुलडोजर और ठोक दो नीति का क्या हुआ? 

अब कुछ दूसरी खबरें फिक्र पैदा करती हैं कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के हुक्म के बाद भी किसी देश की सरकार किस तरह उसे धता बता सकती है। यूपी में योगी की पुलिस ने इस स्कूल संचालिका के खिलाफ जो मुकदमा दर्ज किया है उसमें किसी धर्म के खिलाफ कुछ करने का कोई जिक्र नहीं है। और यह बात भी तब है जबकि उसके वीडियो चारों तरफ फैले हुए हैं जिन्हें कि सुप्रीम कोर्ट अब तक देख चुका होगा। देश की सबसे बड़ी अदालत की नजरों के सामने अगर उसके हुक्म के खिलाफ पुलिस इतने धड़ल्ले से काम करती है, तो उन तमाम नौबतों की तो कल्पना ही की जा सकती है जो जहां तक अदालत की नजरें पहुंचती नहीं हैं, और जो मामले वीडियो-कैमरों से परे होते हैं। नफरती हिंसा के मामले में कार्रवाई के लिए मुजफ्फरनगर का यह मामला एक मिसाल बन सकता था, लेकिन अगर टिकैत के बीच-बचाव की कोई पहल इस कार्रवाई को खत्म करवाने की शर्त के साथ हो रही है, तो यह इंसाफ के खिलाफ बात है। नफरती और साम्प्रदायिक आतंकी हिंसा का यह मामला किसी समझौते या माफी के लायक नहीं है। यह तो एक ऐसी मिसाल है जिस पर अदालत की सबसे सख्त कार्रवाई एक नजीर पेश कर सकती है जो कि बाकी देश के लिए भी एक सबक और नसीहत हो सकती है। हमारा ख्याल है कि सद्भावना के लिए ऐसा कोई बीच-बचाव जायज नहीं है जो कि ऐसी नफरती हिंसा को माफी दिलवा दे। हमने कल भी इस जगह लिखा था कि शिक्षिका का काम कर रही यह औरत वहां मौजूद हर एक बच्चे के दिल-दिमाग पर एक हिंसक छाप छोडऩे के जुर्म में बाकी तमाम जिंदगी जेल में रखने के लायक है, और उसके लिए खुली दुनिया में कोई जगह नहीं होना चाहिए। 

यह शर्मनाक बात है कि जो खबर पूरे हिन्दुस्तान में यूपी सरकार को धिक्कार रही है, उस पर अब तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुंह भी नहीं खोला है। आमतौर पर वे ठोक दो, और बुलडोजर की जुबान बोलते हैं, उनकी बात से यह साफ हो जाता है कि वे किस धर्म का राज चाहते हैं, लेकिन लोकतंत्र का लचीलापन यह है कि इसमें उनकी साम्प्रदायिकता पर कोई रोक नहीं लग पा रही है। उत्तरप्रदेश में साम्प्रदायिक भेदभाव का यह पहला और अकेला मामला नहीं है, यह सिलसिला वहां चलते ही आ रहा है। इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट में जरूरत इस बात की है कि यूपी पुलिस को कटघरे में लाया जाए कि उसने इतने साफ-साफ वीडियो और बयानों के बाद भी साम्प्रदायिकता की कोई धारा इस केस में क्यों नहीं लगाई है। हेट-स्पीच के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने इतने कड़े निर्देश दिए हैं, लेकिन उनकी भी कोई परवाह न यूपी पुलिस को दिख रही है, और न ही देश के बहुत से और राज्यों की पुलिस को। छत्तीसगढ़ में साम्प्रदायिक हत्याओं के बाद बस्तर में खुलेआम विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा के नेताओं ने सडक़ पर लाउडस्पीकर पर राम की कसम खाकर तमाम मुस्लिम कारोबारियों का बहिष्कार करने की कसम खाई, और छत्तीसगढ़ पुलिस ने आज तक उस पर कोई जुर्म कायम नहीं किया क्योंकि सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के लिए वह हिन्दू बहुल प्रदेश में मतदाताओं के बीच घाटे का काम हो सकता था।
 
अब सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि हेट-स्पीच पर अपने जुबानी जमा-खर्च से परे अपना एक कमिश्नर नियुक्त करे जो कि देश के जाने-माने, साख वाले धर्मनिरपेक्ष लोगों की मदद से पूरे देश से हर दिन ऐसी जानकारी इकट्ठी करे जो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ है। और हर महीने अदालत को ऐसी रिपोर्ट पर कार्रवाई करनी चाहिए। अब जब देश की दोनों बड़ी पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस, हिन्दू वोटों की राजनीति कर रही हैं, तो अदालत से ही उम्मीद रह जाती है। सुप्रीम कोर्ट को देश की धर्मनिरपेक्षता के लिए न सही, कम से कम अपने अनगिनत आदेशों की इज्जत के लिए ऐसा एक जांच कमिश्नर तुरंत बनाना चाहिए, जिसके पास देश भर से सुबूतों सहित शिकायतें आ सकें, और सरकारों से जवाब-तलब हो सके। 

फिलहाल मुजफ्फरनगर का यह मामला किसी भी किस्म के समझौते का मामला नहीं है, यह एक शिक्षिका और एक बच्चे के बीच का मामला भी नहीं है, यह देश की धर्मनिरपेक्षता का मामला है, और उसे बेचकर समझौता करने का हक न तो इन दोनों पक्षों को है, और न ही टिकैत सरीखे किसी सद्भावना वाले मध्यस्थ को। इस मामले को इस परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए कि एक गरीब मुस्लिम परिवार उत्तरप्रदेश में हिन्दू-साम्प्रदायिकता के खिलाफ भला कितनी शिकायत करने का हौसला दिखा सकता है? 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2023


 (Daily Chhattisgarh)

मुस्लिम बच्चे से स्कूल में यह सुलूक धार्मिक आतंकी हिंसा के अलावा कुछ नहीं

 26 अगस्त 2023  

  

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की एक निजी स्कूल का वीडियो इस देश के लिए शर्म से डूब मरने का पर्याप्त सामान हैं। इस लोकतंत्र में साम्प्रदायिक हिंसा का जो नया पैमाना तय हुआ है, वह देखने लायक है। जहां तक देश-प्रदेश की सरकारों का सवाल है, तो यह एक नया नवसामान्य है कि अल्पसंख्यकों को किस हद तक मारा जा सकता है, किस हद तक उनका मनोबल तोड़ा जा सकता है। इस वीडियो में स्कूल चलाने वाली उसकी मालकिन, एक हिन्दू टीचर एक मुस्लिम बच्चे की पिटाई करवाती है, क्लास में मौजूद बाकी तमाम हिन्दू बच्चों से। साथ-साथ वह मुस्लिम समाज के लिए आपत्तिजनक और अपमानजनक बातें कहती जाती हैं, और वीडियो से आती आवाज से यह भी समझ आता है कि वहां पर कोई एक पुरूष भी मौजूद है। यह शिक्षिका मुस्लिम बच्चे को खड़ा रखती है, और हिन्दू बच्चों को बुला-बुलाकर उनसे इसे पिटवाती हैं। मुस्लिमों के लिए उसकी नफरत इस हरकत से और परे उसकी जुबान से भी जहर की तरह बरसती रहती है। उत्तरप्रदेश की इस स्कूल के बारे में जिले के अफसर बतलाते हैं कि बच्चे का पिता शिकायत करेगा उसके बाद ही एफआईआर दर्ज हो सकेगी। बाद में अभी दोपहर के करीब खबर आ रही है कि पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की है। दूसरी तरफ बच्चे का मुसलमान पिता कहता है कि न तो वो बच्चे को उस स्कूल भेजना चाहता, और न ही टीचर के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाना चाहता, वह कहीं शिकायत नहीं करेगा। जाहिर है कि योगी आदित्यनाथ के उत्तरप्रदेश में किसी मुसलमान की इतनी हिम्मत हो भी नहीं सकती कि वह एक हिन्दू के खिलाफ मुस्लिम बच्चे को प्रताडि़त करने की रिपोर्ट दर्ज करा सके, क्योंकि उसके बाद उसका जो हाल होगा, वह उसने कई दूसरे लोगों के मामलों में देखा-सुना होगा। 

अब सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट जिस हेट-स्पीच पर अफसरों को मुकदमा दर्ज करने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहरा रहा है, वह जिम्मेदारी इस मामले में कहां गई है? यह न सिर्फ साम्प्रदायिक नफरत फैलाने की बात है, बल्कि एक बच्चे के खिलाफ टीचर और दर्जनों बच्चों का आतंक भी है, और यह साफ-साफ एक साम्प्रदायिक आतंकी घटना है। साम्प्रदायिक आतंकी हिंसा के लिए बंदूकें और फौजी वर्दियां नहीं लगतीं, क्लास के तमाम बच्चों के बीच साम्प्रदायिक नफरत फैलाकर, अपनी निगरानी में अपने हुक्म से बच्चों से हिंसा करवाना, किसी एक बच्चे को अकेला करके उसे धार्मिक आधार पर पिटवाना, यह साम्प्रदायिक आतंकी हिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। तृप्ता त्यागी नाम की यह टीचर बच्चों को फटकारती है कि वे पर्याप्त जोर से नहीं मार रहे हैं, और अधिक जोर से मारें। अकेला खड़ा मुस्लिम बच्चा मार खा-खाकर रो रहा है। इस टीचर पर इसके तहत लगने वाले तमाम कानून तो इस्तेमाल होने ही चाहिए, इनके अलावा क्लास के दर्जनों बच्चों को नफरत सिखाना, उनसे हिंसा करवाना, इसके भी अलग-अलग मामले उस पर चलने चाहिए, और हमारा ख्याल है कि एक-एक बच्चे को साम्प्रदायिक हिंसा में उतारने के जुर्म में उसे अलग-अलग सजा होनी चाहिए जो कुल मिलाकर उसकी पूरी जिंदगी जेल में खत्म करे। जिसे नफरत की हिंसा को इस हद तक फैलाना है, उसे समाज में खुला छोडऩा ठीक नहीं है। 

अब बात जरा उन लोगों की की जाए जिन्होंने संविधान के तहत शपथ ली है, और जिन पर देश में लोकतंत्र, इंसाफ, और नागरिक समानता को जिम्मेदारी है। कल से यह वीडियो सामने है, हमारे हिसाब से सुप्रीम कोर्ट अगर संवेदनशील होता तो कम से कम उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट के एक जज को वहां भेजता जो कि इस बात का प्रतीक होता कि सरकार, और उसकी पिट्ठू पुलिस इंसाफ के अकेले ठेकेदार नहीं हैं, और अगर वे मुजरिमों के गिरोह की तरह काम करते हैं, तो अदालत अभी तक इस मुल्क में जिंदा है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चाहते, तो अब तक यूपी सरकार से इस बारे में जवाब-तलब कर चुके रहते। अगर यूपी के मुख्यमंत्री, भगवा कपड़ों में रहने वाले अपने को संन्यासी बताने वाले योगी आदित्यनाथ अगर संवैधनिक जिम्मेदारी और इंसानियत निभाते रहते, तो वे अब तक इस पर मुंह खोल चुके रहते, और अपने किसी मंत्री को भेज चुके रहते, लेकिन उस प्रदेश में सरकार की नीतियों यह महिला शिक्षिका शायद माकूल बैठती है, इसलिए किसी जायज कार्रवाई की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। अभी दोपहर तक की खबरों के मुताबिक देश की बाल कल्याण परिषद ने इस पर नोटिस जारी किया है, लेकिन उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट, उत्तरप्रदेश मानवाधिकार आयोग, उत्तरप्रदेश बाल आयोग या कल्याण परिषद, अल्पसंख्यक आयोग की कोई खबर नहीं है। संसद में एक तथाकथित हवाई चुम्बन के आरोप को लेकर जो केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद सिर पर उठा लिया था, वे भी अपने चुनाव क्षेत्र वाले उत्तरप्रदेश की इस खबर पर ठीक उसी तरह से आंख, कान, और मुंह बंद करके बैठी हैं जिस तरह से वे मणिपुर में महिलाओं से सार्वजनिक सामूहिक बलात्कार की तस्वीरों, वीडियो, और खबरों पर चुप बैठी थीं। संसद की हवा में उछले एक तथाकथित हवाई चुम्बन के आरोप के साथ स्मृति ईरानी का रौद्र रूप सामने आया था, लेकिन एक मुस्लिम बच्चे को पूरी क्लास से इस तरह पिटवाने को लेकर उनका कोई भी रूप अभी सामने नहीं आया है। 

आज राहुल गांधी से इस बारे में उन्होंने लिखा कि भाजपा का फैलाया केरोसीन है। मासूम बच्चों के मन में भेदभाव का जहर घोलना, स्कूल जैसे पवित्र स्थान को नफरत का बाजार बनाना, एक शिक्षक देश के लिए इससे बुरा कुछ नहीं कर सकता। ये भाजपा का फैलाया वही केरोसीन है जिसने भारत के कोने-कोने में आग लगा रखी है। बच्चे भारत का भविष्य हैं, उनको नफरत नहीं, हम सबको मिलकर मोहब्बत सिखानी है। 

जिन लोगों को देश भर में जगह-जगह यह लग रहा है कि मुस्लिमों को सबक सिखाना है, उन्हें देश में मुस्लिम आबादी के आंकड़े देखने चाहिए। यह समुदाय आबादी के 14 फीसदी से कुछ अधिक है, यानी 20 करोड़ के करीब। 140 करोड़ की आबादी में आज अगर 20 करोड़ मुस्लिम हैं, तो उन मुस्लिमों को सडक़ों पर, स्कूलों में, गांव-देहात में पीट-पीटकर खत्म नहीं किया जा सकता। पल भर के लिए मान भी लें कि सुप्रीम कोर्ट भी इनको बचाने में नाकामयाब है, तो भी देश की करीब सौ करोड़ हिन्दू आबादी के दस-बीस फीसदी हिंसक लोग मिलकर भी 20 करोड़ मुस्लिमों को इतिहास नहीं बना सकते। अगर किसी समाज के छोटे-छोटे बच्चे को इस तरह मारा जाएगा, उसके बूढ़ों को पीट-पीटकर उनकी दाढ़ी मूंडकर उनसे जयश्रीराम कहलवाया जाएगा, तो उससे वह आबादी खत्म नहीं होगी, उसके भीतर एक जवाबी नफरत, और जवाबी बगावत खड़ी होगी, जिसका नतीजा इस देश में गृहयुद्ध की शक्ल में हो सकता है। यह सौ करोड़ आबादी के एक छोटे हिस्से, और 20 करोड़ जख्मी आबादी के बीच अगर नफरती और जहरीले टकराव की नौबत आएगी, तो उससे पूरा देश जल जाएगा, और ऐसे जले हुए देश में सरकारों के पसंदीदा कारोबारियों के कारोबार भी जल जाएंगे। जब सब कुछ जलना शुरू होगा तो वह आज कनाडा और अमरीका के जंगलों की आग की तरह रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के सौ-सौ बार कहने के बाद देश की किसी सरकार को उसकी कोई फिक्र नहीं है, आज वक्त आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट सौ-पचास आईएएस-आईपीएस लोगों को जेल भेजे, तो ही इस देश में नफरत फैलना कुछ धीमा हो सकता है। राजनीतिक दलों में, खासकर कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े राजनीतिक दलों में साम्प्रदायिकता को रोकने की, उसके खिलाफ कार्रवाई करने की कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं रह गई है। खुद राहुल गांधी जो बड़बड़ाते हैं, वह शायद अपनी पार्टी के अधिकतर बड़े और सत्तारूढ़ नेताओं की मर्जी के खिलाफ बोलते हैं। उन्हीं की पार्टी के अधिकतर नेताओं की सोच और उनका चाल-चलन राहुल की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है, भाजपा के बारे में तो कोई चर्चा करने की। अभी तक सुप्रीम कोर्ट या यूपी हाईकोर्ट की कोई ऐसी पहल खबरों में नहीं दिख रही है कि उनके माथे पर मुजफ्फरनगर की इस साम्प्रदायिक आतंकी हिंसा से कोई शिकन आई हो। इस देश का लोकतंत्र  एक गृहयुद्ध की खतरे की तरह बढ़ रहा है। आज जिन साम्प्रदायिक ताकतों को ऐसी हिंसा में बहुत मजा आ रहा है, वे भी जलते हुए देश में सुरक्षित नहीं रहेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के कई देशों में बच्चों के साथ खिलवाड़ करते हुए उनके कान पकड़े, फोटो खिंचाते दिखते हैं, उस बारे में उनके लोगों ने कहा है कि यह बच्चों की एकाग्रता और स्मरणशक्ति बढ़ाने की एक तरकीब है, जिसे दक्षिण के पुराने ग्रंथों में थोप्पुकरणम कहते हैं, इसलिए मोदी ऐसा करते हैं। आज उनका कोई शुभचिंतक उन्हें यह सलाह दे कि यूपी के बच्चे के साथ यह सुलूक देखकर उन्हें अपने कान पकडक़र इसी तरह का थोप्पुकरणम करना चाहिए ताकि उन्हें खुद यह याद रहे कि उन पर देश के तमाम धर्मों के लोगों की जिम्मेदारी है, और लोकतंत्र पर उनकी एकाग्रता बनी रहे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बलात्कारियों के बचाव का नतीजा, देश का झंडा हटा

 25 अगस्त 2023  

  

हिन्दुस्तानी खेलों की दुनिया के लिए एक बुरी खबर है कि कुश्ती की वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारतीय पहलवान भारतीय झंडे के साथ नहीं खेल सकेंगे। भारत में कुश्ती महासंघ के चुनाव न होने की वजह से इस खेल की दुनिया की सर्वोच्च संस्था यूनाईटेड वर्ल्ड रेसलिंग ने भारतीय कुश्ती महासंघ की सदस्यता निलंबित कर दी है। इसके चुनाव लगातार स्थगित होते चले गए, और 7 मई को चुनाव होने थे लेकिन खेल मंत्रालय ने उसे रोक दिया था। 

ऐसा भी नहीं है कि यह बात आसमानी बिजली की तरह आकर गिरी है। अंतरराष्ट्रीय संगठन बार-बार इसके लिए नोटिस देते चल रहा था, और जिस तरह भारतीय कुश्ती महासंघ का अध्यक्ष, भाजपा सांसद, बृजभूषण शरण सिंह महिला खिलाडिय़ों के यौन शोषण के कई मामलों में अदालती कटघरे में हैं, उसे लेकर भी कुश्ती की दुनिया में बेचैनी चल रही थी। यह एक अलग बात है कि पूरी की पूरी केन्द्र सरकार इस भाजपा सांसद को बचाने पर आमादा दिख रही थी, और पहलवान लड़कियां सडक़ों पर पुलिस के हाथ पिट रही थीं। पूरा देश धिक्कार रहा था लेकिन केन्द्र सरकार इस सांसद को बचाने पर अड़ी हुई थी, और सारे संबंधित मंत्रालय, विभाग, और खेल संगठन इतनी सारी खिलाड़ी लड़कियों के आंसुओं को अनदेखा करते हुए इस बाहुबली खेल पदाधिकारी की क्रूर हॅंसी को बढ़ावा दे रहे थे। 

जिन लोगों को देश के गौरव का गुणगान करते हुए हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर भारत की शान का झंडा फहराना रहता है, उन्होंने भी अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों से ओलंपिक से मैडल लेकर आने वाली अपनी लड़कियों की यौन शोषण की शिकायतों को कुचलने के अलावा कुछ नहीं किया। आज हालत यह है कि इस खेल से देश का झंडा छिन गया है, बृजभूषण शरण सिंह की गाड़ी पर तिरंगा जरूर लहरा रहा है। देश भर से न सिर्फ राजनीतिक दलों ने, न सिर्फ महिला संगठनों ने, न सिर्फ खेल संगठनों ने, बल्कि बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोगों ने खुलकर इस बात पर केन्द्र सरकार को लानत भेजी थी, लेकिन केन्द्र पर सत्तारूढ़ भाजपा ने आज तक इस पसंदीदा बाहुबली को एक नोटिस भी नहीं भेजा है। ऐसे में लगता है कि कोई भी खिलाड़ी, कोई भी लडक़ी या महिला इस देश में तभी तक महफूज हैं जब तक उन पर किसी सत्तारूढ़ की नीयत नहीं डोलती, वरना उसके बाद इस देश में कोई ताकत उन्हें नहीं बचा सकती। उत्तरप्रदेश के एक और भाजपा नेता, उन्नाव के भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर का मामला भी सामने है जिसके खिलाफ 2017 में एक नाबालिग से बलात्कार करने का मामला चल रहा था, जिस पर उसे बाद में उम्रकैद हुई, लेकिन वह इस जुर्म के महीनों बाद तक हॅंसता-मुस्कुराता घूमते रहा, और बलात्कार की शिकार लडक़ी के पिता को भी पुलिस हिरासत में मार डाला गया था। इसे भी सेंगर के कहे हुए ही गिरफ्तार किया गया था, और उत्तरप्रदेश में भाजपा सरकार के मातहत इस बलात्कारी भाजपा विधायक की ताकत ऐसी थी कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को उत्तरप्रदेश की जिला अदालत से दिल्ली ट्रांसफर किया था। 

सत्ता के पसंदीदा बलात्कारियों का हिन्दुस्तान में जो सम्मान है उसे देखते हुए इस देश के लोगों से किसी भी देवी की पूजा का अधिकार छिन लेना चाहिए। अभी सुप्रीम कोर्ट में यह मामला चल ही रहा है जिसमें गुजरात की बिलकिस बानो के बलात्कारियों और उसके परिवार के हत्यारों को गुजरात सरकार द्वारा समय से पहले जेल से रियायती रिहाई दी गई है। और कल तो सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई में एक नई जानकारी आई कि छूटे हुए बलात्कारी-हत्यारों में से एक ने वकालत का अपना पेशा फिर शुरू कर दिया है। अदालत ने इस पर पूछा है कि क्या मुजरिम ठहराए जाने के बाद किसी सजायाफ्ता को क्या फिर से वकालत करने का लाइसेंस दिया जा सकता है। अदालत ने कहा कि कानून को एक महान पेशा माना जाता है, और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यह बताना चाहिए कि क्या कोई मुजरिम वकालत कर सकता है? लोगों को याद होगा कि बिलकिस बानो को गुजरात दंगों के दौरान उस वक्त 11 हिन्दुओं ने गैंगरेप का शिकार बनाया, जब वह गर्भवती थी, इन लोगों ने उसकी छोटी सी बच्ची को पटक-पटककर मार डाला था, बिलकिस बानो की मां को मार डाला था, और परिवार के आधा दर्जन लोगों सहित कुल 14 लोगों की हत्या की थी। इन्हें गुजरात सरकार ने केन्द्र की मोदी सरकार की सहमति से समय से पहले जेल से रिहा किया, और उसके लिए यह झूठा तर्क दिया गया कि इनका आचरण अच्छा है इसलिए इन्हें समय-पूर्व रिहाई दी गई, जबकि इनमें से कुछ लोगों के खिलाफ पैरोल पर बाहर आने पर लोगों को धमकाने की शिकायतें पहले से थीं। अब बिलकिस बानो सुप्रीम कोर्ट में खड़ी है, और अदालत ने गुजरात सरकार से पूछा है कि ऐसी रियायत और कितने मुजरिमों को दी गई है, किन्हें दी गई है। 

केन्द्र हो या कोई राज्य, सरकारों का यह रवैया मुजरिमों सरीखा है कि देश के लिए ओलंपिक से मैडल लेकर आने वाली खिलाडिय़ों की यौन शोषण की शिकायतों को अनदेखा करके अपने बाहुबली सांसद को सिर पर बिठाकर रखना। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, यह तो सुप्रीम कोर्ट का दखल था कि दिल्ली पुलिस को मजबूरी में मन मारकर बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ जुर्म दर्ज करना पड़ा, यह एक और बात है कि पुलिस ने इस सांसद की गिरफ्तारी तक नहीं की जबकि उसके खिलाफ आधा दर्जन लड़कियों की रिपोर्ट थी। इस देश की संसद में, और संसद के बाहर सत्तारूढ़ महिला सांसदों का मुंह भी न खिलाडिय़ों के यौन शोषण पर खुला, न मणिपुर में वीभत्स सामूहिक बलात्कार और हत्या पर खुला। यह गजब का पार्टी अनुशासन है कि लोग अपनी इंसानियत भी छोडक़र चुप्पी साधे रखें। इस देश की महिलाओं को मुजरिमों की पार्टी की महिला उम्मीदवारों को घेरकर यह सवाल करना चाहिए कि ये मामले उनकी नजरों के सामने होते रहे, और उन्होंने आंख-कान बंद रखना बेहतर समझा था, तो उन्हें अब वोट क्यों दिया जाए? उनके चुनाव क्षेत्र की किसी महिला से उनकी पार्टी का कोई नेता बलात्कार करेगा, तो उसके खिलाफ भी ये महिला सांसद या विधायक कुछ नहीं करेंगी। जब तक आम लोगों की भीड़ घेरकर ऐसे सवाल नहीं करेगी, तब तक सत्ता पर काबिज लोगों के ऐसे बलात्कार जारी ही रहेंगे। जब तक ऐसे नेताओं, उनकी पार्टियों, और उनके समर्थकों को चुनावों में हराया नहीं जाएगा, तब तक कोई लडक़ी या महिला सुरक्षित नहीं रहेगी। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2023


 (Daily Chhattisgarh)

मौजूदा कानून कमजोर तबकों को बचाने में नाकाफी, नई सोच जरूरी

 24 अगस्त 2023  

   

त्रिपुरा की राजधानी अगरतला का एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक महिला और उसके नाबालिग बेटे को बाजार के बीच सबके सामने कपड़े उतारकर पीटा गया क्योंकि बेटे पर एक दुकान से पैसे चुराने का आरोप लगा था। इसके बाद मां-बेटे को तथाकथित पंचायत में बुलाया गया, और वे जब वहां पहुंचे तो पंचायत के एक सदस्य ने महिला के कपड़े उतारने के लिए भीड़ को उकसाया था, और फिर भीड़ ने उनके कपड़े उतारे, बेटे का सिर मुंड दिया, और दोनों की जमकर पिटाई की। कुछ लोगों ने इसके वीडियो बनाए थे, पुलिस को खबर लगी तो उसने आकर भीड़ से मां-बेटे को बचाया। 

ऐसी घटना जगह-जगह सामने आती है, कहीं गाय को बचाने के नाम पर, तो कहीं अकेले हाथ लग गए किसी मुस्लिम से जयश्रीराम कहलवाने के लिए, तो कहीं किसी दलित से खफा सवर्ण थूककर उससे चटवाने पर उतारू दिखते हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे मामले रहते हैं जिनमें हिंसा करते लोगों को यह पता रहता है कि उनके वीडियो बन रहे हैं, लेकिन उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं दिखती है। कहीं सत्ता तो कहीं जाति, कहीं धर्म तो कहीं संपन्नता की ताकत लोगों में एक अजीब किस्म का दुस्साहस ला देते हैं। फिर पुलिस और अदालत का कोई अधिक डर किसी को दिखता नहीं है। लोग धड़ल्ले से ब्लैकमेल करते हैं, हत्या करते हैं, खुदकुशी को मजबूर करते हैं, और इस भरोसे से रहते हैं कि उनका कुछ बिगड़ेगा नहीं। यह बात काफी हद तक सही  भी है क्योंकि हिन्दुस्तान में पुलिस और अदालत के बेअसर होने का भरोसा अधिकतर आबादी को रहता है, इसलिए लोग उन्हें कोई शिकायत रहने पर भी मन मसोसकर बैठ जाते हैं कि इंसाफ मिलना इतना आसान तो है नहीं। यह भी एक वजह रहती है कि बहुत से लोग गुंडो और मुजरिमों को ठेका देते हैं कि वे उनके जमीन-मकान खाली करा दें, किसी के पास डूब रहा पैसा वापिस दिला दें। कानून एक तो कमजोर बहुत है, दूसरा उसे लागू करने का पूरा ढांचा बुरी तरह से भ्रष्ट है, और बहुत ही कमजोर है। जांच एजेंसियां अदालतों में कुछ साबित नहीं कर पातीं, और सिर्फ मुजरिमों को अदालतों पर भरोसा रहता है कि वहां से उनके खिलाफ कोई फैसला नहीं हो सकेगा। 

ऐसे में देश में अराजकता का एक माहौल बढ़ते चल रहा है। लोग बेधडक़ होकर सडक़ों पर भीड़ की शक्ल में हिंसा कर रहे हैं, और अभी हाल में कानून में जो फेरबदल केन्द्र सरकार ने संसद में पेश किया है उसमें यह बात जोड़ी गई है कि भीड़ अगर किसी वजह से किसी की हत्या करती है तो उस पर सजा और कड़ी कैसे की जाए। ऐसा भी नहीं कि अब तक ऐसी भीड़त्या पर कोई सजा नहीं थी, लेकिन यह तो था ही कि उसका कोई असर नहीं दिखता था, और सरकार की खूबी यह है कि वह पहले से मौजूद और ठीक से इस्तेमाल नहीं हो रहे कानूनों को और कड़ा करके यह तसल्ली कर लेती है कि उसने जुर्म कम करने का इंतजाम कर लिया है। आज अगर भीड़त्या पर सजा बढ़ा दी गई है, तो पहले भी इस पर काफी सजा तो थी ही, और जिन मुजरिमों पर दस बरस की कैद का डर नहीं रहता है, उनसे यह उम्मीद करना कि वे कैद को पन्द्रह बरस कर देने से डर जाएंगे, और जुर्म नहीं करेंगे, यह वोटरों का दिल बहलाने का तरीका हो सकता है। पूरी दुनिया का इतिहास बताता है कि कमजोर अमल और कड़ी सजा का मिलाजुला मेल कहीं भी जुर्म कम नहीं कर पाता। अगर अमल सही हो तो दो बरस की कैद भी लोगों को डरा सकती है, और अगर हिन्दुस्तानी पुलिस और अदालतों जैसा ढीलाढाला रवैया हो, जांच के कमजोर होने, सुबूत और गवाह के बिक जाने से तकरीबन हर मुजरिम के छूट जाने की नौबत हो, तो भी इससे शरीफों का हौसला पस्त होता है, और मुजरिमों का भरोसा बढ़ जाता है। आज हिन्दुस्तान में जगह-जगह भीड़ की जो हिंसा सामने आती है, उसके पीछे देश की पुलिस और अदालत का यह मिलाजुला हाल सबसे अधिक जिम्मेदार है। 

लेकिन देश में धर्म और जाति की व्यवस्था, संपन्नता और राजनीतिक ताकत की व्यवस्था का हाल यह है कि जो गरीब अधिक संख्या में रहते हैं, वे भी कभी घेरकर किसी अमीर को पीटते नहीं दिखते। बल्कि सौ गरीबों के बीच पांच अमीर या राजनीतिक सत्ता संपन्न लोग दो गरीबों को पीटते दिख जाते हैं। देश में बहुसंख्यक धर्म, सवर्ण जातियों, संपन्न तबकों, और राजनीतिक ताकत से लैस लोगों की गुंडागर्दी देखते ही बनती है। ऐस जितने भी सार्वजनिक हिंसा के मामले रहते हैं, उनमें तकरीबन सौ फीसदी अल्पसंख्यकों को, नीची कही जाने वाली जातियों, गरीबों, महिलाओं को पीटने के रहते हैं। कहने के लिए दलित-आदिवासियों की हिफाजत को अधिक कड़े कानून बने हैं, लेकिन उन पर हिंसा से लेकर उन पर बलात्कार तक, और उनकी हत्या तक जगह-जगह सामने आते ही रहते हैं। ऐसे मामलों में कानून को और कड़े करते चलना सिर्फ एक खुशफहमी की बात होगी, हकीकत में मौजूदा कानूनों पर अमल को बेहतर बनाना जरूरी है जो कि काफी भी होगा। 

हमारा ख्याल है कि जिस तरह दलित-आदिवासी पर अत्याचार के मामलों में अलग अदालत रहती है, ठीक उसी तरह महिलाओं, बच्चों, और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों पर बाहुबल के अत्याचार के खिलाफ भी अलग अदालत रहना चाहिए, जहां तेजी से फैसला हो, और फैसले तक जमानत मुश्किल हो क्योंकि ऐसे बाहुबली बाहर आकर फिर कमजोर तबकों की जिंदगी खतरे में डालेंगे। देश की सामाजिक हकीकत को समझे बिना अगर कागजी कानूनों को काफी मान लिया जाएगा, तो वह कभी कामयाब नहीं होगा। आज देश में ताकतवर और कमजोर के बीच फासला ठीक वैसा ही है जैसा कि सवर्ण और दलित के बीच रहते आया है। इसलिए पैसों या ओहदों की ताकत जब गरीब-कमजोर पर जुल्म ढहाती है, तो उसके लिए एक अलग कानून की जरूरत है, तभी ताकत की बददिमागी घट सकेगी। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त 2023


 (Daily Chhattisgarh)

लिक्खा है, 23 अगस्त 2023


 (Daily Chhattisgarh)

पाक केबल कार हादसा, जिंदगियां बच गईं लेकिन सबक लेने की जरूरत

 23 अगस्त 2023  

  

पाकिस्तान में अभी दो पहाडिय़ों के बीच केबल कार से जा रहे आठ लोग एक केबल टूटने से फंस गए। केबल कार तार से टंगी हुई तो थी, लेकिन वह नीचे खाई से नौ सौ फीट की ऊंचाई पर थी, यानी करीब 90 मंजिल ऊंची इमारत जितनी। और नीचे गहरी नदी थी जिसमें बाढ़ भी थी। यहां तक हेलीकॉप्टर से जाना भी आसान नहीं था क्योंकि उसके पंखों से इतनी तेज हवा पैदा होती है कि उसके झोंकों में यह केबल कार गिर सकती थी। प्रधानमंत्री और खैबर राज्य की सरकार के साथ फौज भी लगातार इस पर निगरानी रख रही थी, और इसमें फंसे लोगों में छह बच्चे और दो टीचर थे। एक लडक़ा ऐसा भी था जिसकी सेहत बहुत खराब थी, और वह बेहोश हो गया था। बड़ी मुश्किल से लोगों को एक-एक करके निकाला गया, और यह बहुत खतरनाक हालत थी। इस बचाव को एक असंभव किस्म का काम माना जा रहा था, और फौज की इसे लेकर तारीफ हो रही है। पाकिस्तान के इस हिस्से में सडक़ और पुल की कमी है, और नदी पर पुल न होने से सैकड़ों बच्चे और दूसरे लोग रोज इसी केबल कार से स्कूल आते-जाते हैं। एक रिपोर्ट बताती है कि यह केबल कार कोई निजी कारोबारी चलाता था, और उसने स्थानीय जुगाड़ से यह सब बनाया हुआ था, जिसकी क्वालिटी का कोई ठिकाना नहीं था। यह एक बड़ा संयोग है कि सारे के सारे लोग बचाए जा सके, वरना कुछ भी हो सकता था। 

अब पाकिस्तान हो या हिन्दुस्तान, एशिया के इस हिस्से में गरीबी की वजह से बहुत किस्म की जुगाड़ टेक्नालॉजी काम करती है। पंजाब-हरियाणा के इलाके में मारूति कार की तर्ज पर नाम रखकर मारूटा बनाया गया है जिसमें किसी एक इंजन के पीछे फसल ढोने सरीखी एक ट्रॉली लगा दी जाती है, और उस पर दर्जनों लोग एक साथ सफर करते हैं। न ऐसी किसी गाड़ी की इजाजत सडक़ कानूनों में है, और न ही यह सुरक्षित रहती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह धड़ल्ले से चलती है। हर प्रदेश और शहर में अपने-अपने किस्म की ऐसी जुगाड़ तकनीक आम दिखती है, और कानून लागू करने वाली पुलिस इस तरफ से आंखें बंद रखती है, किस वजह से, इसे आसानी से समझा जा सकता है। हम अपने आसपास ही देखते हैं कि पहले हाथठेलों पर लंबे-लंबे पाईप और लोहे की छड़ें ले जाई जाती थीं जिन्हें एक-दो ठेले वाले मिलकर मुश्किल से धीरे-धीरे धकेलकर चलते थे। अब एक मोटरसाइकिल के पीछे के चक्के की जगह एक ट्रॉली जोड़ दी जाती है, और उस पर वैसे ही लंबे पाईप या छड़ लादकर बहुत रफ्तार से सडक़ों पर उसे ले जाया जाता है। हाथठेलों की धीमी रफ्तार से यह लंबाई भी कम खतरनाक रहती थी, लेकिन अब वैसी ही खतरनाक लंबाई के सामान तेज रफ्तार से दौड़ते हैं, और किसी भी दिन कोई बड़ा हादसा हो सकता है। हर मुसाफिर ऑटोरिक्शा में कई तरह की सीट जोड़ दी जाती है, और तीन मुसाफिरों की कानूनी सीमा के कई गुना अधिक लोग लादकर ले जाए जाते हैं, और इनके एक-एक हादसे में आधा-एक दर्जन लोग भी मारे जाते हैं। गरीब मजदूरों से लेकर तीर्थयात्रियों तक, और गरीब या गांव की बारातों तक को मालवाहक गाडिय़ों पर ले जाया जाता है जिसकी किसी तरह की हिफाजत नहीं रहती, और न उनके ऊपर कोई रोक है। हर बरस ऐसे हादसों में हजारों मौतें एक छोटे राज्य में हो जाती हैं, लेकिन सरकारों की नींद नहीं टूटती। ऐसे जुर्म को रोकने के जिम्मेदार विभाग परले दर्जे के भ्रष्ट भी हो जाते हैं, और सत्ता के चहेते बने रहते हैं। इसलिए पुलिस और आरटीओ महकमे के साथ सभी तरह के नियम तोडऩे वालों की गिरोहबंदी जिंदगियों को रात-दिन बेचती है। 

अब सरकारों के जिम्मेदारी न निभाने के खिलाफ कोई कब तक अदालत जाए? ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तानी अदालतों का बुनियादी काम सरकार के खिलाफ लडऩा ही रह गया है, सरकार के किए जा रहे गलत कामों को रोकने में अदालतों का खासा वक्त लगता है। ऐसा लगता है कि सरकार चलाने की जिम्मेदारी का एक हिस्सा अदालतों पर है जो कि रात-दिन सरकार को रोकने-टोकने का काम करती हैं, गलत कामों से रोकती हैं, जवाब-तलब करती हैं, और किसी किनारे नहीं पहुंचती हैं। पाकिस्तान में अगर स्थानीय सरकार जुगाड़ तकनीक से बनी ऐसी केबल कार को पहले ही रोकती, या उस पर हिफाजत का जिम्मा डालती, तो ऐसी खतरनाक नौबत नहीं आती जिसमें इतने लोग मौत के मुंह में जाकर वापिस लौटे हैं। अब तो हिन्दुस्तान में हमें इस बात की भी कोई उम्मीद नहीं रहती कि देश या परदेस में किसी तरह का हादसा देखने के बाद यहां के अफसर, यहां की सरकारें, अपनी-अपनी जिम्मेदारी के दायरे में जांच कर लें, सुधार कर लें। अभी तो हाल यह है कि जिस शहर में ओवरलोड ऑटोरिक्शा के हादसे में ढेरों मौतें हो जाती हैं, वहां उस दिन भी बाकी ऑटोरिक्शा का ओवरलोड नहीं जांचा जाता। दरअसल सरकार के निकम्मेपन पर कोई अदालती कार्रवाई नहीं हो सकती, और यही वजह है कि सरकार की कोई जवाबदेही नहीं रह गई है। हम अधिकतर प्रदेशों में देखते हैं कि चाहे किसी पार्टी की सरकार रहे, उसका ढर्रा यही रहता है, और जब सभी पार्टियां बराबरी से भ्रष्ट हैं, तो वोटर के सामने पसंद रह क्या जाती है? 

हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में देखते हैं कि सडक़ों पर मौत इस रफ्तार से दौड़ती है, कदम-कदम पर रहती है, लेकिन उसे रोकने में किसी की दिलचस्पी नहीं है। पिछले बीस बरस में जिस पार्टी का भी राज रहा हो, उसने सडक़ों को वसूली और उगाही का जरिया बनाकर रखा, और इस बारे में कांग्रेस और भाजपा की नीति और विचार बिल्कुल एक सरीखे हैं। यह सिलसिला टूटना चाहिए, लोगों को खुद इकट्ठे होकर सडक़ों पर आना चाहिए। कानून तोड़ती गाडिय़ों को घेरकर पुलिस को आने पर मजबूर करना चाहिए, और कार्रवाई करवानी चाहिए। जागरूक लोगों के संगठन सोशल मीडिया पर ऐसे पेज बना सकते हैं जो कि सडक़ों पर तोड़े जाते कानून के फोटो-वीडियो पोस्ट करें, और सरकारों को मजबूर करें कि वे उन पर कार्रवाई करें। मैदानी प्रदेशों में केबल कार जैसी जरूरत कम रहती है, लेकिन कुछ जगहों पर तीर्थयात्रा के लिए, या सैलानियों के लिए केबल कार अगर है, तो जागरूक नागरिकों को जाकर उसकी सुरक्षा के सर्टिफिकेट देखने चाहिए, और गड़बड़ मिलने पर तुरंत ही उसकी शिकायत करनी चाहिए। 

इन सबकी कोई जरूरत न रहे, अगर सरकारें अपना काम जिम्मेदारी से करें। लेकिन जनता को वैसी ही सरकारें मिलती हैं जिनकी वह हकदार रहती है। मुर्दा जनता को मरघट के चौकीदार किस्म की सरकार ही मिलती है। अगर अच्छा काम करने वाली सरकार चाहिए, तो उसके लिए जनता का अपना जागरूक होना भी जरूरी है। लोगों को नेताओं और अफसरों से सार्वजनिक रूप से सवाल करना सीखना चाहिए, और अब तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से यह काम मुमकिन भी है। हर शहर को जागरूक नागरिकों के संगठन बनाने चाहिए, और उन्हें अपने हक के लिए सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩा चाहिए। अदालतें भी तभी लोगों के काम आ सकती हैं जब लोग खुद आवाज उठाएं। लोकतंत्र में यह भी है कि जनआंदोलनों का अदालतों पर भी असर पड़ता है क्योंकि जज अखबार भी पड़ते हैं, टीवी भी देखते हैं, और हो सकता है कि बहुत से बड़े जज सोशल मीडिया पर जनमुद्दे देखते हों। 

(Daily Chhattisgarh)

लेखकों को लिखना छोड़ जनता से जुडऩे की सलाह पर सोच-विचार की जरूरत

  22 अगस्त 2023  

  

जबलपुर में अभी प्रगतिशील लेखक संघ का 18वां राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा है। यह सम्मेलन वामपंथी विचारधारा के लेखकों का है, और जबलपुर के हरिशंकर परसाई देश के सबसे बड़े व्यंग्यकार भी थे, और इस संगठन से जुड़े हुए भी थे। परसाई के लिखे हुए पर बहुत कुछ लिखा गया है। और आलोचकों के लिखे बिना भी अखबारों के मार्फत आम पाठकों ने परसाई को खूब पढ़ा है। वे अपनी सरल और सहज जुबान के साथ राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक सरोकार से लदे हुए थे। इसलिए यह सम्मेलन उनकी स्मृति के साये में हो रहा है, और सोशल मीडिया पर पिछले कुछ हफ्तों में परसाई पर जितना लिखा गया है, उतना पहले कभी नहीं लिखा गया था। परसाई अपनी जिंदगी में कई अखबारों में लगातार नियमित कॉलम लिखते थे, और देश की किसी भी भाषा के व्यंग्यकार के मुकाबले शायद उनके पाठक भी अधिक थे, और वे किताबों से परे भी एक हस्ती थे। अभी जबलपुर का यह आयोजन हरिशंकर परसाई की स्मृति, उनकी लेखन पर खूब चर्चा कर रहा है। और यह चर्चा दूसरे किसी गुजर चुके लेखक पर चर्चा से अलग इसलिए है कि चले जाने के बाद भी परसाई किसी भी दूसरे हिन्दी लेखक के मुकाबले आज अधिक प्रासंगिक इसलिए हैं कि जिन बातों पर उन्होंने लिखा, वे तमाम आज भी मौजूद हैं, और यह जरूरत है कि उन बातों पर परसाई से आगे बढक़र भी लिखा जाए। 

हम स्मृतियों में बहुत ज्यादा जीने के खिलाफ हैं। इधर-उधर लिखते भी रहते हैं कि जो लोग आज हौसले से लिख नहीं पाते, वे पुराने हौसलामंद लेखकों की स्मृतियों के जलसे करके उसकी भरपाई करने की कोशिश करते हैं। आज का वक्त जब आज के लिखे जा रहे, और न लिखे जा सक रहे पर चर्चा का होना चाहिए था, बहुत से सरकारी और गैरसरकारी कार्यक्रम इतिहास के कुछ बड़े लेखकों या पत्रकारों की स्मृतियों से शुरू होते हैं, और उन्हीं पर खत्म भी हो जाते हैं। ऐसे में आज ही सुबह जबलपुर के एक लेखक ने इस सम्मेलन में एक लेखक की कही हुई एक बात को लिखा है कि लेखकों को लिखना बंद कर देना चाहिए, नाटककारों को नाटक बंद कर देना चाहिए, और जनता से सीधे जुडऩा चाहिए। उनके कहे का मतलब शायद यह है कि लेखक और रंगकर्मी अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता से जुड़ नहीं पा रहे हैं, ऐसे में रचना से अधिक महत्वपूर्ण जुडऩा है, और लोगों को आम लोगों से जुडऩा चाहिए। 

यह एक बड़ी दिलचस्प सोच है, और चाहे जिस किसी ने सामने रखी हो, इस पर सोच-विचार होना चाहिए। क्या लेखक और दूसरे किस्म के रचनाकार, कलाकार जनता से सचमुच कट गए हैं? क्या वे जो लिख रहे हैं, वह भी जनता तक जाता है या नहीं जाता है, इसकी परवाह उन्हें नहीं रह गई है? हाल के बरसों में जिस तरह साहित्य पर चर्चा के पर्यटन से होने लगे हैं, कहीं जयपुर तो कहीं किसी और शहर में अब साहित्य महोत्सव होते हैं जो कि पांच सितारा भव्य आयोजन सरीखे दिखते हैं, जिनमें बड़े नामी-गिरामी लेखक, कलाकार, और पत्रकार पहुंचते हैं, पहले से चर्चित और पहले से जिनके बारे में बहुत कुछ छपा हुआ है, वैसे लोग मंचों पर एक-दूसरे से बात करते हैं, कुल मिलाकर लेखकों और उनके सरीखे कुछ छोटे-छोटे दूसरे तबकों के लोगों का यह जमावड़ा आपस में ही एक-दूसरे में मगन दिखता है, और फिर अगले जलसे तक ये तमाम लोग सोशल मीडिया पर ऐसे पिछले जलसे के बारे में लिखते रहते हैं। 

आज यह सवाल पहले के मुकाबले कुछ अधिक परेशान करता है कि लेखक किसके लिए लिखते हैं? हरिशंकर परसाई का लिखा हुआ तकरीबन तमाम, अखबारों में छपते रहा, और चौबीस घंटे के भीतर रद्दी में जाते रहा। बाद में उनकी किताबें भी छपीं, लेकिन किताबों के पाठक उनके अखबारी पाठकों के मुकाबले गिनती के ही थे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आज सजिल्द छपने वाली महंगी किताबों पर फिदा लेखकों को क्या पाठकों तक पहुंचने की परवाह नहीं रह गई है, चुनिंदा हजार-पांच सौ लोगों के बीच महंगी छपी किताब पहुंच जाना ही सब कुछ हो गया है? क्या लिखना पाठक के पढऩे के लिए होता है, या आलमारियों में हार्डबाउंड किताबों की शक्ल में महफूज हो जाने के लिए? ऐसे बड़े से सवाल हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि खुद लेखक भी इनके जवाब नहीं चाहते, वे किसी नामी-गिरामी प्रकाशक से अपनी अगली किताब की शानदार छपाई चाहते हैं। यह किताब जाहिर है कि महंगी होने की वजह से भी कम लोगों तक पहुंचती है, और आम पाठकों का रिश्ता इस महंगेपन की वजह से किताबों से टूट सा गया है। अब मोटेतौर पर लेखक ही पाठक रह गए हैं, और जैसा कि जबलपुर में अभी एक लेखक ने लिखा कि लेखक आलोचकों को ध्यान में रखकर भी लिखने लगे हैं। 

यह पूरा सिलसिला निराश करता है कि जिस परसाई पर इतनी चर्चा हो रही है उनका तो सब कुछ लुग्दी वाले अखबारी कागज पर, अखबारों में ही छपा, और वे लुग्दी पर ही एक महान लेखक बने। किताबें तो शायद उनके पूरी स्थापित हो जाने के बाद आई होंगी, लेकिन तब तक वे दसियों लाख पाठकों तक पहुंच चुके थे। यह बात हमें हैरान करती है कि आज अधिकतर लेखक अधिक पाठकों तक पहुंचने की कोशिश को अहमियत नहीं देते, और अपनी किताब की शानदार छपाई उनके लिए अधिक मायने रखती है। यह सोच, अगर सचमुच है, तो फिर यह अपने लिखे हुए को महत्व देने के बजाय उसकी छपाई को महत्व देने की बात है। लिखे हुए की सार्थकता तो अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने में होनी चाहिए, ताकि उसका मकसद पूरा हो सके। महंगी किताब छापकर कमाई करना एक प्रकाशक की नीयत तो हो सकती है, लेकिन पाठकों के लिए लिखने वाले लेखक के लिए यह महंगा काम अटपटा लगता है। 

हालांकि इन बरसों में सोशल मीडिया ने छपे हुए शब्द की महत्ता को सीमित कर दिया है, अब बिना छपे भी लोग अधिक लोगों तक पहुंच सकते हैं, और हालत यह है कि छपने वाले नामी-गिरामी लोग भी सोशल मीडिया पर अपनी किताबों को उसी तरह बढ़ावा देते दिखते हैं, जिस तरह फिल्मी सितारे अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए शहर-शहर घूमकर मंचों पर जाते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन जिस बात से हमने लिखना शुरू किया उस पर भी अब आ जाना चाहिए कि लेखकों को जनता से जुडऩा चाहिए। एक लेखक ने तो लिखना बंद करके जुडऩे को कहा है, लेकिन हमारा हमेशा से यह मानना है कि लेखक को लिखने के पहले भी लोगों से जुडऩा चाहिए। समाज के अलग-अलग तबके, उनकी अलग-अलग दिक्कतें, उन पर मंडराते खतरे, लोकतंत्र और राजनीति के मौजूदा हाल, मजदूरों, और दूसरे वंचित तबकों के बदहाल से सामना किए बिना किसी लेखक की अपनी सोच का संसार कैसे पूरा हो सकता है? जरूरी नहीं है कि हर लेखक इन मुद्दों पर लिखे लेकिन लेखकों को इन मुद्दों का सामना तो करना ही चाहिए, और उस तजुर्बे के साथ वे फिर जिस चीज पर चाहें उस पर लिखें। जिंदगी की असली हकीकत से रूबरू होने के बाद उन्हें यह भी समझ आएगा कि उनका लिखा कितने तबकों तक पहुंचेगा, वे लोग क्या सोचेंगे, उनके कितने काम का यह लिखा हुआ रहेगा? कुल मिलाकर एक लेखक के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए असल दुनिया से उसका जितना साबका पडऩा चाहिए, उसका कोई विकल्प नहीं हो सकता। दुनिया की अधिकतर महान साहित्य-कृतियां असल जिंदगी को देखने के बाद ही शायद बनी होंगी। परसाई से अधिक बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है कि लोगों से जुड़े रहने का उनके लेखन पर कैसा असर पड़ा, और महानता तक का उनका सफर किस तरह जिंदगी की हकीकतों से होते हुए गुजरा। अब आज के लेखक लोगों से जुडऩे के लिए लिखना बंद करके जुड़ें, यह भी बहुत देर हो जाएगी। हमारा मानना है कि लेखकों को लिखना शुरू करने के पहले ही लोगों से जुडऩा चाहिए, इससे जितना भला लोगों का होगा, उससे अधिक भला लेखकों का होगा। 

(Daily Chhattisgarh)

एक असफल लोकतंत्र बना पाक, उससे जिसे सबक लेना हो ले लें वरना...

 21 अगस्त 2023  

  

पाकिस्तान के हालात बड़े ही दर्दनाक हैं। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान पौन सदी पहले एक ही साथ आजाद हुए थे, और आज वहां हालत यह है कि नए बने एक कानून के बारे में राष्ट्रपति डॉ. आरिफ अल्वी ने एक बयान जारी करके कहा है कि उन्होंने ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, और आर्मी एक्ट पर दस्तखत नहीं किए हैं, दूसरी तरफ देश के कानून मंत्री ने कहा है कि ये दोनों कानून सरकारी गजट में छप भी चुके हैं। राष्ट्रपति ने अल्लाह को हाजिर नाजिर मानकर कहा है कि वे इन कानूनों से सहमत नहीं थे, और उन्होंने अपने अफसरों को इन्हें सरकार को वक्त रहते लौटा देने का आदेश दिया था। राष्ट्रपति ने अपने बयान में कहा है कि उन्होंने अफसरों से कई बार पूछा, और उन्होंने भरोसा दिलाया कि फाईल सरकार को वापिस भेज दी है, लेकिन उन्हें धोखा दिया गया, और उनके ही अफसरों ने उनकी मर्जी के खिलाफ काम किया। दूसरी तरफ शायद राष्ट्रपति के अफसरों ने समय सीमा में इसे नहीं लौटाया, और सरकार ने इसे मंजूरी मानकर इसे कानून बना दिया और इसकी गजट छपाई भी करा दी। सरकार का कहना है कि अगर राष्ट्रपति दस दिन में उन्हें भेजे गए किसी बिल पर कोई फैसला नहीं लेते हैं, तो वह अपने आप ही कानून बन जाता है। सरकार ने राष्ट्रपति के किए गए ट्वीट पर इतना ही कहा कि यह उनकी अपनी मर्जी है। 

किसी भी लोकतंत्र में यह एक भयानक नौबत है कि राष्ट्रपति के अफसर उनके हुक्म न मानें। अब कोई भी राष्ट्रपति अपने अफसरों की कही हुई बात को जांचने के लिए फाईल को बुलाकर खुद तो देख नहीं सकते कि वह सरकार को किस तारीख को मिल चुकी है। और कार्यवाहक प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच इस तरह की नौबत बताती है कि पाकिस्तान एक नाकामयाब जम्हूरियत बन गया है। लोगों को यह सोचना चाहिए कि ऐसी नौबत क्यों आई है? हिन्दुस्तान अपनी बहुत सारी खामियों के बावजूद कई मायनों में एक कामयाब लोकतंत्र है। इस देश में लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिशें लगातार चल रही हैं, संवैधानिक संस्थाओं को चौपट और बेअसर किया जा रहा है, लेकिन फिर भी अभी कुछ हद तक तो लोकतंत्र बचा हुआ दिखता है। ऐसे में पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की तुलना बार-बार इसलिए की जाती है कि एक ही जमीन के दो टुकड़े करके एक साथ ये दो देश बने थे, और पाकिस्तान जिन खामियों को आज भुगत रहा है, वे सामने हैं कि हिन्दुस्तान उनसे बहुत हद तक बचा रहा, इसीलिए लोकतंत्र रहा। 

भारत और पाकिस्तान की तुलना करना दोनों देशों के लिए जरूरी है कि किससे क्या गड़बड़ी हुई है, और किसे वैसी गड़बड़ी से बचना चाहिए। पाकिस्तान ने पहले ही दिन से एक चूक की थी कि उसने अपने देश को धर्म आधारित बना लिया, और उस दिन से ही वहां पर धर्मान्ध कट्टरपंथियों का राज शुरू हो गया। धर्म कब बढक़र धर्मान्धता में तब्दील हो जाता है, और कब वह दो कदम आगे बढक़र साम्प्रदायिकता हो जाता है, इसका पता भी नहीं चलता। पाकिस्तान इस हद तक साम्प्रदायिक हो गया कि मुस्लिम मजहब के भीतर के अलग-अलग सम्प्रदायों में खून-खराबा होने लगा। राजनीतिक दल धार्मिक आधार पर बनने और चलने लगे, देश का एक धर्म कानूनी रूप से बना ही दिया गया था, इसलिए फौज से लेकर क्रिकेट टीम तक वही धर्म दिखता था। धर्म जब देश की सोच पर हावी हो जाता है, तो वहां लोकतांत्रिक सोच की गुंजाइश नहीं बचती। यह कुछ उसी किस्म का होता है कि किसी तालाब के पानी पर पूरी तरह जलकुंभी छा जाए, तो उस पानी तक सूरज की रौशनी पहुंचना बंद हो जाता है, और वहां की हर किस्म की जिंदगी पर असर पडऩे लगता है। पाकिस्तान के लोकतंत्र पर धर्म ऐसा हावी हुआ कि उससे परे कुछ देखना ईशनिंदा माना जाने लगा, और धर्म के नाम पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तक अपनी तीसरी या चौथी बीवी की धार्मिक नसीहतों से घिरे रहने लगे, और वह बीवी धर्म के नाम पर प्रधानमंत्री निवास से राज सा करने लगी थी। जब लोकतंत्र कमजोर होता है, तो फौज हावी होती है। पाकिस्तान में शुरुआती दिनों से ही फौज हावी रहने लगी, कई बार निर्वाचित सरकार को हटाकर फौजी तानाशाही ने खुद काम सम्हाला, और आज भी यह पाकिस्तान में एक खुला राज है कि फौज वहां तय करती है कि किसे प्रधानमंत्री बनाना है, और किसे उस कुर्सी से हटाना है। इस बीच कमजोर लोकतंत्र में सेना, सरकार, और अदालतें सब कुछ भ्रष्ट होने लगे, और अभी तो वहां का ऐसा दिलचस्प और सनसनीखेज नजारा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और उनके परिवार के भ्रष्टाचार के ऑडियो तैरते रहते हैं। जब अदालतें इस दर्जे की भ्रष्ट हो जाएं, प्रधानमंत्री फौज की मर्जी से बने और हटे, तो फिर चारों तरफ भ्रष्टाचार मजबूत होने लगता है। पाकिस्तान आज जिस गरीबी और बदइंतजामी को झेल रहा है, उसके पीछे भ्रष्टाचार है, उसके पीछे धार्मिक आतंकी हिंसा है, और उसके पीछे धर्म है। 

हिन्दुस्तान ने पिछले दस बरसों में धर्म का जैसा कब्जा देखा है, वह पूरी तरह अभूतपूर्व है। भारत की लोकतांत्रिक सोच, और संवैधानिक जिम्मेदारी पर, लोगों की सामाजिक समझ, और राजनीतिक चेतना पर धर्म जलकुंभी की तरह छा गया है, और सूरज की रौशनी के बिना नीचे का पानी सडऩे लगा है, जिंदगी खत्म होने लगी है। यह तो इस देश की आधी सदी से अधिक की गौरवशाली परंपरा थी जिसने फौज को पूरी तरह काबू में रखा था, और अदालतों को काबू से बाहर रखा था। इन बरसों में फौज का राजनीतिक और चुनावी इस्तेमाल जिस तरह से दिख रहा है, उसमें फौज की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जागना बहुत नामुमकिन नहीं है, यह एक अलग बात है कि देश में पाकिस्तान की तरह की फौजी बगावत मुमकिन नहीं है, फिर भी फौज को गैरफौजी मकसदों से कैसा इस्तेमाल किया जा रहा है, यह पिछले दिनों सतपाल मलिक के कई बयानों में सामने आया है। दूसरी तरफ सरकार जिस तरह और जिस हद तक अदालतों पर काबू चाहती है, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर काबू कर चुकी है, वह लोकतंत्र खत्म करने की तरफ बढ़ा हुआ कदम है। ऐसी नौबत कुल मिलाकर देश में लोकतंत्र को कमजोर कर रही है, और यहां हावी किया जा रहा धर्म साम्प्रदायिकता की हद तक तो पहुंच ही चुका है, वह किस दिन आतंकी हिंसा में तब्दील हो जाएगा, वह पता भी नहीं लगेगा। फिर यह भी होगा कि बहुसंख्यक तबके की धार्मिक हिंसा के मुकाबले अल्पसंख्यक तबकों की धार्मिक हिंसा जागेगी, और सब कुछ बेकाबू हो जाएगा। हमारी यह चेतावनी आज कई लोगों को बेबुनियाद लगेगी, लेकिन याद रखना चाहिए कि अभी कुछ बरस पहले तक उत्तराखंड और हिमाचल में हर इमारत, सडक़ और पुल की बुनियाद मजबूत लगती थी, और आज वह पूरी तरह खोखली साबित हो रही है। जिनको हमारी बात आज खोखली लग रही है, उन्हें लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो जाने का पता तब चलेगा जब बिना खून बहे लोगों के लोकतांत्रिक हकों का कत्ल होने लगेगा। 

पाकिस्तान को देखकर हिन्दुस्तान यह नसीहत और सबक तो ले ही सकता है कि एक लोकतंत्र को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। और अगर यह सबक नहीं लिया जाता है, तो फिर खुली आंखों से दूध में गिरी छिपकली देखते हुए भी उसे पीने सरीखा हो जाएगा। हिन्दुस्तानी संवैधानिक समझ पर धर्म नाम की जो जलकुंभी छा गई है, वह कुछ लोगों को पसंद आ सकती है, लेकिन वह कितनी जानलेवा है यह अंदाज अभी नहीं लग रहा है, और जिस दिन लगेगा उस दिन बड़ी देर हो चुकी रहेगी। 

(Daily Chhattisgarh)