शाह-भूपेश की दिलचस्प चुनौतियों का सच जनता को जानने का हक तो है!
31 मार्च 2026
बस्तर में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हुई है, या तकरीबन खत्म हुई है, इस विवाद में हम पडऩा नहीं चाहते। जिस हद तक वह खत्म हुई है, वह केन्द्र और राज्य सरकार की घोषणाओं के मुताबिक ही है। अब अगर बहुत थोड़ी सी गिनती में नक्सली बचे हुए हैं, तो जाहिर है कि उनकी मारक क्षमता खत्म हो चुकी है, और वे शायद अपने आखिरी हथियारबंद दिन गुजार रहे हैं। कल संसद में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सल मोर्चे पर कामयाबी गिनाते हुए छत्तीसगढ़ में पांच बरस कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे भूपेश बघेल पर भी एक सीधा हमला किया है कि उनकी सरकार ने नक्सलियों को संरक्षण दिया, जिससे नक्सल उन्मूलन अभियान में देर हुई। उन्होंने चुनौती दी और कहा कि भूपेश बघेल को पूछो, सुबूत दूं क्या, और कहा कि अगर भूपेश हां बोलेंगे, तो फंस जाएंगे। यह संसद में कांग्रेस की किसी प्रदेश सरकार पर केन्द्रीय गृहमंत्री का अब तक का सबसे बड़ा हमला था, और भूपेश ने संसद के बाहर अमित शाह को सुबूत देने की चुनौती दी है, साथ ही यह कहा है कि उनके पांच बरस के कार्यकाल में केन्द्र सरकार के साथ नक्सल मोर्चे पर लगातार बैठकें हुईं, और किसी भी बैठक में केन्द्रीय गृहमंत्री या केन्द्र सरकार की तरफ से छत्तीसगढ़ की भूपेश-कांग्रेस सरकार के खिलाफ ऐसी कोई शिकायत नहीं की गई। अब अचानक यह बात कही जा रही है।
दरअसल बस्तर के नक्सल मोर्चे पर आज के घटनाक्रम इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनका श्रेय लेने के लिए कोशिश करने, या दावा करने का हक सत्तारूढ़ पार्टी का बनता ही है। दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार की लगाई गई इतनी बड़ी तोहमत पर भूपेश बघेल की जवाबदेही भी बनती है, और उन्होंने अपनी जवाबदेही अमित शाह से एक सवाल करके पूरी की है। ये दोनों चुनौतियां इतनी दिलचस्प हो चुकी हैं कि जनता इंतजार करेगी कि अमित शाह कुछ अधिक जानकारी सामने रखें, सुबूत बताएं, और जनता अपनी सोच तय करे। इसके पहले भी एक ऐसी नौबत आई थी, लेकिन उस वक्त मुख्यमंत्री बनने के पहले के भूपेश बघेल ने यह दावा किया था कि उनके पास झीरम घाटी हमले की साजिश के सुबूत हैं, और उन्हें वे सही जांच एजेंसी को देंगे। कई तरह की जांच एजेंसियां झीरम की जांच करती रही, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से एनआईए की जांच चलते-चलते भी भूपेश सरकार की पुलिस को जांच करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी भूपेश बघेल ने झीरम साजिश के कोई सुबूत किसी एजेंसी को नहीं दिए जिन्हें कि वे अपनी जेब में लेकर चलने का दावा करते थे। हम तो जनता के जानने के हक के तहत पहले भी इस बात को बार-बार लिख चुके हैं कि न सिर्फ मुख्यमंत्री को, बल्कि देश के किसी आम नागरिक को भी किसी भी जुर्म या साजिश की जानकारी होने पर यह उनकी नागरिक जिम्मेदारी बनती है कि वे उसे जांच एजेंसी को दें। ऐसे में विपक्ष के नेता के रूप में भूपेश बरसों झीरम के सुबूत जेब में थपथपाते रहे, लेकिन दिए कभी नहीं। मुख्यमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारी की शपथ लेने के बाद भी उन्होंने कभी सुबूत जांच एजेंसी को देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की। अब संसद में अमित शाह ने भूपेश बघेल को जो चुनौती दी है, उस पर हम अपनी पुरानी सोच को दोहराते हुए यही कहेंगे कि भूपेश बघेल उनसे सुबूत न भी मांगें, तब भी देश का यह हक है कि अगर कांग्रेस सरकार ने पांच बरस नक्सलियों को संरक्षण दिया, तो इसके सुबूत जनता के सामने आने चाहिए। यह बात किसी भी पार्टी के किसी भी संगठन के साथ रिश्तों पर लागू होती है, अगर कोई कानून तोड़े जाते हैं। चाहे ऐसे संगठन हथियारबंद हों, या साम्प्रदायिकता से लैस हों, रिश्तों के सुबूत, और शपथ ली हुई सरकार द्वारा दिए गए संरक्षण तो उजागर होने ही चाहिए।
अब हम इन दोनों नेताओं की एक-दूसरे को दी गई चुनौतियों का मजा लेते हुए, इनके आगे बढऩे का इंतजार करेंगे, क्योंकि यह पारदर्शिता जनता के हक में है। ऐसी राजनीतिक बातें जनता के किसी सूचना पाने के अधिकार के तहत नहीं रहती हैं, ऐसी बातें नेताओं के सूचना देने की जिम्मेदारी के तहत आती हैं, जिसके लिए किसी कानून की जरूरत नहीं है, बस एक सार्वजनिक जीवन की नैतिकता जरूरी रहती है। लोकतंत्र में ऐसी गंभीर बातें खुलकर सामने आनी चाहिए। दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में इस किस्म के बहुत से मामलों में श्वेतपत्र जारी करने की भी परंपरा रही है जिसमें सरकार उसे हासिल तमाम किस्म के तथ्यों को एक दस्तावेज की तरह जनता के लिए जारी करती है। बस्तर के नक्सल मोर्चे को लेकर अगर अमित शाह के पास सचमुच ही कांग्रेस सरकार के दिए हुए संरक्षण के सुबूत हैं, तो उन्हें श्वेतपत्र के रूप में भी जारी किया जा सकता है।
अब हम आज की बची हुई चर्चा को बस्तर ले चलें, जहां का अधिकांश नक्सलग्रस्त हिस्सा अब नक्सलमुक्त हो चुका है, और बचे हुए नक्सली शायद बड़े थोड़े से हिस्से में काबिज हैं, छुपे हुए हैं, या कि दूसरे सरहदी राज्यों में चले गए हैं। जो भी हो, आज राज्य सरकार के पास नक्सलियों से छुड़ाया गया सैकड़ों वर्ग किलोमीटर का ऐसा आबादी वाला इलाका है जहां पर किसी भी जनकल्याणकारी सरकार की बहुत किस्म की चुनौतियां रहती हैं। लगातार दोनों तरफ की बंदूकों की बड़ी मौजूदगी, खूनी टकराव, धमकियों, और जमीनी सुरंगों के बीच ऐसे इलाके विकास से दूर रह गए थे। यहां पर प्रशासन पहले से इतना खराब था, कि उसी वजह से कई दशक पहले नक्सलियों को पांव जमाने का मौका मिला था। अब राज्य सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती है कि मौजूदा ग्रामीणों को भूतपूर्व नक्सल समर्थक जैसे किसी संदेह में परेशान किए बिना इन गांवों में शासन-प्रशासन के प्रति विश्वास पैदा किया जाए। अभी भी ऐसी चर्चा है कि बस्तर के दसियों हजार लोग सलवा-जुड़ूम के दौर में, या बाद के हथियारबंद टकराव के बीच से अपने गांव छोडक़र पड़ोस के राज्यों में जा चुके हैं, वहीं पर बसे हुए हैं। अब छत्तीसगढ़ सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि हथियार छोड़ चुके नक्सलियों के पुनर्वास की एक अलग योजना से परे, एक ऑपरेशन घरवापिसी ऐसा चलाना चाहिए जो कि बस्तर छोडक़र गए लोगों को वापिस लाने का हो। बस्तर के ये सबसे मासूम आदिवासी अपनी मर्जी से, अपनी पसंद से अपना गांव और प्रदेश छोडक़र नहीं गए थे। वे एक तरफ की बंदूकों, या दूसरे तरफ की बंदूकों के दबाव में बाहर गए थे, और आज वे भारतीय लोकतंत्र के भीतर पड़ोसी प्रदेश में शरणार्थी की तरह रह रहे हैं, क्योंकि वहां न उनकी जमीन है, न उनके कोई अधिकार हैं। राज्य सरकार को इनके लिए एक बड़ी मुहिम छेडऩी चाहिए, और जैसा कि कई जानकार तबके बताते हैं, अगर ऐसे दसियों हजार लोग बस्तर के बाहर हैं, तो अब उनको वापिस लाने का, मदद करके उन्हीं के गांव, उन्हीं की जमीन पर वापिस बसाने का एक बड़ा जिम्मा राज्य सरकार पर बनता है। नक्सल उन्मूलन की चुनौती पर कामयाब होने के बाद अब राज्य सरकार को खुद होकर ऑपरेशन घरवापिसी का यह बीड़ा उठाना चाहिए, यह भी छोटा अभियान नहीं होगा, लेकिन इतिहास इसे भी एक संवेदनशील कार्रवाई के रूप में दर्ज करेगा। राज्य और केन्द्र सरकार दोनों अब इस बारे में भी सोचें, क्योंकि बस्तर में अगर जनजीवन को सामान्य करना है, तो इन लोगों की वापिसी के बिना वह कैसे होगा?
ट्रांस-संशोधन विधेयक पास तो हो गया, लेकिन संवेदनशीलता जरूरी है..
30 मार्च 2026
भारतीय संसद के दोनों सदनों में अभी ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक मंजूर किया गया है, और इसका खुलासा सामने आने के बाद ट्रांसजेंडर समुदायों के बीच इसका जमकर विरोध हो रहा है। हमारे यूट्यूब चैनल से एक इंटरव्यू में ट्रांसजेंडरों ने रोते हुए कहा कि इससे तो अच्छा है कि उन्हें जहर दे दिया जाए। अब सरकार के नजरिए से देखें, तो 2019 के कानून में ट्रांसजेंडर की परिभाषा काफी व्यापक थी, और अब सात साल के भीतर ही किए जा रहे इस संशोधन विधेयक में इस वर्ग में जैविक और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों को ही प्राथमिकता दी गई है। संशोधन विधेयक में यह साफ कहा गया है कि जो लोग खुद अपनी शारीरिक-मानसिक भावनाओं के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान स्थापित करना चाहते हैं, या अपना यौन रूझान बताना चाहते हैं, उन्हें इस विधेयक के दायरे में नहीं रखा जाएगा। यानी बिना एक मेडिकल बोर्ड के किसी ट्रांसजेंडर की पहचान सिर्फ उसकी मर्जी से तय नहीं होगी। अभी तक जो लोग अपने आपको किसी दूसरे जेंडर के शरीर में कैद महसूस करते थे, वे कोई ऑपरेशन कराकर भी जेंडर बदलवा सकते थे, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो सरकार ऐसे सेक्स-चेंज ऑपरेशन का खर्च भी उठाती थी। अब इस नए विधेयक में यह खतरा खड़ा हो गया है कि किसी मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होकर अपनी खुद की पहचान साबित करने के लिए बोर्ड के डॉक्टरी पैमानों पर खुद को साबित करना, पूरी तरह अपमानजनक भी है, और यह मेडिकली संभव नहीं है कि किसी की मन की अपनी भावनाएं डॉक्टर पहचान सकें, और मान सकें। आज ट्रांस लोगों की व्यापक परिभाषा में कई तरह की यौन-पहचान, या यौन-पसंद वाले लोग आते हैं, और इस नए विधेयक में उनमें से बहुत सारे लोगों को ट्रांस नहीं माना जाएगा, और वे कानूनी सुरक्षा खो बैठेंगे। इस विधेयक में यह भी है कि किसी पर ट्रांसजेंडर पहचान थोपी गई, तो वह जुर्म कहलाएगा, और उस पर बड़ी कड़ी सजा होगी। ट्रांस-कार्यकर्ताओं को डर है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल उन डॉक्टरों, एनजीओ, या सहायता समूहों के खिलाफ हो सकता है जो लोगों को अपनी मर्जी की सेक्स पहचान पाने में डॉक्टरी मदद करते हैं। इसमें ट्रांस लोगों की शादी, गोद लेने, उत्तराधिकार, और आरक्षण जैसे नागरिक अधिकारों का कोई जिक्र नहीं है। सरकार का कहना है कि ट्रांस लोगों की पुरानी परिभाषा में बहुत सारे फर्जी लोग भी फायदे पा रहे थे, इसलिए इसकी एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा जरूरी हो गई थी। दूसरी तरफ कई प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, वगैरह इस विधेयक को एक ऐतिहासिक गलती बतला रहे हैं, और उन्होंने राष्ट्रपति से अपील की है कि इसे मंजूरी न दें।
ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 में लोगों को अपनी ट्रांस पहचान तय करने के लिए जिस तरह एक मेडिकल बोर्ड की मजबूरी डाली गई है, उससे सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों के साथ इस विधेयक का टकराव हो रहा है। भारत में ट्रांस अधिकारों को लेकर न्यायिक इतिहास का सबसे बड़ा फैसला नाल्सा-जजमेंट माना जाता है। 2014 में दो जजों की बेंच ने यह तय किया था कि किसी व्यक्ति की जेंडर-पहचान उसके आत्मसम्मान और उसके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि किसी व्यक्ति को अपनी जेंडर-पहचान तय करने के लिए किसी डॉक्टरी जांच या सर्जरी की जरूरत नहीं होनी चाहिए, व्यक्ति जैसा महसूस करते हैं, उन्हें वैसी ही मान्यता पाने का हक है। सुप्रीम कोर्ट ने यह लिखा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत गरिमा के साथ जीने में अपनी पहचान खुद तय करना शामिल है। इस फैसले के बाद एक दूसरे फैसले में एक और जज ने यह लिखा था कि राज्य को किसी व्यक्ति की निजी पहचान की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है, जब तक कि कोई बहुत बड़ा सार्वजनिक हित न हो।
अभी ट्रांस-कार्यकर्ताओं की आशंका यह है कि यह नया विधेयक उनके लोगों को मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने के लिए मजबूर करके अपमानित भी करता है, और यह किसी व्यक्ति की गरिमा को एक डॉक्टरी मामला बना देता है। उनकी यह भी आशंका है कि मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता से यह प्रक्रिया लंबी और कठिन हो जाएगी, और पहचान प्रमाणपत्र पाने में भ्रष्टाचार बढ़ेगा। कानून के कुछ जानकारों का कहना है कि 2026 का यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के नाल्सा-फैसले की मूल भावना के खिलाफ है, और इसे अदालत में अगर चुनौती दी जाएगी, तो इसके टिकने की संभावना पर शक है। यहां दो-तीन बातों को समझ लेना जरूरी होगा कि 2014 और 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद 2019 में बने हुए ट्रांसजेंडर कानून को सात बरस के भीतर इस तरह आमूलचूल बदलने की क्या जरूरत आ गई है? ट्रांसजेंडरों के अधिकारों का ऐसा कौन सा बेजा इस्तेमाल होने लगा था कि जिसकी वजह से सरकार ने उनकी पहचान को डॉक्टर जांच और सर्टिफिकेट से स्थापित करना अनिवार्य समझा है?
मोदी सरकार के बारे में चारों तरफ यह चर्चा रहती है कि वे गैरजरूरी कानूनों को खत्म करने के हिमायती हैं। इसके साथ-साथ मौजूदा कानूनों में भी कटौती करने के हिमायती हैं, और सरकार की मौजूदगी को कम करना चाहते हैं। उनके बारे में उनके साथ काम किए हुए लोग बताते हैं कि वे कोई भी नया कानून लाने के खिलाफ रहते हैं, और उसकी इजाजत नहीं देते। ऐसे एक करीबी व्यक्ति ने हमें बतलाया है कि वे अधिक से अधिक मौजूदा कानून में संशोधन की छूट देते हैं। अब ट्रांसजेंडरों के लिए सुप्रीम कोर्ट के दो-दो फैसलों के बाद केन्द्र सरकार का लाया हुआ ट्रांसजेंडर कानून संशोधन पारित तो हो गया है, हो सकता है कि एनडीए की ही बनाई हुई राष्ट्रपति बिना देर किए इसे तुरंत ही मंजूरी भी दे दें, लेकिन क्या सचमुच ही 2014 से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग फैसलों के बाद हालात इतने बदल गए हैं कि कानून बदलने की जरूरत आन पड़ी है? अभी हम सिर्फ इस अटपटेपन पर टिप्पणी कर रहे हैं, सरकार के इस विधेयक के गुण-दोष का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, क्योंकि ट्रांस समुदायों के कल्याण के लिए आज सरकारों में नौकरियों में आरक्षण भी है, छत्तीसगढ़ में ही पुलिस विभाग में बहुत से ट्रांस लोगों को नौकरियां मिली हैं। ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए अगर कोई गैरट्रांस लोग अपने को ट्रांस महसूस करने वाला बता दें, तो किसी के महसूस करने की क्या शिनाख्त हो सकती है, उसका क्या सुबूत हो सकता है? ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ, आरक्षण का लाभ पाने के लिए एक तबके के लोगों की शिनाख्त तो जरूरी होती है। अभी हम इस पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं कि आज एलबीक्यूटीआई नाम के एक व्यापक तबके में आने वाले कई तरह के लोगों में से कौन-कौन से लोग, किस-किस तरह की यौन-पसंद के लोग इस विधेयक से ट्रांस-दायरे से बाहर हो जाएंगे? अभी हम इस कॉलम में उतनी बारीकी में नहीं जा पा रहे हैं, लेकिन जब भी किसी संशोधन से अभी के प्रचलित एक व्यापक तबके में से बहुत से लोगों को दायरे से बाहर किया जा रहा है, तो वहां पर संवेदनशीलता के साथ बाहर होते तबकों के जायज हक के बारे में सोचना चाहिए। ट्रांस समुदाय कभी भी बहुत सीधी-सीधी पहचान वाला नहीं रहा है। अब तो जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ रही है, अधिकतर सभ्य देशों में (इनमें अमरीका शामिल नहीं है) लोगों के निजी हक और उनकी पहचान को लेकर कानून अधिक संवेदनशील हो रहे हैं, अभी मोदी सरकार का ट्रांस कानून पहली नजर इसके कुछ उल्टे जाते दिख रहा है। फिर भी इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक बहस होनी चाहिए।
आस्थावान एमपी में केरल से मनोचिकित्सक 24 गुना कम!
29 मार्च 2026
भारत सरकार के मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के ताजा आंकड़े हैरान-परेशान करने वाले हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक देश में दस फीसदी लोग मानसिक उलझनों और दिक्कतों के शिकार हैं, और इनमें से 90 फीसदी को सही इलाज नहीं मिलता, क्योंकि उसकी क्षमता ही नहीं है। हालत यह है कि पिछले पांच साल में केन्द्र सरकार ने जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए जो बजट मंजूर किया था, राज्यों ने उसका आधा भी इस्तेमाल नहीं किया, और समाज तरह-तरह की हिंसा झेल रहा है, आत्मघाती कुंठाओं का शिकार है, हिंसा के आंकड़ों से परे लोग मानसिक समस्याओं को झेल रहे हैं जो कि दिखती नहीं है, और राज्यों की दिलचस्पी उन्हें मिले बजट को खर्च करने में भी नहीं है। 2020 से 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि किसी भी बरस राज्य केन्द्रीय बजट का आधा भी खर्च नहीं कर पाए। लेकिन इन सबसे और भयानक बात यह है कि देश में मनोचिकित्सकों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। 140 करोड़ आबादी के लिए कुल 8-10 हजार मनोचिकित्सक ही उपलब्ध हैं, और इनमें से भी अधिकतर की मौजूदगी चुनिंदा शहरी इलाकों तक सीमित है। यह आखिरी का तर्क सरकारी आंकड़ों पर आधारित नहीं है, लेकिन हमारे नजरी सर्वे से ऐसा दिखता है। दुनिया में एक लाख मरीजों पर वैश्विक औसत 1.3 मनोचिकित्सकों का है, और इस औसत में दुनिया के सबसे कमजोर और फटेहाल देश भी शामिल हैं। लेकिन भारत में यह औसत लाख मरीजों पर 0.75, यानी पौन मनोचिकित्सक का है। आंकड़ों में एक आखिरी आंकड़ा गिनाना और जरूरी है, वह है मध्यप्रदेश में एक लाख आबादी के लिए सिर्फ 0.05 मनोचिकित्सक हैं, जबकि केरल में उनकी गिनती प्रति लाख 1.2 है, जो कि वैश्विक स्तर के एकदम करीब है।
अब देश में सबसे ज्यादा शिक्षित और राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश केरल को देखें, तो वहां देश का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश के मुकाबले औसतन 24 गुना मनोचिकित्सक प्रति लाख आबादी पर हैं। अब हम यह सोचते हैं कि मध्यप्रदेश में मनोचिकित्सा को अवांछित, या अवैध संतान क्यों मान लिया गया है? क्यों ऐसा मान लिया गया है कि यह शायद कोई पश्चिमी प्रभाव है, और भारतीय संस्कृति वाले प्रदेश में मनोचिकित्सकों को इतना गैरजरूरी कैसे मान लिया गया है? जिस केरल और असम में अभी चुनाव होने जा रहे हैं, वहां असम में यह आंकड़ा 0.29 प्रति लाख है, और केरल में 1.20, यानी सीधे-सीधे चार गुना। और असम में भी मध्यप्रदेश की तरह भाजपा की सरकार है। छत्तीसगढ़ के आंकड़े और अधिक फिक्र पैदा करते हैं, जो कि असम से भी आधे से कम हैं, इस राज्य में प्रति लाख आबादी पर 0.14 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। राजस्थान में 0.10!
हम कोई राजनीतिक विश्लेषण किए बिना यह समझना चाहते हैं कि कौन से ऐसे राज्य हैं जिनका भरोसा मनोचिकित्सा पर है, जो उसे जरूरी समझते हैं, और कौन से ऐसे राज्य हैं जो चिकित्सा विज्ञान की इस शाखा की तरफ से पूरी तरह बेपरवाह हैं? ऐसा लगता है कि कुछ राज्यों में गैरचिकित्सकीय तौर-तरीकों पर कुछ अधिक ही भरोसा है। वहां यह मान लिया जाता है कि पूजा-पाठ, दूसरे कुछ किस्म की धार्मिक उपासना, झाड़-फूंक, धागा-ताबीज जैसी चीजों से ही मनोचिकित्सा बेहतर हो जाती है। चारों तरफ एक धार्मिक माहौल बना दिया जाता है, चारों तरफ धार्मिक प्रवचन चलते हैं, इन प्रवचनों को इतनी अधिक राजनीतिक और सामाजिक मान्यता दे दी जाती है, कि किसी और इलाज की जरूरत नहीं रह जाती। क्या यह 21वीं सदी के 26वें बरस में एक सही फैसला है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई दशक पहले दुनिया के कुछ सबसे पिछड़े देशों में वहां के झाड़-फूंक, और बैगा-गुनिया के इलाज को यह कहते हुए अनौपचारिक मान्यता दी थी कि जहां पर और किसी भी तरह का इलाज उपलब्ध नहीं है, वहां पर वह इसे ही आस्था चिकित्सा मान लेगा। मतलब यह कि जब और कोई भी इलाज उपलब्ध नहीं है, तो लोगों को झाड़-फूंक से ही एक मानसिक शांति मिले कि उनका कोई इलाज हो गया है। लेकिन जिस छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद के 25 बरसों में बजट आकार 5 हजार करोड़ से बढक़र 170 हजार करोड़ हो गया है, वहां भी मनोचिकित्सकों की उपलब्धता वैश्विक स्तर के 10 फीसदी भी नहीं हैं, और केरल के मुकाबले तकरीबन 10 फीसदी ही है। पूरे दुनिया में महंगे निर्माण के लिए मार्बल और ग्रेनाइट भेजने वाले राजस्थान में इससे भी और कम, प्रति एक लाख 0.10 मनोचिकित्सक हैं, और हम मध्यप्रदेश में देश का सबसे नीचा औसत 0.05 प्रति लाख आबादी गिना ही चुके हैं।
भारत में आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में झाड़-फूंक जैसी तथाकथित आस्था चिकित्सा का चलन है। शहर और गांवों में धर्म और आध्यात्म के नाम पर, योग और चमत्कार के नाम पर चिकित्सा करने, मानसिक समस्याओं को सुलझाने का दावा करने वाले बलात्कारी बाबा, लुटेरे तांत्रिक, और अलग-अलग धर्मों के दूसरे-दूसरे चोगों वाले चंगाई बाबा मौजूद हैं। यह बात जाहिर है कि जब लोगों को शिक्षित-प्रशिक्षित मनोचिकित्सक हासिल नहीं होते, या वे उनकी क्षमता के बाहर के रहते हैं, तो वे पाखंडियों के झांसे और चंगुल में फंसते हैं, क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं रहता। समाज में मनोचिकित्सा की जरूरत वाले लोगों के आंकड़े सामने नहीं आते हैं, क्योंकि हत्या-आत्महत्या, और बलात्कार जैसे जुर्म से ही लोग यह मानते हैं कि किसी को मानसिक चिकित्सा की जरूरत है, या बहुत से मामलों में तो ऐसे जुर्म हो जाने के बाद भी उन्हें किसी मानसिक उलझन या समस्या से जोडक़र नहीं देखते। जब धर्म, आध्यात्म, भक्ति, करिश्मा, चमत्कार, जादू-टोना, पर लोगों का भरोसा होने लगे, तो सरकार भी एक किस्म से अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है। अंधविश्वास का यह सामाजिक ढांचा सरकार को मुफ्त में भी मिलता है, उसे न इमारतें बनानी पड़तीं, न चिकित्सक-कर्मचारी रखने पड़ते, न अखबारों में पद खाली होने, या ड्यूटी पर न पहुंचने की खबरें नहीं आतीं। सरकार को बड़ी सहूलियत रहती है।
लेकिन देश के चिकित्सकीय ढांचे में इस विकराल कमी की वजह से आबादी का एक पर्याप्त बड़ा हिस्सा जिस तरह की मानसिक चुनौतियों को झेलता है, उससे देश की खुशहाली भी प्रभावित होती है, और उत्पादकता भी। किसी देश को अगर अपनी अर्थव्यवस्था भी विकसित करनी है, तो मानसिक रूप से स्वस्थ कामगार उसके अधिक काम के रहेंगे, मानसिक सेहतमंद लोग बेहतर ग्राहक भी बनेंगे, और सरकार का कानून व्यवस्था का ढांचा भी मानसिक उलझनों से उपजी हिंसा का बोझ नहीं झेलेगा। लेकिन सरकार के फैसले आंकड़ों पर आधारित होते हैं, और जब तक किसी की मानसिक स्थिति हत्यारी या आत्मघाती न हो जाए, सरकार उसे अपनी समस्या नहीं मानती। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हाईकोर्ट कई बार मानसिक चिकित्सा को लेकर फिक्र जाहिर कर चुका है। देश में लोकतंत्र की मानसिक स्थिति ही ठीक नहीं रह गई है, और उसे विचलित होने से बचाने की ताकत सुप्रीम कोर्ट के पास भी नहीं है। ऐसे में किया क्या जाए? केरल में छत्तीसगढ़ से मनोचिकित्सकों का अनुपात साढ़े 8 गुना अधिक है। क्या यह छत्तीसगढ़ के लिए फिक्र की बात नहीं होनी चाहिए? और मध्यप्रदेश तो 24 गुना नीचे है, वह तो सिर्फ आस्था पर चलता प्रदेश दिख रहा है।
चुनावों पर किनका असर? एक नजर देख लें इनको..
29 मार्च 2026
पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को लेकर अब ये अटकलें लगने लगी हैं कि किन राज्यों में राजनीतिक दल कौन से फॉर्मूले इस्तेमाल करेंगे। अभी सुप्रीम कोर्ट में फ्रीबीज नाम का एक मामला चल ही रहा है जिसमें न केवल चुनाव के वक्त, बल्कि सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक दल जनता को कौन-कौन सी चीजें ‘मुफ्त’ देते हैं। इनमें इन दिनों सबसे अधिक चर्चा महिलाओं के बैंक खातों में सीधे भेजी जाने वाली रकम है जो कि कमजोर महिलाओं के सशक्तिकरण के तर्क के साथ शुरू हुई हैं। राजनीतिक आंकलन यह है कि महिलाओं को सीधे नगद मदद भेजने से कई राज्यों में ऐसी पार्टी की जीत हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हमने पिछले विधानसभा चुनाव में यह देखा है कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में तकरीबन हर महिला को हजार रूपए महीने देने की महतारी वंदन योजना घोषित की, और चुनावी नतीजे उसके पक्ष में चले गए। हालांकि इसके साथ-साथ भाजपा ने धान किसानों से 31 सौ रूपए क्विंटल, प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक खरीदने का वायदा भी किया था, लेकिन किसानों के लिए तो वायदा कांग्रेस का भी था। जो भी हो, भारतीय चुनाव किन वजहों से प्रभावित हुए, इसका अंदाज लगाना बड़ा ही मुश्किल रहता है।
फिलहाल इस बरस असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, और पुदुचेरी में दस दिन बाद वोट डलना शुरू हो जाएंगे, और आज से पांच हफ्ते के भीतर सारे नतीजे आ जाएंगे। भारत के चुनावों की लिस्ट देखें, तो हर बरस चार-छह राज्यों के चुनाव होते हैं। और हर पांच बरस में लोकसभा के चुनाव होते हैं जो कि अब 2029 में इसी वक्त होंगे। इसके अलावा देश में पंचायत और म्युनिसिपल चुनाव भी एक संवैधानिक बाध्यता हैं, और हर राज्य में इनका समय अलग-अलग है। कई राज्यों में ये तीनों किस्म के चुनाव साल-साल भर के फासले से भी होते हैं, नतीजा यह होता है कि ये राज्य पूरे पांच बरस चुनावी मोड में रहते हैं। सरकारें कोई कड़े फैसले कर नहीं पातीं, हर थोड़े-थोड़े अरसे में कुछ लुभावने फैसले लेने पड़ते हैं, और हर चुनाव की आचार संहिता के दौर में कई तरह के काम थम जाते हैं। फिर सत्तारूढ़ पार्टी हो, या विपक्षी दल, सबके नेता प्रचार में लग जाते हैं, और गैरचुनावी लोकतांत्रिक-सरकारी काम प्रभावित होते हैं। अभी जैसे जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहां पर उन राज्यों के नेता भी जाकर प्रचार कर रहे हैं, जहां पर चुनाव नहीं हैं। मतलब यह कि सत्ता के नेता हों, या विपक्ष के, वे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी के इलाकों से दूर जाकर चुनाव प्रचार में लगे हैं। देश में वन नेशन-वन इलेक्शन की सोच इन वजहों से भी बनती है, और हम इसका समर्थन भी करते आए हैं। हालांकि देश के बहुत से समझदार दलों ने इस सोच का विरोध किया है, और यह कहा है कि राष्ट्रीय चुनाव अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं, प्रदेश के चुनाव अलग मुद्दों पर, और स्थानीय चुनावों के मुद्दे इन दोनों से अलग रहते हैं। ऐसे में अगर ये सभी चुनाव एक साथ करवाए जाएंगे, तो कोई राष्ट्रीय मुद्दा राष्ट्र में भी किसी पार्टी की सरकार बनवा देगा, और राष्ट्रीय मुद्दा ही पंचायत-म्युनिसिपल चुनाव पर भी हावी हो जाएगा। हम इस तर्क से असहमत नहीं हैं, फिर भी हमारा यह मानना है कि जब लोकसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों के चुनाव भी हुए हैं, तो भी उनमें जनता कुछ जगहों पर इतनी समझदार रही है कि उसने देश में एक पार्टी की सरकार चुनी, और प्रदेश में उसी पोलिंग बूथ से, उसी दिन वोट डालते हुए दूसरी पार्टी की सरकार चुनी। भारत के आज के विपक्षी दलों की आशंका के खिलाफ हमें तो यह भी लगता है कि पंचायत और म्युनिसिपल के स्तर पर किसी पार्टी के उम्मीदवार देखकर, उसके पिछले कार्यकाल का कामकाज देखकर, हो सकता है कि वोटर उसी दिन के वोट में संसदीय चुनाव में भी उस पार्टी के खिलाफ वोट डाल दे। और ऐसा ही राज्य स्तर पर किसी पार्टी की बदनामी की वजह से उसके संसदीय चुनाव पर असर पड़ जाए। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को लेकर अधिक आशंका से नहीं घिरना चाहिए, मतदाता की सोच लोकल से नेशनल, या नेशनल से लोकल, दोनों तरह से प्रभावित हो सकती है।
खैर, आज का हमारा मुद्दा वन नेशन-वन इलेक्शन नहीं है। हम तो यह सोच रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदान के नतीजों को, या उसके बाद बनने वाली सरकार को ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कामयाबी मान लिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि ये सारे चुनाव, और चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया तरह-तरह के अलोकतांत्रिक प्रभावों से भरे रहते हैं। सुनने में अच्छा लगे या नहीं, राजनीतिक दल ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाते हैं, जो चाहे परले दर्जे के मुजरिम ही क्यों न हों, उनकी जीत की क्षमता रहनी चाहिए, आमतौर पर उम्मीदवार के पास गैरकानूनी खर्च के लायक अंधाधुंध पैसा होना चाहिए। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि धर्म और जाति का ध्रुवीकरण कैसे करवाया जा सकता है, कैसे साम्प्रदायिकता खड़ी करके उससे उपजने वाली नफरत को वोटों की शक्ल में भुनाया जा सकता है। राजनीतिक दल यह भी देखते हैं कि किस तरह वोटरों को शराब या नोट बांटकर आखिरी के दो-तीन दिनों में उनका रूख अपनी तरफ किया जा सकता है। वे यह भी देखते हैं कि किस तरह दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को खरीदकर बिठाया जा सकता है, कार्यकर्ताओं को खरीदकर विपक्षी उम्मीदवार को कमजोर किया जा सकता है। हमने कई तरह के नाजायज काम देखे हैं। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने लोकसभा चुनाव लड़ते हुए अपने सामने के भाजपा उम्मीदवार चन्दूलाल साहू के नाम वाले आधा दर्जन और चन्दूलाल साहू ढूंढकर उनसे नामांकन भरवा दिया था, और फिर उन सबको मतदान तक गायब कर दिया था। इसी छत्तीसगढ़ में अंतागढ़ के कांग्रेस उम्मीद्वार की खरीदी-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग आज भी चारों तरफ घूमती है। हमने अपने ही आसपास के शहरों में देखा है कि किस तरह मुस्लिम वोटरों को शक से देखने वालों ने ऐन मतदान के दिन उनकी अजमेर की टिकटें करवा दी थीं, और एक दूसरे उम्मीदवार ने मतदान के एक दिन पहले मुस्लिम वोटरों को बुला-बुलाकर उनकी उंगलियों पर काली चुनावी स्याही लगाकर नगद भुगतान कर दिया था, ताकि वे अगले दिन वोट न डाल सकें। इस तरह की सैकड़ों तिकड़में भारत के चुनावों में होती हैं जिनकी कोई आशंका भी देश के संविधान और चुनाव आयोग के नियमों में नहीं है। फिर अब तो चुनाव आयोग का हाल यह है कि उसके बारे में लतीफे बनते हैं कि वह फलां गठबंधन में शामिल नहीं हो रहा, वह बाहर से समर्थन करेगा। शेषन की साख वाले चुनाव आयोग की शेष न रह गई साख के बारे में अब क्या ही कहा जाए! अभी तो बहुत से लोगों का यह मानना है कि मतदाता पुनरीक्षण से ही अगले चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं।
अब इस बात पर भी आ जाएं कि चुनावों में जो लोग या पार्टियां जीत जाते हैं, उनका क्या होता है? दलबदल कानून की वजह से अब इक्का-दुक्का दलबदल मुमकिन नहीं है, और अब थोक में खरीद-बिक्री को कानूनी दर्जा हासिल है, और वह शायद सस्ता भी पड़ता है। इसलिए अब देश में यह लतीफा भी चलता है कि वोटर वोट किसी को भी दे, उसका निर्वाचित सांसद या विधायक किसे वोट देगा, यह तो वोटर तय नहीं करते। इतने सारे अलग-अलग प्रभावों को देखें, तो लगता है कि भारत के चुनावों के लोकतांत्रिक होने, और वोटर के राजा-रानी होने, देश का भाग्यविधाता होने, जैसी बातें अपने आपको धोखा देने वाली हैं। जरा यही देख लें कि जितने वोटों से कोई उम्मीदवार जीतते हैं, उससे कितने अधिक वोट नाजायज तरीके से प्रभावित किए जाते हैं। फिर किसी पार्टी के जितने उम्मीदवार जीतते हैं, वह पार्टी किस तरह टूटकर किसी और पार्टी या गठबंधन में चली जाती है। यह सब देखकर लगता है कि पार्टी छोडऩे वाले उम्मीदवार चाहे अकेले हों, चाहे दो-तिहाई मिलकर छोड़ें, उनकी सदस्यता तुरंत खत्म होनी चाहिए, अगला चुनाव लडऩे पर 6 बरस की रोक लगनी चाहिए ताकि अगला चुनाव न लड़ सकें। एक यही फैसला हो जाए, तो भारतीय लोकतंत्र की ढेर सारी बदबूदार गंदगी छंट जाएगी। नहीं लगता है आपको? हाल के बरसों के दलबदल देखकर इस एक शर्त को लागू करके देखिए कि 6 साल के अंधेरे भविष्य का खतरा कितने लोगों को पटरी पर बनाए रखेगा!
नेपाल के पूर्व पीएम और गृहमंत्री की गिरफ्तारी पर
28 मार्च 2026
नेपाल में हाल ही में आई नई सरकार ने एक जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पिछले प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली, और पिछले गृहमंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार कर लिया है। अभी नए नौजवान प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ ली थी। मंत्रिमंडल ने यह तय किया था कि ओली सरकार के दौरान हुए जनप्रदर्शनों पर जो सरकारी कार्रवाई हुई थी, और पिछली सरकार के दूसरे मामलों को लेकर एक आयोग की जो जांच रिपोर्ट आई थी, उसे लागू किया जाएगा। उसी के मुताबिक यह कार्रवाई की गई है। नेपाल के चुनावी नतीजों को जिन लोगों ने बारीकी से देखा है वे जानते हैं एक रैप सिंगर से राजनेता बने बालेन शाह ने चुनाव में ओली को भारी लीड से हराया था, और अपनी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया था। नेपाल के चुनाव भ्रष्टाचार, और बेरोजगारी के अलावा एक बड़े भावनात्मक मुद्दे को लेकर भी हुए थे। वहां सत्तारूढ़ नेताओं की औलादें अपनी रईसी, ऐशोआराम, और देश-विदेश की फिजूलखर्ची सोशल मीडिया पर पोस्ट करती थीं, और उन्हें देख-देखकर नौजवान पीढ़ी अधिक भडक़ी हुई थी। पिछले बरस सितंबर के इस आंदोलन में 76 लोग मारे गए थे, जिनमें से कई मौतें पुलिस गोलियों से हुई थीं। ऐसे में एक जनक्रांति की तरह नेपाल में बहुत बड़ा आंदोलन हुआ, और जनता ने ही सरकार को बर्खास्त कर दिया, पिछली सरकार के सारे नेता किसी तरह जान बचाकर भागे थे। अब ऐसे में पिछले पीएम और गृहमंत्री को आपराधिक लापरवाही के आरोप में गिरफ्तार करने की चर्चा है, जांच आयोग ने इन दोनों को इस बात का दोषी ठहराया है कि इन्होंने जनआंदोलन को हिंसक तरीके से दबाने की अनुमति दी थी।
यह केवल नेपाल की बात नहीं है, दुनिया के दर्जनों देशों में अलग-अलग वक्त पर ऐसा होता है कि नई आई सरकार पिछली सरकार के खिलाफ कार्रवाई करती है। भारत में ही आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी सरकार ने देश भर में कांग्रेस सरकारों के खिलाफ जांच आयोग बिठाए थे, और इंदिरा गांधी को गिरफ्तार भी किया था। अमरीका में अभी ट्रम्प ने पिछले राष्ट्रपति के कार्यकाल के जाने कितने ही बड़े-बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू करवाई, जुर्म दर्ज करवाए, उन्हें बर्खास्त किया, क्योंकि पिछली डेमोक्रेटिक सरकार के कार्यकाल में इन लोगों ने ट्रम्प के तरह-तरह के जुर्म पर संवैधानिक और कानूनी कार्रवाई की थी। ऐसा बांग्लादेश में भी देखने आया, पाकिस्तान में भी, और श्रीलंका में भी। पाकिस्तान में तो हालत यह थी कि जनरल जिया उल हक की फौजी तानाशाह सरकार ने पिछले प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी ही दे दी थी। भारत के बहुत से प्रदेशों में भी नाटकीय से लेकर शर्मनाक तक घटनाएं सामने आई हैं। लोगों को तमिलनाडु का वह नजारा नहीं भूलता जब जयललिता की सरकार ने एक बुजुर्ग नेता, और पिछले मुख्यमंत्री एम.करूणानिधि को गिरफ्तार करवाया था, और रात दो बजे उनके घर में बड़ी संख्या में पुलिस घुसी थी, और 78 साल के करूणानिधि को बिस्तर से उठाकर घसीटते हुए, और फिर पूरा का पूरा उठाकर ले जाया गया था। इस दौरान उनके साथ बदसलूकी भी हुई थी, उन्हें गिरा भी दिया गया था, और वे दर्द से चीखते भी रहे थे। ऐसा कई देश-प्रदेश में होता है, और इनको गिरफ्तार होने वाले नेता बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार देते हैं, और सरकार कहती है कि कानून अपना काम कर रहा है। कानून से परे भी बदले और अपमान की भावना से होने वाली कुछ घटनाएं भयानक तरीके से याद रहती हैं। तमिलनाडु में करूणानिधि की गिरफ्तारी के 12 बरस पहले, विधानसभा में विपक्ष की पहली महिला नेता जयललिता एक हंगामे के बीच चलती हुई चप्पलों से विचलित जब सदन से बाहर जा रही थीं, तो उनकी विरोधी पार्टी डीएमके के एक मंत्री ने उनकी साड़ी का पल्लू पकडक़र खींचा था, कंधे पर साड़ी से लगी सेफ्टी पिन अलग हो गई थी, खून निकलने लगा था, और फटी हुई अस्त-व्यस्त साड़ी, बिखरे हुए बालों सहित रोती हुई जयललिता ने सदन छोड़ा था। शायद करूणानिधि की गिरफ्तारी इसी का हिसाब चुकता करना था। जयललिता उस दिन कसम खाकर निकली थीं कि वे मुख्यमंत्री बनने के बाद ही सदन में लौटेंगी, और दो साल के भीतर ही 1991 में ऐसी नौबत आ गई थी।
लेकिन हम पिछली सरकारों के खिलाफ जांच और कानूनी कार्रवाई को गलत नहीं मानते, जरूरी मानते हैं। नेपाल की इस ताजा घटना के पहले भी हम अपने अखबार में इसी जगह पर कई बार लिख चुके हैं कि किसी भी नई सरकार को आते ही एक जांच आयोग बनाना चाहिए जो पिछली सरकार के कार्यकाल के सारे आरोपों और शिकायतों की जांच करे। यह बात राजनीतिक नफे या नुकसान की हो सकती है, जनता पार्टी सरकार के दौरान इंदिरा गांधी, और कांग्रेस सरकारों के खिलाफ बनाए गए जांच आयोगों से जनता पार्टी की ही सरकार को नुकसान हुआ था, ऐसा माना जाता है, लेकिन नफे-नुकसान से परे यह हर नई सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सत्तारूढ़ हुई पार्टी और उसके नेताओं ने जिन आरोपों को लगाकर सत्ता पाई है, उन्हें साबित भी किया जाए, इसके अलावा जनता को भी यह हक मिलना चाहिए कि वह पिछली सरकार के खिलाफ मामले लाकर दे सके। इसे राजनीतिक दुर्भावना कहने वाले दुर्भावना कहते रहें, हम तो इसे हर सरकार की जिम्मेदारी मानते हैं कि पिछली सरकार के भ्रष्टाचार की खुली सुनवाई और जांच होनी चाहिए।
न सिर्फ नेपाल या भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश, बल्कि तकरीबन पूरी ही दुनिया में अब यह साफ हो गया है कि हर सरकार के कार्यकाल में सत्ता की मेहरबानी से बहुत से भ्रष्टाचार होते हैं। ऐसे में अगर सत्तारूढ़ नेताओं को यह पता रहेगा कि सरकार बदलते ही अनिवार्य रूप से उनके मामलों की जांच होगी, तो वे भ्रष्टाचार करने में शायद कुछ हिचकेंगे। और इसे एक नियमित व्यवस्था बना देने से राजनीतिक दुर्भावना का आरोप भी जाते रहेगा। हर सरकार को अपना कार्यकाल शुरू होते ही पिछली सरकार के पूरे कार्यकाल के लिए आयोग की घोषणा कर देना चाहिए, और जरूरत हो तो इसके लिए संसद या अलग-अलग राज्यों की विधानसभाएं भी एक कानून बना सकती हैं। ऐसे आयोग अभी लोकायुक्त, लोक आयोग, या लोकपाल की मौजूदा व्यवस्था से परे के हो सकते हैं, और वे जनसुनवाई करके शिकायतें और सुबूत इकट्ठे कर सकते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक शिष्टाचार निभाने के बजाय जनता को भ्रष्टाचार से बचाने का काम करना चाहिए।
गुजरात में बैठा सरगना, छत्तीसगढ़ में कॉलसेंटर, अमरीका तक होती ठगी!
27 मार्च 2026
दुनिया भर में टेलीफोन पर लोगों को ठगने, धमकाने, ब्लैकमेल करने के संगठित जुर्म लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं। भारत के पड़ोस में राजनीतिक अस्थिरता, और फौजी तानाशाही से गुजरते हुए म्यांमार में हजारों लोगों को कैद करके उनसे ऐसे कॉलसेंटर चलवाए जा रहे हैं जो भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोगों से साइबर ठगी-जालसाजी करते हैं, उन्हें धमकाते हैं, डिजिटल अरेस्ट का झांसा देते हैं, और उनकी जिंदगी भर की कमाई को खाली कर देते हैं। ऐसे साइबर क्राइम की खबरें हर दिन आती हैं, लेकिन अभी दो दिन पहले आई एक खबर कुछ अनोखी निकली। जिस छत्तीसगढ़ में हर दिन दर्जनों लोग साइबर-ठगी के शिकार होते हैं, उस छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ऐसा एक अपराधी कॉलसेंटर चल रहा था, जो दुनिया के दूसरे देशों, खासकर अमरीका और यूएई के लोगों को लोन दिलाने के नाम पर ठग रहा था। छत्तीसगढ़ पुलिस ने रायपुर के एक संपन्न इलाके में फायनेंस कंपनी की आड़ में चल रहे ऐसे कॉलसेंटर को पकड़ा, और यहां से 42 लोगों को गिरफ्तार किया। इनके पास से कई दर्जन मोबाइल फोन, डेढ़ दर्जन लैपटॉप, दो दर्जन से अधिक कम्प्यूटर, और बाकी चीजें गिरफ्तार की गईं। पुलिस की जानकारी के अनुसार अहमदाबाद में बैठा हुआ एक व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क को कंट्रोल कर रहा था, वही यह कॉलसेंटर चला रहा था, कर्मचारियों का इंतजाम कर रहा था, और वसूली-उगाही कर रहा था। अभी तक छत्तीसगढ़ का नाम ठगने वाले मुजरिम प्रदेशों की लिस्ट में नहीं था, लेकिन अब अहमदाबाद में बैठे एक मुजरिम की वजह से यह प्रदेश भी ठग-जालसाज प्रदेश की तरह पहली बार सामने आया है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का कोई बहुत अंतरराष्ट्रीय लेन-देन कभी नहीं रहा। कुल मिलाकर थोड़ा-बहुत आयरन ओर, और कुछ चावल ही यहां से निर्यात होता है, लेकिन धोखाधड़ी-जालसाजी निर्यात होने का यह पहला मौका सामने आया है। अमरीका और योरप के वक्त के मुताबिक रायपुर में यह कॉलसेंटर शाम में काम शुरू करता था, और दूसरे देशों में लोन का फर्जी प्रस्ताव देकर ठगी करता था। जो लोग यहां से गिरफ्तार हुए हैं, वे सारे के सारे इस प्रदेश के बाहर के हैं, शायद इसलिए कि स्थानीय लोगों से बात बाहर जाने का खतरा अधिक हो सकता था। गिरफ्तार नौजवान कई प्रदेशों से यहां जुटाए गए थे, और यहां ठगी से जुटाया गया पैसा हवाला या क्रिप्टोकरेंसी के जरिए विदेश भेज देने की जानकारी भी सामने आई है। दिलचस्प बात यह भी है कि अधिकतर आरोपी दसवीं या बारहवीं पास हैं, मतलब यह कि जितनी पढ़ाई पर हिन्दुस्तान में ढंग का कोई काम नहीं मिल सकता, वे यहां बैठे हुए अमरीका और योरप के लोगों को ठग रहे थे। रोजगार की इन नई संभावनाओं से यह भी पता लगता है कि अगर मौका मिले, तो हिन्दुस्तानी अर्धशिक्षित बेरोजगार भी कहीं तक भी पहुंच सकते हैं।
जब संपन्न और विकसित देशों के लोग ठगी का शिकार हो सकते हैं, तो यह बात भी उठती है कि क्या साइबर-ठगी, और दूसरे किस्म के साइबर-जुर्म से बचाव के लिए बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए सरकार को शिक्षण-प्रशिक्षण का कोई इंतजाम तुरंत नहीं करना चाहिए? हाल के बरसों में जो मामले सामने आए हैं, उनमें फौज के बड़े-बड़े तीन स्टार जनरल रह चुके रिटायर्ड अफसर भी साइबर-ठगी में करोड़ों रूपए गंवा चुके हैं, देश के बहुत से प्रदेशों में बहुत से लोग अपने आपको डिजिटल अरेस्ट में गिरफ्तार मानकर अपनी सारी जमापूंजी ठगों के बैंक खातों में डाल चुके हैं। कुछ मामले तो ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें तीन-चार हफ्तों तक कोई बुजुर्ग, या परिवार के सारे लोग अपने के डिजिटल अरेस्ट में मानकर कैद रहे, ठगों के हुक्म मानते रहे, बैंक अफसरों के समझाने पर भी समझने को तैयार नहीं हुए, और अपनी पूरी रकम ठगों के खातों में डालते रहे। इनमें ऐसे-ऐसे बुजुर्ग और बीमार लोग शामिल थे, जो कि ऐसे तनाव में मर सकते थे। अब अगर ऐसी मौतें हुई भी होंगी, तो भी वे हमें अभी तुरंत याद नहीं पड़ रही हैं। फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि अभी इसी वक्त अमरीका के एक राज्य में एक अदालत ने फेसबुक की कंपनी, मेटा पर सैकड़ों करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया है क्योंकि उसने अपने प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को जुर्म का शिकार होने से बचाने के लिए जरूरत के मुताबिक सावधानी नहीं बरती थी। ऐसे में दुनिया भर के साइबर और ऑनलाइन मुजरिम अमरीका, ब्रिटेन जैसे बहुत से देशों में छोटे स्कूली बच्चों को फंसा लेते हैं, उनकी नग्न तस्वीरें ले लेते हैं, और फिर उन्हें ब्लैकमेलिंग के एक रैकेट में फंसाकर उनसे वसूली करते हैं। खुद अमरीका में ऐसी ब्लैकमेलिंग से थके हुए दहशत के शिकार कई बच्चों ने खुदकुशी तक कर ली है। अभी भारत जैसा देश इस तरह की साइबर-सावधानी बरतने से कोसों दूर है। इस देश के एक-दो राज्य, तेलंगाना, और कर्नाटक यह पहल जरूर कर रहे हैं कि कमउम्र बच्चों को किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर दाखिला न दिया जाए, लेकिन ऐसे कानून भी जब तक देश के स्तर पर नहीं बनेंगे, बाकी प्रदेशों के बच्चे तो खतरे में रहेंगे ही। फिर मेटा जैसी दानवाकार कंपनी से लडऩे-भिडऩे की ताकत किसी एक प्रदेश की नहीं हो सकती, और इसके लिए भारत सरकार जैसी एक बड़ी ताकत की जरूरत होगी।
हम भारत के जामताड़ा जैसे छोटे इलाके से बरसों पहले से देश भर में की जा रही साइबर-ठगी को अब बढ़ते-बढ़ते यहां पहुंचा हुआ देख रहे हैं कि गुजरात में बैठा सरगना छत्तीसगढ़ में कॉलसेंटर चला रहा है, दूसरे प्रदेशों से नौजवानों को लाकर दुनिया के बड़े-बड़े देशों के लोगों को ठग रहा है। यह नौबत भारत सरकार, और तमाम प्रदेशों की सरकारों की तरफ से अधिक सावधानी, अधिक तैयारी और पहल सुझाती है। अगर सरकार ने इस देश के भीतर डिजिटल अरेस्ट नाम के फ्रॉड के खिलाफ जागरूकता पैदा नहीं की, ऑनलाइन धोखाधड़ी के प्रति लोगों को सावधान नहीं किया, तो बहुत देर हो जाएगी। छोटे-छोटे मुजरिम पकड़ाएंगे, और बड़े सरगना तब तक पूरा पैसा देश के बाहर ले जाएंगे। केन्द्र सरकार के पास ऐसे साइबर-फ्रॉड पर नजर रखने के लिए भी कई तरह के अधिकार हैं, और उसकी तकनीकी क्षमता भी राज्यों के मुकाबले बहुत अधिक है। अब सबको मिलकर जनजागरण का एक ऐसा अभियान चलाना चाहिए, जिसकी शिक्षा स्कूल के कोर्स से ही शुरू हो जाए, और हर बच्चे को यह होमवर्क दिया जाए कि वे घर जाकर परिवार के दूसरे बड़े सदस्यों को भी ऐसा पाठ पढ़ाएं, और उससे पूरे-पूरे परिवार जागरूक हो सकें, लुटने से बच सकें। दूसरी तरफ इस बात को अनदेखा नहीं करना चाहिए कि मुजरिम सरकारी एजेंसियों के मुकाबले बहुत अधिक रफ्तार से आगे बढ़ते हैं, उन्हें नई तकनीक जानने-समझने के लिए कोई टेंडर नहीं बुलाना पड़ता, वहीं सरकार को कोई भी काम करने के लिए बजट मंजूरी से लेकर टेंडर तक कई तरह की देर होती जाती है। समाज भी सोच सकता है कि वह किस तरह जागरूकता पैदा कर सकता है।
बहती माहवारी के साथ छात्रा को परीक्षा हॉल में बिठाने वाली शिक्षिका थी!
26 मार्च 2026
लड़कियों और महिलाओं की माहवारी का मामला लगातार किसी न किसी खबर में बने रहता है। यह एक किस्म से अच्छी नौबत है कि एक-दो पीढ़ी पहले जिस बात की चर्चा भी शर्मिंदगी मानी जाती थी, वह बात अब पहले के मुकाबले कुछ अधिक खुलकर की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दो अलग-अलग मामलों में माहवारी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है, और टिप्पणी की है। एक मामले में उसने तमाम राज्य सरकारों को कहा है कि स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी पैड दिए जाएं, और उनके लिए शैक्षणिक संस्थाओं में ऐसे अलग शौचालय बनाए जाएं, जहां पर वे माहवारी के दिनों में सहूलियत से पैड बदल सकें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मानना राज्य सरकारों के लिए एक बंदिश है, यह एक अलग बात है कि ऐसे कई फैसलों पर अमल करने में राज्य सुस्ती दिखाते हैं, और आसानी से आदेश पूरा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी कुछ लोगों को खटक सकती है कि कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दिनों में अनिवार्य छुट्टी का प्रावधान बनाने से महिलाओं में हीनभावना भी आ सकती है, और नौकरी देने वाले लोग भी महिलाओं को काम पर रखने से कतरा सकते हैं। ये दोनों ही मामले अलग-अलग किस्म के थे, छुट्टी वाली याचिका अदालत ने खारिज कर दी, और कहा कि ऐसे स्वैच्छिक अवकाश की नीति बनाने पर सरकार विचार कर सकती है, लेकिन इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने का मतलब महिलाओं के कामकाज का नुकसान करना हो जाएगा।
आज इस पर चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं कि महाराष्ट्र के नासिक का एक ताजा समाचार है कि वहां स्कूल की बोर्ड इम्तिहान दे रही एक छात्रा ने जब वहां मौजूद शिक्षिका को बताया कि उसकी माहवारी शुरू हो गई है, तो भी शिक्षिका ने उसे बाथरूम तक नहीं जाने दिया, और उसी हालत में उसे बाद के एक घंटे तक बैठना पड़ा। इस घटना की खबर उजागर होने पर बोर्ड के चेयरमैन ने इसे गलत फैसला बताया, और कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि परीक्षा दे रहे छात्र-छात्राओं को शौचालय न जाने दिया जाए। उन्होंने कहा कि शरीर की प्राकृतिक जरूरतों को नहीं दबाया जा सकता, और शिक्षकों को ऐसे नियम बनाने और थोपने का कोई अधिकार नहीं है। बोर्ड की तरफ से इस शिक्षिका को नोटिस भी जारी किया जा रहा है कि उसने इस छात्रा के कहने पर भी उसे बाथरूम तक जाने की छूट क्यों नहीं दी। छात्रा का कहना है कि माहवारी शुरू होने के बाद उसके लिए पर्चा लेकर बैठना मुमकिन नहीं था, और उसके पूरे कपड़े खून से भर गए। इम्तिहान के बाद भी उसे अपनी सहेलियों के घेरे में निकलना पड़ा, क्योंकि ऐसे कपड़े शर्मिंदगी की वजह थे। जब उसने स्कूल की एक कर्मचारी से सेनेटरी नेपकिन मांगा, तो उसने कहा कि स्कूल में इसे नहीं रखा जाता। परिवार ने इसकी शिकायत करते हुए कहा कि शिक्षिका को सजा दिलवाना नहीं चाहते, लेकिन वे बोर्ड के नियमों और निर्देशों को अधिक संवेदनशील बनवाना चाहते हैं।
महाराष्ट्र एक विकसित प्रदेश माना जाता है जहां पर साक्षरता, शिक्षा, जागरूकता, और संपन्नता सभी देश के औसत से अधिक होनी चाहिए। इसके बाद भी अगर सुप्रीम कोर्ट के कई तरह के फैसलों और निर्देशों के बाद भी इम्तिहान के दौरान अगर स्कूलों में पैड का इंतजाम नहीं है, शिक्षिका में संवेदनशीलता नहीं है, तो यह बड़ी ही फिक्र की बात है। कई शिक्षक-शिक्षिकाएं नियमों को कड़ाई से लागू करने के लिए अमानवीय हद तक चले जाते हैं। देश में जगह-जगह छोटे-छोटे बच्चों को भयानक अमानवीय सजा देने वाले टीचर्स गिरफ्तार भी होते हैं, लेकिन फिर भी हर किसी को समझ नहीं आती है। ऐसे में समाज के भीतर ही अपनी जिम्मेदारी, और दूसरों के अधिकार को लेकर एक बेहतर सामाजिक चेतना की जरूरत है। आज भारत का हाल यह है कि लोगों को अपने अधिकार, और दूसरों की जिम्मेदारी से परे कुछ नहीं सूझता है।
भारत में हर बरस लाखों लड़कियां इसलिए स्कूल छोड़ देती हैं कि उनकी माहवारी के दिनों में स्कूल में शौचालय का इंतजाम नहीं रहता, पानी नहीं रहता, और बदन से बहते हुए खून के साथ वहां बैठना कई बार शर्मिंदगी की वजह बन जाता है। यह समाज वैसे भी माहवारी जैसी प्राकृतिक-शारीरिक प्रक्रिया को लेकर एक निहायत ही नाजायज कुंठा और वर्जना से भरा हुआ है। समाज के एक हिस्से में अभी तक परिवारों के भीतर भी माहवारी से गुजर रही लडक़ी या महिला को अछूत मान लिया जाता है, उसे तमाम किस्म के पूजा-पाठ, रसोई, और शुभ कार्यों से दूर रखा जाता है। लड़कियों के मानसिक विकास में इस भेदभाव का बड़ा बुरा असर पड़ता है क्योंकि हर महीने वह कुछ दिनों के लिए अपने खाने-पीने के लिए भी परिवार में दूसरों की मोहताज हो जाती है, और परिवार के व्यवहार की वजह से वह अपने दस फीसदी दिन छुआछूत की हीनभावना में गुजारती है। इस देश में लड़कियों को बराबरी का हक देने के लिए कागज पर लिखा हुआ कानून बिल्कुल ही नाकाफी है। एक लडक़ी को जन्म से लेकर मरने तक अपने खुद के परिवार में, स्कूल, कॉलेज, और खेल के मैदान पर, उपासना स्थलों पर, और कामकाजी जगह पर तरह-तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है। इन तमाम जगहों पर उसे यौन शोषण से लेकर मानसिक प्रताडऩा तक झेलनी पड़ती है। इन सबसे पढ़ाई-लिखाई, और कामकाज की उसकी संभावनाएं बहुत बुरी तरह प्रभावित होती हैं। जो देश अपनी आधी आबादी को मंदिर-मस्जिद से दूर रखता है, रसोईघर से दूर रखता है, लडक़ी के बदन की जिस प्रक्रिया की वजह से मानव जाति आगे बढ़ती है, उसी प्रक्रिया को हिकारत से देखकर लडक़ी की जरूरतों की हेठी करता है, वह देश संभावनाओं को खो भी देता है। कोई हैरानी की बात नहीं है कि भारत की कामकाजी गिनती में महिलाओं का अनुपात बहुत ही कम है। जब उनकी बुनियादी जरूरतों के लिए सहूलियतें नहीं रहेंगी, तो वे बराबरी से काम कैसे कर सकेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्कूल-कॉलेज वाले फैसले में लड़कियों के हक को साफ कर दिया है, और समाज और सरकार की जिम्मेदारी तय कर दी है। अब यह सांसदों और विधायकों की भी जिम्मेदारी है कि वे सरकारों को घेरें, और अदालती फैसले पर अमल करवाएं। देश की आधी आबादी को लगातार हीनभावना में रखना, भेदभाव का शिकार बनाना, बहुत ही नाजायज बात है, और किसी भी जिम्मेदार लोकतंत्र को इस सिलसिले को तेजी से खत्म करना चाहिए।
संविधान की नजर में धर्म बदलने वाले दलितों और आदिवासियों में फर्क है..
25 मार्च 2026
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर कल देश भर में एक खलबली मची। बहुत से लोगों ने जाने किस वजह से खुशियां मनाईं, कुछ राजनीतिक दलों के प्रवक्ता इसे जीत की तरह साबित करने पर उतारू हो गए, कुछ जातियों के संगठन भी खुशियां मनाने लगे। और फैसला महज इतना था कि जो दलित हिन्दू, बौद्ध, या सिक्ख धर्म से परे के किसी भी धर्म में जाते हैं, तो उनका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो जाता है। मतलब यह कि उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, और अनुसूचित जाति को जुल्म से बचाने के लिए जो एक कानूनी संरक्षण बनाया गया है, उसका लाभ भी नहीं मिलेगा। यह 1950 में भारत में लागू हुए संविधान में ही लिखा हुआ है, और यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक, या कि किसी छोटी अदालत तक भी जाने की कोई वजह नहीं थी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में इतना लचीलापन है कि संविधान के कई बुनियादी तत्वों को भी लोग चुनौतियां दे सकते हैं, और अदालतें काफी दूर तक उन्हें सुनने-समझने की कोशिश भी करती हैं कि शायद संविधान के किसी पहलू की कोई नई व्याख्या निकल आए।
अब इस मामले को देखें, तो यह आंध्रप्रदेश का एक मामला था जिसमें ईसाई बन चुके एक दलित पादरी ने शिकायत की थी कि उन्हें 2020 में कुछ लोगों ने घर पर प्रार्थना के बीच जाति आधारित गालियां दी थीं। उन्होंने एसटी-एससी एक्ट के तहत पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। अभियुक्तों का कहना था कि वे सालों से ईसाई हैं, इसलिए वे एससी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज नहीं कर सकते। इस तर्क के आधार पर मामला आंध्र हाईकोर्ट तक पहुंचा, और पिछले बरस आंध्र हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत करने वाला पादरी दस साल से ईसाई है, और चूंकि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं, इसलिए दलितों को जाति के संरक्षण से बाहर कर दिया गया है। यह शिकायत खारिज होने पर यह भूतपूर्व दलित पादरी सुप्रीम कोर्ट गया, और सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि सिर्फ हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध धर्मों में ही जाति व्यवस्था का ऐसा ढांचा है कि उसमें दलितों से भेदभाव की परंपरा है, इसलिए इन धर्मों में जो लोग दलित हैं, वे भी कोई दूसरा धर्म अपनाने पर इस लाभ से बाहर हो जाते हैं।
अदालत के सामने इस मामले में दलितों के इन तीन धर्मों से परे के किसी धर्म में जाने पर सिर्फ कानूनी संरक्षण का मुद्दा था, आरक्षण का मुद्दा तो पहले से ही पूरी तरह तय हो चुका है कि धर्मांतरित दलित इन तीन धर्मों के बाहर जाने पर आरक्षण के भी हकदार नहीं रह जाते। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बिना कोई नई बात कहे 1950 की संवैधानिक व्यवस्था को ही दुहराया है, और इस पर जाने क्या-क्या सोचकर कौन-कौन से तबके खुशियां मनाने में जुट गए हैं। एक दिलचस्प दूसरा पहलू यह भी है कि ओबीसी तबकों के जो लोग ईसाई या मुस्लिम बनते हैं, उन्हें अभी तक ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलता है। जाहिर है कि पिछड़े वर्ग की व्यवस्था हिन्दू, सिक्ख, और बौद्ध से परे के कुछ धर्मों में भी लागू होती हो, और केन्द्र सरकार वहां भी ओबीसी आरक्षण का हकदार उन्हें मानती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में 2004 से एक ऐसी याचिका खड़ी हुई है जिसमें कहा गया है कि इस्लाम और ईसाई धर्म में जाने वाले हिन्दू, दलितों को भी अनुसूचित जाति में गिना जाना चाहिए, और उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक केन्द्र सरकार ने इसका विरोध किया है, लेकिन एक कमेटी गठित की है, जो कि यह गौर कर रही है कि क्या मुसलमान और ईसाई हो चुके हिन्दू-दलितों को अनुसूचित जाति के दर्जे में रखा जाना चाहिए? अभी तक इस मामले में कुछ तय नहीं हुआ है, इसलिए 1950 से चली आ रही संवैधानिक व्यवस्था ही जारी है।
अब कुछ लोगों के मन में यह उत्सुकता हो सकती है कि दलितों और आदिवासियों के बीच आरक्षण-संरक्षण के मुद्दे पर संवैधानिक व्यवस्था में फर्क क्यों है। यह समझना जरूरी है कि आदिवासियों को किसी जाति की वजह से आरक्षण नहीं मिला, बल्कि उन्हें अपनी परंपराओं, और अपने संस्कारों का पालन करने की वजह से आरक्षण मिला, और किसी जुल्म-ज्यादती के खिलाफ एसटी-एससी एक्ट का संरक्षण भी मिला। इसलिए जब कोई आदिवासी किसी भी दूसरे धर्म में जाते हैं, तो वे अपने सामुदायिक संस्कारों, और परंपराओं का पालन उस नए धर्म में भी जारी रखते हैं। इसी आधार पर आदिवासियों को किसी भी धर्म में जाने पर आरक्षण और संरक्षण का अधिकार जारी रहता है। बहुत पुराने वक्त से यह मांग भी राजनीति में चल रही है कि आदिवासी अगर ईसाई बनते हैं, तो उनका आरक्षण का हक खत्म कर देना चाहिए। छत्तीसगढ़ में ही दक्षिण में बस्तर के आदिवासी इलाके से लेकर उत्तर के सरगुजा के आदिवासी इलाके तक यह मांग कई बार उठती है कि ईसाई बने आदिवासियों की डी-लिस्टिंग की जाए, उनका आरक्षण खत्म किया जाए। यह आंदोलन नया नहीं है, यह मांग इंदिरा गांधी के वक्त से झारखंड के कुछ कांग्रेसी नेता भी उठाते आए हैं, लेकिन संविधान की व्याख्या जितनी भी बार की गई, यही पाया गया कि आदिवासी अगर किसी धर्म में जाते हैं, तो भी वे आदिवासी ही बने रहते हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि देश के आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा अपने को आदिवासी धर्म का ही मानता है, और आदिवासी धर्म के हक पाने के लिए वह देश में सरना-कोड लागू करने की मांग करते आया है। अब सरना-कोड के बहुत अधिक खुलासे यहां देना मुमकिन नहीं है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आदिवासी आज भी यह मांग कर रहे हैं कि जनगणना में आदिवासी धर्म का कॉलम अलग से होना चाहिए। आदिवासियों में से बहुत से लोग अपने आपको किसी भी दूसरे धर्म से अलग का मानते हैं, और वे अपने आपको हिन्दू भी नहीं मानते। दूसरी तरफ हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले संगठन, और राजनीतिक दल आदिवासियों को हिन्दू मानकर उन्हें जनगणना में अलग से आदिवासी दर्ज करने के खिलाफ रहते हैं। यह भी एक बड़ी दिलचस्प विसंगति है कि हिन्दू समाज में जिन दलितों की जगह सबसे नीचे रहते आई है, वे दलित तो बड़ी संख्या में बौद्ध बने, और मुस्लिम भी बने। दूसरी तरफ हिन्दू समाज के ही कहे जाने वाले आदिवासी दलितों की तरह छुआछूत और प्रताडऩा के पात्र नहीं थे, और वे काफी हद तक हिन्दू रीति-रिवाज को भी बिना किसी प्रतिरोध के मानने लगे, तब तक, जब तक कि जनगणना में वे अपने को आदिवासी दर्ज करवाना नहीं चाहते। अब अगर जनगणना पत्र में आदिवासी का कॉलम ही नहीं होगा, तो इन आदिवासियों के सामने अपनी पहचान का एक बड़ा संकट रहेगा, पता नहीं उससे राजनीतिक मुद्दा किस तरह बनेगा।
फिलहाल तो सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बारे में यही कहने की जरूरत है कि यह मामला ही गैरजरूरी और बेबुनियाद था, और सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ यही कहना पड़ा कि 1950 से जो संवैधानिक व्यवस्था चली आ रही है, उसके तहत ईसाई बनने वाले दलितों को कोई आरक्षण-संरक्षण जारी नहीं रह जाता।
ट्रम्प का हर हफ्ते का यू-टर्न, लचीलापन या विश्वासघात?
24 मार्च 2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल के सिर्फ 14 महीनों में इतनी बार अपनी नीतियां, वादे और फैसले पलट चुके हैं कि अब यह उनकी कार्यशैली का स्थायी चरित्र बन गया है। कुछ लोग इसे लचीलेपन और कल्पनाशील सौदेबाजी कहकर बचाव करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इतने कम समय में इतने बड़े-बड़े फैसले उलट-पलट करने वाला कोई निर्वाचित राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में पहले नहीं हुआ। ट्रम्प अब ‘यू-टर्न राष्ट्रपति’ बन चुके हैं। हर हफ्ते नया पलटाव, नई अनिश्चितता, नया विश्वासघात।
ट्रम्प के यू-टर्न की सूची लंबी और चौंकाने वाली है। ईरान पर अधिकतम दबाव का दावा करते हुए उन्होंने ईरानी तेल पर छूट दे दी। रूस पर सख्ती का ऐलान कर रूसी तेल खरीदने का रास्ता खोल दिया। कनाडा-मैक्सिको पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, फिर टाल दिया। यूक्रेन युद्ध 24 घंटे में खत्म करने का दावा किया, फिर मदद जारी रखी। ग्रीनलैंड खरीदने का ड्रामा रचा, फिर चुपचाप पीछे हट गए। टिकटॉक बैन का वादा किया, अब एक अमरीकी कंपनी को जोडक़र चीनी मालिक के साथ समझौता कर रहे हैं। क्रिप्टो पर दुश्मनी का रवैया रखा, अब रणनीतिक स्टॉक बनाने की बात कर रहे हैं। यह सिर्फ नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि सिद्धांतों का खुला त्याग है।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ट्रम्प के इन यू-टर्न से नैटो देशों, यूरोप और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों का भरोसा पूरी तरह टूट गया है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा के नेता अब खुलकर कह रहे हैं कि ‘ट्रम्प की कोई नीति स्थायी नहीं है। आज जो वादा करते हैं, कल पलट देते हैं।’ नतीजा यह कि नैटो देश अब अपनी रक्षा पर खुद ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यूरोप में अमरीका-प्रथम को अब महज-अमरीका के रूप में देखा जा रहा है। ट्रम्प ने न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे अमरीका की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है।
इसके अलावा, ट्रम्प की कमजोर नब्जों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एपस्टीन से जुड़ी खबरों को दबाने की कोशिशें और इजराइली मोसाद के हाथ में ट्रम्प की कुछ कमजोरियां होने की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। कई रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों में दावा किया जा रहा है कि नेतन्याहू इन कमजोरियों का इस्तेमाल करके ट्रम्प से वह सब करवा रहे हैं, जो आधी सदी में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति से नहीं करवा सके। साथ ही ट्रम्प परिवार के कारोबारी हित भी विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं। क्रिप्टोकरेंसी, रेयर मिनरल्स और अन्य क्षेत्रों में ट्रम्प परिवार के हितों की खबरें बार-बार सामने आ रही हैं। कई देशों से जुड़े इन व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभों के कारण अमेरिकी विदेश नीति व्यक्तिगत स्वार्थ की दिशा में मुड़ती दिख रही है।
ट्रम्प की इस अस्थिरता और व्यक्तिगत हितों की नीति ने पूरी दुनिया की चैरिटी, पर्यावरण, कारोबार और रोजगार को जिस बुरी तरह प्रभावित किया है, उतना तो हिटलर भी नहीं कर पाया था। पर्यावरण समझौतों से पीछे हटना, ग्लोबल वार्मिंग पर चुप्पी, कारोबारी युद्ध, टैरिफ की अनिश्चितता और रोजगार के अवसरों का नुकसान, सब कुछ एक साथ हुआ है।
सबसे बड़ा और लंबे समय तक रहने वाला खतरा यह है कि ट्रम्प का यह मिजाज अगले किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए नवसामान्य बन सकता है। एक बार जब एक निर्वाचित राष्ट्रपति दिखा देता है कि बड़े-बड़े वादे और नीतियाँ इतनी आसानी से पलटी जा सकती हैं, तो भविष्य के नेता भी इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय समझौतों की विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी, सहयोगी देश खुद को सुरक्षित रखने के लिए अलग गठबंधन बनाने लगेंगे और अमेरिका की वैश्विक लीडरशिप स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगी। यह छोटा खतरा नहीं है। यह लोकतंत्र और वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।
ट्रम्प का हर हफ्ते यू-टर्न अब कोई छोटी बात नहीं रह गया है। यह अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व भूमिका को कमजोर कर रहा है, सहयोगियों का भरोसा तोड़ रहा है और दुनिया भर में अनिश्चितता फैला रहा है। कुछ इसे लचीलापन कहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह अस्थिरता है, जिसकी कीमत न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया चुका रही है। और सबसे अधिक खुद अमरीका चुका रहा है जिसके भीतर यह पूरी तरह, और बुरी तरह स्थापित हो चुका है कि वहां के संविधान में कुछ बुनियादी दरारें हैं जिनकी वजह से वहां के राष्ट्रपति को एक पिशाच-तानाशाह बन जाने का पूरा मौका हासिल हुआ है। इस ट्रंप ने पूरी दुनिया के सामने घटियापन की नई मिसालें कायम की हैं, और इसकी काट किसी भी लोकतांत्रिक देश में आसानी से नहीं निकल पाएगी, इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे घटिया राष्ट्रपति की तरह दर्ज हो जाना तय है।
अभी तक जो इजराइल अमरीका का पिट्ठू बना चल रहा था, आज उसी इजराइल का पालतू बनकर ट्रम्प उसके हुक्म पर ईरान पर एक अभूतपूर्व हमला कर चुका है, और दुनिया में जंग खत्म करवाने के नाम पर वह सत्ता पर आया था, आज वह दुनिया का सबसे बड़ा जंगखोर बन गया है। इस जंग के साथ-साथ उसने मध्य-पूर्व के देशों में अपने सारे पुराने साथियों को एक ऐसी बुरी मुसीबत में डाला है कि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प और अमरीका की विश्वसनीयता इन सारे देशों के बीच खत्म हो चुकी है क्योंकि अमरीकी फौजी अड्डों के रहते हुए उन्हें कोई हिफाजत तो नहीं मिली, ईरान के गैरजरूरी हमले जरूर मिल रहे हैं। ईरान की इस पूरी तरह नाजायज जंग की वजह से आज पूरी दुनिया जिस बुरी तरह तेल और गैस की कमी का शिकार हो गई है, वह ट्रम्प को अपने घरेलू मोर्चे पर मध्यावधि चुनावों के ठीक पहले भी समझ पड़ रहा है, इसलिए वह कभी रूस पर से तेल बिक्री की रोक हटा रहा है, कभी ईरान पर से, लेकिन पारे की तरह अस्थिर उसके दिमाग और फैसलों की वजह से पूरी दुनिया एक आर्थिक अस्थिरता और अनिश्चितता में घिर गई है, और पूरी दुनिया अकेले ट्रम्प को गालियां दे रही है।
हम ट्रंप के चुनाव अभियान के वक्त से इसके अस्थिर चित्त को लेकर यह लिखते आए थे कि यह राष्ट्रपति बनने के लायक नहीं है, फिर जब अमरीकी वोटरों ने इसे चुन ही लिया, तो फिर हमने यह लिखना शुरू किया कि इसके दिमागी दिवालियापन को देखते हुए अमरीका की संसद को चाहिए कि इसे महाभियोग लगाकर हटाए। चूंकि संसद में बहुमत ट्रंप की पार्टी का है, इसलिए यह काम आसान नहीं होगा, लेकिन अमरीकी इतिहास इस बात को अच्छी तरह दर्ज करेगा कि ट्रंप के मंत्रिमंडल ने ऐसी दिमागी हालत वाले राष्ट्रपति को भी हटाने के बारे में कुछ नहीं किया। वहां के संविधान में यह प्रावधान है कि अगर राष्ट्रपति की दिमागी हालत दफ्तर संभालने लायक नहीं रहती, तो उपराष्ट्रपति के साथ बाकी मंत्री मिलकर राष्ट्रपति को हटा सकते हैं, और उपराष्ट्रपति को दफ्तर दे सकते हैं। हालांकि हमें इस बात में कुछ अधिक भला नहीं दिख रहा है क्योंकि वहां का उपराष्ट्रपति भी ट्रंप की ही टक्कर का नफरती, युद्धोन्मादी, और बद्दिमाग है। अमरीका ने दुनियाभर के बेकसूर देशों, वियतनाम से लेकर फिलिस्तीन और ईरान तक बमबारी में जितने लोगों को मारा है, उन सबकी बद्दुआ का असर है कि अमरीका को आज ऐसी सरकार मिली है।
एक दिन ऐसा आएगा जब कोई न कचरा उठाएगा, तब शहरों में कौन जी पाएगा?
23 मार्च 2026
भारत में जब-जब मानसून में किसी शहर में बाढ़ की नौबत आ जाती है, तो श्मशान वैराग्य की तरह पॉलीथीन-कचरे पर रोकथाम की बात होने लगती है। फिर जैसे-जैसे बाढ़ का पानी उतरता है, शहरी घरों से कीचड़ धुल जाता है, सडक़ों पर आवाजाही शुरू हो जाती है, लोग फिर से कचरा फैलाने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी तीर्थ से लौटते ही लोग नए उत्साह के साथ पाप करने में जुट जाते हैं। आज शहरों की हालत यह होती जा रही है कि नालियों को लोग घूरों की तरह इस्तेमाल करते हैं, हर नाली में तरह-तरह का कचरा पटा हुआ रहता है। लोग प्लास्टिक के कचरे को अधिक खतरनाक मानते हैं क्योंकि पतली झिल्लियां जगह-जगह फंस जाती हैं, और पानी आगे बढऩा बंद हो जाता है। लेकिन न सिर्फ सिंगल यूज प्लास्टिक कही जाने वाली ऐसी पतली झिल्लियों का खतरा है, बल्कि हर वह कचरा खतरा है जो कि नालियों में डाल दिया जाता है। इसके पीछे की अलग-अलग वजहों को समझने की जरूरत है।
एक तो यह कि भारत में निर्वाचित स्थानीय जनप्रतिनिधियों में जनता में अनुशासन लागू करने का हौसला नहीं रहता। महापौर या निगम-पालिका अध्यक्ष न किसी अवैध निर्माण को रोक पाते, न अवैध कब्जे को, और ऐसे में नालियों में कचरा फेंकने वाले लोगों को, या कि हर रात दुकान बंद करते समय बाहर सडक़ों पर पैकिंग का अपार कचरा छोडक़र जाने वाले लोगों पर किसी कार्रवाई की चर्चा भी औसत शहर में नहीं होती। हो सकता है कि देश के कुछ चुनिंदा शहरों में निर्वाचित प्रतिनिधि, और म्युनिसिपलों में तैनात अफसर दिल कड़ा करके कचरा फैलाने वालों पर कुछ सख्ती दिखाने की सोचते भी हों, लेकिन स्थानीय शासन की कुर्सियों पर बैठे अधिकतर लोगों को समझाने, और उनसे अमल करवाने के बजाय सरकारी खर्च पर कचरा इकट्ठा करवाने को अधिक सहूलियत का पाते हैं। नतीजा यह होता है कि जब जनता जिम्मेदार नहीं होती, तो घरों और बाजारों से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग छांटने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जिस कचरे को सड़ाकर खाद बनाई जा सकती है, या जो सडक़र खुद ही खत्म हो सकता है, ऐसे बायोडीग्रेडेबल कचरे के भी प्लास्टिक और दूसरे कचरे के साथ मिलाकर जब कचरा गाडिय़ों में डाला जाता है, तो फिर उसमें से प्लास्टिक अलग करके उसकी री-साइकिलिंग की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
कुछ आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालाना करीब एक करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, और इसमें से सिंगल यूज प्लास्टिक, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है, वह सिर्फ दो-तीन फीसदी रहता है। बाकी सारा कचरा अलग-अलग किस्म की पैकिंग का रहता है, जो अभी भी बिना रोक-टोक धड़ल्ले से चल रही है। अभी सरकार ने एक कानून बनाकर इतना जरूर किया है कि प्लास्टिक के अलग-अलग ग्रेड की पैकिंग इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को अपने इस्तेमाल जितनी मात्रा के उन ग्रेड के प्लास्टिक की री-साइकिलिंग के लिए भुगतान करना पड़ता है। इसके लिए सरकार की रजिस्टर्ड री-साइकिलिंग यूनिट्स हैं, लेकिन यह पूरा सिलसिला सरकारी फर्जीवाड़े से घिरा हुआ है, और जिस तरह गाडिय़ों के प्रदूषण वाले सर्टिफिकेट फर्जी तरीके से बन जाते हैं, वैसे ही प्लास्टिक री-साइकिलिंग के सर्टिफिकेट खरीद लिए जाते हैं।
शहरों में घरों से निकलने वाले कचरे को ही अलग-अलग करने का अभियान छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक उत्साही कलेक्टर के रहते हुए हुआ था, और वहां पर बड़ी संख्या में महिला स्व-सहायता समूह की सदस्यों को रोजगार भी मिल गया था। लेकिन खुद छत्तीसगढ़ में ही बाकी जगहों पर कभी ऐसी योजना का विस्तार नहीं हुआ। अंबिकापुर के प्रयोग की देश में राष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई थी, लेकिन देश में जिस तरह किसी एक जगह की कामयाबी को दूसरी जगह उपयोग करने की परंपरा नहीं है, उसके चलते अंबिकापुर गार्बेज सेग्रिगेशन के कामयाब प्रयोग का एक टापू बनकर रह गया। अभी कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई सुनाई पड़ी थी जिसमें जजों ने ठोस कचरे के निपटारे में सरकार की नाकामयाबी पर फिक्र और नाराजगी दोनों ही जाहिर की थी, लेकिन मोटेतौर पर यह नाकामयाबी स्थानीय जनप्रतिनिधियों की दहशत से उपजी रहती है, वे वोटरों को नाराज करने वाला कोई काम करना नहीं चाहते, और सरकारी खर्च पर वोटरों की आदत उसी तरह बिगाडऩा जारी रहता है, जिस तरह किसी बारात के जनवासे में बारातियों की आदतों को बिगाड़ा जाता है।
इस मामले में एक आखिरी मुद्दा और है, जो कि कम महत्वपूर्ण नहीं है, फिर चाहे हम उसकी चर्चा आखिर में क्यों न कर रहे हैं। भारत में सफाई कर्मचारियों को जाति व्यवस्था के तहत पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरागत रूप से उसी काम में जोते रखा जाता है। यह मान लिया जाता है कि बाकी समाज नालियों को घूरे की तरह इस्तेमाल करे, जितना चाहे उतना कचरा फैलाए, गटर साफ करते हुए मरने के लिए कुछ खास जातियों के सफाई कर्मचारी तो अगली कई सदियों तक रहेंगे ही। गरीब और नीची समझी जाने वाली जातियों के सफाई कर्मचारियों की अगली कई पीढिय़ों की गारंटी से लोगों में सफाई के लिए एक हिकारत पैदा होती है, और कचरा फैलाने के लिए उन्हें एक अपार आत्मविश्वास मिलता है। ऐसा लगता है कि भारत के सफाई कर्मचारियों को दस दिन के लिए छुट्टी पर भेज दिया जाए, और देश के सारे नागरिक यह देख लें कि कोई दिन ऐसा भी आ सकता है जब चारों तरफ इतना कचरा रहेगा, और सफाई कर्मचारी यह तय कर लेंगे कि वे इससे बेहतर कोई दूसरा काम कर लेंगे, तो उस दिन इस गंदगी को कौन साफ करेंगे, कौन कचरा उठाएँगे, या हटाएंगे, इसकी एक झलक कचरा फैलाने वाले लोगों को दिख जाना चाहिए। इससे कम में यह देश सुधरते नहीं दिख रहा है, यहां के स्थानीय संस्थाओं के निर्वाचित जनप्रतिनिधि, और वहां नियुक्त अधिकारी लोगों की आदतों को सुधारने पर कोई भरोसा नहीं करते, भला क्यों लोगों को नाराज किया जाए। यह सिलसिला थमना जरूरी है क्योंकि कोई न कोई ऐसा दिन आएगा जब सफाई कर्मचारी इस काम को करने से मना कर देंगे, या इतना भुगतान मांगेंगे कि म्युनिसिपलों के होश ठिकाने आ जाएंगे।
आभासी जिंदगी के सुख, सहूलियतों में उलझी, बर्बाद होतीं असली जिंदगियां…
22 मार्च 2026
दुनिया में इस बात पर भारी उत्सुकता रहती है कि क्या किसी और ग्रह पर भी कोई जिंदगी है? एक सबसे विकसित देश अमरीका अंतरिक्ष अभियानों में सबसे आगे भी रहता है, और वहां पर लोगों के बीच ऐसी साजिशों की कहानियां चलती ही रहती हैं कि कैसे बाहर से कोई उडऩतस्तरी आई, कैसे उसमें दूसरे ग्रहों के लोग उतरे। बहुत सारी खबरें तो ऐसी भी बनती हैं कि कोई दूसरे ग्रह का प्राणी अमरीकी सरकारी एजेंसियों के हाथ लग गया है, और उसके शरीर पर तरह-तरह के प्रयोग चल रहे हैं। यूएफओ और एलियन, अमरीकी जनता के बीच असली रहस्य की तरह बड़ी प्रचलित धारणाएंं हैं, और एआई से बनने वाले वीडियो-फोटो के दशकों पहले से अमरीका से यूएफओ और एलियन की तस्वीरें गढ़ी जाकर दुनिया भर में फैलती आई हैं। लेकिन अंतरिक्ष में दूसरे ग्रहों तक फैली हुई किसी संभावित जिंदगी से परे एक और जिंदगी इस धरती की जिंदगी से परे सामने आई है।
धरती के लोग अपनी असल जिंदगी के साथ-साथ अब एक आभासी जीवन भी जीते हैं। वे आज अपने घर-परिवार, और अपने असल दायरे के दोस्तों, सहकर्मियों, सहपाठियों से परे आभासी दुनिया के लोगों के साथ अधिक जी रहे हैं। फेसबुक या इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों को हर दिन घंटों व्यस्त रखते हैं, और अलग-अलग कई पीढिय़ों के लोग आज इस दिमागी हालत में रहते हैं कि उनकी असल जिंदगी वही ऑनलाइन वाली है, और जो ऑफलाइन, या जमीनी और असली जिंदगी है, उससे लोगों का लेना-देना घटते चल रहा है। यह सिलसिला एक खतरनाक हद तक बढ़ चुका है।
अब लोगों को खरीददारी करने बाजार नहीं जाना पड़ता, किसी असल इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, सब कुछ ऑनलाइन हो जाता है। लोगों को खाने-पीने के लिए किसी इंसान से बात नहीं करनी पड़ती, मोबाइल ऐप से खाना ऑर्डर हो जाता है, और अगर पहले से भुगतान किया हुआ रहे तो डिलीवरी करने वाले लोग दरवाजे पर छोडक़र चले जाते हैं। बिना किसी मानवीय संपर्क के ट्रेन या प्लेन की टिकटें बुक हो जाती हैं, कार किराए पर मिल जाती है, और तो और अगर भाड़े पर कुछ देर के लिए संगी चाहिए, तो वैसी एस्कॉर्ट सर्विस भी ऑनलाइन हासिल है। किसी भी तरह के भुगतान के लिए, किराना या फल-सब्जी खरीदने के लिए किसी इंसान से बातचीत जरूरी नहीं रह गई है।
इससे परे लोग अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में सबसे करीबी और सबसे भरोसेमंद दोस्त ऑनलाइन भी, और बहुत से मामलों में शायद, ऑनलाइन ही बनाने लगे हैं, उन्हीं से राज बांटने लगे हैं, उन्हीं के सुख-दुख मायने रखते हैं, और लोग उसे काफी भी समझने लगे हैं। दरअसल आभासी दुनिया के ऑनलाइन रिश्तों में कोई असल नकारात्मक बात नहीं रहती। सब कुछ नकली रहता है, सांसों की बदबू, बदन से उठने वाली आवाजें, कुछ भी ऑनलाइन रिश्तों को परेशान नहीं करते। लोगों को किसी के बारे में कुछ भी सच पता लग जाए, यह जरूरी नहीं रहता। लोग अंधाधुंध झूठ बोल सकते हैं, और बरसों तक एक मुखौटा ओढक़र रह सकते हैं। ऐसा सहूलियत का झूठ असल जिंदगी में मुमकिन नहीं रहता। ऑनलाइन रिश्ते कुछ-कुछ खरीदे हुए देह-सुख सरीखे रहते हैं जिनके साथ असल लंबी जिंदगी की जिम्मेदारियां जुड़ी हुई नहीं रहतीं। ऐसे में ऑनलाइन सहूलियत को छोडक़र असल जिंदगी की खुरदुरी हकीकत बहुत से लोगों को नहीं सुहाती, और वे ऑनलाइन ही खुश रहने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक शोधकर्ता लगातार यह महसूस कर रहे हैं कि आज नौजवानों की जिंदगी में मेटावर्स (फेसबुक, वॉट्सऐप, और इंस्टाग्राम की कंपनी मेटा में उलझे हुए लोगों की दुनिया) का हिस्सा उनकी असल जिंदगी से अधिक बड़ा होते जा रहा है। वे रोज की अपनी जिंदगी में जितना वक्त दूसरे इंसानों के साथ जीते हैं, असल जिंदगी की धरती पर काम करते हैं, उससे कहीं अधिक वक्त वे मेटावर्स पर गुजारते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लाखों-बरसों में इंसान के मिजाज में धीरे-धीरे करके जो सामाजिकता आई थी, वह अब एक पीढ़ी के भीतर ही तेजी से कमजोर पड़ रही है। असली रिश्ते, भावनाएं, और सामाजिक संपर्क कमजोर होते चल रहे हैं। अमरीकी साइकोलॉजिकल एसोसिएशन, और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोध नतीजों में यह पाया गया है कि मेटावर्स का लंबे समय तक इस्तेमाल लोगों को अकेलेपन के पैमाने पर बहुत अधिक अकेला कर देता है। जो लोग रोज तीन घंटे से ज्यादा मेटावर्स में जीते हैं, उनमें अकेलापन, उदासी, और सामाजिक अलगाव की भावना अधिक बढ़ जाती है। अब लोग मेटावर्स पर भी अपने खुद के चेहरे के बजाय अपनी पसंद के बनाए गए अवतार की शकल में सामने आते हैं, और वे धीरे-धीरे अपनी खुद की हकीकत से भी कट जाते हैं। भारत में 2025 में बेंगलुरू के देश के सबसे बड़े मानसिक केन्द्र, निम्हंस और एम्स-दिल्ली के एक संयुक्त अध्ययन में यह पता लगा कि 18 से 25 साल उम्र के लोगों में से 64 फीसदी लोग रोज दो-चार घंटे मेटावर्स पर गुजारते हैं, इनमें से 47 फीसदी ने यह माना है कि उनकी अपने असली दोस्तों से बात करने की इच्छा अब कम हो गई है। इस अध्ययन के 39 फीसदी नौजवानों में सामाजिक बेचैनी बढ़ी है, वे वास्तविक दुनिया में बात करने से डरते हैं, और अपने गढ़े हुए अवतार के पीछे से बात करने में सुरक्षित महसूस करते हैं। इस शोध के नतीजे बता रहे हैं कि आभासी दुनिया असल जिंदगी का पूरक नहीं बन रही है, वह असल जिंदगी को बेदखल ही कर दे रही है।
2025-26 में आईआईटी दिल्ली, और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईंसेज मुम्बई के एक साझा अध्ययन, डिजिटल डी-टॉक्स में यह बात सामने आई कि जो नौजवान सात दिन तक मेटावर्स से दूर रहे, उनकी नींद 31 फीसदी बेहतर हुई, फिक्र एक चौथाई घट गई, और परिवार के साथ वक्त गुजारने की उनकी इच्छा बढ़ी। ऐसे कुछ अध्ययन बतलाते हैं कि लोग अपने गढ़े हुए चेहरे-मोहरे, और तस्वीरों के पीछे से आभासी जीवन जीते हुए अपने असली तन-मन की फिक्र करना भूल जाते हैं, और घंटों ऑनलाइन बैठे हुए वे अपने तन और मन दोनों को बर्बाद कर लेते हैं।
ये मुद्दा असीमित है, इस पर एक पूरी किताब भी कम पड़ सकती है, लेकिन हम आज लोगों को नकली-आभासी जिंदगी के खतरे, और असली जिंदगी की उपेक्षित संभावनाओं के बारे में आगाह भर करना चाहते हैं। लोगों को आभासी जीवन को ही सब कुछ मानकर असली जिंदगी, असली इंसानों, और असली रिश्तों की उपेक्षा के खतरे में नहीं पडऩा चाहिए। असल जिंदगी अधिक चुनौतियों भरी जरूरी रहती है, लेकिन चुनौतियों के साथ ही संभावनाएं इंसानों को परिपक्व और बेहतर बना सकती हैं। मुखौटों के पीछे छुपी हुई ऑनलाइन संभावनाएं बिना चुनौतियों के रहती हैं, लोग अपने गढ़े हुए झूठ को किसी परीकथा की तरह आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह झूठ उन्हें किसी किनारे नहीं ले जा सकता।
अमरीका सहित योरप के कई बड़े देशों में मेटा प्लेटफॉम्र्स पर कई तरह के मुकदमे चल रहे हैं। इनमें बच्चों की मानसिक सुरक्षा की उपेक्षा करना एक आरोप है, लेकिन इसके अलावा भी लोगों को अपने प्लेटफॉर्म की लत में उलझा देना, यह दूसरा बड़ा आरोप है। मेटा के प्लेटफॉम्र्स जिस तरह नशा बन जाते हैं, उसे लेकर अमरीका में ही चल रहे एक मुकदमे की तुलना तम्बाकू कंपनियों की लत लगाने के एक पुराने मामले से की जा रही है। एक मामला यह भी चल रहा है कि फेसबुक ने किस तरह इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप खरीदकर सोशल मीडिया में अपना एक एकाधिकार बना लिया है, और जो लोग इस ककून में फंस जाते हैं, वे इससे बाहर ही नहीं निकल पाते। एक मुकदमा यह भी चल रहा है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम बच्चों को फंसाने वाले मुजरिमों की चारागाह बन गए हैं। जो जिम्मेदार देश हैं, वहां पर मेटा जैसी कंपनियों पर अरबों डॉलर के जुर्माने लग चुके हैं, लेकिन अधिकतर देश अपने बच्चों, नौजवान पीढ़ी, और बाकी लोगों की मानसिक सेहत, उनकी निजता को लेकर अधिक फिक्रमंद या जिम्मेदार नहीं हैं, इसलिए वहां पर जनता को आभासी दुनिया के इस बेताज तानाशाह, मार्क जुकरबर्ग से बचाने वाले कोई नहीं हैं। समाज के भीतर के लोगों को डिजिटल और ऑनलाइन तानाशाही के इस नए साम्राज्य के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा, आवाज उठानी पड़ेगी, वरना लोकतांत्रिक सरकारें भी अपनी राजनीतिक साजिशों में मेटा जैसी कंपनियों का साथ पाने के लिए उनके जहरीले असर को छूट देती रहेंगी।
पर्यटन संभावनाओं को बढ़ा सकता है चिकित्सा-पर्यटन
22 मार्च 2026
भारत बहुत सारी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच जीने वाला देश है। यहां एक तरफ आम जनता को हासिल सरकारी अस्पताल बदहाल हैं, कई प्रदेशों में तो इलाज का ढांचा इतना कमजोर है कि लोगों को पास के किसी महानगर जाकर वहां संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी तरफ ऐसा कोई दिन नहीं होता जब देश के किसी न किसी शहर में कोई बहुत महंगा अस्पताल शुरू न होता हो, या कोई बड़ा सा डायग्नोस्टिक सेंटर न बनता हो। अमीर और गरीब के बीच बंटी हुई दो किस्म की चिकित्सा-सुविधाओं के अलावा एक तीसरे किस्म की चिकित्सा सुविधा देश में और विकसित होती चल रही है, और वह है दूसरे देशों से इलाज के लिए भारत पहुंचने वाले संपन्न विदेशियों की। दुनिया के संपन्न और विकसित देशों में इलाज इतना महंगा है कि वहां चिकित्सा बीमे के लिए लोगों को बड़ी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। ऐसे में न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के कुछ दूसरे कम महंगे देशों की तरफ भी मरीजों का जाना चलते रहता है। और तो और एक महंगे देश ब्रिटेन से दूसरे देशों में, हंगरी, टर्की, पोलैंड, रोमानिया, स्पेन, पुर्तगाल, थाइलैंड, मैक्सिको, और भारत दांतों का इलाज कराने के लिए हर दिन हजारों लोग चले जाते हैं, और यह इलाज इन दूसरे देशों में ब्रिटेन के मुकाबले खासा सस्ता पड़ता है।
भारत के बारे में यह समझने की जरूरत है कि इतने विशाल देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम अलग-अलग रहता है, और दूसरे देशों से आने वाले लोगों को अपनी पसंद और प्राथमिकता के भारतीय इलाके मिल जाते हैं। फिर यहां के महंगे अस्पताल विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले हैं, हिन्दुस्तानी डॉक्टर पूरी दुनिया में कामयाबी से काम करते हैं, हर विकसित देश में भारतीय नर्सें दिख जाती हैं, और अब कोई ऐसी अंतरराष्ट्रीय आधुनिक चिकित्सा-मशीनें नहीं हैं जो कि भारत में न हों। ऐसे में महंगे देशों के मुकाबले भारत में इलाज का खर्च काफी कम पड़ता है, यहां मरीजों के साथ रहने वाले परिवार को भी बाहर सस्ते में मकान या होटल मिल जाते हैं। इसके साथ-साथ जब वे हिन्दुस्तान आ ही जाते हैं, तो वे ऑपरेशन या लंबे इलाज के साथ-साथ देश के अपने पसंदीदा हिस्से में घूमने भी जा सकते हैं। मरीजों और उनके परिवारों का इलाज का ऐसा भारत भ्रमण उन्हें कुल मिलाकर सस्ता और सहूलियत का पड़ता है। कई किस्म के महंगे इलाज पर अमरीका के मुकाबले भारत में एक चौथाई से भी कम खर्च आता है। भारत से जाकर दूसरे देशों में बसे हुए, और भारतीय पैमानों पर संपन्न हो चुके मरीज तो बड़े इलाज के लिए हिन्दुस्तान आते ही हैं, खाड़ी के देशों के संपन्न लोगों के लिए भी हिन्दुस्तान एक बड़ी पसंद है।
भारत और अंतरराष्ट्रीय जुबान में इसे भारत का मेडिकल टूरिज्म कहा जाता है। अब इस देश में बड़े अस्पतालों के ढांचे जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, हर तरह का पर्यटन भारत में जिस तरह बढ़ रहा है, वह देखने लायक है। इस क्षेत्र के एक जानकार विशेषज्ञ से अभी बीच में रूककर ही हमने बात की, तो पता लगा कि देश के कुछ सबसे बड़े निजी अस्पतालों का 30-40 फीसदी बिल तो विदेशी मरीजों का ही बन रहा है, और उनकी वजह से भारत के मरीजों का इलाज कुछ कम दाम पर हो जाता है। उन्होंने बताया कि आंध्रप्रदेश में तो पर्यटन विकास निगम मेडिकल टूरिज्म और वेलनेस टूरिज्म को अभियान के रूप में जोड़ चुका है, और इसकी वेबसाइट पर इसे अलग से बढ़ावा दिया जा रहा है। आंध्र की राजधानी में दो सौ एकड़ में एक मेगा ग्लोबल मेडिसिटी बनाई जा रही है, जो कि अंतरराष्ट्रीय मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देगी। इसी से जुड़ी हुई जानकारी खंगालते हुए यह दिखा कि केन्द्र सरकार ने अपने ताजा बजट में ऐसे पांच क्षेत्रीय मेडिकल केन्द्र बनाने की घोषणा की है, और टीडीपी के चन्द्राबाबू नायडू तो ऐसा फायदा उठाने वाले सबसे पहले राज्य रहेंगे ही।
भारत में एक-दो निजी कंपनियां ऐसी हैं जो कि दुनिया भर में भारतीय चिकित्सा सुविधाओं की मार्केटिंग करती हैं, और चिकित्सा सुविधाओं के साथ-साथ वे पर्यटन संभावनाओं की जानकारी देकर भी दुनिया भर से मरीजों और उनके परिवारों को भारत भ्रमण के लिए लाती हैं, साथ-साथ इलाज भी। देश में पर्यटन की संभावनाएं, और इलाज की संभावनाएं किस तरह मिलकर एक गाड़ी के दो पहिए बन सकती हैं, यह कोई रहस्य की बात नहीं है, कुछ प्रदेश इसमें दूसरे प्रदेशों के मुकाबले आगे हैं, और कुछ दूसरे प्रदेश आज घरेलू देसी मरीजों का भी मामूली इलाज करने लायक नहीं है, इसलिए वे सिर्फ ताजमहल और बनारस के पर्यटन के मोहताज हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों को इस मिलीजुली संभावना के बारे में अपने मौजूदा ढांचे को तौलना होगा। अगर कोई राज्य इन दो में से किसी एक पैमाने पर पिछड़ा रहेगा, तो वह दूसरे मोर्चे की संभावनाओं को भी खो बैठेगा। आज भारत एक संघीय ढांचे के तहत अलग-अलग राज्यों के बीच आपसी मुकाबले भी देखता है, केन्द्र सरकार अकेले ही किसी एक राज्य को अंधाधुंध बढ़ावा नहीं दे सकती, और खासी कोशिश कर रहे किसी राज्य को रोक भी नहीं सकती। देश के अलग-अलग राज्यों में प्राकृतिक और मानव निर्मित पर्यटन संभावनाएं अलग-अलग हैं। कुछ राज्यों को हिमालय नसीब है, कुछ को समंदर, कुछ को वन्यप्राणी मिले हुए हैं, तो कुछ को ताजमहल जैसी ऐतिहासिक इमारतें। अच्छे निजी अस्पताल जिनमें विश्वस्तरीय सुविधाएं हों, उन्हें कोई भी राज्य सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर बढ़ावा दे सकती है। यह मुकाबले का एक खुला बाजार है, और कल्पनाशील राज्यों की संभावनाएं अपार हैं। हमारा यह भी नहीं मानना है कि विदेशी मरीजों के आने से भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं व्यस्त हो जाएंगी, और उनकी वजह से देसी मरीजों को अस्पताल नहीं मिलेंगे। पूरी दुनिया का तजुर्बा यह है कि अधिक फीस देने में सक्षम छात्र हों, या मरीज, उनकी वजह से स्थानीय और घरेलू लोगों को रियायत मिल पाती है। ब्रिटेन जैसे बहुत से ऐसे देश हैं, जहां पर विदेशी छात्र-छात्राओं को खासी अधिक फीस देनी पड़ती है, और उसी वजह से वहां के घरेलू बच्चों को कम फीस में ऊंची और अच्छी पढ़ाई मिल पाती है। भारत में तो अगर विदेशी सैलानियों से कमाई न रहे, तो ताजमहल तक का रखरखाव ठीक से न हो पाए, और घरेलू सैलानी वहां की गंदगी देखकर जाना बंद कर दें। इसलिए हर विदेशी सैलानी हमलावर नहीं होते, वे यहां धर्मप्रचार के लिए, या देश पर कब्जा करने के लिए नहीं आते, वे यहां की अर्थव्यवस्था में कुछ न कुछ जोडक़र ही जाते हैं।
पर्यटन, और चिकित्सा-पर्यटन की मिलीजुली संभावनाएं इन दोनों क्षेत्रों की अलग-अलग संभावनाओं के मुकाबले खासी अधिक हो सकती हैं। राज्यों को कल्पनाशील होकर बाजार व्यवस्था के साथ तालमेल बनाकर इस तरफ बढऩा चाहिए, इससे राज्य को जो कमाई होगी, उससे भी गरीब मरीजों के लिए कुछ किया जा सकेगा, और विश्वस्तरीय निजी चिकित्सा का खर्च उठाने लायक भी कई भारतीय मरीज भी रहते हैं, उनको भी इस देश के पर्यटन केन्द्रों के आसपास बेहतर इलाज मिल सकेगा। हर महंगी चीज जनविरोधी नहीं होती, बहुत सी महंगी चीजों से मिलने वाले टैक्स से ही तो गरीबों का भला हो पाता है।
बिना ईमानदार अमल के पुराने कानून खारिज करके नए बनाने से क्या हासिल?
21 मार्च 2026
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने अभी दो नए विधेयक पास किए हैं, और राज्यपाल से इन पर मंजूरी मिल जाने पर वे कानून बन जाएंगे। भारत में जैसी राजनीतिक परंपरा है, उसके मुताबिक यह बात साफ है कि जिस पार्टी की राज्य सरकार रहती है, केन्द्र से अगर उसी पार्टी की सरकार ने राज्यपाल नियुक्त किए हैं, तो वे उस सरकार के भेजे विधेयकों पर अड़ंगा नहीं लगाते। छत्तीसगढ़ में एक कानून धार्मिक स्वतंत्रता का है जिसमें धर्मांतरण करवाने वाले लोगों पर पहले के मुकाबले कई गुना अधिक कड़ी कार्रवाई का इंतजाम है। पहले भी लालच देकर, दबाव डालकर, या प्रताडि़त करके, धोखा देकर धर्मांतरण करवाने पर सजा का इंतजाम था, अब उस सजा को इस नए विधेयक में बहुत बढ़ा दिया गया है। यह एक अलग बात है कि देश के अलग-अलग कई राज्यों के इसी तरह के धार्मिक स्वतंत्रता, या धर्मांतरण विधेयकों, या कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, और उन पर एक साथ सुनवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने जो दूसरा विधेयक पास किया है, वह किसी भी तरह के इम्तिहान में पर्चे आउट करने वाले लोगों को बड़ी लंबी और कड़ी सजा देने का है। इसमें नकल करने वाले लोगों को भी कई बरस के लिए अपात्र कर दिया जाएगा, और साजिश के तहत पेपर लीक करने वालों को उम्रकैद तक की सजा, एक करोड़ तक का जुर्माना नए कानून में रहेगा, और उनकी सम्पत्ति जब्त करके उससे भी जुर्माना वसूल किया जाएगा। दोनों ही कानून बहुत कड़े हैं, और दोनों में ही उम्रकैद जैसे प्रावधान रखे गए हैं, जो कि आमतौर पर सामूहिक बलात्कार, या कत्ल जैसे हिंसक अपराधों में ही रहते आए हैं।
देश की सरकार को, या हर प्रदेश को अपनी विचारधारा के मुताबिक कानून बनाने का हक है, और उसके लिए संसद या विधानसभाओं में जितने बहुमत की जरूरत रहती है, वह अगर सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी को हासिल है, तो फिर सदन में असहमति कोई मायने नहीं रखती। संसदीय व्यवस्था, और परंपरा यही है कि बिना किसी बहस के ध्वनिमत से भी विधेयक पास हो जाते हैं, और विपक्ष अपनी असहमति को दर्ज कराने के लिए मतदान में हारने के बजाय कई बार सदन छोडक़र भी चले जाता है। लेकिन जहां कहीं भी कोई नया कानून बनता है, वहां एक लोकतांत्रिक परंपरा शुरू करने की जरूरत है। चूंकि सदनों में चर्चा का माहौल घटते चल रहा है, बहुत से मुद्दों पर विपक्ष को सदनों में बोलने की इजाजत ही नहीं मिलती, इसलिए इसे सरकार की जिम्मेदारी बनाना चाहिए कि वह सदन के अलावा सडक़ के लोगों को भी अपनी बात समझाने के लिए सरल शब्दों में यह बताए कि इस नए कानून की जरूरत क्या है। लोगों की राजनीतिक चेतना के लिए यह जरूरी है कि जटिल कानूनों की सरल व्याख्या उनके सामने रखी जाए। वैसे तो सरकारें यह कह सकती हैं कि वे विधेयकों को पेश करने के पहले उन पर जनता की राय जानने के लिए वेबसाइट पर लोगों से रायशुमारी करती हैं, लेकिन आम जनता वेबसाइट पर भी जटिल बातों को न पढ़ पाती है, न उन पर प्रतिक्रिया दे पाती है। इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे अपने विधेयकों को एक सामाजिक ऑडिट के लिए जनता के सामने भी पेश करें। अब सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र में जनता के सामने कुछ पेश करने का एक माध्यम मीडिया होता है, लेकिन अगर उसके लोग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए तल्ख सवाल न करें, और महज डिक्टेशन लेकर, बयान रिकॉर्ड करके लौट जाएं, तो जनता के लिए जरूरी उसका लोकतांत्रिक हक किनारे धरा रह जाता है।
सामाजिक ऑडिट से हमारा एक मतलब यह भी है कि सरकारों को यह साफ करना चाहिए कि मौजूदा कानूनों में कौन सी कमी थी जिसकी वजह से नए कानून की जरूरत आन पड़ी है। क्या जांच की कमी, सुबूत दर्ज करने की कमजोरी, बेअसर हद तक धीमी हो चुकी अदालतें कानूनों के बेअसर होने के लिए जिम्मेदार हैं, या कि इन सब पहलुओं के मजबूत कर देने के बाद भी मुजरिम छूट जा रहे हैं, उन्हें सजा का खौफ नहीं रह गया है? आमतौर पर हमारा तजुर्बा यह है कि सरकारें मौजूदा कानूनों का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पातीं, जांच में कमी रहती है, सुबूत ठीक से दर्ज नहीं होते हैं, गवाही समय पर और सही तरीके से नहीं हो पाती, अदालत में सरकारी वकील कमजोर पड़ जाते हैं, और हर स्तर पर कुछ बाहरी वजहें भी असर डालने लगती हैं, जिनसे मुजरिमों को सजा नहीं हो पाती। अब अगर मौजूदा कानून, और उनकी जगह आने जा रहे अधिक कड़े कानून दोनों पर अमल की तुलना करें, तो अगर अमल ही कमजोर है, तो नया अधिक कड़ा कानून भला किस काम आएगा? अभी एक-दो दिन पहले ही दो नौजवानों को देश के एक सबसे कड़े और खतरनाक कानून यूएपीए से अदालत ने शायद सात बरस बाद रिहा कर दिया कि उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त सुबूत नहीं थे। अब जिस एक सबसे बड़े कानून के तहत पांच-पांच बरस तक तो जमानत नहीं होती, उस कानून की जगह अगर और कड़ा कानून भी लागू कर दिया जाए, और उसके तहत दस-दस बरस तक जमानत न हो, और सुबूतों के अभाव में अदालत से लोग छूट जाएं, तो ऐसे अधिक कड़े कानून किस काम के रहेंगे? सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि क्या सरकारें मौजूदा कानूनों का पूरी हद तक इस्तेमाल करने के बाद भी, पूरी बारीकी बरतने के बाद भी असफल हो रही हैं? अगर ऐसा है तब तो नए अधिक कड़े कानून की जरूरत है, वरना ऐसे कानून जनता को संतुष्ट करने के लिए अधिक बनते हैं कि सरकार किसी मामले में कितनी गंभीर है।
आज हेलमेट न लगाने पर दुपहिया चालकों पर अगर पांच सौ रूपए का जुर्माना है, और किसी का भी चालान नहीं हो रहा है, तो क्या हजार रूपए जुर्माना करने से लोग हेलमेट लगाने लगेंगे? जब चालान ही नहीं होते हैं, तो महज जुर्माना बढ़ाते चलने से कानून पर अमल नहीं बढ़ जाता। सरकारों को जनता के सामने यह खुलासा करना चाहिए कि नए अधिक कड़े कानूनों की जरूरत क्यों आ पड़ी हैं? संसदीय व्यवस्था में बहुमत से कानून बनाने का हक सरकार को है, और हम किसी एक कानून के गुण-दोष पर यहां बात नहीं कर रहे, हमारा सिर्फ यही कहना है कि एक कानून का सही और जायज इस्तेमाल किए बिना दूसरा नया कानून बना लेने से कुछ नहीं होता। और यह बात हम सिर्फ छत्तीसगढ़ के संदर्भ में नहीं कह रहे हैं, हम लंबे समय से देश-प्रदेश के ऐसे कानूनों को लेकर यही सैद्धांतिक बात करते आए हैं कि सरकारों को कानूनों पर अमल की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी की कमी को छुपाने के लिए नए कानूनों का सहारा नहीं लेना चाहिए, इससे कुछ समय के लिए तो लोगों को लग सकता है कि सरकार कुछ कर रही है, लेकिन ये कानून जिन मकसद को बताते हुए बनाए जाते हैं, वे मकसद पूरे नहीं होते।











